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00:00:00:16 जैसे

00:00:01:01 आपने WhatsApp मैसेज में किया था। किसी ने कोई कहता है हम ऋषियों का या प्राचीन महापुरुष का अपमान करते हैं। तो इसके लिए जानकारी दे दूं। मेरे पीछे जो लगा है पृष्ठभूमि देखेंगे। सबसे ऊपर चार ऋषि अग्न वायु आदि तंगरा है चित्र उनके नीचे ब्रह्मा जी है एक साइड में मनु जी है एक साइड में अत मदास जी है एक साइड में महर्षि वाल्मीकि जी है और उधर वो महर्षि वेदव्यास जी है महादेव जी भी है विष्णु जी भी है श्री राम सीता जी है कृष्ण जी अर्जुन और एक साइड में महर्षि दयानंद जिस भवन में बैठा हूं उसका नाम है महर्षि महावैज्ञानिक ब्रह्मा अनुसंधान भवन जिस कक्ष में बैठा हूं इसका नाम है भगवान शिव कक्ष महान वैज्ञानिक परम योगी भगवान शिव कक्ष जो मेला कक्ष है उसका नाम है महान वैज्ञानिक अमित पराक्रमी भगवान विष्णु कक्ष सब ऋषि मुनियों के नाम है यहां शारल हमारे यहां भगवान मनु भवन नाम से है [खांसने की आवाज़][गला साफ़ करने की आवाज़] लोपा मुद्रा जी के नाम से है श्री राम के नाम से है कृष्ण जी के तो

00:01:16:09 ये हमारा परिचय है और हमारी जो प्रार्थना होती है सत्संग में उसमें अग्नि वायु से लेकर के ऋषि दयानंद परंपरा जिसमें आदि शंकराचार्य जी का भी नाम है। सभी महापुरुषों देवियों वीरांगना वीरों और वैज्ञानिकों का स्मरण हम करते हैं। सत्संग तो यह परिचय है महर्षि ब्रह्मा से लेकर ऋषि दयानंद परंत जो भी ऋषि हुए हैं जो भी वेद के लिए समर्पित रहे हैं मानवता के लिए समर्पित रहे हैं उसी परंपरा का मैं एक छोटा सा अनुय हूं। जी मुझे एक चीज कहनी थी यहां पर आचार्य जी कि शायद कोई गलत सूचना पहुंची है। मैंने उसमें जो WhatsApp मैसेज आपको भेजा था उसमें कहीं भी बात नहीं लिखी थी कि आपकी ओर से ऋषियों का अपमान हो रहा है। किसी का किसी का कमेंट था एक का ज्यादा नहीं थे कमेंट एक का किसी का। अच्छा हां वो किया होगा। दूसरी बात ये है कि एक चीज मेरे पास जो WhatsApp में आई थी उसमें कुछ ऐसा लग रहा था। इसीलिए मैं मुझे लगता है कि मैं चर्चा शुरू होने से पहले उसको बता दूं उस बात को कि जो WhatsApp मैसेज मुझे प्राप्त हुआ था

00:02:31:13 तो उसमें ये कहा गया था कि भाई आप जगह-जगह जाकर के आर्य समाज से आर्य समाज मंदिरों में जाकर के इंटरव्यू लेते हैं। तो उसमें ऐसा प्रतीत हो रहा था कि शायद लिखने वाले को यह नहीं ज्ञात है कि मैं सिर्फ आर्य समाज मंदिरों में ही नहीं गया। मैं इस मंदिर में भी गया हूं। मैं ब्रह्मा कुमारियों के यहां भी गया हूं। मैं रामपाल के यहां भी गया हूं। रामपाल वाले पे तो मुकदमा कर रखा है। हाई कोर्ट में मुकदमा चल रहा है। पेंडिंग है उस समय और यहां लखनऊ स्तर पर बहुत अच्छी कारवाई हुई है। उसमें लखनऊ में उसका जो आश्रम है वो सीज हो गया है। हां इतनी सारी चीजें चल रही है। तो ऐसा नहीं है कि सिर्फ आर्य समाज को ही लेकर कोई ऐसा पर्सनल कोई टारगेट करना ऐसा कुछ नहीं था। और मेरा जो पर्सनल वो रहा है कि मैं एक बहुत बड़े जीवन के दौर में इन सब चीजों से गुजरा हूं कि हमारे सनातनी भाई बहुत सारे मतों में बटे हुए हैं। भले ही वो कहने को हिंदू हैं या सनातनी है या वैदिक हैं, आर्य हैं। मगर उन अगर 10 लोगों को भी हम बिठा दें ना थोड़ी देर के लिए तो उन 10 लोगों के बीच में भी कोई एक बात डाल देंगे तो 10ों का मत भिन्न हो जाएगा। उस कोई एक बात ऐसी नहीं जिसको लेकर के हम एकत्रित हो सके। तो मेरा जो ये हिंदुओं से संबंधित जो संस्थाएं हैं, संगठन है उनमें जाकर के चर्चा करने का मुख्य उद्देश्य यह रहता है कि जो मूल तत्व

00:03:46:14 है वो बाहर आए और यदि कोई भ्रांति फैल रही है तो वो शोधित हो जाए। तो ऐसा नहीं होता है कि कहीं कोई पर्सनल अटैक करना है या प्रहार करना है जिससे कि हम संगठित हो। हमारा समाज जो है बिखरा हुआ है उसके कारण ही ये होता है। जी ये तो ठीक है। एकता होनी चाहिए। जी ऋषि दयानंद ने बहुत प्रयास किया था कि वेद के नाम पर उन्होंने तो पादरियों मौलवियों को भी बुलाया था। वेद के नाम पर एक होने चाहिए क्योंकि वेद हम तो मानते हिंदुओं का ग्रंथ है लेकिन जो अब तक मानते हिंदुओं का ग्रंथ है लेकिन वास्तव में ये ब्रह्मांडी ग्रंथ है ये मैंने अपनी थ्योरी वैदिक रश्म सिद्धांत सृष्टि उत्पत्ति कहा मेरा नहीं है ऋषियों का ही है उसमें सिद्ध वेद ब्रह्मांड का ग्रंथ है केवल हिंदुओं का नहीं भारत का नहीं धरती का भी नहीं है और वेद मंत्रों से सृष्टि बनी है तो वेद मन वेद साधारण नहीं बहुत असाधारण है। [गला साफ़ करने की आवाज़] इसी पे एक हो जाने चाहिए। मनुष्य मात्र का जो धर्म है वेद का ही धर्म है। बस बस मनुष्य चाहे इस लोक का है चाहे दूसरे लोकों में रहता हो जो मननशील प्राणी है वो मनुष्य है। और उस सबका धर्म वैदिक ही है। वेद धर्म का भी ग्रंथ

00:05:01:15 है। विज्ञान का भी ग्रंथ है। वैसे विज्ञान धर्म दोनों पर्यायवाची है। जी हां जी। तो अब उस पर चर्चा अवतार पर अवतार पर शुरू करें। तो अवतार पर मेरा यही कहना है कि जैसे जब ईश्वर सर्व सामर्थ्यवान है, अनंत समर्थवान है, सर्वशक्तिमान है, वो सृष्टि को बनाता है, स्थिति कर रखता है, लय करता है। तो एक उसको अवतार लेने में ही आर्य समाज को क्या आपत्ति हो जाती है? क्या आर्य समाज के अनुसार ईश्वर सर्वशक्तिमान नहीं है? जो यहां पर जो है अवतार लेने बाधा बाध्य करता है कि नहीं अवतार नहीं ले सकता। जैसे कहते हैं ना कि ईश्वर अबाध्य है तो यहां पर ईश्वर बाधित हो जाता है कि वो अवतार नहीं ले सकता या व्यवहारिक नहीं हो सकता। सगुण साकार स्वरूप नहीं धारण कर सकता। तो यह मेरा बस है। जी यही आपका प्रश्न बार-बार रहता है। मैंने लिखा है। जी जी तो [गला साफ़ करने की आवाज़] पहले प्रमाण से प्रारंभ ना करके तर्क से प्रारंभ कर रहे हैं आप तो भी ठीक है।

00:06:04:09 सर्व का अर्थ हमें समझना चाहिए। मीमासा दर्शन एक सूत्र है। सर्वाधिकार जिसके अधिकृत जो कार्य है वो सारे कार्य जिसके अधिकृत जो कार्य जैसे हम यज्ञ करते हैं क्या कहते सर्वम व पूर्णम स्वाहा सबको समर्पण कर रहे हैं। इसका अर्थ क्या है? इसका थोड़ी सारा ब्रह्मांड समर्पित कर रहे हैं। वहां सर्व मतलब मेरे जो अधिकार में मेरे पास जो सामग्री रखी है इसको मैं सारे समर्पित करता हूं। मीमासा दर्शन का प्रमाण भी वो दे दिया है। उसका सावर भाष सुना सकता हूं। जरूरत समझे तो तो सर्वशक्तिमान का अर्थ है कि ईश्वर के जो पूर्ण कर्म स्वभावों के अनुकूल जितने भी कार्य है उन सबको बिना किसी सहायता के करता है। मनुष्य कोई भी कार्य बिना ईश्वर की सहायता के नहीं कर सकता। जैसे हम रोटी बनाएंगे ईश्वर नहीं दूसरों की भी सहायता चाहिए। मनुष्य होंगे गेहूं किसी से लेंगे गेहूं भी जो किसान है वो मिट्टी से पैदा करेगा

00:07:19:15 वहां ईश्वर का सेवक चाहिए हल चाहिए बैल चाहिए मशीन चाहिए चक्की चाहिए पानी चाहिए बहुत कुछ चाहिए ईश्वर केवल उपादान कारण प्रकृति से बिना किसी की सहायता से सृष्टि रचता है कर्ता के लिए करण चाहिए लेकिन उसके लिए करण नहीं चाहिए साधन नहीं चाहिए हमें साधन चाहिए हमें तो इंद्रियाित चाहिए हमें शरीर भी चाहिए पूरा अंतकरण चाहिए उसको नहीं चाहिए हमें मशीनरी चाहिए दूसरे लोगों का सहयोग चाहिए जानवरों का सहयोग चाहिए उसको नहीं चाहिए अब ये देख अपन पहले अपन सृष्टि को समझे

00:08:06:12 हमारे जैसे आठ अरब लोग भी धरती पर रहते हैं और लाखों प्रकार की योनिया है। 40 हजार किलोमीटर धरती का घेरा है और सूर्य से 13 लाख गुना बड़ा है। ऐसे 10 खरब सूर्य है अपनी गैलेक्सी में। उन सबके अलग-अलग पृथ्वीयां ग्रह उपग्रह आदि है। उल्कापिंड आदि। ऐसी अरबों गैलेक्सियां है। ये बनी किससे? उस प्रकृति से जो साम्य अवस्था में पदार्थ था ना एनर्जी थी ना मास था ना चार्ज था ना वेद कुछ भी नहीं था उससे बनाया उसके पास उपादान कारण तो था जिससे बनाना है पर कर कारण कुछ नहीं था साधन कुछ नहीं इतना बड़ा ब्रह्मांड बिना किसी सहायता के बनाया हम प्रत्येक कार्य सहायता के बिना नहीं कर सकते किसी की सहायता किए वो बिना किसी सहायता इसलिए वो सर्वशक्त अगर ऐसा कहने लग जाए कि कुछ भी करना ये तो मीमांसा दर्शन के विरुद्ध है और फिर तर्क के विरुद्ध भी बताया प्रमाण छोड़िए अगर मैं कहूं कि ईश्वर तैमूर बन के भी आ

00:09:21:15 सकता है भारत में रक्तपात करने के लिए ईश्वर औरंगजेब तोड़ने औरंगजेब बनने बन के मंदिर तोड़ने भी आ सकता है। [गला साफ़ करने की आवाज़] ईश्वर बाबर बनके राम जन्मभूमि तोड़ने आ सकता है। ईश्वर जनरल डायर बन के भारतीयों की हत्या करने आ सकता है? क्या ईश्वर चोरी भी कर सकता है? क्या ईश्वर किसी से दुष्कर्म भी कर सकता है? तो आप कहेंगे नहीं कर सकता। और वेद भी कहता अपापवि पाप से विध नहीं हो सकता। इसलिए और देखिए कार्य दो प्रकार के होते हैं सृष्टि में। एक सामान्य और विशेष सामान्य कार्य क्या होते हैं? जिनमें समान नियम कार्य करते हैं। स्वाभाविक क्रियाएं कार्य करती है। स्वाभाविक ज्ञान बल कार्य करता है। श्वेताश्वर उपनिषद कहता है स्वाभाविक ही जान क्रिया। इतनी बड़ी सृष्टि मैंने बताई उस सृष्टि में एक जैसे नियम काम कर रहे हैं। ईश्वर ऐसा नहीं करता ये कैसा होता है? करतुम अकर्तम अन्यथा करत। ये करूं नहीं करूं उल्टा करूं सीधा करूं। ये मेरा अधिकार है। इसलिए मैं करता हूं। वो ऐसा नहीं कर सकता। उसके सामान्य कार्य है और सा दर्शन क्या कहता है? त सनधाना अधित

00:10:36:24 मणवत उस पुरुष का उस परमेश्वर का ब्रह्म का प्रकृति से सनधान संपर्क से वह अधष्ठित्व सिद्ध होता है वो अधाता है उसका सृष्टि का क्योंकि पूरी प्रकृति से उसका नेक है उसके निकटता है वही कंट्रोल कर रहा है फिर आगे लिखते हैं भगवान कबीर विशेष कार्य [खांसने की आवाज़] विशेष कार्यों में जीवो का ही दृष्टित होता है तो जन्म लेना लौकिक कार्य करना यह विशेष कार्य इसके लिए करण चाहिए ये जीवो का अधात जीवो का क्षेत्र आ जाता है म ब्रह्म का नहीं ब्रह्म का सामान्य कर्म है और जीव का विशेष कर्म मैं हूं मैं आपसे बात कर रहा हूं नहीं भी करूं आप मेरे से बात कर नहीं भी करें उल्टा करें सीधा करें ये हमारे हमारे विशेष कार्य हो गए। जन्म लेना, मरना, दुख होना, रोग होना। ये नहीं हो सकता। अब शंकराचार्य जी का ब्रह्म सूत्र पढ़ लीजिए कि अगर उसका शरीर हो तो क्या भोग आदि से ग्रस्त होगा? इसलिए वो ब्रह्म निराकार

00:11:52:07 ही है। शंकराचार्य जी महाराज कह रहे हैं। तो विशेष कार्यों में हमारा अधिकार है। सामान्य कार्यों में जो सब जगह एक नियम से कार्य कर रहे हैं। स्वाभाविक ज्ञान बल क्रिया कर रहे हैं। वह परमेश्वर का ब्रह्म का कार्य है। तो वो ब्रह्म अपने सारे कार्य कर लेता है। यही सर्वशक्तिमान है। ठीक है। अब मैं आपने एक बार में काफी सारी चीजें दे दी है। तो मैं जो जो स्मरण में आएगा तो मैं उनको बात करूंगा। पहली बात तो यह है कि यहां पर आपने सर्व का जो अर्थ लिया है वो जो जो हमारे अधिकार में आता है उसकी उसके लिया है। उसके लिए आपने आधार भी बताया मीमांसा दर्शन का कोई वाक्य और इसमें पहली इसमें बात ये आ जाती है और अगला ही आपने बताया कि क्या वो जनरल डायर के रूप में आ सकता है? औरंगजेब के मोहम्मद साहब के रूप मोहम्मद के रूप में आ सकता है। ईसा के रूप में आ सकता है क्या? एक एक वही मैं अब इसमें क्या है? दो बातें आ जाती हैं कि जैसे कि हम जब सर्वशक्तिमान का अर्थ यह नहीं लेते हैं कि वह सब कुछ कर सकता है। अगले ही पल जब हम कहते हैं कि वो सर्वज्ञ है अगले ही पल जब हम कहते हैं कि वो सर्वव्यापक है तो हम सर्वव्यापक कहते समय वो ये नहीं कहते कि वो नाली में नहीं है। जब नहीं सब में उसमें भी है। मैं

00:13:07:10 जब बोल रहा हूं तो आप मुझे आप मुझे आप मुझे जब हम कहते हैं कि सर्व्यापक है तब हम यह नहीं कहते कि यहां पर सर्व्यापक का अर्थ ये नहीं है कि वो नाली में भी है। हम कहते वो नाली में भी है। हम सर्वव्यापक का अर्थ ये नहीं मान लेते कि वो नाली में नहीं है। है ना? इसी प्रकार से वह सर्वज्ञ भी है। तो हम सर्वज्ञ का अर्थ लेते हैं कि जो भी कुछ है वह जानता है। जो जिसकी भी जो भी कुछ है उसको उसकी नॉलेज है। ऑल नोइंग है। सर्वज्ञ है। हम यह नहीं कहते कि कहीं पर कोई महिला स्नान कर रही है कपड़े उतार करके वो ईश्वर नहीं जानता है। हम यह नहीं कहते कि कहीं पर कोई दुराचार हो रहा है। वो ईश्वर की ईश्वर नहीं जानता है। या कोई भी ऐसी चीज जिसको जानना और जानने पर चुप रहना अपराध माना जा सके वो ईश्वर जानता है। हम यह ईश्वर नहीं जानता है। हम यह नहीं कहते। हम सर्वज्ञ का अर्थ सर्वज्ञ ही लेते हैं। अब इसी इसी में छुपी हुई यह जो जनरल डायर और औरंगजेब वाली इत्यादि वाली बातें वो भी आ जाती है। अगर हम सामान्यत हमारे सामने कोई दुराचरण हो रहा है और हम लोग वहां पर शांत बैठे हैं तो वहां पर हम पर भी दोष आता है। अगर कोई ऐसा दुराचरण जिसमें हमारे पास सामर्थ्य है कि हम उसे रोक सकते हैं। मगर वो हो रहा है। परंतु जब ईश्वर सर्वज्ञ है और उसकी उसकी नॉलेज में सब कुछ पाप आचरण वगैरह हो रहा है तो उस पर यह वाला दोष

00:14:22:16 जा रहा है शांत रहने वाला मगर हम वहां पर पीछे की तात्विक व्याख्या देख लेते हैं। तात्विक व्याख्या देख लेते हैं कि ईश्वर कर्म बंधन है। उसने फ्री विल दी है जीवों को। यहां पर तात्विक व्याख्या के आधार पर हम उसको दोषों से मुक्त कर लेते हैं। दोष लगते हुए भी उसके निर्दोष होना उसका सिद्ध कर लेते हैं। इसी इसका मतलब क्या है? कि जब हम तात्विक व्याख्या देखेंगे तब तो यह सिद्ध हो जाएगा कि दोष जो दिखाई दे रहे हैं वह दोष वस्तुत है नहीं। परंतु जब तक हम तात्विक व्याख्या देखेंगे नहीं तो ऐसी प्रतीति बिल्कुल हो सकती है कि ईश्वर भी पाप आचरण से लिप्त हो रहा है। तो यही जो प्रतीति है ना ये जो जब हम इसको उस प्रपंच रूपी संसार को देखते हैं तो ईश्वर इसमें जो है वास्तविकता वस्तुतः देखते हैं तो ईश्वर अवतरित नहीं होता। उसकी प्रतीति है। परंतु व्यवहारिक सत्य होने के कारण वो हमारे लिए सत्य हो जाता है। एक है परमार्थ कि वस्तुतः क्या हो रहा है और एक है व्यवहार। तो जितना मेरे लिए संसार सत्य है पहाड़ सत्य है। उसमें ईश्वर का जो आना जाना है उसकी जो वो परमार्थ की दृष्टि से प्रतीति मात्र है। परंतु यहां से वो सत्य हो जाता है कि हां ईश्वर आया। उसने अवतार लिया। अब जो यह जनरल डायर और औरंगजेब वाली बात है तो इसमें भी वही वाली बात आती है कि जिस प्रकार से नाली

00:15:37:25 में होते हुए भी हम उसकी तात्विक व्याख्या लेते हुए हम यह मान लेते हैं कि ईश्वर पर नाली में होने का दोष नहीं लग रहा है। बलात्कार का साक्षी होते हुए भी उस पर यह वाला दोष लगते हुए कि वो समर्थवान है। परंतु वो रोक नहीं रहा है। फिर भी उसकी तात्विक व्याख्या जान के हम यह समझ लेते हैं कि ईश्वर पर दोष नहीं लग रहा है। उसी प्रकार से ईश्वर तो यहां पर सब कुछ करता हुआ प्रतीत प्रतीत हो सकता है क्योंकि वह अनंत है अबाध्य है। परंतु जब हम उसकी तात्विक व्याख्या जान लेंगे कि भैया ईश्वर पर ये दोष क्यों नहीं जा रहे? क्योंकि ईश्वर के लिए तो ये प्रपंच मात्र है या माया मात्र है या जो भी है उसके पीछे की कोई एक तात्विक व्याख्या हमारे पास भी है जिसके कारण ईश्वर प्रतीत तो हो सकता है सब कुछ करता हुआ जो व्यवहारिक सत्य के अनुसार सत्य हो जाएगा। परंतु जब हम उसकी तात्विक व्याख्या जानेंगे तो वह सारे दोष ईश्वर उन दोषों से मुक्त हो जाता है। तो जिस प्रकार वही नाली वाली बात या दुराचरण का साक्षी होने वाली बात से हम ईश्वर की तात्व व्याख्या के आधार पर उसको दूर हटा लेते हैं। प्रतीति को हम स्वीकार करते हैं कि हां ऐसी प्रतीति हो सकती है जब तक तात्विक व्याख्या ना हो। और इसके बाद आपने क्या कहा है? एक तो यह हो गया था कि वो अपने कार्य कर सकता है। इसलिए वो सर्वशक्तिमान था। अच्छा इसमें एक बात यह भी आती है कि

00:16:53:01 ईश्वर को अनंत समर्थवान भी कहा गया है। सर्वशक्तिमान में हमने इससे कहा कि भाई सर्वज्ञ में आप सब कुछ मान रहे हो। सर्वव्यापक में आप सब कुछ मान रहे हो। परंतु सर्वशक्तिमान में आप सब कुछ नहीं मान रहे। वहां पर आपने एक अपनी डेफिनेशन दे दी। मगर साथ ही साथ अनंत समर्थवान भी है। तो यहां पर तो उसकी सामर्थ्य का अंत हो रहा है ना। अगर कहीं भी जाकर के अंत होगा जैसे कि अबाध्य तो अगर किसी भी कारण से कारण लॉजिकली हो सकता है वह बाद की बात है मगर किसी भी कारण से यदि बाधा आ रही है किसी भी कारण से यदि आप ये स्वीकार कर रहे हो कि वो उसकी सामर्थ्य का अंत हो रहा है तो फिर उसको वहां अनंत नहीं कहेंगे ना उसको कहेंगे नियमों के कारण ईश्वर भी अनंत सामर्थवान नहीं है तो फिर यह वाली बात अटक जाएगी तो ये दो तीन चीजें वो चौथी पांचवी चीज आपने क्या कही थी मुझे याद नहीं है कुछ आपने और भी बताया था जी तो इसका अर्थ ये हुआ एक तो कि आप जनरल डायर और भगवान श्री कृष्ण में कोई अंतर नहीं मानते। ये तो प्रपंच दिख रहा है। नहीं व्यवहारिक सत्य है। व्यवहारिक व्यवहारिक सत्य है। मानते हैं। व्यवहारिक सत्य ये है कि जनरल डायर हां। मोहम्मद ईसा कुरान और वेद इनमें कोई अंतर नहीं है। नहीं अंतर है

00:18:08:02 ना? व्यवहारिक व्यवहारिक अंतर है मैं बता रहा हूं क्या मैं बता सुनिए सुनिए पहले तात्विक सत्य तो यही है ना सब प्रपंच है तात्विक सत्य है जी मैं और आप बात कर रहे हैं ये भी प्रपंच है हां माया है जी माया है ये माया क्या चीज है माया इससे थोड़ा सा विषयंतर हो जाएगा एक एक चीज है जैसे पहला माया लाए हो माया के कारण मैं कब लाया हूं मैं कब लाया हूं बात को सुनिए। मैंने उसको बता दिया इसलिए जिससे जनता यदि आपके पक्ष को सुन रही है पूरा तो वो यह भी जानती जाए कि मेरे पक्ष मेरे पास तात्विक व्याख्या क्या है। मेरा माया मूल यहां पर कहना नहीं है। मेरा कहना है कि जिस प्रकार से नाली में होते हुए भी आप एक तात्विक व्याख्या के आधार पर वो तात्विक व्याख्या आपकी माया नहीं है। ठीक है? वो क्या है? मैं अभी उस पर नहीं जा रहा। मगर एक तात्विक व्याख्या है जिसके कारण नाली में होने के बावजूद भी आप ईश्वर को निर्दोष मान रहे हैं। विशुद्ध मान रहे हैं। एक तात्विक व्याख्या आपके पास है। मेरा यहां कहने का मतलब ये है। दूसरी एक एक ये पूरा कर लूं ये वाला। उसी प्रकार से बलात्कार का दृष्टा ठीक है बिना कपड़ों के नहाती हुई महिला और ना जाने कितना कितना दुष्कर्म से दुष्कर्म उसका

00:19:23:08 साक्षी होने वाला होते हुए भी आपके पास एक तात्विक व्याख्या है इसलिए आप उसको इन दोषों से भी निर्दोष मानते हैं। इसी प्रकार से मेरे पास भी एक तात्विक व्याख्या होती है जिसके आधार पर मैं सब जगह सब कुछ करने वाला होते हुए भी ईश्वर पर कोई दोष ना लगने वाला उसे सिद्ध कर सकता हूं। वो तात्विक व्याख्या खोलना अभी जरूरी नहीं है। अभी यह है कि ईश्वर यदि अनंत सामर्थवान है तो फिर उसके सामर्थ्य का अंत क्यों हो रहा है? ईश्वर अगर हम अगर हम ईश्वर का सर्वज्ञ का ले रहे हैं सब कुछ जानने वाला सर्व्यापक का ले रहे हैं सब सब जगह होने वाला तो फिर हम सर्वशक्तिमान का मतलब सब कुछ कर सकने वाला क्यों नहीं ले रहे? जी देखिए सर्वज्ञ का अर्थ सब कुछ जानने वाला। लेकिन ये पूछे कि ईश्वर अपनी अपनी मृत्यु भी जानता है क्या कि कब मरेगा तो आप क्या कहेंगे वो तो अलीक पदार्थ है ना हां तो कहेंगे मृत्यु होती मृत्यु होती नहीं तो जानेगा कैसे जी अली पदार्थ हुआ कि नहीं बाधित हुआ कि नहीं नहीं बाधित नहीं हुआ मैं बता मैं बता रहा हूं कैसे मैं बता रहा हूं कैसे बाधित नहीं हुआ बाधित नहीं हुआ और दूसरी बात दूसरी बात एक परीक्षा वाले में विद्यार्थी बैठे हैं परीक्षा देने के लिए। ठीक है?

00:20:39:22 एक निरीक्षक है। कोई कॉपी मांगता है, कॉपी दे देता है। और उसमें एक गाली लिख रहा है। एक सही उत्तर कर रहा है। गाली लिखते हुए देख के भी उसको टोकता नहीं है। रोकता नहीं है। वो कहता है एक और कॉपी चाहिए एक और ले ले। रोकता रोकता नहीं है। जब कॉपी उसके पास जाती है तब अंक देता है। अगर रोकने लग जाए तो जीव की सत्ता ही समाप्त हो जाए। स्वतंत्रता भंग हो जाए। स्वतंत्र करता और फिर हर काम में टोकना सृष्टि नहीं चलेगी। सृष्टि क्यों बनी? जीवों के कर्म के आकर्षण से ही प्रकृति में सृष्टि होने की सृष्टि बनने की प्रवृत्ति हुआ करती है। सा दर्शन कहता है अगर वो रोकने लग जाएगा तो हमारा क्या अस्तित्व है? हम कुछ है कि नहीं? वो तो दंड देगा। कर्मण अधिकार माले गीता में आप भी पढ़ते हैं। हम कर्म करने में हमारा अधिकार है। फल देने में उसका अधिकार नहीं है। उसको रोकने का अधिकार नहीं है। उसको तो दंड देने का अधिकार है। और रोकता भी है। जब भी कोई व्यक्ति गलत काम करता है उसके मन में भय, लज्जा, शंका होती है कि ऐसा मत कर। फिर भी करता है तो

00:21:54:26 फिर दंड मिलता है। तीन सत्ता अनादि ईश्वर की प्रकट। अब उसकी अनंत सामर्थ तो जब भंग होगी जब अवतार लेना पड़ेगा उसको। रावण को मारने के लिए अवतार लेना पड़ेगा। इतने बड़े सूर्य को बनाया, सारे ब्रह्मांड को बनाया, तारों को बनाया, रावण को पैदा भी किया तब नहीं शरीर धारण किया और मारने के लिए शरीर धारण करेगा। वो तो उसके अंदर ही बैठा था। यसत्म आत्म यसत्म शरीर क्या वो रावण के शरीर में नहीं बैठा था? क्या वही नहीं मार सकता था? उसके लिए तो नाटक करना पड़ेगा और नाटक करने से क्या होगा कि वो विकार विकारी हो जाएगा। एक जगह

00:22:40:00 एक जगह अलग स्पेशल क्रिया करेगा तो वो विकारी हो जाएगा और ब्रह्म सूत्र पढ़िए। ईश्वर विकारी नहीं हो सकता। वो निर्विकार है। इसलिए अवतार लेना अवतार लेने की जरूरत पड़ेगी। पृथ्वी को बनाने में, पृथ्वी को चलाने में, सूर्य को बनाने में, सूर्य को घुमाने में, सारी गैलेक्सी घुमाने में और हमें सबको जन्म देने में, हमें सबको मारने में, बड़े-बड़े भूकंप लाने में, बड़े-बड़े तारों में विस्फोट करने में, उसको हाथ पैरों की जरूरत नहीं पड़ती। और वहां हाथ पैरों की जरूरत पड़ेगी। उपन कहता है अपाणि पादो जवनो गहिता वहां बिना हाथ के ग्रहण करता है बिना पैरों के चलता है और वहां रावण को मारने के लिए शरीर लेना पड़ेगा क्यों भाई वैसे नहीं मरता रावण भूकंप इतने आते हैं और फिर कहते हैं कि जन्म लेता क्यों अधर्म के नाश के लिए आज से बड़ा अधर्म कब हुआ आज जितना धरती पर अधर्म हो रहा है मंदिर तोड़े श्री राम के श्री राम जी प्रकट नहीं हुए थोड़ा सा थोड़ा सा थोड़ा सा इसमें एक बात एक निवेदन करना चाहूंगा आप अपनी एक्सप्लेनेशन जारी करिए वो

00:23:55:03 है क्या कि कुछ चीजें ऐसी होती है जिसमें हम अगर उनको संक्षिप्त में भी कह देंगे तो काम चल जाएगा मगर जब विस्तार से कहते हैं तो जैसे उसमें क्या होता है कि भावनाएं लोगों की होती है उससे जुड़ी हुई होती है अब क्या होगा कि भले ही मेरे पास उसका बहुत अच्छा उत्तर है उन भावनात्मक प्रश्नों तो मुझे एक एक्स्ट्रा अलग से समय निकालना पड़ेगा। जरूर मतलब जरूरत पड़नी करनी पड़ेगी कि आपकी उन भावनात्मक बातों का भी उत्तर दूं। जबकि उनका बहुत ज्यादा महत्व नहीं है। तो आप वो जो एक्सप्लेनेशन है कि ऐसा भी हो रहा है। बहुत ज्यादा वो जो आपका क्योंकि ये मैंने देखा है जो आर्य समाज का पक्ष होता है वहां से कहा जाता है कि यहां ये लूटा गया सोमनाथ में ये हुआ वो हुआ। इस तरह से बहुत सारे उदाहरण दे आप एक भी दे देंगे चल जाएगा। जो सिद्धांतिक प्रश्न है वो कर दीजिए। जी कब आता है अधर्म के नाश के लिए आता है परमात्मा आना पड़ता है जी तो सतयुग में अधर्म नहीं था सबसे ज्यादा अवतार सतयुग में हुए समझ गया वो एक से ही हो गया जी तो फिर ये बताइए और सारे अवतार भारत में हुए यही पापी था क्या भारत ही असल में किसी मनुष्य को मारने के लिए ईश्वर को अवतार लेना [हंसी] पड़े तो ईश्वर की गरिमा नहीं बढ़ती उसका सामर्थ उसका

00:25:10:28 सिद्ध नहीं होता सिद्ध उसका सामर्थ होता है जो मरा रावण का सामर्थ सिद्ध हो रहा है कि उसे मारने के लिए सारी सृष्टि के स्वामी को आना पड़ा। कंस का सामर्थ सिद्ध हो रहा है कि उसको मारने के लिए सारी सृष्टि को बनाने वाले को आना पड़ा। ये उनका सामर्थ बढ़ा रहे हम। परमात्मा को नहीं बढ़ा रहे। जी ठीक है। मैं बोलता हूं। आपने एक बात तो पहले ही कही है कि क्या वो अपना अंत बता सकता है? है ना? तो यहां पर उसकी सामर्थ्य का अंत हो रहा है। तो इसमें क्या होता है? यह बहुत सारी ऐसी लॉजिकल फैलेसी होती हैं जो ईश्वर का खंडन करने के लिए नास्तिक इस्तेमाल करते हैं। अब जैसे इसके उत्तर में मैं अगर यह कह दूं कि मैं इसका जो उत्तर है उस व्यक्ति को समझा सकता हूं। इस इस प्रश्न का उत्तर वही व्यक्ति समझ सकता है जो अपना प्रश्न मुझे इस प्रकार से बोले कि मैं समझ ना पाऊं। इस प्रश्न का उत्तर मैं उस व्यक्ति को समझा सकता हूं जो अपना प्रश्न मुझसे इस प्रकार से बोले कि मैं समझ ना पाऊं। तो ये क्या है? एक लॉजिकल फैलेसी मैंने भी एक जवाब में एक दे दी। इसके अलावा और भी चीजें हैं। दूसरी बात अगर हम व्यवहार और परमार्थ मानते हैं। अगर इस जगत को प्रपंच मात्र मान लेते हैं तो ईश्वर की बाधा कहीं भी हो ही नहीं सकती। कैसे नहीं हो सकती? कि

00:26:26:00 ईश्वर जब यहां पर राम रूप में आएंगे, कृष्ण रूप में आए तो आएंगे तो वो घोषित कर सकते हैं। इस व्यवहारिक लीला को मैं कब समाप्त करूंगा? बता सकते हैं अपना अंत व्यवहार में। परमार्थ में नहीं जो पारमार्थिक सत्ता है हम उससे नहीं कह रहे कि ईश्वर अवतार लेता है। व्यवहारिक सत्ता के अनुसार हम कह रहे हैं कि ईश्वर अवतार लेता है। परमार्थ में ईश्वर अवतार नहीं लेता है। वास्तविकता में जो पारमार्थिक सत्य है उसके अनुसार नहीं। जैसे व्यवहार में हमने कोई हमारी माता नहीं है। कोई हमारी बहन नहीं है। कोई हमारा पिता नहीं है। सब जीवात्मा मात्र हैं। यह पारमार्थिक सत्य है। परंतु व्यवहार में हमने स्वीकार किया है कि ये हमारी माता जी है। हमारी बहन जी हैं। और उसके अनुसार हम बिहेव भी कर रहे हैं। जैसे कि पृथ्वी वैज्ञान के आधार पर गोल मानी जाती है। ठीक है? परंतु हमारे व्यवहार में पृथ्वी चपटी आती है। तो हम पृथ्वी के साथ चपटा व्यवहार करते हैं यह जानते हुए कि कि पृथ्वी गोल है। थ्योरिकली वो गोल है। तो एक तो ये वाली बात हो गई कि ईश्वर किस प्रकार से कर सकता है। दूसरी बात अलीक पदार्थ कैसे है? अलीक पदार्थ ऐसे है कि जैसे हमने कहा ईश्वर क्या ईश्वर अपना अंत बता सकता है। अब मैं उसकी बात कर रहा हूं परमार्थ पारमार्थिक सत्ता की। तो ईश्व क्या ईश्वर यह बता सकता है कि उसका अंत कहां पर है? जब हमने खुद ही यह स्वीकार किया है कि ईश्वर वो है जिसका कोई अंत नहीं है तो फिर ईश्वर पर अंत बताने का हम वो करके अपने प्रश्न

00:27:41:03 में जो ईश्वर शब्द का इस्तेमाल कर रहे हैं उसका खंडन खुद ही कर रहे हैं। मतलब हमने पहले कुछ बोला और बाद में खुद ही उस चीज को काट दिया। एक ऐसा वाक्य बोला जिसमें पहले जो भी हमने बोला है बाद में उसका खुद ही खंडन कर दिया। तो हमारे वाक्य का निचोड़ यह आया जब हम यह वाक्य बोल रहे हैं। क्या ईश्वर अपना अंत बता सकता है? तो हम अप्रत्यक्ष रूप से कह रहे हैं क्या ईश्वर ऐसा कुछ बता सकता है कि कुछ भी पता ना लगे क्योंकि उस प्रश्न का जब हम निचोड़ निकालेंगे ईश्वर भी आ गया और हमने उस पर अंत भी थोप दिया ईश्वर भी आ गया और उस पर हमने अंत भी थोप दिया यानी अंत थोपने से हमने उसे ईश्वर नहीं माना और ईश्वर कहने से हमने उसे ईश्वर मान लिया यानी हमने एक एक पंक्ति में दो बातें बोल दी और पहली वाली बात से दूसरी वाली बात काट दी दूसरी वाली बात से पहली वाली बात काट दी तो हम अंततवा अपने इस पंक्ति में यह पूछ रहे हैं कि क्या ईश्वर हमें कुछ ऐसा बता सकता है कि कुछ हमें कुछ भी ना सुनाई दे तो बिल्कुल ईश्वर ऐसा कर सकता है ईश्वर मौन रहेगा हमें कुछ भी सुनाई नहीं देगा हो गया एक मिनट मैं आगे पूरा कर दूं अच्छा फिर आगे आपने कहा तात्विक व्याख्या आपने बताई वो जो वो जो क्या कहते हैं इस्लाम वाले भी यही वो रखते हैं कि

00:28:56:07 भाई ईश्वर हस्तक्षेप क्यों नहीं करता तो वो एक अलग तात्व व्याख्या हो जाएगी। मैंने तो पहले ही स्वीकार किया कि नाली में रहते हुए भी हम ईश्वर को विशुद्ध मानते हैं। सबसे पवित्र मानते हैं। नाली में भी है तब भी हर कण में है तब भी हम पवित्र मानते हैं ईश्वर को। तो हमारे पास क्योंकि उसके लिए एक तात्विक व्याख्या है। परंतु जब तक वो तात्विक व्याख्या हम बता नहीं रहे हैं तब तक ऐसी प्रतीति हो सकती है कि ईश्वर एक अशुद्ध अशुद्धि अशुद्धि से जुड़ा जुड़ा हुआ है। ठीक है? उसी प्रकार से मैंने कहा है कि प्रतीति में ये जो व्यवहारिक प्रतीति है हमारी इसमें ईश्वर का अवतार हो सकता है। उसी आधार वो सब कुछ करने वाला हमें प्रतीत हो सकता है। इसीलिए भगवान ने कहा मैं अजन्मा अविनाशी होते हुए भी अपनी योग माया को अधीन करके प्रकट होता हूं। इसीलिए वेद में भी इस तरह के वाक्य आए हैं कि यद्यपि वे अजन्मा है अविनाशी है। फिर भी वो नाना रूपों में माया के द्वारा उत्पन्न होता है। कौन सा वेद मंत्र है? मैं मैं अभी बता दूंगा। मैं वो जो है ना जो प्रमाण वाली बात है उसको एक सेकंड सेशन में चालू रखना चाहता हूं। इसीलिए मैंने आपके किसी भी प्रमाण में प्रमाण नहीं दिया। अच्छा अब विकारी वाली बात भी मैंने आपको बता दी नाली वाली बात और दुराचरण का दृष्टा होने पर भी मौन रहने वाली बात। यानी कि

00:30:11:13 जब तक मैं आपसे आपकी तात्विक व्याख्या नहीं पूछूंगा तब तक मुझे ईश्वर ऐसा प्रतीत हो सकता है कि हां ईश्वर विकार से जुड़ा हुआ है। यह प्रतीति हो सकती है। तो वही वाली बात है कि समस्त कर्मों को करते हुए भी गीता के अनुसार तू मुझे अकर्ता जान। क्यों अकर्ता? क्योंकि ना ही मैं उनसे वो जो कर्म हो रहे हैं उनसे मिलने वाले फल में मेरी आसक्ति है। और वास्तविकता तो है कि कहीं कुछ हो ही नहीं रहा है। चार 24 भगवत गीता। तो मेरे पास एक तात्विक व्याख्या होती है जिसके कारण वो जो प्रतीति हो रही है भगवान की वो जो प्रतीति हो रही है भगवान की समस्त उसमें होने वाली उस तात्विक व्याख्या के आधार पर उस जो दोष लग सकता है भगवान पर वो हम उससे निर्दोष उसे सिद्ध कर लेते हैं। तीसरी बात अब अब आई सबसे वो वाली बात कि कंस को मारने क्यों नहीं आए और सारे अवतार जो है भारत में ही क्यों हुए? तो मैं यह नहीं कह रहा हूं कि ईश्वर बाध्य है कंस को मारने के लिए अवतार लेने के लिए। ईश्वर बाध्य नहीं है। जैसे कि ईश्वर ने ईश्वर ने वेदों में अलंकार क्यों दिए? वेदों में जगह-गह पर अलंकार माना गया है। तो ईश्वर ने अलंकार क्यों दिए? बाध्य नहीं है। मगर हम यह कहेंगे कि ईश्वर जो है ऐसे बहुत से प्रश्न उठ जाएंगे कि उसने पेड़ों का कलर हरा ही क्यों चुना?

00:31:27:03 या उसने अमुक व्यवस्था क्यों की? तो ईश्वर अवतार के लिए बाध्य नहीं है और अवतार का जो मुख्य प्रयोजन है वह किसी को मारना ही नहीं है। ऐसी लीला में आना इस तरह का रूप धारण करना कि उस रूप के प्रति इस प्रपंच रूपी अविद्या रूपी संसार में जुड़ा हुआ व्यक्ति उस रूप के प्रति आकृष्ट हो सके। उसमें अपनी निष्ठा ला सके और उसमें ध्यान केंद्रित करके अपना भगवत भजन करते हुए मुक्त हो सके। भक्ति कर सके भगवान। एक और है। तो अब यह वाली बात है कि जो है उसको अवतार लेने की आवश्यकता क्या है? तो इसमें बहुत सी बातें फिर आ जाएंगी कि उसको जो है बहुत सी ऐसी चीजें उसने की है कि उसको अपना ज्ञान विज्ञान मंत्र के रूप में देने की आवश्यकता ही क्या है? उसमें भी अलंकार देने की आवश्यकता ही क्या है? बहुत सी चीजें उसमें आती जाएंगी और अंत में अंत में ये आएगा कि ईश्वर की अपनी आवश्यकता तो कुछ है ही नहीं। वह तो सच्चिदानंद है। उसको तो कुछ भी करने की आवश्यकता नहीं है। तो यह वाली बात है। और अगली बात है सारे अवतार भारत में ही के हुए। तो ये प्रश्न तो आर्य समाज से भी किया जा सकता है कि वेद मंत्र केवल भारत के ऋषियों को ही प्राप्त क्यों हुए? ये भी हो सकता है। दूसरी बात सारे अवतार भारत में नहीं हुए हैं। जहां पर भगवान ने अवतार लिए हैं उसे भारत कहा गया। इसको थोड़ा सा देखने का नजरिया जहां पर भगवान के

00:32:42:04 एक मिनट सारे एक मिनट सारे अवतार भारत में नहीं हुए हैं। जहां पर भगवान के अवतार होते हैं उसे भारत कहा गया। एक चीज और है आपकी वो रह गई जो आपने कहा कि पाप आचरण होता है तो वो आता है। पाप जब बढ़ जाता है तो आता है। ये प्रश्न आर्य समाज से भी किया जा सकता है कि वो कर्मों का फल देता है। वो कर्मों का फल देता है। तो अब और कब कौन से कर्म का इंतजार है? दुनिया मैं नहीं कह रहा मैं नहीं कह रहा है नहीं नहीं आपने ये कहा ना कि ईश्वर जो है आप कहते हैं आप कहते हैं यदा परित्राण साधु नाम तो ये तो ये तो ये वाली बात आप कहते हैं ना कि ईश्वर कर्मों का फल देता है कर्म उसके लिए शरीर धारण की जरूरत नहीं एक एक मिनट एक मिनट वो बात ये आ रही है कि अगर कर्मों का फल ईश्वर देता है तो कब देगा भाई निर्भय हत्याकांड हो रहा है लोग लुट रहे हैं भूखे मर रहे फाइल हो रही है दुनिया में ना जाने आप ही के चैनल पर मैंने देखा कितनी सारी वामपंथी साजिशें षड्यंत्र हो रहे हैं और कब देगा ईश्वर कर्मों का फल बस अब ये तो ये हां ठीक है जी बोलिए आपके एक बात सबके मूल में आ रही है ये जगत प्रपंच है पारमार्थिक तात्विक ये शब्द जाल में मतल उलझाइए सुनिए

00:33:57:06 जगत प्रपंच नहीं है जगत वास्तविकता है ब्रह्म सूत्र का दूसरा दूसरा सूत्र क्या कहता है? अ पहला सूत्र है अथातो ब्रह्म जिज्ञासा दूसरा [गला साफ़ करने की आवाज़] कहता है जन्मादेशत प्रपंच का जन्म नहीं होता। अच्छा जगत प्रपंच क्या है? प्रपंच मतलब है नहीं पर दिख रहा है। किसको दिख रहा है? देखने वाला कौन है? एक आपको मैं एक एक छोटी सी चीज बस छोटा सा पहले जी बोलिए बोलिए बोलिए पूरा लेक्चर दिया। बोलिए जगत प्रपंच नहीं है। जगत वास्तविक है। जगत मिथ्या नहीं है। ईश्वर जीव प्रकृति तीनों अनादि है। सुपर्णा सजा सखाया समान वृक्षम परिजाते ये वेद मंत्र कहता है इस प्रकृति रूपी वृक्ष पर दो पक्षी है। एक फल खाता है, देखता है, खाता है, उछल कूद करता है। एक साक्षी भाव से [हंसी] साक्षी भाव वाला है। जीव कर्म फल करता और भोगता है। वैसे योग दर्शन कहता है व्यास भाष्य में महर्षि व्यास जी ने लिखा है कि उस ईश्वर

00:35:12:12 का अपना कोई प्रयोजन नहीं सृष्टि बनाने में। सब जीवो के अनुग्रह के लिए सब जीवो को के उपकार के लिए वो सृष्टि रचना करता है। जब जीव ही नहीं है वो भी प्रपंच है। वो भी ब्रह्म रूप है। तो सृष्टि क्यों बनाई? किसी भी ऋषि ने इसको प्रपंच नहीं कहा है और सरपंच हो भी नहीं सकता। प्रपंच हो भी नहीं सकता है। अगर एक ही ब्रह्म मानेंगे बाकी सब प्रपंच मानेंगे तो प्रपंच देखने वाला भी ब्रह्म अज्ञानी सिद्ध हो जाएगा। एक ही ब्रह्म है। दूसरा है नहीं। ये कहां लिखा है? कोई भी वेद मंत्र ही नहीं सिद्ध कर। किसी वेद मंत्र में किसी उपनिषद में नहीं है। नाली नाली वाली बात कर रहे हैं। अब पहले कीचड़ होता क्या है? कीचड़ कुछ मॉलिक्यूल्स का समूह है। मॉलिक्यूल बहुत बड़ा होता है। मॉलिक्यूल एटम से बना होता है। एटम इलेक्ट्रॉन प्रोटॉन न्यूट्रॉन से बना होता है। और ये क्वारक आदि से बने होते हैं। और ये सूक्ष्म रश्मियों से बने होते हैं। बीच में बहुत सारा गैप होता है। आकाश होता है। दुर्गंध जैसे मीठा है। शक्कर है। शक्कर के अंदर जो मॉलिक्यूल है वो मीठे हैं। लेकिन मॉलिक्यूल से जाएंगे तो मिठास खत्म हो जाएगी। उनके

00:36:27:15 अंदर जो आकाश आकाश ना मीठा खट्टा है फिर भी वो प्रभावित नहीं होता। लेकिन परमात्मा तो आकाश से भी सूक्ष्म है। मैं हम यहां बैठे हैं कमरे में। कमरे में दुर्गंध हुई। कमरे में आकाश भी है। क्या आकाश भी दुर्गंधित होगा? ईश्वर तो छोड़िए। ईश्वर तो बहुत आगे की चीज है। आकाश पर भी सुगंध दुर्गंध का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। आकाश का ये गुण ही नहीं है तो ईश्वर तो बहुत सूक्ष्म है तो ईश्वर उस गंदगी से प्रभावित कैसे हो जाएगा ईश्वर तो उनके अंदर है ऐसे ही जब आकाश प्रभावित नहीं होता हमारे अंदर मेरे शरीर के अंदर मैं आत्मा हूं मैं मेरे अंदर दो प्रकार की क्रिया हो रही है एक ऐच्छिक क्रियाएं एक अनैच्छिक क्रियाएं हृदय का धड़कना भोजन का पचना रक्त संचरण होना ये सारे जो फिजियोलॉजी हो रही है, फिजियोलॉजी काम है, ये ईश्वर का है। ईश्वर के बिना नहीं हो सकता। सारे फोर्सन काम कर रहे हैं। लेकिन मैं भोजन करता हूं। ये मेरा काम है। करूं नहीं करूं। लेकिन भोजन करने के बाद पेट में जाने के बाद मेरा काम समाप्त हुआ। फिर परमात्मा संभाल लेता है। तो इच्छा जो काम इच्छा से हो रहे हैं। मैं करूं या नहीं करूं? स्वतंत्रता से करता हूं। इसका मैं फल

00:37:42:21 भोग रहा हूं। लेकिन अंदर जो काम हो रहे हैं वह ईश्वर के कारण है। तो ईश्वर उससे प्रभावित इसलिए है क्योंकि वो ईश्वर का क्षेत्र नहीं है। ईश्वर तो मुझे मेरे कामों का दंड आप कह रहे हो कि कब दंड देगा? हमारे हजारों लाखों जन्मों के संस्कार आते हैं। उसके सामने हमारा जीवन कुछ भी नहीं है। जन अगर इसी जन्म में संस्कार समाप्त हो जाए तो आगे सृष्टि बंद हो जाएगी। कर्मों का फल देने के लिए सृष्टि रचता है। इसलिए ये मत कहिए कि कब कब जन्म कब दंड देगा जब उसके यहां से चला जाएगा यहां भी दंड मिल सकता है आगे भी मिल सकता है। इसलिए इसके लिए हम उत्तरदाई है। तो सारा प्रपंच तात्विक और पारमार्थिक ये व्याख्या ही गलत है। ये वेद विरुद्ध है। ये दर्शन विरुद्ध है। ब्रह्म सूत्र के विरुद्ध भी है। अलग-अलग मत करिए क्या तात्विक है व्यवहारिक है। ठीक है? हो गया। और दूसरी बात आप कहते हैं कि अवतार ले वो लीला करता है। बताता नहीं है। अच्छा लीला करने वाला झूठा होता है कि सत्यवादी होता है? मैं लीला करूं। लीला करने वाला मिथ्यावादी हुआ कि सत्यवादी हुआ? मैं हूं नहीं वो दिखाऊं। और

00:38:57:22 जो हूं जो हूं उसे दिखाऊं नहीं। ये मिथ्याचरण हुआ। तो ब्रह्म मिथ्याचरण नहीं कर सकता। जहां भी प्रमाण में बाद में आएंगे कहीं भी वेद में नहीं है कि ईश्वर अवतार लेता है। [हंसी] ले सकने की बात है। अनंत ईश्वर का अवतार लेने का वो सोचेगा भी तो भी उसका अनंत सामर्थ्य भंग हो जाएगा कि सारी सृष्टि में बसते हुए भी सारी सृष्टि में रहते हुए भी रावण को नहीं मार सकता या किसी को खुश नहीं कर सकता। खुश क्या करेगा? इतनी सृष्टि इतनी बड़ी सृष्टि में मैं चाहूं कि भगवान मुझे दर्शन दे दे उसके लिए मुझे प्रसन्न करने के लिए आ जाए प्रकट हो जाए यही ईश्वर का काम रहे क्या ईश्वर का काम जन्मादेश तो शंकर आचार्य शंकर जी का भाष पढ़िए जगत की जन्म स्थिति प्रलय करना उसका काम है ना कि किसी को खुश करना किसी को नाराज करना ये उसका काम नहीं है उसका काम है जगत की सृष्टि करना संचालन करना समय पर प्रलय करना सबके कर्मों के अनुसार फल देना ये ईश्वर का कार्य है और ये वो करता है बिना किसी की सहायता करता यही उसका अनंत सामर्थ्य है बताइए सारे ब्रह्मांड को बनाने वाला सारे ब्रह्मांड को चलाने वाला उसका ये कम सामर्थ्य माना

00:40:12:26 जाएगा क्या यही तो अनंत है हो गया हां हो गया आपका ठीक है पहली बात तो ये है कि तात्विक पारमार्थिक इनको अलग-अलग मत करिए मैं अभी आ रहा हूं मैं अभी आ रहा हूं तात्विक पारमार्थिक पे ही आ रहा हूं जी पहली बात तो ये है कि जैसे मैंने कहा था कि आपके पास एक तात्विक व्याख्या होती है। मैं इसको एक्सप्लेन करूंगा पूरा। जैसे मैंने कहा था कि आपके पास एक तात्विक व्याख्या होती है। जब ईश्वर पर दोष की प्रतीति होती है तो आप उसको बचा लेते हो। उसी प्रकार से एक तात्विक व्याख्या होती है। जब ईश्वर पर दोष की प्रतीति होगी तो हम उसे सिद्ध करेंगे निर्दोष। मगर अब आपने जैसे उसको खोला ही है कि भाई माया कहा गया है कि नहीं कहा गया। माया है कि नहीं है। तो इसमें यह वाली बात आती है। इसमें मैं इसको अलग से रख लेता हूं माया वाले मामले को खोलने के लिए। पर इसमें सबसे पहली बात एक ये आती है कि आपने कहा कि वो बहुत कुछ कर रहा है। बहुत कुछ कर रहा है। पर एक चीज करने ना करने के लिए बाधित है तो यहां अंत हो रहा है ना। चाहे एक मेरे को पूरा कर ले दीजिए। चाहे एक सुई के बराबर की कमी रह रही है। मगर अंत हो रहा है उसकी सामर्थ्य का। पहली बात। दूसरी बात यह आती है आपने उसको बचाने के लिए कहा कि नाली मॉलिक्यूल वगैरह आपने उसकी डेफिनेशन दी कि उसमें क्या होता है। मगर जैसे

00:41:27:27 कि हम यह कहते हैं कि अगर हम मल से स्पर्श हो जाएगा तो हम अपवित्र मानेंगे खुद को और अपने को शुद्ध शुद्ध करेंगे। यानी कि मल से स्पर्श होने पर हमारा मल में होने पर मल से लिपट जाने पर हम अपवित्र मान रहे हैं अपने आप को। मगर वहीं पर मल से एक ही भूत होते हुए भी भगवान को हम उस मल से उत्पन्न होने वाली विकृति से विकृत नहीं मान रहे। ठीक है? इसी प्रकार से आपने और भी चीजें कही कि वो गंदगी प्रभावित इसी प्रकार से एक चीज और है शुरू में ही आपने कहा कि जो जो मनुष्य जो भी काम करता है हम जो भी काम कार्य करते हैं उसमें अंतत गतवा हमें ईश्वर की सहायता लेनी पड़ती है। ईश्वर को किसी की सहायता यानी कि दुनिया में जो भी कार्य हो रहे हैं अच्छे बुरे उसमें मनुष्य ईश्वर की सहायता ले रहा है। यह प्रतीति हो गई। ठीक है? अब इसमें बात यह आती है कि जिस जिस पदार्थ के साथ एक ही भूत होने पर स्पर्श हो जाने पर मनुष्य को दोष लग रहा है उसी पदार्थ के साथ एक ही भूत हो जाने पर ईश्वर को आप दोष नहीं दे रहे। एक एक दो पॉइंट ले लीजिए। एक एक पॉइंट हां ये हो गया। एक मिनट नहीं आपने चार पांच पॉइंट दिए ना। शुरू से सारे पॉइंट आप ले चल रहे हो इसलिए लेने के लिए ले चल। तो दूसरी बात जिस कार्य को करने में

00:42:42:28 निमित्त होने के बाद मनुष्य पर दोष लग रहा है उसी कार्य में निमित्त होने के बावजूद भी ईश्वर को आप दोष मुक्त मान रहे हैं। ठीक है? तो एक ये वाली बात हो गई। दूसरी बात आपने कहा कि वो आएगा आने से जो है हां ये वाली बात आप नहीं कह सकते कि वो कब देगा कर्मों का फल। आज नहीं मिलेगा तो कल मिल जाएगा। तो यह बात तो हम भी कह सकते हैं। यह बात आप भी नहीं कह सकते कि अवतार कब लेगा। वो उसकी इच्छा पर आधारित है। उसको कब उचित लग रहा है? कब क्या कौन सा अवतार लेना है। तो हम बाधित थोड़ी ना कर सकते उसको कब लेगा वो अवतार। जी हां जी जी ये हो गया। तो यानी कि जैसे कर्म जैसे कर्मों का फल देने के लिए ईश्वर स्वतंत्र है कि उसकी अपनी मर्जी वो कब देगा और कब वो उसके चीजों को अप्लाई करेगा। उसी तरीके से ईश्वर के पास भी अवतार लेने की भी स्वतंत्रता है कि वो कब लेगा उसके लिए उसको बाधित मत करिए कि कब आएगा ये फिर आप मत करिए। दूसरी बात अ मिथ्यावादी हां आपने कहा कि ईश्वर मिथ्यावादी नहीं हो सकता। ठीक है? जैसे किसी व्यक्ति को दंड दे रहा है ईश्वर। है ना? किसी व्यक्ति को दंड दे रहा है और दंड स्वरूप अभी घर से व्यक्ति बाहर निकला और उस पर कोई

00:43:58:04 उल्का पिंड आकर के गिर गया तो ये कार्य ईश्वर का है कि नहीं इस तरह से दंड दे देना ईश्वर का है ईश्वर का है तो यहां पर ईश्वर ने उसके साथ छल किया कि नहीं किया वो व्यक्ति वो व्यक्ति घर से बाहर देख के निकला वेदर की रिपोर्ट वगैरह हर चीज बिल्कुल सही है और मौसम भी बिल्कुल साफ है अचानक से बिल्कुल मौसम के विपरीत उसको को दंड मिल गया। अब अब रुक जाइए। इनका उत्तर देता हूं। रुकिए। जी जी अब जो गंदगी वाले हमने मल से हाथ लगा दिया तो हम अशुद्ध हो गए ना। आत्मा शुद्ध नहीं होता। ध्यान रखिए हमारा हाथ शरीर अशुद्ध होता है। ईश्वर का शरीर नहीं अशुद्ध कैसे होगा? ईश्वर सारा ब्रह्मांड शरीर है। उसके अंदर सब भरा हुआ है। हमारा हम इसलिए अशुद्ध हुए क्योंकि हम हम शुद्ध नहीं हाथ अशुद्ध हुआ था आत्मा शुद्ध नहीं होता तो आत्मा में कोई फर्क पड़ेगा आत्मा कहीं भी जाएगा वो अशुद्ध नहीं होगा ध्यान रखिए दूसरी बात ईश्वर की इच्छा होगी जब जन्म पर जन्म तो लेता ही नहीं है कर्म फल तो देने वाला है कर्म फल तो देना उसकी अनिवार्यता है कर्म फल देना उसका कार्य है अवतार लेना उसका कार्य नहीं है

00:45:14:02 सब जगह जन्मा अायमान और फिर भी आप जन्म दिला रहे हैं उसको और कोई प्रयोजन नहीं है। क्या प्रयोजन है बताइए? किसी दुष्ट को मारना भी प्रयोजन नहीं है। धर्म की रक्षा भी प्रयोजन नहीं है। कुतहल के लिए आप जो मेरे से बातचीत कर रहे हैं ये कुतल के लिए है या किसी प्रयोजन के लिए है? ये बताइए। प्रयोजन के लिए और वो बिना प्रयोजन के जब चाहे प्रकट हो जाएगा। और अपने सृष्टि नियम जो उसके नियम है उनके विरुद्ध प्रकट हो जाएगा। उनके विरुद्ध प्रकट हो जाएगा। अब उल्का पिंड गिर गया। उल्का पिंड गिरा उसके पीछे उसके कितने संस्कार होंगे अंदर? रामायण पढ़िए। रामायण श्री राम राजतिलक होने वाला वनवास हो गया। तो श्री राम कहते इसी को दव कहते हैं। जो सोचा था वह ना होवे। और जो नहीं सोचा था हो जाए इसी को दव कहते हैं। तो ये दवश हुआ। प्रारब्ध यही प्रारब्ध है नहीं तो प्रारब्ध की धारणा ही समाप्त हो जाएगी फिर तो कर्म फल व्यवस्था ही खत्म हो जाएगी

00:46:30:00 ठीक है अब एक एक बिंदु रखिए एक बिंदु संक्षेप में फिर उसका उत्तर फिर उसके बाद ऐसे कई एक साथ हो जाते है तो मालूम नहीं पड़ता हां वही दिक्कत आ जाती है सबसे पहली बात तो प्रपंच वाली बात वो इस वाले इस वाले मैंने प्रपंच बोला नहीं वैसे फिर भी आप बोल नहीं पर आप बार-बार पारमार्थिक तात्विक प्रपंच शब्द है ना यही वेद विरुद्ध है ये विज्ञान विरुद्ध है व्यवहार विरुद्ध है ठीक है और ये दार्शनिक सबसे बड़ी बुराई अद्वैतवादी है अद्वैतवाद का मतलब ये आप निर्णय निर्णय निर्णय पे ना जाए बुराई है ऐसा ना करें प्लीज निवेदन है निर्णय पे ना जाए नहीं तो निर्णय कर लेंगे उस पर भी कर लेंगे निर्णय निर्णय करेंगे अभी जब तक तर्क वितर्क चल रहा है तब तक घोषणा ना हां इसी पे चलिए। हां। अब आपकी सबसे लास्ट बात ही मैं पहले ले लेता हूं। प्रपंच वाली। आपने कहा आपने खुद कहा कि हम अ क्या कहते हैं? उससे लिप्त हो जाते हैं। जब मल से स्पर्श में आ जाते हैं तो हमारा शरीर होता है। इसलिए हम मानते हैं कि हम हो गए अपवित्र। परंतु हमारी आत्मा अशुद्ध नहीं होती है। आत्मा नहीं होती है। पर फिर भी हम अपनी शुद्धि का लिए कार्य करते हैं। उसमें आत्मा भी लिप्त होती

00:47:45:03 है कार्य में। यही है व्यवहार और परमार्थ का अंतर। शरीर के कारण हम लोग अपवित्र हो भी रहे हैं और जबकि हमारी आत्मा जो है वो अभी भी शुद्ध है। इसी इसी एक मिनट इसको पूरा कर लूं। व्यवहार परमार्थ इसी को कहा है मैंने व्यवहार और परमार्थ या फिर प्रपंच रूपी संसार और तात्विक व्याख्या तात्विक व्याख्या क्या है कि आत्मा को कभी कुछ नहीं होता। नैन चंद श्राण नैन दहति पावक ना चैन क्ल मारता और यह जो जड़ है जो इसमें संपर्क में आ रहा है शरीर हमारा है ना जो गंदा हो रहा है जो अपवित्र हो रहा है उसके कारण हम अपने को मान रहे हैं कि हम गंदे हो गए है ना ये हमारा व्यवहार हो गया उसके कारण हम परेशान भी होते हैं हम अपने आप को साफ भी करते हैं जाकर ये व्यवहार हो गया हो गई एक मिनट एक मिनट तो तो इसी प्रकार से जब जब ईश्वर आप कह रहे हैं कि ईश्वर आएगा तो उस पर ये दिखाई दिखाई देगा वो दिखाई देगा तो वह यहां होते हुए भी लिप्त इसलिए नहीं होगा क्योंकि वास्तविकता में वह भी अशुद्ध नहीं हुआ है। वास्तविकता में वो भी प्रतीति मात्र है। जिस प्रकार से मेरा इस शरीर से जुड़ा होना प्रतीति मात्र है। उसी प्रकार से उसका अवतार भी प्रतीति मात्र है जो व्यवहारिक सत्य है। इससे इससे अवतार सिद्ध नहीं हुआ। इससे अवतार

00:49:00:07 सिद्ध नहीं हुआ। इससे तो वो कीचड़ वाला उदाहरण सिद्ध हो रहा है। कीचड़ वाला इससे इससे अगर इससे अवतार इससे अवतार अगर सिद्ध नहीं हुआ तो मेरी ना तो कोई माता सिद्ध होगी ना मुझे कोई जन्म देने वाला सिद्ध होगा। अगर तात्विक व्याख्या ही दे क्योंकि आत्मा का तो कोई जन्मदाता नहीं है। तो ना तो मेरा कोई पिता एक मिनट ना तो मेरा कोई पिता है ना कोई मेरी मां है ना कोई मेरा ना मैं गंदा हुआ हूं मल से स्पर्श होने के कारण है ना मगर ये सब बातें अगर जितनी ये सब बातें सत्य है उतना ही भगवान का हमारे बीच में आना सत्य है सुनिए जब हां जी जहां ये ना आत्मा शुद्ध रहते हुए भी कैसे मान लेता है मैं गंदा हो गया इसलिए मान लेता है कि आत्मा का साधन है हमारा साधन मोटरसाइकिल पर जाएंगे मोटरसाइकिल खराब होगी पीड़ा हमें होगी मोटरसाइकिल को नहीं होगी परमात्मा का कोई साधन नहीं है उपनिषद ये भी तो कहता है ननम सिंध तो कहता है लेकिन ननम गीता कहती है और उपनिषद भी ए दृष्टा स्पष्ट सोता जाता मनता बोधा ये ईश्वरी स्पर्श करने वाला है यही बोलने वाला है यही सोचने वाला है ये सब सुनने वाला है सूंघने वाला चखने वाला यही सब है क्यों ये इन करण से शुरू करता

00:50:15:10 है ईश्वर ईश्वर में हम में अंतर है क्या ईश्वर अपने लिए संसार नहीं बनाता हमारे लिए बनाता है ईश्वर जन्म लेकर के विभिन्न योनि में घूमता हुआ अपने फलों को नहीं भोगता और मोक्ष को प्राप्त नहीं करता क्योंकि वो मुक्त ही है। लेकिन हम जन्म जन्मों में जाते हैं योनियों में जाते हैं। ये हम में उनमें अंतर है। ईश्वर के लिए नहीं कहा। वास जी यथाई ये ईश्वर के लिए नहीं कहा है। इसीलिए माने शरीर ईश्वर के लिए नहीं कहा। हम जीवो के लिए कहा है। इसलिए इसलिए क्या कह रहे हो? तो ईश्वर अवतार लेगा तो उसके लिए भी यही बात। इसीलिए मैं कह रहा हूं कि ये ये अंतर है ईश्वर और जीव में। इसीलिए जिन कार्यों से जिन कारणों से जीव वो मनुष्य रूप में अपवित्र सिद्ध हो रहा है उनहीं कारणों से उन्हीं विषयों से जो ईश्वर है वो अवतार रूप में अपवित्र सिद्ध नहीं होगा इनहीं कारणों से अवतार अच्छा जीव और ब्रह्म अलग-अलग है ये फिर एक फिर विषय होगा अभी आप इसका आप इसका उत्तर दे दीजिए देखिए इसका जिस समय अवतार में आता है अवतार में आता है ब्रह्म रूप मैं मैं एक चीज कह रहा हूं मैं एक चीज चीज कह रहा हूं आपको कि लास्ट

00:51:30:19 के जो चार पॉइंट पे हमारी बात हुई थी उसके इसको मैं कर लूं। उसके बाद फिर आप एक-एक करके उस पर हम लोग जब तक खत्म नहीं हुई तब तक बात करते रहेंगे। इस पर एक बार करिए। हां इसमें एक है आपने कहा कि ईश्वर का शरीर नहीं है इसलिए वो वो नहीं होता। ये मैंने दे दिया। अवतार लेना उसका कार्य नहीं है। तो अवतार लेना उसका कार्य नहीं है। उसी जिस प्रकार से पत्थर गिराना किसी दुष्ट पर उसका कार्य नहीं है। पर गिराया। उसको दंड देना था। पत्थर गिरा कर गिरा दिया। उसका कार्य नहीं है। वह और तरीकों से भी मार सकता है। पत्थर गिरा के ही मारना जरूरी नहीं है। वो केवल अपनी [गला साफ़ करने की आवाज़] एक एक मिनट वो केवल अपनी शब्द शक्ति से भी किसी को उसके कर्मों का दंड दे सकता है। ठीक है? और तो और ये जिस रूप में हमको ज्ञान विज्ञान प्राप्त हो रहा है जो वैदिक विज्ञान है जो हमें मंत्रों के रूप में प्राप्त हो रहा है तो वो भी उसका जरूरी नहीं है कि मंत्रों के रूप में ही दे। केवल वो अपने मन में सोचे और हमारे मन में वो ज्ञान आ जाएगा। उसको मंत्र के रूप में कि भाई वह इतने नंबर का सूक्त है। फिर उसमें इतने नंबर के सूक्त में इतने नंबर का मंत्र में यह लिखा है। इस रूप में देने की कोई आवश्यकता नहीं है। वो केवल अपने स्मरण करेगा और कर देगा। और आपने कहा सृष्टि नियम के विरुद्ध इसको मैं लास्ट में ले लूंगा सृष्टि नियम के विरुद्ध वाला कि जैसे आपने कहा सृष्टि नियम के विरुद्ध तो सृष्टि नियम के विरुद्ध मैं यही समझता हूं कि जैसे ईश्वर

00:52:45:20 का जो स्वरूप है वो है वो सर्व व्यापक है। फिर वो एक देश कैसे हो सकता है? ये सृष्टि उसका जो स्वाभाविक नियम आ गया तो इसमें बात ये आती है कि जो ईश्वर सब जगह है वो किसी एक देश काल परिस्थिति में कुछ चार ऋषियों के लिए व्यवहारिक कैसे हो गया जो ईश्वर सब जगह है वो भूर भुवा स्वाहा जब हम गायत्री मंत्र पढ़ते हैं तो हम कहते हैं हमें बुद्धि दो तो यह माना जाता है कि जो व्यक्ति गायत्री मंत्र पढ़ेगा उसको ईश्वर बुद्धि प्रदान करेंगे यदि वो योग्य हुआ तो तो वो सेलेक्टिव हो के लोगों को ज्ञान कैसे दे रहा है बुद्धि कैसे दे रहा है या व्यवहारिक हो रहा है और जहां व्यवहारिक होगा वहां विशेष होगा। जहां विशेष होगा तो वो अनंत रूप से तो हो नहीं सकता क्योंकि उसको किसी को ज्ञान देना है, किसी को नहीं देना है। तो वहां पर भी उसका एक देश हो के ही उस व्यवहार करना होगा। अगर वो एक देश होकर के व्यवहार नहीं करेगा तो अनंत जो उसका रूप है उसके साथ व्यवहार करेगा। फिर तो बुद्धि सबको चली जाएगी। सबको दे देगा बुद्धि। और तीसरी बात एक एक करके बोलिए। एक एक करके एक एक करके बोलिए पहले वो कुछ चीजें रह जाती है तो आपने कहा कि उसके संस्कार होंगे इसलिए उसके ऊपर गिरा तो इसी प्रकार से जिसको वो ईश्वर के पास ये वाली चीजें हैं कि उसको किसको ऋषि बनाना है और ऋषि बना के बिना यज्ञ

00:54:00:28 पवित के भी उसको वैदिक ज्ञान विज्ञान दे देना है और उसके बाद उसी षष्ठी क्रम में आगे चलकर के विधान करना है कि आप जब यज्ञ पवित हो जाएगा उपनीत हो जाओगे तब जाकर के आपको जो है वेदों का अधिकार प्राप्त होगा तो ये ईश्वर की अपनी चुनाव होता है कि किसको किस योग्य वो समझता है। तो जो जब हम कर्म फल देने के लिए उस पर यह लागू नहीं कर रहे कि भैया अगर कर्म फल देना है तो आज की तारीख में क्यों नहीं दे रहा अभी क्यों नहीं दे रहा हो सकता है वह अपने तरीके से दे रहा होगा कर्म फल उसको पता नहीं कौन सी बीमारी उसने लगवा दी हो कौन सी उसको परेशानी गैस की प्रॉब्लम हो उसको एड्स हो गया हो कैंसर हो गया हो जो दुराचारी है जो हमको पता ही नहीं चल रहा तो इसी प्रकार से भगवान भी अपनी इच्छा अनुसार अवतार लेंगे जब उनका मन होगा लेंगे नहीं मन होगा तो पत्थर गिरा के मार देंगे नहीं जिसको मारना होगा उसको नहीं भी मारेंगे जिसको वेद का ज्ञान कराना होगा समाधि अवस्था में कराएंगे और जिसको जिसको व्यवस्था के अनुसार वेद का ज्ञान विज्ञान देना होगा वैसे देंगे। अच्छा अब बंद करिए जो अब इसमें जो पहला इसमें जो पहला पॉइंट है उसको ले लेते हैं। अनंत सामर्थ्यवान इस पर चलिए अब आप अब इसको बता दीजिए। जी अनंत सामर्थ्यवान सृष्टि कितनी बड़ी मानी समझे इस बात को। एक दांत का डॉक्टर सारी जिंदगी दांतों की चिकित्सा कर ले। नहीं जानता दांत के बारे में सब कुछ उसे पूछो

00:55:16:02 सब जानते हो नहीं जानता सारे जीवों को बनाया सारे ब्रह्मांड को बनाया अनंत नहीं है क्या ये ब्रह्मांड का विस्तार भी तो अनंत ही है प्रकृति अनंत है उस सब में व्यापक है सबको जानता है इसलिए वो अनंत सामर्थ अनंत ज्ञानवान है अन सामर्थ्यवान है इसका अर्थ नहीं है कि उल्टा भी करे आप वेद को मानते हैं कि नहीं मानते बताओ वेद कह रहा अपापम पाप में विध नहीं हो सकता आप कह रहे हो सकता है व्यवहार में हो सकता आपके द्वारा भी तो हो रहा है। हां कैसे हो रहा है? स्त्री स्त्रियां नहा रही है। वो देख रहा है कि नहीं देख रहा है? स्त्रियां नहा रही है। देख रहा है कि नहीं देख रहा? तो कैसे हो गया? वो तो स्त्रियों को स्त्रियों को नहाते हुए देखना पाप है कि नहीं? ये हमारे लिए पाप है। बस बस यही मैं भी कह रहा हूं कि जो हमारे लिए पाप है उसके लिए पाप नहीं है। दुराचार नहीं करता। वही मैं कह रहा हूं। जो हमारे लिए पाप है, जो हमारे लिए पाप है, उसके लिए पाप नहीं है। वही तो मैं भी कह रहा हूं। सुनिए। जी ये बताइए पहले कोई प्रमाण दीजिए अवतार का प्रमाण में आइए ये कुतर्क मन जाइए प्रमाण पे आ जाऊं तर्क को छोड़ अवतार का लाओ तर्क को छोड़ दे तर्क नहीं कर रहे कुतर्क कर रहे हो अरे अब आप चलिए अगर हम अगर हम मैं प्रमाण

00:56:31:06 दे देता हूं मैं प्रमाण अगर हम केवल आत्मा होते तो पाप नहीं होता केवल आत्मा होते मैं कह रहा हूं जिस जिस पाप के मनुष्य द्वारा होने पर हम उस पाप नहीं मान रहे उसी के द्वारा ईश्वर के द्वारा उसको होने पर हम उसे पाप से अलग कर रहे हैं और वही चीज मनुष्य के द्वारा होने पर हम उसे पाप से वि मान रहे हैं यानी जिस कार्य से लिप्त होने जिस कार्य से सुनिए ये लाइन पूरी मैं मुक्त आत्मा होता तो सारे ब्रह्मांड को देखता मुझे कोई पाप नहीं लगता इसका मतलब जिन कार्यों से मनुष्य को पापी माना जाएगा उनहीं कार्यों से ईश्वर को पाप नहीं पापी नहीं माना जाएगा यही तो मेरा कहना कार्य कर रहा है ईश्वर कार्य कर ही नहीं रहा है वो वो तो बाद की बात है। अभी मैंने पूछा अनंत सामर्थवान अनंत तो अनंत सामर्थ बता दिया। अनंत ब्रह्मांड को रचने वाला है। आपने उसमें दो धारण करने वाला है। आप ब्रह्मांड को जानते हो नहीं कुछ। अनंत ब्रह्मांड को रचने वाला। अनंत ब्रह्मांड को धारण करने वाला। अनंत ब्रह्मांड का प्रलय करने वाला। आपको ब्रह्मांड की जानकारी है ही नहीं वास्तव में। और नहीं है जानकारी कि वेद की उत्पत्ति होती कैसे? चार ऋषियों को दे दिया। कैसे दिया मालूम है आपको? ये अतिरिक्त बातें हैं आचार्य जी। नहीं आपने कहा किसी को दे दिया ज्ञान दे दिया चार को नहीं आपने कहा कि किसी को ज्ञान दे दिया ऐसा नहीं

00:57:46:09 देता है जान उसकी प्रक्रिया है ज्ञान देने की प्रक्रिया अगर अलग से समझे तो कोई वही समझा दे पहले ज्ञान कैसे देता है ईश्वर और वेद है क्या आपसे निवेदन है विनम्र मेरा कि आप ऐसे आपको प्रमाण देता हूं प्रमाण तो प्रमाण मैं दे देता हूं पहले मैं प्रमाण दू आपने तो दिए ही अभी तक बहुत सारे मैं केवल दो चार प्रमाण दे देता हूं बस दीजिए [हंसी]

00:58:18:28 हम एक तो यजुर्वेद में है 319 यद्यपि वह जन्मा है पर विभिन्न रूपों में प्रकट होता है 319 जी मंत्र क्या है वो आप देख लीजिए मैं मंत्र बोलता मतलब 19 ठीक है ठीक प्रजापति चरति जी वो देखता हूं [हंसी] इसमें क्या लिख रहा है

00:58:53:27 हां ये रहा इसमें क्या लिखा हुआ है आप बताइए प्रजापति चरत ग अंतर दृश्य मानो विश्व भवन यस कम सकेतु इसमें अवतार कहां सिद्ध हो रहा है गर्व है गर्व क्या होता है प्रमाण अर्थ क्या अर्थ क्या लिखा है उसका नहीं अर्थ किसका लोगे अर्थ का लाओ किसका लाओ अर्थ की प्रमाणिकता तो चाहिए ठीक है वो मैं देखो अर्थ आपके यहां क्या लिखा है वो बता दो आप प्रजाओं का पति ब्रह्मांड के गर्भ के अंदर मेरा अर्थ नहीं मानोगे मैं तो और ही अर्थ कर मैंने विचर रहा है ना दिखता हुआ वह बहुत प्रकार से विविध रूपों में प्रकट होता है हां प्रकट होता है हां सुन लिए कहां कहां प्रकट होता है सुनिए सूर्य के रूप में प्रकट हो रहा है यानी वो है यानी सूर्य ईश्वर है नहीं नहीं नाभ्यासी अंतरिक्ष

01:00:00:19 यस भूम प्रंतरिक्ष ये है ये उसका ब्रह्मा ये विराट यानी सूर्य ईश्वर है। नहीं सूर्यश्वर नहीं बिजली कैसे प्रकट हो रही है? एसी चला लाइट आ गई। हीटर चला लाइट आ गई। पंखा हवा चली लाइट आ गई। विविध रूपों में कार्य कर रही है। वैसे ईश्वर विविध रूपों में कार्य कर रहा है। पर बिजली ना तो ठंडी है ना बिजली गरम है। ठीक है। सुनिए वैसे ईश्वर विविध रूपों में कार्य कर रहा है। वहां रूपों में प्रकट होना माना गया है ना प्रकट हो रहा है। प्रकट होने का अर्थ यही है कि जब साम्य अवस्था थी तब सब प्रकट नहीं था। उसको कोई नहीं आ सकता था। लेकिन ये सब बन गए। प्रकट हो गया। देखो कैसा सुंदर ईश्वर ने बनाया है। ईश्वर कैसा प्रकाश दे रहा है। ये न तत्र सूर्य भात न चंद्र तारकम ने ये प्रकट हो रहा है ईश्वर अर्थात कार्य प्रकट हो रहा है। कार्य को देख के कर्ता का अनुमान होता है। अगर यह नहीं है तो अनुमान भी नहीं होगा कि ईश्वर है भी कि नहीं। ठीक है। कार्य को देख के का अनुमान होता है। ये प्रकट हो रहा है ईश्वर। जैसे जैसे आपने मेरे व्यवहार और परमार्थ पर वो किया था ना प्रश्न कि व्यवहार और परमार्थ को आप अलग मत करिए। यहां पर

01:01:15:22 भी देखिए आपकी बात से व्यवहार परमार्थ सिद्ध हो रहा है कि एक समय था जब ईश्वर को जानने वाला कोई नहीं था। वो हो गया ईश्वर व्यवहार में ना आ सकने वाला। ईश्वर व्यवहार में नहीं आ रहा है। हम उसे जान ही नहीं सकते। किसी प्रकार से इंद्रियों का विषय है ही नहीं। एक एक मिनट मैं कह लू और उसके बाद ईश्वर प्रकट हो रहा है। व्यवहार आपकी अभी अभी आपकी बात रख रहा हूं। ईश्वर व्यवहार में प्रकट हो रहा है। ठीक है? व्यवहार में आ रहा है। यानी कि उसका मौलिक स्वरूप क्या था? स्वाभाविक स्वरूप क्या था? व्यवहार में ना आ सकने वाला। मगर उसने अवतार लिया। ये क्या है? प्रकट होना क्या है? सुनिए। उसका एक एक मिनट मैं वो वो नहीं दिख रहा। भावना को सूर्य में वह है। यानी प्रकट नहीं हो रहा है। नहीं है। वह है वो प्रकट नहीं हो रहा है। प्रकट अपने कार्यों के कार्यों के माध्यम से प्रो कार्य कर रहा है। दिखाई दे रहा है उसके। व्यवहार में यानी व्यवहार में आ रहा है ना व्यवहार व्यवहार में तो आ ही रहा है हां तो मौलिक स्वरूप क्या है उसका शरीर ठीक है अभी अभी शरीर धारण नहीं अभी मैं अवतार की बात कर रहा हूं आपको अवतार बताता हूं उसका मौलिक स्वरूप क्या है स्वाभाविक स्वरूप क्या है व्यवहार में ना आ सकने वाला ये उसका मौलिक स्वरूप है नहीं नहीं ये नहीं है हां क्या है अशब्दम अशोत्रम अशब्द

01:02:30:26 अरूपम अशब्दम अरूपम ये उसका स्वरूप है ठीक है इसका निचोड़ ये निकलेगा व्यवहार में ना अभी आपने बोला ना पहले वो किसी के जानने में ना आ सकने वाला था तो मौलिक मौलिक स्वरूप हो गया ना जानने में ना आ सकने वाला अभी भी नहीं जान सकते उसको उसके कार्यों को देख रहे हैं यानी कार्यों के अनुसार कुछ कुछ हम उसको जानने में आ सकने वाला हो गया ना बिल्कुल अनुमान होता है यानी यानी कि कार्यों के कारण हम उसे अब जान सकते पहले नहीं जान पा रहे थे हां पहले नहीं जान पा रहे यानी कि उसका मौलिक स्वरूप तो व्यवहार में ना आ सकने वाला था ना नहीं अभी भी वही स्वरूप है उसका अब जो दिख रहा है वो वो तो अरूप ही है। मैं मैं रूप मैं रूप की बात नहीं कर रहा हूं। मैं हम इस मैं इसकी बात कर रहा हूं कि बिना दिखाई देते हुए भी अभी वो हमारी कुछ कुछ इंद्रियों का विषय बन रहा है। व्यवहार में आ रहा है। हम उसे जान पा रहे थोड़ा बहुत। मगर एक समय ऐसा था जब हम उसे बिल्कुल नहीं जान सकते। वो रूप है एक ऐसा। जब हम उसे बिल्कुल नहीं जान सकते। मनुष्य सो रहा है ना कुछ नहीं कर रहा तो उसके व्यवहार का पता नहीं लगता। जाग जाता है व्यवहार का पता लगता है। उसका जागरण ब्रह्मा का रात्रि थी ब्रह्मा का दिन है सुनिए सुनिए जो वचनित होता है जो वचन है वो यह नहीं है कि सोने वो उसको कोई देख नहीं रहा था वचन ये है कि एक

01:03:45:27 समय था जब वो किसी के जानने योग्य नहीं था किसी के सोने से किसी के सोने से किसी का अव्यवहारिक व्यवहार में ना आ सकने वाला सिद्ध नहीं होता है व्यवहार में ना आ सकने वाला तभी सिद्ध होगा जब वो व्यवहार में ना आ सकने वाला होगा तो स्वरूप से ईश्वर के लिए मैं भी यही कह रहा हूं कि वो व्यवहार में ना आकने वाला है मगर एक समय ऐसा आता है जब सृष्टि रचना होती है तो वो व्यवहार में आने लगता है कुछ कुछ इंद्रियों का अनुमान के द्वारा ही सही मगर वो जानने योग्य होता है तो ये उसका प्रथम अवतार ही सिद्ध हो रहा है तो इसको मानो ना सारे ब्रह्मांड को मानो उसका शरीर ये तो वेद ही कहता है दूसरी बात मानो मनुष्य रूप में नहीं किसी दूसरी बात अच्छा इसका अर्थ बताओ अर्थ बताओ इसका क्या अर्थ है 31 31 19 इसका मेरा बता रहा हूं बता रहा हूं। इसका मेरा अर्थ है कि यद्यपि जो ईश्वर है पढ़ रहे हैं आप किसका का शायण का शंकराचार्य परंपरा पढ़िए यद्यपि ईश्वर अजन्मा है अजन्मा होते हुए भी वो उत्पन्न होता है विविध रूपों में

01:05:01:25 सुनिए जी बोलिए बोलिए हां ना और सुनाओ एक मिनट सुना रहा हूं। दो तीन बातें हो जाती है ना उससे क्या होता है जो एक मूल कोई बात चल रही होती है वो रह जाती है फिर सुनाइए उसका हां सुना परमात्मा सब पदार्थों के अंदर विचरता है वह कभी जन्म लेने वाला ना होकर के भी अनेक प्रकार से प्रकट होता है उसके मूल स्वरूप को ज्ञानी जन देखते हैं। हां तो अनेक प्रकार से अनेक जीवों के रूप में प्रकट होता है। ये तो बात बाद की बात हो गई। वो प्रकट हो रहा है ना। वो अप्रकट था प्रकट हो रहा है ये भी ये भी उसके स्वाभाविक मौलिक स्वरूप में अंतर आ रहा है उसने अवतार है सुनिए उसने प्रकृति से सृष्टि को रचा है जैसे मैं मैं मैं पूछ रहा हूं आपसे कौन से रूप में प्रकट हुआ है ये बता दीजिए यहां प्रकट होना है ना कई रूपों में प्रकट होता है कौन से रूप में प्रकट उसने उसका ज्ञान

01:06:17:01 प्रकट हो रहा है ब्रह्मांड के रूप में उसका ज्ञान प्रकट हो रहा है प्रकृति से उसने जान कुल मिला के बात यही आ रही है कि यहां पे आप इसका एज इट इज अर्थ ना ले के अपना कुछ उसमें मिक्स कर रहे है सुनो पहले तो ये बात बताओ आपको गर्व [गला साफ़ करने की आवाज़] का क्या अर्थ होता है? मैं ऋषियों की बात करता हूं। अनषियों की बात नहीं करता। सूर्यति गर्भ वह गर्भ है वह सूर्य लोकों में विचरता है हिरण्य गर्भ में विचरता है या गर्भ का अर्थ सूर्य आदि तेजस्वी लोक है उनमें विचरता है और उन सबको प्रकट करता है ये इसका अर्थ है और सबको प्रकट करता है प्रकट होता नहीं है हां उन सबको प्रकट करता है वो थोड़ी आएगा स्वरूप लेकर के ठीक है ठीक है और सुनिए आचार्य शण का एक मैं मंत्र बताता हूं आपको जो आपकी परंपरा बता रहे है ना एक मंत्र ऋग्वेद का तुम सुकरस दरदर ही तब दरदर तू सुकरस रायसी

01:07:22:14 निशुप ये आचार्य श ने अर्थ किया है हे सार सार मतलब कुत्ता तुम सुकरस वराहस तुम वराह सुकर को ददरी फाड़ो काटो आप देखिए आप गलत जा रहे हैं इसका विषय से कोई मतलब नहीं है आप ये आप ये सिद्ध कर रहे फिर आप ये सिद्ध कर रहे हैं कि शायन का भाष्य क्यों नहीं माना जाना चाहिए हां ये सिद्ध कर रहा हूं की परंपरा ही गलत है अगर शायन का भाष्य आपका कहने का मतलब है पहली बात तो उस पर भी मैं आऊंगा शायन की परंपरा गलत है मतलब कुल मिला के आपका कहने का यह है कि क्योंकि शायन के भाष्य में कहीं पर गलती हो गई इसलिए पूरी तरीके से नकार दो कि शायन मानने योग्य नहीं है। आपने सुनिए सुनिए आपने खुद ऋषि दयानंद जी के द्वारा आपके आप जो मानते हो ऋषि तो दयानंद जी की जो सत्यार्थ प्रकाश है उसमें आपने खुद गलतियां मानी है। आपने खुद माना है कि नियोग में उन्होंने गलत कर दिया। ज्यादा बात कर दी। इस कारण से उनकी एक भी बात नहीं माननी चाहिए। पहली बात। दूसरी बात अगर सायण को आप गलत मान भी लो। मान लो शण गलत है उनका क्योंकि भाष्य गलत है। मैं इसलिए ये कर रहा हूं क्योंकि मुझे अपने विषय को बचाना है। विषय चल रहा है। ईश्वर अनंत सामर्थवान है तो उसके अवतार में क्या दिक्कत है? अब आप अब आप ये वाली बात

01:08:37:20 ले आए कि शायन ने वहां पर कुछ गलत ऐसी चीज लिखी है जो हमारी हमारे तर्क के अनुसार लॉजिक्स के अनुसार गलत बैठ रही है। एक अगर एक मिनट रुकिए एक मिनट रुकिए। एक पूरी बात कर लीजिए। पूरी बात कर लीजिए। पूरी बात कर लीजिए कि अगर आप शायन को गलत मान भी रहे हैं तो मुझे आप यह बता दीजिए आपके पास वेद मंत्र आए कहां से सुनिए पहले एक बात सुनिए हां मैंने आपको जानकारी है कि नहीं एत ब्राह्मण का वैज्ञानिक भाष्य क्या है वेद विजान आलोक नाम से विश्व में पहली बार जी और आचार्य शण का मेरे पास भाष्य है [हंसी] शण के ऋणी हम इसलिए आचार्य शण क्योंकि उन्होंने वेद मंत्रों को बचाए रखा उल्टा सीधा अर्थ किया भले ही किया लेकिन उन्हें बचाए रखा नहीं तो आप आप अपनी प्रामाणिकता बताएं मुझे सायन के अपनी प्रामाणिकता तो सायन ने पशु बलि आप मुझे अपनी प्रामाणिकता बताएं आप मुझे अपनी प्रामाणिकता बताएं मेरी प्रामाणिकता जी मेरी प्रामाणिकता ये है मेरी प्रामाणिकता जब समझ में आएगी जब आप मेरे ग्रंथ पढ़ोगे अभी तो कुछ पढ़ा नहीं अच्छा मेरी प्रामाणिक इसका इसका मतलब यह है

01:09:52:21 इसका मतलब यह है मैं भी आपको एक गट्ठर दे दूं आप इसको पढ़िए तब आप मेरी प्रमाणिकता समझेंगे तो सुनिए मेरे हमारे ग्रंथों में कहीं भी हिंसा नहीं मिलेगी कहीं नरबली नहीं मिलेगी देखिए देखिए इसका इसका जो उत्तर है ना इसका जो इसका जो इसका जो उत्तर है ना इसका उत्तर पहली बात आपकी सत्यार्थ प्रकाश में ही लिखा गया है वो मैं बता देता हूं नियोग विषय में बात करते समय मैं वो बात नहीं कर रहा। नहीं बात क्यों नहीं कर रहे? आप ला रहे हैं ना बार-ब आप बार-बार पशुलि ला रहे तो नियोग लाने दीजिए ना मुझे। मैं अपनी यही होता है विषय यही विषय होता है। मैं अपनी कह रहा हूं। आप अगर पशु बलि की तुलना कर रहे हैं ना पशु बलि की तुलना कर रहे तो मैं भी आपको बता रहा हूं। कुछ आप अवतार के लाइए प्रमाण। हां। तो अवतार का प्रमाण यही मैं बता रहा हूं अवतार की बात। मैं एक ये वाली बात पूरी कर लूं। नियोग में उन्होंने यह शतपद ब्राह्मण नियोग में एक एक मिनट मुझे एक अच्छी बात है उसमें मैं अवमानना नहीं करूंगा दयानंद जी की जब शतपद ब्राह्मण मैं दयानंद जी का दोष नहीं बता रहा हूं आपको उनका एक लॉजिक बता रहा हूं वो सुनिए उन्होंने एक लॉजिक दिया है उन्होंने कहा जब यह कहा पूर्व पक्ष में उन्होंने ये रखा मायानंद जी ने कि भाई ये जो नियोग है इसके बारे में आपने बहुत सारी बातें बता दी मगर अंतत

01:11:08:02 गतत्वा यह मुझे व्यभचार लग रहा है पाप लग रहा है ये पूर्व पक्ष रखा उन्होंने उन्होंने दयानंद जी तो उन्होंने उस उन्होंने जवाब वहां बहुत अच्छा दिया है कि किसी पराई स्त्री को तुम जब अपना मान लेते हो विवाह के बाद तो किन कारणों से उसको अपना मानते हो जो अभी तक तुम्हारे लिए अभोज्ञा थी वो भोग्ञा कैसे हो गई तुम्हारे लिए क्योंकि तुमने शास्त्र से उसको अपने लिए भोग्या बनाया ठीक है तो इसका मतलब यह है कि शास्त्र की दृष्टि से अच्छा और बुरा देखना पड़ता है अगर हमें अपनी दृष्टि से वो गलत दिखाई दे रहा है क्योंकि धर्म और ब्रह्म में हमारी इंद्रिय गति बहुत सीमित होती है। इसलिए यदि शास्त्र की दृष्टि वहां पर आ जाती है तो वहां पर शास्त्र की दृष्टि से देखना पड़ता है। अच्छाई और बुराई में। तो इसी प्रकार से जो क्या कहते हैं? शास्त्रों के द्वारा वर्णित जो चीजें हैं पहली बात तो ये है कि आपने उसका परंपरा से अध्ययन नहीं किया है। आपने स्वा अध्ययन किया है। मैं परंपरा को परंपरा एक मिनट मुझे मुझे पूरा करने दीजिए। शायण जी जैसे आपके यहां पर यह नहीं माना गया कि नहीं गुरु शिष्य परंपरा कोई एक चली हो मगर शायण जी गुरु शिष्य परंपरा में मानते उनके बड़े भ्राता का नाम था विद्या्य स्वामी उन्होंने ही उनको वेद भाष्य करने के लिए कहा था और विद्याण्य स्वामी जो है अपने समय के

01:12:23:06 शंकराचार्य थे शंकराचार्य परंपरा से ही चला आ रहा है शायण भाष्य तो शायण जो है वो परंपरा को मानने वाले हैं। उन्होंने अपने भाष्य में यह तक लिखा है कि मैंने प्रमाण और परंपरा परंपरा से प्राप्त ज्ञान विज्ञान के आधार पर ही भाष्य किया है। वो परंपरा को मानते हैं। तो यदि आप सायण को जानने की बात कह रहे हैं कि मैं सायन ने क्या भाग प्रस्तुत किया है तो उनका अध्ययन आपको प्रामाणिक रीति से करना चाहिए ना कि बाजार में बुक खरीद करके जहां पर भी क्वेश्चन आ रहे हैं वहां पर उनके जो प्रामाणिक उत्तराधिकारी हैं उनके पास जाए कि यहां पर मुझे जो है जो है संशय हो रहा है तो उसमें मुझे उत्तर चाहिए। तब तो आप बता दो ना। आप तो परंपरा वाले हो ना मैं बता रहा हूं। मैं बता रहा हूं। आप तो परंपरा वाले हो। मैं बता रहा हूं। मैं दोनों चीजें बता रहा हूं। मैं दोनों चीज आरती बता दीजिए इस मंत्र का। मैं मैं दोनों मैं दोनों चीजें बता रहा हूं। मैं दोनों चीज़ बता रहा हूं। मैंने दोनों तरीके से आपका उत्तर दिया है। अब मैं पूछ रहा हूं। अब मैं अब मैं पूछ रहा हूं कि अगर शायण भी गलत है। आपके पास वेद मंत्र किसके द्वारा आए हैं? ये बताइए। सुनिए। गलत है। उनका अर्थ गलत है। वेद मंत्र थोड़ी गलत है। यानी शाय अज्ञानी थे ना एक तरीके से। हां बहुत पढ़ा है। अज्ञानी थे। बहुत पढ़ा लेकिन समझा नहीं। यानी शायन हमारे लिए ठीक है ठीक है ठीक है यानी

01:13:38:12 शायण हमारे लिए अज्ञानी है तो जो अज्ञानता कर सकता है वो वेद मंत्र नहीं बदल सकता नहीं बदल सकता बताइए क्यों नहीं बदल सकता इसको तो उनको परंपरा को हमने माना अब इसमें मत जाइए पहले इस मंत्र का अर्थ बताइए जो आपने प्रमाण दिया देखिए वो जो है आप जो मंत्र का अर्थ पूछ रहे हैं इसी प्रकार से फिर मैं नियोग पे बात करूंगा वो एक एडिशनल चीजें हैं जो आप ला रहे हैं विषय चल रहा है मंत्र आपने अवतार के लिए अवतारवाद के लिए मंत्र प्रस्तुत किया है उस अर्थ मैंने बता तो दिया वो गलत है तो आप मुझे अपना प्रामाणिकता बता दीजिए फिर इनके विरुद्ध जा अर्थ क्या बताया आपने उसमें भी ये नहीं आ रहा कि परमात्मा जन्म लेता है इसमें प्रकट होता है आपने कहा मान लिया प्रकट होता है बताइए किस रूप में प्रकट होता है सूर्य के रूप में चंद्र के रूप में परमात्मा है नहीं है परमात्मा प्रकट बताइए ना किसके रूप बिजली प्रकट हो रही है पंखे में पर पंखा बिजली थोड़ी है हां तो फिर इसका मतलब इसका मतलब यह उदाहरण सही नहीं है ना प्रकट कहां हो रहा है क्या उदाहरण यही सही है यही प्रकट हुआ बिजली पंखा आप यानी यानी कि आप यहां ये मान रहे हो उसका कार्य प्रकट हुआ कार्य प्रकट होता है मगर मगर

01:14:53:13 मंत्र में कार्य प्रकट होना नहीं आया उसमें आया है वो प्रकट हुआ और जो हमारे परंपरा प्राप्त है सायण और जो हमारी शंकराचार्य परंपरा है जो प्रामाणिक है वो ये मानते हैं कि यहां पर ईश्वर के अवतार की बात हो रही है। अब बात आती है आप अब आप इसको प्रमाणिक नहीं मानते तो मैं कह रहा हूं जो प्रामाणिकता ब्राह्मणों को मांसाहारी बता रही है मानने के लिए कह रही है उसको कैसे प्रामाणिक तो जो प्रामाणिकता स्त्रियों का देवर के साथ नियोग करा रही है उसको हम प्रामाणिक कैसे मान ले जो है विषय पे अलग चर्चा कर सकता हूं तो फिर बलि विषय पे मैं अलग से चर्चा कर सकता हूं आप अवतार पे रहिए सांड की बात कर ऋषि की बात नहीं करण की बात कर रहा हूं तो मैं दयानंद जी की बात करूंगा ना आप छोड़ दीजिए आर्य समाज मैंने ध्यान की बात आप आर्य समाज छोड़ दीजिए अच्छा वेदव्यास जी नियोग से पैदा नहीं हुए वेदव्यास जी अरे भाई मैं बात जिस समय जिस समय वही लिखा है आप आपने खुद आपने खुद कहा कि आपने खुद माना अपने वीडियो में कि सत्यार्थ प्रकाश में नियोग पे ज्यादा बात कर दी इतनी बात नहीं करनी चाहिए इतनी यानी गलत माना ना ये नहीं लिखा ये नहीं कहा मैंने गलत कर दिया ज्यादा जो जहां पे नहीं आपसे देखिए देखिए अगर

01:16:08:16 हमारे को अवतार के निष्कर्ष पर पहुंचना है तो बहुत सरल सी बात है तर्क पे हमने बहुत देर बात करी अभी आप प्रमाण पे आए अब आप प्रमाण पे आए मैं प्रमाण दे रहा हूं मुझे आप ये बता दीजिए अगर सायण का अर्थ आप नहीं मान रहे हैं तो आपके पास वेद मंत्र कैसे आया मैं साय का भी लाऊंगा अर्थ साण का भी अर्थ लाऊंगा भाई साहब आचार्य काऊंगा मैं मैं पूछ रहा हूं कि आपके पास वेद मंत्र कैसे आया अगर आप सांड को प्रमाण नहीं मान रहे तो एक व्यक्ति ने कोई बात कह दी और उसने उसको कह दी इसका अर्थ नहीं है कि वो सुना रहे वेद पाठी ब्राह्मण ने वेद मंत्र सुना दिया इसका अर्थ नहीं वो वेद मंत्र जानता भी है अर्थ भी जानता है तो वेद के विषय में हमारे पास प्रमाण क्या है कि ये ईश्वर की ही वाणी है ये तो मनुस्मृति प्रमाण है मनुस्मृति कहां से प्रमाण है वो कहां से ये मत पूछिए कहां से आई मत पूछिए आप मनुस्मृति में ही आपने सारा घोटाला कर दिया है अरे आप बताइए ना कहां से आया कहीं से आया कहां से आया? उसका अर्थ पर बात करिए। आप आप अर्थ को ठुकरा रहे हैं ना। आप जिस जिस एक सोर्स को प्रमाणिक मान रहे हैं मंत्र के लिए उसी सोर्स को अप्रामाणिक मान रहे हैं उसके अर्थ के लिए। बात ये है अपना प्रमाण दीजिए। दूसरा कहां से आया वो छोड़िए। ये

01:17:23:27 आया जो आया देखिए मूल तो आया उनसे साण से लेकिन अर्थ उन्होंने सारा गड़बड़ कर दिया। यानी कि यानी कि सायण अज्ञानी थे। उन्होंने गलती की है ना भाष्य में? सारी गलती है। सब गलती नहीं पर बहुत सारी गलती है। तो जो जो कहीं पर वेदों का अर्थ करते समय गलती कर सकता है वो वेदों का मंत्र लिखते समय भी तो गलती कर सकता है। नहीं कर सकता। क्यों? मंत्र तो जैसे तैसे कंप्यूटर भी सुना सकता है। अर्थ नहीं कर सकता कंप्यूटर। तो कंप्यूटर तो कंप्यूटर तो कंप्यूटर से लेने के बाद हम उसको वेद मंत्र को वेद मंत्र नहीं मानते। हम किसी गुरु के पास जाकर सत्यापित करते हैं ना कि वेद है कि नहीं। जैसे आपके यहां पर जर्मनी से वेद आए थे तो आपने कहीं पर मैंने सुना है केरल में जाकर किसी सत्यापित करवाए थे। देखिए जी अगर वेद की बात कर रहे है ना परंपरा से मैं प्रेरण करता हूं एक मंत्र देता हूं अर्थ करवा दीजिए आप अपनी परंपरा से। चैलेंज देखिए आप अपनी प्रामाणिकता बताइए। परंपरा की बात मत करिए। मैं अगर आपको मेरा मेरा वेद अर्थ आपको प्रामाणिक नहीं लग रहा है तो आप अपनी प्रामाणिकता बता दीजिए। कहां से आए वेद मंत्र? तो आप सायन की प्रमाणिकता बता दीजिए। बता तो रहा हूं। सायन की प्रमाणिकता जब सुनिए जब महर्षि याजवल कह रहे हैं कि गर्भ सूर्य को कहते हैं। सायण की सुनिए। गर्भ गर्भ को नहीं कहते। गर्भ गर्भ को नहीं कहते।

01:18:38:28 वेद के गर्भ सूर्य को भी कहते। गर्भ सूर्य को भी कहते हैं। गर्भ गर्भ को भी तो कहते हैं। वेद के पद योगिक है। वेद के पद योगिक है। वो गर्भ क्यों? बात आ गई। बात आ गई है प्रमाण। बात आ गई प्रमाण आप जिनसे वेद के मंत्र ले रहे हैं उसके अर्थ को स्वीकार नहीं कर रहे हैं तो बेकार में वो और मंत्र देना वो फिर व्यर्थ रुक गया नहीं नहीं दीजिए मंत्र दीजिए मंत्र दीजिए दे तो रहा हूं इतने सारे अभी तो एक दिया है वो भी अर्थ गड़बड़ है उसका मैं जो भी मैं जो भी दूंगा उसका अर्थ आपके लिए गड़बड़ ही होगा याव जी की बुक आपके पास कहां से आई कहां से ये क्यों पूछ रहे हो आपके अरे अरे भैया या पता नहीं किसी मोहम्मद से जाकर ले ली किससे ले ली बताइए मुझे मोहम्मद से तो आपने ली या पशु बली हमने नहीं ली आपने दिए मोहम्मद को आप अपने पूर्वजों का बात बता दीजिए ना मेरे पूर्वज मैं श्री राम का वंशज हूं अरे वो पूर्वज नहीं विद्या में सुनिए विद्या में मुंडकोपनिषद पढ़िए विद्या विद्या के मामले में एक से ले पहले ही अध्याय में एक से ले चौथे मंत्र तक वहां पर ऋषि अपनी परंपरा बता रहे विद्या कैसे आई आप मुझे मुझे बताइए आपकी परंपरा परंपरा अच्छा आप बताइए

01:19:54:07 हां बताइए शंकराचार्य जी के गुरु कौन थे बता दे रहा हूं बताओ शंकराचार्य को व्यास जी तक जोड़िए व्यास हां जोड़ रहा हूं जोड़ रहा जोड़ रहा हूं जोड़ रहा हूं जोड़ रहा हूं अभी जोड़ दे रहा हूं पहले है अगर पीछे चलते हुए चले तो उनसे पहले वाले हैं गोविंद योगिन गोविंद योगेंद्र मत्स्य उनसे पहले गॉड फाद उससे पहले सुखदेव जी उससे पहले व्यासदेव जी उससे पहले पाराशर जी उससे पहले शक्ति उससे पहले वशिष् एक मिनट उससे पहले पद्म भव उससे पहले नारायण जी कितने कितने खा गए बीच में आप व्यास जी और शंकराचार्य जी की चार पीढ़ी बताई आपने देखिए यहां पे दो बातें होती है मैं बताता हूं दो बीच में टूट गई परंपरा दो दो आंसर है ना टूटेगी नहीं टूटेगी चार पीढ़ी चार पीढ़ी पहले ठीक है ठीक है एक होता है मतानुज्ञा निग्रह स्थान कि अगर मैंने ने कहा कि आप अंधे हो तो आपने कह दिया तू भी तो गूंगा है। मेरे गूंगे होने से आपका अंधा ना होना सिद्ध नहीं होता। पहली बात मेरे गलत होने से आपका सही होना सिद्ध नहीं होता। आप मेरे को अप्रामाणिक कह रहे हैं मगर आप अपनी प्रामाणिकता के लिए भी मेरी अप्रामाणिकता को ही आधार बता रहे हैं। अगर मैं अप्रामाणिक हूं इसका मतलब बिना क्वेश्चन किए आपको मान लेना चाहिए।

01:21:09:22 पहली बात अभी आंसर नहीं पूछना चाहिए। आंसर आंसर आंसर पूरा नहीं हुआ है। आंसर पूरा नहीं हुआ है। आंसर पूरा आंसर पूरा नहीं हुआ है। आंसर पूरा नहीं हुआ है। बातें बंद कर अर्थ की बात करिए। पूरी बात बता रहा हूं। ये बातें बंद क्यों करें? ये बातें मैं मंत्र ला रहा हूं। भाई वो मंत्र लाने का कोई मतलब नहीं है ना। इसीलिए तो परंपरा पूछता हूं। पूछता हूं। मेरी मेरी मेरी मेरी दूसरी बात भी सुन लीजिए। दूसरी पहली तो ये हो गई। मेरे गलत होने से आपका सही होना सिद्ध नहीं होता। दूसरी बात यह आती है कि इसको थोड़ा सा मैं समझा देता हूं आपको कि मान लीजिए इसमें ये बताइए मैं परंपरा से पूछ रहा हूं सबगा शुक्र परंपरा हमारे यहां पर ईश्वर को निराकार सगुण निराकार और सगुण साकार तीनों रूपों में स्वीकार किया गया है। पहला है एक एक मिनट एक मिनट जिन मंत्रों का बताइए क्या किया है आचार्य जी जिन मंत्रों का अर्थ जिन मंत्रों का अर्थ ईश्वर के निराकार रूप में सिद्ध है उनको हम स्वीकार करते हैं। जिन मंत्रों का अर्थ ईश्वर के सगुण निराकार होने में सिद्ध है उसको भी हम स्वीकार करते हैं। ऐसा मंत्र ऐसा मंत्र बताइए कि आचार्य जी आचार्य

01:22:25:01 राम आचार्य जी थोड़ी तीन बातें हो गई हमने बहुत देर तक तर्क पे बात की थी उसके बाद प्रमाण पे आए और फिर उसके बाद प्रमाण की प्रमाणिकता परंपरा अब एक आपने बात कही थी कि अगर आपके पास तर्क नहीं होगा तो आपको घोषणा करनी होगी कि आपके आर्य समाज के पास तर्क नहीं है पहले आप वो घोषणा कर दीजिए फिर मैं प्रमाण बात करता हूं अच्छे से सारी बातें तर्क से हमने खत्म की आपकी कहां तर्क से सारी बातें तर्क से उत्तर दिया आप आप आप गंदगी को ईश्वर से जोड़ रहे हो आपको उस गंदगी आप आप जिस आप जब ईश्वर को आप जब ईश्वर को जिस कार्य के कारण जिन कार्यों के द्वारा मनुष्य लिप्त हो जाएगा जिन कार्यों से उन कार्यों के कारण आप ईश्वर को पापी नहीं मान रहे हो और वहीं पर अगर वह अवतार ले रहा है तो पापी मान रहे हो जैसे कि जैसे कि जब स्त्रियां नहा रही है सरोवर में तब भी ईश्वर देख रहा है मगर उसने कृष्ण बनकर अगर देख लिया तो पापी हो गया यह बात है आप अगर उसने रूप ले लिया अगर उसने रूप ले लिया तो पापी हो गया तो आपका तर्क कटा मैंने कहा अनंत एक पॉइंट भी अगर वो रुकेगा तो अंत है उसकी सामर्थ्य का अंत है अनंत सामर्थ्यवान सिद्ध करिए उसे अनंत वरना वरना ये कहिए कि वो अनंत सृष्टि

01:23:40:07 रच सकता है वो अनंत ये फला काम कर सकता है उसके अंदर अनंत मगर वो अनंत सामर्थ्यवान नहीं है उसके सामर्थ की सीमा है कुरान पुराण का उपदेश भी कर सकता है। नहीं तो उसकी अनंता भंग होगी। बाइबल का उपदेश भी करेगा नहीं तो अनंता भंग। आपने खुद कहा कि आपने खुद कहा आपने आपने खुद कहा मनुष्य कोई भी कार्य बिना ईश्वर की सहायता से कर ही नहीं रहा है। यानी कुरान भी देने में ईश्वर की सहायता तो आपने भी सुनिए ये नहीं होता है। जी जी ऐच्छिक क्रिया अनैच्छिक क्रियाएं हृदय की धड़कन ईश्वर का काम है। लेकिन अच्छे बुरे कर्म करना मेरा काम है। ईश्वर की सहायता है ना उसमें? ईश्वर की सहायता इसमें थोड़ी है अच्छे बुरे कर्म करने में। उसके शरीर को चलाने में ईश्वर की सहायता है। वो पाप करने में थोड़ी ईश्वर की सहायता है। अगर उसका अरे भाई वही तो मैं कह रहा हूं। आप मानना पड़ेगा कि मोहम्मद भी राम दोनों ही अवतार हैं। कैसे अंतर करेंगे? आप जब ये चलिए ठीक है। अंतर ठीक है। ठीक है। ठीक है। मैं बता रहा हूं। आपने कहा कि ईश्वर नाना रूपों में प्रकट होता है। ठीक है? सूर्य को माना, चंद्रमा को माना। इसका मतलब नाली भी ईश्वर है। सब में ईश्वर है। नाली ईश्वर नहीं है। नाली नाली नाली नाली क्या होती है? नाली नाली मॉलिक्यूल है। उनमें भी ईश्वर है। हां उनमें नहीं नाली के रूप में भी ईश्वर ने

01:24:55:08 अपने आप को प्रकट किया है। नाली नाली मल हां सब में ईश्वर है। मॉलिक्यूल को बस बस ऐसे मल मल भी ईश्वर है। सब में ईश्वर है। आर्य समाज का ईश्वर मल भी मल के रूप में भी अपने आप को प्रकट करता है। नहीं करता बस ऐसे ही है। अब सुनिए सुनिए सुनिए अब अब सुन लीजिए एक चीज़ प्रमाण लाइए कुतर्क मत करिए मैं आपको जो है मोहम्मद वाला मोहम्मद कुतर्क आपका मोहम्मद कुतर्क नहीं है। मेरी नाली कुतर्क है। आपका मोहम्मद कुतर्क नहीं है। आपकी कुरान कुतर्क नहीं है। आपकी आपकी कुरान कुतर्क नहीं है। मगर मेरा जो मल है वो कुतर्क है। आपने कहा कि कृष्ण बनके नंगे दर्शन कर सकता है तो मोहम्मद बन के मार भी सकता है लोगों को। मैंने कहा मैंने कहा मैंने कहा आपका ईश्वर नहीं देख रहा है क्या जहां वो नहा रही है ईश्वर ईश्वर ईश्वर तो उनके अंदर भी है उसको देख मैं कह रहा हूं ईश्वर देख रहा है ना उसकी आंख नहीं है वो देखता नहीं है बिना आंखों के सब देखता है ईश्वर ईश्वर देखता है ना वही मैं कह रहा हूं मैं क्या कह रहा हूं आंखों से देखेगा देख रहा है ना आप जो कुतर्क है वो भी देख रहा है ये आप कहां लिखा है बता दीजिए कुत मेरे जो पुत ये कहां लिखा है कि वो उनको ईश्वर देख रहा तो नहीं देख रहा है ये आपकी परंपराएं पाप लिखे उसमें कृष्ण भगवान का

01:26:10:12 दोष आपके आर समाज में पाप लिखे हुए हैं उसमें दोष है आप आपने लिखे हैं पाप आपने लिखे हैं ठीक है आप व्यक्तिगत हो रहे हैं ठीक है आप जा सकते हैं आप अपना काम करिए आचार्य जी आप व्यक्तिगत हो रहे हैं आप आप विषय कर रहे हैं आपको हर तरह का तर्क दिया है मैंने हर आपके पास तर्क नहीं है तभी आप प्रमाण पे

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01:26:32:28 आए आपकी भागवत आप अपनी माला जपते रहिए आप नहीं आप अपनी जपिए जय श्री राम तो आप सभी ने देखा होगा हां तो सभी देख रहे हैं जी ठीक है अब देखिए सबसे पहले हमारी तर्क पर बात हुई आप लोगों ने देखा तर्क से जब चीजें नहीं बनी तो प्रमाण को लाए प्रमाण मैंने रखा प्रमाण बहुत सारे हैं मगर बात अक्सर ऐसा लोग कहते हैं प्रमाण में बात नहीं है। प्रमाण से होना कुछ नहीं है। मैं बताऊंगा वो कहेंगे अर्थ गलत है। और जब मैं उन अर्थ मैं परंपरा बताऊंगा तो दूसरी चीज लाएंगे। उससे क्या होगा? विषयंतर होता जाएगा। आर्य समाज के पास तर्क नहीं है अवतार के लिए और प्रमाणिकता तो आप लोग आर्य समाज की जानते ही हैं। अपने मन से जो भाष्य किया है। दूसरी बात अब इन्होंने मोहिनी वाली बात कही है। उसको मैं पूरा कर दूं। मोहिनी वाली बात। तो जो एक बहुत अच्छे वैष्णवाचार्य हुए हैं उनका वो होता क्या है जब हॉट टॉक होने लगता है तो खामखा में गरमा गर्मी होने लगती है कुछ उधर से ऐसी बात निकले कि मैं उनका उत्तर दूं बड़े हैं मुझसे इसलिए वहां रहना उचित नहीं रह जाता है फिर व्यक्तिगत हो रहे विषय उन्होंने छोड़ ही दिया कि अवतार की सिद्धि हो रही है कि नहीं हो रही है अब वो मेरे प्रमाण को मान नहीं रहे बात यह

01:27:48:00 नहीं कि कौन वेद को मानता है कौन वेद को नहीं मानता है बात यह है कि वेद के दयानंद जी के अर्थ को कौन मानता है और परम परंपरा प्राप्त अर्थ को कौन मानता है? बात यह है। लोग ये आरोप लगाते हैं ना कि आप वेद को नहीं मानते। यहां वेद को मानने ना मानने वाली बात नहीं है। यहां बात है तर्क की। तर्क और प्रमाण की। तर्क के ऊपर आधारित बात है कि भैया अगर सायनाचार्य आपके लिए अच्छा दूसरी बात कि सायणाचार्य को भी आप जो है प्रमाणिक सिद्ध कर लो। तो अपना जो प्रमाणिकता है वो तो लाके दो ना। आपको वो तो देना पड़ेगा ना। अपनी प्रामाणिकता। पहली बात। दूसरी बात यह है कि आपके पूर्वज हम हैं। मंत्रों के मामले में, वेद लाने के मामले में आपके पूर्वज हम हैं। तो हम ये आपसे स्वतंत्र होकर के कह सकते हैं आप अप्रामाणिक नहीं आपके अप्रामाणिक होने से हमारा कुछ नहीं जाएगा। हम भी अप्रामाणिक सिद्ध हो जाएंगे तो आपका जो वैदिक होना है शून्य हो जाएगा। खत्म। आप लाइए या तो स्वतंत्र रूप से हम हमारा विरोध करते हुए अपना अर्थ। और यदि प्रमाण है तो मैंने आपको दिया। मैंने यह भी पूछा कि भाई वो क्या कहते हैं? सूर्य जो है यह सूर्य के रूप में प्रकट होता है। यह वाली बातें चली प्रमाण पर और प्रमाण बहुत सारे हैं। बात ये नहीं होती है प्रमाण किसके पास है? किसके पास नहीं है। बात यही है कि उसमें ये वाली बात आ जाती है। उनके तो अर्थ गलत है। अर्थ क्यों गलत है?

01:29:03:01 क्योंकि उन्होंने अमुक जगह पर कहीं पर जो है उनके अनुसार गलती की है। अब मैं मोहिनी वाला रूप जो है पूरा कर देता हूं। मोहिनी वाला रूप क्या है? मोहिनी वाला रूप है कि ऐसा हुआ था वहां पर पहली बात तो प्रतीकात्मक व्याख्याएं होती हैं। ऐसे बहुत से भगवान के अच्छा ये देखिए कितनी सुंदर बात है। जहां पर स्त्रियों को निर्वस्त होकर के नहाना नहाते हुए देखना ये निराकार ईश्वर के साथ तो स्वीकार करते हैं। मगर वहीं पर अगर ईश्वर ने अवतार ले लिया रूप ले लिया तो पापी हो जाएगा। क्यों भाई भाई वह तो ईश्वर है ना उसके ऊपर दोष नहीं लग रहा ना वह तो पहले से ही उन स्त्रियों के अंदर भी है ना वह तो केवल एक रूप में व्यवहारिक हो गया है सामने वह तो अंदर भी है तो फिर जब निराकार रहते हुए ईश्वर के द्वारा निर्वस्त्र स्त्रियों को देखना गलत नहीं मानते तो फिर साकार होकर के देखने में गलत क्यों मानते हो क्योंकि साकार से दिक्कत है मूर्ति से दिक्कत है तो खैर ये वाली बात तो हो गई बहुत बढ़िया से और मैं उनसे झगजिगिक बाजी नहीं करना चाहता था वो बात उसी पे जा रही थी कि अब वो दूसरी अश्लील कुछ पशु बलि लाएंगे कुछ ऐसा लाएंगे जिसमें कि जो है हॉट टॉक हो। फिर मैं भी नियोग पे बात करूं या कुछ ऐसी चीजें होंगी जिसमें

01:30:18:12 इस तरह से खत्म हो। तो ठीक है मैं हट गया वहां से। अब मैं आपको वो दे देता हूं। उसका उत्तर जो उन्होंने अंत में कहा है। उन्होंने अंत में कहा है कि अ उन्होंने अंत में कहा है ये मोहिनी रूप वाला। तो मोहिनी रूप में पहली बात तो प्रतीकात्मक व्याख्या है कि जो ये जो आचार्य माधवाचार्य शास्त्री जी हुए उन्होंने अपने ग्रंथ क्यों में लिखा पुराण दिग्दर्शन में इसकी व्याख्या की है पृथ्वी और जो राज जो स्वर्ण और रजत इत्यादि जो धातु है उनको उनका निर्माण कैसे होता है तो सर्वप्रथम जो सब जो निर्गुण निराकार सच्चिदानंद स्वरूप परमेश्वर है वो जब माया जो संयोग में आते हैं तो दो रूपों में प्रकट होते हैं। एक हो गया मोहिनी बनके और एक शिव जी के रूप में वो प्रकृति और पुरुष वाला मामला और उनके संयोग से इस दुनिया का निर्माण होता है। ये हो गई सिंबॉलिक एक्सप्लेनेशन। है ना?

01:31:25:20 पहली बात। दूसरी बात हो गई सिंबॉलिक एक्सप्लेनेशन। और दूसरी बात हो गई कि एक मिनट। हां। पहले मैं कुछ बातें रह गई हैं। मैंने की नहीं वहां पर वह विषयंतर ना हो इसलिए देखिए किसी भी चर्चा में ना विषय को बचाना बड़ा आवश्यक कार्य होता है। मुझे लगता है कि मैं उसमें सफल रहा क्योंकि बार-बार माया पे जाना अभी माया की बात भी करूंगा। पहली बात तो यह आ जाती है कि एक अल्लाह वाली बात हुई थी कि अल्लाह और उनके रूप में आप सबको एक मानते हो। तो नहीं एक नहीं मानते। होता क्या है कि ईश्वर तो सब जगह सर्वत्र समान रूप से है। वो फ्रिज, टीवी, कूलर, पंखा सब कुछ है। सब में ईश्वर है। सब कुछ ईश्वर ही है। ईश्वर ही सबके रूप में प्रकट है। ठीक है? अब बात ये आती है तो फिर हमारे लिए कृष्ण और जो है मोहम्मद में अंतर नहीं है। अंतर है। किस तरह से अंतर है? जिस प्रकार जल जो है वह सर्वत्र व्याप्त है। परंतु हमारे जो हमारी जो प्यास है जल की वो प्यास वही बुझा पाता है जो हमारे जो पात्र होता है हम मुख से पिए कर पात्र होकर के पिए कर पात्र बनाकर के पिए जो हमारे पात्र के व्यवहार की सीमा में आ जाए।

01:32:41:06 तो उसी प्रकार ईश्वर तो सर्वत्र व्याप्त है। परंतु हमारे लिए अनुगम में वही ईश्वर है जो हमारे वेद रूपी पात्र के व्यवहार की सीमा में आ जाए। उससे होकर के हमें प्राप्त हो। तो हमारे जो सनातन धर्म शास्त्र है उनके व्यवहार की सीमा में वैदिक वांगमय की सीमा में जो होकर के जो हमें भगवान के रूप प्राप्त होते हैं वो हमारे लिए अनुकरणीय भजनीय और अनुगम्य होते हैं। पहली बात। दूसरी बात थोड़ा सा लिंक दे दीजिए। किसी को आना हो तो आ सकता है। दूसरी बात है कि इन्होंने कहा था कि भाई इन्होंने खुद ही कहा था अपनी उसमें कि यदि जब तर्क नहीं होगा तो घोषणा करेगा। इनके पास तर्क समाप्त हो गया। ये प्रमाण मांगने लगे। प्रमाण दो प्रमाण दो। तो इन्होंने घोषणा नहीं की कि तर्क नहीं है आर्य समाज के पास। ठीक है? तीसरी बात क्या है कि अभी-अभी ये मोहिनी वाला आरोप लगा रहे थे मोहिनी के रूप में। तो मैंने एक सिंबॉलिक व्याख्या पहले दे दी कि ईश्वर किस तरीके से कार्य करता है। इन्होंने अभी जो ओम छंद रश्मि इत्यादि माना है ना वो काल है ना? तो वो बिल्कुल एग्जैक्ट वही व्याख्या है जो शंकराचार्य परंपरा में हो रही है। कि ईश्वर से सबसे पहले क्या होता है? प्रकृति निकलती प्रकृति जिसको ये ओम जिसको प्रणवाक्षर कहते हैं हमारे यहां भी प्रणव कहा गया कई जगह शंकराचार्य परंपरा में उसके साथ वो उसके साथ ही योग करके जो है इस सृष्टि का

01:33:56:07 विस्तार होता है तो यही तो है निर्गुण निराकार ईश्वर से एक रूप आया शिव बना एक रूप आया मोहिनी बना अब शिव और मोहिनी के बीच में योग हुआ और उसके कारण सृष्टि का आगे विस्तार हुआ यह हो गई आधी जो पारमार्थिक व्याख्या है आदि दैविक व्याख्या अब इसकी जो है आदि आदि भौतिक व्याख्या भी वह क्या है कि सबसे पहले जो सर्वत्र व्याप्त होता है जो अग्नि वाष्प होती है वह सर्वत्र व्याप्त होती है गर्म वो संगीभूत होती है ठीक है संगीभूत होने के कारण पृथ्वी बनती है उधर शीतलता वाला चंद्रमा प्रकट होता है तत्व और चंद्रमा उनका एक बड़ा प्यारा सा वहां पर दृष्टांत दिया है माधवाचार्य शास्त्री जी ने चंद्रमा जो है फिर आकर्षित होता है पृथ्वी की ओर और पृथ्वी के चक्कर लगाता है तो चंद्रमा का जो चक्कर चक्कर लगाना है वह है उधर शिव जी का मोहिनी के पीछे दौड़ना। ठीक है? एक ये हो गया। जी आर्यन यादव जी एक ये हो [गला साफ़ करने की आवाज़] गया। चंद्रमा के पृथ्वी के पीछे दौड़। अब जो चंद्रमा की जो जो शीतलता है जो पृथ्वी के प्रति आकर्षण है चंद्रमा का इसके कारण चंद्रमा का जो चंद्रमा की शीतलता इत्यादि है वह पृथ्वी पर आती

01:35:11:15 है और फिर यह जो तत्व है शीतलता और पृथ्वी की जो अग्नि वह तो स्वयं अग्नि से ही बनी है वहां पर गर्माहट से तो यह जो तत्व है शीतलता चंद्रमा की और अग्नि की जो गर्माहट है ये इत्यादि तत्व मिलकर के जब बहते हैं पृथ्वी पर तो अलग-अलग जगह पर कहीं पर चांदी बनती है कहीं पर स्वर्ण बनता है तो वहां पर जो है स्वर्ण के बनने का जो मामला है वो भी यहां पर आता है। स्वर्ण में देखिए आप कि जो तरलता होती है वह भी होती है और जो अग्नि की चमक होती है वह भी होती है और जो शीतलता होती है जल की वो भी होती है तीनों तरह के तत्व होते हैं स्वर्ण में तो उस वो जो व्याख्या है कुछ वहां पर बताई गई है माधवाचार्य शास्त्री जी की बुक है अभी वर्ड टू वर्ड मुझे याद नहीं है तो उसमें सारी चीजें क्लियर क्लेरिफाई हो रही है तो ये थी हमारी चीजें आज आर्य समाज के एक बहुत

01:36:05:25 प्रसिद्ध है ये आचार्य जी इनके साथ हमारी आज बातचीत हो गई है। जी आदित्य जी नारायण भैया नारायण ऐसा है कि जब वेदों वेदों की बात आती है कह देते हैं योगिक अर्थ होते हैं। वेदों के सामान्य अर्थ नहीं लिए जाते। सब योगिक है। तो पुराणों के प्रसंग योगिक क्यों नहीं हो सकते? हम लोग तो कहते हैं ना कि भाई वेदों वेदों की भांति पुराण अनादि है हां और पुराण वेदों का ही विस्तार है तो पुराणों का योगिक अर्थ लगाने में ये सब पीछे हट जाते हैं और वेदों में जहां पर सब स्पष्ट है वहां भी अलंकार लगा देते हैं वेदों वेदों में वेदों के अर्थ अपने अनुसार ले लेंगे उसमें तरह तरह की अलंकारी व्याख्या मान करके मगर पुराणों में वही अलंकारी व्याख्या ढूंढने का प्रयास नहीं करते हैं। भाई एक जो राम मनोहर जी आए हैं उनको भी ले लीजिए ऊपर मुझे लगता है कि आंखें खोल देने वाली चर्चा हो है यह जो भी प्रबुद्ध जन जो भी प्रबुद्ध वर्ग है वो इस चर्चा को अवश्य सुने और देखे कि किस प्रकार से अवतार की सिद्धि होती है [गला साफ़ करने की आवाज़]

01:37:17:08 जय श्री राम जय श्री राम जी जय श्री राम जी जी हमने हमने सोचा था कि ये कोई प्रसिद्ध आचार्य हैं। इन्होंने बहुत सारे वैदिक फिजिक्स के ग्रंथ लिखे हैं। ये कुछ विशेष बताएंगे। कुछ नई चीज रिसर्च करके बताएंगे। परंतु जहां पर सब फंस जाते हैं व भी फंस गए। कुछ विशेष दिखा ही नहीं इनकी चर्चा सुनके। हम हम बिल्कुल बिल्कुल क्योंकि जिस जिस चीज को ये कुतर्क कह रहे थे जब शिवश जी ने उदाहरण दिया नाली वाला तो भैया जब इन्होंने इन्होंने बोला कि भैया यह चीज यह कुतर्क है। तो जब आप मोहम्मद का उदाहरण दे रहे हैं वह कुतर्क नहीं है। तो वहां पर वो फस गए थे। एक्चुअली ये बहुत बड़ा पॉइंट था। वो जब तर्क पर फंस रहे थे तो प्रमाण की बात कर रहे थे। प्रमाण पर फंस रहे थे तो फिर वहां पर वो उस पर जा रहे थे। अश्लीलता पशु इत्यादि। वहां वहां ये अलंकार नहीं ढूंढेंगे। वहां उनका तात्पर्य समझ समझने नहीं जाते हैं। सबसे सुंदर बात जो आपने कही शिवश भैया आपने जो बात कही ना सबसे सुंदर जो लगा जो वही आपने पहले तीन पॉइंट कि सर्वज्ञ का मतलब होता है सब कुछ जानने वाला। ठीक है? [गला साफ़ करने की आवाज़] जब सर्वज्ञ का मतलब होता है सब कुछ जानने वाला। तो सर्वशक्तिमान का मतलब

01:38:32:24 सब कुछ करने वाला क्यों नहीं है भाई? मैटर यहां ये है। है ना? ये जो तीन पॉइंट है कि ईश्वर जो है सर्वशक्तिमान है सनातन के ईश्वर तो फिर वहां बाधित तो किसी भी कारण से हो बाधित तो हो रहे है ना अगर वो अवतार नहीं ले रहे हो [गला साफ़ करने की आवाज़] सिंपल बात है और वो भी तब जब शास्त्र में प्रमाण है जो आपने उदाहरण दिया [गला साफ़ करने की आवाज़] 31 से 19 का तो वहां पर लिखा हुआ है कि बहुत बहुत रूपों में प्रकट होता ठीक है बहुत रूपों में अब इसकी वो क्या कह रहे हैं व्याख्या बदल दे रहे हैं कह रहे हैं ये जो बहुत रूपों में लिखा है एक्चुअली वो ईश्वर के लिए नहीं लिखा है कि ईश्वर बहुत रूप लेकिन वो मंत्र तो ईश्वर के लिए है कि ईश्वर बहुत रूपों में प्रकट होता है। जी सायन सायन का जो आप एग्जांपल दे रहे थे तो फिर सायन का उनको पसंद नहीं है उनके मुताबिक अर्थ नहीं है तो भाई नहीं हम इसको नहीं मानते अर्थ गलत है ये कैसे हो गया आपके अनुकूल जो अर्थ जब नियोग को मानना होगा और व्यक्ति प्रश्न करेगा ये मुझे अच्छा नहीं लग रहा देखने में तब वहां पर ये कह दोगे नहीं भैया शास्त्र ने कहा है तो मानना पड़ेगा तो अगर आपको कोई शास्त्र की बात अच्छी नहीं लग रही तो उसको तर्क से कैसे काट रहे हो वहां पे भी यही नियम लागू करो ना कि भैया शास्त्र की दृष्टि से देखो शास्त्र का तो मानना पड़ेगा

01:39:48:21 या तो जाकर के शायन परंपरा जो है उनकी परंपरा से जाकर के उसका अर्थ पूछो और इससे मतलब क्या है अगर शायन की परंपरा से गलत अर्थ आ रहा है तो मंत्र भी तो गलत आ सकता है तो इस विषय में कोई जवाब ही नहीं है आप ये आप ये प्रश्न मत पूछो अथ तो धर्म जिज्ञासा अथातो ब्रह्म जिज्ञासा अथातो धर्म जिज्ञासा में प्रश्न भी आ गया संशयात्मा विनति क्यों ना पूछे प्रश्न प्रमाणों से प्रमाणों से प्रमाणों को तर्क से वो व्यक्ति काट रहा है जो व्यक्ति तर्क से अपने मत को सिद्ध करने में असमर्थ होकर प्रमाणों की ओर भाग रहा है। [हंसी] सही कहा। प्रमाणों से वो व्यक्ति जो प्रमाणों से वो व्यक्ति तर्कों को काट रहा है जो व्यक्ति तर्क से पलायन करके और जो प्रमाणों पर भागा था। हां तर्क से प्रमाणों को वो व्यक्ति काट रहा है जो व्यक्ति तर्क तर्क से अपने मत को अुद्ध करने में सिद्ध करने में असमर्थ हो के प्रमाणों की ओर भागा था [गला साफ़ करने की आवाज़] तर्क तर्क तुम्हारे पास बचा नहीं है तर्क से तुम नष्ट हो गए तर्क से तुम पराजित हो गए अब तुम प्रमाण की ओर भाग रहे हो तो फिर प्रमाण को तर्क के आधार पर कैसे

01:41:03:22 काटोगे तर्क तो खत्म है ना मर गया ना तर्क तो पहले ही छोड़ आए थे बिल्कुल तर्क में जब टूट गए थे तभी तो प्रमाण आए थे और इसीलिए क्योंकि यह जो चीज है ना यह जानी है इसमें परंपरा में यह जो शास्त्रों में जो लिखा है यह अंतत गतवा जाना है यह अपना अर्थ बताएंगे हम अपना अर्थ बताएंगे तो वहां पे कभी भी निष्कर्ष नहीं आ पाएगा ईश्वर अवतार नहीं ले सकता कि ले सकता है इसलिए पहले मैं तर्क पे बात करता हूं भाई आपके पास जितने आपकी झोली में तर्क हो आप देते जाओ अब क्या-क्या इन्होंने दिया अच्छा इन्होंने एक जगह माया पे और बात कही थी तात्विक व्याख्या पे और बात कही थी वो भी आपको बता दूं कि एक आदमी है जो पेपर ले रहा है भाई भाई अगर कोई व्यक्ति परीक्षा ले रहा है तो जिस छोटी बच्ची के साथ दुष्कर्म हो रहा है उसका दुष्कर्म हम स्वीकार कर लें। वो उसको बुरा नहीं लगना लगेगा क्या? अगर किसी व्यक्ति का भाई ये तुम्हारी प्रॉब्लम है कि तुम पेपर ले रहे हो। जिस छोटी बच्ची के साथ दुष्कर्म हो रहा है वो तो पूछेगी ना मैंने क्या किया था? हम तो वहां पर तो ये मानना पड़ेगा ना कि भाई प्रतीति में ऐसा हमें दिख सकता है कि ईश्वर जो है लिप्त हो रहा है। फिर हम उसे अलिप्त क्यों मानेंगे? आत गतवा आपकी जो तात्विक व्याख्या वो भी काम नहीं आनी है। वो व्याख्या काम तभी आएगी कि यह जो दुष्कर्म है ये माया मात्र हो ही नहीं रही है। प्रतीति

01:42:18:26 मात्र है। नहीं तो आप दोष मुक्त नहीं कर पाओगे ईश्वर को। यही यही तो जो है अब्राहमी कल्ट वाले यही तो बताते हैं कि जो है उनके उनके द्वारा जो प्रदत ईश्वर है वो जो है यहां पर ले रहा है अरे भाई जब परीक्षा परीक्षा लेने वाला तर्क वहीं से उठ के आता है उस जगह तभी तो मैचिंग मैचिंग हमने थोड़ी ना परीक्षा चुनी थी भाई उस बच्ची ने परीक्षा नहीं चुनी है ना अच्छा एक बात और है तात्विक व्याख्या की बात कर इन्होंने माया पे प्रश्न उठाया था वैसे तो भरभ के इंद्र मायावी वाला तो वो मैं अगला प्रमाण देता ही कि माया क्या है। खैर अब माया की बात करूं। इनके अनुसार जो महाप्रलय होती है उसमें स्पेस वगैरह कुछ नहीं होता है। प्रकृति होती नहीं है। प्रकृति भी ईश्वर के अंदर अदृश्यमान होती है। ठीक है? और जो मुक्त जीव होते हैं वह विचर रहे होते हैं। और जो यह वाले होते हैं ना जिनके अभी मुक्त नहीं हुए वह वहां पर बेहोश पड़े होते हैं। तो अब ये जो कहीं पर बेहोश पड़े हैं और यह जो क्या कहते हैं जो प्रकृति है वो भी उसके अंदर है। ब्रह्म के अंदर

01:43:33:27 है। ठीक है? प्रकृति भी उसके अंदर है। और तीसरा क्या है? कि कुछ जो है मुक्त जीव वो विचर रहे हैं। अब यह बताओ जब स्पेस है ही नहीं तो यह मुक्त जीव कहां पर विचर रहे हैं? कहां विचर रहे हैं? भाई गति कहां हो रही है? ट्रेवलिंग कहां हो रही है? तो मानना पड़ेगा कि जो ट्रेवलिंग है, जो स्थितियां है, यह ज्ञानार्थक है। यह ट्रेवलिंग ज्ञानार्थक है। ठीक है? यानी कि माया और क्या कहते हैं? सत। सत और माया का अंतर आ गया ना? व्यवहार और परमार्थ आ गया। इनकी खुद की व्याख्या में ही अच्छा ब्रह्म के अंदर कौन सी दीवार है जिसके कारण जो जो प्रकृति ब्रह्म के अंदर है दिख नहीं रही है। दिखने योग्य नहीं है। और इनका एक वो वाला वो वाली बात भी है कि उस समय उसको देखने वाला कोई नहीं होता है। तो किसी देखने वाले ना होने के कारण किसी का अव्यवहारिक होना सिद्ध नहीं होता है। कोई भी अव्यवारिक तब होगा जब वो अव्यवहारिक होगा। चाहे भले ही उसका उसका दृष्टा हो चाहे ना हो। हां जी बिल्कुल बिल्कुल और [गला साफ़ करने की आवाज़] यहां पर तो अर्थ भी भिन्न नहीं है जो दयानंद सरस्वती जी ने भी अर्थ किया है बहुत प्रकारों से विशेषकर प्रकट होता हूं तो ये तो दयानंद जी भी वही लिख

01:44:49:03 रहे हैं साय भी वही लिख रहे हैं बस ये यहां पर यहां पर अर्थ में नहीं उसमें अपना भाव ले रहे हैं अपना भाव ले रहे हैं मैंने तरह से कहा अंतत तो गतवा मैंने ये भी बताया ना ईश्वर को आप ये मानो उसका स्वभाव है कि वो जो है व्यवहार में ना आ सकने वाला है अप्रकट है। उसका स्वभाव है। वो अप्रकट है। किसी प्रकार से जानने में ना आने वाला है। फिर वो प्रकट हो रहा है ना तो आप अगर स्वभाव विरुद्ध कार्य मानेंगे तो जो प्रकट होना है ये भी तो स्वभाव विरुद्ध हो गया। जानने वाला अगर वो हो रहा है तो यहां पर भी अवतार मानना पड़ेगा। क्योंकि अगर अवतार नहीं मानेंगे तो ईश्वर में परिवर्तन मानना पड़ेगा और ईश्वर में परिवर्तन मान लेंगे तो ईश्वर की शाश्वतता भंग हो जाएगी। फिर वो ईश्वर ही नहीं रह जाएगा। तो अवतार मानना पड़ेगा कि ईश्वर का जो शुद्ध रूप था वो है। अब वो एक और रूप में प्रकट हुआ। अब यहां इस रूप में वो जानने वाला हो गया। यह सगुण निराकार अवतार है भगवान का। जी और ब्रह्मांड को भी अगर आप ये बोल रहे हो कि जो पूरा ब्रह्मांड है वो भी एक शरीर है। ऐसा बोलते हैं तो उस रूप में भी तो व्यवहार में आ रहा है ईश्वर। थोड़ा सा अवतार सिद्ध हो रहा है। आचार्य जी शुरू से जो है थोड़ा रहने की कोशिश कर रहे थे। पर अंत में आते आते वो थोड़ा सा व्यक्तिगत होने लगे। थोड़ा सीधे-सीधे आरोप इत्यादि पर आने लगे। पर यह मैंने एक्सपेक्ट नहीं करा था इनसे। सही बताऊं।

01:46:04:04 मुझे नहीं मुझे यह था कि यह विषय से नहीं भाग के बात करेंगे। मतलब विषय पर रहेंगे। ये मैं सोच रहा था। लेकिन अंत में जब वो बोलने लग गए कृष्ण और यह बात तो वही मेरे को दृश्य हुआ कि अक्सर आर्य समाज जी हमेशा भगवान श्री कृष्ण के ऊपर वो करने लग जाते हैं कि देखो आपने चरित्र बिगाड़ दिया। ये सब वही व्यवहारिक चीजें आने लग गई। तो कोई नई चीज नहीं लगी मुझे यहां पर। मैं आचार्य जी से तो कम से कम एक्सपेक्ट नहीं कर रहा था कि वो इस तरह से मतलब करेंगे आज मैं सुबह से ही मतलब आप आज डिबेट ही देख रहा हूं एक नास्तिक नास्तिक से आप डिबेट कर रहे थे राटा वो कैसे अमूर्ख नास्तिक से आप डिबेट कर रहे थे उसके पास मतलब गधा को घोड़ा और घोड़े को गधा कर रहा था शास्त्र जी जी

01:46:58:21 एक मूर्ख नास्तिक से आज देख रहा था वो इतनी लंबी गई डिबेट और मतलब पांच मिनट के चीज को घुमा के उतने दूर तक ले गया जो मतलब कि क्या सामान्य जो पारिवारिक व्यवहार है माता पत्नी और पुत्री के लिए जो दृष्टि का जो विधान है सनातन को उसको ही वो चुनौती दे रहा है बेवकूफ के जैसे कि नहीं ये तो सामाजिक रूल एक बात आपने देखी मैंने कहा कि भाई एक तो तर्क है नहीं तर्क तो हो गया खत्म ठीक है और दूसरी बात फिर वहां पर आई कि क्योंकि शायण ने शायण की कोई बात हमको नहीं समझ में आ रही इसलिए हमने सायण को छोड़ रखा है ठीक है तो जो आर्य समाज की कोई बात यदि आपको समझ में नहीं आ रही आप आर्य आर्य समाज को छोड़ दो घोषित कर दो मैं आर्य समाजी नहीं हूं यही तो हमको वास्तविकता बाहर लानी है हम यही चीज तो आपने बोली कि उसके बाद मैटर ही खराब हो गया [हंसी] सायल का नहीं समझ में साहिल को छोड़ दो तो ये आदि समाज की कोई चीज समझ में नहीं आ रही तो आप कह दो कि आप समाधि नहीं हो बात यही तो अटक गई फिर उसके बाद हो गया मामला हम समझ गए थे कि लगभग सभी लोग यही करते

01:48:15:01 [हंसी] लगभग सभी लोग यही करते हैं मुझे नहीं लगता कि ये भी यही करेंगे एंड में जाकर थोड़ा हाइपर हो जाएंगे और फिर व्यक्तिगत हो जाएंगे लेकिन ये भी वही कर गए। वही कर गए। ऐसे उनका तो स्टार्टिंग भैया को अद्वैत पर लेकर के अद्वैत विषय पर आए लेकर के और अद्वैत विषय पर उनका माया ब्रह्म इन सब का खंडन करने का वो शायद प्रयास कर रहे थे स्टार्टिंग में ही। लेकिन क्या है भैया का जो विषय पकड़ का जो है ना कैपेबिलिटी [हंसी] उसमें उनको भागने नहीं दिया। भैया ने तुरंत तुरंत उसको नहीं विषय पर रहिए। विषय पर रहिए। फिर विषय पर अवतार [गला साफ़ करने की आवाज़] मैं बस ये बता रहा था मैं बस ये बता रहा था कि जैसे आपके पास कुछ चीजें ऐसी है जो प्रतीति हो सकती है यहां पे गलत होगा मगर आपके पास एक तात्विक व्याख्या होती है पीछे हमारे पास भी हर चीज के लिए तात्विक व्याख्या है अच्छा मैंने एक चीज और बोली कि जब उसे अवतार लेने की आवश्यकता नहीं है तो पत्थर गिराने की आवश्यकता भी नहीं है [हंसी] वो वो सही था सही

01:49:25:08 आपने तो भैया वहां पर माया का माया का जो स्टार्टिंग में बात वहां पे आपने माया को खोला नहीं था वहां पे आपने ये बात इतना ही बोला था कि जिस भी प्रकार से आप ईश्वर को निर्दोष मानते हैं हम लोग इस आधार पर मानते हैं आप उस आधार पर मानते हैं तो वो आप बता रहे थे वहां पर लेकिन उन्होंने माया को पकड़ा तो बोला अब इसको अब विषय बदलेंगे और इनको विषयांतर पे ले जाएंगे तुरंत आपने बोला कि आप माया को छोड़िए आप इधर बताइए जिस भी कारण से आप रखते हैं मानते हैं ईश्वर को निर्दोष कारण से अनंत मैंने कहा मैंने एक पकड़ा अनंत पे बात करो अनंत पे बात ही नहीं पे आ गए और मैंने वाला भी दिया मैंने मैंने वो वाला भी दिया हां मैंने वो वाला भी दिया है क्या कहते हैं कि व्यवहार विशेष व्यवहार कर रहा है ना ईश्वर अनंत है मगर विशेष हो तो रहा है माना भी उन्होंने विशेष हो रहा है तो वहां पर विशेष रूप धारण कर रहा है। दिखाई देने वाला नहीं है। परंतु अभी वो जो था एक रस सर्वव्यापी उससे वो जो है एक वाले रूप में आकर के व्यवहार कर रहा है। बिल्कुल दिखाई देने वाली बात तो बाद की है। अगर वो बात चलती तो फिर मैं धक्का लेके आता। वो फिर बाद

01:50:40:09 में लाता। हां ये ये धक्का रह गया बीच में। ये धक्का रह गया। [हंसी] वो पहले ही प्रमाण पे आ गए ना। पहले प्रमाण आ गए ओम रश्मि वाला सुनना चाह रहे थे फिर वही है बात ओम रश्म आपने वहां पर दूसरी बात भैया आपने वहां पर ये बात बोला था आपके पास कहां से [गला साफ़ करने की आवाज़] है वो मंत्र कहां से आएगा आप किसको मानते हैं या मनुस्मृति पे कुछ बात पता नहीं यही कुछ हो रहा था कि आप पूछ रहे थे कि कि कहां से आए तो बाद में वो ये स्वीकार करते हैं कि मूल तो सायन ही है ठीक है जब भाई तुम सायन मान रहे हो आप रहे हो तो फिर आप क्यों उसका फिर विरोध कर रहे हो अगर आप विरोध कर रहे तो आपके पास उचित नहीं है ना फिर आपका परंपरा नहीं है ना आपको प्रमाणिकता और तीसरी बात कर दिया उन्होंने केवल मनमानी लगा वेद का जो मंत्र लिया वो वेद का मंत्र ही बदल दिया अजयमानु जाते वाला में उन्होंने मंत्र गलत उच्चारण किया उन्होंने उन्होंने उस मंत्र का गलत उच्चारण किया शिवा जी ने बोला भी कि मंत्र नहीं उच्चारण करना उन्होंने गलत उच्चारण किया तो फिर वो गलत ही है ना वेद भगवान का अपमान होता है ऐसे गलत मंत्र का उच्चारण किया क्या है मैं क्या है मैं क्या आप लोगों को एक बात बताऊं ये उनके

01:51:55:15 लिए नहीं है मैं अपने जीवन का एक घटना बता रहा हूं हुआ क्या था मुझे बहुत सारे लोगों ने पकड़ लिया था युवा अवस्था की बात है जब मैं युवा था अभी भी कुछ लोग मुझे युवा समझते पर मैं मेरी आयु जो है युवा वाली है नहीं तो जब मैं युवा था तो कहीं पर तो कहीं पर कुछ बात हुई थी तो किसी से मेरा मेरा क्या है सदैव यह हमेशा भगवान की कृपा से रहा कि मैं कितना भी क्रोध आए पर मैं विवेक को खोता नहीं हूं। मैं विवेक में रहता हूं। मतलब ऐसी चीजें नहीं करने लगता कि गाली गलौज पर उतर आए या मतलब अपने स्तर को गिरने नहीं देता मैं कठिन से कठिन परिस्थिति में। तो किसी ने मुझे गाली दे दी थी कहीं पे और उसके लोग वहां पर मौजूद थे। हां वो मुझसे जो है शतरंज में हार गया था। वो शतरंज में हार गया था। और लगातार मैंने जो है उसको शतरंज में चार छह बार हरा दिया था और बहुत वैसा वो प्रतियोगिता थी मतलब जैसे आज आज हम लोग शत इस पर बैठे हैं ना ऐसा ही दिन वो भी था तो शतरंज में वो हार गया था तो तो जब वो हार गया तो लास्ट में जब मैं जाने लगा तो उसने मुझे कुछ अश्लील शब्द कह दिए जैसे अश्लील शब्द भागवतानंद के यहां पर उसके उसने कहे थे पांडे ने जाते जाते कुछ बड़बड़ा दो कुछ तो कुछ तो भस निकाल लो

01:53:10:19 तो जब वो हार गया तो उसने ऐसे कह कह दिया तो मैंने कहा मैंने कहा भाई यह क्यों बोल रहे हो? हां तुम हार गए इसलिए अपनी वो ऐसे करके चालू हुई बात तो वो तुरंत और हावी हो गया और जो है उसके लोग भी मेरे आसपास आ गए। अब जब उसके लोगों ने मुझे घेर लिया 10 20 लोगों ने घेरा हुआ था तो मुझे वो 10 20 लोग नहीं दिख रहे थे। मैं अपना टारगेट ढूंढ रहा था वो कहां है। है ना? और मैंने भीड़ में से निकल के उसको वो कुछ हो रहा है मेरे पीछे। वो हाथ पैर चल रहे हैं लोगों के और मैं उसको देख रहा हूं। वो कहा उसको पकड़ लिया। भीड़ में से हाथ निकाल के उसको पकड़ा उसको मारा और उसको मतलब जो अपनी चीज थी वो मैंने कर ली। तो यही होता है विषय। विषय विषय को ढूंढते रहिए। विषय को पकड़ के रखना बहुत जरूरी है किसी भी चर्चा में। [गला साफ़ करने की आवाज़] विषय से हम घूमते चले जाते। घूमते चले जाते हैं। जी। ये जो तीन पॉइंट जो है ना जो तीन पॉइंट अपना रहता है कि सर्वज्ञ है सब कुछ जानने वाले हैं और सर्वज्ञानी है हर ज्ञान का उनके ईश्वर को पता है और सर्वशक्तिमान सर्वव्यापक सर्वज्ञ

01:54:23:08 सर्वव्यापक तो मुझे अभी उन्होंने एक एग्जांपल भी जो उन्होंने बीच में दिया था कि सब कार्य करने का मतलब मतलब जो है कि ऐसा नहीं है कि ये कार्य भी वो कार्य भी उन्होंने जो एग्जांपल जो दिया था ना वो ध्यान देने योग्य बात है जो सुन रहे होंगे उस वक्त वो मानव कृत कार्यों के लिए है और मानव की क्षमता के हिसाब से बताया गया कार्य है कि मुझे कह दिया गया कि राम मनोहर तुम फलाना सारा काम कर लेना तो भाई मेरी एक सामर्थता की सीमित है मैं सीमित हूं कि उससे ज्यादा मैं नहीं कर सकता तो सामने वाले के सब कहने का मतलब है कि मेरे सामर्थ के अंदर लेकिन ईश्वर के सामर्थ की तो सीमा नहीं है तो उस पर ये लागू कैसे होएगा? नहीं हो सकता ना लागू। जब वो सर्वव्यापक का मतलब हम ऐसा नहीं मानते कि नाली में नहीं है, इस कटोरी में नहीं है, आकाश में नहीं है, पेड़ के पत्ते में नहीं है, शरीर में नहीं है। हम ये मानते हैं कि सब जगह है मतलब वो कटोरी भी है। वो एक छोटा से छोटा जीव भी है। अच्छा एक और चीज आप देखिएगा डिबेट के समय शिवश भैया सब लोगों को भी कह रहा हूं ध्यान से ध्यान रखेंगे कि जैसे डिबेट होता है ना तो एक कहते हैं ना कि आप लोग मूर्ति बोल के उसके उनके ओहदे को आप छोटा कर रहे हैं। अरे भाई कैसी मूर्खता पूर्ण बात है। एक जो वैसा जीव जो हम अपनी

01:55:38:14 नगन्य आंखों से नहीं देख रहे हैं। उसको भी बनाने वाले ईश्वर है। उसके भी जन्म उसका भी जन्म देने वाले ईश्वर है। तो जब उतने छोटे से जीव जिसको हम देख भी नहीं पा रहे हैं। उसको पैदा करने के लिए ईश्वर जब अपनी शक्ति लगाता है तब वहां क्यों नहीं कहते कि भाई इतना तुच्छ कार्य क्यों कर रहा है ईश्वर? हम मैंने ये वाले क्वेश्चन किए तो ये तर्क है नहीं। मैंने ये वाले मैंने वहां पे ये वाले क्वेश्चन किए तो थे कि भाई अगर आप क्या कहते हैं ये उसके द्वारा आप छोटे वाले कार्य होने में वो मान रहे हो तो उसके द्वारा जो वेद जो वेद का ज्ञान है वो एक मिनट अपने मन में सोचेगा सबको वेद का ज्ञान हो जाएगा फिर क्यों मंत्र के रूप में देता है वेद क्यों दृष्टा होते है फिर उसके तो उन्होंने कोई जवाब थोड़ी ना दिया है मैंने जितने क्वेश्चन रेज किया कोई भी व्यक्ति होगा कोई जवाब नहीं दिया नहीं अच्छा एक चीज और बता दूं पशु बलि इत्यादि के बारे में बता दूं तो जो हमारे शास्त्रों में पशु बलि इत्यादि का जहांजहां पर रेफरेंस आया है पहली बात तो ज्यादातर प्रतीकात्मक है और जहांजहां पर यह है ही कि हां इसमें यहां पर पशु का उपयोग है तो सबसे पहली बात है वहां विवशता अथवा प्रवृत्ति अब विवशता और प्रवृत्ति की

01:56:53:15 बात क्या है कि जो ये जो चीज है पशु पशु का उपयोग पहली बात जो गाय इत्यादि के आरोप लगते हैं वो तो करपात्री जी का उसमें समाधान है। वहां पर जो गाय इत्यादि को यज्ञ में उपयोग में लेने की बात कही गई है। पहले भी बता चुका हूं। वहां पर गाय की बात नहीं हो रही है। वहां पर मानसिक आहुति की बात है। गाय को लेकर के उसका वध करना यज्ञ के निमित्त वो कहीं पर भी स्वीकार्य नहीं है। हमारी परंपरा में। दूसरी बात कि वेदों के अंदर जो जहां पर अगर ऐसे अर्थ प्राप्त हो भी जाते हैं कि हां भाई पशु है ही तो वो वहां पर विवशता अथवा प्रवृत्ति से निवृत्ति के निमित्त है उसका पर्यावसान जो मांसाहार है उसकी उसके प्रोत्साहन में ना होकर उसकी न्यूनता में कि यदि खाना अनिवार्य अगर ग्रहण करना अनिवार्य हो जिस स्थिति में तो उस स्थिति में किस विधि के द्वारा ग्रहण किया जाए जिसके कारण उसमें कहीं उसकी प्रवृत्ति से निवृत्ति होती जाए अथवा यदि व्यवस्थावश यदि उसका उसको ग्रहण किया भी जाए तो हम उसी को अपना स्टैंडर्ड प्रोटोकॉल ना मान ले उसी को जीवन ना मान ले सिर्फ इतने भर के लिए वो वाक्य है जैसे कि अगर अल्कोहल की बात करें खांसी होने पर आज के टाइम में

01:58:08:16 निर्विवाद रूप से निर्भीक होकर के व्यक्ति अल्कोहल पीता है कि नहीं पीता है उसमें कोरेक्स में अल्कोहल का और ना जाने कितनी दवाइयों के नाम कितनी दवाइयों में पशु का [गला साफ़ करने की आवाज़] उपयोग हो ही रहा है। मगर वहां पर कोई विधि नहीं है। मगर हमारे यहां पर यदि पशु को ग्रहण करने की जो है अंतिम व्यवस्था भी हो जाए तो वहां पर भी विधि वाक्य इसलिए दिए गए हैं जिससे कि उसमें हम लिप्त होकर ना रह जाए। उससे निवृत्ति भी पाए। तो उसका मतलब क्या हुआ कि ऐसे वाक्यों का जो पर्यावसान है वो मांसाहार की न्यूनता में है। उसके प्रोत्साहन में नहीं है। उसको प्रोत्साहित नहीं किया गया है। बस इतनी सी बात है कि हमारे यहां पर जो प्रामाणिक परंपराएं हैं वो वो अस्पताल है जहां बाहर ये नहीं लिखा हुआ है कि यहां पे जो है रोगी नहीं आ सकता है। अस्पताल के बाहर हम यह लिख दें कि भैया यहां पे रोगी नहीं आएगा। तो उस अस्पताल की क्या वैल्यू? उसी प्रकार से जो धर्म है जो प्रामाणिक परंपराएं हैं वो मनुष्य को धार्मिक बनाती हैं। मनुष्य मनुष्य को पशुत्व से मुक्त कराती है। मनुष्य बनाती हैं। तो उसको एज इट इज उस रूप में ग्रहण करेंगी जिस रूप में वो है और कई प्रकार के रूप वाले मनुष्य हैं। ग्रहण करने के बाद ऐसी विधियां

01:59:24:04 ऐसे उपाय किए जाएंगे कि धीरे-धीरे उसके अंदर की जो विकृतियां जो दोष है उससे वो दूर हो और वो अपने मुक्ति पथ पर आगे बढ़े। तो यह पशु बल इत्यादि का महत्व है। हालांकि अवतार विषय से इसका कोई रिलेशन नहीं था। कोई रिलेशन नहीं था। दूसरी बात यदि आपको कोई चीज गलत लग भी रही है अपनी इंद्रिय चीजों से अगर आपको कोई चीज गलत लग भी रही है तब भी यदि वहां पर शास्त्र वाक्य वहां पर प्रधान है तो वहां पर उसको प्रधानता देनी पड़ेगी। और यदि शास्त्र वाक्य को प्रधान नहीं मानेंगे अपनी इंद्रियों को प्रधान मानेंगे तो फिर शास्त्र वाक्य को ला क्यों रहे हो? सीधी सी बात। फिर तर्क पे ही बात करते रहो। जी लेकिन नियोग के विषय में प्रवृत्ति से निवृत्ति वाली बात नहीं है। नियोग का जो विषय है इनका वहां पर ऐसा नहीं है कि आपको निवृत्ति की तरफ जाना है। नहीं नहीं नहीं इनका वहां पर ये इनका वहां पर नियोग के मामले में भी परंपरा प्राप्त सिद्धांतों के विरुद्ध कई है। नियोग के मामले में एक अलग से पूरा वीडियो बनाएंगे। करपात्री जी ने नियोग पर भी बहुत बात की है। तो नियोग का जो मामला है उसमें मोटी मोटी अगर बात बता दूं। पहली बात तो आपत धर्म है। है ना? जब व्यवस्था दूसरी बात उसमें प्राथमिकता होती है मानसिक नियोग की प्राथमिकता हमेशा वो दहिक नियोग नहीं होता है ये लोग उसको दहिक बना मतलब जो वही वाली बात जो अभी आदित्य नारायण जी कह रहे थे कि वेदों के मंत्रों को तो योगिक मान करके उनके दूसरे अर्थ

02:00:39:06 निकालेंगे जहां पर क्लियर होगा और जो ये वाले मंत्र होंगे जहां पर जो है जहां पर उनके अर्थ निकालने की जरूरत है वहां पर उनका वैसा ही अर्थ ले लेंगे जो वो कह रहे हैं ये वाली बात तो नियोग पहली प्रथम तो क्या है वो जो है जो मनो मनोगत होता था। मनोगत व्यवहार। दूसरी बात जो दहिक वाला भी है तो वो उसमें है जहां पर ऐसी प्रज्ञा शक्ति वाले लोग थे जो कि अगर उसमें लिप्त होते हुए भी लिप्त ना हो उसको धारण ना कर ले उन भावनाओं से ग्रसित ना हो जाए। तो आज के टाइम में तो नियोग बिल्कुल सर्वथा बैन है। इसलिए क्योंकि आज वो प्रज्ञा शक्ति वाले लोग बचे ही नहीं है। तो आप क्यों सिखा रहे हो नियोग लोगों को? ये सारी बातें फिर भी नियोग पे तो एक अलग से वीडियो ले ही आएंगे। जी शास्त्रवाद जी आप कुछ कह रहे थे। जी

02:01:36:00 आवाज आ रहा है हां हां बोलिए बोलिए जी भैया वही हम देख रहे थे कि वो तो हर समय अपने विषय से भागे हैं हर प्रकार से वो जब बलि खोल रहे हैं आप भी नियोग खोल दे रहे [हंसी] जो उनका हाल हो रहा था देखने लायक था वो अच्छा प्रहार था क्योंकि जब वो अपना अस्तर निकाल रहे थे तो इन्होंने भी अस्तर यूज़ किया और वो उससे निष्फल हो गया। हालांकि मैं इसको मैं इसको अपनी कमजोरी समझता हूं। मैं इसे ठीक नहीं समझता कि सामने वाले ने आपको अंधा कहा आप उसे गूंगा कह रहे हो। यह मेरा तरीका नहीं है। मगर वहां पे है लेकिन वहां पे उनको मैं स्मरण करा रहा हूं कि हम लोग यह विषय से भटक रहे हैं। आप अवतार सिद्ध करिए और इन्होंने खुद कहा था कि अगर किसी के पास तर्क नहीं होंगे तो वो वो कहेगा कि हमारे आर्य समाज में तर्क नहीं है अवतार को काटने के विषय में। वो कहेगा मगर वो अपनी बात से ही मुकर गए। भाई तर्क खत्म हो रहे तो आप कहोगे ना कि तर्क नहीं है। क्योंकि क्योंकि प्रमाण तो विवादित है ना। प्रमाण विवादित है। उस पर कभी निष्कर्ष पहुंचेंगे ही नहीं। आप कहोगे इसका अर्थ इसका अर्थ अवतार नहीं है। हम कहेंगे है कहां से उस पर होगा? आप तर्क लाइए इस पर इस पर ही भैया उन्होंने कहा ना कि अभी आप कुतर्क कर रहे हैं। अब आप प्रमाण पे आ जाइए क्योंकि वो ये स्पष्ट रूप से कह नहीं सकते भाई

02:02:51:03 मेरे पास तर्क खत्म हो गया। अब तुम प्रमाण पर आइए। हां और प्रमाण दे दिया बहुत सही है कि प्रमाण दे दिया। अगर शिवश भैया ने प्रमाण दे दिया। अब वो जो भी प्रमाण देंगे वो बोलेगा यह गलत है। वो अच्छा वही मैं बोला ना आपको भैया यह सब लोग जितने भी है ना यह सब एंड में वही आ जाते हैं। एंड में वही आ जाते हैं घूम के मैं नहीं मानूंगा नहीं मानूंगा नहीं मानूंगा। अच्छा प्रमाण कुछ और भी दे दूं। वैसे तो बहुत सारे प्रमाण है पर कुछ और प्रमाण भी दे दूं मैं।

02:03:26:12 एक वो है तीन 53 आठ ऋग्वेद का इंद्र मायावी है ना 3 53 आठ है ना और एक है 6 47 18 ऋग्वेद का याद है आपको 6 47 18 और तीन 53 आठ ये सब ऋग्वेद के है 6 47 18 में क्या है माया द्वारा ईश्वर अनेक रूप बनाता है वो रूपम रूपम वाला माया इंद्र माया रूपम हां और नहीं रूपम वाला दूसरा है वो तीन 53 आठ है परमात्मा नाना प्रकार के रूपों में प्रकट होता है वो है रूपम रूपम ठीक है तो ये है जो भी आ रहे हैं अगर वह नोन पर्सन है तो अपनी पहचान बताते हुए आए और अननोन है तो अपना चेहरा लेकर के आए और मैं बता दूं मांडकोपनिषद में सातवें नंबर में ईश्वर को व्यवहार में ना आ सकने वाला बताया गया है ईश्वर व्यवहार में नहीं आ सकता तो यह उसका मौलिक स्वरूप है। अगर वो किसी भी प्रकार से व्यवहार में आएगा आपको ज्ञान देने वाला होने के रूप में आपके अंतःकरण का विषय बनेगा। किसी भी प्रकार से यदि वह व्यवहार में आएगा तो वह पहला अवतार है ईश्वर का नहीं तो उसको परिवर्तनशील मान लो दैट्स इट फिर वो शाश्वत नहीं रहेगा फिर वो ईश्वर नहीं रहेगा इसलिए बात को समझने का अच्छा इन्होंने तर्क में एक भी उत्तर दिया नहीं वो रिपीिटेटिव रहा और उसके

02:04:41:15 बाद प्रमाण पे आ गए मैंने ये देखा जी हम बिल्कुल बिल्कुल और जिस मंत्र को लेकर आ रहे थे ना अपराग अपरागच्छु का करके जो मंत्र है जिसमें मतलब मुझे स्मरण नहीं आ रहा कौन सा वो कह रहे थे जिसमें वो कह रहे थे कि भाई ईश्वर नस नाड़ी के बंधन में नहीं आता है। वो 40 का दो है या क्या है? 40व अध्याय का यजुर्वेद का हम ईश्वर आठ है। हां 40 का आठ है। तो ये बात तो आत्मा के विषय में भी जो है वो कही जाती है कि आत्मा जो है वो नस नाड़ी के बंधन में नहीं आता है। है ना? जो आत्म तत्व है मैंने कहा हम ईश्वर को हम ईश्वर को निराकार मानने से कहां मना कर रहे हैं हम ईश्वर के निराकार रूप की व्याख्या होती है तो ये वाली व्याख्या है साकार रूप की व्याख्या होती है तो इंद्र माया भी है रूपम रूपम है अजन्मा होते हुए भी प्रकट होते हैं। फिर प्रकट कहां हो रहे हैं? उनके कार्यों से अनुभूति हो रही है। उनकी अनुमान प्रमाण मिल रहा है। प्रकट कहां हो रहे हैं? अच्छा कार्य करने वाले रूप में भी अगर प्रकट हो रहे तो वह तो एक देसी कार्य कर ही नहीं सकता क्योंकि वह एक देसी है नहीं मेरी तरह है नहीं कि मेरा कहीं पर हाथ है मेरा कहीं पर सिर है मैं एक देसी कार्य

02:05:56:19 कर सकता हूं मगर जो सर्वत्र एक समान है वो कार्य कैसे करेगा एक देसी वो तो अनंत कार्य करेगा ना एक देसी कार्य कर ही नहीं सकता वो तो सर्वव्यापी कार्य करेगा तो ऐसा कार्य करेगा जो कार्य हो हीएगा ही नहीं शुरू ही नहीं होगी क्रिया कभी यहां पे भी वो ईश्वर प्रकट ही तो हो रहा है अगर इसको भी मान लो कि वो जो उसके कार्यों के रूप में प्रकट होता है। वह कार्य में भी उसका अवतार है। ठीक है? तो सभी को चर्चा अच्छी लगे। अच्छा कन्हैया जी बताएं जय श्री राम। हां जय श्री राम आप लोगों को। अच्छा कल परसों की मैंने भविष्यवाणी की थी।

02:06:36:03 [हंसी] परसों की मैंने भविष्यवाणी की थी कुछ। जी। मैंने आपसे कहा था ना? और दूसरी बात मैं ये कहना चाह रहा हूं जिन प्रश्नों को आज उठा रहे हैं ये तो मैं 2011 से उठा रहा हूं 50ों वीडियो मेरी कम से कम YouTube पर पड़ी हुई है इस चीज के मैटर में जैसे मैंने अभी बताया कि सर्वव्यापक जब सर्व शब्द लग जाता है सर्व लगाया ही इसीलिए जाता है कि सब कुछ जैसे कि हम कहते हैं कि ईश्वर सर्वव्यापक है। सर्व्यापक का अर्थ तो उनके जब आर्य समाज जी कहते हैं सर्वशक्तिमान का अर्थ यह नहीं है कि वह सब कुछ कर सकता है बल्कि यह है कि वह अपना कार्य करने के लिए किसी की सहायता नहीं लेता। तो सर्वव्यापक में भी फिर हमको ये डेफिनेशन लेनी पड़ेगी कि ईश्वर सर्व व्यापक का अर्थ यह है कि वह व्यापक होने के लिए किसी की सहायता नहीं देता। इसका मतलब यह नहीं कि वो मेरे अंदर भी है। यह मेरा वीडियो बनाया हुआ है ऑलरेडी। इसमें कई चीजें बनाई हुई है मैंने। हम जैसे सर्व कहते सर्वे भवंत सुखिन हम यह लगाते हैं तो सर्व इसलिए लगाया गया है गया है इसका मतलब यह सभी सुखी हो जाए इसका मतलब ये नहीं है कि सभी सुखी हो जाए तो इसका मतलब मैं भी सुखी हो जाऊं जब सब लगा सर्व लगा दिया तो सभी सुखी हो गए ना अलग से बोलने की जरूरत नहीं है क्या मैं सुखी हो सर्व तो सबके लिए आ गया अब जैसे गीता

02:07:51:13 में श्लोक आया सर्वे युद्ध विशारदा सर्व युद्ध विशारदा इसका मतलब ये है कि भीमसेन में जो है जो है बलशाली है बाकी तो कोई है ही नहीं यानी पांडव कौरव पांडव वही है बाकी जो भगदत्त हुए और श्ली हुई है ये विशार नहीं है इसका मतलब अरे जब सर्व लगा दिया तो सब का अर्थ हो गया कि सब कुछ हो सकता है उसमें और फिर दूसरी बात ये है सबसे बात है कि ये कहते हैं कि सर्वशक्तिमान का अर्थ ये है कि ईश्वर किसी की सहायता नहीं लेता तो मुझे आज तक यह समझ में नहीं आया कि अवतार लेने के लिए वो किसकी सहायता लेता है भाई क्या मेरी सहायता लेने आया था शिव जी आपकी सहायता लेने आया था क्या नहीं नहीं सनातन शंकर जी जब ईश्वर भगवान श्री कृष्ण का अवतार ईश्वर ने लिया था तब वो आपकी सहायता ली थी उन्होंने नहीं बिल्कुल भी नहीं ली थी वो तो मुझे ये समझ में नहीं आ रहा तो वो वो सहायता लेता किसकी है अवतार अवतार लेते समय भाई किसकी सहायता लेगा भाई वो जब वो पूरा ब्रह्मांड बना सकता है तो अवतार लेने में किसी की सहायता क्यों लेगा हां लेकिन जब आर्य समाज की बात आती है अभी वो पॉइंट आया नहीं हमारे पूज्य गुरुदेव भी यही कहते हैं कि आर्य समाज जो है यह कहता है कि जो यह महापुरुष के रूप में राम और कृष्ण है यह मुक्त आत्मा का अवतार है और धर्म की स्थापना के लिए ईश्वर इन मुक्त आत्माओं को पृथ्वी पर भेजता है। तो यह जो मोक्ष इनका है अनित्य

02:09:06:26 मोक्ष उस अनित्य मोक्ष के अनुसार राम और कृष्ण जो है वह मुक्त आत्माओं के अवतार हैं। तो यानी कि ईश्वर ने धर्म की स्थापना के लिए यहां पर एक मुक्त जीव का की सहायता ली। सहारा लिया। हां। तो इनकी अपनी ही बात जो है कंट्राडिक्ट हो जाती है जो यह कहते हैं कि ईश्वर अपने कार्य करने में किसी की सहायता नहीं लेता। अरे और ले लो। इन्होंने तो माना है कि ईश्वर खुद नहीं करता। रश्मि से करवाता है। है ना? सहायता ले रहा है। दूसरी बात ईश्वर को वेद का ज्ञान देना था। दुनिया को चार ऋषियों की सहायता ले ही रहा है। हम महावीर भी सहायता ले रहा है। मुक्त आत्माओं की सहायता ले ही रहा है। वो सब ठीक है। और कोई मेरे ख्याल से अब एक बात ये आती है कि भाई ये बात उठ सकती है कि मैं छोड़ के क्यों आया? तो क्या करूं? उनसे फिर वहां पे वो जो वही तू तू वाला सींस शुरू हो जाए। फिर वही करूं मैं। हां फिर वो नहीं नहीं नहीं बिल्कुल मैं बताऊं मैंने आपने सही किया। रीजन क्या होता है? किसी देखो किसी वृद्ध व्यक्ति से कोई तू तू में करना सही भी नहीं है। वो अम्र में काफी बड़े हैं आपसे। कोई अगर मान लो आपसे मुंह से कुछ गलत निकल जाता है तो वो आप कोई अपराध लगता है। वो इसलिए बढ़िया है कि वहां से निकल आए। कोई दिक्कत वाली बात नहीं है। मेन बात अवतार बोल के निकल गया है। अवतार अवतार

02:10:22:04 बात हो रही है। अवतार आपने छोड़ दिया है। अवतार पहले तर्क आपने छोड़ा। प्रमाण पे आए। प्रमाण पे आए। मैंने प्रमाण दिया। आपने कहा भाई यह प्रमाण नहीं मेरा प्रमाण मान्य यह अर्थ नहीं मेरा अर्थ मान्य होगा। मैंने वहां पर पूछा कि आपके पास वेद मंत्र आए कहां से? अगर आप शायन आपके लिए गलत है। उसमें उनका पास कोई उत्तर नहीं था। अब उसमें वो ये आया सायण ने ये लिखा है वो लिखा है। तो यह हमारा विषय नहीं है कि सायन ने क्या लिखा है? क्या नहीं लिखा है। विषय यह है आपके पास वेद मंत्र कैसे आए? यदि आप शायद शायण को नहीं मानते हैं। आपके पास वेद कैसे आए? उसको बताइए पहले। अब मैं उसको सही सिद्ध करने में जाऊंगा। फिर एक नया चैप्टर खुल जाएगा कि भैया उसमें आप जो अर्थ बता रहे हो वो क्यों माना जाए? हम जो अर्थ निकाल रहे हैं वो क्यों ना माना जाए। अच्छा मैंने बता भी दिया कि अर्थ जो है आप शायन की परंपरा से उसको पढ़ो और फिर बताओ कि कहां संतुष्ट हो वो भी नहीं पढ़ रहे हैं और खामखा विषयंतर करने के लिए ला रहे हैं। जब विषय चल रहा है अवतार तो आप मुझे बताओ ना कि आप शायन के द्वारा आपको जो अश्लील लग रहा है वो क्यों ला रहे हो? और तो और केवल ला ही नहीं रहे। उसको खोल के बोल भी रहे हो। अभी मेरे पास इतना वो नहीं है कि मैं वहां पर नियोग खोल करके बोलूं। मेरे अंदर दिक्कत होती है वो चीजें बोलने में। मगर आप आप उसमें एक्सपर्ट हो भाई। आप बोलोगे मैं वहां पे ये सब करना नहीं चाहता तो मुझे हटना पड़ेगा। अवतार को मैंने सिद्ध किया। मेन बात जो थी तर्क और

02:11:37:08 प्रमाण से अवतार को सिद्ध किया। उनके पास ना तर्क था विरोध में ना प्रमाण था विरोध में। प्रमाण जो मैंने दिया उस पर भी उन्होंने क्या कहा कि वो तो उसके कार्य वहां कार्य नहीं लिखा है वेद में। कार्यों से प्रकट हो रहा है। कार्य नहीं वह तर्क आप छोड़ के आ चुके हो तो आपकी बात क्यों मान ली जाए कि कार्य एज इट इज़ मानो ना वेद का अर्थ हम हम तो तर्क छोड़ के नहीं आए थे अर्थ भी उसको बताना पड़ेगा जिसको संस्कृत नहीं आती है पर उस मूल अर्थ अगर वेद मंत्र को ही पढ़ लो तो वहां पर भी यही ईश्वर जो है बहुत रूपों में प्रकट होता है वहां पर कार्य नहीं आता है तो उस रूप में अर्थ हम उसको बताएंगे जिसको अर्थ नहीं पता है ना लेकिन जब मूल मंत्र में ही समझ में आ जा रही है बात अच्छा आप ये भी देख ले आप ये भी देख लेना कि शुरुआत कौन कर रहे हैं व्यक्तिगत कटाक्ष की कि आप कुतर्क कर रहे हो आपको कुछ पता नहीं है आपने कुछ पढ़ा नहीं है ये सब चालू वही कर रहे हैं मैं नहीं कर रहा हूं मैं तो कृष्ण का चरित्र बिगाड़ दिया हां कृष्ण कृष्ण का चरित्र बिगड़ गया वहां पर लेकिन अदृश्य रूप में ईश्वर सब कुछ देख रहा है वहां पर ईश्वर के ऊपर कोई दोष नहीं आ रहा है लेकिन यहां दोष आ जा रहा है जी जी जी चलिए ठीक है फिर मुझे लगता है सभी ने अपनीप बातें रख ली। शास्त्रवाद जी आपको कुछ कहना है

02:12:56:16 भैया वो दोष को खाली शरीरगत मान रहे थे कि जो शरीर रूप है वो दोष के अधीन हो सकता है। बाकी कोई शरीर वो नहीं हो सकता दोष के अधीन। इसलिए वो ईश्वर को निर्दोष बताने लग रहे हैं। जबकि भाई जब ईश्वर देख रहा है जब दृष्टा है तो फिर वो भी तो उस इस बात का दोषी हो जाएगा ना नियम अनुसार। यह आप लोगों ने आज नया नया सुना होगा मेरे मुख से स्त्रियों को नहाते हुए देख रहा है कि नहीं [हंसी] बिल्कुल टू द पॉइंट बात थी बिल्कुल टू द पॉइंट

02:13:30:07 फिर वो आ जाते हैं कि आंख से नहीं देख रहा है आंख से नहीं देख रहा लेकिन देख रहा है ना [हंसी] देख रहा है ना अब कहे तो क्या कहे उन्होंने माना उन्होंने माना देख रहा है लेकिन दोष नहीं आता बोला ईश्वर के ऊपर साफ बोला उन्होंने हां हां एक चीज है कि जहांजहां फस रहे थे ना थोड़ा सा उग्र हो रहे थे। दिख रहा था। ऐसे ही कृष्ण ऐसे ही कृष्ण जैसे तुम कह रहे हो कि वो देख रहा है वो तो उनके अंदर भी है। तो मैं भी तो वही कह रहा हूं कृष्ण जी यहां पे दिख रहे हैं अवतार में मगर वो उनके अंदर भी है तो दोष नहीं लगेगा। जिन कर्मों से आप उनका दोषी होना मान रहे हो उनसे उन्हें दोष नहीं लगेगा। कुब्जा के साथ ये किया वो किया। कुब्जा के अंदर भी तो वही है। पहली बात तो आपकी जो कुब्जा को जानने वाली वही गलत है। क्या हुआ क्या नहीं हुआ? मगर कुब्जा के अंदर भी वह है। उस क्रिया में भी वह है। चार 24 पढ़िए। करने वाला भी ब्रह्म है। प्राप्त होने वाला भी ब्रह्म है। और जो हवन सामग्री डाली जा रही है यज्ञ में वो भी ब्रह्म है। फल स्वरूप प्राप्त भी ब्रह्म होता है। क्रिया भी ब्रह्म है। क्रिया वो जो क्रिया जिसका आप आरोप लगा रहे हो ना ईश्वर पे वो भी ब्रह्म है। बताइए। फिर कहां से उनको अलग कर रहे हो? केवल वो व्यवहार में आपको एक जगह दिख रहे तो बुरे हो गए। और वही सब कार्य आपका ईश्वर कर रहा है तो बुरा नहीं हुआ। तो वहां पर सारे लॉजिक आप बैठल ले रहे हो।

02:14:45:18 फिर वो बात आ जाती है कि कौन सी चीज अनुकरणीय है कौन सी नहीं है अनुकरणीय है मनुष्य के लिए तो वो फिर वेद मंत्रों को मानना है और पुराण आदि को नहीं मानना है। है ना? हां [गला साफ़ करने की आवाज़] मुझे लगता था मैं इस मंशा से गया था कि वो जो है इसको ना बोल करके इस तरह से इस पर ना जाकर के वो इस पर आएंगे कि भाई जो है ईश्वर का स्वभाव है और स्वभाव विरुद्ध में वो आता जो बल वाला मामला है ना रश्मि और वो वाला वो सारा सारा पैटर्न खुलता पर वो पहले ही जो है थोड़ा सा उग्र होकर के और जो व्यक्तिगत कटाक्ष इत्यादि पे आ गए तो मैंने कहा छोड़

02:15:22:19 चलिए ठीक है। फिर उनसे बात नहीं देखो मुझे मुझे मुझे एक लास्ट बात और कहनी है। मुझे एक लास्ट मुझे लास्ट बात और कहनी है। एक ये कि जैसे बहुत से कहते थे कि भाई कि के अनुकरणीय है या अनुकरणीय है तो वो कहते हैं कृष्ण का चरित्र कोई अनुकरणीय है। अरे कृष्ण भगवान ने तो सृष्टि भी की थी तो फिर आप क्या सृष्टि कर लोगे क्या? हम तो यह मानते हैं ना कि भगवान श्री कृष्ण तो सृष्टि भी करते हैं। वो वो अनंत जीवों को साल अनंत जीवों को प्रलय काल में मार भी देते हैं। क्या तुम मार दोगे क्या किसी को? इनका ईश्वर के संबंध में एक एक जो सिद्धांत है उसकी धज्जियां उड़ उड़ेंग अगर तरीके से बात करते चले जाए। ये कहते हैं कि ईश्वर की उपासना से क्या मिलता है? ये कहते हैं ईश्वर के गुण आते हैं। ईश्वर का गुण है न्यायकारी होना। क्या वास्तविकता में मनुष्य न्यायकारी हो सकता है? नहीं हो सकता। ईश्वर न्यायकारी क्यों है? क्योंकि वह भूत सब कुछ जानता है। इसने पिछले जन्म में क्या किया था? क्या वो जान सकता है मनुष्य? तो न्यायकारी सिद्ध नहीं होगा। जो जो गुण है जो जो गुण है वो सब कटते चले जाएंगे। तात्विक व्याख्या से तो मानना पड़ेगा कि व्यवहार में यानी प्रपंच रूपी संसार में मनुष्य जो है न्यायकारी हो सकता है। तात्विक में होगा कि नहीं होगा नहीं पता।

02:16:37:25 उसके उस व्यवहारिक न्याय से तात्विक न्याय हुआ कि नहीं हुआ नहीं पता। जैसे मैंने किसी को कपड़े दिए पता नहीं वह कपड़े के योग्य था कि नहीं था। फ्री विल से दिए ना भाई उसने कपड़ों का कर्म किया था कि नहीं किया था पिछले जन्म में। है ना? तो मैं न्याय कर रहा हूं कि नहीं कर रहा हूं वो नहीं हो सकता। तो ईश्वर के गुण भी मुझ में नहीं आ सकते जो उपासना से तो आएगा क्या? ईश्वर ले दे के एक बौद्ध मत के अनुसार जो सिस्टम है ना प्रकृति रूपी उसमें ईश्वर नहीं है। यह करोगे तो होगा। यह करोगे तो यह होगा। आपको ईश्वर कुछ देने वाला नहीं है। तो वो इन्होंने क्या है केवल उसको उस सिस्टम को अपना रखा है बौद्ध वाले को और उसमें जो है एक नाम दे दिया। हम ईश्वर को मानते हैं। है बिल्कुल वैसा ही उसी सिस्टम जैसा है ना जी जी बिल्कुल चलिए फिर बिल्कुल भैया बहुत बार आज यहां पे फसे बार-बार भागे हैं ये आज बहुत अच्छा ये चर्चा रहा जिसमें बार-बार जो उनका चेहरा देखने लायक हो रहा था जहां विषय में अटक रहे हैं वहां से अगला पे भाग रहे कभी इस पे कभी उस पे कूद रहे हैं [हंसी] नहीं हमारी तरफ से संतोषजनक चर्चा है उन्होंने शुरुआत की थी तो उसका तो फिर कुछ कर नहीं सकते

02:17:53:18 हां ठीक है सभी को जय श्री राम राम नहीं बहुत सही किया भैया बहुत सही किया खाली बीच में बहुत सही किया बहुत सही जय श्री राम जय श्री राम जय हां हटने की बात कर रहे है ना छोड़ दिया जो ठीक है जय जय श्री राम ठीक है जी जय श्री राम जय श्री राम भैया जय श्री राम [संगीत]

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A: AHVAAN - Call Of Dharma Live 2:18:40 · 21 Jun 2026

अवतार विषय पर सबसे महत्वपूर्ण चर्चा | आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक @vaidicphysics जी के साथ

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