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00:00:03:20 तो जय श्री राम सभी लोगों को। आशा करते हैं आप सभी कुशल पूर्वक होंगे और मेरी आवाज वगैरह ठीक आ रही है तो कमेंट करके मुझे बता दें कि आवाज ठीक है। आज का विषय बहुत गंभीर है। इसलिए मैंने बहुत प्रयास किए कि मैं पहले वीडियो ना बना करके और इस तरह से अपने स्तर पर जो भी कर सकता हूं वह करूं। परंतु जब कोई रास्ता मुझे नहीं दिखा तो मैंने ये रास्ता इस मार्ग का चयन किया है अपना संदेश पहुंचाने के लिए। तो यह जो वीडियो है यह कुल मिलाकर के तीन विषयों पर आधारित वीडियो है और उसका आधार है हमारे जो सनातन धर्म ग्रंथ हैं वैदिक वांगमय है और जिनमें पुराण भी आते हैं।
00:01:05:13 तीन विषय यह है कि सबसे पहला विषय है जो धर्मेंद्र धर्मेंद्र हुड्डा जी हैं उनको एक संदेश पहुंचाना एक गंभीर विषय से अवगत कराना। दूसरा विषय है कि यह जो 25 अगस्त को हरियाणा में जो आयोजन हो रहा है जो कि हुड्डा जी के आहान पर आयोजित हो रहा है। इसमें जो मूल सनातन वैदिक आर्य हिंदू हैं जो इस कार्यक्रम से अपेक्षा कर रहे हैं और करनी भी चाहिए। ये सनातन धर्म की रक्षा के लिए आयोजित हो रहा है। तो उनकी जो अपेक्षा होने अपेक्षा करने वाली जो स्थिति है वो यहां पर बिल्कुल भी अनुचित नहीं है। परंतु अपने मस्तिष्क को और अपने विचारों को पूर्व में ही थोड़ा सा सतर्क रखते हुए आपको अपेक्षा करनी है और सतर्क किन बातों से रखना है उनके लिए यह वीडियो आज है। तो यह दूसरा विषय है। आपकी सतर्कता हिंदुओं को सतर्क रहने की भी आवश्यकता है। इस कार्यक्रम के प्रति वह क्यों है वह मैं आपको बताने वाला हूं। तीसरी बात है कि आज से मैं इस
00:02:21:25 सीरीज का उद्घाटन कर रहा हूं। बहुत ज्यादा एपिसोड नहीं होंगे। मगर जो मोटे-मोटे आक्षेप पुराणों के आधार पर या हमारे जो भगवत चरित्र उनको बदनाम करने के लिए विभिन्न मतों के द्वारा उठाया जाता है। तो उसमें एक एक करके जो बहुत ज्यादा प्रसिद्धि प्राप्त जो आक्षेप है उनका निराकरण कर देंगे। यद्यपि हमने कई बार किया भी है परंतु डेडिकेटेड रूप से इस पर कोई लाइव या कोई वीडियो डेडिकेटेड रूप से नहीं बनाया है। यहां पर अगर आप हमारे पुराने वीडियोस में जाएंगे तो उसमें सबसे पहला एक आपको मिलेगा इस के जो लखनऊ प्रेसिडेंट है उनके साथ जो हमारा एक पडकास्ट हुआ था तो उसमें उन्होंने भी शिव जी को इसलिए बताया था कुछ हीन दृष्टि से कि वो भगवान नहीं है क्योंकि वो मोहिनी से मोहिनी रूप के प्रति आकृष्ट हो गए थे तो उस उसकी विवेचना में जब हमने उसकी विवेचना की थी तो उसमें जो शिव शिवम मोहिनी का आदि दैविक आदि भौतिक आध्यात्मिक अर्थ है उस घटना का वो दृष्टांत उसी वीडियो में प्रस्तुत कर दिए थे तो ऐसा नहीं है समय-समय पर हम बताते रहे हैं ब्रह्मा जी ब्रह्मा सरस्वती विवाह है उसके बारे में बताया है और जो मूल सिद्धांत है वो भी अवगत
00:03:37:01 कराते रहे जिससे कि हिंदू बार-बार भटके ना परंतु डेडिकेटेड रूप से कोई वीडियो की आज हम इसी पर बात करने वाले हैं कि ब्रह्मा सरस्वती विवाह क्यों हुआ या फिर शिव मोहिनी प्रकरण में क्या हमें अर्थ लेना चाहिए उसका? तो इस तरीके से हमने कभी डेडिकेटेड रूप से नहीं बनाया। तो आज मैं इसका श्री गणेश कर रहा हूं। उद्घाटन कर रहा हूं। इस सीरीज का प्रारंभ कर रहा हूं। जिसमें कि आज हम ब्रह्मा सरस्वती विवाह पर बात करेंगे। ठीक है? तो पुराणों पर आक्षेप ये तीसरा चरण। दूसरा चरण है सामान्य हिंदू की सतर्कता 25 अगस्त को होने वाले कार्यक्रम के प्रति। और पहला है हुड्डा जी को संदेश। तो जितने भी हिंदू हैं, जितने भी हिंदू भाई हैं, मैं उनसे निवेदन करता हूं कि मैंने प्रयास किया है हुड्डा जी को संदेश अपना पहुंचाने का। परंतु मेरे पास उनका शायद यथोचित संपर्क सूत्र ना हो या फिर जो भी है मेरा मैसेज उन तक नहीं पहुंच पाया। इसलिए मैं वीडियो के माध्यम से उनको एक संदेश दे रहा हूं और जितने भी हिंदू हैं मैं उनसे निवेदन करूंगा कि आप यह वीडियो उन तक पहुंचाएं। निश्चित रूप से पहुंचाए। तो सबसे पहले तो जो लोग इस वीडियो
00:04:52:04 से ही इस प्रकरण को जान रहे हैं उनके लिए थोड़ा सा एक संक्षिप्त विवरण देते हुए मैं अपने जो पहला विषय मूल विषय उस पर आना आना आता हूं। तो प्रकरण क्या है कि जहां जो मेरी जानकारी है जहां तक कि हुड्डा जी एक समाज सेवक है और वो काफी दिनों से अपनी प्रोफाइल के द्वारा ऐसे तंत्र या ऐसे व्यक्तित्व जो अंधविश्वास फैला रहे थे सनातन धर्म के नाम पर या सनातन धर्म का चोला ओढ़ के तो उनको अपनी तरीके से वो उनसे जूझ रहे थे और उनसे समाज को मुक्त करने का प्रयास कर रहे थे। विशेष रूप से हरियाणा में जो हो रहा है उसको लेकर के वो और कई सारी समाज को जागरूक करने वाली जो गतिविधियां हैं वो अपने Facebook पेज इत्यादि से कर रहे थे जहां तक मेरी जानकारी है और संभवत उनको जानने मानने और अनुगमन करने वाले भी बहुत लोग हैं। उनका इस इस प्रकार का प्रभाव है हरियाणा में कि उनका अनुगमन करने वाले करने वाले लोगों की संख्या पर्याप्त है। तो इसी क्रम में जब हुड्डा जी ने कोई वीडियो बनाकर के टिप्पणी की रामपाल के ऊपर रामपाल के तंत्र के ऊपर रामपाल की जो अभद्र टिप्पणियां
00:06:07:20 हैं हमारे सनातन हिंदू देवी देवताओं के प्रति उनके ऊपर तो इधर से इनका जो रामपाली गैंग है जो पूरा लगा रहता है कि कोई भी अगर कुछ बोले वो सामर डियर वाली बात तो मैंने आपको बताई है ना कि रामपाल का सबसे बड़ा शत्रु कौन है? उसके ही डंका पीट कर अपने आप को उसका शिष्य बताने वाले जो गैंग है उसका रामपाल का वही उसका सबसे बड़ा शत्रु है क्योंकि रामपाल जब भी कभी मुसीबत में फंसा है तो उसको उसकी गैंग ने ही फंसवाया है और इस बार भी यही किया उसकी गैंग चालू हो गई जवाब देने के लिए हुड्डा जी ने एक मरदित रहते हुए वीडियो बनाया और उसमें चेतावनी दी और यहां से गैंग ने व्यक्तिगत प्रहार करना ऐसा करना तू तो यह है तू तो वो है तेरा व्यक्तिगत ये था तू यह कुत्ता चुराया था तूने बहुत सारी चीजें चालू कर दी। इसके बाद वह चीज गमा गई। हुड्डा जी ने भी अपनी वो पहले उनका जो मैंने थोड़ा बहुत उनका Facebook पेज चेक किया है तो उसमें मैंने जाना कि वो पहले भी अंत तक लड़ने वाले व्यक्ति हैं और वो लड़ेंगे। उन्होंने डिक्लेअ कर दिया कि मैं पीछे नहीं हटूंगा। मैं लडूंगा। दोनों तरफ से फिर ये सब चीजें चालू हो गई। यहां तक भी तो यह मतलब यह पूरा प्रकरण है जो चल रहा है। अब इसी सिलसिले
00:07:22:26 में हुड्डा जी ने एक आहान किया है 25 अगस्त को हरियाणा में कहीं पर एक आयोजन हो रहा है जिसमें उन्होंने बताया कि विभिन्न जो संप्रदाय हैं उनके आचार्य गणों का आह्वान किया है। हालांकि उसमें आ कौन-कौन रहा है यह अभी तक मुझे सुनिश्चित रूप से ज्ञात नहीं हुआ है। पर उन्होंने आहान किया है और नाथ संप्रदाय के कई डेरे हैं ऐसा बताया जाता है और वह लोग तो वहां पर सम्मिलित होने ही वाले हैं। साथ ही साथ इस आयोजन में वहां पर आर्य समाज के बंधुग भी उपस्थित होने वाले हैं। और मैं कहूंगा कि ये जो अभियान जो चला है इसमें जिस तरीके से आर्य समाज ने स्टैंड लिया है ये बहुत अच्छा उन्होंने मतलब उनकी पहल है कि ये अच्छा लगा देख के कि आर्य समाज भी आगे है इस चीज के लिए कि अपमानजनक तरीके से जो टिप्पणियां रामपाल कर रहा है। तो उसको लेकर के उन्होंने भी स्टैंड लिया। मैंने कई लोगों के वीडियो देखे वह आगे आए। इसके लिए उनका भी हृदय से धन्यवाद। तो यह एक आयोजन होने वाला है हुड्डा जी के द्वारा और यह मूल रूप से ये जो आयोजन है यह रामपाल के विरुद्ध होने वाला है। वहां पर आगे की चीजें निश्चित होंगी। ऐसा बताया जा रहा है और हमारे अगले कदम क्या होंगे वह बताया जा रहा है। अच्छी बात है। बहुत अच्छी बात है। पर बात यह है
00:08:38:00 कि इसमें बीच-बीच में मुझे कुछ सुनने को ये आ रहा है। जैसे रामपाल का एक वक्तव्य आया और रामपाल ने उसमें ये कहा कि भाई मैं जो भी बोलता हूं तुम्हारे शास्त्रों में लिखा है। तुम अपने अगर तुम मुझे गलत कह रहे हो तुम अपने शास्त्रों को गलत कह दो। तुम्हारे शास्त्र गलत हो गए। यानी कि मूल रूप से देखा जाए तो जिन शास्त्रों को जो मूल सनातन परंपरा प्राप्त सनातन वैदिक हिंदू है वह मानते हैं जिन शास्त्रों को उन शास्त्रों में लिखा है ऐसा रामपाल का कहना है। तो फिर भीनी सी ऐसी बातें भी आई कि संभवत यह भी हो सकता है कि भाई
00:09:14:21 एक बीच में एक बात यह भी सुनाई दी थी कि जब बहुत ज्यादा ठना जो ठन गई थी दोनों ओर से मामले को तो एक बैठक हुई जिसमें बताया गया कि अब ना हम कुछ बोलेंगे ना आप कुछ बोलो यहीं से ड्रॉप आउट कर दो मामले को शांत कर दो और आप अपनी पोस्ट हटा लो हम अपनी पोस्ट हटा लेंगे हालांकि दूसरे दिन हुड्डा जी ने इस बात का खंडन कर लिया कर दिया कि मैंने कोई कॉम्प्रोमाइज वगैरह नहीं किया है किसी से भी। अब यहां पर बात ये आती है कि यदि रामपाल धर्मेंद्र जी से यानी धर्मेंद्र हुड्डा तो धर्मेंद्र जी से रामपाल यह कहता है कि मैं जो कह रहा हूं वो तुम्हारे पुराणों में लिखा हुआ है। शास्त्रों में लिखा हुआ है। वही कह रहा हूं। एज इट इज बोल रहा हूं। ऐसा है नहीं वो हम आगे बात करेंगे। पर वह जब यह कहेगा तो जो वह बोल रहा है उससे मिलताजुलता हालांकि जो एग्जजेक्टली उसने बोला है जिन बातों को लेकर हमने रिट तक लगा दी हाई कोर्ट में और जो एग्जजेक्टली उसने जो बोला है वो हमारे इस पूरे वैदिक मांग में कहीं भी नहीं लिखा है। वो तो उसकी अपनी कल्पना है। परंतु उसी प्रकार का दूसरा दूसरी घटना वृतांत प्रतीत होने वाला जो वाक्य है वो वाक्य आपको पुराण में मिल जाएगा तो जब रामपाल
00:10:30:00 यह बात कहेगा हुड्डा जी से जो होने वाला है तो वहां पर हुड्डा जी की ओर से अभी तक जो मुझे दिखाई दे रहे हैं रामपाल का शास्त्र के आधार पर प्रतिकार करने वाले जो लोग अभी तक जो दिखे हैं तो वह मुझे दिख रहे हैं आर्य समाज अब यहां पर मैं अभी हुड्डा जी आपके प्रयास को और आपके एफर्ट को मैं नमन करता हूं। बहुत सम्मान करता हूं। आपने जो पहल की है बहुत अच्छी पहल है। मुझे बहुत उससे जो है प्रसन्नता हुई और आर्य समाज ने भी जिस प्रकार से स्टैंड लिया रामपाल रामपाल के विरोध में वो भी बहुत अच्छा है। पर आर्य समाज को अंतिम रूप से अपना रक्षक बनाते हुए शास्त्र के आधार पर रामपाल से इस विषय में बात करना यह कहीं से भी उचित नहीं है। क्यों उचित नहीं है? क्योंकि आज जो रामपाल बोल रहा है इतना उसका जो बेस है ना जो नीव है वो आर्य समाज द्वारा ही निर्मित है। यह सब बातें जो है ना जो वेद में वेद के ऊपर आक्षेप लग रहे हैं। इसमें पहली बार जो बात करने वाला जो कोई तंत्र है वो आर्य समाज है जो वेद के ऊपर नहीं सॉरी पुराण के ऊपर जो आक्षेप लग रहे हैं पौराणिक घटनाओं के ऊपर
00:11:45:03 तो यह जो जो बेस तैयार करके दिया है रामपाल जैसों को रामपाल ही क्यों जिसको भी विरोध करना होता है सनातन का मूर्ति पूजा का या फिर ये जितनी पौराणिक कथाएं हैं इसके आधार पर वो व्यक्ति किसी को भी अगर विरोध करना होता है तो वो करता है और यह जो आधार है ये बना करके दिया है आर्य समाज और मैंने अपने कई वीडियोस में बताया भी है कि परंपरा प्राप्त जो सनातन सिद्धांत है उसका आज जो विरोध कर रहे हैं उनको छत्रछाया जो सानिध्य है वो आर्य समाज से ही प्राप्त हुआ है। हालांकि मैं यह नहीं कहूंगा कि आर्य समाज का सिंगल पॉइंट एजेंडा यही था कि मेरे जैसे और खड़े हो जाए। आर्य समाज खुद भी इनका खंडन करता है। परंतु आपने ही यह ढांचा उनको बना करके दिया है। इससे इस सत्य से भी मुंह नहीं फेरा जा सकता। यह बात भी सच है। तो जो आर्य समाज पहले ही पुराणों को
00:12:39:18 अप्रामाणिक मानता है। जो आर्य समाज पहले से ही यह कहता है कि भाई ये राधा कौन है? वो पहले ही आक्षेप लगाता है। ब्रह्मवरत पुराण में यह लिखा है। फलाना लिखा है, ढिमका लिखा है। जो आर्य समाजी स्वयं पहले से ही एक तानाबाना तैयार करके रखे हुए हैं। जिनके आधार पर आज ये रामपाल जैसे लोग खड़े हो रहे हैं। वो आर्य समाज हमारी रक्षा कैसे करेगा? वहां पर इस विषय में रामपाल जब सामने खड़ा होगा तो आर्य समाज इस विषय में हमारा रक्षक नहीं हो सकता। शास्त्रों के आधार पर हां जो जनबल होता है किसी दैव कार्य के लिए धर्म कार्य के लिए जनबल चाहिए होता है संख्या बल चाहिए होता है उसके लिए आर्य समाज का साथ बहुत अपेक्षित है और प्रशंसनीय अगर वो आता है आर्य समाज आर्य समाज ही आते हैं सामने बहुत अच्छी बात है परंतु आर्य समाज वहां जाकर के ये नहीं कह सकता कि हमारे पुराणों में यह नहीं कहा गया है जो तुम कह रहे हो वो ये नहीं कह सकता आर्य समाज से जब पूछा जाएगा कि भाई इसका क्या करें जब रामपाल कहेगा यह देखो फलाने चैप्टर में लिखा है रामपाल ही कहेंगे रामपाल को तो कुछ ज्ञान नहीं है अब इस समय तो रामपाल के जो गुर्गे हैं उनको ज्यादा रट्टू तोते वाली पढ़ाई इस समय रामपाल से बात करोगे तो उसको 10 चीजें याद होंगी तो उनके जो रट्टू तोते उनको
00:13:54:21 50 चीजें इस समय याद होंगी कहां कहां-कहां पर वो छिद्रान्वषण होता है ना कहांहां पर ऐसी बातें लिखी हुई हैं जिसके आधार पर जो है हम आक्षेप लगा सकते हैं सनातन धर्म के देवी देवताओं तो आर्य समाज वह तंत्र नहीं है जो वहां यह कह पाएगा कि नहीं नहीं तुम गलत बोल रहे हो। पुराण में यह नहीं यह लिखा है। हालांकि जितनी भी पौराणिक घटनाएं हैं उन सब का आधार वेदों में भी है। जो मैं अभी ब्रह्मा सरस्वती विवाह वाला प्रसंग जब आपको बताऊंगा तो उसमें वेदों में उसी प्रकार की घटना कहां पर दी गई जिसके आधार पर पुराणों की वो घटना चित्रित हुई है। वो मैं बताऊंगा। तो आर्य समाज क्या करता है? जब वेद में वैसी बातें आती हैं जिसका एज इट इज अगर शब्दार्थ ले लिया जाए तो बड़ा खराब लगे सुनने में या असंभव सी चीजें लगे या अश्लीलता सुनाई दे या फिर और कुछ जो कि सिद्धांत के रूप में जिसको नहीं लिया जा सकता है। तो आर्य समाज वहां पर क्या करता है? वहां पर उनके उस अर्थ को लेने का प्रयास करता है जो सही हो। ऐसा अर्थ परंतु वहीं पर जब पुराणों में वह घटनाएं आती है उसी से मिलती जुलती तो वहां पर क्योंकि वह विरोध रहा है शुरू से परंपरा प्राप्त आचार्यों से तो आर्य समाज वहां पर उसका अर्थ एज इट इज लेता है कि शिव
00:15:09:22 मोहिनी के प्रकरण का तो यही अर्थ है। आर्य आर्य समाज जब वेदों में जब बात आती है कि अगर तुमको फल की प्राप्ति करनी है तो मेंढक से भोग करो, बैल से भोग करो तो वहां भाष्य करते समय उसका भावार्थ बदल देता है। वह एज इट इज शब्दार्थ नहीं लेता है आर्य समाज भावार्थ में अपने मन का कुछ उसके उसके पीछे की कुछ दय कुछ आदि दैविक अर्थ या आदि भौतिक अर्थ या फिर आध्यात्मिक अर्थ डाल देता है आर्य समाज परंतु जब पुराण की बात आती है उसमें भी यही सब अर्थ है आदि दैविक आदि भौतिक आदि आध्यात्मिक तो वहां पर आर्य समाज सीधे शब्दार्थ लेता है और उसकी निंदा कर देता है कि भाई हम पुराण को नहीं मानते उसमें तो यह सब लिखा हुआ है तो यदि धर्मेंद्र जी सीधा सा संदेश यह कि धर्मेंद्र जी यदि आप आर्य समाज को लेकर के इन विषयों में शास्त्र के आधार पर रामपाल के समक्ष खड़े होने वाले हैं तो यह आपकी बहुत बड़ी भूल है। आप इसको सुधारें और किसी प्रामाणिक आचार्य को अपने साथ खड़ा करें। फिर वो श्री संप्रदाय के हो, शंकर संप्रदाय के हो, मद संप्रदाय के हो, प्रामाणिक आचार्य को अपने साथ खड़ा करें। ठीक है? परंपरा प्राप्त अब परंपरा के विषय में आप आर्य समाज से पूछ सकते हैं। आर्य समाज हमसे आर्य समाजी बहुत सारे हैं जो हमें जान गए हैं। तो आर्य समाज से जब आप हमारे
00:16:25:01 बारे में पूछेंगे तो वह आपको परंपरा इत्यादि के विषय में अच्छे से समझा देंगे। ना हो तो हमारा नंबर सार्वजनिक है। आप सीधे तौर पर संपर्क कर सकते हैं। मैंने आपका नंबर जहांजहां से भी मुझे मिल सका मैंने प्रयास किया पर मेरा संदेश नहीं पहुंच सका। इसीलिए मैं बार-बार कह रहा हूं कि जितने भी हिंदू हैं और जो इस मुहिम से जुड़े हैं, जो इस अभियान से कहीं ना कहीं परिचित हैं, वो इस संदेश को धर्मेंद्र जी तक पहुंचाएं कि ऐसा ना हो कि वहां पर जब जाएं और जब रामपाल ये कहे कि भैया मैं तो जो बोल रहा हूं वो आपके शास्त्र में लिखा है और आप करें आगे आर्य समाज को तो आर्य समाज कह दे हां मैं तो कह ही रहा हूं। हम तो इसीलिए कहते पुराण पुराण अच्छे नहीं है तो फाड़ के फेंक दो पुराण को। तो यह हिंदुओं की रक्षा नहीं है। यह वह वाली बात है कि नेता जी से जब पूछा गया ना कि भैया बाढ़ का पानी खतरे के निशान तक आ गया है तो नेताजी ने कह दिया बाढ़ का निशान दो इंच और ऊपर कर दो। यह वो वाली बात है। यह रक्षा नहीं है। जैसे हमने कहा कि भैया चचेरी बहन से विवाह नहीं होगा। और सामने लोग यहां से धर्म परिवर्तन कर रहे हैं। इसलिए कर रहे हैं कि उनको जो है चचेरी बहन से विवाह करना है। तो जब यह समस्या हुई तो हमने
00:17:40:07 क्या किया? ठीक है अपने यहां बदल देते हैं चचेरी बहन से विवाह। हमारे यहां भी अलऊ कर देते हैं। ये वो वाली बात है। तो ऐसा नहीं है। आप इस बात का ध्यान रखें कि आर्य समाज पुराणों को नहीं मानता है। तो इसलिए रामपाल के समक्ष खड़े होते समय किसी प्रामाणिक आचार्य को अपने साथ रखें। शंकर संप्रदाय के हो सकते हैं, श्री संप्रदाय के हो सकते हैं, नार्क संप्रदाय के हो सकते हैं। प्रामाणिक आचार्य को अपने पास रखें और यह ग्रंथ है श्री संप्रदाय के आचार्य द्वारा रचित है पुराण दिग्दर्शन। इसमें पूरा इनहीं सब विषयों में बात की गई है। हालांकि इसमें जो निशाना है जिस आचार्य ने यह ग्रंथ लिखा है
00:18:21:10 शास्त्रार्थ महारथी माधवाचार्य शास्त्री जी श्री संप्रदाय से थे। तो उन्होंने जब यह लिखा है तो इसमें उन्होंने रामपाल जैसो को नहीं वो उत्तर दिया है। इसमें उन्होंने आर्य समाज को ही उत्तर दिया है। आपको जानकर हैरानी होगी क्योंकि आपका वो क्राइटेरिया नहीं रहा है ना जो आपने कार्य किए हैं उसमें क्राइटेरिया आपका वो नहीं रहा है शास्त्र वाला। तो इसलिए आपको ये सब नहीं मालूम होगा। आर्य समाज ही वो है वो तंत्र है जिसने सबसे ज़्यादा और सबसे प्रारंभ में ये सब आक्षेप और बहुत ही व्यवस्थित रूप से लगाना चालू हुए। जिसके कारण आज ये सब ये जो कुकुर मुत्ते जैसे उग आए हैं छोटे-छोटे बरसाती रामपाल गैंग के जैसे तो आर्य समाज ही वो है। अब देखिए जब से आर्य समाज आपके साथ आया तब से रामपाली गैंग ने वो चालू कर दिया ना कि इन्होंने तो कहा है शिव को कहा है। दयानंद जी की जीवनी में दयानंद जी लेख राम को पत्र लिखते समय यह कह रहे हैं कि अगर शिवलिंग यहां है तो वहां क्या वो शिव है क्या ये लिखा है ना जो सच्चिदानंद स्वामी आज आपके साथ खड़े हुए हैं वही सच्चिदानंद स्वामी अभी ये जो लड़ी जो ये गहमागहमी तेज हुई है एकदम से इसलिए हुई है क्योंकि
00:19:37:18 लास्ट में रीसेंट वीडियोस जो बनाए गए रामपाली गैंग के द्वारा वह राधा जी के विरुद्ध बनाए गए और उसमें भी प्रेमानंद जी के विरुद्ध बनाए गए। राधा जी के बारे में सच्चिदानंद स्वामी जी क्या बोल चुके अपने यहां? यह तक बोल चुके हैं वो वृंदावन नहीं है। वैश्यावन है। भागवत लिखने वाले तू भागवत लिखने से पहले मर क्यों नहीं गया। हालांकि थोड़ा सा उसमें पुट दे देते हैं कि दयानंद जी कह कर गए हैं। मगर बोल वो भी रहे हैं। वो उसका समर्थन करते हुए उस चीज को बताते हैं कि दयानंद जी तो यहां तक कह कर गए हैं कि भागवत लिखने वाले तू मां के गर्भ में ही मर क्यों नहीं गया? यह सब आर्य समाज की सच्चाइयां है। यहां मैं आर्य समाज से लड़ने के लिए नहीं बैठा हूं। इन बातों के आधार पर एक जो गंभीर विषय उसके बारे में सचेत कर रहा हूं लोगों को। तो धर्मेंद्र जी यदि आप यह सोच रहे हैं कि हमारे साथ आर्य समाज है शास्त्रों का मर्मज्ञ और वो रामपाल के इन क्वेश्चंस का आंसर देगा तो यह आपकी भूल है। इस तरह से आप अपने ही धर्म को क्षति पहुंचाएंगे। इसीलिए एक बात कही जाती है कि शक्ति के पास भी यदि दिशा नहीं हो सही तो वह भी स्वयं को ही नुकसान पहुंचा देती है। तो इस तरीके से अगर आप जाएंगे तो आपसे आपके द्वारा ही क्षति पहुंचेगी। कहीं ना कहीं एक मैसेज जाएगा। बहुत बड़े जन समूह में मैसेज क्या जाएगा भाई पुराण जो है अप्रामाणिक चीजें हैं। आर्य समाज
00:20:52:24 ने वहां कहा और आज से हम जो है पुराणों का जो भी आप लोग वहां पर निर्णय करें उस विषय में तो ऐसा ना हो इस बात का ध्यान रखें। आर्य समाज को लेकर के इस मुहिम को आगे ना करें। आचार्यों से मिले। अभी तक मुझे पुष्टि नहीं हुई। जैसा कि मैंने बताया कि कोई आचार्य आपके साथ खड़े होने वाले हैं और मुझे इस बात की पुष्टि नहीं हुई है। दूसरी बात यह भी है कि आपने अगर आप चाहते हैं कि आपके यहां कोई ऐसे आचार्य हो आपके साथ तो आपको थोड़ी सी मेहनत करनी पड़ेगी। केवल यह आह्वान करके काम नहीं चलेगा। आचार्य हैं। वह हमसे वरिष्ठ होते हैं। आप जाएं उनके पास और उनसे निवेदन करें कि आप यहां पर आए। मेरे ना आने का कारण दूसरा भी यदि आपसे संपर्क होता व्यक्तिगत तो मैं उसमें बताता कि मैं वहां क्यों नहीं पहुंच पा रहा हूं। वह भी रणनीतिक विषय है। खैर कुल मिलाकर के प्रामाणिक आचार लीजिए आप श्री कई सारी प्रामाणिक परंपराएं हैं हमारे यहां। तो उनमें से किसी को आप अपने साथ खड़ा करिए और तब रामपाल का सामना करिए। क्योंकि आर्य समाज मौलिक रूप से हमारे धर्म को नहीं बचा सकता। क्योंकि उसने पहले ही कांट छांट कर रखी अपने बिहाफ पर तो वह कैसे बचाएगा समग्र रूप से सनातन धर्म को? उसने तो अपने मन का लिया हुआ है तो इसलिए वह समग्र रूप से हमारी सहायता
00:22:08:00 नहीं कर सकता। हां वो हमारे साथ खड़ा हो रहा है कंधे से कंधा मिलाकर के उसके लिए उसका स्वागत है। जन बल है संख्या बल है। ये सब कलयुग में कलयुग की शक्ति है। संख्या बल जन बल संघ का बल तो उसके लिए उसका स्वागत है और उसका सम्मान भी है। इस पर आप ध्यान दें। यह मेरा हुड्डा जी को संदेश है। अ इसको आप पहुंचाएं। [गला साफ़ करने की आवाज़] अच्छा एक चीज और है कि
00:22:41:06 आपने अभी तक एक चीज पर ध्यान नहीं दिया है। लखनऊ की जो पुलिस है लखनऊ में रामपाल के जो रामपाल का जो सेंटर है उसके खिलाफ रामपाल तंत्र के खिलाफ एफआईआर दर्ज है। बड़ी धाराओं में दर्ज है और उसमें इन्वेस्टिगेशन चल रही है। मुकदमा अभी भी हाई कोर्ट में चल रहा है। लखनऊ की पुलिस हाई कोर्ट में मुकदमा अभी भी इसलिए चल रहा है कि जितना प्रेशर होना चाहिए पुलिस का इन पर लखनऊ ये रामपाल के गैंग पर उतना अभी नहीं हां ये है कि लखनऊ स्तर पर चीजें थम गई है ना यहां पर प्रतिबंधित हो गया रामपाल ठीक है मगर लखनऊ की पुलिस की किताबें कहां छपती हैं ये ढूंढ रही है हमसे भी पूछा गया मैं वहां पर भी गया जहां पर इसकी किताबों का एड्रेस लिखा होता था कि यहां पर इसकी बुक्स छपती है पर वहां पर पाउडर बनता है। तो मैं वहां पर भी गया था। पुलिस भी वहां पर जाकर के आई। उसने भी वहां पर इन्वेस्टिगेशन की। उसको भी वहां पर वही वही मिला। तो पुलिस भी इस फिराक में है कि हमको सीधे-सीधे कहीं का बुक्स छपती कहां पर है? ये एड्रेस मिले। तो वहां से वो अपना आगे की चीजें करें। तो आप हरियाणा में है। आपका लोकल सपोर्ट है आपके पास। आप इस बात को उठाइए कि
00:23:56:12 अगर रामपाल सत्यवादी है तो वह छुपकर अपनी किताबें क्यों छुपवा रहा है? किताबों का कारखाना कहां है जिनमें ये सब विष मिला हुआ है इस पर थोड़ा ध्यान दें। तो इसलिए हिंदुओं को भी सतर्क रहने की आवश्यकता है कि आप अपना पहले से प्रिपरेशन रखें कि अगर वहां पर रामपाल का बॉयकॉट होता है, बहिष्कार होता है, तिरस्कार होता है, बहुत अच्छी बात है। पर इस ओर यदि दिशा जा रही है कि भाई पुराण ही अमान्य है या ऐसी और कोई बात होने वाली है तो आप फिर उसको उसके प्रति सतर्क रह। पहले से ही अपने को प्रिपेयर करके रखें जिससे कि आपको अचानक से अगर यह बातें ज्ञात हो कि भाई पुराणों की अवमानना हो रही है जिनमें आपकी श्रद्धा है तो आपको आघात ना पहुंचे इसलिए आप भी स्वयं को सतर्क रखें। यदि धर्मेंद्र जी तक मेरा संदेश पहुंच जाता है और वह इसको गंभीरता से लेते हैं विषय को तो बहुत ही अच्छी बात है। यदि नहीं पहुंच सका वह इस विषय को जान ही नहीं सके और वो उसी आधार पर चले गए आगे जो संभावनाएं मैंने यहां प्रकट की है तो हो सकता है कि आपकी जो धारणाएं हैं जो आपकी श्रद्धा है उनको आघात पहुंचे। इसी इसी अभियान से जिस अभियान से आप बहुत सारी अपेक्षाएं कर रहे हैं। ये हो गई
00:25:12:14 चीजें मुख्य। तो हिंदुओं को सतर्क क्यों रहना है यह आपको समझ में आ गया और धर्मेंद्र जी को जो मेरा संदेश है वह भी आपको समझ में आ गया। अब [गला साफ़ करने की आवाज़] अब जरा हम बात कर लेते हैं पुराणों पर आक्षेप की। जिसका आज मैं उद्घाटन कर रहा हूं आज से पुराणों पर जो बात करने वाले हैं। सबसे पहली बात तो है कि गीत गोविंद की कुछ पंक्तियों को लेकर के इन्होंने ड्रामा किया है जो रामपाल गैंग है और जहां से मामला भड़का है। तो पहली बात तो यह है कि जो गीत गोविंद ये लोग प्रस्तुत कर रहे हैं वो प्रामाणिक गीत गोविंद है ही नहीं। वो भी किसी ऐसे पब्लिशर के द्वारा छापी गई जैसा पब्लिशर ये खुद रामपाल है। ठीक है? और वह बाद की बात है। आगे अगर हमें पता चलता है तो हम उस पर भी कारवाई करेंगे जिसने गीत गोविंद छापी है। गीत गोविंद प्रामाणिक रूप से कहां छप रही है? डिस्क्रिप्शन में आपको लिंक मिल जाएगा। उसमें वह सब बातें जिस तरीके से इन्होंने परोसी है वैसे नहीं है और गीत गोविंद आप वहां से लेकर डाउनलोड कर सकते हैं। इनके द्वारा दिखाई जाने वाली जो गीत गोविंद है वो अप्रामाणिक है। [गला साफ़ करने की आवाज़] अब हम बात करते हैं कि पुराणों में पुराणों पर जो आक्षेप लगते हैं उसके संबंध में और फिर उदाहरण के रूप में हम एक ब्रह्मा सरस्वती विवाह का जो
00:26:27:22 प्रकरण है उसको लेंगे। तो पहली बात तो यह है कि पुराणों में जो यह वाली घटनाएं होती हैं यह कह सकते हैं अलंकारिक अलंकारिक रूप से प्रदर्शित की गई प्रतीकात्मक व्याख्या होती है। जो पुराण होते हैं उसमें बहुत सारे प्रसंग होते हैं। उनमें से एक प्रसंग होता है सृष्टि कैसे बनती है? कुछ आध्यात्मिक पहलू बताए जाते हैं कि आप अपने चित्त को शुद्ध कैसे करें? आपके आचरण कैसे होने चाहिए? और या फिर यह बताया जाता है वंश परंपरा इत्यादि मनु कब हुए उनके बाद क्या हुआ उनके बाद क्या हुआ यह परंपरा इत्यादि बताई जाती है तो यह मुख्य विषय होते हैं पुराण के अब इसमें क्या होता है कि जब यह वाली जैसे कोई हमें प्रोसेस हमें समझानी है कोई सीख हमें देनी है तो उसको प्रतीकात्मक व्याख्या के रूप में ये जो पौराणिक घटनाएं हैं लीलाएं हैं उनके रूप में उनको प्रदर्शित किया गया है जो पौराणिक घटना हैं वह हुई है मगर वह हमें कुछ समझाने के लिए हुई है। वह क्या समझाना चाहते हैं? तो वह घटनाएं हमें समझाना चाहती हैं आदि दैविक, आदि भौतिक और आध्यात्मिक अर्थ। उन सभी घटनाओं के जो भी ऐसे समझ में ना आने वाली अचानक से ऐसी घटनाएं दिख रही हैं जिसमें हमको आक्षेप
00:27:42:24 जिसके आधार पर लोग आक्षेप कर रहे हैं। इन सब घटनाओं के मर्म है। इनके अंदर कुछ वास्तविक तथ्य कुछ और है जो हमें दिख रहा है वैसा नहीं है। परोक्ष रूप से हमको कुछ समझाया गया है शास्त्रों के द्वारा परोक्ष रूप से अप्रत्यक्ष रूप से। तो वो तीन प्रकार के अर्थ होते हैं जो इस प्रकार की घटनाओं के होते हैं। आदि दैविक, आदि भौतिक, आध्यात्मिक। अब अगर हम यह ना माने कि नहीं नहीं भाई उसमें तो एज इट इज शिव जी ने यह किया ही किया है। है ना? अगर हम ये बात ना माने तो क्या होगा कि परम तत्व शिव जी को परम तत्व कहा गया है। ब्रह्मा जी को भी परम तत्व कहा गया है। ब्रह्म पुराण में ब्रह्मा जी को परम तत्व कहा गया है। शिव जी को परम तत्व कहा गया शिव पुराण में और अनेकानेक भागवत में भी कहा गया है। और विष्णु जी को भी कहा गया है। तो जो परम तत्व है वह ज्ञान स्वरूप है। उसमें कोई लिंग इत्यादि का भेद है ही नहीं। तो यह अश्लीलता भरे आरोप उन पर कैसे लगेंगे? यहां बात परम तत्व की हो रही है। वहां पर तो लिंग भेद है ही नहीं। वो तो ज्ञान स्वरूप है। अद्वय है। उनके जैसा कोई दूसरा है ही नहीं। तो जब कोई दूसरा है ही नहीं। अच्छा शास्त्र में कई जगह यह भी बात
00:28:58:00 आ रही है कि उन्होंने अपने आप को एक से दो किया। तो यदि रमण की बात आ रही है तो वहां पर रमण कैसे सिद्ध होगा? रमण तो किसी अगर रमण का अर्थ यह जो जो हमारा जो मनुष्यगत दृष्टि है अगर इसके हिसाब से रमण का अर्थ ले तो रामपाल अपनी किताबों में लिखता है सेक्स या रति क्रिया को ये लिखता है सेक्स। परंतु जहां पर दो जहां पर एक शक्ति विभाजित हुई दो प्रकार की शक्तियों में और फिर वह आपस में संग कर रही है और इसी संघ को रति का नाम दिया है। इसी संघ को रमण का नाम दिया है। तो क्या इसको आप वो जो मनुष्यों के बीच जो संभोग क्रिया होती है आप उसको ये नाम दे सकते हो? उसको वही समझ सकते हो और ये मैं रामपाल की चीजों से भी सिद्ध करूंगा ये बात। तो भगवान सच्चिदानंद स्वरूप है। ज्ञान स्वरूप है। इसका मैं प्रमाण दे देता हूं। ज्ञान स्वरूप भगवान का।
00:30:22:26 [गला साफ़ करने की आवाज़] ये देखिए विष्णु पुराण प्रथम अंश अध्याय चार और श्लोक है 39 इसमें भगवान को सीधे-सीधे ज्ञान स्वरूप कहा गया है। 40वा आप ही का रूप है। यह जो कुछ भी मूर्तिमान जगत दिखाई देता है। ज्ञान स्वरूप आप ही का आप ही का स्वरूप है। ठीक है? और कहां कहा गया है?
00:31:01:15 [गला साफ़ करने की आवाज़] देखिए ब्रह्म पुराण ये मैं आपके सामने रख के पढ़ रहा हूं। ब्रह्म पुराण और प्रथम अध्याय और इसका पूर्व भाग है ये ब्रह्म पुराण पूर्व भाग प्रथम अध्याय और श्लोक है
00:31:37:01 28 29 25 से लेकर 29 तक इसमें बार-बार इन्हें ज्ञान स्वरूप कहा गया है। क्या कहा गया है? कि वह पुरुषोत्तम अचुत देव सभी प्राणी समूह में स्थित रहते हैं। वह मेरे प्रणम्य है। वह प्रभु परमार्थ यानी कि तत्वत अत्यंत ज्ञान स्वरूप है। ज्ञान स्वरूप अंतत गतवा भगवान का स्वरूप क्या है? ज्ञान स्वरूप है। वहां कोई लिंग इत्यादि नहीं है और यह अभी हम आगे और सिद्ध करेंगे। तो जब [गला साफ़ करने की आवाज़] भगवान में उस तरह के अवयव है ही नहीं जिनके आधार पर ऐसी घटनाएं होती हैं तो इन घटनाओं का सीधे-सीधे वही अर्थ ले लेना जिस प्रकार से अ मैंने कहा चंद्रमुखी है ना तो चंद्रमुखी का मतलब यही हो गया कि वो जो मुख है उसका वो चंद्रमा है। चंद्र के समान नहीं है। चंद्रमा है। ऐसा अर्थ नहीं लिया जाता है। उसी प्रकार से है यहां पर कि भगवान जब ज्ञान स्वरूप हैं तो उनके पास यह जो अवयव है जिनके आधार पर इस तरह की घटनाएं मनुष्यों
00:32:52:14 के तरीके से जोड़ के दिखाई जाती है। आक्षेप लगाया जाता है। मनुष्य मनुष्यों की भांति देखने का प्रयास किया जाता है। तो जब मनुष्यों की भांति वहां पर वो अवयव ही नहीं है। ज्ञान स्वरूप है भगवान। वहां पर यह जो कर्मेंद्रियां है ज्ञानेंद्र वाली सब थोड़ी ना भगवान की तो सच्चिदानंद स्वरूप है तो यह वाले आरोप उनके निरस्त हो जाते हैं सीधे सीधे फिर क्या है ये जो लीलात्मक घटनाओं का वर्णन है इनसे आदि दैविक आदि भौतिक आध्यात्मिक अर्थ आपको बताने का प्रयास किया जा रहा है जैसा कि ब्रह्मा सरस्वती विवाह में भी बताया गया है वो मैं आज आपको बताऊंगा अच्छा अब एक सवाल मैं सीधे-सीधे रामपाली गैंग से ही पूछूंगा यहां पर हालांकि रामपाली गैंग से बात करना बेकार की चीजें हैं इस तरह की तर्क और प्रामाणिक युक्ति युक्त या शास्त्रोक्त बातें करना रामपाल ही गैंग से बेकार है। उसमें सर मारने जैसा है। फिर भी रामपाल के आधार पर ब्रह्मा विष्णु महेश जो है वो देवता है। कौन होते हैं देवता? मतलब हम मनुष्यों जैसे नहीं है। कुछ अलग है। कौन होते हैं? अच्छा रामपाल के अनुसार जो ब्रह्मा विष्णु महेश है वह गुण है तो भाई गुण आपस में वो जो आपका वाला जो जिसको आप ब्रैकेट में लिखते हो सेक्स वो कैसे कर रहे हैं गुण गुण जो है वो सेक्स
00:34:07:27 करता है क्या वो तो प्राणी करता है गुण तो धारण करता है प्राणी गुण का कोई शरीर होता है क्या तो यहां पर ये वो हो जाते हैं। असफल सिद्ध हो जाते हैं। यह जो आक्षेप करता है। अच्छा इसके बाद एक बात और है कि रामपाल की जो कपोल कल्पित कहानी है उसके अनुसार जो उसका तथाकथित वो राक्षस है काल उसने जब अपनी जो वो कथा है वो जो भी उसके बारे में कहा गया उसने जब रमण किया एक स्त्री के साथ है ना तब ब्रह्मा विष्णु महेश का जन्म हुआ और ब्रह्मा विष्णु महेश जो है यह इन गुणों से उत्पन्न होने वाली एक क्रिया है इन गुणों के प्रभाव से होने वाली एक क्रिया है। कौन सी संभोग? तो भाई जब ब्रह्मा विष्णु महेश उत्पन्न हो रहे हैं कहां से? काल और उसकी पत्नी से। तुम्हारे अनुसार फिलहाल बात कर रहा हूं। तो अभी तो गुण है ही नहीं ना। जब तक गुण जन्मे नहीं है तो तो काल काल प्रभावित कैसे हो गया? जब सत रज और तम गुणों की उत्पत्ति ही नहीं हुई। तो काल कैसे प्रभावित हो गया उन गुणों से? या तो यह मान लो कि ब्रह्मा विष्णु
00:35:23:03 महेश काल से उत्पन्न नहीं है। तुम्हारे हिसाब से ही बात कर लेते हैं। तो यहां पर भी तुम फेल हो गए। तो ये सब कुछ टू द पॉइंट बातें हैं जो याद रखने की और सभी हिंदुओं को ध्यान देना चाहिए। तो ब्रह्मा विष्णु महेश रामपाल के अनुसार काल और उसकी भार्या से उत्पन्न हुए हैं। तो काल के लिए ऐसे लिखा है कि वो जो है प्रवर्त हो गया। वहां पर बलात्कार इत्यादि शब्दों का उपयोग किया गया है। यह सब कैसे आ रहा है? ब्रह्मा विष्णु महेश के उत्पन्न होने से पहले क्योंकि वह गुण है और उन गुणों के द्वारा जनित होने वाला ये जो ये जो गतिविधि है संभोग क्रिया है। तो यह जो चीज है यह वहां पर कैसे ली जा सकती है जिसको तुमने ब्रैकेट में लिख दिया सेक्स। तो कहने का मतलब यह है कि वहां पर रामपाल भी यह कह के फंसा हुआ है। अगर उनकी गैंग वाले अगर ऐसा कुछ अर्थ बताते हैं तो अब आगे और चलते हैं। भगवान ज्ञान स्वरूप है। ये समझ गए आप और हमारे अनुसार ब्रह्मा विष्णु महेश ज्ञान स्वरूप है तो उनके पास ये जो ये संभोग इत्यादि उन पर लागू ही नहीं होता। और जो लीलात्मक वर्णन रति क्रिया रमण करने इत्यादि से है उसका वैसा ही अर्थ है जैसे वेदों का अर्थ
00:36:38:09 आर्य समाज निकाल लेता है उसी प्रकार के अर्थ पुराणों के भी है पर यहां पर वो थोड़ी सी आर्य समाज वो कर देता है क्या कहते हैं उसको कहते हैं कि अरे वो दोहरा व्यवहार करना होता है ना शब्द नहीं आ रहा है तो वो कर देता है आर्य समाज कि [गला साफ़ करने की आवाज़] वहां पक्षपात कह सकते हैं पक्षपात कर देता है कि भेदभाव टाइप का कि जो उसे अपने पास रख रखना है उसका तो वह रक्षा करने के लिए अर्थ निकाल लेगा सही और जिसकी रक्षा नहीं करनी है जिसको पहले से ही उसने दुश्मन बना रखा है कुछ उसका अपना व्यक्तिगत कारण है तो उसके लिए वो वही सिद्धांत लागू नहीं करेगा और वहां पर वो जो है उनका वैसा एज इट इज अर्थ ले लेगा यह आर्य समाज करता है। खैर अब बात यह आती है कि 3 6 9 देवी भागवत में जो भगवती हैं वो कह रही है ना ही मैं स्त्री हूं ना ही मैं पुरुष हूं और वहीं पर
00:37:37:03 मैं बता देता हूं [खांसने की आवाज़][गला साफ़ करने की आवाज़] [नाक से की जाने वाली आवाज़] देखिए तीन छ सात भगवती ना ही स्त्री है ना ही पुरुष है ना ही नपुंसक ही है जब वो ना स्त्री है ना पुरुष है तो ये वाली जो आप संभोग की क्रिया है हमारे जो देवी देवता है इनसे कैसे जुड़ रहे हो जो हमारे आराध्य इनसे कैसे जुड़ रहे हो ये सब बातें तुम्हारी तभी तक है रामपाल जब तक तुम अपने सुरक्षित कहीं पर वो कारबोर्ड टारगेट वाला मामला होता है ना जब तक तुम वहां पर बैठे हुए खूब चकोल लो जैसे कोई कपड़ों का दुकानदार होता है ना कपड़ों का कपड़े बेचता है जो वैसे साइड में काउंटर पर बैठकर के खड़े होकर के अपनी दो चार बातें कर ली गप्पे मार ली और कोई भी ताल ठोक दी अपने कमरे में सामने कोई है ही नहीं प्रश्न करने वाला काउंटर काउंटर करने वाला है ना तो भगवती जो है दुर्गा वह खुद कह रही है कि ना ही मैं स्त्री हूं ना ही मैं पुरुष हूं वो खुद कह रही है तीन छ तीन छ सात में है ना और देवी
00:38:52:14 और परम ब्रह्म एक है देवी और उसमें किंचित मात्र भी भेद नहीं है तो जब भेद है ही नहीं तो उनके बीच में कोई इस प्रकार की क्रिया आप कैसे आरोपित कर सकते हैं ये सब रामपाल जो ये आरोप लगाता है पार्वती माता ने ये किया वो किया इस तरह से अभद्र तरीके से कहता है तो यह सब देवी परम ब्रह्म से यह कहां लिखा है देवियों परम ब्रह्म एक है देवी भागवत तीन छ दो देवी परम ब्रह्म से भिन्न नहीं है। अपितु परमेश्वर परमात्मा नित्य सनातन सच्चिदानंद स्वरूप परम तत्व ही है। लो ही है। तो देवी परम ब्रह्म से अभिन्न है। यानी भिन्न नहीं है। कहां ऋग्वेद 10 125
00:39:34:14 द्वैत भाव को प्राप्त होता है। मैं और ब्रह्म एक ही है तो भी माया रूपी कार्य कारण की उपाधि भेद से हमारा प्रतिबिंब प्रथक प्रथक दिखाई देने लगता है। जगत का निर्माण करने के लिए भेद दिखता है। देवी भागवत तीन छ चार से छ ब्रह्म एक और सनातन है। रचना करते समय वह द्वैत भाव को प्राप्त हो जाता है। देवी भागवत तीन छ इसमें कहां से आप तुम्हारा वो जो बबीता कांड वाला जो ब्रैकेट वाला जो शब्द है ना सेक्स वो कहां से डालोगे इसमें कहां से डालोगे वो वो शब्द इसमें कहां से डालोगे जो तुम्हारे अड्डों से जुड़ा हुआ शब्द है वो यहां कहां से डालोगे भाई सोचने वाली बात है तो यह [गला साफ़ करने की आवाज़] भी कुछ तथ्यात्मक है
00:40:23:06 चीजें अब आगे चलते हैं। अब बात आती है कि कुल मिलाकर के जो मुख्य आरोप लग रहा है मैथुन से जुड़े हुए आरोप लग रहे हैं। पर ध्यान देने वाली बात यह है कि ब्रह्मा ब्रह्मा विष्णु महेश का जो लेवल है जो उनका लोक इत्यादि उनकी जो व्याख्या की गई है वहां पर मैथुन तो है ही नहीं। वो तो अमैथुन ही सृष्टि है। मैथुन सृष्टि तो यहां से चालू होती है मनु जी से। वहां तो मैथुनी सृष्टि है ही नहीं उनके लोक में और इसका मैं प्रमाण दे देता हूं कहां पर प्रमाण है
00:41:02:26 भाई जो काम क्रिया को बनाने वाले गुणों को उत्पन्न कर रहा है वो खुद थोड़ी ना उसमें प्रवर्त होगा वो तो उत्पन्न कर रहा है वहां से तो उत्पन्न हो रहे है वो थोड़ी ना उसी से प्रभावित होगा वो तो उनका रिष्ट आता है ना जैसे काल से तुमने माना कि ब्रह्मा विष्णु महेश हो रहे हैं तो प्रश्न उठ गया कि अगर काल से ब्रह्मा विष्णु महेश उत्पन्न हो रहे हैं। ब्रह्मा विष्णु महेश गुण है और इनहीं गुणों से इनहीं गुणों के प्रभाव से उत्पन्न होने वाली क्रिया है। मैथुन क्रिया जिसका तुम आरोप लगाते हो। तो फिर ये जो चीज है ब्रह्मा विष्णु महेश से उत्पन्न होने वाली क्रिया है। फिर ये वहां कैसे पहुंच गई? या तो यह है कि वहां पर कुछ और है जिसको कि इस क्रिया से जोड़ा जा रहा है जिसमें तुम ब्रैकेट में सेक्स लिख देते हो। है ना? जो तुम्हारे अड्डों से जुड़ा हुआ शब्द है जो वहां दिन और रात गूंजता रहता है उसको तुम यहां पर आरोपित कर देते हो ब्रैकेट में लिख के और तुम्हारे चेले चेलिया भी कर देते हैं। खैर अब मैं दिखाता हूं सृष्टि कैसे वैसे जहां पर भी सृष्टि वर्णन आएगा वहां पर ब्रह्मा विष्णु महेश के द्वारा इनमें से किसी के द्वारा काम को उत्पन्न किया जाएगा। गुणों को उत्पन्न किया जाएगा। तो उस गुण को उत्पन्न करने से पहले वह हैं। उनका अपना लोक है। उनका अपना अस्तित्व
00:42:17:27 है। तो फिर वह उनसे प्रभावित कहां से हो जाएंगे? मैथुनी सृष्टि का प्रारंभ ही होता है मनुसतूपा से। और तुम मैथुन को आरोपित कहां कर रहे हो? जहां पर मैथुन है ही नहीं। एक्सिस्ट ही नहीं करता। वो क्रिया एक्सिस्ट ही नहीं करती। मनोमई सृष्टि मनोमई मैथुन ही सृष्टि नहीं है वो। कहां है? ब्रह्म पुराण से ही दिखा देता हूं। इसमें रति का निर्माण हो रहा है। कहां पर हो रहा है? पूर्व भाग 142
00:43:04:28 देखिए क्या लिखा है। अप्सु पारिपलवाम पृथ्वी दस दशदा दधे तत्र कालम मनोवाचम काममम क्रोध मथोरतिम उन प्रभु ने स्वयं जल में प्लावित पृथ्वी को तथा 10 दिशाओं को धारण किया तब काल मन वाणी काम क्रोध रति की उन्होंने सृष्टि की सृष्टि कर रहे हैं ये लोग रति की तो ये रति रति इनके अंदर कहां से आ जाएगी यह तो बना रहे हैं ना रति को अगली पीढ़ी के लिए जो अगला सर्ग होना है। ठीक है? तो यहां से निश्चित हो गया। यानी कि कहने का मतलब यह है कि ब्रह्मा विष्णु महेश जो हैं वहां पर यदि रति शब्द आ रहा है उनके लिए ब्रह्मा विष्णु महेश या और जो हमारे आराध्य देवी देवता हैं उनके लिए यदि रति या फिर रमण का शब्द आ रहा है तो वहां पर जो हमारे मनुष्यों के लिए जो उपयोग में आता है ना जो संभोग शब्द वो एज इट इज अर्थ वहां पर नहीं है उनकी रति का उनकी रति का मतलब है योग करना संयोग करना उसके साथ मिलकर काम करना जो काम कर रही हैं वह शक्तियां पारलौकिक
00:44:20:07 शक्तियां है। वो हमारी तरह आड़मास के इंसान नहीं है। जिनके पास लिंग भेद है। वो शक्तियां है जो सृष्टि की रचना कर रही है। वो रचना कैसे करती है? पहले एक से दो हुए। एक को कहा गया प्रकृति, एक को कहा गया पुरुष। अब दोनों आपस में ही संयोग करके आगे का काम कर रहे हैं। जीव जंतुओं को उत्पन्न कर रहे हैं। मगर वो रति क्रिया नहीं है वाली जो मनुष्यों की रति क्रिया है। ठीक है? तो रति को उत्पन्न करने वाले हैं। रति से प्रभावित होने वाले नहीं है। संसार के अधष्ठाता पर ही संसार का आरोप लगा दो। संसार में होने वाली चीजों का कि वह उससे प्रभावित होते हैं। खैर
00:44:59:06 और [गला साफ़ करने की आवाज़] दिखा देता हूं। इसमें एक ब्रह्म पुराण में ही दो दूसरे अध्याय में चार से पांच में देखिए क्या लिखा है। देखिए जो यह जो वीर इत्यादि की बातें करते हैं ना यह देखिए यहां पर क्या कहा जा रहा है। यही तेजवान पुरुष ही स्वयंभू मनु कहे जाते हैं। 71 युगों का उनका एक मनवंतर होता है। उन पुरुष द्वारा शत्रूपा को वीर नामक पुत्र वीर नामक अब कुछ समझ में आ रहा है? तेज वीर की स्त्री थी कदम प्रजापति की जेष्ठ कन्या काम्या वीर की वीर वीर किससे जन्मा है? मनु से और जो वीर्य है वीर है उसकी स्त्री का नाम क्या है? काम्या। तो यह प्रतीकात्मक व्याख्या है। इन घटनाओं के रूप में प्रतीकात्मक व्याख्या हो रही है कि मनुष्यों के कौन-कौन से तत्व होते हैं? कौन-कौन से गुण होते हैं? उनके पास कौन-कौन से उनकी भावनाएं कैसी होती है? उनका उनकी अलंकारिक व्याख्या मात्र है। अब इसको आप शब्दार्थ के रूप में ले लो कि उनका जो पुत्र था वो तो वीर यानी वीर्य था और जो वीर की पत्नी थी वो काम्य यानी काम थी।
00:46:14:09 उसमें ब्रैकेट में लिख दो सेक्स तो दिक्कत ये है। ठीक है? अब इसका जो उपाय है वो भी मैं बताऊंगा कि ये जो मनोरोग है इनको किस प्रकार के चिकित्सालय की जरूरत है। उस पर भी मैं प्रकाश डाल दूंगा। तो इस तरीके से अलंकारिक रूप में प्रतीकात्मक व्याख्या वेदों में भी है और यहां पर भी है। यह मैं कहना चाह रहा हूं। एक पांच 29 में भी मनोमय सृष्टि कहा गया है। 29 पे आ जाते हैं। विष्णु पुराण मनोम सृष्टि
00:46:58:28 देखिए पहले आ जाते हैं एक पांच और 41 ठीक है फिर ब्रह्मा जी ने एक और रजो मात्रात्मक शरीर धारण किया उसके द्वारा ब्रह्मा जी से छुदा और छुदा से काम की उत्पत्ति हुई भूख और भूख से काम की उत्पत्ति हुई है। काम उत्पन्न हो रहा है भूख से और भूख को उत्पन्न कर रहे हैं ब्रह्मा जी तो ब्रह्मा जी उससे प्रभावित कैसे हैं या तो उनसे पहले वह होना चाहिए अस्तित्व में जो काम है काम तो उत्पन्न हो रहा है यहां पर ये कहां लिखा है पांच 41 में और मैं दिखा देता हूं अमैतुनी सृष्टि की बात
00:47:41:25 1529 ये देखिए पाराशर जी बोले हे मैत्रेय संपूर्ण प्रजा अपने पूर्व शुभशुभ कर्मों से युक्त है। अतः प्रलय काल में सबका लय होने पर भी वह उनके संस्कारों से मुक्त नहीं होती। हे ब्राह्मण ब्रह्मा जी के सृष्टि कर्म में प्रवृत्त होने पर देवताओं से लेकर स्थावर पर्यंत चार प्रकार की सृष्टि हुई। वह केवल मनोमई थी। मनोमई मैथुनी सृष्टि नहीं थी। वो मनोमई सृष्टि थी। ठीक है? तो मनोमई सृष्टि के बहुत सारे प्रमाण है। देवी भागवत से दे देता हूं। देवी भागवत से आपको एक अलग से विशेष रूप से प्रेम है। वो भी दिखा देता हूं। देवी भागवत यह मेरे पास है। ठीक है? इसका है 7 एक 10 [गला साफ़ करने की आवाज़]
00:49:00:07 देखिए तत्पश्चात प्रजापति ब्रह्मा जी ने अपने सात मानस पुत्रों का सृजन किया। मानस पुत्र मरीच अंगीरा अत्री वशिष्ठ पुल कृतु और पुलस्तय पुलस्त्य इन नामों से उन सात मानस पुत्रों की प्रसिद्धि हुई। मानस पुत्र मानसिक सृष्टि है। तो यानी कि इनका जो डायमेंशन है ब्रह्मा विष्णु महेश का कहने का तात्पर्य यह है कि जो इनका डायमेंशन है उसको हम लोक कहते हैं या फिर जो भी है वहां पर यह जो मैथुन क्रिया है एकिस्ट ही नहीं करती है। तो फिर हम मैथुन क्रिया से जोड़ के उनको कैसे देख सकते हैं? वहां पर बात इतनी है कि अगर उनके लिए इस प्रकार के संस्कृत के कुछ शब्दों का उपयोग हो रहा है तो वहां पर केवल जो आदि दैविक घटनाएं हैं, आदि भौतिक घटनाएं, वह आपको समझाया जा रहा है प्रतीकात्मक व्याख्या से और गुरु चरणों में बैठकर के सुनने समझने पर आपको उसी प्रकार से उसका सही अर्थ प्राप्त हो जाता है। जैसे तथाकथित जो वेद वैदिक वेदों की रक्षा करने का दावा करने वाला आर्य समाज है। जिस प्रकार से यह वेदों के कहीं-क पर जहां पर इस प्रकार के प्रसंग आते हैं वहां पर अपने अनुसार अर्थ निकाल लेता है। जबकि वहां पर ना परंपरा
00:50:15:10 है ना आचार्य। और जहां परंपरा है आचार्य वहां पर लोग कह रहे हैं कि नहीं नहीं शास्त्रों में यह कैसे वो कैसे ठीक है और रही बात यह कि अगर कोई ऐसा सोच रहा है कि नहीं नहीं अगर शास्त्रों में ऐसा लिखा है तो हम उनको हटा देंगे तो आपको ध्यान रखिएगा कि वेद में भी यह सब लिखा हुआ है तो क्या आप वेद को भी हटाएंगे अगर आर्य समाज जैसी सोच कोई रखता है तो तो कहने का तात्पर्य यह है कि अगर बाढ़ का पानी खतरे के निशान तक आ गया है तो हमें आवश्यकता है उपयुक्त प्रयास करने की एक सही अप्रोच की कि व्यक्ति वह जो बाढ़ से लोग बच पाए ना कि उसका खतरे का निशान ऊपर बढ़ा दो। अगर व्यक्ति नहीं समझ पा रहा है कि बहन से विवाह नहीं करना चाहिए और अपना धर्म परिवर्तन करा रहा है तो हम यह अप्रोच सही नहीं है कि नहीं नहीं अपने आप भी धर्म परिवर्तन ना करें इसलिए अपने यहां जो है बहन से विवाह अलऊ कर दो। यह अप्रोच सही नहीं है। अप्रोच सही है कि उसको हम शिक्षित करें। उसको बताएं कि बहन से विवाह क्यों नहीं होना चाहिए? तर्क और प्रमाण और युक्त प्रमाण और युक्ति दोनों तरीकों से। यह अप्रोच सही है। ठीक है?
00:51:20:24 अच्छा कुछ लोग कह रहे हैं कि भाई बुक दिखाओ तो मैं बता दूं कि मैंने जो श्लोक क्रमांक बोले हैं उन उन श्लोक क्रमांकों पे आप इस बुक को खुद चेक कर लीजिए जाकर के और नहीं हो तो आकर के हमें बताइए। ठीक है? मेरे पास चार कैमरे नहीं लगे हैं जो मैं जब बुक पढूं तो कैमरा घुमा करके इधर लगा दूं और ये सब करूं। तुम्हारी तरह मेरे पास समय भी नहीं है कि भैया कैमरा जब खोल के बैठूं तो तुरंत जो है एडिट करके और जो है फिर बुक का निशान दिखाऊं फिर पीछे अपनी वॉइस ओवर लगा दूं। ये सब मेरे पास नहीं है। मैंने श्लोक क्रमांक बताए हैं और अ आप खुद उसको वेरीिफाइड कर ले। वैसे भी अगर मैं बुक दिखा भी दूंगा अगर तुम जैसे जो क्या कहते हैं? लकड़बग्गे या फिर क्या कहें? हुड़ुक चुल्लू। हां हुक चुल्लू। तुम जैसे उड़क चुल्लू हैं। तुम बुक तुमको बुक दिखा भी दूंगा तो यह कैसे सिद्ध होगा कि बुक प्रामाणिक बुक है देवी भागवत की मैंने खुद से नहीं छपवा ली है। थोड़ा बहुत बुद्धि है कि नहीं है? इसलिए खुद से उसे वेरीिफाइड करना होगा तुम्हें। अच्छा [गला साफ़ करने की आवाज़]
00:52:26:16 अब दिखाते हैं तो अमैथुनी सृष्टि आपको समझ में आ गई। परम तत्व आपको समझ में आ गया और यह भी समझ में आ गया कि जो देवी हैं और जो भगवान है उनके ही दो स्वरूप है प्रकृति और पुरुष के रूप में एक में वो देवी है और एक में वो भगवान है। एक में पुरुषवाची है और एक में स्त्रीवाची उनका रूप है। तो ये सब चीजें आपको समझ में आ गई। अब बात आती है अब इसका एक उदाहरण ले लेते हैं जो मैं कहता चला आ रहा हूं। ब्रह्मा सरस्वती विवाह वाला जो प्रसंग है उससे ले लेते हैं। उससे पहले पुराण दिग्दर्शन में कुछ मोटी मोटी बातें कही गई है आचार्य श्री के द्वारा तो वो मैं आपको कुछ पढ़ के सुनाना चाहता हूं जो आवश्यक है आपको जानने और आपको अच्छा भी लगेगा। आचार्य जी ने जो बातें कही है अपने ग्रंथ में इस संबंध में जो विषय मैं इस समय बात कर रहा हूं।
00:53:28:16 वाक्य विचार तो इन्होंने यहां पर अपने ग्रंथ में पुराण दिग्द दर्शन में इन्होंने बात की है उदाहरण दे देकर और इन्होंने वाक्य विचार कहे हैं। यह कह रहे हैं जिन अनेक शब्दों के यथावत मेल से अभीष्ट अर्थ प्राप्त का बोध होता है। उसी सार्थक शब्द समुदाय को हमारी परिभाषा में वाक्य वचन समझना चाहिए। प्रायः सभी शास्त्रों में विधि निषेधात्मक जितने वचन पाए जाते हैं उन्हें प्राचीन ऋषियों ने तीन विभागों में विभक्त किया है। रोचक, भयानक और यथार्थ। यानी इसमें जो जो वाक्य आते हैं वो तीन प्रकार के होते हैं। रोचक, भयानक और एक बिल्कुल सीधे-सीधे जो बात है उसको एज इट इज कह दिया। तो रोचक कौन से होते हैं? यह पुराणों की बात चल रही है। पुराणों पर आक्षेप जो आर्य समाज ने लगा रखे उसका उत्तर देते समय आचार्य कह रहे हैं। पुरुषों को धर्म मार्ग में प्रवर्त करने के लिए जो रुचिकर वाक्य कहे जाते हैं, वह रोचक नाम से स्मरण करना चाहिए। वैदिक प्रक्रिया में इन्हीं वाक्यों को विधि प्रसंगक अर्थवाद भी कहते हैं। अब देखिए इन्होंने यहां कुछ उदाहरण दिए हैं।
00:54:37:25 एक वेदों से ही कुछ अर्थ हैं। वेद में कहीं पर एक वाक्य आया है जहां पर लिखा है मेंढकों ने 100 गाय दान की। इस बात का क्या अर्थ है? मेंढकों ने 100 गाय दान की। यदि कोई पुरुष उपयुक्त वेद वाक्यों की रोचकता पर ध्यान ना देकर वास्तव में पशु सर्प आदि द्वारा किए गए यज्ञ दान और साम सामगान के स्वप्न देखने लगे और प्रत्यक्ष रूप में पशु आदि का ऐसे कार्यों में प्रवृत्त होना असंभव जानकर वेदों पर भी असंभव प्रतिपादन का आक्षेप लगाए तो उसे महामूर्ख ही समझना चाहिए। तो क्या है? वेदों में भी इस प्रकार की प्रतीकात्मक व्याख्या चली है। जैसा कि मैंने अभी पहले बताया आर्य समाज के भी शब्दार्थ में आपको मिल जाएगा कि आपको अभी फलाने फल की प्राप्ति करनी है। तो आप जो मेंढकी से भोग करिए, मेंढक से यह मनुष्यों को कहा जा रहा है। मेंढक से भोग करिए, बैल से भोग करिए। यह सब वहां लिखा है। तो क्या इसका एज इट इज अर्थ ले? मगर वहां आर्य समाज ने एज इट इज अर्थ नहीं लिया है। अपने भाष्य में कुछ और बताने का प्रयास किया है। इसी प्रकार से पुराणों में भी यही बात है। एज इट इज अर्थ ना लेकर के उसमें जो प्रतीकात्मक व्याख्या है किस चीज की है वो लेना चाहिए। और क्यों ऐसा लिखा गया है? सबसे पहली बात तो रुचिकर बनाने के लिए अनुसंध की बुद्धि रहे। शास्त्र के प्रति जानने
00:55:53:06 की ललक रहे और एक ही वाक्य से कितने सारे अर्थ हमें प्राप्त हो जाते हैं। इसलिए ऐसा ऐसी रचना की जाती है। अब जो है भयानक वचन देखते हैं। अधर्म आचरण से पुरुषों की प्रवृत्ति हटाने के लिए जो भयानक वाक्य कहे गए हैं उन्हें भयानक नाम से याद किया जाना चाहिए। वेदा आदि सभी शास्त्रों में ऐसे वचन का समावेश पाया जाता है। यथा उन्होंने उदाहरण दिया। यजुर्वेद 409 इसमें क्या कहा गया है? जो मनुष्य माया जन्य जड़ दे आदि की उपासना करते हैं वह घोर अंधकार में प्रवेश करते हैं। और आगे इन्होंने एक उदाहरण और दिया है कात्यायन अनुक्रमणिका का एक एक उसमें क्या है? जो मनुष्य मंत्रों के ऋषि देवता आदि को ना जानता हुआ वेद पढ़ता है वह मर जाता है। उपयुक्त वचनों में माया के फंदे से निकलने की और ऋषि आदि को जानने की आवश्यकता प्रकट की गई है। वस्तुतः माया उपासक किसी काल कोठरी में डाल दिए जाते हो या ऋषि आदि ज्ञान शून्य मंत्र पाठी व्यक्ति तत्काल मर जाते हो। ऐसी बात तो नहीं है।
00:57:08:07 जो ऋषि को नहीं जानता है कि यह जो वैदिक सूक्त है इसका ऋषि कौन है? वह मंत्र को पढ़े तो मर जाता है। ऐसा तो नहीं है। पर यहां लिखा हुआ है कि जो ऐसा करता है वह मर जाता है। तो फिर यहां किस ओर इशारा किया गया? तो यहां भी आक्षरिक अर्थ को छोड़कर तात तात्पर्यार्थ का ही ग्रहण होना चाहिए। जो आक्षरिक अर्थ लिया जा रहा है कि एज इट इज जो हमें जो लिखा हुआ है उसको ग्रहण कर ले। वो नहीं बल्कि उसमें तात्पर्य का ही ग्रहण होना चाहिए। यह केवल इतना ही है कि माया की उपासना करना और ऋष्यादि का ना जानना पाप है। माया जनित चीजों की उपासना करना माया की उपासना करना यानी भोग की उपासना करना जैसे वो भी कहता है तीन गुणों की करे और भक्ति हालांकि वहां पर वो ब्रह्मा विष्णु महेश को जोड़ देता है। जबकि वहां पर ब्रह्मा विष्णु महेश नहीं है। ब्रह्मा विष्णु महेश तो ये तीन जो विभाग है सत रजत तम के इसके एक एक के कंट्रोलर है। वह भी देवता रूप में जो एक परम तत्व के रूप में ब्रह्मा विष्णु महेश विद्यमान होते हैं और एक जो है वह यह जो कार्य कारण भेद से यहां पर चीजों को संभालने वाले देवता के रूप में भी उपस्थित होते हैं। तो
00:58:24:24 यहां पे इनको यह समझाना था वेद को कि भाई ऐसा करना पाप है। मगर उसके लिए उसने क्या कहा वेद ने? वेद भगवान कहते हैं कि जो व्यक्ति ऋषियों को जाने बिना यदि मंत्र पढ़ेगा तो मर जाएगा। सीधे सीधे कह दिया। अब इसको सीधे-सीधे मानता है हर समाज नहीं मानता है या शायद मानता हो। [गला साफ़ करने की आवाज़] अच्छा और आगे चलते हैं। अब यथार्थ वचन पर थोड़ा सा देखते हैं। इसी प्रकार अच्छा जो अभी हमने जो बात की है उससे मिलताजुलता हमें ब्रह्म पुराण में मिलता है और वरा पुराण में भी मिलता है। क्या मिलता है? जो पुरुष काले रंग का वस्त्र पहनकर ईश्वर पूजना आदि कार्यों को करता है। वह पांच वर्ष पर्यंत घान की भुनी हुई खीलों में घुण का कीड़ा बनकर रहता है। बताइए। अब इसको एज इट इज मानेंगे या पाप के उसमें मानेंगे जो पुरुष दूसरा ब्रह्म पुराण जो पुरुष स्त्री संग करके जीता जमाता है या जीने जमाने के बाद स्त्री संग करता है उन दोनों के पितर उसे उस महीने वीर मूत्र आदि को खाते हैं। यह लिखा है। तो इनको भी एज इट इज नहीं लिया जा सकता है। उपयुक्त वचनों के अक्षरार्थ
00:59:40:04 के अनुसार कोई ईश्वर पूजन एक साधारण भूल के कारण साक्षात गुण बन जाता हो अथवा श्राद्ध करता पुत्रा आदि के स्त्री संग रूप पाप से निर अपराध पितरों को घणित वस्तु खाने का दंड भोगना पड़ता हो ऐसा यहां पुराणकर्ता का अभिप्राय नहीं है किंतु इनका तात्पर्य इतना ही है कि शुभ कार्यों में काले कपड़े पहनना और श्राद्ध कार्य में अ्रह्मचर्य से रहना महापाप है। इसी प्रकार अन्यान्य भयानक वचनों का तात्पर्यर्थ समझना चाहिए। अब यथार्थ वचन देखिए। रोचकता और भयानकता दोनों से परे रहकर जो अक्षरार्थ अक्षरार्थ अनुसारी विधि निषेध प्रतिपादक वचन है वह यथार्थ कहे जाने चाहिए। तो वेद में देखिए क्या आया है। अब वेद में सीधे-सीधे जिनका अर्थ लेना है। तो क्या आया? जुआ मत खेल खेती कर उक्त शिक्षा को मानने पर धन में रमण करने वाला बन। अब लो। यहां पे रमण शब्द आ गया। तो यहां पे क्या यह कहा जा रहा है कि धन के साथ रमण करो। यहां ब्रैकेट में रामपाल तू इतना बड़ा पागल है कि यहां लिख देगा सेक्स धन के साथ सेक्स लिख दे यहां पर भी रमण शब्द आ गया क्योंकि यही मूर्खता बताने के लिए आज की ये लाइव चल रही है ठीक है तो दूसरे के धन का लालच मत कर तप करने वाले की बहुत कीर्ति होती
01:00:55:13 है यह कहां लिखा है मतलब ऋग्वेद 10 34 13 से लिया है यजुर्वेद 40 एक से लिया है और इसी प्रकार के आगे उदाहरण दिए गए हैं फिर भाषा विचार चालू होता है। अच्छा यहां पर हम पुराण से भी उदाहरण ले लें। जो पुरुष श्रद्धा पूर्वक यज्ञ आदि के द्वारा देवों और पितरों का पूजन करता है। वह सकाम कर्मों के प्रताप से चंद्रोक में यथा समय निवास करके पुनः जन्म धारण करता है। तो यह सीधे तौर पर अक्षरार्थ जो अर्थ लेना है उसके बारे में बात हुई है। अब भाषा पर विचार किया है आचार्य ने। इन्होंने लिखा है समाधि भाषा भाषा विचार क्या है? जिस प्रकार अन्वत शब्द समुदाय को वाक्य या वचन कहते हैं। इसी प्रकार यथावत वाक यथावत अन्वत वाक्य समुदाय को संदर्भ या कथानक कहा जाता है। यहां हमारे भाषा विचार का क्षेत्र वही कथानक या संदर्भ है। वेदादि शास्त्रों के संदर्भों को प्राचीन ऋषियों ने भाषा तत्व के आधार पर तीन भागों में विभक्त किया है। यह भारद्वाज समिता में लिखा हुआ है। समाधि भाषा प्रथमा लौकिकीति तथा परा तृतीया पर कीति शास्त्र भाषा त्रिधा स्मृता शास्त्रों
01:02:10:16 की भाषा तीन प्रकार की है। पहली समाधि भाषा दूसरी लौकिकी भाषा और तीसरी पर किया भाषा। अब समाधि भाषा की इन्होंने विवेचना की है। जो बातें जागृत स्वप्न और सुशुप्ति तीनों अवस्थाओं में भी पुरुष को प्रत्यक्ष ना हो सकती हो और इंद्रिय मन आदि भी जिन रहस्यों के अनुभव करने में समर्थ ना हो। ऐसी समाधिगम मतलब समाधि से जिन चीजों का ज्ञान प्राप्त होता हो सकता है समाधि की स्थिति से तो वह भाषा है समाधि भाषा उन उन चीजों का जब चित्रण होगा तो वहां पर समाधि भाषा का उपयोग होगा तो ऐसे समाधि गम में
01:02:53:10 अवांगमन सुगोचर एवं लोकोत्तर तत्वों को जहां नीति नीति शब्दों द्वारा व्यक्त करके करने का प्रयत्न किया गया हो वह समाधि भाषा कहलाती है। वेदों में समाधि भाषा का अत्यधिक समावेश पाया जाता है। है ना? वेदों में मतलब ऐसी भाषा जिस जो उन चीजों के बारे में बात करना जिन चीजों का ज्ञान हमें इंद्रियों के द्वारा सीधे तौर पर नहीं हो सकता। तो समाधिगम्य चीजें हैं समाधि के स्थिति में ही उन्हें जाना जा सकता है। जोज्यों देखिए इसमें उदाहरण दिया उन्होंने तो कैसे है? तो ऐसे सैकड़ों मंत्र उपस्थित किए जा सकते हैं जिनका अक्षरार्थ वेदों की बात कर रहा हूं मैं। पुराणों की बात करने के लिए वेदों की बात कर रहा हूं। ठीक है? ऐसे वेदों में ऐसे सैकड़ों मंत्र उपस्थित किए जा सकते हैं जिनका अक्षरार्थ तो अत्यंत सरल और सीधा है। परंतु मंत्रोक्त भावों को हजार बार मस्तिष्क में बिालने का प्रयत्न करने पर भी हृदयंगम नहीं हो सकते। और ज्योंज्यों मानवीय बुद्धि उस अज्ञयता के अगाध सागर में निरवलंब होकर डूबती हुई सी जान पड़ती है त्यों त्यों अप्रतिभा की अप्रतिम प्रतिभा की वह दयनीय
01:04:08:21 दशा तटस्थ आत्मा को रहरह कर अनुभूत होने लगती है। हम पाठकों को अधिक उत्कंठित करना नहीं चाहते। तदर्थ नीचे कतप उदाहरण देकर वास्तविक तात्पर्य को हृदयंगम करने कर लेने की सिफारिश करते हैं। तो यहां इन्होंने नासदी सूक्तम का शायद उदाहरण दिया है। उस समय ना ऋग्वेद 10 एक 100 29 एक से तीन उस समय ना असत था और ना सत्य था ना पृथ्वी लोक था ना अंतरिक्ष और ना ही उससे ऊपर का दक था। ना जीवों को आवरण करने वाला कर्मकलाप था और ना ही कोई सुखादि का भोगता था। सृष्टि का आदिम तत्व दो प्रवेश एवं अगाद आप भी नहीं था। ना उस समय मृत्यु थी और ना ही अमरपण था। रात और दिन की कुछ भी पहचान ना थी। माया से अभिभक्त वह एक ब्रह्म ही था। उसके अतिरिक्त अन्य कुछ भी ना था। अंधकार था और उसी अंधकार से सब कुछ ढका हुआ सा था। यह सब नाम रूपात्मक जगत सलि कार्य कारण रूप में अभिभक्त था। जो इस प्रकार तुच्छ सद असद विलक्षणता से छुपा हुआ था। वही एक तपह की महिमा से प्रादुर्भूत
01:05:23:27 हो गया। तो यहां पर अब इसको हृदयंगम करने के लिए आपको बार-बार बार-बार इसका मनन चिंतन करना पड़ेगा। इस श्लोक का मैं बहुत ज्यादा नहीं चलता हूं। मैं आगे चलता हूं। ऐसा ही एक उदाहरण हम ले लेते हैं शिव पुराण का। यह देखिए मिलती जुलती बात लिखी है वही वही जैसी। यह स्थूल दृश्य जगत सब उत्पन्न नहीं हुआ था। कहां लिखा है? शिव पुराण धर्म समिता दो एक से 64 के बीच में थोड़ा सा यहां पर कुछ मिस प्रिंट हुआ है। यह [गला साफ़ करने की आवाज़] स्थूल दृश्य जगत सब उत्पन्न नहीं हुआ था। उस महाप्रलय के अंत समय में सब सत और असत कुछ भी नहीं था। वही बात लिखी है यहां पर भी। उस समय निरंतर व्याप्ति रूप ब्रह्म में तेज ही था। वह तेज ना स्थूल था, ना सूक्ष्म था, ना शीत था और ना उष्म था। उस अलौकिक दिव्य तेज का आदि व अंत कुछ भी ना था। वह केवल सत्य ज्ञान स्वरूप और अनंत था। इस तरह से अनुसंधयात्मक
01:06:27:06 विचार हमारे शास्त्रों में दिए गए हैं। परोक्ष रूप से बहुत गहरी गहरी बातें लिखी हुई है। अच्छा अब लौकिक भाषा की बात करते हैं। जिन संदर्भों में किसी धार्मिक गण रहस्य को प्रकट करने के लिए लौकिक पद्धति का अनुसरण किया गया हो ऐसे तात्पर्य प्रधान अलंकारिक वर्णनों को लौकिकी भाषा में निबद्ध समझना चाहिए। अब इसके उदाहरण दे रहे हैं। ऋग्वेद का उदाहरण है। एक 164 20 इसमें क्या कह रहे हैं? एक साथ रहने परस्पर संयुक्त और सुंदर पंखों वाले दो पक्षी हैं। अब देखिए यहां सांसारिक चीजों की व्याख्या में ब्रह्म और जीव के बारे में बताया जा रहा है। क्या बता रहे हैं? एक साथ रहने वाले अमूमन यह जो मंत्र है इसका उपयोग करते हुए द्वैत मत की स्थापना के लिए वो है। ये बहुत प्रसिद्ध है। ये एक साथ रहने वाले परस्पर संयुक्त और सुंदर पंखों वाले दो पक्षी हैं। जो दोनों एक वृक्ष का आश्रय लेते हैं। तो यहां क्या हो गया? जीव ब्रह्म प्रकृति उनमें से एक तो उस वृक्ष के पीपल फल खाता है। दूसरा बिना खाए ही प्रकाशमान होता है। वह केवल दृष्टा है। तो यहां क्या हुआ? यहां पहले उदाहरण में जीव और ब्रह्म का दो पक्षियों के रूप में प्रतिपादन किया गया है। जिस प्रकार लोक में पक्षियों
01:07:42:12 के जोड़े वृक्ष पर बैठा करते हैं। उसी को फलों को इच्छा इच्छा उसके फलों को इच्छा अनुसार खाया करते हैं या ना खाया करते हैं। उसी लोक प्रसिद्ध बर्ताव के अनुरूप संसार रूपी वृक्ष के आश्रित जीव रूपी पक्षी को तो अपने किए कर्मों के फलों को भोगने वाला परंतु ब्रह्म रूप दूसरे पक्षी को कृत्व भोक्तत्व से दूर रहते हुए केवल साक्षी मात्र कहा है यानी कि यहां पर तो प्रतीकात्मक व्याख्या है किसकी जीव और ब्रह्म की कहां बैठे हैं प्रकृति रूपी डाल पर और एक है जो भोग कर रहा है फल को खा रहा है प्रकृति के और दूसरा है जो केवल साक्षी है तो इस तरह से भी व्याख्या की गई हमारे शास्त्रों में। [गला साफ़ करने की आवाज़] इसी तरह की व्याख्या आपको और बहुत सारी मिल जाएंगी। भागवत का यहां पर उन्होंने आचार्य श्री ने उदाहरण दिया है। आप लोग पढ़ सकते हैं। मैं थोड़ा सा शॉर्ट रखना चाह रहा हूं जिससे कि यह संदेश है ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंच जाए। अब पर किया भाषा का उदाहरण इन्होंने दिया आचार्य जी ने। जो संदर्भ प्रत्यक्ष में अटपटे प्रतीत होते हैं और जो बातें ना कभी सुनी और ना देखी हैं ऐसी लोकोत्तर एवं असंभव सी जचने वाली भाषा जहां द्वारा जहां गुणतम वैज्ञानिक सिद्धांतों का निरूपण
01:08:57:22 किया हो वह परकीय भाषा समझनी चाहिए। तो अब यहां पर क्या है? एक उदाहरण इन्होंने दिया है ऋग्वेद का। ऋग्वेद चार 58 तीन एक वृषभ बैल है जिसके चार सींग हैं तीन पांव हैं दो सिर हैं और सात हाथ है ये ये वेद में लिखा है ठीक है वह तीन जगह से बंधा हुआ है और बार-बार दडूकता हुआ मनुष्यों में आ घुसा है परंतु है वह सब देवों में उत्तम उत्तम देव इस मंत्र में जैसे बैल का वर्णन किया जा रहा है लोक में कभी किसी ने ऐसे बैल को आज तक नहीं देखा होगा और ना ही सुना होगा। यदि इस मंत्र के वर्णनुसार उक्त बैल का चित्र खींचा जाए तो देखने वाले दंग रह जाएंगे। भला चार सींग और दो सिर तो हुए सो हुए तथा पांव भी तीन ही रहने दो। परंतु वह सात हाथ कहां लटकाए जाएंगे? पाठक जरा कल्पना करके देखें। इस प्रकार का विलक्षण बैल कहीं मनुष्यों में दडुकता हुआ आग घुसे तो एक बार तो सर्वसाधारण के चक्के छूट जाए। पुराण विरोधी आलोचक परकिया भाषा के पुराण
01:10:13:01 पुराण पुराण वर्णित ठीक है थोड़ा सा मिस प्रिंटिंग है इसमें। पुराण वर्णित ऊपर जैसे अंशों पर जो मखल जो उपहास और जो बेपर की उड़ाया करते हैं उससे कहीं अधिक मजाक एक वेदान विज्ञ पामर उपयुक्त मंत्र पर भी खूब उड़ा सकता है। यहां आचार्य श्री उन लोगों की बात कर रहे हैं जो वेद की रक्षा के नाम पर जो है पुराणों की निंदा करते हैं और वेद का ही यह वाक्य है। बैल के इतने हाथ, इतने पैर ये सब तो यहां उनको कह रहे हैं। हालांकि फिलहाल हमारे संदर्भ में यह बात जो है आचार्य जी की जा रही है रामपालियों पर। ठीक है? तो क्या कह रहे हैं वह कि पुराण विरोधी आलोचक परकिया भाषा के पुराण वर्णित ऊपर जैसे अंशों पर जो मखल जो उपहास और जो पेपर की उड़ाया करते उससे कहीं अधिक मजाक एक वेदानभिज्ञ जो वेदों को ना जानने वाला है। पामर उपयुक्त मंत्र पर भी खूब उड़ा सकता है। लेकिन साक्षरों की दृष्टि में इस प्रकार की अनर्गल आलोचनाएं हिंदू ग्रंथों के महत्व को घटाने के बजाय उल्टा [गला साफ़ करने की आवाज़] समालोचक ही खुश खोपड़ी
01:11:28:02 की खुराफात व्यक्त करती हैं। निसंदेह जो यह बात है अब इसका वो अर्थ बता रहे हैं। सुतराम वह बैल क्या पदार्थ है? इसका स्पष्टीकरण सुनिए। याज्ञ लोग कहते हैं कि यज्ञ ही सर्व कामनाओं का बरसाने वाला पूरा करने वाला है। यज्ञ अत वही वृषभ है। यानी यहां पर यज्ञ को वृषभ कहा है। चारों ऋत्विक उसके सींग रक्षक स्थानीय हैं। यानी वो जो चार सींग है बैल के वो उसके ऋत्विक है जो चार ऋत्विक होते हैं। वेद त्रय तीनों वेद ही पाव हैं। तीन वेद जिनके आधार पर यज्ञ को खड़ा किया जाता है। यजमान और उसकी पत्नी दोनों सिर हैं। ठीक है? गायत्री आदि सातों छंद हाथ हैं जिनके द्वारा समस्त यज्ञ कार्य संपादन होता है। प्रातः मध्यान और साय काल के तीनों सवनों से ही वह बंधा हुआ है। वाह अत यह यह देवों का देव है तथा मनुष्यों द्वारा आचरणीय होने के कारण उनमें प्रवेश करता है। आपने कुछ दिनों पूर्व एक शॉर्ट फिल्म बहुत वायरल हुई थी YouTube पर जिसमें वो शेषनाग के ऊपर पृथ्वी है। पृथ्वी घूमती नहीं है। बच्चे को पूछा जाता है कि पृथ्वी कितने चक्कर लगाती है? इस तरह के कुछ वैज्ञानिक
01:12:43:15 क्वेश्चन पूछे जाते हैं तो वह पौराणिक कथा को वहां पर बोल देता है और इस तरीके से इस तरह की शॉर्ट फिल्म बना करके हमारे सनातन धर्म पर आक्षेप लगाने का प्रयास किया जा रहा है। उसी का निराकरण है ये जो मैं बता रहा हूं आज। यह सब प्रतीकात्मक व्याख्याएं और इनका जब हम गढ़ अर्थ देखेंगे इसके पीछे का अर्थ देखेंगे तो उनकी सुंदरता से हमारे हृदय में बहुत संतोष आएगा और ऐसी ही रुचि बनाए रखने के लिए ही इस प्रकार की प्रतीकात्मक व्याख्या में यह शास्त्र ढले हुए हैं जिससे कि हमारी बुद्धि इनके प्रति खोजी की रहे खोजी कि अब कौन सा रहस्य निकलने वाला है इस वाक्य से ठीक है तो और आगे चलते चलते हैं थोड़ा सा। अब इन्होंने और भी बहुत सी बातें की है।
01:13:34:00 अब देखिए एक अब इसी प्रकार की व्याख्या यहां पर कर रहे हैं। पद्म पुराण में उत्तरखंड में छ 96 38 नारद जी कहते हैं कि मैंने यमुना तट पर देखा कि वहां एक खिन्न मुख वाली युवती स्त्री बैठी है। और उसके पास ही दो बूढ़े अचेत हुए लंबी सांस ले रहे हैं। अब यहां पर यह लोग आएंगे रामपाली गैंग वाले और इसको पकड़ के दुष्प्रचार करने लगे कि भैया एक युवती है और उसके पास दो जो है वृद्ध बैठे हुए हैं। लंबी सांसे अचेत पड़े हुए हैं। लंबी सांसे ले रहे हैं। और नारद जी के पूछने पर उस स्त्री ने आश्चर्य पूर्वक कहा कि उसने बताया क्या बताया? मैं माता हूं और यह दोनों मेरे पुत्र हैं। मैं युवती क्यों हूं और यह दोनों मेरे पुत्र वृद्ध क्यों हो गए हैं? वास्तव में तो माता का जरठ होना और पुत्रों का युवा होना ही घटित होता है। अब यहां पर आचार्य बात कर रहे हैं। वास्तव में तो माता का जरठ होना और पुत्रों का युवा होना ही घटित होता है। यहां पर प्रत्यक्ष में माता का युवती होना और पुत्रों का महावद्ध होना हो जाना यह असंभव
01:14:49:10 सा प्रतीत होता है। वास्तव में उक्त संदर्भ में भक्ति को ही माता कहा गया है। यहां पर माता कौन है? भक्ति और ज्ञान वैराग्य को उसके पुत्र बतलाया गया है। कलिकाल के आरंभ में और अब भी ज्ञान की बात कृपाण की धारा के अनुसार धारणा ध्यान समाधि आदि अष्टांग योग द्वारा जितात्मा होकर ज्ञान एवं वैराग्य को धारण करने वाले पुरुष बिरले ही मिलते हैं। अतः ग्राहकों के ना होने से उक्त दोनों साधनों को यहां मृत प्रायः एवं महावृद्ध प्रकट किया गया है। मतलब इनका साधन करने वाले लोग कम होते हैं। तो इसलिए वृद्ध है लुप्त लुप्त से प्रायः तो क्या वृद्ध उनको वृद्ध के रूप में दिखाया है मृत्यु के निकट जैसे और महावद्ध प्रकट किया है परंतु सुगम होने के कारण सरल सरलता से अनुगम में होने के कारण इस गई गुजरी दशा में भी भक्ति मार्ग को अधिकारी भक्ति मार्ग के जो अधिकारी होते हैं वो निकलते रहते हैं। अतः उसे तरुणी यानी युवा बताया गया है। यही आशय यहां विवक्षित है। अब देखिए कितनी सुंदरता से वर्णन किया गया कि एक जो है युवती बैठी थी उसके दो पुत्र बैठे थे और दो पुत्र जो है वृद्ध थे दो पुत्र वृद्ध थे
01:16:04:12 और युवती जो है उनकी मां थी और पुत्र वृद्ध थे इसको देख के किसी को भी रुचि भी आएगी संशय भी आएगा और उसी संशय के कारण उसकी बुद्धि इसमें प्रवृत्त होने लगेगी इन शास्त्रों को पढ़ने में कि और कौन बातें मुझे पता चल ठीक है इसीलिए इस भाषा में उपयोग करते हां तो ये स्कूटी रखी है
01:16:51:27 जय श्री राम जय श्री राम अच्छा तो इस तरह की शैली में प्रतीकात्मक व्याख्या के रूप में विभिन्न जो गुण अर्थ होते हैं वह हमारे बताए जाते हैं पुराणों के भी द्वारा और वेदों के भी द्वारा मैं क्योंकि वेदों का भी उदाहरण इन्होंने लगातार दिया है तो वो उदाहरण भी देता चल रहा हूं। अब अर्थ विचार की बात भी कर लेते हैं। पूर्वाचार्यों ने वेद मंत्रों की व्याख्या करते हुए उन्हें कई कई अर्थों में व्याख्यात किया है। वेदार्थ निर्णय में आजकल निरुक्त का प्राधान्य माना जाता है या यूं समझिए कि इस समय वैदिक साहित्य सागर का यही एक रत्न हमारे पास शेष बचा है। तो
01:17:32:12 उक्त ग्रंथ में एक ही वेद मंत्र के आध्यात्मिक आदि दैविक और आदि भौतिक पद्धतियों से भिन्नभिन्न अर्थ किए गए हैं। तो इन्होंने एक ऋग्वेद का उदाहरण दिया है। वो मैं नहीं बता रहा हूं। मैं आगे एक ऋग्वेद का इन्होंने उदाहरण दे रखा है। जिसके कई अर्थ हैं। आध्यात्मिक और आदि भौतिक। इसके बाद इन्होंने यहां पर ब्रह्म विवर्त पुराण से और यहां पर इन्होंने ब्रह्मा सरस्वती विवाह वाला प्रकरण इन्होंने दिया है। जैसे वेदों में ये वाली बातें हैं जिसके आदि दैविक आदि भौतिक और आध्यात्मिक अर्थ निकलते हैं। उसी प्रकार से हमारे शास्त्रों में भी जो पुराण आदि शास्त्र उनमें भी इस तरह की बातें हैं। अब उनमें से एक जो आक्षेप लगता है ब्रह्मा सरस्वती विवाह उस पर आज मैं बात करने वाला हूं। आज मैं शॉर्ट में करूंगा और जब अलग से इस पर इसका अगले भाग आएंगे तब जो है वेदों का प्रमाण कि वेदों में भी वो घटना कहां पर किस किन रूपों में दर्शाई गई है और फिर यह बताऊंगा कि इसका आदिविक अर्थ क्या है इसमें कौन सा गुण अर्थ छुपा है कि ब्रह्मा जी ने ब्रह्मा जी ने बायोलॉजिकली जो मनुष्यों के बीच में संभोग क्रिया होती है वो उन पर लागू नहीं होती है परम तत्व होने के कारण
01:18:47:13 एक से दो होने के कारण अमथनी सृष्टि होने के कारण ये तो हो गया क्लियर तो अब जब उनके लिए इस प्रकार के शब्द आ रहे हैं जिनका अर्थ यह पागल रामपाली गैंग वो ब्रैकेट में लिखता है सेक्स तो उनके वास्तविक अर्थ क्या है यह अर्थ मैं उस सीरीज में आपको एक-एक करके बताऊंगा इसमें भगवान शिव शिव मोहिनी का प्रकरण भी आएगा ब्रह्मा सरस्वती विवाह भी आएगा और मैं देखूंगा कि कौन से मोटे-मोटे प्रासंगिक जो इन्होंने आक्षेप लगाए उन पर मैं बात करूंगा और हां उसमें जो है जो भगवान श्री कृष्ण की रास लीला और जो कुब्जा समागम और जो राधा जी उनकी मामी है ये सब जो ये लोग किया करते हैं, टपली बजाया करते हैं। इसीलिए मैं कह रहा हूं कि किसी प्रामाणिक व्यक्ति को वहां पर होना पड़ेगा जो हमारे प्रामाणिक आचार्य होंगे। बहुत अच्छी बात है या फिर उनसे जुड़े हुए किसी ना किसी प्रामाणिक व्यक्ति को। तो अब
01:19:39:10 मैं ब्रह्मा सरस्वती पर इन्होंने यहां पर संक्षिप्त में जो बात की है उस पर हम बात करके चीज को चीजों को विराम देंगे। तो वेदानिज्ञ यानी वेदों को जान ना जानने वाले मनुष्य को एक मंत्र के कई अर्थ देखकर यह भ्रम हो सकता है कि वस्तुतः सत्य अर्थ कौन सा है। परंतु एक वेदज्ञ की दृष्टि में सभी अर्थ यथार्थी होते हैं। उनमें से किसी एक को सत्य मानकर दूसरे को मिथ्या बताने का भी का किसी भी संप्रदाय को अधिकार नहीं है। नहीं हो सकता। जिस प्रकार पूर्वोक्त सोम पवते आदि मंत्र का अर्थ आदि देव पक्षवादी पुरुष सूर्य परक कर सकता है। परंतु उसे इसके आत्म परक आध्यात्मिक अर्थ के निषेध करने का कोई स्वत नहीं है। तथा इंद्र वृत्रासुर संग्राम प्रतिपादक मंत्रों में निरुक्तवादी लोग वृत्त शब्द का अर्थ मेघ कर सकते हैं। परंतु उन्हें इतिहासवादियों के अभिमत त्वास्ट्र असुर अर्थ को मिथ्या कहने का अधिकार नहीं। तात्पर्य यह हुआ कि व्याकरण आदि वेदांगों से अरुद्ध और युक्ति युक्त जितने भी अर्थ होंगे वह सभी यथार्थ माने जावेंगे। अधिकारियों को रुचि भेद से उनमें से जो रुचिकर हो वह उसे ग्रहण कर सकते हैं या साध्य हो साध सकते हैं। यहां तक हमने ऋषि समवत वेदार्थ निर्णय शैली का विवेचन किया। अब पुराणों के संबंध में भी जो अर्थ करने की शैली प्राचीन
01:20:54:19 काल से चली आती है। उस पर विचार कीजिए। पुराणों में अधिकांशत यह बहुत इंपॉर्टेंट है। यहां से आप लोग जरूर इसको सुन लीजिएगा। अपने पास कट करके रख लीजिएगा। एक बहुत एक उपयोगी बात आपको अभी तक जो हमने बातें की उसके संबंध में एक संक्षिप्त विवरण प्राप्त होने वाला है। पुराणों में अधिकांशतः वर्णन ऐसे हैं जो जो कि आध्यात्मिक, आदि दैविक और आदि भौतिक तीनों प्रकार के अर्थों में पूर्ण रूप से घटित होते हैं। एक पुराण में यदि उसे आध्यात्मिक अर्थ का प्राधान्य माना सामने रखकर कहा गया है तो पुराणांतर में उसे ही आदि भौतिक या आदि दैविक अर्थ की मुख्यता से वर्णन किया गया। उदाहरणार्थ अब यहां उदाहरण है। उदाहरण क्या है? जैसे ब्रह्मा द्वेता के संबंध द्वता से संबंध रखने वाली प्रसिद्ध वैदिक कथा को ही सामने रखते हैं। यह कथा प्रायः सभी पुराणों में आती है। श्रीमद् भागवत पुराण स्कंध तीन अध्याय 12 में ब्रह्म वैवर्त पुराण खंड चार और अध्याय 36 में और देवी भागवत स्कंध एक अध्याय 14 और श्लोक 68 में भी इसका संकेत मिलता है। परंतु उक्त तीनों पुराणों में यह भिन्नभिन्न अर्थों को मुख्य रखकर लिखी गई है। यह बात उन उन पुराणों में
01:22:09:20 उक्त कथा का उपसंहार देखने से भली-भांति स्पष्ट हो जाती है। मतलब उनमें जो अंतर आ रहा है कि थोड़े से वस्तुनिष्ठ चीजों के अंतर से अर्थ क्या निकल कर के आ रहा है। तो यह बात जब लास्ट का फाइनल देखते हैं ना कि एंड में क्या हुआ? कहानी के अंत में क्या हुआ? उससे समझ में आ जाता है कि इन तीनों में क्या अंतर है। तो देखिए क्या है। श्रीमद् भागवत में यह कथा आदि भौतिक अर्थ में कही गई है। आदि भौतिक अर्थ क्या है? यह वहां इसका तात्पर्य है कि प्रजापति सूर्य यानी यहां पर सूर्य कहा गया। अपनी दुहिता उषा यानी जो उसकी जो लालामी होती है के पीछे पीछे दौड़ता है। यानी जो सूर्य की लालामी होती है उसके पीछे पीछे सूर्य उदय होता है। मरीच आदि पुत्र छह किरणें उसे रोकती हैं। तो छह किरणें होती हैं वहां रोकने वाली कही गई। वह लज्जित होकर अपने कलेवर। अब यहां पर कलेवर यानी कि वाष्पमय प्रभात कालीन बादल। उसका कलेवर यानी उसका शरीर क्या है? सूर्य का शरीर क्या है? वाष्पमय प्रभात कालीन जो बादल होते हैं यानी कि संगणनित हुआ हुआ जो बादल जैसा बन गया होता है वो तो जब किरणों के प्रभाव से उसका वो जो
01:23:24:24 शरीर होता है वो जो बादल है जो कि कोहरा बन के टपकता है बाद में। तो किस कारण से वो टपका? किरणों के प्रभाव से। सर्दियों के समय में जो बादल होते हैं वो क्यों टपकते हैं? सूर्य की गर्मी के कारण। ओस बन के टपकते हैं तो वो त्याग देता है। शरीर सब दिशाओं में फैल जाता है जिसे कोहरा कहते हैं। उसको कोहरा कहते हैं। तो यह शब्द आया वहां पर निहारम यद विदुस्तमः भागवत तीन 12 34 इसमें क्या कहा गया है? निहार कोहरा धुंध कहते हैं। यहां उस संवार से स्पष्ट हो गया कि कोहरे की उत्पत्ति बताने के लिए इस रूपक का उल्लेख किया गया। यानी कि सूर्य निकलता है उससे पहले उसकी लालिमा निकलती है। तो यहां पर देखने में यह लग सकता है कि सूर्य पीछे पीछे और उसकी लालिमा उसी से उत्पन्न होने वाली इसलिए उसकी पुत्री तो वह अपनी पुत्री के पीछे पीछे किरणों के प्रभाव से सूर्य का जो शरीर है यानी कि वो बादल जो नमी के बादल बने हुए हैं वो उसकी जो किरणें हैं उसके कारण उसका जो शरीर है वह त्याग देते हैं जो कोहरा बन के गिरता है और वहां पर बाकायदा कोहरा शब्द आया है भागवत में जो
01:24:39:25 कोहरा बनकर गिरता है निहार ठीक है अब दूसरी जगह पर यही कथा आती है। उसका क्या अर्थ है? देखिए बहुत रोचक है। ब्रह्म व्यवही कथा आध्यात्मिक अर्थ को मुख्य मानकर लिखी गई है। वहां उपसहार में स्पष्ट कर दिया गया है। क्या है? चार 36 58 मन रूप ब्रह्मा वाणी रूप सरस्वती के पीछे पीछे दौड़ता है। वाणी कहां से उत्पन्न हो रही है? मन से। तो वाणी हो गई पुत्री। और मन कौन हो गया? ब्रह्मा। तो ब्रह्मा जी किसके पीछे दौड़ रहे हैं? पुत्री के पीछे तो अब कहने को तो ब्रह अरे पिता ने पुत्री से वह कर लिया भाई वहां पर तो बायोलॉजिकल यह संभोग क्रिया है ही नहीं तो इनके आपको अर्थों को समझना होगा गुरु चरणों में बैठकर जैसे वेद के अर्थों को समझना होगा गुरु चरणों में बैठकर तो मन रूप ब्रह्मा वाणी रूप सरस्वती के पीछे पीछे दौड़ता है तब ज्ञान रूप शिव शिव जी कौन है ज्ञान स्वरूप तो ज्ञान रूप शिव अपने पिता मन का अहंकार रूप मस्तक काट डालते हैं। यह वहां पर मस्तक काटने का प्रसंग है। यानी उनका एक तरीके से वहां पर भी शरीर छूटने वाली बात हो गई। तो यहां मरीच आदि के बजाय शिव द्वारा ब्रह्मा के मस्तक काटने का उल्लेख है। क्योंकि आध्यात्मिक
01:25:55:01 अर्थ में मरीच आदि छह पुत्र किरणें घटित नहीं हो सकते और ना ही ब्रह्मा का शरीर त्याग उचित जचता था। बल्कि ज्ञान रूप महेश्वर द्वारा मन रूप ब्रह्मा का अहंकार रूप पांचवा मस्तक काट डालना ही उचित प्रतीत होता था। अतः ब्रह्म वर्त में वह लिखा है जो कि आध्यात्मिक अर्थ में सर्वथा घटित होता है। देवी भागवत में उत कथा के आध्यात्म आदि दैविक अर्थ को मुख्य मानकर इसका संकेत किया गया है। अतः वहां ब्रह्मलोक के अधिष्ठाता श्री ब्रह्मा जी अभिप्रेत है। तात्पर्य यह हुआ कि यह एक ही कथा तीन पुराणों में तीन अर्थों से प्रयुक्त हुई है। और इसी प्रकार से ये सारी जो लीलाएं हैं, घटनाएं हैं जो पुराणों में है और वेद में भी है। बस बात इतनी है जो इनके जनक भाई साहब है ना इनके रामपाली जैसों के जनक जनक यानी कि आर समाज तो उन्होंने क्या किया वेदों में जब इस तरह की बातें आती है तो वहां पर अपना जो सुरक्षात्मक रवैया अपना लेते हैं मगर उनके ही भाई बंधु जो पुराणों में आस्था है उनके जो उनकी आस्था के केंद्र जो पुराण आदि शास्त्र उनमें जब इस तरह की बातें आती है तो वो वहां पर इस तरह के आदि दैविक आदि भौतिक आध्यात्मिक अर्थ नहीं निकालते तो [गला साफ़ करने की आवाज़] इस समय पुराणों का अनुसंधान करने वाले महानुभाव
01:27:10:09 अर्थ विचार में एक दूसरे से किंचित मतभेद रख सकते हैं। तो यहां पर इन्होंने और कुछ चीजें बताई हैं। अब यहां पर पुराण शैली की विशेषता बताई है। यहां तक हमने प्रायः समस्त शास्त्रों में अवशेष रूप से दिख पड़ने वाली शैली का निरूपण किया है। लौकिक वैदिक किवा आर्ष शब्दों का प्रयोग रोचक भयानक और यथार्थ वचनों का अस्तित्व समाधि लौकिकी और परकीय तीनों भाषाओं का समावेश एवं आध्यात्मिक आदि भौतिक और आदि दैविक आदि अनेक अर्थों का सामंजस्य और यह सामंजस्य वेदों के साथ हो रहा है पुराणों का। जिस प्रकार की घटनाएं यहां है उसी प्रकार की घटनाएं
01:27:53:18 पुराणों में है। ठीक है? अब एक जो लास्ट में इन्होंने वही बात कही है जो मैं बार-बार कहता आ रहा हूं। इसी तरह ब्रह्मा पुत्री इंद्रवत्रासुर इंद्र अहिल्या और उतथ ममता आदि से संबंध रखने वाली 50ों कथाएं भी इतिहास के साथ-साथ अध्यात्म देव चारित्र्य भौतिक विज्ञान और धर्म तत्व आदि रहस्यों के विमर्शण से परिपूरित हैं। जिनका उचित विश्लेषण करने पर ही जिज्ञासु को ऐतिहासिक तथ्य उपलब्ध हो सकता है। यही पुराण शैली की शैली की विशेषता है जिस जिसका मनन करने पर पुराणों में प्रतीत होने वाले असंभव अश्लील परस्पर विरोध और धर्म विरोध आदि दोष दोषाभास में परिणित हो जाते हैं। दोष किस में परिणित हो जाते हैं? दोषाभास दोष नहीं है। दोषाभास है। ठीक है? अपने पुराणों को अपने धर्म ग्रंथों को जानिए। तो प्रश्न अच्छा इसके बाद मैं एक चीज और यहां पर बता दूं। जैसे वो ईश्वर सर्व सामर्थ्यवान है। तो अब ये लीलात्मक उन्होंने विवेचना तो कर दी। उनके उन्होंने जो भी लीला की उसके क्या अर्थ है वो मैंने आपको ब्रह्मा सरस्वती विवाह से बता दिया। पर इसमें एक बात ये आती है कि ईश्वर
01:29:08:26 सर्व सामर्थ्यवान है। जैसे कि भगवान ने चार 13 में कहा समस्त कर्मों को करते हुए भी तू करने वाला होते हुए भी तू मुझको अकर्ता जान क्योंकि मैं कर्मों के फल में लिप्त नहीं होता। आसक्त नहीं हूं मैं। क्योंकि भगवान को उन कर्मों से कुछ चाहिए नहीं और अगर आर्य समाज का अर्थ ले लें आर्य समाज के अनुसार वाला ईश्वर ले लें तो कर्मों का फल देने के लिए और आर्य समाज के अनुसार जीव केवल प्रेरणा करता है सभी जो बल लगाता है वो ईश्वर ही करता है कार्य आर्य समाज के अनुसार सारे कार्य इसका मतलब दुनिया में अच्छा बुरा कुछ भी जो भी क्रियाएं हो रही है वो सब ईश्वर ही कर रहा है और यही बात गीता भगवान भी कह रहे हैं समस्त कर्मों को करते हुए भी तू मुझे करता जान और अगर हम किसी को मानते हैं अगर रामपाली को ले लो ब्रह्मा कुमारी को ले लो। उनसे भी जब ये पूछा जाएगा कि सर्वाधार है कि नहीं ईश्वर हर चीज का आधार है कि नहीं? अगर आप ईश्वर को सर्वाधार नहीं मानोगे तो ईश्वर की सिद्धि ही नहीं हो पाएगी। तो आपको सर्वाधार मानना पड़ेगा ईश्वर को। तो जब सर्वाधार ईश्वर है तो सब कुछ उससे ही तो निकल रहा है। जिसको आप अच्छा मान रहे हो। अच्छा या बुरा जो भी कुछ है उससे ही निकल रहा है। वो बात और है कि आप अच्छे आपके लिए कुछ अच्छा और कुछ बुरा हो सकता है। परंतु ईश्वर के लिए नहीं। तो इसलिए ईश्वर उनसे प्रभावित नहीं होता। तो ईश्वर यहां पर अपनी सामर्थ्य का और अपने बंधन मुक्त होने का प्रस्तुति भी दे देते हैं इस प्रकार की लीलाओं
01:30:24:07 से कि मैं किसी भी प्रकार के कर्मों में लिप्त नहीं हूं और ना ही मुझे कुछ पाना शेष है। जैसे कि भगवत गीता भगवान श्री कृष्ण ने कहा कि मुझे भी कोई भी अप्राप्त वस्तु नहीं है जिसको मुझे पाना है। तो तो यह भगवान यह जो समस्त जितनी भी इस प्रकार की लीलाएं होती है जो प्रतीकात्मक व्याख्या होती है आदि दैविक आदिक भौतिक और आध्यात्मिक अर्थों वाली इन सब लीलाओं में एक मोती पिरा हुआ पिरोया गया है वो मोती क्या है ईश्वर ही सर्वाधार है समस्त करने वाले कर्मों को करने वाले होते हुए भी वह अकर्ता है ईश्वर सर्वशक्तिमान है ईश्वर वो है जो किसी भी प्रकार के नियम के नीचे नहीं है बल्कि सभी नियम सर्व निय नियामक है। ईश्वर वही है जो कुछ भी कर सकता है। तो इस प्रकार से इस प्रकार की लीलाओं में गुथे हुए गुण अर्थों को प्रकट करते हुए ईश्वर अपनी सर्व सामर्थ्यता और बंधन से मुक्त होने की स्थिति को भी प्रदर्शित कर देते हैं। ठीक है? अब यहां पर आचार्य श्री एक बात कह रहे हैं कि प्रश्न हो सकता है कि आखिर श्री वेदव्यास जी ने विमिश्रण का यह गड़बड़ झाला किया क्यों है? ठीक है? तो इस पर उन्होंने आगे बताया है कि सर्वसाधारण जो
01:31:39:10 शास्त्र के प्रति एक खोजी बुद्धि अनुसंधयात्मक बुद्धि आपकी बनी रहे रुचिकर बने आपके लिए शास्त्र और शास्त्रों में बुद्धि प्रवर्त हो उनके मन उनका मनन चिंतन हो और उनके गुण अर्थों के प्रति उनकी जो सौंदर्यता जब वो निकल के आए जैसे गणित का कोई सवाल होता है ना आप कभी भी देखना जब उसको आप सुलझा रहे होते हैं और जब वो निकल के आता है ना तो जो आपको सुख की एक प्राप्त गणित के प्रति रुचि बनती है एक उसी प्रकार से जब इन शास्त्रों का गुरु गुरु चरणों में बैठकर के इस प्रकार से अर्थ प्राप्त होता है तो उसके प्रति एक रुचि बनती है। उस रुचि के कारण आप उन शास्त्रों को पढ़ते हैं और जितना ज्यादा पढ़ते जाते हैं उतना ज्यादा आप बंधन से मुक्ति की ओर आगे बढ़ते हैं। ठीक है? अब
01:32:23:03 यह सारी बातें तो एक तरफ हो गई। अब बात करते हैं कि गुरु गीता में कहा गया है कि मनुष्य चाहे चारों वेद पढ़ ले, सारे पुराण पढ़ ले, सारे उपनिषद पढ़ ले, जप तप, यज्ञ, दान, कर्म इत्यादि जितने भी हैं वो सब व्यर्थ हैं। यदि उसका कोई प्रामाणिक गुरु नहीं है। तो भाई आप पुराण को नहीं मानते कोई बात नहीं। मगर जिन पुराणों की किसी घटना के आधार पर आप पुराण पर आक्षेप लगा रहे हो या हिंदुओं के आराध्य देवी देवता हैं उन उन पर आक्षेप लगा रहे हो शीलता भरा कुछ भी आप बोल रहे हो जो मनगढ़ंत बातें उनहीं पुराणों में यह भी तो लिखा है कि इनको आपको गुरु से समझना है और जब आप गुरु से समझोगे और किस गुरु से समझना है ये भी लिखा है तो उनकी बात को समझने के लिए तो आपको गुरु के पास ही जाना होगा ना फिर और जिस प्रकार का गुरु वो बता रहे हैं उस प्रकार के गुरु के पास जाना होगा अपनी चीजों को आप मत समझो जिनमें आपकी आस्था है और एक तरफा रूप से स्वतंत्र हो के आप कर रहे हो वो बात की आपका सिद्धांत पुष्ट होता है कि नहीं मगर आप इन शास्त्रों को अंतत गतवा ये बात आ जाती है भाई ठीक है ये सब लिखा है हम नहीं समझ पा रहे तो हम तो वही समझेंगे जो हमें समझ में आ रहा है तो उनहीं शास्त्रों में यह भी लिखा है कि इन शास्त्रों को खुद
01:33:38:04 से मत पढ़ो गुरु के बिना ये शास्त्र आपको भटका सकते हैं। भ्रम फैला सकते हैं। भ्रांति में डाल सकते हैं। कहां कहा गया बता दे रहा हूं। हम
01:34:31:27 तो स्कंद पुराणोक्त गुरु गीता है। उसमें यह सब बातें हैं। और गुरु के बारे में भी जगह जगह पर बातें स्पष्ट रूप से की गई हैं। यह देखिए स्कंद पुराणोक्त गुरु गीता 19 20 21 में क्या लिखा है? वेद शास्त्र पुराण आदि मंत्र यंत्र मोहन उच्चाटन आदि विद्या शैव शास्त्र और अन्य सभी मत मतांतर यह सभी बातें गुरु तत्व को जाने बिना भ्रांति भ्रांतित में भ्रांतित वालों का पथ भ्रष्ट करने वाली हैं और गुरु के बिना जप तप व्रत तीर्थ दान यज्ञ यह सब व्यर्थ हो जाते हैं। स्कंद पुराणोक्त गुरु गीता 98वा श्लोक मनुष्य चाहे चारों वेद पढ़ ले वेदों के छह अंग पढ़ ले अध्यात्म शास्त्र पढ़ ले आदि सभी शास्त्र पढ़ ले फिर भी गुरु के बिना ज्ञान नहीं मिलता गुरु कृपा से सब संशय नष्ट हो जाते हैं गुरु गीता 191 और भगवत गीता 440 क्या कह रही है संशय आत्मा विनश्यति देखिए भगवत गीता 440 कह रही है संशय से आपका विनाश
01:35:47:03 होगा ना तो इस लोक में सुखी रह पाओगे परलोक की तो बात तो आपके मन में संशय है। संशय को काटेगा कौन? गुरु। तो जिन पुराणों पुराण शास्त्रों के आधार पर आप पुराणों की घटनाओं पर आक्षेप लगा रहे हैं। आप पुराणों में वर्णित जो दय चरित्र उन पर उंगली उठा रहे हैं। उन्हीं पुराण शास्त्रों में उनको समझने के लिए गुरु के पास जाने को कहा गया है। क्या आप गए गुरु के पास? अब आप कहोगे कि नहीं नहीं हम तो अपने रामपाल के पास गए थे। रामपाल को कितना ज्ञान है वो तो ठीक है। कभी उससे सामना होगा तब पता चलेगा। फिलहाल गुरु की चीजें बताई गई है। स्पष्ट है कि गुरु किसे बनाना है। तो गुरु किसे बनाना है? यह तो मुझे मौखिक रूप से ही वो हो गया है। अथर्ववेद 11 पांच 16 ब्रह्मचारी ही आचार्य बनता है। मनुस्मृति 12वा अध्याय 112 से 114 धर्म में संशय होने पर अधिष्ठाता ब्रह्मचारी को बनाएं। और भगवत गीता में आप देख लीजिए तत्व ज्ञान बताने वाले को बार-बार बार-बार विरक्त कहा गया है। वैराग्य कहा गया है। वैराग्य रूपी हथियार से वैराग्य रूपी शस्त्र से वो संसार रूपी जो वृक्ष है प्रपंच रूपी वृक्ष है उसकी जड़ को काट डालता है। वैराग्य से तो यानी कि लक्षण क्या है गुरु का कि वो
01:37:02:04 विरक्त होना चाहिए। दूसरा क्या है कि मुंडकोपनिषद में दिखा ही देता हूं। मुंडकोपनिषद छंदोक उपनिषद में कह रहे हैं। छंदोक उपनिषद में छठव अध्याय में कहा जा रहा है कि यह विद्या यह गुरुगम्य विद्या है। आचार्य चरणों में बैठकर ही प्राप्त होती है। यानी कि निर्देश दिए जा रहे हैं गुरु के सानिध्य में जाकर इसको प्राप्त करने के। अब मैं वो दिखा दूं आपको मुंडकोपनिषद। मुंडकोपनिषद में जो ऋषि हैं वह अपनी परंपरा बता रहे हैं। यानी गुरु का लक्षण क्या हुआ कि विरक्त होना चाहिए। गुरु की प्रामाणिकता क्या हुई कि वो परंपरा से होना चाहिए। ऐसे नहीं मन मुखी कोई भी अपने आप को गुरु कहने लगे। परंपरा से होना चाहिए।
01:38:05:03 मुंडकोपनिषद 443 ये देखिए आचार्य परंपरा मुंडकोपनिषद तो [गला साफ़ करने की आवाज़] संपूर्ण देवताओं में पहले ब्रह्मा उत्पन्न हुए वह विश्व के रचयिता और त्र केक थे। उन्होंने अपने जेष्ठ पुत्र अथवा को समस्त विद्याओं की आश्रयभूत ब्रह्म विद्या का उपदेश किया। ऋषि गण अपने जो ये दय जो विभूतियां है वो अपनी परंपरा बता रही है। मगर आजकल क्या हो गया कि कोई भी व्यक्ति उठ खड़ा होता है और खुद को जो है स्वयंभू गुरु बन जाता है। मैं उनसे पूछना चाहता हूं कि इन मंत्रों का क्या करेंगे? क्या व्यर्थ में लिखे गए ये मंत्र? यह हमको वर्णन व्यर्थ में दिया है उपनिषदों में। क्यों बता रहे हैं यहां पर यह लोग अपनी परंपरा अथर्व को ब्रह्मा जी ने ब्रह्मा ने जिसका उपदेश किया था वह ब्रह्म विद्या पूर्व काल में अथवा ने अंगी को सिखाई। अंगी ने उस उसे भरद्वाज के पुत्र सत्यवाह से कहा तथा भरद्वाज पुत्र सत्यवाह ने इस प्रकार श्रेष्ठ से कनिष्ठ को प्राप्त
01:39:20:04 होती हुई वह विद्या अंगिरा से कही। इस तरह से यह दय विभूतियां अपनी परंपरा बता रही है। शौनक नामक प्रसिद्ध महागस्थ ने अंगीरा के पास विधि पूर्वक जाकर फिर उनसे आगे ज्ञान लिया। ठीक है? तो यानी कि प्रामाणिकता क्या है? परंपरा। भगवत गीता चार दो में भी कहा जा रहा है कि ज्ञान परंपरा से प्राप्त होने की बात कही जा रही है और पुराणों में तो भरभर के है बहुत जगह पर है मैं शिव पुराण का एक उदाहरण दे देता हूं आपको संभता मिल जाए मुझे बहुत दिन पहले देखा था
01:40:08:14 अगर मिल जाता है तो बताता हूं शिव पुराण का उदाहरण [गला साफ़ करने की आवाज़] सीधी सी बात है ना भाई कि वो जिनसे कह रहे हैं उनसे उन्हें समझ लो आप। नहीं अभी वो मैंने पढ़ा था पर वो एग्जैक्ट कहां देर लग जाएगी ढूंढने में। खैर भगवत गीता चार दो में परंपरा की बात हो रही है। आचार्य यास्क ने परंपरा से कहा है कि परंपरा से मुझे ज्ञान विज्ञान प्राप्त हुआ है जो मैं बता रहा हूं। भगवत गीता 36 में बात हो रही है कि जो अह कालचक्र से जो प्रसिद्ध है ज्ञान विज्ञान यानी परंपरा से उसमें जो प्रवर्त होता है उसका जो अनुसंधान करता है उसका जो आलंबन लेता है वही सुख प्राप्त कर पाता है। इसी प्रकार से भगवत गीता में एक जगह जो है जो हमारे परंपरा से पूर्वज जो करते चले आ रहे हैं जिस ज्ञान का प्रभाव उसी को आगे बढ़ाता है लेकर आगे चलता है। तो वही उसका अभीष्ट फल
01:41:23:15 प्राप्त कर पाता है। इस प्रकार से अनेकानेक जगहों पर प्रकरंतर प्रकरणांतर भेद से परंपरा पर प्रकाश डाला गया है। तो गुरु वही जो परंपरा से हो गुरु के लक्षण वो विरक्त हो। फिर तीसरा कि श्रुति स्मृति शास्त्रों में सामंजस्य की शिक्षा दे। जैसे अभी मैंने आपको बताया कि वेदों में भी वो बात है। पुराणों में भी वो बात है। एक ही स्त्रोत से दोनों चीजें हमें प्राप्त हो रही है। उनहीं आचार्यों से वेद प्राप्त हुए। उनहीं आचार्यों से पुराण प्राप्त हुए। मगर कोई व्यक्ति क्या कर रहा है कि वेद को तो प्रमाण मान रहा है। पुराण को प्रमाण नहीं मान रहा। जो व्यक्ति आपको ये दोनों शास्त्र दे रहा है। अगर वह पुराण झूठे दे सकता है तो वेद भी तो झूठे दे सकता है। पर आप अपने मन से कुछ भी कर रहे हो। खैर कोई बात नहीं। लोकतंत्र कर सकते हो। सबको अधिकार है। मगर मगर क्या है कि जो आचार्य वास्तविक वही जो प्रामाणिक शास्त्र में प्राप्त हुए हैं परंपरा से उनमें भेद बुद्धि ना रख के उनमें सामंजस्य रूपी ज्ञान दे। ऐसा ना हो कि हमारे हमने इस ग्रंथ के वाक्य को परस्पर विरोधी वाक्य दिख रहे हैं तो हमने इसको ले लिया। उसको उसको त्याग दिया। नहीं नहीं यह गलत है। अगर हम यह करेंगे तो हमने उसका विरोध कर दिया। उसका विरोध कर दिया तो उसको देने वाले का विरोध कर दिया। देने वाले का विरोध कर दिया तो देने वाले के द्वारा दूसरी दी गई चीज जिसको हम प्रमाण
01:42:38:19 मान रहे हैं उसका भी विरोध कर दिया। ठीक है? तो इस प्रकार से सामंजस्य की शिक्षा दे वो गुरु है। और इसका इसके लिए प्रमाण ले सकते हैं। न्याय जो वो है न्याय शास्त्र वहां से अर्ध कुकुट न्याय के लिए मना किया गया। दोष है अर्ध कुकुट न्याय करना। और एक है मत्स्य पुराण 152वा अध्याय 45वा श्लोक श्रोत स्मार्थ जो धर्म है उनमें सामंजस्य से जो धर्म हमें प्राप्त होता है वो साधु सम्मत धर्म ठीक है तो यह हो गया और अंतत गत्वा गुरु कौन गु का मतलब अंधकार अद्वतार का उपनिषद रू का मतलब निकालने वाला अंधकार से निकालने वाला चार पांच तात्विक प्रश्न पूछ लिए जाएंगे ना रामपाल से उसका बिल्कुल कचूमर निकल जाएगा भेजे का ऐसे जो तात्विक प्रश्न जो सब बातें किया करते हैं ना आर्य समाज आर्य समाज वाले तो बहुत बहुत आगे रामपाल से बहुत आगे हैं तो यह सब जो यह तात्विक बातें होती है ना ये सब बातें उसके सामने उसको जो है ग्लूकोस की बोतल चढ़वानी पड़ जाएंगी रामपाल को देखा है ना जितनी बार बात हुई है उतनी बार बिल्कुल 100 की स्पीड में वापस हो गए पवन दास बहुत बड़ा चेला था रामपाल का पवन दास जो है जब उससे पूछा मैंने कि कंधे के इधर क्या है कबीर के कंधे के उधर क्या है किसने बनाया बस
01:43:54:12 मैं तो आग में कूद के दिखा दूंगा जिसका अगर मेरा गुरु सत्य होगा तो मैं बच जाऊंगा। यह सब बातें करने लगा। तो बच जाओ ना भाई। फिर ये कहना बंद करो ना हम तो वेदों से दिखा रहे हैं। आग से दिखा रहे हैं। बोलो आग में प्रमाण है। और कबीर भगवान है आग में प्रमाण है। रामपाल भगवान है। ये सब बोलो। हमको हम रोकने आ रहे हैं क्या? अच्छा तो गुरु वही जो आपके अज्ञानता रूपी अंधकार को नष्ट कर दे। यह सारी बातें मैंने ब्रह्मा सरस्वती विवाह का उदाहरण देकर के बहुत सारी चीजें आपको बताई आज और थोड़ा सा डिफरेंट टॉपिक पर आज का ये हुआ है। अब मैं आपको जाते-जाते एक बोनस देता जा रहा हूं। वो भी आप ले लीजिए। वो क्या है? बोनस के रूप में दो चीजें हैं। बहुत ज्यादा समय नहीं लूंगा। मुझे मालूम है आप लोगों का काफी समय ले लिया है। बोनस में पहली चीज है कि अब मैं आपको लिंग शब्द के बारे में शिव पुराण में क्या लिखा हुआ है वह बता रहा हूं। तो शिव पुराण विदेश्वरी समिता 16 106 तो लिंग शब्द का ही एक अर्थ क्या और लिया गया है जो हमें वहां पर लेना चाहिए वो यहां पर बताया गया है। लिंग का अर्थात
01:45:09:22 लीन अव्यक्तावस्थापन वस्तु के गमक बताने वाले निशान को निशान को लिंग कहते हैं। अब यहां पर ये जो निशान है ना प्रतीक चिन्ह मान लो अब इसको वहां वहां पर फिट करो तो आपके जो आरोप है क्या सिद्ध हो पाएंगे जो आप लगाने चल रहे हो और यह जो चीज है मैंने वहां से नहीं ली है मैं अपने मन से ले लिया लिंगार्थ ये शिव पुराण में लिखा हुआ है लिंगार्थ और इसी प्रकार से जो भग यानी जो स्त्री का स्त्री स्त्री का जो गुप्त होती है उसकी बात है तो वहां क्या है भग का अर्थ क्या लिया है शिव पुराण में विद्युसरी समिता 16 106 वह है भि प्राप्त होने वाली वस्तु को भग कहते हैं। वृद्धि को प्राप्त होने वाली वस्तु को भग कहते हैं। जिसका अर्थ है प्रकृति। ठीक है? तो लिंग का और भग का दोनों का हो गया। अब इन दोनों को आप वहां जाकर सेट करो। और इसी तरीके से जो अंडकोष है अब ये अंडकोष क्या? अंडपिंड ब्रह्मांड। ब्रह्मांड में भी आया ना अंड शब्द। तो ये सारी चीजें प्रतीकात्मक व्याख्या किस रूप से लेनी ये आपको गुरु चरणों से प्राप्त होगा। आप लगे मगमखौल उड़ाने और फिर अब जो सेना जा रही है वह पता नहीं क्या वहां पर करेगी। इस तरीके से हमारा पक्ष रख पाएगी
01:46:25:01 पुराणों में आस्थावान लोगों का कि नहीं रख पाएगी मुझे नहीं ज्ञात है पर मैं अपेक्षा करूंगा और निवेदन करूंगा प्रार्थना करूंगा कि जो लोग इस तरह का अभियान चला रहे हैं उससे जुड़ रहे हैं तो वो वहां पर हमारे पक्ष को इसी तरीके से प्रस्तुत करें और हां एक दूसरा टॉपअप और था मैं भूल गया था वह भी देता चलूं कि गरीब दास की वाणी में क्या लिखा हुआ है मेरे पास कल ही आया था वह मामला जाइएगा नहीं बहुत जरूरी चीज बताने जा रहा हूं।
01:47:12:09 गरीब दास की वाणी में कुछ भड़वाहड़वा ये सब लिखा हुआ है। अपनी जीवा को भी दूषित करना पड़ता है। ये देखिए। अरे मैं पढ़ तो नहीं सकता हूं। मैं एक काम करता हूं। मैं ऑपरेटर को भेजता हूं। वह जरा यहां प्रदर्शित कर दें इसे।
01:48:00:14 गरीब दास जी के ग्रंथ में पेज नंबर 710 और 722 पर देखिए क्या लिखा हुआ है। देखते हैं। मैं जरा उनको ऑपरेटर को भेज रहा हूं। ऑपरेटर जी जरा ये 710 नंबर का पेज यहां पर शो कर दीजिए। गरीब दास वाणी 710 और 722 जी ऑपरेटर जी [गहरी सांस लेने की आवाज़] गरीब दास के ग्रंथ में क्या लिखा है वो भी लेते चलो। वो बात ऐसी है ना कि मत पड़ो चक्कर में कोई है नहीं टक्कर में। कितनी बार कहा है पर समझ नहीं पाते मूर्ख।
01:48:51:03 ऑपरेटर जी हैं। यहां पर उपलब्ध हैं। [नाक से की जाने वाली आवाज़] शब्द ऐसे हैं कि मैं बोलकर भी नहीं बता सकता। इसलिए ऑपरेटर जी से मेरा प्रार्थना है कि वो इसको दिखा दें यहां पर। तो ऑपरेटर जी अभी उपलब्ध नहीं है पर मैं आपको पढ़ के बताने का प्रयास करता हूं।
01:50:05:03 [गला साफ़ करने की आवाज़] ये गरीब दास वाणी में 710 है देखिए 90 है। यह लिखा हुआ है। आप लोग पढ़ पाए तो शायद कैसे दिखाऊं? चलिए इसको फिर कभी दिखाऊंगा मैं।
01:51:00:12 बेटी के बाद वह शब्द लिखा हुआ है बहन के। फिर वो वहां गुप्तांक का नाम दिया गया है। इस तरीके से 710 पेज है। इससे ऊपर से मैं थोड़ा पढ़ देता हूं। मार पड़ेगी जम के द्वारा। हंसी आ जाएगी आपको। ये पढ़ के। खैर इसका मैं लिंक डाल दूंगा यहां पर। लिंक दे दूंगा तो आप जो है इसको पढ़कर देख लीजिएगा इनके गरीब दास के गरीब दास का जो ग्रंथ है उसमें क्या लिखा है बेटी बोलने में भी ठीक नहीं है चलिए ठीक है तो आज के लिए बहुत कुछ अ हमने बताया है काफी आवश्यक जानकारी आपको मिली होगी आशा करते हैं आप सभी अपने धर्म में प्रवृत होंगे और नाम जप हमेशा करते रह नाम जप सवा घंटे का अवश्य गुरुदेव पूरी के शंकराचार्य जग गुरु शंकराचार्य जी सदैव बताते हैं। तो आप लोग नाम जप अवश्य करें जिससे कि यह जो विपरीत स्थितियां हैं इनसे संघर्ष करने का बल आपको प्राप्त हो। और बाकी जितने भी विरोधी तत्व हैं उनको फिर से मैं कहूंगा एक
01:52:15:18 बार कि मत पड़ो चक्कर में कोई है नहीं टक्कर में। और जिसने भी अपनी मां का दूध पिया हो विशेष रूप से रामपाल ही गैंग जिसको भी लगता है कि रामपाल के पास ज्ञान है तत्व ज्ञान ठीक है वो आए सामना करें अगर रामपाल घोषणा करेगा रामपाल स्वयं आएगा तो किसी मध्य की जगह पर मिलेंगे वहां नहीं बरवाला वो सब नहीं बता दिया ना शॉर्ट में रामपाल या रामपाल के द्वारा घोषित कोई व्यक्ति होगा तो किसी मध्यस्थ स्थान में आ सकते हैं और यदि उसके बिना खुजली है खुजली मिटानी मिटाना चाहते हो, दवाई चाहिए तो हमारे चैनल पर आकर हमसे बात कर लो। ठीक है? ज्ञान चर्चा वगैरह जो भी करनी है कर लो। और यह जैसे अरुण कुमार जी हैं। अरुण कुमार जी इस वीडियो के लास्ट में आपको नंबर प्राप्त होगा। उस नंबर पर आप WhatsApp करें। WhatsApp करके निश्चित होगी हमारी चर्चा और इसी तरीके से बैठकर के हम आमने सामने बात करेंगे।
01:53:16:21 जय श्री राम। सभी का बहुत-बहुत आभार। जय श्री राम सभी को। [संगीत]
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25 अगस्त हरियाणा धर्मरक्षा या षड्यंत्र धर्मेंद्र हुड्डा को संदेश हिंदुओं को चेतावनी
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