⬜ Not used yet · 00:00:07:13 – 00:33:15:00 (33:08)
00:00:07:13 इसमें जो टॉपिक रह रहे हैं हमारे सिद्धांतिक चर्चा के एक तो हम उस पे चर्चा कर रहे थे परंपरा पे तो परंपरा वाला टॉपिक छूटा था। परंपरा वाला टॉपिक में वो तुमने वशिष्ठ को नहीं माना। मैंने जो है फिर तुमको ये पूछा है कि भाई ऐसे अच्छा परंपरा वाले विषय में थोड़ी सी मैं क्लेरिटी चाहता हूं आपसे। हम्म कि जैसे आप जैसे जैसे तुम ऐसे ऋषियों पर आपत्ति उठा रहे हो जिनकी आयु जो है 1 लाख वर्ष थी या इतने हजार वर्ष थी तो मैं ऐसे ऋषियों पे आपत्ति उठा रहा हूं जिनके अंतःकरण में वेद प्रकट हुआ ऐसा शरीर आज दिखा दो कहां है नहीं जिसमें वेद प्रकट होता है मैंने तो आपको उसका सारा उत्तर उत्तर दे दिया था रिकॉर्डिंग में सुन लीजिएगा नहीं मैंने सुना था मैंने सुना था उसमें तुमने कहा है उसमें तुमने हमको यह कहा है अनुमान प्रमाण से क्योंकि हमें धर्म प्राप्त है तो वहां पर धर्म प्राप्त होना सिद्ध हो रहा है मगर वो वो अंतःकरण में आकर के प्राप्त होना सिद्ध नहीं हो रहा। नहीं वो तो हम मन में अपने विचार करते हैं कि नहीं करते? नहीं मैं ये कह रहा हूं वो हमें धर्म हमारे पास आज की तारीख में है। इससे यह सिद्ध हुआ कि ईश्वर ने ही धर्म दिया। मगर माध्यम अंतःकरण में था। ये थोड़ी ना है। हो सकता है आंखों से आंखों से कुछ उसने लिख के बताया हो तो उन्होंने देखा। इसका इसका इसका भी उत्तर है। इसका उत्तर है। इसका उत्तर है। अगर आप कहोगे मुंह से बोल के बताया। हम ठीक है तो खैर मैं
00:01:22:14 ये ये जो मूल विषय ये घुसेगा सर्वशक्तिमान वाले में घुसेगा तो मैं इसका उत्तर आपको दूंगा आगे [गला साफ़ करने की आवाज़] लेकिन जब ये सर्वशक्तिमान वाला विषय आएगा तो मैं वहां पर आपको इस चीज को क्लेरिटी दे दूंगा लेकिन जो अंतकरण वाला था अंतकरण में कैसे हुआ इसका मैंने आपको अनुमान प्रमाण से सिद्ध किया था अंतकरण से ये अनुमान प्रमाण से यह सिद्ध है कि भाई धर्म उसी से मिला ईश्वर से ये सिद्ध है जो प्रक्रिया आप बता रहे हो वो चमत्कारिक है ना चमत्कारी को तो फिर उसका प्रत्यक्ष प्रमाण दिखाओ [हंसी] और ना ही आपने बच्चे का प्रत्यक्ष प्रमाण दिया कि बिना मां के बच्चा कहां जन्म ले रहा है आज? कोई बात नहीं। चलिए आपने दिए थे इसके जवाब आपने मगर वो संतुष्टिजनक नहीं दिए थे। बिना मां के मनुष्य जन्म नहीं ले रहा है आज की तारीख में। देखिए उसमें बात ये आ जाती है ना कि जब तीन प्रमाण समझने पड़ते हैं। अब अनुमान प्रमाण आप नहीं समझे तो फिर उसमें थोड़ा सा एक इशू होता है। बाकी रिकॉर्डिंग आप फिर से सुनेंगे ना। हनुमान प्रमाण से हमने हनुमान प्रमाण से हमने अगर हनुमान प्रमाण की बात आएगी तो हनुमान से तो हमने सर्वशक्तिमान भी सिद्ध किया है ना। कहां से सर्वशक्तिमान शब्द वो तो सच्चिदानंद सिद्ध हो रहा है। सर्वशक्तिमान कहां सिद्ध हो रहा है? सच्चिदानंद का जो सच्चिदानंद जहां से वो सिद्ध हो रहा है उसका जो व्यवहारिक रूप है वो तो वही है ना सब कुछ कर सकने वाला। ये जो सब कुछ कर सकने वाला देखिए ईश्वर की सिद्धि किस चाह से हो रही है? मौलिक चाह
00:02:37:15 से। वो मौलिक चाह पता कैसे चल रही है कि मौलिक चाह है। उसका अवतार क्या है? एग्जीक्यूशन कैसे हो रहा है? हां। व्यवहार में हमें कैसे पता चल रहा है कि मूल में यह चाह है? यह तो जब हम अपने अंदर एनालाइज करेंगे उसी से पता चलेगा ना। हमारे व्यवहार से पता चल रहा है ना। हमें डर लग रहा है हम भाग रहे हैं। तो ये व्यवहार आ गया। तो वो जो जो इच्छाओं का मौलिक स्वरूप है सच्चिदानंद उसका अवतार हो गया कि हम भाग रहे हैं। हम जो है ये चाह रहे हैं वो चाह रहे हैं। उसका प्रकटीकरण ये हो गया। हां। तो बस ऐसे ही जब जैसे वो जो मौलिक चाह है उसका प्रकटीकरण ये है ऐसे ही उस चाह का मैं थोड़ा सा ओवरव्यू उसमें दे देता हूं एक एक मिनट जैसे वो जो मौलिक चाह है सच्चिदानंद की मौलिक चाह उसका प्रकटीकरण इसमें हो गया वैसे ही उस मौलिक चाह का जो मौलिक निवारण है सच्चिदानंद स्वरूप परमेश्वर उसका प्रकटीकरण इसमें हो गया व्यवहार क्या हो गया क्या हो गया जैसे अवतार लेना जैसे मौलिक जैसे हमारे जैसे प्रकटीकरण से हमारी उस तर्क से तो आप सर्वशक्तिमान की सिद्धि करें। अवतार बीच में कहां से आ गया? सर्वशक्तिमान है सब कुछ कर सकने वाला ये आगे तो ना जब वो पहले सिद्ध हो जाएगा तब तो उसे अवतार पे आएंगे ना। अभी तो आप अवतार पे बात
00:03:52:19 अभी तो आप सर्वशक्तिमान पे बात कर रहे हैं तो आप अवतार पे चले। सर्वशक्तिमान इसीलिए तो नहीं सिद्ध होता है कि तुम अवतार पे बाधित कर देते हो उसे। इसमें इसमें लंबी चर्चा जाएगी। मैं इसमें ओवरव्यू दे रहा हूं मैं कि एक तो यह हमारा इसमें था जो मैंने अभी बोला ना परंपरा वाला तो परंपरा वाले में जो आप वशिष्ठ जी की लंबी आयु कह रहे थे चलिए ठीक है अगर मैंने उसको मैंने उसमें बोला भी था कि दुर्जन तो उसने ऐसे अगर मैं मान लेता हूं कि वो जो परंपरा है वो ठीक चली आ रही है। ठीक है हम और जो शास्त्र है वो सारे उसी परंपरा से चले हैं और बाद में वो परंपराएं की बहुत सारी शाखाएं बनती चली गई विशिष्टा द्वैत द्वैत इत्यादि इत्यादि और सारे शास्त्र अलग-अलग पंडितों के माध्यम से हमें मिले हैं। ठीक है। अब इसमें बात यह आ जाती है कि लेकिन फिर यह आता है कि आपने हमसे परंपरा पूछी क्यों? तो जो मैं कारण समझ में आया आप मुझे करेक्ट कर दिए मैं गलत हूं। तो तो मैं जो कारण समझ पाया वो ये था कि आपका मूल चीज ये था कि भैया जितने भी शास्त्र है वो सारे परत प्रमाण है। वेद जो है वो स्वतः प्रमाण है। तो वेद का जो अर्थ होगा उस हिसाब से बाकी सारे शास्त्रों के अर्थ मानने पड़ेंगे उसे क्योंकि वेद के विरुद्ध नहीं हो सकते। और अर्थ जो आएगा वो परंपरा से ही मानना पड़ेगा। और जो हमने जो है वो अर्थ वेदों का अलग कर रखा है। आपने अलग कर रखा है। तो आप कह रहे हो कि भैया आपने अलग कैसे कर दिया? ये परंपरा के विरुद्ध होने से अमान्य है। ये मोटा-मोटा पॉइंट है। हां। अब इसमें पॉइंट ये है समझने वाला जो पॉइंट है कि जब आप
00:05:07:20 कह रहे हैं कि परंपरा से अर्थ आए हैं तो क्या आप ये कह रहे हैं कि ईश्वर ने जो वेद दिए थे उसी समय ईश्वर ने वेद का अर्थ भी जनाया था और वो अर्थ परंपरा से चले आ रहे हैं आज तक। क्या आप ये मानते हैं? बिल्कुल। हां तो मेरे पास इसका विरोध मैं प्रमाण में दे देता हूं। बता इसका आप खोलिए। निरुक्त एक 20 निरुक्त एक 20 इसमें लिखा हुआ है कि जो परंपरा से जो समाधि अवस्था में जो ऋषियों को अर्थ जाने थे ना वेदार्थ हम वो लोग लोगों को देते थे लेकिन लोगों की जो स्मृतियां है वो शीड होने लग गई तो फिर वो अर्थ जो है वो भूलने लग गए हम फिर ऋषियों ने वेदांगों की रचना की हम और वेदांगों में निरुक्त निघंटु और ये व्याकरण आदि जो है वेदांग इनकी उन्होंने रचना की और यानी जो फिर यह हुआ कि अब जो वेदों का अर्थ होगा वो वेदांगों के आधार पे होगा वेदांगों के आधार पे होगा मगर वह आधार भी तो उन्होंने ही दिया वो वो हमारे शब्द प्रमाण के विरुद्ध थोड़ी ना जाएगा नहीं उसमें आप समझिए इसमें पॉइंट क्या आता है हम हम हम जो अर्थ देते हैं उसमें वेदांगों का विरोध थोड़ी ना है और सुनो तो सुनो सुनो सुनो सुनो दिक्कत क्या है दिक्कत ये है कि अगर आप यह मानते हो कि आपका वेदांगों के अकॉर्डिंगली है उनका नहीं है तो फिर आपको यह मानना पड़ेगा कि ये लोग जो है ये आपसे झूठे आपको झूठ झूठ बोल
00:06:22:24 रहे हैं। कैसा झूठ? मन जो ये कि हम जो ये कह रहे हैं कि नहीं हमारा वेदांगों के साथ है। नहीं हमारा अर्थ वेदांग से ही है। तो आपको उन्हें झूठा सिद्ध करना झूठा मानना पड़ेगा। तो जब आप उनको झूठा मान लोगे तो आप उनसे द्वारा मिलने वाले मंत्रों को आप प्रामाणिक नहीं मान सकते। ये वही मंत्र है जो हम ईश्वर से लेके आए हैं। नहीं क्योंकि जरूरी नहीं है ना। जरूरी इसलिए नहीं है। इसलिए नहीं है मैं आपको बताता हूं। हम क्योंकि देखिए क्या है वेद जो चले आ रहे हैं वो तो हम मंत्रों को रटते आ रहे हैं। ठीक है? अब ऐसा हो रहा है कि मतलब वो तो परंपरा से चला आ रहा है जो वेद चला आ रहा है वो परंपरा लेकिन जो वेदार्थ है वो परंपरा से नहीं वेदार्थ नष्ट हो चुका है परंपरा से तो वेदार्थ करने के लिए जो रीति बताई गई है वो कही है वेदांग आप पढ़ो परंपरा से शास्त्र चले आ रहे हैं वेदांग जो शास्त्र है वो परंपरा से चले आ रहे हैं हम और उन शास्त्रों को जो है हम वो पढ़ेंगे परंपरा से और फिर उन शास्त्रों के द्वारा वेदांगों का अर्थ मतलब वेदों का अर्थ करेंगे हम मान लीजिए मैं पूरा बोल देता हूं मैं मैं थोड़ा सा पूरा बोल देता हूं मुझे निकलना भी है। जी जी। अब उसमें 10 पंडित है। 10 पंडितों ने वेदांग पढ़े हैं और वेदांग पढ़ पढ़ के अपने अपने वेदांगों के ज्ञान से अपना जो है उन्होंने अर्थ किए हैं। अब उसमें से हमें देखना पड़ेगा ना कि किसका जो है वेदांग अब उसमें विरोधाभास आ रहा है। तो हम तो चेक करेंगे किसका सही है किसने
00:07:37:27 क्या गलती क्योंकि मनुष्य मनुष्य गलती कर सकता है। है ना? तो उसमें किसने ऐसा तो नहीं किसी व्याकरण के नियम में उसने फलाना गलती कर दी, फलाना गलती कर दी। हम इत्यादि को चेक करना पड़ता है। हम अंतत यह जो है यह बात इसी पर आ जाएगी कि इस आर्य समाज का जो भाषा है वो स्वामी दयानंद जी का जो भाषा है वो वेदांगों के अनुकूल है या शणाचार्य जी का जो भाषा है वो वेदांगों के अनुकूल है वो इसी और इसकी जो जांच है वो व्याकरण के वो कर पाएंगे। ठीक है। अब यह बात हो गई तुम्हारी। पहली बात इसमें यह वाला वो है कमीज कि वहां पर जो बात हो रही है वो इस केस में हो रही है कि स्मृति क्षीण हो रही है। इसलिए ये वाला सहारा भी रख लो। है ना? मगर सहारा थोड़ी है। सुनो तो मेरी बात सुनो। मगर यह नहीं है कि अगर किसी को याद है तो उसका विरोध विरोध ही करो। याद कहां है? याद तो है नहीं ना। परंपरा से वो तो खत्म हो चुका है। नहीं खत्म। उन्होंने यह कहा था खत्म हो चुका है या स्मृति हो रही कहा था। स्मृतिश होने से जो अर्थ था वो लुप्त हो गया। लुप्त हो गया। रचना की खत्म हो गया। आप पढ़िए ना तो खत्म हो गया तो रचना कैसे कर दी? उसको उसको सिद्ध करने के लिए वैसे ईश्वर को आना पड़ेगा अर्थ कि मैं बता दे रहा हूं ना जब हुआ ये कि जब अर्थ लोग स्मृति शीड होने लग गई। ठीक है? लुप्त का मतलब वहां मानना पड़ेगा कि प्राय लुप्त हो चला। अगर पूरा लुप्त मान लेंगे तो दोबारा भगवान को आना पड़ेगा देने के लिए ना क्योंकि हम अपने से तो
00:08:53:01 अर्थ ज्ञान ले नहीं सकते हैं उसका। नहीं उसमें यह हुआ ना कि जो समाधिष्ट योगी थे उन्होंने तो यानी समाधिष्ट योगी कुछ लोगों को मैं पूरा मैं समझ गया मैं समझ गया यानी समाधि नहीं समझे मैं पूरा बोलना चाहता हूं मेरे को मैं चाहता हूं बताओ बताओ बताओ अब उसमें बात ये है ना कि अब समाधिष्ट योगी थे अब जब अब ऐसा तो नहीं कि एक ही सेकंड में पूरा वाइप आउट हो गया थर्नस की तरफ वो तो हुआ नहीं वही मैं कह रहा हूं मैं अब जब उसमें लुप्त होना जब लुप्त होना चालू हो रहा है ठीक है तो ऋषियों को समझ में आया कि भैया इनकी मेमोरी जो है उतनी तगड़ी है नहीं ये लोग वेद भी याद करे [गला साफ़ करने की आवाज़] फिर सारा अर्थ भी याद करें एक इंतजाम कर दो उन्होंने क्या उन्होंने क्या किया वेदांगों की रचना की ठीक है ऋषियों ने समाधिस्थ जो ऋषि थे उन्होंने वेदांगों की रचना की अब ये हो गया कि भैया अब आपको मंत्र याद करने की जरूरत नहीं है अब आप वेदांग पढ़ो वेदांग से अर्थ करो नहीं ये उन्होंने ये नहीं कहा कि जो है परंपरा से नहीं होगा क्योंकि उन्होंने अपने भाष्य में कई जगह परंपरा से शास्त्र आ रहे हैं सुनो तो उन्होंने उन्होंने जो उन्होंने जो क्या कहते हैं उन्होंने यह माना है कि परंपरा से जो है श्रुति परंपरा से ही वो वेदार्थ निकाला जाएगा। यह भी माना उन्होंने परंपरा मैं निरुक्त मैं निरुक्त से निकाल के दे दूंगा। हां मुझे आप बताइए मैंने आपको बताया एक 20 में आप चेक करेंगे श्रुति का सुनो श्रुति का मतलब ही होता है। श्रुति का मतलब ही है कि हम जो है श्रुति से कर रहे हैं। अगर ज्ञान का ज्ञान निकाल रहे हैं तो श्रुति का मतलब ही है कि परंपरा।
00:10:08:24 नहीं तो श्रुति का मतलब ये लिखा हुआ है ना कि जो श्रुति से जो वेदांत चले थे वो नष्ट हो गए और वेदांगो से अर्थ हो गया। नष्ट हो गए। हां ये लिखा उन्होंने नष्ट हो गए। अरे आप आप पढ़िए वो भाव उसी में पता चल जाएगा आपको क्या है क्या नहीं है उसमें मैं मैं कहता हूं कि मेरे बोलने पे मत सुनिए खुद ही चेक कर लीजिए ना क्या लिखा है अगर आपको उसमें विशेष उसमें परंपरा की बात भी कई जगह हुई है निरुक्त में ही मैंने खुद निरुक्त में जो भी परंपरा की बात हुई है वो वेदार्थ की परंपरा की बात हुई है और वेदार्थ में मैं कह रहा हूं निरुक्त में जो 120 देखो अगर अगर हम कुछ भी करके जो हमें मंत्र दे रहे हैं उनको झूठा सिद्ध करेंगे कि भैया यह जो है हमको गलत ज्ञान दे रहे हैं तो हमें उनकी क्रेडिबिलिटी पर उंगली उठनी उठ उठानी पड़ेगी। नहीं तो जो मंत्र दे रहे हैं उनप थोड़ी मैं कुछ कह रहा हूं। जिन्होंने मंत्र तो मंत्र फिर हमें मंत्र पर विश्वास क्यों? देखिए जो आपसे गलत बात बोल रहा है जो अर्थ बोल रहा है गलत। ठीक है तो मैं साराचार्य से मंत्र थोड़ी ले रहा हूं। आप कहीं से भी ले आपको फिर अपनी परंपरा बतानी पड़ेगी जहां से आप ले रहे हो वो। वो आपकी है नहीं। जैसे समझिए इस चीज को। जैसे जैसे मान लीजिए मैंने कोई कोई भी दूसरे आचार्य हैं जो परंपरा से रूप से अपना उसे आप उसके विरुद्ध नहीं जा सकते अर्थ में। अरे तो उसमें बात ये है ना बात क्या है? बात यह है कि परंपरा से तो हमें मंत्र मिल रहे हैं। अरे वही उन्ही मंत्रों की क्रेडिबिलिटी की बात कर रहा हूं ना जो व्यक्ति द्वेषी हो सकता
00:11:23:27 है। जब एक मिनट तुम इसमें वो बताओ कहां का छपा हुआ है तुम्हारा निरुक्त? कहीं से भी ले लीजिए आप। एक भी चेक कर लीजिए। कोई सा भी खोल लीजिए। किसी के भाषा उठा लीजिए। नहीं वो पेज नंबर बता देते तो जल्दी हो जाता। नहीं मेरे पास जो आपके प्रथम है ना आपके पास में किसका? प्रथम पाद में है। हां प्रथम एक 20 देख लीजिए। अब बात यह आ जाती है कि मंत्र जो हमने लिए वो तो परंपरा से लिए हैं। जो अर्थ है वह परंपरा से थोड़ी है। अगर अर्थ परंपरा से होते तो मानना पड़ता। परंपरा प्राप्त अर्थ को नकारते तो फिर वेद मंत्र को नकारने की बात आती। अभी जो शणाचार्य का अर्थ है वो फिर परंपरा से थोड़ी वेदांग के आधार पे उसमें त्रुटियां इसे नकार। एक मिनट एक मिनट। इसमें तो 20वा है ही नहीं। पाद एक मिनट दृतीय पाद इसको कह रहेगे द्वितीय पाद में प्रथम अध्याय अध्याय प्रथम अध्याय का 20वा आएगा निपात लक्षणम तो नहीं है निपात लक्षण नहीं है उसका दूसरा वचन होगा उसमें नाम क्या है जैसे 20व में बहुत सारे वचन है ना उसमें दूसरा वचन होगा देखिए
00:12:35:08 यही है एक मिनट [गला साफ़ करने की आवाज़] इसमें तुम्हारी वाली बात नहीं है। तुम ऐसा करो मुझे फोटो खींच के भेज दो। अरे आप जो जो आप पढ़ रहे हैं ना उसी के थोड़ा सा और नीचे जाइए नीचे पेज पे और वहां पे दूसरा वचन आपको संस्कृत में दिखेगा। उसकी हिंदी पढ़िए। एक अध्याय में केवल एक ही वचन थोड़ी है। एक पाठ में एक ही वचन थोड़ी है। वेदकालीन समाज में वैदिक संस्कृति ऋषियों द्वारा देवताओं के लिए प्रयुक्त होती थी। देवता विषयक ऋषियों द्वारा दृष्ट वैदिक मंत्र इसी भाषा में निबद्ध हैं। इन मंत्रों के अध्ययन के लिए आगे-आगे आचार्य इन मंत्रों का उच्चारण करता था तथा उनके पीछे-पीछे अध्ययता उच्चारण करते हुए अध्ययन करता था। इसके पीछे पीछे उच्चारण करके अध्ययन करने के कारण वेद मंत्रों को अनु अनु अनुय अनु पीछे पीछे उच्चारण करके अध्याय पाठ होने वाला कहा गया है। उस समय लौकिक संस्कृत जो परवर्ती काल में पाणिनीकृत
00:13:51:08 अष्टाध्याय के विधानों द्वारा व्याकरण के नियमों से नियमित और परिनिष्ठित कर दी गई। वह लोक में प्रचलित थी। इसी लोक में प्रयुक्त भाषा को यहां भाषा शब्द से अभी अभिहित किया गया है। उपमा अर्थ में इव का लौकिक भाषा और वैदिक भाषा दोनों में प्रयोग होता है। यहां यास्क ने उदाहरण के लिए केवल वैदिक मंत्रों का ही उदाहरण इसलिए दिया है क्योंकि निरुक्त में निघंटू की व्याख्या करने की प्रतिज्ञा के प्रारंभ में ही
00:14:25:15 सामामनाय के द्वारा कह दिया गया है। भाषा में लोग भाषा में निषेध अर्थ वाला यहां नहीं है वो वाली बात बहुत लंबा हो रहा है। अरे आप मुझे फोटो लीजिए वो 20वा ठीक है कोई कोई नहीं तुम अपनी फोटो भेज देना मुझे इसमें इसमें दोनों चीजें हैं और इसमें सवाल ये भी आएगा ना कि अगर आप यास्क का प्रमाण हमको दे भी रहे हो फिर हम ये पूछेंगे यास्क का वो कहां से आया क्या परंपरा तो बतानी पड़ेगी ना अरे मैं कह तो रहा हूं कि मान लो आप ही के आप ही के थ्रू आया। हां अगर आप यह भी मान लो कि आप ही के थ्रू आया तो भी आपको ये मानना पड़ेगा कि वेद के जो मंत्रार्थ जो ईश्वर ने दिए थे अभी वो नहीं है हमारे पास में अभी जो वेद के मंत्रार्थ होते हैं उनका आधार आपको वेदांगों को ही मानना पड़ेगा नहीं वेदांगों को नहीं परंपरा से वेद आए परंपरा से वेद का अर्थ भी आया और वो जो वेद वो जो वेद अर्थ होगा वो अष्टाध्याय के अनुरूप भी होगा व्याकरण के अनुरूप भी होगा ऐसा नहीं है कि व्याकरण के विरुद्ध अगर वो विरुद्ध होगा तो तो आपको यह मानना पड़ेगा कि ना हमारे पास वेद है ना वेदार्थ है यह सनातन ना पॉइंट यह कि जब शास्त्र ही खुद कह रहे हैं कि जब परंपरा से आने वाले वेदार्थ नष्ट हो चुके तो जबरदस्ती अरे भैया शास्त्र उसमें परंपरा भी कह रहे हैं श्रुति श्रुति का श्रुति का मतलब ही श्रुति कितनी बार कहा होगा निरुक्त निरुक्त में बताओ यास्काचार्य ने बताओ तो श्रुति जितनी
00:15:40:19 बार कहा है वेदार्थ की परंपरा के लिए कहा है तो क्या वेदार्थ की परंपरा में ये निरुक्तचार्य जो अर्थ किया जाता है व्याकरण तो व्याकरण संप्रदाय बताया निरुक्त संप्रदाय बताया तो यासकाचार्य ने भी अरे देखो ये सब चीजें तो तुमने अभी मुझे भेजी नहीं है भेज देना मैं देखूंगा जो तुम संप्रदाय 10 संप्रदाय वाली बात पढ़ा होगा तो आप तो खुद ही कह रहे हो ना उसमें है तो निरुत पढ़े तो उसमें सारी चीजें फिर उसमें अलग से क्या ये वाली जो चीजें हैं क्योंकि उन्होंने 10 संप्रदाय के नाम लिए हैं वो मुझे बता देना मगर मैं तुम्हें एक बात बता रहा हूं कि जहां जहां पे वो ये कहेंगे कि धर्म और ब्रह्म की व्याख्या हम निरुक्त उससे करते हैं श्रुति से तो श्रुति का मतलब ही है कि हमने अपने गुरुजनों से जो सुना उससे करते हैं श्रुति को तो वेद कहा गया ना वेद हां तो तो वो वेद श्रुति वेद का अपने आप में जो श्रुति नाम है उसका उसका मतलब ही परंपरा बिना परंपरा के श्रुति का अस्तित्व क्या है? नहीं वेद तो मान रहे हैं ना परंपरा से। वेदार्थ तो ये जो बात कह रहे हैं कि व्यास का ये वेदासकाचार्य ये नहीं कह रहे हैं कि जो परंपरा से जो ज्ञान विज्ञान है उसका विरोध में भी तुम अपना खड़ा कर सकते हो। ये जो मैं आधार दे रहा हूं उसके द्वारा। नहीं हमने तो वेदांगों के आधार पर खड़ा किया ना बाबा। केवल वेदांग नहीं होगा ना। उसमें श्रुति भी होगी। वेदांग भी होगा तब दोनों के समन्वय से होना चाहिए। तो है और क्या है? अरे श्रुति परंपरा भाई। परंपरा को आप ठुकरा नहीं सकते ना। भैया श्रुति मतलब परंपरा अपने आप में भी
00:16:55:22 और मैं इसमें बता दूंगा कई जगह परंपरा के लिए उन्होंने बोला होगा प्रत्यक्ष जितनी जगह परंपरा बोला है वेदार्थ की परंपरा बोला उसमें निरुक्त परंपरा है व्याकरण परंपरा है और बताइए ये भी दिखा देंगे बात ये है कि तुम जहां पे तुम्हारी बात आ रही है तुम यहां पे अब तर्क की बात ही नहीं छोड़ दे रहे हो बिल्कुल तुम मुझे शब्द प्रमाण से दबाने की कोशिश कर रहे हो तर्क ये है कि सीधी बात है कि हमको शास्त्र देने वाला कौन है हमारी परंपरा यदि वो झूठी हो सकती है। यदि उसकी क्रेडिबिलिटी पर बात आ सकती है तो वह हमको झूठे मंत्र भी दे सकती है। यासकाचार्य के नाम से झूठा शास्त्र भी दे सकती है। अगर तुम यह सिद्ध कर दोगे कि यासकाचार्य के अनुसार शंकराचार्य जी फिट नहीं बैठ रहे। अगर तुम यह सिद्ध कर दोगे कि यासकाचार्य के द्वारा दिए गए जो अष्टाध्यायी सूत्र है व्याकरण के सूत्र उसके उसके अनुसार जो हमारे पारंपरिक गुरु हैं वो सही सिद्ध नहीं हो रहे। तो आप यह सिद्ध करोगे कि वेदार्थ है ही नहीं कहीं। वेद है ही नहीं कहीं। सब मनमाना है। सब कुछ मनमाना है। यह सिद्ध करोगे। ठीक है। अब आपने एक पॉइंट बोला कि तर्क से सबसे पहले मैंने यही बोला था कि मैं दुर्जन ऐसे मान लेता हूं कि शास्त्र आपकी परंपरा से आए हैं। उन्हीं शास्त्रों के अंदर निरत्ताचार्य बोल रहे हैं कि जो वेद तो परंपरा से चल रहे हैं लेकिन जो वेदांत है उसकी परंपरा वो परंपरा से आना भी तो सिद्ध है। मैं पूरा बोल देता हूं। आपने तो बोला ना मेरा तो सुनिए। तो आपने तो उसी शास्त्र में निरुक्तचार्य बोल रहे हैं
00:18:10:24 कि जो मंत्र परंपरा से चल रहे हैं। लेकिन वेदार्थ जो है उसकी परंपरा लुप्त होने के कारण बुद्धिश होने के कारण बुद्धिश होने के कारण वेदांगों की ऋषियों ने रचना की। अब जो वेदांगों के जो वेद के जो अर्थ होंगे वेदांगों के आधार पे होंगे। जिसका अर्थ वेदांगों के अनुकूल होगा उसका प्रमाण होगा। जिसका विरुद्ध होगा उसका अप्रमाण होगा। सिंपल सी बात है ना? इसमें कोई डिबेट का टॉपिक मुझे पहले तो ये फोटो भेजो। फिर इसके आगे हम बात करेंगे। दूसरी बात यह है कि उन्होंने इस स्थिति में कहा है कि वेदार्थ का जो वो है वो क्षीण हो रहा है। माना है कि वेदार्थ लुप्त हो रहे हैं। हां तो लुप्त हो रहे हैं। लुप्त हो गए ये नहीं वो कह सकते क्योंकि उसके लिए फिर दोबारा भगवान को आना पड़ेगा। नहीं तो नहीं तो उन्होंने ये नहीं कह दिया कि अगर कोई अगर अगर कोई यह कहेगा कि भाई मैं भूल गया हूं। तो वहां पे एक सिंगल पॉइंट एजेंडा आ जाएगा कि भैया यहां पर जो है आपके जो क्या कहते हैं वेदांग है केवल उनके आधार पर कर सकते हो। मगर जब कोई वहां खड़ा हुआ कह रहा है कि नहीं मुझे याद है। तो वहां पर यह वाली चीज फिर तो उसको उसका विरोध नहीं कर सकते ना। जैसे वो जो स्मृति क्षण हो रही है, प्रज्ञा शक्ति क्षीण हो रही है, उसकी वजह से हम भूले तो हम कह रहे हैं कि हम भूले ठीक है। मगर हम जब कह रहे हैं कि यह वाली चीज हमको याद है तो उसमें हमारा झूठ अगर आप हमें नकारते हुए वेदांत का सहारा लो तो भी ठीक है। ठीक है। तो इस केस में अब हमारे पास में इतिहास प्रमाण है। इतिहास प्रमाण ये है हमारे पास में कि मतलब क्षीण हुआ है। वेदार्थ जो है वो शीण हुए हैं।
00:19:25:25 वेद आए हैं लेकिन वेदार्थ शीण हुए हैं। इसका हमारे पास में प्रमाण है। अब इस केस में मान लीजिए कि मैं दुर्जन ऐसे मान लेता हूं। वैसे तो प्रमाण कुछ है नहीं। फिर भी मैं ऐसे मानता हूं सुनिए तो दुर्जन ने ऐसे मगर मैं मान लेता हूं कि जो वेदार्थ है वो किसी न किसी आंशिक रूप में आज बचे हुए हैं तो भी उनका क्योंकि ये आपने बोला ना कि ईश्वर को दोबारा वेद देना पड़ेगा। वो तब देना पड़ता जब ऋषियों ने इसकी व्यवस्था नहीं की होती वेदांगों के रूप में। लेकिन वेदार्थ करने की व्यवस्था ऋषियों ने वेदांगों के रूप में कर रखी थी। इसीलिए दोबारा से वेदार्थ देने की आवश्यकता नहीं। एक पॉइंट। दूसरा पॉइंट ये कि अगर मैं मान भी लेता हूं कि वेदार्थ जो है वो किसी न किसी को याद भी होगा। वो कह रहे नहीं मेरे को तो परंपरा से वेदार्थ याद है भले ही खत्म हो गया। नित्याचार कह रहे हो लेकिन मैं नहीं सुनता मेरे को याद है तो भी उसका जो है वो वेदांगों के विरुद्ध नहीं होना चाहिए अगर वो वेदांगों के विरुद्ध दे बोलेगा कोई बात तो हम यही मानेंगे कि भैया वो जो है उसकी बुद्धि क्षीण हो गई है उसकी अल्पशक्ति जो भी है क्षीण हो गई और वो व्यक्ति गलत बोल रहा है क्योंकि वेदांगों को तो ऋषियों ने स्वीकार किया इसलिए वेदांगों के विरुद्ध नहीं हो सकता हां उस व्यक्ति पे दोष यहां पे एक कैची पॉइंट है तुमने कहा कि उन्होंने व्यवस्था कर दी थी भगवान को आने की जरूरत नहीं है यानी कि आपका मतलब है कि आपने जो आपकी जो बुक्स है हमारी जो बुक्स है ग्रंथ है अष्टाध्याय के सूत्र है पाणिनीय अष्टाध्याय है या जो निरुक्त है यह सब हम एक बच्चे को पकड़ा देंगे और वेदार्थ कर लेगा। नहीं मैंने कब बोला कि बच्चे को पढ़ा उसकी पूरी व्यवस्था है ना कैसे पढ़ेंगे?
00:20:41:03 हां उस व्यवस्था में आ जाएंगे आ जाएंगे। सुनिए बहुत सिंपल है। सबसे पहले शिक्षा पढ़ेंगे। शिक्षा के बाद अष्टाध्याय के सूत्र याद करेंगे। प्रथमा वित्त पढ़ेंगे। भैया वो शिक्षा में कहीं ना कहीं उनकी प्रिपरेशन में परंपरा प्राप्त ज्ञान आना पड़ेगा। परंपरा से शास्त्र ही तो पढ़ाएंगे और क्या पढ़ाएंगे? अरे मैंने कहा कि जब भगवान को आना नहीं जब उन्होंने ऐसी मतलब सबसे पहले सिखाते तो क सिखाते मतलब जाकिर नायक जाकिर नायक भी खड़ा हो के जो है वो बच्चों को प्रिपेयर कर देगा कि भैया अष्टाध्याय के तुम सूत्र ले लो कोई भी कर देगा बहुत सिंपल है ना अगर मान लीजिए अष्टाध्याय से अष्टाध्याय के आधार पे कोई उसने बोलता है कि मैंने जो भाषा की अष्टाध्याय के आधार पे ठीक है तो अष्टाध्याय विशेषज्ञ चेक कर लेगा ना ये कि अष्टाध्याय विशेषज्ञ है ना वहां पर इसका मतलब कहां पे अष्टाध्याय विशेषज्ञ है ना वहां पर कहां पे इस बात को तय करने के लिए कि हुआ है कि नहीं अष्टाध्याय से नहीं मैं पूछ रहा हूं कहां पर तो कहां पर बताइए ना तुम कह रहे हो ना अष्टाध्याय विशेषज्ञ तय कर लेगा कि वो अष्टाध्याय से हुआ है कि नहीं हुआ है हां यही अष्टाध्याय हमारा शब्द प्रमाण होगा यही विशेषज्ञ हमारा शब्द प्रमाण होगा हां तो यह परंपरा प्राप्त होगा अष्टाध्याय विशेषज्ञ और उस उस वो अष्टाध्याय विशेषज्ञ है कि नहीं उसको उसको कैसे माना जाए कि उसके पीछे वाला वो विशेषज्ञ
00:21:56:16 वो अष्टाध्याय विशेषज्ञ है कि नहीं उसको कैसे माना जाए कि उसके पीछे वाला वो विशेषज्ञ वो तो चलिए बाद की बात है तो वो शब्द तो वही मैं कह रहा हूं परंपरा तो आपने मान ली ना जब विशेषज्ञ के अधीन छोड़ दिया नहीं छोड़ा मैंने आपसे मैंने आपसे पहले मैंने आपसे पहले ही बोला ना कि दुर्जन न्याय से मैं मान तो रहा हूं कि सारे शास्त्र आप की परंपरा से हम भी आपकी परंपरा से संबंधित हैं और हमें सारे शास्त्र आप की परंपरा से मिले मैंने बोला तो शुरू में मैंने बोला तो मैं तो ये कह रहा हूं कि किसी कारण से अगर हमें हमारे गुरुजनों का झूठ बोलना हमारा लग रहा है ये लग रहा कि द्वेष वश या लालच वश या भयवश झूठ बोल रहे हैं। सुनो उनके सामने हमने सिद्ध कर दिया। सुनो तो उनके सामने हमने [गला साफ़ करने की आवाज़] सिद्ध कर दिया। ये देखो अष्टाध्याय से आपका मैच नहीं खा रहा है। फिर वो कह रहा है कि नहीं अष्टाध्याय से मैच हमारा खा रहा है। तो इसका मतलब वो लोग झूठे लोग हैं। उन पर विश्वास नहीं किया जा सकता। एक सूत भी नहीं किया जा सकता। और जब एक सूत गलत है। क्यों गलत है? अर्ध कुकुट न्याय नहीं अर्ध कुकुट न्याय करोगे यहां? हां। तो क्या दिक्कत है? अर्ध कुकुट न्याय कर दोगे? किसी व्यक्ति की कोई एक बात गलत हो तो सारी बात गलत हो जाती है क्या? अब बस बस अब इस पर मनन करो अब तुम और इसमें एक और शब्द इसका उत्तर देयर है वो हमारा शब्द प्रमाण नहीं रहा। ये है पॉइंट ये है कि वैसे मैं इसका उत्तर दे भी चुका हूं। इसका उत्तर मैंने
00:23:11:20 आपको कम से कम पांच बार मैंने रिपीट किया कि ये बात तब बोला जा सकता है जब वेदार्थ परंपरा से आ रहा हो। है ना? और अगर हम लोग लेकिन परंपरा से नहीं आ रहा है। हमारा तो आ रहा है वेदार्थ परंपरा से। तो जब जब ने बोल दिया कि वेदास की परंपरा नष्ट हो गई तो कहां से आ रहा है? नष्ट नहीं हुई। वो प्रायः लुप्त हो रही है। इसमें लेना पड़ेगा। ऐसे बहुत लुप्त हो गई है। अगर वो लुप्त ही हो जाएगी तो फिर लुप्त हो गई तो बिल्कुल कोई है ही नहीं बताने वाला। वहां ईश्वर को जाना पड़ जाएगा। इसका एक और बात है कि शाखाएं भी लुप्त हो चुकी है। ये भी लीजिए। तो शाखाएं लुप्त हो रही है। मैं तो वो तो बोल रहा हूं, लुप्त हो रही है। लुप्त होना और झूठ बोलने में अंतर है। जहां लुप्त हो रही है क्या सुनो जहां लुप्त हो रही है वहां बोला जा रहा है भैया हमारी स्मृति क्षीन हुई। हम ये नहीं बता पाएंगे। क्या मगर जिस विषय मगर जिस विषय में हम बता रहे हैं उस विषय में हमें नकारा नहीं जा सकता है। नहीं हमारी क्रेडिबिलिटी में दोष नहीं आ सकता है। नहीं आपने तो ये स्वीकार किया ना कि जो हमारे आचार्यों का जो भाषा है वो वेदांगों के अनुकूल है। आपने स्वीकार किया ना इस चीज को। हां कि नहीं और है ना? अब आप ही की [गला साफ़ करने की आवाज़] परंपरा से मान लीजिए हमने वेदांग पढ़े। ठीक है? हमने अर्थ किया तो हम देखेंगे इसमें और जो एक साल पहले आचार्य थे 400 साल पहले थे मान लीजिए तो उनके भाष्य से और इधर तो विरोधाभास आ रहा है तो हम पूछेंगे ना कि ये विरोधाभास क्यों आ रहा है इसका उत्तर मेन मेन जो विरोधाभास
00:24:27:01 आया है वो व्याकरण इत्यादि विषयों में कम आया है वो ऐसे विषयों में ज्यादा आया है कि ईश्वर अवतार कैसे ले सकता है या अलंकारिक व्याख्या हो गई ना ना ऐसी बात नहीं है ऐसी ज्यादातर खेल पलटा हुआ है मैं आपको समझाता हूं कैसे खेल पलटा वो समझाता हूं सायनाचार्य ने बोला है इससे विषय बदल इससे विषय बदल जाएगा विषय नहीं बदलेगा विषय यही है विषय यही है ये जो मैंने बात बोली है इसको अभी थोड़ी देर छोड़ दो इससे क्योंकि मेरा विषय बदल सकता है नहीं बात पूरा तो हो जाए पूरा हो जाए मैं थोड़ा सा बस दो लाइन ऐड करना चाहता हूं इसमें कि सायनाचार्य जी तो बोलते हैं कि नहीं वेद में तो कोई वेद तो केवल कर्मकांड की पुस्तक है वेद का प्रयोग तो केवल यज के लिए होना चाहिए अब बताइए जब ऐसे ही वो इस मानसिकता से वेद का अर्थ कर रहे हैं तो कैसे मान रहे हैं अब मैं 50 उनहीं उनहीं उनहीं के आचार उनहीं के आचार परंपरा में उनहीं के भाई आई क्यों लिख दे रहे हैं पंचदशी जहां ब्रह्म की व्याख्या हो रही है तत्विक विवेचन हो रहा है अगर ऐसा है इसलिए वो तो इसलिए लिख रहे हैं क्योंकि वेदांत की परंपरा आ रही है ना अद्वैत वेदांत की तो उन्होंने उस आधार पे लिखा तो वेदांत को वेदांत को वेदांत के रूप में नहीं कहते क्या वो वेदांत को अलग मानते हैं क्या उन्होंने कोई मेंशन किया वेदांत जो है वो तो वेदांत परत प्रमाण है ना मैं ये नहीं कह रहा हूं मैं कह रहा हूं क्या वो वेद वो वेद के बाहर मानते हैं क्या वेदांत को
00:25:42:04 परत प्रमाण स्वतः प्रमाण अरे भाई बात ये हो रही है क्या वो उसको वेद विरोधी मानते हैं क्या पंचदशी क्योंकि जिस वेदांत के आप कह रहे हैं ना उसके इंटरप्रिटेशन कई तरीके से हो सकते हैं तो कौन सा इंटरप्रिटेशन ठीक है इसका वेरिफिकेशन पूरा सुनिए पूरा सुनिए पूरा सुनिए किसका जैसे उसका अद्वैत परक हैद्वैत पर है पर उसके जो इंटरप्रिटेशन है वो कौन सा सही है इसका इसीलिए वो क्या है वो प्रत्यय प्रमाण है तो उसकी जो जांच होगी ठीक ठीक इंटरप्रिटेशन कौन सी वो वेदों के आधार पे होगी तो वेद प्रमाण है वेदों के आधार पे आधार पे नहीं कर सकते मैं यह नहीं कह रहा कि वेदांत के अरे क्या बात कर रहे हो तुम गलत जा रहे हो तुम मैंने ये कहा कि वेदांत के आधार पर वेदार्थ कर रहे हैं मैंने ये कहा कि अगर वो वेदार्थ सिर्फ केवल कर्मकांड के लिए कर रहे थे मतलब वो उसमें तात्विक विवेचन देख ही नहीं रहे थे तो जिन्होंने उन्हें आज्ञा दी थी ये करने की जिन्होंने उनसे कहा था उन्हीं ने तो पंचदशी लिखा हां तो वो तो पॉइंट वही है ना कि वो उपनिषद में तो अगर वो अगर वो वेद अपने को वैदिक नहीं मान रहे होते वेदों का आश्रय नहीं लिया होता तो काहे के लिए पंचदशी लिखते तो किसी की एक बात थोड़ी ना मानी उन्होंने तो लिखा नहीं पहली बात एक बात दूसरी बात उन्होंने तो लिखा किसने लिखा है उनके भाई ने लिखा ना आपने बोला ना अभी तो भाई उसी ने तो आर्डर दिया था कि भैया वेदों पे भाष्य कर दो तुम मेरे पास समय नहीं है
00:26:57:10 पॉइंट इसके अंदर ये है कि जैसे वो ये कह रहे वो ये जो पंचदशी का उन्होंने किया वो प्रस्तांत्रिक आधार पे किया प्रस्तांत्रिक [खांसने की आवाज़][गला साफ़ करने की आवाज़] के अंदर तो उपनिषद आ रहा है ना मैं मैं ये नहीं कह रहा कि उन्होंने नहीं आ मैंने मैं यह नहीं कह रहा हूं। मैं यह कह रहा हूं कि वैदिक मानसिकता के थे कि नहीं तुम मेरी बात समझ नहीं पाए। तुमने एक आरोप लगाया कि उन्होंने वेदों का आधार कर्मकांड माना है। उन्होंने खुद लिखा है। अरे तो मैं तो किसी की केवल एक बात को लेकर के क्यों माना जाए? भाई उसको जो व्यापक दृष्टि है उससे देखोगे ना। अच्छा नहीं वो जो सामने और सायन के भाष्य में जो विद्या की बातें हुई है उस पर भाष्य किया तो है उन्होंने तो वो तात्विक विवेचन हो गया उन्होंने भले ही उसको कर्मकांड कह दिया मगर उसमें तात्विक विवेचन तो कर रहे हैं सायन नहीं तात्विक विवेचन वो थोड़ी कर रहे हैं वो तो कर्मकांड के लिए बोल रहे हैं साफसाफ अरे भैया वहां विद्या की बात क्यों कर रहे हैं फिर पॉइंट अब जैसे विद्या को भी कैसे ले रहे हैं कर्मकांड विषय ले रहे हैं वो तो ये तुम बताओगे कि अगर उन्होंने एक जगह लिख दिया उन्होंने कर्मकांड की जैसे कोई कोई अपने वेद भाष्य लिखता है तो वेद भाष्य की भूमिका लिखता है उस भूमिका में बताता है कि मैंने वेद भाष्य कैसे कर रहा हूं क्या कर रहा हूं और सायरन ने भी जैसे स्वामी दानंद ने अपनी वेद भाष की भूमिका लिखी है वैसे सायरन ने भी लिखा हुआ है उसी भूमिका उन्होंने उसमें
00:28:12:16 कर्मकांड की प्राचुर्यता देखी तो लिख दिया उसमें क्या है इसका मतलब इसका वेद का वेद का इसका अर्थ नहीं है इसका अर्थ ही नहीं इसका अर्थ यह नहीं है कि उन्होंने उसमें तत्व ज्ञान नहीं देखा वेद में तो आप दिखा दो कि वेद में कहां तत्वज्ञान उन्होंने लिखा है अपनी भूमिका मैं कह तो रहा हूं विद्या वाले पार्ट नहीं लिखना चाहिए था वहां समझाना नहीं अच्छा समझा दिया उन्होंने भूमिका में बोल दिया तो बाद छोड़ दोगे जो उन्होंने यजुर्वेद के भाष में लिखा है 40व अध्याय में उसको हम समझेंगे ना कि कौन से दृष्टिकोण से लिखा है जो दृष्टिकोण दृष्टिकोण साफ पता लग रहा है वहां तत्व ज्ञान है नहीं तो आप थोड़ी डिसाइड करोगे क्या है क्या आप डिसाइड कैसे कर रहे हो जी क्या सोचते मैं डिसाइड की बात सही कोट करके कर रहा हूं ना अपने को चलो ठीक है शारणाचार्य ने क्या कोट किया तुम्हारे पास कैसे आया चलो इस पे आ जाओ एक अरे परंपरा से ही मैं परंपरा से सुनो तो सुनो तो सुनो अरे अभी अभी दुर्जन तोष न्याय से तुम वो वाली मान रहे हो ना वेदार्थ की परंपरा अभी मैं शारणाचार्य की परंपरा की बात कर रहा हूं तो सायनाचार्य ने क्या लिखा क्या माना क्या कहा ये तुम्हें कौन बता रहा है कौन दे रहा है छाप के बुक यानी पॉइंट इसके अंदर क्या है कि मान लो अरे भैया मैं बोल रहा हूं मैंने आप ही के आचार्यों से पढ़ा तो भी तो आचार्य जो मैं मेरा आचार्य बता रहा है कि शारणाचार्य ने यह लिखा और मेरा ही आचार्य बता रहा है कि शारणाचार्य
00:29:28:04 उसमें तत्व ज्ञान भी देखते थे वेद में अच्छा दिखाओ आचार्य बता रहे हैं जरा ऐसा दिखाओ मेरे पूरी के शंकराचार्य बता रहे हैं पूरी के शंकराचार्य बता आपके दुनिया भर के आचार्य की वीडियो शंकराचार्य की ओर से बोलने वाला प्रामाणिक कौन है मैं कि तुम और बात ये है नहीं उसमें बात ये है कि अगर शंकराचार्य ने कोई बात गलत बोली तो शास्त्रों से चेक होगा कि नहीं होगा फिर वही बात आ गई अभी बात क्या चल रही है साणाचार्य क्या सोचते थे क्या नहीं सोचते थे कौन बताएगा तो जबरदस्ती इस पे ला रहे हो बात तो शास्त्रों [हंसी] पे चल रही है बात देखो अभी बात ये चल रही साचार्य तो उन्हें कर्म कर्मकांड नहीं मानते तो तुम्हें इस पे आ गया कि अगर तुम्हें उनका एक कोट मिल गया है मुझे नहीं जरूरत है उनकी कोई किताब लाने की मिल जाएगी तो दे भी दूंगा जिसमें उन्होंने तत्व ज्ञान की बात की हो वेद में मगर वो क्या सोचते थे क्या नहीं सोचते थे ऑथेंटिकली बताने वाला उनसे जो प्रामाणिक रूप से जुड़ा हुआ व्यक्ति वही बताएगा ना नहीं वो तो गलत भी तो बोल सकता है ना तो गलत बोल सकता है तो वो तुम्हें छपी हुई किताब भी तो गलत बोल सकता है फिर तुम ये भी क्लेम मत करो कि उन्होंने ये लिखा और आप उसमें न्यूट्रल हो जाओ उन्होंने क्या लिखा क्या नहीं लिखा मुझे नहीं पता यही मेरा कहना है कि जब तुम्हें वेद जब तुम्हें प्रमाण उनका डायरेक्ट जब हमें उनका डायरेक्ट शब्द प्रमाण मिल रहा है तो किसी तीसरे किसने दिया वो शब्द प्रमाण उनका डायरेक्ट उन्होंने मिल रहा है मैनुस्क्रिप्ट मिल रहा है मैनुस्क्रिप्ट उन्होंने दिया मिल रहा है ना उन्होंने दिया नहीं तो वो वो यहां पे मेरे सामने थोड़ी है अभी
00:30:43:10 कोई बीच में कोई बीच में विश्वास है ना जो ये बोल रहा है ये उनका मनुस्क्रिप्ट है कोई बीच में है ना मुझे तो यह भी नहीं पता कि जो ईश्वर ने वेद दिए थे वही वेद दिए थे वही तो मेरा कहना है कि जब उनके मंत्रों पर विश्वास कर सुनिए तो जैसे आपने ने बोला कि शंकराचार्य बताएंगे कि शराणाचार्य क्या शंकराचार्य शराणाचार्य थोड़ी क्यों क्योंकि हमारे लिए वो शब्द प्रमाण है। हम उनका किसी भी मामले में विरोध नहीं करेंगे। यही मेरा कहना है। क्यों नहीं करेंगे? विरोध तो हो रहा है ना साफ-साफ। तो फिर हम अपने आप को वैदिक नहीं कहेंगे। हम अपना नया अलग से बना लेंगे। हम तो कहेंगे ना। तो तुम सिद्ध करो तुम्हारा वैदिक होना स्वतंत्र रूप से बिना गुरु परंपरा के। नहीं गुरु परंपरा इसमें क्या है? अभी देखो जैसे यहां पर ये वाली बात मैंने कही। मैं आपके ही शास्त्रों से टकरा रही है। तब आप अपनी परंपरा को ही खत्म कर दे रहे पॉइंट मैं यह नहीं कह रहा हूं। मैं परंपरा को खत्म नहीं कर रहा हूं। तुम मेरी बातों को गलत मतलब निकाल रहे हो। अभी जैसे शणाचार्य की बात कर रही। तुमने माना कि उन्होंने कर्मकांड कहा है। अब मैं जब इस पर आ गया कि भैया जब उनकी चीज तुम्हें किताब प्राप्त कैसे हुई परंपरा से? उनकी परंपरा से तो उनकी परंपरा का जो व्यक्ति तुम्हें किताब दे रहा है वही व्यक्ति बताएगा कि उनकी सही मानसिकता क्या थी? अब उनकी उनकी परंपरा का व्यक्ति बता रहा है। उनकी मानसिकता तात्विक भी थी। तुम कह रहे हो वो झूठ बोल रहा है क्योंकि उनकी किताब में तो केवल कर्मकांड लिखा है। उन्होंने ये नहीं लिखा तत्व ज्ञान है ही नहीं वेद में। उन्होंने ये लिखा कि कर्मकांड है। मगर तुमने अपने आप उनको तत्व
00:31:58:14 ज्ञान का विरोधी मान लिया वेदार्थ में। मगर ठीक है मान भी लिया तो जो व्यक्ति तुमको यह झूठ बोल सकता है कि उनके वह तत्व ज्ञान देखते थे वेदार्थ में वही व्यक्ति तुम्हें झूठी किताब भी तो दे सकता है तो इसीलिए मेरा कहना है कि जब हम परंपरा से प्राप्त होने वाले अर्थ पर विश्वास नहीं करते हैं या फिर सायनाचार्य की परंपरा से प्राप्त होने वाले जो गुरुजनों द्वारा कहे जाने वाले वाक्य सायनाचार्य के संदर्भ में उस पर जब हम विश्वास नहीं करते हैं तो हमें उस बुक पर भी विश्वास नहीं करना चाहिए जो हमें उसी गुरु परंपरा से मिली है जिसमें लिखा हुआ है कि कर्मकांड की प्राचुर्यता है। पहली बात तो उस स्थिति में आपको अपने आप को न्यूट्रल मानना पड़ेगा कि भैया उसमें क्या लिखा था क्या नहीं लिखा था हमें नहीं पता हमारा यह है इस विषय में तो ऐसे ही तो यही बात चाहे जितना पूछ लो अंत में यही बात आएगी अगर तुमने हमको गलत साबित कर भी दिया तो तुम वैदिक सिद्ध नहीं हो पाओगे वेद को तुम खत्म करोगे वहां तर्क खत्म हो जाएगा फिर वहां पर आपके पास सिर्फ अपनी बातें रह जाएंगी वहां तर्क नहीं है फिर लॉजिक खत्म वहां पर
00:33:13:25 [संगीत]
Plans for this video (0)
No Plans yet. Press "✂️ Open Clip Cutter" to make one.
-
⬜Hindi SRT Required
YouTube Studio → Subtitles → Hindi → upload the SRT file. (Checked automatically once OAuth is connected.)
-
⬜English SRT
YouTube Studio → Subtitles → Add language → English → upload the SRT file.
-
⬜Title (per Rules)
Check the title against the RULES on honorifics, names and terms.
-
⬜Description
YouTube Studio → Details → Description. Write it as per the RULES.
-
⬜End Screen
YouTube Studio → Editor → End screen. The API does not report this, so press Done after adding it.
-
⬜Cards
YouTube Studio → Editor → Cards. The API does not report this, so press Done after adding them.
-
⬜Playlist Automatic
YouTube Studio → Details → add to Playlists. It gets ticked ✓ automatically at the next sync.
-
⬜Thumbnail
YouTube Studio → Details → Thumbnail → upload a custom thumbnail.
"Done" is your confirmation. The YouTube API does not report things like End Screen and Cards.
Playlists
Not in any public playlist (or YouTube sync has not run yet).
परंपरा के विषय पर अब तक की सबसे स्पष्ट और निर्णायक वार्ता
🔗 This video is made from parts of these videos
Description
(empty)
History
No changes yet.
✂️ Clip Cutter
⌨️ Keyboard shortcuts
Space Play/Pause · I Set start · O Set end · ←→ 1 second (Shift: 5) · ,. 1 frame · P Preview · Enter Add clip · Esc Stop
Start
End
✂ Remove (middle part: bad audio, bad section)
Move the video to that spot (click the SRT or the bar), then press "Start"/"End".
Clips () · Total
Add clips above. They will appear here; drag (⋮⋮) to reorder.
-
⋮⋮