⬜ Not used yet · 00:00:00:08 – 00:04:39:25 (4:40)
00:00:00:08 और कोई भी परंपरा प्राप्त आचार्य शास्त्रों का ऐसा अर्थ नहीं करते जिससे कि स्त्रियों के यज्ञ पवित का समर्थन हो यदि कोई व्यक्ति ब्रह्म के बारे में बात कर रहा है भगवत चर्चा कर रहा है धर्म चर्चा कर रहा है अथातो धर्म जिज्ञासा की बातें कर रहा है तर्क कर रहा है बात कर रहा है भले ही संस्कृत में कर रहा हो इसका अर् इससे सिद्ध नहीं होता कि व उपनीत है मनुस्मृति 1237 जिस कार्य को करते समय छिपाने का भाव उत्पन्न हो वो तामसिक और जिस कार्य को करते समय ने का भाव उत्पन्न हो वो सात्विक कार्य होता है अब वैसे तो बहुत सारी चीजें इसके गुण अर्थ में जाएंगे तो बहुत सारी डेफिनेशन है पर मैं आपको सीधे-सीधे पूछ रहा हूं मिस्टर हाइपर क्वेस्ट कि एक पुरुष की अपेक्षाकृत क्या स्त्री के जीवन में छिपाने वाले जो कार्य होते हैं वो ज्यादा नहीं होते हैं ये जो छिपाने वाले भाव है ना इसी के आधार पर दुनिया में अच्छाई और बुराई टिकी हुई है चोरी करते समय छिपाने का भाव आता है इसलिए वो तामसिक है दान करते समय दिखाने का भाव आता है इसलिए वह सात्विक है मास को प्राप्त करते समय छिपाने का भाव आता है इसलिए वो तामसिक है हरी सब्जी लेते समय प्राप्त करते समय बताने का भाव आता है कोई छिपाने का भाव नहीं आता इसलिए वह सात्विक
00:01:15:09 है और इस छिपाने वाले भाव के ही कारण जो चित्त होता है उसकी अलग-अलग स्थितियां हो जाती हैं जो दिन भर में छिपाने के कार्य ज्यादा कर रहा है उसका चित्त अलग प्रकार का तैयार हो जाएगा और जो दिन भर में छिपाने के कार्य कम कर रहा है उसका चित्त अलग सामर्थ्य वाला होगा इस अलग-अलग सामर्थ्य के दृष्टिकोण से दोनों की भगवान को प्राप्त करने की जो विधि है उसमें अंतर रखा गया है भगवान को प्राप्त करने में तो अंतर नहीं रखा गया इसीलिए भागवत पुराण में कहा गया है कि वेदोक्त कर्मों में होने वाली जो संभावित भूल चूक है उसको रोकने के लिए स्त्रियों के लिए पुराणों की रचना की गई है स्त्रियों के उद्धार के लिए पुराणों की रचना की गई है पुराण क्या है वेदों का अर्थ पुराण से भी उसी ब्रह्म की प्राप्ति होती है उसी धर्म की प्राप्ति होती है जो वेदों से होती है बस जो वेदों के जो भारी भरकम मंत्र हैं वह यहां नहीं होते हैं जिन मंत्रों के उच्चारण हेतु छिपाने के कार्य ज्यादा करने वाले का जो चित्त है वह उपयुक्त नहीं है क्योंकि यह जो मंत्र है आप भले ही माने ना माने यह मंत्र अत्यंत गंभीर अत्यंत पावरफुल अत्यंत संवेदनशील मंत्र होते
00:02:30:24 हैं यह जितने तारक होते हैं उतने ही मारक भी होते हैं इसी क्रम में आगे एक स्त्री के शरीर में रज धातु ज्यादा होती है और पुरुष के शरीर में शुक्र धातु ज्यादा होती है शुक्र धातु ज्यादा होने के कारण पुरुष में क्षमता ज्यादा होती है स्त्री के शरीर के अपेक्षाकृत और स्त्री के शरीर में रज धातु होने के कारण ऐसे गुण ज्यादा होते हैं जो पुरुष के पास नहीं होते हैं जैसे कि गर्भ धारण कर पाना संतान उत्पन्न कर पाना संतान का भरण पोषण करवा पाना यह सारे गुण मातृ शक्ति को प्राप्त है दुनिया के प्रत्येक मनुष्य के अंदर जो माइट्रोकांड्रिया जहां से एनर्जी जनरेट होती है वह जो पार्ट आता है वह पार्ट आता है मां से मां कौन है शक्ति नारी कौन है शक्ति तो मनुष्य के शरीर में उसको शक्ति कौन दे रहा है उसकी मां से आया हुआ पार्ट माइट्रोकांड्रिया वहीं से एनर्जी जनरेट होती है प्रोवाइड होती है पूरी बॉडी में जहां पर हमारा सारा यह फैट वगैरह जाकर के जलाया जाता है बर्न होता है वो होता है माइट्रोकांड्रिया और फिर मेरे भाई यह सिर्फ विधि का अंतर है रास्ते का अंतर है मार्ग का अंतर है उस मार्ग के द्वारा प्राप्त होने वाले लक्ष्य से किसी
00:03:46:00 को वंचित रखा गया क्या फल से किसी को वंचित किया गया क्या यह कहीं पर कहा किसी ने परंपरा प्राप्त आचार्य ने कि नहीं नहीं स्त्रियों को भगवत प्राप्ति नहीं होगी केवल पुरुषों को ही होगी इतना तो स्वामी दयानंद सरस्वती ने भी अपनी सत्यार्थ प्रकाश में माना कि मार्ग वही सही जिससे फल की प्राप्ति हो अभीष्ट फल की प्राप्ति हो तो जब अभीष्ट फल प्राप्त हो रहा है तो मार्ग कोई दूसरा होने में दिक्कत क्या है और अगर दिक्कत है तो इसका अर्थ यह है कि आपकी भगवत प्राप्ति में कोई रुचि नहीं है अपनी वर्चस्व स्थापित करने में है और वह वर्चस्व स्थापित करने का प्रयास भी खोखला है क्योंकि उससे मिलने वाले फल को तो आप अप्रत्यक्ष रूप से नकार ही रहे हो ना क्योंकि जिस शास्त्र में भगवत प्राप्ति दी जा रही है उसी शास्त्र में आपको विधिक रोग भी है कि यह वाली चीज आप ना करो आप दूसरी वाली चीज करो यह मन में गायत्री मंत्र का जप करेंगे और आप खुलकर उसका अर्थ जप करो
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00:04:39:25 जनक सुता जग जननी जानकी अतिशय प्रिय करणा दन की ताके जुग पत कमल मनाव जा सु कृपा निर्मल मति पाव करो
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00:04:50:06 जब ये जो शारीरिक भेद है अगर इसके अनुसार विधिक भेद नहीं किया जाएगा तो स्त्रियों के शरीर की जो क्षमता होती है प्रजनन क्षमता व प्रभावित हो सकती है इन सारी तार्किक व्याख्या हों को ध्यान में रखते हुए हमारे परंपरा प्राप्त प्रामाणिक आचार्यों द्वारा स्कारे गए वह प्रमाण जो स्त्रियों के जनव को निषेध सिद्ध करते हैं वेदोक्त कर्मों में होने वाली संभावित भूल चूक के कारण पुराणों की रचना हुई है क्योंकि जीवन शैली और शारीरिक क्षमता में अंतर होने का कारण स्त्रियों का शरीर वेदोक्त कर्मों के लिए उपयुक्त नहीं होता है अरे भाई मैं खुद मेरा शरीर भी बहुत से कर्मों के लिए अनुपयुक्त है मैं स्पाइडरमैन के तरह छलांग नहीं लगा पाऊंगा तो इसका मतलब यह हो गया कि मैं आज से हीन विचारधारा पाल लू अपने लिए अपने मन में किसी भी मनुष्य के लिए सबसे ऊंची पदवी हो सकती है राम का भक्त होना सनातनी होना यह क्या कम है क्या क्या मतलब है कि सनातनी होते हुए हमारा कुछ अलग विधि है महिलाओं की कुछ अलग विधि है फला ने की कुछ अलग विधि है उससे क्या फर्क पड़ता है मोक्ष तो सबका एक ही है
00:06:05:07 ना भगवत प्राप्ति आपसे किसी ने कहा कि महिलाओं को वेदों का अर्थ नहीं बताया जाएगा ब्रह्म ज्ञान नहीं दिया जाएगा भगवत प्राप्ति का ज्ञान नहीं दिया जाएगा कौन से आचार्य हैं कौन से ऐसे रूढ़िवादी आचार्य आपने रूढ़िवादी शब्द का उपयोग किया था गायत्री मंत्र ओमकार यजुर्वेद प्र लक्षित यज्ञ यह सभी कार्य स्त्रियों के लिए निषेध यदि वह हटात इन्हें ग्रहण करती हैं तो उनका जीवन दुष्प्रभाव होता है उनका परमार्थ भी दुष्प्रभाव होता है और इन्हें मर्यादा का अतिक्रमण करते हुए उपदेश करने वाला आचार्य जो है उसका भी जीवन बाधित होता है दुष्प्रभाव होता है स्त्री पुरुष के समान नहीं होती है ब्रह्मचर्य आदि कई बातें हैं जिसमें वह पुरुष से भिन्न होती है यहां क्यों कहा गया कि ब्रह्मचर्य आदि में स्त्रियां भिन्न होती है पुरुषों से मल मूत्र का त्याग करते समय इतना नियंत्रण रखा जा सकता है कि कान पर जनेऊ चढ़ाने का आपको अवसर और समय प्राप्त हो जाए पर क्या स्त्रियों का जब मासिक धर्म आता है तो क्या उनके पास य अवसर होता है कि वह पहले जने को कान पर चढ़ाए शरीर भिन्न उपयोगिता भिन्न कार्य भिन्न जीवन शैली भिन्न पर विधि वही होनी चाहिए
00:07:21:00 क्योंकि हमें भगवत प्राप्ति में इंटरेस्ट नहीं है हमें तो अपनी वर्चस्व होता सिद्ध करनी है और वो वर्चस्व सिद्ध करने का जो भाव हमारे मन में डाला गया है इंजेक्ट किया गया है वह उन लोगों के द्वारा जिन्ह सनातन धर्म से दिक्कत है जो खत्म करने पर तुले हुए हैं गायत्री मंत्र का इतना गलत तरीके से उच्चारण करवाओ इतना गलत तरीके से उच्चारण करवाओ कि वही एक विस्पोट बन कर के सनातन समाज को भ्रष्ट कर दे आपके शत्रु गायत्री मंत्र की महिमा आपसे ज्यादा जानते हैं आप नहीं जानते हैं यही अंतर है स्त्रियों को वेद का अधिकार नहीं है विवाह को छोड़कर स्त्रियों के जीवन में जितने भी संस्कार होते हैं वह सब मंत्रों के बिना होते हैं स्त्रियों का विवाह ही उनके उपनयन संस्कार के समान होता है इसीलिए एक ब्रह्मचर्य आश्रम में रहने वाला जो ब्रह्मचारी होता है वह तीन सूत्रों का जने उ धारण करता है पर विवाह के बाद जब वह गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करता है तो वह छह सूत्रों का जने उ धारण करता है कारण कि अब वह अपनी पत्नी का जने भी धारण कर रहा है थोड़ा प्रायोगिक धरातल पर भी देखिए कन्या युवती स्त्री यज्ञ में होता नहीं बन सकती उसी मनुस्मृति में लिखा
00:08:36:04 है जिसमें हाइपर क्वेस्ट वाले भाई साहब कह रहे थे कि नहीं मनुष प्रति के आधार पर हम बताते हैं आपको एक जगह भी इन्होंने नहीं बताया कि सीता माता ने गायत्री मंत्र का जप किया हो रामायण हमारे लिए आदर्श है बताया सीता माता के द्वारा जप करना गायत्री मंत्र का मैंने राम के द्वारा गायत्री मंत्र का जब आपको बता दिया इसी
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→ Used in: A · Video Reply to janhavi singh @Gita Se Gyaan | Stree yagopaveet mimansha -4 | the Conc... at 7:41 ↗
00:08:55:15 क्रम में आगे अगर हम देखें तो जहां पर भी वेद अध्ययन के निमित्त उपनी होने की बात हो रही उपनयन संस्कार होने की बात हो रही है वहां पर पुरुषवाचक शब्दों का केवल उपयोग किया गया है जैसे कि ब्रह्मचारी ही आचार्य बनता है आचार्य ब्रह्मचारी को उपनीत करके अपने पास तीन दिन तक रखता है द्विज से जन्मा द्विज ही यज्ञ में होता हो सकता है
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00:09:16:27 अच्छा सबसे रोचक बात यह है कि स्वामी दयानंद सरस्वती जी भी जब यह बताते हैं कि किसका जन्य किस ऋतु में होना चाहिए तो यह ब्राह्मण बालक की बात करते हैं बालक की बात करते हैं क्षत्रिय बालक की बात करते हैं पर ब्राह्मण बालिका वैश्य बालिका क्षत्रिय बालिका की बात ही नहीं करते कैसे करें क्योंकि शास्त्रों में यदि बालिकाओं का जनय होना होता तो कहा जाता ना कि इस बालिका का जन इस ऋतु में कराना यह तो बताया ही नहीं गया है क्योंकि उसका कोई विधान है ही नहीं बताया क्यों जाएगा तो फिर दयानंद सरस्वती जी कैसे बताते इसी प्रकार से प्रमाण का अभाव और कहां है यदि महिलाएं जनेय धारण कर सकती हैं तो मल मूत्र के त्याग के समय क्या करना है यह बताया गया है संभोग के समय क्या करना है यह बताया गया है क्या मासिक धर्म के समय क्या करना है यह बताया गया है एक दूध मुहे बच्चे को जिसको नहीं पता है कि मुझे क्या छूना है क्या नहीं छूना है उस समय के बारे में क्या बताया गया है कि आपको जनेऊ के साथ क्या करना है कहां चढ़ाना है जनेऊ क्योंकि जो ग्रहणी होगी उसके संतान होगी उसको स्तनपान करना होगा अपने दूध मुह शिशु को जिसको
00:10:32:02 नहीं पता है कि मैंने अभी कहां हाथ लगाया अब कहां लगा रहा हूं तो जब वह हाथ लगाएगा अगर तो फिर कहां जाएगा व परमम पवित्रम अब हम उन प्रमाणों के बारे में बात करेंगे जिनसे कि स्त्रियों का जिने होना व्यवहारिक सिद्ध नहीं होता है व्यवहार में नहीं लिया जा सकता केवल बातें कर लीजिए आप आचार्य ब्रह्मचारी को उपनीत कर तीन रात्रि तक अपने पास रखता है किस स्त्री के लिए अपने आचार्य के पास तीन रात्रि तक रहना व्यवहारिक है ब्रह्मचारी मेखला कौपीन धारण पूर्वक ब्रह्मचर्य धारण करता है ये व्यवहारिक है क्या एक स्त्री का मुंडन होना व्यवहारिक है यज्ञो पवित के समय आचार्य द्वारा नहाना वस्त्र पहनना यह सब व्यवहारिक है महिलाओं के लिए मात्र शक्तियों के लिए क्या कभी भी मासिक धर्म प्रारंभ हो जाने की संभावना बनी रहने की स्थिति में भी स्त्री का परमम पवित्रम यज्ञोपवित धारण करना व्यवहारिक होगा क्या क्या पवित्र अपवित्र में भेद ना कर पाने वाले दूध मुहे शिशु को स्तन पान कराने वाली महिला का यज्ञ पवित धारण करना व्यवहारिक होगा इसीलिए स्त्रियों की भगवत प्राप्ति हेतु पौराणिक विधा का विधान किया गया जिससे कि वो उन मर्यादाओं से उस भार से मुक्त रहे
00:11:47:13 जो वेदोक्त कर्मों को करते समय आने वाले हैं अगर एक ब्राह्मण पुरुष की बात करें ना तो अन्न खाने के बाद 16 कुल्ले दातून के बाद 12 कुल्ले सौज के बाद आठ कुल्ले संभोग के बाद आठ कुल्ले मूत्र त्याग के बाद चार कुल्ले पूरे दिन कुल्ले में ही बीत जाएगा इसीलिए एक को यह टिपिकल लाइफ दी गई और दूसरे को ऐसी लाइफ दी गई कि वह खुद की लाइफ आसानी से जी सके और इसकी टिपिकल लाइफ में मदद भी कर सके सबको एक जैसा कर दो तो संसार है ही नहीं हां अब कुछ लोग ऐसा कर अब कुछ लोग ऐसा कह सकते भाई यह शारीरिक भेद भी क्यों दिया भगवान ने तो मेरे भाई जब आप यह प्रश्न करते हैं ना शारीरिक भेद भी क्यों दिया है ईश्वर ने तो आप अप्रत्यक्ष रूप से बोल रहे होते हैं कि भगवान ने संसार बनाया ही क्यों है क्योंकि भेद का नाम ही संसार है मुझे मोबाइल की जरूरत तब तक है जब जब तक मोबाइल में कुछ ऐसे गुण है जो मेरे अंदर नहीं है इसलिए मोबाइल का मेरे लिए अस्तित्व है मुझे मोटरसाइकिल इसलिए चाहिए क्योंकि मोटरसाइकिल के पास कुछ ऐसी चीजें हैं जो मेरे पास नहीं है इसलिए मेरे सामने मोटरसाइकिल का अस्तित्व है मुझे एक माता के रूप में एक बहन के रूप में एक पत्नी के रूप में मातृ शक्ति तब तक आवश्यक है जब तक
00:13:02:19 मेरे पास उसके गुण नहीं है अगर सब कुछ इक्वल ही हो गया किसी भी देश काल परिस्थिति का अंतर है ही नहीं तो फिर संसार है कहां एजिस्ट कहां करता है फिर यह तो अभेद की स्थिति हो गई ईश्वर हो गए आप तो ऐसे कुतर्क करना ऐसे घनघोर कुतर्क करना बंद करें थोड़ा सम कर ले कि हमने क्याक जाना निष्कर्ष यह है कि सभी श्रुति स्मृति शास्त्रों में कई प्रमाण ऐसे हैं जिनसे कि स्त्रियों के जने की निषेध सिद्ध होती है सभी श्रुति स्मृति शास्त्रों में कई प्रमाण ऐसे हैं जिनमें कि यज्ञोपवित के निमित्त ऐसी विधियां बताई गई हैं जो कि स्त्रियों के लिए व्यवहारिक सिद्ध नहीं होती मुंडन नहाना वस्त्र पहनना कोपन पहनना आदि इसके अलावा यदि स्त्रियां जने धारण करती हैं तो स्त्रियों के जीवन में जो जो स्थिति परिस्थिति पुरुषों से भिन्न होती है उन स्थिति परिस्थितियों में जनय की पवित्रता का निर्वाह किस प्रकार करना है इस बारे में कोई प्रमाण नहीं है शास्त्रों में जैसा कि मैंने बताया शिशु को स्तनपान कराते समय अथवा मासिक धर्म के समय कैसे
00:14:17:25 पवित्रता का निर्वाह करना है कैसे यज्ञ पवित की पर पवित्रता को बचाना है इस बारे में कोई प्रमाण नहीं है शास्त्रों में जिससे भी यह सिद्ध होता है कि यज्ञोपवित का विधान पुरुष को ध्यान में रख कर के किया गया है और उनकी जीवन शैली के निमित्त ही यह बताया गया है कि आपको इस इस स्थिति में ये ये कार्य करने हैं श्रुति शास्त्रों में ब्रह्मचारी की दाढ़ी मूछ की बातें की गई हैं क्या स्त्रियों के दाढ़ी मूछ होती है किसी भी कारण वश वेद मंत्रों का साक्षात्कार हो जाने से वैदिक ज्ञान हो जाने से यह सिद्ध नहीं होता कि हमें प्रत्येक सामान्य स्त्री का जनव करवा देना चाहिए और उसे वेदा अध्ययन कराना चाहिए यह ना सोचते समझते हुए कि कि उसकी जीवन शैली अलग है पुरुष की जीवन शैली अलग है उसके शरीर की क्षमता अलग है पुरुष के शरीर की क्षमता अलग है मैं अलग कह रहा हूं ज्यादा या कम नहीं कह रहा यह ध्यान रखिएगा यह ना सोचे स्त्रियां कि उनके शरीर की क्षमता कम है अलग है डिफरेंट है इसलिए आपका मार्ग अलग है यदि कोई स्त्री भगवत चर्चा करती है ब्रह्म ज्ञान की बात करती है यदि कोई स्त्री भगवत प्राप्ति के निमित्त वंदना करती है उपासना करती है तो इससे भी यह सिद्ध नहीं होता है कि उसने वह ब्रह्म ज्ञान वेदोक्त मार्ग
00:15:33:03 पर चलकर प्राप्त किया है क्योंकि पुराणों के आधार पर भी ब्रह्म ज्ञान प्राप्त होता है पुराणों के आधार पर भी भगवत प्राप्ति के निमित्त संध्या बंदन होता है संध उपासना होती है और क्योंकि वेदों के अर्थ पर सभी का अधिकार है इसलिए वेदों का अर्थ किसी को भी मालूम हो सकता है तो वेदों का अर्थ ज्ञात होने से यह सिद्ध नहीं होता है कि स्त्रियों का ज कराना चाहिए और स्त्रियों को वेदा अध्ययन करना चाहिए वेद मंत्रों का जाप करना चाहिए हां यदि वोह किसी यज्ञ में यजमान है उनके पति वहां बैठे हुए हैं उस समय वो वेद मंत्रों का श्रवण कर सकती हैं और अमुक अमुक मंत्र जो उनके द्वारा बोले जाने अनिवार्य हो उनका उच्चारण भी उनके मुख से होना शास्त्र उचित होता है अब वो शूद्र कर्म से है या जन्म से है वो बात तो बात की है मगर शूद्रों द्वारा तो वेद मंत्रों का जाप या वेद मंत्रों का मनन या वेद मंत्रों का श्रवण सब कुछ वर्जित है जिस समय जहां पर यज्ञ हो रहा होता है उस यज्ञ की पदी में क्या शूद्र सेवा कार्य नहीं दे रहे होते हैं उस तरह से क्या उनके कानों में वेद मंत्र नहीं जा रहे होते हैं वेद मंत्र जा रहे होते हैं तो क्या उनका चिंतन मनन श्रवण नहीं चल पाता है इसका अर्थ क्या है कि उस यज्ञ की सीमा में अमुक अमुक स्थितियों
00:16:48:10 में स्त्री द्वारा भी वेदों का श्रवण अथवा अमुक अमुक मंत्रों का उच्चारण ग्रहण करने योग्य है और उस यज्ञ की सीमा में वहां पर उपस्थित शूद्रों द्वारा वेद मंत्रों का श्रवण मनन भी ग्रहण करने योग्य हो जाता है जीवन शैली में छिपाने वाले कार्यों की अधिकता और अभाव के कारण चित्त में पड़ने वाले प्रभाव के चलते स्त्री और पुरुष दोनों के जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में विधियों का अंतर है इसी प्रकार से स्त्री और पुरुष दोनों की क्षमता में अंतर होने के कारण दोनों की जीवन शैली के प्रत्येक क्षेत्र में विधियों का अंतर है और अंत में दोनों के केवल मार्ग अलग हैं लक्ष्य किसी का अलग नहीं है विधि अलग है प्राप्ति किसी की अलग नहीं है मंत्र अलग है जाप अलग है भगवान किसी के अलग नहीं है अगर एक गायत्री मंत्र पढ़ रहा है तो दूसरा उसका अर्थ पढ़ रहा है इतना सा अंतर है प्राप्त तो वही राम हो रहे हैं प्राप्त तो वही भगवान हो रहे हैं यदि किसी ने आपके मन में यह डाल भी दिया है कि नहीं आपका समाज स्त्रियों को
00:18:03:13 हीन मानता है इसलिए उसको गायत्री मंत्र का उच्चारण नहीं करने देता है उसको उसके अर्थ का उच्चारण करने की आज्ञा देता है तो मैं आपसे पूछना चाहता हूं क्या गायत्री मंत्र श्रेष्ठ और उसका अर्थ नीच है निम्न है आप बताइए अथवा उनसे पूछिए जिन्होंने आपके मन में यह भेद बुद्धि डाली है जो आर्य समाज लड़कियों के जन का समर्थन करता है उसी आर्य समाज ने यह तक लिखा है कि आप लिंग की पूजा करते हैं और भगवान रहते हैं कैलाश में तो लिंग जब यहां पर है तो वह क्या वहां पर नपुंसक है बहुत ही गलत वहां पर आपत्ति जनक शब्द का उपयोग हुआ
00:18:48:01 है तो जब आप सनातनी होते हुए शिव का मजाक उड़ा सकते हो तो क्यों किसी मुसलमान के द्वारा शिव को शिवलिंग को गुप्तांग कह देने पर भड़कते हो क्यों भड़कते हो या तो यह पाखंड है या फिर वह पाखंड है या फिर बात शिवजी के अपमान की नहीं है बात इसकी है कि उसने अपमान क्यों किया यह कितना भी अपमान कर दे कोई दिक्कत नहीं है बात माता की गरमा की रक्षा की नहीं है बात है कि मुसलमान ने माता की गरमा कैसे भंग कर दी अगर कोई स्वयं को हिंदू कहते हुए माता की गरमा भंग कर देगा तो कोई दिक्कत नहीं है है ना और अंत में मैं कहूंगा 100 की सीधी एक बात 100 की सीधी एक बात वैसे तो मेरे भाई हाइपर क्वेस्ट आप वेद पुराण स्मृति भगवत गीता महाभारत सबको मानते हैं मगर फिर भी मैं यह कह रहा हूं कि जो व्यक्ति परंपरा प्राप्त आचार्य द्वारा स्वीकार किए जाने वाले सिद्धांतों को नहीं मानता है वो व्यक्ति परंपरा से प्राप्त होने वाले वेद मंत्रों को कैसे मान सकता है आपने
00:20:03:08 घन पाठ जटा पाठ वाला वीडियो बनाया था परंपरा पर विश्वास करते हैं आप बताइए कितनी ऐसी परंपराएं हैं जिसमें स्त्रियों ने घन पाठ जटा पाठ याद करे हो कितने आज के आज के वर्तमान समय में कुछ महिलाओं को करा भी दिया गया होगा ना तो पीछे आप उनकी परंपरा में यह नहीं निकाल पाएंगे कि यह महिलाओं का ये जत्था ऐसा था जो घन पाठी था यह जत्था यह जत्था ऐसा था महिलाओं का जो जटा पाठी था इसका मतलब होगा कि यह शास्त्र विरुद्ध मर्यादा के विरुद्ध मर्यादा का अतिक्रमण करके जो आचरण हो रहे हैं यह सब अभी हैं तो इसका अर्थ यह है कि जो परंपरा प्राप्त आचार्यों को नहीं मानता वह वेदों को नहीं मानता भले ही प्रत्यक्ष हो या अप्रत्यक्ष जो वेदों को नहीं मानता वह सनातनी नहीं है वह सर्वशक्तिमान ईश्वर को नहीं मानता जो सर्व तिमान ईश्वर को नहीं मानता वह उसे प्राप्त करने वाले धर्म को भी नहीं मानता इसका अर्थ यह है कि उसके पास माता को माता कहने का कोई कारण नहीं है क्योंकि धर्मेन हीना पशु भी समाना और इसका अर्थ यह है कि वह मानव है कि नहीं मनुष्य है कि नहीं
00:21:18:26 इस बात पर भी प्रश्न खड़ा हो जाता है तो मेरे भाई तो मिस्टर हाइपर क्वेस्ट आप मुझे अपना शत्रु नहीं मित्र समझिए आपके अंदर क्षमता है देखा है मैंने आपको और आपके पास दिशा नहीं है दिशाहीन है आप परंपरा प्राप्त आचार्यों का सानिध्य प्राप्त करिए उपनिषदों का अनुसरण करिए क्योंकि हमारे सभी शास्त्र कहते हैं कि स्व अध्ययन ना करें परंपरा प्राप्त आचार्यों के सानिध्य में अध्ययन करें तब वह आपके लिए फलीभूत होगा तो मैं ये नहीं कह रहा कि आप शंकराचार्य के पास ही जाइए क्योंकि मेरे गुरु हैं नहीं आप राधा वल्लभ संप्रदाय जाइए आप वल्लभाचार्य जी के पास जाइए आप निबार काचार्य जी के पास जाइए रामानंदाचार्य जी के पास जाइए रामानुजाचार्य जी के पास जाइए पर जाइए मेरे भाई किसी परंपरा प्राप्त आचार्य के पास और उन सिद्धांतों का आलंबन
00:22:15:26 लीजिए जय श्री राम
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