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00:00:00:03 लाइव हो गए हैं तो सभी को जय श्री राम जैसा कि आप सभी जानते हैं अभी हम लोग लाइव आ कर वापस लौट चुके हैं और तकनीकी समस्याए आज के हमारे जो अतिथि है इनका नाम शर्मा जी है और मित्र है वैसे हमने अपने चैनल पर एक मर्यादा बना रखी कि हम उसी से चर्चा करते हैं जहां डिसएग्रीमेंट होता है वहां उसी से चर्चा करते हैं जो अपने पहचान को छिपाए बिना आए क्योंकि वहां पर ऐसा होता है कि वह स्वतंत्र हो जाता है ज अपनी पहचान को छिपा नहीं रहा होता तो स्वतंत्र हो जाता है किसी भी प्रकार का अमर्यादित व्यवहार करने के लिए पर जो शर्मा जी है यह इनका चैनल है संविधान नाम से और यह जो चर्चा है वो डिस एग्रीमेंट पर नहीं है ऐसा विषय जिस पर हम दोनों जो है एक ही मत के हैं इस कारण से यह जो मर्यादा है इनके लिए हमने नहीं रखी अगर ईश्वर सर्वशक्तिमान है

00:01:15:18 तो क्या वह अपने जैसा एक और ईश्वर बना सकता है जिसके पास उससे ज्यादा शक्तियां हो हां जी बिल्कुल बना सकता है रामचंद्र जी के रूप में आएंगे उसी समय वो हनुमान जी के रूप में भी आ जाएंगे ठीक है और मैं एक प्रश्न का उत्तर और दे दूं शुरुआत में ही कि अ एक क्रिश्चियन महोदय थे उन्होंने एक प्रश्न किया था मुझसे व्यक्तिगत रूप से तो व्यक्तिगत रूप से किसी का भी उत्तर देना ठीक नहीं लगता है क्योंकि ऊर्जा उतनी ही नष्ट होती है मगर जो जानकारी है वह सीमित हो जाती है उन्होंने पूछा था कि क्या ईश्वर कोई बुरा घृणित कार्य कर सकता है से रेप वगैरह ऐसा कुछ तो बात यह है कि जिस जिसको व वह ईश्वर मान रहे हैं क्या जहां पर रेप हो रहा है वह जो जगह है वह उनके द्वारा स्वीकारा गए ईश्वर से के नियंत्रण से बाहर है दूसरी बात जो रेप करने वाला है चलो मान लिया कि उनका ईश्वर खुद रेप नहीं करता है मगर जो रेप करने वाला

00:02:30:22 है क्या उसको उनके ईश्वर ने नहीं बनाया किसी और ने बनाया है और साथ ही साथ एट द सेम टाइम कि जब वोह उसको बना रहा है तो क्या उसको नहीं मालूम है कि आगे चलकर के इस तरह के गणित कार्य करेगा तो मुझे इसे नहीं बनाना चाहिए तो कुल मिलाकर के यदि वह अपने ईश्वर को सर्वव्यापक सर्वशक्तिमान मानते हैं सब कुछ उसके नियंत्रण में है तो उन्हें स्वीकार करने करना पड़ेगा कि मान लीजिए प्रत्यक्ष रूप से वह अगर नहीं भी कर रहा है रेप मगर जो रेप बनाने वाला है उसको वही बना रहा है और जहां पर रेप हो रहा है वोह जगह भी उसके नियंत्रण में आती है तो इस स्थिति में उस रेप का जिम्मेदार भी कारण भी कौन हुआ अगर वह उसको ईश्वर मानते हैं तो वह हो गया वह बात बात की है कि शक्ति अगर उनकी वहां पर है तो शक्ति के रूप में वह स्वयं है या फिर उनकी शक्ति उनसे अलग है अगर शक्ति उनसे अलग है

00:03:31:28 तो अगर शक्ति ईश्वर से अलग है तो हमें मानना पड़ेगा कि शक्ति कहीं ना कहीं प्रभावशाली कम है कंपेरटिवली टू ईश्वर और जब हम ऐसा मानेंगे तो हमें यह मानना पड़ेगा कि ईश्वर जहां पर है वहां पर उसका नियंत्रण अधिक है कंपेरटिवली विद जहां पर वह नहीं है उसकी शक्ति है या तो आपको यह मानना पड़ेगा कि जहां पर शक्ति है वहां शक्ति के रूप में ईश्वर ही है तो कुल मिलाकर के दत हो गया है ना तो इससे आप भाग नहीं पाएंगे ईश्वर की सर्वशक्ति मक्ता सिद्ध तभी होगी जब जहां पर किसी भी प्रकार का कार्य हो रहा है संसार का कोई भी ऐसा क्षेत्र नहीं है जहां पर ईश्वर नहीं है ईश्वर का नियंत्रण नहीं है वह बात अलग है कि जिस प्रकार से जो पानी है उसकी नमी है पूरे संसार में भले ही फैली हुई है मगर हम हमारी प्यास पानी के उसी रूप से घुसती जिस रूप से बुझती है उसी प्रकार से ईश्वर तो सर्व सर्वत्र सर्वव्यापक है दीवार में भी ईश्वर है स्वान में भी ईश्वर है गाय में भी ईश्वर है पर पर हमें हमारी जो हम ईश्वर के उस

00:04:47:00 रूप की भक्ति करते हैं जो हमें वेदों का प्रतिपादन कराती है मोक्ष का प्रतिपादन कराती है ईश्वर के उस रूप की भक्ति हम करते हैं तो मैं ज्यादा विलंब ना करते हुए सबसे पहले अपने जो आज के हमारे गेस्ट हैं उनको मैं चाहूंगा कि वह अपना वक्तव्य दे और अपना परिचय दे जो हमारे दर्शक है उनको फिर हम आगे बढ़े जो हमारा आज का विषय है उस सभी को जय श्री राम हर हर महादेव मेरी आवाज आ रही है सभी को हां सभी को आ रही है जब मुझे आ रही तो पिछली बार इनको आ रही थी आपको नहीं आ रही थ अभी क्वेश्चन हम लेंगे पहले हमारी बातें हो जाए फिर हम ले लेंगे ब्रह्म माया से लिप्त होता है कि नहीं या फिर वो जो क्वेश्चन आ रहे हैं वो हम ले लेंगे जी तो मेरा नाम सत्यम शर्मा है नाम से मेरा चैनल है आज का जो विषय है वो आर्य समाज के ऊपर हम चर्चा करने वाले हैं तो मेरी बात को अगर कोई भी आर्य समाज का व्यक्ति अगर यहां सुन रहा है तो बड़े धैर्य के साथ सुने

00:06:02:06 मेरा आर्य समाज से कोई द्वेष नहीं है सिर्फ सैद्धांतिक जो मत है उनका उसी पर मैं कुछ विषय रखना चाहता हूं अगर उनको लगता है कि वह सही है तो मैं जो खंडन करने जा रहा हूं उसको अकेले में बैठ के समझिए कि उसका खंडन हो पा रहा है कि नहीं हो पा रहा है आप लड़ मत कि आर्य समाज का सबसे बड़ा समस्या यह है कोई भी खंडन करने आता है तो सबसे पहले उसको पाखंड कह देते हैं जबकि उसकी सुनते भी नहीं तो सबसे पहला मेरा निवेदन यही है कि धैर्य पूर्वक सुनिए तो मैं अब शुरू करता हूं जी कहानी पता है कि दयानंद जी बचपन में शिवलिंग के ऊपर चूहा देखते हैं कि चूहा चढ़ गया है तो चूहा चढ़ने के बाद उनके मन में क्या आया कि उनकी देवों में आस्था समाप्त हो गई कि देवता तो होते ही नहीं है अगर होते तो शिवजी चूहे के चूहे को हटा पाते लेकिन उनके मन में आया कि देवता तो होते ही नहीं इसका प्रभाव बाद पर जाकर उनके भाष्य पर पड़ा क्योंकि उन्होंने देवताओं को नकार दिया तो जो भी भाष्य उन्होंने किया है वोह हम मान नहीं सकते क्योंकि उन्होंने देवता को ना मानते हुए वो सब भाष्य किया है अच्छा हम सत्या प्रकाश

00:07:17:10 के सातव समुल्लास को देखेंगे तो उसमें प्रश्न किया गया है कि वेदों को किन आत्मा में प्रवेश किया यानी प्रकाश किया गया प्रश्न है किनके आत्मा में कब वेदों का प्रकाश किया दयानंद जी उत्तर दे रहे हैं शतपथ ब्राह्मण का प्रमाण देकर कि प्रथम सृष्टि की आदि में परमात्मा ने अग्नि वायु आदित्य अंगिरा इन ऋषियों के आत्मा में एक एक वेद का प्रकाश किया सारी कहानी यहीं से शुरू होती है आदित्य अंगिरा और वायु और अग्नि इनको ऋषि कहा गया है दयानंद जी ने य ऋषि कह दिया कि ये ऋषि थे मेरा प्रश्न यहीं से शुरू होता है कि इन चारों को ऋषि किस वैदिक ग्रंथ में कहा गया मैंने वैदिक ग्रंथ इसलिए लिखा कि पुराणों को तो मानते नहीं है वेद मतलब वैदिक जो ग्रंथ उन्ही को मानेंगे आर्य समाज तो किस वैदिक ग्रंथों में इनको ऋषि कहा गया है ऐसा मेरा प्रश्न था क्योंकि जहां भी हम देखते हैं वहां यह सब देवता के रूप में ही आते हैं कि इनको देव कहा गया है इसके प्रमाण में हम मनु मति पर चलते हैं जहां से स्पष्ट हो जाएगा सारा

00:08:33:16 विषय मनुस्मृति अध्याय एक श्लोक 24 अध्याय एक श्लोक 24 अगर कोई आर्य समाज सुन रहा है तो लिख ले आगे वो चेक कर पाएगा कि यह लिखा भी है नहीं लिखा भाष्य जो मैं पढ़ रहा हूं व सुरेंद्र कुमार जी का है आर्य समाज के ही है तो श्लोक सॉरी 27 है श्लोक 27 में लिखा है दश के आधे अर्थात पांच पांच महा भूतों को ही जो विनाश शल अर्थात कौन सा हां 23 सॉरी 23 है दूसरा शलोक पढ 23 वा जो श्लोक है उसम लिखा है उस परमात्मा ने जगत में समस्त धर्म अर्थ काम मोक्ष आदि व्यवहारों की सिद्धि के लिए जगत की सिद्धि अर्थात जगत के समस्त रूपों के ज्ञान के लिए अग्नि वायु और रवि यहां पर अग्नि वायु रवि को देवता कहा गया है लेकिन सुरेंद्र कुमार जी ने अपना अर्थ करते हुए इनको ऋषि कह दिया अग्नि वायु रवि नामक ऋषियों से त्रिवेद ज्ञान वाले ऋग्वेद यजुर्वेद सामवेद नामक नित्य वेदों को दहक प्रकट किया गया है इससे

00:09:48:19 जस्ट अगर 22 वा श्लोक देखेंगे तो उसमें देवताओं को रचने की बात ब्रह्मा जी ने कह दी कि मैंने देवताओं को रचा है उसके जस्ट बाद यह वाला श्लोक आता है कि अग्नि वायु रवि नामक जो देवता है इनके माध्यम से यजुर्वेद ऋग्वेद सामवेद को दोहक प्रकट किया दोहक प्रकट किया का अर्थ है जो दोते हैं हम गाय से दूध दुहते यानी गाय से ले रहे हैं तो इन जो ग अगनि वायु रवि जो है देवता इनसे भी दोहक प्रकट किया गया है इनसे लिया गया है जबकि दयानंद जी कहते हैं कि इनको दिया गया है जो परमेश्वर है वो इनको दे रहा है जबकि मनुस्मृति कह रहा है इनसे लिया गया है वेद ठीक है दहक प्रकट किया गया फिर इसका एक और प्रमाण कहां मिलता है कि चलो मनुस्मृति को तो मिलावटी बोल देते हैं कि इसमें तो मिलावट हुआ है हम नहीं मानते तो उपनिषद अगर आप देखेंगे छांदोग्य उपनिषद छांदोग्य उपनिषद सतवा खंड अध्याय चार सवा खंड आप इसमें 17 खंड में देखेंगे तो मैं आपको हिंदी पढ़कर बता रहा हूं प्रजा ने लोको को लक्ष्य बनाकर ध्यान रूप तप किया उन तप

00:11:03:25 किए जाते हुए लोको से उसने रस निकाले पृथ्वी से अग्नि अंतरिक्ष से वायु द लोक से आदित्य को उद्धृत किया उसने इन तीन देवताओं को लक्ष्य करके तप किया यहां पर उनको देवता कह दिया ठीक अग्नि वायु और आदित्य को यहां देवता कह दिया तप किए जाते हु देवताओं से उसने रस निकाले अग्नि से रिक वायु से यजू और आदित्य से को ग्रहण किया तो यहां पर भी वो वेदों को प्रकट करने की ही बात की गई है यहां से इनसे रस निकाल के वेदों को प्रकट किया गया है ना कि इनको वेद इनके हृदय में प्रकाशित किया गया है तो अभी भी इनको यहां देवता कहा है ऋषि नहीं कहा गया है कहीं पर भी तो छंद उपनिषद का एक प्रमाण हो चुका है तो आर्य समाज वालों से यही एक ब्राह्मण ग्रंथ में भी यह प्रकरण आता है तो ब्राह्मण ग्रंथ में भी इनसे लिया ही गया है इनको दिया कुछ नहीं गया इनको देवता कहा गया हर जगह इनको ऋषि कहीं नहीं कहा गया अग्नि ऋषि काफी ग्रंथों में लिखा हुआ है लेकिन मेरा प्रश्न यह है कि यह जो अग्नि वायु आदित्य है जिनसे वेदों को धकर प्रकट किया जा रहा है इन ऋषियों इनको कहीं पर भी वैदिक ग्रंथ में ऋषि कहा गया हो तो आप मुझे दिखाइए ऐसा कहीं

00:12:19:02 नहीं कहा गया है इनको सिर्फ देवता कहा गया है अब यह देवता योनि को मानने को स्वीकार स्वीकार करने को तैयार ही नहीं होते हैं क्योंकि अगर यह स्वीकार कर लेते हैं तो इनको सारे भाष्य बदलने पड़ जाएंगे मनुस्मृति का जो भाष्य कराया है उसमें जानबूझकर जहां जहां देवता शब्द आए हैं वहां वहां उनको विद्वान पुरुष बता दिया गया है तो इस तरह का भाष्य हम कभी नहीं मान पाएंगे और अगर किसी आर्य समाजी सज्जन भाई को लगता है कि वो इसका प्रमाण दे सकता है कि इनको कहीं ऋषि कहा गया है तो आप शिवांश भाई को या मुझे मैसेज कर दीजिए उसको अगली लाइव में जरूर बुलाएंगे उसका प्रमाण देखेंगे या फिर आप प्रमाण सीधे भेज भी सकते हैं लाइव की भी जरूरत नहीं है उसम तो अच्छा इनका द्वेष पूर्ण भाष्य है इसमें पूर्ण भाष्य की मैं आपको एक बात बताऊ ये जितने भी लोग हैं जो पुराणों की जो कथाए हैं उनको लेकर के और मजाक बनाते हैं पुराणिक कथाओं का भले ही उसका अर्थ आदि दैविक आदि भौतिक आध्यात्मिक हो उससे उसको नजर अंदाज करते हुए उनका बनाते हैं अब बात यह आती है कि जो

00:13:34:25 ऋग्वेद आदी जो हमारे वेदा शास्त्र है उसमें भी इसी भाषा शैली में बात की गई है जो पौराणिक भाषा शैली है व उसमें भी है ंद जी ने तासर का वध ऐसे किया वहां पर वो ये है जो देवताओं की कुतिया है वह आई थी वेद के मंत्र पढ़े थे और इस तरीके की घटनाए सब वेदों में भी दी गई मगर जब वेद में व बात आ रही है तो क्या हो रहा है वहां पर यह अपने मन से वहां पर लिख दिया गया फलाना अलंकार यह फलाना अलंकार है यह फलाना अलंकार है क्योंकि इनको वेद की सीमा में अपने आप को दिखाते हुए ही अर्थ करना था इस कारण से वरना वेद की किसी बात को कल्पना समझना अलंकार का अर्थ क्या होता है वास्तविकता नहीं है वास्तविकता नहीं है मगर हम जो है क्या कर रहे हैं व वहां पर एक जो चीज है नहीं उसको हम दिखा रहे हैं अलंकार के रूप में जैसे कि कई जगह होता है ना उ उपमा अलंकार हो जाता है उसको एक उपाधि दे दी जाती तो अलंकार की बात तो यहां प्रश्न य उठता है कि जब आप वेदों की मर्यादा को वेदों के सम्मान को गरिमा को बचाने के

00:14:49:25 लिए अपने वहां पर उसको कहीं पर भी अपनी मनमर्जी से अलंकार कह सकते हैं तो जो पुराण मानने वा ले थे वो भी आपके सनातनी भाई बहन थे तो पुराण मानने वालों कोभी मजाक ना उड़ा कर के आप यह कर सकते थे कि आप पौराणिक कथाओं को अलंकार कह देते वो बात बात की है वो चर्चा का विषय बना रहता कि व अलंकार है या नहीं है है ना मगर आप इतना कर सकते थे मगर वो क्या किस प्रकार का द्वेष था क्योंकि वहां पर स्पष्ट लिखा उन्होंने मूर्ति पूजा करना पाप है मूर्ति पूजा करना अधर्म है तो वो एक तरीके से ज्वलंत अंदर का जो द्वेष है वो उसम दिखाई देता है

00:15:34:03 जी दोष के बराबर है यह लिखा है किसके बराबर है 1000 हत्या के दोषों के बराबर है हां और आपने अभी वो बताया था कि जो राजा मूर्ति पूजा करता हो उससे दान लेना वो राजा किसके समान है वो क्या बताया था आपने मुझे कुछ एक सेकंड दे वो भी द्वेष पूर्ण भाष्य मैंने लिखा था कि उसका अर्थ कुछ भी कर रहे अपने मन से सिर्फ लोगों को दिखाने के लिए कि हां मूर्ति पूजा मत करो कभी हम अच्छा खंडन करो बहुत अच्छी बात है खंडन मंडन चलता आया है लेकिन सही तरीके से तो करो आप अपना ही बनाए जा रहे हो कुछ भी सिर्फ खंडन मैंने एक चीज और देखी है देखिए इनसे बात करने में एक समस्या आती है जैसे मैंने अपने चैनल से मुख्यतः दो तंत्र है जिनका जिनकी शिक्षाओं पर जिनकी विचारधाराओं पर मैंने अ प्रश्न उठाया एक स्कन और दूसरा आर्य समाज इसके अलावा बात की है ब्रह्म कुमारी ब्रह्म कुमारी वालों से कम की है एक कल्की वाले उनसे कम की है एक ये अपने रामपाल है भाई मगर मैंने जब स्कोन में और आर समाज में एक फर्क देखा आर्य समाज को मैं

00:16:49:04 देखता हूं इन सभी तंत्रों के जनक के रूप में यह जो जितने भी तंत्र आज चल रहे हैं जो परंपरा प्राप्त सनातन शास्त्र सम्मत विचारधाराओं के विरोध में सिद्धांतों के विरोध में उन सबका जनक के रूप में देखता हूं आर्य समाज को आर्य समाज ने जो एक पहल की तो उससे सभी को मौका मिल गया अपने अपने मन के हिसाब से वेदा आदि शास्त्रों का अपने हिसाब से अर्थ करने का वो तो एक अलग बात रही मगर फिर भी आज आज भी मैं अगर देखता हूं तो अगर इकोन के फॉलोअर्स मुझे जब काउंटर करते हैं और वहीं पर जब आर्य समाज को मानने वाले लोग मुझे काउंटर करते हैं तो आर्य समाजी जो व्यक्ति होता है वो बहुत जल्दी अभद्रता पर उतरता है यह आर समाज की तरफ से एक आ रहा हो सकता है सारे ऐसे ना हो पर आर समाज की तरफ से ज्यादातर ऐसा होता है कि जो काउंटर किया जाता है बहुत अभद्र तरीके से किया जाता है बिल्कुल तू तड़ाक चालू हो जाता है बिल्कुल और मेम्स बनाए जाते हैं बहुत जल्दी होता है मतलब ऐसा नहीं है स्न की तरफ से नहीं होगा होगा कम होगा मगर इधर से बहुत जल्दी होता है बहुत ज्यादा होता है स्कन की तरफ से हुआ ना के बराबर हुआ तो इकन वालों से बात करने में तब भी एक बात करने का एक स्तर बना रहता है कंपेरटिवली टू आर्य समाज

00:18:04:15 वहां पर स्तर बिल्कुल गिर जाता है अभी जैसे कल या कल की बात है आर्य समाज जी का मेरे पास फोन आता है वह कहते कि भाई बहुत अच्छे से बात करना शुरू करते जब मैंने कहा कि ठीक है आप लाइव आइएगा जब लाइव आने की बात आई तो व बोलते हैं कि मैं लाइव आ जाता हूं मैंने कहा ठीक है अपनी फोटो भेज दीजिए तो उन्होंने पूछा क्यों मैंने कहा भाई हम किसी भी अ विरोधाभास के ऊपर की जाने वाली जो चर्चा होती है वो हम बिना फेस के नहीं करते उसने हमारा हमने अपना एक नियम बनाया हुआ है तो अब वो बोलता है बस और उसके आगे डॉट डॉट एक अभद्र भाव को प्रस्तुत करने वाला शब्द वहां पर उपयोग किया तो मैंने कहा भाई मैंने फोन काट दिया तो पलट के फोन करके कह रहे हैं कि भाई फोन क्यों काट रहे हो मैंने कहा भाई आपसे अवत्र अवत्र बातें सुनू आपके अभद्र शब्दों को सुनू बोले अभद्र शब्द तो नहीं रिकॉर्डिंग है मैंने रिकॉर्डिंग की है इस बात की तो बोले कि अभद्र शब्द तो नहीं मैंने कहा मैंने कहा क्या कहा आपका ये जो आपने कहा कि फट जाना इसका अर्थ क्या था क्या फट गया तो बोले कि मैंने कहा कि आप डर की कारण आपके जो दिल के आसपास की नश हैं वो फट गई अच्छा

00:19:19:25 तो मैंने कहा ठीक है अब आप ऐसा करिए कि जो जो भगवत गीता भाष्य किया है दयानंद सरस्वती जी ने दयानंद जी ने आप उसकी सौगंध खा कर के कहिए कि आपका जो अर्थ है फटने का वो यही है तो हसने लगे व जो महानुभाव थे जो फोन कर रहे थे हसने लगे फस गए कैसे या तो यह सिद्ध करें अभी की अभी हम दयानंद को नहीं मानते क्योंकि जनता को जब वो बात जाएगी तो जनता तो जानती है ना फटने का अर्थ क्या है आप कितना भी दरदर की बातें कर लीजिए तो यह है वो व्यक्ति बहुत जल्दी स्तर गिरता है अब एक एक विषय में और छेड़ना चाहूंगा कि अभी हमने जो आर समाज ने एक बैठक की थी कुछ एक दो महीने पूर्व हमको बुलाया गया था फिर बुलाने के निमित्त जो बातचीत हो रही थी उसमें अभद्र भाषा शैली का उपयोग हुआ तो हमने वहां से कहा हम ऐसे व्यक्ति से बात करने नहीं जाएंगे और नहीं गए तो हमारी अनुपस्थिति में उन्होंने उनके हिसाब से मुंगेरी लाल के हसीन सपने देखते हुए और जो है यह सोच लिया कि हमने शंकर परंपरा का खंडन कर दिया शंकर परंपरा के चेत उसके बाद अभी हमने रिसेंटली उनमें जितने

00:20:35:00 भी उन्होने क्रमानुसार एक एक पॉइंट जो जो उन्होंने बोला उसम सारे पॉइंट पर हमने एक एक पॉइंट पर हमने बात की और अच्छा सा प्रस्तुत किया अपना पक्ष अब इसके बाद उन्होंने इतनी बकला में अपने वीडियोस बनाए हैं अपनी बातें कह डाली है कि मुझे ऐसा लगता ही नहीं है कि मैं दोबारा से उनके लिए अलग से फिर वीडियो बनाऊ तो अगर कोई व्यक्ति हमारे वीडियो देखेगा और फिर उनके देखेगा तो उनका बहुत ही वीक आर्गुमेंट जो है पक्ष नजर आता है अब वो कैसे है जैसे सबसे पहले एक बात ले लेते हैं कि हमने कहा कि भाई हमने उनसे कहा कि आपने जो गोविंद पाद जी के गुरु को राक्षस सिद्ध करने का प्रयास किया उनकी आइडेंटिटी को गलत तरीके से दिखाने का प्रयास किया है तो आपके ही जो आचार्य है जो लिखते हैं उन्होंने अपने वेदांत दर्शन के इतिहास में लिखा है कि जो यह वाला प्रकरण है जो गोविंद पाद ये वाला है जिनके बारे में मिथ्या फैल रही है कि उनके गुरु राक्षस थे तो यह वो शंकराचार्य के गुरु सिद्ध नहीं होते बात किसने मानी उदयवीर जो इनके य उदयवीर शास्त्री नाम से जो ख्या पित है जिनके भाष्य है अब इन्होंने इसके काउंटर

00:21:50:06 में आंसर क्या दिया है कि भाई अगर उदयवीर जी की बात आप मान रहे हो तो आप उनकी दूसरी बातें भी मानो मूर्ति पूजा का खंडन भी किया है और सुखदेव जी को शंकराचार्य का गुरु भी नहीं माना है तो हमने आपको व जो जवाब दिया है वह जवाब यह सोचते हुए नहीं दिया है कि हम जो है उसको मानते हैं हमने आपको जवाब यह सोचते हुए दिया है कि आप जो है मूर्ति विरोधी तो है आप जो है शंकराचार्य विरोधी तो है पर आप उदयवीर शास्त्री जी के विरोधी नहीं है इसलिए आपको उदयवीर शास्त्री जी से प्रमाण दिया आपने जो हम पर आक्षेप लगाया है व हमारे द्वारा स्वीकार ग्रंथ से आक्षेप नहीं लगाया है इसको उन्होंने कुछ नाम दिया था वो क्या था कि मीठा मीठा हप्ता और कड़वा कड़वा थू इसमें इन्होंने ऐसा कहा मीठा मीठा अपप्पा कड़वा कड़वा ू तो हमने तो हमने इनको बता दिया आपने जो आक्षेप लगाया है वोह हमारे द्वारा स्वीकार ग्रंथ से नहीं लगाया है हमने आपको वहां से इसलिए दिया कि भाई आपके ही लोग नहीं मानते तो पहले आप डिसाइड कर लो कि आपको क्या मानना है हम तो उनको पूरी तरीके से नहीं मानते मगर उनको ना मानने का अर्थ ये नहीं है कि हमने य मान लिया यह जो गलत ग्रंथ है कोई भी ग्रंथ छाप देगा तो हमने य मान लिया ऐसा नहीं है अब उन्होंने जो मीठा मठा

00:23:05:16 मीठा मीठा ह् और कड़वा कड़वा थूका है शंकराचार्य जो शेरी के हैं उनको जो है मुगलों का हिमायती सिद्ध करने के लिए इन्होंने किस वेबसाइट से लिया संदर्भ शेरी मट की वेबसाइट से श अब पहली बात तो यह है कि कोई व्यक्ति अपनी वेबसाइट पर जाहिर सी बात है कि ऐसी ही बातें डालेगा जो उसके पक्ष में हो तो हमें उसकी बातो का जो अर्थ लेना चाहिए वह यह ढूंढते हुए लेने का प्रयास करना होगा कि हमें ऐसा अर्थ निकालना है कि इससे इनकी चीज ग्लोरिफाई हो मगर उन्होंने क्या किया वो क्या कहते आधा अपनी अपनी ढपली अपना अपना राग इधर से ये उठा लिया उधर से उठा लिया जहां से वह यह सिद्ध कर रहे हैं कि शंकराचार्य के यज्ञ के कारण टीपू को फायदा हुआ तो टीपू को जो फायदा हुआ है भाई पहली बात तो यह है कि यह जो पत्र लिखा है वो टीपू ने लिखा है कि मुझे आपके यज्ञ के कारण फायदा हुआ सत्रु पर मैंने विजय प्राप्त की दूसरी बात जो यज्ञ है वह गांव की खुशहाली के लिए भी है मगर टीपू एट द सेम टाइम मठ मंदिरों को जो तोड़ते थे उनसे रक्षा करता था मंदिरों की रिकवरी करने में सहायता भी करता था यह भी वहीं पर इतिहास मेंशन है इसको आप निका नहीं सकते तो फिर जो यज्ञ से टीपू

00:24:20:25 ने जीत जीत प्राप्त की वो किन शत्रुओं पर की जो मठ मंदिर को तोड़ने वाले शत्रु थे यह सिद्ध हुआ बात कि जो मराठा थे उस समय के वो भी शंकराचार्य के प्रति आस्थान वित थे तो फिर आप इस तरह से मराठा के भी विरोधी हो गए क्यों क्योंकि मराठा ऐसे व्यक्ति के प्रति आस्त क्यों हो रहे हैं जो उन्हीं को मारने वालो का शरण देता है आशीर्वाद देता है तो आपको यह भी जानना पड़ेगा और फिर अंत में बात आ जाएगी कि मीठा मठा आपने जब संगरी मठ की वेबसाइट से सिद्ध करने का प्रयास किया कि उस तत्कालीन जो शंकराचार्य थे वह टीपू के हिमायती थे तो वहीं पर है कि वह जो है शारदा के अवतार थे यह वहां से आप नहीं लोगे अब मीठा मठा अप्पा कड़वा कड़वा थू क गया वहीं पर लिखा हुआ है कि उनके प्रति उस समय उस प्रांत के जितने भी लोग थे सब आस्थान वित थे अब यह बात आप नहीं मानोगे तो मीठा मठा अप्पा कड़वा कवा तू कहां गया इसके बाद आपने उसी वेबसाइट में एक जानकारी और दी गई है विद्यारण्य स्वामी हरिहर बुक्का की इसको आपने अपने इसी वीडियो से खंडित कर दिया कि नहीं ऐसा कुछ नहीं है विद्यान स्वामी हरिहर बुक्का के गुरु नहीं थे ये वो जो भी

00:25:35:25 कहा मगर फिर यहां पर आपने उसी वेबसाइट का खंडन कर दिया जिस वेबसाइट के आधार पर आप अपने किसी पक्ष को रखने का प्रयास कर रहे हैं तो यह क्या है मीठा मीठा अपा करवा करवात एट द एंड इन्होंने एक कहानी सुनाई और भी बहुत सारे हैं कि इन्होने भत में वो जो दिए गए हैं अद्वैत का तो इनका कुछ भी ऐसे इतना वीक आर्गुमेंट है कि उसको दोबारा से बनाने का मन ही नहीं कर रहा कि हम लोग दोबारा से बनाए उसको अच्छा उसमें अंत में उन्होंने कहा कि एक व्यक्ति था उसने गधे पर अपने ग्रंथ लाग दिए और जब वो अपने घर लेकर के पहुंचा ग्रंथों को तो गधा बोलने लगा कि मैं तेरा गुरु हो गया तो मुझे गुरु मान तो उस व्यक्ति ने उसको गुरु नहीं माना बल्कि उसके डंडे लगाए भाई पहली बात तो यह है कि इस गधे का कंपैरिजन आपने जब अप्रत्यक्ष रूप से इधर परंपरा प्राप्त आचार्यों को किया है जिन्होंने पुराणों को स्वीकारा है तो पहली बात तो यह कि अनादर किया मगर ठीक है वह बाद में देखेंगे मगर दूसरी बात यह कि आपने अनकहे प्रत्यक्ष रूप से अनकहे शब्दों में माना कि आपको वेदा शास्त्र जो प्राप्त हुए हैं इन्हीं से हुए हैं

00:26:51:20 दूसरी बात ये है कि जब आप ये कह रहे हैं कि गधे पर जो ग्रंथ ला दे थे वो उसी व्यक्ति ने ला दे थे जिसको बाद में गधे ने ग्रंथ दिए मगर क्या जिनको जिनसे आप वेद ले रहे हो क्या उनको आपने जाकर के वेद दिए थे क्या दूसरी बात ये कि यदि आप गधे को रास्ते में अकेला छोड़ देते हैं अपने आप गधा वहां से लेकर के आ रहा है आपके ग्रंथों को आपने उसके ऊपर ना तो लादा है ना ही रास्ते में आप उसके साथ साथ चल रहे हैं उसकी के लिए ऐसे में वो गधा आकर के आपसे जब कहेगा कि यह है तेरे जीवन का प्रमाण अंतिम प्रमाण वेद तो क्या आप उसको मानेंगे क्यों क्योंकि आपको गधे की बुद्धिमता पर और उसकी जो सामर्थ्य उस पर भरोसा नहीं है यह सच बोल रहा है कि झूठ बोल रहा है तो आप उसको नहीं मानेंगे मगर यहां पर तो आपने वेदों को अपने अपना अंतिम प्रमाण माना हुआ है भाई अगर आपने गधे के ऊपर ग्रंथ नहीं ला देते मैं कह रहा हूं

00:28:00:26 मगर आप तो इसका अर्थ क्या हुआ कि इन्होंने यहां पर भी एक अन सेटल्ड सी अन एक अपने मन गणन से कहानी तो सुनाई मगर उसमें खुद ही फस गए पहली बात तो मान लिया कि मुझे इन्ही गुरुओं से प्राप्त हुआ है उनके बारे में अबद टिप्पणी तो की पर मान लिया और दूसरा क्या हुआ कि इन्होंने ऐसा जोक वहां पर किया है जो खुद ही में उलझ के रह गया कि भाई गधे को ग्रंथ देने वाले आप ही है मगर जिससे आपने वेदा आदि शास्त्र लिए उनको वेदा दि शास्त्र देने वाले आप नहीं है अगर आप किसी से वेदा दि शास्त्र ले रहे हो वेदा दि शास्त्रों को अपना अंतिम प्रमाण मान रहे हैं तो आपको यह कहना पड़ेगा कि मुझे जिस व्यक्ति से मिला है उस पर विश्वास है तभी आपको वे आपका वेद पर विश्वास होना सिद्ध होगा और अगर नहीं है विश्वास वेद जहां से प्राप्त हो रहे हैं उस पर तो फिर आपका वेदा दि शास्त्रों पर विश्वास होना सिद्ध नहीं होता तो खैर इसी तरीके से इनके और भी आर्गुमेंट है इन्होने भिक्षु शब्द की बात की भिक्षु शब्द मारे से पुराण में दिया गया है हा इन्होने एक और बोखला में जल्दबाजी में किया वो भी मैं बता दूं इन्होंने क्या किया जल्दबाजी में अब वो भगवान जाने खरीदा है वायु पुराण के किसी से लेकर आए मांग के लाए हैं वो नहीं पता मगर उन्होने वायु पुराण दिखा दिया भाई चौखंबा

00:29:15:28 से छपता है और जो है जो देखो इसमें कहां पर है एक भी जगह परंपरा नहीं है मेरे भाई वायु पुराण का ही एक भाग है एक लिंग महात्मा है वो अलग से प्रकाशित करते पब्लिशर वो वो भाग बड़ा हो जाता है इसलिए वो अलग से प्रकाशित करते हैं और उसमें वो परंपरा दी गई है तो जहां से आपने वायु पुराण खरीदा वही से पूछिए एकलिंग महात्मा मुझे दे दीजिए वो बताएंगे कि हा ये वायु पुराण का खंड है अलग से ये सारी चीज इतना वीक है कि उसके लिए मुझे ठीक नहीं लगता कि मैं अलग से एक वीडियो बनाऊ और इसी प्रकार अब जैसे हमने बताया कि भाई जो महाभारत में कपिल मुनि के द्वारा जो दर्शन बताया गया है अद्वैत दर्शन सांख्य दर्शन उसका लय जो होता है वह जाकर के होता है किसम अद्वैत में मैंने श्लोक क्रमांक तक बताए थे अपनी वीडियो में मगर इन्होंने क्या किया इन्होंने वहा अपना एक जो पर्सनल रूम में बैठ कर के जब य वीडियो बना रहे थे तो इन्होंने सीधे-सीधे वहां पर कह दिया कि नहीं नहीं वहां पर सिर्फ सांख्य की बात हुई है तत्व हुई है 24 तत्वों की बात हुई है मैंने 26 तत्वों का श्लोक क्रमांक दिया है अगर ऐसा होता तो अगर वो जो श्लोक क्रमांक मैंने दिया है आपने क्या खोल के बताया जैसे आप जब आरोप लगा रहे थे तब आपने खोल के बताया था मैंने श्लोक क्रमांक

00:30:31:07 दिया है आपको खोल के बताना चाहिए कि वहां पर 26 में तत्व की बात हो रही है मैंने श्लोक क्रमांक दिया है आपको बताना चाहिए कि वहा अद्वैत की बात हो रही है कि नहीं जीव ब्रह्म की एकता की बात हो रही है ब्रह्म को माना गया है कि नहीं माना गया है तो यह सब चीज इनकी इतनी वीक रही है कि अब उसके बारे में वीडियो बनाना कहीं से भी उचित नहीं दिखाई देता और गीला गीला अप्पा और मीठा मठा थू शुरुआत तो इन्होने ही की शंकराचार्य जब इनका यस से जो चीज मानोगे उसको मानना है तो भाई तुम वेबसाइट से जब य सिद्ध कर रहे हो और एक बात और कि यह परंपरा को माने ना माने अभी सत्यार्थ प्रकाश में अगर कोई व्यक्ति एक पेज एक्स्ट्रा चिपका दे जिसमें लिखा हो एक्स्ट्रा बढ़ा दे प्रिंट करवा ले अपनी सत्यार्थ प्रकाश कितना खर्चा आएगा हज रप 00000 अपनी सत्यार्थ प्रकाश प्रिंट करवा ले और उसमें लिख डाले कि बैडमिंटन खेलने से गिल्ली डंडा खेलने से मोक्ष प्राप्त होता है और यह बात कही है सरस्वती जी ने अभ ये आक्षेप लगाया जाएगा तो अब ये क्या कहेंगे ये सत्यार्थ प्रकाश नकली है क्यों नकली है क्योंकि उनसे जुड़े हुए जो लोग हैं चैन ऑफ नरेशन दयानंद जी की वो नहीं मान रहे हैं कि ये सत्या प्रकाश भाही सत्या प्रकाश है जो दयानंद जी ने लिखी

00:31:47:06 अगर येय ये चीज नहीं करेंगे तो कभी सिद्धि नहीं कर पाएंगे किय जो छापी गई किताब है वो नकली है इसी प्रकार से ये लोग भले ही परंपरा को ना माने मगर अपने को बचाने के लिए इनको परंपरा को ही मानना पड़ेगा और अब बात यह आती है कि परंपरा की अगर बात करें तो यह मानते हो ना मानते हो मगर हम तो मानते हैं अगर हम पुराणों को मानते तो हम परंपरा को मानते हैं परंपरा की बात ांद उपनिषद में कही गई आचार्य से प्राप्त होने वाली जो विद्या होती है वही फलदायक होती है ये सब ध्यान नहीं देते खैर फिर भी हम तो मानते हैं तो जब ये उसकी वेबसाइड से कोई बात प्राप्त कर रहे हैं जब शंकराचार्य के बारे में कोई बात प्राप्त कर रहे हैं तो पहले जा कर के इनको क्लियर तो करना पड़ेगा कि जो अर्थ मैं इसका समझ रहा हूं इस पंक्ति का वही अर्थ है कि नहीं वरना वही हो जाएगा तीन बेर खाती थी वो तीन बेर खाती है अब इसमें बेर शब्द का जो उपयोग हो रहा है दो बार वो अपने मन से कोई भी कुछ भी लगा लेगा मगर इन सब बातों से इन्ह मतलब नहीं है और इनके जो वो होते हैं अनुयाई वो भी आके वा वा वा वा वा खंडन हो गया खंडन हो गया ऐसे करते खंडन मतलब हसी आती है खंडन भी हो गया सब ध्यान नहीं देना कौन क्या कह रहा है कौन क्या नहीं कह रहा है बस खंडन हो गया साब वाह वाह वाह वा वा वा वही वाली बात वो

00:33:03:06 अमा एक एक मूवी थी ना उसमें वो कहता है मैं अर्ज किया है तो अर्ज करने से पहले ही वो कहने लगते वाह वा वा वा वा वा तो वो कहता है अमा शुरू तो करने दो भाई तो यहां वो वाला हाल है तो इनकी एक सबसे बड़ी समस्या है कि इनका जो ग्रंथों का भाष्य है ना वो ये समझ नहीं पा रहे एक उदाहरण देता हूं मनुस्मृति का अध्याय ये है दूसरा और इसका श्लोक है 176 इसमें आप भाष्य देखिए आर्य समाज के विद्वान का ही है प्रतिदिन विद्वानों देवताओं का अर्थ इन्होने विद्वान कर दिया विद्वानों ऋषियों ज्ञान वयो वृद्ध व्यक्तियों की सेवा अभिवादन आदि प्रसन्नता कारक कार्यों से तृप्ति संतुष्टि का व्यवहार और स्नान करके यानी यह कहना चाह रहे है पहले आप विद्वान ऋषि इनके पास जाओ बिना नहाए फिर नहाओ जबकि इसका प्रचलित अर्थ यहां दे रखा है ब्रह्मचारी नित्य स्नान देवताओं ऋषियों तथा पित्रों का तर्पण श्लोक का आप अनुवाद करेंगे तो आप बताइए कि इन्होंने श्लोक का अर्थ मोड़ने के लिए पहले विद्वान ऋषियों के पास जाना लिख दिया बाद में स्नान करना लिख दिया तो आप मुझे बताइए उससे पहले क्या बिना नहाए आप कहीं और ही चले जाएंगे ऋषियों के पास चले जाएंगे बिना नहाए या पहले स्नान

00:34:18:19 करेंगे तो लेकिन इन्होने श्लोक को मोड़ना है भाई देवता का अर्थ विद्वान कैसे करे तो फिर उन्होंने दे पहले लिखा है यह सब तो इस तरह का बड़े छल के साथ किया है तो कोई सामान्य व्यक्ति पढ़ेगा तो उसको तो पता ही नहीं चलेगा कि उसके साथ हो क्या रहा है जी और आपको बताऊ रामलीला देखने को भी 1000 हत्या के दोषों के बराबर बताया दयानंद सरस्वती जी ने देखिए आपको मैं बता देता हूं फिर बैठ कर के राम राम मंदिर के पक्षधर बनते हैं हजार हत्या के समान दोष है और इसी प्रकार मूर्ति पूजा करना हजार हत्या के समान पाप है ठीक है यह जीवनी है लेखराम जी की है संभव न है प्रमाणिक है अच्छा इनकी एक किताब छपती है मानस पियुष विशेषांक अंक छपता है प्रेम इसके बारे में जरा स्पष्ट कर दीजिए किस ग्रंथ में है ये जो आपने ग्रंथ दिखाया अभी ये लेखराम जी वाली जीवनी है अच्छा और अगर लेखराम जी वाले में नहीं हो तो मैं ढूंढ के बता द या लेखराम जी वाली में है या एक अन्य भाष्य का लेखक है आर्य समाज के उनकी है एक यह

00:35:33:25 पढ़िए नीचे वाली राम कृष्ण की भाति ही बुद्ध महावीर शिवा प्रताप कबीर नानक दयानंद गांधी यही नहीं मोहम्मद और ईसा भी अपने युग के महापुरुष हुए राम कृष्ण के समान बता दिया मोहम्मद और ईसा को अच्छा मोहम्मद भी महापुरुष है भाई इनका जो है आप प्रमाणिक रेफरेंस प्रामाणिक रेफरेंस दे दीजिएगा तो पिट कमेंट में डाल दूंगा क्योंकि अगर यह बात है क्योंकि ये लोग मुझे इस मामले में अच्छे लगते हैं कि भले ही इनका दर्शन जो है उधर जाता हुआ इस्लाम की तरफ मगर इस्लाम का प्रत्यक्ष रूप से वो तो करते हैं लोग सामने आते हैं वहां पर लोहा लेते हैं तो यहां पर के समान कह दिया तो अा इसी में नहीं क्या लिखा है प्रेम भिक्षु अच्छा यहां पर एक और चीज आ गई प्रेम भिक्षु मान लिया उन्होने अपने को प्रेम भिक्षु नाम

00:36:27:20 का आरोप लगाया था इन्होंने प्रेम भिक्षु आर्य लिख लिया इन्होंने अपने को मानस पीयूष विशेषांक हां भाई हो गए बध ये तो वो जब इन्होंने चीड़ उड़ाने वाला वीडियो बनाया था तो उसमें बड़ा बारबार एक शब्द आ रहा था मोए मोए हो गया वो आशीष कर रहा था ना आशीष की चैट दिखाऊ तो रिप्लाई तक नहीं देता नहीं आशीष नहीं है ऋषि उवाच नाम के हैं कोई वो कर रहे ऋषि अलंकार समाज के समय अलंकार समाज के जो सोशल मीडिया जो निचले स्तर की सोशल मीडिया के वो बने हुए हैं इस समय अगवा का निचले स्तर की गौतम खट्टर वगैरह का तो थोड़ा ऊपर ऊंचा स्तर हो गया भाई फम नेम फेम है तो निचले स्तर की जो सोशल मीडिया के जो निचले स्तर के जो मिल जाते हैं कि हमारा सरगना कौन है तो उसके अगवा का जो बने हुए हैं वो इस समय ऋषि उवा जी बने हुए हैं तो वही ये बोल रहे थे मोए मोए हो गया और ये देखो आप ये भिक्षु शब्द लिखा हुआ है प्रेम भिक्षु आर्य अब ये बहुत हो गए कि नहीं हो गए अच्छा एक एक मैं बात कहना चाह रहा था अगर कोई आर समाजी हो तो व सुन ले कि मैंने तो आप लगभग लगभग उन्होंने जितना भी मुझे ध्यान आया तो मैंने बताया

00:37:43:01 मगर हमने जो प्रश्न किया हा उन्होंने एक बात और कही है क्या कहा है व ब्रह्म जो है वोह माया से लिप्त हो गया यह हो गया भाई यह सब चीजें जो हो रही है पहली बात तो आप अलग ही तरीके से उनको व्याख्या कर रहे हो मगर अगर मैं मान लेता हूं हो भी रही है तो व व्यावहारिक धरातल पर नहीं है ईश्वर सर्वशक्तिमान सिद्ध होना चाहिए व्यावहारिक धरातल पर मनुष्य को समझ में आज आने वाली दुनिया में ईश्वर अपने एक्जिस्टेंस से बाहर जा सकता है नहीं जा सकता कहां परमार्थ में क्या ईश्वर मर सकता है नहीं मर सकता कहां परमार्थ में यह सारी चीज परमार्थ में हो रही मगर परमार्थ और व्यवहार में अंतर है परमार्थ का एक्जिस्टेंस आपके लिए तब तक है जब तक आप ईश्वर को ईश्वर मान रहे हो यानी कि परमा के एक्जिस्टेंस से पहले आपके लिए ईश्वर को ईश्वर रूप में स्वीकार करना आवश्यक है तो इसलिए व्यावहारिक दुनिया में ईश्वर का सर्वशक्तिमान सिद्ध होना आवश्यक है परमार्थिक दुनिया में तो ईश्वर निश्चित है वो प्राप्त व्य है व्यवहार की वही नहीं है व्यवहार का विषय नहीं है वो प्राप्त व्य है तो इसका अर्थ है कि जितने भी व्यवहार में आ सकने वाली बातें हैं वो सब कुछ ईश्वर करके दिखा दे वो सर्वशक्तिमान है आपका ईश्वर व्यवहार में बाधित है जन्म नहीं ले सक रहा है बहुत सी और चीजें नहीं कर सकता इसीलिए मूर्ति पूजा का विरोध है मगर

00:38:58:08 आप जो बातें कर रहे कि व माया से लिप्त हो गया यह हो गया वो हो गया वो एक अलग विषय लंबा हो जाएगा मगर फिर भी आप करतो से बाधित परमार्थिक धरातल पर रहे हो ना जैसे अभी शुरू में किसी ने प्रश्न पूछ लिया था क्या ईश्वर अपने आपको अपने जैसा एक और ईश्वर बना सकता है नहीं परमार्थिक धरातल पर नहीं बना सकता मगर वो परमार्थ है क्या जीवन कर रहा है जब तक आप किसी को सर्वशक्तिमान ईश्वर मान रहे हो है ना अगर आपने परमार्थिक धरातल पर ईश्वर के एक्जिस्टेंस को मना कर दिया मैं नहीं मानता ऐसे ईश्वर क्योंकि ये परमार्थिक धरातल में बाध्य हो गया बाधित हो गया तो क्या होगा जैसे ही आपने ईश्वर को मना किया वैसे ही आपके पास परमार्थिक धरातल का एक्जिस्टेंस भी नहीं बचा क्योंकि परमार्थ को आप देख किसकी नजरों से रहे हो ईश्वर की नजरों से और आप ईश्वर को ईश्वर माना नहीं तो जब आपने ईश्वर को ईश्वर नहीं माना तो जैसे ही ईश्वर को ईश्वर नहीं माना तो परमार्थिक धरातल आपका नष्ट हो गया जब नष्ट हो गया तो आपके पास फिर ये प्रश्न शेष रह गया कि आप ईश्वर को ईश्वर क्यों नहीं मान रहे आप अगर ये कहोगे परमार्थ में वो वादित है तो आपको सामने वाला आपसे पूछेगा मैं आपसे पूछूंगा कि परमार्थ तो एजिस्ट ही नहीं करता ना जब आप ईश्वर को ईश्वर नहीं मान रहे तो तो कहने का अर्थ ये है कि व्यवहार में सब कुछ कर देने वाला कर सकने वाला ईश्वर सर्वशक्तिमान होना

00:40:13:10 चाहिए परमार्थ का तो मेरी आवाज आ रही है सभी को सभी को आवाज आ रही है आ आ रही है ठीक हां तो व्यवहारिक अच्छा धरातल पर ईश्वर का सब कुछ कर सकने वाला एक एक मिनट बस मैं फिनिश कर लू अपनी जिस प्रकार से एक सोता हुआ व्यक्ति जगने के बाद यह नहीं कह सकता

00:40:37:07 कि मैं किसी की आवाज सुनक जगा हूं क्योंकि अगर वह सुन सकता है तो उसका सोना सिद्ध नहीं होता और अगर वह सो रहा है तो उसका सुनना सिद्ध नहीं होता इसी प्रकार से परमार्थ के आधार पर कोई व्यक्ति यह नहीं कह सकता कि मैं ईश्वर को नहीं मानता क्योंकि अगर वह परमार्थ को जानता है तो ईश्वर को तो उसका को ना मानना सिद्ध नहीं होता और अगर व ईश्वर को नहीं मानता है तो उसका

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00:41:03:06 जानना सिद्ध नहीं होता अा यह देखिए सबसे पहले तो यह ओम देखिए ओम ऐ आर्य समाज लिखते हैं इस्लाम के दीपक यह देखिए आर्य समाज चोक से य प्रकाशित होती है इसमें इस्लाम की इतनी तारीफ की गई है बहुत ज्यादा अच्छा इस्लाम इस्लाम और आर्य समाज अच्छा अब ये कोई कह देंगे भाई साहब ये तो गलत मतलब मिलावटी है किसी और ने छाप दी ऐसे कैसे छाप देगा भाई आर्य समाज चौक से छपी हुई

00:41:43:06 है ठीक है तो भाई मतलब यह अपना तो छुपा के रखते हैं कि भाई किसी को दिख ना जाए अच्छा एक बात और बता अगर यह पीडीएफ कोई वायरल करता है ना तो उसको धमकी देते हैं कि मूर्ख हो के तो ये क सब वायरल कर रहे हो भाई क्यों नहीं वायरल करेंगे एक बात और बताता हूं कि राहुल आर्य को सब जानते होंगे ठीक है जी जी राहुल आर्य ने एक वीडियो बनाई थी कि जो कुंभकरण है वह छ महीने तक नहीं सोता था ऐसा वाल्मीकि रामायण में प्रकरण ही नहीं मिलता है कि कुंभकरण छ महीने सोता था इनकी वाल्मीकि रामायण अलग है य जगदीश्वरानंद सरस्वती नाम के कोई व्यक्ति है जी जी उने मेरे पास है वो वाल्मीकि रामायण भी है वो वाली ठीक है तो उसमें श्लोक नहीं था जिसमें छ महीने सोता था चलो यहां तक ठीक थी बात वो व्यक्ति वही बोल रहा है जो उनकी वाल्मीकि रामायण लिखा है उसने आगे यह बोला कि मिलावटी वाली वाल्मीकि रामायण में भी वो श्लोक नहीं है जबकि तीन चार श्लोक मिलते हैं जिसमें कुंभकरण छ महीने तक सोता है ऐसी बात लिखी है वाल्मीकि रामायण में गीता प्रेस से जो छपती है तो उस व्यक्ति ने वो वाली वाल्मीकि रामायण भी नहीं पढ़ी है कभी वो सिर्फ लेख पढ़ के ही वीडियो

00:42:58:08 बना डालता है ठीक है और लोगों को भ्रम में डालता है लोग सोचते हैं अरे ये तो पंडितों ने मिला दी ये तो पंडितों ने मिला दी दूसरा ये खुद के दयानंद जी को भी नहीं पढ़ते हैं एक वीडियो बनाई थी राहुल आर्य ने उसमें कह रहा था कि अगर मासिक धर्म चालू है किसी स्त्री के तो पंडा लोग कहते हैं कि उसको पूजा में ना बैठाए पूजा में ना बैठाए उसका स्पर्श ना करे वो पूजा पठ दि ना करे तब वो कहता है छाती ठोक के राहुल आर कि कौन से वैदिक ग्रंथों में ऐसा लिखा हुआ है कि स्त्री को ये सब नहीं करना चाहिए सब पंडितों ने मिला दिया है ये अपने स्वार्थ सिद्धि करते हैं ऐसा कुछ नहीं लिखा हुआ अरे जब दिखाऊं आपको दयानंद सरस्वती जी ने क्या लिखा है उसमें हम ये देखिए ये संस्कार विधि है इसमें पढ़िए अगर आपको दिख रहा है तो उस रज स्ला के हाथ का छुआ पानी भी ना पिए पूजा तो दूर की बात छुआ पानी तक पीने को मना कर दिया ये कहां लिखा है कौन सा ग्रंथ है ये ये संस्कार विधि सं विधि अच्छ अच्छा अच्छा दयानंद सरस्वती जी ने लिखी है ये ना वह स्त्री कुछ काम करे किंतु एकांत में बैठी रहे तो भाई खुद के मतलब खुद के तो ग्रंथ पढ़ लो तुम पंडा पंडा के के पंडितो आरोप लगाते हो खुद कुछ नहीं पढ़ते जीवन भर हा सारे

00:44:13:10 ग्रंथ इनके अपने अब बात एक चीज यह आती है कि मैंने उस वीडियो में सवाल इतने इनसे पूछे हैं उसमें से सवालों को इन्होने लिया ही नहीं कि भाई जब आना जाना स नहीं होता नहीं लेते सवाल पूछे उनको लिया ही नहीं इन्होने अपने उसम जबक हमने इनका एक एक सवाल लिया था जब बनाया था वीडियो बहुत बैठ के विस्तार से इनकी सारी अभी एक अच्छा एक चीज मुझे और दिखाई देती है कि जो इनका फलना फूलना है वह ऐसा दिखाई देता है जैसे क्रिश्चन जो मिशनरी जिस तरह से काम करते हैं कि जो दबा कुचला वर्ग होता है उनको यह दबा कुचला पिछड़ा या फिर अन गया अनजान उस वर्ग के ऊपर यह लोग हाथ रख और उनको ऐसा दिखाते हैं कि हम तुम्हारे हिमायती हैं और जिस तरह से मिशनरी उनका परिवर्तन करती हैं इसी तरीके से य भी अब जैसे किसी का किसी ने शूद्र कुल में जन्म लिया है तो यह उसको बोलते हैं कि भाई तुम ब्राह्मण हम तुम्हें ब्राह्मण बना द तो क्या है वही चीज है बिल्कुल जैसे वो क्रिश्चन व पर बना रहे हैं यह उसको जो आ समाजी बना रहे कि तुम शूद्र हम तुमहे ब्राह्मण बना देंगे अरे भाई आपने आज तक शूद्र किसको बनाया है में आपके अकॉर्डिंग शूद्र

00:45:28:19 है भी कोई कि नहीं एक अगला वीडियो आने वाला है ये वर्ण व्यवस्था पर जिसमें केवल मैंने तर्क पूछे इन्होने आज तक किसी को शूद्र बनाया ही नहीं है जितने भी ऐसे ता पता है इन्होने मनुस्मृति का भाष्य करते हुए लिखा है व लोक ढूंढना पड़ेगा कि अगर कोई व्यक्ति अपने नामकरण संस्कार जब होता है अगर कोई व्यक्ति अपने पुत्र को शुद्र बनाना चाहता हो तो वो शुद्र जैसा नाम रखे अपने पुत्र का इस तरह सेने मनु में लिख रखा है आपको श्लोक में बता देता हूं ढूढ के लेकिन आप मुझे बताइए ऐसा कोई व्यक्ति होगा जो अपने पुत्र को शुद्र बनाना चाहता हो वही तो मैं कह रहा हूं अगर मनुष्य की इच्छा पर आप वर्ण व्यवस्था को छोड़ दोगे तो विप्लव होगा और वो विप्लव हो रहा है ब आज हर कोई दूसरे के कार्यक्षेत्र में बाजी मारना चाहता है कोई कोई अपने साब सीमा में है ही नहीं जब भगवान श्री कृष्ण कहेंगे जब भगवान श्री कृष्ण कहे हे अर्जुन तू क्षत्रिय जा रक्षा करना तेरा धर्म है सोही श्री कृष्ण भगवान वो अर्जुन कहेगा अर्जुन कहेंगे श्री कृष्ण से मैंने अभी अभी कर्म ना ण कर्मणा वर्ण व्यवस्था के अनुसार अपना जो है वर्ण बदल लिया है और अभी अभी मैंने पंडिताई करने की सोची है

00:46:44:03 मैं जा रहा हूं कथा बचने मैं तो यहां से चला अब आप संभालो और व रथ से उतर के चला जाएगा और पीछे श्री कृष्ण भगवान अर्जुन सुन भाई अरे सुन ले भाई जन्म से होता मण से नहीं होता मया सिस्टम माया ने बनाया है अरे सुन नहीं नहीं कर्मणा मैं आर समाजी हो गया हूं मैं स्कन वाला हो गया हूं कर्मणा मैं तो कर्मणा मानता हूं वाह अ एक बात और जोड़ना चाहता हूं कि यसे बोलते कि वण बदल जाता है ठीक है मान मनुस्मृति में सजा का दंड का विधान है कि चारों वर्णों को अगर चार वर्ण के लोगों ने एक अपराध किया है एक ही अपराध तो चारों को अलग अलग सजा मिलेगी आज सुबह ला वा हा ब्राह्मण क्या करेगा कि पहले शुद्र बनेगा कि अ मैं शुद्र वाला कार्य करके शुद्र बन गया अपराध कर दिया तो साबित हुआ तो शद कम सजा मिलेगी तो भाई य प्लानिंग करके बच सकते है इसमें तो लोग इनका मेरा सीधा सा प्रश्न है कि जैसे अभी ये भी एक बहुत बात फैलाई जाती हैकन के द्वारा कि भैया वो जो शास्त्र है तमोगुण शास्त्र है तमोगुण लोगों के लिए है तो अगर वो तमोगुण लोग है तो इसका मतलब तमोगुण लोग एजिस्ट करते होंगे ना दुनिया में अब एजिस्ट करते तो क्या इनके बाहर गेट पर कोई खड़ा होता है क्या जो

00:47:59:03 पूछता है तुम्हा तुम तमोगुण हो कि सतोगुण हो तो तो अंदर जाओ क्योंकि अंदर जो भागवत पढ़ाया जाएगा शिव पुराण जो है नहीं पढ़ाया जाएगा तो इन्होंने आज तक जितने भी ऐसे तंत्र है उन्होंने कभी किसी को शूद्र बनाया है घोषित किया है तो इनके हिसाब से तो सर्विस डिपार्टमेंट है ही नहीं दुनिया में तो सर्विस कर कौन रहा है अगर सर्विस व शूद्र कर रहे हैं तो इन्होंने क्या उसको शूद्र कहा है नहीं कहा है इन्होंने किसी को शूद्र कहा ही नहीं है आप देख लेना इस कन और आर समाज के द्वारा घोषित शूद्र एक भी निकलवा दो और ये जो प्रमाण पत्र की बात है घोषणा य कौन से नियमों के आधार पर कौन होता है कौन देता है क्या होता है कुछ नहीं बिल्कुल अच्छा ये देखिए अध्याय दो श्लोक 31 और 32 ब्राह्मण बनाने के इच्छुक बालक का नाम शुभ तत्व श्रेष्ठ तत्व भाव बोधक शब्दों से जैसे ब्रह्मा विष्णु मनु शिव अग्नि वायु रवि आदि रखना चाहिए अब इसमें देखिए जैसे शुद्र वाला आया है ये शुद्र रखने के इच्छुक बालक का यानी आप शुद्र बनाना चाहते हैं तो शुद्र जैसा रखिए जबकि इसका अर्थ यह नहीं था इसका प्रचलित अर्थ क्या है ब्राह्मण का मंगल मंगल सूचक शब्द से युक्त है ना तो लेकिन अब इनको मिलावटी भी घोषित नहीं कर

00:49:14:04 सकते श्लोक को तो क्या करें तो इसका अर्थ यह कर दिया जबकि श्लोक के विपरीत है मूल संस्कृत के विपरीत अर्थ है यह तो बिल्कुल तो बहुत बढ़िया काफिर है आजम जी बहुत बढ़िया मैं और ब जिसको चर्चा करनी है ना वर्ण व्यवस्था पर या किसी भी बात पर हमारा एक फॉर्म है एक नंबर नोट कर लीजिए यह कोई चुनौती नहीं है शास्त्रार्थ की चर्चा का आमंत्रण है जिसको भी जो भी असहमत है हमारे विचारों से तो वो एक नंबर नोट करें उस पर वो मैसेज अगर करता है जय श्री राम या किसी भी प्रकार का अभिवादन करेगा तो उसको एक फॉर्म प्राप्त होगा कि वैचारिक मतभेद के निमित्त चर्चा के लिए फॉर्म भरें वह फॉर्म आप भरेंगे डिटेल वैसे ही हमें आपकी सारी जानकारी प्राप्त हो जाएंगी और हमारी और आपकी एक स्वस्थ चर्चा सुनिश्चित हो जाएगी फॉर्म की एक मर्यादा है कि यदि डिसएग्रीमेंट पर हमारी चर्चा होनी है तो आपको फेस के साथ आना है बिना फेस के हम चर्चा नहीं करेंगे अभी अभी कोई सूरज जी उन्होने कहा मुझे लिंक दो यह दो वो दो

00:50:29:07 तो सूरज सनातनी जी आप वो फॉर्म भर दीजिए मैं आपको नंबर बता रहा हूं 740 8369 इस पर आप व करेंगे तो आपको फॉर्म मिल जाएगा और जैसे ही फॉर्म मिलेगा बस उसको आप भरिए उसमें अपनी फोटो वगैरह लगाइए हम थंबनेल वगैरह बनाएंगे और सोशल मीडिया के निमित और सारी प्रचार सामग्री बनाएंगे और आपको वो दे देंगे आप आइए आपका नि आमंत्रित है स सम्मान स सम्मान कोई वहां पर अबे तू तड़ाक मैंने ऋषि वाज के चैनल पर जाकर के देखा कि उसम एक जगह मेम बनाया है अरे शिवांश द्विवेदी तूने दो चार तेरे फॉलोअर क्या हो गए तो तू अपने आप को बड़ी तोप समझने लगा यह है वो तोय इस स्तर पर तुरंत आ जाते हैं अकन वाले थोड़ा देर में आते हैं और ये मैं कहूंगा इकन के द्वारा प्रतिपादित होने वाला जो ईश्वर है व तब भी आर समाज के ईश्वर से ज्यादा शक्तिशाली है भाई इतना तो है क्योंकि वो अवतार ले सकता है बिल्कुल अच्छा इसकी मैं इस पर एक बात करना चाहूंगा वो जो ईश्वर की जो शक्ति है ना शक्ति संपन्नता से ही धर्म की स्थापना होती है तो जिसके पास जितना कमजोर ईश्वर उसकी मर्यादा उतनी कमजोर है ना मेरे कुछ

00:51:44:09 आर्य समाज मित्र है जो अब पौराणिक बन चुके हैं वो मुझे ऐसे ही कहते हैं कि जीवन में कुछ भी कर लेना लेकिन कभी सत्या प्रकाश मत पढ़ने को देना किसी भी ऐसे व्यक्ति को जो कुछ नहीं जानता हो उसका जीवन बर्बाद हो जाएगा उसके आगामी पाच साल बर्बाद हो जाएंगे क्यों कारण वो बताते हैं कि हम जब हमने जब पढ़ा तो हमारे अंदर सत्या सत्या प्रकाश पढ़ने के बाद यह अहंकार आ गया कि भाई हम हो गए ज्ञानी ठीक है ये आचार्य कौन ये संत कौन यह माता पिता कौन भाई मैं हूं ज्ञानी सबसे बड़ा ज्ञानी हो गया तो हर चीज में मुझे कमी दिखने लग गई कि इसमें भी कमी है इसमें भी कमी है इसमें भी कमी है अच्छा ग्रंथ भी मैं इसलिए पढ़ूंगा कि मुझे उसमें खंडन करना है है भाई हम इस स्तर के हो गए हैं सत्या प्रकाश पढ़ के कि अब तो हम खंडन करेंगे पढ़ना अरे हमने सब कुछ सीख लिया तो आगामी पा साल बस ही खंडन वणन खंडन वर्न लेख किताब जो भी है वह करता रहेगा जीवन अपना बर्बाद कर लेगा कुछ नहीं कर पाएगा जीवन में मूर्ति पूज को से द्वेष करेगा कि भाई दिखते ही चिड़चिड़ापन उसके अंदर चिड़चिड़ापन हमेशा रहता है इस कारण यह कभी ब्रह्मचर्य का पालन नहीं कर पाते इसका मैं सामने कह रहा हूं भाई किसी को चड़ लगे ना तो भाई अंदर अपने मन पर हाथ रख के अपने मन से ही कह लेना कि भाई यह सत्य है नहीं है आपको

00:52:59:12 लगेगा भाई सत्य है ठीक है आपके अंदर चिड़चिड़ापन है यह सत्य है आप इस कारण ब्रह्मचर्य का पालन नहीं कर पाते यह भी सत्य है मा एक कोने में कहीं तो सत्य का होगा ना कि हा सही कह रहा है य तो अब ये वो जो मैं कह रहा था कि दयानंद सरस्वती जी ने द्वेष पूर्वक भाष्य किया है की अध्याय चार लोक य 87 8 है स मनुस्मृति यह देखिए आर्य समाज का ही है हां हा विशुद्ध [हंसी]

00:53:37:07 मनुस्मृति हा तो अच्छा मेरे 700 और बर्बाद हो गए इसमें ठीक है कि आज मेरे को पस्ता पहले मैं जब आर्य समाजी था तब खरीदा था जो जोश में आज पछतावा होता है अर्थ गलत है सारे क्या पढ इसमें तो इसमें देखिए इन्होने जो अर्थ किया है यह वाला वर्ड देखिए दश ध्वज सम वेष दश ध्वज के समान वेश अर्थात वेष भंडवा भांड दूसरे की नकल अर्थात पाषाण मूर्तियों के पूजक अब मुझे बताइए पाषाण मूर्तियों के पूजक अर्थ कैसे हुआ इसमें अ करने की क्या जरूरत थी अर्थात लिखकर और दूसरी बात ये स्टार आपकी आवाज कट रही है अच्छा अब आ रही है साफ आपकी आवाज कट रही है साफ आ रही है अब तो इन्होंने ये मूर्ति ये जो है मूर्ति पूज मूर्तियों के पूजक यानी पुजारी ब्रैकेट में पुजारी तक लिखा है यह क्यों लिखा है इसका अर्थ जबकि इसका अर्थ तो यह है ही नहीं और दूसरा अ ये स्टार देखिए ये स्टार देखिए इसका अर्थ है कि सुरेंद्र कुमार जी जो आर्य समाज के विद्वान है इसको मिलावट माना

00:54:52:14 है इस श्लोक को लेकिन दयानंद सरस्वती जी ने तो इसको प्रमाण स्वरूप माना है तो दयानंद जी जो है वह सही है कि कुमार जी सही है मुझे तो आज तक यही समझ नहीं आ रहा दयानंद जी को भी सही नहीं मानते भाई साब उन्होंने प्रमाण स्वरूप प्रयोग किया होगा वोह गलत है क्योंकि यह तो मिलावटी है श्लोक ही तो इनम आपस में नहीं बनती कभी हा मैं देखो मैं यहां पर एक बात कहना चाहूंगा कि भाई हम आपके ग्रंथों से कुछ बातें निकाल करके बता रहे हैं अगर हम गलत मतलब समझ रहे हैं तो आप सही मतलब बताने के लिए आमंत्रित है अगर हम जो आपने लिखा है वो मानते हैं भाई जैसे आपने व ंं का अर्थ कह दिया कि गुरुदेव ने जो है करपात्री जी का विरोध किया फिर उसका हमने निस्तारण दे दिया तो उसके बारे में आपने अपने वीडियो में बात नहीं की चंदासी वाले मामले में आपने बहुत से प्रश्नों पर बात ही नहीं की है जो निचले स्तर के आर समाज यों के सरगना है उनसे कह रहा हूं मैं और इनका सबसे अच्छा नाम जो मुझे लगता है व आरमा की बज अलंकार समाजी ज्यादा अच्छा लगता है क्योंकि इन्होंने जो अलंकार दिया है ना वो वो जो है प्रशंसा के योग्य है अलंकार इन्होंने जो वैदिक मंत्रों को अलंकार दिया

00:56:07:14 है वो बहुत ज्यादा एक शशांक श्री श्रीवास्तव जी कह रहे हैं कि करते रहो सूत्रों का शोषण शास्त्रों के अनुसार नहीं गलत समझ नहीं आ रहा शूद्र जो संज्ञा है वो गणा सूचक नहीं है आपको अगर कोई आपत्ति है शशांक जी तो आप सादर आमंत्रित है आप आइए और आपसे चर्चा होगी तू तड़ाक में हम बात नहीं करेंगे जैसे आपके लोगों ने किया आप देखिएगा जाकर के कितने गलत तरीके से बात किया और हम हमारे वीडियो देखिएगा हमने कैसे जवाब भी दिया और देखिएगा स्तर बताइएगा कैसा है किसका और फिर बताइए कि स्तर से क्या पता चलता है कहां पर धर्म का पालन हो रहा है हसलो हसलो अच्छी बात आप मुझ सपने जी आपको मैं बताता हूं अध्याय 12

00:57:07:20 श्लोक ठीक है देखिए श्लोक देखिए अध्याय 12 श्लोक 40 मनुस्मृति ही है इसमें जीव की तीन गतियां बताई गई है तो सत्व गुण का आचरण करने वाले पर जन्म देवत्व अर्थात दिव्य गुणों से युक्त विशेष मनुष्य का जन्म प्राप्त करते हैं ठीक है जन्म से मनुष्य विद्वान हो गया इनम रजोगुण अर्थात रजोगुण आचरण करने वाले साधारण मनुष्य का जन्म पाते हैं एक साधारण मनुष्य होता है एक असाधारण मनुष्य होता है जो आर्य समाजी होता है ठीक है जन्म से सत्या प्रकाश का ज्ञान लिए लेता है व तमोगुण आचरण करने वाले पशु पक्षी कीट पतंग वृक्ष वनस्पति आदि त्रय जन्मों में प्राप्त करते हैं तो ऐसा ही सेम श्लोक एक महाभारत में भी मिलता है वो मैं बता देता

00:58:00:28 हूं बारात आ रही है किसी की तो आवाज आएगी शायद गानों की देखिए महाभारत का श्लोक है प्राणी पहले ही सुख दुख तथा प्रिय और अप्रिय विषयों में विचरण करके कर्म के अनुसार नरक त्रक योनि मनुष्य योनि अथवा देव योनि में जाते हैं तो अब इनको मानना पड़ रहा है यह श्लोक मिलावटी कह नहीं पा रहे इसलिए इन्होंने क्या करा है उस देवता को हमेशा विद्वान बताया है देवता क्यों नहीं मान रहे मुझे यह समझ नहीं आ रहा देवता योनि के कर्म के अनुसार जन्म सुनिए कर्म के अनुसार जन्म जन्म जो है प्राप्त होना जो है वह छंद उपनिषद में भी बताया गया है कि कर्म के अनुसार योनि प्राप्त होती है और सुनिए सबसे बड़ी बात मैं मान लू यदि जो ईश्वर इन्होने एक जगह कहा है प्रकाश में क्या जब यह बात आए कि शूद्रों को या महिलाओं को वेद मंत्र नहीं पढ़ने चाहिए भाई वेद मंत्र से ही मोक्ष मिलेगा ऐसा तो है नहीं उन्हीं वेद मंत्रों की व्याख्या प्रवचन के रूप में की जाएगी भाष्य के रूप में की जाएगी तो उससे भी मोक्ष मिल जाएगा मतलब तो ज्ञान से है उसी रूप में ज्ञान मिले जो रूप जो है हर कोई संभाल सकता है नहीं संभाल

00:59:16:04 सकता व अलग बात है मगर बात य है कि जो इन्होने लिखा क्या ईश्वर पक्षपात जो व ऐसा करेगा तो अब यह बताइए कि जो व्यक्ति वेदों के बगल में जहां वेद रखे हैं मान लीजिए आ समाज का ही घर है उसमें वेद रखे हैं उसके बगल में जिसका जन्म हो रहा है वह व्यक्ति उससे ज्यादा सौभाग्यशाली हो गया जो वेद से उतने ही सेंटीमीटर या फिर इंच या फिर किलोमीटर दूर है मान लीजिए किसी का जन्म हुआ वेस्ट इंडीज में और किसी का जन्म हुआ वैदिक घर में वैदिक घर मतलब य अलंकार का घर उसकी बात कर रहा हूं अलंकार समाज के घर में जब किसी बच्चे का जन्म हुआ किसी शिशु का जन्म हुआ उसके कंपैरिजन में एक बच्चे का जन्म जब वेस्ट इंडीज में हो रहा है अलंकार समाजी के घर में जन्म लेने वाला जो शिशु है वह आसानी से वेद को ग्रहण कर सकता है उसके सामने वेद है वेदों तक उसकी रीच है मगर एक वेस्ट इंडीज में या फिर साउथ अफ्रीका के जंगलों में ज जन्म लेने वाला जो प्राणी है उसका हो सकता है पूरा जीवन बीत जाए वो वेदों तक पहुंच ना पाए तो क्या ईश्वर पक्षपाती है जो उसने वहां पर जन्म दिया उ वेदों के बगल में ही सबको जन्म मिलना चाहिए अगर ईश्वर पक्षपाती नहीं

01:00:31:07 है और कर्म के अनुसार जन्म नहीं मिलता तो वेद जहां रखे हैं बिल्कुल उसके बगल में होना चाहिए या फिर इससे भी ज्यादा कोई नजदीकी स्थिति हो सकती है तो वहां पर दुनिया के हर प्राणी को जन्म मिलना चाहिए क्यों मिल रहा है वेदों से हजारों किलोमीटर दूर किसी को जन्म और किसी को वेदों वाले घर में जन्म मिल रहा है इसका कारण क्या है क्यों ईश्वर ऐसा पक्षपात कर रहा है किसी के साथ के उसका पूरा जीवन बीत जाए तब जाकर के वेद नाम सुन पाए ऐसा क्यों कर रहा है ईश्वर क्या ईश्वर पक्षपाती है और जो कहो वो सत्यार्थ प्रकार का स्टाइल है उसमें इसी तरह से इसी भाषा में बात की जो कहो जो कहो जो कहो बड़ा अच्छा लगता है वहां जब पढ़ते हैं तो जी सत्या प्रकाश की एक बात में मुझे हंसी आती है कि वो भागवत पुराण तो भाई किसी बोपदेव ने बनाया है और किसी को विश्वास ना हो तो वो पत्र खोज ले क्योंकि हमसे तो वो घूम गया प्रमाण था वही पत्र खो दिया ये तो अचंभे वाली बात है ऐसा तो मैं कह दूं कि मेरे पास एक पत्र है जिसमें लिखा हुआ है कि दयानंद सरस्वती अंग्रेजों से मिले हुए थे दयानंद जीहे ऐसा काल्पनिक पत्र है कि ऐसे मिले हुए थे पत्र खोल ले एक चीज अभी ये चीज

01:01:46:10 समझ में आ रही है कि एक तरफ ये कह रहे हैं जो शूद्र होता है वो वो है जो अज्ञानी है जो जिसके बुद्धि कम है ऐसा ही तो है ना और एक जगह कह रहे हैं कि अगर व्यक्ति को शूद्र बनाना यानी कोई व्यक्ति अपने बच्चे को अज्ञानी भी बनाना चाहेगा अपनी बिटिया को अपने बाबू को अज्ञानी भी बनाना चाहेगा तो ये समझ में नहीं आया भाई कोई हो तो आप जरूर आइएगा और इन बातों को बताइएगा जरा क्योंकि हम परंपरा को मानते तो जब तक आपकी तरफ से ठप्पा नहीं मिल जाएगा तब तक ये सवाल रहेगा आक्षेप नहीं है ना अच्छा वो आप मैं बता रहा था ना 1000 हत्या के दोषों के बराबर है जी जी वो एक तो मिलता है दयानंद जी का पत्र व्यवहार में देखिए जी रामलीला देखने का दोष हा दोष है हजार हत्या के समान दोष है यह पत्र व्यवहार है ठीक है हा पत्र व्यवहार लखनऊ हा यह मैं आपको भेज दूंगा इसकी पीडीएफ जी जी जी ऋषि दयानंद सरस्वती विपन राम मंदिर के पक्षधर है भाई

01:02:56:10 और दूसरा था जीवनी है एक उसम है हा देवेंद्रनाथ जी मनीष शर्मा जी देखिए आप व्यक्तिगत तर्क देते हैं हमारे पास सनातन सिद्धांत है अगर सनातन सिद्धांतों को आप लागू करेंगे तो वह आसान भी होगा लागू करना और आसानी से हम अपने जो धर्म है हमारा समाज है उसका भला कर पाएंगे ये सब अगर ऐसा नहीं करेंगे अगर अगर ईश्वरी सत्ता के नीचे खड़े होकर के हम अपने विचार प्रकट नहीं करेंगे तो हर व्यक्ति का अपनी अपनी ढपली अपना अपना राग होगा हम लोग एक हो कैसे पाएंगे अब आपने एक निकाल दिया अलग-अलग सरनेम होने से हि हिंदू समाज टूट गया है भाई सनातन ने तो ऐसा कहा नहीं कि अलग-अलग सरनेम होने की वजह से टूट गया है तो इस पर विचार करिए सनातन सिद्धांत लाइए उनको हम मानेंगे बिल्कुल मानेंगे मनीष शर्मा जी आप अच्छे व्यक्ति है देवेंद्रनाथ जी की जीवनी है दयानंद जी का जीवन जीवनी पुस्तक का नाम है और देवेंद्रनाथ जी जो आरी समाज के वो है इसमें भी हजार हत्या के दोषों के बराबर बताया है रामलीला देखना और मूर्ति पूजा करना अच्छा ये रहा तो हम कोई शास्त्रों से ही बातें बोल मतलब आपकी लिखी

01:04:11:18 पुस्तको से ही बात बोल रहे कोई अपने मन से नहीं बोल तो मेरे को बता दीजिएगा सा हजार हत्या दोष लगा दिया है आपने रामलीला देखने का तो आर्य समाज तो एक मूवी भी बना रहे थे रामायण के ऊपर तो वो भी तो रामलीला ही है पूरे टीम को हजार हत्या के दोष के बराबर माना जाए जी जी जी अरे मैं कह रहा हूं वो आर्य समाज छोड़ दो कि वो रामलीला पर बना रहे थे चलिए मान लीजिए और किसी पर बना रहे थे तो मान लीजिए रामलीला तो तब भी एक श्रेष्ठतम साहित्य हो गया उस पर मूवी बनाने को लोग हत्या बता रहे हैं तो जो इनके जो अभी अंकुर आर्य बता रहे थे हम फिल्म बना रहे हैं ये बना रहे हैं तो वो तो कितनी हत्याओं के पा पाप लग गया उनको अंकुर आर्य छोड़ो क्या ही बोल ति के बारे में बोलते हुए मुझे थोड़ा ऐसा लगता है कि वो व्यक्ति सिर्फ कमाने के लिए आया है य पर इन सारी इन सभी बातों का जवाब है आर्य जी जो आप बातें कर रहे हैं तर्क सम्मत और शास्त्र सम्मत दोनों प्रकार का जवाब है एंट्री नहीं मिलनी चाहिए तो क्यों नहीं मिलनी चाहिए मिलनी चाहिए तो क्यों मिलनी चाहिए पर इस पर हम लोग बात कर भी चुके हैं और कभी आप अगर पधारेंगे तो आपसे बात होगी चर्चा होगी इन लेन की एक बात बताता

01:05:26:25 हं जब य खंडन करने आते हैं तो जो आप पूछ रहे शीशा पिघलाकर डालने को इसका जवाब दे दिया है आप पिछली बारी वो देखिएगा या फिर अभी एक दो दिन में हम लोग शॉर्ट बना देंगे यह जो बात है पिगला के डालने वाली जो व्यक्ति को चुराने के निमि वेद मंत्र को सुन रहा है रट रहा हैब से दंड दंड के रूप में अगर कोई गुप्त मंत्रणा कहीं पर चलती है और उसको कोई सुनने का प्रयास करता है मान लीजिए फौज वगैरह का कार्य चल रहा है तो वहां पर जिस प्रकार से गुप्त मंत्रणा को सुनने उस तरह से यहां पर है और अगर स्कार करते उनके हिसाब से देखा जाए तो ब्राह्मणों के पास पहली बात तो जरूरत से ज्यादा धन कमाने का अधिकार ही नहीं है और दूसरी बात हां व वो बहुत हो गए क्योंकि परंपरा प्राप्त जाते ना एक जगह आती है जहां अपने मत को आगे कर देते हैं और जो सनातन शास्त्र उनको पीछे कर देते हैं शास्त्र कह रहे हैं परंपरा पर जाओ मगर आप नहीं जा रहे शास्त्र में मांड को उपनिषद में परंपरा बताई

01:06:41:27 जा रही है निरुक्त में परंपरा बताई जा रही है मगर आपसे जब पूछा जाता है आपकी परंपरा क्या है आप नहीं बताते हो बताते हो तो अपने जिनसे आपने वेद लिया है उनको ही मना कर देते हो य हमारे गुरु नहीं है उनको गधा तक कह देते हो जिनसे आपको वेद मंत्र प्राप्त हुए तो इसलिए सिद्धांत बदल रहे हैं ना व्यक्तिगत कौन हो रहा है एक बात मैं बताता और मैं वो बोल रहा था कि मैं जो बोल रहा था शीशा पिघलाने की जो बात है व सापेक्ष बात है कि पहली बात तो ब्राह्मणों को जरूरत से ज्यादा धन कमाने की आज्ञा ही नहीं है दूसरी बात उस पर भी यह है कि केवल उनके पास वेदी शास्त्रों की जो व्याख्या है या फिर उनका ही जो उनका ही आलंबन लेकर के आजी को पार्जन था तो उस पर भी यदि कोई उनके उस चीज को चुराना चाहता तो उस चुराने की दृष्टि से वहां कहा गया नहीं तो रामायण जो स्वीकार की गई आदि शंकराचार्य जी के द्वारा तो उसम अद यज्ञ अद यज्ञ में शूद्र भी होते थे जो सेवा का करते थे उनको बहुत अच्छे आदर से स्वीकारा गया उनके कानों में क्या वेद मंत्र नहीं पढ़ते

01:07:45:02 थे आपको मैं एक बात बताता हूं विवेकानंद जी जो थे अच्छा यहां विवेकानंद जी का नाम ले रहा हूं तो विवेकानंद एक बार साइड में रख दीजिए उन्होने क्या किया क्या नहीं किया उसका मेरे को मतलब नहीं है विवेकानंद जी की पुस्तक इन्होंने कोट किया उनका नाम है आचार्य अग्निवंशी महिला की कितनी तारीफ करते हैं कि वह ऐसी है वह ऐसी है व विदेशी महिलाओं में खोए रहते हैं तो ऐसा विवेकानंद जी के बारे में कहा बो ठीक है कह दिए लेकिन वही दयानंद दयानंद जी ने भी अपनी पुस्तकों में विदेशी महिलाओं की तारीफ करी है उसको आप क्यों नहीं बताते भाई दयानंद जी ने भी तो तारीफ करी है विदेशी महिलाओ की तो सिर्फ विवेकानंद जी पर ही आप आक्षेप क्यों उठाते हो इस मुद्दे को लेकर कि वो तो विदेशी महिलाओ की तारीफ करते थे विदेशी महिलाओं की तारीफ तो ये भी करते थे दयानंद जीपी लेकिन हमको तो

01:09:00:04 सिर्फ वही नहीं नहीं भाई वही मानेंगे जो दूसरा करेगा वो गलत सौ सीधी एक बात है पुराणों पर पुराणिक कथाओं पर या शंकराचार्य के भाष्य पर देखिए मैं अपने भाई गुरु भाइयों को बताना चाह रहा हूं या जो भी इस चैनल को फॉलो कर रहे हैं उनको बताना चाह रहा हूं प्रमाण शास्त्र सम्मत तर्क वितर्क देने के पहले सबसे पहले एक ही बात करिए कि आप वेदा जो हमारे द्वारा स्वीकार ग्रंथ है उनका जो अर्थ आप लेकर के आए हैं प्रश्न करने वह अर्थ आपने पहले किसी हम क्योंकि परंपरा को मानते तो परंपरा प्राप्त आचार्य से जाके कंफर्म कर लिया है कि आपकी लिखी हुई बात का हम यह अर्थ समझ रहे हैं शीशा पिघलाकर डालने का यह अर्थ समझ रहे हैं मंदिर में ना घुसने का हम यह अर्थ समझ रहे हैं या फिर छुआछूत का हम यह अर्थ समझ रहे हैं रणा मूलक अर्थ समझ रहे हैं जब आप

01:10:03:10 य जिन शास्त्रों को हमने स्वीकार किया है या फिर आप रासलीला पर आक्षेप लगा रहे हैं ब्रह्मवर्त पुराण पर आक्षेप लगा रहे हैं तो आक्षेप लगाने से पहले आप हमारे परंपरा प्राप्त आचार्यों से कंफर्म करके आइए कि क्या जो अर्थ में समझ रहा हूं वही अर्थ इस संदर्भ में इस भाष्य में इस ग्रंथ में दिया जा रहा है और जब वहां से आपको संतुष्टि जनक उत्तर नहीं मिलता है तब आपको आक्षेप लगाना चाहिए क्योंकि हम हम जिन ग्रंथों को स्वीकार करते हैं उसमें बार-बार लिखा हुआ है कि मनुष्य चाहे चारों वेद पढ़ ले सारे पुराण पढ़ ले सारे उपनिषद पढ़ ले जप तप व्रत दान पुण्य कर्म तीर्थ दान यज्ञ सब कुछ व्यर्थ है यदि आपका कोई प्रामाणिक आचार्य गुरु नहीं है हम इसको मानते हैं हमारे यहां रामचरित मानस प्रारंभ होती है तो उसम सबसे पहले गुरु वंदना होती है हमारे य पुराण जब शुरू होते हैं तो उसमें सबसे पहले गुरु वंदना होती है भगवत गीता का अध्ययन करते हैं तो हम चार दो को नकारते नहीं है जहा लिखा है एवं परंपरा प्राप्ति मांड को उपनिषद का अध्ययन करते तो उसमें उस श्लोक को नकारते नहीं है पहले ही अध्याय में जो परंपरा दी गई है कि कैसे ब्रह्मा जी से ग्रंथ यहां तक आए जब हम छंद उपनिषद का अध्ययन करते तो चौथे अध्याय के संभवत

01:11:18:25 चवा या दूसरा श्लोक है उसको नकारते लिखा हुआ है कि आचार्य से प्राप्त विद्या ही फलदायक है पढ़ लीजिएगा जाकर के तो इन सब चीजों को अनदेखा नहीं करते हम उसको कहते हैं सनातन वैदिक आर्य हिंदू एक एक आचार्य आचार्य प्रशांत नाम के व्यक्ति है जो आचार्य प्रशांत शर्मा जी आर्य समाज वाले वो वेदांती नहीं नवीन वेदांती नहीं जो नशा करते हैं तो जी उन्होंने एक वीडियो बनाई जो आर्य समाज के आचार्य प्रशांत शर्मा है उन्होंने वीडियो बनाई वर्ण व्यवस्था उन्होंने यही कहा मैं आपको कहूंगा आप आर्य समाज की आप आर्य समाज की बजाय थोड़ा आदत डाले अलंकार समाज कहने की तो वो ज्यादा थोड़ा रस रहेगा उसमें तो उन्होंने यही कहा कि वर्ण ऐसे नहीं बदलता है जैसा आजय अलंकार अलंकार समाज वाले बता रहे हैं ठीक है उन्होंने ऐसा कहा तो उस उनको भी वीडियो पर आर्य समाज के लोग अलंकार समाज के लोग भला बुरा कह रहे थे कि आपको कुछ नहीं पता भाई अपने आचार्यों को ही यह कह देते कि आपको कुछ नहीं पता जबकि वह आचार्य गुरुकुल में पढ़कर आ

01:12:33:27 रहे हैं और यह घर बैठे सत्या प्रकाश पढ़ के आचार्यों पर आक्षेप लगा रहे कि आपको कुछ नहीं आता तो आप बताइए कि सत्या प्रकाश पढ़ने पर फिर कैसे व्यक्ति की स्थिति हो जाती है गए ना पा साल आगे कचरे में जब उन्होंने महाभारत पढ़ा तो उनको समझ आया कि वण ऐसा नहीं बदलता है ऋषि आज जब मेरे समूह में आया तब मैंने एक प्रश्न रखा था कि वर्ण जो बदल रहा है इसका सर्टिफिकेट कौन दे रहा है कौन से ग्रंथ में लिखा है कि यह इसके इतने कर्म को देख के वर्ण का तुम्हारा वर्ण बदल जाएगा और इसका सर्टिफिकेट तुमको दे दूंगा यह कहा लिखा हुआ है तो उसको समझ नहीं आया यह तो कहीं लिखा हुआ ही नहीं है क्योंकि ब्राह्मण का तो न साल या 6 साल की उम्र में ही उपनयन संस्कार हो जाता है शूद्रों का तो होता ही नहीं है यह तो दयानंद जी खुद कहते हैं कि शूद्रों का उप संस्कार नहीं होगा तो मुझे ये बताइए कि कौन से ग्रंथ में ऐसा लिखा हुआ है कि वर्ण बदला जा सकता है और उसका सर्टिफिकेट कोई देगा ऐसा कहीं नहीं लिखा हुआ उसने वो जबाला वाला जो उदाहरण है ना उपनिषद में नहीं तो अब सर्टिफिकेट की कोई बात ही नहीं बची ना अब तो सर्टिफिकेट की कोई बात ही नहीं बची ना पिता जो होगा व अपनी क्या बनाना है हा बात ही नहीं रह

01:13:49:00 गई अब तो पिता तय करेगा इसको मूर्ख बनाना है विद्वान तो ऐसे भी कई पिता होंगे जो मूर्ख बनाते होंगे बिल्कुल भाई तुम शत्र बनो संतान को हां तुझे सूत्र बनना है भाई नहीं तो सेवा का कैसे होंगे वैसे है परंपरा परंपरा बहुत करते रहते हैं तो कभी-कभी ऐसा लगता है जो कर्मणा को पोषित करने वाले तंत्र है उनके लिए मुझे ऐसा लगता है कभी कभी कि दो बातें नजर आती है एक तो जो सूत्रों को जो सरल जीवन दिया गया है कि आप कितना भी धन कमा सकते हैं आप जो है आजीवन गृहस्थ रह सकते हैं और भी बहुत सी ऐसी चीजें जो अगर ब्राह्मणों के पर्सपेक्टिव से आप देखोगे तो बड़ी सरल जीवन है तो मुझे कभी-कभी ऐसा लगता है कि ये उन लोगों के द्वारा बनाए गए नैरेटिव है वो ऐसे ऐसे धूर्त ब्राह्मण जो कि शूद्रों का जीवन जीना चाहते हैं तो क्या किया शूद्रों को तो लगा दो इधर के तू ब्राह्मण बन और उनका जीवन खुद जिएंगे है ना पहली बात तो ये और दूसरी बात वही क्रिश्चियन मिशनरी वाली कि भाई कैसे जो कन्वर्जन होगा कन्वर्जन ऐसे ही होगा कि जो वहां से तुमको किसी भी पहले तो

01:15:04:03 एक प्रॉब्लम क्रिएट करेंगे जो है ही नहीं कि भैया जीवन का लक्ष्य ब्राह्मण बनना नहीं है जीवन का लक्ष्य शंकराचार्य बनना नहीं है जीवन का लक्ष्य वेद जो हमारे शास्त्र है उनको ही पढ़ना नहीं है जीवन का लक्ष्य बल्कि वेद वेदों के उससे फूटने वाला जो ज्ञान है उनका आलंबन लेते हुए और जो मोक्ष को प्राप्त करना हमारे जीवन का लक्ष्य तो पहली बात तो एक प्रॉब्लम क्रिएट की कि एक मार्केट में एक नैरेटिव फैलाया कि नहीं सबका जो लक्ष्य है वो यही है गायत्री मंत्र पढ़ना प्रणव का उच्चारण करना ब्राह्मण कहलाना रस सला की स्थिति में भी पूजन पाठन करना यह पहले तो नैरेटिव बनाए फिर इन नैरेटिव को आपसे चिपका दिया देख वो तुझे वेद नहीं पढ़ने दे रहे तेरे लिए वही सबसे इंपोर्टेंट है पता है ना देख वो तुझे गायत्री मंत्र नहीं बोलने दे रहे तेरे लिए वही सबसे इंपोर्टेंट है पता है ना तो वो व्यक्ति भी वो जो प्रोग्रामिंग हुई थी ना मार्केट में नैरेटिव जो बनाए गए थे उसमें आ गया कि हां यार वो मैंने सुना इतने दिनों से कि सबसे इंपॉर्टेंट तो गायत्री मंत्र का जाप ही है अब क्या हुआ जिनको गायत्री मंत्र का जाप करना है वो तो कर नहीं रहे और इनको इनको कहा गया इनकी जीवन को वो जीरहे हैं कि तुम यहां से जाओगे सर्विस सर्विसेस

01:16:19:08 से जाओगे जगह खाली होगी तो हम आराम से अपना जीवन बिताएंगे तो यह सब चीजें दिखाई देती जी आर जी आपका धन्यवाद आपको हमारी बातें लॉजिकल लगी और मैं कहूंगा कि आप जो है शंकराचार्य जी जो है उनके पास जाइए शीशे वाली बात मैंने वैसे आपको बता दी है करपात्री जी ने भी बताई है अभी कुछ दिन पहले एक ऑडियो था मैं हो सकता है आप कहीं पर कनेक्ट होंगे तो ऑडियो भेज दूंगा यह जो शीशा पिघलाने वाली बात है सापेक्ष है और आप जो है कोई अच्छे पद पर जो विराजमान आचार्य गण है उनके पास जाइए परंपरा प्राप्त उनसे जो है जब उनसे आपको संतुष्टि ना मिले तो आप आक्षेप कर सकते हैं और यहां पर यही होता है हां जी बताइए आप बो एक इसमें जोड़ता हूं कि एक किसी सीरीज का डायलॉग है कि दुख होता है बहुत जब कोई हमारी योग्यता हो और हमारी योग्यता को कोई ना पहचाने ठीक है सबको सबने सुना होगा रील्स में आता रहता है मिर्जापुर का डायलॉग है तो जो वर्ण व्यवस्था है इसमें जब आप किसी वर्ण में जन्म ले रहे कि आपने शुद्र वर्ण में जन्म ले लिया शूद्र कुल में फिर आप बड़े हो गए आपको ज्ञान बहुत है लेकिन आप वह सब नहीं कर सकते क्योंकि आपने शास्त्रों ने रोक दिया तो वह दुख हुआ तो वो दुख ही तो आपके कर्मों

01:17:34:10 की सजा है व इतना ही तो समझना है कि हमें जो दुख हो रहा है व पूर्व जन्म के फल है जो हमें यही भोगने है एक तरफ तो आप कहते हो कि स्वर्ग नर्ग यही है कहीं दूसरी जगह नहीं है तो जब इसको मैं इसको दूसरे तरीके से समझाना चाहूंगा जैसे कि एक जगह पर 932 में जो आदि शंकराचार्य जी ने य कह दिया कि व पाप योनि कह दिया है वो स्त्रियों को अब मैं एक बात कह रहा हूं कि पुरुषों की कंपेरटिवली क्या स्त्री एक नेचुरल कष्ट लेकर के शारीरिक कष्ट लेकर के जन्म लेती है कि नहीं लेती है क्या उसको मास जो हर महीने जो माह में एक बार मासिक धर्म आ रहा है नेचुरली उसको दर्द होना ही है पेट में गर्भाशय में उसको दर्द होना ही है यह पुरुषों की अपेक्षाकृत उसको दर्द क्यों दिया है ईश्वर ने इसका अर्थ है फिर वो मैंने एक बात कही कि कोई व्यक्ति वेदों के बिल्कुल एक सेंटीमीटर दूर जन्म ले रहा है एक इंच दूर जन्म ले रहा है और कोई व्यक्ति हजारों किलोमीटर दूर जन्म ले रहा है लाखों किलोमीटर दूर जन्म ले रहा है तो ऐसे में य बात आती है कि भाई एक को इतनी दूर जन्म क्यों दिया गया हर व्यक्ति को वहां जन्म मिले जहां वेद रखा हो वेदा शास्त्र वो भी हमारे अलंकार समाज वाले रखे हो कम से कम जिससे कि वो

01:18:49:14 भटके अपने जीवन में तो एकय इसमें कि आपको आपको पूजा करनी है आपको मंदिर जाना है आपको यज्ञ करना है यह कहां से पता चल रहा है यह शास्त्रों से पता चल रहा है तो वही शास्त्र फिर कह रहे हैं कि ब्राह्मण अरनी पूजा कर मनी शर्मा जी आपका धर्म सनातन है सनातन सिद्धांत लाइए सनातन शास्त्रों से सिद्धांत लाइए मनमुक बातें मत करिए हर दूसरा आदमी एक नया सिद्धांत ला देगा क्या करोगे फिर धर्म धर्म तय होता है हमारे शास्त्रों से अपने मनम की बात बातो से नहीं होता है जी जी आप कुछ कह रहे थे उस वो शास्त्र कह रहा है कि ब्राह्मण अंदर जाके पूजा करेगा जो भी करेगा ध्यान जप करेगा उसका पुण्य मिल जाएगा उसको और वही कह रहा है कि कोई शुद्र मंदिर के बाहर से सिर्फ ध्वजा को भी देख लेगा मंदिर के ध्वजा को तो उतना ही पुण्य उसको मिल जाएगा यही शत्र कह रहा है वो उनको एक सरलता दी गई है क्योंकि उनके जीवन में ऑलरेडी शारीरिक रूप से श्रम है तो इसलिए उनका भार हल्का किया गया है लेकिन

01:19:54:25 केंगे क्योंकि जब गर्भ क्योंकि जब गर्भ ग्रह में जाएगा तो उसको विभिन्न प्रकार के जो नियम है उनको फॉलो करना होगा तो उसका जीवन तो ऑलरेडी पहले से ही कठिन है अब व वहां पर ग गर्ग में जाने के लिए अपने बैग में जो लेकर चल रहा है उसके साथ में मट्टी भी लेकर चले अगर म मूत्र मूत्र त्याग के लिए जाए तो दो बार धोए मिट्टी से और उसके बाद अगर वो क्या कहते हैं मल त्याग के लिए जाएगा तो चार बार धोए मिट्टी से और फिर मिट्टी से मिट्टी से साफ करने के लिए उसे समुचित जगह भी चाहिए तो कितना यह तो एक पक्ष मैंने बताया है फिर उसके बाद कुल्ले हैं तो कितना ज्यादा और शिखा खोलनी है बांधनी बहुत सारी चीज तब निर्वा अगर शास्त्र सम्मत गर्भ ग्रह है जहां पर अभी भी सनातन सिद्धांत लागू है जैसे शंकराचार्य के उसम नियंत्रण में आने वाले जो मंदिर है वहा इसी प्रकार की वो होती है तो इतने सारे प्रोटोकॉल से भाई उन प्रोटोकॉल से आपको मुक्ति दी गई है इसलिए आपको कहा गया कि आप जो है सिर्फ ध्वजा देख लीजिए उससे भी हम आपको वही फल देंगे जो इतने सारे कठिन नियमों का पालन करने वाले ब्राह्मण को देते हैं अच्छा एक बात बताइए जी

01:21:10:04 मैं ऐसा पूछना चाहता हूं कि दयानंद जी को मोक्ष मिला है नहीं मिला से मैंने पूछा है अब मैं बताता हूं एक जो देवेंद्रनाथ जी द्वारा दयानंद जी लिखी है उसम कह रहे कि दयानंद सरस्वती जी दयानंद जी शिव सहस्त्र नाम का पाठ करते थे त्रिपुंड धारण करते थे ठीक है और सूर्य को अर्ग देते थे इनके जो गुरु विरजानंद जी थे वो दुर्गा अष्टक का पाठ करते थे रोजाना जिनको देख के स्वामी जी भी ये जो दयानंद जी ये भी दुर्गा अष्टक का पाठ करते थे तो मूर्ति पूजक तो ये भी हो ही गए ठीक है तो इनको भी 1000 हत्या का दोष लगा तो क्या 1000 हत्या का दोष ये धोती है क्या इसी जीवन में तो इनके य तो ऐसा है नहीं ना कि भक्ति का फल मिलता नहीं फल तो लेकिन क्या इन्होने मना किया है इन्होने मैंने प्रश्न पूछा है ना इनसे इन्होंने जवाब नहीं दिया मैंने कहा ईश्वर की भक्ति करने से आप लिख रहे हो कि ईश्वर कोई फल नहीं देता अगर फल नहीं देता तो भक्ति का क्या फायदा ईश्वर के अस्तित्व का क्या फायदा अच्छा बाद में अगर आप यह मान लो कि फल मिलता है तो आपकी वो वाली बात गलत अगर फल मिलता है तो वह बात गलत कि भक्ति का फल नहीं मिलेगा और अगर फल नहीं मिलता है तो फिर भक्ति करना गलत और उसम में भी उन्होने य

01:22:25:06 मान लिया है कि भक्ति करने से आपके अंदर ईश्वर के गुण आते हैं तो यहां अद्वैत हो गए भाई ईश्वर के गुण क्या है उत्पत्ति स्थिति समार करने की क्षमता यही गुण है ना तो भक्ति करने से ईश्वर के गुण आते हैं यानी भक्ति करने से वो ईश्वर बनने लगता है उत्पत्ति स्थिति सार के गुण आ जाते हैं तो ये तो अ अद्वैत हो गया अच्छा आपको मैं बताता हूं कि आपका जो मोई मोय वाला व्यक्ति था आशीष मैसेज भेजा है देखिए वो मेरे को रिप्लाई कभी नहीं देता है यह व्यक्ति रहा आशीष तुम बात करोगे वीसी पर मेरे से उसका कोई रिप्लाई नहीं दिया वो 16 सितंबर की बात है मैंने आज मैसेज किया सीन करके छोड़ दिया यह व्यक्ति क्यों तैयार नहीं होते आपको बड़ा ललकार हैं जो मासूम व्यक्ति है उनको बड़ा ललकार हैं कि आओ डिबेट करो जब मैं इनको डिबेट के लिए बुलाता हूं चर्चा के लिए बुलाता हूं तो रिलाई रिप्लाई तक नहीं देते सीन करके छोड़ देते हैं ये उनको लड़ते जिनके बारे में इयह लगता है कि हम इनको दबा लेंगे दबोच लेंगे उनको लड़ते जब पता लग जाता इसको दबोच नहीं पाएंगे तो फिर दूर रहने लगते हैं फि या फिर वो उस पर आ जाते हैं जो निचले स्तर की चीज होती है ना वो सब करने लगते हैं तड़ा के गाली गलो जैसे इन्होंने क्या किया था जब मैंने जब इन लोगों ने मेरे मेम बनाया था पहला जिसम मेरी आवाज को इन्होने वो किया था

01:23:40:08 तो मैंने मर्यादित शब्दों में इनसे कहा था कि निष्ठा से माता ने अगर दूध पिलाया है आपको तो आप एक स्वस्थ चर्चा के लिए आमंत्रित है कोई भी अभद्र टिप्पणी नहीं कोई तू तड़ग नहीं मगर मैंने मुझे ऐसा लगता है कि ज्यादातर जो आर् समाज से जुड़ने वाले वो हरियाणा के जाट है या पता नहीं जो आर समाज में सबसे ज्यादा जो जो थोड़ी सी अकड़ भाषा होती है ना तो ऐसा तत्व लगता है कि वो जो दिल्ली के छात्र घरों में पैदा होने वाले जो है ना तो ऐसा उनने लगता है कि वो लोग है तो वो तुरंत तू तड़ाक पर आते तो एक तो वो भी खराब लगा हम लोग तूतक की सुनने के आदि नहीं है तो मैंने इस तरह से बोला कि अगर माता ने निष्ठा से दूध पिलाया है तो आप आमंत्रित है एक स्वस्थ चर्चा के लिए उसके बाद स् चर्चा के लिए बात होने लगी और बात होने में उन्होंने पतरा फेंका ऋषि उबास दूसरी तरफ से वो बोल रहे हैं कि

01:24:39:14 भाई जो वक्ता है उसका समय निर्धारित होगा बोलने का पाच मिनट तो मैंने कहा नहीं समय निर्धारित नहीं होगा आपको ठीक लग रहा है मुझे ठीक नहीं लग रहा तो बोले कि इससे क्या दिक्कत है भाई आपने हो सकता है कोई रणनीति बनाई हो ना बनाई हो पर मैं ये नहीं मानता कि मेरे को निश्चित समय में अपनी बात रखूंगा कि पाच मिनट में ही बोलूंगा मैं इसको नहीं मानता मैं नहीं आऊंगा चर्चा में मेरा अधिकार हैय तो इस पर ही अरे एक एक रुपए की एक एक मिनट की रील बना कर के ये करने वाला और जो है भाग रहा है हम तुम्हारी परंपरा के चिथड़े उड़ाएंगे मतलब इतनी बात पर इनकी जो है मर्यादा सब भंग हो गई अगले दिन इनके जो है मुझे ट्रोल करने लगे वो स्टोरी वगैरह लगा के कुछ इनके पले स्तर के जो फॉलोअर है वो मूत्र ये है वो है मूत निकल गया बहुत गंदी गंदी बातें उसमें करने लग लगे उसके बाद भी इनके लोग आ कर के कहते कि तुम भागे भाई भागे नहीं है आप सामने आ जाइए धरती पर हमारे सामने हम भागेंगे नहीं आपके सामने से इंटरनेट पर हम आपसे दूरी इसलिए बनाए हुए हैं क्योंकि इंटरनेट पर जब आप गंदी बातें बोलेंगे अश्लील बातें बोलेंगे हमारे बारे में तो हम आपको रोक नहीं पाएंगे समझ रहे हैं इंटरनेट पर हम आपको रोक नहीं पाएंगे दूसरी बात पुलिस कारवाई कानूनी कारवाई जब करेंगे तब करेंगे मगर अभी उसका हमारे पास समय नहीं है दूसरी चीजें हैं

01:25:55:10 है ना और कभी सामना करिए मैं एड्रेस हमारी वेबसाइट पर लिखा हुआ है नंबर है मेरे पास लखनऊ आइए बिल्कुल साथ में बैठते हैं देखे कौन भागेगा हम तो ढूंढ रहे हैं आर समाजी को जो बैठ कर के बात करें हम तो अभी एक दो दिन में फिर जाएंगे जो हमारे आसपास लखनऊ कानपुर उत्तर प्रदेश में जो हमें विद्वान मिलेंगे उनके साथ बैठकर चर्चा करेंगे जी अलंकार समाज जो है अलंकार समाज अपनी बुद्धि को विकसित करने के स्थान पर अनंत ज्ञान को ही दबाकर जैसे तैसे अपने शुद्र शुद्र में घुसाना चाहता है और इसमें असफल रहने पर उन बातों को ही मिलावटी कह देता है इतना सा है ये अलंकार समाज और कुछ नहीं है चाहे आप इसमें ऋषि उवाच जैसे छोटे मतलब मतलब छोटे क्या ऋषि उवाच को ले लीजिए और इसको तो मैं आर्य समाज अलंकार समाज से मानता भी नहीं हूं यह सिर्फ ब्राह्मणों से द्वेष करता है ब्राह्मणों से इसको कोई व्यक्तिगत दुश्मनी है इसने अलंकार समाज का सहारा लिया है कि मैं ब्राह्मणों को गरिया सकूं इसलिए ही अलंकार समाज में टिका हुआ है उसके अलावा उसको कुछ भी नहीं है ब्राह्मणों को गरि आना है आप मेरे को तीन चार व्यक्तियों ने कह दिया यह बात आर्य समाज के एक आचार्य ने भी कह दिया कि ऋषि उवा सिर्फ ब्राह्मणों को गरि आता है उसको ब्राह्मणों से समस्या है इसलिए यह सब कर रहा है तो फिर उस व्यक्ति पर ध्यान देना योग्य कु और अभी मैंने एक

01:27:10:10 वीडियो देखा था शंकराचार्य जी के लिए अभी मैंने एक वीडियो देखा था शंकराचार्य जी पर बोल रहा था कि कि ये देखो ये स्टील इसलिए बनाई है क्योंकि छूते छूने से ये हो जाएगा वो हो जाएगा भाई छूने से क्या क्या हो सकता है पहले तो आप ये समझो छूने से जो गुण और दोष है वो दोनों एक दूसरे में जो है ट्रांसफर होते हैं और इस बात को पीक लेवल पर हमारे धर्म ने कहा अब मैं आपसे पूछ रहा हूं अगर कोई स्त्री है या फिर कोई पुरुष है जो पराई स्त्री या फिर स्त्री पर पुरुष के साथ केवल चुंबन कर रही है तो उससे क्या हुआ जा रहा है बुरा लगेगा कि नहीं लगेगा इस बारे में विचार करिए नहीं क्योंकि छूने से कुछ होता नहीं है ना छूने से कुछ होता नहीं है आपने अभी इनके अंदर के ग्रुप की बातें नहीं य जो ये जो व्यवस्था है ना छूने की घृणा मूलक आपको बनाई गई है ना छूने की व्यवस्था व्यवस्था मूलक है जिससे कि किसी भी प्रकार का जो गुण दोष है वह एक दूसरे में ट्रांसफर ना हो उसको केवल क्रिएट करके आपको इंजेक्ट किया गया देख भाई े छू नहीं रहे तुझसे दूर है अरे भाई एक जो स्त्री है वो अपने सतीत्व की रक्षा

01:28:25:16 करती है किसी पराय पुरुष को ना छू करके तो वो क्या वो अछूत है वो घृणा मूलक है उसका दूर रहना उससे ये व्यवस्था मूलक है चलिए जी और ये इनके अंदर की जो ग्रुपों की बातें अगर मैं यहां दिखाने लग जाऊ कि शंकराचार्य जो कितना ब बुरा भला कहते हैं इसमें कितनी सात्विकता है किय गालिया तक देते रहते हैं उसम बैठे बैठे मैंने देखा है बहुत गंदी गंदी वोर के कुछ फोटो है मेरे पास अब वो राम जाने एडिट क्या है मगर देख हुआ मुझे सत्य है तो मैंने जो है मैं जो है क्रोध को पालने वाला व्यक्ति हूं और मैं क्रोध को पालना पालता हूं और उसको सही दिशा देता हूं क्योंकि गुरुदेव ने हमें सिखाया है ना कि कोरी भाविक के वशीभूत हो कर के अपने कदम ना उठाना सदैव दर्शन विज्ञान और व्यवहार को साध के अपनी बात कहना कोई तुम्हारा कुछ नहीं बगाड़ पाएगा तो गुरुदेव के जो वचन है वो मेरे कानों में गूंजते रहते हैं वो गुरुदेव के जो वचन कर्मन वादी का रस्ते माफ लेस

01:29:25:26 कदाचना जब तक नौका डूबती नहीं तब तक तुम्हारा काम है खेते रहना खेते रहना तो आप

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01:29:33:10 गा इनका कोई गुरु तो है नहीं जो इन्ह ये सब सिखाए ये तो खुद से ही बने फिरते हैं गुरु तो ये है गीता संग्रह महाभारत की गीता है उसमें से एक श्लोक मैं आपको बताता हूं जी एक सेकंड यहां पर बताया गया है मनुष्य लोक में एक कल्प तक स्वधर्म जनित बंधनों से बंधकर क्लेश उठाता हुआ जब धीरे-धीरे अपनी तपस्या को बढ़ाता है तब हल्दी कि स कांति वाले पित्त वर्ण देव भाव को प्राप्त होता है अब ये देव योनि को तो नकारते हैं कि देवता योनि होती नहीं मनुष्य से भिन्न लेकिन महाभारत का ये प्राण प्रमाण स्पष्ट कह रहा है कि देवता योनि होती है भिन्न होती है मनुष्य से लेकिन इस श्लोक को बोल देंगे मिलावटी है सिर्फ इसी कारण बोलेंगे क्योंकि ये देवता योनि नहीं मानते इसी कारण ये मिलावटी है तो सोचिए कितने ग्रंथों के साथ अत्याचार कर कर के उनको मिलावटी घोषित करे जा रहे हैं कितने सामान्य लोगों के साथ उ छल कर रहे हैं कि भाई देवता योनि तो होती नहीं इसलिए तुम ये सब मिलावट मानो तुम्हारे साथ धोखा हो रहा है मैं कह रहा हूं छल है सभी के साथ छल हो रहा है आर्य आर्य समाज द्वारा और अगर कोई आर्य समाज का सही व्यक्ति होगा तो वो आपको बताएगा

01:30:48:22 कि देवता होते हैं चाहे दयानंद जी ने जल्दबाजी में शायद ये सब हो गया हो उनसे कि उन्होंने देवता योनि स्वीकार नहीं करी हो ऐसा भी सुनने में आता है ना कि दयानंद दयानंद जी के बारे में ऐसा भी सुनने में आता है कि शायद ऐसा हुआ था कि पहले जो वेद का भाष उन्होंने किया था उसमें काफी सारी उनको ठीक नहीं लगी थी बातें तो फिर उन्होंने दोबारा किया पहले वाले का खंडन करके ऐसा कुछ मेरे पास बीच में आया था इस बारे में ज्यादा जानकारी नहीं

01:31:22:12 है इसमें वो मेरे पास वो कुछ है स्क्रीनशॉट्स वगैरह पर पता नहीं इसमें दिखाने का सिस्टम है कि नहीं मामला बिगड़ ना जाए तो अभी मैं छूंगा नहीं इस बारे में और फिर किसी दिन इस बात को लेंगे देखिए मनीष जी आप जो कह रहे हैं ना कि सरनेम हटा देने चाहिए देखिए ब्राह्मण क्षत्रिय वैश शूद्र भी कहने लगेंगे फिर भी आपको क्या करना पड़ेगा ना जैसे जैसे प्रभु श्री राम की बात ले लीजिए तो आप वहां पर बारबार बताना पड़ेगा कि वो रघुकुल वंशी है और क्षत्रिय हैं इस तरह जब उनके बारे में बताया जाता है तो फिर उनकी चीजें आपको बतानी पड़ेगी उसी के बारे में यहां पर एक सरनेम की व्यवस्था है जो सरनेम से उनके कुल का पता चल रहा है कौन से कुल के हैं किस प्रकार के ब्राह्मण है ऐसे जैसे आपके जो स्वामी दयानंद ने दयानंद जी ने भी अपने नाम के आगे सरस्वती टाइटल लगाया तो सबसे पहले तो आप उसको बदलिए यह एक व्यवस्था है जिससे कि समझ सके कौन से वाले सन्यासी है वो दशनामी परंपरा व तो इसी प्रकार से सब चीजें चल रही है जी देखिए यहां पर भी दूसरे श्लोक में वह जीव निरंतर देवलोक में विहार करता है और वहां से भ्रष्ट होने पर ऑफलाइन ऑफलाइन करेंगे ऑफलाइन

01:32:37:18 करेंगे उनको यहां बुला लीजिए या फिर हमें गुजरात की हमारी व्यवस्था करवा दीजिए हम वहां जाकर कर लेंगे अब व आजा लखनऊ कर लेंगे हम जी बताइए यहां पर भी देवलोक से जब उसके कर्म क्षीण हो जाते हैं तो वो मनुष्य योनि को प्राप्त कर ऐसी बात भी अन्य पुराण में भी लिखा है इसमें भी ऐसा ही इसका वो है अर्थ है तो देव तो अपने मन से इसको भी मिलावटी कह दिया हां य जहां जहां देवताओं को विद्वान मनुष्य नहीं बता पाते वहां उसको मिलावट कह देते हैं या फिर परमात्मा ले लेते हैं ऋगवेद वैसे वेदों की चर्चा अभी नहीं करनी चाहिए रात्रि को लेकिन ऋग्वेद में मंत्र जो शुरू में जो मंत्र तीसरा है शुरु श्र मंडल एक का उसमें भौतिक अग्नि और निराकार परमात्मा को एक ही बता रखा है द जी ने मैं आपको बता देता हूं वाष्य उसमें मतलब जो आप निराकार परमात्मा से ले सकते हैं वो आपको भौतिक अग्नि देने में भी सक्षम है तो इसमें तो कोई अंतर ही नहीं रहा जड़ और निराकार में निराकार ईश्वर में उनके भाष्य को देखा जाए तो नहीं तो मैंने अपने उसम कहा ना कि भाई ये ईश्वर जो है आपने सिर्फ ईश्वर को स्वीकारा है जिससे कोई नास्तिक ना कहे मगर भाई ईश्वर जन्म ले नहीं सकता है ईश्वर अच्छाई

01:33:52:24 और बुराई को कर नहीं सकता है वो केवल बैठा है बिल्कुल एक बिल्कुल एक सिस्टम की तरीके से जिसने अच्छा कार्य किया उसको वो देगा उसके कर्मों के अनुसार सजा देगा ऐसा ईश्वर नहीं कर सकता है कि कहीं पर कुछ हो रहा है उसको जाकर के रोक दे वो उसके अंदर नहीं है तो ऐसे ईश्वर से किसी प्रकार की आशा रखना वो व्यर्थ है कोई व्यक्ति उससे आशा रख ही नहीं सकता कि ईश्वर हमारे लिए कुछ हमें कुछ फल देंगे हमें शक्ति देंगे हमें आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करेंगे वो ऐसा ईश्वर है वो बस प्रकृति के नियमों के अधीन ईश्वर तो ऐसे व्यक्ति को मतलब ऐसे ईश्वर की आवश्यकता कहां रह जाती है फिर मनुष्य को जो कुछ कर नहीं सकता जैसे एक सवाल आता है कि अब इनके अनुसार जो है कभी कभी तर्क होता है वही जो शुरू में मैंने क्रिश्चन से पूछा था वही इनसे पूछ रहा हूं कि य पूछते क्या अगर ईश्वर आपका व है तो क्या वह हत्या कर सकता है क्या व रेप कर सकता है तो फिर वही बात आ जाती है जहां रेप हो रहा है उसको आप आप जिस ईश्वर को मानते हो उसने उसको आपके ईश्वर ने बनाया कि नहीं बनाया है अगर बनाया है तो वो बुरा हो गया क्योंकि रेप करने वाले को बना रहा है अगर उसको नहीं पता था कि वो रेप करेगा अगर उसको नहीं पता था कि व रेप करेगा तो इसका मतलब क्या हुआ कि वह सर्व ज्ञाता नहीं है भविष्य

01:35:07:27 नहीं जानता है तो वो अब अगर यह कहेंगे कि नहीं बना नहीं सकता ऐसे को तो वो बाद बनाने वाला वो नहीं है बनाने वाला है तो रेप करवाने वाला है अगर रेप करवाने वाला है उसको पता नहीं तो वो सर्व ज्ञाता नहीं कैसा ईश्वर है भाई और ईश्वर के बारे में बहुत सारे मैंने कुछ सवाल उनका कोई आंसर नहीं दिया गया जी तो यह देखिए आप मैं भाष्य दिखाता हूं इनका 80 साल बाद आर्य समाजी अद्वैत हो गए आचार्य शंकर का भाष्य पढ़ के वाह बहुत अच्छी बात बताई सब ये देखिए ये है पतंजलि योग प्रदीप है योग दर्शन है ये एक महानुभाव है जिन्होंने एक सूचना दी है आचार्य प्रदुमन है कोई जो ब्रह्म सूत्र पर आचार्य शंकर का भाष्य पढ़ रहे थे वह भी 80 साल की उम्र में जीवन भर आर समाजी थे अब अवती हो गए क्या बात है ऐसे तो बहुत से लोग हैं तो ये देखिए साधना पाद का सूत्र 44 वा है इसमें लिखा है कि व्यास भाष्य पढ़ता हूं मैं व्यास भाष्य इसमें दे रखा है स्वाध्याय से इष्ट इष्ट देवता

01:36:22:27 का साक्षात होता है अच्छा यहां पर आर्य समाज का अगर आप योग दर्शन पढ़ेंगे तो वहां पर विद्वान लोग लिखा है अब मुझे बताइए विद्वान लोगों का साक्षात्कार हो रहा है स्वाध्याय हर जगह वो देवता का अर्थ अपने हिसाब से विद्वान कर देते हैं वही वो अलंकार वाली बात जहां प भी वैसी बात आए व अलंकार टाइप की बात बोल लो ठीक व्यास भाष्य भी देख लीजिए मतलब अपने अपने मत को अनुवाद में बदल दो वही जैसे कन करता है ना उसने क्या किया कि ब्रह्म कर्म समाधि ना ब्रहम गंतव्य तो इन सब चीजों में ब्रह्म का अर्थ उन्होने कृष्ण भावना भावित कर दिया चार 24 भगवत गीता में अब बात ये आती है कि अगर आप यहीं पर अपने मंतव्य को डाल देंगे तो नीचे भाष्य में क्या लिखेंगे भाई अनुवाद का मतलब होता है संस्कृत से हिंदी में अनुवाद यह अनुवाद है शब्दार्थ तो शब्दार्थ करिए आप फिर बाद में अपना मंतव्य लिखिए भाष्य में मगर जहां पर उनको अर्थ से प्रॉब्लम हो रही होती है वहां अर्थ में भी वो अपना

01:37:21:19 भाष ये देखिए एक अब ये देखिए व्यास भाष्य अगर आप पढ़ेंगे तो स्वाध्याय शल को देवता ऋषियों और सिद्धों के दर्शन अब ये देवता ऋषि और सिद्ध के ऊपर अगर आप सोचेंगे तो विद्वान लोग में ऋषि आ जाते हैं सिद्ध लोग आ जाते हैं तो फिर य व्यास जी ने देवता जो शब्द लिखा है वह कौन है क्योंकि ऋषि आ गए विद्वान लोगों में सिद्ध भी आ गए विद्वान लोगों में तो देवता कौन है देवता को अलग मानना पड़ेगा आपको तो इस सिद्धों के दर्शन होते हैं और वे इसके योग कार्यों में सहायक होते

01:38:03:14 हैं तो यहां पर भोज वृति और व्यास भाष्य में अलग अलग बता रखा है कि देवता योनी होती है लेकिन यहां पर उसको विद्वान जबरदस्ती घोषित कर रखा है अगर आपको यह दिख रहा हो जी जी जी यह ऋग्वेद का तीसरा मंत्र है प्रथम मंडल यह मनुष्य ी प्रकार ईश्वर की उपासना और भौतिक अग्नि ही को कलाओं में संयुक्त करने से प्रतिदिन आत्मा और शरीर की पुष्टि करने वाला जो उत्तम कीर्ति का ब बढ़ाने वाला जिस और जिसको अच्छे-अच्छे विद्वान व शूरवीर लोग चाहा करते हैं विद्या और स्वर्ण आदि उत्तम उस धन को सुगमता से प्राप्त होता है तो यहां पर परमात्मा और भौतिक अग्नि से आप ये सब प्राप्त कर सकते हैं तो परमात्मा और भौतिक अग्नि को आपने एक ही कर दिया अचानक से क्योंकि आप अग्नि को देवता तो मान नहीं पाएंगे क्योंकि आपने खंडन कर रखा है तो य भौतिक अग्नि से ही यह सब प्राप्त हो रहा है तो परमात्मा से जो जो प्राप्त कर सकते हैं वह सब शक्ति भौतिक अग्नि के पास भी है इन्होने ऐसा कर दिया इसका अर्थ य पर कोई आर्य समाजी

01:39:13:13 बताएगा सही बिल्कुल सही ब बहुत अच्छे आपने पॉइंट रेज किए बहुत बढ़िया पॉइंट रेज किए एक यहां पर है जो पूछ रहे ईश्वर को ईश्वर कोई जादूगर नहीं है जो चमत्कार करे दुनिया में जब भी कुछ सृष्टि का से हुआ साइंस के द्वारा हुआ है व चमत्कार सिर्फ वह है जिसको आप जानते नहीं हो बस और कुछ नहीं जिस विद्या को आप जानते नहीं हो उसको आप चमत्कार कहते हो जरा सोचना प पहला ह्यूमन बीइंग पहला ह्यूमन बीइंग समाज के द्वारा चमत्कार से हुआ या वैसे करती है और साइंस की व थ्योरी भी है वो सनातन

01:40:05:14 थ्योरी एक दयानंद जी की जीवनी है योगी नाम से है श योगी जीवनी इस तरह से उसमें दयानंद जी उड़ रहे हैं उनके पास सिद्धियां है तो क्या यह चमत्कार नहीं है ये चमत्कार नहीं भाई अभी वो योगी जो योगी जो योगी हो जाता है जो योगी हो जाता है व 3000 पता नहीं कितने युगों बाद या जो भी है अभी वोह आ जाता है कालांतर में यह कर सकता है वो कर सकता है यह क्या है चमत्कार नहीं है क्या जब यह योगी कर सकते हैं चमत्कार तो ईश्वर नहीं कर सकता वाह और दूसरी बात चमत्कार को छोड़ दो अपनी इच्छा के अनुसार ईश्वर तो जन्म नहीं ले सकता ना और जब ईश्वर नहीं ले सकता तो आपके जो आप्त पुरुष है श्री श्री कृष्ण जिन्ह आप आप्त पुरुष मानते हो वो कैसे अपने मन में इच्छा ला रहे हैं अपनी इच्छा अनुसार जन्म लेने की कभी सोचा है आप तो पुरुष जिससे कभी कोई गलती नहीं हुई वो कैसे इच्छा ला रहे हैं अपने मन में अपनी इच्छा अनुसार जन्म लेने की जब ईश्वर तक जन्म नहीं ले सकता तो अपनी इच्छा अनुसार जन्म लेने की इच्छा कैसे आ रही श्री कृष्ण में अगर आ रही है तो या तो वो अज्ञानी है इसलिए आ रही है आपके अनुसार आपके जो जो हाथरस के जो वो है प्रभारी उन्होंने माना

01:41:21:04 है उन्होंने माना है की जो सत्यार्थ प्रकाश है उसके अनुसार श्री कृष्ण अज्ञानी है यह माना है अब जाइए उनके विरुद्ध कारवाई करिए पहले नहीं करेंगे सिर्फ यहां पर आएंगे बातें करने अ ये अंदर ही अंदर आपस में भी लड़ लेते हैं कई बार क्योंकि इनको लड़ने कोई नहीं मिलता आपस में मक्का मारी कर लेते हैं लेखा लेखी य तिवारी जी थे जो इनकारी जी थे जो इनका बहुत क्रमानुसार इनके पीछे पड़े हुए थे बस उनकी एक चीज थी जो मुझे भी लगती थी ठीक नहीं है थोड़ा सा अमर्यादित हो जाते थे और मैंने उनको कई बार कहा भी था कि मर्यादा का आलंबन

01:42:05:10 मेरे गुरु भाइयो सबसे कहूंगा कभी भी कभी भी धर्म का धर्म से अधर्म से लड़ते लड़ते कभी भी अधर्म का आलंबन मत लो क्योंकि अगर अधर्म से लड़ते लड़ते हमने अधर्म का आलंबन लिया तो अंततः भौतिक रूप से शारीरिक रूप से भले ही हम जीत जाए मगर अंत में जो विजय होगी वो अधर्म की होगी फर्क सिर्फ इतना होगा कि तब अधर्म वहां हमारे अंदर आ चुका होगा जैसे भूत प्रेत की फिल्में आती थी ना अपने अंदर कभी मत आने दो बात मैं कहूंगा इसको ऐसे गिरो गिरो मगर उस झरने की तरह जो गिर के भी को खोने नहीं दे तो अपनी बात को रखो मगर दर्शन विज्ञान व्यवहार के अनुसार सामने वाला कभी आपके सामने नहीं टिक पाएगा सदैव ध्यान रखिए ये बात तो गुरु हो तब बताए ना गुरु है ही नहीं तो खुद ही गुरु बने फिरते हैं खुद के भी जी देखिए एक विरजानंद जी द्वारा रचित पुस्तक है तो दयानंद जी जब विरजानंद जी के पास गए थे कि दरवाजा खटखटाया तो उनसे पूछता है कि कौन हो तो बोलते हैं कि यही

01:43:20:13 तो जानने आया हूं ये ऐसा कहते हैं किय कल्पना इसका मैं प्रमाण जल्दी ही दूंगा आज इस विषय पर चर्चा नहीं है इसलिए नहीं बता सकता चलिए थोड़ा विराम देते आज जी तो अंतिम में यह बात कह देता हूं कि जितने भी आर्य बंधु सुन रहे हैं वह आराम से खोजे परखे कि देवता जो मैंने पूछा है कि उन तीन जो आपने ऋषि माना है उनको ऋषि कहीं कहा गया है आवाज कट रही है तो हम इसको चर्चा रोकना पड़ेगा कोई तकनीकी खराबी आ रही है आवाज कट रही है और यश तिवारी जी अच्छा कार कर रहे थे मगर उनका जो तरीका था उससे मैं सहमत नहीं हूं और अगर वो मेरी बात अगर सुनेंगे तो मैं उन्हें आमंत्रित करता हूं कि पुनः इस युद्ध में हमें आप जैसे योद्धाओं की आवश्यकता है दर्शन विज्ञान और व्यवहार का आलंबन लेते हुए हमारा साथ निभाए और एक महानुभाव उन्होंने कहा है कि वो टिकट के पैसे भेज देंगे सिर्फ टिकट के पैसे नहीं हम यहां पर जो कार्य कर रहे हैं उनमें जो जो प्रभाव पड़ेंगे उ आजीवक उपार्जन जो भी है वो सारी चीजें आपको देखनी होंगी अगर हम गुजरात आते हैं तो और वहां पर यह सारी चीजें हमसे आप बात करिएगा हमारा कांटेक्ट

01:44:35:18 नंबर लीजिए तो यह सारी चीजें अगर आप व्यवस्था कराएंगे जो आना जाना रहना रुकना खाना पीना मैं और मेरे साथ जो भी लोग जाएंगे वो हमारे आना रहने की स्थिति में जो भी विकार उत्पन्न होंगे जो भी स्थितियां उत्पन्न होंगी उनको यथा सम्मत यथा संभव उनकी स्थिति को न करने के लिए जो भी प्रभाव उत्पन्न होंगे व सबकी व्यवस्था आपको करनी पड़ेगी तब हम गुजरात जाएंगे है ना अन्यथा हो सकता है हम कभी गुजरात जाए तो आपको हम सूचित करेंगे आप हमें अपना नंबर दे दीजिए ठीक है तो अभी हमारी आवाज ठीक से आ रही है कि नहीं आ रही

01:45:15:06 है आवाज के बारे में कोई बताएगा यश तिवारी जी के बारे में मैं भी ज्यादा नहीं जानता हूं उनका चैनल था पहले उन्होंने कन को एक्सपोज किया था बाद में व आर समाज को व कर रहे थे चीज तो दोनों बार उन पर जो है संवैधानिक कारवाई की गई थी आवाज नहीं आ रही ठीक है इनको आ रही है आवाज ठीक है ठीक है तो आप अपनी बात पूरी कर लीजिए समता जी आवाज आ रही है

01:45:49:24 तो यह जो देवेंद्रनाथ मुखोपाध्याय जी है आर्य समाज के इन्होंने ही इस बात को कल्पना कही है कि वह दरवाजा खटखटा आते हैं अंदर से आवाज आती है कौन दयानंद जी कहते हैं कि यही तो जानने यह कल्पना कह देते हैं इस पूरी बात को लेकिन इसको प्रचारित बहुत किया जाता है कि देखो दयानंद जी तो ऐसा कहा है अच्छा और अंतिम बात कोई भी आर्य स इस इस बात को आप दोबारा पीछे से बता दीजिए थोड़ा सा क्योंकि वो बीच में काफी लंबी चर्चा द

01:46:26:00 जब दयानंद जी गुरु की तलाश में जाते हैं तो गिरजानंद जी के कक्ष का दरवाजा खटखटा हैं तो विरजानंद जी पूछते हैं कि कौन तो दयानंद जी कहते हैं यही तो जानने आया हूं इस बात को लेकर अलंकार समाज वाले बड़े चरित करते हैं कि देखो यह है ये है और लेकिन जबक देवेंद्रनाथ मुखोपाध्याय जो आर्य समाज के है इसके लेखक है जीवनी के वो कहते हैं कि ये तो कल्पना है ठीक है ये तो कवि की कल्पना है ऐसा कुछ नहीं हुआ था ऐसा लिखते हैं इसका प्रमाण दिखा देता यहां पर यह जो लाइनों के बीच में अगर दिख रहा

01:47:10:21 हो जी उसको सीधा कर दीजिए आप उसको सीधा कर दीजिए जी तो यही जानने के लिए तो आपको आपकी शरण में आया हूं जैसे कल्पना पूर्ण प्रसंगों की उद् भावना स्वामी जी ने ही की है लो स्वामी जी ने ही की है और किसी कल्पना में तो एक्सपर्ट है देखिए हम अपने सामर्थ्य के अनुसार जो कर सकते हैं वह कर रहे हैं दूसरी बात यह है कि हमारे पास इतना समय नहीं है कि हम अपने सारे काम धामों को छोड़ कर के गुजरात चले जाए तो जब हमारे पास समय होगा जब भी होगा सामर्थ होगा तो हम वहां पहुंचेंगे इससे भिन्न यदि किसी को बहुत ज्यादा आपत्ति है बहुत ज्यादा उसके अंदर जो है एकदम ज्वाला भड़क रही है तो मैंने उन चीजों के बारे में बताया कि आप ऐसी ऐसी अमुक अमुक व्यवस्थाएं करेंगे तो हम जाने में सक्षम हो पाएंगे मुझे पता है कि आप वो नहीं करेंगे इसीलिए मैंने वो चीजें की है कि हम अगर आप कर देते तो हम जाएंगे मगर हमारे पास यहां धरातल पर करने के बहुत सारे कार्य हैं हर हफ्ते कई जगहो पर हिंदू राष्ट्र संगोष्ठी करना शोभा यात्रा निकालना लोगों को जो धर्म की चीजें हैं उनसे जानकारी दिलवाना

01:48:26:00 और इकट्ठा करना सजक करना अपनी चीजों के प्रति वोह आका सिद्धांत बताना जिनके कारण हमारा सनातन समाज एक हो पाए व अकाट्य सिद्धांत है क्या हमारे पास ज्यादातर लोगों पास नहीं है तो ऐसी चीजों लेकर के कर रहे हैं कार्य कर रहे हैं तो इसलिए ऐसा संभव नहीं है कि अचानक से किसी ने चुनौती दे दी तो हम चले ग भैया गुजरात मगर फिर भी आपके अंदर बहुत ज्यादा ऊर्जा है तो हम यहां की जो चीजें कर रहे भंडारे चल रहे हैं हर हफ्ते हर समय लगातार कुछ ना कुछ चल रहा है धरातल पर तो यदि अगर किसी को बहुत ज्यादा जल्दी है हमें वहां पहुंचाने की उनसे उनसे साथ सामना कराने की तो वो यहां की जो व्यवस्थाएं है उनको उठाने का बाहर उठाए है ना उनको उनको वहन करे और फिर हम वहां जाएंगे अन्यथा कभी ना कभी हो सकता गुजरात जाएंगे बिल्कुल जाएंगे कभी ना कभी आपको सूचित करेंगे तब तक आप धैर रखिए जी तो मैं अब थोड़ा सा विराम दूंगा आज की काफी लंबी चर्चा हो गई है एक घंटा अंतिम बात

01:49:24:26 जी जी कि मैंने बता दिया है कि अलंकार समाज देवता योनि नहीं मानता तो इनके जितने भी भाष्य है अब जो देवता शब्द जिन श्लोकों में आया है इन्होंने जान मूच करर उसका अर्थ अलग लगाया है आप सब समझ सकते हैं इस बात को कोई है नहीं कोई भी वो तो मैंने कहा ना वो अलंकार अपने मन से जहां इनके इनके मंतव्य की पूर्ति नहीं हो रही है वहा अलंकार किसी को भी असहमति है हमारे विचारों से हमारे सिद्धांतों से तो मैं फिर से अपना नंबर दे रहा हूं नंबर है 740 8369 जैसे ही आप वहां पर व करेंगे एक आपको फॉर्म प्राप्त होगा उस फॉर्म को भर कर के हमारी जो चर्चा है सुनिश्चित हो सकती है सभी को जय श्री राम और शर्मा जी भव्य शर्मा जी आपको आने के लिए बहुत-बहुत आभार आपने बहुत अच्छा प्रकाश डाला कई तथ पर जी जी क्षमा करिएगा सत्यम जी आपने प्रकाश डाला बहुत-बहुत आभार आपका चलिए जय श्री राम सभी को जय श्री राम हर हर महादेव नमस चंडिका हर हर महादेव हर हर महादेव

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A: AHVAAN - Call Of Dharma Live 1:50:45 · 25 Apr 2024

आर्य समाज पर चर्चा | Discussion on Arya Samaj #aryasamaj #satyarthprakash

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