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00:00:01:27 ठीक है तब तक मैं शुरू कर देता हूं। श्री मंगल मूर्त नमः श्री गुरु नमः बोध परम सुंदर एकदंतम पितांबरम त्रिनयनम परम पवित्र बुद्ध दिवाकर कांतिकांत विघ्नेश्वरम सकल विघ्नहरम नमामि वाद विश्वेश्वम धर्म मार्ग प्रवर्तकम वंदे श्री हरिहरं कर पात्रम जगत हरि ओम तत्सत श्रीमद ते
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00:00:34:04 रामचंद्राय नमः ओम नमः परम हंसा स्वादित चरण कमल जन्म करंदाय भक्त जनमान मानस निवासाय श्री रामचंद्राय श्री राम जय
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00:00:46:00 राम जय जय राम जय राम जय जय राम जय जय राम श्री राम जय राम जय जय राम श्री राम श्री राम जय राम जय जय जय राम श्री राम जय राम जय जय राम श्री राम जय राम जय जय राम राम धर्म की जय हो नाश हो प्राणियों में विश्व का कल्याण हो गौ माता की जय हो गौ हत्या बंद हो भारत अखंड हो भारत
00:01:37:03 सेना हिंदू सनातनी हो हम भारत भव्य बनाएंगे हम हिंदू राष्ट्र हिंदू राष्ट्र भारतवर्ष की जय हो हिंदू राष्ट्र भारतवर्ष की जय हो जय हो प्रातः स्मरणीय भगवत पूज्यपाद श्रीमद् परमहंस चरणारविंद सर्व तंत्र स्वतंत्र अनंतानंद श्री समलंकृत ऋग्वेदीय अपूर्वानाय श्री
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00:02:05:08 गोवर्धन पुरी पीठाधीश्वर अनंत श्री विभूषित श्रीमद जगुरु शंकराचार्य गुरुदेव भगवान की जय हो
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00:02:13:06 नमः पार्वती पतय हर हर चलिए भगवान श्री गणेश की कृपा से शुरू करते हैं और शिवास जी को भी मैं देख पा रहा हूं यहां पर वो भी ज्वाइन हो गए हैं। तो कुल मिलाकर दो टीमें बनी हैं और पहली टीम जो साकार पक्ष की है उसे हर्ष कुमार झा जी लीड कर रहे हैं और दूसरी निराकार पक्ष की जिसे स्वयं शिवश जी ही लीड कर रहे हैं। तो हम उसका इसका प्रारूप आप सब समझ गए हैं किस तरह से होगा।
00:02:54:09 जी तो शुरू शुरू करते हैं। तो पहले साकार पक्ष से हर्ष जी आप अपने टीम को के सदस्य को या आप आप स्वयं को बोलेंगे जो भी आपको अपने पॉइंट शेयर करने हैं। उसके बाद निराकार पक्ष अंतिम में अपने जो क्लोजिंग पॉइंट है वो वो टीम लीड या फिर टीम लीड के द्वारा चयनित कोई भी सदस्य जो है वो उस माध्यम से उसको क्लोज कर देगा। ठीक है? अ
00:03:32:07 और ठीक है। इसमें समय का मैं देख लेता हूं इसमें कि मैंने नोट किया था कि नहीं। समय इसमें पूरी तरह से दोद दोद मिनट बोलने का समय है इसमें दोद मिनट है तो नहीं तो फिर दो दो मिनट तो दो मिनट से कम में बात पूरी रखी जा पाएगी ना ना ना दो मिनट से कम में नहीं रखी जाएगी हां तो दोद मिनट करते हैं मैं टाइमर लगा लूंगा और मोस्ट ज्यादा ज्यादा हुआ तो वो प्लस माइनस 15 सेकंड हो जाएगा तो कोई समस्या नहीं है उसमें लेकिन जभी भी 2 मिनट पूरा हो जाएगा या होने वाला होगा तो मैं टोक दूंगा मेरे ख्याल से बोलने की समय सीमा ना रखी जाए तो उचित रहेगा तो तो उसके हिसाब से फिर मुझे अपने ही विवेक से फिर रोकना पड़ेगा और यह ध्यान रहे कि जब भी भी कोई भी इस अपनी बात से भटकने की कोशिश करेगा ठीक है तो मेरे द्वारा उसे से टोका जा सकता है। तो कृपया इस इस बात का स्मरण
00:04:47:15 दें आप सभी लोगों को। जी मेरी टीम में मेरी टीम का में कौन-कौन है एक बार जरा बता दें। पता है आपको? जी जी जी तो एक मिनट रुकिए मैं क्लोज कर दिया मैंने। हां। तो आपकी टीम में तनुष प्रताप सिंह जी, मोहम्मद हैदर अली शेख जी, किरण दीक्षित जी, नयन चक्रवर्ती जी, सुजीत पाटिल जी और आप स्वयं हम ठीक है तो आपको देखिए एक मैं बहुत सरलता कर दूं इसमें देखिए ऐसा है कि जो सगुण साकार के पक्ष से जो लोग हैं
00:05:31:06 तो उनके पक्ष में निराकार पक्ष भी है। है ना? तो फिर निरा निराकार पक्ष क्या है? निराकार पक्ष वह है जो सगुण ईश्वर के सगुण साकार स्वरूप को नहीं मानता नहीं पूजता ना ही प्रामाणिक रूप से मानता है ना ही तार्किक रूप से मानता है ना ही उसकी पूजा या मूर्ति पूजा इत्यादि का समर्थन करता है तो निराकार पक्ष का पक्ष यही है कि वह सगुण साकार का विरोधी है उसको सगुण साकार का खंडन करना है निराकार पक्ष को ठीक है और यह सिद्ध सिद्ध करना है कि ईश्वर का अवतार नहीं हो सकता। उसका सगुण साकार स्वरूप नहीं हो सकता। उसको निराकार को सिद्ध नहीं करना है। निराकार हो सकता है कि नहीं हो सकता यह नहीं सिद्ध करना है। यह तो सामने वाली सामने वाला जो दल है वो भी मानता है कि ईश्वर निराकार और साकार दोनों ही है। तो इसका पक्ष यही है कि उसको केवल निराकार में सीमित करना है। ठीक है? तो शुरू सामने वाली टीम से ही किया जाए। समोर साकार से फिर हम पक्ष से हमारी तरफ से वो करेंगे। जी ये अपने स्टार्टिंग
00:06:46:09 पॉइंट्स कृपया रखना शुरू करें। हर्ष कुमार झा जी और उनकी टीम सभी को जय श्री कृष्ण जय श्री राम हर हर महादेव हर हर महादेव ईश्वर परम कृष्ण सच्चिदानंद विग्रह अनादिरादि गोविंद सर्व कारणम सच्चिदानंद रूपाय विश्वत हेतवे तापत्रय विनाशाय श्री कृष्णााय वयं नमः तो मैं सबसे पहले यह यह अपना पक्ष रखता हूं कि हमारे जो ईश्वर हैं वो साकार में साकार रूप में अपने नित्योक में निवास करते हैं। वो निराकार शक्ति अपने धारण करते हैं और वह साकार सगुण साकार भी होते हैं। अपने भक्तों की इच्छा से दुष्टों का संार करने के लिए धर्म स्थापना के लिए यह मेरा पक्ष है।
00:07:55:15 ठीक है। तो अ जो हमारी टीम है उससे कोई काउंटर करना चाहेगा इनको? जी किरण जी। बोले हां तो आपने कहा कि आपका जो साकार ईश्वर है वो नित्य लोक में रहते हैं। इस नित्य लोक को जरा समझाएंगे।
00:08:32:00 नित्य लोक नित्य लोक का अर्थ है कि वो जहां पे अपने सगुण साकार रूप धारण करके वो लोक के रूप में भी और अपने एक साकार मतलब एक चतुर्भुज स्वरूप में या फिर अपने दिव्य स्वरूप में भी वहां पर निवास करते हैं, नित्य लीला करते हैं। वो नित्य लोकक मोक्ष धाम, श्री गोलोक धाम या फिर साकेत धाम, वैकुंठ धाम, कैलाश धाम इत्यादि है। नित्य लोक का आशय यही है कि वह कभी नष्ट नहीं होता। वो साकार रूप में वहीं पर रहता है। वो अपने आप को अदृश्य अवश्य कर लेते हैं। लेकिन वो अवश्य वहां पर रहता है।
00:09:15:25 तो यह जो नित्य लोकक है वो मतलब हम जहां पर है अभी भूलोक में वो नित्योक यहां पर नहीं है क्या यहां तो परमधाम ही तो कह रहे हो ना परमधाम को ही तो आप नित्योलोक कह रहे हो ना जी परमधाम जहां पे भगवान अपने साकार दिव्य स्वरूप में वहां पे निवास करते और यहां इस धरती लोक पे ईश्वर सर्वव्यापकता अपने निराकार स्वरूप में भी है। और जब चाहे वो साकार स्वरूप भी धारण करके अपने भक्तों के साथ लीला करने या धर्म स्थापना जो भी उनका उद्देश्य होता है वो अपनी इच्छा अनुसार यहां पे भी आते हैं। लेकिन यह जो लोक है यह नश्वर है। स्वयं भगवान श्री में ये विलीन हो जाता है। अंत में नहीं नहीं ये लोक तो माया है। लेकिन आपने कहा कि परमधाम वहां है और यहां नहीं है तो फिर वो नित्य कैसे रहा
00:10:22:24 ये तो का नित्य का अर्थ है कि वो हमेशा रहने वाला लोक है। यानी कि नहीं है लेकिन देश और परिस्थिति से प्रभावित है। जी वो काल से प्रभावित नहीं हो सकता और वो अपने दिव्य लोक जो है अगर आप ये सृष्टि को देखा जाए तो ये सृष्टि भगवान के शरीर में ही कल्पित मानी जाती है। भगवान के शरीर में ही श्री विग्रह में ही ये शरीर है। उन्हीं में उत्पन्न होता है। उन्हीं में लय हो जाता है। भगवान तब प्रकट करते हैं। ये सत्ता मात्र
00:11:03:22 है। परमधाम तो हर जगह होना चाहिए ना। परमधाम का मतलब क्या है? जिस पर सब कुछ टिका हो। तो आप यह नहीं कह सकते कि परमधाम वहां है और यहां पर नहीं है। है ना? सिर्फ काल से प्रभावित को भी सनातन नहीं कहा जाता। जो देश काल परिस्थिति से प्रभावित ना हो उसे ही सनातन या नित्य कहा जाता है। आपका तो देश से प्रभावित हो रहा है कि वो वहां है यहां नहीं है। मैंने अपना पक्ष से नित्य मैं एक चीज क्लियर कर दूं। हर्ष जी आपने शुरुआत जो है ना वह एक अलग दिशा से कर दी है। आप परमधाम में जो परमधाम की जो नित्यता है उसके संबंध में आप बात करने लगे। जबकि बात हमें यह करनी चाहिए कि ईश्वर का सगुण साकार स्वरूप हो सकता है कि नहीं? वो ले सकता है कि नहीं? अवतार ले सकता है कि नहीं? उसकी मूर्ति पूजा हो सकती है कि नहीं? उसकी मूर्ति पूजा होना आवश्यक है कि नहीं? व्यर्थ तो नहीं है इन विषयों में। क्योंकि वो जो नित्य वाली बात है ना मोक्ष के टाइम पर वह लीन धामोधामी एक हो जाते हैं तो वह एक अलग चैप्टर हो जाएगा कि जो नित्य लोक है कि नहीं वह जो केवल मोक्ष केवल
00:12:18:24 मोक्ष से पहले वाली जो चीजें हैं ठीक है मोक्ष से पहले कोई भी चीज नित्य नहीं हां तो वो उनको अलग-अलग परिभाषाओं में कहा जा सकता है मगर अंततवा जो एक सनातन सत्य है कि वह सारी चीजें नित्य नहीं मानी जाएंगी अर्थपूर्ण दृष्टि से क्योंकि धाम और धाम ही एक हो जाते हैं तो इसलिए वो धाम को नित्य कहा जाता है मगर धामो और धामी एक हो जाते हैं तो इनका वो स्वरूप नहीं रह जाएगा जो स्वरूप था। ठीक है? वही मैं कह रहा हूं कि साकार रूप में धाम और धामी धाम और धामी कभी भी एक नहीं हो सकते। हां वो वो नित वो नित्य इसलिए कहा जाएगा वो नित्य इसलिए कहा जाता है क्योंकि धामोधाम एक हो जाते हैं। यानी जो परम ब्रह्म है परम ब्रह्म स्वरूप है सच्चिदानंद स्वरूप है वो और धाम एक होते हैं। इसलिए उस धाम को भी नित्य कहा जाता है। ठीक है? मगर वो अपने एज इट इज स्वरूप में रह जाएगा। यह जिस परंपरा से आप भी हैं, वह परंपरा और तर्क और प्रमाण की दृष्टि से सिद्ध नहीं है। ठीक है? ठीक है। तो विश्व विश्वजीत जी इस पक्ष
00:13:33:25 में कुछ कह रखना चाहते हैं। तो अब अब एक एक क्लियर कर लीजिए कि ईश्वर के सगुण साकार स्वरूप का वो करना है। वहां वो जो मोक्ष के नित्य की बात एक शुरू हो गई तो उसकी वजह से थोड़ा सा दिशा बदल गई। ईश्वर सगुण ईश्वर मैं याद दिला दूं एक बार सगुण साकार का एक पक्ष कि ईश्वर वही है जो कुछ भी कर सकता है इसलिए ईश्वर अवतार भी ले सकता है और क्योंकि ईश्वर अवतार ले सकता है सगुण साकार रूप ले सकता है सगुण साकार हो सकता है इसलिए उसकी मूर्ति पूजा की जा सकती है और मूर्ति पूजा उसकी जो उसके जो सगुण साकार की भक्ति है उसका आलंबन लेकर के ही व्यवहार में ना आ सकने वाले स्वरूप का आलंबन लेकर के ही जो भक्तगण है वह व्यवहार में व्यवहार में आ सकने वाले स्वरूप का आलंबन लेकर ही जो भक्त हैं वो व्यवहार में ना आ सकने वाले स्वरूप को प्राप्त कर सकते हैं। इसीलिए भगवान ने कहा कि यदा यदा धर्मस भवती भारत अभान धर्मस तदात्म सजाम और क्यों भगवान यहां पर किस चीज की सजन की बात कर रहे हैं
00:14:51:15 भगवान किस चीज की सृजन करने की बात कर रहे हैं मैं मैं अभी बात करूंगा मैं इसको पूरा कर लूं और क्यों कि परित्राणाय साधु नाम ठीक है तो यह आप याद रखें कि यहां से हमारा शुरू हो रहा यह इस तरह से सगुण साकार को लेकर चलिए और फिर सगुण साकार रूप नहीं ले सकता। इस बारे में हम लोग फिर आपको काउंटर करेंगे। तो अब एक बार जो सगुण साकार की टीम है वो एक बार फिर से अपना पक्ष रख दे जिससे कि हम आगे बढ़े। सगुण साकार की टीम से
00:15:27:06 विश्वजीत विश्वजीत जी हैं। हां बोल सकते हैं हर्ष बोलिए जी विश्वजीत जी राम राम भैया राम राम भैया ईश्वर की भक्ति के लिए सगुण साकार रूप का होना जरूरी है। ध्यान केंद्रित करेंगे उन्हीं ईश्वर पे जो जिनका कोई आकार हो। जैसे कि अगर हम एक बिंदु पे भी ध्यान केंद्रित करके ईश्वर की भक्ति करते हैं तो उसका भी एक गोल आकार होता है और यदि आकार ना हो तो हमारे जैसे मनुष्यों के लिए जैसे विश्वास पे ही सब कुछ चलता है तो कोई भी आजकल के मनुष्य वैज्ञानिक प्रमाण मांगते किसी भी चीज का तो हम जैसे मनुष्यों के लिए वो प्रूफ जो होता है ना वह जरूरी होता है तो इसीलिए भगवान का अवतार लेना भक्तों का कल्याण करने के लिए यह तो सिद्ध होता और भी बहुत सारी कथाएं हैं जो कि ऐसा रूप मिलता है उनसे कि भगवान का सगुण साकार रूप हो सकता है और है भी। मतलब आपने एक बात कही है कि प्रमाण और एक बात कही है क्योंकि प्रमाण मिलता है और एक बात कही है क्योंकि सगुण साकार में ध्यान नहीं लग सकता तो इसलिए किसी एक बिंदु की आवश्यकता है तो उसके लिए भगवान जो
00:16:42:12 है मतलब भगवान की भक्ति के लिए किसी एक शगुन शाखा रूप को मतलब मानकर चलना ही होगा। अच्छा यस अब जो पहले तो एक बार सब लोग हैंड अपने डाउन कर ले सभी लोग जिससे हमें पता मैं जो बोलूंगा उसके अनुसार फिर काम कर सके। अब इनकी इन दो बातों को काउंटर कोई करें तो बताएं। साकार सगुण साकार विरोधी जो दल है निराकार की तरफ से कोई काउंटर करेगा वो हैंड रेज करे
00:17:24:09 कोई काउंटर नहीं करेगा किरण जी आप भी नहीं सुजीत जी सुजीत जी आप करें जी अगर हम भगवान के सगुण साकार की बात करें कि वो भक्ति के लिए इंपॉर्टेंट है क्योंकि भक्ति हम निर्गुण निराकार पर कर नहीं कर सकते। लेकिन अल्टीमेटली हम देखें जो अत्यंतिक स्वरूप होगा भगवान का वो निर्गुण निराकार ही होगा। जो हम ध्यान के लिए या फिर भक्ति के लिए जो हम एक सगुण स्वप असा रूप जो देखेंगे या फिर ध्यान करेंगे वो भी मिथ्या ही होगी। क्योंकि ब्रह्म ब्रह्म सत्यम जगन मिथ्या तो हम जो भी कुछ भी कर रहे हैं इस जगत में वो हम अगर ब्रह्म की दृष्टि देंगे तो वो मिथ्या ही रहेगा। चाहे भक्ति पूजा यज्ञ आदि सब कुछ मिथ्या ही है। तो इसका मतलब जो भगवान का आत्यान स्वरूप है वो तो सिर्फ निर्गुण निराकार ही है। लेकिन हम कुछ क्षणों के लिए हमारा ध्यान लग जाए। हमें वो परम ज्ञान या फिर परम ज्ञान पता चल जाए कि भगवान का स्वरूप निर्गुण निराकार ही है। इसलिए हम सगुण साकार के ध्यान करते हैं। तो हम सगुण साकार की ओर से निर्गुण निराकार की ओर जाएंगे। इसका सिर्फ सगुण सार का
00:18:40:00 हम ध्यान इसलिए कर रहे हैं कि ताकि हम जान सके कि भगवान का असली स्वरूप निर्गुण निराकार ही है। तो आपने खंडन कहां किया सगुण साकार? भैया मैं कुछ कहना चाहूंगा। हां बोलिए भैया इससे यह साबित नहीं होता कि भगवान का शाकार रूप नहीं हो सकता। इस बात का आपने ये उल्लेख नहीं किया जो काउंटर और भैया दूसरी बात कि जैसे मोक्ष हो या भक्ति हो हमको तो कोई ना कोई एक शगुन साकार जैसे शिवलिंग हो गए या अग्निदेव हो गए कोई भी रूप लेकर के भगवान का किसी एक ना एक रूप का तो सगुण साकार रूप लेकर के चलना पड़ेगा। वरना भक्ति आएगी कहां हमारे अंदर और बिना भक्ति के तो कुछ पॉसिबल ही नहीं है भैया ना मोक्ष ना स्वर्ग ना कुछ भी पॉसिबल नहीं है बिना भक्ति के
00:19:32:14 और भैया ये भी प्रमाण नहीं मिलता कि ये हो ही नहीं सकता सगुण साकार अगर आप कुछ क्षण के लिए भी ये मानते हैं कि सगुण साकार हो सकता है भक्तों का उद्धार के लिए तो यह फिर इसका आप काउंटर कैसे कर पाएंगे मेरा मेरा कुछ प्रश्न सुजीत जी से एक क्षण के लिए विश्वजीत जी रुकिए विश्वजीत जी ने अपना पक्ष रख दिया है अब निराकार पक्ष का ही कोई व्यक्ति बोले क्या मैं कुछ काउंटर कर सकता हूं मुझे भी कुछ काउंटर करना है सुर जी आपका पक्ष कौन सा है आशीष जी जी मैं शगुण साकार पक्ष से हूं और नारायण जी जी नयन मैं निराकार से हूं हां तो आशीष जी अभी तो आपके ही पक्ष से विश्व जी ने बोल दिया ना तो और सुजीत जी ने भी आपके पक्ष से बोला है तो तो नयन जी कृपया आप बोले जी तो विश्वजीत जी आपने कहा कि यदा यदा ही धर्मस्य गण भवती भारतम तो उसी श्लोक से आप यह सिद्ध कर रहे हैं कि उनका अवतार हो रहा है तो आप मुझे यह कहिए कि जो ईश्वर है उनका अवतार कहां हो रहा है उनका अवतार उनके अंदर ही हो रहा है
00:20:47:18 वो कुछ भी कर सकते हैं। जो चाहे वह कर सकते हैं। अगर वे किसी एक स्थान पे एक वक्त पे प्रेजेंट है, उपस्थित हैं तो वह अपने अंदर ही उपस्थित है ना कि किसी और जगह में क्योंकि पूरा संसार पूरा ब्रह्मांड उनके अंदर ही समाया हुआ है। तो यदि वे धरती पर भी अवतार लेते हैं तो वह अपने अंदर ही यह लीला कर रहे हैं। ठीक है? तो आप यह तो मान रहे हैं ना कि वो धरती पर अवतार ले रहे हैं। हां, भक्तों का उद्धार के लिए धर्म का कल्याण के लिए लेते हुए ब्रह्म को या किसी को भी अगर कुछ क्रिएशन बनाना है तो उसके लिए एक स्पेस तो मतलब आवश्यक है ना। स्पेस के बिना तो किसी चीज का आविर्भाव नहीं हो सकता। स्पेस तो अवश्य है। उनके अंदर स्पेस बहुत है। वो अनलिमिटेड अनंत है। ठीक है। तो अभी जो चार महावाक्य है वो तो वेद से ही सिद्ध है। तो उनको आप मानते हैं ना। जैसे कि अहम ब्रह्मास्म करके जो आता है या ब्रह्म सत्यम जगन मिथ्या जो है तो अगर उसके स्वरूप से अगर हम देखेंगे कि अगर कोई ईश्वर भी अगर जगत में आए वो आ सकता है या नहीं वह तो दूसरी बात है। वो अगर कुछ भी कर सकता है तो वह अवतार
00:22:02:19 भी ले सकता है। परंतु प्रश्न यह है कि अगर वह ले सके वह ले लिया अवतार तो लेने के बाद उसमें एक दोष आएगा क्योंकि अगर वह जगत में आ रहा है तो वो एक स्पेस में आ रहा है वहां पर जगत का नियम लागू हो रहा है उसके ऊपर इसलिए जगत में अपने अंदर ही आ रहे अपने बाहर नहीं जा रहे वो हां तो उनके ऊपर कोई नियम नहीं लागू होगा हां नहीं लागू होगा तो अगर वो अगर अवतार ले रहा है। वह अगर मनुष्य रूप में हमारे बीच में आ रहा है तो हमारे ऊपर वेदों का या धर्म शास्त्रों का जो नियम लागू होता है वो उस ईश्वर के ऊपर भी लागू होगा। तो इस वजह से उसके ऊपर एक दोष भी आएगा जो कि निराकार रूप में हम यह नहीं कह सकते कि उसमें कोई दोष है। परंतु साकार रूप में दोष भगवान श्री कृष्ण खुद कहते हैं कि मुझे उनको ना कोई वचन रोक सकता है ना कोई श्राप मिल सकता है। तो उनको बस भक्तों का मान रखने के लिए वो यह अपने ऊपर ले सकते हैं। श्राप हो या कोई वरदान हो या कोई वचन हो अन्यथा वो यह सब चीजों से परे हैं। उनके ऊपर कोई नियम लागू नहीं होता। यह भक्तों का कल्याण के लिए भक्तों में भक्ति भावना रखने के लिए उनका मान सम्मान रखने
00:23:17:20 के लिए भगवान ऐसा लीला रचाते हैं। बहुत बढ़िया। मैं फिर कहूंगा निराकार वाले निराकार वाले अपने आप को मैं फिर कहूंगा निराकार पक्ष वाले स्वयं को आर्य समाजी जैसा माने। वो सगुण साकार के अवतार को स्वीकार ना करें। आपको उसको स्वीकार नहीं करना है। जैसे अभी नारायण जी ने स्वीकार कर लिया कि नयन नयन नयन जी ने स्वीकार कर लिया तो आपको स्वीकार नहीं करना है। सुजीत जी ने भी स्वीकार कर लिया था। आपको स्वीकार नहीं करना है। शिवंत भैया एक नयन जी से प्रश्न था मेरा अगर आप कहे तो पूछ आप साकार से हैं या निराकार से हैं? साकार से हैं। ठीक है। करिए। कृपया मेरा कि आपने कहा करण जी कोई भी अगर आप बोले क्योंकि अभी क्या है कि हम ये पहली बार कर रहे हैं तो कोई भी जब बोले तो अपना पक्ष बोलते हुए ही बोले कि मैं साकार पक्ष पक्ष से हूं और मैं अब प्रश्न करना चाहता हूं तो उससे हमें आसानी रहेगी। जी करण जी कृपया बोलिए। मेरा ये प्रश्न था कि जैसे उन्होंने कहा कि कोई दोष लग जाना तो जगत में जब हम अवतार लेकर प्रभु आते हैं तो दोष तो लगेगा ही तो दोष ना लगना ये कहां कौन
00:24:32:24 सा कंपलशन है? दोष के साथ ही वह उस जीवन चरित्र को निभाते हैं और जो अपना कार्य पूर्ण करके जाते हैं तो दोष जो आप कह रहे हैं कि कोई भी भौतिक दोष उन पर लग रहा है तो उसमें कहां कोई रोक है और हम कौन होते हैं उस रोक लगाने वाले वो तो देखिए रोक लगाने वाले तो हम कोई नहीं परंतु अगर मैं कह रहा हूं कि अगर उसमें दोष आ रहा है तो वह पूजनीय है क्या वो स्वरूप उनका वो स्वरूप पूजनीय है क्या जिसमें दोष लग रहा है जैसे आप दोष मतलब किस प्रकार के दोष भौतिक दोष जैसे विचार करना सोना खाना पीना इसी प्रकार के दोष नहीं वह सब क्यों होगा पर देखिए जो हम जैसे मनुष्य हैं तो चल फिर रहे हैं तो हमसे अजान मतलब अनजाने में ही कुछ ना कुछ दोष हो ही रहा है कुछ ना कुछ पाप हम कर ही रहे हैं कीटों को मार रहे हैं या कुछ भी हो रहा है निश्वास में तो अगर वो मनुष्य देह लेकर अगर वो आ रहा है तो उसमें भी वही दोष रहेगा ना उसमें भी अनजाने में वही पाप सब होगा उससे तो उस प्रकार से तो आप कह रहे हैं कि उससे कुछ अनुकरणी नहीं होगा। जैसे आचार्य देव होते हैं। आचार्य देव आचार्य देव नमः कहते हैं। हमारे उपनिषद में वर्णित है। तो उनमें भी दोष कहीं ना कहीं रहता है। जब वशिष्ठ जी ने शिक्षा प्रारंभ करी थी देनी रामचंद्र जी को तो कहा था कि मेरे
00:25:48:00 गुणों को स्वीकार करना अवगुणों को नहीं। उसी प्रकार तो वही तो कह रहा हूं। इसका मतलब आप भी मान रहे हैं कि उनमें अवगुण भी है तो जो ईश्वर है रूप से अवगुण मतलब भौतिक जो भी उनमें कमियां है जो कि शरीर धारी के पास होता ही है संसार में जुड़ने के बाद तो वो तो अब सब में रहता है हां तो आप तो खुद ही कह रहे आप आप मैं क्या खंडन कर आप तो खुद ही खंडन कर रहे हैं कि अगर वो आ रहे हैं तो उनमें अवगुण भी है उनमें दोष भी है लेकिन इनके बाद भी आप ये कैसे कह रहे हैं कि ये जो है मतलब सिद्ध नहीं होते भगवान इन सब अवगुणों के बाद मेरा पक्ष यह है कि उनका जो निराकार स्वरूप है वही मूल है और वही पूजनीय योग्य है। अगर वह साकार रूप में आएगा जी मैं ना साकार पक्ष बोल रहा हूं शशांक तो आपके अनुसार अगर कोई अवतार लेकर आते हैं इंसानी रूप में तो उनसे अनजाने में पाप हो जाते हैं। कुछ बोल सकता हूं मैं कीट पतंगों पे वो पैर रख देते हैं। बोल दीजिए। इस प्रकार के उनसे अनचाही रूप से भी पाप बन जाते हैं। तो ऐसे तो जो निराकार सृष्टि है इसमें बाढ़ आती रहती है। लोग मरते रहते हैं। तो निराकार तो हम पूछ ही नहीं सकते। फिर राम जी कृष्ण जी तो जानबूझ के पैर से बचा भी सकते हैं। कीड़ों को जैसे आप कह रहे हैं लेकिन प्रकृति तो वो भी देती है। तो वो तो कर्म के अनुसार क्या कहते हैं? फल देती
00:27:03:01 है। हां तो उसके अब देखिए ये तो जो प्रकृति है उसका तो यह नियम है ना। इसको हम परमात्मा से क्यों? प्रकृति को आप ईश्वर से अलग मानते हैं क्या कि ईश्वर ने प्रकृति एक बोल बना दी उसके अंदर गतिविधियां चल रही है या फिर ईश्वर ही प्रकृति के रूप में विराज विराजमान है क्योंकि अवतार लेने पे तो उनसे वो क्या कहते हैं कीड़ों पे पैर रख देंगे लेकिन जो प्रकृति कर्म के अनुसार फल देती है बाढ़ लाती है बिजली गिराती है सूखे से लोगों को मारती है वो पूजनीय है ना भैया देखिए अगर हम उसको ईश्वर प्रकृति है या उससे भिन्न है ये तो अलग बात मैं जो कह रहा हूं तो हम साकार और निराकार रूप की बात कर रहे हैं ना आप कह रहे वो ज्यादा पूजनीय वो पूजनीय नहीं है तो डिबेट तो इस बात पे भी नहीं है ना कि अवतार पूजनीय है या नहीं है उनके होने या ना होने पे डिबेट है हां तो नहीं उसी में अगर अगर अनचाहे रूप से पाप कर रहे हैं अवतार और ईश्वर रूप लेके तो अनचाहे रूप से प्रकृति भी तो वो कर रही है और मीट्योर तो इस प्रकृति का भी हिस्सा नहीं है। प्रकृति को हम थोड़ी रहे हैं। हम तो उस ब्रह्म को पूज रहे हैं तो वो ब्रह्म प्रकृति भिन्न कैसे अलग उसको अलग है अलग है जैसे आप उन्होंने
00:28:19:03 बहुत होशपच हो रहा है ठीक है एक-एक करके बोले तो अभी अभी दो कौन-कौन से लोग बोल रहे हैं नयन जी और शशांक जी बोल रहे थे हां तो नयन जी आप कोशिश करिए कि [संगीत] आप एक बार में ही अपनी बात को रखें ठीक है ताकि दूसरा आप बैक एंड बैक एंड फोर्स करते रहेंगे तो ये कन्वर्सेशन हो जाएगा पूरा इसमें बाकी लोगों को मौका नहीं मिलेगा बोलने का कोई नहीं अब नयन जी के पक्ष से और लोगों को ले लीजिए
00:28:52:02 तो जी आशीष जी ने एक भी बार नहीं बोला है अभी तक तो उनको उनको ले लेते हैं। आशीष चतुर्वेदी जी बोल चतुर्वेदी जी हैं विश्वजीत जी हैं और बोले जी अगर ये आपका ऐसा मानना है कि ईश्वर निराकार है और साकार नहीं है और क्या आप ऐसा भी मानते हैं कि ईश्वर सर्वव्याप्त है
00:29:26:12 निराकार पक्ष से अगर कोई इसका उत्तर दे हमें ईश्वर ईश्वर सर्वव्याप्त है ईश्वर में ही हम जा रहे हैं सर्वव्याप्त ईश्वर है या नहीं है जी ईश्वर सर्वव्याप्त है। सर्व्याप्त है। तो विभिन्न प्रकार की जो आकार हम देखते हैं अपने आसपास उन सब में भी ईश्वर व्याप्त है। हां तो इससे आकार किसी आकार मतलब सभी आकारों में व्याप्त होने की वजह से ईश्वर की साकार होना सिद्ध नहीं होता है। नहीं क्योंकि जो ईश्वर है वो उसने अपने आप को माया से ढकने दिया है। इसलिए जो हम देख रहे हैं वो सब मिथ्या है। और असली जो आतंत्रिक स्वरूप होगा वो निराकार ही होगा।
00:30:11:15 तो विभिन्न आकारों में जो आप देखते हैं जैसे हमारा ईश्वर जगत बनाता भी है और बनता भी है। अब मुझे आर्य समाज के ईश्वर के बारे में नहीं पता कि उनका बनता है या नहीं। लेकिन हमारा अगर बनता है तो विभिन्न आकार जो हम देखते हैं अपने आसपास वो सब उसी के आकार होते हैं। हां फिर लेकिन जो हम देख रहे हैं वो सब मिथ्या ही तो है। हम कितने भी भगत के बात कर ले कि आकार आकार लेकिन अल्टीमेटली उसका आकार निराकार ही है। व्यवहारिक सत्य है। अच्छा मैं मैं एक छोटा सा संशोधन करना चाहूंगा आशीष जी के बात में कि ईश्वर सब कुछ में नहीं है। ईश्वर में सब कुछ है। ठीक है? तो अगर हम साकार रूप को अगर मानेंगे तो उसको भी हमें निराकार में ही मानना पड़ेगा। तो इसका मतलब उसका एक बाउंड्री भी होगा। जी आपने जैसे कहा कि सब कुछ उसमें सब कुछ उसमें भी है और सब वो भी सब कुछ में जैसे श्लोक है ना अगर हम एक जरा एक चीज समझिए अगर हम मान रहे हैं कि एक वस्तु किसी दूसरे वस्तु में है तो वो वस्तु तो पूर्ण है ना उसमें एक छोटा सा अंश है अगर हम मानेंगे कि ईश्वर में सब कुछ है तो ठीक है। ईश्वर सब कुछ में है मतलब उसको एक बाउंड्री हो जाएगा ना। नहीं तो आप देखिए ना गीता में
00:31:26:19 कहते हैं कि योम पश्यति सर्वत्र सर्व चम पश्यति तस प्रश प्रसति इसका मतलब यही है कि सब कुछ मुझ में देखता है और सब कुछ मुझ में स्थित देखता है और सब कुछ मुझ में समाया हुआ देखता है सब कुछ मुझे देखता है उस प्रकार से भाव रखने वाले जितने भाव वो है उस सिद्धांत में मैं कह रहा हूं आप कह रहे हैं कि वो केवल सबको समाया हुआ है वो सब में नहीं है हां तो अगर देखिए इसमें थोड़ा व्याख्या का या समझने का थोड़ा अंतर हो है। परंतु जो वह वहां जो बोला गया है कि जो ईश्वर में सब कुछ है या ईश्वर सब कुछ में है मतलब क्या है? अगर ईश्वर में सब कुछ है ईश्वर में जो जो चीजें हैं उनमें हम उनको देख सकते हैं एक साथ। परंतु जो जगत है उससे भी तो परे ईश्वर होगा ना। जैसे पुरुष सूक्त में कहते हैं कि जो दशांगुलम है ना जो पूरा जगत है उससे भी 10 अंगुल छोड़ के वह मौजूद है। तो इस प्रकार से अगर माना जाए तो ईश्वर में सब कुछ है और जो कुछ है उनके अंदर उसमें हम उनको देख सकते हैं ब्रह्म स्वरूप में या परमात्मा स्वरूप में जी अतिरिक्त बात है अतिरिक्त अंगुल आपने जैसे कहा अतिरिक्त अंगुल वो इस परिभाषा को शायद समझाता
00:32:41:22 हो कि जो आपके दृष्टिगोचर जो प्रकृति है उससे परे जो आप विचारणीय नहीं है वो भी ईश्वर है उस प्रकार एक संख्या से बता दिया गया है 10 अंगुल का ऐसा मतलब नहीं 10 अंगुल आप उसको ठोस रूप से स्वीकार कर ले 10 अंगुल ये बताया गया कि जो आपसे कुछ हटके है जो आप अभी ज्ञात नहीं है वो वस्तु जो वो जो क्षेत्र है वो भी ईश्वर से समाया हुआ है नहीं मैं तो कह रहा हूं कि उसको वो जो एक्स्ट्रा जो पार्ट है उसको लेकर पूरा पूरा ही पूरा संसार ही है ब्रह्म परंतु जितना अंश हम देख रहे हैं वो तो हमारे व्यवहार में है और जो व्यवहार में आ रहा है उसमें संसार का नियम लागू होगा तो इस कारण हम उसको उस अंश को हम ईश्वर के रूप में पूजा नहीं कर सकते जो हमारे कौन सा अंश लोगे जो ईश्वर में नहीं आता है मतलब सभी चीजें तो ईश्वर में ही समा सर्वत्र ही है तो फिर वो मूर्ति जिसकी आप खंडन करते हो कि मूर्ति पूजा संभव नहीं है वो तो इसी जगत का ही अंश हुआ ना तो पारलौकिक वो भी होगा क्योंकि भगवान के अंश में ही वो आता है तो आप उसका विरोध कैसे करते हो तो अगर आप एक बात बताइए कि जो मूर्ति का आप कह रहे हैं तो सब कुछ में है तो आप केवल मूर्ति को ही क्यों मान रहे हैं?
00:33:57:01 आप तो दीवार को भी पूज ही सकते हैं ना जो नरसिम्हा अवतार जैसा हुआ था कि क्या पूछा था कि हिरण्यश कि क्या ये दीवार में है? तो उसने कहा था कि दीवार को पूछिए मूर्ति एक मिनट एक मिनट एक मिनट मैं एक चीज क्लियर कर दूं जरा अभी तक जो पक्ष सामने आ रहा है वह यह आ रहा है कि ईश्वर यदि अवतार लेगा तो उसमें विकार आ जाएगा। हम जब विकार आ जाएगा तो फिर विकार युक्त स्वरूप को क्यों पूजा जाए। ठीक है? दूसरी बात यह है कि यदि अब आगे बात होती है कि भाई ईश्वर क्योंकि ईश्वर जगत बनाता ही नहीं बनता भी है तो वो सब चीजें वही है फिर वहां से निकल के आया कि वो सब कुछ में है या वो वही क्या वो सब कुछ में नहीं है बल्कि उसमें सब कुछ है ये वाली बात आ गई और फिर अंतत गतवा बात ये आई कि यदि सब कुछ ईश्वर है यदि जितने भी स्वरूप रूप दिख रहे हैं वह ईश्वर के ही है। तो फिर सब कुछ क्यों नहीं पूज रहे हैं? फिर आप पर्टिकुलर एक एक विग्रह को एक स्वरूप
00:35:12:07 को क्यों पूज रहे हैं? ठीक है? अभी तक ये निराकार की ओर से पक्ष रख दिया गया है। तो अब पहले सारे लोग हैंड डाउन कर दें। उसके बाद साकार की ओर से उठाएं। हैंड रेज करें। शिवाशु भैया मैं बस आखरी एक शब्द कहना चाहूंगा। इसके ही परिपेक्ष में कि ये जो मैंने कहा कि दोष आ जाएगा उसके साथ एक बात है कि क्रिएशन कैन नॉट बी क्रिएटर क्रिएटर जो क्रिएटर है उससे जो बन रहा है वह क्रिएशन है और क्रिएशन कभी क्रिएटर नहीं बन सकता। तो यही मेरा पक्ष है। आपने ना होने के संबंध में भी ठीक है ना?
00:35:55:20 तो अब केवल सगुण साकार वाले हाथ उठाएं। करण दास, हर्ष जी, आशीष जी और विश्वजीत जी और शशांक जी है ना और कोई है जिसने हाथ उठाया हो। पंडित जी आप देखें किसको बोलना है। जी जैसा कि उन्होंने कहा कि क्रिएशन कैन नॉट बी क्रिएटेड। तो उस पक्ष को मैं पूछना चाहूंगा कि आप ये कह रहे हैं कि जो क्रिएशन है और क्रिएटर है वो एक सेपरेट एंटिटी है। तो आप ये बताइए कि जो क्रिएशन है उसके लिए एक स्पेस रिक्वायर्ड है और क्रिएटर उससे भिन्न है। कहीं अलग है स्थित। तो यह किस तरह से आप वैज्ञानिक तल पर भी और सनातन के सिद्धांत पर भी आप किस तरह से इसको सिद्ध कर पा रहे हैं ना वैज्ञानिक तल पर यह हो रहा है सिद्ध ना सनातन के पक्ष क्योंकि आप एक तो पहले भिन्नता उसमें ले आए और भिन्नता लाने के बाद आप कह रहे हैं कि वो एक क्रिएट कर दिया और वो उससे भिन्न है अलग कुछ है और फिर वो जगत को देख रहा है बाहर से उस प्रकार तो आप कैसे समझाएंगे तो आप यदा यदा ही धर्मस्य वाले श्लोक को आप मानते हैं
00:37:12:09 जी जी बिलकुल अच्छा तो आप मतलब आप ये मानते हैं कि जो श्री कृष्ण जो कह रहे हैं कि जब जब धर्म का ग्लानी होगा तब मैं अपने आप को सृजन करूंगा। ठीक है ना? मानते हैं। तो वो अगर सृजन कर रहे हैं मतलब वो क्रिएटर है और जो बन रहा है वह क्रिएशन है। तो अगर आप जो साकार रूप को मान रहे हैं तो आप क्रिएटर को पूज रहे हैं या क्रिएशन को पूज रहे हैं? दोनों समान रूप में संभव क्यों नहीं होगा? दोनों साथ ही में क्यों संभव नहीं है? आप कह रहे हैं कि साथ में मतलब देखिए जो अगर कोई अगर बन रहा है अगर हम अगर हम आप कह रहे हैं कि जो क्रिएशन है और क्रिएटर है दोनों एक है। ठीक है? कोई समस्या नहीं। परंतु अगर क्रिएशन को पूज रहे हैं मतलब उसका क्रिएटर अलग है। ठीक है ना? जो क्रिएशन भौतिक सिद्धांत आप क्यों बना रहे हैं कि पोर्ट बन रहा है तो पॉटर की आवश्यकता है। यहां पे पोर्ट और पॉटर में कोई भेद ही नहीं है। हां। तो ये कैसी बात हो गई? अगर आप मतलब पॉट को आप पूछ रहे हैं तो उसको बनाने वाला तो कोई और है ना पॉट और पॉटर कैसे एक हो सकता है भैया से बनता है तो मिट्टी जो है उसको आप क्रिएटर के रूप में समझिए क्योंकि क्रिएटर का मतलब ये नहीं जो भौतिक रूप से कुछ ऐसे गढ़ दिया हो बाहरी रूप से नहीं
00:38:27:10 ऐसा कैसे समझे मिट्टी जी पहले करके उनके प्रश्न का उत्तर दीजिए उसके बाद क्रॉस क्वेश्चन आप ऊपर क्वेश्चन कर देते हैं जो उत्तर नहीं देते मेरे पास क्वेश्चन था क्रिएशन और क्रिएटर में डिफरेंस है क्या? क्रिएशन से क्रिएटर अलग है क्या? आप इसका एक बार उत्तर दे दीजिए। उसके बाद आप क्रॉस क्वेश्चन कर लेना। जी मैं उत्तर देता हूं। आप पहले मिट्टी से उसका उदाहरण दीजिए ना। फिर वही मतलब आप क्रॉस क्वेश्चन करोगे।
00:38:59:20 हेलो आप संभाले बात को। ये क्या पूछा है आपने? पूछा करण दा मैं भी देखिए करण जी एक बार अपना प्रश्न फिर से रिपीट कर दीजिए जी कि दोनों में जी जी नरेंद्र जी ने ये तर्क दिया था कि क्रिएशन इज सेपरेट फ्रॉम क्रिएशन क्रिएटर सेपरेट फ्रॉम क्रिएशन तो उस प्रकार मैंने इसे तो मूल रूप से उनका उनका यही था कि क्या ईश्वर जगत बनता और बनाता दोनों हो सकता है क्या नहीं क्रिएटर भिन्न रहता है मतलब जगत को निर्माण करके वो भिन्न कहीं स्थित है कहीं बाहर मतलब ऐसा आप कह रहे हैं करण जी नहीं नहीं ऐसा मैं नहीं कह रहा हूं ऐसा वे कह रहे थे तो मैंने वो साम उसमें दोनों में सामंजस्य ऐसे बनाया कि क्रिएशन और क्रिएशन कैन हैपन एट द सेम टाइम मतलब अलग भी वो नहीं रहेंगे और वो तो नहीं एक बार एक बार कंफर्म कर लेते हैं तो करण जी इसका अर्थ यही हुआ कि आप ये कह रहे हैं कि ईश्वर जो है वो जगत बनता भी है और बनाता भी है करेक्ट इस प्रकार से और अवतार की वही बात है क्योंकि उनमें लिंक है तभी वो अवतार ले पा रहे हैं और साथ में जो है सब कुछ घटित कर पा रहे हैं और वह भिन्न अगर रहते वो भिन्न रूप से अगर जगत का निर्माण करके किस प्रकार से आ रहे हैं अवतार ले रहे हैं तो अवतार बात का तो खंडन कर रहे हैं उस
00:40:14:24 बात का मैं कह रहा हूं तो तो आपके हिसाब से क्रिएटर और क्रिएशन दोनों एक ही वाले क्वेश्चन में जवाब दे दूंगा मैं जवाब ठीक है अभी अभी एक मिनट अब करण जी ने अपना पॉइंट रख दिया है अब इसके अगेंस्ट साकार पक्ष से निराकार करण दास जी साकार से सॉरी क्षमा कीजिएगा नि- निराकार पक्ष से कौन बोलना चाहता है? अच्छा मैं एक बार मेरा पक्ष स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि मैंने क्या कहा था? मैंने यह नहीं कहा कि क्रिएशन और क्रिएटर अलग है या ऐसा कोई वो ऐसा हो भी बन सकता है। ऐसा मैंने उनके जो उदाहरण था उसका खंडन किया था। अगर मैं यह कहता हूं कि क्रिएटर है। उसने कोई कुछ बनाया वह क्रिएशन है। अब वह खुद क्रिएशन बन भी सकता है। परंतु उसका जो क्रिएशन जो रूप है उस रूप को हम पूज नहीं सकते। हम क्रिएटर का जो स्वरूप है उस स्वरूप को पूजेंगे। निराकार जो स्वरूप है न वो विश्वजीत जी बोले भैया अगर हम क्रिएटर और क्रिएशन दोनों को अलग माने तो फिर एक एक्स्ट्रा मटेरियल इस दुनिया में आ जाएगा। जैसे कि उन्होंने कहा मिट्टी से अगर कोई बर्तन बनाने वाला है
00:41:30:00 तो वो अगर दोनों भिन्न है तो मिट्टी अलग हो गया और बर्तन बनाने वाला अलग हो गया। तो जब बनाने वाले ईश्वर अलग हो गए तो उनसे पहले अगर मिट्टी मौजूद था इस सृष्टि में तो फिर ईश्वर की महत्व महत्वाकांक्षा कम हो जाएगी क्योंकि उनसे पहले भी कुछ था इस जगत में और जैसा कि हम लोग यह मानते हैं कि हर कण में भगवान है या फिर भगवान के अंदर ही हर कण है दोनों एक ही बात होगा तभी यह सिद्ध हो पाएगा क्योंकि हर कण में भगवान है तो मिट्टी में भी वही है बनाने वाले भी वही बन भी वही रहे हैं और एक प्रश्न और था नयन जी का अगर वे अवतार लेते हैं तो विकार आ जाता है। तो विकार मनुष्यों की दृष्टि से आता है ना कि उनके दृष्टि से जैसा कि मैंने पहले भी अपना पक्ष रखा था कि भगवान ये जो पाप पुण्य जो भी भगवान को लगता है ये भक्तों का लाज रखने के लिए भगवान ऐसा लीला रचाते हैं। जैसे द्रोपदी जी ने श्राप दिया। ये सॉरी माफ कीजिएगा। दुर्योधन की जो माता जी थी उन्होंने श्राप दिया था भगवान को कि उनका जो कि उनका जो पूरा जनरेशन है वो खत्म हो जाएगा आपस में लड़ के तो इस बात का लाज रखने के लिए भगवान उसको मतलब बोले कि ठीक है मैं आपके स्व मतलब जो श्राप है उसको स्वीकार करता हूं इसके अलावा अगर भगवान चाहते तो ऐसा
00:42:45:03 ना भी होता क्योंकि वो भक्तों का लाज रखते हैं इसीलिए भगवान अपने ऊपर श्राप पाप पुण्य सब मान लेते हैं मगर मगर भगवान इन सब चीजों से बहुत अलग है, बहुत दूर है। इन सब चीजों का उनके ऊपर कोई असर नहीं होता है। हम अब मैं चाहता हूं कि साकार रूप क्यों नहीं हो सकता भगवान का? इस बात का प्रमाण दे या काउंटर करें। अच्छा विश्वजीत जी को और आशीष जी दोनों का ही मैंने दो पक्ष सुना है। मैं एक प्रश्न करना चाहता हूं। अच्छा आपने कहा कि देखिए दो बातें हैं आप पहले तो उन्होंने जो प्रश्न किया है उसका उत्तर भी दीजिएगा अपने उत्तर में और फिर ये अपना जो प्रश्न कर रहे हैं तो वो भी करिएगा हां दोनों करिएगा जी हां बोलिए तो आपने ये कहा कि जो क्रिएशन है वही क्रिएटर बन सकता है तो उसमें कोई समस्या नहीं है। अगर हम कहेंगे कि मिट्टी और जो बनाने वाला वो अलग है तो दोनों अलग है तो ऐसा नहीं हो सकता। ठीक है? अब आप मुझे प्रश्न का उत्तर दीजिए। चावल में कार्बोहाइड्रेट होता है ना हैं या फल में? फल में जो होता है फल हम तो फल नहीं खाने के फल खाने के लिए तो नहीं खाते। उसमें जो पुष्टि है जो एनर्जी है उसको लेने के लिए हम खाते हैं।
00:44:00:09 तो क्या आप मतलब वहां से मतलब देखदेख कर बस वही चुन चुन के खाते हैं या पूरा फल ही खाते हैं? पूरा फल खाते हैं। पूरा फल खाते हैं ना? तो मेरा बस पॉइंट यही है कि क्रिएशन में क्रिएटर के अंदर ही क्रिएशन है। तो अगर हम पूरे क्रिएटर को ही पूज ले तो उसके साथ पूरा क्रिएशन ही पूजित हो जाता है। जैसा कि श्री कृष्ण ने गीता ने श्री कृष्ण जी ने गीता में कहा है कि तुम मेरा इस स्वरूप को पूजो बाकी स्वरूप अपने आप ही पूजित हो जाते हैं। जी सही बात है। सही बात है मेरा कि हमको चुन चुनकर बस इस साकार रूप को मानो। जरूरत नहीं है। पूरी निराकार जाएंगे। मैं यह नहीं बोल रहा हूं कि मैं दीवार की पूजा नहीं कर सकता। मैं किसी भी चीज का पूजा कर सकता हूं। वो वो मेरी श्रद्धा है कि भगवान मुझे उस रूप में अवतार लेकर आए थे तो हम लोग उस रूप की पूजा कर सकते हैं। क्योंकि कण-कण में भगवान है तो हम किसी भी चीज की पूजा कर सकते हैं। वो भगवान का ही पूजा माना जाएगा। दीवार की भी अभी तक एक एक प्रश्न अभी तक एक प्रश्न जी भैया। अभी तक एक प्रश्न क्लियर दिखाई दे रहा है कि यदि सब कुछ भगवान है तो फिर किसी एक स्वरूप को ही वो सर्वशक्तिमान सच्चिदानंद कहते
00:45:15:22 हुए क्यों पूजा जा रहा है यदि सब कुछ भगवान है तो इस बारे में इस पर आप अब प्रकाश डालिए है ना नयन जी सही कह रहे हो सही कह रहा हूं ना मैं जी उत्तर भैया मेरा कहने का अर्थ ये नहीं था कि किसी एक रूप की पूजा करे बल्कि मेरा यह कहने का अर्थ है जो आज का वार्ता का जो मुख्य विषय है कि भगवान का साकार रूप भी हो सकता है। जब आप अगर सब कुछ को पूजने की बात करेंगे तो बात ये आ जाएगी क्या आप गधे को भी पूजेंगे क्या भगवान के अंदर ही है वो सृष्टि में है तो क्या आप स्वान को भी पूज लेंगे गली यहां पे तो 16 24 आ जाएगा ना आप ऐसे सबको नहीं पूज सकते दोनों पूजे जाते हैं भगवान के रूप में पंडित जी आप संयम रखें अपने ऊपर
00:46:09:01 जी मैं उत्तर अब जो है निराकार वाले एक बिल्कुल सब क्लियर हो गया है अब निराकार वाले जो टीम है वो अपने हैंड डाउन कर ले जिससे कि हम देख सके साकार वाले कौन-कौन लोग हैं तो हम उनमें से चुने किसी को तो भैया मैं जब उत्तर देना है एक मिनट विश्वजीत जी एक मिनट पहले सब लोग नीचे कर ले हाथ उसके बाद रेज करें दोबारा कर देता हूं। रुक जाइए। अब अब अभी साकार वाले रैंड रेस करें। केवल साकार वाले
00:46:49:08 हर्ष झा जी हैं। शशांत जी हैं। जी सीता प्राणा जी ने अभी तक नहीं बोला है। बोलिए श्री सीताराम जी सीताराम और जो ईश्वर है उसे हम साकार रूप में सिर्फ इसलिए पूछते हैं ताकि हम उसे भक्ति कर सके क्योंकि निराकार में हम प्रेम नहीं कर सकते। मेन पॉइंट जो आ जाता है प्रेम कहा जाता है। इसीलिए साकार रूप में अंजना पड़ता है।
00:47:26:07 मतलब कहने का अर्थ है कि जो भाव है वो भी साकार स्वरूप है। तो वो अपने ही मतलब उसी उसी साकार स्वरूप को खोजता है। तो जैसे प्रेम भी एक भाव ही हो गया। यह कहना चाह रहे हैं आप। जी भैया इसमें थोड़ा मैं ऐड करूंगा साकार पक्ष से। करिए करिए। जी मैं यह कहता हूं कि जैसे निराकार पक्ष के हैं तो शास्त्र सम्मत रूप से निराकार को सिद्ध अगर करने की कोशिश करेंगे तो निराकार में तो इस प्रकार भी कहा गया है कि जैसे वेद पाठी ब्राह्मण का वेद से जैसा प्रयोजन रह जाता है निराकार को समझने के बाद उसी प्रकार का भाव है। तो क्या ये जो निराकार का पक्ष रख रहे हैं वो उस प्रकार के तत्वदर्शी हैं? मतलब क्या उनमें पूरी तरह से कोई भी चीज का भिन्नता का वो परिचय नहीं दे रहे हैं। सोना हो, पत्थर हो या फिर ब्राह्मण हो, चांडाल हो। इस प्रकार जो हमारे व्यवहारिक धर्म के जो है नहीं इसमें देखिए एक बात है हम लोगों का पक्ष तो हम ये ये करेंगे कि हम निराकार साकार को होने ही नहीं देंगे। हम यह नहीं कहेंगे कि एक एक उसके बाद जो है निराकार की साकार की वो नहीं रह जाती है। सगुण साकार की उपयोगिता नहीं रह जाती है। हम यह सब नहीं कहेंगे। हम तो यह कहने वाले हैं कि ईश्वर सगुण साकार हो ही नहीं सकता। उसकी मूर्ति बनाकर पूजा करना व्यर्थ
00:48:41:13 है। तो हम उस पक्ष की ओर से आप पर काउंटर कर रहे हैं। भैया निराकार पक्ष में होने के लिए तो वो सब गुण भी आवश्यक है ना कि निराकार मतलब निर्विकार स्वरूप जैसे कोई भी भेद नहीं दृष्टिकोण रखने वाला। अभेद दृष्टि अद्वैत दृष्टि ठीक है। आपकी बात समझ गए। अब साकार पक्ष इस पॉइंट को कोई कहना चाहता है क्या? तो पहले आप हां पहले आप सीता प्राण सीता प्राण जी के जो पॉइंट को है उनको अगर काउंटर है कोई क्वेश्चन है तो बोले जी भैया प्रश्न क्या है एक बार फिर से पल दीजिए हां नहीं प्रश्न आपकी तरफ से नहीं था अब आप वो तो आपके समर्थन से था तो निराकार निराकार को देना है ठीक है हमारी साइड कौन-कौन है भाई धनुष हैदर अली जी हैदर अली जी भी कुछ बोले क्या कहें हम? हम हम तो ज्ञान ले रहे हैं बस। नहीं नहीं निराकार पक्ष निराकार पक्ष से कृपया अपना भी कोई भी पॉइंट ऑफ व्यू तो रखें ही।
00:49:52:02 चलिए ठीक है। उनको नहीं रखना है तो आगे अन्य लोगों से दीक्षित जी सुजीत पाटिल जी एवं नयन जी कर सकते। कर लीजिए तब तक कर लीजिए। तो जो निराकार वाले पक्ष है जो भी जो लोग होते हैं योगी गण वो जिस ज्योति को पूजते हैं भाई भक्त अपना निज रूप मान के रूप में जो आते प्रेम से प्रकट होते है सबसे पहले तो व्यापक प्रेम से प्रकट जाना अब जो प्रेम से प्रकट हो गए जिस ज्योति को वही ज्योति है वो प्रेम से प्रकट हुई है ठीक है अब जो प्रेम से प्रकट हो गई है उसे छोड़ के हम फिर निर्गुण की तरफ क्यों भाग
00:50:40:14 तो आप अब किसको किस ओर जा रहे हैं? मतलब सगुण साकार को छोड़ रहे हैं क्या? नहीं तो ठीक है। ठीक है। निरा निराकार वाले अब निराकार वाले इनको जवाब दें भाई। उत्तर दें। बोलिए सुजीत जी जी अगर हम भगवान को किसी आकार में सीमित कर देंगे फिर उसको वो सर्वशक्तिमान नहीं रह सकता ना क्योंकि हम देखते हैं कि कहीं ना कहीं इस सीमा में ईश्वर है अपने लोक में है या फिर इस आकार में है तो इससे वो सीमित हो जाएगा और रही बात कि हम अह कि जो ज्योति है वो भक्ति से प्रकट हुई है ऐसा नहीं अह अनेक ज्ञानी हुए जिन जिन्होंने ब्रह्म का स्वरूप समझकर वो ध्यान लगाया ज्योति का वो उनका ज्ञान हुआ है उनको भक्ति नहीं वो भक्ति से नहीं गए वो ज्ञान मार्ग से गए अनेक साधक है जो वो उस स्वरूप को ध्यान करते हैं फिर उनको ज्ञान होता है तो जरूरी नहीं कि भक्ति भक्ति ही ईश्वर के मार्ग पर जो सामान्य जन उनके
00:51:55:18 लिए भक्ति है लेकिन जो ज्ञानी जन है या फिर योगी है वो योग लगा योग आसन करके और प्राणायाम आदि करके उन जो ईश्वर है उसका स्वर का ध्यान करते हैं। फिर इसका मतलब ये है कि हमें जरूरी नहीं कि सगुण साकार के आकार का। सगुण साकार की कोई जरूरत नहीं है। इसका मतलब सिर्फ यही कहना चाहता हूं मैं कि हमें सगुण साकार के निर्गुण निराकार कभी हो सकता है हमें उसका ध्यान करके। ऐसा जरूरी नहीं कि सगुण साकार ही चाहिए। क्योंकि अगर हम उनको आकार में डालेंगे फिर सुजीत जी मैं फिर वही कहूंगा कि आप इस बात को जो एक्सेप्ट कर रहे हैं ना कि नहीं वो क्या कहते हैं जो ज्ञानी जन नहीं है उनके लिए भक्ति है ये चीज हमारा हमें नहीं स्वीकार करनी है। नहीं नहीं स्वीकार कर रहे हैं। मेरा मतलब फिर ये है कि किसी भी रूप से हमें शगुन साकार का अस्तित्व स्वीकार नहीं करना है। और इसका कारण क्या है? क्यों नहीं करना है कि कौन-कौन से तर्क आ सकते हैं सगुण साकार के खंडन के लिए हम लोग सीख सके व्यवहारिक रूप से सीख सके थ्योरिकली नहीं कि हमारे भगवान को भगवान का खंडन करने के लिए किस-किस तरह का प्रहार हो सकता है ये जो सगुण साकार और निराकार में जो आज ये तुलनात्मक वैचारिक चर्चा हो रही है गोष्ठी हो रही है इसका उद्देश्य यही है कि सगुण
00:53:10:26 साकार का मत जो है सगुण साकार का अस्तित्व पर किस-किस प्रकार से प्रहार किया जा सकता है तो इसलिए आवश्यक है कि जो सामने वाली जो यह वाली इस तरफ से जो कर रही है सगुण साकार का जो अस्तित्व क्या कहते हैं स्वीकार नहीं करती है तो वो ना करे किसी भी रूप से ना करे क्योंकि किसी भी रूप से होगा तो फिर मूर्ति बन जाएगी ना पूजा हो जाएगी जबकि जो सगुण साकार का खंडन करते हैं कि नहीं ईश्वर अवतार नहीं ले सकता ईश्वर की मूर्ति नहीं हो सकती ईश्वर का सगुण साकार स्वरूप नहीं हो सकता वो ये थोड़ी ना करते हैं कि नहीं नहीं वो उनके ये ठीक है जो कम ज्ञानी है। समझ रहे हैं आप? जी भैया मैं कुछ कहना चाहता हूं। साकार पक्ष से मैं निराकार का एक बार क्लियर कर दूं कि किसी भी तरह से सगुण साकार को एक्सेप्ट ना करें आप। यही आपका पक्ष है। शिवशी मैं भी कुछ कहना चाहता हूं। साकार पक्ष से एक मिनट कहिएगा। पहले मैं निराकार पक्ष को थोड़ा सा वो कर दूं। तो अभी अभी मेरे ख्याल से पड़ रही है। अभी क्या है कि सुजीत जी आप हैंड हैंड डाउन कर लीजिए। हाथ अपना अभी
00:54:26:14 साकार की तरफ से ही वो उठ रही है। ठीक है? और अगर निराकार की ओर से कोई इनको काउंटर करना चाहता है तो करें। मगर अब ध्यान रखें निराकार वाले अप्रत्यक्ष रूप से यह स्वीकार ना करें कि नहीं सगुण साकार इस तरीके से हो सकता है। मगर फिर भी हम वो नहीं यह करेंगे। वो एक अलग चीज हो जाएगी। आपको होना ही स्वीकार नहीं करना है तो उस पर बात करें। तो अगर इनको काउंटर करना है तो करें नहीं तो अन्यथा फिर मैं करूं काउंटर। मैं कर सकता हूं क्या निराकार कुछ? निराकार से कौन है? तनुष जी हां बोले जो इससे पहले प्रेम की बात हुई कि सगुण साकार रूप से प्रेम करके हम मतलब भक्ति कर सकते हैं। आप यहां से शुरू करिए। आप यहां से शुरू करिए कि जब सब कुछ भगवान ही है। सब कुछ सारे स्वरूप उसी के हैं या सब में वो है। इस कारण से यदि पूज रहे हो तो सब कुछ को क्यों नहीं पूज रहे हो? फिर कुछ विशेष विग्रह को कुछ विशेष स्वरूप पूज रहे हो। यहां से शुरू वो भी है। पर मेरा एक दूसरा पॉइंट है कि प्रेम तो निर्गुण स्वरूप से भी किया जा सकता है। प्रेम करने के लिए हमें सगुण की जरूरत नहीं है। हम अगर सबको
00:55:41:22 ही भगवान मान रहे हैं तो फिर अह हमें सगुण की जरूरत क्यों पड़ रही है प्रेम के लिए? अगर हम भक्ति रखते हैं तो हम निर्गुण रूप के ब्रह्म में भी भक्ति रख के मतलब पार इसका उत्तर अगर थोड़ा देना चाहूंगा। कौन-कौन देना चाहता है? पहले बताएं एक बार विश्वजीत जी और शशांक जी आप बोले आपने आपने काफी देर से नहीं बोला है शशांक चौधरी जी ने भी नहीं बोला है हां हां बोलिए जी मैं बोलूं बाकी सब हाथ बाकी सब हाथ नीचे करिए कहने पर हाथ उठाया कर उससे थोड़ा क्लिटी रहती है तो निराकार पक्ष से भी ये मतलब क्वेश्चन पूछा गया है कि जब सभी भगवान है तो स्पेसिफिक रूप को ही क्यों पूजा जाए? सबको क्यों नहीं पूजते? तो इस सबसे पहले मैं जवाब देना चाहता हूं। निराकार हमें कुछ सिखा नहीं सकता। जो भी हमें वैल्यूज मूल्य जीवन के सिखाए जाते हैं वो साकार रूप में ही सिखा सकते हैं। निराकार कुछ नहीं सिखा सकता। और जो निराकार का ध्यान लगाते हो ध्यान लगाने के लिए भी निराकार का कैसे ध्यान लगा सकते हो? एम्प्टी स्पेस का जो भी यज्ञ करते हैं जो भी हम पूछते हो जैसे अभी आप
00:56:56:26 कह रहे थे कि जो ज्यादा एलिवेटेड ऋषि होते हैं वो निराकार का ध्यान लगाते हैं तो ध्यान लगाते किसका है एट द एंड जब कुछ है ही नहीं सब सब भ्रम है और कोई बिना आकार के भ्रम है तो फिर ध्यान बैठ के आंख बंद करके सोचते क्या हो और एक भी उदाहरण आप मुझे ऐसा दे दो जो निराकार ईश्वर ने कोई भी मूल्य सिखाए हो जैसे कृष्ण जी राम जी आके हमें मूल्य सिखाए के उत्तम कैसे बने? मर्यादाओं में कैसे रह? वचनों का पालन कैसे करें? निराकार किस प्रकार से और क्या सिखाता है मनुष्य को कि वो मोक्ष तक जा सके। ठीक है? धन्यवाद। भाई मैं थोड़ा ऐड करना चाहूंगा मैं साकार पक्ष। कर दीजिए। साकार पक्ष खूब ऐड कर दीजिए भाई। हम लोग दब जाए उसके नीचे।
00:57:41:27 ये शिवंत ये कहना चाहता हूं कि जैसे उन्होंने कहा कि निराकार अगर सब कुछ आप कह रहे हो कि साकार दृष्टि से कि सब कुछ में ईश्वर है तो फिर आप क्यों विशेष कुछ विग्रह को पूज रहे हो तो ये सीमा हम पर लगती है ना हम असीमित थोड़ी है हम पर तो सीमाएं लगती है वो असीमित है वो तो विभिन्न प्रकार में हर जगह पूजित हो सकता है पर हम तो सीमाएं लगता है ना हमारे माता-पिता है हम सभी पुरुष स्त्रियों को माता-पिता नहीं कह सकते तो हम जगत में हमारे भिन्न है शिक्षक हैं हम हर हर किसी को शिक्षक थोड़ी कहेंगे। अब विद्यालय में कोई शिक्षक है, कोई विद्यार्थी है। अब सब कुछ तो उसके लिए ना वो एक एकत्व भाव है। हम तो सामान्य हैं। हमके लिए तो सीमाएं लगेंग ही विग्रह बनेंगे और पूजे भी जाएंगे। जी जी इसका उत्तर देखिए तो तो मोटा मोटा पहले केवल हाथ उठाए। पहले केवल हाथ उठाए। अभी ये हो गया साकार का साकार से किसी और को भी बोलना है। नहीं नहीं
00:58:41:03 एक-एक करके पॉइंट लेके चलते हैं। तो मोटा-म मोटी ये कह रहे हैं कि व्यवहार में हम हैं। अब साकार वालों का हो गया है। तो हम निराकार वालों का पक्ष लेने जा रहे हैं। आप जो साकार वाले हैं वो हाथ अभी डाउन रखें। तो साकार वालों के लिए बस एक पॉइंट मैं इसको जोड़ देता हूं। मतलब जोड़ क्या देता हूं। किसी को बता देता हूं कि वह यह कहना चाह रहे हैं कि व्यवहार में होने के कारण उनको व्यवहारिक पॉइंट ऑफ व्यू से ही डील करना पड़ेगा और वो वो हमेशा साकार ही होगा। चाहे वो कोई अच्छी बातें सीखनी सिखानी हो या शिक्षा देनी हो सब कुछ व्यवहार है और व्यवहार स्व जो है वो उसका जो जो अंत है वह क्या बोलते हैं? साकार स्वरूप ही होगा। ठीक है? तो और उसके बिना आप क्या बोलते हैं? व्यवहार में एक्सिस्ट नहीं कर सकते। कुछ इस तरह से कहना चाह रहे हैं। तो मैं एक और चीज और बोलिए बोलिए हर जी हर जी बोलिए
00:59:34:28 जी जैसे कि निराकार पक्ष से ये आया ना प्रश्न कि जब ईश्वर सब जगह है सब कुछ ईश्वर ही है तो सारे स्वरूप पूजनीय क्यों नहीं जो आज सब कुछ है खाली स्पेसिफिक एक विग्रह को ही क्यों है ना तो इसका उत्तर यह है कि जल जो है वो तो सब सर्वत्र व्याप्त नमी के रूप में ना तो हमको लेकिन हमारा प्यास तो वही बुझा सकता है जो मतलब जो हमारा प्यास बुझा है जिसको हम पीते हैं जो एक एक रूप में एक है ना तो हम समुद्र में तो जल नहीं पी सकते अगर वो पिएंगे तो लगेगा लेकिन वो भी तो जल ही है और नमी सर्वत्र व्याप्त है लेकिन वो उसको पीने योग्य नहीं है वो वो हमारा प्यास नहीं बुझा सकता इसलिए जीव का जो प्यास है वो वो ईश्वर प्राप्ति जो सुलभता से हो जाए वो साकार साकार में ज्यादा है क्योंकि ईश्वर भगवान श्री कृष्ण ने ही कहा है कि जो ज्ञानी है वो मेरा मतलब आत्मा है लेकिन जो भक्त है वो मेरा प्राण है भगवत गीता में और यह भी बताया कि जो निर्गुण निराकार पक्ष के जो है वह
01:00:50:12 अपना साधना करते हैं तो कठिनता से प्राप्त करते हैं लेकिन साकार पक्ष वाले जो भक्ति से प्राप्त करते हैं वो बहुत जल्दी बहुत शीघ्र ही वो प्राप्त हो जाते हैं भगवान को बहुत सुलभता होती है उनको हम तो ये मेरा दो दो पक्ष हुआ और एक और पक्ष था जो मैं बोलना चाह रहा था लेकिन बोल नहीं पाया कि ईश्वर जब अवतार लेता है तो वो सीमित हो जाता है। इस तरह का जो बात है तो ये उसकी सीमितता नहीं उसकी पूर्णता है। पहली बात कि जब ईश्वर साकार आता है तो ऐसा नहीं कि वो निराकार रूप में सर्वत्र नहीं रहता है ना वो सर्वत्र व्याप्त है अपने निराकार निराकारता से और साकार रूप में हमारे समक्ष आता है और दूसरा एक और प्रश्न था कि जब उसमें दोष आ जाएगा अगर वो साकार लेगा तो तो इसका भी मैं उत्तर दूंगा कि वो कि वो जब भगवान आते हैं तो उनको कोई कर्म बंधन बांध ही नहीं सकता। भगवान स्वयं कहते हैं कि मेरे को कर्मों में आसक्ति नहीं तो मेरे को कर्म बांध नहीं सकते। जब कर्म बांधते नहीं तो दोष आता ही नहीं। जब तक दोष नहीं आएगा तो वो उसमें दोष कैसे लगेगा? है ना? और एक और है कि भगवान का जो विग्रह है हम लोग देखते हैं। मनुष्य लोग देखते हैं कि वो एक मानव तनधारी है। है ना? लेकिन अगर हम देखा शास्त्रों में पढ़े तो उनको
01:02:05:15 चिन्मय शरीरधारी भी बताया गया है। भगवान श्री राम, श्री कृष्ण इत्यादि को वो चिन्मय रूप धारण करके आते हैं। मानव जैसे प्रतीत होते हैं लेकिन उनका शरीर जो रहता है वो हमारी जैसे पंच भौतिकता नहीं सच्चिदानंद स्वरूप रहता है। जैसे सच्चिदानंद विग्रह कहा गया है। है ना? ना विग्रह का अर्थ तो रूप है, साकार है। हम तो तो इस आधार पे हम ये कह सकते हैं कि भगवान को ना तो दोष लगता है और भगवान भगवान सर्वत्र होते हुए भी जीव की जो प्यास है वो अपने साकार रूप से ही बुझाते हैं। तो यहां पर ये मेरा तर्क है कि भगवान का साकार रूप की उपयोगिता साकार रूप की जो है ना मेरा पक्ष यही है। फल लगता है यहां पे।
01:02:50:21 ठीक है। निराकार की ओर से कोई है जो नयन जी को छोड़ के और कोई है? चलिए नयन जी आप बोले। जी मैंने शशांक जी और हर्ष जी दोनों का तर्क का आगे-आगे उत्तर दूंगा। पहले शशांक जी का जो पक्ष था कि निराकार रूप से हम कुछ सीख नहीं सकते मूल्य। जो हम साकार रूप से सीख सकते हैं। तो इस पर मैं यह कहूंगा कि क्या जो हमें जो वैल्यूस मोरल वैल्यूस अगर हमें जानना है तो उसके लिए क्या ईश्वर की आवश्यकता है? क्या धर्मशास्त्र वेद या महाभारत पुराण आदि जो शास्त्र है तो उससे क्या हम सीख नहीं सकते? दूसरी बात अगर हम यह मानते हैं कि अगर आप रामायण महाभारत से सीखने
01:03:43:20 एक मिनट आप पूरी बात जी को पूरा कर लेने दीजिए पहले नयन जी ये पहली बात दूसरी बात अगर हम यह मानते हैं कि जो निराकार जो उनका स्वरूप है उसके अंदर ही सब कुछ है। है ना? वह सब कुछ में है और सब कुछ उनमें है। तो हमें तो कोई परेशानी नहीं है इसमें कि हम किसी से सीखे किससे ना सीखें। पूरी जगत ही हमें हमारे लिए शिक्षणीय है। किसी भी व्यक्ति से उन्होंने जैसे एक व्यक्ति ने पिछले कहा था कि मेरे अवगुणों को मत लो। मेरे सद्गुणों को लो। तो किसी भी व्यक्ति से हम उसके अच्छे गुण देखकर सीख सकते हैं। वो आम मनुष्य ही हो या अवतार ही हो या भगवान ही हो। तो उसके अच्छे गुण तो हम ले ही सकते हैं। तो इसमें कोई समस्या नहीं है। और हर्ष जी का जो पक्ष था कि जल के बारे में आप कह रहे थे कि जो अच्छे जल है उसको ही जो पीने योग्य है उसको हम व्यवहार में ला व्यवहार रूप से व्यवहार कर सकते हैं। बाकियों के साथ नहीं। तो यहां पर मैं कहूंगा गीता का एक श्लोक है दो अध्याय का 45व श्लोक शायद है कि जहां पर कहते हैं कि त्रगुण्य विषया वेदागुण्य भव्जुन तो वो यह कह रहे हैं अर्जुन को कि वेद का जो विषय है वह तीन गुणों से मतलब मिला मिला हुआ है तो
01:04:58:24 तुम तीनों गुणों के परे जाओ तुम निर्गुण हो तो अर्जुन को उन्होंने यह क्यों नहीं कहा कि तुम सात्विक बनो क्योंकि तीनों गुणों में तो श्रेष्ठ सात्विक है तो आपके अनुसार भी अगर देखा जाए जितने सारे जितने प्रकार के जल मौजूद है उनमें से जो श्रेष्ठ है जो पीने योग्य है तो वह क्यों उनको बनने नहीं कह बनने के लिए नहीं कह रहे वो कह रहे कि इन सबके पड़े तुम जाओ तो यही पक्ष है हां अब नयन जी ने रख लिया है और अब मैं ऐसा करता हूं कि अभी तक काफी देर हो चुकी तो अब जो है दो लोगों के बीच में बात हो उनमें से जो जिसका पक्ष कमजोर दिखाई दे उसको हटा के उसकी की टीम से दूसरा व्यक्ति आ जाए। ठीक है ना? तो ऐसे कर लेते हैं। अब जो बात हो रही है अब होगी शशांक जी और नयन जी के बीच में। चलिए शशांक जी उत्तर दीजिए। जी तो जैसे मैंने अभी क्वेश्चन पूछा था कि निराकार से कोई वैल्यू नहीं मिलते। तो उसके उत्तर में भी उन्होंने कहा कि हम तो किसी से भी सीख सकते हैं। ये नॉकउ राउंड है। इसके बाद जी आवाज कहां से आ रही है? यह नॉक आउट राउंड है। तो इसमें जब आप एक बार जाएंगे तो फिर दोबारा या तो हो सकता है कि अवसर प्राप्त
01:06:14:02 ना भी हो आपको बोलने का और ये भी हो सकता है कि मतलब आपका आपकी बारी ना आ पाए। तो इस हिसाब से लड़िएगा अपने पक्ष में रखिएगा। मैं जी केवल दो लोगों के बीच बात होगी। लगातार इधर से उधर से केवल दो लोग एक दूसरे से बात करेंगे और जो जिसका पक्ष कमजोर होगा उसको उसको हटा करके उसकी टीम के दूसरे व्यक्ति को ले लिया जाएगा। ठीक है। शशांक जी और शशाचांग जी अब अपनी पक्ष को रखें। जी। तो और अगर आपको लगता है कि इसका जवाब नहीं दे सकते। कोई और देना देता है तो आप भी स्वयं वालंटियर करके बोल सकते हैं कि नहीं नहीं मेरी टीम से अब ये बोलेंगे। ठीक है? ऐसे भी किया जा सकता है। बोल तो मैं नयन जी आपसे एक सवाल पूछता हूं। तो अपने पक्ष के अनुसार आपको निराकार का ही समर्थन देना है। उसमें अगर आप यह कहेंगे कि प्राकृति से हम सीख सकते हैं तो प्राकृति का भी आकार है। ठीक है? तो मेरा फिर वही एक बेसिक सा सवाल है। निराकार ईश्वर जिसका कोई रूप नहीं है, कोई डायमेंशन नहीं है, कुछ नहीं है। ठीक है? कोई रंग, रूप, गंध कुछ नहीं है। उसका कोई आकार नहीं है। उससे हम क्या वैल्यू सीख सकते हैं? और पिछली बार आपने उत्तर में हमारे समर्थन दे दिया था कि महाभारत रामायण से भी हम सीख सकते हैं। तो वहां पर तो अवतारवाद को आप सपोर्ट कर रहे थे। तो बिना आकार के बिना किसी अवतारवाद के बारे में मैंने कहा कि जो भी व्यक्ति
01:07:29:22 है कोई भी व्यक्ति है या कोई भी मनुष्य है तो उससे हम कुछ ना कुछ अच्छे चीजें तो सीख ही सकते हैं ना और हमारे धर्मशास्त्र तो मौजूद है जिससे हम अच्छे चीजें सीख सकते हैं तो उसके लिए ईश्वर की आवश्यकता क्या है तो फिर तो आप भी क्यों पूछ रहे हो फिर निराकार को अगर सब चीज यहीं से सीख सकते हैं प्राकृतिक ईश्वर की नीड क्या रहेगी वही तो है ना जो जो निराकार देखिए एक मेरा मेरा पक्ष यह है कि जो ईश्वर का जो निराकार स्वरूप है वो नित्य शुद्ध बुद्ध मुक्त सच्चिदानंद घन विग्रह स्वरूप है जो अजन्मा और अविनाशी है तो अगर वो जन्म लेगा वो अगर संसार में आएगा तो उसका यह जो ये जो मतलब उसका गुण है नित्य शुद्ध बुद्ध मुक्त और सच्चिदानंद घन तो यह जो स्वरूप है वह बाधित हो जाएगा तो इस कारण हम उसको मतलब पूर्ण नहीं कह सकते जो पूर्ण है तो इस कारण हम जो वह अजन्मा रूप है। हम उसको पूज सकते हैं। वह पूजनीय है। और जो उसका साकार में अगर वह आ रहा है तो वो क्रिएशन बन रहा है उससे हम सीख सकते हैं। कुछ अच्छे चीजें सीख सकते हैं। परंतु पूजनीय नहीं है क्योंकि वो पूर्ण नहीं है। तो यही मेरा पक्ष है। लेकिन इससे साबित क्या होता है? अगर किसी में कोई भी डिफिटी है, विकार है तो वो पूजनीय नहीं रह जाएगा। पूजने के लिए मतलब एकदम से ही विकार
01:08:44:26 युक्त को ही हम पूजेंगे। इसका तो कोई मतलब ये कहां पे लिखा हुआ है कि विकार युक्त को ही हमेशा पूजो तभी मुक्ति प्राप्त होगी। इसमें विकार होगा तो उसको मैं पूजा पूजूंगा ही क्यों विकार तो मैंने सबसे पहले अपने प्रश्न में पूछा था कि प्रकृति भी कर्मों के अनुसार फल देती है। कहीं पे बाढ़ ला के लोगों को मारती है। पूरे के पूरे गांव उजाड़ देती है। ये प्रकृति भी आपने माना था कि ये ईश्वर की ही रची हुई है। तो ईश्वर ने ही जो चीज बनाई है वही लोगों को कष्ट दे रही है। तो डायरेक्टली ईश्वर ही कष्ट दे रहा है ना। हां तो वही तो मेरा पक्ष है कि हम उस प्राकृत को यानी ईश्वर को क्यों पूजे जो जो कोई अभी बच्चा जन्मा ही है उसके ऊपर से पेड़ गिर जाए बिजली गिर जाए तो वो फिर हम साकार को क्यों पूजे तो मेरा विधान तो साकार निराकार ईश्वर ने कहा ना कि मैंने सृष्टि की रचना कर दी सृष्टि ही कर्मों के अनुसार फल देगी सबको आप तो मेरा ही पक्ष कह रहे हैं कहां से जो ईश्वर ने आपने कहा डिफिटी होती है अगर ईश्वर तो अपने आप ही विकार मैंने प्रकृति बनाई है तो उसमें तो अपने आप ही विकार है जो निराकार ईश्वर देखिए मैंने मेरा पक्ष था कि ईश्वर ने प्रकृति बनाई है तो ईश्वर क्रिएटर है प्रकृति क्रिएशन है क्रिएशन में दोष है तो हम प्रकृति को नहीं पूज सकते हम ईश्वर को पूजेंगे तो ईश्वर को हम क्यों पूजें जिसने दोष युक्त प्रकृति बनाई है
01:09:59:27 दोष तो आ गया ना ईश्वर में परफेक्ट प्रकृति बना सकते ईश्वर को भी बना सकते हैं ना वो उनकी मर्जी है तो तो ऐसे ईश्वर खुद भी विकार युक्त शरीर धारण करके अवतार लेके मनुष्य को उद्धार के लिए लीला कर सकते हैं इसका मतलब वो अगर आप बना सकता है जो लोगों को दंड दे आप मान रहे हैं अवतार नहीं अच्छा आप मान रहे हैं कि ईश्वर ने जो प्रकृति बनाई है वो दोष युक्त है उसमें अगर हम है तो अगर उस प्रकृति में अगर भगवान आ रहे हैं तो वो खुद भी दोष मतलब दोष मैंने मना कब करा कि उसमें उनमें दोष नहीं है मैं तो कह रहा हूं उनके उनको पूछ सकते हैं नहीं पूजने का कहां से विधान है कि हम नहीं पूछ सकते अरे मेरा तो सीधासीधा बात है कि अगर पूछेंगे तो यही बात को बार-बार नहीं देखो परफेक्ट तो ऐसे कोई भी नहीं होता कोई है दयानंद सरस्वती जी वो भी परफेक्ट नहीं है लेकिन आप उनके भी वही मूल्य उसको लेते हो ना जो लेने योग्य हैं सभी को नहीं लेते ना तो हम भी अपने अवतारों के जो अवकार है उनको नहीं देखते उनके जो बाकी 99% जो उन्होंने लीला करी है जो ज्ञान दिया है और हम भी सिर्फ उन्हीं को लेते उन्हीं को पूछते हम तो हर देखिए ईश्वर का तो संज्ञा ही यहां पर बाधित हो जाएगा हर मनुष्य अगर हम कोई मनुष्य कहता है कि मैं ईश्वर हूं तो उसको उसको प्रमाण करना पड़ेगा कि उसमें कोई दोष नहीं है ना तो ऐसे तो निराकार का प्रमाण देके
01:11:15:06 दिखाइए हमारे तो अवतारवाद में अब निराकार ईश्वर का फिर प्रमाण क्या दोगे आप ऐसे कि कहां पे किसकी सहायता की किसको वचन दिए ईश्वर की अगर संज्ञा में भी कहूं जितने सारे संज्ञा है मुझे सभी ज्ञात नहीं परंतु जिसमें कोई दोष नहीं होगा जो 100% विशुद्ध है और जो है एक मिनट यहां पर दोनों पक्षों में एक बात जो बोली नहीं जा रही है शशांक जी की ओर से भी एक माइनस पॉइंट चल रहा है। हल्का सा छोटा सा वो भूल रहे हैं कुछ और नयन जी आपकी ओर से भी कुछ आप छोटा सा भूल रहे हैं। तो कोशिश करिए कि आप अपने पक्ष पे पुष्ट करें। भैया एक चीज मैं जरा ऐड कर आपको। अब आप आपकी बारी आएगी। अभी दोनों में से जो अगर साकार की ओर से शशांक जी हटते हैं तो फिर आपको ले लिया जाएगा। जी नयन जी अब अपनी बात बोले। बोलिए। जी मेरा मेरा बात बस इतना था कि जो मतलब क्या कहूं कि जो अभी देखिए अगर मैं साकार के रूप से भी कहूंगा जो निराकार है उससे साकार बन रहा है तो ये थोड़ा डायवर्जेंट रे जैसा होता है ना फिजिक्स में तो वैसा हो जाएगा कि अगर हम देखेंगे निराकार से साकार बन रहा है बहुत सारे साकार अब कौन से रूप को पूजे ये वाला रूप या वो वाला रूप तो साकार में भेद है परंतु निराकार
01:12:30:16 में भेद नहीं वही मूल है और वही नित्य शुद्ध बुद्ध मुक्त है तो इसलिए लिए जो नित्य है हम उसी को पूजेंगे तो सीधासीधा बात है। और दूसरा जी आप कहिए हां अब इस पॉइंट को काउंटर कर सकते हैं शशांक जी तो कृपया करें। जी इसी पॉइंट को तो काउंटर कर रहा हूं मैं कि निराकार है अगर वो उसमें कोई दो शशांक जी का एक पॉइंट बहुत बढ़िया रहा। भैया इस पॉइंट का काउंटर मैं करना चाहूंगा। एक मिनट शशांक जी का एक पॉइंट बहुत बढ़िया रहा कि ईश्वर जब सृष्टि बना रहा है तो वो भी दोष युक्त है। ठीक है? अगर आप निराकार को भी मानते हो निराकार ने सृष्टि बनाई है तो वह भी दोष युक्त है क्योंकि दोष युक्त क्योंकि दोष युक्त सृष्टि है अगर हम ये सब दोष देखते कीड़ों को मारना ये करना वो करना ठीक है तो इसका जवाब क्या दिया है नयन जी ने वो दोबारा से बता दीजिए जी मैंने कहा कि अगर वो दोष युक्त प्रकृति बना रहा है तो उसमें अगर वो आएंगे तो वो खुद भी दोष युक्त होंगे तो इस कारण से हम उसे पूछ मेरा एक जी अगर मैं कोई डेवलपर हूं या फिर कार मैन्युफैक्चरर हूं मैंने कोई प्रोडक्ट बनाया उससे लोगों को दोष लग रहा है उससे उनकी हत्या हो रही है तो उसका इल्जाम मेरे पास आएगा ना क्योंकि मैं क्रिएटर हूं ईश्वर ने अगर दोष युक्त प्रकृति
01:13:45:20 बनाई है और उससे लोगों को कष्ट हो रहा है बाढ़ आ रही है सूखे से मर रहे हैं आपस में सब लड़ के मर रहे हैं तो उसका दोष भी ईश्वर को मिलना चाहिए ना निराकार ईश्वर को निराकार ईश्वर को साकार को नहीं साकार तो हमारे बीच में जो निराकार ईश्वर जिन्होंने दिया उसको हम इसके परिपेक्ष में व्यवहार नहीं कर सकते क्योंकि आप क्रिएशन है जो अगर कोई कार मैन्युफैक्चरर कार बना रहा है तो उससे लोग मर रहे हैं तो कार के बाहर वाले लोग मर रहे हैं परंतु यहां पर कार के अंदर वाले लोग ही मर रहे हैं तो यह उदाहरण उसके साथ मेरे ख्याल से अंदर वाले भी लोग मर रहे हैं अंदर वाले भी मर जाते है ना क्रिएटर की अगर एयर बैग नहीं खुले मैं एयर बैग बनाने वाली कंपनी का मैन्युफैक्चरर हूं तो अगर एयर बैग नहीं खुले उसकी वजह से लोग मरे हैं बाहर वाले बच गए अंदर वाले मरे हैं उनका उसका दोष भी तो मुझ पे आएगा ना। तो ऐसे निराकार ईश्वर जिसने सृष्टि बनाई है और वो अलग से बैठा हुआ है। एक उसका दोष आएगा ना। अब जो है भैया एक पॉइंट हमको बोलने दीजिए। एक मिनट विश्वजीत जी अभी आवश्यकता नहीं है ना। अभी शशांक जी का ठीक चल रहा है ना? तो निराकार की ओर से और कोई हो जो सामने आना चाहे।
01:14:58:09 है कोई किरण दीक्षित जी कहां गए नहीं है क्या उपलब्ध हां हां वो बोलिए तो आइए फिर अब आप इनको थोड़ा सा विराम देते हैं नयन जी को अब आप बोल अरे मैं आपको क्या कहूं शिवाजी साकार का तो मतलब खंडन हो ही नहीं सकता सही से अगर चर्चा इस विषय पर होता की ठीक है। ठीक है। ठीक है। तो चर्चा अगर इस मेरा एक बात सुन लीजिए। जी कि किसी दिन चर्चा इस विषय पर भी रखी है कि मतलब भगवान का जो मौलिक स्वरूप है वो साकार है निराकार। जी अब आप ये सुझाव उसमें दीजिएगा। अभी हम लोग जो चर्चा को थोड़ा आगे बढ़ाते हैं। अ फिर निराकार की ओर से अब कौन बचा? सुजीत जी आप नहीं आएंगे। आप हाथ नहीं उठा रहे हैं और बाकी सभी लोग शांत हैं तो अब तनुष जी ने हाथ हैंड रेज किया था तो अब आप आ गए हैं और दो सेकंड मैं अपना पॉइंट रिमेंबर कर कर लीजिए कह लीजिए हां हां अभी याद आया जब हम ये कहते हैं कि दोष युक्त प्रकृति
01:16:13:25 में कुछ अगर बुरा हो रहा है या अच्छा हो रहा है तो उसके दोष ईश्वर को लगा तो वो तो सगुण स्वरूप में भी ईश्वर को लगेंगे क्योंकि क्योंकि प्रकृति उनहीं की है। तो हम ये क्यों मान रहे हैं कि जब ईश्वर निर्गुण है तो दोष बस निर्गुण स्वरूप को ही ना। तनुष जी ये प्रश्न नहीं था। वो तो इन्होंने नयन जी ने ऑलरेडी आरोप लगाए हुए थे ना कि उन पे विकार आ जाता है तो हम उन विकार को एक्सेप्ट कर रहे हैं। इनका पॉइंट था कि जो निर्गुण है जो निराकार है उस पे कोई विकार नहीं होते हैं। आपको उसका पक्ष लेना है। जो सगुण है उनमें तो हम विकार मान लेते हैं। वो जब जन्म लेते हैं तो विकार आ जाता है। जो निर्गुण निराकार है उसमें भी विकार है। इसका खंडन करिए अब। नहीं नहीं मैं यह बोल रहा हूं कि सगुण में अगर आप किसी का विकार मान के उसकी पूजा कर रहे हैं जी तो आप वो जब संपूर्ण है ही नहीं तो आप उसकी पूजा कैसे कर सकते हैं तो जो मैंने तर्क दिया है उसके अकॉर्डिंग निराकार भी नहीं है ना देखिए उसको डिफेंड करिए शशांक जी ये ये जो चीज है चलिए आप तनुष जी आप ही लीजिए फिर जब बात नहीं बनेगी तो नहीं इस इस लॉजिक के अकॉर्डिंग तो गुरु और जो माता-पिता है सभी में विकार होते हैं तो ऐसे फिर कोई भी पूजने नहीं रहेगा। अगर हम विकारों को हम सिर्फ उसी को पूजेंगे जिसमें कोई भी देखिए इनका इनका पॉइंट
01:17:29:01 ये है ये ये कह रहे हैं कि जो जो ईश्वर के अवतार हैं उनमें विकार है मगर विकार जिसमें होगा उसे हम पूज क्यों नहीं सकते? ये कहां लिखा है? मतलब ये ऐसा क्यों माना जाएगा? दूसरी बात है। दूसरी बात तनुष जी का यह कहना है। तनुष जी का यह कहना है कि अगर आप ईश्वर में विकार को स्वीकार कर रहे हैं तो फिर आप जो है अगर आप ईश्वर में विकार को स्वीकार कर रहे हैं तो आप उसको पूर्ण की संज्ञा कैसे दे सकते हैं? उसको ईश्वर कैसे कह सकते हैं? वो संज्ञा बाधित हो रही है। दोनों ही पक्ष मजबूत है। ठीक है? अब आप दोनों आपस में बात करें जिससे कि हम निष्कर्ष तक पहुंचे। जी और जो निर्गुण स्वरूप है तो क्योंकि उसकी कोई क्वालिटी नहीं है। ये कह सकते हैं कि कोई क्वालिटी नहीं या फिर ये कह सकते हैं कि सारी क्वालिटी उसमें मौजूद है। इसलिए हम उसकी पूजा कर सकते हैं इसलिए वो पूर्ण है।
01:18:30:16 जी बोल। यह तो कंट्राडिक्टरी हो गया ना कि उनमें कोई भी क्वालिटी नहीं है और सारी क्वालिटी उन्हीं में है। ये तो दोनों बातें कह दी उन्होंने निर्गुण के दोनों यही दोनों बातें फिर अवतार पे भी लागू होती है कि उनमें अवतार तो बाधित हो जाता है ना तो अवतार जब आ रहा है तो वो तो बाधित हो रहा है क्योंकि उसमें कुछ ना कुछ विकार आ रहे हैं। ये आप ही ने बोला बाधित हुआ कृष्ण जी किस चीज से बाधित हुए थे महाभारत में वो अवतार के ऊपर डिपेंड करता है। नरसिम्हा जी किस चीज पे बाधित हुए थे? इंसान उन्होंने अगर कोई शरीर धारण किया है हां तो उनकी पहुंच एक लिमिट के बाहर से नहीं है उस मनुष्य शरीर में तो उन्हें मैं पूर्ण क्यों समझूं? तो निराकार जो ये अनंत ब्रह्मांड है ये इसका भी कोई लिमिट नहीं है। है ना? ये भी एक्सपेंड नहीं होता हर सेकंड। ये भी तो बढ़ रहा है ना। पहले से तो नहीं है। हां हां। अगर निराकार को आप देखो तो ये भी तो हर सेकंड बढ़ ही रहा है ना। अपना आकार बढ़ा ही रहा है। तो निराकार ये भी कैसे हो गया? जो एम्प्टी स्पेस है वो स्पेस भी तो लिमिटेड स्पेस होता है ना कोई भी चीज इनफाइनाइट स्पेस के अंदर है स्पेस के अंदर ईश्वर भी है निराकार बनाने वाले ने जैसे पहले कमरा बनाया उसके अंदर फिर निराकार ईश्वर आया फिर उसने धरती बनाई विकार युक्त है ना तो आप तो वो तो एक ही बात हो गई ना भाई जब आप एक
01:19:45:18 ही बात आप नहीं मान रहे ना एक ही बात थोड़ा पंडित जी क्लियर कर दे दोनों पक्षों को क्या कह रहे हैं दोनों पक्ष नहीं दोनों के दोनों मतलब कि शशांक जी एक्चुअली क्या है आपकी आपकी बात का तो मतलब मैं मैं बोल नहीं सकता वरना अब बहुत हो जाता है खंडन अभी लेकिन देखिए आप आप लिमिट मत करिए ईश्वर को ना शशांक जी नहीं नहीं मैं अवतार के समय पे लिमिट कर रहा हूं उनको क्योंकि देखो जब ये शुरू हुई है तो शिवश भैया ने बताया था कि जितने भी निराकार वाले हैं जो साकार वाले हैं वो निराकार और साकार को एक मानते हैं जैसे हम मानते हैं निराकार अवतार लेता है एक मिनट एक एक मिनट पंडित जी पहली बात आप चीटिंग ना करें। ठीक है? हां। और दूसरी बात यह है कि शशांक जी का यह वाला जो पॉइंट है ना कि क्या कहते हैं ये
01:20:42:26 वो ये कह रहे हैं कि भाई ईश्वर में विकार है मतलब भगवान के अवतार में विकार है मगर फिर भी हम उसकी पूजा करते हैं। तो यहां पे एक तो वो यह कह रहे हैं और सामने वालों का कहना है कि उसमें अगर विकार है भी अगर उसमें विकार है तो आप उसको पूर्ण कैसे कह रहे हैं? नहीं पर वह विकार भी तो मनुष्य की दृष्टि से भगवान के बताए हुए विकार में से है ना। जैसे विकार अभी बताया था कि जब वह जन्म लेते हैं तो अपनी मर्जी के बिना भी उनसे कुछ पाप बनते हैं। जैसे चींटी मकोड़ों की हत्या करना स्वास लेते समय जो भी माइक्रो ऑर्गेनिज्म है उनकी हत्या करना। तो ये ईश्वर के बनाए हुए नियम के विकार है ना। उनसे परे तो विकार नहीं है ना ईश्वर में कोई। ये हमारी दृष्टि से विकार है ना? ईश्वर की ही बनाई हुई विकारित सृष्टि में ईश्वर पे ही विकारी दोष लग रहे हैं। तो तो लगे हां तो लेकिन तब भी तो पूजे हैं ना ईश्वर ने ही तो नियम बनाए ईश्वर ने ही वो विकार बनाए ठीक है शशांक जी अब जो है आपकी टीम की तरफ से और लोगों को भैया अगर मैं बोलता हूं भैया मैं उत्तर देना चाहूंगा जैसा कि आप लोग ने निराकार पक्ष वालों ने कहा कि अगर हम किसी अवतार को मान लेते हैं तो उनपे बाधा आ जाएगी कि वो उसी रूप में रहेंगे लिमिटेड हो जाएंगे। तो भैया हम लोग तो पहले से बोले कि वो अनंत हैं तो अनंत में भी अगर वह
01:21:58:02 उसी रूप में अनंत है जिसका हम लोग कल्पना नहीं कर सकते तो क्या आप लोगों ने अनंत का परिभाषा पता कर लिया है कि क्या होता है अनंत जिसके रूप में आप बोल रहे हैं कि बाधा आ रही है और दूसरी बात भैया जैसा कि आप लोगों ने यह भी बोला था कि एक रूप की पूजा कैसे कर सकते हैं वो हर जगह में बहुत सारे रूप है उनका तो तो भैया अगर हम ईश्वर को एक पल के लिए हम रंग की संज्ञा देते हैं जो कलर बोलते हैं हम लोग तो कलर का मतलब तो एक ही होता है ना कि रंग। अब रंग हरा हो, नीला हो, काला हो, कैसा भी हो उससे क्या फर्क पड़ता है? उसके अनेक प्रकार होते हैं। लेकिन रंग तो रंग एक ही चीज होता है। तो ईश्वर तो एक ही शब्द है, एक ही चीज है बट उनके अनेकों प्रकार हैं। तो हम किसी भी प्रकार की पूजा कर सकते हैं अपने अनुसार। और भैया एक बात और आया था कि अनेकों रूप है और ईश्वर सभी जगह है। तो क्या हम गधे की पूजा कर सकते हैं? तो भैया कर सकते हैं। अगर नहीं करेंगे तो हमको उस पल ये मानना पड़ेगा कि उनके अंदर ईश्वर नहीं है। उनके हृदय में ईश्वर का वास नहीं है। और ईश्वर से यहां पे एक मिनट क्या सभी साकार वाले इनके इस उत्तर से सहमत है? ये आप एक तरह से निराकार का पक्ष नहीं बोल रहे थे थोड़ी देर के लिए। नहीं भैया क्योंकि ठीक है विश्वजीत
01:23:13:10 जी जो जो लेने लायक है वो ले ली जाएंगी। आपकी बात सुन ली है। अब हमारी ओर से तनुष जी बात कर रहे थे। कहां गए तनुष जी? चलिए तनु जी हैं। आप विराम लेना चाहेंगे या मेरा बस एक बात है विश्वजीत जी को उन्होंने कहा कि हम गधे का भी पूजा कर सकते हैं। तो आप कर क्यों नहीं रहे? हम रुक जाइए जी सुनिए सुनिए एक मिनट एक मिनट जी उनकी टीम वालों ने ही उनको इस बात पर माना नहीं है स्वीकार नहीं किया तो हमें उस बात को खींचने की आवश्यकता नहीं है ठीक है और दूसरी बात यह है कि अब जो है निराकार की ओर से रह गए हैं मेरे सामने दो दिख रहे हैं सुजीत जी ने भी हाथ नीचे कर लिया है सुजीत जी आप बोलेंगे हां बोलिए ठीक है। लेकिन पॉइंट क्या है? जो पॉइंट यही है कि ईश्वर में विकार है। विकार को माना जब विकार है तो पूर्ण नहीं तो उसे ईश्वर संज्ञा उस पर सिद्ध नहीं हो रही है। उसकी पूजा क्यों हो रही है? ठीक है? और अभी-अभी आपके जो
01:24:29:01 आपकी टीम के जो व्यक्ति हैं उनका कहना है कि भाई बिल्कुल हम सब चीजों को पूछ सकते हैं। किसी भी चीज को खुद वो कोई भी चीज हो हम उसको पूछ सकते हैं क्योंकि अगर हम उसे नहीं पूजेंगे तो वैसे इसको लेने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि इसको साकार मनो ने स्वीकारा नहीं है। ठीक है? तो अब आप इस बात का अब आप इस बात का वो करें कि विकार है यदि अगर आप ये स्वीकार किया आपकी टीम वालों ने कि उसमें विकार है तो फिर उसकी पूजा क्यों की जाए? उसको पूर्ण की संज्ञा क्यों दी जाए? विकार है तो ऐसा क्यों माना जाए? ठीक है? और इस पर एक एक आपकी ओर से एक जवाब दिया गया था कि भाई विकार तो निराकार वाले ईश्वर में भी है क्योंकि वो दोष युक्त सृष्टि बना रहा है। ठीक है? तो विकार वहां पर भी है। तो फिर उसकी पूजा क्यों हो सकती है? तो इस तरह से अस्तित्व का ही सवाल है। मतलब इस तरह से तो इस तरह से तो दुनिया जो है नास्तिक हो जाएगी। ये उनका पक्ष था। तो अब जो है सुजीत जी और
01:25:36:24 साकार की ओर से कौन रह गया है विश्वजीत जी हर्ष जी आप नहीं बोले हैं आप बोलिए हर्ष जी और सुजीत जी अब बात करेंगे आपस में जो प्रकृति हम अगर कह सकते हैं कि जो ब्रह्म जो निर्गुण निराकार ईश्वर है उससे भी प्रकृति में जब बाढ़ आती है या सूखा पड़ता है तो उससे उस उससे उसको भी दोष लगता है। लेकिन अह जब हम कहते हैं अगर दोष लगता है, तो वह बाधित हो जाएगा। लेकिन जो निर्गुण निराकार है वह किसी भी लिमिट से नहीं है। जो हम कहते हैं कि प्रकृति में ऐसा क्यों हुआ फिर वो उसका दोष उसे लेगा उसको नहीं लगेगा। क्योंकि वो जो है इधर के दुख सुख से जो है वो प्रभावित नहीं रहता। लेकिन जो सगुण साकार ईश्वर है वो प्रभावित हो सकता है। अगर समझो कि भगवा भक्त कोई आ चाहिए या फिर कुछ अधर्म हुआ तो तो इससे जो सगुण साकार ईश्वर है उसको उसको भावना जगेगी और फिर वो सीमित हो जाएगा क्योंकि हम उसको भावना बांध रखते हैं। अगर हम फिर कहे कि वो अपने लोक में है तो वहां भी उसको दुख पहुंच रहा है। और हम क्या चाहते हैं? हम जीव की जो असली चाय है वो सच्चिद आनंद है। हम अनंत आनंद चाहते हैं। अगर हम बांध देंगे कि प्रकृति में ऐसा होगा वैसा हुआ तो उसको दोष उसे लगेगा। उसको दोष नहीं लगेगा। उसने सब प्रकृति बनाई है। जो भी यहां होता
01:26:52:00 है वो सिर्फ हमारे कर्म की वजह से होता है। और प्रकृति भी हमारा कर्म का ही प्रभाव से ऐसा आपत्ति उत्पन्न करती है। जब हम प्रजा का एक बहुत सा भाग अधर्म करने लगता है। तब प्रकृति देखती है और तब वो ऐसे आपदाएं लाती है। इसका दोष ब्रह्म को नहीं जाएगा। या फिर निर्गुण निराकार ईश्वर है। वो नहीं जाएगा। वो अलग ही है। वो सच्चिदानंद स्वरूप में ही हमेशा रहता है। उसका दोष प्रकृति का जो आता है आप उसका दोष उस पे नहीं जाएगा। उसका जो हम जो कर रहे हैं हमारा जो कर्म है वो उसको दएगा क्योंकि प्रकृति सिर्फ कर्म का ठीक है सुजीत जी आपकी बात हो गई हर्ष जी कोई काउंटर करेगा इनको हर्ष जी आप बोल
01:27:35:13 केवल हर्ष जी और सुजीत जी के बीच में अभी बात हो रही है। दोनों में से जो नॉकउ होगा उसकी टीम का दूसरा मेंबर आ जाएगा तो बाकी सब लोग हैंडरे मतलब डाउन कर ले थोड़े कन्फजिंग कन्फ्यूजन होती है उससे जी मैं यह कहूंगा कि ईश्वर के जो साकार रूप है उसमें विकार कैसे हो सकता है? वो जब ईश्वर ही है निराकार ईश्वर ही जब साकार रूप में आ रहा है उसके कंट्रोल में सब कुछ है। वही सभी प्राणियों के सभी कर्म फलों को वो जानता है। कर्म फल देना भी जानता है। किस प्रकार से कैसे क्या करना है सब वो जानता है। तो वो किस प्रकार से विकार युक्त हो रहा है। पहला बात वो विकार युक्त है ही नहीं। वो सभी को उसी के कर्म फल के अनुसार बहुत आवश्यक बात कही है अभी तक जो साकार की ओर से जो मुझे एक पॉइंट मैं मिसिंग बता रहा था शशांक चौधरी जी इस बात को जो बोल रहे थे कि विकार युक्त है तो उसकी पूजा क्यों नहीं हो सकती मतलब वो स्वीकार कर रहे थे कि विकार है। है ना? तो विकार को स्वीकार नहीं करना है। उसके संबंध में जो तर्क और प्रमाण दिए जा रहे हैं वह सही है कि नहीं है वह बात एक अलग है। मगर हमें यह आपको सगुण साकार को यह स्वीकार नहीं करना है कि विकार है। ठीक है? तो यह अभी हर्ष जी ने क्लियर किया और
01:28:50:19 आगे से ध्यान रखेंगे कि टीम वाले जब उनकी टीम से कोई वक्तव्य दिया जा रहा हो तो जो कैप्टन होगा वो डिसाइड करेगा कि मतलब कि उनकी ओर से जो वक्तव्य दिया जा रहा है उनकी टीम की ओर से वो वक्तव्य मान्य है कि नहीं उसको स्वीकार मतलब उस पर आगे आर्ग्यू करें कि ना करें है ना तो इसकी वजह से अभी तक यह बहुत लंबे टाइम से मैं देख रहा हूं इस पर किसी ने बोला नहीं था कि विकार है ही नहीं आप विकार को स्वीकार कर रहे थे जो कि विकार की पूजा क्यों नहीं हो सकती विकार युक्त की तो विकार है ही नहीं यह बात बोलनी अब इसके समर्थन में तर्क है कि नहीं प्रमाण है कि नहीं वह बात अब बाद की है मगर यह सबसे पहले आवश्यक था कि हम विकार को स्वीकार क्योंकि विकार को स्वीकार कर लिया तो हम जिसकी पूजा कर रहे हैं वो पूर्ण नहीं है बस अगर पूर्ण नहीं है तो फिर वो ईश्वर नहीं है हम तो विकार को स्वीकार नहीं करना था खैर अ हर जी ने ये तो बोल दिया कि विकार नहीं है अब हर जी आगे आप अपनी बात को सिद्ध करें कि विकार क्यों ना माना जाए।
01:29:52:24 विकार इसलिए नहीं माना जाएगा क्योंकि ईश्वर जो है वह अपने जब अवतार धारण करने के विषय में बताते हैं कि वो क्यों आते हैं। धर्म रक्षा के लिए आते हैं। साधु जन का कल्याण करने आते हैं और एक मर्यादा स्थापना कुछ भी जो उनका अपना उद्देश्य होता है धर्म संस्थापना का वो पूरा करते हैं। तो वो पहला तो निर्लिप्त है। कर्मों से निर्लिप्त है। वो वो बस एक होता है ना कि अपने आप को दिखाते हैं कि मैं ऐसा कर रहा हूं लेकिन वास्तव में वो अकर्ता है क्योंकि वो कर्मों में लिप्त नहीं है और वो ऐसा क्यों दिखाते हैं ऐसा क्योंकि वो सबसे पहले बताए हैं कि जो मुझे जिस भाव से जानता है जिस भाव से मुझे जानता है मैं उसी रूप में उसे प्राप्त होता हूं। अगर अगर वो लिप्त हो जाते कर्मों में तो फिर वो कर्मों के बंधन में बंध जाते और कर्मों में के बंधन में बंध जाते तो वो दोष पूर्ण हो जाता। ईश्वर पहले ही कृष्ण भगवान ने गीता में स्पष्ट कहा है कि मुझे कर्म बांध नहीं सकते क्योंकि मैं कर्मों में लिप्त नहीं हूं इसलिए उनमें कोई विकार नहीं और दूसरा जब वो साकार ईश्वर के रूप में आते हैं रामकृष्ण इत्यादि के रूप में तो वो सब कुछ पहले जानते हैं वो निराकार स्वरूप उनका मतलब खत्म नहीं हो जाता वो सर्वव्यापी पहले भी है अभी भी
01:31:07:25 है उनकी सत्ता हर जगह है लेकिन वो बस हमें एक दृष्टिगोचर होते हैं सामने में कि वो हमारे सामने खड़े हैं हम उनको देख सकते हैं हम उनको मतलब उनसे व्यवहार कर सकते हैं तो उसमें कोई भी दोष आ ही नहीं सकता क्योंकि वो सबको जानते हैं। सब कुछ को वही नियंत्रण करते हैं। वही अपने कर्म फल देना समझ गए समझ गए। तो अब सुजीत जी आप अपनी बात जी अब हर्ष जी ने कहा कि जो अवतार व्रत लेते हैं वो सिर्फ भक्तों की भावना से लेते हैं कि भक्त जैसा भाव से बचता है हम उसी भाव से मैं उसका सामने आ जाता हूं। फिर ऐसा अगर हम कहेंगे कि कि नहीं वो तो अवतार लेता है हमारे भाव से। अब किसी को अब आज विश्वजीत से जैसे जी ने कहा कि हम तो गधे में भी पूछ लेंगे। अब किसी का भाव गधे में हो गया तो फिर कैसे चलेगा? ऐसा अवतार अगर हम बेसिकली अगर हम उसको किसी भी रूप में ढाल देंगे तो वो सीमित ही हो जाएगा। और अगर हम कहेंगे नहीं हम है मेरा भावना ऐसे है अब क्या सत्य कि कहते हैं ना कबीर कि अब हजार लोग हैं हजार की भावना अलग-अलग फिर अलग-अलग भगवान हो जाएंगे क्या फिर अब इतना अलग हो गए फिर कौन कौन कौन किसको पूजेगा कौन किसको पूजेगा फिर ये तो सब
01:32:23:01 सुजीत जी मैं एक बात कहूं कि उनके यहां पर दो पॉइंट चल रहे हैं साकार वालों के तो अब साकार वालों के दो पॉइंट क्या है कि एक कि विकार तो निराकार ईश्वर में भी आ रहा है क्योंकि वो ऐसी सृष्टि बना रहा है जो कीड़ों को मार रही है। ठीक है? और दूसरा आपने क्या कहा है कि वो अभी आप क्या कह रहे हैं? अभी जो आपने कहा है कि आपकी भावना अगर भावना अगर हजार लोग की भावना अलग-अलग होगी तो अलग-अलग तो ये आप एक नया पॉइंट ला रहे हैं क्योंकि अभी हर्ष जी ने जो दूसरा पॉइंट रखा है वो ये रखा है कि क्योंकि भगवान समस्त कर्मों को करते हुए भी अकर्ता है इसलिए उन्हें कोई दोष नहीं लगता है। प्रमाण के प्रमाण के दृष्टव्य से हर्ष जी ने ये बात रखी। ठीक है? ठीक है। तो आप इस इन दोनों बातों में आप आप आपको जवाब देना चाहिए था। खैर तनुष जी का हो गया है या तनुष जी अभी बोलेंगे?
01:33:27:18 एक पॉइंट था मेरा कि जो उन्होंने गीता का श्लोक बोला था कि मैं हर एक कर्म करने के बाद भी करता हूं। तो वहां पे मैं कृष्ण जी को भगवान नहीं मान रहा हूं। वहां पर मैं यह मान रहा हूं कि कृष्ण जी निर्गुण ब्रह्म की बात कर रहे हैं कि जो माया के द्वारा उनकी सृष्टि बनाई गई है उसमें वो कर्म करके भी मतलब कर्म करने के बाद भी उनको कर्ता का प्रभाव नहीं पड़ता।
01:33:59:18 ये पॉइंट ठीक है? तो ईश्वर ईश्वर जब कर अपने निर्गुण निराकार स्वरूप में कर्म कर सकता है। करता है तो वो निर्लिप्त है आपके है ना वो भी तो निर्लिप्त है ना और कृष्ण भगवान ने भी वहां पर अपने विषय में ही कहा है ना कि मुझे कर्म नहीं बांधते क्योंकि मैं कर्मों में लिप्त नहीं होता नहीं नहीं उसे मैं कृष्ण जी के विषय में नहीं मानूंगा क्योंकि अगर मैं मान लूंगा तो मैं तो फिर वो सगुण रूप मान रहा हूं उनका तो मैं यह मान रहा हूं कि वो निर्गुण ब्रह्म की बात कर रहे हैं और तब वो कहते हैं कि मैं अगर कोई कर्म करता हूं तब भी मैं करता नहीं हूं। देखिए प्रमाण की बात तो ऐसी है कि वहां फिर दूसरी बात आ जाएगी। वह हम लोगों को प्रमाणों को तो ना मानने वाला होना ही पड़ेगा क्योंकि वहां पर मुझ लिखा है। हमें यह मानना पड़ेगा। ठीक है? तो अब निराकार की ओर से सभी का हो चुका है ऑलमोस्ट। तो फिर मैं बात करता हूं। ठीक है। अर्जी से हम बोले बोले
01:35:16:09 एक मिनट चलेगा और बेटा देखिए दो बातें चल रही है कि एक तो भाई कि विकार आ जाएगा। ठीक है? और दूसरी बात हर्ष जी आपने जो अभी रखा है ना कि समस्त कर्मों को करते हुए मैं करता हूं। ठीक है? तो यहां आप उनको कर्म की दृष्टि से निर्विकार मान रहे हैं कि वह कोई भी कर्म गलत नहीं करते। इस दृष्टि से आप उनको निराकार मान रहे हैं। मगर उनके स्वरूप की दृष्टि से भी तो विकार है। जैसे कि वो क्या कहते हैं? जैसे सबसे पहले एक बहुत अच्छा टॉपिक छिड़ गया था। मगर फिर उसको कंटिन्यू नहीं किया गया। कि जैसे भगवान अवतार लेते हैं तो लेने से पहले वह कहां थे? कहां पर ले रहे हैं? भाई अवतरित होने का मतलब है कि उतरना। तो कहां से उतर रहे हैं? पहाड़ से नीचे उतर रहे हैं। तो जब वो पहाड़ पर भी थे और नीचे भी थे तो फिर वो उतर कहां रहे हैं? ये क्या है? जी बताइए।
01:36:26:00 ईश्वर अपने चलिए बोलिए हर जी। जी ईश्वर अपने निर्गुण रूप में सर्वत्र व्याप्त है। निराकार स्वरूप में सर्वत्र व्याप्त है। जब वो सृष्टि में साकार स्वरूप में अपने धाम पे भी निवास करते हैं। दृष्टिगोचर होते हैं। तो जब वो अवतार लेते हैं तो अपने उसी धाम से अपने रूप को यहां धरती पे आते हैं। हम लोग क्या कहते हैं? हम लोग कहते हैं कि वो परमात्मा यहां पे धरती पे आया क्योंकि हमारे वैसे ना गुण ना कर्म हमारे वैसे कुछ भी नहीं है। है ना? वो ईश्वर आते हैं। ईश्वर कहां से आते हैं? ईश्वर अपने धाम से ही आते हैं। या फिर अगर धाम से ना माना जाए तो वो प्रकट होते हैं। उन्होंने कहा है मैं प्रकट होता हूं युग युग में। है ना? तो बस वो वहीं थे बस वो प्रकट हो गए। इसको ये भी माना जा सकता है। वो साकार हो गए। है ना? अवतार लेना मतलब एक रूप धारण करना। तो निर्गुण निराकार से वो अवतार धारण कर लिए तो वो साकार हो गए। और अगर मतलब वो वहां पर थे मतलब कि वो वहां पर थे और वो वहां पर पहले से भी थे मगर अभी वो प्रकट हो गए। कहने का सीधा तात्पर्य है कि यहां पर यह कहना चाहिए कि पहले वो व्यवहारिक इंद्रियों का विषय नहीं थे। अब वो व्यवहार में आ सकने वाला उन्होंने रूप ले लिया
01:37:41:06 है। ये तो जी बिल्कुल ये आने जाने वाली बात होगी। अच्छा दूसरी बात अब यह आती है कि स्वरूप में एक चीज और आती है कि वह यहां है वहां नहीं है। इसको कैसे डिफाइन भैया ईश्वर अगर ईश्वर मैं मैं कहना चाहूंगा अभी बात हो रही है। है ना? मैं यह कहना चाहूंगा कि अगर देखा जाए तो शास्त्रों के अनुसार ईश्वर ही सर्वत्र है। सभी रूपों में भी वही है क्योंकि वही एक ब्रह्म ब्रह्म जो था वही सर्वत्र सभी रूपों में प्रकट हुआ। वही भगवान ने गीता में कहा है मैं ही सत हूं। मैं ही असत भी हूं। है ना? जड़ चेतन भी मैं ही हूं। वह सर्वत्र सब जगह व्याप्त है। वो हमारे रूप में अपने माया को आीन कर मतलब अपनी माया में रख के अपने आप को माया में रख के हमारे जैसे रूप में भी है। लेकिन वो जब ज्ञान रूप में आए हैं तो वो सगुण साकार रूप में भी है जो जिनको हम ईश्वर कहते हैं और चिन्मय शरीर हम लोग स्थूल शरीर धारी है वो चिन्मय शरीर धारी है। तो उनकी ये निराकारता या फिर उनकी सगुण साकार होने के कारण उनकी जो निराकारता है वो खंडित
01:38:56:14 ऐसे नहीं होती ना। वह तो सर्वत्र है। वो सब चीजों को कंट्रोल कर सकते हैं। वहां से भी है ना पर वह सब जगह है तो वो अपने रूप को अनगिनत अनंत रूपों में भी व्यक्त कर सकते हैं। जहां चाहे जब चाहे तो वो ये नहीं माना जा सकता कि उनका जो स्वरूप है वो सीमित है। वो एक देश है। क्योंकि वो जी वो एक देश नहीं हो सकते कि वो सर्वत्र हैं। वो बस रूप के द्वारा हमें हमें प्रतीत होते हैं कि वो सामने प्रकट है। हमारे सामने हैं। लेकिन सिर्फ हमारे सामने ही नहीं है। जब भगवान श्री कृष्ण यहां पर धरती पर हैं, हमारे साथ लीला कर रहे हैं तो इसका अर्थ यह नहीं कि वह गोलक धाम में नहीं थे। इसका अर्थ यह नहीं कि भगवान बैकुंठ में नहीं थे। इसका अर्थ यह नहीं कि भगवान साकेत में नहीं थे। सर्वत्र वो है लेकिन वह यहां भी है। वो बस दृष्टिगोचर हो रहे हैं। उसी तरह जहां चाहे वहां प्रकट हो सकते हैं। तो उनका जो स्वरूपता है वो निराकारता को भी मतलब खंडित नहीं करता है। निराकारता और स्वरूपता एकता ही है दोनों में। अच्छा भगवान ने अपने आप को अजन्मा कहा है कि मैं अजन्मा हूं। तो फिर उनका ये जन्म और ये प्रकट और अप्रकट ये सब क्या है? वह तो पहले से ही प्र मतलब वो है
01:40:11:18 अजन्मा मतलब जिसका जन्म नहीं होता तो फिर यह जन्म क्यों है प्रकट क्यों है या अविर्भाव क्यों हो रहा है जन्म उन्होंने स्पष्ट कहा है कि मैं मनुष्यों की तरह भगवान ने नौवें अध्याय में कहा है ना कि जो मुझे मनुष्य की तरह जन्मता मरता जानता है वो मूढ़ है मूर्ख है तो भगवान तो पहले मनुष्य की तरह ना जन्म लेता है ना मरते हैं मतलब जन्म मतलब उनका होता ही नहीं बस वो एक दृष्टि मतलब वो वो साकार स्वरूप में दृष्टिगोचर होते हैं और फिर अंतर्ध्य भी हो जाते हैं। है ना? तो इसका मतलब इसका मतलब मतलब भगवान का जन्म नहीं हो सकता माता के गर्भ से।
01:40:52:00 वो चाहे तो माता के गर्भ से जन्म ले सकते हैं। वो कहीं मतलब वो बाध्य नहीं है ना किसी कर्म के करने में। और सर वो सब कुछ तो करने वाला भी है तो नहीं है तो फिर आप अजन्मे के संबंध में ये वाला क्यों दे रहे हैं कि उनका मनुष्यों के जैसा जन्म नहीं होता। जब जन्म हो सकता है तो आप ये वाला तर्क क्यों दे रहे हैं कि मनुष्यों के जैसा जन्म हो सकता। मेरा कहने का आशा ये है कि भगवान जो है वो जब सृष्टि बनाता है तो इसका मतलब ये नहीं कि वो सृष्टि से पहले नहीं था। वो सृष्टि से पहले भी था। अनादि है, अनंत है वो है। जब वो धरती पर अवतार लेता है तो मां के गर्भ से अगर चाहे तो अवतार ले सकता है। मतलब वो साकार हो सकता है। इसका मतलब ये नहीं कि उनका जो स्वरूपता है वो अजन्मा खंडित हो जाता है। वो अजन्मा तो अपना अपने जो मूलभूत स्वरूप है अपने को कहा है ना। फिर उनको जन्मा जन्मा वाली बात क्यों कह रहे हैं आप? उन्होंने अपने आप को अजन्मा कह दिया ना। ईश्वर अजन्मा वेद में भी कहा है। श्री कृष्ण भगवान ने भी कहा है। ठीक है हर्ष जी अब आपकी ओर से कोई और आ जाए तो मैं मैं एक चीज कहना चाहूंगा भगवान श्री कृष्ण का मैं भगवान श्री कृष्ण का जो जन्म का जो बात आता है तो श्रीमद् भागवतम
01:42:07:08 में भी या फिर जहां कहीं भी उनका यह वर्णन नहीं मिलता कि वो प्रकट मतलब कि वो गर्भ से जन्म लिए हैं। श्रीमद् भागवतम में उनका यह बात बताया गया है कि देवकी मैया के गर्भ में वायु था। वायु बाहर निकला और भगवान अपने चतुर्भुज या अष्ट अष्टभुजा स्वरूप में वहां प्रकट हुए थे तो वहां पर वो जन्म एकदम बालक के जैसा जन्म नहीं दिखाया गया है और उनका गर्भ से बाहर होना चाहते तो फिर इसका मतलब कि ये कहना कि ईश्वर वो पूर्ण है वो वो गलत हो रहा है क्योंकि वो चतुर मेरा मेरा एक कथा कथन है कि उनका जो अच्छा भैया एक बताइए तो अगर उनका जन्म नहीं हुआ था। तो भाद्र भाद्रपद मास के जो कृष्ण पक्ष का अष्टमी है उसको जन्माष्टमी क्यों कहा जाता है? प्रकटष्टमी क्यों नहीं? ये भी है ये भी है। जी जी तो अभी बात ये हो रही थी कि आप देखिए आप दोनों बातें कर रहे हैं। मैं पूछ रहा हूं जन्म हो सकता है कि नहीं? तो आप कह रहे हैं जन्म हो सकता है। फिर आप यह कह रहे हैं भागवत में प्रमाण है यहां यह है वहां वो है कि वो क्या कहते हैं इस रूप में प्रकट होते हैं। तो आप तो खुद ही अपनी बात को काट रहे हो। जन्म ले सकता है माता के गर्भ से ले सकता है
01:43:22:09 कि नहीं ले सकता है? अगर नहीं ले सकता है तो फिर आप यह क्यों कह रहे हैं कि ले सकता है और अगर ले सकता है तो फिर यह क्यों कह रहे हैं कि वो प्रकट होते हैं जन्म नहीं लेते हैं तो आप अपनी बातों को कंट्राडिक्ट नहीं नहीं मैं कह रहा हूं आपने कहा वो ले सकते हैं कि नहीं आपने सकने वाली बात कही तो मैंने तो मैंने कहा वो ले सकते हैं आपने ये नहीं कहा वो लिए हैं कि नहीं लिए होने का आशय में अगर आप लिया जाए तो उन्होंने परशुराम जी को देखो क्वेश्चन क्या हो रहा है क्वेश्चन ये हो रहा है कि जब वो ले सकते हैं तो अजन्मा क्यों कहा फिर अजन्मा वाली बात खत्म हो जाती है कि वो तो जन्म हो रहा है ईश्वर का ईश्वर अपने जिस रूप में है ऐसा हुआ है मेरी बात सुनिए ऐसा हुआ है मैंने पूछा कि जब ईश्वर अजन्मा है तो उसको आप जो है ये जन्म लेने वाला क्यों कह रहे हैं ये सब क्यों कह रहे हैं फिर आपने कहा कि नहीं ईश्वर का जो जन्म है वो मनुष्य जैसा नहीं वो ईश्वर जो लीला लीला में आते हैं तो वो मनुष्य जैसा जन्म नहीं होता है वो प्रकट और अप्रकट होते हैं। है ना? तो फिर वहां जब आप यह पक्ष रखने लगेंगे कि आप जन्म को मानते ही नहीं है। जब आप यह पक्ष रखने लगेंगे तो ईश्वर पर बाधा आएगी कि ईश्वर ले सकता है कि नहीं। जब
01:44:37:10 आप यह मान रहे हैं कि ईश्वर जन्म ले सकता है तो आपको केवल इस बात का आपको यह प्रमाण नहीं देना है कि उसने कभी जन्म नहीं लिया है। हम आपको यह प्रमाण नहीं देना है कि वो केवल प्रकट होता है। एक मिनट आपको ये प्रमाण नहीं देना है कि वो केवल वो केवल प्रकट होता है। वो जन्म नहीं लेता है। ठीक है? आपको यह प्रमाण नहीं देना है। आपको जन्म लेने वाला मानते हुए भी अजन्ना वाली बात से हम लोगों को सेटिस्फाइड करना है। ठीक है? ये अभी तक का था। अब मैं ऐसा करता हूं कि आपकी टीम से किसी और को लेता हूं। काफी देर हो गई है आप काफी लोगों को कर चुके हैं। एक बात कहना चाहता हूं। ये कह दूं बस इतना एक चीज कह देता हूं मैं बस। जी भगवान अपने परमार्थिक एक मिनट एक मिनट। हम लोग ऑलरेडी 25 मिनट जो है वो डिले कर चुके हैं इसको। ले लीजिए इनकी आखरी बात ले लीजिए हर्ष तो इसको थोड़ा सा हम क्लोज भी करते हैं है ना क्योंकि डेढ़ घंटे का था ये दो घंटा होने वाला है तो हम इसको जल्दी से जल्दी क्लोज करने की कोशिश करते हैं हर्ष जी बताएं अपनी कह रहा हूं जी जी भगवान ने अपने गीता में कहा है कि मैं अजन्मा अविनाशी होते हुए भी मैं प्रकट होता हूं अपनी माया को आीन करके वो अब जो अपने आप को अजन्मा अविनाशी कह रहे हैं वो अपने परमार्थिक
01:45:52:14 स्वरूप को कह रहे हैं और अब व्यवहारिक स्वरूप में आने के कारण वो वो लोगों को दृष्टिगोचर हो रहे हैं कि वो जन्म ले रहे हैं। इसलिए लोगों के द्वारा वो जन्माष्टमी या फिर जो भी कहा जाए वो मान्य है। लेकिन उनका जो जन्म है वो जन्म लिए हैं कि नहीं उसका बात अलग है। वो ले सकते हैं कि नहीं वो बात अलग है। वो ले सकते हैं लेकिन वो लिए हैं कि नहीं इसका प्रमाण इसमें नहीं है कि वो बालक के स्वरूप में वो जन्म ले लिए और पंच भौतिक रूप में वो आ गए। वो शरीर धारी के रूप में हम लोग समझ गए। हम समझ गए। अब हर्ष जी की टीम से किसी और को ले लिया जाए। मैं तब तक अपना वह दे रहा हूं इस पर काउंटर कि जब आपने यह कह दिया कि भाई वह जन्म अह क्या कहते हैं वह लेते हैं कि नहीं लेते वो पारमार्थिक दृष्टि से व्यवहारिक उसमें आए इसलिए कह दिया जाता है कि वह जन्म लेते हैं तो उस हिसाब से मगर वो लेते हैं कि नहीं लिया है कि इस हिसाब से तो व्यवहारिक स्वरूप से उन्होंने बहुत कुछ ऐसी चीजें लागू हो जाएंगी जो फिर अगर आप उनके जन्म को नहीं मानेंगे तो व्यवहारिक दृष्टि से मानी मानी जाने वाली और भी बहुत सी चीजें हैं। तो हम लोग उसमें कह देते हैं व्यवहार की दृष्टि से है। व्यवहार की दृष्टि से है। तो वो सारी चीजें व्यर्थ हो जाएंगी। फिर वो वहां पर ऐसा कहना फॉर एग्जांपल जैसे कि भगवान ने ये वाली लीला
01:47:07:15 की हम तो ये दोष युक्त चीज आ रही है दिखाई दे रही है। हम उस लीला वो लीला है केवल हम लोग ये कह देते हैं लीला लीला का कुछ अर्थ होता है परमार्थ और प्रातिभाषिक दृष्टि से। मगर उस अर्थ को ना लेते हुए हम लीला वाले रूप को ही लेते हैं। हम् तो वहां पर यह कह देना कि यह तो लीला है और लीला कहते हुए हम उसको क्या कहते हैं स्वीकार करवा देते हैं कि भगवान ने जो है परमार्थिक दृष्टि से कुछ और मैसेज दिया है। मगर ये लीला है इसको ऐसा ना माने। अगर ऐसा है अगर आप यह कहेंगे कि मतलब भगवान का जन्म जो है होता नहीं है। बस वो जो है कह दिया जाता है। यही तो कहा है ना आपने? एक बार क्लियर कर दीजिए। मैं कहता हूं कि भगवान जन्म चाहे तो ले सकते हैं। लेकिन वो लिए हैं कि नहीं उसके ऊपर है ना। प्रमाण बताते हैं कि भगवान श्री कृष्ण ने जन्म नहीं लिया। भगवान ने प्रकट हुए हैं। चाहे ये ये आपसे पूछा ही नहीं गया था ना कि भगवान ने जन्म लिया है कि नहीं लिया है। जब भगवान जन्म ले सकते हैं। जब भगवान जन्म ले सकते हैं। आपने स्वीकार कर लिया तो हम आप हमें इसका उत्तर दीजिए। फिर उनको अजन्मा क्यों कहा जा रहा है? क्योंकि वह
01:48:22:16 अपने परमार्थ स्वरूप में पहले से विद्यमान है। वो संसार में व्यवहार होने के व्यवहार करने के लिए वो माता का बस वो चयन करते हैं कि हम इस माता के द्वारा हम प्रकट हो रहे हैं। मतलब उनके जन्म जन्म नहीं मान रहे हैं। शिवा जी उनका व्यवहार में आने के लिए तो माना जाएगा। लेकिन उनका जो परमार्थिक स्वरूप है उसमें तो ये कहिए ना कि व्यवहारिक स्वरूप से यही मैं कह रहा था। आप ये बोल ही नहीं रहे हैं। आप ये नहीं बोल रहे हैं कि जो प्रपंच रूपी संसार के दृष्टिकोण से उनका जो प्रकट और अप्रकट होना है उसी को जन्म और अजन्म कहा जाएगा। जिस प्रकार से प्रपंच रूपी संसार में जब जीवात्मा आ रही है या जा रही है तो उसको भी जन्म लेना कहा जा रहा है उसका। जबकि वो जन्म थोड़ी ना ले रही है। केवल कोई शरीर धारण कर रही है। वास्तविकता क्या है? वास्तविकता यह है कि वह केवल एक शरीर धारण कर रही है। मगर हम कहते हैं कि फलाने का जन्म हुआ। अगर अगर हम जीवात्माओं का संसार रूपी प्रपंच रूपी संसार में जन्म मानते हैं, जन्म कहते हैं तो उस दृष्टिकोण से भगवान का भी जन्म होना हम कह सकते हैं। अगर हम उसके मौलिक स्वरूप की ही बात करते हैं सबका कि
01:49:37:18 कोई जन्मता मरता नहीं है। अगर हम जब वो वाली बात करेंगे तो हम ये कहेंगे कि नहीं भगवान भी प्रकट और अप्रकट होते हैं। जन्म नहीं लेते। तो आप बहुत देर से यही यह बात ना करके और इस बात का जवाब दे रहे हैं कि वह जो है उन्होंने कभी जन्म लिया नहीं है। वो जन्म ले सकते हैं मगर जन्म कभी लिया नहीं। जबकि पूछा ये जा रहा है जब वो जन्म ले सकते हैं तो उनको अजन्मा क्यों कहा जा रहा है? तो सीधी सी बात है कि परमेश्वर जो है वो ईश्वर जो है वो सदैव विद्यमान है। उनका कभी कोई जन्म नहीं हुआ। वो नित्य है, वो सनातन है। इसलिए वो अजन्मा है। मगर लीला में जब वो प्रकट और अप्रकट होते हैं तो उसी को लीला संसार रूपी दृष्टिकोण से मनुष्य दृष्टि से उसको जो है जन्म और मृत्यु कहा जाता है। ठीक है? ये मौलिक स्वरूप था। जीने वही बता। नहीं आप जो है ये जो स्पष्टता के साथ ये वाली बात नहीं रखी आपने। बताया ना अंत में बताया आपने हां मैंने फिर बताया तो ठीक है यह जन्म वाला वो तो हो गया मगर जब आप ये कहते हैं कि ईश्वर चाहे तो कुछ भी कर सकता है अब हर जी नहीं हर जी की ओर से और कोई बोले करण
01:50:53:01 करण दास जी आप सकते भाई आप थोड़ा प्रश्न रख दीजिए जैसे मैं मैं प्रश्न रख रहा हूं कि एक देश वाली बात को हमने सेट कर लिया है और जन्म वाली बात को भी हमने सेट कर लिया है। मगर अब बात यह आता है बात यह आती है कि हम बार-बार यह कहते हैं कि ईश्वर सब कुछ कर सकता है इसलिए वह जन्म भी ले सकता है। ठीक है? और दूसरी बात यह है पहले ऐसी बात को क्लियर कर लेते हैं। पहले विकार वाली बात को ले लेते हैं। कि क्योंकि मैं निर्गुण निराकार को पूज रहा हूं। है ना? जी। और निर्गुण निराकार को या सगुण निराकार को पूज रहा हूं। तो क्योंकि निराकार वाले उसमें भी विकार है। है ना? कि वह दोष युक्त सृष्टि बना रहा है, यह कर रहा है, वह कर रहा है। तो इससे सगुण साकार के विकार को एक्सेप्ट किया जाना सिद्ध नहीं होता है। आपने सगुण साकार में विकार नहीं है। इसके पक्ष में कुछ नहीं कहा है। तो आप इसके पक्ष में बताएं कि वह जो कर्म है और यह सारी चीजें
01:52:08:07 कि भाई जब वह चल रहे हैं तो कोई बैक्टीरिया मर गया, कोई कीटाणु मर गया और फिर आपने बहुत सी चीजें ऐसी हुई जो विकार युक्त हो गए वो कर्म है ना। जी। तो अब क्या है कि ये क्रॉस क्वेश्चन किया गया कि भाई निर्गुण निराकार भी तो ऐसी चीज बना रहा है जो विकार युक्त है तो वो भी एक विकार हो गया बनाना। भैया यही प्रश्न है कि व्यवहारिक जगत में विका शून्यता की हम कैसे मांग कर पा रहे हैं? मतलब विकार विकार शून्यता की मांग हम क्यों कर रहे हैं व्यवहारिक जगत में वो अवतार लेंगे हमारे बीच में रहेंगे तो वो जो शद्र छोटी मोटी जो समस्याएं आप बता रहे हो उसके कारण जो धर्म की स्थापना है वह अपना मूल्य उद्देश्य है कि जैसे मान लीजिए समस्या अगर आप यह कहेंगे कि छोटी मोटी समस्या तो छोटी मोटी पूर्ण की परिभाषा को काट देगी नहीं तो फिर ऐसे तर्क देंगे भैया कि जैसे महाभारत का युद्ध हुआ। ज्यादा से ज्यादा ये हो सकता है कि जब आप निराकार का खंडन करेंगे कि वो ऐसे दोष युक्त सृष्टि बना रहा है तो इस इस तरीके से आप जब निराकार का खंडन करेंगे तो यह हो सकता है कि आप संसार को नास्तिकता दे क्योंकि सगुण साकार को आप सिद्ध नहीं कर रहे हैं। आप निराकार को काट कर जो है सगुण साकार
01:53:23:08 को पुष्ट कर रहे हैं। तो और दूसरी बात और सगुण साकार में आप छोटी मोटी चीजें मान ही रहे हैं। तो आप उसको खंडन करिए कि भाई जो यह क्या कहते हैं कि भाई उनसे जो बैक्टीरिया वगैरह मर रहे हैं। अब यहां पे देखिए वो वाली बात दोबारा आ गई जो शुरुआत में एक बात थी कि भगवान में विकार थोड़ा बहुत मान लिया होता है। तो विकार भगवान में जैसे ही मान लिया आपने थोड़ा बहुत भी तो पूर्णता वाली बात नष्ट हो गई। ठीक है? तो अब खैर इनकी ओर से अगर और कोई बोले जो नहीं अब तक बोला है
01:54:08:02 जी शिवशी मैं बोल सकता हूं आशीष चतुर्वेदी बोलिए बोलिए बोलिए आशीष जी किसने बोला था अभी मैं बोल सकता हूं आशीष जी ने बोला था आवाज नहीं आ रही उनकी ठीक है तब तक हां तब तक और किसी को ले लेते हैं। विश्वजीत जी बोलेंगे विश्वजीत जी आप तो आपका तो हो गया है भैया मैं बोलना भी चाहता हूं निराकार रूप भगवान को ले चलेंगे तो हम लोग को ज्ञान और कर्म का वो उपदेश कैसे मिलेगा या फिर वरदान कैसे मिलेगा आवाज से केवल आवाज भैया केवल आवाज से हां आवाज गूंजेगी आकाशवाणी होगी ऐसा कभी ये पॉइंट मैं बहुत पहले देना चाहता था जब ये बाद की बात आई थी ना भगवान हमें सिखाएंगे कैसे जी भैया तो निराकार होते हुए सिखा सकते हैं आवाज गूंजेगी सिखा सकते हैं बट सिखाए हैं ऐसा कहीं प्रमाण अब ये ये अब अलग सिखाए हैं कि नहीं वो सिखा सकते हैं नहीं शिवश भैया उसका
01:55:23:18 निराकार ईश्वर को साकार आवाज गूंज जानी एक मिनट नहीं शिवश भैया स्पेस में तो आवाज जाएगी नहीं ये जो सृष्टि बनाई है आकार वाली सृष्टि है इसके अंदर आकाशवाणी होगी ना वायु के द्वारा उसी पंच तत्व में ऐसे है जो जो ध्वनि पैदा कर सकती है इसलिए हम आकार कहते फिर भी निराकार कैसे इस सृष्टि के अंदर आ गई ना निराकार कोई अगर एक कमरे के अंदर कोई भी वायु आ रही है तो उस आकार वाले उसके अंदर आ गई ना वो निराकार निराकार से केवल इतना है जो निराकार से केवल इतना मान लीजिए कि वो सगुण निराकार है गुण है पर निराकार है तो सृष्टि के अंदर सृष्टि के अंदर ऐसी बहुत सी चीजें हैं जो सगुण निराकार है तो क्या वो सब तो इस हिसाब से आप जो कह रहे हैं निराकार पक्ष नहीं ले रहे मैं वापस आ गया हूं तो क्या मैं नहीं हम लोग निराकार का पक्ष ले रहे हैं वो चाहे सगुण हो चाहे निर्गुण होकार जैसे और क्या निराकार कोई भी आकार हो सकता है आकाशवाणी में भी जो होते हैं वो वाइब्रेट करते हैं हिलते हैं निराकार उत्पन्न होती है एक मिनट चौधरी जी एक मिनट जी कि हम निराकार और सगुण साकार का पक्ष नहीं ले रहे हैं। हम हमें हमारा है पक्ष ये कि हम सगुण साकार को स्वीकार नहीं करेंगे।
01:56:38:19 ये पक्ष है हमारा। जी। ठीक है। तो अब ये वाली बात तो रह ही नहीं जाती कि हम निर्गुण निराकार के उससे अपना पक्ष रखें या सगुण निराकार के। ये निर्गुण निराकार के उससे रखें या सगुण निराकार के। हां। दूसरी बात आपने कही कि सृष्टि में वो कोई वाइब्रेशन होती है, ध्वनि होती है। तो बात ऐसी है कि आपके अनुसार फिर दुनिया में कोई भी चीज निराकार है ही नहीं। प्रपंच रूपी संसार में भैया इसके अनुसार तो हर व्यक्ति के जीवन में एक ना एक बार भविष्यवाणी करना ईश्वर को जरूरी हो जाएगा साक्षी नहीं जरूरी की बात नहीं है अभी बात ये है कि निराकार रूप से वो शिक्षा दे सकते हैं कि नहीं दे सकते हैं तो फिर आने की फिर आवश्यकता खत्म हो जाएगी ना आप आप आवश्यकता से सिद्ध कर रहे हैं भगवान का स्वरूप किस रूप में करेंगे उनको एक मिनट विश्वजीत जी आप जो है भगवान का स्वरूप आवश्यकता के कारण सिद्ध कर रहे हैं कि आवश्यकता है शिक्षा देने की, फॉलो करने की। इसलिए भगवान का अवतार होना आवश्यक है। तो मैं उस आवश्यकता को ध्वस्त कर रहा हूं। भगवान जो है आकाशवाणी कर देंगे और जो है आपको वो हो जाएगा। नहीं नहीं तो नहीं तो आप वैदिक मंत्रों का दृष्टा बन जाएंगे। हम निराकार हो गए। भाई कई कई चीजें ऐसी हुई है ना
01:57:53:22 कि वह जो है कंस जा रहा था अपनी बहन को लेकर के माता देवकी को लेकर के और आकाशवाणी हुई थी कि नहीं हुई थी कि तू जिसको ले जा रहा है उसी का सातवां पुत्र तेरे तेरा नाश करेगा आठवां आठवा हां आठवां तो शिवश भैया जैसे ये बात है तो इसमें ऐसा आ रहा होगा राक्षस एक एक करके बोल एक एक करके एक मिनट एक एक मिनट एक मिनट ईश्वर सुनिए एक एक मिनट एक चीज क्लियर कर दूं एक चीज मैं क्लियर कर दूं एक चीज एक चीज मैं क्लियर कर दूं कि ये जो बात है इन्होंने लास्ट में एक बात कही थी कि इसका कोई प्रमाण है तो मैंने प्रमाण दे दिया जीश भैया देखो
01:58:47:15 के रूप में थोड़ा हॉचपच हो जाएगा अब विश्वजीत जी को हटाइए और जिसका नहीं हुआ हो साकार से उसको ले लीजिए या फिर फर्स्ट से शुरू करिए और ये लास्ट राउंड होगा अगर लास्ट राउंड में सही से स्टैंड नहीं कर पाया साकार तो आज साकार वाले उसको प्राप्त करेंगे पंडित जी उनकी तरफ से अगर लोहा लेना चाहे वो बात अलग है शिवश भैया मैं बस वो आकाशवाणी वाली बात पूरी करना चाहता हूं अपनी शशांक जी समझने का प्रयास करिए क्योंकि क्योंकि एक एक उसमें चल रहा है ना कि भाई अभी आपका सबसे पहले आप ही थे ना? नहीं मैं तो मैंने तो बीच में ज्वाइन किया था। नहीं नहीं अभी अभी क्या कहते हैं? अभी जब ये वाला राउंड शुरू हुआ है ना नॉकउ राउंड उसमें आप ही थे ना। जी जी हां तो अभी रुक जाइए। आप कोई और हो अगर साकार की ओर से जो जी जिसका जिसका अभी तक वो नहीं आया है। नंबर नहीं आया है। नॉकउ किसका नहीं आया? आशीष हां आशीष जी बोलिए जी आपका प्रश्न क्या था सर मैं खुद ही भूल गया सर विकार वाला प्रश्न जो आपका है हां एक तो विकार वाला है कि भाई आप अगर ये कहेंगे कि निराकार में भी विकार है तो
02:00:02:16 आप ज्यादा से ज्यादा क्या करेंगे कि सृष्टि को नास्तिक बनाएंगे ठीक है तो आपको अपने विकार और फिर आप यह कह देंगे कि भाई विकार को पूजा नहीं जा सकता ये कहां का नियम है और मतलब आप विकार को स्वीकार कर रहे हैं और उसके पक्ष में आप उसके समर्थन में ये कह रहे हैं कि निराकार ईश्वर में भी विकार है और क्या कहते हैं ये निराकार ईश्वर में भी विकार है और एक चीज और कह रहे हैं कि ईश्वर में अगर छोटे-मोटे विकार हैं तो हां निराकार ईश्वर में भी विकार हैं तो विकार युक्त चीज को पूजा नहीं जा सकता। ये कहां का विधान है? तो यह आप कह रहे हैं तो इस तरीके से आप अपने ईश्वर को ईश्वर सिद्ध नहीं कर रहे क्योंकि आप कह रहे हैं कि वह पूर्ण नहीं है और उसके पक्ष में कह रहे हैं कि तुम भी तो अपूर्ण को पूजते हो। ठीक है? तो अपूर्ण को पूजा नहीं जा सकता है। ऐसा कहीं नहीं है। तो अपूर्ण के अपूर्ण के उसमें आपने जब यही मान लिया कि वो अपूर्ण है तो वो ईश्वर ही नहीं है। हम तो जब वो ईश्वर नहीं है तो आपने नास्तिकता दी संसार को। पहली बात और विश्वजीत से विश्वजीत जी से क्या बात हो रही थी? पंडित जी आपको याद है क्या? अभी अभी जो हो रही थी बात? जी भैया आकाशवाणी के बारे में।
02:01:18:16 हां विश्वजीत जी का एक पॉइंट था और ये सगुण साकार वालों का सगुण साकार वालों ने जो पक्ष रखा कि आवश्यकता कि जब वो आएगा ही नहीं तो उसकी आवश्यकता क्या होगी? मतलब उसकी आवश्यकता है आने जाने की। है ना? तो इसलिए उसका आना आना जाना आवश्यक है। इसलिए वो आता जाता है। ठीक है? तो इसका मैंने ब्रेक किया कि भाई वो अपने निराकार स्वरूप से आपको ज्ञान वगैरह दे सकता है। बहुत कुछ कर सकता है निराकार स्वरूप से। तो वो जो है इन्होंने कहा कि प्रमाण क्या है? तो मैंने एक प्रमाण भी दिया कि उसने एक भविष्यवा ऐसी बहुत सारी कथाएं मिलंगी जिसमें कि उस प्रमाण में भी तो उनको अवतार लेना ही पड़ा ना साकार रूप में तो फिर आवश्यकता तो ध्वस्त हो गई ना उन्होंने आपको ज्ञान देने के लिए अवतार नहीं लिया उन्होंने आकाशवाणी कर दी आवश्यकता
02:02:16:00 मैं अवतार लूंगा मेरी बात समझिए आपने कहा कि ज्ञान देने के लिए अवतार आवश्यक है तो ज्ञान देने के लिए आवश्यकता को खंडित किया मैंने। ठीक है? सगुण निराकार के द्वारा वो जो है खंडित हो गई आपकी बात। ठीक है? और दूसरी बात कि भगवान यदि चाहे तो केवल अपने मन में अपनी जो वो है शक्ति से आपके मन में वो बोध करा देंगे। जो जो वो सोच आपसे सुचवाना चाहते हैं वो सुचवा सकते हैं। विचार जो आपके मन में उत्पन्न कराना चाहे तो कर सकते हैं। तो यह कहना कि वो उनका जो है हमें सिखाने के लिए आवश्यक है अवतार लेना इसलिए वो अवतार लेते हैं तो यह ध्वस्त हो जाता है यहां से। अब आशीष जी आप अपनी बात बोले। मैंने आवश्यकता का खंडन किया है और मैंने विकार वाली बात में आपको एक्सप्लेन कर दिया। जी जी जहां तक विकार की बात है तो अगर आप सूर्य का प्रतिबिंब जल में देखते हैं और उसको पत्थर से मारते हैं तो उसका असर सूर्य पे नहीं होता है। प्रतिबिंब पे होता है और कुछ टाइम बाद फिर से वो स्थिर हो जाता है। तो यहां होने वाले किसी भी विकार
02:03:31:03 अथवा किसी भी कर्म का फल ईश्वर को नहीं भोगना पड़ता है। वो इससे परे है। नहीं भोगना नहीं पड़ता। वो तो उसकी वो तो उसकी अपनी बात है ना कि उसको भोगना है कि नहीं भोगना है। हम तो यह देख रहे हैं ना कि उसके द्वारा कीड़े मारे जा रहे हैं। जी तो फिर अगर चंद्र का पूरा ना दिखना आपकी दृष्टि में भेद हो सकता है। चंद्र तो पूरा ही है। आपकी दृष्टि का भेद हो सकता है। चंद्र का पूरा गोल ना दिखना। लेकिन चंद्र तो गोल ही है। पूरा ही है।
02:04:06:19 तो वो दृष्टि भेद मुझे समझाइए ना कि कीड़ा मर रहा है तो क्या करूं मैं उसका? क्या है उसकी वास्तविकता? उसमें फिर उसका प्रारब्ध होगा। आशीष जी परमार्थ व्यवहार का थोड़ा कांसेप्ट समझाइए इनको। को नहीं पता है ये। पंडित जी अभी आपसे बात होने वाली है लग रहा है। वो आरआरआर का सीन आने वाला है। बहुत देर से जय श्री राम जय श्री राम राम उन्मेश जी उन्मे किस पक्ष को रखने रखेंगे अभी आप जब रखेंगे तो साकार को साकार को रखूंगा मैं यदि वो दुर्बल हो जाएगा तो अच्छा अच्छा अच्छा अच्छा शिवश भैया मैं यहां पर एक बात रख सकता हूं आशीष जी के लिए जी उन्होंने उन्होंने जो अवतारवाद को लेकर कहा था नयन जी नयन जी बहुत सारे हमारे पास ब्रेन है और यहां पे मेरे ख्याल से इस समय कोई पक्ष नहीं रखूंगा मैं बस बस उनसे एक प्रश्न बस छोड़कर मैं बस निश्च हो जाऊंगा। मगर जाइएगा नहीं। ये नहीं कि अपनी बात बोल के आप वो इतनी अच्छी उसको चर्चा को छोड़कर ही चले जाए। नहीं आप आप चर्चा करिए। मैं बस उनसे एक प्रश्न देकर मतलब दे रहा हूं कि आशीष जी ने जो अवतार आप मुझे दे दीजिए। समय आने पर मैं रख दूंगा। अभी आशीष जी
02:05:21:20 आप इनके प्रश्न को ना लीजिएगा। आप मुझे दे दीजिए। तो उनके जो अवतारवाद का जो प्रश्न था वहां पर मैं एक चीज कहना चाहूंगा कि जो कृष्ण जी जो अगर कह रहे हैं कि यदा यदा ही धर्मस ग्लानी भवती भारत तो वो जब जबजब धर्म के लिए ग्लानी होगा तबतब वो अवतार लेंगे अगर नहीं लेंगे तो मतलब वो तो लेने के लिए बाध्य है ना तो साकार रूप जो है वह अवतार लेने के लिए बाध्य है अगर नहीं लेगा तो शास्त्र का खंडन हो जाएगा क्योंकि शास्त्रों में उल्लेख है उनका अवतार लेना पड़ेगा हम हम ठीक है। वो लाइट जला दो। बोर्ड में बटन है लाइट का। ठीक है आशीष जी अब आप इनकी बात को अभी ना लें। मैं समय आने पे इसको उरत कर दूंगा। अभी आप जो विकार वाली बात है कि भाई वो जो विकार हो रहा है हम अब आपने एक बात कही है प्रारब्ध कि उसका प्रारब्ध होगा कीड़े का इसलिए वो मर गया। ठीक है? जी। तो ऐसे तो फिर हम किसी को भी दोष नहीं दे सकते कि उसका प्रारब्ध होगा। वह मर गया। कोई भी व्यक्ति कोई भी अपराध कर रहा है उसको हम दोष ही नहीं दे सकते कि उसका प्रारब्ध होगा। तो ये प्रार कि दोष दिया जाना और नहीं दिया जाना। इसको थोड़ा
02:06:37:08 डिफाइन करिए आप। जो मतलब अपराध हमने हमसे अनजाने में होते हैं वो अगर किसी को कष्ट पहुंचता है हमसे अनजाने में तो वो उसका प्रारब्ध होता है और अगर हम किसी को जान पहुंचा जान मतलब अपनी पूरी समझ के साथ नुकसान पहुंचाते हैं तो वो उसका प्रारब्ध नहीं होता लगता है। यानी कि अनजाने में किए जाने वाले जो वो हो जाते हैं वो दोष नहीं देते हैं। जी उसका प्रारब्ध होता है। वो ये तो आप गलत बोल रहे हैं। दोष लगता है। कई बार कहा जाता है ना कि किचन में यह इतने लोग अग्नि जलाने से मर जाते हैं। कई बार ऐसा होता है ना रसोई घर में इतने जीवों की हत्या हो जाती है अनजाने में हमसे तो इसलिए ये करना चाहिए प्रतिदिन है ना इसलिए तो पंच महायज्ञ कहे गए हैं। पंच महायज्ञ हां तो आपकी ये बात गलत है कि अनजाने में किए हुए पापों का दोष लगता ही नहीं है। बहुत जगन्य हो जाएगा तो लगेगा ना। अब कोई व्यक्ति कोई व्यक्ति अपने किसी उसमें जा रहा है और उससे किसी बच्चे की निर्मम हत्या हो गई कुचल गया बच्चा कोई बालक है वो मृत्यु को प्राप्त हो गया तो उसको दोष नहीं लगना चाहिए कि तुम ऐसे बुद्धिहीन व्यक्ति हो तो गाड़ी क्यों चला रहे हो हां जी
02:07:52:12 तो अनजाने अनजाने की बात तो ये है कि तो दोष लगेगा तो आप यहां पे रख मतलब चीज नहीं रख रहे हैं। खैर अ अब जो नए लोग हैं उनके उनसे अतिरिक्त मुझे लगता है अभी इस समय साकार के पक्ष से और कोई नहीं है। ठीक है। तो अभी मैं अब पंडित जी और उन्मेश जी में से कौन हर्ष झा जी ने अपना हाथ उठाया तो हर्ष झा जी अब काफी काफी समय हो गया है थोड़ा एक निष्कर्ष तक पहुंचे है ना तो उन्मेश जी और पंडित जी में से कोई जी को बोले श्री गणेश करें वो ज्यादा ज्ञानी है हमसे बोलिए उन्मेश जी नाटो नाटो
02:08:42:00 नारायण जी जी तो निराकार पक्ष से आपका क्या पक्ष है अभी बाबू जी अभी बात दो चल दो चल दो दो चल रही है एक तो ये चल रही थी कि साकार के पक्ष ने कहा था आवश्यकता है तो मैंने उस आवश्यकता को खंडित किया था वो कह रहे थे कि भाई जब भगवान अवतार नहीं लेंगे सगुण साकार तो वो शिक्षा कैसे देंगे तो मैंने कहा केवल आकाशवाणी से दे देंगे शिक्षा हम तब भी सगुण साकार साकार की तो आवश्यकता नहीं हुई ना फिर अगर शिक्षा की बात है तो और वो अपनी शब्द जो उनकी शक्ति है उससे भी केवल बोध करा सकते हैं आपको बहुत कुछ ठीक है तो आप आवश्यकता को मैंने खंडित किया जी दूसरी बात यह है कि अभी बात ये हो रही है कि विकार ये कहा गया कि भगवान जो है वह यहां आएंगे तो उनके द्वारा भी कई ऐसे कर्म होते हैं जिसका उनको दोष लग जाएगा तो वह दोष युक्त हो जाएंगे है ना? तो इसके पक्ष में जो साकार की ओर से अभी तक जो रखा गया है वो क्या-क्या है वो मैं बता दूं आपको। एक रखा गया है कि निराकार ईश्वर भी तो ऐसी सृष्टि बनाता है जो कीड़ों को मारती है। ऐसा पहाड़ बनाता है जो किसी दिन टूट जाता है तो
02:09:57:03 मर जाते हैं। मतलब प्रकृति भी चीजों को खराब कर रही है। ठीक है? कुल मिलाकर और एक पक्ष ये रखा मतलब निरा तो तुम निराकार की पूजा क्यों करते हो? और दूसरा पक्ष इन्होंने यह रखा कि दोष युक्त दोष युक्त की पूजा नहीं हो सकती। ये कहां का प्रमाण है। ठीक है? तो इसको मैंने ऐसे खंडित किया कि भाई अगर आप यह मानते हो कि दोष युक्त की पूजा नहीं हो सकती। इसका प्रमाण नहीं है मान लो। तो सबसे पहली बात तो यह आ जाएगी कि आपने जब मान लिया कि भगवान में दोष है। वो अपूर्ण है तो वो भगवान की जो वो है डेफिनेशन वो वहां खत्म हो गई जब आपने दोष मान लिया तो उनके द्वारा कीड़े इत्यादि को ना मरना प्रैक्टिकली थोड़ा सा समझाना पड़ेगा कि वो दोष युक्त क्यों नहीं है और अगर आप ये मान लेंगे कि दोष युक्त है मगर दोष युक्त की भी पूजा हो सकती है तो फिर क्या होगा कि ये दोष युक्त की पूजा हो सकती है तो फिर यह दिक्कत आएगी वो भगवान ही नहीं रहेंगे हां आप एक जो है आप जैसे अन्य लोग हैं जिनमें ज्यादा दोष हैं। आप किसी ऐसे की पूजा कर रहे हो जिसमें कम दोष है तो
02:11:12:07 फिर तो आर्य समाज की वो धारणा सिद्ध हो जाएगी। महापुरुष महापुरुष की पूजा करो महापुरुष है भगवान नहीं है ना वो सिद्ध हो जाएगा और जो निर्गुण निराकार की तुलना तुलना की तो उससे क्या होगा ज्यादा ज्यादा यदि आप निर्गुण या सगुण में भी दोष निकाल देंगे सगुण में दोष अगर आप निकाल देंगे कि भाई सगुण निराकार ईश्वर भी तो ऐसी सृष्टि की रचना कर रहा है जो जिसमें दोष है तो आप अगर यह कर देंगे तो ज्यादा से ज्यादा यह होगा कि आप संसार को नास्तिक बना देंगे। आपका ईश्वर आपने सिद्ध नहीं किया। सामने वाले का ईश्वर आपने खंडित कर दिया तो ईश्वर है ही नहीं। है ना? ये दो पक्ष और विश्वजीत वाले बता दिया मैंने कि आवश्यकता का खंडन आवश्यकता और विकार के जो दो पॉइंट है उनका मैंने खंडन किया। अब आप पक्ष रखें। भैया मैंने भी एक पक्ष दिया था। हर्ष जी आपने क्या पक्ष लिया था?
02:12:08:24 मैंने बताया था ना कि वो तो कर्मों में लिप्त नहीं होते। जब कर्म में लिप्त नहीं होते तो उनको कर्म का दोष नहीं लग सकता। जब कर्म का दोष नहीं लग सकता तो वो ये प्रमाण से आपने लिया है। वो कर्मों में लिप्त नहीं होते। प्रश्न ये पूछा जा रहा है कि हम कैसे समझे कि वो जब कीड़ा मर रहा है तो क्या हो रहा है? उसको क्या समझे? यह प्रमाण से आपने दिया है। उसको मतलब प्रमाण और युक्ति नहीं है उसमें। उसको समझना भी है ना थोड़ा सा कि भाई भगवान वो जो कीड़ा मर रहा है हमने वहां से देख लिया क्या मैं कर्मों में लिप्त अच्छा कोई व्यक्ति अगर और कोई व्यक्ति ये कह देगा कि मैं कर्मों में लिप्त नहीं होता तो क्या उसकी बात को ये मान लिया जाए है ना और समझिए गीता में ही कहा गया है कि तू तो यह समझ कहा जा रहा है कि गुण ही गुण में बरत रहे हैं तू कुछ नहीं करता तो लो दुनिया में किसी भी व्यक्ति को फिर पाप ही नहीं कहा जा सकता क्योंकि भगवान ने कहा तू ऐसा समझ कि मैंने कुछ किया ही नहीं है। कर्तापन के लिए कहा है ना भगवान ने कि गुण ही गुण में बरत रहे हैं। ऐसा समझना चाहिए तो ये दिक्कत आएगा तो तो ही दोष आता है। जब कर्तापन आता है तभी दोष आता है।
02:13:23:25 तो तो फिर फिर हम किसी को पापी कह ही नहीं सकते। फिर तो पाप तो स्वेच्छा से लोग करते हैं ना तो वो जब स्वेच्छा आ जाता है पाप से तो तो कर्ता में बंध गया वो वो खुद स्वयं अपने को कर्ता समझता है अज्ञान के कारण ना वो अपने को कर्ता समझता है तो उसमें विकार और दोष उत्पन्न हो जाता है नहीं वो कर्ता समझता है यदि प्रत्येक व्यक्ति को हम गीता के आधार पर यह मानने लगे कि कोई कोई कार्य नहीं कर रहा है बल्कि गुण ही गुण में बरत रहे हैं वस्तु जो जीव है वो नित्य शुद्ध बुद्ध मुक्त है नैन चिंदती शस्त्राण है ना तो क्या कहते हैं जब हम इसको ही मान तो किसी को भी पाप नहीं लगेगा तो इसलिए अभी बात क्या है कि मैं इस पर फोकस कर रहा हूं कि हम जब वो कीड़ा मर रहा है तो उसको हम कैसे समझे कि वो कीड़े का दोष नहीं जा रहा है भगवान पर ये प्रमाण से आप हमने जान लिया कि भगवान जो है परे हैं उनको दोष नहीं लगता है ठीक है वो परे हैं मगर अगर इसको प्रैक्टिकली हम कैसे समझे कि ये जो कीड़ा मरा इसका दोष भगवान को नहीं लग रहा है। युक्ति क्या है इसमें? वो युक्ति मिस हो रही है। ठीक है। सब यही बताएं। उन्मेश
02:14:39:01 जी बोले जी नारायण। तो पहले तो मैं मुझे जो अब तक समझ में आया वो मैं एक मिनट में कह दूं या सही में समझा हूं या नहीं। तो निराकार पक्ष से यह बात रखी गई कि साकार वालों के लिए कि विकार इत्यादि उसमें होता है भगवान में तो वो पूर्णम नहीं है तो उसे भगवान ईश्वर नहीं कह सकते तो उसके ऊपर साकार पक्ष ने ये कहा कि अंतिमतः निराकार जो रूप है उसका वो तो सृष्टि तो बनाने वाला है तो उस दृष्टि से उसमें भी विकार आ जाएगा। तो जैसा अभी शिवशु भैया ने कहा कि जो अदरवाइज भी हमारी बात होती है ना कि मैं गलत होने से आपका सही सिद्ध नहीं होगा तो निराकार में भी विकार है इसके इस कारण से साकार में विकार होना समर्थित नहीं होगा सिद्ध नहीं होगा और स्वीकार कर भी लिया साकार में विकार होना तो फिर वही बात आ जाएगी कि ईश्वर का खंडन ही हो जाएगा ईश्वरत्व ही नहीं बचेगा वहां तो अभी इस स्वीकार के मामले में साकार पक्ष से युक्ति प्रस्तुत करनी है ठीक यही बात है। बिल्कुल जी और आवश्यकता कही गई है तो उसका खंडन किया गया है कि भगवान अगर अवतार नहीं लेगा तो ऐसा हो जाएगा वैसा हो जाएगा।
02:15:54:09 और दीक्षा निराकार रूप में होते हुए वो दे सकता है। ठीक है तो आवश्यकता नहीं है उसकी आने जाने की। जी जी पक्ष रखा था साकार पक्ष रखा। तो अब आप इन दोनों बिंदुओं पे रखें बात। हां जी। तो पहली बात तो इसमें एक बात और जोड़ लें। हर्ष जी ने एक बात और कही है कि भाई वो कर्मों को करते हुए भी अकर्ता है क्योंकि गीता में लिखा है। ठीक है? मगर फिर यहां वो दूसरी बातें आ जाएंगी कि प्रमाण को कौन मानता है? कौन नहीं मानता है? तो एक तो ये वाली बात भी आएगी। तो इसलिए हमें अब युक्ति को ले भी चलना होगा। है ना? तो युक्ति आप बताएं। जी। तो अभी पहले तो बात ये आ जाती है कि अ मैं थोड़ा सा विचार कर रहा हूं कि डायरेक्ट काउंटर करूं या मूल में ही घुस जाऊं। तो मैं पूछता हूं यदि शिवांशु जी आपको वो मैंने पाथ नहीं छोड़ा है ऐसा लगे तो आगे जाएंगे नहीं तो मैं सीधी युक्ति दे दूंगा मैं मूल में ही घुसना चाह रहा था निराकार पक्ष के लिए अभी आपके लिए कि आप निराकार और निर्गुण मानते हो केवल मानते हो केवल वो निराकार है केवल निर्गुण है सगुण साकार है ही नहीं तो पहली तो चीज यह है कि निराकार और निर्गुण की व्याख्या आप क्या करते हो यह मेरा प्रश्न होगा यदि ठीक है तो आगे जाएंगे नहीं तो डायरेक्ट युक्ति दे देंगे निराकार और निर्गुण का मतलब क्या मानते
02:17:09:10 हो आप? यह मेरा पक्ष है। निराकार का मतलब मानते हैं जो जो दृष्टि का विषय ना हो। हम ठीक है? निराकार का और निर्गुण का मतलब जो व्यवहार में ना आ सके। अच्छा तो आप अभी स्वयं को निर्गुण निराकार मान रहे हो या सगुण साकार मान रहे हो। आप कैसे हो अभी? अभी मैं अपने आप को सगुण साकार मान रहा हूं। मान रहा हूं। तो यदि आप सगुण साकार है स्वयं को मान रहे हैं और वह सत्य भी है तो निर्गुण निराकार का जो रूप वहां बैठा है वह बैठा है ऐसा भी नहीं कह सकते जो निर्गुण निराकार रूप है परमेश्वर का वो है ये आपको कैसे पता चला युक्ति पर वो है निर्गुण निराकार स्वरूप ये तो मुझे शब्द प्रमाण से ही पता चला प्रमाण से और प्रातिभाषिक सत्य से प्रातिभाषिक के अनुभव से हां वो अभी हम प्रमाण को अभी नहीं लेंगे शायद कदाचित यदि आपने ये बोला है तो तो वो युक्ति क्या है वो प्रातिभाषिक सत्य क्या है जिससे वो युक्ति है युक्ति ये है कि मेरे मन में सच्चिदानंद की चाह विद्यमान है हम है ना जी
02:18:24:14 और सच्चिदानंद से जो है ये सिद्ध होता है चाह विद्यमान है तो सच्चिदानंद का विषय है और सच्चिदानंद का विषय है तो सच्चिदानंद है युक्ति यह है कि इसका मतलब इस दुनिया में कोई नित्य शुद्ध मुक्त बुद्ध है। हम मगर आप मुझसे मेरी युक्ति पूछ के अगर जाएंगे अपने पक्ष पे तो पहले मुझसे ही साकार सिद्ध करवा लेंगे आप क्योंकि मैं तो साकार का पक्षकार हूं। अच्छा हां वही वही करना चाह रहा था। इस चर्चा के लिए वो नहीं होगा। जी सही है। सही है। तो आप अब जो अब आर्य अगर आर्य समाज की ओर से मैं दूंगा। हां। अगर आज समाज जैसे किसी विचारधारा की ओर से मैं दूं तो मेरे पास जो है कि ईश्वर है इसको मानने के लिए केवल इतना है कि इस दुनिया में क्रिएशन है तो इसका कोई ना कोई क्रिएटर है हम है ना जी फिर मैं तो उस बात को फिर वो करता हूं ना खंडन की अगर हम मान रहे हैं कि पृथ्वी को कोई गोल घुमाने वाली कोई शक्ति है तो हम उस शक्ति को ईश्वर क्यों माने हो सकता है उस शक्ति उस शक्ति को भी किसी और शक्ति ने धक्का दिया हो। हम हो सकता है उस शक्ति को भी किसी और शक्ति ने धक्का दिया हो। तो पृथ्वी को घुमाने वाली शक्ति के रूप में
02:19:39:15 ईश्वर को स्वीकार कैसे कर पाएंगे। जी तो तो ईश्वर को स्वीकार ही नहीं कर सकते। उसके पीछे के पीछे के पीछे के पीछे पता नहीं कितने और डायमेंशंस हो और इसे शास्त्र में अनवस्था का दोष कहा जाता है। वो इनफाइनाइट हो जाता है पीछे पीछे पीछे पीछे। हां तो ये बात आ जाएगी। तो इसलिए आप जो है निराकार का खंडन ना करें। आप सगुण साकार का पक्ष सिद्ध करो। ठीक। हां सही। फिर वही बात वो वाली बात भी आ जाएगी जो अभी अभी चल रही थी। कि अगर मैं मैं अपनी चीजों को वो कर लूंगा मान लो मैं सिद्ध नहीं कर पा रहा हूं निराकार को जो कि नहीं कर सकते। क्योंकि मैं सच्चिदानंद होते हुए जब जाऊंगा जब मैं सिद्ध करने ईश्वर को तो वहां ईश्वर सब कुछ कर सकता है। तो ईश्वर सब कुछ कर सकता है तो वो आ गया। आ गया।
02:20:26:04 सही है। तो इसलिए अगर मैं ऐसे सिद्ध करूंगा तो यहां पे ये दिक्कत आ जाएगी और अगर आर समाजी तरीके से अगर ईश्वर के अस्तित्व को सिद्ध करूंगा तो वहां वो अनंत वाला दोष लग जाएगा। इसलिए आप जो है ईश्वर रहित संसार ना बनाएं। संसार ईश्वर रहित हो जाएगा। जी इसलिए आप सगुण साकार को सिद्ध करें। हम ठीक तो आपसे फिर एक छोटा सा प्रश्न कदाचित मेरा यह प्रश्न भी उसी दिशा में जाएगा कदाचित पूछ लेता हूं मैं नहीं तो हम फिर से पलट लेंगे रास्ता आप निर्गुण निराकार तो मानते हो ईश्वर को केवल तो क्या आप सगुण भी मानते हो साकार की तो आगे सगुण सगुण मानते हैं सगुण निराकार होता है वो अच्छा सगुण निराकार होता है तो कैसे थोड़ा सा समझाएं सगुण निराकार का मतलब सगुण निराकार प्रकार जब भी कोई कार्य होगा ठीक है तो कार्य होने वाले के रूप में सगुणी कहा जाएगा ना उसे गुण है कार्य करने का गुण है है ना अच्छा तो मतलब केवल आकार से परहेज है आकार से परहेज आकार से मूर्ति पूजा से परहेज है
02:21:38:24 अच्छा ठीक है मूर्ति पूजा से ठीक है तो हम अभी डायरेक्ट अभी वो जो विकार वाली बात थी ना उसके ऊपर युक्ति दे देते हैं। ठीक है? तो ये फिर से वहां जाएगा। तो विकार की जब तक बात है कि फिर से एक बार मैं कह देता हूं कि निराकार पक्ष से कहा गया कि साकार यदि मानोगे तो उसमें विकार इत्यादि आ जाएगा। तो फिर से तो निराकार में भी विकार है। सृष्टि इत्यादि बनाता है तो कीड़े मरते हैं। तो निराकार को विकार इत सिद्ध करने से साकार सिद्ध नहीं होगा। अच्छा तो बात इसमें ये आ जाती है कि जो कीड़ा मर रहा है तो उसका दोष भगवान पे जाएगा या नहीं जाएगा तो बात ऐसी है कीड़े का मरना या किसी चीज किसी किसी भी चीज का जन्म लेना मरना ये जो धरातल है ये जो लेवल है वो व्यावहारिक लेवल है मूलत तो व्यवहार में वो कीड़ा जन्म ले रहा है और व्यवहार व्यवहार में ही मर रहा है बात ऐसी है कि ईश्वर की दृष्टि से मतलब अ पारमार्थिक दृष्टि से देखेंगे इस पूरे जगत को मतलब एक छोटी सी बात यहां ये आ जाएगी कि पारमार्थिक दृष्टि से देखने पर ये है ही नहीं जगत मिलेगा ही नहीं वो एक अलग बात लेकिन अभी के लिए पारमारिक
02:22:54:14 दृष्टि से देखेंगे तो पाप हम कीड़े को मारने वाला ईश्वर को बता रहे हैं। इसमें आपत्ति आ रही है कि अरे ईश्वर तो कीड़े को मारने वाला हो गया। इसमें आपत्ति क्या है? सामान्य शब्दों में कि ईश्वर कीड़े को मारने वाला हो गया है। इसका मतलब वो पाप का भागी बन गया और कीड़े को ना मारना पुण्य का काम है। अन्यथा उसे बचाना। तो पाप और पुण्य दोनों ही मूलत अस्तित्व में है ही नहीं। ईश्वर की दृष्टि से परमात्मा की दृष्टि से। उसने एक वीडियो गेम बनाया है। वो ये है आईटी वाला वीडियो गेम उसने बनाया। उसमें उसमें मतलब शस्त्र भी दिए हैं और शस्त्रों से बचने के लिए साधन भी दिए हैं। पाप भी करना, पुण्य भी करना योग में कोई व्यक्ति पाप कर रहा है, कोई व्यक्ति पुण्य कर रहे हैं। वो बाहर बैठा है। वो उनका मतलब पाप और पुण्य का दोनों का वो निर्माता है। उसके लिए दोनों चीजें है ही नहीं। तो इसलिए वो उसकी बनाई हुई जो सृष्टि है जिसको हम अभी मिथ्या कहेंगे आगे। तो उस सृष्टि में जो घट रहा है नहीं भी घट रहा है तो उन दोनों के लिए वो उत्तरदाई नहीं कि उसने केवल सृष्टि बनाई उसके अंतर्गत जो कुछ चल रहा है उसने केवल सृष्टि नहीं बनाई सृष्टि बनाने के बाद सृष्टि
02:24:09:18 में 100 तो लोग हैं उसने बताया ये ये करोगे तो मेरे पास आ जाओगे सृष्टि से बाहर निकलोगे ये करोगे तो मुझसे दूर जाओगे और उसमें जिसे कहते हैं संकल्प स्वतंत्र मतलब यह अच्छा यह गलत चुनाव आपका जैसा चुनाव करोगे वैसा फल पाओगे। तो यदि कोई व्यक्ति उसमें से मतलब सुनामी आ गई या यह हो गया वो हो गया जिस व्यक्ति ने अपने पांव से कुचल दिया कीड़े को तो उस व्यक्ति का कर्म है उसी को जाकर के मिलेगा। मैंने तो उसे बनाया हुआ है केवल सृष्टि को बनाया मैंने वो मशीन बना दी मैंने तो अतः मेरे ऊपर दोष नहीं आएगा और यह बात चल रही है मशीन को स्वीकार करने के बाद उस सृष्टि को स्वीकार करने के बाद वास्तविकता में कोई मर भी नहीं रहा है कोई जन्म भी नहीं ले रहा है जो हो ही नहीं रहा है उसका दोष आप यदि मैं भगवान हूं तो जो हो ही नहीं रहा है उसका दोष आप मेरे माथे पर फोड़ रहे हो ये इसमें मेरा क्वेश्चन यह रहेगा आपने जो चीज समझाई है मैं उसको पहले क्लियर कर दूं। हो ही नहीं रहा है। प्रैक्टिकली मैं बताऊं कि जैसे कि एक चार 24 में श्लोक आया है। मैं इस समय समर्थन में बात कर रहा हूं साकार के। चार 24 में श्लोक आया कि जिस अर्पण में कर्ता
02:25:24:21 भी ब्रह्म है। सामग्री भी ब्रह्म है। क्रिया भी ब्रह्म है। सब कुछ ब्रह्म है। है ना? उससे फल स्वरूप जो फल है वो भी ब्रह्म ही प्राप्त होता है। हां वो ब्रह्मा समझ में आता है। जो कीड़ा है वह भी ब्रह्म था। यह भी तो माना जाए वो भाई जगत बनाता जो कीड़ा है उसमें वो भी ब्रह्म ही है। और अगर ब्रह्म नहीं मानेंगे तो फिर वो उसका जो वो सच्चिदानंद वाला स्वरूप है उसमें दोष आ जाएगा। तो जब कीड़ा भी ब्रह्म है। जब क्रिया भी ब्रह्म है उसको मारे जाने वाली है ना? और जब वो भी ब्रह्म है जो मार जिसके पैर से वो कुचला जा रहा है। ठीक है? जब ये तीनों चारों चीजें एनवायरमेंट भी ब्रह्म है वहां का। नीचे मान लीजिए कीड़ा जब दबता है तो ऊपर से तो किसी कर्ता ने दबाया मगर नीचे तो पृथ्वी ठोस है ना जिसके कारण जिस दो चीजों के बीच में वो पिसा हम तो पृथ्वी भी ब्रह्म है। तो जब सब कुछ ब्रह्म है तो वहां क्रिया का कोई स्पेसिफिकली किसी क्रिया का घटित होना सिद्ध ही नहीं हो रहा है। हम तो फिर ऐसा दोष फिर इसका पाप कैसे जा सकता है? तो इसी को भगवान ने कहा कि वास्तविकता में मैं परे हूं हम और यहां पर वो अपने इस पारमार्थिक दृष्टि से बता रहे हैं कि समस्त कर्मों को
02:26:39:22 करते हुए भी मैं अकर्ता हूं। हम जी मैं बंधन में नहीं हूं। तो अब बात ये आती है काउंटर क्वेश्चन मेरा यह है कि ब्रह्म दृष्टि से तो संसार का प्रत्येक व्यक्ति कुछ भी नहीं कर रहा है। हम तो उसको दोष क्यों लग रहा है? उसको पापी क्यों कहा जा रहा है? उसको विकार युक्त क्यों कहा जा रहा है? अच्छा इसके लिए मैं मतलब कहने का मतलब है फिर किसी को ईश्वर और फिर किसी को पापी क्यों मनुष्य क्यों कहा जा रहा है? फिर तो सब ईश्वर होगा क्योंकि ब्रह्म दृष्टि से तो मनुष्य ने भी कुछ नहीं किया है। है ना? जी यही है ना तो ब्रह्म दृष्टि से तो कुछ हो ही नहीं रहा है। हो ही नहीं रहा है। हां सही बताइए। इसमें फिर भी वही आ जाएगा ना। इसमें ऐसा हां हां जी बोलिए। पंडित जी बोलिए। और क्या बोलते हैं? माया का विचार होगा। नहीं आप बात पूरी कर लीजिए अनुमय जी आप सही सही दिशा में है आप अब थोड़ा एक एक उस पर पहुंच रही है चर्चा अब निष्कर्ष की ओर आती जी तो बात आपके काउंटर क्वेश्चन पर ऐसी है कि जब सब ब्रह्म ही है ये मान लिया हमने तो तब ब्रह्म है ये क्यों मान लिया क्योंकि वो पीड़ा मर मरने का दोष भगवान के ऊपर नहीं जाएगा इसलिए मान लिया सब ब्रह्म ही है तो जब ब्रह्मा ही है
02:27:55:15 तो ये मनुष्य दृष्ट से दोष लगना, पाप लगना, धर्मशास्त्र का पूरा करो, पुण्य करो। ये क्यों है? ये जो ब्रह्म मैंने माना है ये मैंने मतलब साकार वालों को एक चीज थोड़ा सा खुल के बताई है। ये मेरा पक्ष नहीं है। मैंने आपकी बात को थोड़ा एक्सप्लोर किया है बस। जी वो पता चल गया। ये चतुर न्याय कहते हैं इसे। हम चलो आप साकार वाले मानते हो ना उसको तो आपकी दृष्टि से ऐसा ऐसा ऐसा आपने बता दिया। जी जी बिल्कुल। तब आप जब आपका यह प्रश्न है कि तो फिर ब्रह्मा ही है तो पाप पुण्य इत्यादि की व्याख्या क्यों और कैसी इसमें एक छोटा सा दृष्टांत देना चाहूंगा एक अश्व है और वो मतलब पाला हुआ है पालतू अश्व है जंगल जंगल का नहीं है और उसको मतलब रोज थोड़ी देर के लिए खुला छोड़ा जाता है और बाद में 24 में से 20 घंटे उसके गले में यह रस्सी बांधी जाती है। वो कहीं आ जा नहीं सकता। चार घंटों के लिए उसे खुला छोड़ा जाता है। अब ऐसा थोड़ा सा दृश्य लाइए विजुअलाइजेशन करिए तभी और मतलब आप निरा करते हैं तो कि मान के चलो एक आदमी है उसके हाथ में कुछ नहीं है। रस्सी नहीं कुछ नहीं है। केवल उसने उस घोड़े को ऐसा गला फेरा उसका मतलब रस्सी डालने की एक्शन की उसने घोड़े के गले में और वो ऐसा रस्सी पकड़ने की
02:29:10:19 एक्शन करके चलने लगा। वो घोड़ा उसके पीछे पीछे जाता है। मैं केवल अभी समय जाएगा इसलिए मेरे पास वो वीडियो क्लिप भी है। ऐसा प्रयोग करके भी देखा गया है कि घोड़ा उसके पीछे पीछे जाता है। खुद को बांधा हुआ समझ के समझ कर जाता है उसके पीछे। ऐसा आप YouTube पर डालोगे तो मिल जाएगा। तो ये बात है। अभी मैं एक प्रश्न पूछूंगा उत्तर स्वयं ही दे दूंगा। ये प्रसंग सबको समझ में आ गया कि घोड़ा वास्तविकता में बंधा हुआ नहीं है। जी ठीक। तो अब प्रश्न यहां आ जाएगा तीसरा उत्तर मैं दे दूंगा वो जो अश्व है वह बद्ध है या मुक्त है इसके दो उत्तर हो जाएंगे वास्तविकता हमारी दृष्टि से अश्व की दृष्टि से हमारी दृष्टि जो है वो रियलिटी है हमारी दृष्टि हां दिख रहा है उसके गले में कुछ है नहीं वो मुक्त ही है नित्य मुक्त और ये जो इस इस प्रश्न का जो दूसरा उत्तर है अश्वबद्ध है या मुक्त है अश्व की दृष्टि से उत्तर हम ही देंगे बड़ा आगे उसे देख रहे हैं हम उत्तर हम ही देंगे लेकिन अश्व की दृष्टि से देंगे। अश्व जब तक स्वयं को बद्ध मानेगा तब तक वो बद्ध है। बद्ध ही है। क्या बात है? जब तक स्वयं को बद्ध मानेगा। ये बात और जब किसी दूसरे आश्रम ने उसको
02:30:25:20 बता दिया जैसे पंचतंत्र में होता है ना दो पशु बात करते। अरे देखो देखो तुम्हारे गल में है नहीं कुछ। ऐसा देखा उसने। अरे तो वो क्षण उसका मुक्ति का क्षण माना जाएगा। वास्तविकता में वो मुक्त ही था है और रहेगा। लेकिन वो अपने आप को मुक्त समझना अनुभव करना यह होता है मुक्ति का क्षय तो इस दृष्टि से हो जाएगा स्वरूप स्वरूप को जानना तो इस दृष्टि से जीव के लिए कहा जाता है वो नित्य भी है बद्ध भी है दोनों पूरी की पूरी विरोधाभासात्मक चीजें है एक ही जीव के लिए कैसे कही जाती है वो अश्व है जीव वहां तो मूलत वो मुक्त है स्वयं को जब तक वो बद्ध मान रहा है तब तक वो बद्ध ही रहेगा वो जाएगा नहीं बहुत बढ़िया बहुत बढ़िया जवाब। तो इसलिए पाप पुण्य का इंतजाम किस दृष्टि से होता है? बिल्कुल बिल्कुल। तो कहने का मतलब इसको मैं थोड़ा आम भाषा में एक्सप्लोर कर दूं और जी जी कि भगवान ने कहा हे अर्जुन तेरे और मेरे बहुत से जन्म हो चुके हैं। तू जान तू नहीं जानता पर मैं जानता हूं। तो यहां खेल केवल किस बात का है? कि भगवान वो है जो विद्यावान है और मनुष्य वह है, प्राणी वह है जो अविद्या से युक्त है।
02:31:41:13 तो मार मर भगवान से भी कीड़ा रहा है। ब्रह्म और मर मनुष्य से भी कीड़ा रहा है। ब्रह्म दृष्टि से जो है भगवान ये जानते हैं। ब्रह्म दृष्टि से देखने पर क्या है कि कोई कुछ नहीं हो रहा है। कोई कीड़ा नहीं मारा गया। और व्यवहारिक दृष्टि से क्या हुआ कि हां कीड़ा मारा गया। तो ब्रह्म दृष्टि से ना मनुष्य के द्वारा कीड़ा मारा गया है ना ही ईश्वर उनके स्वरूप के द्वारा सगुण साकार स्वरूप के द्वारा ठीक है मगर व्यवहारिक दृष्टि से मनुष्य के द्वारा भी और ईश्वर के द्वारा भी कीड़ा मारा गया मगर फिर जब ब्रह्म दृष्टि से किसी के द्वारा भी कीड़ा नहीं मारा गया है तो किसी को ईश्वर और किसी को मनुष्य क्यों कहा जा रहा है इसलिए कहा जा रहा है कि ईश्वर वो है जो मैं जो ये जानता है कि यह कीड़ा भी मैं ही हूं। ईश्वर वो है जो ये जानता है कि ये क्रिया भी मैं ही हूं। ईश्वर वो है जो ये जानता है कि कुछ नहीं मर रहा है। है ना? जो ये जो इस सत्य को जानता है जो अविद्या से मुक्त है उसको ईश्वर कहा गया। जिसे अपने स्वरूप का बोध है वो ईश्वर है।
02:32:57:01 है ना? और जिसे स्वरूप का बोध नहीं है वह वहां पर पापी कहा जाएगा क्योंकि उसको उसको अपने मनुष्य रूपी होने का वह प्राप्त है और उसकी दृष्टि में ऐसा नहीं है कि कुछ हो ही नहीं रहा है। उसकी दृष्टि में ऐसा है कि कुछ हुआ है ना जो शब्द शब्द प्रमाण है प्रातिभाषिक जो है उसकी दृष्टि से उसको बार-बार बताया तो जा रहा है कि कुछ नहीं हो रहा है। गुणी गुण में बरत रहे हैं। जैसे भगवान श्री कृष्ण ने कहा कि गुण तुझे ऐसा समझना चाहिए कि गुणी गुण में बरत रहे हैं। तो ऐसा समझने योग्य खुद को बनाना है उसके उसके पहले कि गुण ही गुण में बरत रहे हैं। इस स्टेज तक पहुंचने से पहले हमको अपने आप को ऐसा योग्य बनाना है कि हम ऐसा सोच पाएं। मन से फील कर पाएं। है ना? बार-बार हम प्रमाण को जैसे हम कहते हैं ना जैसे हमें एक उदाहरण दिया जाता है कि भाई तुम्हें अगर भगवान की ओर तो एक छोटी भगवान की दिशा में आगे बढ़ना है। तो एक छोटी सी बात जरूर किया करें कि दिन भर में जो भी कुछ अच्छा कार्य करें तो बोले भगवत कृपा से भगवत कृपा से। तो ये क्या है कि वास्तविकता तो यही है सब भगवत कृपा से हो रहा है मगर हमें फील तो नहीं हो रहा है मगर फिर भी हमको जो है ये बोलना होता है अपने मन को ये बताना होता है ऑल इज वेल वाली बात भगवत कृपा से भगवत कृपा से जिससे
02:34:12:09 हमारे जो चित्त का जो दोष है वो खत्म होते हुए एक दिन वो भगवत कृपा से वाली जो सत्यता है वो वास्तविकता हो जाए अभी भगवत कृपा से हमें फील नहीं हो रहा है फील वो भगवत कृपा जो है वो हमें केवल शब्द प्रमाण से प्राप्त है और प्रातिभाषिक अनुमान प्रमाण से प्राप्त है। मगर अभी हमें प्रत्यक्ष प्रमाण से फील नहीं हो रहा है। भगवत भगवत कृपा से ही हो रहा है। है ना? मगर फिर भी हम अपने मन को ये बता रहे हैं भगवत कृपा से भगवत कृपा से तो यही बात भगवान ने कही कि तू अपने मन को ये बता कि सब गुण गुण ही गुण में बरत रहे हैं। बार-बार बता जिससे उसको हैबिट हो। ठीक है? तो क्योंकि जो मनुष्य है जो प्राणी है वह स्वयं को नहीं समझ रहा है कि भाई मैं जो है मैं मुक्त हूं वो नहीं जानता वो प्रत्यक्ष रूप से फील नहीं कर पा रहा है कीड़ा मैंने नहीं मारा यहां कीड़ा मरा ही नहीं है ना कुछ हुआ ही नहीं वो ये फील नहीं कर पा रहा है इसलिए वो पद्ध है इसलिए वो मनुष्य है वो प्राणी है और ईश्वर कौन है जो सब कुछ जानता है वो जानता है कि यहां कुछ नहीं मर रहा है यह कीड़ा भी मैं ही हूं सब मैं ही हूं। एवरीथिंग इज मी। तो वो है। तो ये चीज समझ में आई? मैं बस इसमें एक चीज और जोड़ दूंगा। बस यही अंतर है ईश्वर और मनुष्य में। और अगर शब्द
02:35:27:13 को लेकर चल तो ब्रह्म और ईश्वर में भी क्योंकि ईश्वर को इस बात का ज्ञान है कि वो ब्रह्म है। हमें इस बात का भी ज्ञान नहीं है कि हम ब्रह्म है। तो ईश्वर अगर यहां इस धरती पर आकर अगर बन बन रोए जाके और बोले मेरी सीता कहीं देखी क्या? या युद्ध में खड़ा हो के उपदेश दे या माखन चुराए फिर भी उसको इस बात का ज्ञान है कि वो ब्रह्म है। अंतर बस यही है कि हमें इस बात का ज्ञान नहीं है। हम ब्रह्म नहीं है इसलिए वो ईश्वर है और हम मनुष्य हैं। जी मनुष्य हैं। जी छोटी सी बात केवल जोड़ना चाहूंगा जैसे हिमांशु भाई और पंडित जी ने कहा उससे ही आगे की बात कि जैसा सुशुप्ति में होता है ना सुशुप्ति का मतलब होता है स्वपक्ष विरहित निद्रा तो उसमें शरीर इंद्रिय, मन और बुद्धि चारों सो जाते हैं या तो विलीन हो जाते हैं। हम हम में लीन हो जाते हैं। अपने स्वरूप में आठ घंटे की सुशुप्ति हो गई तो हम हम में होते हैं। और मोक्ष अवस्था भी कुछ ऐसी ही है। तो यहां पर भी एक शंका आ जाती है कि तो दोनों में भेद क्या है? तो यही भेद है जो आप दोनों ने कहा कि सुशुप्ति में जब हम होते हैं सुशुप्त में होते हुए हमें पता नहीं चलता मैं अभी सो रहा हूं। बाद में पता चलता है नींद अच्छी हुई। लेकिन सुशुप्त अवस्था में नहीं पता चलता। मैं अभी सो रहा हूं। तो ये भेद है मोक्षावस्था में और सुशुप्त का। जी हम बहुत
02:36:42:16 बढ़िया। तो अब यहां पर एक प्रश्न वैसे प्रश्न तो अभी दो और हैं मगर एक प्रश्न यह आ जाएगा कि जब सब कुछ ईश्वर ही है। है ना? तो उस पे फिर माया का पर्दा क्यों पड़ा? जब वो सब कुछ जानता है, जब वो सब कुछ जानता है, तो फिर वो अपने आप को बद्ध क्यों समझ रहा है? जैसे आपने घोड़े वाला उदाहरण दिया। अच्छा मतलब सिर्फ निराकर से पूछ रहे हो।
02:37:18:14 अब तो मैं क्वेश्चन करूंगा ना। हां इन्वेस्ट पता है आपको क्या है कि जब मैंने कई बार आर्य समाजियों से बातें की है। इन क्वेश्चन से आने ही नहीं देते वो चर्चा को। ऐसी ऊटपटांग बातें करेंगे आचार स्तर के लोग भी कि वो जो अच्छी जो चर्चा हो सकती है ना एक दिशा पूर्ण वो आ ही नहीं पाती है। गड़बड़ गड़बड़ के या तो कर देंगे। अगर लाइव होगा तो बड़बड़ पे आ जाएंगे। अरे तुमने कर क्या लिया? हमने क्रांतिकारी बनाए हैं। ये है वो है। वो जो जो वास्तविकता में किसी निष्कर्ष की ओर हम लोग बढ़ रहे हैं आगे वो ना हो के वो बूमबाम बूम होके लाइव में तो ऐसा होगा और जब प्रत्यक्ष चर्चा हो रही होगी तो उसमें वो अटक जाएंगे। रील कैसेट नहीं नहीं गायत्री मंत्र सही है। भले ही वो क्या कहते हैं? गायत्री मंत्र का अर्थ यह है कि ईश्वर से हम कुछ मांग रहे हैं मगर फिर भी वो नहीं गलत तो नहीं है गलत तो नहीं है गलत तो नहीं है तो अटक ही जाते हैं तो वो जब वो वाला तर्क ही नहीं देंगे जिस पर मैं आगे बढ़ सकूं आगे का काउंटर क्वेश्चन कर सकूं तो फिर मैं वहां पर कैसे वो करूं उनको तो ये शुद्ध चर्चा आ ही नहीं पाती। अब जब आपने ये कहा कि जीव भी ब्रह्म है और वो भी ब्रह्म है। जब इस पर आप आए तो फिर काउंटर क्वेश्चन मुझे मैंने आपको मजबूर किया ना वो कहने पर जी
02:38:33:22 मैंने आपको मजबूर किया ना कि समस्त कर्मों को करते हुए भी भगवान जो है अकर्ता कैसे प्रैक्टिकली समझाइए मुझे है ना तो आपने जो है उसमें ब्री समीक्षा वो व्याख्या करते हुए ये कहा मगर वो लोग मुझे मौका ही नहीं देते कि मैं ये बात बोलूं तो मुझे काउंटर करें तो मैंने आपको वहां तक पहुंचाया कि आप ये बात बोले तो अब जिससे वो आगे की बात आए इससे आगे की जब आप ये कह रहे हैं कि ईश्वर और मनुष्य में केवल इतना अंतर है कि मनुष्य वो है जो यह समझ रहा है कि क्या कहते हैं वो बद्ध है और ईश्वर वो है जो ये जानता है वो बद्ध नहीं है मतलब वो मुक्त है तो इसमें फिर ये बात आती है कि जब एक ही तत्व है कुल मिलाकर केवल बद्ध समझना और ना समझने वाली बात है तो जो विद्यावान है वो अविद्या से ग्रसित कैसे हो रहा है जहां प्रकाश है वहां अंधेरा कैसे हम है ना और और दूसरी बात ये आती है एक चीज और थी कि जैसे कई बार इस वाले भी इस तर्क को देते हैं कि भाई भगवान वो ये कैसा ब्रह्म है जैसे माया ने ढक लिया ठीक है तो इसके उत्तर में तो मैं इसके उत्तर में तो मैं यह पूछता हूं
02:39:48:24 कि अभी हमको भगवान जैसे उनके अनुसार जो भगवान है वो बैठे हैं तो वो हमें दिख क्यों नहीं रहे उनके अनुसार भगवान यहां भी है ना जी भगवान हमारे बगल में खड़ा है तो वो हमें दिख क्यों नहीं रहे क्यों तो उनको कहना पड़ेगा कि भैया उन्होंने अपनी माया से अपने आप को छुपाया हुआ है तो ये कैसा भगवान है जो माया से छिप जाता है ये नहीं आएगा जो सनातन सत्य है वो तो किसी से बाधित नहीं हो सकता ना है ना तो खैर यह वाला तो काउंटर ऐसे हो जाता है मगर अभी मैं पूछ रहा हूं कि जो विद्यावान है वह अविद्या से युक्त कैसे हुआ जो स्वयं सत स्वरूप है उसमें यह विकार कैसे आ रहा है कि वो अपने आप को बद्ध समझ रहा है तो यह विरोधाभासी चीज है कैसे जहां प्रकाश है जहां प्रकाश है बिल्कुल विश्वजीत जी जहां प्रकाश है वहां पे अंधेरा नहीं हो सकता जहां अंधेरा है वहां प्रकाश का अस्तित्व नहीं है इसीलिए अंधेरा तो अब आप इसको बताएं कि जो है ये जब विद्यावान है ब्रह्म तो वो तो उसी समय जिस समय वो विद्यावान है उसी समय वो अविद्या से ग्रसित हो रहा है। इसको थोड़ा समझाइए कैसे समझ में नहीं आ रहा। बस उससे पहले बस मैं एक लाइन कह देता हूं।
02:41:04:00 जी पंडित जी इसका खंडन आप भी कर देंगे तो नहीं मैं नहीं आप यही बोलिए क्योंकि आप अच्छे वक्ता हैं। मैं बस एक ये लाइन बोलूंगा कि मांडूक्य उपनिषद शंकर भाष्य 336 में एक बहुत ही सुंदर लाइन कही है उन्होंने भाष्यकार भगवान ने अविद्या लक्षणा अनादि माया ठीक है? और उसका अर्थ यह होता है कि माया जो है वह अविद्या रूप है और वह अनादि है ब्रह्म की तरह। ठीक है? तो वो आपके पहले पार्ट का ये आंसर है जो एक लाइन में मैंने कहा है लेकिन अब इसके बाद कंटिन्यू करके उमेश जी आप पूरा एक्सप्लेन कर दीजिए और जो इनके प्रश्नों का उत्तर दे दीजिए। जी। तो शिवम जी आपका यह कहना है कि जो ऐसा हो रहा है अभी कि वो एक ही समय में अविद्यावान भी है विद्यावान भी है और अविद्यावान भी है दोनों के तो दोनों में से तो एक हो सकता है तो बात ऐसी है कि और जो इस वाला जो है वो भी थोड़ा सा ले लेते हैं इसमें कि अविद्यावान होना मतलब क्या माया का आवरण पड़ जाना माया का माया के प्रभाव में आ जाना तो बात ऐसी है कि पहले तो यह समझना होगा माया है क्या सीधी सी भाषा में अभी कहेंगे तो या संस्कृत का थोड़ा सा व्याकरण का इसमें पार्ट आ जाता है या मां हिंदी में समझा देता हूं या मतलब जो
02:42:19:25 और मां मतलब नहीं है तो थोड़ा अधिक व्याकरण में नहीं घुसूंगा जो नहीं है उसको कहते हैं माया ये तो हो गया एक शब्द में बात अब ऐसी है कि एक कमरा है उस कमरे में बहुत प्रकाश भी नहीं है और बहुत ज्यादा अंध अंधेरा भी नहीं है इस ऐसे कमरे में एक रस्सी पड़ी हुई है और उस रस्सी के सामने से कोई आदमी गुजर रहा है तो वो रस्सी को देखने के बाद उसे हो गया अरे ये तो सर्प है वो भागा उसे पसीना आ गया हार्ट हार्ट बीट्स उसके बढ़ गए इत्यादि इत्यादि अब उस प्रसंग के ऊपर हमें विचार करना है जिससे हमें माया समझ में आ जाएगी और माया समझ में आ जाने के बाद इसका पता चल जाएगा कि वो साइमलटेनियसली दोनों कैसे हैं विद्यावान भी अविद्या तो माया क्या है वास्तविकता में वहां है रस्सी उस व्यक्ति का जो आय कांटेक्ट हो रहा है वो रस्सी में इसमें एक प्रश्न ध्यान रखिएगा पंडित जी एक प्रश्न ध्यान रखिएगा कि साइमलटेनियस जो एक साथ दोनों विपरीत चीजें कैसे वो उसका जवाब तो चल ही रहा है और आगे ये कि जो ब्रह्म है वो ब्रह्म ब्रह्म कैसा जो जो है माया से जाता है हां वो आगे वो आगे वो तो आगे आ जाएगा अभी एक समय वाली बात का उत्तर चल रहा है जी हां जी वो एक समय के बाद वो आगे आ जाएगा सही बात है तो उस व्यक्ति
02:43:34:28 का जो आय कांटेक्ट है वो रस्सी से ही हो रहा है रस्सी से ही होगा क्योंकि वहां रस्सी ही है वास्तविकता में आय कांटेक्ट रस्सी से हो जाने के बाद भी उसे यहां ज्ञान हो रहा है सर्प का। ये थोड़ा 101 मिनट की प्रोसेस है समझाने के लिए। अभी वो स्किप कर करेंगे हम। न्याय दर्शन लाना पड़ेगा। थोड़ा अभ्यास का कांसेप्ट आता है उसमें क्योंकि पहले के एक्सपीरियंस के हिसाब से फिर अभी एक्सपीरियंस कर रहे हैं। सारी चीजें हैं। अभ्यास भी आता है और उसे न्याय दर्शन के एक कांसेप्ट भी है। वो मतलब बहुत सारा टेक्निकल विषय आ जाता है न्याय वैशेषिक दर्शन का। ठीक? तो आई कॉन्ट्रैक्ट रस्सी से हो रहा है और उसे ज्ञान हो रहा है सर्प का। बिल्कुल। तो बात ऐसी ही आ जाती है इसमें सत और असत ये दो शब्द हमें पहले समझने हैं। सत मतलब अस्तित्व जिसका है वो और असत मतलब जिसका अस्तित्व ही नहीं है। ये थोड़ा सा समझा देंगे एक मिनट में। जैसे शास्त्रों में शब्द आते हैं शश श्रृंग ख पुष्प या वंध्या पुस्तक। शश माने खरगोश रैबिट और श्रृंग मतलब उसका जो सिंह होता है वो वो मस्तक पे जो होता है तो शश अस्तित्व में है कहीं ना कहीं किसी ना किसी पशु का सिंह भी अस्तित्व में है परंतु शश का सिंह शश का श्रृंग इसकी बात करेंगे तो वो अस्तित्व में है ही नहीं था अभी नहीं है आगे भी नहीं होगा वध्या का पुत्र वंध्या स्त्री प्रारब्ध कहीं ना कहीं अस्तित्व में है किसी ना किसी मातृशक्ति का पुत्र
02:44:50:02 भी है लेकिन वंध्या स्त्री का पुत्र यह जो पदार्थ है ये केवल नाम है यह पदार्थ नहीं है विश्व में नहीं था नहीं है नहीं होगा ख पुष्प ख माने आकाश आकाश मतलब अभी स्पेस ले लेंगे और पुष्प माने फूल तो आकाश है फूल है आकाश में उगने वाला आकाश में विकसित होने वाला पुष्प पदार्थ नहीं है केवल शब्द है जैसा गुरुदेव कहते हैं धर्मनिरपेक्ष केवल शब्द है पदार्थ नहीं है उस दृष्टि से तो ये केवल शब्द हो गए तो इनको कहते हैं असत माने एकिस्टेंस में ना होने वाले और इसके के विपरीत हो जाता है सत एक्सिस्ट। अभी हम व्यावहारिक रूप से बात कर रहे हैं सर्प और के सर्प और रस्सी के बारे में। तो व्यावहारिक रूप से अभी हम कहेंगे सत कौन है? अस्तित्व में कौन है? रस्सी। और रस्सी के ऊपर जो दिख रहा है वो वो जो है सर्प वो उसे क्या कहेंगे? ये अभी यहां प्रश्न है। उसे सत कहेंगे या असत कहेंगे? सर्प को व्यावहारिक दृष्टि से अभी रस्सी अगर अगर हम वीडियो गेम वाला क्वेश्चन घुमा के पूछ लिया आपसे वीडियो गेम वाला क्वेश्चन। हम यदि यदि यदि हम वो व्यक्ति नहीं है जो उससे प्रभावित हुआ है हम और यदि हम ये जानते हैं कि वो सर्प नहीं है वो रस्सी है हम तो हम
02:46:05:08 उस सर्प शब्द को वहां पर कहेंगे क्या कहते हैं अविद्या माया क्या कहेंगे असत हां असत जी नहीं वो दो मैं वो भी बता रहा हूं वो दोनों नहीं कह सकते बात ऐसी है कि दो ही पक्ष है या तो हम सर्प को सत कह सकते हैं या तो असत कह सकते हैं तीसरा तो है सच कह कह सकते हैं या नहीं इसके ऊपर बात करेंगे। सर्प को सच नहीं कह सकते। व्याहारिक दृष्टि से सत्य क्योंकि यदि उसे अभी सर्प देखने पर देखने के बाद कोई छूने के लिए जाएगा नहीं वैसे तो लेकिन अभी अभी के लिए उसे कोई छूता है तो वो उसको डसेगा नहीं क्योंकि वो है ही नहीं ना भास्कर में रस्सी है। मान के चलो रस्सी में कुछ कांटा लगा है। वो कांटा उसे ऐसा है हो गया पिन हो गया। उसे लगा सर आपने मुझे डसा है। ठीक है। लेकिन उसे बीच नहीं चढ़ेगा। हां यह एक अलग चैप्टर खुल जाएगा कि मन की शक्ति है तो विष चढ़ेगा इत्यादि वो अलग बात ऐसे प्रयोग भी हुए हैं पाश्चात्य देशों में अभी के लिए तो उसको सत नहीं कह सकते क्योंकि वो डसता नहीं है सर्प ठीक है तो सत नहीं कह सकते और अब दूसरा पक्ष होगा असत कहेंगे तो उसे तो असत भी नहीं कह सकते क्योंकि वास्तविकता में यदि उस व्यक्ति को सर्प दिख जाता वास्तविकता में तो उसकी जैसे-जैसे रिएक्शन हो जाती उसके उसको पसीना आ जाता है वो भाग जाता हार्ट बीट्स बढ़
02:47:20:14 जाते वही सेम टू सेम रिएक्शन अभी उसकी हो रही है रस्सी को देखने के बाद तो इसलिए वह जो दिख रहा है जो कुछ दिख रहा है उस व्यक्ति के दृष्टिकोण से सर पर वो असद भी नहीं है क्योंकि वो है चाहे उस उसकी दृष्टि से ही सही लेकिन है और उसके जो परिणाम है ना वो परिणाम तो सत वाले है ना उसके वास्तविक शरीर में परिणाम हो रहे हैं हार्ट बीट्स बढ़ गए उसके हां तो मैंने मैंने मैंने असल में मैंने मुक्त की दृष्टि से कहा है जो उससे प्रभावित नहीं हुआ है जो ये जानता वो मतलब उसने छू के मान लीजिए उसने छू के देखा हुआ है। मैंने उस दृष्टि से आपको कहा कि वो असत है। उसको सर्प कहना सर्प संज्ञा ठीक है। तो उस दृष्टि से कह सकते हैं। उस दृष्टि से ठीक है। हां तो अभी वो अभी ये आ गया कि वो जो सर्प है वो सत भी नहीं है। असत भी नहीं है। दोनों नहीं कह सकते। लेकिन कुछ तो है ना वो। दोनों नहीं तो क्या है? तो उसमें एक शब्द आता है शास्त्रों में जी। उसे कहते हैं अनिर्वचनीय माया। अनिर्वचनीय शब्द का ही अर्थ होता है वचनीय या निर्वचनीय इस संस्कृत शब्द का अर्थ होता है जो शब्दों में पिरोया जा सके जिसे शब्दों में पिरोया ही नहीं जा सकता सत भिन असि लेकिन वो कुछ तो है मतलब उसे कहते हैं अनिर्वचनीय तो माया ऐसी है अब बात आ जाएगी
02:48:35:27 विद्यावान और अविद्यावान साइमलटेनियसली कैसे है दोनों तो मैं परमात्मा हूं माया कौन है मेरी शक्ति है हां बिल्कुल अब इधर अद्वैतवादी कूद जाएंगे तो आ गया द्वैत आ गया अद्वैत का खंडन हो गया तो इन छोटा सा उनका खंडन करते हम करते चले हम एक मिनट में एक वाक्य में कि शक्ति हो जैसे पूज्य गुरुदेव भगवान की ही वाणी है शक्ति अपने अस्तित्व से अपने शक्तिमान को सद्वितीय नहीं करती जैसे अग्नि है अग्नि में दाहिका शक्ति विद्यमान है तो दाहिका शक्ति मान के चलिए अग्नि से निकाल ली जाए तो अग्नि ही कहां बचेगा वो कुछ बचेगा नहीं वहां बिल्कुल तो अग्नि और अग्नि में जो शक्ति है वो एक ही है लेकिन लक्षण स्वरूप भूत लक्षण एक ही है दोनों का शक्तिमान है वो शक्ति और शक्तिमान शक्तिमान में ऐसी क्षमता है कि वो अपनी जो कैपेसिटी इसप मैं भी मैं एक थोड़ा मेरे जो उदाहरण होते हैं वो वैसे होते हैं थोड़े से सामने वो थोड़ा कार्टून वाले हां मैं मैं सोच जानबूझकर ऐसा बहुत वैसे उदाहरण देता हूं जिससे सामने वाले को बहुत सरलता से समझ में भी आए और वो व्यत्मक रूप से भी उसको देख सके। जी जी भगवान श्री कृष्ण को तो वो मानते हैं ना कि
02:49:51:18 वो तो हैं कम से कम। ठीक है। हम अगर हम ऐसे मानने लगेंगे कि भगवान जैसे शक्ति होने के कारण द्वैत आ गया। हम तो भगवान श्री कृष्ण के दो हाथ भी हैं। हम तो दो तत्व हो गए। यानी ईश्वर एक नहीं है। वहां पे भी द्वैत हो गया। अब दो पैर भी है तो त्रेत हो गया। फिर उनका माथा भी है ना तो क्या कहेंगे उसको चतुर्थ चतुर्थक चतुर्थक कहेंगे लगा और उनका उदर भी है ठीक है तो वो हो गया पंचायत पंचायत हो गया उसके बाद फिर हम कहेंगे कि भाई वो मुरली भी जो है वो भी वही है हम आभूषण भी वही है जी हम वस्त्र भी वही है हां तो कितने अहत हो जाएंगे फिर सैकड़ों तक चले जाना पड़ेगा फिर हां हां और उनके केश है एक केश एक एक केश जी फिर अनंत केश हां तो कितने ऐत हो जाएंगे तो ये कहना कि वो शक्ति से शक्तिमान वो हो जाता है हां वो हो जाता है जी वो आपने बात अभी पूरी कर दी थी चोरभूत हो गया तो वो द्वैतों का खंडन थोड़ा सा हो गया एक मिनट में तो बात अभी ये है
02:51:07:10 नहीं हुआ का खंडन नहीं हुआ द्वैत को ना मानने वालों का खंडन हुआ हां वैसा को तो हम भी मानते हैं। हां वो ठीक है। मतलब जो केवल द्वैत मानते हैं। अद्वैत को नहीं मानते हैं उनका खंडन हो गया। अद्वैत को ना मानते हैं। जी जैसे जैसे आज के जो सगुण साकार के पक्ष लोग पक्ष में जो बात कर रहे हैं वो भगवान के निर्गुण स्वरूप को भी स्वीकार करते हैं। सगुण निराकार को भी स्वीकार करते हैं। जो आपने 8:00 बजे पहले बात कही थी 8:30 बजे एकदम शुरू में शुरू में वही बात है। हां जी जी अवश्य अवश्य जी। क्योंकि मतलब एक थोड़ा सा इसमें जोड़ दूं एक वाक्य केवल कि जो केवल द्वैत मानते हैं ना तो वेदों में द्वैत अद्वैत विशिष्ट अद्वैत शुद्ध्वता द्वैत अद्वैत पांचों फर्क मंत्र मिलते हैं। एक थोड़ा सा मैं एक अलग बात बताता चलूं प्रसंग आ गया है तो सभी के लिए बात ऐसी आ जाती है वह सभी मतलब जो मधवाचार्य के अनुयाय जी हैं मधवाचार्य जी के जो कट्टर बन गए हैं अद्वैत को नहीं मानते तो उनके ऊपर बाध्यता है अद्वैत को मानने की क्यों क्योंकि वो तो द्वैत को भी मानते हैं और वेद में अद्वैत पर वचन भी मिल जाते हैं द्वैत पर भी मिल जाते हैं। तो अद्वैत को मानते हुए द्वैत को माना जा सकता है। बिल्कुल लेकिन केवल द्वैत को मानते हुए द्वैत की वो प्रेम में अद्वैत कहां बिठाएंगे असंभव है तो ये बात है ठीक है तो अभी हमारी बात
02:52:22:12 चल रही थी वो एक ही समय में विद्या अविद्यावान कैसे एक ही समय इसको लीजिए आप इसको अभी अभी इसको ले लेते हैं तो तो ये हमने माया को थोड़ा तो समझ लिया संक्षेप में और मैं परब्रह्म हूं अभी मेरी माया शक्ति है माया शक्ति का ही नाम है माया मेरी शक्ति ही है माया तो मैं बीचबीच में बीचबीच में बोलते जाइए कि मान लेते हैं थोड़ी देर के लिए ऐसे बोलते जाइए क्योंकि ये वहां वहां जाएगा ना जब सार्वजनिक होगा हां तो तो जो वो वो होते हैं ना क्या कहते हैं उनको
02:53:00:04 असामाजिक तत्व इसकी कटिंग बनाएंगे कटिंग बनाएंगे जी बोलिए अच्छा मतलब ये मुझे संज्ञान में नहीं था ये जाएगा सार्वजनिक तौर से ठीक ठीक ठीक है। इतनी अच्छी चर्चा है तो जाएगी। जानी भी चाहिए। तो बात ऐसी है कि वो दोनों समय में विद्यावान अविद्यावान अविद्यवान कहते हैं। यह जो आक्षेप है इसका उत्तर ऐसा है कि मैं हूं परबह्म। मैं अभी के लिए तो क्या हूं? विद्यावान। विद्या से युक्त हूं। विद्या से युक्त होना मेरा नित्य स्वरूप है। ऐसा एक भी समय नहीं मिलेगा। जिस समय में ऐसा कहा जा सके मैं अमुक अमुक समय के लिए विद्यावान नहीं हूं या विद्यावान नहीं होऊंगा। ऐसा एक भी समय नहीं मिलेगा। तो मैं विद्यावान होना मेरा पूरा बन गया। नित्यता आ गई उसमें। तो अब बात केवल इतनी बच जाती है कि विद्यावान होते हुए भी मैं अविद्यावान कैसे बन जाता? तो इसका उत्तर अभी संक्षेप में मेरी जो शक्ति है माया उस माया शक्ति के प्रभाव से माया शक्ति के माया शक्ति को साधन के रूप में प्रयोग में लेने के बाद ही मैं सृष्टि की संरचना कर देता हूं। और जो सृष्टि में जो पाप पुण्य इत्यादि होंगे सभी ब्रह्म ही है। लेकिन वो अश्व वाला उदाहरण वो सृष्टि के बारे में अभी हमें पता है क्या है? बात ऐसी है कि जबजब मुझे
02:54:15:06 आवश्यकता प्रतीत होती है उसे मुझे उस वीडियो गेम में कूद जाना है। जो अभी मिशन पूरा कर रहा है वहां खिलाड़ी तो उसे बहुत ये हो रहा है। आगे नहीं जा पा रहा वो। तो उसकी मदद के लिए मुझे उसमें कूदना है। तो मैं अपनी माया शक्ति तो मेरी है। मैं उसका स्वामी हूं। शक्तिमान हूं। तो जब वो चीज मेरी है। मेरे कंट्रोल में है। तो उस चीज के प्रभाव में आना ना आना। अमुक समय तक आना, अमुक समय तक ना आना, अमुक समय तक जाना और फिर उससे बाहर निकलना यह पूरी की पूरी बात मेरे कंट्रोल में है। क्योंकि जिसके प्रभाव में मैं जा रहा हूं, मैं जाना चाहता हूं वो मेरी है। वो मेरे कंट्रोल में है माया। तो इसलिए मैं खुद डिसाइड करता हूं कि मैं अभी उस माया शक्ति के प्रभाव में स्वयं को मतलब उस माया शक्ति का अपने आप पर प्रभाव मानूंगा। उस माया शक्ति के कंट्रोल में मैं चला जाऊंगा। मेरी ही इच्छा से। तो इसलिए मैं माया शक्ति के प्रवाह में चला जाता हूं। जैसे कि मान के चलो ऐसा केवल मैंने वीडियो गेम नहीं बनाया है। मैं जो आईआईटी वाला हूं आदमी मैंने ऐसी भी चीज बना डाली। मैं इस शरीर से उस वीडियो गेम में कूद जाऊंगा। जैसे हॉरर मूवीज में दिखता है। टीवी से भूतनी बाहर आ जाता है। टेलीपोट भी कह सकते हैं। तो उस सृष्टि में मैं चला
02:55:30:09 जाता हूं। इधर से कूद के। तो जब मुझे मालूम है मैं कौन हूं? मैं विद्यमान हूं। वो सृष्टि सब मिथ्या है। वो है ही नहीं। वास्तविकता में लेकिन अब मुझे उसमें कूदना है क्योंकि मुझे उसे जिताना है तो मुझे पहले से जैसा हम किसी नाटक में भूमिका करते हैं ना तो भूमिका करने के लिए जब हम स्टेज में जाते हैं स्टेज पर जाने के पहले हमें मालूम होता है मैं अमुक अमुक हूं लेकिन मैं अभी अमुक अमुक बनूंगा मैं वो बनने जा रहा हूं तो जो अभिनेता भूमिका कर रहा होता है मैं अभी उनमें दोषी हूं मैं रावण की भूमिका करने जाऊंगा तो मैं भूमिका जब कर रहा होता हूं उस भूमिका करने का जो समय है उस समय में मैं यदि मैं कौन हूं मैं मनुष्य हूं मैं उन्मेश दोषी हूं मैं अभिनेता हूं इसी बात को मैं यदि भूल गया तो मैं रावण की भूमिका कर कैसे पाऊंगा रावण की भूमिका करने के लिए पहले मुझे ज्ञात होना ही चाहिए कि मैं कौन हूं उसमें खंड खंड आ गया तो भूमिका खत्म भूमिका तभी कर पाऊंगा जब मेरा मेरे वास्तविक स्वरूप का ज्ञान मुझे है अखंडित रूप से तो मैं उस वीडियो में मैं कूदूंगा कूदने से पहले जानूंगा मैं कौन हूं क्या हूं लेकिन अभी मैं जा रहा हूं और उसमें जाने के बाद मुझ पर भी आघात हो जाएंगे
02:56:45:10 तो मैं अभी वास्तविक रूप में मैं ईश्वर परम ब्रह्म हूं मैं वीडियो गेम को बनाने वाला हूं यह पूरी सृष्टि है ही नहीं लेकिन उस सृष्टि के अंदर जाने के बाद जो घाव मुझ पर लगेंगे उसकी मुझे वेदना भी होगी घाव पहली बात तो घाव होंगे मुझ पर वेदना होगी सब चीजें होंगी और उसको मदद करूंगा और फिर से वापस आ जाऊंगा का फर्क केवल इतना है। अब मैं उस वीडियो गेम में गया। 10 लोग 10 सैनिक लड़ रहे हैं। मैं 11वा वहां पहुंच गया। तो वो जो 10 सैनिक हैं मिथ्या वाले उनकी दृष्टि उनको पता भी है। अरे हमारे भगवान आ गए मदद के लिए। उनकी दृष्टि से मैं भगवान भी हूं लेकिन मुझे घाव भी हो रहे हैं। उनकी दृष्टि से क्या है? हमारे भगवान नीचे आ गए हैं। तो इसीलिए वो क्या मानेंगे? हम उनको भी घाव लग रहे हैं, चोट हो रही है। उनको भी वेदाना हो रही है। यह 10 जो मेरे पक्ष से लड़ रहे हैं उनको मालूम है। सामने वाले जो है वो नहीं जानते यह भगवान आ गया है। वो क्या मानेंगे? अरे हां ये तो मतलब ऐसा ही है। 11वा कुछ सैनिक आ गया उसको भी चोटिल कर दो ये कर दो वो कर दो। बात ऐसी है अभी मैं अभी विद्यावान तो मैं हूं ही। क्योंकि विद्यावान मुझे नहीं मानेंगे तो भूमिका ही नहीं कर पाऊंगा। तार्किक दृष्टि से असंभव है। तो क्योंकि मैं भूमिका कर रहा हूं तो मैं विद्यावान हूं ही। उसी समय
02:58:00:14 पर भी अविद्यावान होते हुए अविद्यावान कैसे हो गया? मैं वास्तविकता में अविद्यावान हुआ ही नहीं हूं। जो सामने वाले हैं उनकी दृष्टि से क्योंकि वो अभी अविद्या में है। उनकी दृष्टि से मैं उनके जैसा ही बन गया हूं। तो हम जब सभी बात कर रहे हैं अभी भगवान की बात कर रहे हैं तो हम देखते हैं कि अरे वो भी अविद्यावान होता दिख रहा है। हमारे ही जैसा लेकिन उसको पता है वास्तविकता यहां पे इंटरप्ट करूंगा। जी जी थोड़ा सा जी अवश्य बात यह कर रहे हैं कि विद्यावान होते हुए अविद्यावान वो जो आप यहां से यहां पर अवतार की बात को वो कर रहे हैं। भगवान जब अवतार लेते हैं तो वो क्यों दिख रहे हैं? हम बात कर रहे हैं कि वो जो सामने वाले हैं जो सामने वाले जो भगवान को नहीं समझ पा रहे हैं कि ये भगवान है। हां वो सामने वाले भी सामने वाला तत्व से तो वही है ना ईश्वर ही है ना। हां तो फिर वो वो बुद्धू क्यों बन रहे हैं? वो वो ऐसा क्यों मतलब ईश्वर उस रूप में स्वयं को बुद्ध मतलब बुद्ध क्यों ईश्वर विद्यावान होते हुए भी बुद्धू क्यों बन रहा है अविद्यावान अविद्या से ग्रसित क्यों हो रहा है उसका एकदम सिंपल सा उदाहरण कि बात ऐसी होती है इसका केवल एक उत्तर यही है कि माया उसकी मर्जी
02:59:15:22 कहने का अर्थ ये है कहने का अर्थ ये है कि एक ही समय में ये दो विपरीत चीजें कैसे हो सकती हैं इसमें एक तर्क और आता है हां कि यदि यदि यदि एक ही तत्व है बहुत सारी जीवात्माएं नहीं है। एक ही जीव एक ही तत्व है। ब्रह्म और जीव भी एक है। तो जब एक जीव को मुक्ति मिलती है तो सभी को मिल जानी चाहिए। मिलनी चाहिए। है ना? तो बात वही है कि जब ये जब जब तत्व से जब हम मुक्त हैं, जब तत्व से हम अविद्यावान है, अविद्या से मुक्त हैं तो फिर अविद्या से ग्रसित क्यों हो रहे हैं? कैसे हो सकते हैं? जब मेरे को मालूम है कि 2 2 4 होता है। जब मेरे को मालूम है कि 2 2 4 होता है तो मैं ये कैसे कह सकता हूं कि मैं नहीं मालूम है कि 2 2 4 होता है। है ना? मैं मैं इसका मैं इसका एक एक पॉइंट रख देता हूं। यहां पर है कि आप जो है वो अपने दृष्टिकोण से देखकर यह बात कह रहे हैं और इसी को ही अध्यास रूप कहते हैं क्योंकि माया का एक बहुत फंडामेंटल गुण है उसे बोलते हैं माया का अध्यास रूप होना जैसे रस्सी रस्सी में जैसे रजो सर्प का एग्जांपल ले लेते हैं तो जैसे रस्सी में सर्प या फिर
03:00:30:26 मान लीजिए कोई सीपी होती है ना सीपी जिसके अंदर चांदी का मिथ्यारोप होता है है ना ऐसा होता है उसी प्रकार मायावश जब जीव होता है। वह भी एक निर्गुण ब्रह्म को नाना प्रकार से नाना रूपात्मक जगत के रूप में उसको देखता है और तब उस समय वो दो चीजें देख रहा होता है। एक कि वो ईश्वर और एक अपने आप को तो वो अपने आप को तो नहीं जान पा रहा होता है अभ्यास के कारण कि वो भी ब्रह्म है ईश्वर है। उसका बोध नहीं है। इसलिए वो ईश्वर नहीं कहलाता है। और दूसरा जो उसके सामने जो होता है जो दूस 11वां करैक्टर जो इंट्रोड्यूस किया था उनमे जी ने जो स्वयं ईश्वर था उसको उसको इस बात का पता होता है। तो तो मतलब हम ये ये कह रहे हैं कि एक समय में मैं अज्ञानी और मूर्ख अज्ञानी और ज्ञानी दोनों हूं। भैया मैं एक चीज एक चीज बोलना चाहूंगा भाषा में कि जैसे हमारे माता-पिता कभी जोड़ घटाव सिखाते हैं तो जानबूझ के कभी गलती कर देते हैं ताकि वो हमारा परीक्षण कर सकते हैं हमें आता है कि नहीं। तब तो हम हमारे माता-पिता को बोलते हैं कि नहीं मम्मी ऐसा नहीं ऐसा होगा। आप ईश्वर का पक्ष ले रहे हैं अवतार का पक्ष ले रहे हैं। हां जी भैया ईश्वर भी वैसे ही करते हैं। हमें अभी अवतार का पक्ष नहीं लेना है। हमें अभी अवतार का पक्ष लेते लेते हम यहां पर आ गए कि
03:01:45:27 सब कुछ जब जब हमने अवतार के पक्ष में यह कहा ना कि सब कुछ वही है तो कुछ हो ही नहीं रहा है। जब हमें यह कहना पड़ गया अवतार के पक्ष में कि सब कुछ वही है। क्योंकि भगवान को कर्मों से मुक्त सिद्ध करना था। है ना? जी। तो हमको ये कहना जब पड़ गया कि सब कुछ वही है अवतार के समर्थन में। तो जब सब कुछ वही है कह दिया तो फिर यह कहा फिर अब यह बात आई है कि मनुष्य के रूप में वह बाधित क्यों हो रहा है? मनुष्य के रूप में वह बंधन में क्यों आ रहा है? मनुष्य के रूप में वो अविद्या से ग्रसित क्यों हो रहा है? जब वो तत्व से जब वो सच्चिदानंद है जब वो सब कुछ जानता है तो एक ही समय में दो विपरीत स्थितियां कैसे हो रही है? अविद्या अविद्या साथ में कैसे ये होना संभव है क्या? क्या आप ऐसा मानते हैं विद्या एक मिनट क्या आप ऐसा मानते हैं? क्या अविद्या अविद्या साथ में हो सकती है? और अगर मानते हैं तो उसको थोड़ा सा समझाइए कैसे हो सकती है कैसे सिद्ध होता है ये संभव है क्योंकि वो अनंत शक्तिवान है कुछ भी कर सकते हैं तो दोनों एक साथ आ सकता है और वो ऐसा इसीलिए करते हैं ताकि उनका कोई उपदेश हम तक पहुंचे नहीं करने वाली बात नहीं है यहां होने वाली बात है एग्जिस्टेंस साथ में हो सकता है क्या आप क्रिया की बात कर रहे हैं कि वो कुछ भी कर सकता है वो एक अलग चीज है और हम कह रहे हैं
03:03:00:28 कि विद्या और अविद्या साथ में कैसे रह रही भाई जहां पे प्रकाश अंधेरा वहीं हो सकता है जहां उजाला ना हो। तो हम फिर ये तो भैया बिना उजाले को आप अंधेरे को डिफाइन कैसे करिएगा? तो हम नहीं करेंगे। नहीं करेंगे फिर अंधेरे का तो वास्तविकता ही खत्म हो जाएगा ना भैया। बिना उजाले बिना उजाले के भाई सामने जो मनुष्य है वह बंधन में है ना? हां ठीक है। कर दीजिए। ईश्वर रहित कर दीजिए संसार को और क्या है भाई? आप ज्यादा से ज्यादा जब हम यह कह रहे हैं कि हम यह कह रहे हैं मनुष्य को यह क्यों लग रहा है कि मनुष्य रूप में उसी तत्व को यह कैसे लग सकता है कि जो है मैं बंध गया हूं। मैं अविद्या से ग्रसित हूं या मुझे गलत दिखाई दे रहा है। माया दिख रही है। ये सब क्यों हो रहा है? जबकि तत्व से मैं वही हूं। तत्व से मैं जानता हूं कि वही क्या कहते हैं? मैं मुक्त हूं। है ना? जी भैया। तो अभी यह यह चल रहा है कि जहां पर प्रकाश है वहां अंधेरे को हम नहीं मान सकते और या फिर आप अगर मानते हैं तो बताएं कि क्यों मानते हैं विद्या और अविद्या साथ में है ना अब पहले तो आपको
03:04:16:02 यह बताना है क्या विद्या और अविद्या साथ में हो सकती है एक साथ एक ही समय में और अगर हो सकती है तो ऐसा आप क्यों मानते हैं युक्ति क्या है प्रमाण क्या है ये कह रहा हूं जी बोले जी कुछ पंडित जी बोलने वाले हो? नहीं नहीं ऐसा मुझे लगा था। भैया एक छोटा सा वक्तव्य दूंगा जैसे कि पहले कहा था अविद्या और विद्या मतलब एक साथ ना हो तो विद्या और अविद्या दोनों अगर इंडिपेंडेंट रहे एक दूसरे से रहित तो एक दूसरे का वास्तविकता ही सिद्ध नहीं हो पाएगा। जैसे कि पाप और पुण्य होता है। अच्छे कर्म आप सिद्ध आप समझ आप मेरी बात को काट करके केवल ईश्वर रहित ही तो करेंगे। आपको अपना पक्ष सिद्ध करना होगा ना। जी भैया अगर नहीं रहेगी साथ में तो ऐसा हो जाएगा वैसा हो जाएगा यह क्या है कि मेरा खंडन कि मैं अगर जो ये क्या कहते हैं कि मैं निराकार के पक्ष को रखने वाला हूं तो निराकार का खंडन या ईश्वर के अवतार को ना मानने वाला हूं तो ईश्वर के अवतार का ना मानने वाला का खंडन मगर ईश्वर के अवतार को तो सिद्ध करना ही होगा ना तो ऐसे जी बोले तो इसमें बात अब ऐसी है कि हम ये जो आक्षेप कर रहे हैं मतलब आप जो आपसे आक्षेप
03:05:31:18 कर रहे हो कि कोई सवाल एक बार और क्लियर कर दूं क्योंकि बीच में दूसरी बातें भी हो गई। पहला सवाल क्या विद्या और अविद्या साथ में रह सकती है? जबकि हम जानते हैं कि प्रकाश और अंधेरा साथ में नहीं रह सकते हैं। एक समय में एक ही देशकाल परिस्थिति में नहीं हो सकते। तो क्या आप ऐसा मानते हैं कि विद्या और विद्या साथ में रहती है? क्योंकि आप यह कह रहे हैं कि एक ही तत्व जो है एक एक रूप में जो है बाधित है और एक रूप में मुक्त है। ठीक है जी। तो क्या आप ऐसा मानते हैं? अगर मानते हैं तो उसमें युक्ति और प्रमाण क्या है? अब ये बताओ। जी। तो पहले युक्ति और प्रमाण बताएंगे क्योंकि अविद्या और अविद्या साथ में रह सकती है या नहीं? इसका उत्तर व्यावहारिक धरातल से हां है और पारमारिक धरातल से नहीं। क्योंकि अविद्या तो मूलत है ही नहीं। तो इसलिए पहले तर्क और प्रमाण की बात करेंगे कि ऐसा क्यों होता है? तो बाद में इसका उत्तर ऑटोमेटिकली मिल जाएगा हां या ना में तो बात एकदम सिंपल सी है जो पंडित जी अभी बात कर रहे हैं तो उमेश जी आपने इसका उत्तर तो ऑलरेडी दे दिया है ना अगर आप ये रजो सर्प का एग्जांपल ले लीजिए तो अविद्या भी है और वहां विद्या दोनों विद्यमान है। लेकिन पॉइंट ऑफ व्यू चेंज हो गया है। राइट? हां एक्सक्टली वही बात और फिर भी मतलब जो शिवम जी का प्रश्न है
03:06:46:19 नहीं नहीं पंडित जी यहां मैं काउंटर करूंगा। नहीं नहीं काउंटर करेंगे। क्यों करेंगे? यहां पे जो व्यक्ति ये समझ रहा है ना कि ये सर्प है वो व्यक्ति ये नहीं समझ रहा है कि ये रस्सी है। हम जो व्यक्ति ये समझ रहा है कि ये सर्प है वो व्यक्ति ये नहीं समझ रहा है कि वो रस्सी है। जी हां लेकिन लेकिन विद्या और विद्या और अविद्या तो दोनों दोनों वहां पे एक्सिस्ट तो कर रही है ना। वो तो हम जब हम इधर से देख रहे हैं मुक्त की दृष्टि से जानते हैं शब्द प्रमाण से जान रहे हैं। अभी तो यह हो रहा है कि वो व्यक्ति वो व्यक्ति जो देख रहा है उसको वो व्यक्ति यदि इस ब्रह्म का ही स्वरूप है मुक्त ही है तो वो क्यों वो क्यों उस समय सर्प से वो हो गया है और जिस समय वो ऐसा हुआ है सुनिए वो ऐसा भी हुआ है वहां पर कि उस समय वो नहीं जान रहा है कि ये सर्प नहीं है। है ना? जी हां तो ये बताइए कि यदि वो व्यक्ति मुक्त है तो वो यह क्यों जान रहा है कि ये सर्प है और यदि वो व्यक्ति मुक्त नहीं है तो फिर हम उसे ये क्यों कह रहे हैं कि वो मुक्त है वो इसलिए क्योंकि वो व्यवहार में मुक्त नहीं है। वो परमार्थ में मुक्त है। व्यवहार में वो मुक्त नहीं है। व्यवहार में अभी भी उसके अंदर वो सारी समस्याएं हैं। वो माया की आवरण शक्ति से विक्षेप शक्ति से घिरा हुआ है। अध्यास से घिरा हुआ है। इसलिए
03:08:02:16 ये अंतर दिख रहा है आपको। लेकिन अगर आप परमार्थ की जैसे कि जब आप वो वीडियो गेम का करैक्टर खेलेंगे ठीक है तो उस समय आपकी भी अपनी बाधाएं होंगी। आप भी एक मिशन के बाद ही दूसरा मिशन कर सकते हैं या फिर आपकी लिमिटेशंस है कि आप जब आपने गेम की ही लिमिट इतनी बना दी है तो आप उसके बियों्ड नहीं जा सकते। ठीक है? लेकिन जब जो गेम खेल रहा है उसे इस बात का पता है ना। व्यवहार की दृष्टि से तो वो मुक्त है वो बात जानता है लेकिन उस कररेक्टर में होकर वो नहीं जान रहा है तो परमार्थ की दृष्टि से तो वो बिल्कुल मुक्त है लेकिन जब व्यवहार में होने के कारण क्या बोलते हैं फिर वो अपने आप को अमुक्त कह लीजिए या माया में होने की वाली बात कह लीजिए बंद कहेंगे बंद बंद नहीं तो ये तो ये तो ये तो शब्द प्रमाण हो गया ना बात ये चल रही है देखिए जब हम जब हम परमार्थ की दृष्टि लाएंगे तो हम सीधे ये कहेंगे कि भाई ये शब्द प्रमाण है ऐसा है वहां पर ठीक है अभी बात ये हो रही है कि अभी मैं समझना चाह रहा हूं। आपने जो शब्द प्रमाण से मुझे बताया है ना तो उससे उत्पन्न होने वाले संशय है जो मैं आपसे पूछ रहा हूं। वो संशय क्या है? पहला कि क्या ज्ञान और प्रकाश साथ में रह सकता है वो आप मानते हो। यदि मानते हो तो उसमें प्रमाण और युक्ति क्या है?
03:09:17:22 ज्ञान और ये आप मुझे शब्द प्रमाण देते हो कि वो व्यवहार नहीं परमार्थ है। ज्ञान और प्रकाश मैं समझा नहीं कदाचित तुमको अंदर और प्रकाश कहना या तो अविद्या मैं और क्लियर कर दूं क्या विद्या और अविद्या मैं मानता हूं कि विद्या और अविद्या ज्ञान और प्रकाश की तरह ही है। ठीक है? तो विद्या और विद्या ज्ञान और प्रकाश की तरह जब है तो क्या आप यह मानते हैं कि नहीं विद्या और विद्या अंधेरे और अंधकार और प्रकाश अंधकार और प्रकाश की तरह है तो क्या आप मानते हैं कि अंधकार और प्रकाश एक समय में एक साथ रह सकता है और यदि मानते हैं तो ये बताइए कि इसमें प्रमाण और युक्ति क्या है?
03:10:01:01 ठीक है। आप बोलोगे पंडित जी क्या नहीं मैं कोई दूसरा लॉजिक देने वाला था लेकिन आप बोलिए वरना अरे नहीं तो आपका मतलब आपकी चर्चा हो जाने दीजिए आप देखिए क्या है कि अंधकार तो फिर तभी भी एक्सिस्ट करता है प्रकाश होने के बाद भी बस वो प्रकाश का आवरण ओढ़ ओढ़ने के बाद वो अंधकार जो है वो छिप जाता है। जैसे माया अपनी आवरण शक्ति से जो सत्य जो वास्तविक सत्य है जो वास्तविकता होती है उस पे ऐसा आवरण डालती है कि वो पूर्ण रूप से छिप तो जाता है लेकिन वशिष्ठ फिर भी करता है जैसे काले बादल के पीछे छिपा हुआ सूर्य ठीक है चलिए मैं इसको और थोड़ा सा एक्सप्लोर कर देता हूं हां कि वो छिप जाता है मगर हमें इंफॉर्मेशन तो ये प्राप्त हो रही है कि अब अंधकार नहीं है हां व्यवहार में हो रही है हो रही है प्रत्यक्ष प्रमाण तो यही है ना अंधकार नहीं है तो अंधकार जब नहीं है तो यानी कि हमने ये माना कि प्रकाश के होते समय अंधकार नहीं होगा। इंफॉर्मेशन में तो कम से कम नहीं होगा। हां नहीं होगा। ठीक है? और हमने ये माना कि प्रकाश के उसमें और अगर ऐसे देखेंगे तो दुनिया में कुछ भी चीज नहीं है। है ना? फिर तो वही वाली बात आ जाएगी। तो व्यवहार की बात जब करेंगे तो व्यवहार में हमें मानना पड़ेगा कि भैया ये जो इंफॉर्मेशन है वो जो अंधेरा है। जब प्रकाश हुआ तो अंधेरा नहीं रहा। और जब अंधेरा हुआ तो अंधेरा
03:11:16:09 तब हुआ जब प्रकाश नहीं रहा। ठीक है? अंधेरा होने का जो वो है अंधेरा होने का प्रमाण मतलब अंधेरा हुआ ही इसलिए है क्योंकि प्रकाश नहीं है। कारण ही अंधेरे का कारण ही है प्रकाश का अभाव। ठीक है? तो मैं मानता हूं कि अविद्या का कारण ही है अविद्या का ना होना। है ना? तो अब पहली बात अब अगर आप नहीं मानते हैं तो क्यों नहीं मानते हैं? और क्या ये दोनों चीजें साथ में एक समय में एक जगह रह सकती हैं? एक ही तत्व में है ना? और और दूसरी बात कि इसमें प्रमाण और युक्ति क्या है? अगर रह सकती है तो ये कह रहा हूं।
03:12:01:22 तो व्यवहार की दृष्टि में तो बिल्कुल नहीं रह सकती एक साथ। ठीक है। मतलब वो पॉसिबल ही नहीं थी। ये वही वाली बात हो गई कि वो ये अनिर्वचनीय वाली बात वहां पे हो गई या फिर एक बंधिया का पुत्र वाली जैसी बातें कहने का मतलब है मैं मैं आपको अपनी बात समझा दूं कि जो मुक्त है जो जानता है कि दो और दो चार होते हैं वो कैसे जान रहा है कि दो और दो चार नहीं होते या वो जान ही नहीं रहा है कि दो और दो कितना होता है वो बंधन में कैसे आ रहा है जबकि वो तो वास्तविकता में क्या है कि दो और दो चार होते हैं वो जानने वाला है तो दो और दो चार होते हैं जानने वाला होते हुए भी दो और दो चार नहीं होते ऐसा होने ऐसा कैसे हो सकता है एक साथ एक ही समय में ये बात बताएं
03:12:56:07 फिर उदाहरण दीजिएगा ऐसा कब हुआ था ये सोच के पाएंगे उन्मेश जी उन्मेश जी को बोल कुछ बोल रहे थे पंडित जी अभी नहीं ना मैंने काटा नहीं मैं नहीं नहीं काटा नहीं मैं बस यही कह रहा था फिर यहां पे फिर माया का विचार आएगा लेकिन आप बोलिए फिर मैं अपनी बात कहूंगा क्योंकि मुझे पता है उस फिर से क्वेश्चन आएगा हम जी वो तो आएगा ही आने वाला ही है तो इसमें बात ऐसी है जो आपने शिवम जी कहा मतलब दो और दो चार होते हैं मैं जान रहा हूं फिर भी मैं दो और दो कितने होते हैं या पांच कितने मतलब मैं जानता नहीं इस रूप में मैं कैसे जा रहा हूं जानते हुए भी तो यही बात है इसमें पहली तो उसे उसमें सबसे पहली मेरी मर्जी ये सबसे पहली बात है मुझे उस रूप में अपने आप को ढालना है वो तो ठीक है वो एक अलग रूप से हो गया कि वो हां वो तो अलग हो गया लेकिन एक मतलब पॉइंट क्लियर और दूसरी बात यदि मुझे उस रूप में अपने को सबसे पहले क्लियर करते करते चले कि क्या जिस प्रकार से प्रकाश और अंधेरा है क्या उसी प्रकार से अविद्या और विद्या है क्या पहले इसको आप करें क्योंकि प्रकाश प्रकाश और अंधेरे में क्या है प्रकाश एक अभाव पदार्थ है जब जब प्रकाश नहीं अंधकार अंधकार एक
03:14:11:10 अभाव है। जब प्रकाश नहीं है तभी अंधकार का अस्तित्व है। ठीक है तो क्या आप इसी तरीके से विद्या और अविद्या का अस्तित्व मानते हैं कि नहीं मानते? पहले इसको क्लियर करो। अच्छा अब सबसे पहले बात ऐसी आ जाती है जब आपने भाव का विषय निकाल ही लिया है। तो ये पूरा का पूरा विषय हो जाता है न्याय दर्शन का। विद्या का शब्द का प्रयोग क्यों कर रहे हैं? विद्या विद्या का मतलब आप यहां पे अर्थ यही है ना कि जो अविद्या का अभाव नहीं नहीं नहीं विद्या फिर उसको अभावात्मक हो जाएगी बिल्कुल नहीं विद्या भाव पदार्थ है ये स्पेसिफिक शब्द जो है विद्या का प्रयोग क्यों कर रहे हैं अपने प्रश्न में ये पूछ रहा हूं मैं मैं हां उनका प्रश्न ऐसा है कि विद्यावान मतलब जो जानने वाला है वो ना जानने वाला कैसे बन पा रहा है अच्छा अच्छा अच्छा अच्छा अच्छा तो विद्यावान अविद्यावान कैसे हो रहा है इसलिए वह विद्या अविद्या का थोड़ा सा मतलब सुलभता के लिए ऐसा मुझे लग रहा है कि वहां कुछ अलग बिलकुल बिलकुल आप सही कह रहे हैं तो पहला पहले इसको क्लियर करें तो हम आगे बढ़े क्या आप क्या आप क्या ज्ञान और प्रकाश की तरह ही विद्या और अविद्या को मानते हैं जिसमें कि प्रकाश के ना होने में ही अंधकार का एक्सिस्ट अस्तित्व है तो क्या आप उसी प्रकार से ये मानते हैं कि विद्या के
03:15:26:12 ना होने में ही अविद्या का अस्तित्व है अब बात ऐसी है जो अंधेरा और प्रकाश वाली बात है ना तो जब हम अभाव की बात करते हैं किसी भी चीज का अभाव हो नॉन एक्सिस्ट तो अभाव न्याय दर्शन के अनुसार ऐसा होता है प्रतियोगी एक वहां शब्द आ जाता है बहुत अधिक टेक्निकल में अभी नहीं घुसूंगा लेकिन फिर भी केवल अभाव है ऐसा हम कह नहीं सकते देखो सामने वाला पूछेगा अरे किस चीज के अभाव के बारे में तुम बात कर रहे हो तो अभाव किसी ना किसी का होता है केवल अभाव नहीं होता ऐसा स्पेस में तो किसी ना किसी चीज का अभाव हो जाता है तो किसी ना किसी भाव पदार्थ का अभाव होता है। कब कहां होगा वो अलग बात है। तो इसे कहते हैं जिसका अभाव होता है ना उसे कहते हैं प्रतियोगी। मान के चलो मैं इस कमरे में बैठा हूं। इस कमरे में मिट्टी का बर्तन नहीं है अभी मौजूद नहीं है मटका। तो वो हो गया प्रतियोगी। वो नहीं है तो क्या है? इस उसका अभाव विद्यमान है। तो अभाव किसी ना किसी चीज का होता है। अब जब हम किसी चीज को अभाव रूप में मानते हैं जैसा कि अंधेरा अभाव रूप है। तो ये बताना पड़ना आवश्यक बताना आवश्यक हो जाता है कि किस चीज का अभाव मतलब अंधेरा। केवल अभाव नहीं कह सकते। तो यहां ये बात आ जाती है कि प्रकाश का अभाव मतलब
03:16:41:18 अंधेरा। वैसा ही तो क्या आप अविद्या अविद्या को ऐसा ही मानते हैं कि विद्या का अभाव अविद्या। थोड़ा सा क्या कैसी बात है जैसा प्रकाश और अंधेरा इन दोनों में से हम एग्जजेक्टली कह सकते हैं कि प्रकाश का अभाव मतलब अंधेरा अंधकार तो वैसा सामान्यता कह सकेंगे कि विद्या का अभाव मतलब अविद्या लेकिन किस दृष्टि से अभी देखना आवश्यक है विद्या का अभाव मतलब क्या विद्या को विद्या का अभाव कहेंगे तो माइनस यह आघात हो जाएगा ईश्वर पर कहीं ना कहीं किसी ना किसी स्थान पर किसी ना किसी देश काल परिस्थिति में विद्या का अभाव हो रहा है तो बात खत्म सर्वशक्तिमान ईश्वर का खंडन हो गया तो इसलिए विद्या का अभाव एग्जजेक्टली इसी शब्दों में नहीं कह सकते जिस शब्दों में प्रकाश का अभाव में ही अविद्या का अस्तित्व मानते हैं नहीं नहीं जैसा मैं अभी क्लियर कर रहा हूं तो प्रकाश और अंधेरा में जिस तरह से हम मानते हैं एक्सजेक्टली मानते हैं कि ठीक है प्रकाश का ना होना मतलब अंधकार उसकी दृष्टि से विद्या का ना होना बात अटक जाएगी यहां पर ही विद्या का ना होना क्या है वो अगला पॉइंट विद्या का ना होना केवल इतना हमने मान लिया
03:17:56:21 तो हमारा ईश्वर खत्म हो गया पूरा का पूरा नास्तिकता आ गई तो इसलिए विद्या का अभाव मतलब विद्या का ना एक्सिस्टेंस ये अविद्या नहीं बात ऐसी है मैं यही कह रहा हूं बहुत बढ़िया बहुत बढ़िया नहीं है बहुत देर से सुनना चाह रहा था मैं मैं भी यही मेरे मन में भी यही बात आ रही थी मैं बोल रहा था यही यही पॉइंट है मैं पूरा कर दूंगी क्या आपकी? अवश्य अवश्य अवश्य कर इसमें एक और बात जोड़ दूं और माया और अविद्या माया तथा अविद्या यह दोनों ही मैं तो आज मैं तो आज मैं तो आज की चर्चा का ये शीर्षक डालने वाला था कि साकार पक्ष हार गया।
03:18:37:18 तो ऐसा है कि गुरुदेव से ये प्रश्न पूछा था। गुरुदेव का जो इंटरव्यू डला हुआ है उसमें प्रश्न है। गुरुदेव का पहला सेंटेंस यही था कि अविद्या अभाव पदार्थ नहीं है। एक्सक्टली वो ज्ञान और प्रकाश की तरह है ही नहीं। अंधकार और प्रकाश की तरह है ही नहीं। क्यों? क्योंकि अंधकार क्या है? जब प्रकाश नहीं है तभी अंधकार है। मगर अविद्या क्या है? विद्या है तब भी अविद्या है। उसका अस्तित्व है। विद्या के ना होने पर ही अविद्या नहीं है। अविद्या का अपना अस्तित्व है। अभी आपने बोला भी है कि अविद्या अनादि नित्य है। जी बोला है ना? जी अभी पंडित जी ने बोला। थोड़ी देर पहले बोला था। हां। अब श्वेता शत्रुपनिषद में ये बात है भी कि विद्या और अविद्या दोनों ब्रह्म में अनादि उससे रहते हैं। विद्यमान। तो सबसे पहली बात तो यह समझनी होगी कि अविद्या कोई अभाव पदार्थ नहीं है। अब यह तो चीज क्लियर हो गई कि अविद्या अभाव पदार्थ नहीं है। तो इसका मतलब आप ये कह रहे हैं कि दोनों एक ही समय में एक ही तत्व में एकिस्ट कर सकते हैं। विद्या और विद्या दोनों तो इसको थोड़ा सा आप युक्ति से बता
03:19:52:21 दे। प्रमाण तो हमें मिल गया श्वेता सूत्रपनिषद और गुरुदेव का। अच्छा थोड़ा सा इसमें युक्ति बताएं कुछ कि दो दो विपरीत दो विपरीतार्थक चीजें कहां पर रहती है एक साथ ऐसे कुछ सिर्फ ऐसे कुछ युक्ति दें चुंबक में भैया चुंबक में नॉर्थ पोल और साउथ पोल चुंबक चिपक जाते हैं नहीं वो तो अलग विषय हो जाएगा नहीं वो नहीं आप थोड़ा सा मतलब क्या कहना चाह रहे हो चुंबक के उदाहरण से भैया दिन और रात शाम के वक्त दोनों मौजूद होते हैं विपरीत चीजें
03:20:28:14 नहीं दिन और रात तो वो तो एक उसको नाम दिया गया कि इस स्थिति को क्या कहते हैं? को संध्या बोल देंगे आप लेकिन वो नहीं कहलाएगा। दिन और रात तो कह ही नहीं सकते। रात तो तभी है जब दिन नहीं है। हम तो मतलब ये तो एक समय में होता ही नहीं है ना दिन और रात। तो वो मतलब उदाहरण उतना सटीक नहीं बैठेगा। तो अंधकार और प्रकाश वाला ही मामला हो गया। हां मामला हो जाएगा। एक समय में नहीं। तो ये जो बात है ना जो हमने कुछ समय पहले अवतारवाद की तरफ विषय हमारा आ रहा था वो अभिनेता का हमने उदाहरण ले लिया था। तो वही बात ले लेते हैं यहां कि ये अवतारवाद के लिए नहीं हम कह रहे हैं अभी विद्या अविद्या दोनों एक साथ विद्या क्या है? मैं उन्मेश दोषी हूं और उस एक घंटे के लिए उस दो घंटे के लिए मैं स्वयं को रावण मानता हूं। तो यह हो गई अविद्या मतलब मेरा जो मूल स्वरूप है उस स्वरूप को उस स्वरूप को मैं भुला रहा हूं जानबूझ करके ही सही जैसे कैसे भी तो उस एक ही समय में मैं उनकी तो हूं ही मुझे मालूम है कि मैं कौन हूं इसलिए तो मैं भूमिका कर रहा हूं लेकिन उस समय क्या है मैं ही स्वयं को रावण नहीं मान रहा हूं तो ये हो गया विद्या अविद्या का एक साथ होना इसका एक और दे देता हूं मैं जादूगर का
03:21:43:15 एग्जांपल ले लेते हैं जैसे जैसे जादूगर जब जादू दिखाता है तो वो अविद्या होती है। लेकिन जादूगर का अपने ही बनाए हुए जादू द्वारा प्रभावित ना होना वो विद्या है। और विद्या दोनों एक साथ कर रही है। जी और एक एग्जांपल मैं इसमें जो इस तर्क से तो इस तर्क से तो अगर आप इस तर्क से करेंगे तो भगवान जितने भी प्राणी है वो सब ईश्वर सिद्ध होंगे। तो नहीं तो
03:22:17:03 ब्रह्म है बिल्कुल बिल्कुल जितने भी प्राणी है सब ब्रह्म स्वरूप है लेकिन ईश्वर सिद्ध इसलिए नहीं होंगे क्योंकि फिर वहां क्योंकि वो उसी वो वो वो इस समय जादूगर नहीं बने हैं वो वो दृष्टा बने हैं जो जादूगर जादू कर रहा है और अपने आप को वो दृष्टा समझ रहे हैं उसका मतलब वो जादू देख के उस जादू क्या बात है बहुत बढ़िया ये भी बहुत अच्छा है बहुत अच्छा बहुत तो चलिए इसका एक एक बहुत वैसा सा उदाहरण मैं दे देता हूं। शिवशु जी मैं एक दो उदाहरण लेने वाला था। क्या पहले दे दूं? आप दे दीजिए आप। हां। तो बाद में पंडित जी आपने जो बोला ना मेरा थोड़ा अभी नेटवर्क चला गया था। बाद में आप कह दीजिए आपने क्या बोला? जी आपने तो ये वाला तो बहुत ध्वस्त कर दिया। ये वाला कह के वो नारायण। चलिए पंडित जी आप अभी कह दीजिए। मतलब अभी विषय पूरा मैं सुन नहीं पाया था। मैं मैं ये कह रहा था जैसे मैंने जादूगर का एग्जांपल दिया था तो जब आप बता रहे थे वो अभिनेता वाला एग्जांपल दे रहे थे ना तो मैंने ये कहा था कि जैसे जादूगर अपना जादू दिखाता है ठीक है तो वो वो जो जादू है वो तो अविद्या ही है एक्सिस्ट नहीं मतलब वो जादू ही लेकिन जादूगर का उस जादू
03:23:32:07 से प्रभावित ना होना ही वो विद्या है। सही बात तो तो इस पे उन्होंने तर्क किया था तो ऐसे तो फिर सारे ही अपने आप को ईश्वर समझ बैठेंगे तो मैंने इसका उत्तर दिया कि बिल्कुल सभी के सभी लोग ब्रह्म है। ठीक है? लेकिन जब वो ब्रह्म माया में आता है तो ईश्वर कहलाता है। तो लेकिन वो ईश्वर इसलिए नहीं कहलाएंगे क्योंकि वो इस समय उस वो जादूगर नहीं बने हैं। वो उस जादूगर के द्वारा बनाए हुए जो जो जादू कर रहा है उसका दृष्टा बने हुए हैं। जी जी सही सही बात। इसलिए वो अपने को ईश्वर मैं इसको मैं इसको उन्मेश जी वाले उदाहरण से मिलाते हुए आपकी बात को पंडित जी की बात को बताऊं। जैसे उन्मेश जी ने कहा कि कोई व्यक्ति अभिनेता बनता है। तो वह जानता है कि मैं अभिनेता मैं रोल करने आया हूं। फिर भी वो उन क्षणों में अपने उसी उसी मस्तिष्क में ये भी फील करता है कि मैं रावण हूं। मैं फलाना हूं। उसी मस्तिष्क में जिस मस्तिष्क से वो ये जानता है कि मैं वास्तविकता में कौन हूं। अगर वो फील नहीं करेगा तो एक्टिंग नहीं करेगा। ना तो दोनों चीजें वो फील वो फील करता है। रावण को भी फील करता है उस समय। ठीक है? तो अब जब ये दोनों चीजें फील करने वाली बात आती है तो फिर ये होता है कि इस इस तरीके से तो जो ईश्वर है और जो जीव है
03:24:47:08 वो फिर प्रत्येक जीव कहेगा कि भाई मैं मैं भी ऐसे ही कर रहा हूं। है ना? केवल यही बात तो है। तो फिर अंतर क्या रह गया? जब रोल प्ले करने वाली केवल बात है। तो हम तो अंतर ये रह गया कि जब ये क्या कहते हैं? जब ईश्वर अपना अवतार लेता है तो वो ईश्वर का रोल करता है। ईश्वर का ही रोल करता है। मगर जब ईश्वर ये जीवों के रूप में है तब वो बद्ध का यानी ईश्वर जब ईश्वर के रूप में मुक्त का रोल करता है और जीव के रूप में बद्ध का रोल करते हैं। इसलिए वो जीव जो है पूजनीय नहीं है। वो ईश्वर नहीं है। जी सही। वो क्योंकि वो प्राणी के रूप में जीव के रूप में बद्ध का रोल प्ले कर रहा है। ठीक है। पहली बात तो ये हो गई। अब आप दूसरी कोई बात उदाहरण देने वाले थे वह बता दीजिए। हां जी जो हमारे विजयनगर साम्राज्य के जो संस्थापक थे ना माधवाचार्य जी तत्कालीन शंकराचार्य जी विद्यारण्य स्वामी जी तो उनका ग्रंथ है पंचदशी नाम से बहुत बड़ा ग्रंथ है प्रकरण ग्रंथ है अद्वैत वेदांत का तो उसमें छठा प्रकरण आ जाता है उसमें कुल 15 प्रकरण है तो उसमें जो छठा प्रकरण है चित्रदीप प्रकरण नाम से तो उसमें पहले पहले श्लोकों में चित्रदीप प्रकरण में जो ड्राइंग
03:26:02:09 करने वाला कैनवास होता है ना कागज मान के चलो या कोई तो वस्त्र होता है तो उसका उदाहरण उन्होंने दिया है उस वस्त्र के ऊपर सूरज जो हम बचपन में चित्र निकालते थे सभी पर्वत निकालेंगे नदी निकालेंगे सूरज निकालेंगे तो वो चित्र किसी हमारे घर के बालक ने बनाया तो वो हमारे पास दिखाने के लिए आ जाता है देखो मैंने कितना अच्छा चित्र बनाया है तो हम उस चित्र की वहां स्तुति कर देते हैं बहुत अच्छा सूर्य बनाया तुमने पिछले बार जैसा बनाया था ना उसके उससे भी अच्छा बनाया है तो यदि हम उसे ये कह देंगे अरे क्या है ये तो वस्त्र दिखा रहे हो तुम मुझे और ये तो रंग है तो वो वो मतलब निराश हो जाएगा चला जाएगा बेचारा बेचारा बच्चा तो उस समय हमें क्या करना होता है हम यद्यपि जानते वो बच्चा भी जानता है यद्यपि हम जानते हैं कि वो वस्त्र है और वो रंग है वहां सूर्य जैसा कुछ है ही नहीं फिर भी हम अपने आप के ऊपर यह प्रभाव डालते हैं या वो लदवाते हैं कि वो सूर्य ही है ऐसा होना चाहिए ऐसा नहीं होना चाहिए और उसको साथ लेकर के हम बोलते हैं कि सूर्य सूर्य अच्छा बना। सूर्य अच्छा नहीं बना। तो ये हो गई विद्या अविद्या एक साथ। एक दूसरा उदाहरण जो समुंदर है पूरा का पूरा और उस समुंदर में से कोई एक पानी का बूंद उछला ऊपर
03:27:17:10 10 सेकंड उसने ऐसा प्रवास किया और फिर समुंदर में समा गया। तो ये जो है बात उछलने से पहले वो कहां था? नहीं था क्या वो? अवश्य था। हां। लेकिन वो बूंद के रूप में नहीं था। समुंदर के रूप में था। लेकिन था अवश्य। आ गया और फिर से डूब गया। समुंदर में विलीन हो गया। एक्सजेक्टली ये एग्जांपल नहीं है लेकिन थोड़ा सा मैच करेगा इसलिए मैंने लिया है। तो वो जो है ये जन्मा और जन्मा वाले के लिए फिट है ये। हां वो फिट है ये वाला। लेकिन इसमें से ये जो बात थी ना कि वो तो ऐसे तो सभी ईश्वर हो जाएंगे। तो इसके ऊपर मैं थोड़ा सा लेना चाहता हूं एक उदाहरण था। तो वो जो उसका प्राकट्य हुआ समंदर से तो वो उसकी उत्पत्ति नहीं है। उसको उत्पत्ति का अर्थ पहले ना होना। पहले से था। किस रूप में था अलग बात लेकिन पहले से था लेकिन एक मिनट पूरा कर लूं तो ये ऊपर आ गया तो वो उसका जो हमारी बहुत देर पहले चर्चा हुई तो उसे उसी को ही जन्म कहते हैं प्राकट्य को ही और बाद में फिर से समुंदर में चला जाएगा उसे ही विलिनीकरण कहेंगे व्यावहारिक रूप से उसे मृत्यु कहेंगे तो जो बीच का जो उसका प्रवास है 10 सेकंड का 15 सेकंड का बिंदु के रूप में बूंद के रूप में तो वो अभी जीव है और समुंदर है परमात्मा ईश्वर तो वो जो जीव है तो अपने आप को वो ईश्वर क्यों नहीं कहलाएगा अपने आप को या सही
03:28:32:19 हमारी चर्चा में वो ईश्वर क्यों कहेंगे उसे क्योंकि यदि उसने उस 10 सेकंड्स में अपने आप को ईश्वर ही स्थापित करने का प्रयास किया हां वो अलग बात कि मेरा मूल स्वरूप ईश्वर है समुद्र है मुझे उसे पाना है अलग बात लेकिन मैं ही ईश्वर हूं जो तात्विक रूप से है परंतु उसने अपने आप को बूंद समझते हुए यदि ये बात कह डाली मैं ईश्वर हूं तो वो उसका उसका ईगो कहलाता है। अहंकार कहलाता है। कहलाता है। व्यवहार के रूप में जिसे हम ईगो कहते हैं। मैं अहंकार शब्द का प्रयोग नहीं करूंगा क्योंकि वो थोड़ा सा अलग अर्थ हो जाता है। जिसे हम ईगो के रूप में जानते हैं। ये ईगो आ जाएगा। यदि उसने किस उससे किसने पूछा कि अच्छा तुम ईश्वर हो क्या? तो लाओ फिर सुनामी। तो उस बूंद में यद्यपि तात्विक रूप से समुद्र समुद्र ही है। उस बूंद में सुनामी लाने का सामर्थ्य नहीं है क्योंकि वो अपने आप को बूंद मान रहा है। अपने आप को बद्ध मान रहा है। तो ये बात आ जाती है जो आपने कहा ना पंडित जी और शिवा जी आपने जो ये किया उसका विस्तार तो इसलिए वो सब के सब ईश्वर नहीं हो जाएंगे। ऐसी बात मैं अब मैं इसमें एक उदाहरण और दे दूं। उसके बाद इस चर्चा को विराम करेंगे। विराम करते हैं। एक उदाहरण लेकर मैं इसको रोकूंगा। जी विश्वजीत जी आप बोल रहे
03:29:47:20 महाभारत से जैसे भगवान कृष्ण रथ का पहिया उठा लेते हैं। जबकि वह पहले ही सबको मार चुके थे या फिर कुछ भी कर सकते थे तो क्या जरूरत था पहिया उठाने का तो ये भी एग्जांपल हो सकता है। किस रूप में कि माया और माया और ये विद्या और अविद्या एक साथ कैसे इस रूप में? हां मतलब जैसे कि भगवान को तो रथ का पहिया उठाने का जरूरत नहीं था। नहीं यह तो आवश्यकता वाली बात आ गई। आवश्यकता वाली आ गई। हां ये तो आवश्यकता है ना वो आवश्यकता को हमने खंडित किया है। चलिए मैं उसमें बात करूंगा। मैं एक उदाहरण दे दूं छोटा सा कि दो विपरीतार्थक स्थितियां एक ही समय एक ही तत्व में कैसे विराजमान रह सकती हैं? और इसमें उसका भी आंसर मिल जाएगा जो आर्य समाज की ओर से मैंने देखा था कि एक तर्क दिया जाता है जिसमें कहा जाता है कि अगर एक ही तत्व है, एक ही आत्मा है। है ना? तो क्या कहते हैं ये जब एक को मुक्ति मिले तो सबको मुक्ति मिल जाए। एक को सुख और दूसरे को दुख कैसे हो रहा है? जब एक ही जीव है तो है ना? वही वाली बात कि दो विपरीतार्थक चीजें एक साथ कैसे हैं? तो उस पर मैं बोल दूं जरा
03:30:56:16 जब हम अब यहां से देखिए सांसारिक दृष्टि से हम मुक्त हैं। ठीक है? सांसारिक दृष्टि से हम मुक्त हैं। और हमने मुक्त होते हुए हम बैठे भगवान के नाम का जाप करने। हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे। ठीक है? तो अब क्या है? जब हमने जाप करना शुरू किया तो हम हमारी जो जीवा है उससे हम बोल रहे हैं हरे कृष्णा हरे कृष्ण कृष्ण कृष्णा हरे हरे हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे यानी यानी हमारी एक कॉन्शियसनेस जो है यानी हमारी जो एक कॉन्शियसनेस है वो किस किस काम में अब लग गई है हरे कृष्णा हरे कृष्णा कृष्णा कृष्णा हरे हरे हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे ठीक है हम इसी समय जो हमारी संसार के नजरिए से जो मुक्त कॉन्शियसनेस है वो वो भ्रमण करती है। करती है ना वो क्या करती है कि ये ये है ये वो है ये वो है। एक ही समय में वो हरे कृष्ण का जाप करने के लिए बंधन में है। हम और उसी समय में वो पूरे संसार के बारे में विचार कर लेने के लिए भी मुक्त है। बिल्कुल है ना? जी। ठीक है। बंधन है वहां। वो हरे कृष्ण के लिए
03:32:11:20 तू जपते जाना है तुझे। जब तक कमांड नहीं मिलेगा। मुक्त का कमांड नहीं मिलेगा जब तक तब तक तुझे जपते जाना है। हरे कृष्ण का जाप करते हुए भी वो मुक्त भी है और वो बद्ध भी है। और सुनिए एक ही समय में अलग-अलग फीलिंग अब वो जो अब वो जो बद्ध है हरे कृष्ण जाप में जो लिप्त हो चुकी है जो उसी कॉन्शियसनेस का एक रूप ठीक है और एक रूप ये हो गया जो स्वतंत्र पूरे संसार में भ्रमण कर रहा है जो ये भी जानता है कि मैं ही हूं जो वहां जाप कर रहा हूं और एक वहां पे वो बद्ध हो गया जिसको जाप करना ही है करते जाना है करते जाना है उस दृष्टिकोण से वो बंधन ही तो है कि आसन पर बैठ के करते जाना जाओ। ठीक है? उसी समय एक मच्छर भी बैठता है आपके शरीर पर जो आपको काटता है। तो आपके हाथ को एक कमांड जाती है और पट्ट से उसको मार देता है। अब ये जो हाथ का कमांड है यह आपका बद्ध ही तो है उसको मारने के लिए। जबकि आप मुक्त हो पूरे संसार के बारे में सोचने के लिए। तो एक ही समय में तीन यहां पर हमने चेतनाएं प्राप्त कर ली। कौन-कौन सी? एक जो हरे कृष्ण का जाप करने के लिए बद्ध है। एक जो मच्छर को मारने के लिए बद्ध
03:33:26:28 है। और एक जो स्वतंत्र है जो जानती है कि मैं मैं ही हूं जो मच्छर को मार रही हूं। मैं ही हूं जो हरे कृष्ण का जाप कर रही हूं। मैं ही हूं जो पूरे संसार में भ्रमण कर रही हूं। ठीक है? और उसको बार-बार कमांड भी नहीं देना पड़ रहा है हरे कृष्ण का जाप करने के लिए। तो एक ही समय में यहां हमने जब हमारी चेतना का स्तर इतना निम्न है। अभी प्रज्ञा शक्ति का स्तर इतना निम्न है। अभी तो एक ही समय में जब हमने तीन और मैं सोच रहा हूं कि अभी हम उदाहरण देने पर आएंगे तो मुझे लगता है 50 तो निकाल ही लेंगे एक ही समय पे। है ना? 50 तो निकाल ही लेंगे। तो एक ही समय पे जब हम जैसे निकृष्ट प्रज्ञा शक्ति वाले 50 ऐसे दृश्य दिखा 50 अस्तित्व मान सकते हैं अलग-अलग फीलिंग्स के है ना अलग-अलग फीलिंग्स के 50 वो निकाल सकते हैं तो सोचिए प्रज्ञा शक्ति का स्तर जिसका अपरंपार होगा अनंत होगा वो कितने फील एक साथ में कर ले सकता है विपरीतार्थक एक ही समय में तो विद्या और अविद्या एक साथ रह सकती है। अविद्या भाव पदार्थ नहीं है। और एक ही समय में दो विपरीत आर्थक चीज़ें घटित हो सकती हैं। और हम
03:34:42:07 जो एक ये जो चीज है ना कि जो स्वरूप से तत्व से एक ही है जीव और ब्रह्म। इसमें जीव के अंदर जो सच्चिदानंद की चाह आ रही है। ठीक है? वो ही यह सिद्ध कर रही है कि तू सच्चिदानंद है। वो चाह आ कैसे गई उसके अंदर? जब उसने रस्सी को सांप समझा जब उसने रस्सी को सांप समझा उसने समझ लिया सांप है तो उसके अंदर जीवित रहने की चाह कैसे आ गई? सत स्वरूप में रहने की चाह कैसे आ गई? उसी से सिद्ध हो गया कि वो सत स्वरूप ही है। इसीलिए उसके अंदर वो चाह विद्यमान है। जैसे कि वो आपने एक उदाहरण दिया था ना कि जादूगर जादू दिखाता है। अभिनय अभिनय अभिनय करने वाला अभिनय करता है। तो एक होता है जो ये जानता है कि अभिनय है। मगर मैं अभिनय कर रहा हूं। ठीक है? और एक होता है जो दर्शक होता है जो देखता है कि ये जादू है। ये अभिनय है और वो उसका मजा लेता है। ठीक है? भैया एक सवाल पूछना चाहूंगा इस जादूगर। अगर उसी मगर उसी समय मगर उसी समय जो दृष्टा के रूप में जो देख रहा है जो प्रभावित हो रहा है उसी समय वो ये जानता भी होता है कि मैं वास्तविकता में कौन हूं। जी तभी तो वो उसका आनंद ले रहा है।
03:35:57:13 हां बस ये है कि ये जो सच्चिदानंद का जो कनेक्शन है ये जो भाई भाई देखो मेरे अंदर भी चाह विद्यमान है। इससे इससे पता चल गया कि अंदर से मैं भी जानता हूं। हम सच्चिदानंद की चाह विद्यमान होने से यह भी हो गया कि मैं भी जानता हूं कि मैं कौन हूं। ठीक है। मगर मैं इसको कनेक्ट नहीं कर पा रहा हूं। तो इस कनेक्शन को कनेक्ट करने वाला अवतार है। ईश्वर है। भगवान का स्वरूप है। सगुण साकार जो इस कनेक्शन से कनेक्ट है। और इस कनेक्शन से जो कनेक्ट नहीं मैं जान नहीं पा रहा हूं। मेरे अंदर की जो चाह है यही बता रही है कि मैं ये हूं मैं वो हूं। ठीक है? तो ये जो प्रत्यक्ष रूप से मैं फील नहीं कर पा रहा हूं। ये प्रातिभाषिक अनुमान को शब्द प्रमाण को उसके कारण मैं बद्ध हूं। जी विश्वजीत जी हां अब ये करते हैं कि एक जो बात आती है ना ईश्वर यदि ईश्वर एक मिनट यदि ईश्वर सब कुछ कर सकता है तो क्या वो दो और दो को पांच बना सकता है क्या वो ऐसा पत्थर बना सकता है जिसको वो स्वयं ना उठा सके क्या वो मतलब ऐसी बंद्या पुत्र को जन्म दे सकता है ना इलॉजिकल वो लॉजिकल फैलेसी कहते हैं क्या कहते हैं इसको ऐसा कुछ कहते हैं ना हां इस
03:37:12:21 पर हम लोग अगली चर्चा रखेंगे। यदि ईश्वर सब कुछ कर सकता है तो ऐसासा विश्वजीत और फिर इसको विराम पूछ लीजिए जो जादूगर वाला एग्जांपल दिए वो तो दृष्टा की दृष्टि से सिद्ध होता है कि विद्या और विद्या एक साथ मौजूद है। परंतु अगर जादूगर की नजर से देखें तो वह तो विद्यावान ही हुआ ना क्योंकि उसे सब ज्ञात है पहले से। नहीं मगर जादू के रूप में वह जादू जिस समय दिखा रहा है तो उसकी एक चेतना जान रही जान रही है ना कि जादू हो रहा है भैया वो जादू उसको पता है कि जादू नहीं कर रहा हूं मैं वो तो दृष्टा ऐसे मूर्ख बन रहे है उसको जादू समझ के एक्चुअली में वो जादू हो ही नहीं रहा है मैं आपको मैं आपको बताऊं ऐसे है जैसे कि इसको अभिनय वाले में ले लीजिए तो ज्यादा अच्छे से समझ पाएंगे अभिनय करने वाले से उससे समझ लीजिए जादू वाले को छोड़ अभिनय में भी देख लीजिए कोई भी एक्टर अभिनय करता है जैसे मान लीजिए शाहरुख खान है उसको तो अभिनय करते वक्त भी ये ज्ञान है कि वो शाहरुख खान तो मैं मैं वही कह रहा हूं। मैं उसको आपको अंतर दे रहा हूं। मालूम है। फिर भी उसी समय पे यदि वो ये नहीं समझेगा कि शाहरुख खान है तो वो एक्टिंग नहीं कर पाएगा शाहरुख खान की। हां तब वो रोएगा नहीं। हां। उसको ये समझना
03:38:28:00 पड़ेगा वहां पर कि वो अह वो फलाना कैरेक्टर भी है किसी फिल्म का। बिलकुल। ठीक है? उतनी चेतना शक्ति वहां पे उसकी बाधित वो उसमें आएगी उस प्रभाव में कि वो और एक ही समय में उसको मालूम है मैं शाहरुख हूं। उसको मालूम है मैं अजय देवगन हूं। मगर उसी समय में उसकी वो चेतना एक आएगी जिसमें कि नहीं मैं अजय देवगन क्या कहते हैं? नहीं हूं। मैं ये हूं। मैं दृश्यम का वो मैं दृश्यम का चौथी क्लास फेल हूं। आप क्या विश्व जी आप आप एक दर्शक का एग्जांपल ले लीजिए यहां पर। एक दर्शक जब मूवी देखने जाता है हॉल में मान लीजिए बहुत ही ज्यादा सैड मूवी है वो ठीक है तो उसे पता है कि ये पिक्चर चल रही है या हॉरर मूवी है उसे पता है पिक्चर चल रही है लेकिन फिर भी डरता है फिर भी कोई सैड सीन आता है तो उसमें रोने लगता है आंख में आंसू आते हैं उसे पता है ये बात कि पिक्चर एक्टिंग है यार कुछ नहीं है फिर भी लेकिन फिर भी करना है बस बस ये जो अमाउंट है ना ये जो अमाउंट है समझने और ना समझने वाला ये अमाउंट कम ज्यादा होता है हां जैसे कोई कोई कोई फिल्म में इतना ज्यादा खो जाता है कि वो बहुत ज्यादा उसको वो जानता है कि मैं सच्चिदानंद हूं। यानी इस फिल्म से मुक्त हूं मैं। फिल्म
03:39:43:10 के दृष्टिकोण से मैं मुक्त हूं। मगर फिर भी वो वहां रोने भी लगेगा, इमोशनल भी हो जाएगा और कहीं-कहीं पे किसी की एक्टिंग इतनी बेकार होती है। क्यों? क्योंकि वो अपने कररेक्टर में डूब नहीं पाता। होती है। कहीं-कहीं पे एक्टिंग इतनी लूज होती है कि सामने वाला वो कनेक्ट ना हो पाए। तुमसे प्रभावित ना हो पाए। तो यानी कि वहां पर तुम वहां पर तुमने एक्टिंग जबरदस्त नहीं की है। अपने कररेक्टर में तुम डूबे नहीं। तुम अलाउद्दीन खिलजी बनते समय राक्षस नहीं बने। हम और कहीं-कहीं पे व्यक्ति इतना स्मार्ट होता है कि वो जो है आपसे कनेक्ट नहीं होता। आप कितनी भी अच्छी एक्टिंग कर लो वो आराम से चला आएगा बाहर। अरे बकवास मूवी थी। है ना? उस टाइम दृष्टा के पास रहते हैं भैया। बकवास मूवी थी। नहीं नहीं तो फिर तीन तरह के तो इसमें तीन तरह के आपके सिनेरियो हो जाएंगे। एक तो वो होगा जो बिल्कुल भी प्रभावित नहीं हो रहा। बोर हो रहा है। एक होगा जो प्रभावित हो रहा है लेकिन मूवी थिएटर से बाहर निकलते ही नॉर्मल हो गया। ठीक है। बाकी ये जो उदाहरण दिए गए हैं इनका स्पष्टीकरण में थोड़ा सा स्तर कम ज्यादा हो सकता है। हां है ना? सभी उदाहरण काम के हैं। मगर वो वो एक बहुत प्रत्यक्ष उदाहरण अभी मैंने बताया नाम जप वाला। वो अनुभव मुझे होता है। तो इसलिए मैंने बताया। जी। और एक एक अंतिम जो बता देता हूं जो आजकल
03:40:58:24 हम सभी लोग हैं माया की दृष्टि से। ठीक है? कि हम मूवी देख के इतने उससे प्रभावित हो जाते हैं कि हम सच ही मान बैठते हैं। ठीक है? और कई लोग तो फिर उसके उस मूवी के चक्कर में कई लोग तो सच मान के बैठ गए कि अरे एक्टर मर गया, एक्ट्रेस बन गए तो लोग अपने आप को भी हर्ट करने लगते हैं। अपने आप को भी लगता है कि नहीं नहीं क्योंकि सच में हो रहा है ऐसा। तो वो बिल्कुल एकदम माया में ग्रसित होने वाला है। इसको जन्म लेने पड़ेंगे अभी कई बार समझने के लिए कि हां ठीक है ये। तो हम लोग जो यह बात कर रहे थे ना एक समय में दो विपरीतार्थक चीजें एक ही जगह पर कैसे हो सकती हैं? तो जो हमारी जो चेतना है जो ब्रह्म की जो चेतना है वो इतनी शक्तिशाली है कि उसमें ना जाने कितनी फीलिंग्स एक साथ विपरीतार्थक हो सकती हैं। इसमें कोई डाउट नहीं है क्योंकि हम एक ही समय में जब हम जैसे निकृष्ट लोगों की चेतना जो है एक ही समय में दो तीन तरह की फीलिंग तो अभी मैंने गिना दी हम लोग जब करने बैठेंगे तो बहुत सारी फीलिंग्स आ जाएंगी। ठीक है? तो आज को इसको विराम देते हैं और अगली बार हम लोग चर्चा रखेंगे कि भाई वो दो और दो पांच कैसे आप लोग कमर कस के आए जो ईश्वर सब कुछ कर सकता है क्योंकि सामने आर्य समाजी तो नहीं मिलेंगे मगर मैं जरूर मिलूंगा तो भैया विराम गर्व की बात कि सामने आप हैं। आर्य समाजी के सामने रहेंगे तो गर्व
03:42:13:25 महसूस नहीं होगा हम लोगों को कि अपोनेंट में कौन है वह भी मैटर करता है चलिए बहुत बहुत करता हूं आज बहुत हां बहुत बढ़िया जी भैया हर तरह से हमने कोशिश किया है लेने का है ना जी ठीक है फिर भगवान का एक मिनट नाम लेके फिर इसको क्लोज करते हैं ठीक है जी जी बिल्कुल बिल्कुल भैया हरि ओम तत्सत श्रीमते रामचंद्राय नमः ओम नमः परमहंसा स्वादित चरण कमल चंदाय भक्त जनमान मानस निवासाय श्री रामचंद्राय श्री राम जय राम जय जय राम श्री राम जय राम जय जय राम श्री राम जय राम जय जय राम श्री राम जय राम जय जय राम श्री राम जय राम जय जय राम श्री राम जय राम जय जय राम धर्म की जय हो धर्म का प्राणियों में हो विश्व का कल्याण हो गौ माता की जय हो हत्या बंद हो भारत अखंड हो भारत हर
03:43:29:15 हिंदू सेना हर हिंदू सनातन सनातन हम भारत भव्य बनाएंगे हम हिंदू राष्ट्र बनाएंगे हम भारत भव्य बनाएंगे भगवत पूज्य पाद धर्म सम्राट स्वामी श्री कृपात्री जी महाराज की जय जय हो स्मरणीय भगवत पूज्य पाद अनंतानंद श्री समलंकृत ऋग्वेदीय पूर्वानाय श्री गोवर्धन पुरी पीठाधीश्वर अनंत श्री विभूषित श्रीमद जगतुगुरु शंकराचार्य गुरुदेव भगवान की जय जय नमः पार्वती हरव
03:44:08:16 चलिए सभी को जय श्री राम। जय श्री राम। जय श्री राम। जय श्री राम। [संगीत]
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साकार और निराकार ईश्वर की अवधारणा पर चर्चा #iskcon #aryasamaj #satlokashram
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