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00:00:02:14 सभी को जय श्री राम। आशा करता हूं आप सभी कुशल पूर्वक होंगे। अ जय श्री राम। जय श्री राम

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→ Used in: B · Video रामपाल का मनमौजी गीता अर्थ #4 अध्याय 2 का #श्लोक #gita #gitagyan at 0:18 ↗

00:00:16:00 सभी को। तो गीता के नाम पर रामपाल के बोल वचन शायद हमारा ये फोर्थ एपिसोड है और जैसा कि हम हर एपिसोड में पिछले एपिसोड के जो बुलेट पॉइंट्स हैं वो उपलब्ध कराते हैं। तो हमने फर्स्ट एपिसोड में रामपाल ने क्योंकि गीता का अपार्थ करना शुरू किया था। 2.10 से लेकर के मतलब 2.10 से उसने शुरू किया है अपार्थ। तो हमने 2.10 से लेकर के 2.30 तक की समरी जो जो उसने जो शटर घोट की है श्लोकों के अर्थ में उसके बारे में बात की है एपिसोड वन में 2.30 से लेकर के 2.52 तक जो उसने शटर घोट की है झोल किया है उस पर हमने बात की है एपिसोड टू में और 2.53 से लेकर के उसने जो 2.72 तक जो अपार्थ किया है उसके बारे में हमने बात की है अह एपिसोड थ्री में आज तीसरे अध्याय की शुरुआत होने वाली है। मगर उससे पहले जो एपिसोड

00:01:31:03 थ्री के बुलेट पॉइंट्स कौन-कौन से हैं उस पर हम बात कर लें। सबसे पहला और जरूरी पॉइंट है कि रामपाल के अनुसार उसने जो 2.53 से लेकर के 2.72 के बीच में जो गीता का अर्थ किया है, उसमें उसने कौन-कौन सी मोटी बातें ऐसी की है जो हमारे ध्यान में रखने योग्य है रामपाल वालों को भगाने के लिए दौड़ा दौड़ा कर। ठीक है? तो क्या है पहली बात कि रामपाल के अनुसार कोई भी भक्त नहीं है। क्यों नहीं है? क्योंकि उसने मेंशन किया है कि जिसको तत्व ज्ञान नहीं है, जिसको तत्व ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ है। तत्व ज्ञान के बिना वो भक्ति नहीं कर सकता। वो भक्त नहीं हो सकता। तो आप जानते ही हैं रामपाल के अनुसार इस संसार में पूरे संसार में कोई भी तत्व ज्ञानी नहीं है। तो इसका अर्थ क्या है? कि उसका भक्त समझ उसका फॉलोअ मानते हुए स्वयं को भक्त कहने वाले जितने भी लोग हैं वह सब भक्त नहीं है। रामपाल के अनुसार ये मोटी बात। दूसरी बात क्या है कि रामपाल ने जो दूसरे अध्याय की शुरुआत में एक जगह कह दिया था कि लाभ हानि के बिना कोई युद्ध हो सकता है। कोई कर्म हो सकता है भला। तो हमने उस अभी तक तीन एपिसोड में बार-बार यह बताते आए

00:02:46:04 कि यह जो बात इसने कही है कि लाभ हानि के बिना कुछ नहीं हो सकता। जिसके आधार पर उसने गीता बोलने वाले को गलत कहा, गलत ठहराने की कोशिश की है कि उसने गलत ज्ञान दिया है। हालांकि वो बात और है कि जब वो गलत ज्ञान दे रहा है तो उसकी कोई भी बात तुम प्रमाण के रूप में कैसे मान रहे हो? खैर वो तो एक अलग बात है। मगर यहां पर भी उसने पाप और पुण्य के फल पर ध्यान मत दो। इस बात को स्वीकार किया है। यानी अपनी उस लाभ हानि वाली बात का खुद ही खंडन किया है। 2.46 से 2.53 के बीच में उसने क्या-क्या स्वीकार किया है? उसने मोह रहित होने की बात को स्वीकार किया है। मतलब मोह नहीं होना चाहिए। लाभ हानि में राग द्वेष में समान बुद्धि होनी चाहिए। लाभ हानि में समान बुद्धि होनी चाहिए। हम और पूर्ण परमात्मा में मन होना चाहिए। छोटे भगवान से दूर मन होना चाहिए। ये भी उसने वहां पर ब्रह्मा विष्णु महेश की बात वो कर रहा है और उसके हिसाब से पूर्ण परमात्मा कबीर है। तो यहां पर ये भी हमें यहां पर पता चला यहां पर भी इसने वो जो ये लोग क्लेम करते हैं ना हम लोग वो हम लोग तो ब्रह्मा विष्णु महेश की भक्ति बताते हैं। तो यहां पर ये इनके मुंह पर मारना ये वाला 2.53 से लेकर 2.72 के बीच में रामपाल ने ये भी कहा है कि पूर्ण परमात्मा

00:04:01:15 में मन लगाओ और ये जो भगवान है ब्रह्मा विष्णु महेश उसके अनुसार भगवान है। हालांकि वो भी भगवान सिद्ध नहीं होते मगर उनसे अपने मन को दूर हटाओ। और एक बहुत जरूरी मोटी बात क्या है कि सतलोक का प्रभु कौन है? कबीर मगर इसने इसी बीच में जो जहां जिन श्लोकों की हम बात कर रहे उसी बीच में माना है कि ब्रह्म तथा परम ब्रह्म से भी आगे एक और परमेश्वर है उसके पास जाना है। सतलोक से भी आगे एक और लोक है वहां जाना है। वहां पर जाके मुक्ति होगी। तो सतलोक में मुक्ति नहीं है। यहां पर भी इसने माना। ठीक है? अच्छा सांसारिक लालच त्यागने की बात इसने फिर कही वह लाभ हानि वाली बात का अपनी बात का खंडन किया सुखदख में समान रहो यह भी बात इसने यहां पर की है इस बीच भौतिक जगत से प्रेम ना करो यह भी बात कही है इस बीच राग द्वेष रहित रहो यह भी बात कही है इसके बीच और यह जो व्रत का खंडन करने का प्रयास करता है कि व्रत के लिए तो भगवान ने मना किया है क्यों मना किया है क्योंकि वो हट हट पूर्वक जो लोग अपनी इंद्रियों को वो करते हैं तो हठ योग का मना किया है। मगर

00:05:17:06 वहां भगवान का कहने का तात्पर्य है कि बिना भगवान की शरणागति हुए केवल कर्म को आधार बना के कर्म में हम अपनी जो अपने कर्मों जो इंद्रिय विषय उनसे अपने इंद्रियों को नियंत्रित कर लेंगे। इंद्रिय विषय आसक्तियों से मुक्त हो जाएंगे। उस बात को भगवान ने कहा है मगर इसने उस बात को ऐसे ले लिया है कि भगवान ने व्रत करने को उपवास रखने को ही मना कर दिया। वो खैर आगे आएगी वह वाली बात। मगर इसने यहां पर इस बीच जो यह बात कर रहा है तो इस बात कर रहा है कि इंद्रिय नियंत्रण निषेध किया है। मतलब बिना भक्ति के यह भी यह बात मानता है कि भक्ति के साथ यदि इंद्रिय नियंत्रण करने का प्रयास किया जाएगा तो पॉसिबल है। इस पर भी हम आगे बात करेंगे। आज के चैप्टर में भी ये वाली बात है। तो इसने ये माना है कि भक्ति के साथ अगर इंद्र इंद्रिय नियंत्रण करोगे तो पॉसिबल है तो अच्छा है। मगर भक्ति के बिना भगवान की शरणागति के बिना करोगे तो वो कोई लाभ का नहीं है। ठीक है?

00:06:19:24 और परमात्मा को जानकर इसने माना कि आसक्ति रहित हुआ जा सकता है। अच्छा इसने शंगी ऋषि का उदाहरण देकर के दशरथ की जो पुत्री थी शांता उनके साथ उनके विवाह का खंडन किया है। इसी बीच और आगे के श्लोकों में खुद ही विवाह का समर्थन किया। मतलब इस बीच कहा है कि भाई वो श्रृंगी ऋषि थे। उन्होंने अपनी इंद्रियों पर कंट्रोल किया हुआ था। परंतु वो अपनी इंद्रियों पर वो कंट्रोल जो था उसको रख नहीं पाए। और जो है उन्होंने हट पूर्वक क्योंकि यहां हट पूर्वक खंडन कर रहा है ना इंद्रियों का इंद्रियों पर नियंत्रण करने का वो व्रत इत्यादि वैराग्य का खंडन कर रहा है वैराग्य का नहीं मतलब हमारी जो हमारे जो सनातन की जो प्योर पद्धति है उसके अनुसार पूजा भक्ति का खंडन कर रहा है तो वहां पर उदाहरण दे रहा है कि श्रृंगी ऋषि अपनी इंद्रियों पर कंट्रोल नहीं कर पाए और उन्होंने विवाह कर लिया जबकि आगे विवाह करते हुए भी गस्त होते हुए भी विषयों में विचरण करते हुए भी व्यक्ति को मुक्त होने के योग्य बताया है। यदि वह शास्त्र अनुकूल कर्म करेगा तो वो मुक्त हो जाएगा। तो यह भी बात बहुत ध्यान रखने की है कि इसने यहां

00:07:34:24 पर विवाह का खंडन किया है मार्कंडेय ऋषि में मार्कंडेय पुराण वाली जो बात आती है जहां पे पितृ दर्शन दे रहे होते हैं। हम वहां पर पित्र भी कह रहे होते हैं कि भाई तू विवाह कर ले गृहस्थ हो जा। तो वहां पर वो पूछता है उनका जो बेटा होता है जो वो ऋषि होते हैं वहां पर वो पूछते हैं कि भाई मैं जब ऑलरेडी फ्री हूं इन सब कर्मों से तो मुझे कर्मों में लिप्त क्यों कर रहे हो तो वहां पर वो जवाब देते हैं कि तुम विषयों में रहते हुए भी इन कर्मों को करते हुए भी यह श्राद्ध आदि कर्मों को करते हुए भी मुक्त हो सकते हो वहां पर पित्र उन्हें समझाते हैं तो ये वहां पर भी विवाह का खंडन करता है और यहां पर भी विवाह का खंडन करता है जबकि इसी चैप्टर में थोड़ी देर बाद यह विवाह का समर्थन करता है। गृहस्थ होने का समर्थन करता है। यह खुद इस बात को मानता है कि गृहस्थ होते हुए भी विषयों में विचरण करते हुए भी यदि भगवान का सानिध्य होगा शास्त्र सम्मत कर्म करेगा तो वो मुक्ति के योग्य हो जाएगा। ठीक है? तो ये एक बात ध्यान रखने की है। और दो 61 में इसने एक झोल किया है। वो क्या किया है कि भगवान ने कहा मत पराह। उन्होंने कहा कि मेरे परायण होकर तो इसने उसका अर्थ निकाला है मत पराह का कि मेरे से परे। ठीक है? मत पराह का अर्थ निसय निकाला

00:08:50:15 है 261 में मेरे से परे मेरे से दूसरे परमात्मा तो यहां पे ये दिक्कत आएगी कि मेरे से दूसरे परमात्मा अगर मेरे से दूसरे परमात्मा की बात हो रही है और परह का अर्थ तुमने दूसरे कहा है तो परमात्मा का भी अर्थ तो आएगा ना वहां पर मेरे से दूसरे दूसरे का तुमने परह ले लिया हालांकि परह का अर्थ वो है नहीं और हम इसी का खंडन करेंगे करेगा। अगर पराह का अर्थ है तो परम का अर्थ अन्य कैसे है वो हम यहां आगे इस बात का भी प्रतिकार करेंगे। खैर मेरे से दूसरे दूसरे और परमात्मा परमात्मा की यहां पर कोई संस्कृत नहीं है। ठीक है? एक सनातन का सार्वभौम सिद्धांत आता है कि हम कैसे फंसते हैं। तो यह भी दूसरे अध्याय के श्लोकों में दिया गया है। मेरे ख्याल से 62 से 63 के बीच में है कि जब हम विषयों का चिंतन करते हैं क्योंकि हमारा मन अगर भगवान की भक्ति में नहीं लगा है तो हमारा मन कहां लगेगा? विषयों के चिंतन में। चिंतन करने से उन विषयों के प्रति आसक्ति होगी। आसक्ति के कारण प्राप्त ना हो पाने की स्थिति में क्रोध आएगा। क्रोध ना आने के कारण मूर्खता आएगी और मूर्खता के कारण स्मृति भ्रम आएगा और हमारे जीवन में जो भी हम दुख इत्यादि

00:10:05:20 या जो भी बंधन हम वो करते हैं वो स्मृति भ्रम के कारण ही है और अगर अद्वैत सिद्धांत के अनुसार देखें तो स्मृति भ्रम ही तो है अविद्या के जाल में फंस जाना तो यहां पर एक सारभम सिद्धांत भी इस बीच हमें प्राप्त होता है। हालांकि इसका रामपाल से कोई लेन देन नहीं मगर एक अच्छी चीज आई तो मैंने वह भी आपको बता दी। अच्छा इसके बाद 2.64 से 65 के बीच इसने यह समर्थन किया। पीछे श्रृंगी ऋषि के विवाह का खंडन किया। अब यहां पर ये समर्थन कर रहा है। क्या कह रहा है? इंद्रियों को वश में करने का समर्थन है। विचरण करते हुए भी 2.64 से 65 यहां ध्यान रखिएगा। पीछे शंगी ऋषि का जो दशरथ जी की पुत्री शांता के साथ विवाह हुआ उसका खंडन कर रहा है। देखो देखो वो अपने पर कंट्रोल नहीं कर पाए। ठीक है? वहां पर उसने यह नहीं सोचा कि भाई वो विवाह करते हुए भी मुक्त हो सकते हैं। अगर यहां पर दो 6465 के अर्थ में ये माना कि उसके अनुसार जो परमात्मा है उसकी उसकी शरणागति होने पर उसके अनुसार जो बताए गए शास्त्र शास्त्रों के अर्थ है उसके अनुसार कर्म करने पर भक्ति करने पर हालांकि इसने कर्म की बात तो कहीं की नहीं है केवल भक्ति की बात की है वो भी उसकी कबीर की तो उसके अनुसार कर्म करने पर यदि व्यक्ति

00:11:20:28 विवाहित भी होगा गृहस्थ भी होगा तो मुक्ति के योग्य हो जाएगा ठीक है तो अब इसने यहां पर 64 65 में अपनी किस बात को खुद खंडित कर दिया। खुद ही जो शंगी ऋषि का के विवाह का खंडन किया उसको उसका खंडन यहां कर दिया। और जो मार्कंडेय पुराण में पितरों का खंडन किया है इसने। है ना? इसने कई वीडियोस में किया है। तो वो जो मार्कंडेय पुराण में जो इसने पितरों का खंडन किया है। यहां पर अपनी उस अपने उस खंडन का भी खंडन यहां पर कर दिया। क्यों? कि गृहस्थ होते हुए भी विचरण करता होते हुए भी व्यक्ति मुक्त हो सकता है। फिर 66 से 68 में फिर से झोल है। यहां पर इसने शब्दों शब्दार्थ जो है नहीं है। संस्कृत के शब्द वहां पर नहीं है। मगर अपनी तरफ से पूर्ण संत के अभाव ये सब वहां पर लिख दिया है। जिसका वहां पर संस्कृत में कोई वर्ण नहीं है। और इसके बाद क्या लिखा है? फिर इसने यहां पर इस इन श्लोकों में 66 से 68 के बीच में भक्ति के साथ इंद्रिय नियंत्रण का समर्थन किया है। मैं ये बार-बार क्यों कह रहा हूं कि इसने इंद्रिय नियंत्रण का समर्थन किया है। भक्ति के साथ क्योंकि इसने इसी इनहीं जो भगवान के भाव है कि यदि तू भगवान की भक्ति नहीं कर रहा है और भगवान का चिंतन

00:12:36:09 नहीं कर रहा हो मन में विषयों का चिंतन कर रहा हो अपनी इंद्रियों को तू कंट्रोल कर रहा है तो क्या होगा कि तू अपनी इंद्रियों पर कंट्रोल को यथावत रख नहीं पाएगा ये भगवान कह रहे हैं तो ऐसे कंट्रोल के लिए भगवान मना कर रहे हैं कि तू चिंतन उसी उनहीं विषयों का कर और उन विषयों से अपने इंद्रियों को कंट्रोल कर ले तो इसमें उसका फायदा उठाते हुए हमारे व्रतों का उपवास का खंडन किया इसने। ठीक है? इस बात का और बार-बार खुद ही भक्ति के साथ इंद्रिय नियंत्रण को इंद्रिय नियंत्रण को यह समर्थन दे रहा है। इसलिए मैं ये बात बार-बार बता रहा हूं। अच्छा फिर एक बात आ गई 66 से 68 के बीच में केवल तत्व ज्ञानी ही शास्त्र के अनुकूल कर्म करता है। ये भी बात ध्यान रखने की है। इसका अर्थ क्या है? कि रामपाल के अलावा कोई भी दुनिया में शास्त्र के अनुसार कर्म नहीं कर रहा है। क्यों नहीं कर रहा है? क्योंकि वो तत्वज्ञानी नहीं है। और रामपाल ने यह माना है कि केवल तत्वज्ञानी ही शास्त्र के अनुकूल कर्म करता है। एक दुनिया में एक है जो शास्त्र के अनुकूल कर्म कर रहा है। वो है रामपाल और वो क्या कर्म कर रहा है वो आप लोग जानते ही हैं बबीता इत्यादि को हम आगे चलिए।

00:13:48:03 2.69 से 72 इंद्रिय नियंत्रण फिर से इसने इंद्रिय नियंत्रण को समर्थन दिया है 2.69 से 72 के बीच इसका अर्थ क्या है कि व्रत को समर्थन दिया उपवास को समर्थन दिया जिसका ये खंडन करता है आगे है ना और सांसारिक आसक्ति से मुक्त हो जाना हो जाने के लिए प्रेरित किया और यानी कि यहां पे जो हम लोग कहते हैं ना कि जो अंतिम निर्णायक कौन होता है सन्यासी तो वैराग्य का इसने स्वयं समर्थन किया है। है ना? कि वैराग्य आ जाता है जीवन में उसके तत्व ज्ञान जो जिसको होता है। आगे की चरणों में विवाह का समर्थन 2 70 में किया है। पीछे श्रृंगी ऋषि के विवाह का खंडन किया। मार्कंडेय पुराण में रुचि मुनि के विवाह का खंडन करता है। पित उसको उनको समझा रहे होते हैं। जब यहां पर विवाह का इसने प्योर समर्थन किया है। 2.70 में ध्यान रखने वाली बात है। 2.71 में फिर इसने समत्व बुद्धि का समर्थन किया। समत्व बुद्धि का समर्थन फिर लाभानि वाले अपने कथन का खंडन कर दिया। और 2.72 में इसने इसने कुछ नहीं मगर इसने एक तो सार्वभौम सिद्धांत आता है कि अविद्या से मुक्ति अज्ञानता

00:15:03:03 ही है जो आपको बंधन में डाले हुए और अज्ञानता से मुक्ति ही आपकी मुक्ति का हेतु है। और इसका क्या झोल है? सार्वभौम सिद्धांत तो हमने सुन लिया। इसने क्या जो किया है यहां पर? इसने ब्रह्म का अर्थ पूर्ण परमात्मा माना है। 2.72 में। यह ध्यान रखने योग्य बात है। क्योंकि जब हमारे आचार्य गण एक ही शब्द के अलग-अलग अर्थ लेते हैं जो कि अभी आगे आने वाला है आज के चैप्टर में। तो ये वहां पर कहता है कि देखो देखो इसने वहां पर तो इस शब्द का ये अर्थ लिया है। देखो देखो इसने वहां पर तो इस शब्द का ये अर्थ लिया है और यहां पर ये ले लिया। ठीक है? ये बात ध्यान रखना। तो यहां पर इसने ब्रह्म का अर्थ पूर्ण परमात्मा लिया है 2.72 में

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00:15:44:14 तो अब हम आज का प्रारंभ करते हैं। तीसरा अध्याय तीसरे अध्याय में सबसे पहले अर्जुन ने भगवान श्री कृष्ण से वही पूछा जो मार्कंडेय पुराण का जो संदर्भ देते हैं कि पित्र अपने वंशज को बता रहे हैं कि तू हमारा तू गृहस्थ हो जा विवाह कर ले और हमारा श्राद्धारी कर्म कर है ना जिससे हमको भी हमको भी सद्गति प्राप्त हो और तू भी वहां से मुक्त हो तो वहां पर जो मुनि होते हैं अपने पितरों से यही प्रश्न करते हैं जो यहां पर अर्जुन ने भगवान श्री कृष्ण से किया है। क्या प्रश्न है वो

00:16:34:10 कि जब कर्मों में फंसने से ही बंधन है तो फिर आप मुझे कर्मों के बारे में कर्म में लिप्त होने के लिए क्यों बोल रहे हैं? हम कर्म करने की आप बात क्यों कह रहे हैं? क्या कहा है? हे जनार्दन यदि आपको कर्म की अपेक्षा ज्ञान श्रेष्ठ मान्य है तो फिर हे केशव मुझे भयंकर कर्म में क्यों लगाते हैं? और यहां पे एक बात ध्यान देने की है कि भगवान श्री कृष्ण ने गीता बोली है। है ना? यह बात भी ध्यान देने की। यहां पर इन्होंने केशव कहा है। भगवान श्री कृष्ण का नाम लिया है यहां पर। हे केशव। तो ये लोग कहते हैं ना कहां लिखा है कि गीता भगवान श्री कृष्ण ने बोली है। या यह अर्जुन और कृष्ण के बीच का संवाद है। तो देखिए क्या कह रहे हैं अर्जुन? हे केशव नाम ले रहे हैं उनका। ठीक है? हालांकि यह बहुत ही निम्न दर्जे का व्याख्यान है। पर क्या करें? इसकी आवश्यकता है रामपाल जैसे असामाजिक तत्व को रोकने के लिए। हम अच्छा फिर आगे अर्जुन ने अगले श्लोक में भी यही कहा है कि आप मिलेजुले वचनों से मेरी बुद्धि को मानु मोहित कर रहे हैं।

00:17:49:25 इसलिए उस एक बात को निश्चित करके कहिए जिससे कि मैं कल्याण को प्राप्त हो जाऊं। भगवान ने ज्ञान भी दिया अभी तक और शास्त्र वेद कर्मों को करते हुए भी मुक्त हो जाने वाली बात कही है। तो अब भगवान बता रहे हैं कि तुम्हें ऐसा क्यों लग रहा है? तो इसने क्या किया है कि सीधे तीन से आठ का अर्थ किया है तो हम पहले पढ़ ले तीन से आठ में क्या कहा भगवान ने हे निष्पाप इस श्लोक में दो प्रकार की निष्ठा मेरे ये भगवान बोल रहे हैं हे निष्पाप इस श्लोक में दो प्रकार की निष्ठा मेरे द्वारा पहले कही गई है। उनमें से सांख्य योगियों की निष्ठा तो ज्ञान योग से है और योगियों की निष्ठा कर्म योग से होती है। ठीक है?

00:18:42:02 अब यहां यह जो सांख योग वाली बात है सांख योग और कर्म योग इन सब के बारे में इस मनचले ने बात ही नहीं की है और जानते ही है क्यों करेगा क्योंकि ये जटिल बातें हैं सांख योग कर्म योग ज्ञान योग ये सब जो है इनके पल्ले कहां आने वाली तो इसलिए धीरे से खुदक जाते हैं आगे की ओर आगे चलते हैं मनुष्य ना तो अब ये बता रहे हैं कि मैंने तुम्हें शास्त्र सम्मत कर्म करने के लिए क्यों कहा जैसे वहां पर पित बता रहे हैं कि अविद्या से मुक्त होने के लिए अविद्या का आलंबन लेना पड़ता है। धरती पर गिरा हुआ जो व्यक्ति होता है वो धरती का ही धक्का लेकर के उठ खड़ा होता है। आकाश में जिस हवाई जहाज को उड़ना है वो आकाश हवा हवा में उड़ने से पहले वो हवाई जहाज हवा में उड़ने से पहले आकाश में उड़ने से पहले धरती का ही आलंबन लेता है। उसी प्रकार से कर्मों के बंधन से मुक्त होने के लिए कर्म ऐसे कर्मों को करना आवश्यक है जिससे कि मुक्ति को प्राप्त की जा किया जा सके। ठीक है? तो अब यहां भगवान कह रहे हैं मनुष्य ना तो कर्मों का आरंभ किए बिना निष्कर्मता को यानी योग निष्ठा को प्राप्त हो सकता है और ना कर्मों के केवल त्याग मात्र से सिद्धि यानी सांख्य निष्ठा को प्राप्त हो सकता

00:19:58:08 है। निसंदेह कोई भी मनुष्य किसी भी काल में क्षण मात्र भी बिना कर्म किए नहीं रहता है। क्योंकि सारा मनुष्य समुदाय प्रकृति जनित गुणों द्वारा परवश हुआ कर्म करने के लिए बाध्य किया जाता है। तो आप कहने का तात्पर्य यहां पर यह है पहले और पढ़ लूं थोड़ा सा जो मूढ़ बुद्धि मनुष्य समस्त इंद्रियों को हट पूर्वक ऊपर से रोक कर मन से उन इंद्रियों के विषयों का चिंतन करता रहता है वह मिथ्याचारी अर्थात दंभी कहा जाता है। किंतु हे अर्जुन जो पुरुष मन से इंद्रियों को वश में करके अनासक्त हुआ समस्त इंद्रियों का इंद्रियों द्वारा कर्म योग का आचरण करता है वही श्रेष्ठ है। ठीक है? और तू शास्त्र भेद कर कर्तव्य कर्म कर क्योंकि कर्म ना करने की अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है तथा कर्म ना करने से तेरा शरीर निर्वाह भी सिद्ध नहीं होगा तो एक साध्य कोटि का धर्म है ही साध्य नहीं सिद्ध कोटि का धर्म है ही कि आपको ये तो करना जैसे सांस तो आपको लेनी ही है और भी बहुत कुछ भोजन आपको करना ही है तो भगवान यहां पर ये कह रहे हैं कि कर्म किए बिना आप नहीं रह पाओगे तो अगर आप उसमें शास्त्र सम्मत्तता को नहीं डालोगे तो आपसे शास्त्र

00:21:13:08 विरोधी कर्म होंगे जिनके उस स्थिति में आपके मुक्त होने के चांसेस घटेंगे। जैसे ही आप शास्त्र विरुद्ध जाओगे शास्त्र की सीमा के बाहर जाओ क्योंकि कर्म तो आप करोगे ही मगर शास्त्र सम्मत नहीं होंगे तो कौन से कर्म होंगे? शास्त्र विरुद्ध कर्म होंगे जिन्हें पाप भी कहा जाएगा। तो ऐसे कर्म होंगे जिनके कारण आप बंधन से मुक्त नहीं बल्कि बंधन में ही लिप्त होते चले जाओगे। यह भगवान का यहां पे कहना है। इसलिए तू शास्त्र वेद कर्तव्य कर्म कर क्योंकि कर्म ना करने की अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है। एक बार जगतगुरु शंकराचार्य जी ने बताया था कि जैसे ये मुट्ठी खोली ये एक कर्म है। मगर मुट्ठी को ना खोलना भी अपने आप में एक कर्म है। तो कर्म ना करने की अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है। मगर शास्त्र वेद। ठीक है? तो अब इनका झोल देख लेते हैं। तीन से आठ में क्या किया है? गीता अध्याय तीन से आठ में अब ये रामपाल का लिखा हुआ पढ़ रहा

00:22:15:12 हूं। अर्जुन इस श्लोक में इस श्लोक में ज्ञानी तो ज्ञान को श्रेष्ठ मानते हैं तथा योगी कर्म योग को फिर भी ऐसा कोई नहीं जो कर्म के बिना बचे। अब यह श्रेष्ठ मानने वाली बात कहां कौन से शब्द का अर्थ है यह इसने नहीं बताया। ठीक है? ये है झोल। इसको कहते हैं झोल। ये श्रेष्ठ और निम्न की बात यहां पे कहां से आ गई? खैर आगे चलते हैं। ऐसा कोई नहीं है जो कर्म किए बिना बचे। निष्कर्मता नहीं बन सकती और कर्म त्यागने मात्र से भी उद्देश्य प्राप्त नहीं हो सकता। अध्याय तीन से चार में निष्कर्मता का भावार्थ है कि जैसे किसी व्यक्ति ये इसके तटपुंजी कुछ उदाहरण है यहां पर तो उसमें पढ़ उनको पढ़कर कोई फायदा नहीं है। आगे चलते हैं। इसने अपार्थ क्या किया? यह देखते हैं। ठीक इसी प्रकार शास्त्र विधि अनुसार भक्ति कर्म। अब देखिए बात यहां पर कर्म करने की हो रही है कि कर्म करें तो कैसे करें? किस प्रकार से अपने कर्म करें जो हमारी

00:23:30:22 जो नित्य प्रति की जो सुबह प्रातः काल से लेकर के रात्रि काल तक जो हमारी दिनचर्या होनी चाहिए वो किस तरह से होनी चाहिए इस बारे में यहां पर बात हो रही है उनके सिद्धांत क्या होने चाहिए कर्म को करने के मगर यहां पर हर बात में भक्ति को ही डाल रहा है क्योंकि क्योंकि ले दे के इसने भक्ति को पकड़ा वो भी किसकी अपने अनुसार बनाए गए एक तथाकथित काल्पनिक ईश्वर की खैर अगर तू भक्ति कर्म प्रारंभ करने से ही परमात्मा प्राप्ति रूपी कार्य पूरा होगा। हम ये इसने क्या डाल दिया? अपने मन से सब डाल दिया। और क्या डाल दिया अपने मन से? यदि भक्ति कर्म नहीं करेंगे तो यह त्रिगुण माया। यहां पे देखिए यह त्रिगुण माया यानी रजगुण ब्रह्मा सद्गुण विष्णु तथा तमगुण शिव बल पूर्वक अन्य व्यर्थ के कार्यों में लगाएंगे तो यहां ब्रह्मा विष्णु महेश अन्य कार्यों में लगाने वाले हो गए जीव से जबरदस्ती कर्म करवाते हैं ये भगवान कर ये ब्रह्मा विष्णु महेश करवाते हैं ध्यान रखने वाली बात है अर्थ का अनर्थ तो कर ही रहे हैं मगर यहां पे इसके ढोल की पोल कैसे खुलेगी देखिए जीव से जबरदस्ती कर्म कर्म करवाते हैं। जैसे

00:24:46:00 जुआ खेलना, शराब आदि नशीली वस्तुओं का सेवन। उरी लूट व्यभचार। व्यभचार क्या है? बलात्कार भी व्यभचार में आता है। और इसके अनुसार सृष्टि रचना में काल ने क्या किया? व्यभचार किया। जबरदस्ती किया ना प्रकृति के साथ। तो वो जो जबरदस्ती हुई है वहां पर वो इसके अनुसार ब्रह्मा विष्णु महेश के प्रभाव में आकर के किया। यहां से क्लियर हो गया। क्योंकि कोई भी व्यभचार कर रहा है तो किसके प्रभाव में है? ब्रह्मा विष्णु महेश में से एक के प्रभाव में इसके अनुसार आगे चलते हैं। जैसे मिलावट, धोखाधड़ी आदि कर्म जीव तीनों देवताओं से निकल रहे गुणों के प्रभाव से करता है। अब यहां ध्यान देने योग्य बात है। जीव तीनों देवताओं से निकल रहे गुणों के प्रभाव से करता है। यानी यह जो गुण है यह इसने भी मान लिया कि गुण ही ब्रह्मा, विष्णु, महेश नहीं है। इनसे निकल रहे ब्रह्मा विष्णु महेश से गुण निकल रहे हैं। तो यहां पर इसने अपनी बात का खंडन कर लिया। ठीक है? गुण निकल रहे हैं। वो स्वयं नहीं आ रहे हैं। उनसे गुण निकल रहे हैं। खैर कितना झूठ बोलोगे भाई? फसोगे ना?

00:26:01:10 फिर आगे इसने अपनी वही चरखी चलाई है। जब तक मानव की नौका जो हवा के झोंकों तथा पानी की है वो सद्गुरु रूपी मल्ला ये पूर्ण गुरु नहीं मिलता। फिर पूर्ण गुरु का इसने डाल दिया। उनका मन इंद्रियों से प्रभावी रहता है। निष्काम भाव से शास्त्र अनुकूल तो इसने ये यहां पर तीन से आठ के बीच में अर्थ का अनर्थ किया है। और निष्कर्मता की बात भगवान ने क्या कही थी?

00:26:40:04 कर्मों को किए बिना निष्कर्मता को प्राप्त नहीं हो सकता। मगर इसने जो है भक्ति कर्म को उसको लगा दिया। मतलब जैसे संसार में आया तो संसार से होके गुजर करके और इस तरह से गुजर करके संसार से संसार की यात्रा इस तरह से तय करिए कि आप सांसारिक प्रपंच से मुक्त हो पाए। यहां पर यह कहने का अर्थ है भगवान का और इसने उसका अर्थ का अनर्थ किया। बहुत सारे झूठ चपेट इसने डाले। ठीक है? इसके बाद तीन से नौ की इसने कहानी कही है। तो पहले हम अपना तीन से नौ पढ़ ले। क्या कह रहे हैं भगवान श्री कृष्ण तीन से नौ में यज्ञ के निमित्त किए जाने वाले कर्मों से अतिरिक्त दूसरे कर्मों में लगा हुआ ही यह मनुष्य समुदाय कर्मों से बंधता है। इसलिए हे अर्जुन तू आसक्ति रहित होकर उस यज्ञ के निमित्त ही भलीभांति कर्तव्य कर्म कर। ठीक है? कर्तव्य कर्म को ही यज्ञ कर्म कहा गया है। मतलब कर्तव्य क्या है? तेरे लिए कर्तव्य और अकर्तव्य के विषय में एकमात्र शास्त्र प्रमाण है। तो शास्त्र सम्मत जो कर्म है वह कर्तव्य है। कई बार यहां पर क्या होता है जो कम्युनिस्ट वाले लोग होते हैं वो क्या कहते हैं कि मैं तो भगवान को प्रसाद चढ़ाने

00:27:55:06 से अच्छा मैं तो ये दिव्यकांत वगैरह हम जो आर्य समाज की वो हैं आर्य समाज की उपज दिव्यकांत तो यह लोग क्या कहते हैं? कि मैं तो भगवान का नाम जपने से अच्छा नाम जपने से क्या होगा? भगवान का चिंतन चलेगा मन में। भगवान का चिंतन होने से क्या होगा? विषयों का चिंतन नहीं होगा। ठीक है? तो वो कहता है कि मैं तो नाम जपने से अच्छा गरीबों की मदद करना। इस तरह के कम्युनिस्ट लोग भी आपको मिलेंगे कि भाई मैं तो यह करना ज्यादा अच्छा समझता हूं। ऐसा अच्छा समझता हूं। तो यहां पर भगवान ने इसके बारे में बताया है कि जब तुम केवल कम पर ही ध्यान देते हो और चिंतन पर ध्यान नहीं देते कि मुझे चिंतन किसका अधिक करना है। सोचते हो केवल अपनी जो कर्मेंद्र उनके द्वारा यह कर्म करवा करके और मैं जो है मुक्ति के पथ पर आगे बढ़ जाऊंगा। हम तो वहां पर तुम्हारा वो सस्टेंड नहीं रह पाता है। आपका वो क्या कहते हैं? इंद्रियों का नियंत्रण सस्टेंड नहीं रह पाता है क्योंकि वहां चिंतन आप उन्हीं विषयों का कर रहे हो जिन विषयों से आप मुक्त जिन विषयों से मुक्त होने के लिए इंद्रियों पर आप कंट्रोल कर रहे हो तो

00:29:11:03 ये भगवान ने यहां पर इसीलिए कहा कि आप जो है शास्त्रों के द्वारा बताए हुए जो कर्म है उनको करिए जिससे कि आप धीरे-धीरे वो इस तरह से उसको व्यवस्थित किया गया है शास्त्रों के द्वारा कर्मों को कि आप धीरे-धीरे इससे मुक्त होंगे। आप अपनी इंद्रियों को नियंत्रित कर पाएंगे। सस्टेंड वाला नियंत्रण आपके पास आ पाएगा। अन्यथा आप जो सोच रहे हैं ना कि मैं केवल केवल कर्म इंद्रियों के द्वारा ऐसा ऐसा कर्म करता रहूं। मुझे जो है वो नियंत्रण मिल जाए। मुझे लाभ हानि में समत्व बुद्धि आ जाए और जो है मुझे राग द्वेष में समत्व बुद्धि आ जाए तो वो नहीं आ पाएगी। क्योंकि आपके मन में चिंतन क्योंकि नहीं चलेगा। किसका? विषयों से भिन्न भगवान का। मुक्त का मोक्ष स्वरूप का चिंतन नहीं चलेगा। चिंतन किसका चलेगा? भाई सांसारिक प्रपंच की जो विषय है उनका चिंतन चलेगा। खैर आगे चलते हैं। तो क्या है

00:30:08:03 कि तू आसक्ति से रहित होकर। आसक्ति मतलब कि आप जो धर्म कर्म कर रहे हैं उनसे मिलने वाले फल के प्रति आसक्ति मत रख। यह बात हम लोग पिछले सेशंस में कर चुके हैं। तो आसक्ति से रहित होकर तुम कर्म करो। इसके बाद क्या कहा है? प्रजापति ब्रह्मा ने कल्प के आदि में यज्ञ सहित प्रजाओं को रचकर उनसे कहा कि तुम लोग इस यज्ञ के द्वारा वृद्धि को प्राप्त हो जाओ और यह यज्ञ तुम लोगों को इक्षित भोग प्रदान करने वाला हो। तो यहां पर वेदों की बात हो रही है।

00:30:50:00 तुम लोग इस यज्ञ के द्वारा देवताओं को उन्नत करो और देवता तुम लोगों को उन्नत करें। आगे बढ़ गए हम लोग थोड़ा सा तीन से नौ की बात दोबारा कर ले। तो तीन से नौ में इसने दोबारा कहा है पहले एक बार बता दिया एक पैराग्राफ में। फिर से दोबारा बता रहा है अध्याय तीन से नौ में इसने कहा है कि निष्काम भाव से शास्त्र अनुकूल किए हुए धार्मिक कर्म यज्ञ लाभदायक हैं। यज्ञ यानी धार्मिक अनुष्ठान जैसे पांचों यज्ञ तथा नाम जप करने के अतिरिक्त जुआ खेलना, शराब, तंबाकू, मांस सेवन करना, फिल्म देखना, निंदा करना, व्याभचार करना आदि आदि कर्मों को करने वाला व्यक्ति कर्मों में बंधता है। इसलिए परमात्मा के निमित्त शास्त्र वर्णित कर्तव्य कर्म कर। ठीक है? तो अभी हमने बताया कि कम्युनिस्ट का खंडन कहां पर हो जाता है? जब हम जब कोई कम्युनिस्ट आपसे यह कहे कि भाई मैं तो केवल गरीबों को खाना खिला के ही अपना वो मानता हूं। मुक्ति का हेतु वो अच्छा है। वो गलत नहीं है। मगर यदि साथ में आपकी भक्ति नहीं होगी, ईश्वर पर विश्वास नहीं होगा, ईश्वर का चिंतन नहीं होगा, ईश्वरीय चिंतन नहीं होगा तो आपकी वो सस्टेनेबिलिटी नहीं बन पाएगी। तो एक तो वो सार्वभौम सिद्धांत आपको यहां प्राप्त हो गया। कम्युनिस्टों के खंडन के लिए और

00:32:05:03 दूसरी बात यह है कि यहां पर मार्कंडेय पुराण में जो पितर जो हैं जो कह रहे हैं कि तुम भाई गृहस्थ हो जाओ हमारा श्राद्ध इत्यादि कर हमको भी सद्गति प्राप्त होगी। उसका समर्थन भी हो रहा है इस बात से कि अगर हम कर्मों में लिप्त होंगे भी गृहस्थ जीवन जिएंगे भी मगर शास्त्र सम्मत तरीके से रहेंगे तो भी हम मुक्ति के पथ पर आगे बढ़ेंगे तो मार्कंडेय पुराण का यहां पर समर्थन हो गया। तीन श्लोक छ से नौ तक एक स्थान पर एकांत में विशेष आसन पर बैठकर कान आंखें आदि बंद करके हट योग करने की मनाई की है तथा यहां पे फिर से अपनी उस भावना को पुष्ट कर रहा है कि व्रत इत्यादि मत करो ठीक है खुद ही खुद ही की बात का खंडन करता है बार-बार अब भाई गृहस्थ जीवन का समर्थन हो गया तो वहां पर जो गृहस्थ हुए श्रृंगी ऋषि दशरथ के दशरथ महाराज की पुत्री जो भगवान श्री राम की बड़ी बहन मानी गई है उनसे विवाह करने का खंडन किया। फिर बाद में पिछले चैप्टर में भी इसने मान लिया कि हां गस्थ होते हुए भी मुक्त हो सकते हैं। कर्तव्य कर्म करके यहां पे भी मान रहा है कि शास्त्र वर्णित कर्तव्य

00:33:20:14 कर्म करके गस्त व्यक्ति भी विषयों में विचरण करता हुआ भी वो मुक्त हो सकता है। फिर आगे क्या कह रहा है कि हठ योग करने की मनाही है। अब यहां हठ योग करने की मनाई के रूप में भी यह विवाह का समर्थन कर रहा है। गस्त हो जाने का समर्थन कर रहा है। अपनी इंद्रियों को ऐसे कंट्रोल मत करो। हम यानी कि कहने का तात्पर्य यह है कि यहां पर ये इस बात का समर्थन कर रहा है कि यदि हम भगवान के सानिध्य में भगवान का चिंतन करते हुए उनके नाम इत्यादि का स्मरण करते हुए अपनी इंद्रियों पर कंट्रोल करने का प्रयास करेंगे तो वो मुक्ति का हेतु होगा। हां बिना भगवान के सानिध्य के यदि कंट्रोल करने का प्रयास करेंगे तो चिंतन विषयों का होने के कारण हमारी मुक्ति में बाधा आएगी। ठीक है? मगर यहां पे क्या किया इसने? ये जो भगवान से कनेक्ट होने वाली बात है इसको हटा दिया एक साइड और सीधे-सीधे कह दिया कि यहां पे तो इंद्रियों पर कंट्रोल करने को मना किया है भगवान ने। ऐसा नहीं है मना नहीं किया है। अच्छा इससे आगे चलते हैं तो एक मोटी बात यहां पर दिख रही है हमें।

00:34:33:25 यह पृष्ठ संख्या 39 पर यह मोटी बात है। पवित्र वेदों को बोलने वाला ब्रह्म है। जिसको ये काल कहता है। यह थर्ड पैराग्राफ है। ऊपर से 39 नंबर पेज और उसमें ऊपर से थर्ड पैराग्राफ है। इसमें इसने कहा है कि पवित्र वेदों को बोलने वाला ब्रह्म है और यह भी कहा है कि पूर्ण परमात्मा के बारे में उसको पूरी जानकारी नहीं है। ठीक है? पूर्ण परमात्मा की जानकारी उसको नहीं है। और एक और वो कुतर्क है कुछ समय तक अमर हो जाने वाला और मेरी वाली परमगति। इसके बारे में बाद में बात करेंगे। आगे अगले पृष्ठ पर आ जाते हैं। 40 नंबर। अब इसमें आता है श्लोक 10। तो इसमें प्रजापति ब्रह्मा ने कल्प के आदि में यज्ञ सहित प्रजाओं को रचकर उनसे कहा कि तुम लोग इस यज्ञ के द्वारा वृद्धि को प्राप्त हो जाओ और यह यज्ञ तुम लोगों को इच्छित भोग प्रदान करने वाला हो। अब देखिए इसका आप एक बात समझ

00:35:49:06 लीजिए कि इन श्लोकों में जो यज्ञ की बात हुई है ये यज्ञ डायरेक्ट वो यज्ञ नहीं है। धर्म स्वधर्म आचरण को यज्ञ कहा गया है। धर्म आचरण को यज्ञ कहा गया है। ठीक है? तो यह यहां पर ध्यान रखने वाली बात है। और श्लोक 10 में इसने क्या झोल किया है बहुत बड़ा वह देखिए क्या किया है। पहली बात तो ध्यान रखिए कि अनुवाद लिख रहा है। यह व्याख्या नहीं लिख रहा है। भाष्य नहीं लिख रहा है। कमेंट्री नहीं लिख रहा है। पेज नंबर 40 पे आ जाइए। रामपाल तो इसने क्या लिखा है? श्लोक 10 का अर्थ प्रजापति यानी कुल के मालिक

00:36:39:00 ने

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→ Used in: A · Live गीता के नाम पर रामपाल के बोलबचन अध्याय 4 Ep-7 #satlokashram at 53:03 ↗

00:36:40:00 कुल के मालिक ने कल्प के आदि में यज्ञ सहित प्रजाओं को रचकर उनसे कहा कि अनेन यानी अन्य द्वारा अन्न द्वारा होने वाला धार्मिक

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00:36:55:03 कर्म। अब देखिए अनेन का अर्थ इसने क्या किया? अनेन के अनेन का अर्थ इसने क्या किया? अन्न के द्वारा होने वाला धार्मिक कर्म। जिसमें अनाज पड़े। अब अनेन का अर्थ यह कहां से निकाला इसने कि अनेन का अर्थ है कि अन्न के द्वारा होने वाला धार्मिक कर्म यह यही बताएगा यह झोल है इसका और आगे क्या है इसका अर्थ बताते हुए इसने स्पष्ट किया जिसमें भोजन भंडारे यानी लंगर करना है यानी जो वास्तविक अर्थ है अनेन का वह है कि इस यज्ञ के द्वारा जिस यज्ञ की बात चल रही है किस की बात चल रही जो हम स्वधर्म आचरण करते हैं वो यज्ञ है अपने आप में एक उस यज्ञ की बात चल रही है कि इस यज्ञ के द्वारा तुम लोग वृद्धि को प्राप्त हो जाओ यह यज्ञ तुम लोगों को इच्छित भोग प्रदान करने वाला सिद्ध हो और यहां पर इसने क्या किया कि यज्ञ को नाम दे दिया अनाज के द्वारा होने वाला यज्ञ यानी कि भंडारा इसको हमेशा भंडारा ही दिखाई देता है भंडारा लंगड़ ये सब क्योंकि इसने ज्यादा वो लपका लपकी की होगी इजादत अधिकांशता

00:38:10:19 तो इसको वही दिखता है। इस यज्ञ के द्वारा बुद्धि को प्राप्त हो जाओ। बुद्धि को प्राप्त हो जाओ। वहां पर वृद्धि की बात आ रही है और ये व्यक्ति बुद्धि कर रहा है। हम अब बताइए बुद्धि कहां से आ गई इसमें? हम अच्छा चलिए इसके इसका खंडन यही मिल गया। बहुत बढ़िया। देखिए ध्यान से देखिए। जब इसने अध्याय तीन का श्लोक 10 में अर्थ किया है तो इसने कहा है इस यज्ञ के द्वारा वृद्धि को प्राप्त हो जाओ। ठीक है? वृद्धि को प्राप्त हो जाओ। कहा है? और इसके बाद तुरंत जब भावार्थ लिखा है तो उसमें क्या कहा है? इस यज्ञ तीसरी लाइन में देखिए इस यज्ञ के द्वारा बुद्धि को प्राप्त हो जाओ। तो यहां पर वृद्धि और बुद्धि में वृद्धि को इसने बुद्धि कर दिया। इतनी बुद्धि है रामपाल की। देख लीजिए ये बिल्कुल जो निचले स्तर की बातें हो सकती है वो ये करता है अपनी किताबों में। अब क्या कहे ऐसा मतलब दो टके की बातें

00:39:25:27 सीधी सरल इसके जैसी भाषा तब भी इसकी भाषा से अच्छी भाषा है दो टके की बातें करता है पहले करता है वृद्धि को प्राप्त हो जाओ फिर करता है बुद्धि को प्राप्त हो जाओ चलो ठीक है हो सकता है भाई किसी ने सुनने सुलाने में सुनाने में टाइपिंग मिस्टेक कर दी होगी मगर यह अनेन का अर्थ अनाज के द्वारा होने वाला धार्मिक यज्ञ कैसे हो गया कहां लिखा है अनेन यही बताएगा कभी जेल से बाहर आ पाया तो अच्छा फिर क्या

00:39:58:15 है कि यहां पर कहीं भी पूर्ण परमात्मा जो कि यज्ञ में प्रतिष्ठित ही इच्छित भोग प्रदान करने वाला हो हम ये नहीं लिखा है यहां पर लिखा है यह यज्ञ अनेन अनेन का मतलब क्या है यह यज्ञ तुम लोगों को इक्षित भोग प्रदान करने वाला हो। तो यहां पर जबरदस्ती बिना किसी बात के पूर्ण परमात्मा को इसने डाल दिया। अब इसके बाद क्या है कि पूर्ण परमात्मा ने कल्प के प्रारंभ में यज्ञों यानी धार्मिक अनुष्ठानों का ज्ञान तथा प्रजा को उत्पन्न करके उनसे कहा था कि अन्न से होने वाले धार्मिक कर्म जिसे धर्म यज्ञ कहते हैं जिसमें भोजन भंडारा यानी लंगर करना इस यज्ञ के द्वारा बुद्धि को प्राप्त हो जाओ यानी धर्म करने से धन प्राप्त होता है। तुम साधकों को यज्ञ में पूज्य इष्ट देव की मनोवांछित भोग प्रदान करें। यहां इष्ट देव को इसने जबरदस्ती डाला है। ठीक है? यह पूर्ण परमात्मा जबरदस्ती इन्होंने इसने डाल दिया है। इसका यहां पे कोई बात नहीं हुई ना और अनुवाद में भी डाला है और उसके भावार्थ

00:41:13:15 में भी भावार्थ में अगर अपने मन की बात डाल दे तब समझ में आता है। मगर अनुवाद में कैसे डाल सकते हो? अनुवाद तो एज इट इज होना चाहिए ना। प्रधान यानी धन चाहिए तो दान धर्म कर। मुक्ति चाहिए तो भज सतनाम वाले सिद्धांत अनुसार पूर्ण परमात्मा साधक को लाभ देता है। उसे प्राप्त करो। लो हो गया। अब 11 पे आ जाए। 11 का हिंदी अनुवाद इसने कहा। इसने किया है। यज्ञ के द्वारा पहले अपना 11 का अर्थ पढ़ ले। तुम लोग इस यज्ञ के द्वारा देवताओं को उन्नत करो और वह देवता तुम लोगों को उन्नत करें। इस प्रकार निस्वार्थ भाव से एक दूसरे को उन्नत करते हुए तुम लोग परम कल्याण को प्राप्त हो जाओ। ठीक है? अब इसने क्या किया है? यज्ञ के द्वारा देवताओं अर्थात संसार रूपी पौधे की शाखाओं को उन्नत करो और वह देवता अर्थात शाखाएं तुम लोगों को उन्नत करें। यदि यानी पौधा पेड़ बनेगा। शाखाएं फल देंगी। इस प्रकार एक दूसरे को उन्नत करके परम कल्याण को प्राप्त हो जाओ। इसने यहां पर एक बात ध्यान रखिएगा परम का अर्थ परम ही लिया है। यह ध्यान

00:42:33:21 रखिएगा। आगे चलते हैं। पेज नंबर 43 लीजिए। इसमें गीता अध्याय तीन का 12वा श्लोक यज्ञ के द्वारा बढ़ाए हुए देवता तुम लोगों को बिना मांगे ही यह मैं अपना पढ़ रहा हूं। बिना मांगे ही इक्षित भोग निश्चय ही देते रहेंगे। इस प्रकार उन देवताओं के द्वारा दिए हुए भोगों को जो पुरुष उनको बिना दिए स्वयं भोगता है वह चोर ही है। अब क्या है? जैसे हमारे यहां कहा जाता है ना कि हर कर्म को भगवान से जोड़ दो। सोते हैं तो क्यों सोते हैं? कि सुबह उठकर के भगवान को भगवान की सेवा कर सके, भक्ति कर सके। भोजन बनाते हैं तो किस भावना के साथ बनाएं कि भगवान को भोग लगा सके और उस भोग लगाने में भी सबका कल्याण है। है ना कि सबको कुछ ना कुछ मिले। भगवान को भोग लगाएंगे, भगवान की पूजा करेंगे। तो इस भावना के साथ हमने हमारे शास्त्रों के द्वारा हर बात को भगवान से जोड़ा गया है। हमारे जीवन के हर क्षेत्र के किसी भी कर्म को भगवान से होकर गुजारा गया है। तो

00:43:49:08 यहां पर वही बात कही जा रही है कि जो इस प्रकार उन देवताओं के द्वारा दिए हुए भोगों को जो पुरुष उनको बिना दिए स्वयं भोगता है वह चोर ही है। अब इसने यहां पर क्या अर्थ किया है? पहली बात यहां ध्यान से देखिए। तीन तीसरे अध्याय के 12व श्लोक का अर्थ करते हुए इसने फिर से लिखा है अनुवाद। अनुवाद का मतलब होता है कि अपनी बातें नहीं डाल सकते। भावार्थ में डाल सकते हो। भाष्य में डाल सकते हो। अनुवाद में नहीं डाल सकते। अनुवाद में एज इट इज आपको अर्थ करना होता है। तो इसने अनुवाद में भी अपने मतलब की चीजें डाल दी है। तो अब क्या डाला है? यज्ञ यानी धार्मिक अनुष्ठानों के द्वारा बढ़ाए हुए देवता तुम साधकों को इच्छित भोग यानी सुख पदार्थ बिना मांगे निश्चय ही देते रहेंगे। रहेंगे। हम निश्चय ही देते रहेंगे। भावार्थ है कि अब यहां भावार्थ भी आ गया। भक्ति रूपी पौधे के मूल सिंचाई करके पेड़ बना लेते हैं। शाखाएं बढ़ जाती है। उन शाखाओं को अपने आप फल लगते हैं। बिना मांगे ही सेवक को फल देते हैं। इस प्रकार

00:44:50:04 पूर्ण परमात्मा रूपी मूल यानी जड़ की ईष्ट के रूप में प्रतिष्ठित करके पूजा करने वाले शास्त्रानुकूल भक्ति कर्म का फल तीनों देवता

⬜ Not used yet · 00:44:58:28 – 00:59:07:20 (14:09)

00:44:58:28 ब्रह्मा, विष्णु शिव ही बिना मांगे देते रहते हैं। अब यहां पे ब्रह्मा, विष्णु, महेश को जबरदस्ती डाला गया। राग देवताओं की हो रही है और अगर डाला भी गया है तो फिर वहां पर अलग से ईस्ट की भक्ति करके और करने से ब्रह्मा विष्णु महेश आपको फल देते रहे। ये सब अपने आप मटियामेट अर्थ का अनर्थ। इसको कहते हैं झोल। इसको कहते हैं टोटल झोल। तो अपने से ही मूल मालिक ईस्ट को डाल दिया। अपने से ही ब्रह्मा विष्णु महेश को डाल दिया। सबको डाल दिया अपने मन से। यहां कोई ऐसी बात नहीं हो रही। अब अपनी अपना अर्थ पढ़ लेते हैं। तीसरे अध्याय का 13व श्लोक का अर्थ जो है यज्ञ से बचे हुए अन्न को खाने वाले श्रेष्ठ पुरुष सब पापों से मुक्त हो जाते हैं। और जो पापी लोग अपना शरीर पोषण करने के लिए ही अन्न पकाते हैं वे तो पाप को ही खाते हैं। अब यहां देखिए यज्ञ का अर्थ बहुत बहद रूप में भी लिया जा सकता है कि हम धार्मिक अनुष्ठानों को करते हुए जो हमें अन्न प्राप्त हो जाए धर्म के अनुसार चलते हुए स्वधर्म के पालन करते हुए जो हमें अनाज प्राप्त हो उसी को हम ग्रहण करके अपनी पूर्ति करें। केवल पूर्ति के लिए अनाज को ना पकाए। एक तो यह हो गया। दूसरा इसका अर्थ यह भी लिया जा सकता है कि

00:46:14:24 एक अर्थ यह भी निकलता है कि भाई हम केवल अपनी आपूर्ति के लिए अनाज ना पकाए बल्कि इस भावना से पकाएं कि हम पकाएंगे तो गाय को भी जाएगा, शान को भी जाएगा और सबसे पहले भगवान को भी भोग लगाएंगे। इस भावना के साथ भी लगाएं। तो यह दोनों ही बातें यहां पर हमको दोनों ही अर्थ मिल रहे हैं। मगर उन कम्युनिस्ट विचारधारा वाले लोगों के लिए भी यहां पर एक सार्वभौम सिद्धांत है। केवल शरीर के पोषण के लिए पकाया गया जो अन्न है। यानी अगर सबसे सरल भाषा में कहें तो भगवान को बिना भोग लगाए जो खा रहे हैं अन्न खा रहे हैं। भगवान को भोग लगाने के लिए नहीं अपने लिए अपने लिए जो पका रहे हैं केवल भोग खाना बना रहे हैं। तो वो पाप कहा गया भगवत गीता में। अब कई कम्युनिस्ट ऐसे हैं जो हमारे घरों में भी बैठे हुए हैं। हमारे घर में है। हमारे यहां पर जो सार्वभम सिद्धांत की बात कर रहा हूं। यहां पर रामपाल की बात नहीं कर रहा हूं। यहां पर हमारे और आपके घर में भी कम्युनिस्ट विचारधारा वाले लोग बैठे हुए हैं। जो सिर्फ अपने लिए करने की बात करते हैं कि भाई मैं भी तो इंसान हूं। मेरे को भी तो यह चाहिए। मैं भी तो यह करूंगा। तो वहां पर आप इस श्लोक को दे सकते हो उन्हें कि जो धर्म धर्म कार्य करते हुए जो अन्न प्राप्त होता है वही अन्न ग्रहण करने

00:47:30:00 योग्य है अन्यथा पाप है अथवा भगवान को भोग लगाए बिना जो हम लोग भोजन करते हैं भगवान को भोग लगाने से इत जो हम अपनी पूर्ति के लिए जो क्या कहते हैं अन्न पकाते हैं वह सब पाप का आ गया है। ठीक है आगे चलते हैं। अब इसमें क्या किया इसने? तीन 13 में इसने कहा है अब इसने बहुत अनर्थ किया है इसमें। जैसे गीता अध्याय तीन के श्लोक 12 में कहा है ये रामपाल बोल रहे हैं। अह लास्ट पैराग्राफ है। गीता अध्याय तीन श्लोक 13 का अनुवाद। जैसे गीता अध्याय तीन के श्लोक 12 में कहा है कि यज्ञ शास्त्र विधि से किए हुए धार्मिक अनुष्ठान से पुष्ट इष्ट देवता आपको सांसारिक सुविधा कर्म फल के आधार पर देते हैं। ये क्या हो रहा है भाई? यहां पर ये सब बातें कहां हो रही है कि देवता आपको देते हैं। अनुवाद कहा है ना इसने? तो जब ये अनुवाद कह रहा है तो देवता शब्द की संस्कृत क्या है? तीन 13 में आगे चलते हैं। क्या इसने 12 का उदाहरण दिया है कि देवता आपको देते हैं।

00:48:45:25 फिर उसके बाद एक गीता अध्याय तीन के 13 में बात कर रहा है कि यज्ञ में प्रतिष्ठित पूर्ण परमात्मा इष्ट देव को भोग लगाकर फिर भंडारा करें। तो ये कुल मिलाकर के सब बातों को ले आता है अपने भंडारे पे। और उसमें भी उसका जो इष्ट है वो कौन है? वो है इसका कबीर और ये खुद रामपाल। ठीक है? भोग लगाकर भंडारा करें। वह साधक यज्ञ के द्वारा होने वाले लाभ को प्राप्त हो जाएंगे। तो इसने जो उसका जो एक समष्टि वाला जो रूप था ना वो उस बारे में बात नहीं की। उसके आउट ऑफ सिलेबस की बात है ये समष्टि वाले रूप से बात करना इस श्लोक के अर्थ में कि जो अन्न जो अनाज या जो धन जो द्रव्य हमें स्वधर्म का पालन करते हुए प्राप्त होता है वही द्रव्य वही धन वही अनाज ग्रहण करने योग्य है और जो स्वधर्म का पालन किए बिना हमें प्राप्त होता है जो धर्म से प्राप्त नहीं होता अधर्म से प्राप्त होता है वह सब कुछ पाप है।

00:49:48:04 क्या देखना है बताएं? तो हां यज्ञ यानी तीनों देवता श्री ब्रह्मा विष्णु महेश शिव ही बिना मांगे देते रहते हैं। हां हां इसने ये वाली बात यहां पर कही है कि बिना मांगे देते हैं। हां यह भी कहा गया है यह देखिए बहुत अच्छी बात यहां पर नजर आ रही है कि यहां पर क्या कह रहे हैं कि जीव से जबरदस्ती कर्म करवाते हैं गलत कर्म और वहां पर क्या कह रहे हैं क्या कहा जा रहा है कि ब्रह्मा विष्णु महेश बिना मांगे देते रहते हैं एक जगह उनको क्या दिखाया जा रहा है विलन और यहां पे उनको ठीक ठीक बताया जा रहा है हम अगर ये कहे कि भगवान के प्रभाव के कारण कबीर के प्रभाव के कारण यहां पर दे रहे हैं तो वहां क्या कबीर का प्रभाव नहीं होता जब वह गलत कर्म करवाते हैं तो बहुत सारी बातें यहां पर आ जाती

00:51:06:25 हैं। तो आगे चलते हैं। तो सर्व पापों से मुक्त होने का अभिप्राय यह है कि जो यज्ञ नहीं करते वह पापी कहे गए हैं। जो शास्त्र विधि के अनुसार मतानुसार यज्ञ करते हैं। वह उन सर्व पापों से बच जाते हैं जो यज्ञ ना करने से लगने थे। यदि कोई यज्ञ आदि धार्मिक अनुष्ठान नहीं करता वह तो चोर बताया गया है। अब इसका मतलब है कि हर व्यक्ति को भंडारा ही करना है। अगर भंडारा नहीं करता है तो वो चोर पापी है। इसने कह दिया तो जितने रामपाल के ऐसे लोग हैं जिन्होंने भंडारा नहीं किया है करवाया है तो वो सारे चोर हैं, पापी हैं। जबकि यहां पर अह अर्थ केवल इतना है कि स्वधर्म के पालन से ही जो अन्न प्राप्त हो उसको ग्रहण करें। अथवा दूसरा अर्थ यह है कि अनाज को इस भावना से ही पकाएं कि भगवान को भोग लगाना है अथवा किसी भूखे को भोजन कराना है। इन दोनों में से किसी एक मगर यही नहीं है कि आप भंडारा करोगे तो आप ठीक हो नहीं करोगे तो आप पापी हो। ठीक है? और इसने यही बताया प्रतिदिन या सत्संग के समय भोजन प्रसाद बनता है। सर्वप्रथम कुछ भोजन यही सब बातें इसने कही।

00:52:20:04 आगे चलते हैं। अध्याय तीन 14 से 19 इसने एक साथ लिया है। हम अनुवाद चल रहा है। ठीक है? तो पहले हम अपना 141 का अनुवाद पढ़ लें। संपूर्ण प्राणी अन्न से उत्पन्न होते हैं। अन्न की उत्पन्न उत्पत्ति वृष्टि से होती है। वृष्टि यज्ञ से होती है और यज्ञ विहित कर्मों से उत्पन्न होने वाला है। यज्ञ किससे उत्पन्न होता है? शास्त्र सम्मत कर्मों से। यज्ञ विहित विहित कर्मों से उत्पन्न होता है। कर्म समुदाय को तू वेद से उत्पन्न और वेद को अविनाशी परमात्मा से उत्पन्न हुआ जान। यहां पे एक इसने ढोल किया है जिसके बारे में जिस ढोल के बारे में आगे बात करेगा। मगर फिलहाल हम लोग जो इसने यहां पर बात की है उसी के बारे में बात करेंगे। इससे सिद्ध होता है कि सर्वव्यापी परमक्षर परमात्मा सदा ही यज्ञ में प्रतिष्ठित है। तो यहां पे एक ध्यान देकर के देखिए कि गीता प्रेस गोरखपुर के अनुवाद में अक्षर जो शब्द आया है वहां पर अक्षर के लिए अविनाशी परमात्मा अर्थ लिया गया है। ठीक है? अक्षर

00:53:36:24 समुद्भवम अविनाशी परमात्मा से उत्पन्न हुआ अक्षर समुद्भवम परम अक्षर नहीं कहा गया है। मगर अर्थ में गीता प्रस के अनुसार ब्रह्म अक्षर और परम अक्षर ये सब एक ही है और निरुक्त में भी एक ही है। मगर रामपाल तो इसमें अलग-अलग करता है ना कि ब्रह्म अलग है। हालांकि ब्रह्म का अर्थ उसने पूर्ण परमात्मा माना। पिछले वाले अध्याय में हमने देखा। खैर अब यहां पे इसने अर्थ क्या लिया है? अक्षर का अर्थ इसने परम अक्षर लिया है। तो अकॉर्डिंग टू रामपाल की नियमावली वो तथाकथित काल्पनिक मेंटल वाली उस नियमावली के अकॉर्डिंग यहां पर इसको अक्षर का अर्थ परमात्मा नहीं लेना था क्योंकि अक्षर का अर्थ क्या है? अक्षर पुरुष जो ईश्वर है। है ना? अभी आगे आएगा। इसने आगे बताया है ईश का अर्थ है पेज नंबर 46 एक मिनट निकालिए इसकी गीता का।

00:54:37:01 ई का अर्थ है क्षर पुरुष। ईश्वर का अर्थ है अक्षर पुरुष। परम ब्रह्म। ईश का अर्थ है क्षर पुरुष यानी ब्रह्म। ईश्वर का अर्थ है अक्षर पुरुष यानी परम ब्रह्म। और परमेश्वर का अर्थ है परम अक्षर पुरुष यानी पूर्ण ब्रह्म। यानी अक्षर पुरुष का मतलब परम अक्षर पुरुष नहीं है। ठीक है? अब इसने यहां जो अर्थ किया वह देखिए क्या किया? प्राणी अन्न से उत्पन्न होता है। अन्न वर्षा से उत्पन्न होता है। वृष्टि यज्ञ से यानी धार्मिक अनुष्ठान से होती है। यज्ञ यानी धार्मिक अनुष्ठान शास्त्र अनुकूल कर्मों से सफल होते हैं। सफल होते हैं। अरे भाई उत्पन्न होने की बात है। सफल कहां होने की बात है यहां? अपने मन से। खैर चलिए आगे देख फिर इसने क्या कहा है कर्मों को तू ब्रह्म यह 14व का इसने अर्थ किया अब 15व का अर्थ कर रहा है गीता प्रेस में 14 और 15 का एक साथ अर्थ है पिछले प्रश्न पे आ जाइए भाई 44 पे तो गीता प्रस में 14 और 15 का एक

00:55:52:04 साथ दिया है अर्थ और इसने अलग-अलग दिया है तो इसने क्या कहा पहले कि अन्न वर्षा से उत्पन्न होता है प्राणी अन्न से उत्पन्न होता है अन्न वर्षा से उत्पन्न होता है। होती है होता है वृष्टि यानी वर्षा यज्ञ से धर्म यानी धार्मिक अनुष्ठान से उत्पन्न होती है। अह यज्ञ यानी धार्मिक अनुष्ठान शास्त्र अनुकूल कर्मों से सफल होते हैं। यहां पे इसने सफल कर दिया। जबकि सफल का तो अर्थ है नहीं यहां से। हम धार्मिक अनुष्ठान के लिए क्या आया है?

00:56:28:09 विहित कर्मों से होते हैं। तो सफल जो इसने लिखा है सफल होते हैं। तो इसकी कोई संस्कृत इसका कोई संस्कृत शब्द यहां पर नहीं है सफल का। ठीक है? आगे देखिए इसने 15 का क्या अर्थ किया है? कर्मों को तू ब्रह्म यानी काल ब्रह्म से उत्पन्न जान। अब देखिए सबसे पहली बात है कि इसने पिछले अध्याय में ब्रह्म का अर्थ पूर्ण ब्रह्म माना है। तो यहां पे अपने मन से क्यों कर रहा है? कि कर्मों को तू ब्रह्म यानी काल ब्रह्म से उत्पन्न जान। जबकि कर्म किससे उत्पन्न हो रहे हैं? वेद से। भगवत गीता के अनुसार जो वहां पर ब्रह्मोदभवम कहा गया है वो ब्रह्म से ब्रह्म वहां पर वेद लिया गया है। ब्रह्म का अर्थ वेद लिया गया है जो कि निरुक्त में दिया गया है। मैं दिखा देता हूं।

00:57:16:24 [संगीत] क्योंकि इस श्लोक इस श्लोक के बारे में इसने आगे कटाक्ष किया है कि इन्होंने ब्रह्म का अर्थ वेद कर दिया है। तो ऐसा नहीं है। निरुक्त में ब्रह्म का अर्थ वेद बताया गया है। अच्छा ये देखिए निरुक्त में परमात्मा अथवा वेद को भी ब्रह्म कहा जाता है ये देखिए एक मिनट मेरा वाला बड़ा कर दीजिए यह निरुक्त है वैदिक डिक्शनरी है इसको शायद यह जान नहीं पाया है अपने जीवन में और इसकी अभी जिस तरह की हालत है उसमें जान भी नहीं पाएगा। उसकी आने वाली कई पीढ़ियां नहीं जान पाएंगी। निरुक्त होता क्या है? खैर निरुक्त इसको आप सीधे सरल शब्दों में कह सकते हैं वैदिक डिक्शनरी। तो निरुक्त में ब्रह्म का अर्थ वेद भी कहा गया है। तो प्रसंग अनुसार क्योंकि वहीं पर ब्रह्म की दोबारा बात हो रही है। बार-बार ब्रह्म आया है। ब्रह्मोद भवम। ठीक है? कर्म कहां से जनित हो रहे हैं? ब्रह्मोदभम। उसके बाद वेद कहां से जनित हो रहे हैं?

00:58:32:09 ब्रह्म वेद को अक्षर समुद्भवम। तो यहां पे ब्रह्म से कर्म ब्रह्म यानी वेद से उत्पन्न हुए। फिर ब्रह्म यानी वेद अक्षर यानी अविनाशी परमात्मा से उत्पन्न हुए। इसलिए ब्रह्म को अलग किया गया। क्योंकि दोबारा से परमात्मा की बात हो रही है। इसलिए ब्रह्म का अर्थ परमात्मा ना लेकर वेद कहा गया। और क्योंकि यज्ञ और जो कर्म है वह कहां से उत्पन्न होते हैं? वेद से ही वेद बताते हैं ना कि कर्म कैसे करना है, कैसे नहीं करना है। खैर इसने क्या किया है? इसने झोल करने के चक्कर में क्या किया? अब इसने पहली बात तो यह है कि

00:59:07:20 ब्रह्म यानी काल ब्रह्म की उत्पन्न उत्पत्ति अविनाशी परमात्मा यानी परम अक्षर पुरुष से हुई है। तो

⬜ Not used yet · 00:59:16:24 – 01:00:30:26 (1:14)

00:59:16:24 इसने ब्रह्म को उत्पन्न मान लिया। इसने कर्म को उत्पन्न माना है ब्रह्म से। कर्मों को तू ब्रह्म यानी काल ब्रह्म से उत्पन्न जान। तो पहले इसको इसको समझाना पड़ेगा कि काल ब्रह्म से कर्म कैसे उत्पन्न हो रहे हैं। वेद से तो उत्पन्न हो रहे हैं। वेद के अनुसार तुम्हें कार्य करना है। मगर ब्रह्म से कैसे उत्पन्न हो रहे हैं। पहली बात। दूसरी बात है कि फिर वह जो ब्रह्म है वह पुनः

00:59:49:08 किससे उत्पन्न हो रहा है? अक्षर समुदभवम। हां। तो इसने यहां पर अक्षर को परम अक्षर मान लिया। क्या कहा है? कि कर्मों को तू ब्रह्म यानी काल ब्रह्म से उत्पन्न जान। क्योंकि जीव सतलोक को त्याग कर कालोक में आए तो कर्म करके सर्व पदार्थ प्राप्त करते हैं। लोग अपनी थ्योरी बता दी। और यह अनुवाद चल रहा है। ध्यान दीजिएगा। यह भावार्थ नहीं है। तो इसमें सतलोक और सर्व पदार्थ प्राप्त होते हैं। इन सब की संस्कृत कहां गई? वहां निष्करम मुक्ति जीव को प्राप्त होते हैं। प्राप्त होती है। इस श्लोक में आगे कहा है

01:00:30:26 कि ब्रह्म यानी काल ब्रह्म की उत्पत्ति अविनाशी परमात्मा यानी परम अक्षर पुरुष से हुई है। अब

⬜ Not used yet · 01:00:37:22 – 01:28:12:00 (27:34)

01:00:37:22 यहां पे फंस गया क्योंकि इसने अक्षर समुद्भवम का अर्थ मान लिया। इसने अक्षर समद भवम का अर्थ मान लिया परम अक्षर पुरुष हमने अभी देखा ना अक्षर पुरुष कौन है अक्षर ब्रह्म कौन है जो परम अक्षर नहीं है जो पूर्ण परमात्मा नहीं है इसके हिसाब से हमारे हिसाब से है मगर इसने यहां पे क्या किया भगवत गीता में परम अक्षर समुद्भवम नहीं आया है भगवत गीता में अक्षर समुद्भवम आया है तो इसके अनुसार अक्षर का अर्थ परम अक्षर नहीं है हमारे अनुसार है तो इसने यहां पर मान लिया क्या माना कि ब्रह्म की उत्पत्ति सर्वव्यापी परम अक्षर ब्रह्म से हुई है। ठीक है? जो कि सदा ही यज्ञों यानी धार्मिक अनुष्ठानों में प्रतिष्ठित है। ये सब अपने मन से इसने डाल दिया। इष्ट के रूप में पूज्य है। यह इसने डाला है। इष्ट के रूप में पूज्य है। अपने मन से डाला है। सर्वव्यापी परमक्षर परमात्मा सदा ही यज्ञ में प्रतिष्ठित है। यह तो लिखा है। और एक दोबारा गौर करने वाली बात है कि यहां पर दो बार इस श्लोक में दो बार परमात्मा की बात

01:01:52:24 हो रही है। एक बार वेद को उत्पन्न करने वाले यानी ब्रह्म को उत्पन्न करने वाले के रूप में परमात्मा की बात हुई है। वहां पर अक्षर समुद्भवम कहा गया है और दूसरी बार यज्ञों में प्रतिष्ठित होने की बात की गई है। तो उस समय उसको ब्रह्म कहा गया है। तो इसने क्या किया है? अक्षर का मतलब भी परमात्मा मान लिया कि जो पहली बात तो जो ब्रह्म का अर्थ वेद मानना था वेद ना मान करके इसने काल ब्रह्म अपना प्रायता फैला दिया उसके बाद चलो फैला दिया उसके बाद उसको किससे उत्पन्न माना इसने परम अक्षर पुरुष से परमात्मा से जबकि वहां पर अक्षर कहा गया अक्षर का अर्थ इसने परमात्मा मान लिया ठीक है और उसके बाद यज्ञों में प्रतिष्ठित यहां पर ब्रह्म कहा गया है। कि कौन प्रतिष्ठित है यज्ञों में? ब्रह्म नित्यम यज्ञ प्रतिष्ठितम लिखा है ना श्लोक में ब्रह्म नित्यम यज्ञ प्रतिष्ठितम ये 15वा श्लोक की अंतिम जो लाइन है ब्रह्म प्रतिष्ठित है तो इसने यहां पर फिर से ब्रह्म का अर्थ क्या मान लिया है इसने फिर से ब्रह्म का अर्थ मान लिया

01:03:03:28 कि ठीक है। अब एक बात और है यहां पर कि सतलोक में भी सतलोक में आए क्योंकि जीव सतलोक को त्याग कर काल के लोक में आए तो कर्म करके सर्व पदार्थ को प्राप्त करते हैं। तो कर्म कहां से स्टार्ट हो रहा है? कर्म कहां से स्टार्ट हो रहा है? कर्म स्टार्ट हो रहा है सतलोक से निकलने के बाद। यह भी बात ध्यान रखने की है क्योंकि यह सारे कर्म तो वही दिखा देता है। व्यभचार इत्यादि सब कुछ दिखा देता है। जबकि सतलोक से निकल कर्म स्टार्ट हो रहा है यहां पर और इसने सतलोक में भी बहुत सारे कर्म दिखाए हैं। तो यहां पे भी फसा है। खैर आगे चलते हैं। जो व्यक्ति इस काल ब्रह्म के लोक में इस प्रकार प्रचलित विधान यह सोलवा पढ़ रहा हूं। तो पहले सोलवे का अपना अर्थ पढ़ ले हम लोग। कि हे पार्थ जो पुरुष इस लोक में इस प्रकार परंपरा से प्रचलित सृष्टि चक्र के अनुकूल नहीं बरतता। कहने का मतलब है कि जो शास्त्र वेद कर्म है उनको नहीं करता। अर्थात अपने कर्तव्य का पालन नहीं करता। वह इंद्रियों द्वारा भोगों में रमण करने वाला पापा पुरुष व्यर्थ ही जीता है। शास्त्र

01:04:19:10 सम्मत कर्म नहीं करेगा। शास्त्र सम्मतता से नहीं चलेगा तो फंसेगा। और फिर वो पाप करेगा, पाप करेगा तो व्यर्थ ही जी रहा है। क्योंकि वो और फंसता चला जाएगा। ठीक है। अब इसने क्या किया है? 36 में इस काल ब्रह्म के लोक में। अब यह काल ब्रह्म के लोक में कहां लिखा है? यह काल ब्रह्म का लोक इसकी संस्कृत कहां है? ध्यान देने वाली बात है। ये अनुवाद है। भावार्थ नहीं है। ध्यान दीजिए। ऊपर हेडिंग में हमने आपको बताया था ना 14 से 19 का हिंदी अनुवाद। तो ये 14 से 19 का अनुवाद चल रहा है। तो इसमें काल ब्रह्म का लोक कहां लिखा है? इस प्रकार प्रचलित विधान चक्र के अनुकूल नहीं बरतता। यानी शास्त्रों में दिए हुए व्याख्यान के अनुसार भक्ति कर्म नहीं करता। अब देखिए हर चीज की बात भक्ति कर्म नहीं करता। तो बाकी के कर्मों का विधान कहां पर है? सोचने वाली बात। वह इंद्रियों के भोगों में रमण करने वाला पायु यानी जीवन भर पाप करने वाला व्यक्ति व्यर्थ ही जीवन जीता है। यह झोल। आगे देखिए तीन 17 में क्या किया है? पहले तीन सत्र अपना पढ़ते हैं। परंतु जो मनुष्य आत्मा में ही रमण करने वाला और आत्मा में ही तृप्त तथा आत्मा में ही संतुष्ट हो उसके लिए कोई कर्तव्य नहीं है। अब यहां पे बहुत बढ़िया बात आने वाली है। बहुत बढ़िया क्या?

01:05:34:19 कि इसने माना है परंतु जो मानव आत्मा यानी सच्चे मन से परमात्मा के विधान का पालन करता है। यह कैसे हुआ भाई? जो मनुष्य आत्मा में ही रमण करने वाला आत्म रति क्या कहा गया है? आत्म रति आत्मा में रमण करने वाला। मगर यहां इसने क्या कर दिया? इसका अर्थ परमात्मा के विधान का पालन करता है। यह कहां गया? कहां से आ गया? इसकी संस्कृत कौन बताएगा? और जो अपने शास्त्र अनुकूल कर्म से तृप्त है शास्त्र अनुकूल की खैर वो नहीं है मगर फिर भी चलिए मान लेते हैं और आत्मा में ही तृप्त है मतलब आत्मा में तृप्त है उसको अन्य बा चीजों की बहुत न्यूनतम वो रह जाती है आवश्यकता तो वो तृप्त है मगर ये हमारा है इसकी इसके झोल को सुन लीजिए क्या कह रहा है ये कि शास्त्र अनुकूल कर्म से संतुष्टि हो उसके लिए अन्य पदार्थ की प्राप्ति के लिए कोई प्रयोजन नहीं रहता। और यहां यह कहा जा रहा है कि उसके लिए कोई कर्तव्य नहीं है। ठीक है? तो जो मनुष्य आत्मा में ही रमण करने वाला है उसके लिए कोई कर्तव्य नहीं है। ये हमारी भगवत गीता

01:06:49:20 ने कहा मगर इसने कहा कि जो मनुष्य सच्चे मन से परमात्मा के विधान का पालन करता है। मतलब आत्मा में रमण की बात तो भूल ही जाओ। ठीक है? आत्मा यानी सच्चे मन से परमात्मा के विधान का पालन। वाह। खैर आगे चलते हैं। अब तीन 18 में क्या कहा भगवान ने? उस महापुरुष का इस विश्व में ना तो कर्म करने से कोई प्रयोजन रहता है ना कर्मों के ना करने से कोई प्रयोजन रहता है तथा कर्म करने से भी कोई प्रयोजन नहीं है और कर्म ना करने से भी यहां पे भी वही समत्व बुद्धि आ रही है लाभ हानि राग द्वेष कर्म निवाद कारस्त फले सुदाच यहां पे भी वही चीज आ रही है समत्व बुद्धि कि तू केवल इसलिए कर कि ईश्वर ने कहा है इसलिए कर कि शास्त्र ने कहा है तेरा अपना कोई उसमें प्रयोजन नहीं होना चाहिए क्योंकि तू स्वयं आत्मरति आत्मरति हो जा आत्मा में ही रमण कर तो कुल मिलाकर के गीता में वही बात चल रही है आत्मरति हो जा और राग द्वेष में समान बुद्धि ले ले अपनी इंद्रियों को समेट ले मगर विषयों का चिंतन करते हुए मत समेट भगवान का सानिध्य प्राप्त करते हुए समेट भगवत गीता में वही बातें चल रही है अलग-अलग प्रकार से वही सब कहा जा रहा है तथा संपूर्ण प्राणियों में भी इसका किंचित किंचित किंचित मात्र भी स्वार्थ का संबंध नहीं रहता ठीक है अब इसने

01:08:05:01 क्या किया 3 18 में इसने तीन 18 में कहा है उस महापुरुष के लिए विश्व में ना तो व्यर्थ के पाप कर्म करने से कोई प्रयोजन रह जाता है। जो व्यक्ति जिसको मालूम है जो ये मान रहा है कि पाप कर्म है उसको पाप कर्म करने में प्रयोजन कैसे स्वीकार करेगा? हां। तो यह कह रहा है कि इसने इसका पूरा अर्थ ही बदल दिया इस व्यक्ति ने। यहां पर इसने पूरा अर्थ बदल दिया यहां पर। भगवान ने कहा है कि इस जो महापुरुष कौन सा महापुरुष जो आत्मा में ही रमण करने वाला है आत्मा में ही संतुष्ट है आत्मा में ही संतुष्ट है उसके लिए कोई कर्तव्य नहीं है उस महापुरुष का इस विश्व में ना तो कर्म करने से कोई प्रयोजन है ना कर्मों को ना करने से कोई प्रयोजन है क्यों कर रहा है फिर क्योंकि ईश्वर ने कहा है बस और उसका कोई व्यक्तिगत या आत्मिक कोई प्रयोजन नहीं है कि मैं अपने लिए कर रहा हूं केवल ईश्वर ने कहा इसलिए क्योंकि वो आत्मा में संतुष्ट है। ठीक है? यहां तो यह कहा भगवान मगर इसने क्या कर दिया? इसने कर दिया कि जो महापुरुष के लिए उस महापुरुष

01:09:20:14 के लिए विश्व में ना तो व्यर्थ के पाप करने से कोई प्रयोजन रह जाता है तथा ना शास्त्रानुकूल धर्म धार्मिक कर्म ना करने से कोई प्रयोजन रह जाता है। भाई मेरे यह कहना क्या चाहते हो? शास्त्र अनुकूल धार्मिक कर्म ना करना भी पाप है और पाप कर्म करना भी पाप है। तो उसी बात को तुमने दो बार यहां कर दिया और अर्थ का अनर्थ कर दिया मटियामेट कर दिया। शास्त्रानुकूल धर्म धार्मिक कर्म ना करने से कोई प्रयोजन नहीं रह जाता। ठीक है? यानी तत्व ज्ञान परिचित व्यक्ति अशुभ कर्म कदापि नहीं करता। लो वहां भगवान और ही कुछ कह रहे हैं कि वहां पे उसको राग द्वेष से मुक्त हो के बात करनी है। काम करना है। लाभ हानि में समत्व बुद्धि रख के काम करना है। मगर यहां पे इसने क्या कर दिया? अपने दिमाग की उपज यहां पूरी डाल दी। तो अशुभ कर्म कदापि नहीं करता तथा शुभ व शास्त्रोक्त साधना किए बिना भी नहीं रह सकता। वह केवल परमार्थ के लिए कार्य करता है। किसी भी प्राणी से स्वार्थ सिद्धि के लिए ही संबंध नहीं रखता। वह सबका शुभचिंतक होता है। अब इससे पूछो कि

01:10:35:20 तू भाई अपने इस तीन 18 की संस्कृत दिखा। संस्कृत दिखा जो तूने यहां पर किया है उसकी तीन 18 की संस्कृत दिखा जो तूने अनुवाद लिखा है तीन 18 खैर आगे चलते हैं तो अब इसने विश्लेषण किया क्या विश्लेषण किया कि गीता अध्याय तीन के श्लोक 19 में मूल पाठ में लिखा है कि साधक शास्त्रोक्त साधना करके परम आपनोति पुरुष अन्य परमात्मा को प्राप्त होता है। अन्य परमात्मा परम परमात्मा को नहीं अन्य परमात्मा क्योंकि इसको गीता कहने वाले से अलग हटाना है परमात्मा को तो इसका वो जो सिंगल पॉइंट एजेंडा है वो चलता रहेगा तो क्या है अब ये यहां पर बता रहा है कि परम का अर्थ अन्य श्लोकों में 42 43 में परम का अर्थ पर लिया है पर किया है पर का अर्थ श्रेष्ठ किया है यानी हिंदी की बात करें तो पर का अर्थ अन्य या आगे आगे वाला होता है। जैसे दादा फिर परदादा अब देखिए पहली बात तो क्या होता है कि परदादा का मतलब अन्य नहीं होता है। एक और दादा परम दादा इसलिए परदादा

01:11:51:03 कहते हैं। ठीक है? तो यहां पे खुद ही फंस रहा है उदाहरण देके। जैसे दादा फिर परदादा जैसे आत्मा परमात्मा ब्रह्म परम ब्रह्म तो ब्रह्म परम ब्रह्म को परब्रह्म भी कहते हैं। है ना? और इसने भी पर का मतलब परम माना है। यहां पर यह कहने का प्रयास कर रहा है तीन 19 का विश्लेषण करते हुए कि पर का अर्थ परम नहीं लेना है। पर का अर्थ अन्य लेना है। कोई और दूसरा जबरदस्ती। ठीक है? तो क्या है? इसने ही पर का अर्थ परम माना है। अभी हम दिखाएंगे आपको पर पहले इसको पढ़ ले थोड़ा सा। परम का अर्थ अन्य गीता अनुवादकों ने परम का अर्थ परमात्मा किया है। इनहीं अनुवादों ने इसी अध्याय के तीन के श्लोक 42 43 में परम का अर्थ पर किया है और पर का अर्थ श्रेष्ठ किया है। यानी यदि हिंदी की बात करें तो पर का अर्थ अन्य आगे वाला होता है। नहीं पर का अर्थ परम होता है। अगर दादा के आगे पर लग रहा है परदा यानी दादा से परम दादा। हम जैसे दादा फिर परदादा तथा ब्रह्म फिर परबह्म यानी दूसरा ब्रह्म परबह्म का अर्थ दूसरा हो गया। वाह दूसरा ब्रह्म दो ब्रह्म हो गए। खैर

01:13:06:07 इनहीं अनुवादों ने गीता अध्याय फिर इसने बार-बार पर का अर्थ परे किया है। मतलब इसने ये दिखाया है कि पर पर जो संस्कृत में लिखा हुआ है उसका मतलब इन्होंने परे कर दिया है। मगर जब हिंदी में पर लिख रहे हैं तो उसका अर्थ लिख रहे हैं परम। ठीक है? यहां पर यह क्लेम कर रहा है, आरोप लगा रहा है। फिर इसने बहुत सारे उदाहरण दिए कि आठ आठ श्लोक आठव अध्याय के श्लोक 22 में परह का अर्थ परम किया है। एक जगह पर का अर्थ परे किया है और एक जगह पर का अर्थ परम किया है। जबकि मूल पाठ से स्पष्ट है कि परह का अर्थ यानी दूसरे परे की बात हो रही है। अगर मान लीजिए एक बार को मान भी लिया जाए कि दूसरे परमात्मा की बात हो रही है। तो पहली बात तो वहां पे परमात्मा की संस्कृत होनी चाहिए। दूसरी बात है भाई तू खुद एक जगह कह रहा है कि ब्रह्म का अर्थ है क्षर पुरुष मगर यहां पर जब ऊपर इसका दिखाइए जरा

01:14:04:27 हम एक एक चीज और ले लेते हैं पेज पृष्ठ संख्या 45 निकाली है इसकी उसमें भी इसी तरह की क्लेम कर रहा है कि चार श्लोक 31 में अन्य परमात्मा का स्पष्ट वर्णन मूल पाठ में है। तो अनुवादों ने स्पष्ट अनुवादों को स्पष्ट लिखना पड़ा। ये 45वें का लास्ट पैराग्राफ है यही जो पढ़ रहा हूं। चार श्लोक 31 में अन्य परमात्मा का स्पष्ट वर्णन है। वर्णन मूल पाठ में है तो अनुवादों ने स्पष्ट लिखना पड़ा। परंतु श्लोक 32 में सांकेतिक वर्णन है। वहां अर्थ का अनर्थ करके गलत अनुवाद किया है। इसमें ब्रह्मण शब्द का अर्थ वेद कर दिया है। जबकि इन्होंने ही इन्होंने गीता अध्याय 17 श्लोक 23 में ब्रह्मणा का अर्थ सच्चिदानंद घन ब्रह्म यानी पूर्ण ब्रह्म ठीक किया है। यानी ब्रह्म का अर्थ जब इसके अनुकूल हो तो ब्रह्म का अर्थ भी परम ब्रह्म है। ठीक है? इसने यहां ये मान लिया। ब्रह्म का अर्थ परम ब्रह्म मान लिया। ब्रह्माणा का अर्थ सच्चिदानंद घन ब्रह्म मान लिया। ठीक है? ठीक है? अब कुल मिलाकर के यहां पर निचोड़ यह निकलता है कि यह आरोप लगा रहा है कि एक ही शब्द का कहीं पर कोई अर्थ

01:15:20:02 कर रहे हैं। कहीं पर कोई अर्थ कर रहे हैं। यह आरोप यह लगा रहा है। तो अब इसके इसके इस आरोप का हम जवाब देते हैं। पहले तो पर का अर्थ इसने स्वयं ने परम लिया है कि नहीं वह दिखाते हैं आपको। कहां पर लिया है पर का अर्थ परम? यह देखिए आ जाइए। इसकी भगवत गीता में प्रश्न संख्या 40 पृष्ठ संख्या 40 में बिल्कुल लास्ट पैराग्राफ देखिए। उसमें लिखा हुआ है यज्ञ के द्वारा देवताओं अर्थात संसार रूपी पौधे की शाखाओं को उन्नत करो। और इसी अनुवाद की अंतिम लाइन में लिखा हुआ है इस प्रकार दूसरे को उन्नत करके परम कल्याण को प्राप्त हो जाओगे। तो इसने यहां पर परम का अर्थ परम माना स्वयं ने माना। तो गीता प्रेस के जो अनुवादक हैं या जो आचार्य गण है पारंपरिक वह अगर परम का अर्थ परम मान रहे हैं और अपने प्रसंग प्रसंग अनुसार कहीं कहीं पर परम का अर्थ कोई दूसरा मान रहे हैं तो उस पर आरो उन पर आरोप लगा रहे हैं। मगर खुद ही एक ही शब्द के अलग-अलग अर्थ अपने

01:16:35:03 अनुसार मान रहा है। जैसे कि ब्रह्म का अर्थ हमने पिछले अध्याय में बताया। इसने पूर्ण ब्रह्म मान लिया। ब्रह्म का अर्थ इसने यहां पर भी मान लिया। तीन तीन 15 में ब्रह्म का अर्थ इसने सर्वगत ब्रह्म मान लिया और तीन 15 में इसने अक्षर का अर्थ परम अक्षर पुरुष मान लिया और अ 432 में इसने ब्रह्मण का ब्रह्मण का अर्थ क्या कहते हैं सच्चिदानंद धन ब्रह्म मान लिया तो इसने अपने अनुसार मान लिया मगर वहीं पर यदि यदि परंपरा प्राप्त आचार्य गण या गीता प्रस के जो अनुवादक हैं जो आचार्य गण है वो अगर प्रसंग अनुसार एक ही शब्द के अलग-अलग अर्थ हैं। मगर वो यदि प्रसंग अनुसार करेंगे तो ये क्लेम करेगा जबकि ये खुद भी परम का अर्थ परम मानता है। मगर भगवत जो गीता प्रेस के ट्रांसलेटर्स है वो अगर इसके अनुकूल नहीं दिखेंगे इसे तो ये कह देगा कि यहां पर इन्होंने गलत अर्थ किया है। भले ही इसको संस्कृत का सा भी ना आता हो, इसको संस्कृत बोलनी ना आती हो। मगर जो संस्कृतज्ञ है उन पर यह आरोप लगाएगा। भले ही इसको निरुक्त ना पता हो,

01:17:50:14 कुछ भी ना पता हो मगर यह आरोप लगाएगा। तो यहां तक हमने पढ़ लिया। इसके बाद आगे से शुरू होगा क्योंकि आगे जनक जी को परम सिद्धि प्राप्त हुई है। ठीक है? जनक आदि ज्ञानी जन भी आसक्ति रहित कर्म द्वारा ही मतलब ये गृहस्थ जनक आसक्ति रहित कर्म द्वारा ही परम सिद्धि को प्राप्त हुए थे। ये अगला है श्लोक। तो वो कहा जा रहा है ना कि गृहस्थ होते हुए भी तुम मुक्ति को प्राप्त हो जाओगे। हम तो यहां पर जनक जी का उदाहरण दिया जा रहा है कि परम सिद्धि को प्राप्त हो गए। तो ये अगला अगले अगली बार हम बात करेंगे। हम थोड़ी सी अपनी बातें कर लेते हैं। गोपाल जी शायद आने वाले थे। उनको लिंक अगर आपने ना भेजा हो तो भेज दीजिए। लाइव स्ट्रीम का लिंक यहां दे दीजिए। किसी को कोई चर्चा करनी हो वैचारिक मतभेद के निमित्त तो वह आ सकता है या फिर अपने विचार प्रकट करने हो तो वह आ सकता है। हमने अभी एक बड़ी चीज यहां पर निकाली है कि भाई यह क्लेम कर रहा है कि एक ही शब्द के अलग-अलग अर्थ अनुवादक कर रहे हैं जो कि गलत है। और जबकि इसने स्वयं ने एक ही शब्द के अलग-अलग अर्थ किए हैं। कहीं पर ब्रह्म का अर्थ अपना काल राक्षस वाला ब्रह्म किया है। कहीं पर ब्रह्म का अर्थ पूर्ण ब्रह्म किया है। सच्चिदानंद

01:19:06:04 घन ब्रह्म किया है। ठीक है? कहीं पर अक्षर का अर्थ इसने खुद बताया है कि परम अक्षर और कहीं पर अक्षर का अर्थ बताया है कि अक्षर। ठीक है? और कहीं पर परम का अर्थ खुद परम बताया है और कहीं पर का अर्थ इसने अन्य बताया है। तो यह सब इसने खुद झोल किया है। मगर इसके झोला अनुसार जो अर्थ प्राप्त हो उसको मानना चाहिए और संस्कृतज्ञ परंपरा प्राप्त आचार्यों के प्रसंगानुसार जो अर्थ प्राप्त हो वो नहीं मानना चाहिए क्योंकि यह है जेलधाम निवासी कौन है जेलधाम निवासी जिन पर चलिए छोड़िए। खैर हमने स्ट्रीम का लिंक दे दिया है संभवत। तो आप कोई आना चाहे तो आ सकता है। अन्यथा हम फिर इसको बढ़ाएंगे

01:20:03:28 आगे। हम हां एक बात और बता दें। Instagram अकाउंट को बैन किया गया है इंडिया में। भारत में Instagram अकाउंट को बैन किया गया। आप अगर हमारे अकाउंट पर जाएंगे तो वहां आपको लिखा दिखाई देगा कि यह जो अकाउंट है यह इंडिया में बैन है। तो आप जो है अगर विदेश वाले होते हुए उसको अगर चेक करेंगे तो आपको हमारा पेज दिखेगा। उस पर हम कार्य कर रहे हैं कि ऐसा क्यों किया है? किसने कर क्लेम किसने किया है। अभी हमें कुछ भी बताया नहीं गया इस बारे में। उस पर चल रहे

01:20:45:21 हैं। कमेंट कर दिया ना स्ट्रीम का लिंक और किसी भी प्रकार की वैचारिक मतभेद के निमित्त आप चर्चा के लिए हमें संपर्क कर सकते हैं। नंबर यहां पर स्क्रीन पर दिया जा रहा है। मैं बोल भी देता हूं। 7408301869 कोई आवश्यक कमेंट हो तो आप यहां उसको प्रदर्शित कर दीजिए क्योंकि मैं पढ़ नहीं पा रहा हूं। सरकार को रामपाल जैसे लोगों पर एक्शन लेना चाहिए। बिल्कुल लेना चाहिए और हम और आप अपने ध्वनि सरकार के कानों तक कानून तक पहुंचाएंगे। आह्वान करिए सरकार का और संगठन तैयार कीजिए। अपने स्थानीय लेवल पर संगठन होना चाहिए कि आपके घर के आसपास रामपाल मुक्त रहे। हर व्यक्ति यही बीड़ा उठा ले कि मेरे घर के आसपास रामपाल मुक्त होगा तो भी रामपाल मुक्त हो जाएगा हमारा देश। हम ठीक है

01:21:53:24 ना? और कोई कमेंट काल के जाल में रामपाल जेल में ठीक है तो आने के लिए बहुत-बहुत आभार सबका हम जॉइ करके मुझे कमेंट दिख क्यों नहीं रहे हैं? ये जो रीसेंट कमेंट आ रहा है इसको जरा प्रदर्शित करिए कि क्या लिखा है ये जो तमीज से बात करेंगे ऊपर वाला कमेंट है इसको जरा स्क्रीन पर दिखाइए दिख नहीं रहा है कोई भी कमेंट

01:23:09:06 इससे पहले वाला है जस्ट पहले वाला क्या लिखा है 8 21 22 में देवी भागवत महापुराण को वंशजों को श्राप दिया है भाई सामने आकर बात करना यह क्या सब बकवास कर रहा है अच्छा वो है क्या बाबू बाबू अर्जुन को मोक्ष मिला था कि नहीं सीधी बात है भाई सर्वशक्तिमान सिद्ध करो ले जाओ सब कुछ सारी बातें तुम्हारी मान लेंगे आप भगवान को सर्वशक्तिमान परम स्वतंत्र मोक्ष इसकी बात करिए हां बाबू है समझ गया अंकित दास नाम से आया था बाबू अब स्मार्ट हो गया थोड़ा पहले हैप्पी डेंट वाइट चिंगम का ऐड करता रहता था बाबू वैसे एपिडेंट वाइटम ज्यादा चलती है अगर बाबू कोस में लिया जाता है ना क्या कहना है आप लोगों का पहाड़ी

01:24:07:12 जी चलिए ठीक है कोई है नहीं जो इस समय आए क्योंकि रामपाल के किसी भी फॉलोअ ने लगता है बचपन में माता जी का निष्ठा पूर्वक दूध नहीं पिया है जिस कारण से वह आते नहीं है और यही चंगू मंगू जो 50ों बार पिट चुके हैं और केवल उधम मचाने के लिए वो एक क्या कहते हैं अवस्था फैलाने के लिए आते हैं इनका हो गया बार-बार क्या इन्हीं को लेते रहे अमित दास आता है अपने चैनल के लिए कंटेंट लेने वो उसने कल डाल दिया यहां की चर्चा में अपना शटर घोट कर के डाल दिया देखो देखो एम ये वो फलाना ढिमका सब करके उसने डाल दिया ठीक है चलिए सभी को जय श्री राम। आशा करता हूं यह श्रंखला आपको अच्छी लग रही हो। इसके बुलेट पॉइंट्स आपको सर्वशक्तिमान धर्म नाम का जो हमारा दूसरा चैनल है उस पर मिल जाएंगे और अगले सेशन तक के लिए आप लोगों से आज्ञा चाहते

01:25:14:06 हैं। खीर का कर्ज उतारो भाई रामपालियों माता जी ने निष्ठा पूर्वक दूध पिलाया तो आ जाना शिवश नारायण द्विवेदी तुमको तुम्हारे रास्ते में खड़ा मिलेगा हम वो गरुड़ पुराण में ही है बस गरुड़ पुराण में ही फस गया है वो लगता है वो वो कौन सी नदी है गरुण पुराण में वेतरणी नदी है ना वही फसा है वह इसीलिए बेचारा आता रहता है। चलिए और हम कौन है? वहां के जो हंटर चलाते हैं ना वैतरणी नदी में जब यातनाएं दी जाती हैं। हम लोग वो हैं। इसीलिए आता है वह भी मुझे वैतरणी नदी में यातना दो मुझे। खैर चलिए यह तो हो गया विनोद की बातें। सभी को जय श्री राम। और आप लोग हमारे कई कई प्रकार के प्रकल्प चल रहे हैं। तो अगर आप हमें आर्थिक बल प्रदान करना चाहते हैं तो यहां पर हम डिटेल्स आपको दिखा देते हैं। तो आप अमित

01:26:37:22 दास ने जो वीडियो बनाई है उस पर हमने कई वीडियो बनाई हैं। हां अमित दास जो टॉपिक लेकर आया था उस पर हमारी बहुत सारी वीडियोस बनी हुई है। आप लोग वह देख सकते हैं। उसको लगता है कि वो पहली बार लेके आया। उसने शायद विद्या वाली वीडियो देखी नहीं। माया वाली वीडियो नहीं देखी तो आप लोग वो सब देख सकते हैं। हालांकि अमित दास के प्रतिकार स्वरूप हमें कुछ स्पेशली बनाना हम आवश्यक नहीं समझते। उनके जो बाबा जी हैं जब वो ही इस स्तर के नहीं है अमित दास तो क्या है फिर अमित दास जी बाबा जी हैं जिनका ऊंट जो इस तरह से हुआ करता है हम वो ही इस तरह के नहीं है तो फिर केवल अमित दास की क्या ही प्रार करें आर्य समाजी भी इस तरह की बातें कर चुके हैं ठीक है तो चलते हैं एक महाशय आए हैं मगर वो अपना चेहरा लेकर के नहीं आए हैं तो फिर किसी दिन बात करते हैं। कोई बात नहीं आप कभी साहस जुटाइए। माता जी का निष्ठा पूर्वक दूध प्राप्त किया है जिसने वो संपर्क करें

01:27:45:02 7408301869 जय श्री राम। वो डिटेल्स यहां पर दिखा दीजिए। जो जानकारी हां यह आपको जानकारी दी जा रही है तो बारकोड भी अच्छा ठीक है तो ठीक है सभी को जय श्री राम

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A: AHVAAN - Call Of Dharma Live 1:28:14 · 29 May 2025

गीता के नाम पर रामपाल के बोलबचन अध्याय 3 Ep-4 #satlokashram

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A · Live रामपाल का काल exposed #rampaljimaharaj #kabir
Open at 00:22:29:06
A · Live शैतान ने Rampal Das के अंदर प्रवेश कर गीता का किया गलत अनुवाद #rampal...
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