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00:00:00:13 तो जो लोग फॉलो करते हैं चैनल को उनको ज्ञात होगा कि आज हमने एक लाइव स्ट्रीम फिर से रखी है जिसमें की एक स्कन डिपल है वह आज हमारे साथ जुड़ने वाले हैं कुछ वही सारे जो टॉपिक्स कई दिनों से चल रहे हैं आपको मालूम होगा कुछ संशय संशय पूर्ण शिक्षाए हैं जो कि विवादास्पद है मतलब जिस पर मैंने कुछ प्रश्न उठाए तो यह एक स्वस्थ चर्चा मान के चलिए इसको ऐसा ना समझे कि कोई डिबेट होने वाली है हां एक वास्तविकता तक पहुंचने का प्रयास है सनातन योद्धा नाम से जुड़ रहे हैं आ गए हैं

00:00:46:13 वो तो भ जय श्री राम जय श्री राम बड़ा सौभाग्य है जो आपके सामने बैठने का मौका मिल रहा है जय श्री राम जय श्री राम तो आप अपना थोड़ा सा परिचय देंगे हमें सबसे पहले मेरा नाम शिवांग रस्तोगी है अच्छा मैं स्वर्णकार परिवार से आता हूं अच्छा और मैं उत्तर प्रदेश के बरेली जिला का रहने वाला हूं अच्छा अच्छा बहुत बहुत सुरर तो ये मतलब जो शिक्षा है धार्मिक विषय पर आज हम चर्चा करने वाले तो आपकी बैकग्राउंड है वो थोड़ा सा शेयर कर दीजिए मतलब कहां से आप शिक्षित है कहां से शिक्षा प्राप्त हो रही है किससे जुड़े हुए हैं प्रत्यक्ष रूप से आपके जो गुरु है वो कौन

00:01:45:01 हैसे भैया मैं गुरुजनों की बातें मतलब जो दोहराते हैं उनका उनका मतलब बातों को मैं प्रस्तुत करता हूं और इस समय मैं जी महाराज 108 108 पीठा पर महाराज का आहवान करता हूं क्या शुभ नाम बताया आपने उनका श्री वेदांती जी महाराज श्री 1008 वेदांती जी महाराज अ अा ये किस परंपरा से जुड़े हुए जी यह राम भद्राचार्य के परंपरा से जुड़े हुए अच्छा मतलब आप इसकन से शिक्षित नहीं है आप जी नहीं जी नहीं बकल नहीं तो आपने क्योंकि हमारी जो आपकी भेंट हुई है जो हमारी और आपकी वार्ता हो रही है वो एक्चुअली हो रही है क्योंकि हमने स्कोन की शिक्षा पर कुछ प्रश्न उठाए थे तो अभी अभी आप यह कह रहे कि स्कोन की शिक्षा में आंशिक रूप से त्रुटियां है आप य स्कार कर रहे आपने कमेंट के माध्यम से भी बताया था कि आंशिक रूप से शिक्षा में त्रुटिया है तो आप ये स्वीकार करते हुए बता रहे कि हम मगर हा कुछ चीज है जो जानने लायक है उस बारे

00:03:00:06 में आप बताना चाहते हैं तो फिर इसका अर्थ तो ये हुआ कि काफी सारे क्वेश्चन ऐसे किए हैं हमने इस कन के लिए जैसे कि जिस प्रकार दूध से दही बन सकता है पर दही से दूध नहीं उसी प्रकार कृष्ण तो शिव बन सकते हैं पर शिव बनने के बाद वो कृष्ण वापस कृष्ण नहीं बन सकते तो यहां पर ईश्वर बाधित होता है और ईश्वर अगर बाधित हो गया तो फिर वो ईश्वर नहीं जिसको हम ईश्वर कह रहे हैं अगर ईश्वर बाधित हो गया तो वो ईश्वर नहीं तो यहां पर जो स्न से प्राप्त होने वाली शिक्षा है उसको आप मानते हैं कि हा यह जो चीज है य नहीं य ठीक नहीं है

00:03:40:02 जी इसकन का मैं कुछ मतलब विषयों पर समर्थन करता हूं और कुछ विषयों पर मैं अस समर्थन भी करता हूं जैसे कि हां यह जो बात है कि मतलब महादेव श्री कृष्ण के वो मतलब फॉर्म है जो मतलब कर्ड तो मन सकते हैं पर कड से कभी मिल्क नहीं मन सकते तो यह बात आप मानते हैं यह बात नहीं नहीं मानता हूं मैं मतलब यह जो लिखा हुआ है यह ब्रह्म संहिता में लिखा हुआ है जी ब ब्रह्म संहिता में लिखा हुआ है यह प्रॉपर श्लोक है पर इस श्लोक में यह बताया गया है कि श्री कृष्ण की इच्छा से वहां पर शिव की बात नहीं शिव की बात नहीं हुई शंकर की बात हुई है शंकर और शिव में बहुत बड़ा भेद है कि मतलब शिव अलग चीज है सदा शिव अलग चीज है और शंकर भी अलग चीज है तो वहां पर शंकर की बात की कि शंकर श्री कृष्ण के रोम रोम से अनेकों शंकर अनेकों विष्णु और अनेकों ब्रह्मा प्रकट होते

00:04:55:06 हैं और उनकी इच्छा से उनमें मिल जाते हैं चलिए आप मतलब कह रहे हैं कि जो संदर्भ है मैं समझ नहीं पाया हूं और आप ठीक से उसे समझा रहे हैं तरीके से जी तो मैं यह पूछूंगा कि जब श्री कृष्ण भगवान के रूम रूम वो पार्ट्स निकलते हैं अलग अलग बहुत सारे शंकर बनते हैं तो जब श्री कृष्ण अपने रोम रोम में आ जाते हैं रोम रोम श्री कृष्ण का रोम मान लीजिए एक रोम और वह एक शंकर है मान लीजिए तो जब रोम पर्ट पार्टीशन होता रोम के रूप में तो क्या उस वो सर्व शक्तिमान नहीं होते हैं

00:05:35:26 जी विष्णु पुराण में शक्तिया बताई मैं आगे बढूंगा मैं आपसे य पूछ रहा हूं जिस समय वो रोम रोम पार्टीशन होता है जब करोड़ों शंकर बन जाते हैं तो जो रोम के रूप में कृष्ण जा रहे हैं तो क्या रोम के रूप में वो पूर्ण नहीं है श्री कृष्ण अपने रोम के रूप में पूर्ण है या नहीं मैं य पूछ रहा हूं जैसे मान लीजिए कि मैं एक इंसान हूं मैं एक इंसान हूं और मैं अपने इस हिस्से को हल्का सा हल्का सा अपने से अलग कर देता हूं और शंकर बना देता हूं आपका ये कहने का मतलब है मैंने ये बनाया तो ये जो मेरा हिस्सा है मेरे बराबर ताकत इस हिस्से में नहीं है ठीक है क्योंकि मैं बाध्य हूं अब श्री कृष्ण का जो हिस्सा है तो क्या श्री कृष्ण जब एक रोम के रूप में कहीं पर जा रहे हैं तो पूर्ण है या नहीं है क्योंकि वो तो अबाध है बिल्कुल है बिल्कुल है और समान भाव से है यानी जो उनका हर रोम है वो भी पूर्ण रूप से श्री कृष्ण ही है जी बिल्कुल और कोई भी भेदभाव नहीं है इसमें भगवत गीता में लोक में हमें ये पता चलता है कि कोई भी भेदभाव नहीं है जी बिल्कुल तो भेदभाव जब है ही नहीं तो फिर बात ही नहीं है कोई उसम विवाद की बात

00:06:51:00 तो तब है ना जब यह कहा जाए कि भेदभाव है श्री कृष्ण भगवान यदि शंकर बन रहे हैं और वो अपने रूम से शंकर बन रहे हैं मगर रोम भी पूर्ण है अगर श्री कृष्ण भगवान पूर्ण है या फिर हमें नियम लागू करना पड़ेगा कि श्री कृष्ण भगवान जना रोम अपने से अलग करते हैं तो वह जो रोम होता है उस हिस्से में पूर्ण शक्तिमान नहीं हो व पूर्ण ईश्वर नहीं होते अगर हम यह कर देंगे तो हमें यह नियम मानना पड़ेगा कि श्री कृष्ण के ऊपर एक नियम लागू हो गया कि श्री कृष्ण भगवान अपने रोम के रूप में पूर्ण ईश्वर नहीं है जब नियम लागू हो गया तो ईश्वर की व्याख्या है सत्यम ज्ञान अनंतम ब्र ईश्वर किसी भी प्रकार के नियम के नीचे नहीं है वह तो सभी नियमों के बनाने वाला सर्व नियामक है तो अगर वो इस रूप में अपने रोम के रूप में पूर्ण ईश्वर नहीं है तो बाधित बाधित हो गए और जो बाधित हो गए तो व ईश्वर ही नहीं रहे और जब ईश्वर नहीं रहे तो फिर वहां पर पूजा किसकी हो रही है भक्ति किसकी हो रही है भाई हमारे दर्शन में और अन्य दर्शनों में यही तो अंतर है सबसे बड़ा हम जिस ईश्वर को पूजा करते हैं वो ईश्वर है पूर्ण ईश्वर अन्य ग्रंथों के माध्यम विचारधारा के माध्यम से प्रतिपादित होने वाला जो ईश्वर है ित है वण ईश्वर नहीं है वो स्वयं य

00:08:06:02 कहते व ग्रंथ स्वयं य कहते हैं जैसे की में जो इस्लाम के ईश्वर है व कह रहे कि मैं अवतार नहीं ले सकता मेरी संतान जन्म नहीं ले सकती इसीलिए उनके मति पूजा नहीं है मगर हमारा ईश्वर है यदाय धर्म भ भारता अन धर्म स हमारा ईश्वर कह रहा है जब जब धरती पर पाप बढ़ेगा साधु उधार के लिए धरती मा की रक्षा के लिए प्रकट हो जाऊंगा तो यह है वो अबाध ईश्वर मगर जैसे ही हम यह कहेंगे कि वो शिव तो बनते हैं मगर शिव जी कृष्ण नहीं बनते तो वहां पर हमें मानना पड़ेगा कि श्री कृष्ण अपने मूल फॉर्म में जितने ज्यादा ताकतवर है जितने ज्यादा आबाद है उतने अबाध वो शंकर के रूप में नहीं है अगर हम यह मानेंगे तो श्री कृष्ण को हमने बाधित मान लिया श्री कृष्ण के अध्य रूप की रक्षा करने के लिए हमको यह मानना पड़ेगा कि श्री कृष्ण जब भी कोई फॉर्म ले रहे हैं करोड़ों शंकर बन रहे कुछ भी बन रहा है वो भी पूर्ण ही है नहीं नहीं मतलब मैं हल्का सा बताना चाहूंगा जी कि जैसे कि नहीं अभी आपने माना ना कि वो पूर्ण है

00:09:20:18 जी मैंने ये कहा कि वो जिस भी रूप में इस जगत में आते हैं इस माया में आते हैं उ उन रूपों में कोई भी भेदभाव नहीं है पर ईश्वर एक है श्री कृष्ण और उनकी ही इच्छा से उनके जितने भी रूम है वो सारे कम करते हैं अब जैसे कि आप मेरी बात समझ नहीं रहे हम लोग भटक जाएंगे मैं यह कह रहा हूं कि आपने कहा कि उनके जितने भी रोम है वो उनसे अलग होते हैं वो जगत में आते हैं वो रोम वो रोम पूर्ण होता है एक एक रोम की नहीं होता है मैं यह नहीं कह रहा कि श्री कृष्ण भगवान सर्वोच्च सर्वशक्तिमान ईश्वर नहीं है भाई मैं भी राम की पूजा करता हूं राम रूप में ईश्वर की पूजा मैं करता हूं भक्ति करता हूं मगर जब हम ये कहते हैं कि शिव भगवान का जो शिव रूप है वो पूर्ण नहीं है तो यहां पर मेरे और आपकी विचारधारा गलत अंतर आ जाएगा मेरा कहना है भगवान के कितने भी रूप है उम भेद नहीं है भगवान शिव भी पूर्ण है शंकर रूप भी पूर्ण है भगवती रूप भी पूर्ण है और क्या कहते गणपति रूप भी पूर्ण है ब्रह्मा रूप भी पूर्ण है विष्णु रूप भी पूर्ण है अपनी तर ये जो है ये सारे पांचों देवताओं का पंच देव

00:10:35:22 उपासना कोई ये नहीं कि सि पुराणों के आधार पर वेदों में स्वीकार किया गया पांचों देव पांचों रूपों की पूर्णता वेदों में श शास्त्रों में छ छ है जी जी बोलिए बोलिए आप बोलिए प्रभु जी छह है छह और मैं ये कहना चाहूंगा जैसे कि अभी मैं आपको थोड़ा सा उदाहरण देता हूं मैं ना पहले एक हम एक विषय हम लोग सेट कर ले पहले कि हम लोग किस चीज पर हमारे बीच में मतभेद है क्या आप यह मानते हैं कि उनसे उनके यय हम मतभेद सेट कर ले तो मतभेद हमारा यह है कि मैं यह कह रहा हूं कि श्री कृष्ण से जब उनके रोम अलग होते हैं तो वोह पूर्ण होते हैं अगर व रोम पूर्ण होंगे तभी श्री कृष्ण पूर्ण होंगे अगर वो पूर्ण नहीं है तो श्री कृष्ण पूर्ण नहीं है

00:11:31:27 जी आवाज आ रही आपको क्या यही हमारा विषय है बात करने का कि आप यह कह रहे हो जो रो अलग अलग हो रहे हैं वो पूर्ण नहीं है आप यह कह रहे हो उसी पर आ रहा हूं उसी पर आहा पहले हम लोग य चेक तो करें कि क्या आप य मानते हो व पूर्ण है कि नहीं मानते हो पूर्ण है फिर उसके बाद जी श्री कृष्ण के अलावा कोई भी पूर्ण नहीं है और मैं आपको प्रॉपर भगवत गीता का देखिए भगवत गीता का उदाहरण भगवत गीता का उदाहरण मैं भी आपको दूंगा मैं आपको शास्त्रों से ही बात करूंगा तो आपका कहने का मतलब है जो श्री कृष्ण का जो टुकड़ा उनसे अलग होता है रोम शंकर जी शंकर भगवान जो होते हैं व श्री कृष्ण का ही रोम होता है ना तो रोम रूप में श्री कृष्ण भगवान अपने पूर्ण नहीं होते आप यह कह रहे हैं जी बिल्कुल तो इसका अर्थ यह हुआ कि जब जब श्री कृष्ण भगवान अपना रूम अलग तो वो उसम पूर्ण सर्व शक्तिमान नहीं रह सकते नहीं कोई भी रोम अलग होने प तीन चीजें बाधित होती है तीन चीजें उसम बंद जाती है जी पहला परमात्मा तत्व जो तत्व है परमात्मा

00:12:46:28 तत्व वो आत्म त तत्व बताए गए हैं अब जैसे कि मैं आपसे पूछता हूं कि आपको कौन सा खेल खेलना पसंद है है ये बताइए आप मेरे मेरे को खेल खेलना पसंद है मान लेते हैं कि क्रिकेट वैसे मैं उसको प्रोत्साहन नहीं देता मगर मैं एक उदाहरण के तौर पर कह देता हूं क्योंकि सबसे ज्यादा प्रासंगिक है वो तो मैंने मान लिया आपकी बात का जवाब देने के लिए मान लेता हूं कि क्रिकेट आप बताइए जी पहले तो आप यह तो एक तो बात मानते ही है कि मतलब भगवान तो एक ही है भगवान एक है उसके रूप अनेक है जी तो वो अनेक रूप क्यों हुए हैं अनेक रूप क्यों हुए हैं ये एक अलग ये अलग विषय हो जाएगा अभी ये है कि अगर वो शंकर बन रहे हैं तो शंकर बनने के बाद व पूर्ण हो सकते हैं या नहीं हो सते अगर हो सकते हैं तो व बाध्य है नहीं हो सकते तो बाध्य

00:13:45:26 है यह आपकी भी सही है ये आता है के ऊपर परिस्थिति परिस्थिति कि जगत में परिस्थितियां कैसे मन नहीं है आप वो परिस्थिति बाद में मुझे आप ये समझाइए कि अगर श्री कृष्ण भगवान शंकर बन रहे हैं उनका एक छोटा सा हिस्सा शंकर बन रहा है तो क्या वह सर्वशक्तिमान है कि नहीं है उसम पूर्ण है कि नहीं उसमें आप देखिए मैं आपको बता रहा हूं कि हर रोम में हर शरीर में और हर आत्मन में भगवान प्रत्येक भौतिक शरीर में हर संभव प्रयास से एक ही है कोई भी भेदभाव नहीं है पर जैसे कि अभी आपने कहा कि आपका खेल क्रिकेट है खेलना पसंद आपको जी उसको आगे बढ़ाए हा क्रिकेट आपका खेलना पसंद है अब मैं एक नियम से बंधा हुआ हूं अब मैं आपसे कह रहा हूं कि भाई आपने बाउंड्री के पार सीधे बाउंड्री मारी है आपने बाउंड्री के बा आपने सीधे मारा है तो क्यों

00:15:02:02 है वो द रन क्यों नहीं है वो रन क्यों नहीं है वो सिक्स ही क्यों है जी यह जो चल रहा है जगत में तो खेल है तो परिस्थितियां है जो उसको अनुकूल बनाती है टपा ि जो आप बोल रहे है ना वो व्यवहारिकता है ईश्वर के दो है स्तर एक ईश्वर है ऋगवेद में शलोक आया है व जो ना आने लायक है ईश्वर का एक रूप हो गया जिसके लिए वहार नहीं कर सकते ईश्वर का एक रूप हो गया जिसके लिए व्यवहार कर सकते हैं जैसे की साकार सगुण साकार व व्यवहार का विषय और निर्गुण निराकार परमार्थ का विषय अब अगर मनुष्य की तरफ खड़े हो कर के देखेंगे तो जो निर्गुण निराकार है वह आश्रित है किसके सगुण साकार के मनुष्य के मनुष्य को निर्गुण निराकार का बोध ही तब होगा जब सगुण साकार से होकर गुजरेगा मनुष्य दुनिया में जब बिजली चमकी तो मनुष्य ने सोचा यहां पर इस दुनिया में कोई ऊर्जा है अगर बिजली नहीं चमकेगी तो ऊर्जा का कोई होने का अस्तित्व नहीं है तो ये जो की तरफ अगर हम खड़े हैं मनुष्य दृष्टि से अगर हम देख रहे हैं तो जो भगवान का जो निर्गुण निराकार

00:16:17:02 स्वरूप है वो किसके अधीन हो गया सगुण साकार के वो हम तक तभी पहुंच सकता है जब सगुण साकार रूप के माध्यम से हम तक पहुंचेगा इसी प्रकार से अगर मुक्त की दृष्टि से हम देखेंगे जीव मुक्त हो जाता है की दृष्टि से जब देखेंगे तो सगुण साकार अधीन हो गया इधर तो यय जो लास्ट हमारी जो एक चर्चा हुई थी महानुभाव आए थे उन्होंने अंत में यही वाला श्लोक दिया था जिसम व कहा गया था कि वो ब्रह्म के जो ब्रह्म है वो भी मेरे ही आश्रित है तो इसका अर्थ यह है कि मनुष्य दृष्टि से हा जो उनका जो निर्गुण निराकार रूप है जो प्राप्ति का विषय है वो सगुण साकार के वो है अब जो आपने कहा कि जो प्रपंच है य मिथ्या यह सब एक खेल है बात आप सब बिल्कुल सही कह रहे हो मैंने तो मैंने तो अपने लगभग हर वीडियो में एक ही बात कही है एक ही बात की इस दुनिया में यदि कोई व्यक्ति ऐसा है जो स्वयं को पशुओं से भिन्न मानता है भिन मैं पशु नहीं हूं मैं मनुष्य हूं तो इसका अर्थ है कि व मानता है कि इस दुनिया में कोई सर्वशक्तिमान

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00:17:23:25 ईश्वर है जिसे प्राप्त करने के लिए उसने उन मर्यादा का अलंबन लिया हुआ है जिसे धर्म

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00:17:30:14 कहते हैं जी ठीक है अब अगली पंक्ति है यदि कोई व्यक्ति दुनिया में ऐसा है जो यह मानता है कि इस दुनिया में कोई सर्वशक्तिमान ईश्वर है तो इसका अर्थ है कि उसने वेदों के द्वारा प्रतिपादित होने वाले ईश्वर को मान रखा है स्वीकार कर रखा है जी वेदों के दवारा अब इसके बाद जो अगली पंक्ति है इसके बाद जो अगली पंक्ति है वो ये है कि इस दुनिया में कोई मनुष्य अगर ऐसा है जो ये मानता है कि वेदों के द्वारा प्रतिपादित होने वाला ईश्वर सर्वशक्तिमान है तो इसका अर्थ है उसने वेदों के उस अर्थ को स्वीकार कर रखा है जो अर्थ भगवान आदि शंकराचार्य ने दिया उन्होंने कहा किय दुनिया प्रपंच है माया है खेल उन्होंने कहा जी अब बात ये है कि अलग अलग जो आचार समय समय पर आए तो उन्होंने वो जो एक बार जैसे भगवान श्री कृष्ण ने भगवत गीता में संस्कृत में कहा उस समय के लोग समझ पाए मगर कालांतर में लोगों की भाषा जो है भ्रष्ट हो गई मिलावट हो गई भाषाओ में तो समझना मुश्किल हो गया तो हर बार थोड़े थोड़े टाइम के बाद ऐसे हमारे दिव्य दिव्या आत्मा आती है पृथ्वी पर जो उसको उस समय की जो प्रासंगिक श शब्दावली है उसके अनुसार वो सरल करती है तो बाद में जितने

00:18:45:16 भी आचार्य आए उन्होंने जहां तक जहां तक है जो भगवान आदि शंकराचार्य की कही हुई बात है उसी को ही घुमा फिरा कर के दूसरे शब्दों में लिखा है अब बात ये आती है कि आप भी प्रपंच मान रहे हो आप भी व्यवहारिक रूप से अनेक मान रहे हो मगर मूल रूप से आप भगवान को एक ही मान रहे हो तो आप तो मेरे साथ ही हो आप फिर आप में और मुझ में कोई वैचारिक मतभेद बचा ही नहीं जो थोड़े बहुत वो जो व्यावहारिक मतभेद होंगे वो भी हो सकता है कि ज्यादा हम लोग कई दिनों तक जब बातचीत करते रहे तोव भी दूर हो जाए मतभेद कहां बचा आपने इस दुनिया को प्रपंच मान लिया खेल मान लिया माया मान लिया आपने मान लिया कि भाई वो जो भी हिसा उनका अलग होगा देखिए आपने कहा कि कि यह दुनिया खेल है इस दुनिया में आने के बाद वह जो है तब प्रपंच चालू होते हैं ठीक है अब बात यह है कि जब हम ईश्वर की ऐसी व्याख्या करते हैं कि श्री कृष्ण भगवान अपने रूम को अलग करते हैं और वह अलग करके और जो है शंकर बन जाते हैं उनका रूम मगर वो श्री कृष्ण भगवान की तरह पूर्ण ईश्वर नहीं होता है तो जब आप भगवान के सण साकार विग्रह की बात कर रहे हैं तो यह विग्रह तो मनुष्य के व्यवहार का विषय हो गया परमार्थ का विष आ ही नहीं है

00:20:01:01 प्रपंच के अंदर की चीज हो गई व्यवहार में आने वाली चीज हो गई जिसको हम समझ सकते जिसके बारे में बात कर सकते हैं यह वो चीज हो गई जिसकी हम भक्ति कर सकते हैं ये वो चीज हो गई अब जब व्यवहार का विषय हो गया तो व्यवहार में तो सर्व शक्तिमान ईश्वर बाधित है ही नहीं भाई प्रपंच वाली दुनिया में ही तो उसका कंट्रोल है पूरी तरीके से यहां पर तो बाधित हो ही नहीं सकता फिर हम यह नहीं कह सकते कि नहीं परमार्थ है अगर परमार्थ कहेंगे तो फिर सगुण साकार की व्याख्या नहीं होगी फिर वहा पर क्योंकि सगुण साकार स्वरूप तो व्यवहार का विषय है ना व्यवहार में आ रहा है ओम जय जगदीश हरे गलती हो गई श्री जय जगदीश हरे भक्त जनों के संकट क्षण में दूर करे ये क्या व्यवहार का विषय मनुष्य के प्रेम का विषय भक्ति का विषय तो ये तो वो वाला नहीं है इसको परमार्थ की परमार्थ की घटना है इसलिए यह जो है अलग है और यहां पर अलग है व्यवहार का विषय जब जब हम सगुण साकार की बात कर रहे भगवान के सगुण साकार स्वरूप की तो ये मनुष्य के व्यवहार का विषय सब्जेक्ट ऑफ बिहेवियर तो वो हमारे जब व्यवहार का विषय है तो फिर हम वहां पर व्यवहार के विषय में तो भगवान जो है बाद है अब जैसे कि परमार्थ की बात में आपको बताऊ हम यह नहीं कह सकते कि वेदों का मार्ग अपनाने वाला धर्म पर चलने वाला अंत में जाएगा तो भगवान ऐसा नहीं कर सकते उसको मोक्ष

00:21:16:08 ना दे है ना जी ऐसा नहीं कह सकते ना तो ये तो बाधित हो गया ईश्वर बाधित हो गया मगर ये बाधित कहां हो रहा है परमार्थ में तो परमार्थ में ईश्वर निश्चित है सुनिश्चित है सब कुछ है मगर हमको ईश्वर वो चाहिए हमें उस ईश्वर की अपेक्षा है जो इस व्यावहारिक दुनिया को कंट्रोल कर ले इसमें कुछ भी कर सके हमें समझ में आने वाली कोई भी चीज हो जहां जो दुनिया हमें समझ में आ रही है उस दुनिया में वो कुछ भी कर सकता हो जिस दुनिया में वो निश्चित है जिस दुनिया में वो सुनिश्चित है वो दुनिया तो हमें तब समझ में आती है जब इस दुनिया में हम किसी को ईश्वर मान ले परमार्थ का अस्तित्व हमारे लिए तब सिद्ध होता है जब हमने किसी को ईश्वर मान लि अन्यथा परमार्थ हमारे लिए एसिस्ट ही नहीं करता जैसे नास्तिक जब नास्तिक व्यक्ति ईश्वर को मानता ही नहीं है तो फिर वो यह थोड़ी ना कहेगा कि नहीं कोई परलोक भी है पहले ईश्वर को स्वीकार करना पड़ेगा ईश्वर को स्वीकार कब करेंगे जब वो कुछ भी कर सकने वाला हो इसीलिए हमारे भगवान क्या करते हैं कोई कहे कि अगर वो जन्म नहीं ले सकता अवतार नहीं ले सकता प्रकट हो जाते हैं कोई कहे कि वो मृत्यु को प्राप्त नहीं हो सकता मृत्यु को प्राप्त हो करके भी दिखा देते हैं फिर भी जीवित रहते हैं कोई कहे कि वो झूठ नहीं बोल सकता बन जाते हैं छल नहीं कर सकता मोहिनी बन जाते हैं

00:22:31:14 बुद्ध बन जाते हैं आधा जानवर आधा इंसान नहीं हो सकता नरसिंग बन जाते हैं वो सब कुछ करके दिखाएंगे जो एक मनुष्य बुद्धि से सोचा जा सकता है और जो परमार्थ में वो वेदों के मार्ग को अपनाने वाला भटक नहीं सकता तो यह हो गई परमार्थ वाली बात परमार्थ में ईश्वर ऐसा नहीं कर सकते कि आपको मोक्ष ना मिले उनका सिस्टम ऐसा है ही नहीं मगर वो कहां पर वो हो रहे हैं निश्चित कहां प नियमित कहा पर हो रहे उनके अलावा और कुछ है ही नहीं दुनिया में हम तो उन्हीं के अंदर है ना सब कुछ हिरण्य गवा ईश्वर तो वह निश्चित कहां हो रहे हैं उस दुनिया में जिस दुनिया का एक्जिस्टेंस हमारे लिए तब चालू हुआ जब हमने उन्हें इस दुनिया में ईश्वर मान लिया तो ईश्वर की जो आदता है सर्वशक्ति मत्ता है व सिद्ध होनी चाहिए क्रिकेट के इस मैदान में तो इस मैदान में आने के बाद आप ये नहीं कह सकते ईश्वर के लिए नहीं वो शंकर बनते हैं इस मैदान में आने के बाद आप ये नहीं कह सकते कि वो शंकर बनते तो पूर्ण नहीं होते हैं क्योंकि फिर ये हो जाएगा कि मैं एक इंसान हूं अगर मैंने अपने ये इतना सा एक टुकड़ा अगर अलग किया तो यह टुकड़ा मैं इस टुकड़े में उतना शक्तिशाली नहीं हूं जितना मैं पूर्ण रूप से हूं मगर वो भगवान है वो अगर अपना एक रोया

00:23:46:15 भी अलग करें तो उसमें भी उतनी ताकत होगी यह नियम लागू नहीं हो सकता कि इसमें कम ताकत है अगर कम ताकत हो गई तो भगवान बाधित है व्यवहारिक दुनिया में बाधित हो गया भगवान और जब व्यवहारिक मतलब क्रिकेट के नहीं के अंदर जी जी जी मैं एक बात कहना चाहूंगा जी मैंने ये नहीं कहा कि मतलब प्रभु ने अपना एक अंश निकाला और बाकी जो अंश है और निकालेंगे अंश बाकी जो अंश है उनमें भेदभाव है ऐसा नहीं कहा मैंने आपका प्रश्न यह था कि जो उनका जो अंश निकला हुआ है क्या वो प्रभु के बराबर है यही आदि शंकराचार्य ने भी इस बात का खंडन किया है कि हे प्रभु हम ये आप सब है एक बराबर पर हम सब मिलकर भी आपकी पूर्णता नहीं कर सकते क्योंकि सागर सागर है पर उनमें जो लहर हैं वो तो उठती है और समा जाती है पर उन लहरों का जो सागर है उसकी बराबरी कभी नहीं कर पाती है मैंने तो मैं मैंने आपको यह बात कही है मैंने आपको यह बात कही है कि जो भगवान आद शंकराचार्य उनके ऊपर एक एक वो बनाया गया रा

00:25:02:02 खासतौर पर इकन वालो के द्वारा कि भैया वो मायावादी है मायावादी मायावादी है भगवान आदिक शंकराचार्य ने कहीं पर भी पूर्ण रूप से अद्वैत को नहीं कहा है अद्वैत प्राप्ति की स्थिति है अंतिम स्थिति है व्यवहार में उन्होंने द्वैत को माना है आपका जो मार्ग है वो द्वैत है और आप आपकी जो डेस्टिनेशन है आपकी जो मंजिल है आपकी जो प्राप्ति का विषय है वो है अद्वैत जब आप इस दुनिया में इस दुनिया में जब आप भेद का निर्वाह करोगे तब आप अभेद तक पहुंचो जैसे कि गुरुदेव पूज्य गुरुदेव इसमें एक वक्तव्य देते हैं कि धरती पर गिरा हुआ व्यक्ति धरती से उठने के लिए धरती का ही आलंबन लेता है इसी प्रकार से भेद भेद भेद से अभेद तक पहुंचने के लिए भेद का ही आलंबन लिया जाता है इसको एक इसको एक उससे और देख ले मैंने अपनी लास्ट जो स्ट्रीम हुई थी उसमें भी कहा था कि उसमें एक कांसेप्ट है जैसे कि पृथ्वी हम लोग पृथ्वी हम लोग जानते हैं कि पृथ्वी गोल है मगर हम लोग पृथ्वी के साथ व्यवहार कैसा करते हैं कि पृथ्वी चपटी है हम लोग किसी को रास्ता बताते हैं हम लोग किसी को रास्ता बताते हैं

00:26:17:04 कि उधर चले जाओ ठीक है समय हम रास्ता बता रहे हैं उस समय हमारी उंगली अंतरिक्ष की ओर जाती है अगर हम गोल मान रहे हैं पृथ्वी को हा अगर हमने इशारा किया तो हमारी उंगली जो है वो बाहर गई आउट आउट ऑफ द अर्थ वो किसी और ऊपर अंतरिक्ष में गई मगर हम ये सोचते हैं कि हमने इसको पूर्व दिशा में भेजा हमने इसको फलानी दिशा में भेजा तो क्या है हम व्यवहार कर रहे हैं चपटी का और जो पृथ्वी का गोल होना है वो कौन सी स्थिति है मुक्त की स्थिति जब हम पृथ्वी को ऐसी जगह से ऐसे पर्सपेक्टिव से देखेंगे जब हम पृथ्वी के अंदर नहीं पृथ्वी से बाहर होंगे तो वो हमारे लिए दिखाई देगी पृथ्वी तो गोल है तभी तो हमें दिखाई देती पृथ्वी तो गोल है वरना हम पृथ्वी पर खड़ हम जो पथवी के साथ बिहेव करते हैं वो चपटा वाला बिहेव होता है बस वैसे ही है प्राप्ति का विषय मुक्त का विषय अभेद यानी कि अद्वैत और धारण करने का विषय व्यवहार का विषय वो है भक्ति द्वैत सामने प्रभु खड़े हैं श्री राम के भजन करते मैं उन जैसा कभी नहीं हो सकता मैं उनके चरणों की धूल नहीं बन सकता उन जैसा होने की तो बात अलग है तो एक दिन प्रभु श्री राम ही मुझे गले से ऐसा लगा लेंगे कि बस मेरे को मुक्ति मिल जाए

00:27:29:09 जी तो मब भगवान आदि शंकराचार्य ने कहीं पर भी केवल अद्वैत को नहीं माना है उन्होंने परस्पर सामंजस की शिक्षा दी है तो यह प्रोपेगेंडा फैलाया गया है कि नहीं साहब वो अद्वैत वादी थे अद्वैत वादी थे ऐसा नहीं है अद्वैत अंतिम स्थिति इसलिए उनके दर्शन का नाम अद्वैत पड़ गया उन्होंने द्वैत को भी निर्वाह किया ऐसा ना होता तो जगन्नाथ पुरी में दारू ब्रह्म को क्यों पुनर स्थापित करते 1 स साल तक मूर्ति भंजक ने उसको जो है मूर्ति को उनकी लुप्त रही उसको पुनर स्थापित क्यों करते जगन्नाथ पुरी और बड़े-बड़े जितने भी हमारे मंदिर है उसको क्यों शंकर दिग्विजय यात्रा के दौरान उन्होंने ये सब किया अगर वो केवल अद्वैत को ही मानते थे तो निर्वाह करने के लिए बिहेव करने के लिए हमें स्वीकारना पड़ेगा कि वो जो प्रभु है हम उनकी पूजा करनी है जी हां तो मुझे नहीं लगता कि हमारे बीच में कोई वो बचा है वैचारिक मतभेद अगर है तो आप बता दीजिए और इसकन का विरोध में इसलिए इसको कसे विरोध नहीं कहेंगे इसको कहेंगे कि वास्तविकता तक पहुंचने का प्रयास इसको कुछ शिक्षाए है

00:28:37:25 जो स्पद मतलब क्वेश्चनेबल अब क्वेश्चनेबल क्यों हो जाती है जैसे की पिछली स्ट्री में आए थे भाई तो मैंने उनसे पूछा कि आप ईश्वर और अल्लाह को एक क्यों कहते हैं तो वो बोलते हैं कि भाई ईश्वर के कई नाम हो सकते हैं तो अल्लाह भी हो सकता है ठीक है मान लिया जब अल्लाह हो सकता है तो फिर कई नाम हो सकते तो सिर्फ कृष्ण क्यों भजना है फिर तो आप हरे अल्लाह हरे अल्लाह भी कर सकते हैं तो यहां पर उन्होंने कहा नहीं वो वो तो हम जो उनकी जो कुरान है वो कुछ और कहती है तो वही तो मैं कह रहा हूं इसका मतलब आप जब कह रहे हो कि कृष्ण और अल्लाह एक है तो आप कुरान के ईश्वर की बात कर रहे हो मगर वहां प आपने कहा हम तो भागवत पुराण का वो नियम अपनाते हैं जहां पर कहा गया ईश्वर के कई नाम हो सकते हैं तो पहली बात तो ये है कि जब हम जानते हैं कि अल्लाह किसको समझते हैं लोग तो अगर हम कृष्ण और अल्लाह कह भी रहे हैं तो हम वहां पर पॉइंट आउट करना चाहिए कि हम जब अल्लाह कह रहे हैं कृष्ण अल्लाह एक तो अल्लाह का अर्थ ये नहीं है कि कुरान के द्वारा प्रतिपादित होने वाला ईश्वर हम उस हम उस संदर्भ में नहीं कह रहे हम यह कह रहे हैं कि भगवान के क्योंकि कई नाम हो सकते हैं तो हम उसे अल्लाह भी स्वीकार रहे मगर फिर भी अगर हम अल्लाह नाम स्वीकार करते हैं भगवान का तो हमें फिर ये स्वीकार करना पड़ेगा कि हम जो अपने जो महामंत्र है जिसका वो जाप कराते हैं हरे कृष्ण वाला उसम अल्ला नाम

00:29:52:27 भी यूज किया जा सकता है जब कोई अंतर नहीं है तो अल्लाह नाम हो सकता है उनका तो भगवान भगवान नाम का जप किया जा सकता है फर तो संकीर्तन दूसरी एक बात फर इसमें अगला पॉइंट य आता है ये चीज क्लियर नहीं करते वो अब इसमें अगला पॉइंट य आता है की भाई प इसमें अगला पॉइंट य आता है कि जब आप अल्लाह को कृष्ण से संतुल्य बता सकते हो क्योंकि भगवान के कई नाम हो सकते हैं आपने कहीं पर भी ये लिखा है कि शिव और कृष्ण एक है आपने कभी बोला शिव और कृष्ण एक है यहां पर आपका वो लॉजिक लागू हुआ कि भगवान के कई नाम हो सकते हैं यहां पर लोग कहते शंकर भगवान उनके सबसे बड़े वैव भक्त है परम वैष्णव है तो अब मैंने अपने लास्ट वीडियो में ये दिया था कि अगर सबसे बड़े वैष्णव भगवान शिव है तो सबसे बड़े भगवान विष्णु है और इसके शास्त्र में प्रमाण है बिल्कुल सही बात है जी तो कुल मिलाकर कान इधर से पकड़ ले इधर से पकड़ ले बात घुमा फिरा कर के एक ही आनी है कि भगवान आदि शंकराचार्य के द्वारा दी गई जो शिक्षा है जो उन्हें परंपरा से उन्होंने पीछे से आई आगे दिया उस शिक्षा के अंदर रहते हुए में कितना हम लोग कितना भी

00:31:08:01 शब्दावली को बदल के किसी तरीके से लोगों को समझाने के लिए ज्ञान को प्रस्तुत करते वो बात एक अलग है मगर जिस दिन हम ये कहेंगे कि हम आदि शंकर के विरोध में खड़े हैं तो उस दिन हम सबसे पहले वेदों के विरोध में पूर्ण ईश्वर के विरोध में और उसके बाद तदा अनुसार हम लोग धर्म के विरोध में तदा अनुसार हम मानवता के विरोध में हो जाएंगे मानवता के विरोध में और फिर अंत में हम बन जाएंगे वो धर्मे ना पशु भी समाना जी जी अ बिल्कुल मैं आपकी बात का समर्थन करता हूं अब जैसे कि आपने उनसे प्रश्न पूछे थे उन्होने कुछ के मतलब मतलब उत्तर नहीं दे पाए वो अब जैसे कि आपने पूछा कि भाई तुम लोग महामंत्र का जाप करते हो हरे महामंत्र का जाप करते हैं आप लोग महामंत्र का जाप मैं भी करता हूं भैया जी भी करता हूं अपने सब लोग करते हैं आपने मंत्र कोईन के द्वारा प्रतिपादित किया हुआ थड़ी ना महाम तो हमारे शास्त्र में हैन उस नाम से फेमस हो गया हैन जो है उस नाम से फेमस हो गया हरे क का मतलब एक ही हैन ऐसा नहीं है

00:32:20:10 जी का मतलब पहली वारी अपने मुख से निकाली थी पहली वाणी तो जैसे कि अब महामंत्र में सिर्फ राम और कृष्ण के नाम क्यों आते हैं शंकर का नाम क्यों नहीं आता है शिव का नाम क्यों नहीं आता है ब्रह्मा का नाम क्यों नहीं आता है इस बात को आप सोचिए और इसका जो उत्तर है वो आपको मतलब आप ये कह रहे हैं क्योंकि चैतन्य महाप्रभु ने इसको स्वीकारा तो हम ये मान ले कि विष्णु जो है वो पूर्ण है वो ज्यादा श्रेष्ठ है और जो शिव शंकर है वो वो है विष्णु और शिव एक है विष्णु और शिव एक है मैं कह रहा हूं नारायण या श्री हरि या श्री कृष्ण मान लीजिए कि क्योंकि चैतन्य महाप्रभु ने हरे कृष्ण महामंत्र को स्वीकारा है इसलिए हम यह माने कि श्री कृष्ण श्रेष्ठ है और जो है यह जो हमारे शिव शंकर है विष्णु है ये थोड़े से

00:33:16:18 डाउन जी देखिए श्रीमद् भागवत में भगवान के आप संदर्भ तब प्रस्तुत करिए जब आप एक को स्वीकार करिए कि आपके अनुसार चैतन्य महाप्रभु ने क्योंकि महामंत्र को स्वीकारा है और उसमें सिर्फ कृष्ण और राम का नाम है इसलिए इससे सिद्ध होता है कि जो शिव और विष्णु है भगवान के अन्य जो रूप है वो जो है थोड़े से डाउन है ये आप स्वीकार करते हैं नहीं मैं डाउन नहीं कह सकता प्रभु की इच्छा के बिना क्या मैं ये कहूंगा बस मतलब वो वो भी श्रेष्ठ है वो भी संतुल्य है कुछ नहीं कर सकते प्रभु की इच्छा के बिना तो इसका मतलब अधीन हो अधीन हो गए ना वो अधीन हो गए ना हां वो उनके जो अधीन हो गया जो अधीन हो गया वो पूर्ण नहीं

00:34:12:25 है जो अधीन हो गया वो पूर्ण नहीं है बाधित है यानी बाधित हो गया तो वो ईश्वर नहीं है नहीं नहीं ऐसा बिल्कुल नहीं है देखिए प्रभु जी अ अब वही मैं आपको बताना चाहता कि श्रीमद् भागवत में भगवान के हम प्रमाणों प तब जाए ना जब हम प्रमाणों की आवश्यकता पड़े हम लोग प्रमाणों तब जाए प्रमाणों की आवश्यकता पड़े पहले तो हम लोग एक चीज प पहुचे कि भाई आप जो कुछ कह रहे वो मैं मानू तो हमें पहले स्वीकार करना पड़ेगा ना कि जो जो शिव है वो पूर्ण नहीं है जो विष्णु है वो पूर्ण नहीं है श्री कृष्ण का नाम क्योंकि महामंत्र में आता है और उनका नाम आता है क्या कहते राम जी का श्री राम जी का तो इसलिए यह पूर्ण है और जो विष्णु और शिव है शंकर है यह कहीं ना कहीं इनके अधीन हा बिल्कुल जी अवतार और अवतारी इसका अर्थ तो ये हुआ इसका अर्थ य हुआना कि शिवजी के शिवजी जो है वो पूर्ण नहीं है य स्वीकार किया ना आपने शिव शंकर और ये जो अपने विष्णु भगवान है पूर्ण नहीं है पूर्ण परमात्मा तुम

00:35:27:26 अंतर्यामी गलत लाइन है जी वो एक अवतार है और जो श्री कृष्ण है वो अवतार है अच्छा श्री कृष्ण के अवतार है ठीक है अब ये बात जो आपने मानी है अब ये बात जो आपने मानी है अब हम लोग अब ये आया कोई डिबेटेबल अभी तक कोई डिबेटेबल मामला ही नहीं था अब आया तो अब आपने कहा कि श्री चैतन्य महाप्रभु के उन्होंने जो है हरे कृष्ण महामंत्र का जाप किया है तो आप ये सोचना कि उसम श्री राम का जी इसका अर्थ य है आप जो है यह मानते हैं यही एक मंत्र ऐसा है जो सबसे मतलब सबसे श्रेष्ठ मंत्र है क्योंकि इसको श्री चेतन महाप्रभु ने स्वीकारा यही हुआ इसके अलावा अन्य सभी जो मंत्र है वो कहीं ना कहीं अगर शिव का मंत्र मैं आपको बता दूं तो जिसमें केवल शिव का नाम है जी जी जी वही वही मैं उसी पर आ रहा हूं जी अब आप मुझसे पूछेंगे कि भाई मेरे को नहीं नहीं मैं आपसे मैं आपसे प्रमाण नहीं मांग रहा हूं मैं क्योंकि मैंने आपको बिना प्रमाण दिखाओ आप प्रमाण मत दिखाओ मैंने आपके प्रमाण को स्वीकार कर लिया कि आपने कहीं पढ़ा है किय मंत्र बहुत बड़ा है अब मुझे बताइए कि चैतन्य महाप्रभु गुरु भाव किसके लिए

00:36:42:27 रखते थे जी देखिए श्री मैंने यह कहा था कि जो महामंत्र है वो प्रकृति में पहले से था ऐसा तो है नहीं कि श्री चैतन्य महा चैतन्य महाप्रभु ने उसका आलंबन लिया श्री चैतन्य महाप्रभु ने उसका आलंबन लिया जैसे अभी प्रेमानंद जी है प्रेमानंद जी महाराज है तो प्रेमानंद जी महाराज ये नहीं कहते भगवान के अन्य नाम जो है वो उतने शक्तिशाली नहीं है प्रेमानंद जी कहते हमने आलंबन लिया राधा भाई मैं मेरे को प्यार है भगवान के राम रूप से मगर इसका अर्थ ये नहीं है कि मैं ये कह कि नहीं साहब शिवजी जो है वो थोड़े से अधीन है राम के और कृष्ण अधीन है मैं तो यह कहता हूं हे पांचों ईश्वर के सभी हे पाच रूप मुझे राम रूप में दर्शन दीजिए मैं तो इस रूप में आपकी भक्ति करूंगा मुझे आपके इस रूप से बड़ा प्रेम है तो ये मेरा फंडामेंटल है और जो जो प्रेमानंद जी महाराज है वृंदावन में है वो भी यही कहते हैं वो ये कहते हैं कि क्या कहते हम राधा का वो लेते हैं मगर भगवान के किसी भी नाम का आलंबन आप ले सकते हैं हम राधा राधा करते उन्होंने तो नहीं कहा कि नहीं अब उनके अगर हरे कृष्ण के पर्सपेक्टिव से देखा जाए तो राधा नाम गल उनका उतना शक्तिशाली नहीं है वो नाम दूसरी

00:37:58:26 बात अब मैं आपसे पूछूंगा कि चैतन्य महाप मैं एक आपसे मैं एक आपसे बात पूछूंगा श्री चैतन्य महाप्रभु जी गुरु भाव किसके लिए रखते थे इस बारे में आप बताइए आपने श्री चैतन्य महाप्रभु जी को स्वीकारा है ना प्रमाण के रूप में जी बक उसके लिए आवश्यक है ना कि हम उनके बारे में जानते हो जिसको हम प्रमाण के रूप में स्वीकारें तो हमको यह तो पता होना चाहिए किसको स्वीकार कर रहे हैं हम तो इस हिसाब से चैतन्य महाप्रभु जी गुरु भाव किसके लिए रखते

00:38:31:28 थे श्री चैतन्य महाप्रभु नित्य गौरंगा आपने सुने होंगे उनके लिए अपना गुरु भाव रखते थे अब क्या उन्होने कभी शंकराचार्य को अपना गुरु माना किन्ने चैतन्य महाप्रभु ने बिल्कुल देखिए इसका तो मैं देखिए आपसे झूठ नहीं बोलूंगा कि हां भाई माना होगा नहीं माना होगा पर आपको नहीं पता है आदि शंकराचार्य श्री चैतन्य महाप्रभु आपकी आवाज नहीं आही प्रमाण है आपकी आवाज नहीं आ रही नहीं नहीं माना होगा नहीं अगर माना होगा तो तो शंकराचार्य कहते ईश्वर के पांचों रूप पर कोई शंकराचार्य होते वो कृष्ण की भक्ति करते कोई शंकराचार्य होते हैं शिव की भक्ति करते हैं और देखिए शंकराचार्य का मतलब ऐसा नहीं नाम में शंकर आ गया तो शब हो गए शंकराचार्य का मतलब है जो पांच ईश्वर के पांचों रूपों को वेद सत जो पांच रूप है उनको एज इट इज अपनाते हैं उसमें कोई बड़ा छोटा नहीं करते नहीं वेद में छह है छ भक्ति भक्ति वो एक ही करते हैं ठीक है वो वो हम ये एक अलग टॉपिक हो जाएगा वेद में छह है मैं बाकायदा आपको श्लोक दूंगा छह है

00:39:47:09 पांच नहीं है छह है कारतीय भगवान को भूल रहे मैं कह रहा हूं वो मैं आपकी इस बात को रख लेता हूं छह मगर फिलहाल मैं ये कह रहा हूं जो शंकराचार्य है वो ऐसा नहीं है कि उन्होंने केवल सिर्फ वैष्णव से ही शास्त्रार्थ किया है शंकराचार्य जी का जो शास्त्रार्थ हुआ है वह बौद्धों को बौद्धों का खंडन करने के बाद जैनों का खंडन करने के बाद इस उद्देश्य से कि मैं अपने धर्म को अपने समाज को एक करूं और जहां पर कहीं पर मिथ्या के कारण बट रहा है समाज शिव और विष्णु के नाम पर उन्होंने शवों से भी शास्त्रार्थ किया है उन्होंने वैष्णव से भी शास्त्रार्थ किया है उन्होंने सातो से भी थ किया है शास्त्रार्थ का वो क्या था उद्देश्य कि यहां पर जो भ्रम है वो दूर हो यह लोग एक हो वैष्णव शैव के साथ खड़े हो शकतो के साथ खड़े होप गणपति के साथ खड़े हो सबके साथ में खड़े हो तो इसलिए शंकराचार्य जी केवल ऐसा नहीं है वो शिव की पूजा करने वालों के गुरु है तो अभी हम वापस आ जाते हैं अपने विषय पर कि आपने ये कहा कि चैतन्य महाप्रभु ने हरे कृष्ण महामंत्र को स्वीकारा तो अब आप चैतन्य महाप्रभु को जानते हैं जहां से वो जाहिर सी बात है कि वो स्कन की ग्रंथावली है यही है ना चैतन्य

00:41:02:12 महाप्रभु को आप कहां से जानते हैं देखिए वृंदावन तो आप गए होंगे जी नहीं नहीं मैं मैं एक एक एक एक चीज क्लियर कर लेना आप चैतन्य महाप्रभु को जो जानते हैं कहां से जानते हैं आप जैसे हम श्री कृष्ण और शंकर मानते हैं श्र कृष्ण शंकर को परंपरा प्राप्त जो हमारे आचार्य हैं पूज्य गुरुदेव शंकराचार्य जी पुरी पीठाधीश्वर जी उनके द्वारा बताए गए जो शास्त्र है उनके आलंबन से मैं जानता हूं उन्होंने गीता प्रेस गोरखपुर की पढ़ने को कहा है जो पुस्तक मैं उसकी पढ़ता हूं जो पुस्तक उन्होंने चौखंबा पब्लिकेशन के लिए पढ़ने को कहा मैं उसकी पढ़ता हूं उनके माध्यम से जो गोविंद को मैं जानता हूं आप किस किन ग्रंथों के माध्यम से जानते

00:41:53:24 हैं देखिए अब आप मे से पूछ रहे हैं कि आप चैतन्य महाप्रभु को किन ग्रंथों मानते देख एक नाम सुन लेना एक अलग सुनि नाम सुन लेना एक अलग बात है जब हम किसी को अपनाते आत्मसात करते हैं तो कहीं ना कहीं उसके बारे में अध्ययन करते हैं तो व अध्ययन आपका क्या है कहां से अन चैतन्य महाप्रभु जी का यह कोई आपसे स नहीं आपकी एबिलिटी के लिए सवाल नहीं कर रहा हूं मैं एक तत्व पर पहुंचना चाहता हूं इसलिए सवाल कर जी अब आपने प्रेमानंद जी काने ठीक है प्रेमानंद जी हमारे लिए

00:42:34:15 प्रमाण वो क्या देख मान्यवर आप मेरी बात समझिए विषयात हो जाएगा विषयात में क्या होगा चलिए चलिए बोलिए आपकी बात जो प्रेमानंद जी ने जिनसे दीक्षा ली है व श्री हरिवंश है इस बात को मानते हैं मान लिया मान जी श्री हरिवंश राधा वल्लभ मंदिर को चलाते हैं इस बात को मानते होंगे मान लिया जी तो उसी श्री हरिवंश में उसी हरिवंश की मतलब लिख लिखित किताब है उसको उसको पढ़िए उसमें भी मतलब श्री चैतन्य महाप्रभु का वर्णन आता है और नित्य गौरंगा का आता है आप मतलब आपने उसका अ आपने उसका अध्ययन किया है चैतन्य महाप्रभु के लिए या किसी और पुस्तक का मैं सीधे-सीधे पूछ रहा हूं चैतन्य महाप्रभु को जानते आप कहां से है आपने कहां से अध्ययन किया है उनका श्री ह श्री हरिवंश की किताबों से अच्छा तो मैं कुछ प्रमाणिक शास्त्रों की बात बता रहा हूं मैं कुछ प्रमाणिक शास्त्रों की बात आपको बता रहा हूं कि श्री चैतन्य महाप्रभु ने

00:43:49:16 जी प्रभु जी एक मिनट एक मिनट जी जी जी किसी का कोई प्रश्न हो तो पूछ ले कुछ देर के लिए व विराम हुआ है लाइव चैट में लसे नहीं नहीं ऐसा नहीं स्थान पर शास्त्र प्रमाण तार्किक आधार पर वार्ता क्यों नहीं करते बिल्कुल अस्पष्ट वक्तव्य देते

00:44:25:00 हैं प्रभु जी जी जी आवाज आ रही है प्लीज इकन के प्रभुजी के साथ पॉडकास्ट वाले वीडियो का लिंक भेजें जी मैं अभी अभी भेज दूंगा संसाधनों का अभाव है थोड़ा सा तो इसलिए उतना ज्यादा उत्कृष्ट स्तर का हम नहीं कर पाएंगे स्ट्रीम यार्ड का उपयोग किया करिए प्लीज हा हम लोग कोशिश करेंगे ये समय के अभाव क्योंकि हम केवल देखिए मैं जो देख रहे हैं इस समय उनको एक बात बता दूं कि केवल य ही नहीं है हमारा कार्य स्थली

00:45:03:02 youtube4 इसके लिए य का आलंबन लिया जाता है बाकी हम ग्राउंड लेवल पर बहुत सारे कार्य करते हैं तो अभी भी आपको मैं बताऊं कि मैं कहीं और था उनके साथ सज्जन के साथ मेरी वार्ता चल रही थी वार्ता चलते चलते कब समय बीत गया अचानक से मुझे याद आया कि 7:00 बजे का टाइम दिया गया था मैं वापस आया जल्दी बहुत जल्दी जल्दी अपना संध्या बंदन किया सायंकाल का और उसके बाद य उपस्थित हुआ तो केवल य का जिनका वो रहता है तो वो बहुत जल्दी जल्दी उसम आपको देखेंगे कि आप तरह तरह से वो संसाधनों का उपयोग भी करेंगे हम प्रयास करेंगे कि हम भी यहां पर उपलब्ध करा पाए वो चीज मगर अभी सारी चीज अवेलेबल नहीं है

00:45:47:28 और भगवान एक रूपन हां बिल्कुल सही बात है जय श्री राम कट्टर हिंदू जी कट्टर हिंदू जी जय श्री राम नमस्ते आर्य आओ करें सनातन सुद्धि जी जी जी आपका स्वागत है नारायण भैया नमस्ते जय श्री राम जय श्री राम आदित्य वशिष्ठ जी जय श्री राम वेदांत है इन्होंने कोई मोटन दिया है इनके मैं कमेंट पढ़ता हूं आपका बड़ा सहयोग मिलता है हमें जो आप वहां पर आकर के प्रति उत्तर देते हैं वैचारिक मतभेद रखने वालो

00:46:23:02 को भगवा रेवोल्यूशन ये तो अद्वैत बोल रहा है जी जी जी जी वो अद्वैत घुमा फिरा के आप जब पीछे पड़ जाएंगे ना ईश्वर को सर्वशक्तिमान सिद्ध करने के मोक्ष को परम स्वतंत्र सिद्ध करने के और व्यवहारिक धर्म को कभी ना बदलने वाला सिद्ध करने के तो आप पहुंच जाएंगे आदि शंकराचार्य के पास हरि हर में भेद गया स्कोन वाले तो हरि हरि के ही अवतार में भेद करते हैं जी जी जी जी ये क्वेश्चन था उसम बात नहीं हो रही है अभी प्रभु करना ही तो है आप इकन के किसी गुरु के साथ डिस्कशन डिबेट करें यह सब करके कुछ नहीं होगा लोकेश नहीं देखिए एक वैचारिक मतभेद जहां से प्राप्त होता है और जो उपलब्ध हो जाता है तो हम यहां पर बैठ कर के अगर हम एक व्यक्ति की भी को भी जागरूक बना पाए तो हम अपने को सौभाग्यशाली समझते हैं और इस तरह की चर्चा से हम मुझे लगता है कि अगर 10 लोग देख रहे होंगे इस चर्चा को तो कहीं ना कहीं कोई एक व्यक्ति तो है जो जिसमें जागरूकता आएगी धर्म के लिए वो चीजों को समझ पाएंगे किधर है बरो य सम इनके चैनल ही है हा अच्छा अच्छा वो आपस में बात कर रहे हैं उस वीडियो में भी इसकन के प्रभु जी ने क्लियर कुछ नहीं कहा जी हां उन्होंने क्लियर नहीं जितना अच्छे से क्लियर क्लियर महानुभाव सामने बैठे हैं जो बात कर रहे हैं

00:47:38:02 इतना क्लियर उन्होंने नहीं कहा था उन्होंने तो बस यह कहा था उनके दो तीन चीजें थी जो बहुत ही कहूंगा कि वो रही संशय पूर्ण पहली कि आत्मा को यह सोचना होगा कि संशय कहां पर करना चाहिए यह उन्होंने कहा था मुझे आज भी याद है उनका य संशय कहां करना चाहिए य भी अब ये भी एक सवाल हो गया कि यह कहा लिखा मिलेगा यह शास्त्र में कहा मिलेगा कि कहां संशय करना कहां नहीं करना है यहां तो हम लोग जो ब्राहमम आडलज जिसमें कहा जाता है ज्यादा सवाल मत करो ज्यादा प्रश्न मत करो प्रश्न करोगे तो तुम्ह कठिनाइया हो जाएंगी तुम ये होगा तुम्ह वो होगा वैसी आइजी हो गई जब हम ये कह देंगे कि संशय मत करो जबक हमारा धर्म किस पर टिका हुआ है अथातो धर्म जिज्ञासा अथातो ब्रह्म जिज्ञासा हमारा धर्म तो इस पर चलता है असतो सत गमाया मुझे असत से सत ले चलो तम माया मुझे अंधेरे से उजाले की ओर ले चलो मृत मतम गमाया मुझे मृत्यु से अमृत की ओर ले चलो तो हमारा धर्म इस पर चलता है हमारा धर्म यह कहता है कि सवाल करो आप सवाल करिए और आप देखिए हमारे सारे जितने भी धर्म ग्रंथ कहीं ना कहीं सवालों पर टिके हुए हैं पुराण शुरू होगा कि वहा इतने महा ऋषि बैठे हुए थे ऋषि उन्होंने उनसे पूछा सवाल से शुरू होता है हमारा ग्रंथ भगवत गीता सवाल से शुरू होती है

00:48:53:10 तो यह सारी चीज सवाल प है हमारी प्रश्नों पर और जब प्रश्न करने को मना कर दिया उसके बाद उनका था कि शास्त्रों की गहराइयों में जाना इनमें जाना यह हमारा उद्देश्य नहीं है तो जब शास्त्रों की गहराई में जाना नहीं है तो क्यों हम लोग भगवत गीता को रोड पर जाकर के और जो है जो भी करते हैं वहा पर विक्रय करते हैं क्रय करते हैं तो क्यों करते हैं जब शास्त्रों की गहराई में उनको गहराई से जानना ही नहीं है तो हमें करना क्या है फर उनका भगवत गीता का ये उनके वक्तव्य थे इसके अलावा एक वक्तव्य और था कि बस कुछ नहीं आप जो है हरे कृष्ण का जाप करिए तो ये उन्होंने अंतता बस यही कहा कि भाई मुझे मैं कुछ जानता नहीं मैं तो बस वो है जो मुझे बता दिया मैं बोलूंगा और आप हरे कृष्ण का जाप करिए तो इस तरह का वक्तव्य था लखनऊ केन प्रेसिडेंट है जो तो बड़ा निराश हुए थे हम वहा से क्योंकि हम गए थे वहा पर अपनी शंकाएं दूर

00:49:49:15 करने जी जी जी जी बिल्कुल आप सही कह रहे मन जी शास्त्र प्रमाण की आवश्यकता नहीं पड़ेगी कौन के वक्तव्य का खंडन तार्किकता से ही हो जाएगा आप ये बिल्कुल सही कह रहे इसीलिए मैं कह रहा हूं ना इसीलिए मैं कह रहा हूं कि शास्त्रों प त हम जाए जब हमें आवश्यकता पड़े पहले तो वो तार्किकता ही खत्म हो जाती है ना ठीक है चलिए प्रभु जी हम वापस आते हैं प्रभु जी तो बताइए मान्यवर हेलो जी जी आप क्या कह रहे थे बताइए पहले तो आपसे माफी मांगूंगा जो मैंने आपका मतलब समय थोड़ा सा उधर चला गया था कोई बात नहीं कोई बात नहीं इसके लिए माफी मांग उतनी देर थोड़ा सा जो जो छोटे भाई है या फिर समकक्ष है या फिर थोड़े से वरिष्ठ है मुझसे उनसे थोड़ा सा आदान प्रदान करने का एक अवसर प्राप्त हो गया उसके कारण तो वो भी एक अच्छी चीज है बताइए नहीं नहीं बिल्कुल अब जैसे कि मैं आपसे एक प्रश्न करना चाहूंगा कि अवतार और अवतारी मतलब क्या अंतर है अवतार और अवतारी में क्या अ मैं जो है कोई बहुत एक आचार्य नहीं हूं ठीक है जिस भाष मैं आचार्य नहीं

00:51:04:18 हूं मैं केवल एक धर्म रक्षक के रूप में स्वयं को देखता हूं और मैं शंकराचार्य का सैनिक ह और मेरा बस य पूज्य गुरुदेव ने एक बात कही थी जिसके हृदय में ताप हो गौ हत्या आदि को लेकर दर्द हो पीड़ा हो सनातन मान हिंदुओ की रक्षा का भाव हो तो पुरी के शंकराचार्य से आक मिलना तो बस जी मैं उनसे जाकर मिल लिया और यही मेरा अस्तित्व है पूरी पीठाधीश्वर जी का अल्पज्ञ शिष्य और प्रभु श्री राम का साधारण सा भक्त मैं कोई आचार्य नहीं हूं और जिस भाषा शैली में आप जो है अवतार अवतारी में जो वो सब आप ये हमारे विषय नहीं है मैं उस पर बात कर सकता हूं ऐसा नहीं इनका अर्थ नहीं मालूम अवतारी वो है जो अवतार लेता है अवतार वो है जो अवतार लिया गया नहीं नहीं अ अभिज और अभिजन का अंतर है इस विषय से ही आपके सारे जितने भी मतभेद है वो शायद प्रभु की कृपा से मिट सकते हैं आप समझ नहीं रहे पहले तो यह तय नहीं होता है कि मतभेद क्या है जब जब मैंने जो जो भेद बोला तो उस उसम आपने एग्री किया जब आपने एग्री किया तो भेद कहां रहा फिर आप जब भेद नहीं है तो आप सही किस चीज को कर रहे

00:52:23:08 हैं हम तो फिर भी मन प्रभु नियम से बंधे हुए हैं प्रभु नियम से बंधे हुए हैं परमार्थ में और परमार्थ का एक्जिस्टेंस तब होगा जब यहां पर इस इस व्यवहार में व हर नियम को तोड़ दे वो रावण बन के पाप करेंगे हमारे आपके रूप में मूर्ख बन जाएंगे और वो हर वो चीज करके दिखा देंगे जो एक मनुष्य बुद्धि से सोचा जा सकता है एक खिड़की है उसका छोटे से छोटा छेद है हम उसके अंदर से घुस के नहीं निकल सकते वो निकल के दिखा देंगे वो भूत भविष्य सब कुछ कर देंगे सब कुछ बदल डालेंगे क्योंकि वो ईश्वर है किसके मनुष्य के वो प्रभु अपने नियमों से बने प्रभु निश्चित है अद्वैत है उनके अलावा किसी और चीज का एेंस नहीं है वो सब वहां है परमार्थ परमार्थ हमारा सिद्ध तब होता है जब यहां पर हमने उन्हें ईश्वर मान लिया तो ईश्वर किसी को ईश्वर मानने के लिए यहां पर उनका आबाद सिद्ध होना आवश्यक है तो यहां पर भी अगर हम उन्ह बाधित कर देंगे आपने जैसे आपने कहा कि प्रभु भूत और भविष्य सब एक कर देंगे तो प्रभु किस रूप में कर देंगे यह मेरा प्रश्न है कि किस रूप में कर देंगे आप लोग किस रूप में उन्हें देखना चाहते हैं और आप लोग उन्हें किस रूप में देखते हैं

00:53:40:09 व्यवहारिक व्यवहारिक रूप का अनुकन क्या है जो आप जैसे कह रहे हो वो श्री कृष्ण है तोय व्यवहार वाले हो गए यह ईश्वर व्यवहारिक हो गया जैसे ही हमने उसके बारे में बात व्याख्या करना शुरू कर दी अगर वो परिभाषित कर पा रहे हैं कि उनका कंधा यहां से शुरू हो रहा का शरीर है हम लोग व्याख्या कर रहे हैं तो व्यवहारिक ईश्वर हो गया वो जिसके साथ व्यवहार किया जा सके जैसे ईश्वर के दो रूप है एक जिसको हम नहीं समझ सकते एक जिसको हम समझ सकते हैं अब राम वो आप स निगुण में जा रहे हैं जी जी व्यवहारिक हो गया सगुण साकार और संग में एक और एक और रूप है वो है अवतार का वो भी तो है तीन रूप है जी तो फिर मैं मैं इसी बात प आ रहा हूं कि अवतार और अवतारी में क्या मतभेद है मतलब क्या अंतर है अवतार जिस जो अवतार अवतार वो है जो अवतार लिया गया वो रूप और अवतार ही वो है जिसने अवतार लेता है जो अवतार लेता है वो हो गया अवतार जी तो इनमें कोई भेदभाव है तात्विक दृष्टि से देखेंगे तो कुछ नहीं है व्यवहारिक दृष्टि से देखेंगे तो है तो उसी बात प मैं आज मैंने यह भी पहले बोला था मैं अब भी यही बोलता हूं कि परिस्थितियां जैसे होती है प्रभु भी वैसे

00:54:55:10 व्यवहार व्यवहार व्यवहार में बाधित है व्यवहार में बाधित है तो वही तो मेरा भी कहना है मेरा मेरा भी वही कहना है कि व्यवहार में हम ईश्वर को बाधित नहीं कर सकते व्यवहार में हम ईश्वर को बाधित नहीं कर सकते व्यवहारिक ईश्वर अगर बाधित हो गया तो फिर ईश्वर कहां से रहा पर वो जो व्यवहार जो परिस्थितियां जो उठ रही है वो भी तो उनकी ही कृपा से उठ रही है और उन्ही की कृपा से बंद हो जाए इसका मतलब इसका अर्थ य है इसका अर्थ हमको देर व है

00:55:29:10 नहीं अब वही प आ रहा मैं अब आप ये बताइए की शंकर भगवान कौन है शकर भगवान रूप है जो समार नामक कत के निर्वाह का प्रकट करता है निर्वाह करता है व है शंकर भगवान शिव शंकर भगवान रुद्र जी करुणा अवतारम संसार सारम भुजग हारम सदा वसंतम हदे भव भवानी सतम नमामि तो करुणा के अवतार है मतलब सीधी भाषा में करुणा के अवतार है शंकर भगवान हम तो भगवान का अगर एक अंश करुणा के रूप में निकल चुका है तो क्या वह भगवान की पूर्णता रूप जिसमें हर रूप सलात है वो क्या उसकी टक्कर ले लेगा यह बताइए आप जो व्यवहारवाद है ना जो व्यवहारवाद उसकी कौन है देखिए मैं बताऊ आपको इसकन जो है गलत नहीं कहता है थोड़ी सी बातें अब जैसे कि इस उनने मतलब कृष्ण और अल्लाह को उने एक कर दिया यह बात गलत है पर अगर आप मुसलमान से पूछोगे तो मुसलमान कहेगा मेरा एक भगवान है अल्लाह आप सिखों से पूछेंगे सिख वाहेगुरु का नाम लेंगे वो

00:56:44:15 भी कहेंगे एक है आप क्रिश्चन से पूछें कश्चन कहेगा हमारे जीसस क्राइस्ट यसा मसीह के रूप में गॉड की फॉर्म में पूजे जाते हैं हमारे एक भगवान है आप हिंदुओ से पूछेंगे ना हिंदुओ में सबसे ज्यादा कन्फ्यूजन रहता है कि हमारे भगवान कृष्ण है शंकर है राम है का मैं आपको बताऊंगा पूरी कर लो अपनी बात मैं इसका कारण बताऊंगा इसका समाधान भी बताऊंगा जी जी इसका कारण ये है इसका कारण यह है पहली बात तो यह है कि अगर भगवान ने कहा भागवत भागवत पुराण में भगवान कहते हैं कि मैंने तुम्हें इन्हीं स्थितियों के साथ इन्ही गुणों के साथ इन्ही विचारधाराओं के साथ पशुता के उत्पन्न किया है और तुम्हारा जीवन सार्थक तब होगा जब तुम अपनी इस पशुता को खत्म कर दोगे मेरा मेरे बताए हुए मार्ग को अपनाते हुए यानी कि अगर आपके अंदर लट है भोग की प्रवृत्ति है तो उसको विवाह आदि के माध्यम से मुझसे जोड़ दो संतान उत्पत्ति के लिए केवल भोग करो अगर आपके पास खाने की भूख है तो आप खाना तब खाओ जब मुझे भोग लगा दो हर जगह मुझे आप जोड़ दो तो आप धीरे धीरे आपकी जो पता है वो समाप्त करना मेरा काम मैं देखूंगा आपकी सारी चिंताए तो सबसे पहली बात यह है जो मैं कह रहा था कि

00:58:00:06 जो धर्म होता है ना अगर जो एक पशु रूप में उत्पन्न होने वाले व्यक्ति की नजर से हम देखें तो धर्म का निर्वाह करना बहुत मुश्किल होता है एक बच्चा जब जन्म लेता है उसको उसके माता पिता ना सिखाए कपड़े पहनना या फिर बड़े लोग अपने गुरुजनों को प्रणाम करना यह सब अगर उसके माता पिता उसको नहीं सिखाएंगे तो वो थोड़े कालांतर में एक मानव रूप में जानवर होगा मान ना इस बात को अब हम उससे कहे मानव रूप में जानवर होगा इसका अर्थ क्या है धर्म का निर्वाह करना जो एक मनुष्य रूप में जन्मा है ना उसके हिसाब से बहुत कठिन है कठिन मगर इसका अर्थ ये नहीं है क्योंकि कठिन हो रहा है तो हम धर्म को ही बदल दे नहीं हमको जिस रूप में धर्म है उसी रूप में जब हम किसी को देंगे क्योंकि यह जो कंफ्यूजन फैलाने वाली शिक्षा है इस शिक्षा के कारण कंफ्यूजन फैलती है तो शिक्षा कोही बदल दे तो ये धर्म का प्रचार प्रसार जिस रूप में धर्म प्राप्त है जो सच्चाई है जो जैसी है उसको वैसा ही अब ज फैलाए तो है तब वो होगा कि धर्म का प्रचार प्रसार किया कि भाई वर्ण व्यवस्था से दिक्कत आती है उससे भेद भाव फैलता है वर्ण वस्था हटा दो ईश्वर के कई रूपों से दिक्कत आती है ईश्वर के कई रूप हटा दो यह तो तरीका नहीं है किसी चीज के प्रचार प्रसार का फिर

00:59:15:07 अंतत हमने धर्म को धर्म का प्रचार प्रसार नहीं किया अधर्म का किया क्योंकि हम अशा स्त्रीय हो गए महा ऋषि वेदव्यास कहते हैं महा ऋषि वेदव्यास स्मृति है दो 11 में व्यक्तिगत त कमान्य ये कहीं पर कहा गया है क्या कि भाई अगर उससे कंफ्यूजन फैल रही है तो आप अपने हिसाब से धर्म में थोड़ा बहुत वो कर दो कि भाई कई रूप है ईश्वर के उससे कंफ्यूजन होती है इसलिए एक रूप प आ जाओ ये कौन सी बात उसको उसको हजम करवाओ जिसको हजम नहीं हो रहा है उसको डाइजेस्ट करवाओ जिसे डाइजेस्ट नहीं हो रहा है उसको समाधान दो समाधान क्या है स्कंद पुराण में कहा गया है मनुष्य चाहे चारों वेद पढ़ ले सारे पुराण पढ़ ले सारे उपनिषद पढ़ ले जप तप व्रत दान पुण्य कर्म तीर्थ आदि तीर्थ दान यज्ञ सब कुछ व्यर्थ है अगर अगर मनुष्य का गुरु नहीं है 99 पर लोग आज हिंदू वो है जिसका कोई गुरु नहीं है इसलिए ये प्रॉब्लम है जी और अगर गुरु है अगर अगर गुरु है अगर गुरु है भी तो फिर यह नहीं है कि व प्रमाणिक है कि नहीं कहां से आया कौन है जो जहां पर थोड़े दिन पहले जो कुमार विश्वास जी थे कवि थे थोड़े दिन पहले राम कथा मर्मज्ञ हो गए आचार्य प्रशांत ज्ञान बांटते हैं धर्म का अपनी आईआईटी

01:00:30:09 की शिक्षा के लिए बताते हैं मैं आईआईटी हूं यानी कि मैंने आईआईटी कहां से की वो ये बताते हैं मैंने धर्म का ज्ञान कहां से लिया नहीं बताते इसका अर्थ क्या हुआ कि जिन 99 पर लोगों को तो गुरु तत्व का मालूम नहीं है और फिर उसके बाद जब गुरु तत्व का मालूम पड़ा तो प्रमाणिक गुरु का नहीं मालूम है तो ये जो स्थिति है कि कंफ्यूजन फैलती हैय स्थितियां इनके कारण है अगर वो किसी प्रमाणिक गुरु के सानिध्य में जाएगा उसको सब कुछ संतोष प्राप्त हो जाएगा उसका भक्ति का लेवल अप हो जाएगा तो यह कंफ्यूजन का कंफ्यूजन का समाधान यह नहीं है कि हम अगर पांच रूपों है क्योंकि दुनिया में सबका एक एक रूप है भाई उन्होंने वेदों का वेदों के विरुद्ध अपनी संरचना की है तभी तो उनका अस्तित्व है अगर वेद सम्मत ही वो अपनी संरचना करते तो उनका अस्तित्व कहां से होता उन्होंने वेदों के विरुद्ध अपनी जो शिक्षा है अपनी ग्रंथावली उसकी संरचना की तभी तो आज वो एजिस्ट करते हैं वरना वो हमारे ही कोई अंश होते हमारा ही कोई भाग होते वैदिक होते तो हम ये करें कि भाई कक हम ये करें क्योंकि भाई सनातन धर्म में पांच रूप पांच रूप ईश्वर के बताए गए छह रूप ईश्वर बताए गए हम इसलिए और वहां पर देखिए कोई कन्फ्यूजन नहीं है इसलिए अपने को बदल दे तो हमने तो अंतत अपनाया उसी कोई यह तो एक तरीके से ऐसा हो गया जैसे वो भूतों वाली फिल्म आती थी ना

01:01:45:27 जिसमें की एक एक को मार दिया तो उसके शरीर से निकल कर के भूत दूसरे के शरीर में आ गया फिर वो हा करने लगा तो ये तो वो वाली बात हो गई कि भाई हमने जब अधर्म से लड़ते लड़ते अपने अधर्म को छोड़कर उनके जैसा ही अपना लिया तो अंततः जीत किसकी हुई अधर्म की जी तो हम इस बहाव प कि भाई कंफ्यूजन फैलती है दिक्कत आती है कठिन होता है रास्ता इस बहाव प हम ये चेंज नहीं कर सकते कि नहीं एक ईश्वर माने हम भी और ना इसकी क शास्त्रों ने परमिशन दी बल्कि मना और किया है व्यक्तिगत तर का मान मषि वेदव्यास दो शास्त्रों के विरोध में कहीं भी आप व्यक्तिगत तर्क नहीं लगा सकते अगर शास्त्र कह रहे शिवजी पूर्ण ब्रह्म है तो आप ये नहीं कर सकते क्योंकि भा कन्फ्यूजन फैले गी इसलिए हम एक को मानेंगे नहीं ये तो नहीं कह रहे शास्त्र जी बताए आप मतलब आपका कहने का मतलब यह है कि लोगों को अपने गुरु बहुत हिसाब से चुनने चाहिए बिल्कुल जी तो फिर कुछ लोग हैं जो मतलब कह देते हैं कि आप ये बताए कि गुरु क्या भगवान है गुरु स्वेता सत्र उपनिषद स्वेता सत्र उपनिषद में लिखा हुआ है कि गुरु में और भगवान

01:03:01:06 में अंतर ना करे मगर हम कभी भी अपने गुरुदेव की पूजा नहीं करते गुरुदेव स्वयं मना करते कि मेरी कहीं पर मूर्ति लगा कर पूजा नहीं होनी चाहिए भगवान भगवान वो है प्राप्ति का विषय गुरु जो है व्यवहार का विषय वैसे ही हो गया दोबारा से गुरु का आ ले हा मैं अपना उदाहरण दे दूं मेरे को किसी ने गुरु मान लिया या आपको किसी ने गुरु मान लिया ठीक है जी आपको किसी ने गुरु मान लिया और मुझे किसी ने गुरु मान लिया मैं तो कुछ भी नहीं हूं पर फिर भी लोग कहते कि गुरु ब्रह्मा गुरु देव महेश्वरा गुरु साक्षात परब्रह्म श्री गुरुदेव नमः तो यह तो फिर बात गलत हो गई है कैसे गलत हो गई आपने गुरु कैसे मान लिया क्या सुनिए जो गुरु बताया गया अंतिम निर्णय गुरु बताया गया है अधर्म वेद 117 16 ब्रह्मचारी आचार बनता है मनुस्मृति 12 अध्याय 112 से 114 नंबर श्लोक कि धर्म में संशय होने पर ब्रह्मचारी के पास जाए तो आप ब्रह्मचारी है नहीं है अंतिम निर्णायक आपको नहीं माना जा सकता ना मैं हूं ना आप है दूसरी बात कि ज्ञान वही प्रमाणिक जो परंपरा से प्राप्त हो भगवत गीता पढ़ता है ना व्यक्ति ज्ञान वही प्रमाणिक जो परंपरा से प्राप्त हो शांतो उपनिषद मांड उपनिषद

01:04:16:14 और व्यवहारिकता भी देख लीजिए व्यक्ति अगर अपने बच्चे को एडमिशन दिलाने जाएगा तो उस स्कूल में जाएगा जो कहीं ना कहीं से सफाइड हो अगर डॉक्टर से इलाज कराने जाएगा तो वहां जाएगा जो कहीं से सर्टिफाइड हो पढ़ाने के लिए ट्यूशन भेजेगा तो देखेगा कि कहां से इसकी डिग्री है वो डिग्री वो सर्टिफिकेशन वो डिग्री वो सर्टिफ आरहा जी जी मैं एक मिनट खत्म करू वो डिग्री वो सर्टिफिकेशन क्या बता रहे हैं उसके गुरु का नाम यानी कि उसकी गुरु परंपरा वो डिग्री वो सर्टिफिकेशन उसके गुरु का नाम बता रहे हैं तो कोई व्यक्ति हमको गुरु ऐसे ही क्यों मान लेगा जब हम किसी गुरु परंपरा से नहीं तो ये उसकी मूर्खता है कि जीवन के छोटे छोटे से लौकिक शिक्षाओं को प्राप्त करने के लिए लौकिक ज्ञान प्राप्त करने के लिए व गुरु परंपरा का आलंबन ले रहा है मगर जब धर्म के लिए जा रहा है तो वो किसी को भी बिना कुछ सोचे समझे गुरु मान ले रहा है ये उसकी गलती है तीसरा है मत्स पुराण 145 अध्याय 5वा श्लोक की सभी सुति स्मृति शास्त्रों में सामंजस्य की शिक्षा ही साधु सम्मत धर्म है तो हमें गुरु उसको बनाना है जो किसी भी प्रमाणिक आर्स ग्रंथ का खंडन ना करते हुए सामंजस्य की शिक्षा दे ऐसा ना हो शिव पुराण को छोड़ दो भगवती पुराण को छोड़ दो विष्णु पुराण को मानो भागवत पुराण को मानो ऐसा ना हो शिव पुराण की भी

01:05:31:15 सामंजस हो भगवती पुराण का भी सामंजस्य हो ब्रह्मवर्त पुराण का भी सामंजस हो ऐसी शिक्षा होनी चाहिए इसमें सब सबका मान वो है गुरु और अंतत गुरु का क्या लक्षण है अंतत गुरु का लक्षण है अद्वय तारका उपनिषद गु का मतलब अंधकार रु का मतलब निकालने वाला गुरु वही जो संशय दूर करते आपको आपकी अज्ञानता रूपी अंधकार से निकाल दे ये चार रूप है इसमें से जो माना हुआ गुरु है क्या वो माना हुआ गुरु प्रश्न करने पर बताता है जैसे कई लोग होते हैं अब जैसे आपसे मान लिया आपसे आपको उन्होने मनी मन गुरु मान लिया आपसे वो कुछ पूछने आया तो आपके पास सारे प्रश्नों के जवाब तो नहीं होंगे संशय तो आप दूर कर नहीं पाएंगे तो संशय ज दूर नहीं बिल्कुल नहीं होंगे तो जब संशय दूर नहीं हो रहे तो आपको वो गुरु कैसे मान रहा है हम तो उसको गुरु मान हम तो हमारे गुरु तो वो है जो सभा में आने के बाद कथा वगैरह ना करते हुए सबसे पहले आकर के ये कहते हैं कि भाई किसी का कोई प्रश्न हो तो वो पूछे वो पूरे भारतवर्ष में केवल इसीलिए यात्रा करते हैं कि संशय दूर हो क्योंकि वह संशय फैलाया गया है हमारे हिंदुओं के मन में जिसके कारण आज ये नतीजा है हमारी शिक्षा पद्धति पर जो वार किया है व पूरे आज वो करीब 81 82 साल

01:06:46:20 वर्ष के हो गए आयु हो गई है उनकी पूरे भारतवर्ष में आज भी वो यात्रा करते हैं केवल इसलिए कि धर्म की रक्षा करनी है उनका का एक वीडियो उसको देख कर के आंसू आ जाएंगे शायद आप अ आप देखिएगा वीडियो उसमें कह रहे हैं पूज्य गुरुदेव ने हमसे अकेले में कहा

✅ This part is already used · 01:07:02:07 – 01:07:13:01 (0:11)

→ Used in: A · Live रिदम से विजया और जगदगुरु शंकराचार्य #vedpuran #hindu #shankaracharya at 1:21:35 ↗

01:07:02:07 था कि लोग तुमसे कहेंगे लोग तुमसे कहेंगे कलयुग है यह है वो है किसी की बात मत सुनना बीच की रक्षा भगवान को अभीष्ट करते रहना तो

⬜ Not used yet · 01:07:13:01 – 01:38:45:00 (31:32)

01:07:13:01 असफल होना हमने सीखा ही नहीं ऐसे गुरु है हमारे तो ऐसे किसी को गुरु माना बनाना चाहिए मैं ये नहीं कह रहा हूं कि केवल उन्हीं को गुरु बनाइए ऐसा जहां भी ऐसा महापुरुष आपको मिल जाए को गुरु बनाइए और जब व्यक्ति धर्म को एक साइड वाली चीज मानते हुए करता है कि य खोला और वहां से हमको ज्ञान मिल जाए तो वो ऐसे लोगों पढ़ते हैं आचार्य प्रशांत जी हो गए उनको ऐसा मिल गया उनको राम वो राम कथा मर्मज्ञ हो गए उन्होंने कह दिया उत्तरकांड प्रक्षिप्त है गलत लोगों की गलत शिक्षा देने वालों की शरण में जाने से लोग आजकल मुझसे पूछते हैं कि आप इसकन के लिए इतना वो क्यों उठाते हैं ये सारे चैप्टर्स है स्कन है और जहां जहां पर आर समाज की विवादास्पद शिक्षाएं वो है जहां जहां पर ये संत राम संत रामपाल वाले हैं ब्रह्मा कुमारी वाले हैं इसी की वजह से तो आज हिंदू धर्म वो है निर्मल इसी की वजह से तो हम सेंट्रलाइज नहीं हो पाते भाई एक सिंपल सा उदाहरण ले लीजिए कि रामचरित गीता प्रेस गोरखपुर से छपने वाली जो वाल्मीकि रामायण है उसमें उत्तरकांड दिया गया है अब उसको कोई व्यक्ति चौराहे पर जलाने वाला है जो लोग कुमार विश्वास को प्रमाण मानते होंगे अपना जो लोग कुमार विश्वास को फॉलो करते होंगे वो हिंदू उस चौराहे पर नहीं जाएंगे रामायण की रक्षा करने के लिए क्या हुआ

01:08:28:16 गलत गुरु के सानिध्य में पहुंच जाने से हिंदू बटा यही है गलत गुरु जहां जहां व्यक्ति पकड़ रहा है वैसे वैसे हिंदुओं का हास होहा हमारी शक्तियां विघटित हो रही है अब शिव और विष्णु के नाम पर लड़ा दिया कि शिवजी ब्रह्म नहीं है भगवती ब्रह्म नहीं है तो व कहां एक हो पाएंगे शिवजी के मंदिर पर हमला होगा हमने एक नाट्य मंचन किया था कुछ कुछ दिन पहले शिव जी के मंदिर पर हमला होगा हम जाएंगे मंदिर जाता होगा बचाने नहीं आएगा कि हम तो जहा जाना जाते वहा जाते हैं कहीं पर भंडारा हम लोग करवा रहे होंगे शिवजी के नाम का भंडारा होगा वो इंटरेस्टेड नहीं होगा चंदा देने में दान करने में जो जिनको सिखा दिया गया शिवजी ब्रह्म नहीं है ऐसे ऐसे लोग हैं जो अगर अगर पंच देव उपासना वाले घर में चले जाए तो घणा से देखते हैं इफट ये आप लोग कैसे हो गए हो एक भगवान की जग कितने भगवान तुमने रख रखे हैं मतलब इरिटी से देखते उन हिंदुओ को जो पंचदेव उपासना करते हैं यह है इकोन की शिक्षा तो ऐसी शिक्षा पर हम प्रश्न उठाते हैं जहां से तो इस शिक्षा के जब गुण में जाएंगे जब भी कोई व्यक्ति शास्त्र विरुद्ध और परंपरा विरुद्ध शिक्षा देगा कहीं ना कहीं वह दो तीन चीजें कर बैठेगा

01:09:44:00 पहली चीज कि वह उस ईश्वर को उसके द्वारा प्रतिपादित होने वाला ईश्वर सर्व शक्तिमान नहीं रह जाएगा उसके द्वारा जीव को मिलने वाला जो मोक्ष हो परतंत्र सिद्ध होगा उसके द्वारा जो मनुष्य को प्राप्त होने वाला धर्म है वह शाश्वत नहीं होगा बदलता होगा जैसे कि ब्रह्मा कुमारी को ले लीजिए ब्रह्मा कुमारी कहते हैं हमारे य रोज आकाशवाणी होती है रोज जो भगवान है व आ कर के वो आकाशवाणी करके जाते पूरे विश्व में फैलाया जाता है है ना तो यानी क्या है रोज नया धर्म आ रहा है किसी भी देश काल परिस्थिति में जो ना बदले उसी का नाम सनातन है अथर्ववेद तो यहां पर वो स अब कह तो खुद को सनातन ही रहे क तो स्वयं को नात रहे मगर वो क्या है सनातन विरोधी तो ऐसे लोग हो गए अज्ञात नास्तिक खैर आप कुछ कह रहे थे

01:10:35:06 बताइए नहीं मैं आपकी बात से सब बातों से मैं आपके सहमत हूं अब जैसे कि मैंने आप आपने एक आपने कमेंट मतलब आपने एक रील ली थी जिसमें आप बता रहे थे कि भगवान श कृ पहले तो आप एकज एक चीज आप दर्शको को क्लियर कह दीजिए आप भी इकन की शिक्षाओं से कहीं कहीं पर मतभेद रखते हैं यह आप बता दीजिए पहले देखिए इकन की संस्था में बहुत सारे लोग जुड़े हुए

01:11:12:24 हैं आगे बोलिए इसकन की संस्था में बहुत सार लोग जुड़े हुए हैं पर एक संस्था के नाम पर हम सबको बदनाम नहीं कर सकते हम वो बातें कर रहे हैं मान्यवर हम वो बातें कर रहे हैं जो उनके ग्रंथ में लिखी है हम वो बातें कर ही नहीं रहे जो वो वर्बल बोलते हैं हम हमेशा उन बातों पर बात करते हैं जो उनके ग्रंथ में लिखी है 3 152 में लिखा है कि कई मूर्ख ऐसे हैं जो हेलो

01:12:01:15 हेलो आवाज आ रही है हेलो जी नहीं आवाज नहीं आही थी तो आप हां आवाज आ रही है हुआ क्या है यहां पर सप्लाई कट हो गई है आपकी आवाज धीमी आ रही है प्रभु जी आ रही अब थोड़ी सही हुई है जी ठीक है तो मैं यह कह रहा था कि जैसे मान लिया कि आप ये

01:12:51:16 मानते मैं आपने कहा इकोन की शिक्षा हम इकोन की उन शिक्षा को गलत मानते हैं जो उन शिक्षा पर क्वेश्चन करते हैं जो उनके शास्त्रों में लिखी उनके ग्रंथों में लिखी है हम किसी का विज्ञान है जो उसम कृष्ण और कृष्ण और क्राइस्ट है इनकी एकता स्थापित करने का प्रयास किया गया है यहोवा जो बाइबल का ईश्वर है यवा वो की जो कृष्ण है और क्राइस्ट यहोवा उनकी एकता स्थापित करने का प्रयास किया गया इसके अलावा जो कृष्ण अल्ला वाली बात है वो भी एक ऑफिशियल इनकी साइट है उन पर से आप जाकर देख लेंगे

01:13:39:24 उसमें प्र जी अच्छे उन्होने स्वीकारा कि नहीं स्वीकारा अल मैटर मगर प्रभुपाद जी के नाम से जब हमारे बच्चे यह समझेंगे कि यह समझने में कि कोई भी पढ़ो किताब सब एक है अगर वैचारिक अंतर नहीं होता तो फिर य अलग जो भी विचार धाराए है आज अस्तित्व में उनका अस्तित्व होता ही ना के उसके अंग मान सकते हैं कि अंग होते मगर

01:14:22:08 एक हेलो मुझे लगता है कि आपको आवाज नहीं आ रही है एक चीज हम लोग क् कर लेते है एक चीज क्लियर कर लेते हैं आप ये स्वीकार करते हो कि ईश्वर एक ही है वही अनेक रूपों में प्रकट होते हैं पहली बात ये बात तो मैंने पहले क थी ठीक है ठीक है ठीक है ठीक है दूसरा एक पॉइंट है कि वो जो आपका

01:14:58:28 जो पहले कुछ और है जैसे की एक चीज और है कि दूध जिस प्रकार दूध से दही बन सकता है पर दही से दूध नहीं उसी प्रकार कृष्ण शिव बन सकते हैं पर शिव बनने के बाद कृष्ण जो शिव है जो वापस कृष्ण नहीं बन सकते जी या ब्रह्म के कारण को मानते हैं सही है जी ब्रह्म संहिता के सं अनेको पुराणों में इसका मतलब बताया गया है जैसे कि आपको बरा पुराण में मिलेगा श्रीमद् भागवत पुराण मिलेगा आपको विष्णु पुराण में भी इसका

01:15:44:13 मिलेगा तो ब्रह्म समता एक आग सा बता तो उस शिव गणों ने वि को वो दे दिया था शास्त्रों की रचना हुई थी व उन्ह नाम दिया गया और साफ साफ मेंशन है कि इन शास्त्रों में दी गई जो सारी शिक्षा है व तभी तक मान जब तक व वेदों का विरोध ना कर रही हो इसका मतलब कि हम इसे अंतिम प्रमाण नहीं मान सकते तो ब्रह्म समता में जहां जहां पर ऐसी शिक्षा है जो वेदों का विरोध नहीं कर रही उसको वेद में कहा जा रहा है कि शिव पर्र है मगर यहां पर कृष्ण की स्थापना हो रही है परब्रह्म के रूप में तो हम इसको नहीं मान सकते नहीं वेद में नहीं कहा गया है कि शिव परब्रह्म है वेद में कभी नहीं कहा गया है आप मेरे कोष का आपको शता उपनिषद और प्रमाण नहीं है उपनिषद आपके लिए प्रमाण नहीं है जी नहीं वेद है उपनिषद को तो मानता ही नहीं मैं अच्छा ठीक है लिए निषद को नहीं मानते तो ये ज्ञान आपको कहां से मिला जी देखिए यह ज्ञान

01:16:59:15 आपको कहां से मिला पहली बात तो मैं आपको क्लियर कर एक क्लियर कर दूं वेदों में भी भगवान शिव की परब्रह्म के मैं प्रमाण आपको उपलब्ध करा दूंगा ये इस फोन में है इस फोन में ही है जिससे मैं आपसे बात कर रहा हूं तो मैं आपको श्लोक क्रमांक वगैरह जब इससे आगे कोई रील बनाऊंगा इस हिस्से की तो उसमें वेदों में प्रमाणिकता डाल दूंगा जहां पर शिवजी को परब्रह्म माना गया हो ठीक है अब दूसरी बात ये है कि आप उपनिषदों को प्रमाण नहीं मानते उपनिषदों को देखिए आपने आपने अभी कहा नहीं मानता अब आप मानते हैं कि नहीं मानते दोबारा बता दीजिए नहीं मानते ब ये नाम उपनिषदों को प्रमाण ना मानने वाला जो ज्ञान है आपने कहां से प्राप्त किया है कि मैं उपनिषद को नहीं मानना पुराण नहीं पुराणों से नहीं परंपरा प्राप्त आचार उपनिषद का एक बार भी मैंने ब्रह्म संहिता का नाम लिया मैंने उपनिषद का मैंने एक भी नाम नहीं लिया शिव पुराण मैं क कह रहा हूं मैं ये कह रहा हूं कि उपनिषदों को आप प्रमाण नहीं मानते हैं जी नहीं मानते तो अब ये उन्ह उपनिषदों को प्रमाण ना मानने का जो ज्ञान है कि उपनिषदों को प्रमाण नहीं मानना है यहां पर आप देखिए वो जो 145 अध्याय 5वा शलोक था ना मत्स पुराण वहा

01:18:14:24 उसको आप क्रॉस कर रहे हैं कि भाई मैं जो है समस्त शास्त्रों को आश ग्रंथ जो हमारे आप उपनिषद को नहीं मानते उपनिषदों को तो आर्य समाज मानता है आप बताइए कैसे आप सामान्य धारा के हिंदू हैं आप उपनिषदों को नहीं मानते ठीक है मैं इसको करेक्ट कर देता हूं अब आप ये बताइए आपको किस परंपरा प्राप्त आचार्य ने कहा है कि उपनिषद प्रमाण नहीं है पहले आप मेरे को ये बताइए कि उपनिषद क्या है श्वेता जो हमारे 108 उपनिषद है उसमें से 11 और भी जो क्या कहते हैं श्वेता सतो उपनिषद है ब्र उपनिषद है ये सब आप प्रमाण नहीं मानते हैं ठीक है तो अब आप मुझे बताइए किस आचार्य ने आपको यह कहा है कि उपनिषद हमारे लिए प्रमाण नहीं है असतो मा स जति हमारे लिए प्रमाण नहीं है निजी अनुभव मैं आपसे यह कहना चाहता

01:19:10:13 हूं मषि वेदव्यास निजी अनुभव मत बताइए आप मुझे बताइए आपको किस परंपरा प्राप्त आचार्य ने कहा है उपनिषद प्रमाण नहीं है जी नहीं मेरे से किसी ने नहीं कहा है पर मैं ये क क्या है मैं आपसे प्रश्न करता हूं कि उपनिषद क्या के अंग है वेदों के अंग है जिस अंग में अंग किने बनाए वेदों के अंग किन्ने बनाए पुराण किसने बना भवान ने तो सिर्फ चार वेद की ही रचना की थी पुराण किसने बनाए उपनिषद कहां से आ गए पुण किसने बनाए भगवान ने तो सिर्फ चार वेदों की किसी और दिन सुनिए सुनि इस हम किसी और दिन अच्छे से चर्चा करेंगे फिलहाल मैं आपसे पूछ रहा हूं कि आपसे किसी भी आचार्य ने ये नहीं कहा कि उपनिषद को प्रमाण मत मानो आपने आपने अपने मन से य कर लिया है जी निजी अनुभव निजी अया सुनि जब आप निजी अनुभव हो जाते हैं तो शास्त्रों के विरोध में महारसी वेदव्यास ने कहा पुराण को मानते हैं ना पुराण को मानते हैं ना पुराणों को मानते हैं कि नहीं मानते हैं पुराणों को देखिए मैं तो

01:20:25:20 बिल्कुल मानता हूं मैं पुराणों कोनते तो म वेदव्यास को मानते हैं जी महा ऋषि वेदव्यास स्मति को मानते हैं महा महा ऋषि वेदव्यास जी को मानता हूं और सुखदेव जी को भी मानता हूं मैं तो वेदव्यास जी ने कहा है व्यक्तिगत तर्क अमान्य अ ये आपका अनुभव है आप अपने अनुभव पर बात कर रहे हैं शास्त्र प्रमाण बात नहीं कर रहे तो हम लोग सनातन के ऊपर बात नहीं कर रहे अब हम लोग बात कर रहे हैं एक अ हिंदू के रूप में नॉन हिंदू के रूप में और हम लोग य आए क्यों थे हिंदुत्व के ऊपर बात करने धर्म के ऊपर बात करने मगर य धर्म तो है ही नहीं क्योंकि आप यहां पर तो अपने मन का जो नियम है वो बता रहे हैं और हम अपने मन के नियम में बात नहीं करते जी मतलब हिंदू तो बात कहना अलग बात है अब मैं आपसे पूछ लू कि भाई मेरे को ये बताओ कि हिंदू पंथ है या फिर धर्म अब आप ये भी तो प्रश्न है ना तो आप कहोगे तो हिंदू तो प आप य पर अगर मेरी योग्यता को जांचने की कोशिश कर रहे तो बात अलग है मैं बता सकता हूं आपको हिंदू कौन है हीनता हीनता से दूर रहने वाला हिंदू है हिमालय से लेकर हिंदू सरोवर यानी कन्याकुमारी

01:21:41:09 के बीच में जो स्थान है उस स्थान को न कहते आपकी आवाज कट रही है जी अब आ रही है अब आ रही है हां आ रही है अब आ रही है हेलो जी आ रही है आ रही है जी तो ये ये एक हो गया कि आप मेरी परीक्षा लेने आए हैं परीक्षा मत दीजिए आप मेरी हिंदू का अर्थ मैं आपको बता सतां हिंदू कौन है गुरुजी हा आप ये पूछ रहे हैं ना मैं आपसे पूछ ऐसे विषयात हो जाता है देखिए एक विष हो जाता है आप भगवत गीता को मानते

01:22:20:06 हैं भगवत गीता को मानते हैं आप जी मैं भगवत गीता को मानता हूं तो भगवत गीता में चौथे अध्याय के दूसरे श्लोक में भगवान ज्ञान का परंपरा से प्राप्त होना बता रहे हैं तीसरे अध्याय के 16 श्लोक में बता रहे जो लोग परंपरा चक्र से प्राप्त होने वाले ज्ञान के विरुद्ध जाते हैं वो लोग कभी सुखी नहीं रह पाते और जो साथ में चलते हैं वही सुखी रहते हैं यहां पर आप जब यह कह रहे कि मेरा व्यक्तिगत अनुभव है परंपरा प्राप्त ज्ञान जो क्या कहता है उससे मतलब नहीं है तो यहां पर तो आप विरोध कर रहे हैं भगवत गीता का वो जो परंपरा चक्र है व सुमता नारी के बीच में जो आने वाले सात चक्र है उनकी बात हो रही है ना कि गुरु परंपरा के चक्रों की बात हो रही है चार दो जी चार दो चार दो चौथे अध्याय का दूसरा

01:23:14:14 शलोक चौथे अध्याय का दूसरा लोक चौथे अध्याय का दूसरा लोक चौथे अध्याय का दूसरा श्लोक आपको मेरी आवाज आ रही है आप मेरे को आपकी आवाज आ रही है चौथे अध्याय का दूसरा श्लोक आवाज नहीं आ रही तो फिर ऑफ करें चौथे अध्याय का दूसरा श्लोक आवाज आ रही है आपको आवाज आवाज आपकी आ रही है कट कट के आ रही है अभी आपने बोला कि श्लोक आपने बोला मैं सुन पा रहा हूं पर कट के आ रही है आपकी प चौथे अध्याय का दूसरा लोक दोबारा बोल रहा हूं चौथे अध्याय का दूसरा श्लोक चौथे अध्याय का दूसरा श्लोक चौथे अध्याय का दूसरा श्लोक चौथा अध्याय दूसरा श्लोक जी मेरे को कंठस्थ नहीं है मेरे को देखना पड़ेगा का उपयोग परंपरा से प्राप्त हुआ ज्ञान मुझे यह ज्ञान मुझे परंपरा से य भगवान को नहीं यह परंपरा से परंपरा

01:24:29:25 वाला ज्ञान है जो मुझे जो मैं तुम्ह आज बता रहा हूं बीच में लुप्त हो गया था अब दूसरी एक बात बता दीजिए कि आप वेदों का एक्जिस्टेंस मानते हैं वेदों का एक्जिस्टेंस मानते हैं वेदों का एक्जिस्टेंस मानते हैं आप आवाज नहीं आ रही जी अब आ रही है आरही को मानते प्रमाण वेदों का एक्जिस्टेंस नहीं मानता हूं वेदों का एक्जिस्टेंस नहीं मानते अच्छा अच्छा तो आप सनातनी कैसे कह रहे अपने आप पुराणों का मानते हैं पुराणों को मानता हूं पुराणों को मानते हैं तो महाने महा ऋषि वेदव्यास जी ने पुराण जो लिखे थे वो कब लिखे थे

01:25:26:04 मतलब सुनि एक चीज क्लियर हो जाएगी आज की समय धारा में तो नहीं लिखे गए नहीं लिखे गए ना आज नहीं नहीं तो जो आपको वेद प्राप्त हुए हैं पुराण सॉरी पुराण वो कैसे प्राप्त हुए कैसे मिले आप देखिए पुराण है प्राप्त कैसे हुए भाई साब पुराण हमें वेद ब्याज जी की वजह से प्राप्त हुए हैं अरे उनकी वजह से प्राप्त हुए उन्होंने अपने शिष्य को दिए उन्होंने अपने शिष्य को दिया शिष्य के शिष्य के शिष्य परंपरा से प्राप्त हुए कि नहीं पुराण पहले आप ये बताइए मेरे को कि वेद क्या है मैं देखिए बा चर भगवान की मु मुख वाती है क्या वेद भगवान के मुख से निकले हैं नहीं वेद अपौरुषेय

01:26:23:13 बिल्कुल आप किसी भी वेद का हो रही है वो भी उस जिक्र किया जाता है आपसे कह रहा हूं मैं आपसे कह रहा हूं आप परंपरा प्राप्त ज्ञान का खंडन करते हैं इस समय आप अमिक विचारधारा की तरफ जा रहे खैर मैं अब आपसे पूछ रहा हूं नहीं नहीं आप जाएंगे देखिए आप जब वेद को प्रमाण नहीं मानते आप उपनिषद को प्रमाण नहीं मानते आप हिंदू नहीं है सनातनी नहीं है आप सनातनी नहीं आपको सिद्ध करूंगा आपको सिद्ध कर रहा उसी के लिए लाइव स्ट्रीम चालू काट चुका होता क्योंकि आपने ऐसी बात कर दी है तो मैं आपको पूछ रहा हूं पुराण को भी आप मानते हैं तो आप तक पुराण आया कैसे गीता प्रस गोरखपुर से आया कैसे

01:27:13:00 आया कैसे आया देख शिष्य की व गुरु परपरा के शिष्य है को आपने स्वीकार कर लिया य परंपरा को आपने स्वीकार कर लिया ना यहां पर जी तो परंपरा को जब आप स्वीकार कर रहे हैं तो आप इसका मतलब आप य परंपरा प्राप्त जो आचार्य गुरु शिष्य परंपरा का नियम है आप इसको स्वीकार करते हैं आपको भगवत गीता के शलोक की आपको किसी भी प्रमाण की आवश्यकता नहीं आप परंपरा को स्वीकार कर

01:27:47:10 रहे आवाज आ रही है आपको मेरी आपकी आवाज आ रही मैं आपसे पूछ रहा हूं कि आप यहां पर आप पुराणों के लिए पकार कर रहे हैं जी मेरी आप बात समझ जब आप परंपरा परंपरा के नियम को स्वीकार कर रहे हैं तो आपको परंपरा प्राप्त आचार्य की बात माननी पड़ेगी वरना आपके लिए पुराण भी एजिस्ट नहीं करते हैं गुन आचार लिखे हैं गुरु गोविंद और ग्रंथ ये तीनों से मिलाकर जो ज्ञान प्राप्त वो ज्ञान प्रमाणिक माना जाएगा आपने गुरु को अलग हटा दिया कि मेरा व्यक्तिगत व अनुभव फिर मैंने आपको परंपरा के बारे में बताया तो आपने वो नहीं माना नियम जब मैं आपको बता जब मैंने आपसे पूछा पुराण कैसे प्राप्त हुए तो आपने कहा परंपरा से इसका अर्थ क्या हुआ कि पुराणों को प्राप्त करने के लिए आपने परंपरा का ही आलंबन लिया है अन्यता आपको प्राप्त कहां से होते आपका नेटवर्क इशू है कुछ ऐसा लग रहा है बब तक हम लोग बात कर ले खर हम लोगों की आज जो डिबेट है वो बहुत ही निथ सिद्ध हो रही है ऐसा लगने में आ रहा है क्योंकि मुझे ऐसा लग रहा था कि एक इकन का पक्ष रखेंगे वो इकन का पक्ष भी नहीं रख रहे हैं और आपकी

01:29:02:19 खुद की मान्यता बहुत ज्यादा क्षमा करिएगा उसमें बहुत ज्यादा शोधन की आवश्यकता है नवीन शर्मा जी ने बता दिया जी भग गीता चार दो इतने प्रश्न यदि इतने प्रश्न यदि अपने स्कन के सो कॉल्ड गुरु को पूछते तो यहां अपनी पशु बुद्धि का प्रमाण नहीं दे रहे होते क्या मतलब इनके गुरु भी ऐसे हैं खैर आप लोगों ने देखा जब हम लोगों ने बात की भाई साहब से तो वो जा चुके हैं आप लोगों ने देखा जब हमने इनसे बात की तो यही बात है यही मैं सबको बताना चाहता हूं जो इधर उधर गलत विचारधाराओं के अंदर फंसे हुए हैं उनको जब आप पुरे दोगे तो उनके अंदर छुपा हुआ सनातन विरोध मिलेगा यह इसका जीता जागता प्रमाण और जब इनकी ऐसे मुख से निकलने वाली शिक्षाएं विस्तार करेंगी तो क्या होगा मैंने अपनी आंखों से देखा है ऑनलाइन स्ट्रीम में एक बिटिया आती है और कहती है कि मैं सात साल से इस इस विचारधारा को फॉलो कर रही हूं और मैं आज अपना धर्म कन्वर्ट करना चाहती

01:30:18:02 हूं इसलिए क्योंकि ऐसे मुख से शिक्षा निकलती है इसीलिए मैं पीछे पढ़ता हूं हमारे हमारा हिंदुओं का सबसे बड़ा शत्रु कोई सामने खड़ा हुआ नहीं है वोह है जो चोला जिन्होने सनातनी का ड़ रखा है मगर जब आप उनको कुरे दोगे तो उनके मूल में सनातन का विरोध निकलेगा उपनिषदों को प्रमाण नहीं मानते हैं वेदों को प्रमाण नहीं मानते हैं गुरु परंपरा को अभी नहीं मान रहे थे पुराणों के लिए गुरु परंपरा को मान लिया खैर अच्छा लगा इनसे बात करके ज्यादा परेशानी तो नहीं हुई और ये वहां पर कमेंट में आकर के ा वाला जो हमारा अकाउंट है वहां पर जो लोग फॉलो कर रहे थे हमको उनको बोल रहे थे कि आप मैं आचार्य हूं मुझसे अगर कुछ जानना हो तो आप आ कर के मुझसे पूछ लेना ये उन्होंने वहां पर वक्तव्य दिया था मुझे अभी तक य वार्ता बड़ी अच्छी लग रही थी मगर मुझे हिट करने लगता है जब कोई व्यक्ति सनातन का विरोध करता है इस तरह से गुरु परंपरा का विरोध खुद अपने गुरु का नाम बता रहे हैं मगर उसके बावजूद कह रहे मैं गुरु परंपरा को नहीं मान रहा हूं फिर गुरु परंपरा को मान रहे हैं किसलिए कि भाई मुझे प्राप्त तो वहीं से हुआ

01:31:33:06 भैया आपको च बहुत ही उत्तम कार्य करते जी आपका जी जी जय हो जय हो मनु भैया आपकी खुश रहिए आपने मनु जी आप खुश रहे जी वी हु आर इ य आर कीपिंग रसे सेपरेट इनवाइट एवन च वी कैन चट अला ही इ द सेम सुप्रीम पर्सन सुप्रीम

01:32:06:25 नाम मेंटेनर एंड कंट्रोलर सुप्रीम फादर सोस ऑ एव वेलकम एवरी बडी यर वन गड ए व आर फमली ए व आर र ग ड मैटर ददर यू कॉल अल्ला और कृष्णाय देखिए यहां पर किसी ने कमेंट में कहा है हम आस्ता सिची जी को बोलना चाहेंगे अगर व हिंदी भाषा का प्रयोग कर सके तो कभी आए हमारी लाइव चैट में और इस पर हम बात करेंगे कि हम अल्लाह क्यों नहीं कहेंगे कृष्ण को क्योंकि हमारी जानकारी में अल्लाह वो है सबसे पहली बात है स्वरूप निश्चित होना चाहिए सगुण साकार की भक्ति के लिए भक्ति का विषय सगुण साकार इसलिए सगुण साकार स्वरूप है भगवान का कृष्ण राम शिव शिव जी के भी दो रूप होते हैं सग निराकार सगुण साकार दोनों है शिव जी का सगुण साकार स्वरूप है उसकी अगर भक्ति करते हैं तो उसको हम अल्लाह से नहीं जोड़े क्योंकि अल्लाह जो है वो खुद कह रहे हैं कि हम अवतार नहीं ले सकते तो व्यवहारिक रूप से भी वो य क रहे

01:33:21:28 कि मेरे ऊपर कुछ नियम लागू होते हैं सही कह रहे मनु जी आप कि कैसे सनातनी योद्धा है जो वेद और उपनिषद को नहीं मानते यही यही रूप ऐसे लोगों का हमें बाहर लाना है हमें जो भ्रांति में है कि मैं सनातनी ह किसी भी देश काल परिस्थिति में जो ना बदले उसका नाम सनातन है अब इन्होंने कहा मैं पुराण को मानता हूं खुद कह रहे हैं म वेदव्यास जी ने पुराण लिखे यानी कि उन्होंने जब पुराण लिखे थे इनके अनुसार तो उससे पहले तो एक्जिस्टेंस ही नहीं था उनका तो यानी कि सनातन धर्म ग्रंथों को नहीं मानते जब तक ये बात नहीं मानेंगे कि पं पुराण में लिखा गया है कि वेदों के समय पर भगवान ब्रह्मा ने उसका स्मरण किया था पुराणों का तब तो मान पाएंगे अगर य ये मानेंगे कि वेदव्यास जी के लिखे हुए पुराण है तो फिर वो तो सनातनी कहां से कह रहे हैं सबसे पहले तो आप सनातन से बाहर जाइए

01:34:26:04 सही कह रहे हैं वेदांत जी इतने प्रश्न यदि वेद को भी नहीं मानता है जी इन्होंने सारे वेद पढ़ लिए क्या ये क्लेम कर रहे हैं कि भगवान शिव को परब्रह्म नहीं बोला गया है कौन से आधार पर यह बात क्लेम कर रहे हैं नहीं नहीं हम इनको जवाब देंगे हमने वो सेक्शन में छोड़ दिया था उपनिषद नहीं मानता ठीक है अब हम इसकन का पक्ष रखने वाले के जो ये जो वीडियोस है देखिए हो सकता है कि मेरे तरफ से इस सम इस वक्त इस समय थोड़ा सा अमर्यादित व्यवहार दिखाई दे रहा हो पर उसकी एक मात्र वजह है कि जो मेरे अंदर कोई एक ऐसा फीड है कि जैसे ही कोई विरुद्ध बात करने लगता है बिल्कुल अतार्किक बातें करने लगता है तो थोड़ा सा ऐसा ब्लड फलो होने लगता है कि थोड़ा सा मेरे जो स्वर है बात करने का जो तरीका है भाषा शैली है थोड़ी सी चेंज होती है हां मर्यादित रहती है कभी मर्यादा को नहीं लाे मगर इतना सब सुनने के बाद किसको धैर रहेगा पूज्य गुरुदेव के

01:35:50:12 अलावा ठीक है लगभग हमने सभी प्रश्नों के जवाब ले लिए हैं आप सभी को जय श्री राम और आपका इस प्रकार से समर्थन प्रकट करने के लिए आभार आपका हम लोग बहुत अतिशीघ्र एक भगवान शिव का भक्ति गीत है वो लेके आने वाले हैं जिसमें हमने द्वै अद्वैत साकार निराकार ये सारी चीजों की बात की है और हमने इसका एक शॉर्ट भी डाल रखा है वहां अपने हमारे शॉर्ट्स की गैलरी में आप जाकर देख सकते हैं तो एक रैप सॉन्ग बनाया है युवाओं के लिए बहुत अच्छा रहेगा और उसके माध्यम से हम ये चीजें बताई है उसमें कि भाई साकार निराकार में क्या अंतर है साकार हमारे भक्ति का विषय व्यवहार का विषय और निराकार प्राप्ति का विषय तो निराकार के लिए हमें प्रयत्न नहीं करना है प्रयत्न करना है साकार के लिए सगुण साकार और ऐसे ही भक्ति हूं मैं द्वैत की अद्वैत का मैं ज्ञान हूं ज्ञान का विषय अद्वैत और भक्ति का विषय द्वैत और यह बातें हमें जनजन तक पहुंचा नहीं है ये लोग जो जितना इन्होंने प्रोपेगेंडा फैलाया है कि भई वो तो मायावादी उनसे दूर रहना यह इसलिए जब इनके ट्रेनिंग सेशन चलते हैं तो सबसे पहले क्लास में बताया जाता

01:37:05:12 है कि भाई शंकराचार्य से दूर रहना शंकराचार्य क्योंकि उन्ह मालूम है कि जिस दिन य शंकराचार्य के पास पहुंच जाएंगे ना इनकी सारी चीज गलतफहमिया दूर हो जाएंगी तोय शंकराचार्य से एक निश्चित दूरी बना के रखते हैं शंकराचार्य के पास जि पहुंच गए भाई इकी दूरी ग दूर हो जाएगी तो हमा जो भी प्रोटोल है हमारी जो भी मान्यता है वो बंद हो जाए संभवत बात भी कर रहा हूं मैं निर्णायक नहीं मैं अंतिम बातें नहीं बोल रहा अगर इसमें कोई भी मैं गलत बात बोल रहा हूं जिसको आप सही कर सकते हैं तो आप करिएगा आप कहते शंकराचार्य जी मायावादी शंकराचार्य जी मायावादी है पहले तो यही सिद्ध नहीं होता और फिर

01:37:50:06 वैष्णवास्त्र री बात अगर शंकराचार्य जी के सिद्धांत को आप स्वीकार नहीं तो तीन चीज प्राप्त नहीं कर पाएंगे तीन चीज परम स्वतंत्र ईश्वर सर्वशक्तिमान ईश्वर परम स्वतंत्र मोक्ष और शाश्वत धर्म ये तीन चीज आपको प्राप्त नहीं हो पाए और यही तीनों चीज मिलकर के धर्म असतो मा सद गम तमसो मा जमया म मतम गम इसका अर्थ है इसके मूल में कि मनुष्य जो है सब कुछ कर सकने वाला बनना चाहता है कंट्रोल चाहता है प्रकृति पर खैर मैं विराम लूंगा सभी को जय श्री

01:38:43:03 राम

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A: AHVAAN - Call Of Dharma Live 1:38:45 · 03 Nov 2023

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