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00:00:02:04 तो सभी को जय श्री राम और आज हमारे साथ मंगा राम जी है मंगल राम जी आपका बहुत बहुत स्वागत है आभार आपका पधारने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद आपने जी तो किया जी जी बिल्कुल नहीं हम लोग चाहते हैं कि जो वैचारिक मतभेद समाज में आ रहे हैं जिसके कारण से हम लोग कमजोर दिखाई देते हैं हिंदू समाज जो है वो वैचारिक मतभेद धीरे धीरे दूर हो वैचारिक क्रांति आए और हम लोग वैचारिक स्तर पर एक हो जिससे कि व्यवहारिक स्तर में हम विरोधियों का सामना कर सके एक साथ खड़े होकर तो बक मंगाराम जी का परिचय हमें जो बताया गया है वह यही है कि मंगाराम जी ने स्वा अध्ययन किया है अपने ग्रंथों का और उसके आधार पर उन्हें हमारी कुछ बातों से शायद वो सहमत नहीं है जिसमें से मुख्य बात है जिसके निमित्त आज हम बात करने वाले हैं कि ईश्वर अवतार लेता है या नहीं ईश्वर साकार है या नहीं तो मंगाराम जी आप
00:01:17:08 सबसे पहले हमको ये बता दें कि आपके अनुसार ईश्वर अवतार ले सकता है या नहीं ईश्वर साकार हो सकता है या नहीं यह आप पहले बता द हा तो देखिए सर जो मेरा सवाल जो आया उसका मैं बैकग्राउंड बता देता हूं कि आपको आपसे मैंने व सवाल पूछा क्यों उसका य कि मैंने आपका एक वीडियो देखा मुझे बड़ा इंटरेस्टिंग लगा आपका जो सवाल पूछने का जो तरीका था और जो आप एक तरफ की जो लास्ट सीमा है वहा तक जाके आप बात करते हैं मुझे वो आपका तरीका अच्छा लगा और मैंने वीडियो को ध्यान से दिखा और और भी मैंने आपके एक दो वीडियो ध्यान से देखे तो वहा से जब ये है कि आपने ज ईश्वर की परिभाषा दी भगवान की मतलब जो भी आपको भगवान की परिभाषा दे रहे थे जिन जिन लोगों ने आपसे बात लोग की और उन्होने भवान की परिभाषा दी और उस भगवान की परिभाषा में आपकी तरफ से जो सवाल था वो था कि क्या व किसी नियम में बंधे हुए हैं क्या भगवान किसी नियम में बंधे या नहीं बंधे हुए और यहां पर आके जो है वो जब उन्होंने बोला कि वह जन्म नहीं लेता
00:02:33:00 तो आपने बताया कि वह जन्म नहीं लेता य क्या नियम है अगर यह नियम है तो इसका मतलब नियम में बंधा हुआ है और व भगवान नहीं है तो मेरे सवाल का जो बैकग्राउंड ही था कि अगर आपके अनुसार वो जन्म लेते हैं तो वह जन्म किन परिस्थितियों में लेते हैं यहां पर मैं अपना कोई मत नहीं रख रहा हूं कि वो जन्म लेते हैं या नहीं लेते हैं वो साकार है या निराकार है मैं आपको बताऊ कि मैं एक तरह से यहां पर बिल्कुल शुद्ध श्रेणी का य शुद्ध श्रेणी का मनुष्य बनके मैं आपके सामने आया हूं ये क्योंकि मुझे लगा की अगर व वो आपके तर्क पर रे नहीं उतर रहे हैं इसका मतलब आपके पास एक उनसे अच्छा कोई तरक होगा तभी आप उनके तक को काट पा रहे हैं और यही से मेरी जिज्ञासा हुई की यह सवाल मुझे आपसे पूछना चाहिए हो सकता है कि मुझे इसका बहुत अच्छा एक जवाब मिल जाए जो मेरी भी मतलब जो उसके आधार पर पूरा खड़ हो सके तो सवाल मेरा जै की आपने बताया य क्या आवश्यकता है जो व लेते हैं आवश्यकता की चलो आवश्यकता आप मान सकते
00:03:48:04 है पहली बात तो वही है अगर अवतार लेने की आवश्यकता पड़ती है तो किन परिस्थितियों में प नहीं नहीं आपका मत क्लियर पूछ रहा हभी मैंने जब देना शुरू नहीं किया है अच्छा आप थोड़ा सा अपना जो अभी भी आप ब्लूटूथ डिवाइस से ही बात कर रहे हैं हाय इयरफोन है क्योंकि दूर हो जाएगा कमरा तो उसको थोड़ा नजदीक करू मोबाइल को देखता हूं आपकी आवाज में ना इको आ रहा है थोड़ा सा एक ऐसा साउंड आ रहा है जो नॉर्मल नहीं है तो आप ब्लूटूथ डिवाइस की बजाय किसी अन्य तरीके से अगर बात करने का प्रयास करें इसको बंद कर दो सीधा करता हूं फिर सीधे करिए बार बंद कर
00:04:38:03 हा अभी बोलिए हां अब बताइए आवाज आ रही है सही हा अब ठीक है उससे थोड़ा अजीब टाइप की आ रही तो जी जी आप बता ईश्वर जो है सबसे पहली बात ये है कि हमने कभी यह मामला उठाया ही नहीं कि ईश्वर अवतार लेता है कि नहीं लेता है है ना लेता है कि नहीं लेता यह तो बाद की बात है हमारा सवाल यह होता है कि ले सकता है या नहीं उसमें कैपेबिलिटी है कि नहीं क्षमता है कि नहीं तो इस बात का घुमा फिरा करके कुल मिलाकर जवाब नहीं दिया जाता है क्योंकि उनके यहां पर वह मन मानते नहीं है कि वह ले सकता है मगर नहीं ले सकता है बोलने में उनको प्रॉब्लम होती है नहीं ले सकता जैसे बोल देंगे तो उनको ये मानना पड़ जाएगा कि हमारा ईश्वर वादित है ईश्वर को जिस रूप में हम मानते हैं तो अब यह तो रही बात यह ले सकता है कि नहीं तो बिल्कुल क्योंकि वह सर्व सामर्थ्य वान है इसलिए वह ले सकता है अच्छा इसमें य बात आती है कुछ तर्क दिए जाते हैं ना लेने वालों के द्वारा वो कहते हैं जो सब जगह है वो एक जगह कैसे आ सकता है इसका अर्थ क्या हुआ कि वह अवतार को इसलिए नहीं मान रहे हैं ईश्वर के अवतार पर विश्वास इसलिए
00:05:53:13 नहीं कर रहे हैं क्योंकि वो तार्किक सिद्ध नहीं हो रहा है है ना कि जो सर्वव्यापक है एक देशीय कैसा हो सकता है जैसे वो महिला मात्र शक्ति थी जो आर समाज की निष्ठा अलंकार जिनको आधुनिक गर्गी भी कहा गया बाद में तो उन्होंने भी य बात कही थी जो सर्वव्यापक है व एक देशीय कैसे हो सकता है तो इसमें दोनों तरीके हमारे पास तर्क भी है और हम लोग उसको प्रायोगिक दृष्टि से समझा भी सकते हैं प्रायोगिक दृष्टि से कैसे समझा सकते हैं कि ईश्वर जब हमने माना कण कण में है कण कण में ईश्वर है हा और इतना सभी लोग मानते हैं कि जो जीव है वो अज्ञानी है जो फस गया है तो पहली बात तो यह हो गई कि अज्ञानी उसको इसलिए कहा जा रहा है उनके भी अनुसार जो लोग नहीं मानते हैं बिल्कुल क्योंकि वो कुछ ऐसा देख रहा है जो वास्तविक नहीं है उसी को तो अज्ञान कहेंगे जो वास्तविक नहीं है तो जब ईश्वर उसको ऐसा कुछ दिखा सकता है जो वास्तविक नहीं है तो वो उसको ऐसा चित्र भी तो दिखा वो जो वास्तविक नहीं है जैसे मान लीजिए कि मैं चेयर देख रहा हूं ठीक
00:07:08:15 है अब चेयर से चेयर वास्तविक नहीं है और साथ ही साथ अगर यहां की दृष्टि से भी देखा जाए जिस दुनिया को मैंने स्वीकार किया हुआ है इस चेयर में ईश्वर की ईश्वर भी नहीं है व्यवहारिक दृष्टि से ईश्वर की ईश्वर का भी नहीं है मगर फिर भी इसमें ईश्वर तो है तो यह कैसा ईश्वर जिसमें ईश्वर की ईश्वर मुझे फील नहीं हो रही चेयर से तो इसको कहा गया सावरण ब्रह्म ब्रह्म का वो रूप ईश्वर का वो रूप जिस पर आवरण चढ़ा हुआ है उसको आप अविद्या का कह ले अज्ञानता का कह ले आवरण चढ़ा हुआ है वहां भी ईश्वर है वहां भी ईश्वर की चेतना है मगर उस पर आवरण चढ़ा हुआ है किसका अविद्या का अज्ञान का तो यानी कि हम य जो पूरी सृष्टि देख रहे हैं पूरी दुनिया पेड़ पौधे सब कुछ इस पर एक आवरण चढ़ा हुआ है ईश्वर सब जगह विद्यमान है मगर उस पर एक आवरण चढ़ा हुआ है किस बात का अज्ञानता का अविद्या का अब क्या होता है कि मान लीजिए एक चादर है अज्ञानता की जिसमें कि हम सावरण ब्रह्म को देख रहे हैं सावरण अज्ञानता का आवरण उड़ रखा है ब्रह्म ने तो अब इस चादर में
00:08:23:16 एक चीरा लगाया जाए मानवीय आकृति के अनुसार उसको काटा जाए तो ये का ये चादर काट के जितनी जगह से हमको यह सावरण ब्रह्म ना दिख करके पर्दे के उस तरफ ब्रह्म उस तरफ वाला जो ब्रह्म दिखेगा है ना वो अवतार है वो जो चीरा लगा है अविद्या में अविद्या रूपी चादर में जो चीरा लगाया हमने मानवीय आकृति के रूप में वह जो है अवतार होता है भगवान का इसको और सरल कर लेते हैं कि हम माया रूपी संसार के कक्ष में बंद है ठीक है या अज्ञानता रू संसार के कक्ष में बंद है अभी भी इसके अंदर भी हमको वो ईश्वर होता दिख रही है आकाश इसके अंदर भी है मगर हमको आकाश फील नहीं हो रहा है क्योंकि हमने एक कमरे में हम लोग बंद है अब हम एक खिड़की खोलते हैं उससे हमें आकाश दिखाई देता है जो इस कक्ष के बाहर का आकाश वो आकाश हमें दिखाई देता है वो आकाश का अवतार है तो यह तो हो गया प्रायोगिक दृष्टि दूसरी बात ये आती है हमने एक बात वो तर्क से निकाल ली कि जब जीव जीव को ईश्वर ऐसी चीजें दिखा सकता है जीव ऐसी चीजें देख सकता है जो वास्तविक नहीं है जिसके कारण जीव को अज्ञानी कहा जा रहा है जिसके कारण जीव को
00:09:38:20 बंधन में बताया जा रहा है जिसके कारण उसको अभी जो चित की उपाधि है सत चित आनंद में से अभी चि है वो उसके पास नहीं है जिसके कारण इसका अर्थ है कि वो कुछ ऐसा देख रहा है जो कि रियलिटी नहीं है तो फिर जब जो रियलिटी नहीं है जब भगवान हमको कुर्सी दिखा सकता है जो रियलिटी नहीं है पेटी सकता है जो रियलिटी नहीं है तो वह एक ऐसी आकृति भी दिखा सकता है जिसके अंदर वह स्वयं की चेतना को जोड़े हो जैसे उसने कुर्सी दिखाई कुर्सी में अपनी चेतना को उसने नहीं रिफ्लेक्ट किया उसने पेटी दिखाई उसमें उसने अपनी चेतना को रिफ्लेक्ट नहीं किया मगर उसने एक मानव मानव ऐसा रूप दिखाया आपको जिसमें उसने अपनी चेतना को कनेक्ट कर दिया और वह आराम से आपसे व्यवहारिक रू व्यवहारिक हो गया वो ईश्वर अब दूसरी बात ये आती है कि आवश्यकता क्या है जो आपका प्रश्न था ये तो मैंने हा बताया कि वो कैसे कैसे ले सकता है एक चीज और है कि अगर आप ईश्वर को मानते हैं तीसरा तर्क तो र ही गया तो आपको किसी ना किसी जगह जाकर के मानना पड़ेगा कि ईश्वर ने कुछ ऐसे कार्य किए जो तार्किक नहीं है यह भी है किसी ना किसी जगह जाकर के आपको
00:10:53:22 ये मानना पड़ेगा कि जो ईश्वर ने कुछ ऐसे कार्य किए जो तार्किक नहीं है जै से अथुनी सृष्टि की रचना कर द इस इस बाद में करेंगे इस भी आएंगे सवाल मेरा होगा ऐसा क्यों किया हां व वो भी करेंगे वो भी करेंगे हा वो बाद में किया भी जाए क्यों किया प भी जाएंगे अच्छा सवाल तो ईश्वर ने कई कार्य ऐसे किए जो आज हम जिस जिस ज्ञान को जानते हैं विज्ञान के आधार पर वो तार्किक नहीं है जैसे कि अमनी सृष्टि की रचना यह तार्किक नहीं है आज के टाइम में और भी चीज बिना मुख के व रूपी वेद कैसे प्रदान किए तो वहां पर बिना मुख के बिना मुख के शब्द रूपी वेद कैसे प्रदान किए
00:11:41:10 बना वेद कैसे प्रदान किए अब जैसे आर्य समाज की विचारधारा को माने तो फिर उसमें भी कई जगह तर्क की कमी आ जाएगी ईश्वर तो जब तर्क की कमी आएगी तो आर्य समाज ने भी कई जगह माना है कि भा क्योंकि ईश्वर अनंत सामर्थ वान है इसलिए उससे हम यह नहीं पूछ सकते कि तुम अथुनी सृष्टि की रचना कैसे कर पा रहे हो या तुम बिना मुख के शब्द रूपी वेद कैसे प्रकट कर पा रहे हो यानी उसने भी कई अंशों में माना कि हां भाई ईश्वर के कई कार्य ऐसे हो सकते हैं जो वैज्ञानिक दृष्टि से तार्किक नहीं होते तो अब जब वो अन्य कार्यों को अब्जॉर्ब कर रहा है मथनी सृष्टि की रचना को स्वीकार कर रहा है शब्द रूपी वेद को प्रकट करने के प्रकट करने को स्वीकार कर रहा है तो फिर उसको अवतार के वादित क्यों कर रहा है या तो यह माने कि जितने जितने अतार्किक जितने बिना तर्क वाले कार्य आप स्वीकार करेंगे वह ईश्वर कर सकता है बाकी बिना तर्क वाला कार्य कोई ईश्वर नहीं कर सकता तो ईश्वर अनंत सामर्थ्य वान है केवल इस बात से ही हो जाएगा कि हां वह जन्म भी ले सकता है अब बात आती है आपकी कि ईश्वर किन परिस्थितियों में अवतार लेता है
00:12:56:22 यह आपने बात कही तो कि इसका जवाब तो है मगर जवाब देने के लिए मैं प्रमाण लाऊंगी ग्रंथ पर बात आएगी फिर उसमें ये होगा कि नहीं इसका एक मिनट थोड़ा सा मैं कहना चाहूंगा कि जब बात आप प्रमाण किसी ग्रंथ से देंगे क्योंकि आपने मेरी बात सुनी नहीं मैं वही जो आप मुझे कहने वाले मैं वही आपको बताने वाला हूं वही कह रहा हूं जब मैं किसी ग्रंथ से प्रमाण के साथ आपको बोलूंगा कि वो है अपने पास ऐसा नहीं है ग्रंथों में भी है मगर अगर आप कहेंगे इसका अर्थ ये नहीं है प्रॉब्लम यहां आएगी कि आप जो बता रहे हैं इसका अर्थ ये नहीं है इसका अर्थ तो वो है जो मैं कहूंगा फिर बात यहां से उठक के अवतारवाद से उठकर के कहां चली जाएगी कि आपने ज्ञान कहां से प्राप्त किया परंपरा है क्या है उस चली जाएगी हा वो विषयात हो जाए इसलिए अभी मैं आपको सीधे बता दे रहा हूं कि जैसे हमें यह स्वीकार करना है कि ईश्वर ने सृष्टि बनाई क्यों ईश्वर ने सृष्टि बनाई जीव को मोक्ष देने के लिए तो फिर सभी जीवों के मन में वेदों के मंत्र क्यों नहीं भर दिए डायरेक्ट हर व्यक्ति वेदों के मंत्र के साथ ही जन्म लेता क्यों उसको मेहनत करनी पड़ रही है वेदों के मंत्र तक पहुंचने के लिए क्यों क्यों क्यों बहुत सारे
00:14:11:27 हम ऐसे क्यों बना सकते हैं तो जैसे हम बिना किसी क्योंकि मान लेते उसका मन उसने ऐसे किया उसका मन उसने ऐसे किया तो उसका मन उसने अवतार लिया उसका मन उसने अवतार लिया उसका मन यूं ही और जो एक जगह तर्क दिया है उन्होंने बहुत अच्छा है वो कि आंख आंख देखती क्यों है हम आंख से कह रहे हैं कि आंख देखती क्यों है तो अब आंख देखती क्यों है तो इसमें आ जाएगा यदि आप आंख से प्रश्न कर रहे हैं कि वह देखती क्यों है तो फिर इसका अर्थ है कि आंख का देखने के अलावा भी कुछ और अस्तित्व है हो गया तो आप आंख को देखने वाला नहीं मानते जबक आंख क्या है जो देखती है तो जब आपने आंख से प्रश्न कर दिया कि आंख देखती क्यों है तो उतने अंश में आपने आंख को आंख नहीं माना तो जब आपने आंख को आंख नहीं माना तो उसके द्वारा देखा जाना भी सिद्ध नहीं हुआ तो आपका जो प्रश्न है वो आप ही ने काट दिया क्यों क्योंकि आंख के द्वारा देखा जाना सिद्ध नहीं हो रहा है तो फिर आप ये प्रश्न नहीं कर सकते कि आंख देखती क्यों है पहले आपको मानना पड़ेगा कि आंख आंख है तो आपका ये प्रश्न आप करने पर खुद ही खंडित हो जाता है तो इसी प्रकार से जो क्यों
00:15:27:03 आते हैं कि ईश्वर ने सृष्टि बनाई क्यों ईश्वर ईश्वर इसलिए क्योंकि उसने सृष्टि बनाई है अगर आप उस पर यह प्रश्न ले जाएंगे कि उसने बनाई क्यों है तो आप यह कह रहे हैं कि ईश्वर ईश्वर नहीं है तो जब ईश्वर ईश्वर नहीं है तो उसके द्वारा सृष्टि बनना भी सिद्ध नहीं होता तो जब सृष्टि बनना सिद्ध नहीं होता तो फिर आपका य प्रश्न खत्म हो गया कि ईश्वर ने सृष्टि बनाई क्यों तो इसलिए यह जो प्रश्न है अपने आप में ही खत्म हो जाता है इसके बाद जैसे मैं हूं जैसे आप है अभी आप समय बीच-बीच में कुछ ऐसे मूवमेंट कर रहे हैं जिसकी कोई आवश्यकता नहीं है कर रहे हैं ना हिल रहे हल्का सा मैं बारबार पन को पकड़ रहा हूं मैं अपने हाथों को य कर रहा हूं कोई आवश्यकता नहीं है क्यों कर रहा हूं सामर्थ्य है सामर्थ है यूं ही कर दिया इसीलिए भगवान यूं ही सृष्टि की रचना करते हैं बिना किसी आवश्यकता के यूं ही क्योंकि उनके अंदर सामर्थ्य और इसी प्रकार से व अवतार भी लेते हैं मगर अगर गीता आदि का अनुसरण भी किया जाए तो उनके अवतार लेने के पीछे अमुक अमुक उसमें कोई उनकी मजबूरी नहीं थी कि व वो अवतार ना भी लेते तो नहीं लेते तो काम ना चलता मगर उनका मन कि उनको यह कार्य ऐसे ही करना था उनका मन
00:16:42:08 तो उन्होंने ऐसे किया तो उन्होंने क्यों क्यों किया तो जो अवतार हमें प्राप्त होता है जिन अवतारों की हम पूजा करते हैं तो भगवान बताते हैं जब जब धर्म की हानि होती है तो और अधर्म की वृद्धि होती है तब तब मैं अवतार लेता हूं उन्होंने बता दिया आवश्यकता नहीं है यहां पर वो बिना उसके भी बिना अवतार के भी अपनी शक्ति के द्वारा ही वह कार्य कर सकते हैं जैसे कि वेद मंत्रों का किसी ग्रंथ में लिखा होना आवश्यक नहीं है अगर भगवान चाहे तो हर व्यक्ति की मस्तिष्क में व वेद मंत्र डाल सकते हैं डाल सकते हैं ना तो उसी प्रकार से मगर फिर भी वो एक व्यवहारिक तौर पर उनको एक वेद मंत्र देते हैं गुरु से सुनते हैं या किसी प्रकार से वो वेद जो है व्यवहारिक रूप से प्राप्त होते हैं मनुष्य के मन के साथ मन में लेकर के वेद जन्म नहीं लेता मनुष्य जबकि वो ले सकता है अगर भगवान चाहे तो तो यह भगवान के ऊपर है कि उन्होंने कुछ कार्य अवतार लेकर के कर दिए कुछ कार्य केवल सिद्ध शक्ति से ही कर दिए मगर हम उन पर ये अंकुश नहीं लगा सकते इस कारण से कि नहीं अगर उससे आवश्यकता नहीं है तो वो ले क्यों रहा है बहुत सारे सवाल खड़े हो जाएंगे वेदों में आर समाज ने कई जगह पर अलंकार माना है अलंकार क्यों लगाया अगर वो कहे कि अलंकार की आवश्यकता होती
00:17:57:08 है तो फिर हर मंत्र में क्यों नहीं लगाया अगर अलंकार की आवश्यकता होती है तो प्रत्येक मंत्र में क्यों नहीं लगाया वस्तु स्थिति यह है कि जहां जहां पर चमत्कारिक बातें हुई है जहां जहां पर आर्य समाज ने जो वेद से पहले जो अपनी विचारधारा तैयार कर ली उसके विरुद्ध जाती हुई जो बातें हुई है वेदों में उनके लिए उसने तुरंत एक मामला निकाल के रखा अवतार तो अव वो अलंकार सॉरी उन्होंने क्या किया हर जगह अलंकार भा राम जी गए अहिल्या को स्पर्श किया जो शिला में परिवर्तित हो गई थी उसको स्पर्श किया तो वो मुक्त हो गई तो वहा उन्होंने कह दिया अलंकार में कहा है उनके स्पर्श से जो श्राप से मुक्त हुई अहिल्या जी वो तो केवल एक अलंकार है जहां जहां पर चमत्कार चमत्कार वाली बातें कि जो वो है शर्मा जो देवताओं की कुतिया है वो मंत्रों मंत्र कैसे बोल रही है तोय अलंकार है कबूतर मंत्र कैसे बोल रहा है तो अलंकार तो जहां जहां पर भी उनकी जो एक उन्होंने वेदों से पहले अपना एक वो बना लिया है नियम उसके विरुद्ध जब जाने लगेंगे वेद भी तो उसमें वो वेदों को अलंकार कह देंगे अब आप
00:19:13:03 बताएं तो अभी आपने कहा कि उसका मन किया उसने अवतार ले लिया वो अवतार के रूप में आए तो उससे पहले आपने बताया था कि आवरण से ढका हुआ है जो संसार है जिन चीजों को हम देख रहे हैं वो एक आवरण ढके हुए अज्ञानता के आवरण से जो हमारी अज्ञानता है उसके आवरण से वो ढके हुए हैं आपने यह भी कहा कि जैसे यह कुर्सी है यह कुर्सी मुझे इसमें भी ईश्वर है मगर क्योंकि य आवरण से ढकी हुई है इसलिए मुझे इसमें जो भगवान जो है वो मुझे दिखाई नहीं दे रहे क क में जैसे भगवान बोला प्रकट नहीं हो रही ईश्वर प्रकट नहीं हो रही उससे फीलिंग नहीं आ रही ई नहीं हो रही तो यह जो आवरण है जिस आवरण की बात की गई है वो आवरण बुद्धि या मेरी आत्मा के ऊपर है या वह सामने वाली चीज जिसको मैं देख रहा हूं उसके ऊपर है यह आवरण कहां पर है मेरे ऊपर य आवरण है जिसकी वजह मैं नहीं देख पा रहा या फिर जो सामने चीज है उसके ऊपर व आवरण है जिसकी वजह से मैं उसके अंदर परमात्मा नहीं देख पा रहा यह मेरा सवाल है मेरी बुद्धि बुधि के पर आवरण है मतलब आवरण मेरे अज्ञानता का है मेरी बुद्धि का जिसकी व से जैसे आपने बोर बु
00:20:29:13 यह पमार्ट चीज हो गई और व्यवहारिक चीज हो गई कि वो उसके ऊपर है सामने वाले के परर परमार्थिक चीज ऐसे हो गई बता रहा परमा हो हा मैं चाहूंगा बात कर व्यवहारिक बात करें व्यवहारिक बात इसलिए करें क्योंकि मे और आपको देखने वाला जो सामने जो देख रहा है हम दोनों को उसको एक व्यवहार में आने वाली चीज की जानकारी मिले की भाई व्यवहार में क्या वो इस्तेमाल कर सकता है वो दो चीज ब आपको चीज बताऊंगा हम कि हम जो ये लाइव करते हैं वो इसलिए नहीं करते कि हम भगवान के टॉपिक्स को हम क्या कहते हैं आप क्या सोचते हैं हम क्या सोचते हैं अगर आपको हमारी किसी बात से आपत्ति होती है जिज्ञासा के लिए हम क्लासेस करते हैं जिज्ञासा के लिए हम क्लासेस करते हैं उसमें आप आ सकते हैं और ये आपकी जो जिज्ञासा है बहुत अच्छे से शांत हो सकती है मगर यहां आते हैं वैचारिक मतभेद के निमित्त जैसे अभी क्योंकि मैं आगे बढ़ रहा आपके साथ तो अब आप ये बताए मुझे कि आपको कहां पर आपत्ति है हां ये एक मतलब मुझे लगा कि अगर हम ये व्यवहारिक और जो आपने परमार्थिक दो दो
00:21:44:16 चीजों का बात किया कि एक एक बात हम व्यवहारिक में करेंगे एक बात हम परमार्थिक में करेंगे वो परमार्थिक की बजाय अगर हम व्यवहारिक बात करेंगे तो थोड़ा सा ज्यादा सही रहेगा क्योंकि एक देखिए वही मैं कह रहा हू यहां पर लोगों को मैं बता हम लोग उसके लिए लोगों को जो व चीजें हैं अलग से इनफॉर्मेटिव वीडियो भी बनाते हैं और हम लोग क्लासेस भी चलाते हैं मगर अभी क्या है यह जो जा रहा है उस तरफ जा रहा है कि जैसे एक क्लास चल रही है और उसमें आप स्टूडेंट नहीं है मगर एक जो है अपने कुछ जानने के लिए आए हैं तो हम लोग य जो सेशन करते हैं यह वैचारिक मतभेद के निमित्त से करते हैं जानने के लिए हमारी क्लासेस चलती है समझ रहे हैं तो आप अपना पक्ष रखिए यद मेरी कही हुई किसी चीज से आपको आपत्ति है तो वह आप अपना पक्ष रखें हा वो मैंने आपको बता दिया कि मुझे इस चीज से आपत्ति थी तो वो मैंने आपको बता दिया तो मतलब हमारी अज्ञानता की वजह से हम सामने वाली चीजों को नहीं देख पाते ठीक है ये सही क्लियर हो गया आपने बता दिया कि उनका मन था तो उन्होंने अवतार लिया अब यहां पर ये चीज है कि उनका जब मन था उन्होंने अवतार लि पहले पहले अब आप अपना मत वो करिए क्लियर कि आप मानते हैं अवतार को नहीं मानते हैं
00:23:00:02 मैंने आपको बताया कि मैं आपके सामने इस टाइम प जीरो होके बैठा हूं शून्य नहीं तो वैचारिक मतभेद तो तब होगा ना जब आपके पास कुछ होगा कुछ परसेंटेज होगी कि भाई ये चीज मुझे नहीं मैं नहीं मानता वो बताइए देखो मैं मैं ये कह रहा हूं कि जब मैं आपके सामने आया आपसे कुछ पूछने के लिए और क्यों आया पूछने के लिए आप पूछने के लिए आप क्लास में आ सकते हैं आप समझिए मेरी बात को मैं जो कह रहा हूं ये ये ठीक है आप सही कह रहे क्लास सकते सहमति है वो आप यहां बताए नहीं मैं सहमति असहमति की जब बात करते क्योंकि देखो मैं जानकारी के लिए आया और क्यों आया आप आप कह रहे क्लास में आ सकता हूं मुझे भी पता है कि मैं आप जहां प जो भी आपका सेंटर है हो सकता आपने जब नहीं नहीं आपने जब किया होगा तो आपको एक लिंक मिला होगा आवान पाठ्यक्रम से जुड़ने के लिए उसमें यदि आप फॉर्म भर देते तो आप कल की क्लास हुई थी उसमें भी आते अगले हफ्ते शनिवार को आएगी उसमें भी आते तो उसमें असल में क्या है बात ये है ये पर हम लोग अगर यह जो क्लास वाली बातें हैं जो कि उतनी प्रासंगिक नहीं है जिसको सुनने के लिए लोग बैठे हैं तो फिर इसकी जो रीच आदी होती है पब्लिक तक पहुंचने की व व्यर्थ हो जाता है
00:24:15:08 कम हो जाता है ज्यादा से ज्यादा जन समाज को जो हमारे वो होते हैं उसका प्रभाव पड़ता है तो एक इसलिए मर्यादा बनाई कि हम जो वैचारिक मतभेद के निमित्त बात होगी व यहां करेंगे और जो जानने जिज्ञासा की बात होगी व हम क्या कहते हैं वहां करेंगे अब अपनी बात कह दीजिए क्योंकि आप आए हैं आप बोलिए मतलब आपको कुल मिलाकर के असहमति नहीं है कोई भी या आप थोड़ी देर के लिए ये कह रहे हैं कि असहमति नहीं है हां अभी मैं य कह रहा हूं कि असहमति नहीं क्योंकि अभी एक बात प असहमति थी तो मैंने आपको बता दी कि मुझे इस बात प असहमति है बाकी अभी तक मुझे कोई असहमति नहीं है आपने जो कहा कि उनका मन था अवतार लेने का तो उन्होंने अवतार लिया यहां प मुझे कोई असहमति नहीं है सहमति है मगर यहां पर एक असहमति जो यह है कि आपसे असहमति नहीं है हालांकि कि उन्होंने अवतार लिया आप क्या वो अवतार लेकर कुछ ऐसे कार्य भी करते हैं कि जिनसे दुनिया के को एक दूसरा गलत एग्जांपल जाए कि भाई ऐसा व्यवहार अगर भगवान ने किया था तो फिर जब भगवान ऐसा व्यवहार कर सकते हैं तो हम क्यों नहीं कर सकते क्या वो इस तरह के कार्यकलाप भी करेंगे इसको आप समझिए कि भगवान अवतार लेकर के कर रहे हैं उसको छोड़ दीजिए दुनिया में जहां पर भी कुछ भी हो रहा है
00:25:30:14 गलत या अच्छा उसमें भगवान की मर्जी शामिल है कि नहीं अगर हम कहते हैं नहीं है तो उसकी सामर्थ कम हो गई कट गई तो भगवान तो वहां पर भी है जहां पर व साकार रूप से नहीं है और कहते हैं कण कण में ईश्वर है अद्वैत को मान लीजिए तो ईश्वर ही कल्पित हुआ है अद्वैत विचारधारा को अगर मान लेते हैं तो ईश्वर ही कल्पित हुआ है तो इसका मतलब क्या हुआ कि जहां पर हत्या हो रही है वो भी ईश्वर है और जहां पर जो है हत्या नहीं हो रही है पुण्य हो रहा है वो भी ईश्वर है तो फिर फायदा क्या हुआ ऐसे ईश्वर का तो इसको कहा गया कि ईश्वर ही सब जगह है सब जगह विद्यमान है मगर हमारे लिए अनुकरणीय अनुसरण ईश्वर के वह रूप है जो हमारे मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करें वेद आदि शास्त्र सम्मत धर्म का अनुपालन करवाने में सहायक हू धर्म की सिद्धि में सहायक हूं तो हमारे लिए ईश्वर के रूप में पूजनीय भजनी है वही रूप है ईश्वर के जो इस र हमें ले जाए कहां वेदों की ओर मोक्ष की ओर भगवत प्राप्ति की र अब जैसे इसको समझ लेते हैं दूसरा जैसे हमने कहा कि ईश्वर कण कण में है तो ईश्वर तो मल में भी है ईश्वर तो हर जगह
00:26:45:14 लास्ट में भी ईश्वर है तो फिर हम केवल ईश्वर के उस रूप की क्योंकि वो हमारे फिर जाता है जो हमारे वेदा शास्त्र सम्मत जो ईश्वर के जो ऐसी व्याख्या की गई जहां पर ईश्वर को उस तरीके से साकार रूप में बजा जा सकता है तो वही अब इसको और समझ लीजिए जैसे पानी है पानी नमी के रूप में पूरे वातावरण में मौजूद है पूरे वातावरण में मगर हमारी प्यास कौन सा पानी बुझाएगा जो हमारे गिलास की या चुल्लू की या मुंह की सीमा में आता हो तो इसी प्रकार से ईश्वर सब जगह है ये हमारे शास्त्रों ने ही बता दिया कि ईश्वर सब जगह है मगर हमारी प्यास कौन बुझाएगा हमारे लिए हमारे लिए ईश्वर का कौन सा रूप ग्राह है ग करने लो योग्य है जो वेदा दि शास्त्रों की सीमा में आता हो जैसे कई बार एक कुत किया था एक आर्य समाजी है उसने कुतर किया उसने कहा यह जो अभ मुक्तेश आनंद जी है ज्योतिष पीठ के जो शंकराचार्य के रूप में जाने जा रहे हैं वर्तमान में तो उन्होंने किसी वीडियो को इनके पास प्रश्न आया था मूर्ति पूजा को लेकर के तो मूर्ति पूजा को लेकर के उन्होने साकार भगवान की कहां कहा बात हो रही भगवान के साकार
00:28:00:16 स्वरूपों की बात कहां हो रही है वो उन्होंने बता दिया भाई देखो यहां साकार की बात हो रही है मूर्ति पूजा भी हो हालांकि वेदों में ऐसे भी मंत्र डायरेक्टली जो बोला जा रहा है कि हे देवता इस पत्थर में आकर के निवास करो इस मूर्ति में आकर निवास करो 100 हज साल तक ऐसे भी मंत्र है अब वो बात आ जाएगी कि उसकी व्याख्या अलग कर दी गई अलंकार कह कर के नकार दिया गया वो बात अलग है मगर जब उन्होंने ऐसा कहा कि ईश्वर कण कण में है तो वो जो कुतर्क था उसने कुतर्क वाला वीडियो बनाया उसने कहा ऋषि वाज नाम का चैनल है उसका उसने कहा कि अगर ईश्वर कण कण में है इसलिए तुम भगवान की पूजा कर रहे हो तो जीसस की क्यों नहीं करोगे जीसस की क्यों नहीं करोगे मोहम्मद की क्यों नहीं करोगे कण कण में है तो उसकी भी पूजा करो बात वही आ जाती है मैं कह रहा हूं इस दुनिया में जो भी कुछ है सब में भगवान है अगर सब में भगवान है तो इसका मतलब दुनिया में जो भी कुछ शब्द है भगवान का ही नाम है कोई भी शब्द है भगवान का ही नाम है क्योंकि हर जगह ईश्वर है उस नाम में भी भगवान है क्योंकि कण कण में भगवान है उस नाम में तो फिर आप एक प्रणव को ही लेकर क्यों चल रहे हो क्यों प्रणव
00:29:15:18 को ही झंडे में लगाते हो इसका मतलब क्या हुआ वही वाली बात हो गई कि ईश्वर तो सर्वत्र विद्यमान है मगर हमारे लिए अनुकरण करने योग्य ईश्वर का वह रूप है जो वेदा दि शास्त्रों की सीमा में आता हो यानी कि पानी का वह रूप जो हमारे लिए व्यवहारिक हो जाए जैसे कि सूर्य से आने वाली जो ऊर्जा है जो हमें अंत गत्वा चाहिए इंटेस्टाइन को उसकी आवश्यकता है कैलोरी के रूप में वह सर्वत्र विद्वान है मगर हमारे लिए वो कैसे हम प्राप्त कर पाते हैं उसे जो हमारे व्यवहार में आ जाए बर्गर पिज्जा रोटी पुलाव उस व्यवहारिक रूप में जब वो आ जाए वहां उसको खा कर के हमारे इंटेस्टाइन में सूर्य से आने वाली ऊर्जा पहुंचती है तो इसी प्रकार से इसी प्रकार से जो उनका कुतर्क था कि भाई अगर ईश्वर कण कण में है सभी नाम ईश्वर के ही है दुनिया में इसकन वाले भी तर्क देते हैं कि दुनिया में सभी नाम भगवान के बहुत से नाम है तो अगर वो हरे अल्लाह हरे अल्लाह वो अल्लाह और कृष्ण को एक कहा जा रहा तो क्या दिक्कत है तो बात वही आ जाती है अल्लाह जो है वो हमारे शास्त्रों द्वारा वर्णित नहीं है हमारे शास्त्रों का ऐसा अर्थ नहीं निकाला जा सकता जो कुरान के द्वारा प्रतिपादित होने
00:30:30:19 वाले ईश्वर के रूप में ख्या पित हो जाए इसलिए हम उसका नाम नहीं लेंगे वह नाम भी उस नाम में भी ईश्वर है ऐसा नहीं है मगर वह अव्यावहारिक ईश्वर है वही और व्यवहारिक कौन सा है जो हमारे वेदा दि शास्त्रों की सीमा में बताए तो इसका मतलब वही है कि जिसको हमने सीमा में बांधा कुछ शब्दों की सीमा में जो कि हमको शास्त्रों से मिले हैं या उन शब्दों की सीमा या उस परिभाषा में जिसको हमने बांध दिया या जिस उसको परिभाषित किया गया वही ईश्वर हमारे अनुकरणीय है या हम उसी ईश्वर को वहार तौर पर ले सकते हैं का रूप ईश्वर नहीं ईश्वर का वह रूप अनुकरणीय जो वेदा शास्त्रों की सीमा में हो ईश्वर का वह रूप अनुकरणीय इसको आपको क्लियर कर दू अगर हम ईश्वर के बाकी के रूप को जानेंगे ही नहीं सभी नियम को तोड़ के रख देने वाला तो ईश्वर की ईश्वर सिद्ध नहीं होगी और जब ईश्वर की ईश्वर सिद्ध नहीं होगी तो उसके प्रति निष्ठा सिद्ध नहीं होगी जब निष्ठा सिद्ध नहीं होगी तो अज्ञानता का वो हरण कैसे होगा जब ईश्वर में मन ही नहीं लग रहा है मतलब ये है कि हम उसको सिद्ध करने के लिए ईश्वर को अपने शास्त्र की जो सीमा है उससे बाहर जाक
00:31:45:28 भी उसको सिद्ध करेंगे वो सीमा से शास्त्र ने ही बताया है वो भी बताया है ईश्वर ने ईश्वर ने जब कहा वो अनंत है जब ईश्वर ने ये कह दिया वो अनंत है तो वो शास्त्र के बाहर भी ईश्वर है फिर ईश्वर ने कहा कि वो ऐसा ऐसा रूप लेते हैं ऐसा ऐसा करते हैं विष्णु रूप बताया शिव रूप बताया गणेश रूप बताया भगवती रूप बताया रूप लेते हैं कि वो वस्तुत वो निर्गुण है वो ना स्त्री है ना पुरुष है ना कुछ है देवी भागवत में आया कुछ नहीं है वो मगर वो सृष्टि की रचना करते समय ऐसा ऐसा रूप लेती है तो जो रूप बताए गए वो रूप हमारे लिए अनुकरणीय जैसे कि इसको ऐसे समझ लीजिए जैसे हम जानते हैं हनुमान जी जी को ठीक है हम हनुमान जी की व्याख्या है वाल्मीकि रामायण के अनुसार वो बाल ब्रह्मचारी थे ठीक हम तो इस तरीके से हनुमान जी का विवाह होना सिद्ध नहीं होता उनके द्वारा स्त्री का जो स्पर्श है स्त्री को स्त्री संघ उनके द्वारा सिद्ध नहीं होता मगर जब भगवान श्री कृष्ण ने विराट रूप दिखाया तो विराट रूप में एक मुख उनका बताया जाता है हनुमान जी का भी था यानी उन्होंने बताया मैं ही हनुमान हूं और अगर वही अनुमान है तो भगवान श्री कृष्ण ने तो स्त्रियों को
00:33:00:28 छुआ स्त्री संग हुआ उनका य सिद्ध है तो फिर उस रूप में फिर बजरंग बली को भी हमें मानना पड़ेगा कि हां भाई स्त्री संग कर सकते हैं तो एक रूप हो गया वाल्मीकि रामायण के अनुसार निश्चित रूप कि वाल्मीकि रामायण के अनुसार बजरंग बली जो है वोत्री गमन नहीं करते और एक रूप हो गया कि वो कुछ भी कर सकने वाले ईश्वर है वो कुछ भी कर सकते हैं तो अब क्या हुआ कि जो कुछ भी कर सकने वाला रूप है जब वो कुछ भी करेंगे जब वो हनुमान जी की सीमा के बाहर वाला हनुमान जी के ही रूप में आकर के जब वो करेंगे तो हम उनकी बात नहीं मानेंगे हम कहेंगे तुम हनुमान नहीं हो आप बहरूपिया
00:33:37:08 का पालन नहीं करेंगे तो हम यह कहने लगेंगे कि आप हनुमान नहीं हो या फिर इतने अंश में हम आपको नहीं मानते जैसे बुद्ध बुद्ध भगवान विष्णु के अवतार माने गए यज्ञों की रक्षा के लिए उन्होंने वो बुद्ध अलग है जो गौतम बुद्ध वाले वो एक अलग चैप्टर खुल जाएगा मगर जो सिद्धार्थ जो इनके बौद्धों के जो बुद्ध है वो अलग है मगर जो हमारे बुद्ध है विष्णु भगवान के अवतार जिनको माना गया तो विष्णु भगवान के अवतार ने यज्ञों की रक्षा के लिए यज्ञों में अनाधिकृत व्यक्तियों को दूर हटाने के लिए व अवतार लिया तो जब उन्होंने यज्ञों का खंडन किया उतने अंश में तो लोगों ने उनको नकार दिया उनको भगवान माना मगर उनको नकार दिया ना तो उनको फॉलो किया ना ही हम लोग उनको उस तरह से लेते जैसे राम कृष्ण आदि को लेते हैं तो ऐसे ही हनुमान जी के रूप में ही ईश्वर अगर हनुमान जी के विरुद्ध आचरण करने लगेंगे तो क्योंकि रामायण है जो उसके अनुसार वाल्मीकि वो बाल ब्रह्मचारी है तो हमारे लिए ग्रहण करने योग्य क्या हुआ हनुमान जी तो यही है व्यवहारिक हनुमान जी यही है व्यवहार और परमार्थ का यही अंतर है परमार्थ से कुछ भी कर सकने वाले हैं व्यवहारिक हनुमान जी जी बताए तो क्या हम इनको जो हमारा असली जो ईश्वर है जो असली भगवान है जिसको कि अनलिमिटेड
00:34:52:18 बोला गया कि कुछ भी करने में सक्षम है और जो सब कण कण में है तो क्या हम इन को एक छाया के तौर पर ले रहे हैं एक तरह से उनकी छाया जैसे या चित्र जैसे भगवान का मान ले उस तौर पर हम इसको ले रहे हैं कुछ लिमिटेशन के साथ कुछ लिमिटेशन के साथ आपका प्रश्न क्लियर नहीं हो रहा है हां मैं ये कहना चाह रहा हूं कि भगवान तो अनंत है भगवान अनंत है उनको किसी शब्द की सीमा में किसी तस्वीर के तौर पर बनाकर या किसी तरह से उसको बांधा नहीं जा सकता हम या बांध के उसको समझा नहीं सकते वो अनंत है यही आप कहना चाह रहे हैं और जो हम आकार देख रहे हैं जो कि हमारे श्री राम जी के तौर पर जो आए थे श्री के न अनंत तक पहुंचने का रास्ता बताया कि व्यक्ति की जो मूल इच्छा है वह खुद है अनंत हो जाने की असतो मा सद गम तमसो मा जति गम मृत मतम गम व्यक्ति की जो मूल इच्छा है जीव की चाह का मूल इच्छा ही यही है कि मैं अनंत हो जाऊ चित सच्चित आनंद सत का मतलब जिसमें कभी बदलाव ना आए सनातन सत्य हो शाश्वत सत्य हो चित जहां पर कहीं खंडन ना हो ऐसा कुछ ना हो जो मुझे ना पता हो और
00:36:07:25 आनंद ऐसा आनंद जिसकी कोई सीमा ना हो जो कभी खत्म ना हो बूढ़ा ना हो यह ना हो तो व्यक्ति की मूल इच्छा तो यही है कि वो वो हो जाए मगर उसके लिए जैसे धरती पर गिरा हुआ व्यक्ति धरती का ही सहारा लेकर के खड़ा होता है तो उसी तरीके से भेद का निर्वाह करते ही अभेद की होती है तो यह जो अनंतता वाला ईश्वर है यह व्यवहारिक नहीं है यह व्यवहारिक नहीं है यह अनंतता वाला ईश्वर वेदा आदि शास्त्रों के द्वारा आपके लिए व्यवहारिक होने बनाया जाता है या अब यह जो जैसे अज्ञानता कहा गया यह सब अज्ञान है तो वेद भी तो अज्ञान हो गए एक कुतर्क आता है यह आता है इसन की तरफ से कि भाई वेद भी तो अज्ञान हो गया हां हो गया मगर यह वेद का वो रूप है जो ब्रिज का काम कर सकता है जैसे कि यह अज्ञानता का व रूप है जो हमारे लिए ब्रिज का काम करेगा हमको इससे बाहर ले जाने वाली माया है माया माया यह भी है अविद्या यह भी है क्योंकि इसमें हमें दिखाई दे रही है मगर यह हमारे क्या कहते हैं माया का वो रूप है जो माया को कनेक्ट करेगा अविद्या को कनेक्ट करेगा विद्या से इसको ऐसे समझ लीजिए जैसे
00:37:22:27 कि पृथ्वी गोल है बाहर से देखिए सेटेलाइट के द्वारा तो गोल है मगर हम लोग खुद अपनी आंखों से देखें कोई भी बय तरीके से ना देखे तो पृथ्वी चपटी है हम लोग उसके साथ चपटे पन का व्यवहार करते हैं अब हमारा हमारा उद्देश्य है कि हमको जो है यहां से मुक्त होना है पृथ्वी की गोलाई को देखना है तो कैसे देखेंगे हम कोई सेटेलाइट बनाएंगे स्पेसशिप बनाएंगे कि हम पृथ्वी की गोलाई को देख सके ठीक है वह जो सेटेलाइट बना रहे हैं हम उस सेटेलाइट को बनाते समय हम किसका सहारा ले रहे हैं पृथ्वी की गोलाई का या चपटे पन का धरती का धरती चपटी है उसी साती धरती के चपटे पन का जब हम वो बना रहे होंगे सेटेलाइट गाड़ी चलाएंगे मोटरसाइकिल चलाएंगे तो चपटे पन का ही सहारा लेंगे जबकि चपटा पन तो गलत था मगर उसका सहारा लिया तो ये जो चपटा पन जिसका हम सेटेलाइट के लिए उपयोग कर पा रहे हैं ये ब्रिज का काम कर रहा है स्पेसशिप का काम कर रहा है तो इसी तरीके से जो अनंत ईश्वर है वो हमारे लिए व्यावहारिक नहीं है वेदा आदि शास्त्रों के द्वारा वो व्यावहारिक होता है जिससे कि उसका निर्वाह करके उस अनंतता वा ईश्वर को प्राप्त कर सके जी अब मैं कहूंगा कि आप कुछ अपना अगर वैचारिक मतभेद हो तो उसको रखें वरना मैं आपको कहूंगा कि आप क्लास में देखिए मुझे मुझे ऐसा लगता है
00:38:37:28 कि आप वैचारिक मतभेद की बारबार बात करके वो क्योंकि लोगों को इंटरेस्ट आता है थोड़ा लड़ाई में मैं नहीं लड़ाई की बात नहीं हैय हमने एक सिस्टम बनाया है कि यदि आपको कोई जिज्ञासा है तो आप क्लास में आए अगर आपत्ति या असहमति है तो यहां अब वो मर्यादा जो है भंग हो रही है देखिए क्या होता क्या है मुझे आपका नहीं पता हालाकि मुझे आपका रूल नहीं पता कि आपका नियम क्या है कि आप किस नियम से आपने जो फम भरा था उस फॉर्म का नाम क्या था उसम जो आपने फॉर्म भरा था उस फॉर्म का नाम क्या था उस फम फम मुझे अ याद नहीं हैद निम उसका नाम था वैचारिक मतभेद के निमित्त चर्चा क्योंकि अभी तक तो मैं आपके विचार से सहमत हूं जहां पर मुझे ल अब आप देखिए मैं काफी कुछ बोल चुका हूं और अब आप अपना अगर कोई मतभेद है तो वो प्रस्तुत करें मैं वही कहने जा रहा हूं आपको जी तो आपने बताया कि मैं आपसे जो पूछ रहा था म मतभेद ही था मेरा वो आप मतभेद मान के चल सकते हो उसको कि ईश्वर अनंत है प्रूव हो चुका है आप भी बता रहे मैं मान चुका हूं
00:39:53:00 कि ईश्वर अनंत है भगवान अनंत है उसकी कोई सीमा नहीं है हर कण कण में वो बसा हुआ है आपने बोला कि वो व्यावहारिक तौर पर आता है अवतार के रूप में आपने ये कहा तो क्या मैं इन अवतार जो अवतार हुए हैं चाहे उसका कोई भी नाम दे दे हनुमान जी अगर मान लो या शिव जी श्री कृष्ण जी या श्री राम जी जो भी अवतार हुए हैं क्या मैं इनको एक उनकी छाया मान के चलू या पूर्णतः एक तरह से पूर्ण भगवान के तौर पर मान के चलू ये मैं मैं बताता हूं मैं बताता हूं देखिए पहली बात तो येय आ जाती है समझ गया आपका क्वेन क्या है बहुत अच्छा क्वेन बहुत अच्छा क्वेश्चन है मैं समझ गया अब देखिए पहली बात य आ जाती है कि अभी जैसे मैंने आकाश का उदाहरण दिया था बिल्कुल आकाश का उदाहरण दिया था तो उसमें खिड़की है खिड़की अब जो खिड़की के साइज से जो आकाश लिख रहा है वह पूर्ण तो है नहीं हा पूर्ण आकाश तो कुछ और है खिड़की से तो उसका केवल एक अंश दिख रहा है तो अब हम उसे माने कि ना माने ये आर समाज की तरफ से कुतर्क आ सकता है ये वाला ये आता है एक जगह किया भी था कमेंट हा तो अब यहां यह बात आती है कि यदि
00:41:08:13 ईश्वर दुनिया में कुछ भी कर रहा है तो व पूर्ण ईश्वर ने किया ही नहीं है ईश्वर ने पृथ्वी बनाई मान लीजिए ईश्वर ने पृथ्वी बनाई ईश्वर ने पृथ्वी बनाई तो उसने क्या किया भाई मिट्टी के कण इधर उधर एक मोटा मोटा बोल रहा हूं मिट्टी के कण इधर उधर आकाश गंगा में टल रहे ठीक है ईश्वर ने अपने निश्चित अनुपात को कंट्रोल करते हुए उसकी रचना की अगर जो सर्वव्यापक ईश्वर है वह हरकत करता उसको संगठित करने के लिए तो क्या हो पाता सब जगह एक ही जैसी प्रक्रिया होती तो एक निश्चित आकार में पृथ्वी बन पाती तो क्या हम यह माने कि पृथ्वी को पूर्ण ईश्वर ने नहीं बनाया हा क्योंकि ईश्वर अपनी इच्छा से अपने आप को कंट्रोल करके आपको दिख रहा है इसलिए उसको पूर्ण मानना मानना पड़ेगा ये पूर्ण
00:42:04:09 है हा दस दूसरा तर्क ले लेते दूसरा तर्क ले लेते हैं मैं अपनी बात खत्म कर लू तब आप बोलिएगा दूसरा तर्क ले लेते कि पृथ्वी के साथ जब पृथ्वी चपटी नहीं है तो हम उसके साथ चपटे पन का व्यवहार जो कर रहे होते हैं वो यह समझ के कर रहे होते हैं कि पृथ्वी गोल है या चपटी करके समझ के कर रहे होते हैं हमको मालूम है पृथ्वी गोल है मगर जब हम उसके साथ व्यवहार कर रहे होते हैं तो हमारी निष्ठा उसके चपटे पन में होती है या गोल में होती है देखिए जब मैं यहां पर बैठा हूं अभी मैं एक चपटी धरती पर बैठा हूं कक इसका इतना हिस्सा तो हमें यह मालूम होते हुए भी हमें यह मालूम होते हुए भी कि वस्तुतः पृथ्वी गोल है हमारी निष्ठा उसके चपटे बद में है हमारे हमें ये मालूम होते हुए हमारे मान यही तो बात है व्यवहार और परमार्थ यही बात है यही जनजन को पहुंचाना है तो हमारे को मालूम है कि वास्तविकता का स्वरूप क्या है पृथ्वी का मगर पृथ्वी के उस स्वरूप तक पहुंचने के लिए हमको पृथ्वी के इस स्वरूप में अपनी निष्ठा को लाना होगा तो सत्य क्या क्या करें तो उसके लिए कहा गया अचिंत जान ले मगर अब उसका चिंतन मत कर अब
00:43:19:19 उसके बारे में मत सोच क्योंकि अगर सोचेगा तो तेरा यहां का व्यवहार बिगड़ने लगेगा जानना इसलिए आवश्यक है जिससे कि की सर्व सामर्थ पता चले जानना इसलिए आवश्यक है कि पृथ्वी का गोलाई का पता नहीं लगेगा तो तुम उसे प्राप्त करने की आवश्यकता क्या रहेगी तो आवश्यकता है मगर व्यवहार में उसे नहीं लाना यही दिक्कत होती है कई बार लोग कहते हैं अरे मैं भी ब्रह्म तू यह हमारा व्यवहारिक सत्य नहीं है मैं भी ब्रह्म हूं त भी ब्रह्म है यह प्राप्ति का विषय है यह प्राप्त करना है अभी तो यही है कि राम जी अलग है जब यहां व्यवहार में हम लोग इसको मान के जैसे नैनम चिंति सण नैनम दती पावक ना चैनले मारता आत्मा को कोई नहीं कुछ कर सकता आत्मा का टॉपिक हो जाएगा अभी मैं आपको उदाहरण ही दे रहा हूं मैं आपको उदाहरण दे रहा हूं अपने टॉपिक से मैं जाऊंगा नहीं चिंता मत करिए तो क्या हुआ आत्मा को कोई कुछ नहीं कर सकता यह सच्चाई है कोई कुछ नहीं कर सकता हमारा मौलिक स्वरूप आत्मा ही है फिर भी अभी हमारी और कोई थप्पड़ घुमाएगा तो हमारी पलक झपके गी तो क्या हुआ कि आत्मा की वो जो सच्चाई है वो प्राप्त करना है आपको वहां तक आपको पहुंचना फिलहाल आपको वह चीज आपने थ्योर कली जान ली है मगर अभी आत्मसात नहीं हुआ है तो अभी आत्मसात करने
00:44:34:19 तक की जो यात्रा है उस दौरान आपको डर भी लगेगा आपकी पलक झपके गी आपकी अगर कोई घुसा मारेगा तो वह सब चीजें आपके साथ होंगी उसी प्रकार से जो भगवान का जो वो वाला स्वरूप है उस तक पहुंचने के लिए भगवान के जोय स्वरूप है जो वेदा श शास्त्रों की सीमा में है उनका अनुकरण आवश्यक है मगर यह भी नहीं कह सकते कि उस रूप को जानो ही मत जानेंगे नहीं तो इधर करण क्यों करेंगे यही यही दुनिया में जो धर्म और अधर्म को लेकर के या धर्म और विधर्मी बने ईश्वर को लेकर के इतनी सारी जो कवायत है इस व्यवहार और परमार्थ को ना जानने के चक्कर में है डायमेंशन यही इसी बात प मैं आ रहा था आपके पास इस डायमेंशन की सच्चाई ये है कि आप उस डायमेंशन तक पहुंचो ग ही तभी जब इस डायमेंशन में आप जो है अपने इस यहां की जो निष्ठा है पूर्ण निष्ठा लगाओ जी अब मान लो कि मुझे कोई कहता है मुझसे कोई पूछता है कि धरती चपटी है या गोल है मुझसे किसी ने पूछा कि धरती चपटी है या गोल है या इसी तरह से मान के चलो कि मुझसे किसी ने पूछा ईश्वर अनंत निराकार है या भाई साहब आप यहां फिर जिज्ञासा प आ रहे हैं आप विरोध बताइए जिज्ञासा नहीं है जिज्ञासा नहीं आप मेरी पूरी बात सुन ले फिर मैं आपसे पूछ आप इसका जवाब देना कि मुझसे
00:45:49:27 किसीने पूछ मैं मैं आपका प्रश्न पूछ आप प्रश्न कर लीजिए फिर मैं बोलूंगा हां तो अगर मैं उसको ये बोलता हूं कि नहीं भाई धरती चपटी है गोल नहीं है तो क्या मैं मूर्ख साबित नहीं हुआ क्या मैं अज्ञानी साबित नहीं हुआ उसने इसी तरह से दूसरा सवाल पूछ लिया क्या भगवान निराकार और अनंत और निराकार है तो मैं उसको बोलू कि नहीं वो साकार है तो क्या मैं उसमें अज्ञानी साबित नहीं हुआ क्या मैं सामने वाले को भ्रमित नहीं कर रहा हूं क्या मैं सामने वाले को भी अपना अज्ञान नहीं दे रहा हूं पहली बात तो ये है मैं आपके प्रश्न का उत्तर दे दूं कि जो अज्ञान आप दे रहे हो मैं वही तो बोल रहा हूं जो अज्ञान आप दे रहे हो वो अज्ञानता ब्रिज का काम कर रही है आपको यहां से मुक्ति दिलाने में सहायक ठीक है क्योंकि उस अज्ञानता के ब्रिज के बिना आप वहां से बाहर ही नहीं निकल सकते दूसरी बात ये है कि मैंने अभी आपको कहा कि पृथ्वी जो है गोल आपको चपटे का ही अनुसरण करना है आपने मुझे मूर्ख कहा क्या आपने मुझे मूर्ख समझा क्या आपको सुनो आप आपने क्या किया मैं बताऊ आपने जो प्रश्न किया है वो एक अंश पर प्रश्न किया है आप पूरा बताइए ना आदमी को वस्तुतः पृथ्वी गोल है मगर यहां पर उसकी गोलाई से अपने दिमाग को हटाना है तुझे और उसकी चपटे
00:47:04:28 पन पर आपको ध्यान केंद्रित करना है जिससे कि तू गोल तक पहुंच पाएगा वस्तुत प गोल है मगर तुम्हें अपना ध्यान लगाना है यहां इस पर लगाना है जिससे कि तू उस तक पहुंच सके वस्तुतः जो ईश्वर है वो अनंत सामर्थ वान है अनंत है वो व्यवहार में नहीं आ सकता है मगर तुझे अपना ध्यान लगाना है व्यवहार में आ सकने वाले रूप के ऊपर जो व्यवहार में आ सके तभी तू उस तक पहुंच पाएगा तो आप उसको एक लाइन नहीं बताएंगे आप उसको पूरा बताएंगे उदाहरण देंगे तरह-तरह के पृथ्वी की गोलाई का एक उदाहरण देंगे या फिर मृत्यु का उदाहरण देंगे वस्तुत तुझे मर जाना है वस्तुत एक दिन तुझे मर जाना है मरेगा निश्चित है मगर अभी तुझे निष्ठा रखनी है अभी तुझे निष्ठा रखनी है अपने जीवन पर यहां होगी हा हा अब ये कि मान लो कि मैं अब अब अब मैं अब मैं आपसे प्रश्न करूंगा आप मुझे बताए आपके अनुसार ईश्वर साकार है या निराकार अब ये बताइए देखिए क्योंकि अब यहां पर जो डेफिनेशन की बात है आपने बोला अब मैं आपको बताता हूं कि बता भी नहीं रहा एक
00:48:20:00 तरह से इसको आप अज्ञानता मान सकते हो मेरी ठीक है पहली तो बात यह है कि आप जैसे की द्वैतवाद और की बात हुई है दत अद्वैत है हम लोग आगे चलेंगे हम लोग आगे चलेंगे पहले आप एक जो हेडलाइन है वह क्लियर करें आपके अनुसार ईश्वर निराकार है या साकार है वो बताए देखिए मेरे अनुसार या किसी के भी अनुसार ईश्वर जो है वह निराकार है अनंत है असीमित है उसकी कोई सीमा नहीं है और यह भी मेरे अनुसार है कि जब उसकी कोई सीमा नहीं है जब उसका कोई आकार नहीं है वो निराकार है वो कण कण में व्यापत है व आप में भी है वो मुझ में भी है मुझ में भी है मगर वो मेरी अज्ञानता की वजह से मैं उसको नहीं देख पा रहा हूं उसको मैं समझ नहीं रहा पा रहा हूं उसकी क्रियाकलाप को मैं नहीं समझ पा रहा हूं इसलिए मुझे वो नहीं पता चल रहा उसका मैं अनुभव नहीं कर पा रहा हूं एक तरह से मैं उस उसके साथ उसका दर्शन नहीं कर पा रहा हूं तो ये है कि वो मेरी अज्ञानता की वजह से है जब बात आती है यह व्यवहारिक नहीं है व्यवहारिक सत्य नहीं है जैसे कि मैं पूछ मैं पूछ रहा हूं आपसे जैसे ईश्वर कण
00:49:35:04 कण में है कहीं कोई भेद नहीं है फिर भी माता और पत्नी में भेद होगा कि नहीं करोगे कि नहीं करोगे तोय आपकी अज्ञानता है मिनट एक मिनट मिनट मैं आपसे य पूछ रहा हूं क्या माता और पत्नी में भेद करना को आप अज्ञानता मानोगे कि नहीं मानोगे व वो भेद दोनों में भेद है और आप जब तक आप जीव भाव को प्राप्त है मुक्त नहीं हो गए तब तक व्यवहारिक जो सत्य है वो यही है कि वो अज्ञानता नहीं है माता और पत्नी में भेद मानना और जब आप मुक्त हो जाएंगे तो माता पत्नी का भेद ही नहीं रह जाएगा फिर तो कुछ है ही नहीं नहीं आप बात अगर ये अज्ञानता अगर ये अज्ञानता है अगर इसको अज्ञानता कहेंगे कि ईश्वर अनंत है और जो है वो दिख रहा है या फिर पृथ्वी गोल है तो फिर यह भी अज्ञानता है कि माता और पत्नी एक नहीं है यह भी अज्ञानता है यह कहेगा क्या वो अब मैं आपको बताता हूं कि आपने बहुत बड़े जो कांसेप्ट था बहुत बड़ा कांसेप्ट में से एक छोटा सा उसका टुकड़ा आपने लेकर उसको सवाल बनाया एक जब ईश्वर अब ये होता क्या है कि
00:50:51:02 हम मान रहे कि प्रकृति है और यह प्रकृति एक तरह से आवरण का मतलब मेरी जोा आप कहने का एक मिनट हम लोग अपना डिस्कशन क्लियर कर ले कि हम लोग कहां जा रहे हैं आपका कहने का अर्थ ये है कि जो पार मार्थी सत्य है केवल वही बताओ व्यावहारिक सत्य मत बताओ यही बात है ना दो अविद्या के अंदर की दुनिया के सत्य को ना बताओ परमार्थिक सत्य बताओ केवल आप जब बात कर रहे हैं जब आपने बात की माता और पत्नी की वो एक साभ अभी मैं कांसेप्ट क्लियर कर रहा हूं जिस पर हम डिस्कशन कर रहे हैं पारिक सत्य बताओ केवल जो व्यवहारिक सत्य मत बताओ परमार्थिक सत्य केवल व्यक्ति को बताया जाए बिल्कुल जब वो उसको ज्ञान होगा तो उसको हर चीज का उसको अच्छे बुरे गलत सबज की जानकारी होगी ठीक है ज्ञान होगा कैसे ज्ञान होगा कैसे वही जो मेरे मेरे ऊपर जो आवरण है मेरी बुद्धि के ऊपर जो आवरण है अज्ञानता का जब वो आवरण वहा से तो मेरे अरने हटाने के लिए वो आवरण हटाने के लिए आवरण वो आवरण हटाने के लिए उद्योग क्या किया
00:52:07:09 जाएगा हा आपने कहा कि वो आवरण हटाने के लिए उद्योग क्या करें अब यहां पर मैं अपना उद्योग भी आपको बताऊंगा कि मेरा मैं क्या उद्योग करना चाहता हूं या मैं क्या कर रहा हूं या क्या करना चाहिए तो खैर मैं इसके लिए तो नहीं कहूंगा कि भाई क्योंकि मैं दूसरे को पाबंदी नहीं लगा सकता दूसरे के ऊपर उसको क्या करना चाहिए मगर य प वही है कि ये था कि अब टॉपिक भूल गया आपका उद्योग क्या आपने पूछा उद्योग क्या करना चाहिए उसके लिए चलो खैर इसी प आ जाते हैं अगर आपने यही सवाल पूछा है तो मैं जो करता हूं मैं क्योंकि दूसरे के बारे में नहीं कहूंगा गीता में जो बताया गया है जो कर्म की परिभाषा गीता में बताई गई है मैं उसको फॉलो करता हूं उसके उसम जो जैसा कि उसने बताया कि आप जाप ओम का करिए गीता को फॉलो करते हैं हां मैं उसको सही मानता हूं कि उसमें जो चीजें है वो सही बताई गई है और जब उसको मैं व्यावहारिक तौर पर भी लेता हूं और मेरी जो समस्याएं होती है जब मैं कभी समस्या में उलझता हूं या मुझे कभी संदेह होता है तो उन संदेह को भी वहां से मुझे निवारण मिल जाता है इसलिए खैर मुझे वो सही लगता है और मैं उसको मान के चलता य आपको क्लियर कर दूं एक बात आपको
00:53:22:13 क्लियर कर दूं कि आपने पूछा था मुझसे कि अगर धरती गोल है और हम उसको चपटे पन के लिए बता रहे हैं गोलाई बताते हुए भी उसर ध्यान ना देने के लिए कह रहे हैं मैंने यह नहीं कहा था उसको बताना ही नहीं है आपने कहा तो क्या मैं अज्ञानी नहीं कहला आंगा अगर वो गोल है और मैं उसको कहू चपटी है मेरा उत्तर वहां पर क्या था मेरा उत्तर वहां पर ये था कि आप उसको बताएंगे कि गोल है मगर उस और ध्यान नहीं देना है तुझे तो आप अज्ञानी नहीं कहलाएंगे दूसरी बात ये है कि हां जीव की संज्ञा ही अज्ञानी है आप भी मानते हैं कि आप अज्ञानी है जब तक आप मुक्त नहीं हो गए आप भी अज्ञानी है तो हां उस रूप में अगर अज्ञानी की संज्ञा लग रही है हमारे ऊपर तो ज्ञानी है बिल्कुल है हम जीव है ही इसलिए कि हम अज्ञानी है कहीं से भी आप देख लीजिए कोई भी सेक्ट हो उसको देख लीजिए तो इसमें भी कोई आपत्ति नहीं है इस इसको इसको स्वीकार करने में कोई आपत्ति नहीं है कि पार मर्थक दृष्टि से ब्रह्म दृष्टि से मुक्त दृष्टि से हम लोग अज्ञानी है बिल्कुल है तो क्या हम अनी मगर जब बात आ जाती है व्यवहार के मगर जब बात आ जाती है व्यवहार के अंदर इसी डायमेंशन की तो हम अज्ञानी नहीं है अब मैं वही कह रहा हूं
00:54:38:12 गीता को फॉलो कर रहे थे अब आप गीता को फॉलो कर रहे थे वो बताए हां ठीक है मैंने बता दिया कि जैसा कि उसम बताया गया वो करना है वो मैं करता हूं ठीक है और अब वही आपने कहा ईश्वर साकार नहीं मानता मैं निराकार है ठीक है आप अज्ञानी है या विद्वान है अज्ञानी के अकॉर्डिंग आपको मानना होगा ईश्वर साकार भी है निराकार भी है और विद्वान के मुक्त के अकॉर्डिंग आपको मालूम है कि ईश्वर क्या है तो आप मुक्त है कि व बंधे हुए हैं अभी भी अभी आपका स्टेटस क्या है देखिए अभी मैं स्टेटस की बात यह है कि जब तकने मुक्त है कि नहीं मैं चल रहा हूं राही हूं मुसाफिर हूं मंजिल मैं पूछ रहा हूं मुक्त है कि नहीं मुक्त नहीं यानी आप यानी आप अज्ञानी हैर मेरा वही है यानी आप अज्ञानी है अभी यानी आप अज्ञानी है तो आप अपने आप को अज्ञानी मानते हुए दुनिया में और सारी जितनी भी अज्ञानता एं है माता पत्नी का भेद अज्ञानता है पिता पुत्र का भेद अज्ञानता है यहां से मिलने वाली और सारी चीजें जो अज्ञानता ही है अज्ञानी स्वीकार करते हुए उन अज्ञानता को
00:55:53:14 आप स्वीकार कर लेते हैं अपने जीवन में व्यवहारिक सत्य तौर पर मगर आपको भगवान के अवतार को स्वीकार करने में दिक्कत है पहली बात अब दूसरी बात में आ जाता हूं आप भगवत गीता को फॉलो करते हैं भगवत गीता आपके पास आई कहां कहां से आई देखो अभी मैं आपको बताऊ कि मेरा गुरु कौन है या क्या है वो एक तरह से दूसरा टॉपिक कन्वर्ट हो जाएगा उस क और अत्यंत आवश्यक है वो अत्यंत आवश्यक है एक बात तो ये हो गई कि आप जो है भता का अर्थ जो भी लेते हैं जो भी लेते हैं उसमें दोनों सत्य बताए गए व्यवहारिक और परमार्थिक उसमें दोनों सत्य बताए गए मगर आप केवल पार मर्थक सत्य को इसलिए पकड़ते हैं क्योंकि वहां पर आप मुक्त की दृष्टि से देख रहे हैं और बाकी की जिंदगी आप जी रहे हैं बाकी का जीवन जो आप निर्वाह कर रहे हैं वो अज्ञानी होते हुए कर रहे हैं सारे वेदों का निर्वाह कर रहे हैं केवल एक उस उस रूप में उसको नहीं स्वीकार करेंगे कि भगवान जो है अवतार ले सकता है केवल उसमें हम जो है ज्ञानी है उसमें हम अविद्या युक्त नहीं है जीव भाग प्राप्त नहीं है मुक्त हो गए उसमें हम उस तरीके से देखेंगे तो इसलिए अब मुझे कहना पड़ेगा कि अगर आप गीता को मानते हैं भगवत गीता को तो गीता आपके पास आई कैसे इस
00:57:08:24 इस सवाल का अगर मैं जवाब देता हूं इस सवाल पर हम जाते हैं तो मैं वही आपको कह रहा हूं कि ये निरर्थक होगा यहां पे ये आपका सवाल भी कोई सार्थक नहीं है और नहीं इसका गीता में आपके अनुसार आप कह रहे हैं कि उन्होंने व्यवहार का सत्य नहीं पार मार्थी सत्य ही बताया यही कह रहे व्यवहारिक सत्य बताया कि नहीं बताइए यही इसीलिए वर की व्यवहार की जितने सवाल होते हैं में व्यवहारिक सत्य बताया है कि नहीं भगवान ने अपने दोनों प्रकार के रूप बताए नहीं वो व्यवहारिक सत्य भी है वो वाला नहीं भगवान ने जब अपने ब्रह्म की व्याख्या की तो दोनों ही तरीके के ब्रह्म को बताया ग नहीं पार मार्थी ब्रह्म और व्यवहारिक ब्रह्म पार मार्थी ईश्वर और वर पार मार्थी ब्रह्म और व्यवहारिक ईश्वर बताया कि नहीं नहीं आप उसम क्या कहना चाह रहे भगवान ने निर्गुण निराकार और सगुण साकार दोनों की व्याख्या की कि नहीं नहीं उन्होंने क्या वहां प मैं पूछ रहा हूं आपसे गीता के अनुसार भगवान ने निर्गुण निराकार और सगुण साकार दोनों की व्याख्या की कि नहीं की उसम यह बताइए वहां पर वो कहते हैं कि ध्यान
00:58:24:00 मेरा दो देखिए अब आप बच रहे हैं इतनी देर से आप इंटेलेक्चुअल पर्सन की तरह कर रहे थे बहुत अच्छी चर्चा चल रही है अभी मैं आपसे पूछ रहा हूं उन्होने क्योंकि अब मुझे क् बताइए उन्होंने निराकार साकार दोनों की बात की है या केवल निराकार की बात की है गीता में आप जो है उस टॉपिक को अगर एक शब्द में बांधने की कोशिश करेंगे कि मैं एक शब्द आपको बोलूं तो वो सही नहीं रहेगा मैं एक शब्द में उस चीज को नहीं बता सकता आपको आप कह रहे हैं कि खाली उसने साकार और निराकार की बात की है तो एक शब्द से मैं उसको रामपाल जी को फॉलोअर है रामपाल जी के फॉलोअर है नहीं बिल्कुल नहीं है रामपाल जी वो मैंने आपको पहले बता दिया था कि मैं फॉलोअर किसी का नहीं हूं स्टिल डेट आज तक कि बुलाना शबद शबद जब आपने बोला तो उससे पता चला यह भाषा जो है रामपाल जी के फॉलोअर्स की होती है चलो वो उनकी हो सकती है रामपाल को आप ठीक नहीं मानते रामपाल को आप ठीक नहीं मानते रामपाल के बारे में जानते हैं कि नहीं रापा बाद में कर बाद में कर लेंगे बात अभी आपने सवाल पूछा एक चीज क्लियर पूछ लू रामपाल जी को आप मानते हैं कि नहीं मानते हैं नहीं वो इतना झूठ तो कोई नहीं बोलता खैर
00:59:39:02 जितना झूठ वो बोलते हैं और जितने झूठी उनकी प्रचार तंत्र जो है वो चलता है शायद ही कहीं प दुनिया में इतना बड़ा झूठ कभी देखने को मिला हो इतना बड़ा झूठ च अलग चीज है चलिए आपने पूछा साकार या निराकार साकार मैं ये पूछ रहा हूं क्री कृष्ण जी ने जब श्री कृष्ण जी अर्जुन को बता रहे हैं कि भाई मुझे तुम ध्यान मेरा दो तो इसका मतलब व साकार रूप में श्री कृष्ण जी अर्जुन के सामने है तो आप य कहना चाहते कि वह साकार है क्योंकि मैं गीता को फॉलो कर रहा हूं गीता जो है मैंने आपसे प्रमाण मांगा ही नहीं मैं आपसे सिर्फ यह बोल रहा हूं आपके जानकारी में गीता में साकार और निराकार दोनों की बात है या केवल निराकार की बात है बस ये बताइए दोनों की बात है दोनों की बात है बात तो फिर साकार से आपत्ति क्यों है मैं वही आपको बताना चाहता ये तो व्यक्ति की यह तो व्यक्ति की क्षमता के ऊपर है उन्होंने कहा उसमें जो अव्यक्त की पूजा करते हैं उनका जीवन बहुत कठिन होता है तो व्यक्ति की क्षमता के ऊपर है उसका अव्यक्त में मन लग पा रहा है भैया उसका वो कठिन नहीं है जीवन मगर दिक्कत निराकार ना होने से नहीं निराकार होने से दिक्कत नहीं है दिक्कत साकार के ना होने से जब कोई कहता है साकार है ही नहीं वहां दिक्कत है
01:00:54:10 निराकार की आप पूजा करो कोई दिक्कत आपका मन अगर निराकार में लग पा रहा है आप जीवन का कठिन कठिनाई आपको नहीं हो रही तो करो मगर आप यह मत कहो कि साकार है ही नहीं तो हम फिर वहा पर बात आ जाएगी तो फिर बचार म आपके साथ य है मेरा व बक्शन यह है कि वहा पर मैं मान रहा कि व साकार रूप में अर्जुन को बता रहे हैं मगर उस साकार रूप में व जन्म ले रहे हैं ये ऑब्जेक्शन है कि वो जन्म लेंगे मान ईश्वर जो है जन्म नहीं ले यहा यही बात क रहा गीता का अ आपने गीता का अर्थ आपने ये निकाला ठीक है मैंने यही कहा जो इसके अलावा और भी कुछ शास्त्र पढ़े आपने नहीं मैं अभी वही बात क रहा हूं कि आपने पढ़े हुए हैं आप मुझे बताइए मैं आपकी हर बात को मानने के लिए तैयार हूं वो में लिखा है कि ईश्वर जो है गर्भ के मध्य में विचर है यद्यपि अजन्मा अविनाशी है फिर भी वह नाना अपनी माया द्वारा नाना प्रकार के रूप बनाता है जब यह संसार माया है जब यह संसार माया है और हमारे लिए संसार सत्य है तो
01:02:09:12 हमारे लिए ईश्वर का जन्म होना साकार होना सब कुछ सिद्ध हो जाता है और जो ईश्वर जो है अनंत जो उसका व्यवहार में ना आ सकने वाला रूप है वो मुक्त की दृष्टि से है क्योंकि अभी हमें जीव भाव प्राप्त है क्योंकि अभी हमारी पलक झपक रही है मारने पर क्योंकि हमा अंदर भय है सब कुछ है जीव जीव भाव को हम प्राप्त है तो हमारी जो सच्चाई है वो यही है कि ईश्वर यहां पर आकर के जन्म भी ले सकता है कुछ भी कर सकता है यही सच्चाई है व्यवहारिक सत्य यही है तो आपका कहना है कि गीता में गीता के अनुसार भगवान जन्म नहीं लेते हैं सनातन शास्त्रों के अनुसार भगवान जन्म नहीं लेते हैं आपका तो आप जानते हैं शास्त्रों के अनुसार तो आप आपका वो है मैं शास्त्र के अनुसार नहीं बोल रहा हूं बोल क्या गीता बोल रहे वो क्या है अपना मत बताया है गीता बोल रहे वो क्या मानना बताया है गीता के अनुसार बताया आपने आपने गीता के अनुसार बताया ना कि गीता में जन्म लेना सिद्ध नहीं होता गीता के अनुसार क्योंकि श्री कृष्ण अर्जुन के सामने है वो उस टाइम प सकार रूप में है इसलिए गीता के अ पूछ रहा हूं गीता के अनुसार ईश्वर का जन्म लेना सिद्ध नहीं होता है ना नहीं जन्म लेना सिद्ध होता तो अब आपने इसका मतलब
01:03:24:15 यह कहा कि सनातन शास्त्रों के अनुसार ईश्वर का जन्म लेना सिद्ध नहीं होता यह आपकी डेफिनेशन हो सकती है कि आप शास्त्रों के अनुसार उसको नहीं मानते गता शास्त्र नहीं है गीता के अनुसार ये जन्म लेना सिद्ध नहीं होता तो शास्त्र के अनुसार जन्म लेना सिद्ध नहीं होता ठीक बिल्कुल शास्त्र आपके पास आए कहां से ये ये जो आपका मैं वही कह रहा हूं कि आप मेरे सामने हैं मैं शिवांश जी को जान रहा हूं और मैं आपके सामने हूं आप मांग राम को जान रहे हैं ठीक है मैं अपने ज्ञान के तौर पर बात कर रहा हूं आप आपके अपने ज्ञान र पर बा देखिए मैं आपको काउंटर करने का मैं आपकी किसी बात पर आपत्ति होने का अधि मैं आपकी किसी बात पर आपत्ति करने का अधिकारी हूं या नहीं मैं आपकी किसी बात का विरोध कर सकता हूं यहां पर कि नहीं आपत्ति जता सकता हूं कि नहीं बिल्कुल बिल्कुल बिल्कुल बिल्कुल तो अब मैं आपसे इसीलिए आपत्ति जताने के लिए आपसे पूछ रहा हूं जिन शास्त्रों का अर्थ आप ये बता रहे हैं कि उसके अनुसार वो जन्म नहीं लेता है यह शास्त्र आपके आसपास आप तक आए कहां से
01:04:39:22 अय मैं इसलिए इस सवाल का जवाब ये आपका सवाल भी सार्थक नहीं है ना ही मेरा जवाब देना इसके लिए सही है ये आप ये आप मत करिए मैंने मैंने आपका कोई भी सवाल ये नहीं कहा ये मत करिए आपके हर सवाल को लिया और उसको कहा नहीं नहीं आपे ब कर आप यहां प विषयात कर रहे हैं नहीं विषयात नहीं कर रहा होगा अभरा मुझे केवल आप मुझे बताइए जिन शास्त्रों का अर्थ आप ये बता रहे हैं कि ईश्वर अवतार नहीं लेता व शास्त्र आप तक आए कहां से सिर्फ मैं अभी सवाल पर रहना चाहता हूं कि साकार निराकार मैंने कहा कि श्री कृष्ण
01:05:25:25 से किसी चीज को काउंटर कर सकते थे काउंटर करने के लिए कहा मैं भगवत गीता को फॉलो करता हूं भगवत गीता के अनुसार ईश्वर जन्म नहीं लेता आपने कहा कि नहीं कहा कहा ना देखो इसमें टाइम खराब होगा और जो अरे तो आपने आप अपनी बात से हट रहे हैं सु ठीक है कोई बात नहीं मैं ये कह रहा हूं कि जो आप सवाल आपका जो सवाल है और उसका जो जवाब है उससे क्या होगा कि हम यहां से हट के जो हमारा सवाल जवाब था उससे हट के हम कहीं दूर चले भाई साहब जब आप प्रमा जब आप प्रमाण को लाकर के बात कर रहे हैं तो मैं आपसे प्रमाण की वेरिफिकेशन पूछूं कि ना पूछूं नहीं मैं प्रमाण की बात कर ही नहीं रहा हूं कहां प मैंने मैंने बोला कि अब बात सुनिए मेरी पूरी बात सुन लीजिए आप एक बार फिर बताइए कि मैंने प्रमाण क्या दिया है गीता में से किस शलोक का प्रमाण दिया आप पूरी बात सुन लीजिए जो गीता प्लीज मुझे प्लीज आप प्रमाण की बात मत करिए आपको कहां पर तर्क के द्वारा मेरी बात पे आपत्ति जतानी है वो जताए हां हां तरक की बात कर रहा हूं मैं तो मैंने ये कहा कि वहां पे सवाल जवाब अर्जुन और श्री कृष्ण का सवाल जवाब हो रहा है ठीक है क्योंकि प्रमाण फिर आप प्रमाण ले आए अब मैं
01:06:41:02 अब मैं इसको लाइव को बंद करूंगा या तो आप बताएं कहां से आए या फिर हम लोग बंद करेंगे हो गया नहीं अच्छा आप सिर्फ इतना जानना चाह रहे हैं कि मेरी नजर में क्या है मैं बता देता हूं आपको नहीं आप काउंटर करिए आपकी नजर जानने के लिए हम नहीं बैठे हैं आप काउंटर करिए आप मेरी कही हुई बात को काटिए तर्क पर से काट मैंने यही कहा कि साकार किस परिस्थिति में है और वो निराकार क्यों है जब तक इन जबतक जब तक हम इंसान है जब तक हम क्या कहते हैं जीव भाव को प्राप्त है तब तक भगवान साकार निराकार सब कुछ है तो आप ये कहना चा रहे हम इस जन्म में मनुष्य शरीर में हम कभी नहीं जान पाएंगे कि वो निराकार है क्या आप ये कह मनुष्य शरीर में हम नहीं जान पाएंगे ये कब थिकली तो देखिए मिशन है मिशन है उसको आत्मसात करना जान तो गए हैं अब उस तक पहुंचना वो जो मिशन है उसको प्राप्त करना उस स्थिति तक पहुंचना वो है मिशन मनुष्य जन्म का जान तो थ्योर कली गए क्या क्या वो लक्ष्य क्या वो मैं इस जन्म में नहीं प्राप्त कर सकता आप जो
01:07:57:00 मैं बता रहा हूं आपको जो लक्ष्य प्राप्त करने के बाद आपका ये शरीर जो है वो तो अज्ञानता है तो लक्ष्य प्राप्त करने का मतलब ही यह है कि यह शरीर का वो अस्तित्व नहीं रहा वो उपाधि नहीं रही तो ये दोनों का एक जैसे वंद पुत्र जैसे बंध्या पुत्र होती है पुत्र होता है बंध्या पुत्र का मतलब पुत्र हो जाने का मतलब ही है कि जिसकी वो संतान है वो बंध्या नहीं है तो बन्या नहीं होता और बंद और अगर बंद है तो पुत्र नहीं संभव है तो यदि आप मो प्राप्त कर पा रहे तो आपको आपके जो शरीर से प्राप्त होने वाले जो वो है व्यवहारिक सत्ता वो नहीं रहेगी और अगर व्यवहारिक सता है तो आप मुक्त नहीं है तो आप ये कहना चा सुनि देखि मेरी बात सुनिए हमको यहां पर जिज्ञासा के लिए नहीं आए हैं आप या तो काउंटर करिए काउंटर करिए बात गल
01:08:51:00 सवा आपने कहा इस शरीर में रहते हुए मेरा वो सवाल है सवाल तो काउंटर कर रहा हूं मैं काउंटर का मतलब थोड़ कोई य झगड़ा करूंगा आपके साथ मेरा सवाल ही होगा ना उसे काउंटर करूंगा मैं आपको आपने कहा कि शरीर में रहते हुए मैं कभी जाने बहुत सारे सवाल कर लिए मैंने बहुत सारे जवाब आपको दिए अब आपके अनुसार ईश्वर निराकार है अब आप मेरे सवालों के जवाब दीजिए मैंने बहुत सारे सवालों के जवाब दीजिए अब आपके अनुसार ईश्वर जो है निराकार है अब मेरे सवालों का जवाब आप दीजिए ठीक है बताइए आप पूछिए तो अब ये बताइए कि आपके अनुसार ईश्वर निराकार है तो क्या वह सर्व सामर्थ वान है बिल्कुल वो सर्व समर्थन है सब कुछ कर सकता है उसके ऊपर किसी भी प्रकार का नियम है या नहीं है कोई नियम नहीं है नहीं है तो वो जन्म ले सकता है कि नहीं
01:09:57:24 क्यों नहीं ले सकता ले सकता कह रहे जब सुनो सुनो मेरी बात सुनिए आपने कहा कि कण कण में है ठीक है ना केवल इतना बता हम आगे बढ़ेंगे इसका मतलब ईश्वर साकार भी हो सकता है ईश्वर केवल निराकार नहीं है पारिक दृष्टि से ईश्वर केवल निराकार है व्यवहारिक दृष्टि से ईश्वर साकार भी हो सकता है जन्म भी ले सकता है बात सुनिए जन्म इंसान लेगा जन्म इंसान लेता है जब वो जन्म लेता है तब वो भगवान नहीं है तब वो भगवान नहीं है जन्म सिर्फ इंसान लेगा भगवान कभी जन्म नहीं लेगा ना ही उसको कभी जन्म लेने की जरूरत है ना ही वो कभी अपने मनोरंजन के लिए जन्म लेगा क्योंकि उसको मनोरंजन करने की कोई जरूरत नहीं किसलिए मनोरंजन करेगा बताए मुझे ईश्वर ने सृष्टि बनाई क्यों
01:10:49:12 है जब मेरा सृष्टि बनाने का प्लान बनेगा तब मैं इस सवाल का जवाब दूंगा कि आपको बनाई कभ तो आपका प्लान है सट बनाने सट बनाई क्यों है मैं ये कह रहा हूं कि ना तो मेरा सृष्टि बनाने का प्लान है ना आपका बनाने का भी कोई प्लान है बनाने का सवाल बहुत आगे का सवाल है अरे भाई आप क रहे कि ईश्वर की कोई आवश्यकता नहीं है जन्म लेने की हा ईश्वर को कोई आवश्यकता नहीं है जन्म लेने की तो मैं आपसे पूछ रहा हूं कि ईश्वर ने सृष्टि क्यों बनाई देखिए एक स्टेडियम है सृष्टि को आप एक स्टेडियम मान के चल सकते हो और इस स्टेडियम के अंदर हम हम जो आत्माएं हैं इस स्टेडियम में खिलाड़ी हैं वह भगवान खुद रेफरी है यहां पर हम जो कर रहे हैं जैसा कर रहे हैं वह खेल है तो यह इस तरह से है इसमें बाकी इस सवाल का जवाब जो सृष्टि की रचना क्यों की कैसे की यह कोई एक तरह से प्रैक्टिकल ना तो सवाल है और नहीं स कोई जवाब देने की इतनी कोई जरूरत है ये एक मतलब मैं जब क्वेश्चन करू तो वो जवाब देने की जरूरत नहीं है
01:12:04:16 ईश्वर ने सृष्टि की रचना करने के लिए क्या ईश्वर को आवश्यकता थी मैं वही कह रहा हूं कि यहां परता थी नहीं ी आवश्यकता थी कि नहीं थी भाई कैसे जान सकता हूं आवश्यकता थी या नहीं थी सृष्टि रचाने की तो इसका मतलब आपकी जानकारी में नहीं है कि ईश्वर आवश्यकता के बाहर काम करता है कि नहीं करता है जन्म नहीं लेगा जम लेने की बात की बात है वो वो बात की बात है आपकी जानकारी में नहीं है कि ईश्वर आवश्यकता के बिना काम करता है कि नहीं करता है ये पक्का नहीं है देखिए ईश्वर ऐसा कोई काम नहीं करेगा जिस क्लियर कट तो कुछ करेंगे ही नहीं यही तो होता है यही प्रॉब्लम होती है कोई ईश्वर ईश्वर ऐसा कोई काम ऐसा कोई काम कभी नहीं करेगा कि मुझे इस चीज की जरूरत नहीं है तब भी ईश्वर कोई काम करे क्योंकि उसको कोई मनोरंजन ने वेदों में अलंकार क्यों लगाया वो आर्य स माजियो से पूछना आप आपके अनुसार वेदों में अलंकार नहीं है मैं नहीं जानता वो मेरा वो एरिया नहीं है
01:13:19:19 उसका मैं कोई नहीं जब आप जानते नहीं है भाई ईश्वर ने इस दु चलिए ठीक है आपके अनुसार भगवत गीता आदि को ईश्वर ने हमारी मुक्ति के लिए दिया है बिल्कुल उसमें जो जो चीजें बताई है आप उनको फॉलो करेंगे आप मुक्त हो जाएंगे मुक्ति के लिए दिया है अब मुझे बताइए कि ईश्वर ने वो जो ज्ञान है हमारे मन में फिट क्यों नहीं किया किताब के रूप में क्यों लाना पड़ रहा है हां आपने पूछा कि भाई मन में फिट क्यों नहीं किया किताब के रूप में क्यों आया जो मोक्ष है जो ज्ञान है वो कमाया जाता है आप अगर ज्ञान कमा ज्ञान कमाओ सुनो ज्ञान कमाओ चलो मैं मान लू उसको भी मैं देख लूंगा कि ज्ञान क्यों नहीं दिया डायरेक्ट क्यों कमाया जाए इसकी क्या आवश्यकता है आपको मानना पड़ेगा कि ये खेल है जो उसका दृष्टा ईश्वर है जब तक नहीं मानोगे जब तक नहीं मानोगे कि उसने अच्छाई बुराई दोनों बनाई ज्ञान और अज्ञान दोनों बनाया यहां का तो तब तक जा रहा हूं कि ईश्वर की जो गीता है उसको आप समझिए मत उसके मंत्रों को रट के तो जन्म लीजिए ज्ञान जो उसके अंदर छुपा है वह आप प्राप्त करिए जैसे कि हमको अगर पानी की जरूरत है तो पानी की प्यास के साथ हम जन्म लेते हैं
01:14:35:03 हमको किसी को बताना नहीं पड़ता कि आपको पानी की आवश्यकता है तो ऐसे ही गीता के जो श्लोक है वह श्लोक रटे रटा हमने क्यों नहीं जन्म लिया क्यों उसको किताब के रूप में ही दे रहा है क्या आवश्यकता है उसको किताब की क्योंकि वो र जो उनका अर्थ है मैं फिर क कह रहा हूं जो उनका गुण रहस्य है उसके लिए चलो मैंने आपकी बात अभी रख ली ये भी दुर्जन तोष ने आय है मैं आपकी बात थोड़ी देर के लिए रख रहा हूं मगर मैंने आपकी बात रख ली थोड़ी देर के लिए कि ईश्वर का ईश्वर जो ज्ञान है उसको जो है वो कमाया जाता है ठीक है मगर मैं कह रहा हूं ज्ञान वो कमाए ईश्वर को उसको जो गीता के श्लोक जो रटे रटा हैं उनको वो समझने जाए किसी के पास कहीं से समझे किसी का भाष्य पढ़े मगर जो श्लोक है वो रटे रटा क्यों नहीं जन्म लिए उसने क्या आवश्यकता है उसको किताब की यही मैं कह रहा हूं कि किसी भी कोई भी ग्रंथ चाहे मैं गीता को मान रहा हूं और गीता को फॉलो कर रहा हूं कोई भी ग्रंथ कोई भी किताब या कोई इंसान उसको पूरी तरह से परिभाषित नहीं करता हां हमें उनको प सुनिए मैं बता रहा हूं इसको मैं बता रहा हूं इसको परिभाषित
01:15:50:18 इसलिए नहीं करता है क्योंकि वह प्राप्त करने का विषय है व यही मैं कहा तो जो व्यवहार का विषय है उस तरीके से ईश्वर की जो व्याख्या की जा सकती है वो मैंने आपको बताई अब आप अगर यह कहोगे कि ईश्वर जो है जन्म नहीं ले सकता मैंने आपसे जैसे पूछा तो आप इसलिए कह रहे हो कि ईश्वर आवश्यकता के बाहर जो है कोई कार्य नहीं करता फिर मैंने पूछा कि वो श्लोक को रटा रटा क्यों नहीं देता है वो जो है सृष्टि की रचना क्यों करता है तो मुझे नहीं पता मुझे नहीं पता तो हो गया अब क्या बताऊ आपसे भाई आपकी जानकारी में भी नहीं है कि ईश्वर आवश्यक के बिना कोई कार्य करता है कि नहीं तो आप यह क्यों कह रहे नहीं करता जन्म व लेगा आपकी मर्जी समझते रहे अभी आप आपसे अगर बात होगी ना ज्यादा तो आप पहले तो सनातनी सिद्ध नहीं होंगे आपको मैं बताऊ पहले आप सनातनी सि आपको बात बता बता रहा क्या क्या होगा आपने अगर मुझसे 10 प मिनट और बात बता दी तो पहले आप सनातनी सिद्ध नहीं होंगे वेदों को मानने वाले अरे भाई मुझे बोल ले होना अबकी बार बीच में प्लीज मत बोलिएगा अगर मैंने और 10 मिनट आपसे बात कर ली तो आप पहले सनातनी सिद्ध नहीं होगे उसके बाद आप क्या कहते हैं वेदों को मानने वाले सिद्ध
01:17:05:25 नहीं होंगे ईश्वर को मानने वाले सिद्ध नहीं होंगे आस्तिक सिद्ध नहीं होंगे और अंततोगत्वा आप मनुष्य भी सिद्ध नहीं होंगे और तब आप कहेंगे नहीं मुझे मनुष्य को सिद्ध करना है खद को अभी जैसे आप कह रहे हो ना मुझे सिद्ध नहीं करना आप अपने आप को मनुष्य भी सिद्ध नहीं कर पाएंगे इसलिए आने के लिए आभार आपका अच्छा लगा आपके साथ टाइम बीता मनुष्य सिद्ध नहीं होंगे क्योंकि मनुष्य क्योंकि मनुष्य मनुष्य और पशु में अंतर होता है कि पशु के पास सामने खड़ी हुई तीन स्त्रियों में कौन माता है कौन बहन है कौन पत्नी है यह चुनाव करने का कोई आधार नहीं होता है तो इसलिए वहां पर व्यक्ति को चोट पहुंचती है वह सनातन को मना कर देगा मैं सिद्ध करने नहीं आया वो वेदों को मना कर देगा मैंने मैं अपने को वे वैदिक नहीं मानना चाहता वो ईश्वर को ना मानने वाला कोई आपत्ति नहीं मैं अपने आप को आस्तिक सिद्ध नहीं करना चाहता मगर जब यहां बात आएगी तो आपको कहना पड़ेगा नहीं नहीं मनुष्य तो हूं मैं तब आपको कहना पड़ेगा भावना आ जाती है सुनिए आप जब अपने आप को एक कुछ सिद्ध करते हैं अपने आप को बड़ा सिद्ध करने की कोशिश करते हैं बड़े छोटे का नाम किसीने नहीं लिया है हमारी बात हो चुकी है आपका आने के लिए बहुत-बहुत आभार आज की जो चर्चा हुई है मुझे ऐसा लगता है कि वो व्यर्थ रही ये सब बातें आप क्लास में आते
01:18:21:07 तो हमारी चीज डिकस हो सती व्य क्यों लगा मैं आपको बताता हूं व्यर्थ क्यों लगा अभी आपको व्यर्थ क्यों लगा क्योंकि ये चर्चा आपको व्यर्थ क्यों लगी आप चाहते हैं एक झगड़ा हो तो भाई यह थे मंगाराम जी अलंकारी ईश्वर सर्व शक्तिमान है तो क्या वह भक्ति करने वाला जब मांगेगा कि आप मेरे पुत्र बने तो अलंकारी ईश्वर उनको पुत्र होने से मना कर
01:19:16:03 देगा यही होता है व्यक्ति जब केवल फौजी बन जाता है और भक्ति नहीं करता तो उसका हाल यही होता है आपने जैसा कि देखा यह सिद्धांत विहीन हिंदू हैं सिद्धांत विहीन हिंदू कैसे हिंदू भी है उनको हिंदू भी खुद को नहीं कहना है कि भाई मैं गीता को मानता हूं अगर आप सनातनी नहीं है तो आपके पास वह शास्त्र नहीं है जिनके आधार पर ईश्वर को सर्वशक्तिमान सिद्ध किया जा सके गुरु ग्रंथ गोविंद नहीं है और अगर आपके पास वह ग्रंथ नहीं है तो आप वैदिक नहीं है वैदिक नहीं है तो आपके पास सर्वशक्तिमान ईश्वर नहीं है जब सर्वशक्तिमान ईश्वर नहीं है तो आप कौन हुए ईश्वर ही नहीं है अगर वह जरा सा भी बाधित है तो व ईश्वर ईश्वर ही नहीं है तो फिर आप नास्तिक हो गए जब नास्तिक हो गए तो फिर आपका आपके पास ईश्वर को प्राप्त करने के निमित्त जो नियमावली है विधि है वह नहीं है तो क्या हुआ संसार में जो धर्म का स्थाई आ सकता है धर्म को स्थापित किया जा सकता है तो सर्व शक्तिमान ईश्वर के दम पर इसलिए
01:20:31:03 हम लोग लड़ते हैं ईश्वर की सर्व शक्तिमता के लिए और ईश्वर जहां पर अनंत है अवाद है निर्गुण निराकार है व परमार्थिक है जब व्यवहार में ईश्वर को स्वीकार कर लेते हैं तो ईश्वर सब कुछ कर सकने वाला है ठीक है तो आज की चर्चा कैसी ल आप लोग बताइएगा मुझे ऐसा लगा कि हमने काफी निरर्थक बातें की यह बातें वो क्लास में भी कर सकते थे और कोर्स कैसे मिलेगा मैं बता देता हूं आपको 7408
01:21:06:09 30169 इस पर आप एक व जब करेंगे और कोई सवाल वगैरह मत किया करिए केवल ट करिए वहां पर तीन प्रकार के फॉर्म है उनमें से एक फॉर्म है क्लास वाला उस पर टच करिए अपनी इंफॉर्मेशन दीजिए आपको एक दो हफ्ते में मतलब वो क्लास जवाइन करने को हमारी मिल जाएगी और इसी तरीके के टॉपिक्स है बहुत रोचक रहते हैं टॉपिक्स तो आप लोग जवाइन कर सकते हैं दूसरी बात मैं यह कह रहा हूं भक्ति बहुत आवश्यक है आप भक्ति अवश्य करें भगवान की सवा घंटे डेली भक्ति करें हम लोग एक सेशन चालू करने वाले हैं गल मीट के द्वारा जिसमें कि हम भक्ति युद्ध स्तर पर करने वाले हैं सब लोग बैठ कर के साथ में वहां पर करेंगे नाम जप उसके लिए भी आप लोग उसमें भी अपना एनरोल करवा लीजिएगा भक्ति अवश्य करें सवा घंटे की डेली या तो एक साथ बैठ के कर ले या फिर 1515 मिनट करके दिन में पांच बार करें उपासना सेवा संकीर्तन स्वाध्याय यह आपकी नीव है अब यह क्या है कि केवल अपने अपने हिसाब से जो बुक अच्छी लगी यानी कि बुक को चुनाव करने का जो धर्म है वो इनके पास पहले से है कौन सी बुक लेनी
01:22:21:13 तो क्या हुआ गुरु गोविंद और ग्रंथ इसीलिए कहा जाता है तो भक्ति को साथ में रखिए गोविंद को साथ में रखिए तब आप जो है ऐसी जटल जटिल जो बातें उनको समझने के लिए समझ पाएंगे और भक्ति करिए उपासना सेवा संकीर्तन स्वाध्याय करिए स्मार्थ के विषय में हमारे एक भाई है गुरु भाई उन्होंने हमें कहा कि यह बात बोलिएगा कि जैसे कोई शैव है शिवजी को मानता है उससे कोई आपत्ति नहीं है यदि वह यह कहता है कि विष्णु भगवान शिव से अलग है और नीचे हैं तो आपत्ति है इसी प्रकार से जो वैष्णव है अगर वह यह कहते हैं विष्णु भगवान सर्वोच्च है तो हम भी मानते हैं मगर वह यह कहता है कि विष्णु भगवान शिव से अलग है और वो उच्च है विष्णु तो दिक्कत है तो आपत्ति वाली बात तो यह बातें उन्होंने बताने को कही थी और स्मार्थ वैष्णव स्मार्थ स्मार्थ शैव होना ही
01:23:26:19 शास्त्रो चित और तार्किक भी सिद्ध होती है क्योंकि जैसे ही हम अन्य तत्वों को स्वीकार करते हैं तो फिर ईश्वरीय सत्ता जो है क्षीण होने लगती है तो स्मार्थ होते हुए वैष्णव बनिए स्मार्थ होते हुए बनिए स्मार्थ होते हुए सात बनिए नपत बनिए सौर बनिए स्मार्थ होते हुए ब क्या दिक्कत है दूसरों को भी अगर आप कह दोगे कि हे भगवान हे ब्रह्मा विष्णु महेश मैं आप सबकी भक्ति श्री राम के रूप में करना चाहता हूं इससे आपका क्या घट जाएगा कुछ नहीं घटेगा खैर समझने वाले समझेंगे और ना समझने वालों को प्रयास जारी
01:24:11:19 है सभी को जय श्री राम
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