⬜ Not used yet · 00:00:01:22 – 00:26:03:00 (26:01)
00:00:01:22 सभी को जय श्री राम। तो एक सवाल है जो सोशल मीडिया पर बहुत ज्यादा वायरल नहीं हो रहा है। पर हां जो सज्जन थे इस की तरफ से जो आए थे सज्जन कहना भी अभी उचित नहीं है उनके लिए क्योंकि उन्होंने कई सारी चीजें की है जो मैं आपको बताऊंगा। पर उनके द्वारा कुछ भ्रामक प्रचार किया जा रहा है। तो मैं यह सोच के मुझे अपने जो दर्शक हैं या समर्थक हैं उनको उसका उत्तर देना आवश्यक है जिससे कि उनको मालूम हो कि इस प्रश्न का उत्तर क्या है जो उनके द्वारा उठाया जा रहा है। हालांकि मैं कुछ दिन पूर्व करीब छ सात महीने पूर्व एक वीडियो बना चुका हूं जिसमें कि विद्या और अविद्या के विषय में एक वीडियो है। तो एक प्लेलिस्ट है सनातन सिद्धांत नाम से उसमें वो वीडियोस हैं जो आपको देख लेने चाहिए। तो उससे आपको जो कांसेप्ट है वो सब समझ में आ जाएगा। उसमें इसका भी उत्तर है क्या ईश्वर मर सकता है? क्या ईश्वर ऐसा पत्थर बन सकता है जिसे वह स्वयं नहीं उठा सकता? जो इस तरह के नास्तिक लोगों की तरफ से जो प्रश्न उठाए जाते हैं ईश्वर के अस्तित्व पर तो उन सब बातों का उत्तर है। अच्छा अब बात यह आती है हमने हम क्यों इस तरह के नास्तिक वाले प्रश्न पूछते हैं? क्योंकि ईश्वर के अस्तित्व को सिद्ध करने में ही
00:01:16:26 तो धर्म की स्थापना है। तो जब तक हम नास्तिकों के तरीके के प्रश्नों को नहीं करेंगे किसी के समक्ष जो यह कह रहा है कि हम धर्म की स्थापना करने वाले हैं। तब तक वो रियलिटी बाहर नहीं आएगी कि वास्तविकता में या धर्म को स्थापित करने वाला है कि नहीं। इसलिए वह नास्तिकों के दृष्टिकोण से भी प्रश्न करने पड़ते हैं यह जानने के लिए कि जो स्वयं को धर्मावलंबी कह रहा है, धर्मज्ञ कह रहा है या धर्म रक्षक कह रहा है, वह वास्तव में धर्म रक्षक है कि नहीं। या वह सतही स्तर पर केवल अपने आप को धर्म धार्मिक होने का दावा तो कर रहा है परंतु उसके मूल में धर्म नहीं अधर्म है। वो नास्तिकता ही है जो रूप बदलकर उसके अंदर है। खैर तो उसमें एक बात उठाई जा रही है कि हमने यह कह दिया कि जो ईश्वर हैं वो सृष्टि की रचना यूं ही करते हैं। यूं ही यूं ही उसका मजाक उड़ाया जा रहा है। हालांकि अभी तक हमने किसी भी कोई भी इस तरह का हास्यपूर्ण या विनोद पूर्ण ऐसा नहीं किया उनके साथ कि उनकी चीजों का हमने मजाक उड़ाया हो ये किया हो। जबकि प्रभु श्री राम जो दुराचारी होता है उसका हास्य बनाने की भी उन्होंने शिक्षा दी है। जब सुपनखा आई थी वो कामासक्त होकर के जब वो आताताई हुई जा रही थी
00:02:32:04 श्री राम जी को या लक्ष्मण जी को प्राप्त करने के लिए तो उस समय श्री राम जी ने भी वहां पर विनोद किया था। ठीक है? पर फिर भी अभी तक हमने ऐसा कुछ नहीं किया था क्योंकि हम यह समझते हैं कि जो सामने वाला व्यक्ति जो आया था जिसने वो तीन सा 3 घंटे हम लोगों को पागल किया था विषय से हटकर झूठ बोलकर या इधर-उधर इशारे करके उनके जो और चार पांच वहां सहयोगी थे कितने थे नहीं पता उनके निर्देशानुसार अपने वक्तव्यों को बदलकर अह दोहरी बातें बोलकर जो हमें परेशान किया था जिसमें से तत्व को निकाल पाना बहुत मुश्किल होता है। होता है ना कि नकल करने के लिए भी अकल चाहिए होती है। तो जब कोई आपको ऐसा व्यक्ति मिल जाए जो नकल तो करना चाहता हो पर उसके पास नकल की भी अकल ना हो तो उससे टकराने में थोड़ा टाइम लगता है उसको संभालने में। तो उनहीं उनके द्वारा प्रश्न एक तो विषय पर आ जाते हैं। उनके द्वारा एक प्रश्न उठाया जा रहा है कि भाई शिवश का जो ईश्वर है उन्होंने ईश्वर के बारे में मतलब हम जिसकी पूजा करते हैं ईश्वर के बारे में ब्रह्म के बारे में लात मारता हूं तो वहां हो ही गया था। इनके द्वारा प्रतिपादित किया हुआ ईश्वर। अब्राहम क्योंकि ईश्वर से भी कई ज्यादा गिरा हुआ और कई ज्यादा घटिया है।
00:03:47:08 और भी कई ऐसे आपत्तिजनक शब्द घटिया और तरह-तरह के अमर्यादित बातें वहां पर हैं। तो सबसे पहली बात तो यह है कि जो ये अपनी जीत का डंका पीट रहे हैं कि हम जीत गए जीत गए। पहली बात तो वो शास्त्रार्थ नहीं था। एक चर्चा थी। जिसमें स्वयं को सनातनी मानने वाले दो लोग वैचारिक मतभेद को दूर करने का प्रयास कर रहे थे। मगर इस इन्होंने उसको शास्त्रार्थ के रूप में उपयोग भी कर लिया। उसके बाद फिर जो है यह भी डंका बजा रहे हैं कि जीत गए जीत गए। मगर जब जो व्यक्ति जीत गया है उसकी तो शालीनता होनी चाहिए क्योंकि वो संतुष्ट है। मगर इनकी भाषा का स्तर गिरने से बेटा अब मैं तुम्हें बताऊंगा मैं यह करूंगा मैं वो करूंगा। मैं 10 वीडियोस बनाऊंगा। तो इस तरह की चीजें वो सब Instagram पे कर रहे हैं। आप लोग जाकर देख सकते हैं। और शिवश का ईश्वर ऐसा है, मायावादियों का ईश्वर ऐसा है, मायावादी ऐसे होते हैं, वो होते हैं। तो उसमें बहुत अश्लील बातें भी हैं कहीं-कहीं और अमर्यादित शब्द भी है, अभद्र शब्द भी है। तो मुख्य विषय है कि ईश्वर ने ये सृष्टि बनाई क्यों? ठीक है? इसका मैं जवाब पहले दे दिया है। मगर अभी यहां पर जो मैंने यह कहा कि यूं ही तो इसका वो मजाक बना रहे हैं
00:05:02:12 वहां पर जो कुछ भी यूं ही कर देता है। जैसे कोई पागल है वो यूं ही हंस देता है। वो यूं ही रोने लग जाता है। वो यूं ही कुछ भी कर देता है। वहां पर कह रहे हैं कि यूं ही बनाता है इनका ईश्वर सृष्टि। तो भैया यह है श्वेता शत्रुपनिषद। इसका चौथा अध्याय है। चौथे अध्याय में सृष्टि के प्रारंभ में [गला साफ़ करने की आवाज़][खांसने की आवाज़] पहला ही श्लोक है सृष्टि के आरंभ में जो एक निर्विशेष होकर भी अपनी शक्ति के द्वारा बिना किसी प्रयोजन के बिना किसी प्रयोजन के इस पर भी हम बात करेंगे बिना किसी प्रयोजन के ही सृष्टि बनाता है। नाना प्रकार के जो वर्ण होते हैं उनको धारण करता है और अंत में भी जिसमें विश्व लीन हो जाता है। तो यहां परमात्मा के बारे में बात कर रहे हैं कि भगवान है, ब्रह्म है, ईश्वर है। वह सृष्टि क्यों बनाते हैं? बिना किसी प्रयोजन के। अब बात ऐसी आती है कि बिना किसी प्रयोजन के और भी कई कार्य होते हैं। जैसे कि आंख देखती क्यों है? अब भाई हम आंख से यह नहीं कह सकते कि तुम देखती क्योंकि आंख आंख इसलिए क्योंकि वह देखती है। तो यह उसका स्वरूप भूत लक्षण
00:06:17:22 है। तो ईश्वर से हम यह नहीं कह सकते कि तुम्हें क्या सृष्टि बनाने की आवश्यकता थी क्या? ईश्वर से हम यह नहीं कह सकते क्योंकि सृष्टि बनाने के कारण ही हम उसे ईश्वर कह रहे हैं। इसका अर्थ है इसको समझने का प्रयास करिए कि यदि हमने हम यह कहते हैं कि क्योंकि ईश्वर को ईश्वर भी अतृप्त है क्योंकि वह सृष्टि बनाए बिना नहीं रह सकता। उसको आवश्यकता है सृष्टि बनाने की और इस आधार पर हम ईश्वर को नकार। यहां मैं नास्तिकों के उत्तर की बात कर रहा हूं। इस आधार पर हम उसे नकार क्योंकि ईश्वर भी अतृप्त है। तो पहली बात यह है कि ईश्वर को कोई आवश्यकता नहीं है। वो यूं ही सृष्टि बनाता है। जैसे कि भव्य जी जो वो चर्चा है उसमें आप कई बार आपका जो मुंड था वो चित्रपट से गायब हो गया था। कई बार आपके केवल केश दिखते थे और उसमें आप बात बालों में हाथ फराते थे। क्यों फिराते थे? यूं ही आपने कहा ना कि यूं ही तो काम पागल करते हैं तो पागल कौन है यहां पर इस हिसाब से तो आप तो अपनी बात कर रहे हैं फिर क्योंकि आप मुंड दिखा रहे हैं। आप यहां पर चित्रपट पर सामने बैठे हुए हैं। आप पीछे जाते हैं। आगे आते हैं। क्यों किया? इसकी कोई आवश्यकता थी क्या? यानी कि बिना आवश्यकता
00:07:33:06 के भी आप पीछे गए, आगे आए। आपने सर को नीचे किया। आपने उसमें हाथ डाला। हम आपको उसकी आवश्यकता नहीं थी। और आपने कहा ठीक है ठीक है मेरी आदत है यह आपकी आवश्यकता है क्या ठीक है बोलना नहीं है ना मगर फिर भी बोल रहे हैं तो फिर पागल कौन हुआ इस हिसाब से आप अब दूसरी बात आती है कि क्या ईश्वर द्वारा सृष्टि बनाना या फिर उसमें अविद्या का होना अविद्या का होना ब्रह्म में क्या इसके कारण हम उन्हें द्वैत भाव में डाल दें क्योंकि भाई ईश्वर के अंदर एक तत्व है अविद्या क्योंकि भाई ईश्वर का एक लक्षण है अविद्या विद्यावान नहीं डाल सकते शक्ति शक्तिमान को कभी भी द्वैत भाव में नहीं डालती फॉर एग्जांपल इसन के ही ईश्वर को ले लेते हैं इस के अनुसार भगवान श्री कृष्ण जो है गोलोक धाम में बैठे हैं और वह कार्य करते हैं तो जो भगवान श्री कृष्ण है इस के अनुसार उनका एक हाथ है उनके दो पैर हैं उनकी की दो आंखें हैं। तो क्या इसके हिसाब से इसको भी तत्व के रूप में गिना जाएगा कि एक हाथ हो गया तो फिर द्वैत से त्रैत हो गया।
00:08:48:12 उसके बाद उनकी दो आंखें हो गई तो त्रेत से उसको क्या कहेंगे? चतुर्थ चार तत्व हो गए। फिर कान अलग हो गया। पांच तत्व हो गए। तो कितने तत्व हैं? इस हिसाब से। फिर तो आप द्वैतवादी भी नहीं रहे। मधवाचार परंपरा के भी नहीं रहे। तो कहना चाहिए कि यह जो हाथ होना है या भगवान की शक्ति होना है जिसके द्वारा वह कंट्रोल करते हैं पूरे संसार को यह उनका स्वरूप भूत लक्षण है और स्वरूप भूत लक्षण इसको ऐसे भी कहा जा सकता है कि शक्ति ही शक्तिमान है। शक्तिमान ही शक्ति है। तो शक्ति शक्तिमान को कभी भी द्वैत भाव में नहीं डालती। इस कारण से यह जो उसके स्वरूप भूत लक्षण है इनको उसका गुण नहीं कहा जा सकता। ठीक है? इसलिए वह निर्गुण भी है। अब मैं अपनी बात कर रहा हूं। तो क्या हुआ कि ईश्वर सृष्टि की रचना क्यों करते हैं? बिना किसी प्रयोजन के। क्योंकि उनके पास शक्ति है। और यदि हम यह कह रहे हैं कि अरे भाई वह बिना मतलब वो सृष्टि की रचना किए बिना नहीं रह सकता। तो इसका अर्थ है हम उसे ईश्वर नहीं मान रहे। और जब हम उसे ईश्वर नहीं मान रहे तो उसके द्वारा सृष्टि बनी होना सिद्ध नहीं होता। तो इस कारण से क्योंकि ईश्वर सृष्टि बनाता है और आप ऐसा
00:10:03:15 कह रहे हो कि वह बनाए बिना नहीं रह सकता तो इस कारण से आप उसके प्रति अनास्था प्रकट नहीं कर सकते क्योंकि यह जो स्थिति है कि उसने बिना किसी प्रयोजन के जैसे आपने कहा कि बिना किसी प्रयोजन से वो सृष्टि बना रहा है। फालतू के काम कर रहा है। इसलिए हमारी उसमें आस्था नहीं है। तो इस आस्था इस प्रकार से अनास्थावान होना भी आपका सिद्ध नहीं होता। क्यों? क्योंकि पहले आपने उसे ईश्वर माना है और ईश्वर मान लेने के बाद आप उसके प्रति अनास्थावान नहीं हो सकते। अगर अनास्थावान हो जाओगे कि हम ऐसे ईश्वर को नहीं मानते जो बिना किसी आवश्यकता के सृष्टि नहीं बना सृष्टि बना देता है। तो फिर आपने जब उसको ईश्वर नहीं माना तो उसके द्वारा सृष्टि का बनना सिद्ध नहीं हुआ। तो फिर आपके पास यह बताने का कारण शेष नहीं रह गया कि ईश्वर ने बिना किसी प्रयोजन के सृष्टि बनाई इसलिए मैं उसे नहीं मानता। तो यही है परमार्थ और व्यवहार। परमार्थ में ईश्वर स्वयं को नष्ट नहीं कर सकता है। पर परमार्थ में नष्ट ना करने की वजह से हम उसकी ईश्वरता को मना नहीं कर सकते। अनास्था नहीं प्रकट कर सकते। क्यों नहीं कर सकते? क्योंकि वहां पर उसका स्वयं को नष्ट ना कर पाना तब सिद्ध हो पा रहा है जब हम ईश्वर को ईश्वर मान रहे हैं। और जब हमने ईश्वर को ईश्वर मान लिया तो हम उसके
00:11:18:16 प्रति अनास्थावान नहीं हो सकते। और अगर अनास्थावान हो गए तो फिर हमारे पास यह कारण शेष नहीं रह गया कि हम उसके प्रति अनास्थावान क्यों हो गए। तो इसी को मैंने वहां पर उस दिन भी बताया था। इसी बात को कहते हैं कि जिस प्रकार एक सोता हुआ व्यक्ति यह नहीं कह सकता कि मैं किसी की आवाज देने से जाग गया। क्योंकि अगर वह सुन रहा है तो उसका सोना सिद्ध नहीं होता और अगर वह सो रहा है तो उसका सुनना सिद्ध नहीं होता। अब बात यह आ जाती है कि अगर हम यह कह देंगे कि ईश्वर ने किसी आवश्यकता से सृष्टि बनाई हम नहीं कहते हमने तो बिना किसी प्रयोजन के जैसे कि एक नास्तिक भाई आए थे वह सवाल उठा रहे थे उनकी वीडियो में वो चक्कर काट काट के बातें कर रहे थे ये चक्कर काटना क्या है यूं ही कर रहे हैं यूं ही कर रहे हैं एक लेफ्ट टू राइट लेफ्ट टू राइट बार-बार ये कर रहे हैं यूं ही कर रहे हैं कोई उनका उसके आवश्यकता नहीं है कोई प्रयोजन नहीं है बिना किसी प्रयोजन के कर रहे हैं क्यों क्योंकि वो उनके अंदर शक्ति है तो वो स्फुटित हो रही है तो इसी प्रकार से भगवान जो है वह शक्ति है तो वह स्फुटित होने पर ही उसका ही परिणाम है संसार ठीक है तो उनके द्वारा यह संसार बनने के कारण बिना किसी प्रयोजन के हम उनके प्रति अनास्थावान नहीं हो सकते मैंने तर्क से भी सिद्ध कर दिया और
00:12:33:22 प्रमाण भी दे दिया श्वेता शत्रुपनिषद का बहुत सारी जगह प्रमाण है मगर अभी काम चलाने के लिए मैंने आपको एक जगह से दे दिया बहुत सारे प्रमाण जैसे एक वो बात उठी थी कि भाई वो व्यवहार और परमार्थ का बताओ मांड्योपनिषद में सातवें श्लोक में भगवान के लिए कहा जा रहा है कि वह व्यवहार में नहीं आ सकता। भगवान भगवान जो है व्यवहार में नहीं आ सकते हैं। तो इसका मतलब क्या हुआ भाई? भगवान तो श्री कृष्ण है। भगवान तो आ रहे हैं व्यवहार में। उनके उनको हम देख पा रहे हैं। उनके चित्र हैं हमारे हम उनकी पूजा कर रहे हैं। तो यह क्या हो गया? भगवान का व्यवहारिक स्वरूप। और जो जहां पे यह लिखा है कि भगवान व्यवहार में नहीं आ सकते। वो हो गया उनका पारमार्थिक स्वरूप। पारमार्थिक स्वरूप है वह प्राप्तव्य है। वह प्राप्त करने का विषय है। तो भगवान के द्वारा जो सृष्टि बनाना है जो यह उनके स्वरूप भूत लक्षण है। उनके अंदर विद्या है, अविद्या है। यह सब प्राप्तव्य का विषय है। अब एक तर्क ले लेते हैं इस बात में व्यवहार और परमार्थ। वैसे तो इस बात को जो इस आदि विचारधाराएं हैं तंत्र वह भी मानते हैं। जैसे कि यह आध्यात्मिक प्रेम है, आध्यात्मिक दया है, आध्यात्मिक संबंध है और वह भौतिक है। यह क्या है? यह भी व्यवहार और परमार्थ है। अब मगर इसको ऐसे ले लेते हैं
00:13:49:08 कि हम पूजा कर रहे हैं भगवान की। ठीक है? भगवान के मंदिर में जो कार्य हम नहीं करते, जो कार्य हम नहीं कर सकते, वह कार्य हम थोड़ी दूर जाकर के कर सकते हैं। क्यों? वहां पर भगवान नहीं है क्या केवल मंदिर में ही है क्या तो इसका अंतर क्या हुआ वहां भगवान जो है व्यवहारिक है ना व्यवहार हो रहा है वहां पर उनके मूर्ति के रूप में वो ख्यापित है और जहां पर आपका बेडरूम है या आपका शौचा शौचालय है वहां पर भगवान जो है पारमार्थिक रूप से हैं तो व्यवहारिक रूप से ना होने के कारण आप वहां पर वह कार्य कर पाते हैं जो कार्य आप मंदिर में नहीं करते तो ये क्या हुआ व्यवहार और परमार्थ का अंतर जैसे जैसे कि हम एक रास्ते में पड़े हुए एक गंदगी में पड़े हुए पत्थर आदि को हम पूजा नहीं करते। व्यवस्थित रूप से जहां प्राण प्रतिष्ठा हुई हो जिस देव विग्रह में उसकी हम पूजा करते हैं। तो इसका अर्थ क्या हुआ कि पत्थर में भी ईश्वर है। ऐसा नहीं है वहां जो गंदगी में पड़ा हुआ ईश्वर है। मगर व्यवहारिक व्यवहारिक भेद है। पारमार्थिक रूप से है वहां पे व्यवहारिक भेद है। जैसे कि ईश्वर कण-कण में है। माता बहन और पत्नी तीनों में है। मगर
00:15:04:09 व्यवहार में अंतर है। ठीक है? तो एक तो ये हो गया। अब बात यह कहती है कि मुझे हंसी आई कि मैंने जब यह जानने का प्रयास किया अगर अच्छा इसमें अंतत गतवा एक बात है कि यदि आप यह कह देंगे कि ईश्वर को आवश्यकता थी किसी प्रयोजन से उसने सृष्टि बनाई तो जब आप प्रयोजन कह देते हो ईश्वर का तो इसका अर्थ है कि वह सच्चिदानंद नहीं है। पूर्ण नहीं है। कुछ ऐसा था जो उसके पास नहीं है। जिसकी उसे आवश्यकता थी। ठीक है? तो अब जब हमने इस बारे में इस की जो विचारधारा है उसको पता लगाया तो बहुत ही हास्यप्रद बातें आई और मुझे ध्यान आया कि अभी हमने थोड़े दिन पहले इसी विषय पर एक चर्चा भी की थी लाइव वो क्या तथ्य सामने आए कि उनके अनुसार जो जीव है वो भोग करने की उसके अंदर प्रवृत्ति आती है भगवान से स्वतंत्र होकर के भोग करना तो इसलिए भगवान ने सृष्टि बनाई है कि सृष्टि में उसको भगवान डाल देते हैं और वहां से वह यह समझ पाता है कि भगवान से स्वतंत्र मुझे सुख नहीं मिलेगा और फिर वह वहां से मोक्ष को प्राप्त होता है। इसका अर्थ क्या है कि जहां पर जो इनके अनुसार मुक्ति है जो गोलोक धाम है वो मुक्ति नहीं है। क्योंकि वहां पर भी
00:16:19:18 जो जीव है वो अतृप्त हो रहा है। उसके अंदर ऐसी इच्छाएं आ रही है कि मुझे अभी और कुछ भी प्राप्त करना है। तो ये जो अगर वही मैंने कहा ना कि भाई तीन चीजें होनी चाहिए। सर्वशक्तिमान ईश्वर परम स्वतंत्र मोक्ष और शाश्वत धर्म तो ईश्वर सर्वशक्तिमान सिद्ध नहीं हो रहा है क्योंकि वह अपनी देह का नाश नहीं कर सकता है। है ना? क्योंकि वह लीला में व्यवहारिक स्तर पर भी देह का नाश नहीं कर सकता है। जैसे कई लोग कहेंगे तुम्हारा पारमार्थिक में तो है। भाई पारमार्थिक प्राप्तव्य का विषय है। परमार्थ में ईश्वर के सीमित निश्चित सुनिश्चित होने से या उसके अंदर अविद्या रूपी विद्या रूपी गुण लक्षण होने से हम यह नहीं कह सकते कि भाई हम उसके प्रति आनास्थवान हो गए। क्योंकि मैंने अभी बताया क्योंकि हम परमार्थ में परमार्थ को जान ही तब पा रहे हैं जब हमने किसी को ईश्वर मान लिया। अगर हमने उसको ईश्वर नहीं माना तो उसके द्वारा बताए गए परमार्थ का अस्तित्व सिद्ध नहीं होता। तो ईश्वर को ना मानने का कारण फिर हमारे पास शेष नहीं रह जाएगा।
00:17:22:07 मगर प्रॉब्लम वहां है जब ईश्वर व्यवहार में भी बाधित हो जाए कि व्यवहार में भी कृष्ण जो है अपने शरीर को नष्ट नहीं कर पा रहे हैं। तो मुझे इस बात की हंसी आई। पहली बात तो कि जीव को मुक्ति देने के लिए ईश्वर को संसार की आवश्यकता है। इसलिए उसने संसार बनाया। इसन के अनुसार अगर कुछ और हो तात्विक रूप से तो बताएं क्योंकि मैंने कई वीडियोस देखे अमोग लीला इत्यादि के तो उनमें वो यही बोल रहे हैं। अब इसके बाद क्या हो रहा है कि जीव जो है जब यहां से संसार से मुक्त है तब भी वो मुक्त नहीं है क्योंकि उसके अंदर अभी जो है अत मतलब वो तृप्त नहीं है। वह अतृप्त है। उसको भोग की लालसा आ रही है उसके मन में और यह लोग यह खुद कह रहे हैं। इसका मतलब कि वहां पर नित्य सुख नहीं है। इनके अनुसार जो गोलोक धाम है जहां पर मुक्त है व्यक्ति यहां से संसार से वह यहां से मुक्त है मगर वहां नित्य सुख नहीं है शाश्वत आनंद नहीं है सच्चिदानंद आनंद नहीं है वहां पर तो परम स्वतंत्र मोक्ष नहीं है तो यह सारी चीजें हैं जो मैं आपको बताना चाहता था इंटरेस्टिंग है आपको अच्छी लगी हो आशा करता हूं और इसके साथ ही साथ एक बात और है कि जो वो भगवान के जो लक्षण
00:18:37:20 है स्वरूपभूत लक्षण के वह उसके अंदर विद्या है उसके अंदर विद्याद है। इसीलिए वो ईश्वर है। इसीलिए वो ब्रह्म है। पहले तो यह समझो वो सृष्टि बनाता है इसलिए वो ईश्वर है। अगर हम इसके कारण उस पर अनास्थावान हो जाएंगे कि वो जो है बिना किसी प्रयोजन के या उसके अंदर विद्या भी अविद्या भी है। हम अनास्थावान हो गए तो वही वाली बात कि आप जैसे एक सोता हुआ व्यक्ति यह नहीं कह सकता कि मैं सुन करके जाग गया। क्योंकि अगर वह सो रहा है तो उसका सुनना सिद्ध नहीं होता और अगर वह सुन रहा है तो उसका सोना सिद्ध नहीं होता। इसी प्रकार से यदि आप ईश्वर के प्रति अनास्था हो तो आपका उसके अंदर विद्या होना या उसके द्वारा सृष्टि की रचना होना यह जानकारी प्राप्त करना सिद्ध नहीं होता और अगर आप ईश्वर को मानते हो तो फिर इन जानकारियों के आधार पर उसको उसके प्रति अनास्थावान होना सिद्ध नहीं होता। ठीक है? तो कुल मिलाकर के आज हमने क्या जाना कि हां और एक चीज और यह जो ईश्वर के स्वरूप भूत लक्षण है यह लक्षण है गुण नहीं है। इस कारण से ईश्वर को निर्गुण कहा जा सकता है। ईश्वर को निर्गुण कहा गया है। और इसके साथ ही साथ अगर आप इसको गुण की संज्ञा दे भी रहे हो तो यह वो गुण नहीं है जिनको गुण कहा गया
00:19:52:21 है शास्त्रों में। शास्त्रों में गुण किसे कहा गया? सतरज और तम जिनसे सृष्टि बनी। तो सृष्टि बनने से पहले के जो लक्षण है ईश्वर के अगर आप उनको गुण की संज्ञा दे भी रहे हो तो यह वो गुण नहीं है जिसको हम गुण कहते हैं। तो इस सापेक्ष से भी उसको आप निर्गुण कह सकते हैं। अर्थात मनुष्य दृष्टि से जो गुण है वो गुण ईश्वर के नहीं है। इसलिए वो निर्गुण है। ठीक है? तो एक ये भी यहां पर भी वही बात आ गई कि अब वो क्योंकि निर्गुण है तो इसलिए मैं उसके प्रति अनास्था मान हूं। वो नहीं हो सकते। वो निर्गुण है। यह पता कैसे चला? जब आपने यहां व्यवहार में किसी को ईश्वर माना तब उसने बताया वह निर्गुण है। तो उसके निर्गुण होने के कारण भी आप उसके प्रति अनास्थावान नहीं हो सकते। क्यों? क्योंकि उसका निर्गुण होना भी परमार्थ का विषय है। प्राप्तव्य का विषय है। तो क्योंकि भाई उसके अंदर मैं यह नहीं कह सकता कि वो निर्गुण है और जो है वो निर्गुण है। इसलिए मुझे उसमें आस्था नहीं है। नहीं क्योंकि वो उसका निर्गुण होना परमार्थ का विषय है। और आप उस परमार्थ तक पहुंच कब रहे हो? जब आपने उसे ईश्वर मान लिया। तो अगर आपने उसे ईश्वर मान लिया तो उसके निर्गुण होने के कारण आप उसे उसके प्रति अनास्था नहीं हो सकते और अगर उसके प्रति अनास्थावान हो तो आप उसे ईश्वर नहीं मान सकते। जब ईश्वर नहीं मान सकते तो आप उसके उसका निर्गुण होना या उसके प्रति उसके द्वारा सृष्टि
00:21:08:02 का निर्माण होना या फिर उसके उसका स्वरूप उसका ततस्थ लक्षण विद्या होना ये इन सब की बात नहीं कर सकते कि मैं इसके कारण इसके प्रति अनास्था हुआ। अब [गला साफ़ करने की आवाज़] तो आज हमने क्या जाना? ईश्वर सृष्टि की रचना बिना किसी प्रयोजन के करते हैं। क्योंकि उनके द्वारा सृष्टि की रचना होना ही यह सिद्ध करता है कि वह ईश्वर हैं। तो बिना किसी प्रयोजन के उनके द्वारा सृष्टि रचना होने के कारण हम उनके प्रति अनास्था नहीं हो सकते क्योंकि उनके द्वारा सृष्टि रचना होना सिद्ध ही तब हो रहा है जब हमने उन्हें ईश्वर मान लिया है। ठीक है? पहला हमने ये सीखा। दूसरा हमने क्या सीखा कि शक्ति शक्तिमान को कभी भी द्वैत भाव में नहीं डालती। अगर ईश्वर के ईश्वर में अविद्या है, ईश्वर में विद्या है या उसका ततस्थ लक्षण है या स्वरूप भूत लक्षण है उसके द्वारा सृष्टि निर्माण होना तो ये सब उसकी शक्तियों का परिणाम है। उसके लक्षण है। उसके गुण [गला साफ़ करने की आवाज़] नहीं। तो इसलिए हम उसे द्वैत नहीं कह सकते। यहां मैं द्वैत का खंडन नहीं कर रहा हूं। व्यवहार में द्वैत ही द्वैत है। हम लोग भी अपने जीवन में यह मान के नहीं चलते हैं कि हम ही ब्रह्म है। हम ही राम है।
00:22:23:03 राम के साथ एकत्व को प्राप्त करना हमारे जीवन का लक्ष्य है। हम राम है नहीं। क्योंकि हम राम है तो फिर हमारी माता भी राम है। हमारी पत्नी भी राम है, हमारी बहन भी राम है, छोटे भाई भी राम है, सब राम है। और जब हम ऐसा है तो फिर व्यवहारिक भेद क्यों आ रहा है? तो व्यवहार के भेद का निर्वाह करते हुए परमार्थ के अभेद की प्राप्ति करना हमारे जीवन का उद्देश्य होता है। होना चाहिए और इसी के द्वारा ईश्वर को सर्वशक्तिमान भी सिद्ध किया जा सकता है एकमात्र इसी सिद्धांत के द्वारा। तो हम यह नहीं कहते हैं कि आप अपना नाम बदल लो, अपने मंदिर बंद कर दो, आप अपने गुरु बदल लो ना। ईश्वर को सर्वशक्तिमान कहो। ईश्वर को बाधित मत कहो। जिससे कि धर्म की जो स्थापना है उसमें कोई बाधा ना आए। क्योंकि ईश्वर जब जैसे ही वह बाधित होगा तो वह ईश्वर नहीं रह जाएगा। ईश्वर नहीं रह जाएगा। ईश्वर का अस्तित्व नष्ट होने लगेगा। नास्तिकवाद बढ़ेगा। नास्तिकता बढ़ेगी। अधर्म बढ़ेगा। माता बहन और पत्नी में अंतर करने वाले नियम लुप्त होने लगेंगे।
00:23:22:19 थोड़ा समझने का भी प्रयास करिए। तो संक्षिप्त में यह सारी बातें हैं कि ईश्वर के द्वारा बिना प्रयोजन के सृष्टि के निर्माण होने के कारण हम उसके प्रति अनास्थावान नहीं हो सकते। दूसरी बात है कि ईश्वर बिना किसी प्रयोजन के सृष्टि बनाता है। यही हमें स्वीकार करना पड़ेगा। अगर नहीं करेंगे तो ईश्वर बाधित सिद्ध हो जाएंगे। अतृप्त सिद्ध हो जाएंगे या फिर सीमित सिद्ध हो जाएंगे। सच्चिदानंद स्वरूप सिद्ध नहीं होंगे। दूसरी बात कि ईश्वर में दूसरी बात ईश्वर के स्वरूप भूत या तथस्थ लक्षण जो हैं ईश्वर के द्वारा सृष्टि का निर्माण होना विद्या होना तो इन सब के कारण भी हम उसके ऊपर उसके प्रति अनास्थावान नहीं हो सकते क्योंकि यह सब परमार्थिक विषय व्यवहारिक विषय नहीं है। अनास्थावान होना ये क्या है? व्यवहार और वह परमार्थिक विषय है। ठीक है? तीसरा कि इसन के द्वारा यह बताया जाना कि जो जीव है उसके अंदर भोग की प्रवृत्ति आती है इसलिए वह संसार में आता है। भगवान के द्वारा संसार में भेजा जाता है। तो यह भी बहुत ज्यादा विवादास्पद शिक्षा है क्योंकि वह मुक्ति को भी मुक्ति नहीं कह रहे हैं क्योंकि उनकी मुक्ति भी बाधित है। वहां पर भी उसके मन में जो है असंतुष्टि है। जीव के अंदर असंतुष्टि व्याप्त
00:24:37:25 है। नित्य सुख नहीं है। नित्या आनंद नहीं है। ठीक है? यह जाना और क्या जाना कि निर्गुण क्यों कहा जा रहा है? क्योंकि यह जो विद्या सृष्टि का सृजन यह उसके स्वरूपभूत लक्षण है। तथष्ट लक्षण है। और यदि इनको आप गुण भी कहेंगे तब भी मनुष्य दृष्टि से वो निर्गुण ही सिद्ध होते हैं। क्योंकि मनुष्य के अनुसार जो गुण है मनुष्य दृष्टि से सत रज और तम वो जो है उन वो गुण वो उन गुणों से भगवान परे हैं। इसलिए वो निर्गुण सिद्ध होते हैं। और इस कारण से भी हम उसके प्रति अनास्था नहीं हो सकते। क्योंकि वही वाली बात कि सो रहे हो तो सुनना सिद्ध नहीं होता और सुन रहे हो तो सोना सिद्ध नहीं होता। ठीक है? तो इसी प्रकार से किसी परमार्थिक कारण से हम ईश्वर के प्रति अनास्थावान नहीं हो सकते। क्योंकि अगर हम ईश्वर के प्रति अनास्थावान हैं तो उन पारमार्थिक कारणों को जानना सिद्ध नहीं होता और उन परमार्थिक कारणों को जान रहे हैं तो हमारा ईश्वर को ना मानना सिद्ध नहीं होता। आप तो थोड़ा बहुत चिंतन मनन और श्रवण भी करना शुरू करिए क्योंकि अभी आप जो मूल सिद्धांत है ना सनातन के सर्वशक्तिमान ईश्वर परम स्वतंत्र मोक्ष और शाश्वत धर्म इनसे बहुत दूर हैं। ठीक है? तो आशा करता हूं आप सबको यह सारे जो तथ्य
00:25:52:28 हैं एक बार और मैंने स्पष्ट करने का प्रयास किया है। अच्छे लगे हो। जय श्री राम। [संगीत]
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ईश्वर ने यह सृष्टि क्यों बनाई? #nastik #iskcon #aryasamaj #vedpuran
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