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00:00:02:12 तो सभी को जय श्री राम। मेरी आवाज आ रही है सभी को? ठीक है। तो सभी को मालूम है हाल ही में हमारी एक चर्चा हुई है अग्निव्रत जी के साथ जो आर्य समाज के वैज्ञानिक आचार्य के रूप में जाने जाते हैं। आधे मतलब आधा आर्य समाज उन्हें मानता है कि आर्य समाज हैं और कुछ ऐसा वर्ग भी है बहुत बड़ा जो नहीं मानता कि वो जो है आर्य समाज की बातें मानते हैं। कई हिस्सों में वो जो है उनमें मान्यता को लेकर के यह है कि आप दयानंद जी का विरोध कर रहे हैं। तो [गला साफ़ करने की आवाज़] इस चर्चा को लेकर के एक समीक्षात्मक कम कहूंगा। पक्षपाती कटाक्ष पूर्वक वीडियो प्राप्त हुआ है। योगेश भारद्वाज जी का। तो सबसे पहली बात तो मैं साधुवाद कहूंगा। योगेश भारद्वाज जी ने इस पर प्रतिक्रिया दी है इस वीडियो पर और

00:01:04:16 उसका कारण यह है कि योगेश भारद्वाज जी जैसे लोग आर्य समाज के विद्वानों में गिने जाते हैं। आर्य समाज की ओर से जो विद्वान है कुछ गिने चुने मेरी जानकारी में उसमें से एक नाम उनका भी है। तो क्या था कि मैं जब अपने मान बिंदुओं को लेकर के मैं बहुत बार बता चुका हूं कि क्यों गया क्यों निकला हूं। वो सब ठीक है। तो मैं जब निकला था तो मुझे एक नाम यह भी था कि आचार्य ये जो योगेश भारद्वाज जी का जो प्रसिद्ध जो इनकी जो प्रसिद्धि है आचार्य के रूप में और इनका भाई इनको लोग मानते हैं बड़े विद्वान है। इनके साथ अगर चर्चा हो जाएगी तो बहुत बढ़िया रहेगा। तो मुझे इस चीज को लेकर के समस्या होती है कि आर्य समाज के किसी बड़े व्यक्ति के साथ चर्चा कैसे करें? अगर हम उसको कहते भी हैं चर्चा करने को तो वह टालता है, मना कर देता है। उसके पास अपनी रीजनिंग हो सकती है चर्चा ना करने की। हमसे डायरेक्ट इंटरेक्ट ना करने की हो सकती है कि मैं उनके योग्य नहीं हूं। मैं उस स्तर पर नहीं खड़ा हुआ हूं। भाई अगर हमारे यहां के कोई आचार्य संपर्क करना चाहे तो व्यवस्थित रूप से चर्चा मतलब बहुत सारी रीजनिंग उनके पास हो सकती है जो बिल्कुल सही है। उसमें कोई आपत्ति नहीं है। तो फिर हम क्या करें? हम क्या करें कि उनके यहां के जो

00:02:20:21 ऊंचे स्तर पर बैठे हुए लोग हैं। वह भी एक समय ऐसा आए जो हमसे बात करें तो हम अपने आप को योग्य बनाएं। क्या करें? इस योग्य बनाएं कि एक दिन हम उनकी नजरों में आने लगे। वो विवश हो जाए हमारा उत्तर देने के लिए। हमसे सामना करने के लिए उनको विवश किया जाता है। जैसे भगवान श्री कृष्ण ने जब कंस के यहां पहुंचे तो कंस के अनेक पहलवानों को जो है कूट दिया। एक-एक करके एक-एक करके एक-एक करके अंत में कंस को आना ही पड़ा अखाड़े में। तो वही वाली बात है कि भाई ठीक है बड़े पहलवान से सीधे अगर नहीं मिल रहा है तुम्हें मुकाबले का अवसर तो ठीक है जो मिल जाए उसी को कूटो उसी को पटको पटकते रहो कभी ना कभी उस उस दल का जो बड़ा पहलवान होगा उसको आने पर विवश होना पड़ेगा तो वही वाली बात है इसी कारण से यह अग्निव्रत जी आ पहुंचे थे भाई कुछ हमने ऐसा किया ना कि वह आ गए उन्होंने फोन किया हमको हमने ऐसा कुछ किया तो योगेश जी ने वीडियो बना के सीधे तौर पर इंटरेक्शन में आकर के अखाड़े में कूद के

00:03:35:22 बड़ा अच्छा कर दिया क्योंकि हमारा बड़ा एक विचार यह था कि योगेश जी के साथ भी जो है चीजें सुनिश्चित हो जाए चीजें स्पष्ट हो जाए वो हो गया। अच्छा एक चीज और है कि योगेश भारद्वाज जी की नजरों में हम काफी दिनों से हैं। यह आज उनके वीडियो से मुझे पता चला काफी दिनों से हैं। उन्होंने कहा कि भाई उन्होंने हमारा प्रीति विमर्शनी जी का वीडियो भी देखा है। और भी कई आचार्यों के साथ जो उनके आगे वीडियो हुए हैं। मतलब हम यह सोच रहे हैं कि हम अभी उनकी नजरों में नहीं है। इसीलिए भाई कोई ऐसा कुछ नहीं कर रहे हैं या फिर हमने अभी तक ऐसा कुछ नहीं किया कि कुछ कहना करना पड़ जाए। अच्छा हमें उनका एक वीडियो और भी प्राप्त हुआ जिसमें वह कह रहे हैं कि भाई शिवश नारायण द्विवेदी हैं और वह जो है परंपरा पूछते हैं कोर्ट परंपरा इत्यादि वहां भी कटाक्ष कर रहे हैं। किसी और के साथ वार्ता कर रहे हैं और उस वार्ता में ये कह रहे हैं। यह भी मालूम पड़ा कि हाइपरकस्ट के यहां पर भी वो गए। वहां पर भी शिवश नारायण द्विवेदी उनके स्मरण में और इतना सब होने के साथ-साथ आज के वीडियो में उन्होंने यह कहा कि मोहित गॉड ने हमको जो है चर्चा के लिए बुलाया था पर हम नहीं गए। तो बुलाया तो आचार्य जी हमने भी आपको है। आप क्यों नहीं आए? डर लगता है। डरना तो नहीं चाहिए। हमने आपसे

00:04:50:26 काफी कुछ सीखा है आज की वीडियो से। हां। और आप उस वीडियो में यह कह रहे हैं कि हमें समझा दीजिए। वैसे हमारी निशुल्क कक्षाएं चलती हैं। उसमें आपको वो जो 515100 लेकर के जो मंदिरों में चंदा इकट्ठा किया जाता है। जिहादियों के साथ हिंदू बिटिया को विवाह करा के वो खर्च नहीं करना पड़ेगा। हमारी कक्षाएं निशुल्क चलती है। आप आ सकते हैं। आपका स्वागत है। कुछ समझना चाहते हैं। वैसे काफी कुछ आपके जो जिज्ञासाएं हैं वह आज के वीडियो में मैं शांत करा दूंगा। फिर भी आप अगर हमारी कक्षाएं ज्वाइन करना चाहते हैं तो आपके लिए छूट है। निशुल्क वैसे भी है। आपको और भी कुछ हम अपनी ओर से प्रदान कर देंगे। यदि आप आएंगे तो तो आपको वो वाली जो राशि है जो आर्य समाज मंदिरों से आती होगी आपके यहां भी ₹5100 वाली राशि वो खर्च नहीं करनी पड़ेगी। खैर मोहित गड के बुलाने पर हम क्यों नहीं गए? यह भी एक बड़ी अच्छी बात आपने कही मोहित गड के बुलाने पर। यानी कि कोई व्यक्ति अगर आपसे आकर के पूछ रहा है कि ईश्वर सर्वशक्तिमान है कि नहीं? अवतार क्यों नहीं ले सकता? तो आपने अपने लोगों को ये सिखाया है कि उसके घर की स्त्रियों की फोटो ढूंढो। कहां से फोटो मिल जाए और उस फोटो को जो है बैठकर के उसका मखौल उड़ाओ। वातावरण बनाओ। उसमें गालीबाजों को बुला लो। है ना? टपोरियों को बुला लो और उनको बिठा करके उसका मजाक उड़ाओ। उसका और उसके घर की स्त्रियों का क्योंकि उसने पूछ लिया था कि

00:06:06:02 तुमने जनेऊ वेदोक्त रीति से क्यों नहीं किया क्योंकि उसने आर्य समाज से पूछ लिया है कि क्या आर्य समाज का ईश्वर सर्वशक्तिमान है? क्योंकि उसने आर्य समाज से यह पूछ लिया है कि भैया आपको वेद कहां से प्राप्त हुए? आपकी परंपरा क्या है? तो अब मैं अब मैं समझ पाया कि मोहित गड जो है वह आपके द्वारा सिखाया पढ़ाया हुआ व्यक्ति है जो ऐसे कार्यों में लिप्त था और जिन कार्यों की वजह से हमने उसके साथ चर्चा से उस समय दूरी बनाई थी जिस समय उसने हाल ही में ये कार्य किया था तो मजा आ गया आपकी इतनी अच्छी शिक्षा प्रणाली देख के वैसे ये भी वेद भाष्य में लिखा होगा आपके तथाकथित स्वकल्पित वेद भाष्य जो आपके उसी में लिखा होगा यह सब भी कि कोई आर्य समाज से अगर प्रश्न करने आए तो क्या-क्या करना उसकी एफबी से चार साल पहले की 5 साल पहले की फोटो निकालनी है। उनको किस-किस तरीके से इस्तेमाल करना है और वो ऋषिवाच भी उस चर्चा में था जिसमें मोहित गड था। ऋषि वाच जो है शंकराचार्य के लिए और उन मान्य आचार्यों के लिए जो आपके लिए मान्य है ना आपके वो आए थे ना तथाकथित वैज्ञानिक जी वो कह रहे थे हम ऋणी हैं शायण के शंकराचार्य के ऋणी है हम तो जिनके हम ऋणी है उनको गालियां देना और ना जाने कौन-कौन सा बाज बताना व्यश्यावत्त में लिप्त रहने वाला बताना भोग करने वाला बताना

00:07:21:13 यह सब आप ही ने सिखाया आज मुझे पता चला आपकी वीडियो से आपका बहुत अच्छा कनेक्शन वो बात और है कि मोहित गड को शर्म आती है यह कहते हुए कि मैं आर समाजी हूं। उसको लज्जा होती है यह कहते हुए मैं आर समाजी हूं। कैसा सिस्टम है आपका? एक तरफ वो अग्निव्रत जी चर्चा के बीच में कहते हैं कि भाई मैं दयानंद जी की बात नहीं कर रहा हूं। दयानंद जी के भाष्य पर जब प्रश्न किए जाते हैं। सत्यार्थ प्रकाश पर जब प्रश्न किए जाते हैं वो कहते हैं मैं दयानंद जी की बात नहीं कर रहा हूं। आर्य समाज को छोड़ने लगता है व्यक्ति। और यदि कोई प्लस पॉइंट हो जाए तो यह भी हमारा वह भी हमारा और कोई माइनस पॉइंट हो जाए तो तू कौन? मैं कौन? हम आपके हैं कौन? अच्छी चीज हो जाए तो हम साथ-साथ हैं और कोई गलत चीज हो जाए तो हम आपके हैं कौन? सिंपल। यह अपना अच्छा नजरिया आपने बताया। खैर तो योगेश भारद्वाज जी का जो वीडियो है उसको देख के मैंने एक फिल्मी गाना है। उसकी मुझे एक पंक्ति याद आ रही है। वो कुछ इस तरीके की है कि

00:08:27:27 क्या था? [गला साफ़ करने की आवाज़] मैंने लिख ली थी उसको। हम पंक्ति ये याद आ रही है मुझे गाने की। मिलती जुलती रहेगी। 150 बरस की 150 बरस की समाजी उपज को सलाम। भारद्वाज की पहनी नजर को प्रणाम 150 बरस की समाजी उपज को सलाम भरद्वाज की पैनी नजर को प्रणाम। पैनी नजर क्या है यह पैनी नजर? पैनी नजर यह है कि जब हमें कोई मटेरियल मिलता है तो उसमें यह ढूंढना है कि किस-किस प्रकार से हमें अपने व्यक्ति को कौन-कौन से पॉइंट हैं जहां पर बचाना है और विपक्षी दल के व्यक्ति पर आक्रमण करना है। गिद्ध की तरह कहां पर मांस है कहां कहां पर शिकार है उसको ढूंढना है वो बस उसी जगह मारना है। वो जो एक एक चीज और याद आ रही है इससे। वो शायद इनका कुछ विधर्मी से सैद्धांतिक कनेक्शन है तो वो रिफ्लेक्ट हो जाता है। मूर्ति पूजा का विरोध है

00:09:43:01 ना वो बुद्ध परिस्थिति का विरोध करते हैं। मूर्ति पूजा का विरोध करते हैं। ईश्वर अवतार नहीं ले सकता उनका इनका दोनों तो सैद्धांतिक एग्रीमेंट है इनके बीच में जो अनुबंध वो कहीं-कहीं पर रिफ्लेक्ट हो जाता है। इस प्रकार की चीजों से उनका क्या है? हमारे देश में हमारे देश में जहांजहां पर भी हमारे जो मुख्य स्त्रोत है ना केंद्र हैं धर्म के वहीं वहीं पर जो विधर्मी हैं वो कब्जा करना चाहते हैं। उसी को खराब करना चाहते हैं। आप काशी चले जाओ तो काशी में भी मामला चल रहा है। कृष्ण जन्मभूमि चले जाओ। राम जन्मभूमि चले जाओ। हां वो आर्य समाज के मंदिरों पर कब्जा नहीं करना चाहते। वो जगह नहीं हड़पना चाहते हैं। क्या रखा है वहां पर? वो तो अपने ही जैसा है। बस नाम ही तो चेंज है। समय आने पर नाम भी बदल लेंगे। क्या दिक्कत है? बहु बेटियां तो आ ही रही है वहां से यहां। वही तो एक जरिया है जहां से उनके यहां की बिटियां यहां आ रही हैं। तो क्या दिक्कत है? वहां नहीं करते। वो कृष्ण जन्मभूमि जहां भगवान को अवतार माना जाता है। राम जन्मभूमि जहां भगवान को अवतार माना जाता है। वो काशी विश्वनाथ इत्यादि परिसरों के आसपास अपना ये बेड़ा लगाते हैं और जिस तरीके से वो ढूंढते हैं कि कहां इनकी सबसे ज्यादा ताकत है वहीं पर प्रहार करते और वहीं पर कमजोरी करना करते। तो आज का पूरा मैंने वीडियो जो

00:10:58:04 देखा उसमें जहांजहां पर आचार्य जी की सबसे नीची हो रही थी वहीं वहीं पर इन्होंने पकड़ के और कुछ ऐसी बातों बातें की जिनमें कि व्यक्ति को लगे वाह वाह वाह वाह वही वाली बात मेरा कल मेरा कल आचार्य जी हार गए पर मेरा कल मेरा कल वाह क्या वो मारा है तीर मारा है खैर [गला साफ़ करने की आवाज़] अच्छा अब आगे बढ़ने से पहले मैं एक चीज समझाना चाहूंगा कि आज मैंने क्या सीखा आज इनका योगेश जी का वीडियो देख के मैंने क्या सीखा है। मैं अभी तक समझता था टू द पॉइंट का जो अर्थ होता है वो यह होता है कि ऐसी बातें करने से बचना जो हमारे विषय की नहीं है जिस विषय पर बातचीत चल रही है उस उससे बहुत ज्यादा उनका मतलब नहीं है और जिन पर बात करने की कारण ऐसा हो सकता है कि विषय बदल जाए या हमारा खामखा दूसरी चीजों में बहुत ज्यादा टाइम स्पेंड होने लगे तो ऐसी चीजों से ऐसी चीजें ना करना और मूल विषय से संबंधित बातें ही करते रहना। तो आज योगेश जी से मेरी जो मैंने योगेश जी का जो मैं बहुत-बहुत साधुवाद करता हूं। बहुत आपने मैं

00:12:13:06 ऋणी हूं आपका भी। आज आपने मुझे यह अर्थ बताया कि टू द पॉइंट रहने का मतलब है, विषय पर रहने का मतलब है ऐसी सारी बातें करना जिनका विषय से कोई मतलब नहीं है और ऐसी बातों के आधार पर ही यह सिद्ध करना कि हमने अपना पक्ष सिद्ध कर लिया। यह है टू द पॉइंट का मतलब। यह है विषय पर रहने का मतलब। अब कैसे? तो मैं थोड़ा सा उदाहरण दे देता हूं। कुछ उदाहरण देता हूं। तीन भागों में होगा मेरा जो यह समीक्षा है उनके वीडियो की प्लस जो वो क्या कहते हैं वो जो चर्चा हुई थी उस पर भी हम थोड़ी बहुत बातें करेंगे और

00:12:55:27 एक कि इन्होंने जो ये टू द पॉइंट वाला जो शटर घोट किया है ना अपनी वीडियो में कि ऐसी ही बातों पर जोर देना जिनका विषय से कोई मतलब नहीं है। एक ये वाला भाग है। एक यह वाला भाग है कि जो मुझे लगता है कि जो उन्होंने क्वेश्चन रेज किए हैं और जिनका उत्तर बनता है। हालांकि वह सारे उत्तर हम अपनी वीडियो में दे चुके हैं। पर योगेश भारद्वाज जी निशुल्क कक्षाओं में आना चाहते हैं। इसलिए मैंने कहा कि भाई कक्षाओं में आने से पहले यहीं पर थोड़े बहुत आंसर्स आप ले लीजिए जिससे आप समझ सके कि जिसको आप गुरु बनाने के लिए जा रहे हैं वो उस योग्य है कि नहीं। है ना? खैर [गला साफ़ करने की आवाज़] तो क्या है कि इन्होंने सबसे पहले तो एक कटाक्ष करने का प्रयास किया वहां पर कि मैंने जो अपना परिचय दिया वर्तमान पूरी पीठाधीश्वर वो कहना चाहिए था पूरी के वर्तमान पीठाधीश्वर जो है खैर उसमें भी अगर देखा जाए तो बहुत सारी शाब्दिक वो निकल आएंगी कि वर्तमान के जगुरु शंकराचार्य पीठ के पीठाधीश्वर बहुत सी चीजें हैं जो उसमें निकाली जा सकती है और उसमें व्याकरण का पक्ष मेरा गलत है कि नहीं गलत है मैं इस पर भी नहीं जाऊंगा और स्लिप ऑफ टंग तो इन्होंने मान ही लिया है स्लिप ऑफ टंग इन्होंने भी मान लिया। हालांकि इस वीडियो में इनकी भी स्लिप ऑफ टंग हुई है। मैं इनको प्रिविलेज दूंगा

00:14:11:01 क्योंकि मैंने इनसे आज बहुत कुछ सीखा है। इसलिए इनको प्रिविलेज में दूंगा। बिल्कुल दूंगा। तो स्लिप ऑफ टंग हो गई या मेरी व्याकरण गलत है। मगर कुल मिलाकर के ये बात करने की आवश्यकता क्यों थी? भारद्वाज जी को। क्यों आवश्यकता थी? इसलिए आवश्यकता थी कि स्लिप ऑफ टंग से मानो या व्याकरण की गलती मानो। इसी से सिद्ध होता है कि ईश्वर अवतार नहीं ले सकता है। पहला पॉइंट वाह वाह वाह वाह मिरेकल मिरेकल करिए ताली पीटिए। शिवश नारायण द्विवेदी ने अपना परिचय ठीक से नहीं दिया। इसी से सिद्ध होता है कि ईश्वर अवतार नहीं ले सकता है। मिरेकल मिरेकल ताली पीटिए। अच्छा

00:14:55:01 आगे चलते हैं। पन्ने पलटने की बात भी आएगी इसमें। खैर अच्छा स्वयं जो वैज्ञानिक महोदय हैं वह प्रिंट आउट निकाल निकाल कर एक पूरी फाइल बना के बैठे हैं एक अल्पज्ञ शिष्य से बात करने के लिए शंकराचार्य के अल्पज्ञ शिष्य अभी वो आचार्य जो धर्म को धारण किए हुए हैं ना वो तो आए नहीं है फिल्म में उनका कोई रोल अभी तक हुआ ही नहीं है एक अल्पज्ञ शिष्य से बात करने के लिए आपके वैज्ञानिक वैदिक रश्मिक थ्योरी देने वाले बड़े वैज्ञानिक फाइल बना के बैठे हैं और पन्ने वो भी पलट रहे हैं। मगर उनको उनका पन्ना पलटना ध्यान नहीं दिया। हालांकि कुछ तैयारी तो योगेश जी ने भी की थी लिखी हुई जो नीचे देख रहे थे पर उनको वो भी दिखाई नहीं दिया। उनको क्या दिखाई दिया कि मैंने पन्ने पलट करके कुछ बताया क्योंकि मैं ऐसा मानता हूं कि मुझे अपने धर्म की रक्षा करने के लिए अपने पक्ष के लिए किसी तैयारी की कोई जरूरत नहीं है। सीधी बात सर्वशक्तिमान ईश्वर परम स्वतंत्र मोक्ष शाश्वत धर्म हर विधर्मी का अंत आउट अब बबा होने लगता है।

00:16:10:16 इस तरीके से बार-बार यह कॉलर पर यहां पर हृदय गति चेक करने लगता है। व्यक्ति कहीं रुक ना जाए। पानी पीने लगता है व्यक्ति। गला सूखने लगता है। जान अटक जाती है ना हलक में। ये सब होने लगता है। मुझे तैयारी की जरूरत नहीं है। है ना? फिर भी ना तो उनको स्वयं का पन्ने पलटना दिखाई दिया। ना तो उनको तथाकथित जो वैज्ञानिक महोदय हैं उनका पन्ना पन्ने पलटना दिखाई दिया। उनको तो शिवांश नारायण द्विवेदी के पन्ने पलटना ही दिखाई दिया और उन्होंने यह बात कही क्यों अपने वीडियो में पन्ने पलटने की बात क्योंकि इसी से सिद्ध होता है कि ईश्वर अवतार नहीं ले सकता है बिंगो बहुत बढ़िया ईश्वर अवतार क्यों नहीं ले सकता है क्योंकि शिवश नारायण द्विवेदी ने पन्ने पलट करके बताया था प्रमाण बिना पन्ने पलटे बताना था भाई है ना अच्छा फिर आगे एक बात और आती है कि

00:17:12:02 प्रश्न मैंने पूछा था। मैंने प्रश्न क्या पूछा था कि मैंने प्रश्न पूछा था जिस पदार्थ से स्पर्श हो जाने पर मनुष्य को पाप लग रहा है उसी पदार्थ से स्पर्श हो जाने पर उसमें एकीभूत होते हुए भी ईश्वर को दोष नहीं लगता है ना। तो फिर आप क्यों मान रहे हैं कि जिन पापों से लिप्त होने पर मनुष्य को दोष लगेगा। जिन कर्मों में लिप्त होने पर मनुष्य को पापी कहा जाएगा। उन्हीं कर्मों में लिप्त होने पर भगवान को दोष लगेगा। क्योंकि वह तो रूप धारण करके करे या बिना रूप धारण करके करे वह तो प्रत्येक कार्य में किसी ना किसी प्रकार से लिप्त है ही।

00:17:48:12 यदि कोई व्यक्ति किसी को चाकू मार रहा है तो चाकू मारने की शक्ति तो ईश्वर ने ही प्रदान की है। वह तो लिप्त है ही उसमें। मगर ईश्वर को नहीं पड़ता है। यह आप भी मानते हो। लिप्त होते हुए भी ईश्वर को उसका जो दोष है वह नहीं लगता है। सिंपल सी बात। तो मेरा कहना यह था कि रूप ले लेने पर क्यों लग रहा है? बिना रूप के भी ईश्वर उन कार्यों में लिप्त है जिन कार्यों को मैं लिप्त होने के कारण ईश्वर को पाप मनुष्य को पापी कहा जाएगा। उसको दोषी माना जाएगा। पर ईश्वर को नहीं माना जाएगा। यहां पे आप भी एक मत है। मैं भी एक मत हूं। तो फिर उसके रूप ले लेने पर उस पर वो पाप क्यों चढ़ा रहे हो आप? पर यहां पर जो तथाकथित वैज्ञानिक जी थे शायद मेरे प्रश्न को समझ नहीं पाए और मेरे प्रश्नों को समझने की बजाय जो है उन्होंने कुछ अपनी ओर से कुछ देने का प्रयास किया तो उनकी वो वैदिक रश्मि थ्योरी वाली खुजली शायद थी तो उन्होंने वो मिटाने का प्रयास किया तो उन्होंने बताया कि भाई वो नाली में जो है मॉलिक्यूल्स होते हैं और यह होता है और वो होता है। वाह अगर किसी से पूछा जा रहा है कि भैया इसको दोषी क्यों ना माना

00:19:03:15 जाए इस पर जो है मुकदमा चल रहा है और पूछा जा रहा है कटघरे में खड़े हुए व्यक्ति को जो है वो दोष क्यों नहीं लग रहा है वो गुनहगार क्यों नहीं है अपराधी क्यों ना माना जाए उसको तो इसलिए ना माना जाए क्योंकि चाकू जो है लोहे का बना होता है और चाकू जहां पर जिसको जिसकी हत्या की गई थी वहां पर वो जो है ईंटों का मकान बना हुआ था यह सारे कारण है उसको दोषी ना मानने के कटघरे में खड़े हुए व्यक्ति के और तो और कारण है कि नहीं है ठीक है एक तरफ हटा देते हैं पर मुझे जो है साइंस नहीं आती वो बात और है कि आप जो है अग्निवृत्त जी की जो वैदिक साइंस होगी उससे पूरी तरीके से सहमत होंगे वैदिक रश्मि थ्योरी है जो उनकी बढ़िया वाली आई नहीं बारी सही बता रहे हैं अगर अग्निव्रत जी विषयांतर करके व्यक्तिगत कटाक्ष इत्यादि का आलंबन ना लेते बहुत अच्छा किया उन्होंने उनकी प्राणों की भी रक्षा हुई मुझे लगता है उन्होंने कई वीडियोस में बताया कि उनको बहुत सारी बीमारियों ने घेरा हुआ था और वृद्ध तो हैं ही और मैं देख रहा था कि बार-बार छाती पर हाथ जा रहा है। पानीानी पी रहे हैं। हालत खराब हो रही है। तो किसी प्रकार से मुझे भी उसका निमित्त बनना था कि भाई इनके प्राणों की रक्षा करने की करने का दायित्व मेरा भी है। और मेरे प्रश्न करने से कहीं कुछ हो गया तो खामखा

00:20:18:16 एक नया आरोप ना लग जाए। हां। आत्महत्या के लिए उकसाने का या किसी तरीके से कोई एक नई चीज बना दे कोई तो मेरा तो वहां से हटना भी वो भी उनके लिए फायदेमंद रहा और उन्होंने बहुत अच्छा किया जो विषय करके पलायन कर गए इस तरीके से हां आपको मेरी खांसी दिख रही थी ना वो खांसी में भी यही बात थी उनकी वो जो कपी इत्यादि थी और ये सब ये जो था ये सब देख के मुझे हंसी आ रही है। कैसे रोकूं अपनी हंसी? तो मैं रोक रहा हूं भाई। भाई खांसने के पीछे की रीजनिंग एक ही थोड़ी ना होती है। हां खांस रहे हैं तो यदि बीमार नहीं है व्यक्ति। हालांकि मेरे गले में था इनफेक्शन अभी भी है। पर यदि व्यक्ति खांस रहा है और तो उसका उसका मतलब यही नहीं है कि वो जो है परेशान है। वो जो है व्याकुल है या चिंतित है। डर रहा है। खांसने के तो कई अर्थ हो सकते हैं। वो अपनी हंसी छुपाने के लिए खांस रहा हो। उसको क्रोध आ रहा हो सामने वाले को उठा के पटक दूं। बेकार की बातें कर रहा है। शायद इसलिए खांस रहा हो और उसको यह भी हो सकता है कि वास्तविकता में परेशान हो। तो यहां पे आप लोग न्याय दर्शन इत्यादि की बातें थोड़ी ना करोगे। ऐसे ही अपने मन से जो आएगा वो सामने वाले पर थोप दोगे कि इसलिए इसीलिए खांस रहा है। खैर ठीक है। कोई बात नहीं। [गला साफ़ करने की आवाज़] अब आ जाते हैं तो कुल मिलाकर के हम प्रश्न कर रहे हैं कि जिस पदार्थ

00:21:33:27 से स्पर्श हो जाने पर मनुष्य को दोष लग रहा है पर ईश्वर के द्वारा उस पदार्थ के साथ एक ही भूत होने पर भी उस पर दोष नहीं लग रहा है क्योंकि कुछ उसकी रीजनिंग है तो फिर ईश्वर यदि रूप ले लेगा तो उसको आप दोषी क्यों मान रहे हो जिन कर्मों से संलग्न होने पर मनुष्य को दोष लग रहा है उन्हीं कर्मों से संलग्न उसी प्रकार के कर्मों से संलग्न होने पर ईश्वर को दोष नहीं लग रहा है निराकार रहते हुए तो यदि वो एक रूप धारण करके खड़ा हो जाएगा तो फिर उस पर दोष क्यों लगने लगेगा? प्रश्न यह था जिसका उत्तर शायद आपने इस वीडियो में आगे दिया हो पर उन्होंने वहां नहीं दिया। वो मुझे मॉलिक्यूल बता रहे हैं और मैंने कहा ना कि जहां-जहां पर उनकी कमजोरी है वही वही उसी उसी को पकड़ के आपने मखौल बनाया है। इसी को कहते हैं टू द पॉइंट रहना। आपने ढूंढा मेरा मित्र कहां-कहां फंसा या मेरे पूजनीय आपके पूजनीय होंगे शायद। तो मेरा पूजनीय आदरणीय व्यक्ति कहां-कहां फंसा है? वही वही मोटे-मोटे पॉइंट हैं। कहां अयोध्या है, कहां जन्मभूमि है, कहां काशी है, कहां वो क्या कहते हैं? त्रिपति है, कहां शंगेरी है वहीं वहीं जो जो ऐसे पॉइंट हैं द्वारका इत्यादि वो सारे पॉइंट पकड़ के और वहीं पर ऐसी चीज करो कि लोग असली पॉइंट को भूल ही जाए। यही कहानी रही है हालांकि आर्य समाज की पर नहीं तो नहीं तो इस बात को कहने की आवश्यकता क्या थी कि शिवश नारायण द्विवेदी को विज्ञान से कोई मतलब नहीं है। विज्ञान नहीं

00:22:49:01 आता है। मुझे लगता है आपने सारे विज्ञान के जितने भी नियम वर्तमान में उद्भाषित कर लिए गए हैं। आप वैज्ञानिक नहीं हो। मगर जितने भी वैज्ञानिक नियम है भाषित कर लिए गए सारी थ्योरीज आपको आती होंगी। मैं जानता हूं ईश्वर के बाद आप ही हो। ईश्वर के बाद जो दूसरे थे वो थे वो आपके तथाकथित महर्षि और तीसरे आप। इसीलिए आपको सारा ज्ञान विज्ञान आता है। इसीलिए तो आप किसी पर ही कटाक्ष कर रहे हैं कि इसको साइंस से क्या मतलब? अब मैं अपनी साइंस बताऊं आपको। तो कुल मिलाकर के आपने वहां पर जो यह बात रखी कि भाई इनका विज्ञान से क्या मतलब है? इस रखने इसे रखने की आवश्यकता क्या थी वीडियो? आवश्यकता यही थी कि इसी से सिद्ध होता है कि ईश्वर अवतार नहीं ले सकता है। बिंगो बहुत बढ़िया। तो क्या है सिद्धांत? ईश्वर अवतार इसलिए नहीं ले सकता क्योंकि शिवश नारायण द्विवेदी ने विज्ञान की पढ़ाई नहीं पढ़ी है। जो थोड़ा बहुत बेसिक चीजें हैं विज्ञान से संबंधित वही जानता है। चौथी क्लास फेल हूं। और बोलो। चौथी क्लास फेल हूं। मगर जो सनातन का चोला ओढ़ के सनातन विरोधी कार्यक्रम चला रहे हैं ना उनकी नाक में नकेल डालने के लिए पर्याप्त हूं। भगवत कृपा से गुरु गोविंद ग्रंथ की कृपा से है ना चौथी क्लास फेल ले लो जाओ

00:24:04:04 इसी से जीत जाओ ईश्वर अवतार क्यों नहीं ले सकता है क्योंकि शिवश नारायण द्विवेदी चौथी क्लास फेल है लिख लो अपने यहां पर वो जो 10 नियम है ना ईश्वर सर्वशक्तिमान है ये वो वो 10 नियम है ना उसमें एक नियम और बढ़ा लो 11वा कि ईश्वर अवतार इसलिए नहीं ले सकता है क्योंकि शिवश नारायण द्विवेदी को साइंस का ज्ञान ध्यान नहीं है। चौथी क्लास फेल है। जाओ खुश हो जाओ। अच्छा फिर आगे [गला साफ़ करने की आवाज़] चलते हैं। बड़ा मजेदार बड़ा रोचक वीडियो बनाया। मुझे मतलब हृदय गदगद हो गया आपका वीडियो देख के। आनंद आ गया कि चलो भाई कोई तो आया सामने से आ ही नहीं रहा था कोई इतने दिनों से। ठीक है? अब आगे चलते हैं। टू द पॉइंट बातें इनकी। ईश्वर अवतार क्यों क्यों नहीं ले सकता? जरूरी बातें हैं। सबसे इंपॉर्टेंट चीज है। ईश्वर अवतार क्यों नहीं ले सकता? इस बारे में जरूरी बातें सुनिए। ठीक है?

00:25:02:02 अ इसके बाद इन्होंने क्या कहा है? अच्छा इन्होंने एक चीजों पे और जोर दिया कि मैंने भाई प्रमाण नहीं दिया काफी देर तक। बहुत इन्होंने लेंस लेकर के वो चीजें देखी हैं। टाइम भी बता रहे हैं। टाइम स्ट भी बता रहे हैं। 5 बज के वो 50 सेकंड पे ये हुआ। 26व मिनट पे ये हुआ। बहुत अच्छे तरीके से बता रहे हैं। हम तो इसका मतलब बड़े बड़े अच्छे से इन्होंने वीडियो देखा और फिर क्या ढूंढा? वजनदार बातें हैं कि मैंने प्रमाण कितने मिनट पे दिया? ये ढूंढा इन्होंने। मैंने प्रमाण कितने मिनट पे दिया और कितने मिनट तक नहीं दिया? ये देना। अच्छा प्रमाण देना है। क्या प्रमाण देना था? सच में सच्ची ना। कसम से प्रमाण देना था। प्रमाण देना था। या प्रमाण का वह अर्थ देना था जो तुम मानते हो। क्या करूंगा मैं प्रमाण देकर तुम्हें? भाई तुमसे चर्चा करते समय मुझे प्रमाण देना है या प्रमाण का वो अर्थ देना है जो तुम मानते हो। इसमें सेलेक्ट कर लो कि कौन सी चीज तुम्हें चाहिए। हां। तुमने अपनी किताबों में जो लिख रखा है वो ढूंढ के

00:26:17:03 बताना है क्या तुम्हें? क्योंकि उसके बाहर का तो तुम मैं लाऊंगा तो तुम मानोगे नहीं। तुम तो वही मानोगे जो किताबों में लिख रखा है। तो मुझे लगता है चोरी छुपे तुम भी मानतेगे अवतार को। इसीलिए कह रहे हो प्रमाण दो प्रमाण दो। तुमने कहीं ना कहीं चोरी छुपे लिख रखा है ना? सच बताना आर्य समाजियों और आप भी बता दीजिए। भरद्वाज जी कहीं ना कहीं लिख रखा है ना अपनी किताबों में ईश्वर अवतार लेता है। उसी प्रमाण को ढूंढना मेरा मुख्य कार्य है। इसीलिए आप कह रहे हो प्रमाण दो। क्योंकि जब मैं आपकी मान्यता के विरुद्ध प्रमाण लाऊंगा तो आप तो मना करने वाले हो। तो क्या करूंगा प्रमाण देकर? अच्छा थोड़ा और तर्क की बात करते हैं। शायद भारद्वाज जी थोड़े व्यक्ति हैं जो शायद मेरे से अगर उनका मन बना है शिक्षा ग्रहण करने का तो इसका मतलब है कि उनमें वो बल होगा उनकी प्रज्ञा में जो वो मेरे से शिक्षा दीक्षा ग्रहण करना चाहते हैं। अच्छी बात है। मैंने बता ही दिया निशुल्क है। तो अब जरा आगे चलते हैं। प्रमाण की बात करते हैं। जब मैं उनको कोई प्रमाण दिखाता हूं तो वह कहते हैं कि प्रमाण इसलिए गलत है कि वहां पर मुझे गलत लग रहा है और किस आधार पर गलत लग रहा है क्योंकि प्रमाण तो प्रमाण है। प्रमाण को गलत गलत ठहराने के लिए उससे परम प्रमाण चाहिए होगा। प्रमाण को प्रमाण को गलत ठहराने के लिए उससे परम प्रमाण चाहिए

00:27:32:07 होगा। उसमें अपना तर्क दे रहे हैं कि वेदों में पशु बलि दी है। शय भाष पशु बलि दी है कि नहीं दी है यह एक अलग विषय है। पशु बलि सही है या गलत है यह भी एक अलग विषय अलग से बात हो सकती है। ठीक है? परंतु यदि आप वेद पर आधारित हैं यह निर्णय करने के लिए कि क्या सही है और क्या गलत। जिस प्रकार से आप वेद पर आधारित हैं। आपकी जानकारी में कि नियोग सही है या गलत है। किस पर आधारित है? नियोग देखने में गलत लग रहा है। यह उदाहरण मैंने वहां उनको भी दिया था। नियोग देखने में गलत लग रहा है। व्यभचार लग रहा है। यह पूर्व पक्ष रखा है दयानंद जी ने। पढ़ लेना। सत्यार्थ प्रकाश आपने ना पढ़ी हो तो पढ़ लेना। अपने ग्रंथों पढ़ पढ़ सकते हैं। सभी लोगों के लिए छूट है। तो पढ़ लेना। नियोग का नियोग विषय में उन्होंने पूर्व पक्ष रखा दयानंद जी ने। इस बात को लेकर के मैं दयानंद जी से सहमत हूं। बिल्कुल सही पूर्वक है। जब जब हम विवाह के विषय में शास्त्र पर निर्भर करते हैं तो किसी भी चीज के धर्म और अधर्म होने के विषय में हमें शास्त्र पर ही निर्भर करना पड़ेगा। तो बलि गलत है यह हमने कहां से तय किया? जब हमें वेद भाष्य में यह मिल रहा है। वेद के अर्थ में ये मिल रहा है कि बलि है और उससे मिल रहा है जो वेद के विषय में हमारा

00:28:47:10 प्रमाण है। यानी वेद से पहले हमारे पास सही और गलत निर्णय करने का कोई आधार है। जबकि शास्त्र में तो लिखा है तेरे लिए कर्तव्य और अकर्तव्य के विषय में शास्त्र प्रमाण है। तो धर्म को जानने से पहले ही हमें धर्म पता है तो धर्म की आवश्यकता क्या है? वेद को जानने से पहले ही हमें पता है हमारा धर्म क्या है? तो वेद की आवश्यकता क्या है? यह उसका तार्किक उत्तर है जो मैं वहां दे रहा था। पर उन्होंने फिर अरे इस मंत्र का अर्थ बताओ। इस इस मंत्र का अर्थ बताओ। विषयंतर जो आपके यहां एक स्पेशल क्लासेस चलती होंगी उसके अनुसार जैसे मोहित ग को सिखाया वैसे ही खैर वेद को जानने से पहले ही आपने तय किया ना कि पशु बलि गलत है यानी कि आपको आपका धर्म वेद से नहीं मिल रहा है जबकि वो तो कह रहे हैं दयानंद जी तो कि बिना किसी के सिखाए नहीं सीख सकता व्यक्ति माना है ना सत्यार्थ प्रकाश में तो फिर कहां से सीख रहे हो वेदों में पशु बलि है कि नहीं है शयन ने क्या कहा है? परंपरा प्राप्त आचार्यों ने क्या कहा है? उसका अर्थ अलंकारिक है, प्रतीकात्मक है। क्या लेना है? क्या नहीं लेना है? यह एक विषय है। परंतु यदि जिनसे तुम्हें वेद के मंत्र प्राप्त हो रहे हैं और उन मंत्रों को तुम मान रहे हो कि ईश्वर से आए हुए मंत्र हैं। यानी कि वेद के विषय में आप जिनको

00:30:02:26 प्रमाण मानते हैं। उन्हीं का लिखा हुआ कोई अर्थ है वो आपको हजम नहीं हो रहा है। तो फिर आपने नियोग के विषय में शास्त्रों का अर्थ क्यों हजम कर लिया? उसमें भी तो देखने में यही लग रहा है कि नियोग गलत है तो करा दो उसको और अपना भाष्य लिखो नया पर नियोग में मान लिया क्यों मान लिया क्योंकि वो 111 करना है ना कलयुग में ये सब वर्ण संकर्ता इत्यादि को चीजों को कैसे मिलेगा समर्थन अगर ऐसा नहीं करेंगे तो तो खैर ये है प्रमाण की प्रमाण के संबंध में दो तीन बातें पहला जो आपने मैंने पूछा कौन सा प्रमाण देना सत्यार्थ प्रकाश से प्रमाण देना है अवतार के संबंध में क्योंकि सत्यार्थ प्रकाश के जो प्रतिकूल होगा वह तो आपको मानना नहीं है तो क्या करूं मैं प्रमाण देकर अरे कुछ होश संभाल के तो बातें करो भाई तर्क कहां है आपकी बातों में प्रमाण लाओ प्रमाण लाऊंगा अरे ये नहीं अर्थ नहीं मानने मुझे मालूम है ना अर्थ मानने नहीं है इसीलिए तो आज यहां बैठे हैं खैर चलो अच्छा हमारी शर्तें आपने देखी नहीं होंगी ठीक है मैं अभी पढ़ के बताऊंगा शर्तें क्या कह थी? एक शर्त थी कि यदि तर्क नहीं होगा तो घोषणा

00:31:18:00 करनी होगी कि हमारे समाज में हमारी परंपरा में तर्क है नहीं। ईश्वर का अवतार निषेध करने के लिए बार-बार थोड़ी सी देर होने के बाद ही आपको ज्ञान नहीं है। आपको जो है आप कुतर्क कर रहे हो। फिर थोड़ी देर बाद कुतर्क कर रहे हो। यहां तक कि जब मैंने प्रश्न पूछे थे उनसे तो यह तक कहने लगे थे इसको छोड़िए इसको छोड़िए। अथातो धर्म जिज्ञासा अथा तो ब्रह्म जिज्ञासा अगर इसको छोड़िए ही कहने लगते तो जितने प्रश्न उठाए हैं दयानंद जी ने सत्यार्थ प्रकाश में सबको छोड़िए और केवल जो सामने वाला कह रहा है जिसका विरोध कर रहे हैं उसको मान लीजिए पर नहीं आप स्वयंभू है ना बता तो रहा हूं ईश्वर के बाद पहले तो महर्षि वो और दूसरे आप स्वयंभू

00:32:04:26 महाभारत में लिखा हुआ है अन्यों के साथ जो व्यवहार अपने लिए जो व्यवहार स्वीकार कार्य नहीं है ना अन्यों के साथ वही व्यवहार किया करिए और अपने लिए जो स्वीकार नहीं है वह अन्यों के साथ भी ना करें यही धर्म परंतु नहीं कोई धर्म नहीं केवल धर्म का डंका बजेगा धर्म का प्रचार करेंगे समय आने पर पक्षपाती हो जाएंगे अन्यायकारी हो जाएंगे सारी चीजों से लिपट जाएंगे क्योंकि उसी को उसी में लिपटना तो धर्म है खैर आगे चलते हैं तो तर्क [गला साफ़ करने की आवाज़] छोड़कर प्रमाण पर भागे अब प्रमाण का अर्थ कौन सा होगा जो उनके अनुसार फिट बैठेगा तो उन्होंने तो अवतार का विरोध कर रखा है हर जगह तो हम कहां से प्रमाण दें उनको

00:32:52:21 व्यर्थ में चीजें करना तब पड़ती हैं जब व्यक्ति के पास वास्तविकता में अपने पक्ष की सिद्धि के लिए कुछ नहीं होता है समझे यह व्यर्थ है तुम आप जैसे लोगों को प्रमाण उपलब्ध कराना अभी खैर प्रमाण में भी आऊंगा अच्छा [गला साफ़ करने की आवाज़] कुल मिलाकर के हमने हमें अगर प्रमाण देना भी है तो आपके किए हुए अर्थ के अनुसार देना है। क्योंकि आपने मान रखा है कि जो है जो परंपरा प्राप्त आचार्य उन्होंने वेदों के भाष्य में यहां यहां पे गलती कर रखी है। इस तरह से उनका जो है प्रमाणिक सिद्ध होता है। गलती किस आधार पे की है? तर्क के आधार पर। देखिए आप तर्क का जब उत्तर नहीं बचा तो व्यक्ति प्रमाण भाग रहा है। और प्रमाण जब दिया जा रहा है तो प्रमाण को नकार किस आधार पर रहा है? तर्क के आधार पर। क्या लूप हो लूप क्या लूप बनाया वाह बहुत बढ़िया और यह लूप आगे काम आएगा मौत का कुआं एक मौत के कुएं की बात भी की है भारद्वाज जी ने बहुत मतलब अंत तक देखते रहिएगा बहुत अच्छी बातें की है इन्होंने खैर कुल मिलाकर के मुझे अगर इनको प्रमाण देना था तो इन्हीं की किताबों से ढूंढ कर देना था कि ईश्वर अवतार कहां ले सकता है तो इन्होंने ये जो बात की है प्रमाण नहीं दिया कम दिया देर से दिया ये बात की क्यों है इसलिए क्योंकि

00:34:08:14 इसी से सिद्ध होता है कि ईश्वर अवतार नहीं ले सकता। बिंगो एक और पॉइंट क्या है वो पॉइंट कि ईश्वर अवतार इसलिए नहीं ले सकता कि शिवश नारायण द्विवेदी आर्य समाज की किताबों से ये प्रमाण नहीं दे पाया कि ईश्वर अवतार लेता है। बस सिंपल हमारी किताबों से निकाल के दो प्रमाण। [हंसी] क्या बात है। बहुत बढ़िया। बड़े बड़े लॉजिकल व्यक्ति हैं आप तो आज बहुत अच्छा लगा आपकी चीजें जानकर के। खैर चलिए आगे चलते हैं। अच्छा इन्होंने आगे एक बात कही व्यवहार और परमार्थ पर इन्हें आपत्ति है। चीजें इनको आपत्ति लग रही है। अच्छा तो ये कोई गेट खुलता है क्या जब व्यक्ति मोक्ष में जाता है तो व्यवहार और परमार्थ में आपको आपत्ति है ना। तो कोई गेट खुलता होगा आपके यहां कहां पे खुलता है? कितने किलोमीटर दूर है वो आकाशगंगा का वो जो अंतरिक्ष है आकाश है उसमें वो जगह कहां पर है जहां गेट खुलता है व्यक्ति मोक्ष मोक्ष के बाद वहां जाता है फिर वो वापस वहां से इधर इस दुनिया में आता है गेट खुलता है ना खुलता है तो फिर डायमेंशन चेंज होती है उसी को व्यवहार परमार्थ कहते हैं थोड़ा समझिए क्लासेस में आइए निशुल्क है थोड़ा समझ लीजिए बातों को फिर आप जो है बोलिए तो पहली बात तो ये हो गई अच्छा इसी में इन्होंने

00:35:23:18 व्यवहार और परमार्थ में व्यवहार और परमार्थ से जुड़ी आगे की एक बात है जो प्रमाण से संबंधित है जो मैंने बात कही थी। जब मैंने कहा था कि ईश्वर व्यवहार में ना आ सकने वाला है और इन्होंने भी माना है। इन्होंने भी माना है कि ईश्वर व्यवहार में नहीं आ सकता। ठीक है? एक मिनट। इन्होंने भी माना है कि ईश्वर व्यवहार में नहीं आ सकता। ठीक है? क्यों नहीं आ सकता? क्योंकि वह इंद्रियों का विषय नहीं बन सकता। आगे बात करेंगे इंद्रियों के विषय वाले मामले पर। तो ईश्वर व्यवहार में नहीं आ सकता। तो जो मैंने प्रमाण दिया था उसमें जो सूर्य, चंद्रमा इत्यादि यानी जगत को उत्पन्न करने के रूप में भगवान के ईश्वर के प्रकट होने की बात उसमें लिखी हुई है। अब जो

00:36:21:25 इनका कहना है कि ईश्वर वहां पर अपने कार्य के रूप में प्रकट होना होता है। हालांकि यह बात आगे भी कही गई है इनके द्वारा। इनके जो सो कॉल्ड जो वैज्ञानिक महोदय जी हैं उन्होंने भी यह बात आगे कही है। मतलब आगे बात आएगी जब मैं आपको बताऊंगा। अभी फिलहाल सिर्फ इतना लेना है कि पहले कोई देखने वाला नहीं था। सो रहे थे सब इन्होंने भी कही है भारद्वाज जी ने अपने वीडियो में बात कि पहले कोई देखने वाला नहीं था। तो जब व्यक्ति जागा उसने देखा उसी को प्रकट होना कहा गया है। ठीक है? तो यह बताइए कि पहला जो व्यक्ति था वह तिब्बत में जन्मा था या फिर वायुमंडल में जन्मा था। अगर वायुमंडल में जन्मा है पहले वो हवा में उड़ रहा है और फिर उसके सामने जो है सूर्य, चंद्रमा और पृथ्वी इत्यादि का निर्माण हो रहा है। तब तो कह सकते हैं कि एक साक्षी है जो देख रहा है कि ईश्वर जो है कार्य कर रहा है। साक्षी तभी है ना। यहां तो पृथ्वी पहले बन रही है। सूर्य पहले बन रहा है। पृथ्वी के ऊपर फिर मनुष्य जन्म ले रहा है। तो वहां पर कौन सा साक्षी हो गया जिसके कारण प्रकट होना मान रहे हो? कौन साक्षी है वहां पर? साक्षी ना होने के कारण चीजों को अप्रकट और प्रकट कहोगे। कहां का सनातन सिद्धांत है? अच्छा ठीक है। अगर कहोगे भी तो फिर वहां पर साक्षी कौन था ईश्वर के अलावा?

00:37:37:08 तो ईश्वर स्वयं को स्वयं के ही समक्ष प्रकट कर रहा होगा। हम स्वयं को स्वयं के समक्ष ही प्रकट कर रहा होगा कि वाह मैंने देखा हां मैंने देखा मेरा कार्य है हां मैंने अपना कार्य जान लिया देख लिया यही हुआ होगा सूर्य बनाते समय क्योंकि तब तक जीव तो मनुष्य के रूप में आए नहीं थे कि मुक्त जीवों के समक्ष प्रकट कर रहा था जो मुक्त जीव तो उसको भोग ही रहे थे ईश्वर को वो तो ईश्वर के संपर्क में ही थे इस पर भी आऊंगा कि वहां व्यवहार होता है कि नहीं होता है तो व्यवहार और परमार्थ का अंतर आप नहीं जानते क्या ना तो गेट के बारे में आपने आज तक कुछ बताया है ना आपने यह बताया है अरे भाई वहां पर साक्षी कौन था? फिर कौन साक्षी था? अच्छा इसके आगे बात चलती है। आपने बात कही पृथ्वी गोल और चपटी आप मेरी बात समझे नहीं। यहीं पे मौत का कुआं है। यहीं पे यहीं पे मौत का कुआं है। क्या है मौत का कुआ? आपने कहा कि अक्षांश इत्यादि के अनुसार व्यवहार में भी चपटी जो है वह व्यवहार में भी धरती जो है चपटी है। नहीं नहीं स्लिप ऑफ टंग हो गया दोबारा। स्लिप ऑफ टंग आपने कहा अक्षांश इत्यादि के जो अक्षा अक्षांश इत्यादि के रूप में जो वैज्ञानिक सिद्धांत हैं उनके अनुसार व्यवहार में भी पृथ्वी गोल है। ये आपने

00:38:52:14 कहा तो इसका मतलब यह है कि व्यवहार में पृथ्वी गोल है। तो भरद्वाज जी किसी को रास्ता दिखाते होंगे तो यूं दिखाते होंगे। भैया वो मुझे जो है विवाह करने जाना है। हिंदू बिटिया के साथ जिहादी पूछता होगा जब प्यार समाज मंदिर कहां है? है ना? मुझे ₹5100 मेरे पास हैं। तुरंत नगद कैश है और हिंदू बिटिया के साथ मुझे विवाह करना है। यह लड़की है और जो है मुझे ब्राह्मण बनना है और आप मुझे जल्दी आर्य समाज का मंदिर बता दीजिए। तो योगेश भारद्वाज जी कहते होंगे उधर चले जाओ गोल इशारा करते होंगे क्योंकि व्यवहार में पृथ्वी गोल नहीं है व्यवहार में तो पृथ्वी चपटी है या फिर ये कहे कि यह भी एक और व्यवहार में ना आकने वाला मामला है जो हमें शब्द प्रमाण के अनुसार या दूसरे अनुमान प्रमाण के अनुसार प्राप्त हो रहा है कि पृथ्वी गोल ही है अक्षांश इत्यादि के विज्ञान द्वारा व्यवहार में हमको दिख तो चपटी ही रही है और हमारा व्यवहार उसी प्रकार से होता है जैसा हम लोग देख रहे यह सब बातें आपके समझ में नहीं आई। खैर तो अगर समझ में नहीं आई और आपके अनुसार व्यवहार में पृथ्वी गोल है, चपटी नहीं है तो आप लोगों को रास्ता ऐसे ही बताते होगे आर समाज मंदिर का और स्वयं जो मोटरसाइकिल चलाते होगे वो मौत के कुएं वाली चलातेगे। गोल मौत के कुएं वाली सीधी थोड़ी ना चलाते

00:40:07:22 हो क्योंकि व्यवहार में पृथ्वी गोल है। तो अग्निव्रत जी कौन है? मौत के कुएं में जो गाड़ी चला ले या फिर ऐसा ना कहें तो योगेश भारद्वाज जी कौन है जो मौत के कुएं में गाड़ी चला लें वो जो करतब दिखाते हैं ना वैसी गाड़ी आप चला ले हम जरा इस मामले में कमजोर हैं। हम मौत के कुएं वाली गाड़ी नहीं चला पाते। हम सीधी गाड़ी चलाते हैं। सीधा रास्ता बताते हैं। हमारे व्यवहार में धरती चपटी है। हां थ्योरिकली शब्द प्रमाण से अनुमान प्रमाण से वैज्ञानिक दृष्टिकोण से यह जाना जाता है कि पृथ्वी गोल है। खैर यह ज्यादा आगे की बातें हो रही मुझे लगता है। अच्छा कुछ कुल मिलाकर के अगर जो भी बात थी कि पृथ्वी अक्षांश इत्यादि जो आपने बताया तो ये सब बातें आपने अपने आचार्य जी को रटाई क्यों नहीं है? वो वहां पर बोले क्यों नहीं? इन सबका उत्तर जो आपको बोलना पड़ रहा है। कई बातें ऐसी है जो पक्ष उन्होंने रखे ही नहीं वहां पर जो आपको बोलना पड़ रहा है। नहीं नहीं पृथ्वी व्यवहार में भी वो गोल ही है। क्यों नहीं बोला? हां। खैर [गला साफ़ करने की आवाज़] नहीं बोला कोई बात नहीं।

00:41:21:15 अगर वो ऐसा वहां पर बोलते तो मैं उनको काउंटर करता। यही मौत के कुएं वाला और शायद वह समझ पाते। खैर आपने बोल दी कोई बात नहीं। पर इसमें यह बात आती है कि इस बात पर जोर देने का जोर देने की आवश्यकता क्या हुई? योगेश जी को इस बात पर जोर देने की आवश्यकता क्यों हुई? क्योंकि इसी से सिद्ध होता है कि ईश्वर अवतार नहीं ले सकता। बिंगो टू द पॉइंट। ताली बजाइए। इसी से सिद्ध होता है ना कि ईश्वर अवतार इसलिए नहीं ले सकता क्योंकि अग्निव्रत जी और योगेश भारद्वाज जी दोनों ही शिवश नारायण द्विवेदी के उदाहरण की गढ़ता को समझ नहीं पाए। इसलिए सिद्ध होता है कि ईश्वर अवतार नहीं ले सकता। 12वा नियम आर्य समाज का लिख लो भाई। अच्छा इन्होंने एक जगह कहा कि मैंने कहा कि भावनाएं जो है जो आहत करने वाली चीजें हैं। हालांकि आर्य समाज का स्ट्रक्चर ही इस पर खड़ा हुआ है और जो भी कोई परंपरा प्राप्त सनातन सिद्धांतों का विरोध करता है उनका स्ट्रक्चर इसी शैली पर टिका हुआ है कि लोगों जो

00:42:36:24 संवेदनशील मुद्दे हो ना उन पर बात करो जीतने के लिए। सामने वाले को असहज स्थिति में डालने के लिए जो संवेदनशील मुद्दे हो उनप बात करो। उसी से हमारी जीत होगी। हमें सत्य का अनुसंधान नहीं करना है। हमें वाकई टू द पॉइंट ये नहीं बताना है कि ईश्वर अवतार कैसे नहीं ले सकता है। हां अब क्या है कि जैसे ओशो और वर्तमान में जो वर्तमान के ओशो पीठाधीश्वर है तथाकथित एक और आचार्य प्रशांत यह लोग जिस तरीके से फेमिनिज्म इत्यादि रूपों में विक्टिम कार्ड जो खेलते हैं वही विक्टिम कार्ड आर्य समाज यह सारी जो चीजें निकली हैं जो जो ये कह रहे हैं रामपाल को मेरा प्रणाम है और गांधी जी ये रामपाल इत्यादि तो तुम्हारे ही द्वारा फैलाए हुए रायते हैं जिनको हम बटोर रहे हैं। ये नास्तिक पैदा कर रहे हो आप लोग दिव्य कीर्ति जैसे। आप लोगों के द्वारा फैलाए गए रायते हैं। यह जो आपने बुद्धिज्म जैसा ही सिस्टम पूरा बना रखा है। बस कहने को बोल दिया ईश्वर है। ठीक है? पर कम टू द पॉइंट। मैं थोड़ा टू द पॉइंट रहने का प्रयास कर रहा हूं। हालांकि आपने जो आज मुझे टू द पॉइंट सिखाया वो कुछ और है कि विषय से हटकर सारी बातों पर जोर देना

00:43:51:25 है। तो क्या है कि ऐसी संवेदनशील बातें करो। ऐसी संवेदनशील बातें करो जिस पर या तो बहुत लंबी एक्सप्लेनेशन देनी पड़ जाए सामने वाले को और लंबी एक्सप्लेनेशन देने के चक्कर में जो मूल विषय है वो खत्म हो जाए। उसको लोग भूल जाए और राम राम श्याम श्याम और या फिर वो उन बातों को सुनकर के विषय को बचाने के लिए मौन हो जाए। उन बातों के बारे में बात ही ना करें और फिर बाद में आपके लोग यह वीडियो बनाए कि देखो देखो इनके पास इस बात का कोई उत्तर नहीं था। अरे भाई ईश्वर अवतार नहीं ले रहा है। क्यों नहीं ले रहा है? अगर बात हो रही है क्यों नहीं ले सकता है? ठीक है? तो इसका जवाब आपको तात्विक विवेचना से देना है कि ऐसा ऐसा उसका स्ट्रक्चर है, उसकी उसके जो फीचर्स हैं, उसकी तात्विक विवेचना यह है, वो है वो देना है आपको ईश्वर के। इसलिए और इस इस कारण से ईश्वर का अवतार लेना सिद्ध नहीं होता। और ईश्वर के अवतार ना लेते हुए भी उसका सर्वशक्तिमान ना होना सिद्ध नहीं होता। यह आपको बताना है। पर आप उस बात पर बात करने की बजाय तमाम सारी चीजें कर रहे हो। वो आगे आ भी जाएंगी। फिलहाल ये बात कर रहे हो कि भैया यदि ईश्वर अवतार

00:45:07:10 लेता है तो अगर वो सब कुछ कर सकता है तो क्या वो जनरल डायर के रूप में भी आ सकता है? क्या वो औरंगजेब के रूप में भी आ सकता है? फिर वो कर्म फल वाली बात भी ले आते हो कि जो है अगर ईश्वर अवतार लेता है पापियों का नाश करने के लिए तो यह हो रहा है वो हो रहा है। केवल इतना कह देने मात्र से आपका प्रश्न समझ में आएगा। ठीक है? इतना कहने मात्र से कि बहुत सारे पाप हो रहे हैं। इस समय आके क्यों नहीं रोक रहा है? अच्छा उदाहरण देना है कि गलत गलत बन के आ सकता है तो एक उदाहरण दे सकते हो। मगर 10 ठो उदाहरण क्यों देने हैं? 10 ठो उदाहरण इसलिए देने हैं क्योंकि हमारे पास तात्विक विवेचना है ही नहीं। तो हम ऐसे उदाहरण संवेदनशील उदाहरण ज्यादा मोटे तौर पर इसलिए दे देंगे कि उन उदाहरणों का उत्तर निराकरण करते करते इतना टाइम हो जाए और फिर लास्ट में हम कुछ ऐसी गरमा गर्मी पैदा कर दें जिससे कि यह चर्चा भंग हो जाए। जीत गए जीत गए मिरेकल मिरेकल। और यदि मैं इस चीज को होने से रोक रहा हूं विषय को बचाने के लिए तो आप जैसे लोग आकर के प्रश्न करोगे कि भाई भावनाओं को घर पर छोड़कर आओ तर्क और प्रमाण पर बात करो। और जब मैं भावनात्मक वो दे रहा हूं, उत्तर काउंटर दे रहा हूं तब सामने वाला कह रहा है कुतर्क है। मैं पूछ रहा हूं कुतर्क है कहां लिखा हुआ है? सामने वाला कह

00:46:22:12 रहा है नहीं बताऊंगा। तो वो चीजें आपको दिखाई नहीं दे रही है क्योंकि वो लेंस लेके आपने वीडियो देखा है ना कहां-कहां से सबसे ज्यादा कमजोरी सिद्ध हो रही है अग्निव्रत जी की। वहीं पर मैं उनको जो है बड़ा बनाऊंगा। तो भावनाएं मेरी नहीं थी। मैं समाज की भावनाओं की बात कर रहा हूं। कई ऐसे विषय होते हैं जिन पर बात करने के लिए एक व्यवस्थित रूप से अलग से समय चाहिए होता है। जब हम अवतार पर बात करने बैठे हैं तो ऐसे विषयों पर बात करने से हम बचेंगे ना जिनसे कि खामखा एक अलग से हमें उस पर समय देना पड़ जाए। एक टॉपिक एक एक नाम आप ले लो। दो नाम आप ले लो जनरल डायर औरंगजेब और 50 नाम क्यों ले रहे हो? एक उदाहरण दे दो। यह हो रहा है। यह पाप कर्म हो रहा है। वह पाप कर्म हो रहा है। और उदाहरण क्यों दे रहे हो? जिससे कि सामने वाला या तो लंबी एक्सप्लेनेशन में जाए और या फिर इस पर मौन रह जाए। ठोको ताली। खैर तो [गला साफ़ करने की आवाज़] अच्छा इसका मैं उदाहरण भी दे देता हूं। अग्निव्रत जी से जब मैंने योग नियोग पर बात की थी। अग्निव्रत जी ने वहां पर कहा क्या कि नियोग पर मैं अलग से नियोग पर भी मैं चर्चा कर सकता हूं। क्यों कहा? नियोग पर मैं चर्चा कर सकता हूं। यह उन्होंने क्यों कहा? नियोग के संबंध में सवाल आ रहा है। धड़ाधड़ देना

00:47:37:18 शुरू करो जवाब। हालांकि मैं नियोग के विषय में भी आक्षेप नहीं लगा रहा था। वो अलग बात थी। मैं ला रहा था उस तर्क को जो दयानंद जी ने वहां पर दिया है। आपका अच्छा बुरा यदि शास्त्र से तय हो रहा है तो शास्त्र की किसी बात को आप शास्त्र अपने मन से नकार नहीं सकते। यदि शास्त्र आपके लिए प्रमाण है तो ठीक है अच्छा और यदि तर्क से ही तय होना है तो प्रमाण जा क्यों रहे हो दे तो रहा हूं आपको डलिया भर के तर्क दिए डलिया भर के और जो जो आएगा उसको दूंगा ठीक है तर्क से ही होना है ना तो तर्क से करो फिर भागे क्यों प्रमाण पे तर्क से जान बचानी है तो प्रमाण में भागो प्रमाण से जान बचानी है तो तर्क पे भागो यही हुआ है सत्यार्थ प्रकाश में भी यही भरा हुआ खैर आगे चलते हैं। तो उन्होंने भी यह कहा कि भैया नियोग पर चर्चा करने को मैं तैयार हूं। इसका मतलब ही था कि वो एक विशेष रूप से वहां लंबी चर्चा है नियोग को समझने के लिए। उनके नजरिए में हमारे नजरिए में हम नियोग आर्य समाज के नियोग से हम सहमत नहीं है। ठीक है? जो उन्होंने नियोग की परिभाषा दी है, जो दृष्टांत

00:48:53:06 दिए, उससे सहमत नहीं है। परंतु नियोग पर जब एक व्यवस्थित चर्चा करना उनको उचित लगा तो उन्होंने यही बात कही कि नियोग पर मैं चर्चा कर सकता हूं। ऐसे ही पशु बलि पर मैं चर्चा कर सकता हूं। पर इन चर्चाओं के लिए अलग से समय चाहिए होता है और अपने विषय को बचाने के लिए टू द पॉइंट को टू द पॉइंट रखने के लिए। यह बात वहां कही गई थी कि आप ऐसी बातें ज्यादा मत करिए। उदाहरण दे रहे हैं। एक दो दे दीजिए। संक्षिप्त में दे दीजिए। ज्यादा करेंगे मुझे एक-एक उदाहरण को जाके काटना पड़ेगा। उसी में दो घंटे जाएंगे। तब तक सामने वाले को इतनी सारी बीमारियां वो बता चुके हैं। पता नहीं कौन से समय जो है पीछे से आ जाए बुलावा डॉक्टर का। तो ये सब चीजें ध्यान रखनी पड़ती है ना। खैर आप क्लासेस में आएंगे तो मैं जरूर आपको ट्रेनिंग दूंगा इन सब चीजों की। अच्छा अब आगे चलते हैं। तो अब [गला साफ़ करने की आवाज़] आपने एक जगह कहा है कि ईश्वर इंद्रिय विषय नहीं बनता। यह आपने कहा। आपने मेरा जो है कुछ कटाक्ष किया कि ईश्वर इंद्रिय विषय नहीं बनता है। और पहली बात तो यह है कि ईश्वर का इंद्रिय विषय बनने से मेरा तात्पर्य है व्यवहार में आना। किसी प्रकार से उसकी जानकारी होने होना भी। व्यवहार में आना है कि मुझे किसी

00:50:08:09 प्रकार से उसकी जानकारी हो रही है। यानी कि ईश्वर व्यवहार में आ सकता है किसी प्रकार से। तो उसी रूप में मैंने कहा कि इंद्रिय विषय इंद्रियों के जाने वहां पर मैंने विकल्प कहे पर आपने वह विकल्प सुनने नहीं थे। शायद उस समय कान पर कुछ रख लेते हो जहां पर मेरे पक्ष की कोई बात हो रही हो तभी तो लेंस लेकर के ढूंढ पाते हो। खैर आगे की बात ये है कि फिर ईश्वर ज्ञान कैसे देता है अपना? अंतःकरण में मन नहीं होता है क्या? अच्छा ईश्वर ने सृष्टि बनाई तो मांस मज्जा को कैसे जोड़ा? भाई मांस मज्जा बना। बहुत सारे छोटे-छोटे कण हैं उनसे कुछ बना फिर उनसे कुछ बना एंड में मास बना उस मास को संगीभूत किया होगा उन्होंने तो ये सब क्या स्पर्श इत्यादि में नहीं आ रहा है कैसे बनेगी सृष्टि अब यहां पे आ जाओगे कहने अचिंत विषय है बन जाओगे इसको हम बात नहीं हुई ना खैर और आगे चलते हैं तो अंतःकरण का विषय बनता है ना ईश्वर भू स्वा प्रचोदयात

00:51:11:22 बुद्धि मांग रहे हैं ना ईश्वर गायत्री मंत्र पढ़ने वालों को बुद्धि देगा ना कि नहीं मानते नहीं देगा हालांकि वह बात अलग है कुछ नहीं देता ईश्वर जो है भक्ति का कोई वो नहीं करता है पर बुद्धि दे देगा चलो बुद्धि दे रहा है तो व्यवहारिक हुआ ना इसी व्यवहारिक होने को ही इंद्रियों का विषय मैंने कहा ज्ञान देता है ना ऋषियों को अंतकरण का विषय बनता है ना भूल गए क्या आप अपनी चीजें भूल रहे हो इतना ज्यादा द्वेष है मुझसे इतना ज्यादा द्वेष मुझसे है या सत्य से है किसको छुपा रहे वो आत्मवलोकन भी करें थोड़ा बहुत। खैर आगे चलते हैं। तो मांस मज्जा इत्यादि ईश्वर के बिना संपर्क में आए ही जुड़ गए। यही बात थी ना? अच्छा

00:51:58:19 आगे क्या है कि सबसे दिक्कत वाली बात यह है ना। अच्छा इसमें एक बात और कहूंगा रश्मि थ्योरी जो है वैदिक रश्मि थ्योरी इनकी क्या नाम है अग्निवत जी की तो आपके जो तथाकथित वैज्ञानिक है इनकी रश्मि थ्योरी है उसमें थोड़ा देर लगेगी ईश्वर के व्यवहारिक होने पर ईश्वर के व्यवहार में आने आना आने वाला दिखाने के लिए थोड़ा देर लगेगी परंतु आपके अगर आपने इनकी वैदिक रश्मि थ्योरी नहीं मानी है और ईश्वर स्वयं कार्य करने वाला है सीधे वो क्या कह रहे हैं कि वहां पर वो पहले एक ओम रश्मि होती है काल होता है उसको जो है शक्ति प्रदान करते हैं। हालांकि वह शक्ति थोड़ी प्रदान करते हैं। अब सबसे पहले तो मैं एक बात कर यह वाली बात पहले पूरी कर लूं। तो वह क्या करते हैं कि ईश्वर का कार्य पहले ये जो ओम रश्मि है इसके साथ ईश्वर का संयोग होता है। फिर यह जो ओम रश्मि है यह सृष्टि निर्माण इत्यादि कर रही है। यानी सृष्टि के संपर्क में सीधे तौर पर ओम रश्मि आ रही है। ईश्वर नहीं आ रहा है। पर आपकी थ्योरी में ईश्वर आ रहा है। अगर आपने यह थ्योरी अपनाई नहीं है तो और रश्मि थ्योरी में भी आ रहा है। वह कैसे आएगा मैं बताऊंगा कैसे आएगा। पर इस कारण से तो आपको इनका आलंबन ले ही लेना चाहिए। भाई तुम्हारी थ्योरी ठीक है क्योंकि

00:53:13:25 हमारे यहां पर सत्य से कोई मतलब नहीं है। इससे मतलब है कि आर्य समाज के पक्ष को ज्यादा मजबूती से कौन रखेगा? अगर वह कोई स्मकिया भी होगा, साइकिल चोर होगा, तोता चोर होगा तो उसको भी हम कहने लगे वाह वाह वाह वाह धो डाला। बहुत बढ़िया है ना यही सिद्धांत 13वा सिद्धांत आर्य समाज। खैर कुल [गला साफ़ करने की आवाज़] मिलाकर के आपका कहना है कि ईश्वर जो है एक बात तो यहां पे हमें माननी पड़ेगी ना कि ईश्वर जो है कोई रूप धारण करके। मैं अभी एक हां यहां पर यह चीज बड़ी आवश्यक है बताने की कि शायद आर्य समाजी इस बात को समझ नहीं पाए कि अवतार हम कहते किसे हैं। उसको बस यही समझ में आता है कि भैया वो जो अगर वो सामने वो कृष्ण भगवान और राम जी के रूप में अगर दिखाई दे रहा है बस वही अवतार है। भाई तुम अवतार का खंडन करते कैसे हो? यहां से फिल्म को चालू करो ना। यहां से अपना मनन चिंतन चालू करो ना। जो सर्वव्यापक है वह एक जगह कैसे आएगा?

00:54:21:10 जो जिस जो कभी ना आया ना गया वो आएगा कैसे? जो पहले से है वो आएगा कैसे? जो अजन्मा है वो जन्म कैसे लेगा? ये सब है ना आपके? तो जब ईश्वर ओम रश्मि को अपनी थोड़ी सी शक्ति दे रहा है तो वो शक्ति क्या टूट रही है ईश्वर से? टूट के आ रही है। कैसे आ रही है? ओम रश्मि के अंदर वह शक्ति भी ईश्वर है ना। इस आने को ही कहते हैं अवतार। जैसे ही ईश्वर किसी कार्य में संलग्न होगा वहां पर ईश्वर का अवतार मानना पड़ेगा। वो व्यवहार में आ ही नहीं सकता। व्यवहार में विशेष होना पड़ेगा उसे। कहीं पर मंत्र दे रहा है, कहीं पर नहीं दे रहा है। हो गया एक एक कार्य करने वाला। अब यह एक देश कार्य कैसे हो रहा है? ईश्वर ही कर रहा है ना।

00:55:18:21 तो यह कार्य करने वाला होने के रूप में ही ईश्वर का अवतार मान्य है। पहला ही यही हो गया। सिर्फ वही नहीं जो आंखों का रूप बने। वो तो आगे की बात है। यानी कि यह सारी जो धारणाएं हैं कि उसका आना जाना सिद्ध नहीं होता। तो किसी देश काल परिस्थिति में मंत्र देने वाला हो गया। सृष्टि रचना करने वाला हो गया, प्रकट होने वाला हो गया। हाड़ मास के इंसान के रूप में ही प्रकट होने वाला नहीं। अग्निव्रत जी ने कहा कि कार्य के रूप में प्रकट होता है। आप कहते हो ना कि भैया पहले कहा था जो नहीं। कार्य के रूप में प्रकट होता है। अग्निव्रत जी ने कहा यह सब चीजें लेंस लेकर नहीं ढूंढी। कार्य के रूप में प्रकट होता है। वह कार्य ईश्वर का शाश्वत है। लगातार हो रहा है। एक ही जैसा बिल्कुल ना तो वह शाश्वत है, ना तो वह नित्य है वह कार्य और ना ही वह एक देश है। सर्वव्यापक है। एक ही जैसा कार्य हो रहा है। कहीं पर सूर्य बन रहा है, कहीं चंद्रमा बन रहा है, कहीं कुछ कार्य हो रहा है। तो कार्य के रूप में जो ईश्वर प्रकट हो रहा है, यह ईश्वर का अवतार है। पर नहीं आपको यहां समझ में नहीं आएगा। आप क्लासेस में आइए निशुल्क वाली क्लासेस वो ₹5100 खर्च नहीं करने पड़ेंगे जो आर्य समाजी चंदे चंदे से आते हैं। जो हिंदू

00:56:33:25 बिटियाओं का विवाह होता है ना वहां पर ₹5100 लेकर के एक ही दिन में ब्राह्मण बना दिया जाता है। ब्राह्मण बिटिया से विवाह करना है। एक ही दिन में ब्राह्मण तो वो जो आर्य समाज से जो पैसों का कलेक्शन होता है उसको कोई चोट नहीं पहुंचेगी। आप मेरे यहां फ्री निशुल्क पढ़ने के लिए आ सकते हैं। ठीक है भारद्वाज जी। हां। तो क्या है? ईश्वर का अवतार वही मानना पड़ जाएगा जैसे ही आप कार्य देखोगे। ईश्वर यदि अपने कार्य के रूप में प्रकट हो रहा है तो उस कार्य के रूप में भी अवतार ले रहा है। अच्छा उन्होंने एक बात और कही उसका ज्ञान प्रकट होता है। प्रकट होता है यानी कि वो शाश्वत नहीं है। शाश्वत नहीं है तो प्रकट कहां से हो रहा है? ईश्वर उसमें ज्ञान के रूप में। ईश्वर जैसे ही क्रियावान होगा, क्रियाशील होगा, जरा सा भी उसका कोई व्यवहार भी होगा, कहीं पर भी, किसी के भी साथ वैसे ही उसका अवतार मानना पड़ जाएगा। यही तो मैं सिद्ध कर रहा हूं। वो तो उन्होंने जल्दी विषयंतर कर दिया। नहीं तो वो धक्के वाली थ्योरी आने वाली थी। मैं लाता धक्के को फिर उनका वो सब वो जो बोले थे बल ये सब बातें तो हो ही नहीं पाई। मैंने उनको अगले दिन फिर कॉल किया था कि आप अगर विषयंतर ना करें और व्यक्तिगत ये सब ना करें तो चर्चा पूरी कर लो। अब तो खैर चीजें आगे बढ़ गई है। पर मैंने उनको अगले दिन कॉल किया था कि भाई

00:57:48:26 क्योंकि मेन बात थी ये सब बातों के ये जितने उन्होंने जो निचले स्तर के तर्क दिए हैं ये छोटेमोटे आर शर्मा जी जो मेरे साथ आए दिन जुड़ा करते वो सब दे चुके सब जो बोले हैं वहां पर और आज आप आए हो इनकी सिफारिश करने वह सब आर्य समाजी आपके अपने नहीं थे। यही सब बोला था उन्होंने। और जब यहां पर गाड़ी आकर के अटकी थी कि ईश्वर सृष्टि करता कैसे है? बनाता कैसे है? चीजें इधर से उधर मूव कैसे हो रही है? वहां पे बल की बात आई थी। शक्ति की बात आई थी। शक्ति के रूप में अवतार लेता है भाई। पहला अवतार तो वहीं मान्य हो जाएगा ना जहां क्रियावान है ईश्वर। खैर [खांसने की आवाज़] [गला साफ़ करने की आवाज़] अच्छा अब पहली बात तो एक निर्णय कर लीजिए आप ईश्वर सदैव व्यवहारिक है कि नहीं है यदि सदैव व्यवहारिक होता है सदैव वो व्यवहारिक है तो भी उसके लिए शब्द नहीं आना चाहिए कि वो प्रकट होता है क्योंकि वो तो पहले से ही व्यवहारिक है और यदि वो व्यवहारिक है तो अभी मेरे व्यवहार में क्यों नहीं आ रहा है तो मानना पड़ेगा ईश्वर व्यवहारिक नहीं है और

00:58:57:15 यदि आपने उसको सदैव व्यवहारिक मान रखा रखा है कि ईश्वर सदैव से व्यवहारिक ही था। आपने आगे चलकर के एक तर्क दिया है कि ईश्वर का व्यवहार और परमार्थ में कोई अंतर नहीं होता है। व्यवहार और परमार्थ है क्या? हमारी दृष्टि से है जो भी ईश्वर के कार्य नहीं बदलते हैं। हमारी दृष्टि देखने की बदल जाती है। जैसे पृथ्वी नहीं बदल रही है। पृथ्वी तो गोल ही है। हमारी दृष्टि बदल रही है। हमारी दृष्टि के अनुसार प्राप्त होने वाली जो जानकारी वो बदल रही है। इसको व्यवहार परमार्थ कहते हैं। जो आपने कहा ना दोगला क्यों होगा? व्यवहार में कुछ और परमार्थ में कुछ और तो हम उसे किस तरीके से जान पा रहे हैं वो वाली बात उसको कहते [गला साफ़ करने की आवाज़] हैं व्यवहार परमार्थ कह बहुत ज्यादा गढ़ बातें हो जाएंगी और

00:59:39:25 क्या है कि इतनी गढ़ बातों की अपेक्षा नहीं की जा सकती समाजियों से मुझसे मुझे क्षमा करिएगा मुझसे गलती हो गई इतनी गढ़ बातें ईश्वर जो है क्रियावान होते ही अवतार मानना पड़ेगा उसका ये सब बहुत उच्च कोटि की गुण बातें यहां तक समाज समाजी लोग कहां सोचते हैं आज तक कहां सोचा है किसी ने नहीं तो अवतार को ना मान लेते तो इतनी इतनी गढ़ बातें करने के लिए मुझे क्षमा कर दीजिए। मुझसे गलती हो गई। अभी अभी मैं रोकूंगा आगे। इतनी गढ़ बातें नहीं करूंगा। [गला साफ़ करने की आवाज़] तो अगर ईश्वर सदैव व्यवहारिक है उसको आपने कहा ना कि वो केवल उसका कोई साक्षी नहीं था। यानी कि वो व्यवहार व्यवहारिक शुरू से था। केवल वहां पर जाना गया। तो अगर उसका कोई साक्षी नहीं था। यानी कि वो ऐसे मोड़ पर है जब वो व्यवहारिक है। ईश्वर सदैव से एक ही रहता है। आपने और भी जगह कहा कि वो व्यवहार और परमार्थ दोनों में तात्विक में भी वैसा ही होगा व्यवहारिक में भी यानी व्यवहारिक तो उसका जो व्यवहारिक है वह सदैव से व्यवहारिक है तब भी आपकी इंद्रियों के विषय में ना आने वाली बात खंड खंडित हो जाती है पर इतनी गुण बातें हैं। खैर तो मान लिया कि ये सब आप आप लोगों की सीमा के बाहर का विषय है। इनमें आपकी गति नहीं है। फिर भी जो भी पक्ष आप व्यवहार परमार्थ के विषय में दे रहे हैं। इंद्रियों के विषय में दे रहे हैं। यह सब बातें आपके

01:00:55:01 तथाकथित वैज्ञानिक जी नहीं बोले। वह तो अपनी वैदिक रस्म थ्योरी आने से पहले ही पलायन कर गए। व्यक्तिगत कटाक्ष पर पहुंच गए। आप कुतर्क कर रहे हो। अद्वैतवाद बुरा है। अच्छा इसमें एक बात और आती है निर्णय वाली। खैर आगे मैंने नोट किया है। भाई मैं तो पन्ने पलटता हूं। आप जैसा मैं वो जो अद्भुत अदम्य साहस की परिभाषा नहीं हूं। आप जैसा शक्तिमान नहीं हूं। तो मैं पन्ने पलटता हूं। आप नहीं पलटते। खैर आगे चलते हैं।

01:01:31:18 तो ईश्वर अवतार क्यों नहीं ले सकता? यहां से हमने क्या सीखा टू द पॉइंट में? ईश्वर अवतार इसलिए नहीं ले सकता है क्योंकि आर्य समाजियों की गति इतने गढ़ विषयों में नहीं है। 14वा सिद्धांत जोड़ते जाइए अपने मन लिस्ट बढ़ा दीजिए। ईश्वर अवतार क्यों नहीं ले सकता है? क्योंकि आर्य समाजियों की गति व्यवहार परमार्थ को जानने में नहीं है। व्यवहार परमार्थ के विषय में और एक उत्तर दे देता हूं आपको। कोई व्यक्ति मुक्त हुआ है। अब वह मुक्ति में है। तो उसको यहां की चीजें ज्ञात है कि नहीं? या तो यह कहो कि उसको जो है कुछ ऐसा इंजेक्शन लगा दिया जाएगा जिससे उसको यहां की गतिविधियां देखने को ही ना मिले। छिपा दी जाए या फिर ज्ञात है। अगर ज्ञात है यहां की नॉलेज उसे मिल रही है मुक्ति में मुक्ति अवस्था में आपके अनुसार तो उसकी जो यहां पर कल तक माताएं बहने थी या उसके जो बंधु बांधव थे उनके साथ कुछ अनहोनी हो रही है कुछ अप्रिय घटनाएं हो रही हैं तो उसको बुरा लगेगा मुक्ति में नहीं लगेगा तो क्यों नहीं लगेगा उसके लिए सब पाप नहीं होगा उनके साथ कुछ गलत हो रहा है कुछ हो रहा है प्रभाव डालने वाला नहीं होगा।

01:02:46:26 हालांकि थ्योरी तो यही कहती है कि भाई मुक्ति वाले को नहीं होता है। तो यह क्या है? कल तक उसकी जो माताएं थी, बहने थी, आज उसको कोई फर्क ही नहीं पड़ रहा है। यही है व्यवहार और परमार्थ का अंतर। दृष्टि का अंतर एक है मुक्त दृष्टि, एक है बंधन में बंधन वाली दृष्टि। इसी को व्यवहार और परमार्थ कहते हैं। खैर इतनी गढ़ बातें हैं। क्षमा करिए। फिर मैंने पूरा कर दिया। अच्छा अब आगे एक वो और आ जाता है। स्वयं हिंदी में वीडियो बना रहे हैं। अग्निव्रत जी हिंदी में ही अपने भाषण देते हैं। प्रचार प्रचार प्रचार प्रसार व्यवस्था के लिए हिंदी में ही वीडियो बनाते हैं। हिंदी में ही किताबें लिखते हैं। और पूरे वांगमय को वैदिक वांगमय को आपने हिंदी में ट्रांसलेट करके लिखा है। तो इनको अपना हिंदी में वीडियो बनाना हिंदी में आज मेरा जो समीक्षात्मक वीडियो बनाया है उसमें भी इन्होंने हिंदी भाषा का उपयोग किया है। संस्कृत का नहीं किया है। तो इन्होंने स्वयं तो स्वीकार कर लिया कि हम जैसा जो उचित होगा अपेक्षित होगा उस भाषा में करेंगे। पर शिवश नारायण द्विवेदी यदि अपेक्षित भाषा में करेगा तो हम ये मुद्दा उठाएंगे। भैया इसने संस्कृत नहीं बोली। नहीं आती है संस्कृत। चौथी क्लास फेल हूं ना। बता तो दिया नकेल

01:04:02:04 डालने के लिए पर्याप्त हूं। नाक में चौथी क्लास फेल नकेल डालने के लिए पर्याप्त शंकराचार्य का अल्पज्ञ शिष्य सुन लो दोबारा अल्पज्ञ शिष्य पर्याप्त है समूचे सनातन विरोधी तत्वों को नष्ट कर देने के लिए तुम वो नष्ट की सीमा से बाहर हो शोधन वाली सीमा में हो आप लोग उसमें नष्ट में ना जाना तो क्या है मामला कि संस्कृत में मैंने चीजें नहीं बोली इसका आपको बड़ा अफसोस है और अग्निव्रत जी ने संस्कृत में प्रचार प्रसार किया। आपने प्रचार प्रचार प्रसार किया हिंदी में संस्कृत में नहीं तो हिंदी में प्रचार प्रसार आपने किया वो आप नहीं देखो। अच्छा जब ये चर्चा तय हुई थी उस चर्चा को तय करते समय भी आपने उनको फोन करके बताया नहीं। अनबन है ना वैदिक रश्मिक थ्योरी की वजह से आपस में अनबन है आज शिवश नारायण द्विवेदी की वजह से जैसे कई भेड़िए एक नहीं हो जाते हैं शेर का शिकार करने के लिए वैसे एक हो रहे हैं ऐसा ही दिख रहा है वैसे तो अनबन है ना हनुमान जी उड़ते थे कि नहीं उड़ते थे ये सब चीजों को लेकर के अनबन है पर फिर भी उस अनबन के चलते लगता है आपने फोन नहीं किया ये कहने के लिए कि संस्कृत में शास्त्रार्थ करना भाई चर्चा थी हमको तो किसी ने कहा

01:05:17:06 नहीं था कि संस्कृत में करनी है आपको फोन करके उन्हें बता देना चाहिए बचना अगर शंकराचार्य के सैनिक से बचना है तो भाई उसको संस्कृत के लिए बोलो। तो ना तो आपने फोन किया ना स्वयं संस्कृत में वीडियो बनाया और ना ही आपने अग्निव्रत जी से कहा कि आप संस्कृत में क्यों नहीं बात कर रहे हैं? हिंदी में क्यों कर रहे हैं? पर आपको मेरा संस्कृत में ना बोलना इतना खल गया कि आपने एक 16वा सिद्धांत दे दिया आर्य समाज का। क्या है सिद्धांत? कि ईश्वर अवतार इसलिए नहीं ले सकता है क्योंकि शिवश नारायण द्विवेदी को संस्कृत नहीं आता। वाह वाह बिंगो 16वा सिद्धांत मिल गया। ईश्वर अवतार इसलिए नहीं ले सकता है क्योंकि शिवश नारायण द्विवेदी को संस्कृत में ही आती है। ये है आपके सिद्धांत। भाई इसी पे तो खड़ा है आर्य समाज का स्ट्रक्चर। सत्य से मतलब नहीं है, न्याय से मतलब नहीं है, धर्म से मतलब नहीं है। मतलब इस बात से है कैसे सामने वाले की कमियां निकालनी है। जिन कमियों का उस विषय से कोई मतलब नहीं है जिस विषय पर चर्चा होगी। है ना? चलिए, [गला साफ़ करने की आवाज़] यहां तक आपने आपकी कई सारी बातें अगर मैं कुछ भूल रहा हूं तो आप जब क्लासेस में आएंगे ना, आपने जो जो बातें रेज की है, कुछ भूल

01:06:32:12 रहा हूं अगर आपकी बातों को, तो आप जब क्लासेस आएंगे, निशुल्क वाली में तो आप वहां मुझे बता दीजिएगा। तो मैं बाकी की चीजें भी पूरी कर दूंगा। अच्छा आगे चलते हैं। तो अब आ गई कुछ ऐसी बातें जिनका उत्तर देना मैं आवश्यक समझता हूं। अब एक बात तो बात आपने की कर्म के फल वाली। आपने कहा कर्मों का फल। हां। आपने एक आरोप लगाया कि इनका ईश्वर अपने मन के अनुसार कार्य करता है। है ना? तो सबसे पहली बात तो यह है कि वह सृष्टि जो करता है उसमें कई चीजें होती हैं जो अभी भी सुनिश्चित नहीं है। वो ईश्वर ने बस की है। बहुत सारी है। ईश्वर ने चीजों को हरा, पेड़ों को हरा कलर क्यों दिया? या फिर ईश्वर ने वेदों में अलंकार क्यों लगाए? ये बातें आगे भी आएंगी। मंत्रों के रूप में क्यों दिया? सूक्त के रूप में क्यों दिया? वेद का ज्ञान ये सब चीजें आगे आएंगी। खैर जो मोटी बात है इसमें कि हमने यह नहीं कहा कि ईश्वर मनमाने ढंग से कार्य करता है। परंतु किसको क्या फल देना है और

01:07:47:13 उसने कितना कर्म कौन सा गलत किया है जिसके कारण भगवान अवतार ले रहे हैं। हालांकि अवतार लेने के लिए भी हमने ये नहीं कहा है कि ईश्वर केवल कर्मों का फल देने के लिए पापी को मारने के लिए ही अवतार लेता है। उसमें उनकी कुछ अपनी चीजें हैं। कब लेना है, कितने अंतराल के बाद लेना है। जैसे कर्मों का फल देने में उनकी अपनी चीजें हैं। तो कर्मों का फल वह अपने मन से देता है। हम यह नहीं कह रहे। हालांकि मन भी है उसमें पर हमने यह नहीं कहा है। हम यह कह रहे हैं कि उन विषयों में हमारी गति नहीं है कि किसके साथ क्या व्यवहार कर रहा है ईश्वर। जैसे कि चार ऋषियों को ईश्वर ने वेद का ज्ञान दिया। अन्य को क्यों नहीं दिया? ये तो अन्याय हो गया। अब हमारी इसमें गति थोड़ी ना है कि उन ऋषियों ने उन उन मुक्त आप ही के अनुसार बोल रहा हूं। ठीक है? दुर्जन तोष न्याय कहते हैं इसे। दुर्जन्या तो वो जो ऋषि के रूप में प्रकट होते हैं उन्होंने अपने पूर्व में क्या-क्या कर्म किए जिनके कारण ईश्वर ने उन्हें ऋषि बनाया और उनके अंतःकरण में वो ज्ञान दिया। इसमें हमारी गति नहीं है। इसी बात को बोला जाता है कि किस रूप में बोला जाता है कि ईश्वर उसमें हमारी गति नहीं है। तो ईश्वर अपनी इच्छा के अनुसार जो कार्य करना है जहां पर करना है वैसे करेगा। कर्मों का

01:09:02:14 फल दे रहा है। तो जब आप यह सुनिश्चित नहीं कर रहे हैं कि किस प्रकार से दिया जाएगा तो यह सुनिश्चित क्यों कर रहे हैं कि कब दिया जाएगा। आप यही तो कह रहे हैं ईश्वर अब क्यों नहीं आ रहा है? इसका अर्थ है कि उसकी वो जो सेटिंग है जिसमें हमारी गति नहीं है। जिस विधि के अनुसार ईश्वर कार्य करता है कर्म का फल देने वाला उसमें हमारी गति नहीं है उसको जानने की। बस हमें यह मानना पड़ता है कि जैसे आपने कहा कि नहीं ईश्वर हर क्षण कर्मों का फल दे रहा है तो वहां पर आप फंस जाओगे। जहां किसी व्यक्ति ने कुछ किया होगा और जो है वो बहुत सुखी होगा। आपको मानना पड़ेगा शब्द प्रमाण के कारण कि ईश्वर कर्मों का फल दे रहा है। परंतु व्यवहारिक रूप से सूचना प्राप्त नहीं हो रही कि ईश्वर कर्मों का फल दे रहा है। यहां भी आ गया व्यवहार और परमार्थ। तात्विक विवेचना हमें जो शब्द प्रमाण से मिली है उससे हमने माना कर्मों का फल दे रहा है अनुमान प्रमाण से माना पर इंद्रियों के द्वारा नहीं पता चल रहा है कर्म का कर्मों का फल मिल रहा है उसे ठीक है तो क्या हुआ [गला साफ़ करने की आवाज़] इसी में इन्होंने कहा कि ये बात तो आपके लिए भी आ सकती है कि हनुमान जी यहां क्यों नहीं कर रहे वो क्यों नहीं कर रहे वही तो हम कह रहे हैं भाई भाई वो ईश्वर की अपनी एक विधि है जिन विधि के अनुसार वो तय करता है किसको कब देना है किसको किस रूप में देना है हमने ये थोड़ी ना कहा है कि हर

01:10:17:20 व्यक्ति को कर्मों का फल देने के लिए हर पापी को मारने के लिए ईश्वर आएगा। आप वहां पर अलंगा लगा रहे हो ना कि क्यों नहीं आ रहा है। क्योंकि उसकी विधि के अनुसार उन लोगों को मारने के लिए अवतार लेना नहीं है। उन उन अधर्मियों को रोकने के लिए अवतार लेना नहीं है। जिस प्रकार से आपके अनुसार कि जो इस समय कर्म हो रहे हैं वो इस प्रकार से हो रहे हैं कि उनको कर्मों का फल इस प्रकार से दिया जाए जो हमारी जानकारी में आना आवश्यक नहीं है। सुन लेना रिपीट करके कभी-कभी होती है ऐसी लाइन जो एक बार में समझ में ना आए। रिपीट करके सुन लेना थोड़ा 1.5 की स्पीड पर लगा लेना। ठीक है? तो यह प्रश्न आप कर रहे हैं कि इतना सब हो रहा है तो कर्मों का कर्मों का फल वो अवतार क्यों नहीं ले रहा है? अवतार लेना कर्मों का फल दे। हालांकि अवतार केवल एक कर्मों के फल के लिए नहीं है। मगर अगर कर्म कर्मों के फल से उसे जोड़ भी लिया जाए। तो प्रत्येक कर्म का फल देने के लिए अवतार नहीं है। हां अवतार लेते समय का एक प्रयोजन यह भी होता है कि ठीक है। यह भी करेंगे। पर यही एक प्रयोजन नहीं है कि अवतार ले ही हर पापी को मारना है। और यदि आप यह सेट करेंगे कि अभी क्यों नहीं हो रहा है? तो हम पूछेंगे कि भैया फलाना जो व्यक्ति है उसकी इस प्रकार से मृत्यु क्यों नहीं हो रही है? उस प्रकार से मृत्यु क्यों

01:11:32:21 नहीं हो रही है? ये सब चालू हो जाएगा। या अभी क्यों नहीं हो रही है? वहां क्यों नहीं हो रही है? बहुत से ऐसे लोग हैं जो अभी भी जीवित हैं। और हमारी दृष्टि में और मनुस्मृति की दृष्टि में उनको मृत्युदंड है। तो क्यों नहीं मिल रहा है मृत्युदंड? क्यों ईश्वर उन्हें मृत्युदंड नहीं दे रहा है? ये सारी चीजें वहां पर तो इसको समझिएगा। तो जिस प्रकार से आप यह तय नहीं कर सकते कि किसको कब किस रूप में ईश्वर कर्मों का फल देगा। उसी प्रकार से आप यह भी तय मत करिए कि ईश्वर कब किस समय और किस रूप में आकर के उसको उसके कर्मों का फल देगा। अवतार से भी उस बात को मत जोड़िए। यह बात ठीक है। अच्छा इसके बाद आपने एक तंज कसा। ईश्वर के मन नहीं होता है। ईश्वर के मन नहीं होता है। इस बात पे आपने तंज कसा है। ईश्वर के ईश्वर के मन होता है। तो सत्यार्थ प्रकाश पढ़िए। उसमें लिखा हुआ है कि ईश्वर अपने शक्ति रूपी हाथों से कार्य करता है। हाथों से। ओ हो हो हो। ये कैसी गलती कर दी दयानंद जी ने? ईश्वर के हाथ नहीं होते हैं। क्यों लिख दिया? तो जैसे ईश्वर ने शक्ति रूपी हाथ दिए हैं तो ज्ञान विज्ञान को

01:12:47:22 ग्रहण धारण करने वाली शक्ति शक्ति रूपी मन नहीं हो सकता उसके। हमने कह दिया तो आफत है। जाइए फाड़ के फेंक दीजिए। सत्यार्थ प्रकाश का उपना जहां लिखा है शक्ति रूपी आंख ईश्वर की। और यहां पर भी मैं आपकी वही जो आपने बचकानापन किया है इसमें उसको याद दिलाऊंगा टू द पॉइंट। कि मैंने वहां पर प्रॉपर सेंटेंस नहीं बोला कि शक्ति रूपी मन ज्ञान विज्ञान को धारण ग्रहण भाई कुछ तो लौकिक भाषा में नाम देने पड़ते हैं ना जैसे आपके यहां दिए गए हैं। ईश्वर बलवान है। बल जहां लगेगा वहां वो धक्के का विषय बन जाएगा। चीजों को स्पर्श का विषय बन जाएगा। जड़ पदार्थों के स्पर्श का विषय बन जाएगा। अवतार हो जाएगा वहां बल के रूप में। खैर आगे चलते हैं। तो आप यदि मेरे द्वारा यह कहने पर कि ईश्वर के मन में ईश्वर के मन है इस पर आप तंज कस रहे हैं तो आप अपने उनहीं तथाकथित जो आपके परम महषि हुए हैं उनकी बात पर भी तंज कस रहे हैं क्योंकि वो भी कह रहे हैं ईश्वर के हाथ होते हैं। शक्ति रूपी हाथ होते हैं। और यदि उनके शक्ति रूपी हाथ आपको स्वीकार रहे हैं तो आपको निसंकोच होकर मेरा भी शक्ति रूपी मन स्वीकार कर लेना

01:14:02:24 चाहिए। हाथ से तो उच्च कोटि की चीज है ना मन। है कि नहीं? चलिए आगे चलते हैं। [खांसने की आवाज़] तो यहां पर भी यही वाली बात आ जाती है कि ईश्वर अवतार क्यों नहीं ले सकता है? क्योंकि आचार्य जो योगेश भारद्वाज जी हैं सहारनपुर वाले हैं शायद। आचार्य योगेश भारद्वाज जी की जानकारी में ईश्वर के शक्ति रूपी हाथ नहीं होते हैं। मेरे और आचार्य योगेश भारद्वाज जी की जानकारी में सत्यार्थ प्रकाश का ज्ञान विज्ञान अभी थोड़ा कम है। इसलिए ईश्वर अवतार नहीं ले सकता है। अच्छा अब इन्होंने एक बात और कही है सर्वज्ञ इत्यादि के विषय में। ईश्वर हां इन्होंने एक बात और कही कि ईश्वर व्यवहार में अलग हो जाता है। परमार्थ में अलग हो जाता है। दोहरा चरित्र क्यों है? यह तो दोगला कहा जाएगा। ईश्वर नहीं बदल रहा है। हमारी उसको देखने की दृष्टि बदल रही है। एक एक है मुक्त दृष्टि अविद्या से रहित और एक है बद्ध की दृष्टि अविद्या से सहित और उस कारण से ईश्वर हमें अलग रूप में दिखाई देता है। अविद्या में रहते हुए जब ईश्वर व्यवहारिक होगा अविद्या में रहते हुए जब ईश्वर व्यवहारिक होगा उसको

01:15:17:27 अवतार कहा जाएगा। और अविद्या से मुक्त रहते हुए जब ईश्वर होगा तो वहां पर कुछ वहां परमार्थ है। वहां व्यवहार है ही नहीं। तो वहां पर जरूरी नहीं कहा जाएगा कि ईश्वर ने अवतार लिया क्योंकि वो परमार्थ है। अविद्या से रहित है। तत्व से चीजों को हम देख समझ जान पा रहे हैं। वही तो विद्या है। खैर [गला साफ़ करने की आवाज़]

01:15:51:22 तो यह व्यवहार और परमार्थ का मतलब आप समझ गए। अब एक चीज और है कि आपने एक बात कही है हमने सर्व का मतलब नहीं समझा। हालांकि इसमें भी वो खेल गए। योगेश भारद्वाज जी थोड़ा सा खेल गए। जब सर्व शब्द पर बात आई है तो थोड़ा सा खेल गए। क्या खेल गए? जैसे मैंने कहा कि भाई सर्वशक्तिमान का मतलब यह नहीं है कि जो सब कुछ कर सके यदि तो आपने सर्वज्ञ का मतलब यह क्यों माना है कि जो सब कुछ जानता है और आपने सर्व्यापक का अर्थ क्यों माना है कि जो सब जगह है तो यहां योगेश भारद्वाज जी क्या खेल गए कि इन्होंने मेरे सर्वज्ञ को मात्र पकड़ा और सर्वव्यापक में बात ही नहीं की। सर्वव्यापक का अर्थ इन्होंने माना है कि ईश्वर सब जगह है। ऐसा कुछ नहीं है जहां पर ईश्वर ना हो। सब जगह है ईश्वर। ठीक है? पर सर्वज्ञ का अर्थ इन्होंने क्या माना है पता है? इन्होंने माना है कि ईश्वर भविष्य नहीं देख रहा है। त्रिकालदर्शी नहीं है। ईश्वर उसके ऊपर आधारित है। ईश्वर पहले से नहीं जानता है कि क्या कर्म करने वाला है। वो जो कर रहा है वो ईश्वर जानता है। जैसा वो कर रहा है वैसा ईश्वर जानता है। और कुछ उसमें अनुमान प्रमाण की बात भी

01:17:06:26 कही कि उसने एक संभावना व्यक्त कर ली कि भाई ऐसा ऐसा मैंने बहुत देखा इसलिए ऐसा करेगा। इस तरीके से सेट हो गया कि ईश्वर जो है यह जानता है। इस तरीके से यह चीजें निश्चित हो पाई कि ईश्वर ये जानता है कि अब क्या होगा अब क्या होगा। मगर वो भविष्य दृष्टा नहीं है। त्रिकाल दर्शी नहीं है। वो जो संभावना है संभाव संभावना जन्य वो चीजें हैं। अगर ईश्वर ऐसा कुछ जानता है जो भविष्य से संबंधित है तो वो संभावना जन्य चीजें हैं। और दूसरी बात यह है कि जैसा जैसा मनुष्य करता जा रहा है वैसा वैसा ईश्वर जानता जा रहा है। इस रूप में वो सर्वज्ञ है। तो इन्होंने सर्वज्ञ को भी वो जो सब कुछ जान सकने वाला भविष्य भी देखता है उससे ही बाहर निकाला है। तो पहली बात तो मैं यह कहूंगा कि अगर हम यह कह देंगे कि वह क्या सोचने वाला है ईश्वर नहीं जानता है तो आपका जो वो जो पेरोल जैसा जो वो है ना मोक्ष पेरोल में जिस प्रकार से नहीं जेल से कैदी को छोड़ दिया जाता है जाओ इतने दिनों में आप वापस आ जाना उसी प्रकार से बद्ध जीवों को छोड़ा जाता है मुक्ति में जाओ इतने दिनों में वापस आ जाना 36 लाख कुछ वर्षों पता नहीं कितने वर्ष के बाद वो जो आपका परांत काल है तो वो बाधित हो जाएगा

01:18:22:00 क्योंकि उसमें आपने यही वहां पर लिखा है सत्यार्थ प्रकाश में कि वो ऊब जाता है जो जीव है मुक्त जीव वो मुक्ति के उससे आनंद से ऊब जाता है हालांकि फिर वो एक नई चीजें खुलंगी कि वो आनंद बाधित कैसा फिर वो सच्चिदानंद कैसा वो तो आनंद है ही नहीं जब वो बाधित है तो फिर यहां वाले आनंद में उसमें ये अंतर है वो दीर्घ काल के लिए और ऊब जाता है तो मनुष्य क्या सोचने वाला है जीव क्या सोचने वाला है क्या विचार करने वाला है बंधन में और मुक्ति में तो आपका बाधित हो जाएगा क्योंकि फिर प्रत्येक जीव जो है वापस नहीं आना चाहिए ना अगर वो अगर वो नहीं हुआ तो उसने कहा नहीं नहीं मुझे तो रहना है तो आपको 36 लाख वर्ष वाली थ्योरी तो फेल हो जाएगी तो पहली बात तो यह है कि बड़ा निरी टाइप के ईश्वर की परिभाषा दे रखी है फिर इस इस प्रकार से आर्य समाज यहां भी बाधित है भविष्य नहीं देख सकता है और दूसरी बात इससे आपका मोक्ष भी खंडित हो रहा है मोक्ष की जो धारणा है वो भी खंडित हो जा रही है तो तो इस पे थोड़ा काम करें। इसको ऐसा सेट करें कि 17वा कुछ सिद्धांत बन पाए। कुल मिलाकर के यहां तक यह बात कई बार आ रही है कि आचार्य जी ये सारे पक्ष नहीं रख पाए। उनको जल्दी से कूदना पड़ गया कि प्रमाण दो। तर्क को छोड़कर के प्रमाण में आना पड़ गया। तो थोड़े आचार्य जी को हालांकि वैज्ञानिक विज्ञान की कोटि

01:19:37:08 कोटि के हैं पर उनको थोड़ी ट्रेनिंग आप दीजिए और उनको समझाइए कि भाई ये तर्क पर ये सारे तर्कों पर भी बात हो सकती थी। हालांकि आपके तर्कों का उत्तर भी मैंने दे दिया है। क्लास में भी दूंगा यहां पे भी दे दिया है। पर फिर भी उनको तो कहनी चाहिए थी इनमें से कुछ थोड़ी बहुत बातें हैं जो आपने कही है। पर नहीं कही फिर भी भाई ताली पीटो थोको ताली वैज्ञानिक जी ने धो डाला। कल मुझे एक फोटो प्राप्त हुई थी। हम पोस्ट करेंगे। उसमें किसी ने पता नहीं क्यों भेजी थी वह फोटो। उसमें दिखाया गया था। शेर के जबड़े में शेर के जबड़े में जो है एक शान था और वह कुकू कुकू कर रहा था। फोटो आई मुझे WhatsApp पर और शेर के ऊपर लिखा था सैनिक और वो कुकू कुकू कर रहा था जो उसके जबड़े में स्वान था और नीचे वही स्वान जब जहां पर शेर नहीं है फिर दूसरा दृश्य पहला दृश्य कुकू कुकू शेर के जबड़े में और दूसरा दृश्य वही जो स्वान है वो बैठा हुआ है और वो जो है लोगों को सुना रहा है मैंने धो डाला बोलती बंद कर दी थी मैंने उसकी

01:20:52:12 इस तरह से बातें कर रहा है वो जब शेर नहीं है उसकी अनुपस्थिति में और उसके सामने कई सारे उसके छोटे छोटे छोटे से जो पिल्ले होते हैं वो बैठे हुए बहुत छोटे-छोटे से और वो फिर कह रहे हैं वाह वाह बॉस आपने अपने ज्ञान विज्ञान से उसको धो डाला वाह वाह मेरा अकल मेरा अकल ये सब बातें हो रही पता नहीं क्यों भेजी थी यह तस्वीर किसी ने भेजी थी मुझे कल खैर [गला साफ़ करने की आवाज़] आगे चलते हैं। तो दोगलेपन वाली बात तो हमने ले ली जो आपने कहा कि व्यवहार परमार्थ में अलग और उसमें अलग। अब इसमें

01:21:32:19 यहां पर देखिए आठ मिनट और 14व सेकंड पर भरद्वाज जी ने ये भी मान लिया कि परमात्मा व्यवहारिक है। व्यवहारिक कैसे है? परमात्मा आपके हिसाब से इंद्रियों का विषय नहीं है। व्यवहारिक कैसे हुआ? कौन से रूप में व्यवहारिक हुआ? व्यवहार कैसे होता है? योगेश जी कैसे होता है व्यवहार? इंद्रियों से होता है ना व्यवहार? आप तो कह रहे हो 84 पे तात्विक भी व्यवहारिक तत्व की दृष्टि से भी व्यवहारिक है और यहां पर भी व्यवहारिक है तो आपका परमात्मा यदि इंद्रियों का विषय बन नहीं सकता तो वो पूर्णतः अव्यवहारिक है और यदि वो व्यवहार का विषय बन नहीं सकता तो ये वेद का ज्ञान विज्ञान आएगा कैसे सृष्टि होगी कैसे जीवो के शरीर का निर्माण होगा कैसे ये सारी चीजें मांडक उपनिषद में लिखा है ईश्वर अव्यवहारिक है। व्यवहार में ना आ सकने वाला है। फिर वो व्यवहार में ना फिर वो व्यवहार में आ सकने वाला बनता है। उसी को कहा गया सूर्य चंद्रमा इत्यादि के रूप में प्रकट होता है। पर आप जिन धारणाओं से आप जिन कसौटियों पर कसने का प्रयास करते हो और ईश्वर के अवतार की राम कृष्ण के रूप में असिद्धि करने का

01:22:47:20 प्रयास करते हो। उनहीं कसौटियों से यह सूर्य चंद्रमा का निर्माण ईश्वर के द्वारा सिद्धि नहीं होगा। क्योंकि जब ईश्वर सूर्य, चंद्रमा इत्यादि को बनाएगा तो विशेष व्यवहार करेगा। जड़ पदार्थों के साथ विशेष व्यवहार करने के लिए उसे विशेष रूप में प्रकट होना पड़ेगा। आंखों का विषय वाला नहीं विशेष शक्ति के रूप में आना पड़ेगा। अगर वो अपनी अनंत सर्व्यापक शक्ति को ही लगाएगा कहीं भी व्यवहार करेगा तो क्या होगा? तो होगा ये कि कहीं पर कुछ होगा ही नहीं। समझ में आ रहा है? खैर मुझे अच्छा लगा कि इसी तरीके से जो है जिस प्रकार से चीटियों के जगह जो होती है और उनको जो है बाहर निकालने के लिए उसमें दवाई डालो तो चीटियां सारी बाहर आ जाती है। अच्छा रहा कि इसमें थोड़ा बहुत स्पेस छूटा कुछ कहने का आधार छूटा। कुछ मुंगेरी लाल के हसीन सपने देखने का मौका मिला। समाजियों को जो जिस मौके के कारण जो अब तक मुंह छुपा करके घूम रहे थे, पीठ पीछे बातें कर रहे थे। वो लोग भी सामने आकर के बात करने लगे। उनको मौका मिल गया। उनको कुछ खयाली पुलाव बनाने का आधार मिल गया। तो अब तक तो पीठ पीछे बातें हो रही थी। दूर दूर रह के मेरे पास मैं रिकॉर्डिंग होगी तो सुना दूंगा। मेरे

01:24:02:24 पास कुछ दिन पहले एक महीने पहले फोन भी आ चुका है इनके यहां से योगेश भारद्वाज जी के यहां से कि भाई आपको डिस्कशन करना है। हालांकि वो डिबेट कह रहे थे कि आपको डिबेट करते हो। आप सहारनपुर आ सकते हो। मैंने कहा सहारनपुर अभी तो मेरा आना नहीं है। आऊंगा तो फिर देखूंगा। आप ऑनलाइन कर लीजिए तब तक अगर तुरंत करना है निस्तारण तो अगर आप बदतमीजी नहीं करेंगे या जो वैज्ञानिक महोदय आए थे अगर इनका व्यवहार कुशलता नहीं बिगड़ेगी तो निष्कर्ष पर पहुंच जाएंगे ना कि अवतार ले सकता है तो इसलिए अंत में यही करना पड़ेगा इसी तरीके से टू पॉइंट निकालने पड़ेंगे वो छह सात 10 नियम जो बताए मैंने तो

01:24:47:13 अच्छा अच्छा इन्होंने कहा कि इन्होंने ये भी माना कि अवतार नहीं लेता है। उसके साथ साथ मैंने क्या कहा है कि अवतार उतना ही सत्य है जितना कि ये सृष्टि मेरे लिए सत्य है। यह जगत मेरे लिए सत्य है। पारमार्थिक रूप से जगत है ही नहीं। वो फिर विवेचना अलग हो जाती है। फिर वो आपका वो जो मोक्ष इत्यादि वो सब खंडित हो जाता है। आना पड़ेगा भाई अद्वैत की सीमा में। ये सब जो ताना-बाना बुन रखा है ना ये तब तक बुन रखा है जब तक अद्वैतवाद शंकराचार्य का सिद्धांत नास्तिकों का मुंह बंद करा रहा है। शंकराचार्य के द्वारा निर्मित जो सुरक्षा का घेरा है उसके अंदर बैठकर के खूब बातें बना लो। नास्तिकों से सामना होगा। बैठ जाओगे एक तरफ जाकर के। नास्तिकों से सामना होने से मुझे याद आया। योगेश भारद्वाज जी स्वयं अपने एक वीडियो में नास्तिकों का खंडन करते हुए बता रहे हैं कि आपने कुछ बोला वो आवाज मेरे पास सीधी आई सीधी कैसे आ जाएगी भाई घूम के आएगी ना सीधी कैसे आएगी आप तो मौत के कुएं के कुशल ड्राइवर हो मेले में जो लगता है ना मौत का कुआं गोल चलती है मोटरसाइकिल व्यवहार में भी पृथ्वी जो है गोल है तो सीधा ट्रेवल

01:26:02:19 क्यों दिखा रहे हो आप उसमें देखो आप अपना जा के उंगली आपने सीधी दिखाई सीधी नहीं यूं यू दिखाइए सबको ऐसे ही रास्ता बताइएगा व्यक्ति भाग जाएगा वो एक जुदाई पुरानी फिल्म है उसमें एक प्रश्नवाचक था अभिनेता था वो प्रश्न बहुत करता था ऐसा क्यों ऐसा क्यों ऐसा क्यों तो [हंसी] उससे कोई रास्ता पूछ रहा होता है तो जैसे ही उससे रास्ता पूछता है तो वो ऐसा क्यों ऐसा क्यों करने लगता है तब तक दूसरा व्यक्ति आता है वो देखता है ना जैसे प्रश्न पूछने वाले को उसकी आदत थी। प्रश्न पूछता ही चला जाता था। तो वह उल्टा एक्सलरेटर लेकर के भाग जाता है पीछे। तो ऐसे ही जब आप लोगों को रास्ता बताएंगे आर्य समाज मंदिर का जिहादियों के साथ विवाह कराने के लिए ₹5100 लेकर के जैसे ही आप रास्ता बताएंगे आर्य समाज मंदिर का यूं यू व्यक्ति उल्टा भाग जाएगा एक्सलरेटर लेकर रिवर्स गियर सीधे

01:27:04:10 [खांसने की आवाज़][हंसी] अच्छा एक फिर इन्होंने बात कही है आगे आवश्यकता वाली बात इन्होंने भी कही इन्होंने शायद मेरी वो बात सुनी नहीं क्योंकि लेंस लेकर के ढूंढ रहे थे ना कि कहां पर मेरा व्यक्ति जो है सबसे कमजोर सिद्ध हुआ है तो वहीं पर उसका जो ताना वाना खड़ा करना है तो इन्होंने वहां पर भी आवश्यकता की बात कर ली तो आवश्यकता की बात सुन लो भाई वहां पर उसमें भी पूछा है आपके आपके आचार्य श्री को उत्तर देना चाहिए था कि यदि ईश्वर को अवतार लेने की आवश्यकता नहीं है तो वेदों का ज्ञान मंत्रों के रूप में सूक्त के रूप में देने की आवश्यकता भी नहीं है। क्यों दे रहा है? अलंकार लगाने की आवश्यकता भी नहीं है। क्यों लगा रहा है? तो आवश्यकता ना दिखाते हुए आप ईश्वर के अवतार का निषेध नहीं कर सकते। तात्विक विवेचना आप कर नहीं पा रहे हो। एक देसी वाली वो जो सर्व्यापक एक देसी कैसे हो सकता है? अजन्मा अजन्म कैसे ले सकता है? अजन्मा तो आत्मा भी है। वह तो देह धारण कर रही है ना। इसमें कारण कुछ और है। उनका कारण कुछ और है। आने का प्रयोजन कुछ और है। बस इतनी बात है ना। मगर आपके पास

01:28:19:13 ये बाध्यता कैसे है कि वो ले ही नहीं सकता। अच्छा एक जगह आपने कहा कि निर्णय दे रहे हैं। इस पर आपको आपत्ति मैंने उनसे कहा था जब वो ये कह रहे थे कि अद्वैत बुरा है। अद्वैत ही सबसे बुरा है। अद्वैत ही समस्त उसका कारण है सारे उसका ये सब वो निर्णय दे रहे थे। तो मैं क्या करूं? वहां पर जब वो ऐसा निर्णय दे रहे हो तो मैं यह कहने लगूं कि भैया आर्य समाजियों में जिहादियों का विवाह होता है। हिंदू बिटियाओं को विवाह विवाह कराया जा रहा है। हमारी बिटियां वहां जा रही है। ऐसा ऐसा हो रहा है। आर्य समाज में नियोग है और कलयुग में जो है नियोग नहीं है। जबकि आर्य समाज की सत्यार्थ प्रकाश सबसे बुरी और सड़ी हुई किताब है। आर्य समाज की धारणा सबसे सड़ी हुई है। बिल्कुल निचले स्तर की है। मच्छों से भी ज्यादा बुरी है। और इत्यादि इत्यादि बहुत घटिया से घटिया मल के साथ तुलना इत्यादि सब कर दूं उसकी वहीं पर जिससे कि चर्चा आगे बढ़ने की बजाय वही रुक जाए और इसी पर बात होने लगे आपने ये कैसे कहा चर्चा हो रही है अवतारवाद पर अवतार ले नहीं सकता तो क्यों नहीं ले सकता उसका कोई मतलब नहीं है आपको उसकी तात्विक विवेचना देनी होगी कि वह क्यों नहीं ले सकता यह बाध्यता दिखानी होगी और नहीं ले सकने वाली स्थिति में भी

01:29:36:04 आप जो है उसको सर्वशक्तिमान कैसे कहेंगे? अच्छा सर्वशक्तिमान से मुझे याद आया। हां इन्होंने सर्व और सर्वज्ञ पर बात कही थी। तो वहां पर इन्होंने चतुराई क्या की थी? वहां पर इन्होंने सर्वव्यापकता की बात ही नहीं की। भिंगो सर्वज्ञ की बात तो की कि वो इतना ही है। वहां भी कह देते कि नहीं नहीं उनका सर्वज्ञ यही अच्छी-अच्छी जगह पे है ईश्वर। जो जो जगह बुरी है वहां पर ईश्वर नहीं है वहां फस जाते तो सर्व व्यापकता पर बात ही नहीं की है ना

01:30:11:08 निर्णय देने वाली बात पे आ जाते हैं तो पहली बात तो यह है कि आपने कहा कि भाई आपका कुछ निर्णय होगा इसीलिए तो आप कोई पक्ष रख रहे हो हां मेरा निर्णय है। मैंने निर्णय लिया हुआ है पर मैं निर्णय दे नहीं रहा हूं चर्चा के बीच में क्योंकि दूंगा तो विषयांतर होगा। मैं तो यह तक कह सकता हूं चर्चा के बीच में मैंने निर्णय लिया हुआ है कि आज जो आर्य समाजी है या जिसका पिता आर्य समाजी है वो कभी ना कभी आर्य समाजी नहीं था और आर्य समाजी के अनुसार आर्य समाज को आर्य समाज के सिद्धांतों को ग्रहण ना करने वाला अधर्मी है। मूर्ति पूजक अधर्मी है। और उसकी पिछली कुछ पीढ़ियां अधर्मी थी। मूर्ति पूजा करती थी। 90% 99% आर्य समाजी वहीं से आया ना जहां मूर्ति पूजा है फिर आर्य समाजी हो गए 99% वही है तो मेरी जानकारी में मेरा निर्णय तो यह है कि अगर वो अधर्मी थी तो उनका जो विवाह हुआ उनके जो कर्म हुए वो सही तरीके से नहीं हुए विवाह कर्म इत्यादि तो उनके साथ रहने वाली जो मातृशक्तियां है वो कौन हुई उनके पिता की जिनको वो अपना पिता मानते हैं और उनकी फिर संताने कौन हुई ये सारे प्रश्न हो जाएंगे और इस संबंध में मेरे पास अपना निर्णय है

01:31:26:09 भाई जो व्यक्ति आज इस पीढ़ी का आर्य समाजी बन रहा है। यानी कि उससे पहले उसके माता-पिता आर्य समाजी नहीं थे। यानी आर्य समाज के जो सिद्धांत है धर्म और अधर्म के विषय में वो नहीं मानते थे। ज्यादातर मूर्ति पूजक तो मूर्ति पूजक कौन है? अधर्मी। तो उसके द्वारा किए जाने वाले जो कर्म है क्योंकि सभी कर्मों का परवसान मोक्ष में है। धर्म का परवसान क्या है? मोक्ष। महाभारत पढ़िए। धर्म का परवसान मोक्ष में है तो जिन कर्मों का परसान मोक्ष में नहीं है और मूर्ति पूजकों का परसान मोक्ष में नहीं है आज समाज के अनुसार तो उनके द्वारा किए जाने जो धर्म कर्म है वो भी मोक्ष के हेतु नहीं है मोक्ष के हेतु नहीं है तो वो फिर उनका विवाह हुआ ही नहीं विवाह हुआ नहीं तो कौन हुई इनके उनकी माताएं कौन हुई इनके पिता के साथ रहने वाली ये निर्णय है

01:32:15:25 परंतु मैं वहां उस चर्चा के बीच में अपने यह निर्णय इसलिए नहीं सुना रहा हूं कि जो मूल विषय है सर्वशक्तिमान ईश्वर उस पर बात पूरी हो जाए। ऐसा ना हो कि इन गरम गरम बातों पर कि वो मातृ शक्तियां कौन कहलाएंगी जिनके पिता आर्य समाजी नहीं थे। जिन्होंने आर्य समाज में आर्य समाज मंदिरों में विवाह नहीं किया है। आर्य समाज की मान्यता को धारण पूर्वक जिन्होंने विवाह नहीं किया है। उनकी माताएं क्या कहलाएंगी? जो रह रही हैं। और आधे से ज्यादा ऐसे होंगे आर्य समाजी होने के बाद पुनर् विवाह नहीं किया होगा। आर्य समाज मंदिर में जाकर के वर्तमान में भी उनकी जो मातृ शक्तियां वो क्या कहलाएंगी ये सारे तार्किक प्रश्न है ना ये सब निर्णय है और वो संताने क्या कहलाएंगी जो आज आर्य समाजी हो रहे हैं जो ये कह रहे हैं आर्य समाज सही है ये कहते हुए कि आर्य समाज सही है मूर्ति पूजा गलत है अधर्मी है राम लीला देने देखने वाला पापी है तो भाई पापियों के द्वारा जो कर्म इत्यादि हुए हैं वो थोड़ी हम स्वीकार रहे हैं हमारे यहां क्योंकि पापियों के कर्मों का परेशान मोक्ष में नहीं है तो वो धर्म नहीं है तो अधार्मिक रीति से विवाह हुआ वो विवाह विवाह नहीं है। जब विवाह नहीं है तो संताने क्या कहलाएंगी? माताएं क्या कहलाएंगी? मेरे लिए तो बड़ी सम्माननीय है। आपकी भी और आपके पिताजी की। पर आपने ये प्रश्न उठाया है ना कि निर्णय क्यों दे रहे हो? ये निर्णय देता वहां।

01:33:33:08 चलिए अच्छा आगे चलते हैं। निर्णय वाली बात बहुत बढ़िया रही। इन्होंने कहा ईश्वर और जीव में अंतर मान लिया। बिल्कुल भाई व्यवहार में है ना। यही तो खेल है। निशुल्क कक्षाओं में आओगे तब पता चलेगा। व्यवहार में अच्छा चलो ठीक है इसको छोड़ देते हैं। केवल जीवात्माएं हैं ना तो व्यवहारिक अंतर क्यों आ रहा है कि माता है, बहन है, पत्नी है। आप कह रहे हो व्यवहार और परमार्थ में अंतर ही नहीं है। व्यवहार और परमार्थ में अंतर है कि नहीं? परमार्थ में केवल जीवात्मा आर समाजी सिद्धांत के अनुसार परमार्थ में केवल जीवात्मा मात्र है। आप जीव हो दूसरा जीव है। कोई किसी की माता नहीं, कोई किसी की बहन नहीं, कोई किसी की पत्नी नहीं है। व्यवहार में तो है। यही है व्यवहारिक अंतर। यही है व्यवहार और परमार्थ। समझ लो थोड़ा। खैर इतनी गढ़ बातें जो है आर्य समाजियों के साथ करना ठीक नहीं रहता है।

01:34:32:04 कुल मिलाकर के प्रश्न यही था। कुल मिलाकर के प्रश्न यही था योगेश भारद्वाज जी कि जिस प्रकार से जिन कर्मों में जिन पदार्थों के साथ लिप्त होने पर मनुष्य को पाप का दोषी माना जाता है उनहीं पदार्थों के साथ लिप्त होने पर ईश्वर को ईश्वर पर दोष नहीं लगेगा। आप कह रहे हो कि भैया उसको दोष इसलिए लगता है उसके अंतःकरण है। तो हमने कब कहा कि ईश्वर का जो शरीर होता है जब वो अवतार लेता है तो वह सेम वैसा ही शरीर होता है जैसा कि मनुष्य का होता है। केवल देखने में दिख रहा है वैसा केवल वो आंखों का विषय बन रहा है। जब वो सृष्टि बना रहा है तब वो धक्का दे रहा है। चीजों को मूव करा रहा है। वहां पर वो एक देश होकर कार्य कर रहा है। जब वो ओम रश्मि को शक्ति दे रहा है। वहां पर वो ओम रश्मि को ही शक्ति दे रहा है। निश्चित शक्ति दे रहा है। निश्चित कैसे हो रहा है? सर्वव्यापी है तो

01:35:28:28 तो हम प्रश्न हमारा यह था जो आपने कहा ना कि अंतकरण अंतःकरण नहीं होता है। जी ईश्वर के अंतकरण नहीं होता है। जीव के तो जीव के होता है अंतकरण जीव के भी नहीं होता है। मनुष्य बनने पर होता है। तो जीव क्यों समझ रहा है? कि मैं गंदा हो गया। उन्होंने कहा था कि मोटरसाइकिल जिस तरीके से हम चला रहे हैं अगर मोटरसाइकिल गंदी होती है तो मोटरसाइकिल को साफ करते हैं। जीव शरीर साधन है जीव का। इसलिए वो प्रभावित होता है। प्रभावित होता है। मोटरसाइकिल अगर गंदी होगी तो चलाने वाला चालक है। वो ये नहीं सोचता है मैं गंदा हो गया। मोटरसाइकिल गंदी हुई। भले ही वो उसका साधन है। मगर यहां तो जीव सोच रहा है ना मैं गंदा हो गया। यही है व्यवहार और परमात्मा। उसका ये सोचना कि मैं गंदा हो गया। यह व्यवहार है। वास्तविकता में वो गंदा नहीं हुआ है। यह परमार्थ है। यह परमार्थ की दृष्टि मुक्त के पास है। ईश्वर के पास है। और व्यवहार की दृष्टि बद्ध जीवो के पास है। हमारे पास व्यवहार और परमार्थ ही नहीं जान सके। प्रश्नोपनिषद पढ़िए। खूब व्यवहार परमार्थ भरा पड़ा है।

01:36:36:04 [गला साफ़ करने की आवाज़] ईश्वर अपनी माया के द्वारा विभिन्न रूपों में प्रकट होता है। क्या दू मैं प्रमाण? वेद में लिखा है। अब आप कह रहे हो कि भैया जिन कर्मों में या जिन पदार्थों के साथ लिप्त होने पर मनुष्य को पाप लगता है उनहीं कर्मों में लिप्त होने पर उनहीं पदार्थों के साथ लिप्त होने पर ईश्वर को दोष नहीं लगता क्योंकि उसके अंतःकरण नहीं है। तो आपसे किसने कहा है कि जब ईश्वर अवतार ले रहा है तो उसके अंतःकरण है। किसने कहा है वह उसका जो शरीर है वह जीव जैसा है। भाई आप ईश्वर के अवतार का निषेध इसलिए कर रहे हो क्योंकि ईश्वर अवतार लेगा तो वो पाप का भागी बन रहा है। उनहीं कार्यों को जब वो बिना अवतार के कर रहा है उनमें लिप्त है तो उसको दोष नहीं लग रहा क्योंकि उसके अंतकरण नहीं है। मगर रूप ले लेने पर उसका अंतकरण बन गया। किसने कहा भाई? यही तो मेरा पॉइंट है। अवतार लेने ले लेने पर ईश्वर पर दोष लग जाएगा। उनहीं कार्यों से लिप्त होने पर जहां पर बिना अवतार लिए वो लिप्त है तो दोष नहीं लग रहा है। यह कहां का सनातन सिद्धांत है? केवल अभी आंखों का वो विषय हो गया है।

01:37:52:02 अब इनकी पैनी नजर पे भी थोड़ी बात कर लूं। इन्होंने बहुत सारी बातें की जो पैनी नजर पे गाना गाया। हालांकि अभी तक आपको इनकी पैनी नजर समझ में आ गई होगी। पर इनकी पैनी नजर क्या थी कि उनका मॉलिक्यूल पर भागना। ठीक है? सर्व का अर्थ पर बात ही ना करना। अच्छा इन्होंने एक बात और कही है कि सर्व का अर्थ हम लेते हैं। मैं प्रश्न आपसे कर रहा हूं। वीडियो बना के दे दीजिएगा उत्तर। हालांकि हो सकता है हमारी भी चर्चा हो सकती है। उसमें दे दीजिएगा कि भाई सर्व का अर्थ है कि जो अपने अपने ये कर सकता है। ठीक है? सर्व्यापक तो आपने लिया ही नहीं। मगर अब मैं पूछ रहा हूं जो सब कुछ कर सकता है उसको क्या एडजेक्टिव लगाओगे आप? जो अपने कार्य जो उसे करने हैं वह कर सकता है वह हो गया सर्वशक्तिमान। और जो जो मुझे जानना चाहिए वह वह यदि मैं जान रहा हूं तो मैं भी हो गया सर्वज्ञ। हालांकि इसमें भी दोष है इस बात में भी। मगर मैं यह कहता हूं कि जो ये किसी भी बाधा से बाधित ना हो उसको क्या कहेंगे? जो यह भी जान जो उसे नहीं करना है पर वो कर सकता है। जिसमें यह क्षमता भी हो उसको क्या कहेंगे? सर्वशक्तिमान तो आपने ले लिया। क्या कहेंगे? सर्व सर्वशक्तिमान कहेंगे

01:39:07:08 तो एक घोषणा करवा दो आर्य समाजियों का ईश्वर सर्वशक्तिमान है और जो परंपरा प्राप्त आचार्य हैं उनके द्वारा प्रतिपादित होने वाला ईश्वर सर्व परम सर्व परम लगा दो परम से चल जाता है परम सर्वशक्तिमान है ले जाओ कर दो घोषित नहीं सर्व का अर्थ तो हम सीमित लगाएंगे फिर हम यह बताएंगे ही नहीं कि जो सीमाओं से रहे तो उसका क्या होगा ऐसे ही सर्वज्ञ में कर देना परम सर्वज्ञ है कर दो घोषणा पर नहीं

01:39:43:03 उनके जब तर्क नष्ट हो रहे हैं वो कह रहे हैं प्रमाण दो प्रमाण दो वो शुरू में ही कह रहे हैं आपको ज्ञान नहीं है व्यक्तिगत हो रहे हैं शर्तों का उल्लंघन कर रहे हैं शर्त बताता हूं क्या शर्तें थी क्या शर्तें थी वो बता देता हूं आपको ठीक है आपने कहा ना वो भाग गए आप तो 1 घंटे 22 मिनट में ही भाग गए ये वो शर्त क्या आती है वो पढ़ लो। सत्य के पक्षधर बनिए सत्य के पक्षधर। [गला साफ़ करने की आवाज़] पहले तो इन्होंने बहुत व्यक्तिगत कटाक्ष पूर्वक शर्तें भेजी थी। फिर मैंने इनको अच्छा सा व्यक्तिगत कटाक्ष पूर्वक उत्तर दिया था WhatsApp में ही तो सुधर गए वही वही सुधर गए थे। फिर उन्होंने उसको मिटाया, डिलीट किया और फिर नया शर्तों का एक व्यक्तिगत कटाक्ष हटाते हुए और फिर शर्तें भेजी थी। उसमें पहली शर्त है चर्चा का उद्देश्य सत्य का ग्रहण तथा असत्य का त्याग होगा। व्यर्थ का विवाद करना नहीं होगा। अद्वैतवाद बुरा है। यह बात आप क्यों बोल रहे हो? जब बात हो रही है अवतार की।

01:40:58:24 हमारा वहां पर माया प्रपंच इत्यादि कहना केवल इसमें निहित है कि यदि आपके पास कुछ कारण है किनहीं कारणों से ऐसा हो सकता है कि बुरे कर्मों में लिप्त हुए भी लिप्त होते हुए भी ईश्वर को दोषी ना माना जाए। उसी तरीके से यह भी हो सकता है अवतार लेने पर भी बुरे कार्यों में लिप्त होने पर भी या बुरे पदार्थों के संपर्क में आने पर भी कुछ ऐसा हो सकता है जिसके कारण ईश्वर पर दोष ना आए। तो फिर आप अवतार का निषेध कैसे कर सकते हैं इस बात से केवल यह बताना था माया प्रपंच इत्यादि शब्दों का उपयोग करना फिर भी आवश्यकता पड़ने पर हमने वहां पर दृष्टांत दिया उन दृष्टांतों का खंडन या विरोध करने का कटाक्ष पूर्वक आपने प्रयास किया उनका भी प्रति उत्तर यहां दे दिया है ठीक है जो आपने पृथ्वी गोल चपटी में किया है ना मौत के कुए मौत के कुएं वाली मोटरसाइकिल चलाकर वो सब दे दिया है दूसरा है कोई भी पक्ष पक्ष विषय से बाहर की चर्चा नहीं करेगा। हां, विषय से संबंधित उप विषयों पर आवश्यकता अनुसार चर्चा की जा सकेगी। तो कोई भी पक्ष विषय से बाहर की चर्चा नहीं करेगा। अब मैं पूछ रहा हूं कि नाली के साथ लिप्त होने पर ईश्वर को दोष नहीं लगता है ना। यानी कि जिन कर्मों में जिन स्थानों

01:42:14:02 में लिप्त होने पर मनुष्य को दोष लगता है। उनहीं स्थानों में लिप्त होने पर निराकार ईश्वर को दोष नहीं लगता है ना। तो फिर उनहीं कर्मों में उनहीं स्थानों में लिप्त होने पर अवतार को दोष क्यों लगेगा? मैं पूछ ही रहा हूं। वो बता रहे हैं कि नाली बनी किन-किन चीजों से है? इसका क्या आवश्यकता थी? विषय से बाहर जाने की जिससे कि उनका पक्ष मजबूत दिखाई दे लोगों को कि वैज्ञानिक दृष्टि रखते हैं। यही बस बात है और कुछ नहीं है। मॉलिक्यूल्स वाली बात बताने की और उसी पर आपने जोर दिया। यहां फंस रहे थे वो। मैंने कहा ना आपने उनहीं उनहीं जगह पर उनकी रक्षा की है जिन जिन जगहों पर वो फेल होते हुए आपको दिखाई दिए। खैर आगे चलते हैं। [खांसने की आवाज़] विषय से बाहर की चर्चा हमें सिद्ध ये करना है कि ईश्वर अवतार ले सकता है कि नहीं ले सकता है। फिर आप पहुंचे कहां कि ईश्वर अवतार इसलिए नहीं ले सकता क्योंकि शायण के भाष्य में पशु बलि है। जो ना हमने उनकी परंपरा से जाना ना देखा ना समझा। के भाष्य में पशु बल है इसलिए अवतार नहीं ले सकता है। इसीलिए तो इसको विषय से भागना नहीं कहा जाएगा। शिव मोहिनी का प्रकरण ले आओ

01:43:29:15 और तमाम सारी बातें करो। ये भी कह दो तुम्हारे उसमें पाप लिखा हुआ है। ये सब विषय से हटने की बातें नहीं है आपके अनुसार। तो फिर विषय से हटने की बातें होती कौन सी है? जब भी बात होगी तो दुनिया भर की हर एक बात पर ही बात होगी। इस हिसाब से तो सत्यार्थ प्रकाश में जो जो कुतर्क किए हैं सब पर बात होगी [गला साफ़ करने की आवाज़] क्योंकि जब तक एक-एक पक्ष सही नहीं हो जाएगा अगर यह पक्ष भी खत्म हो जाता तो भैया आप लोग हिंदू शब्द का उपयोग करते हो इसलिए जो है ईश्वर अवतार नहीं ले सकता आप लोग स्त्रियों का जनेऊ नहीं होने दे सकते हो देते हो स्त्रियों का जनेऊ नहीं करवाते हो उनको जो है नाम जप करवाते हो भक्ति करवाते इसलिए जो है आप ईश्वर अवतार नहीं ले सकता है। ये है ईश्वर अवतार विषय पर चर्चा करते समय जितनी बातें हो सकती है सारी बातें करी जाएंगी और एक भी बात नहीं हुई तो अधूरी हो गई चर्चा निष्कर्ष निकलेगा ही नहीं तो मुझे बता देना विषयों से भागना किसे कहते हैं

01:44:38:02 अच्छा दोनों वक्ता शांत एवं शिष्ट भाषा का ही प्रयोग करेंगे क्रोध कटुता अवता अथवा अशिष्ट व्यवहार नहीं करेंगे स्वीकार नहीं होगा। यह भी एक चर्चा थी। यह भी एक शर्त थी। आप कुतर्क कर रहे हो। अद्वैतवाद बुरा है। आपको ज्ञान नहीं है। आपने पढ़ा नहीं है। सब किसने चालू किया? व्यक्तिगत कटाक्ष किसने चालू किए? यह सब आपको दिखाई नहीं दिया होगा। इसी में हमने एक चर्चा और लिखी थी कि भैया तर्क यदि आपके पास नहीं होगा तो आपके आपको जो है यह घोषित करना होगा। तर्क नहीं है। उन्होंने घोषित किया तर्क से प्रमाण में जाने पर घोषित ही नहीं कर रहे हैं। वो तो उसमें अपनी व्यक्तिगत कटाक्ष ला के लीपापोती करके और किसी तरीके से गरमागरम मामला करना चाहते हैं। जिसके कारण ये चर्चा जो है स्थगित हो जाए। वही हुआ।

01:45:35:01 आगे देखते हैं। तो यदि कोई हम अच्छा इसमें एक शर्त हमने भी बढ़ाई थी जिसको कि फिर उन्होंने आगे स्वीकार किया था। वो चर्चा क्या थी? जब एक पक्ष अपनी बात रख रहा हो तो दूसरा पक्ष धैर्य पूर्वक सुनेगा। ये ये शर्त इनकी भी थी। ठीक है? इनकी हमारी सेम है। ये वाली। तो जब वो कह रहे हैं कि भाई शायण आचार्य और गडपाद जी और व्यास जी के बीच के बीच में गैप क्यों है और मैं बताने चल रहा हूं तो फिर बीच में कह रहा है इसको छोड़ो आप तो शायन आचार्य के मंत्र का अर्थ बताओ लो ये क्या है कौन कर रहा है उल्लंघन ये कर रहे हैं विषयंतर कर रहे हैं इनको जहां पे लग रहा है कि ये जवाब दे देगा वहां विषयंतर कर रहे हैं ये बार-बार कुरान और मोहम्मद की बात ला रहे हैं कुरान और मोहम्मद पर पहचान कैसे होगी इन्होंने प्रश्न किया था पहचानेंगे कैसे दुनिया में तमाम ध्वनिया ये वैदिक रश्मि थ्योरी में ध्वनि है ना तमाम ध्वनिया ईश्वर से ही आ रही है तो सारी ध्वनिया ईश्वर मान ली जाए ईश्वर का प्रतीकात्मक नाम मान लिया जाए सारे शब्द जितने भी ईश्वर के ही है तो सबको क्यों नहीं माना प्रणव को ही क्यों माना शास्त्र ने लिखा है तो जिस प्रकार पानी सर्वत्र

01:46:50:16 व्याप्त होते हुए भी हमारी प्यास पानी का वही स्वरूप बुझा सकता है जो हमारे व्यवहार की सीमा है पात्र के उसी प्रकार ईश्वर सर्वत्र व्याप्त होते हुए भी सब कुछ में ईश्वर होते हुए सब कुछ ईश्वर होते हुए भी ईश्वर का वही रूप व्यवहार में हमारी प्यास बुझा सकता है मोक्ष की जो हमारे शास्त्र की सीमा में आए। शास्त्र से पहचानेंगे कौन अवतार है कौन नहीं है। आई बात समझ में? [गला साफ़ करने की आवाज़] तो इन्होंने कई बार ऐसा किया जहां पर जो है मैं कुछ बताने जा रहा हूं। उन्होंने खट से दूसरी बात करके वो मुझे बताने ही नहीं दिया। वो मेरा चीजें रह ही गई। वो गॉड पादाचार्य जी वाला जो गैप में भरने वाला था। सुन लीजिए अब यहां बता देता हूं। गड पादाचार्य जी के जो गुरु है वो है सुखदेव जी। सुखदेव जी कौन थे? जिन्हें महाभारत काल में जिनका मोक्ष हो गया था। महाभारत के अनुसार। अब इनका कहना है कि भाई उनका तो मोक्ष हो गया था। आर्य समाजियों के अनुसार ही मुक्त जीव दोबारा आते हैं। हालांकि 36 लाख वर्ष बाद आते हैं। आते तो है ना। योगेश भारद्वाज जी के अनुसार कई गैलेक्सी है, कई ब्रह्मांड है।

01:48:03:25 तो क्या मुक्त सुखदेव जी वहां से यहां नहीं आ सकते? सीधे तात्विक बाधा तो नहीं हो रही है। शब्द प्रमाण आपको परंपरा प्राप्त मानना नहीं है। जो तात्विक विवेचना है वो बाधा तो नहीं हो रही ना। आपके अनुसार योगेश भारद्वाज जी का ही मैंने वीडियो देखा जिसमें वो कई ब्रह्मांडों की बात कर रहे हैं जिसमें वो यह बता रहे हैं कि स्वर्ग का मतलब क्या होता है कि यदि कोई कलयुग का व्यक्ति इस समय कहीं पर जहां जिस सृष्टि में सतयुग चल रहा होगा वहां पहुंच जाएगा तो उसके लिए वो स्वर्ग है स्वर्ग में पहुंच जाएगा। ये होता है स्वर्ग का मतलब ये योगेश भारद्वाज जी ने बताया। तो इस प्रकार से सुखदेव जी नहीं आ सकते हैं। मंत्र देने ज्ञान देने दूसरी सृष्टि से स्वर्ग से और मुक्त मुक्त जीव वापस आता है। चलिए हमारा ही है। जो सारूप मोक्ष होता है उसमें टाइम ट्रेवल और ये लोकरंतर का ट्रेवल कर सकता है। इस प्रकार से भी सुखदेव जी का आना सिद्ध हो गया। और अगर कैवल्य मान लोगे तो फिर ईश्वर ही जीव जगत जगदीश्वर के रूप में प्रकट हो रहे हैं। फिर तो उनके आने में कोई बाध्यता ही नहीं है। तो आपके सिद्धांतों के अनुसार भी सुखदेव जी आकर के मंत्र

01:49:18:26 दे रहे हैं। दे सकते हैं। हमारे जो द्वैत के सिद्धांत है परंपरा प्राप्त उनके अनुसार भी सुखदेव जी मोक्ष का मंत्र दे सकते हैं। ज्ञान विज्ञान दे सकते हैं। अपने शिष्य को शिष्य के रूप में ग पादाचार्य को और कैवल्य के अनुसार अद्वैत के अनुसार भी दे सकते हैं। और यह बात मैंने ही नहीं मानी है। यह बात भी माधवाचार्य शास्त्री जी ने विशिष्टा द्वैत परंपरा के हैं। रामानुजाचार्य परंपरा उन्होंने इस बात का निराकरण प्रस्तुत किया है। ठीक है? पुराण दिग दर्शन में तो यह वाली चीज पढ़ लेना। खैर तो जब जब मैं ऐसे आवश्यक उत्तर देने वाला था तबतबत आपके जो तथाकथित वैज्ञानिक जी हैं वो विषयंतर कर गए और आप कह रहे हो कि जो है हमने वो चर्चा से पलायन कर लिया। स्पष्ट रूप से था। जैसे ही कोई व्यक्तिगत कटाक्ष माना करेगा और अह जो है इस अनुशासन का पालन करने में असफल सिद्ध होगा वैसे ही चर्चा को निष्फल मान लिया जाएगा। हम क्या करें उस बूढ़े व्यक्ति से तू तू मैंम करें वहां जब वो व्यक्तिगत कटाक्ष पे आ रहा है। बार-बार सीने पे हाथ रख रहा है। पानी पी रहा है।

01:50:34:21 क्या करें वहां? हम भी तुम्हारी तुम्हारे जैसे हो जाए। हमें सिखाया नहीं गया ना भाई यही बात है बस जब चर्चा की शर्त है कि नहीं रुकना है निष्फल मान लिया जाएगा उस चर्चा को तुरंत तो क्यों कर रहे हो व्यक्तिगत कटाक्ष क्योंकि तुम्हारे पास उत्तर नहीं है और आप ऐसे लोगों का पक्ष ले रहे हो आ के तो आपने ये सब नहीं देखा शर्त क्या थी उन्होंने विषयंतर किया कि नहीं उन्होंने व्यक्तिगत कटाक्ष किया कि नहीं कौन-कौन से प्रश्नों के उत्तर दे ही नहीं पाए आपने आपने जो उत्तर दिए वो उत्तर तक नहीं रख पाए वहां पर। ऐसा भी नहीं कह सकते कि उनको बोलने का मौका नहीं दिया जा रहा था। अच्छा ये तक कह दिया कि परंपरा मत पूछो। ये मत पूछो कि वेद कहां से आया? भाई ये तो पूछा जाएगा ना। मैंने तो यहां तक कह दिया कि शय आचार्य यदि प्रमाणिक नहीं है तो तुम्हारे पास वेद कहां से आया? वो बताओ ना। मैं हो जाता हूं। बिहार समाज जी। बताओ मुझे वेद के विषय में प्रमाणिकता बताओ। तो वो कह रहे हैं मेरी प्रमाणिकता। मेरी प्रमाणिकता के भाष्य में पशु बलि ये मेरी प्रमाणिकता है। अच्छा मान लिया पशु बलि गलत है। तो क्या किसी तोता चोर से तोता चोर की बातों को प्रमाण मान लोगे आप मानते होगे। आपके

01:51:49:25 यहां माना जाता है ये मैं जानता हूं। आपके यहां मान लिया जाता है। चीनी चोर तोता चोर सबको प्रमाण मान लिया जाएगा। क्योंकि श के भाष्य में पशु बल है या फिर कोई सिद्धांत है किसी को प्रमाण मानने का तो बता देना कभी हो सके तो दे नहीं पाया आज तक कोई आर्य समाज इन बातों का जवाब अभी भी खांसी आ रही है वीडियो बना लेना इस पर खांस रहा था तो व्यक्ति बार-बार विषयांतर कर रहा है कुतर्की कह रहा है व्यक्तिगत कटाक्ष कह रहा है निरुत्तर हो रहा है प्रश्न प्रश्न करने से ही मना कर दे रहा है। ये मत पूछो इस बात को तय कौन कर रहा है चर्चा के बीच में? ये मत पूछो। कौन कर रहा है तय? क्यों ना पूछा जाए? भाई आप जो है वेद के संबंध में अपने आप को प्रमाणिक कह रहे हो तो प्रमाणिकता बताओ ना क्या है? अथातो धर्म जिज्ञासा ये मत पूछो। अगर ये मत पूछो वाली बात कह दी जाए तो पूरी सत्यार्थ प्रकाश में यही सारी बातों को हम मना कर दें। ये मत पूछो। बस जो कहा जा रहा है मान लो मंत्र के विषय में तो हम आपके प्रमाण है ही चाहे जर्मनी से ले आओ कहीं से भी ले आओ प्रमाणित तो यही से कराना पड़ेगा परंपरा प्राप्त से तो ये सब चीजें थी जिसके कारण चर्चा

01:53:05:06 को स्थगित किया गया और पर्याप्त रूप से वहां पर आर्य समाजी सिद्धांतों की धुलाई हुई और आज यहां पर सारे जो है एक हो रहे हैं अच्छे अच्छा है आप लोग बाहर आ रहे हो इंटरेक्शन और सीधी सी बात है ना भाई आपके यहां से दो महीने पहले फोन आया था कि आप सहारनपुर आ रहे कि नहीं उसके बाद मैंने कहा कि ठीक है आप जो है ऑनलाइन का देख के पता करो नहीं तो अगर होगा तो देखा जाएगा सहारनपुर भी आएंगे तो क्यों नहीं क्या अभी तक धानस नहीं बटोर पाए मोहित गौर ने मुझे पुकारा मैं नहीं गया आपको मैंने पुकारा आप क्यों नहीं आ रहे यानी कि कुछ वजह हो सकती है ना जाने की वो बात और है कि आपने खुद मुझे अपनी तरफ से फोन भी करवा लिया पता करवा लिया कि भाई क्या है क्या नहीं है और उसके बाद भी आप जो है संपर्क नहीं कर पा रहे हो यहां वहां मेरे बारे में बातें भी कर रहे हो बयानबाजी भी कर रहे हो पीठ पीछे मगर इतना साहस एकत्र नहीं हो पा रहा है कि शिवश नारायण द्विवेदी को कह दे या तो ऑनलाइन चर्चा कर लो शर्तों के साथ और या फिर यहां आ जाओ सहारनपुर किसी बीच के स्थान पर बैठकर के चर्चा हो जाएगी साहस नहीं है क्या वैसे तो स्वयंभू बने फिर रहे हैं आप ये अच्छा नहीं लगा साहस दिखाइए सीधी सी बात है किसी भी प्रकार के वैचारिक मतभेद के निमित्त सुन ले पूरा आर्य

01:54:20:09 समाज जितने लोग हैं बनाने ठीक है जितने लोग हैं आर समाज को मानने वाले किसी भी प्रकार के वैचारिक मतभेद के निमित्त अगर आपको कुछ हमारे चीजों से विरोध है यदि आपको लगता है कि आप सत्य के पक्षधर हैं तो और बचपन में माता जी ने निष्ठा पूर्वक दूध पिलाया है तो प्रत्यक्ष वार्ता करने का साहस प्रकट करो प्रत्यक्ष यू बयान बाजी मुंह छुपा के पीठ पीछे बातें करना बंद करो ठीक है जिसको भी लग रहा है कि उस उस चर्चा चर्चा में उनका पक्ष भारी रहा था। अरे उनको फॉलो करने वाले लोग जो दो महीने पहले मुझसे कह रहे थे अग्निव्रत जी से चर्चा कर लो। वो तक तो कह रहे हैं कि अग्निव्रत जी इसमें जो है बहुत ढीले दिखाई दिए। अरे वो बल वाली बात आ ही नहीं पाई। उससे पहले व्यक्तिगत कटाक्षों पर उतर आए। तो आ जाना जिसजिस ने अपनी मां का दूध पिया हो। बात कर लेना मुझसे। या जिसकी भी माता जी ने निष्ठा पूर्वक दूध पिलाया हो और वह जो है ये अवतार का निषेध सिद्ध कर सकता हो आ जाना कर लेना आमने सामने से और भरद्वाज जी आपके लिए तो वो वाली छूट भी है। आप सहारनपुर में अगर व्यवस्थित करेंगे तो वहां पर भी कोई

01:55:35:10 अच्छा सा स्थान देख के कर लिया जाएगा। ठीक है? अब आप करिए तैयारी। ठीक है। तो अब जो है जो लोग जुड़ सकते हैं कुछ 101 मिनट कुछ बातें कर लेंगे। उसके बाद जो है चर्चा को समाप्त करेंगे। वैचारिक मतभेद के निमित्त चर्चा नहीं करनी है।

01:56:21:02 [गला साफ़ करने की आवाज़] दुनिया तो देख रही है एक अकेले शिवश जी कितने समाजियों पर भारी कर अच्छा यह मैं देख रहा हूं कि इन लोगों को वीडियो बनाने भी इसीलिए पड़ रहे हैं। इन लोगों को वीडियो इसीलिए बनाने पड़ रहे हैं कि किस तरीके से वह जो मिट्टी पली हुई है उस पर लीपापोती की जाए। है ना? राम मनोहर जी आप जुड़ सकते हैं। अच्छा यहां पर लिंक दे दीजिए आप। शास्त्रवाद जी, सनातन शंकर जी और कुछ लोग हैं जो जुड़ सकते हैं।

01:57:02:26 विशाल जी क्या कह रहे हैं? विभूति जी का कहना है कोई नहीं है टक्कर में। क्यों पड़े हो चक्कर में? हां, यह मेरा व्यक्तिगत परामर्श है सभी को कि मत पड़ो चक्कर में। कोई है नहीं टक्कर में। यह लिंक दे दिया गया है। कोई अगर जुड़ना चाहता है तो जुड़ सकता है। [खांसने की आवाज़] [गला साफ़ करने की आवाज़] विज्ञान दर्शन यानी कि मोहित गड। उसने जब वह एक ऐसी चीज की थी जो उपयुक्त नहीं थी व्यवहार व्यवहारिक चीज नहीं थी। अव्यवहारिक चीज से जुड़ा था वो तो हमने उसका निषेध किया था। मगर अभी जब आर्य समाज के द्वारा प्रतिनिधि सभा के द्वारा आमंत्रण पत्र आया था उसका जब जवाब लिखा था उसमें बता दिया था कि अब वह वीडियो जो था जिससे मोहित गड जुड़े थे वो डिलीट हो चुका है तो मोहित गड के साथ चर्चा हो सकती है। यदि मोहित गड के द्वारा संपर्क किया जाएगा तो जरूर उससे अवतार विषय पर चर्चा हो जाएगी। हालांकि आप इन विषयों पर बात ज्यादा आपको मोहित गड से चर्चा बहुत आवश्यक नहीं है क्योंकि वो तो स्वयं को आर्य समाजी मानते नहीं है। फिर भी वो अगर संपर्क करता है मोहित गड अगर हमसे करते हैं तो चर्चा जरूर हो जाएगी क्योंकि ऐसा मुझे संदेश प्राप्त हुआ था कि उस चर्चा

01:58:18:02 से जिसमें व्यक्तिगत चीजों पर हास्य किया गया था हमारे ऊपर उन बातों को लेकर वो क्षमा प्रार्थी भी हैं। क्षमा मांगने के लिए भी तैयार है और अब वो वीडियो भी हट चुका है। दोनों ही कारण है जिसके कारण उनके साथ चर्चा की जा सकती है। तो इसीलिए मोहित गौ से चर्चा जी राम मनोहर जय श्री राम हटा दीजिए जय श्री राम जी राम मनोहर जी जय श्री राम जय श्री राम [गला साफ़ करने की आवाज़] आवाज जा रही है मेरी जी बोल राम मनोहर जी जी जय श्री राम शिवश भैया मैंने ये लगा आपको नहीं आ रही है शायद

01:59:00:28 हेलो एक एक मिनट जी बोले जी जी जय श्री राम बोले राम मनोज हेलो आवाज आपको नहीं जा रही है शिवश भैया हां आ रही है हेलो जी जय श्री राम शिवश भैया आ रही है। बोलिए। जी जी मैं वही कह रहा था कि आज आपने बहुत ही अच्छा किया। जी। अरे पता नहीं आवाज क्यों नहीं आ रही।

01:59:43:10 प्रवीण कुमार जी जी जय श्री राम। प्रवीण कुमार जी। जय श्री राम। जय जगन्नाथ। आपको बहुत-बहुत धन्यवाद। आपने तुरंत इसका जवाब देने इसको बंद कर आपने तुरंत दवा देने के लिए आज वीडियो प्रस्तुत किया अच्छा हुआ और आपने बोला कि जिसने अपना माता का दूध निष्ठा पूर्वक पिया है आ जाइए हम तो चाहते भरदा जी आए उन्होंने बहुत हिम्मत दिखाया और उनका उनको कुछ चीज दिखाई नहीं दिया जो उनका पक्ष में था शुरू शुरू से आपको शिवाशु द्विवेदी या द्विवेदी क्या है आपका नाम उनको भी डाउट है क्लियर नहीं हो पा रहा है आपका नाम को लेकर हम आवाज जा रही है मेरी आपके पास जी आ रही है आ रही है एक एक जी जय श्री राम जरा प्रवीण जी अपनी बात को पूरा कर ले बिल्कुल मेरी आवाज नहीं आ रही फिर कह रहे हैं कि आपको क्वार्क एटम आदि साइंटिफिक वर्ड्स को आप समझ नहीं पाएंगे कैसे बोल दिया अग्निवर्त जी ने आप क्या कर ले आप साइंटिस्ट हो हमको पता है अग्निवर्त जी कितना बड़ा साइंटिस्ट है पूर्व जन्म में शायद अभी गए थे लेन बन के वो चंद्रमा पुष् में इस जन्म

02:00:58:16 में साइंटिस्ट बन गया नासा का कोई बात नहीं हम यही चाहते हैं कि भरतदास जी आए और सामना सामने हो जाए एक बार बढ़िया रहेगा क्योंकि उनका फॉलोवर्स Facebook वगैरह में जो कमेंट छोड़ रहे हैं कि शिवास जी माने भाग गए डिबेट छोड़ के भाग गए उधर क्या शेष रह गया जो रहना था वक करना था वो खुद पानी पी रहे थे थे एक बूढ़े व्यक्ति के साथ मुंह चोरी करनी थी वहां पर और कुछ नहीं था वहां अगर वो तू पे आते तो मैं भी उनको तूग बोलूं और अगर चर्चा छोड़ दो तो भाग गए। भरद्वाज जी कह रहे हैं कि वो कांप रहे थे। कांप रहे थे। उनको दिखाई दिया कम से कम ये चीज ऐसा हुआ कंपना ऐसेसे बार-बार उनका हाथ हो रहा है। पानी पी रहे हैं। हां जी सर

02:01:48:21 जी जी जय श्री राम सभी लोगों को जय श्री राम। शिवश भैया जय श्री राम। जय श्री राम जी राम जी जी बहुत ही आपने बहुत ही अच्छा कार्य किया आपने आज ये स्ट्रीम रखी है विवेचना वाली जो स्ट्रीम रही है बहुत अच्छा ही रहा वो तो खैर जो आर्य समाज का एक नियम भी है ना कि सत्य को ग्रहण करना और सत्य का परित्याग कर देना तो अगर आंशिक रूप से भी अगर कोई देखेगा उस डिबेट को तो उनको समझ में आएगा कि एक्चुअल सत्य क्या है और जो असत्य क्या है उसके हिसाब से ये लोग जो है ना वो कहते नहीं है कि अगर किसी व्यक्ति का अगर पट का जीप अगर खुल जाता है तो फिर शर्ट को जो है बाहर निकाल लेता है ताकि जीप खुली हुई नजर ना आए लोगों को है ना तो [हंसी] जो लोग अंदर की शर्ट को बाहर निकालने के लिए शर्ट ही बाहर निकल निकल के लोग आ रहे हैं अभी अभी और लोग आएंगे अभी और लोग आएंगे है ना एक और दूसरे ऋषि जो है उनके भी तो WhatsApp पे आए सॉरी YouTube पे आए ही थे कि सिवान जी कैसे हैं और क्या बोलते हैं वो तो सबको पता है और क्या

02:03:03:22 बालक बुद्धि और क्या नहीं है तो ये वही वही जो जिनके जीभ टूट गए ना लघु शंका के समय में तो ज्यादा है तो भाई वो फिर कैसे 18वा सिद्धांत है [हंसी] शिवश ईश्वर अवतार इसलिए नहीं ले सकता क्योंकि शिवश बालक बुद्धि है बाबा भाई वही मैं YouTube वाला था वही तो मैं कह रहा था आपको एक दूसरे जो महर्षि दयानंद को तो महर्षि पता नहीं कैसे बना दिए लोगों ने एक दूसरे भी नए ऋषि नहीं हुए हैं जिनके बारे में आपने कई बार ऑलरेडी चर्चा भी हम लोगों ने की है तो उन ऋषि ने आपको बालक कहा है तो भाई हम तो देख रहे हैं कि सुंश भैया के दांत तो इनके

02:03:50:24 लेकिन कई जो बड़े बुजुर्ग दांत लेकर के लंबे लंबे जो आए ना उनके भी दांत उखड़ते हुए नजर आ रहे हैं। कोई पानी पी रहा है, कोई हृदय पे हाथ रख रहा है। कोई कोई जो है सलामी देने के लिए जीभ टूट गया तो शर्ट निकल निकल के बाहर आ रहे हैं। ये तो दुनिया देख रही है इन चीजों को। जो व्यक्ति ईश्वर को सर्वशक्तिमान सिद्ध नहीं कर सकता। अपने सिद्धांतों से वो क्या कर सकता है? थू है ऐसे ईश्वर को जो सर्वशक्तिमान भी नहीं हो सकता। उसमें भी उसमें भी बाधा आ रही है उस ईश्वर को। ऐसे कार्य करने की परिभाषा है वो जरूर उस पर विचार हो सकता है मगर ये थूकने जैसा शब्द का उपयोग ठीक नहीं है भाई मतलब हम हम जैसे अज्ञानी व्यक्ति के लिए हम जैसे अज्ञानी व्यक्ति के लिए हम तो वही मानेंगे ना हमारी मर्यादा मैं इसके लिए क्षमा मैं मैं अपने वाणी को मैं अपने वाणी को वापस लेता हूं क्षमा चाहता हूं मैं भाव हो के बोल गया ऐसा नहीं बोलना चाहिए मैं अपने वाणी के लिए क्षमा प्रार्थी हूं। लेकिन मैं यही कहना चाहूंगा कि हम जैसे जो कम पढ़े लिखे उनकी नजर में कम जानते हैं। उनके लिए तो ईश्वर का मतलब ही है जो सर्वशक्तिमान हो। जो सार्वभौमिक

02:05:06:02 हो जोकालिक हो जिसका नियम निकृष्ट जैसे वो कह रहे थे ना कि ईश्वर को पापी बनाया है तो हम हमारा ये कहना आपने बड़ा ही निकृष्ट क्वालिटी का ईश्वर बना रखा है। अपनी किताबों उसपे चिंतन होना चाहिए। [गला साफ़ करने की आवाज़] जी सत्यम जी जय श्री राम स्वागत है आपका जय श्री राम जी तो सत्यम जी आवाज नहीं आ रही है आपकी अब आ रही है आवाज हां अब आ रही है हां तो जब से वो लाइव चर्चा हुई है तब से समीक्षा की बाढ़ आ चुकी है हर जगह से अच्छी बात है समीक्षा की जरूरत उसे ही पड़ती है जो अपनी हार छुपाना चाहता है। नहीं ठीक है टाइम पास हो गया होगा सोचा होगा चलो इसी

02:06:00:04 इसी प्रकार से थोड़ा सा अपना वो कर लेते हैं इनका काम हो जाएगा अग्निवत जी जो वहां पर रायता फैला के आए हैं उसको बटोर लिया जाएगा और हमारे पास कुछ कामधाम है नहीं तो थोड़ा किसी काम में हमारा संलग्नता हो जाएगी कुछ कर्तव्य का निर्वाह हो जाएगा समाज के प्रति बिल्कुल बिल्कुल मतलब इतनी समीक्षा करनी पड़ रही है पूरा उनके उनके पूरी लाइफ को कि हम जीत गए इसके लिए किस किस को समीक्षा करनी पड़ रही है इससे समझ आ रहा है कि ये हिल चुके हैं अंदर से बिल्कुल और अग्निव्रत जी तो शुरू से ही ऐसे रहे हैं कि वो अपना पक्ष सिद्ध करने के लिए खुद की चीजें ही नहीं पढ़ते कभी जैसे मैंने आपको एक बार बताया था ये कह रहे थे कि विवेकानंद जी ने तो कहा है कि विदेश की स्त्रियां बहुत सुंदर है। बहुत गुणवती है। अरे दयानंद जी ने भी कहा है यही बात वो नहीं। [हंसी] दयानंद जी ने अपने जीवनी में लिखा है कि विद्यावती है अंग्रेजों की स्त्रियां तो। अब मैं नहीं ये कौन सी विद्यावती है अंग्रेजों की स्त्री जो भारत की स्त्री नहीं है। अच्छा आप उसमें उसमें एक चीज पे ध्यान देना। ये लोग इसलिए आ रहे हैं अग्निवत जी को कवर अप करने के लिए क्योंकि अग्निव्रत जी इस समय जो है आर्य समाज

02:07:15:15 की ओर से हैं। उसी चर्चा में अग्निवत जी से जब मैं दयानंद जी के संबंध में बात कर रहा हूं वो तुरंत छोड़ रहे हैं। मैं मैं कहां ले रहा हूं दयानंद जी का नाम? मतलब उनका स्वतंत्र है। वो दयानंद जी से संबंध नहीं है। वो स्वतंत्र रूप से अपने को प्रस्तुत कर रहे हैं। वैज्ञानिकता खंडित हो रही है ना भैया। समझिए बात को आपके साल पहले साल पहले मेरे बारे में कह रहे हैं योगेश जी ने क्या स्लिप ऑफ टन किया है जी जी अग्निवर्त जी को कुछ साल पहले ऑफर मिल रहा था महर्षि होने का अच्छा महर्षि आया था दयानंद जी के बाद सेकंड होने वाले थे लेकिन इनको थोड़ा शर्म लगा तो हुए नहीं मना कर रहे थे इनका उनसे वाले लगा रखा है सत्यम जी आप अपनी बात अगर कुछ रह गई तो पूरा कर ले फिर हम धीरज जी है शायद उनको सुन ले वो जितने अभी चाहे वो एक जो थे ना जो कह रहे थे कि खांस रहे हैं आप खास रहे हैं तो एक वो कुछ जो समीक्षा कर रहे हैं वो कह रहे शास्त्रों [हंसी] से भाग गए डिबेट

02:08:30:24 से भाग गए तो मैं इतना कहना चाह चाहूंगा। आपको यही नहीं पता कि यह चर्चा है। आप उसको शास्त्रार्थ कह रहे हो। घर पर अगर छोटी सी भैंस हो जाती होगी तो ये शास्त्र कर लेते होंगे अपने माता पिता से और रात को फिर टेलीग्राम पे WhatsApp पर कहते होंगे आज तो मैंने धो डाला शास्त्रार्थ में अपने माता पिता को। नहीं इनके टेलीग्राम पे चलता है सब होता रहता है इनके साथ। तो इनको नहीं पता ना कि शास्त्रार्थ नहीं है चर्चा है और अग्निव्रत जी भी इनको नहीं कह रहे कि भैया शास्त्र नहीं है इसको सुधारो क्योंकि वो चाहते इसको शास्त्रार्थ कह रहे हैं तो भैया हमारा पक्ष तो उसमें पुष्ट हुआ है तो शास्त्रार्थ में हम विचित हुए हैं कोई आएगा तो उसको अच्छा है शास्त्र इनको ज्ञान नहीं ज्ञान नहीं है बात का [हंसी]

02:09:17:06 ज्ञान ज्ञान ज्ञान है ज्ञान नहीं है बस ठीक जी धीरज जी बोले अगर चर्चा आपको कोई वैचारिक मतभेद के निमित्त चर्चा है तो वो आप प्रोटोकॉल है उसके द्वारा आइएगा फिलहाल आपको कोई विचार प्रकट करना हो तो आप कर सकते बोले एनडी क्या नाम है आपका जी शिवश भाई जय श्री राम जय श्री राम जी बताइए। बहुत बढ़िया चर्चा रही। मेरा तो मन गदगद हो गया। आपने जिस तरीके से इनको निरत्तर किया है जितना इनके अंदर दम है ना जितना अंदर अंदर एटीट्यूड रहता है कि हमें सब कुछ ज्ञान है। हमें सब हमें वेदों का ज्ञान है तो हमें सृष्टि की हर एक प्रश्न हर एक क्वरी जो है उस सबका सभी का ज्ञान हमारे पास है। तो इनका जो एटीट्यूड है ना ये आपने बहुत डाउन किया है इस चर्चा से। ये इनसे चर्चा आप कर कैसे सकते हैं? देखिए आप उनको प्रमाण दे रहे थे तो प्रमाण मानने को तैयार नहीं है। वो कह रहे हैं कि दयानंद का प्रमाण मानेंगे हम और आप उन्हें तर्क अगर तर्क यू नो प्रस्तुत कर रहे हैं तो तर्क को नहीं

02:10:32:09 मान रहे हैं वो तर्क कर ही नहीं पा रहे हैं बल्कि आपसे तो इनसे चर्चा कैसे की जाए? अच्छा प्रमाण के अर्थ में भी अपने तर्क के अनुसार अर्थ करेंगे। अपने करोगे तो फिर तर्क पे ही बात कर लो ना भाई। शिवश भैया मैं एक छोटी सी बात कहना चाहूंगा इसमें ऐड ऑन कर रहा हूं आप ही की बात जी जब आप जब आपने बात रखी थीकि मैं तो पूरा ही उस कन्वर्सेशन में पूरा लाइव ही था कामधाम छोड़ के मैं बैठा हुआ था उसी कन्वर्सेशन को इंतजार भी था मुझे और मुझे पहले से ही परमात्मा जिस परमात्मा को लोग मानते हैं भविष्य नहीं देख सकता मैं एक तुच्छ मनुष्य हो के मैं जानता था कि सत्य की सदा विजय होती है और अद्वैत आदि गुरु शंकराचार्य के एक नगण्य से एकदम साधारण से भक्त के भक्त की भी विजय होने वाली है। ये बात मैं पहले से जानता था। मैं मेरे जैसा एक तुक्ष व्यक्ति जो शास्त्र का उतना ज्ञान नहीं रखता। साधारण सा ज्ञान रखता है। उसको भी ये बात हमें पहले से पता थी। वो आपने सिद्ध किया। पहली चीज। दूसरी चीज आपने एक बात उस जब चर्चा चल रही थी तो आपने एक बात कही थी कि जब तर्क पे बात होगी तो सिर्फ तर्क पे बात होगी। जब

02:11:47:15 तर्क खत्म हो जाएंगे तब हम प्रमाण पे चलेंगे। ये बात हुई थी ना? और फिर प्रमाण पे विवाद होना है ना। प्रमाण से जाएगी परंपरा पेवाद और परंपरा से परंपरा से फिर वो गरमा गर्मी होगी और वो खत्म हो जाएगा। हां हां प्रमाण पे बाद में जाता हूं मैं। प्रमाण से प्रमाण का अर्थ नहीं शास्त्रों से प्रमाण देना है। प्रमाण का अर्थ ये है कि इनके द्वारा प्रमाण का जो अर्थ लिखा गया उन अर्थों में से ढूंढ के प्रमाण देना है। ये बात है। अच्छा शिवा जी मैं एक्चुअली अभी अपनी अपनी जॉब पर हूं। मुझे बस दो मिनट दीजिए क्योंकि मुझे वापस बोलिए बोलिए मैं जॉब पे हूं। मेरे पास मेरा ब्रेक खत्म हो रहा है। मैं आपको बस देखिए मैं ये कहना चाह रहा हूं कि इन्होंने [हंसी] मुझे तो सुन के हंसी आती है। ये कहते हैं जी लैटीट्यूड और लोंगिट्यूड है तो उसके आधार पे हम तय कर लेते हैं व्यवहारिक दुनिया में भी कि पृथ्वी गोल है। भाई आप अपने घर से बाजार के लिए जाते हो तो लैटीट्यूड और लोंगिट्यूड को कंसीडर करके जाते हो क्या बाजार को? [हंसी] अब ये बताइए आप देशांतर और ये सारी चीजें कंसीडर करते हो क्या जब आप मतलब घर से गाड़ी ले निकलते हो तो वो भी शब्द और अनुमान

02:13:02:26 प्रमाण ही है अगर लैंगिक वो जो आप बता रहे हैं बिल्कुल बिल्कुल ऑब्वियसली हां वो भी सही है वही है अंदाजा ही है वो एजमशन है वो और दूसरी बात ये आपको काउंटर करते हैं हर बार जब भी कहते हैं कि इनको संस्कृत बोलनी नहीं आती भाई चलो हमने मान लिया आपको संस्कृत बोलनी आती है ठीक है लेकिन क्या आप अपने दिन प्रतिदिन जो आपकी डे डे टू डे की जो लाइफ है उसमें संस्कृत बोलते हो क्या? आप हिंदी में ही वार्ता करते हो ना। क्यों करते हो आप हिंदी में वार्ता? ताकि आप अपने जो विचार है सामने वाले को प्रकट कर सके। भाषा का एक उपयोग यही तो होता है ना कि अपने आप को एक्सप्रेस करना। तो अगर किसी को संस्कृत नहीं आती है इसका मतलब यह तो हो नहीं सकता ना कि उनको वेदों का ज्ञान लेने प्रतिबंधित हो जाएगा या वो फिर वो आपसे तर्क नहीं कर पाएंगे। ऐसा है ना इस बात का उनका उद्देश्य यह नहीं है कि सत्य क्या है? ईश्वर अवतार ले सकता है कि नहीं? उद्देश्य यह है कि हमें जो व्यक्ति हमारा विरोध करने आया है उसको किसी तरीके से व्यक्तिगत कटाक्षों के घेरे में लाएंगे। उसको मोरली मोरली उसका डाउन उसको डाउन करेंगे। उसके जो हृदय में ऐसी ऐसी बातें बोलेंगे जो उसका मोरल डाउन हो जाए या तो वो उसके ऐसा कुछ कर बैठे जो कानूनी घेरे में आ जाए या ऐसे घेरे में आ जाए जो ये चर्चा समाप्त

02:14:17:27 हो जाए और फिर बल्ले बल्ले हो जाए व्यक्तिगत लास्ट में हां मैं लास्ट में बस आपसे एक एक बात और कहना चाहता हूं एक जो मेरे मन में विचार है कि आप थोड़ा सावधान रहिए ये संस्था को आप इतने लाइटली मत लीजिए ये संस्था इंटरनेशनल लेवल पे जो है ना इसे बहुत सारी जो ऑ्गेनाइजेशन है उनका सपोर्ट भी हासिल है। आप YouTube पर जाएंगे ना तो आपको हमारे खिलाफ बहुत सारा कंटेंट मिल जाएगा लेकिन आर्य समाज के खिलाफ कंटेंट नहीं मिलेगा। उसका कारण है कुछ। उसका रीजन यह है कि इंटरनेशनल ऑर्गेनाइजेशन से इसे सपोर्ट मिलता है। ये बैन करते हैं इस कंटेंट को। फिर कहीं ना कहीं तो साहस दिखाना ही पड़ेगा। बाकी योगेश भारद्वाज जी को जानने वाले एक हमारे मित्र हैं जो उनका नाम है वीरेंद्र जी। वो ऋषिकेश हरिद्वार में रहते हैं। और मुझे लगता है कि अगर योगेश भारद्वाज जी के साथ आमने सामने हरिद्वार बहुत ज्यादा दूर नहीं है सहारनपुर से तो ये योगेश भारद्वाज जी के साथ

02:15:24:28 जो है चर्चा उनके समक्ष हो सकती है। वो मध्यस्थता का कार्य कर सकते हैं आराम से। और ये कह रहे तेरी मां ने निष्ठा तो भाई मैं मैं तो बोल रहा हवा में कर लूं क्या? बिना उनके माने बिना बिना उनकी स्वीकृति लिए ही कर लूं क्या बोल तो रहा हूं करने को तैयार हूं तू अपने आकाओं को बोल जा मेरे को कहने दीजिए मेरे को कहने दीजिए ये अपना शब्द में शब्द है तू अपने आकाओं को बोलना जा के वो इस चीज को स्वीकार करे चर्चा होगी तो उनके यहां कोई व्यवस्थित जगह देख ली जाएगी दोनों पक्ष आएंगे जी पुनीत जी ये अश्लील व्यक्ति जी ये अश्लील व्यक्ति कु संस्कार के साथ अपना जो परिचय दे रहा है। इसका कोई गुरु परंपरा नहीं है। इसलिए इसका संस्कार नहीं है। ये संस्कार इधर लिखा है कमेटी ये अब असली भाषा में लिखा है। देखो ये होता है इन लोगों का ज्ञान। ये वो ज्ञान है जो तथाकथित दो ढाई सौ साल पहले जो प्रकाशित हुई है ना नए विज्ञान के स्वरूप में जो व्यवहारिक रूप में पृथ्वी को गोल समझते हैं। उनहीं का ज्ञान है 150 साल वही 150 साल वाली जो ज्ञान है ना जो व्यवहारिक रूप

02:16:40:00 से पृथ्वी हां ज्ञान सही आपने किया मैं वापस जाता हूं क्योंकि मैं इस समय अपने कार्य भी कर रहा हूं आपका बहुत धन्यवाद एनडी जी नहीं मेरा मेरा वास्तविक नाम कुछ और है मैं आपसे फोन पे कनेक्टेड हूं मैंने कल आपको मैसेज भी किया था मेरा नाम कुछ और है अच्छा अच्छा ठीक है आपको याद होगा मैंने उसके ईश्वर सर्वशक्तिमान होने के यू नो नेहित कुश मैंने आपको एक मैसेज किया था छोटा सा बहुत-बहुत धन्यवाद जय श्री राम जी जी बहुत-बहुत धन्यवाद जय श्री जी जी [गला साफ़ करने की आवाज़] सनातन शंकर जी स्वागत है जय श्री राम बताएं जय श्री राम जय श्री राम बहुत बढ़िया आज आपने तो इनके सारे मतलब परखच्चे उड़ा दिए बढ़िया किया शंकर भैया जय श्री राम जय जय श्री राम। जय श्री राम जी। अच्छा एक और जोड़ लीजिए। 18वा रूल था ना। अब एक 19वां रूल भी जोड़ लीजिए कि सनातन शंकर जो है शिवा नारायण द्विवेदी जी के साथ है इसलिए ईश्वर अवतार नहीं ले सकता। [हंसी] ठीक है।

02:17:51:13 ठीक है। ये भी जोड़ लीजिए के भैया ये कोई मतलब पॉइंट होता है क्या? अब वो घातक मूवी का एक सीन है जिसमें के जब सनी देओल वहां पर जाता है अपने भाई के दुकान पे तो वहां पर एक गुंडा सबको डरा रहा होता है और सनी देओल उसे लापा मारता है एक अब वो घूम जाता है बोलता है कौन है कौन है अच्छा उसे दिख रहा होता है कि सामने कौन है फिर भी वो इधर कहता है कौन है कौन है कोई हाथ नहीं लगाने का वो इधर पकड़ लेता है उसको है ना कोई हाथ नहीं लगाने का इसको रुक अभी मैं लेके आता हूं वो लेके आता है बड़े बंदे को वो जैसे ही वो आता है तलवार लेके एक कि मैं गुस्से में गिर जाता वो बंदा। [हंसी] वो ऐसे दिखता है कि ये क्या हो गया एकदम से यही हालत हो रखी है आर्य समाजियों की आजकल। ठीक है? तो ये पूरे बौखला गए हैं कि भैया ये एक अचानक से क्या हो गया? हमारे इतने बड़े साइंटिस्ट, इतने बड़े आचार्य जवाब नहीं दे पा रहे हैं। यह व्यक्ति बार-बार पूछ रहे हैं कि यदि प्रकट होना मात्र ही अवतार है तो ईश्वर पहले से सर्वत्र प्रकट है। ये आप उनसे पूछिए ना जाकर के भाई वो क्यों कह रहे हैं कि सूर्य, चंद्रमा इत्यादि के प्रकट करने के रूप में प्रकट होता है वो। और ईश्वर का ज्ञान कैसे प्रकट हो जाता है? चार ऋषियों के अंतकरण में क्या वहां पर ईश्वर पहले

02:19:06:16 नहीं था? फिर ईश्वर ज्ञान क्यों दे रहा है वहां पे? सिर्फ इतनी सी बात है पहले वो ज्ञान व्यवहार में नहीं था व्यवहारिक हो गया आज सामने आकर बात कर लो ज्यादा अच्छे व्यवस्थित तरीके से हम कोई खा थोड़ी ना जाएंगे इतना डर क्यों लग रहा है लिंक दिया महाप्रभु नहीं अभी नहीं अभी नहीं करोगे व्यवस्थित तरीके से ठीक है इंटरनेट में घुस के नहीं खा जाएंगे शंकराचार्य के सैनिक है डर लगता होगा जाहिर सी बात है पर इतना मत डरो कि इंटरनेट में घुस के भी खा जाएंगे आपको अभी अभी इतना सर्व अभी हम इतने सर्वशक्तिमान नहीं हुए हैं। वो बात और है आर माजी ईश्वर तो इसमें बाधित होगा। अच्छा हां बाधित से मुझे एक बात याद आ गई जो रह गई जरूरी बात थी। उन्होंने एक तर्क दिया है कि ईश्वर जो मनुष्य करता है जैसा जैसा करता जाता है वैसा वैसा जानता है। ठीक है? तो ये तर्क किस बात पे दिया? जब मैं ये कह रहा हूं ईश्वर रोकता क्यों नहीं है? है ना? तो अब क्या है कि कई बार ऐसा होता है जैसे हमारे घर में बच्चे हैं वो गिरने वाले हैं। हमने देखा अरे गिर रही है जाके बचा लिया संतान है बच्चे छोटे-छोटे बच्चे बालक हैं या कुछ हो रहा है गलत होने वाला है हमें पता चल गया होने वाला है रोक लिया तो वो ना रोकने के संबंध में ये कह

02:20:21:20 रहे हैं कि उसको तब पता लगता है जब वो हो मतलब जैसा जैसा वो करता जाता है वैसा वैसा पता होता है उसे पहले से नहीं पता होता कि वो क्या करेगा उसके मन में क्या विचार चल रहा है ये उसको नहीं पता होता त्रिकाल दर्शिता नहीं है मगर भाई ये तो पता चल जाता है ना कि अब ये जो है अगर दुराचार हो रहा है किसी किसी बिटिया के साथ दुष्कर्म हो रहा है तो वहां पर कुछ शुरुआती चीजें ऐसी होती है ना जिससे वह दिख जाता है ईश्वर को कि यह होने वाला है अपराध तब तो उसे अगर इसके उत्तर में आप यह दे रहे हो कि ईश्वर को पता नहीं होता है मगर यह तो दिख रहा है ना कि ऐसी ऐसी क्रियाएं हो रही है जिससे कि अगली क्रिया आपको मालूम पड़ सके तब भी नहीं रोकता है तो अगर वो तब भी नहीं रोक पा रहा तो कितना निकृष्ट और कितना निर ईश्वर हो गया फिर ये सब विचारणीय नहीं है इससे एक बात ये भी पता चलता है शिवश भैया कि ईश्वर सही मायने में सब कुछ देख भी नहीं रहा है। [हंसी] ईश्वर का उस ईश्वर के पास इतना भी ज्ञान नहीं है कि इस व्यक्ति को देखो और उस व्यक्ति को ना देखे। ये तो इतना निम्न स्तर तक बाधित हो गया। ईश्वर की मतलब जिसकी कोई प्रकाष्ठा नहीं है। जिसको एक बाथरूम में नहाता हुआ व्यक्ति को पता हो रहा है बाहर से कि कितना इतना तेज तेज पानी गिरा रहा है। मतलब पानी का वेस्टेज कर रहा है। एक साधारण व्यक्ति को पता लेकिन उस ईश्वर को पता नहीं चल पा रहा है कि इसकी प्रतिक्रियाएं ऐसी है

02:21:37:01 बाद में जाकर के इस बालिका के साथ कुछ ऐसा करेगा। तो निरी ईश्वर हो गया। निरह ईश्वर का प्रमाण है। ये सर्वशक्तिमान ईश्वर का बात करना ईश्वर के लिए उसको ईश्वर को बड़ा निरह कहने के समान हो गया ना शास्त्र जी जय श्री राम स्वागत है। बोले जय श्री राम भैया जय श्री राम आज का लाइव तो बहुत जबरदस्त रहा जी जय श्री राम मेरा आवाज क्लियर है जी बिल्कुल क्लियर जी जी क्लियर जी बहुत बहुत आनंद आया बहुत आनंद आया आज का लाइव में आपने पूरे परफेक्ट तो ऐसे ही उड़ा दिए हैं वो लोग क्या ही बोलेंगे अब इससे कुछ बचा नहीं है बोलने को आपने तो वैसे सभी पॉइंट क्लियर कर दिए एक-एक करके मैंने तो योगेश भारद्वाज जी का ही पक्ष रखा कि ईश्वर अवतार क्यों क्यों नहीं ले सकता है? वो जो उन्होंने जोर दे के कहा है वही बताया मैंने तो

02:22:31:20 जी जी बिल्कुल बिल्कुल तो वही बात है ये लोग ऐसे ही करते रहते हैं। आनंद तो आज बहुत मजा आया मुझे देख के। आर्य समाजियों के पास भजन का अनुभव नहीं है। लकीर के फकीर है। अगर होता है तो वो ऐसी मूर्खता की बातें नहीं करते। देखो भाई कह रहे हैं कि भाई इनका एक वीडियो आया नया तो भाई वीडियो तो आता ही रहेगा। ऐसा कुछ थोड़ी ना हो गया कि वो अपनी फैक्ट्री बंद कर देंगे। सही बात है। भाई मंदिर कैसे चलेंगे आर्य समाज के? जहां विवाह होता है ₹5100 में तो कैसे चलेंगे? फैक्ट्री तो नहीं बंद हो जाएगी। मगर जब तक वो सामने थे उनकी वो गिग्गी बंधी थी। याद रहेंगे करंट छू करके गया मुझे। टच

02:23:20:09 झटका जोर का झटका हाय धीरे से लगा और वो और वो अगर जो कूदते नहीं इधर से उधर इधर से उधर अगर बार बार जल्दी जल्दी कूदते नहीं तो मैं उनकी वैदिक रश्म थ्योरी जो थी ना वो बल इत्यादि वाली सब थ्योरी सब ढेर की ढेर होने वाली थी थोड़ी देर में कुछ ना बचता अंत में ये आता पशु बल है अवतार नहीं ले सकता बस पशु बलि है अरे भैया आपके में चल रहा है। हां यह जो यह जो चल रहा है भैया ऐसा लग रहा है जैसे वो नहीं होता आपने एक जो वीडियो था जिसमें यह तो सपना है यह तो सपना है वो वाला वो वाला चल रहा है [हंसी] ये लोगों को सब कुछ आगे धो के चल जा रहे हैं लेकिन लोग जी लाइव जुड़ने का प्रयास कर रहे हैं जतिन जी आप जुड़ जाइए बहुत लंबी चर्चा अब नहीं करनी है क्योंकि यह वीडियो भारद्वाज जी तक भी जाना है तो इसलिए भारद्वाज जी के लिए वीडियो एक घंटे घंटे 50 मिनट का ही है। उसके आसपास वीडियो पूरा हो गया था तो वही तक के लिए तो इसलिए बहुत ज्यादा लंबा कर देंगे तो भारद्वाज जी को भय लगने लगेगा तीन घंटे कैसे देखूंगा इस बात का ध्यान भी रखना जी हां वो भी देखते हैं ना आप जुड़ जाइए जतिन जी फिलहाल जी

02:24:36:04 जी जतिन जी बोले राम मनोहर जी मैं स्टेज को खाली कर दूं आवाज आ रही है सर आपको मेरी जय श्री राम सर जय श्री राम जय श्री राम सर मैं आपकी जो मतलब आप मैं अभी भी कई चीजों से ना सर एग्री करता हूं। मैं अभी जैसे हिंदूइज़्म प्रैक्टिस करना शुरू करूंगा ना तो मैं आपकी कई चीजों से एग्री करता हूं। मतलब किस परंपरा से जुड़ना चाहिए मुझे? मतलब परंपरा तो जरूरी है ना। नहीं तो सब अपनीप परंपरा बना रहे हैं। आपको भी पता है। हमने सिद्धांत बताया है। परंपरा जो प्रामाणिक परंपराएं हैं कुछ के नाम है ही है। शंकराचार्य परंपरा रामानुज रामानुजाचार्य हो गए। मधवाचार्य जी हो गए। मैं बोल रहा हूं। मुझे बोलने दीजिए। शंकराचार्य परंपरा, रामानुजाचार्य परंपरा, मधवाचार्य परंपरा और नारकाचार्य परंपरा और जो है गड़िया वैष्णव परंपरा में भी जा सकते हैं। तो ये सब परंपराएं हैं। इनसे आप जुड़ सकते हैं और शंकराचार्य का विरोध करने से बस बचिएगा। सभी कहीं भी जाए और इसके साथ ही साथ आपका परम जो निर्णायक हो धर्म का वो उसमें विरक्तता होनी चाहिए। सन्यास के लक्षण होने चाहिए और समस्त श्रुति स्मृति शास्त्रों में सामंजस्य की शिक्षा देते हो और अंतत गथवा

02:25:51:08 जो आपका अज्ञानता रूपी अंधकार है संशय है वो दूर कर दे ये सारे पैरामीटर जहां पर सेट हो जाए जिस महानुभाव के साथ वही आपके गुरु बन सकते हैं ठीक है मैं जैसे आपको एक साल से फॉलो कर रहा हूं ना तो कल मैं आर्य समाज का वो रिप्लाई आया था ना उनका अग्निव्रत जी हो गए तो उनके वहां पर कमेंट सेक्शन में तो मेरी बहस हो गई थी तो बोले तुम्हारा वेदव्यास मुझको अच्छा हां तुम्हारा भी इतिहास वो बोले कोई और बोला वो मुझे बोले थे उनका कोई आर्य आर्य करके था वो कोई उनका वो होगा मतलब आर्य समाज का ही होगा उसमें कुछ कह नहीं सकते उन्होंने खुद नहीं बोला होगा

02:26:33:27 ठीक है ठीक है जतिन जी और कोई बात हो तो आप WhatsApp पर संपर्क कर ले जी किया था मैंने आपको WhatsApp पे बीच में संपर्क कई बहुत टाइम हो गया फिर कर लीजिएगा ठीक है जय श्री राम ओके जय श्री राम अनिकेत जी जय श्री राम जी जय श्री राम भैया प्रणाम भैया जी हां ये कह रहा था भैया कि आपने उसमें ये भी पूछा था कि याज्ञवल् जी के ऊपर भी आपने पूछा था कि याज्ञवल् जी का ज्ञान आपका कहां से आया तो उन्होंने वहां पर भी यही कहा कि ये कहां से आए? ये क्यों पूछ रहे हो? [हंसी] कहीं से भी आए हो। कहां से आए हो? मतलब कुछ भी हो मत पूछो। अच्छा मंत्र आ गए हैं तो मंत्र अच्छा तुम्हारा मंत्र हमारे पास आए। तुम्हारा व्यक्ति स्पष्ट रूप से पलायन कर रहा है। प्रश्नों से कह रहा है ये मत पूछो। कहीं से भी आया ये सब कर रहा है। तुम कह रहे हो तुम वहां से भाग गए। भाई मैं दूसरे की चौखट पर खड़ा हुआ हूं। मेरा कितना भी अपमान हो सकता है वहां पर ना। वह तो मैंने साहस दिखाया कि मैं वहां गया। जैसे ही पता चलेगा कि अब यहां अपमान हो सकता है

02:27:49:06 और मेरे रूप में वहां पर मेरा सिद्धांत है। मेरे रूप में वहां पर कईयों की निष्ठा है। मैं उसकी गरिमा की भी तो रक्षा करूंगा। जैसे ही मुझे पता लगेगा भाई यहां पर मेरा सम्मान नहीं होगा। यहां से आगे मेरी चीजों पर गलत तरीके से कटाक्ष किया जा रहा है। तो मैं वहां से हटूंगा ही ना भाई। और वहां पर बराबरी से उत्तर देने का मेरे पास अधिकार नहीं है। मैं तो उसकी चौखट पे हूं। जब मैं बराबरी से बराबर वाली जगह थी तो भ गया था। अकेला था। 50 लोगों से भिड़ गया था। कहां पर? गंगा के घाट पर। इस वाली मंडली से जब मेरे पास वहां पर समान अधिकार है ही नहीं और वो व्यक्तिगत कटाक्षों पर उतर रहे हैं। यद्यपि मेरी शैली नहीं है कि मैं भी उनके साथ उसी शैली में उतरू। एक हद तक जाऊंगा। अगर वो अमर्यादित हो जाएंगे तो मैं तब भी वहां से वापस ही आऊंगा। मगर उस अमर्यादित जो मर्यादा का उल्लंघन पूर्वक वहां जो चीजें होने वाली हैं वो करने के लिए भी मेरे पास समान अधिकार थोड़ी ना है। वो कोई न्यूट्रल जगह थोड़ी ना थी। उनकी चौखट पर खड़ा था मैं। ये अंतर होता है। वहां से आना ही मेरे मेरे लिए था ना। अभी मैं हंस हंस तीर्थ क्षेत्र में जो कब्जा करके बैठे हुए हैं वहां गया था। उसने क्या क्या बोलने लगा? आपको कुछ नहीं आएगा। वहां से मुझे वापस आना पड़ा निकल कर के।

02:29:04:09 वहां क्या कर करता मैं? हां तर्कों से प्रश्नों से उसको हरा दिया था। भागवतानंद के यहां गया था। भागवतानंद ने जब कह दिया कि भाई मैं उत्तर नहीं दूंगा तो वहां से मैं आ गया कि वहां बैठा रहूं मैं अपना अपना अपमान कराने के लिए। जब वहां व्यक्तिगत हो रहा है व्यक्ति जी अंकित जी बोलिए। तो यही याज्ञवलक वाला प्रश्न फिर आगे बढ़ा भैया तो वहां पर यह देखने मिला कि वह निर्णायक हो रहे थे। आप निर्णायक नहीं हुए। आपने बोला कि कहां से आया है? मोहम्मद से आया कहां से आया? आपने ये प्रश्न किया उनसे कहां से आया? और उन्होंने निर्णय लिया। मोहम्मद से तो तुमने लाया है। बलि लाया है। तो ये भी एक गौर करने वाली बात है कि आप वहां पर निर्णायक नहीं बने। आपने प्रश्न किया। वो निर्णायक बन रहे थे जबरदस्ती।

02:29:56:09 वो इनकी शैली यही होती है ना कि सामने वाले को मोरली डाउन करो। सिद्धांत तो है नहीं तो क्या करें? ये भाई साहब पूछ रहे हैं आपने जो है शंकराचार्य से व्यास देव तक ढाई हजार सालों में चार ही गुरु दिखाए। इसका जवाब दे दिया है भाई। देख लो वीडियो में। इसका जवाब दे दिया इसी वीडियो में। अभी ट्रांसक्रिप्ट आ जाएगी। दो तीन घंटे बाद ट्रांसक्रिप्ट से सर्च कर लेना। सुखदेव जी नाम से सर्च करना मिल जाएगा आपको। ठीक है? उसका भी तो उत्तर नहीं देने दिए ना। इसका भी तो उत्तर कहां देने दिए? क्लियर हो जाता है। बिल्कुल मैं दे रहा था तो उन्होंने कहा कि नहीं तुम तो मंत्र का अर्थ बताओ। वो समझ गए थे ना कि क्या देने वाले थे। वो इसलिए समझ गए थे कि भैया अब ये सुखदेव जी तो मोक्ष प्राप्त है तो वो बता देंगे। इसलिए उन्होंने बोला नहीं रोक दो रोक समझ गया मैं। तो काफी जगह पर ना वो पहले से वो समझ जा रहे परंपरा में वो पहले से समझ गए कि मेरी परंपरा का खंडन होने वाला है। वहां पर वो उन्होंने रोक दिया और तर्क में वहां पर भी बोला फिर शास्त्र प्रमाण पर चले गए। शास्त्र प्रमाण में बोला तो बोला हमारे वाला ही मानो है ना यह तुम्हारे वाला गलत है। तुम्हें कुछ पता नहीं है। मैं तो बहुत बड़ा साइंटिस्ट हूं। तो मैं सोच रहा हूं अगर इतने बड़े साइंटिस्ट हैं तो साइंस पे भी आ जाए डिबेट कर ले भाई। हम तो खुला चैलेंज देते हैं नास्तिकों

02:31:11:22 को। एक नास्तिक आया था वो जिओसेंट्रिक मॉडल और उस पे भी आया था। तो भैया अगर तुम्हें उस पर भी करना है वह तत्व पर और जो एटम के उस पर तो वहां पर भी आ जाओ। वहां पर भी तुम्हें जितना हमें हमारे गुरुदेव का ज्ञान है उस हिसाब से हम आपका तो खंडन वहां कर ही देंगे। है ना? जो सृष्टि की संरचना का सिद्धांत पृथ्वी कैसे बनी है सिद्धांत जो हमारे गुरुदेव ने हमें दिया है वो आप दे ही नहीं सकते। जितना अच्छे से एक्सप्लेनेशन वहां पर है। अरे इनकी बातें मैंने देखी है। ओम रश्मि थ्योरी इत्यादि की है। सब बंडल है कुछ नहीं है। बंडल थ्योरी हम अच्छा जैसे न्यूटन लॉ ऑफ ग्रेविटी न्यूटन ने ग्रेविटी की खोज की थी वैसे ही जो ज्ञान रूप में प्रकट हुआ ईश्वर जो आपने अभी भी कहा था वीडियो में कि ज्ञान रूप में ईश्वर तब प्रकट हुआ जब किसी ने उसे रियलाइज किया है ना ऐसे ही कुछ बोला ना उन्होंने कि जैसे किसी ने अनुभव किया कि अच्छा ये चीज है उसी वक्त ज्ञान रूप में प्रकट हो गया ईश्वर तो जैसे गुरुत्वाकर्षण शक्ति किसी को नहीं पता थी कि वो शक्ति काम कर रही है बस न्यूटन ने खोजा तो वो शक्ति काम करने लग गई। उससे पहले तो वह शक्ति काम ही नहीं कर रही थी। भाई कैसा लॉजिक लाते हो? इसमें तो कोई मतलब जितने भी सूडो साइंट है हां ये सही कह रहे हैं। काफिर आजम सूडो साइंस

02:32:27:01 है। सूडो साइंटिस्ट सारे के सारे जी संकल्प जी बोले जय श्री राम। आ रही है आवाज भैया। जी आ रही है। प्रणाम शंकर भैया प्रणाम शिवश भैया प्रणाम। आवाज आपकी बहुत स्लो हो गई अभी भी पहले तेज आ रही थी। अब आ रही है? जी हां प्रणाम जय हो जय हो थैंक यू भैया और मैं काफी दिन से मैं सोच रहा था किसी आर्य समाज के किसी एक मतलब मेन जो चेहरा है ना उसको आप थोड़ा करो क्यों ये लोग जो श्री राधा का भगवान कृष्ण का जैसे अपमान करते हैं आप इनके वीडियोस देखोगे ना तो मतलब एक वीडियो मैंने गलती से देख ली कि क्या बोलते क्या है कि इनकी क्या थॉट है तो इतने गंदे गंदे शब्द की पूरा मोरल डाउन हो गया पूरा दिमाग खराब हो गया और शब्द नहीं खाली वो आप YouTube पर YouTube ऊपर देखे इनके वीडियोस ये भगवान कृष्ण का राधा रानी का इतना गंदा अपमान हर कुछ शब्द जम्मू में आ रहे हैं वो और अभी जैसे शब्द ही नहीं अब इन्होंने जैसे अभी जिनका आपने भी खंडन किया इनका नाम याद नहीं है मेरे को अभी इन्होंने वीडियो बनाया था आपके ऊपर कि है ना अग्निव्रत जी के सपोर्ट में तो उन्होंने भी कृष्ण भगवान के बारे में कहा ना कि लीला करते हैं गोपियों के वस्त्र चुड़ते हैं तो वो शब्द बोल सकते हैं खाली कि हां मैं शब्दों से बता रहा हूं लेकिन वो साथ में वो अर्धन फोटो लगा रहे

02:33:42:04 वहां पे उनको उनके देख लो क्या लेवल उनका तो थैंक यू यही कह रहा था मैं आपको और बाकी वो एक भैया कह रहे थे कि इनसे रहना हाथापाई पर जाते हैं सच्ची में मेरे किसी दोस्त की बहन पे किसी ने भगा ली थी तो हम जैसे मैं राजस्थान से हूं तो दिल्ली थे तो हमें पता लगा हम दिल्ली गए अब जब तक उनकी शादी हो चुकी थी अब वो लड़की भी उनके साथ ही थी तो हम कहते नहीं फिर हमने उनसे मैंने कहा उनको कि मतलब तुम यही करवा सकते हो नाश कर रखा है धर्म का और जो लड़कियां भगा के तुम शादी करवा रहे हो तो हाथापाई पर आ गए हाथापाई करने लग गए हो भेज दिया उन्होंने

02:34:15:01 आदित्य नारायण जी को लिंक देना है। एक बार लिंक और दे दीजिए। ये नहीं बढ़िया बढ़िया इनका ध्यान। ठीक है भैया। धन्यवाद। प्रणाम धन्यवाद। लिंक दे दीजिए एक बार। ये मिल गया। आदित्य जी आपको लिंक दे दिया है देखो नीचे। आदित्य जी बस जुड़े क्योंकि समापन की ओर है। ढाई घंटे हो चुके हैं।

02:34:50:07 भैया ये जो योगेश भारद्वाज जी का जो चैनल पे आज मतलब जो वीडियो अपलोड हुआ था उसमें क्या है उसमें वो क्या बोल रहे थे कि आपका आपका जो अर्थ है ना वो मनमुखी है क्योंकि आप हिंदी में बता रहे थे। ये बहुत मेरे को आशास्पद लगा कि जब आप मंत्र का अर्थ हिंदी में बता रहे तो बोलते हैं कि मनमुखी है और उनका अर्थ मनमुखी इसलिए नहीं क्योंकि वो संस्कृत में मंत्र पढ़ रहे थे। अरे सब ये बहाने हैं संस्कृत और हिंदी के ना बात ये मैं बताऊं क्या है लोगों ने अपनी मन की बातों को धर्म के रूप में सिद्ध करने के लिए एक खेल खेला है। वेद से जोड़कर बहुत बड़ा एक जंजाल बना रखा है वेद वैदिक वांगमय से जोड़कर अब उस जंजाल में घुसकर उसमें भेद करके और जो है सत्य को सिद्ध करने के लिए एक बहुत लंबी समय अवधि लगेगी। हर जगह से हर चीज सटीकता के साथ जो होनी चाहिए। तो इतना दीर्घ काल से यह सब हो रहा है। इतना समय हो चुका है कि इन्होंने जो माथा मथैया कर रखा है शास्त्रों के नाम पे उसमें बड़ी जटिलता

02:36:05:18 इन्होंने डाल दी है कि कहां से किधर से आओगे ऐसे करके बहुत सारी चीजें तो इसीलिए इस जटिलता से इस जटिलता रूपी इनका जो हथियार है उससे आपको सुरक्षा प्रदान करने के लिए भगवान ने आपको एक ब्रह्मास्त्र दिया है। उस ब्रह्मास्त्र का नाम होता है परंपरा। आ जाओ। तो इसलिए बहुत ज्यादा जब व्यक्ति प्रमाण के रूप में अपने अर्थ को प्रचारित करने का प्रयास करता है तब बात आती है परंपरा की। ये बार-बार एक ही प्रश्न किया जा रहा है। भैया वीडियो को देख लो। जवाब दे दिया गया है। अंधे मत बनो। और ज्यादा दिक्कत है तो सामने आकर बात कर लो। हां जी आदित्य नारायण पांडे जी बताएं।

02:36:55:01 नारायण भैया नारायण नारायण नारायण जी कह रहे हैं कि एक बड़ी रहस्य की बात है सबको हम बताते हैं आर्य समाजियों में कई उपस संप्रदाय होते हैं जो प्रत्यक्ष नहीं दिखते अंदर अंदर दिखते हैं पर वो सभी उपस संप्रदाय जो है अब इकट्ठा हुए हैं। यह जितने भी आचार्य अग्निव्रत जी के समर्थन में आर्य समाजी गण आ रहे हैं, वे सभी आर्य समाजी गण आचार्य जी के रसमी थ्योरी को स्वयं फर्जी घोषित कर चुके हैं अथवा फर्जी ही मानते हैं। मेरा तो मैंने तो उस थ्योरी को पढ़ा नहीं है। अतः उस दिव्य थरी के बारे में मेरा कोई विचार नहीं है। अभी तो जैसे आचार्य जी ने एक वीडियो बनाया था अग्निव्रत नष्टिक जी ने कि हनुमान जी कैसे उड़ के गए। उन्होंने कहा कि रश्मि के माध्यम से उड़ के गए। उनका शरीर रबड़ जैसे हो गया। जैसे रबड़ खींचने पर तन जाता है। स्प्रिंग दबाने पर उठ जाती है। ऐसे हनुमान जी उड़ के गए। इसमें कुछ आर्य समाजियों का मतलब उन्होंने माना कि छलांग मार के गए। अब इसमें कुछ आर्य समाजियों का ऐसा मानना है कि हनुमान जी बहुत जोर जोोर से तैरते हुए गए क्योंकि तैरने का वेग बहुत ज्यादा था इसलिए बोल दिया उड़ के गए। जैसे हम लोग जोर से साइकिल चलाते हैं तो बोलते बहुत उड़ रहे हैं। जहां अपना मत सिद्ध ना हो वही अरे

02:38:10:14 आज समाजी इनसे सहमत नहीं है। वो बात तो एक अलग है। ये खुद दयानंद जी एंड पार्टी की जो मूल धारा है उससे खुद को अलग मानते हैं। बातें सुनिएगा। यह स्वयं को ही मंत्र दृष्टा टाइप से सिद्ध करने का प्रयास करते हैं। बोलते मैंने ध्यान साधना लगा के ज्ञान विज्ञान प्राप्त किया है। मैंने भाष से किया है। तो गुरु परंपरा इनकी अपने आप ही अपनी खुद एक नई गुरु परंपरा बताते हैं। ये कल जो परसों वो लाइव हो रहा था उस लाइव में भी एक बार को बोल गए थे। मैं तो अपनी बात कर रहा हूं। दयानंद जी की बात ही नहीं कर रहा हूं। लो और फिर मैंने पूछा आपकी कह दिया फिर मैंने ये कह दिया ना तो घोषित कर दो समाज नहीं हूं तो इन्होंने फिर उसका जवाब नहीं दिया उस बात का वही बात है ना अब कोई कहता है कि जी मेरे को हिमालय में मैं गया था वहां मुझे ज्ञान मिल गया तो मेरे गुरु का नाम मत पूछो क्योंकि मुझे ज्ञान हिमालय में मिल गया तो मैंने उनसे कहा था कि भैया जैसे आपको हिमालय में ज्ञान मिल गया वैसे हमें भी मिल जाएगा आप अपना रास्ता देखिए अब आर्य समाज वाले भी ऐसे ही है कि जैसे दयानंद जी को अपने आप वो मंत्र का अर्थ प्रकट हो गया तो अग्निव्रत जी को भी अपने आप मंत्र का अर्थ प्रकट हो रहा है। आगे वाले सबको अपने आप मंत्र का अर्थ प्रकट हो जाएगा ना। यही सिद्धांत है उनका। सीधी सी बात है। एक एक और मैं

02:39:25:18 बताता हूं। मैं एक बात जरूर कहूंगा कि मुझे लगता है कि अग्निव्रत जी से तो कहीं ज्यादा अच्छा जो चर्चा के लिए जो उपस्थित होने वाला व्यक्ति था वो था निर्भय आर्य। निर्भय ने कहीं ना कहीं जो पक्ष को रखा था तो थोड़ा सॉलिड तैयारी के साथ आया था। इनसे तो कहीं ज्यादा आगे थी। बात अलग है। हमारा सिद्धांत अकाट है और व्यक्ति को एक जगह जाकर के फिर वो वो सगुण निराकार में ही अवतार की सिद्धि हो जाती है। अगर स्वरूप विरुद्ध कार्य को देख तो सगुण निराकार में अवतार की सिद्धि हो जाती है। मगर इनसे कहीं आगे जो था निर्भय आया था और उससे चर्चा हुई थी। उसका लेवल इस चर्चा से कहीं ऊंचा था। अगर आर्य समाजियों को सपोर्ट करना चाहिए। तो भैया तुम लोग निर्भय को करो जाकर के सपोर्ट अग्निव्रत जी को छोड़ो अग्निव्रत जी तो वही टटपुंजिया तर्क लेकर के बैठे थे जो टटपुजिया तर्क जो हर निचले स्तर का या मतलब अभी तक जितने भी आर समाजियों से बात हुई है कुछ एक को छोड़ के उनसे उनके साथ जो है अवतार के विषय में बहुत ज्यादा बात हो नहीं पाई तो अवतार के विषय में ज्यादातर जो इन्होंने जितने भी निकृष्ट वाले जो तर्क इत्यादि प्रस्तुत किए वो सब आपके चलते फिरते चलती बिरिया वाले जो फॉलोअ होते समाज के उन्होंने भी की एक निर्भय ने ऐसे तर्क वगैरह दिए थे जो कुछ नए

02:40:40:24 थे और मुझे लगता था कि इस चर्चा में जो निर्भय जिन प्रश्नों का उत्तर नहीं दे पा रहा है उस चीज से आगे बढ़ के अग्नि जी अब कुछ ऐसा देंगे जिसके उत्तर मैं दूंगा उनको मगर ऐसा कुछ हुआ ही नहीं उन्होंने बहुत जल्दी हथियार डाले पहले विषयंतर किया फिर व्यवहार वो व्यक्तिगत हुए और चर्चा समाप्त करनी पड़ी उनके चैनल पर हो रही थी अच्छा [नाक से की जाने वाली आवाज़] [गला साफ़ करने की आवाज़] जी आदित्य जी आप अपनी बात कुछ करें फिर उसके बाद हम थोड़ा थोड़ा अगर बात बताते हैं उस समय हम जब लाइव देख रहे थे कमेंट में थे तो आपको बोला कौन सा मंत्र है आपने कहा भाई हम मंत्र नहीं बोलते बाद में वो बोलने लगे तो कुछ भी बोल रहे थे फंस फंस के उल्टा पुल्टा हमने कमेंट में लिखा कि भाई हम मंत्र नहीं बोल पा रहे है तो क्यों लिख रहे हो क्यों बोल रहे है नहीं बोल पा रहे है गलत बाद में एक व्यक्ति लिखता है की भाई तुम्हारा व्यक्ति तो मंत्र बोलने से ही कतरा रहा है। वो कम से कम कुछ तो बोल रहे हैं। तो मैंने उसको उत्तर लिखा कि भाई हमारा व्यक्ति स्वयं को शंकराचार्य जी का दास बोलता है। क्या बोलता है? दास। और तुम्हारा व्यक्ति जो है वो स्वयं को आचार्य बोलता है और ऐसा आचार्य बनता है कि अपने पूर्वाचार्य दयानंद का ही खंडन

02:41:56:02 करता है। उनमें ही दोष निकालता है। तो उसको तो मंत्र बोलने आना चाहिए ना। जी ये सब बातें हैं सब ऐसे भटक रहे हैं बच्चे दोष कारण खराब होते कुछ दिन के लिए बन जाता है बहुत दिनों से आप एक ही प्रश्न पूछते हो आज इस वीडियो में उत्तर दे दिया गया है इसको देख लेना ग पाद सुखदेव यह कीवर्ड है इनके द्वारा सर्च करना ट्रांसिप में मिल जाएगा

02:42:33:08 और पहले भी दे चुके हैं। ऋषिवाज को उत्तर दिया था। ठीक है। तो मुझे लगता है सभी की बातें हो गई है पूरी पूरी। हां। किसी का अगर कुछ महत्वपूर्ण बात है तो बोल दे नहीं तो फिर समाप्त करें। नहीं भैया। ठीक है। ठीक है। बहुत-बहुत आभार सभी का समय देने के लिए। मुझे लगता है आज बहुत एक अच्छा सा वीडियो आप लोगों को प्राप्त हुआ है। तो जी जी। काफी लोगों के जो जिनको निराशा हो गई थी कि भ शिवश जी ने क्यों लाइव छोड़ी उनको तो काफी राहत मिली होगी क्योंकि कल भी जब मैंने भी एक लाइव की थी आपकी जब दिन में डिस्कशन थी तो शाम को तो फिर वो लोग कह रहे थे नहीं नहीं हमें अच्छा लगा कि आपने यह करा तो आज का करके तो शायद उनके सारे संशय दूर हो ही गए होंगे आपकी लाइव देखकर लाइव छोड़ने का जो मुख्य था कारण वो यही था कि विषयांतर करते हुए व्यक्तिगत कटाक्ष पर आ रहे थे ऐसी बातें बातें बोल रहे थे जिससे कि मेरी अवमानना हो। मेरे मान्यताओं की अवमानना हो। हम लोग जब तक तर्क वितर्क कर रहे हैं तब तक आप निर्णय घोषित मत करिए क्या बुरा है क्या अच्छा है या पापी लिखा है यह लिखा है आप तर्क लाइए तर्क से बात करिए तर्क प्रस्तुत करिए हम तर्क प्रस्तुत कर रहे हैं प्रमाण प्रस्तुत करिए हम भी प्रमाण प्रस्तुत कर रहे हैं प्रमाण को प्रमाण नहीं मानोगे

02:43:48:12 तो उसमें भी तर्क प्रस्तुत करेंगे ठीक है वो एक बात अलग है तो विषयांतर करते हुए व्यक्तिगत कटाक्ष वो काफी देर से चालू हो गए थे वहां पर गरमा गर्मी ज्यादा हो रही थी अब वहां पर यही बचता है कि मैं भी गरमा गर्मी का भागीदार बन जाऊं अगर गरमा गर्मी का भागीदार बनता हूं तो क्या वह जगह इक्वल है? वहां पर जब वह कुछ बोलेंगे तो सुन लिया जाएगा। हो सकता है मेरे को म्यूट ही कर दिया जाए। फिर क्या करूंगा मैं? तो जहां पर समान अधिकार प्राप्त नहीं है वहां पर युद्ध करना बेकार होता है। समान अधिकार प्राप्त होने चाहिए। अब जैसे मैं इस मंदिर में जाकर के विरोध थोड़ी ना कर सकता हूं कि तुम अगर शिव जी का अपमान करोगे तो मैं बोलूंगा क्योंकि वो उनकी प्रॉपर्टी है। परंतु वो गंगा के घाट पर बैठकर के अगर शिव जी का अपमान करेंगे तो वहां मैं बोल सकता हूं। ठीक है? तो इसी उनकी चौखट पर था। इस कारण से जो है मुझे हटना ही उचित लगा। या तो मैं उनसे मुंह चोरी करता। उसमें भी तू तड़ाक में आगे बात जाने वाली थी या और गरमा गर्मी की बातें होने वाली थी। उसके बाद हटना तो था ही। यह बात निश्चित है। क्योंकि उन्होंने ऐसी चीजें शुरू कर किस बात पर मैं हटा हूं। उन्होंने कहा तुमने पाप लिखा है। पापी लिखा है। मैं अपने ईश्वर के बारे में ये सब क्यों सुनू? भाई हम लोग तात्विक सैद्धांतिक चर्चा कर

02:45:03:15 रहे हैं कि ईश्वर अवतार क्यों नहीं ले सकता है? इसमें इस लाइन को बोलने की क्या जरूरत है कि तुम्हारा ईश्वर जो है तुमने ईश्वर को पापी बना दिया। ग्रंथों में पाप लिखा है। अद्वतवाद सबसे बुरा है। तुम्हें ज्ञान नहीं है। आप तर्क दो ना अपनी बात को सिद्ध करने के संबंध में। ऐसी बातें मत बोलो जिसके गवाह सिर्फ आप हो। आप तर्क दीजिए। अपनी बात को सिद्ध करने के लिए। प्रमाण दीजिए। वो प्रमाण जो मैं भी मान सकूं।

02:45:34:24 ऐसी बातें मत बोलिए जिसके लिए आप ही केवल प्रमाण हो। अद्वैत बात बुरा है। प्रमाण क्या है? मैं बोल रहा हूं ना ऐसी बातें मत बोलिए। ठीक है? और बाकी योगेश जी को हमारा संदेश दे ही दिया है हमने। योगेश जी आपने बड़े दिनों तक जो है चोरी छुपे पीठ पीछे काफी सारी बातें की हमसे हमारे बारे में और फिर आपने एक कॉल भी करवाया हमको सहारनपुर आने के लिए। तो अगर आप व्यक्तिगत कटाक्षों से बचते हुए और एक सैद्धांतिक चर्चा करना चाहते हैं तो हम तैयार हैं। आपका स्वागत करते हैं। आप लखनऊ आ सकते हैं। यहां पर आपका स्वागत है। अगर आप सहारनपुर या उसके आसपास के क्षेत्र हरिद्वार में ज्यादा उचित रहेगा क्योंकि हरिद्वार में वो रहते हैं वीरेंद्र वीरेंद्र जी गौधी वाले। तो वहां कर सकते हैं चर्चा। सहारनपुर अगर आपके लिए वह होगा ना क्या कहते हैं असंभव कहीं और करना तो सहारनपुर में भी इंतजाम किया जा सकता है और अगर आपको ऑनलाइन से दिक्कत नहीं तो ऑनलाइन में भी आ सकते हैं बसशर्ते व्यक्तिगत कटाक्षों से बचिएगा वरना इसी तरीके से चर्चा स्थगित होगी [गला साफ़ करने की आवाज़][खांसने की आवाज़] ठीक है सभी का आभार समय देने के लिए आदित्य जी सनातन

02:46:50:04 शंकर जी शास्त्र जी अनिकेत जी सभी को जय श्री राम जय श्री राम जी जय श्री राम जय श्री राम भैया जय श्री राम जय श्री राम

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A: AHVAAN - Call Of Dharma Live 2:47:26 · 23 Jun 2026

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