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00:00:00:00 पाकिस्तान और भारत का पार्टीशन हुआ। लगभग 52 इयर्स का आपका एक्सपीरियंस [संगीत] है। जी जी आदि सनातन यह मतलब आदि विरोध कर रहा है। सनातन का जहां द्वेत है, अनेकता है वहां अशांति है। तो ये धर्म जो है ना राजे ये सारे हमारे आए हैं द्वापर युग से। तो क्या असल
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→ Used in: A · Video क्या ब्रह्माकुमारी की सेक्युलर शिक्षा ही सनातन धर्म है? ब्रह्माकुमारी दिल्ली मुख... at 13:51 ↗
00:00:18:19 समय आने पे ऐसा भी हो सकता है कि हमें आईएस आईएस यदि कहे कि [संगीत] ये धर्म है तो हम कहे कि हां ये धर्म है।
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00:00:24:14 जैसे इस्लाम है उसमें भी मतभेद हैं। तो हम फिर ये धर्म क्यों कह रहे हैं? है वो है वो कहे कि तुम्हारा [संगीत] बाप है हमें कैसे मालूम है पिताजी है ही नहीं जैसे ईश्वर को सर्व्यापक सर्वव्यापक विभू से एक शब्द आया था गीता में विभूत [संगीत] जो नेगेटिविटी है वो ईश्वर की सत्ता से बाहर है मतलब उसके दायरे [संगीत] के बाहर है कोई
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→ Used in: A · Video क्या ब्रह्माकुमारी का ईश्वर सर्वशक्तिमान है, तो क्या वह सब कुछ कर सकता है? at 8:57 ↗
00:00:51:08 व्यक्ति ये कहता है कि मेरे पास भी आओ वो आपके ठीक उलट बात करता है और वो भी कहता है [संगीत] मेरे पास आके भगवान कि आप मेरी बातों को मानो। जजमेंट आपकी है। आवाज आती है गलत। आवाज आती है। मगर प्रॉब्लम यह है ना कि जैसे [संगीत] कोई किसी की बहन के प्रति कुदृष्टि हो रही है।
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00:01:08:14 हां। है ना? पढ़ना शुरू कर देती है। तो अध पहले से था ना उसके अंदर? [संगीत] तो सभी को जय श्री राम। आप देख रहे हैं YouTube चैनल आवान कॉल ऑफ धर्म। मैं शिवश नारायण द्विवेदी श्रीमद् जगुरु शंकराचार्य पूरी पीठाधीश्वर जी का एक अल्पज्ञ शिष्य। और आज हम दिल्ली में इस देश की जो राजधानी है वहां पर हैं। और वहां पर भी जो सबसे बड़े ब्रह्माकुमारी के जो सेंटर्स हैं उनमें से एक सेंटर राजौरी गार्डन वहां पर हम इस समय बैठे हुए हैं। यहां की मुख्य संचालिका हैं। दीदी जो यहां पर देखरेख करती है। सबसे पहले दीदी जी आपको मेरा ससम्मान अभिवादन। ओम शांति। जी दीदी थोड़ा सा हमारे दर्शकों को आप अपने बारे में थोड़ा सा बता दें। एक संक्षिप्त विवरण कुछ यहां के अपने बारे में बता ओम शांति। यह हमारा प्रजापिता ब्रह्मा कुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय है जिसकी स्थापना सन 1936 में सिंध हैदराबाद में हुई और सेवाओं के लिए 51 में भारत में आए जब पाकिस्तान और भारत का पार्टीशन हुआ। माउंट आबू राजस्थान
00:02:23:25 में। वहां पर पिता श्री प्रजापिता ब्रह्मा ने लगभग 350 भाई बहनों को बहुत सुंदर ट्रेनिंग दी। राजयोग मेडिटेशन सिखाया और फिर 53 में इस संस्था को और आगे बढ़ाने के लिए सबसे पहले दिल्ली गंगा के ये अपने जमुना के कंठे पर आए और यहां पर ईश्वरीय सेवाएं शुरू की। जी जिसमें यह रजोरी गार्डन जहां पर स्वयं पिता श्री ब्रह्मा बाबा और मातेश्वरी जगदंबा जो सामने आप देख रहे हैं यह दोनों ही यहां इस भूमि पर आए भी और यह भूमि इन्हों को मम्मा बाबा को एक परिवार ने दान में दी डोनेट की जिसका एरिया है 2600 गज तो यहां पर पहले हमारी परम परम आदरणीय रुक्मणी दादी जी, गुलजार दादी जी और सभी दादियां जो ईश्वरीय सेवा करती रही। अच्छा अभी दादियां हमारी अव्यक्त हुई शरीर छोड़ दिया है जी तो लगभग आठ वर्ष हुए हैं रुक्मणी दादी जी को शरीर छोड़े तो अभी
00:03:39:01 हम यहां पर ये सारी कारोबार संभालते हैं जी और यहां विद्यालय में एक्चुअली जनजन को यह परमात्मा का संदेश देने के लिए सेवन डेज कोर्स कराया जाता है। अच्छा से डेज कोर्स के अंदर फर्स्ट डे सेल्फ रियलाइजेशन गॉड रियलाइजेशन और कर्म फिलोसफी क्या है? साथ-साथ राजयोग मेडिटेशन क्या है? तो कैसे घर परिवार में रह के हम सिर्फ एक घंटे के लिए जो भी आने वाले विद्यार्थी आते हैं उनको राजयोग की शिक्षा देते हैं। वह घर परिवार में रहकर ही अपना व्यवसाय संभालते हुए यह राजयोग मेडिटेशन का अभ्यास करते हैं। और राजयोग मेडिटेशन जो से डेज कोर्स है उसको करने के बाद डेली हमारी क्लासेस होती हैं जिसको राजयोग मेडिटेशन और साथ में जो परमपिता परमात्मा ने प्रजापिता ब्रह्मा के द्वारा महावाक्य उच्चारण किए उनको हम मुरली कहते हैं। मुरली जी वो मुरली सुनने के लिए सुबह सभी विद्यार्थी लगभग 100 से भी
00:04:54:02 ऊपर यहां पर आते हैं। अच्छा एक घंटा छ से सात मेडिटेशन करते हैं और सात से आठ वो मुरली सुनते हैं। थर्सडे और संडे कम से कम 150 200 भाई बहन होते हैं क्योंकि संडे हॉलिडे होता है और थर्सडे हम सभी भाई बहनों के लिए सभा में भोग लगाते हैं। परमात्मा को प्रसाद स्वीकार कराते हैं। फिर सबको प्रसाद देते हैं। फिर सब अपनेप घरों में जाते हैं। बाकी सारा दिन नए-नए लोग आते रहते हैं। उनको सब स्पोर्ट्स कराते हैं। जी और शाम को भी हमारी क्लास होती है। छ से सात योग सॉरी पांच से छह योग और छ से सात क्लास चलती है। बहुत सुंदर बहुत सुंदर। दीदी इसमें जैसे आपने बताया कि यहां पे जितनी भी सीनियर जो हमारी दीदी रही हैं वो इस सेंटर को उन्होंने संचालित किया है सीधे जी तो इसमें आपकी नियुक्ति होना ये प्रकट करता है कि कहीं ना कहीं आपका भी एक बहुत अच्छा अनुभव और ज्ञान के विषय में ब्रह्मा कुमारीज की ओर से आपका एक स्थान होगा तभी इतना प्रमुख सेंटर में आपको नियुक्त किया गया जी तो इस संबंध
00:06:09:03 में थोड़ा सा प्रकाश डालें मतलब आपका जो अपना पर्सनल जो एक कि आप कैसे यहां पर आई हैं? इतना मतलब इतना महत्वपूर्ण सेंटर आपको दिया। मैं एक्चुअली वैसे जन्मभूमि मेरी सहारनपुर की है। हम और दिल्ली में हमारे मामा जी रहते थे। हम उन्होंने मुझे विशेष ये ज्ञान देने के लिए अपने पास बुलाया। तो यह 68 की बात है। 68 में मैंने इस ज्ञान को सुना और सुनने के बाद मैंने इसको धारण किया। अच्छा लगा मुझे और उसके पश्चात 74 में क्योंकि यहां जो ब्रह्मा कुमारी बहनें रहती हैं उनकी पहले बकायदे ट्रेनिंग होती है। ट्रेनिंग में उनको लगभग एक डेढ़ महीने की ट्रेनिंग होती है। जी और ट्रेनिंग में सब जो भी यहां की गतिविधियां होती हैं वो सब ट्रेनिंग में बताई जाती हैं। तो मैंने 74 में ट्रेनिंग की। 74 में ट्रेनिंग कर चुकी हैं? हां। मतलब लगभग आज से 50 साल पहले 50 साल का जी तो 74 में ट्रेनिंग करके और पहले मैं यहीं रजोरी
00:07:24:04 गार्डन पहले हमारा डी7 है किराए पर हम लोग रहते थे। अच्छा अच्छा वहां पर दादी रुक्मणी जी के पास में आई और मैं समझो 17 वर्ष की थी। अच्छा और उनके साथ ही मैं लगभग 50 वर्ष रही हूं हम और यहां पर जो हमारा यह राजयोग भवन है यहां पर सभी जो इस ईश्वरीय विश्वविद्यालय की मुख्य आदि रतन जो सिंध हैदराबाद में प्रजापिता ब्रह्मा के साथ रही दादी दादा लेखराज जी के साथ रही हैं तो वो सब यहां क्योंकि एयरपोर्ट पास में है कैंटोमेंट रेलवे स्टेशन भी पास में है तो यहीं पर आते आते थे। आगे उनको जाना होता था। इधर ही आते थे और बहुत बड़ी-बड़ी सेवाएं यहां पर होती थी। मैं कहूंगी कि जब देवगोड़ा जी प्रधानमंत्री रहे हैं वो भी यहां पर एक बार आए हैं और क्योंकि माउंट आबू हमारा बहुत अच्छे महात्माएं सन्यासी देवी घोड़ा ऐसे करके हां देवघोड़ा जी उनके गुरु जी यहां पर थे और वो भी ब्रह्मा कुमारी से संबंध था। हां
00:08:39:06 क्योंकि माउंट आबू में एक बहुत बड़ा सम्मेलन हुआ था जिसमें सब जो भी भारत के महात्माएं थे साधु सन्यासी उन सबको बुलाया गया था। दादी प्रकाश मुनि जी थे मुख्य प्रशासिका यहां के उनको बुलाया गया था। तो फिर वो यहां उनको मिलने के लिए आए थे। हम तो उस टाइम में हमारी दादी जानकी जी जो मुख्य प्रशासिका रह चुकी हैं। दादी गुलजार जी वो भी मुख्य प्रशासिका रह चुकी हैं। तो ये सभी दादियां यहां पर आए और बहुत अच्छे से भव्य उनका स्वागत किया गया। प्रोग्राम हुआ तो इस प्रकार से यहां प्रोग्राम चलते रहते थे और अभी भी चलते ही है लेकिन अभी हमारा गुड़गावा में ओआरसीडी सेंटर बना है जी वो भी लगभग 23 एकड़ में है तो वहां पर अभी प्रोग्राम चलते हैं वहां सब लोग आते हैं वो बड़ा है अब वो जब बड़ा हो गया थोड़ा छोटा पड़ गया तो और प्रोग्राम यहां पर थोड़ा मूल मूल में तो मूल यही है फाउंडेशन मतलब हम ये कह सकते हैं कि अगर जैसे जितने जितनी भी प्रशासिका दीदी जो रही है सी और वो यहां पर उन्होंने देखरेख की है और आज वो नहीं है उनकी जगह पे आप है तो आपके रूप
00:09:54:09 में वो नहीं देख रहे हैं एक तरीके से और ये ये भी हम मतलब इसमें भी कोई वो नहीं है मतलब आपका लगभग 52 इयर्स का आपका एक्सपीरियंस है जी इतना अज्ञान है तो मतलब ब्रह्मा कुमारीज के वरिष्ठ विद्वानों में से एक हैं जिनके साथ आज हम बैठे हुए हैं। इसमें कोई दो राय नहीं है। बहुत सुंदर परिचय दिया। अच्छा थोड़ा सा दीदी इसमें आते हैं स्पिरिचुअल
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00:10:18:04 जो बात करता है ब्रह्मा कुमारी इसमें जैसे ब्रह्मा कुमारी कहता है कि सभी धर्मों की बात कहता है ब्रह्मा कुमारी तो धर्म क्या है ब्रह्मा कुमारी के अनुसार पहले मैं धर्म कहूं तो मैं कौन हूं हम दो शब्द सुबह से लेकर के रात्रि तक संबोधित करते हैं। मैं और मेरा तो मैं कहने वाली सत्ता अलग है और मेरा अलग है। जैसे साड़ी अलग है और मैं अलग हूं। ऐसे ही शरीर को चलाने वाली सत्ता एक अति सूक्ष्म ज्योति बिंदु आत्मा है। एनर्जी है। जी जो इस शरीर को चलाती है। तो आत्मा
00:11:09:03 मेन एक पॉइंट है कि जो हम आज इसको भूले हुए हैं। आप देखेंगे शरीर के अंदर आत्मा नहीं है। आंखें हैं देख नहीं सकती। मुख है बोल नहीं सकता। कान है सुन नहीं सकते तो देखने सुनने बोलने हर कर्म करने वाली वह अति सूक्ष्म ज्योति बिंदु आत्मा ही है तो आत्मा की जो नॉलेज है वह यहां पर मैं जैसा अनुभव करती हूं और जैसे मैं जान पाई हूं 50 55 वर्षों में उस परमपिता परमात्मा ने ही नॉलेज दी है। आज दिन तक हमने शास्त्रों में सुना है थोड़ा आत्मा है। आत्मा यह करती है आत्मा। लेकिन एक्चुअली अभ्यास जो कराया जाता है, उसकी प्रैक्टिस जो कराई जाती है, वह हम यहां पर ना केवल मैं आने वाले विद्यार्थी जो भी यहां के रेगुलर विद्यार्थी हैं या जो भी हमारी दीदियां हैं, दादियां हैं, वरिष्ठ हैं, उन्होंने भी यह अभ्यास किया। इवन साकार प्रजापिता ब्रह्मा ने भी यह अभ्यास किया कि मैं आत्मा हूं और मेरा यह शरीर है। अगर इस शरीर के अंदर आत्मा नहीं तो शरीर जड़ है, डेड बॉडी है और इसको जाकर के जला दिया जाता है। आत्मा अजर है, अमर है, अविनाशी
00:12:24:28 है। जी जो कभी भी मरती नहीं है। जी आत्मा के लिए कहा जाता है पर प्रैक्टिकल है। आत्मा को जल डुबो नहीं सकता। अग्नि जला नहीं सकती। शस्त्राण जी ऐसे है यह आत्मा जो चोला चेंज करती रहती है पर अजर अमर अविनाशी है जी तो यहां पर यही एक मेन नॉलेज दी जाती है और अभ्यास भी साथ-साथ कराया जाता है। जी यहां सिर्फ यह नहीं है कि आए और सुना और चले गए। जी। यह एक पाठशाला भी है, स्कूल है जहां पर हम परमात्मा के एक छोटे बच्चे हैं। पढ़ाई पढ़ते हैं। सीखते हैं, पढ़ाई पढ़ते हैं। और जैसे वहां एक पढ़ाई का लक्ष्य होता है जो बच्चे लोग पढ़ते हैं। जी। इंजीनियर बन जाएंगे, जज बन जाएंगे, वकील बन जाएंगे, डॉक्टर बन जाएंगे। वहां पे अपना आत्मस्वूप का बोध होना लक्ष्य है। बहुत जरूरी है। और उस आत्मा का लक्ष्य है मनुष्य से देवता बनना। सामने चित्र देख रहे हैं। कहते हैं ना नर ऐसी करनी करे नारायण बन जाए। जी नारी ऐसी करनी करे जो लक्ष्मी बन जाए। जी पर वो लक्ष्मी नारायण कैसे बनते हो? वो लक्ष्य हमारा कौन
00:13:40:02 सा है? वो कौन दे सकता है? वो परमपिता परमात्मा ही दे सकता है। दीदी ये तो ठीक है। मतलब इसमें क्या है? जैसे हमने बात कही कि हम आत्मा हैं वास्तविकता में तो ये तो वो स्थिति है जो हमें धर्म का पालन करने से प्राप्त धर्म की बात मैं बताने जा रही थी क्योंकि मैं तो आत्मा का धर्म हां पहले हमें जानना है आत्मा का धर्म जी शांति है क्योंकि मानव जीवन में शांति चाहता है। धर्म शांति है। कर्म शांति है। शांति देश से आत्मा आई है। शांति दाता आत्मा का परमपिता परमात्मा है। और विश्व में शांति स्थापन करना यह हमारा एक संदेश है। लेकिन जब आत्मा मनुष्य से देवता बन जाती है तो वह धर्म है आदि सनातन देवी देवता धर्म। आदि मींस पुराने ते पुराना सनातन मींस आदि मींस शुरू का और सनातन मींस पुराने से पुराना का अर्थ तो है ना शाश्वत नृत्य। शाश्वतना खत्म होता है। लेकिन यह धर्म इसमें आदि लगा देंगे तो वो तो शुरू हो रहा है। हां लेकिन आदि इसलिए हम लगाते हैं क्योंकि शुरुआत जो होती है वो यहां से होती है। यह जो समय चल रहा है नहीं तो सनातन की तो शुरुआत नहीं हुई ना सनातन भी लगा है ना उसमें
00:14:55:03 आदि सनातन यह मतलब आदि विरोध कर रहा है सनातन शुरू का शुरू से आदि का मींस शुरू से तो सनातन तो कभी शुरू नहीं हुआ वो तो नित्य है हां क्योंकि जब अभी देखो रात दिन का खेल है दुख सुख का खेल है राजजीत का खेल है वो तो वो तो नित्य समाप्त नहीं होती है सृष्टि भी तो शुरू फिर शुरू क्यों कह रहे हैं इसको आदि क्यों कह रहे हैं आदि इसीलिए कह रहे हैं क्योंकि वर्तमान समय जो पुरानी पुरानी दुनिया है कलयुग घोर कलयुग है। ऐसी दुनिया जब हो जाती है तब उस परमपिता परमात्मा को सृष्टि पर यह वाला जो राउंड शुरू हुआ है उसकी वजह से शुरुआत है वो सनातन ही है वो शादी की वैसे आवश्यकता नहीं मूल रूप से वो सनातन ही तो कहने में आ जाता है क्योंकि शुरुआत यहां से होती है इस इस राउंड की लेकिन वो तो सदा है ही है हां वो सदा है वही सदा है विरोध कर रहा है ना आदि हां आदि नहीं कह करके आप समझ लीजिए कि सनातन कह लीजिए सनातन देवी देवता धर्म जी जी अच्छा तो दीदी इसमें जैसे ये बात आई ना कि शांति उसका धर्म है आत्मा का आत्मा का तो एक्चुअली है क्या जितनी मेरी थोड़ी सी जानकारी है कि शांति तो हमारा गोल है हम जैसे नारायण बनकर के क्या प्राप्त होगा शांति गोल हैस लक्ष्मी बन के क्या
00:16:10:07 प्राप्त होगा शांति आत्मा अपने आत्म स्वरूप को जान के क्या प्राप्त होगा शांति तो शांति हमारा गोल है जी और क्या कहते हैं जैसे आपने कहा ऐसी करनी करिए जिससे नर नारायण होए हमने कहा तो ये जो करनी है इसमें मैं मतलब जो धर्म शब्द है वो ज्यादा लागू होता है कि धर्म क्या है करना क्या है करना नहीं क्या है तो मतलब धर्म क्या है ब्रह्मा आपके अनुसार ब्रह्मा कुमारीज के अनुसार क्योंकि शांति तो हमारा लक्ष्य है हां लक्ष्य तो का जब पालन करेंगे तो शांति मिलेगी वो तो स्थिति है। जैसे हम देवता बन गए जैसे मान लीजिए देवी देवता को देवत्व को प्राप्त कर लिया देवी देवत्व को प्राप्त कर लिया तो यह तो हमें फिर उसके बाद धर्म की आवश्यकता है ही नहीं है तो पहुंच गए जहां पहुंचना तो ये जो पहुंचने वाली बात है इसका कैसे किया है धर्म क्या है नहीं इसका धर्म तो माना आत्मा का धर्म शांति हुआ और लक्ष्य हुआ देवता धर्म वही माना देखो अभी कोई धर्म पूछेंगे आप अनेकानेक धर्म है इस संसार में अनेकानेक धर्म वही वही मैं ऐसी किस चीज किसी मेंटालिटी को हम धर्म कब और किस आधार पे कह रहे हैं वही पूछ रहा हूं। धर्म माना जहां एकता हो एक भाषा एक कुल एक राज्य सत्ता एक के हाथ
00:17:25:10 में हो। जहां कोई दुख का नाम निशान ना हो, लड़ाई ना हो, झगड़ा ना हो, घर-घर में कोई मतभेद ना हो, भाषा भेद ना हो, जाति भेद ना हो। उसको हम धर्म कहते हैं। यह तो दीदी फिर से वही हो गया ना कि हम लोग जब ऐसा करेंगे तो हमें यह प्राप्त होगा कि लड़ाई नहीं होगी। हां तो यही धर्म हो गया ना हमारा वो फिर गोल हो गया। गोल हुआ हमारा शांति की प्राप्ति। क्योंकि उस युग में शांति होगी। क्यों होगी शांति? क्योंकि एकता होगी। जहां द्वेत है, अनेकता है वहां अशांति है। क्योंकि जब अभी हम समझो दो जने हैं। मतलब जैसे किसी मेंटालिटी को धर्म कहा है। इसलिए कहा है कि वहां पर मतभेद नहीं है। जी और जहां मतभेद है हम उसको धर्म नहीं कहते। अंडरस्टुड? तो फिर हम जैसे कई स्टेटमेंट जैसे आते हैं कि हिंदू मुस्लिम भी धर्म है। तो जैसे इस्लाम है उसमें भी मतभेद हैं। तो हम फिर ये धर्म क्यों कह रहे हैं इसको? एक्चुअली हम इसको नहीं कहते। अगर मैं हूं मैंने मुस्लिम के परिवार में जन्म लिया। मैं मुस्लिम कहलाई। जी। कहीं मैं गुजरातियों के परिवार में पैदा हुई तो गुजराती कहलाई और कहीं मैं
00:18:42:14 और किसी धर्म बुद्धिस्ट के यहां जन्म लिया तो मैं बुद्धिस्ट कहलाई लेकिन वास्तव में ये धर्म है ही नहीं अच्छा हम क्या कहते हैं हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई आपस में सब भाईाई जब हम शरीर में प्रवेश करते हैं धर्म हमने बनाए हैं मनुष्य ने बनाए पर परमात्मा ने कोई धर्म नहीं बनाया उस तरह का हम सभी आत्माएं एक ही पिता की संतान है। क्या कहते हैं? हे परमपिता परमात्मा हम सब हैं तेरी आत्मा। पापों का करो खात्मा हम सब बने धर्मात्मा। धर्म का अर्थ होता है धारणा। जो हमारे जीवन में धारणाएं हैं जैसे परिटी है। रॉयल्टी है। इसी तरह से जो हम व्यवहार हमें धारण करना है। वो वो धर्म है हमारा। जो हम अच्छाइयों को धारण करते हैं, दिव्यता को धारण करते हैं, पावनता को धारण करते हैं, अलौकिकता को धारण करते हैं। जिससे कि शांति प्राप्त जो गोल है फाइनली ऑटोमेटिकली होगी वो जी वो जो गोल है, जो हमारा लक्ष्य है वो हमें ऑटोमेटिकली मिलेगा। तो कहना चाहिए अगर सनातन धर्म है हम उसे सनातन से जोड़ रहे हैं। यानी कि वो धारणाएं जिन्हें हम कभी जिन्हें हम लॉन्ग टाइम तक धारण कर पाए। ऐसी धारणाएं सनातन धर्म कहलाएंगी। वह वह
00:19:57:22 कहलाती है। वह धारणाएं जिन्हें हम हमेशा के लिए धारण नहीं कर सकते। अह जैसे मान लीजिए मनुष्य में मनुष्य रूप में हूं मैं तो मैं जिन धारणाओं को अ धारण नहीं कर सकता हूं। जी मान लीजिए कि मेरे अंदर कुछ गलत चीजें आ रही है। चीजें जो कि ह्यूमैनिटी के विरुद्ध है। जाहिर सी बात है हम बहुत देर तक उसको धारण नहीं कर पाएंगे। जैसे कि व्यभचार, मांसाहार, झूठ बोलना, चोरी करना जितने जो पाप कर्म आदि हैं उनको हम धारण नहीं कर पाएंगे। बिल्कुल। इसलिए वो सब सनातन धर्म कहलाए कि उसको जो है सस्टेन तरीके से हम धारण कर सकते हैं। जी हां। तो फिर जो ऐसी मेंटालिटीज हैं जो कि ऐसी चीजें बोल रही हैं जैसे आपने बौद्ध बुद्ध का नाम लिया हम तो बुद्ध वाले तो कहते हैं कि वो नास्तिक थे। बुद्ध तो ईश्वर को माना ही नहीं उन्होंने। हम और इस्लाम का भी कुछ ऐसी चीजें हैं जिनको हम धारण नहीं कर सकते। जैसे कि जैसे मैंने आपको दीदी बोला तो हमारे यहां पर क्या है भारतीय परंपरा के अनुसार कि दीदी अगर बोल दिया है तो आपको दूसरी दृष्टि से नहीं देखा जा सकता। ये परंपरा है। मगर उस वहां पर कुछ ऐसा भी कहा गया है कि यदि आपने मुंह से कोई रिश्ता बनाया तो उसकी वैल्यू नहीं है। आपकी जब आप माता के गर्भ से जन्म होगा उसी के अनुसार जो रिश्ते हैं वही
00:21:13:08 उन्हीं की वैल्यू है और मुंह से कही हुई बातों के उलट आप व्यवहार कर सकते हो। जी तो जिन धारणाओं को हम लंबे समय तक धारण नहीं कर पा रहे उनको भी हम धर्म क्यों कह रहे हैं? नहीं तो मनुष्य जब धर्म भ्रष्ट कर्म भ्रष्ट हो जाता है खुद को भूल जाता है। परमात्मा को भूल जाता है तो ये सारी धारणाएं भी भूल जाता है क्योंकि कोई हमें सिखाने वाला नहीं है। ये कलयुगी दुनिया में ये सब होता है। नहीं मगर वहां तो मोहम्मद जी ने कहा है ना कि वो हां वो ये धर्म जो है ना राजे ये सारे हमारे आए हैं द्वापर युग से। नहीं लेकिन इसको फिर धर्म कहना उचित है इस्लाम को जो कह रहे हैं क्योंकि धर्म स्थापक तो है ना उन आत्माओं ने परमधाम से आकर के धर्म की स्थापना तो की ना धर्म तो हम उसे कह रहे हैं ना जिसको हम नहीं उनके हिसाब से तो कहेंगे ना हम नहीं कहे मान लो लेकिन वो जो आए हैं धर्म स्थापक उन्होंने अपने-अपने भिन्न भिन्न भिन्न-भिन्न धर्मों की स्थापना तो की नहीं मगर दीदी इससे ऐसा नहीं लगता कि जैसे कोई भी व्यक्ति जो आएगा और मान लीजिए उसका एक गुट बन जाए बहुत सारे लोग उसे मानने वाले हो जाए और वो कोई भी धारणा कहेगा धारणा को फैला रहा होगा उचित अनुचित ना देखते हुए वो अगर कह रहा है धर्म है तो हम उसको धर्म कह दें ऐसा नहीं हो जाएगा इससे नहीं हम नहीं भी कहेंगे लेकिन वो तो
00:22:28:09 कहेंगे ना हमारे ना कहने से तो वो मानेंगे ही नहीं वही मैं कह रहा हूं कि हमारे ये हो गए माने द्वापर से लेकर के कलयुग एंड तक अनेक धर्म आए जो सिर्फ धर्म स्थापक कहलाए तो वो तो धर्म है ही धर्म आत्मा कहलाए परमात्मा वो नहीं बन सकते हैं। परमात्मा जो आते हैं जब इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर ज्योति बिंदु परमात्मा वो एक धर्म की स्थापना करते हैं। अनेक को एकता में ले आते हैं। जो सनातन धर्म हम कह रहे हैं उसकी वो परमा परमात्मा आकर के स्थापना करते हैं। इंसान भिन्न-भिन्न अपना वो आप आए आपने धर्म स्थापन कर दिया। वो आए उन्होंने अपना कर लिया। आपने कहा ना कि बुद्ध जो है वो बौद्ध है। उनका मानना है कि दुनिया में कोई सनातन सत्ता है ही नहीं। हां वो फिर अपनेप उसका मानते हैं ना उनको हम जब वो ईश्वर को स्वीकार ही नहीं कर रहे तो हम उसे धर्म कैसे कह रहे हैं हम नहीं कह रहे हैं वो कह रहे हैं वो कह रहे हैं तो हमारे हिसाब से है या नहीं है वो हम उनको गलत नहीं कह रहे उनकी बात को हां अपमान भी नहीं कर रहे हैं क्योंकि परमात्मा ने हमें सिखाया किसी का भी निरादर अपमान किसी की कमी कमजोरी हमें नहीं देखने जो हैं जैसे हैं वो चल रहे हैं लेकिन हमें अपने जीवन को धारणा युक्त बनाने तो दीदी धर्म
00:23:43:13 अर्थात धारणा इस तरीके से जैसे नेपोलियन बोनापार्ट आए हिटलर आए जिन्हें एंटी क्राइस्ट तक कहा गया बहुत ज्यादा नशंसता की गईंगा बिल्ला आए या फिर आईएसआईएस जैसी जो खंखार आतंकवादी जो संस्थाएं हैं उनके हिसाब से वो जो कर रहे हैं वो भी ठीक है और धर्म की परिभाषा यही है जो करने में ठीक है वही धर्म है तो क्या समय आने पे ऐसा भी हो सकता है कि हमें आईएस आईएस यदि कहे कि ये धर्म है तो हम कहे कि हां ये धर्म है मतलब हमारा हमारा कोई क्राइटेरिया होना चाहिए ना धर्म को धर्म कहने का ये बात है क्योंकि जब ये कलयुग आता है ना तो कलयुग में अनेकता आती है हमारा एक चार है ये भी एक आप ऐसे खार लोग हैं ये सब है वो सब करके गए हैं तो ये कलयुग में माना एक मैं क्या कहूंगी कि होना जरूरी है क्योंकि जब रात हो जाती है ना अज्ञानता की अंधकार छा जाता है संसार में तो ये सब आते हैं अपना अपना कार्य क्योंकि सृष्टि एक नाटक है नाटक में हम सभी एक्टर हैं और नाटक में दुख सुख का हार जीत का रात दिन का नहीं वो आते तो हैं पर वो फिर ये जो खंकार है ये आए इनको हम धर्म कहें क्या कहें तो वो अपना धर्म म अपना ये कार्य तो करते ही हैं ना मतलब एक तरीके से हम बस उस मामले में मौन है साक्षी
00:24:58:26 बस हम साक्षी हो के देखें जैसे ड्रामा को हम देखते हैं 3 घंटे का ड्रामा है उसमें कोई मर्डर भी कर रहा है कोई किसी को सुख भी दे रहा है कोई लड़ाई भी जैसे कि मान लीजिए मर्डर करना अधर्म अधर्म है। मगर कोई कह रहा है कि यह धर्म है। उसको मानने वाले लोग बहुत हैं। तो क्या हम उसे धर्म कहेंगे? नहीं, हम उसको धर्म नहीं कह सकते। वही तो यहां हो रहा है। मुंह बोली बहन से जैसे मुंह बोले स्टोक को हम मानते हैं कि ये धर्म है और उससे मुकरना अधर्म है। मगर हम फिर भी इस्लाम को कह रहे हैं कि वो धर्म है। ये एक्चुअली ये है ना क्योंकि वो आत्माएं आई हैं। वो कर रही हैं। हमको ये धारणा अपने मन में बना करके रखनी है। कि वो क्या है क्या नहीं। हम मन की धारणा तो रखेंगे मगर कह देंगे कि हां ये भी धर्म है। वो भी धर्म है। क्या क्या है? दुनिया कह रही है तो हमको कहने में अच्छा ठीक है। मैं समझती हूं कि क्या कह सकते हैं उसको हम? कोई नहीं कोई नहीं। बहुत अच्छे। अच्छा दीदी इसमें थोड़ा सा आगे चलें कि आजकल के युवाओं के द्वारा एक वो आता है। प्रश्न आता है कि ये ईश्वर है। इसको सिद्ध कैसे किया? मतलब ईश्वर है। इसको कैसे हम स्वीकार करें? ईश्वर नाम की कोई चीज भी है? यह तो 100% ईश्वर क्योंकि देखो जैसे इस संसार में चिड़िया का बच्चा चिड़िया
00:26:14:07 जैसा घोड़े का बच्चा घोड़े जैसा इंसान का बच्चा इंसान जैसा जो मैं आत्मा हूं देखने में नहीं आती कभी भी आत्मा ने गर्भ में प्रवेश किया किसी ने देखा जब आत्मा शरीर से निकल जाती है तब देखा आंख खुली रह गई कहा आंख से निकल गई मुख खुला रह गया मुख से निकल गई कैसी है क्या है यह कोई नहीं देख पाता जी क्योंकि आत्मा अति सूक्ष्म ज्योति बिंदु है तो आत्मा का पिता है परमपिता परमात्मा हम आत्माओं का पिता परमपिता परमात्मा है वो परमपिता परमात्मा की हम संतान है तो आपने क्वेश्चन किया कि ईश्वर है ईश्वर है या नहीं ये सिद्ध सिद्ध कैसे होता है? मतलब कैसे मान ले कि ईश्वर है? हां, हम लोग तो यहां पर यह मानते हैं क्योंकि आत्मा का पिता परमपिता परमात्मा है। देखो जो नहीं मानता और उसको कुछ ऐसे हम बात कर रहे हैं कुछ भी कह रहे हैं वो नहीं उसका आंसर दे पा रहा है या नहीं वो कुछ कर पा रहा है तो क्या कहता है ईश्वर ईश्वर पर छोड़ दो। ऊपर वाला जाने वो मालिक जाने वो मालिक जाने उसके लिए ही कहते हैं ना।
00:27:29:08 तो इसलिए उसके बिना तो ये संसार चल ही नहीं सकता है। परमपिता परमात्मा चलना ही यह प्रमाण देता है कि इस सृष्टि को चलाने वाला कोई है। उसने ही कोई नई दुनिया स्थापना यह वाली दुनिया उसने नहीं बनाई जो हम कहे दुख सुख परमात्मा दे रहा है। कोई मर्डर कर रहा हो परमात्मा कर रहा है। कोई किसी को दुख दे रहा है। परमात्मा दे रहा है। नहीं परमात्मा ने जब यह सृष्टि बनाई थी नई सृष्टि बनाई थी। स्वर्ग बनाया था। पैराडाइज बनाया था। और बनाने वाला भी वही है क्योंकि सृष्टि का डायरेक्टर रचयिता हम कौन हो सकता है? परमात्मा ही हो सकता है ना। इतना सारा विश्व है इतनी सारी प्रकृति है। यानी कि क्योंकि बहुत सुंदर संसार बना इसलिए उसको बनाने वाला कोई एक हो सकता है। कोई होगा ना जिसकी रचना इसकी सुंदर वो कोई लॉजिकली आंसर नहीं है कि ईश्वर है ये कैसे ये लॉजिकली है क्योंकि जब मैं आत्मा हूं तो मेरा बाप भी होगा। क्या कहते हैं? तुम मात पिता हम बालक तेरे तुमरी कृपा ते सुख घनेरे हम ऐसे थोड़ी कहते हैं। हम तो अनुभव करते हैं। मतलब कोई चीज एक्सिस्ट कर रही है तो इसका मतलब उसका कोई पिता होगा। अंडरस्टुड ऐसे तो ये ये एक्चुअली ये काउंटर आता है। वो ये कहते हैं कि अगर ये वाली बात मानेंगे तो फिर परमपिता का भी कोई परमपिता
00:28:44:19 होगा। नहीं यही है। यही यही बात है। मैं यही आना चाह रही जी जी देखो हर आत्मा धर्मात्मा हो सकता है और वो महात्मा हो सकता है लेकिन परमात्मा आप संसार में किसी को भी नहीं कह सकते परमात्मा का कोई पिता नहीं हो सकता है जितने भी देवी देवताएं हुए मतलब ये है कि परमात्मा है ही वो जिसका कोई पिता नहीं है हां जिसके कोई मात पिता नहीं है सबका मात पिता है वो सर्व आत्माओं का पिता फिर बात वही यही आ जाती है ना कि सर्व आत्माओं का पिता किस रूप में है कि आत्माओं को उसने बनाया है। आत्माओं को नहीं बनाया। आत्माओं को आकर के परिवर्तन किया। पावन बनाया। आत्मा तो बनी बनाई है। आत्मा का कहा ना होना चाहिए। चिंता भी नहीं है। एक तरीके से देखा जाए तो मतलब जो हम कह रहे हैं तो है नहीं जैसे हमने कहा कि हम है इससे पता लगता है कि हमें बनाने वाला कोई है। हां तो हम आत्म स्वरूप है। देखो आत्मा को बनाया नहीं जाता। परमात्मा को भी बनाया नहीं जाता। लेकिन आत्मा जब पतित बन जाती है, विकारी बन जाती है, दुखी हो जाती है, अशांत हो जाती है तो परमात्मा आकर के आत्माओं को पतित से पावन बनाता है। यानी
00:29:59:20 हमारे एक्सिस्टेंस से उसका सिद्ध नहीं हो रहा है। नहीं वो नहीं होता है। हम है तो इसलिए वो है। हां हम है तो इसलिए है ऐसा नहीं है। वो आकर के विश्व परिवर्तन करता है। ये तो हमारा क्लेम है दीदी। फिर हम कहे क्या मतलब कि कि ईश्वर है है वो है वो कोई कहे कि तुम्हारा बाप है मैं कैसे मानूं मेरा पिताजी है ये है ना क्योंकि मुझे पैदा किया है लेकिन यहां पैदा वाली बात नहीं आती है क्योंकि परमात्मा पॉइंट ऑफ लाइट ज्योति बिंदु सर्वशक्तिमान ऑलमाइटी अथॉरिटी है जी तो दीदी ये बनाया नहीं जाता ना वो बनता जैसे ये वाली चीज है ना कि है तो मतलब कि मेरा बाप है तुम कहो मेरे पिता है तो है तो उसमें कहेंगे ठीक है तुम्हारे तुम्हारे पिता है। फिर आप ये क्यों कह रहे हो तुम्हारे भी है। सबके हैं। हां नहीं क्योंकि वो आत्माओं का है। बॉडी का वो पिता नहीं है। वो हम बॉडी का नहीं है। बॉडी का मैंने आपको पहले ही बताया चिड़िया का बच्चा चिड़िया जैसा। घोड़े का बच्चा घोड़े जैसा। मनुष्य का बच्चा मनुष्य जैसा है। आपके पिता अलग हैं, उनके अलग हैं। उनके अलग है, मेरे अलग हैं। लेकिन जिसको कहा जाता है सर्व आत्माओं का, सर्व धर्मात्माओं का, सर्व देवी देवताओं का वो पिता है। पॉइंट ऑफ लाइट ज्योति बिल वो सदा है। उसको सदा शिव कहते हैं। सदा शिव है।
00:31:14:24 आजकल बच्चे क्या है? लॉजिक मानते हैं कि हमको भाई हां। लेकिन यहां पर हमारे शिशु विश्वविद्यालय में जब हम ये एक दिन में तो नहीं समझा जाता है। सेवन डेज कोर्स होता है और सेवन डेज कोर्स में भी ये मैं सर्टेन नहीं कह सकती कि वो मान ही ले। कई लोग तो एकद दिन में मान लेते हैं। नहीं मान कैसे मानना मानना उसको रियलाइज करते हैं। मान लो अनुभव कर मानने की बात तो एक अलग है। मगर हमारे पास कुछ होना चाहिए ना थ्योरिकली कि हम उसको कुछ कहे। वो वो मात-पिता कह रहे हैं जी वो तो है ही हमारे मात-पिता। वो परम बाप है, परम टीचर है, परम सतगुरु है जिसकी पालना में हम पल रहे हैं। 55 साल हो गए जीवन कन्या का हम लोग वो जी रहे हैं और उनकी बदौलत हमने तो अनुभव किया है। प्रैक्टिकल अनुभव किया है कि वो हमारा मात-पिता है। केवल मात-पिता ही नहीं वो परम टीचर भी है। वो परम सतगुरु भी है। वो हमारा साजन भी है। हम उसकी आत्मा रूप
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00:32:08:21 में ऐसे नहीं लग रहा दीदी कि जैसे हमने पूछा कि मोटरसाइकिल है ये मैं कैसे मानूं क्योंकि मोटरसाइकिल अभी सामने नहीं है। किसी भी तरह से इंद्रियों का विषय नहीं है। तो फिर हमने कहा कि मोटरसाइकिल के दो हाथ हैं। मतलब एक्सलरेटर हैंडल है। दो पहिए मैं आपकी बात को काट रही हूं। जी वो चार अंधे थे। एक हाथी खड़ा हुआ है। वाली स्टोरी है। वो है ना? रस्सी को जिसने जो पकड़ी वही वही उन्होंने नहीं उसने किसी ने पूछा जैसे आप पूछ रहे हैं कि भगवान कौन है क्या है कैसा है तो किसी ने कहा छाज जैसा है कान पकड़ लिया किसी ने उसकी टांगे पकड़ ली तो कहा वो खंभे जैसा किसी ने सू पकड़ ली तो कहा वो लाठी जैसा है किसी ने पूछ पकड़ ली कहा वो एक डंडे जैसा है किसी ने रस्सी जैसा पूछ रस्सी जैसा है तो ऐसे हर एक की वो मानने की बात है वो ऐसे ऐसे मान लेते हैं। पर परमा मेरा उदाहरण दूसरा था। मैं ये कह रहा
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→ Used in: A · Video क्या ब्रह्माकुमारी का ईश्वर सर्वशक्तिमान है, तो क्या वह सब कुछ कर सकता है? at 0:06 ↗
→ Used in: A · Video क्या ब्रह्माकुमारी की सेक्युलर शिक्षा ही सनातन धर्म है? ब्रह्माकुमारी दिल्ली मुख... at 21:55 ↗
00:33:06:21 था जैसे हम ये कह रहे हैं कि जैसे प्रश्न किया लड़के ने मुझसे हां कि ईश्वर है ये मैं कैसे मान लूं? तो मैं उससे जैसे उसने कहा कि मोटरसाइकिल है मैं कैसे मान लूं? हां तो मैंने उसको कहना चालू किया कि दो पह के हैंडल होता है। सीट होती है। अभी उसको लड़के को कुछ दिख नहीं रहा है। बस मैंने बता मगर ये उसका जो डिस्क्रिप्शन मैं दे रहा हूं कि वो ऐसा होता है। उससे उसका होना सिद्ध नहीं हो रहा है। अभी तो हम उसके और क्लेम्स करते जा रहे हैं कि वो कैसा कैसा है। तो कुछ इसी तरीके से जैसे ये वाली बात है कि ईश्वर है। मैं कैसे मान लो तो वो गुरु है। वो माता-पिता है। वो निराकार है। वो सर्वशक्तिमान है। तो ये वो डिस्क्रिप्शन है। इस संबंध में इस दिशा में नहीं है कि ईश्वर है सिद्ध कैसे होता है? नहीं लेकिन मैं ये तो मानने वाली बात नहीं है। हम तो अनुभव कर रहे हैं प्रैक्टिकल में कि अनुभव कराएंगे। हां हम अनुभव कराएंगे। जब वो आते हैं हम उनको अनुभव कराते हैं और लोगों को अनुभव होता है। लाखों अभी तो मैं कहूंगी करोड़ों हो गए। हम हम ऐसी मनुष्य आत्माएं जो अनुभव करती है और प्रैक्टिकल में वह उस जीवन को जी रही है। परमात्मा एक एनर्जी है एक्चुअली राजे वो
00:34:21:22 देखने वाली चीज नहीं है। अनुभव अनुभव करने की चीज है। ऐसा क्या अनुभव होता है जिससे हम ये मानते हैं कि वो ईश्वर को हम अनुभव कर रहे हैं। क्या भाई प्रत्यक्ष को प्रमाण क्या है? मेरा जीवन देख लीजिए आप। नहीं जैसे पूरे माना हम अपने मित्र संबंधी आदि उन सबको छोड़ के यहां जो हम एक जीवन जी रहे हैं और लाखों मनुष्य आत्माओं की सेवा कर रहे हैं और हमारा जीवन जो चल रहा है जी उसी की बदौलत आज हम यहां इस तरह से जी बैठे हम तो दिन रात अनुभव करते हैं विरक्तता से ये सिद्ध होता है कि आपको आपने ईश्वर का अनुभव किया है डेफिनेटली अनुभव मतलब मैं मैं एक्चुअली ये पूछ रहा था जैसे जैसे रसगुल्ला है तो रसगुल्ला खाने से हमें सुख का अनुभव हुआ मीठामीठा हुआ बिल्कुल हमने ये कहा कि मैंने अनुभव किया रसगुल्ले को है ना तो एक अनुभव था स्वाद के रूप में जी्हा से जो मेरे को आया जी तो ऐसे ही वो अनुभव होता है जिससे हम सिद्ध करते हैं ये जो है ईश्वर का अनुभव है वो क्या अनुभव होता है वही कहते हैं ना जहां ना पहुंचा रवि वहां पहुंचा कभी जहां ना पहुंचा अनुभवी अनुभव जीवन की बहुत बड़ी अथॉरिटी होती है आज के विश्व में ऐसे संसार में रहते हुए जहां
00:35:36:24 पर मानव धर्म भ्रष्ट कर्म भ्रष्ट बन चुका है। एकदम नास्तिक बन चुका है। जी मैं इसीलिए इस चीज को थोड़ा सा एलबोरेट कर रहा हूं। तो ऐसे संसार में हम रह रहे हैं। पनप रही है और मैं तो कह रहा हूं कि धर्म का चोला ओढ़ के भी कई लोग नास्तिकता फैला रहे हैं। एक्चुअली एक्चुअली राइट यू आर राइट बिल्कुल राइट है। आज युवा ही नहीं और भी मनुष्य बड़े नास्तिक बन गए। जब आप भी कह रहे हैं मैं बाबा हूं मैं भगवान हूं। मैं भी कह रही हूं मैं भगवान हूं। वो भी कह रहे हैं भगवान। यह भी कह रही भगवान वो भी सब कहते हैं मैं भगवान। आइए मैं रास्ता बताता हूं। आइए मैं रास्ता बताता हूं। जी तो आजकल की जो युवा पीढ़ी है वो यही समझती है धर्म नाम की कर्म नाम की या परमात्मा नाम की कोई चीज ही हां वो इस पे आ जाती है छोड़ वो नास्तिक हो जाते हैं हम कोई भगवान भगवान नहीं लेकिन यहां पर सिर्फ कहते नहीं है हम अपने को भगवान नहीं कह रहे हम अपने को वैसे भी नहीं कह रहे हम धर्म स्थापक के परमात्मा ही आकर के एक साधारण तन में प्रवेश करके उनके माध्यम से ही सारा ज्ञान हमें देते हैं। वो स्वयं बताते हैं कि मैं परमपिता परमात्मा तुम आत्माओं का पिता हूं। तो जो जैसे आपने कहा कि अनुभव होता है मैं और थोड़ा सा जैसे
00:36:51:25 कि मान लीजिए अगर ये सिद्धांत हो लॉ कि अगर जब यदि ईश्वर होगा तो वो घंटी बजेगी है ना? अब जब मैंने आपने अनुभव कराया घंटी बज गई। इससे सिद्ध हो गया कि ईश्वर है। तो फिर इसी तरीके से क्या ऐसा होता है जिसकी वजह से कोई यह कहता है कि हां ईश्वर है मैं मान गया। लाखों युवाएं भी यहां पर कितने मैं समझती हूं 50000 से मतलब कोई एक स्पेसिफिक क्रिया नहीं है। हां वो हर एक का अपना अपना माना क्योंकि परमात्मा दिव्य दृष्टि विधाता है। दिव्य बुद्धि विधाता है। तो हर कोई इस परमात्मा को पहचानेगा भी नहीं। गीता में लिखा है कोटों में को में भी को मुझे पहचानते हैं। मूढ़ मती लोग तुझ समझ मुझे गाली देते हैं। वरना भगवान को नहीं हम जो धर्म के नाम पर ये कार्य करते हैं उनको फिर गाली देते हैं। हर कोई उसको पहचान ले और फिर अनुभव करें यह भी जरूरी नहीं। मगर हमारे पास थ्योरिकली तो काट होनी चाहिए ना एथिज्म में भी। नहीं तो काट हां नास्तिकता जैसे हम ज्ञान दे रहे हैं संसार में राज हम देख रहे हैं कितनी नास्तिकता है माना आज मनुष्य ये तो ऐसे हो गया ना मानना पहनना और नहीं नहीं यहां तो अनुभव किया जाता है ना जो आते हैं उनको
00:38:06:28 जब हम कोर्स कराते हैं मेडिटेशन मेडिटेशन सीखते हैं वो और सेल्फ रियलाइजेशन करते हैं यहां मेन बात है सेल्फ रियलाइजेशन करना और जब वो यह करते हैं आत्मा को पहचान जाते हैं अनुभव करते हैं परमात्मा अनुभूति ना हो यह नहीं हो सकता है। मतलब अनुभव है थ्योरी नहीं मिल पा थ्योरी नहीं अनुभव अच्छा तो दीदी थोड़ा सा आगे चलते हैं जो ईश्वर के बारे में हम बात कर रहे थे तो आपने कहा ईश्वर सर्वशक्तिमान है ऑलमाइटी है सर्वज्ञ है पॉइंट ऑफ लाइट एक एनर्जी है परम एनर्जी तो वो सनातन सत्ता है या मतलब वो भी मनुष्य तो नहीं तो सनातन सत्ता से अलग वो सत्यम शिवम सुंदरम है सनातन गॉड इज ट्रुथ ट्रुथ ही गॉड है जी तो वो वो भी नित्य है ना सनातन हां नित्य है डेफिनेटली नित्य है परमात्मा सदा है सदा है आत्मा जैसे सदा परमात्मा भी सदा है वो कभी मरता ही नहीं है तो दीदी जैसे क्या ब्रह्मा कुमारी ईश्वर को सर्वव्यापक भी कहता है सर्वव्यापक विभ से एक शब्द आया ना गीता में विभु नहीं विभु नहीं मानता आपने कहा अभी सर्वशक्तिमान सर्वज्ञ ऑलमाइटी अथॉरिटी सब परमात्मा त्मा हो जाए उसे आने
00:39:22:00 की आवश्यकता ही नहीं सब परमात्मा नहीं हो जाए सर्वव्या सबके अंदर भी हो जाए समझो आपके अंदर मेरे मेरे अंदर इनके सबके अंदर परमात्मा है हम तो क्या कहा जाता है ब्रदरहुड ब्रदरहुड कहा जाता है ना हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई आपस में सब भाई भाईाई नहीं तो फादरहुड होना चाहिए सब भगवान भगवान भगवान हम हम सर्वज्ञ मानते हैं सर्वशक्ति मानते नहीं है ही हम सर्व व्यापक नहीं व्यापक नहीं तो इसमें दीदी जैसे हम कहते हैं कि ईश्वर सनातन है तो सनातन का अर्थ जो निकल के आता है नित्य स्थाई स्थाई ना जो किसी भी देश काल परिस्थिति से बाधित ना हो है ना जैसे सनातन के बारे में हम कहते हैं कि जो मतलब सनातन सत्य वो है जिसके लिए ये उसके बारे में अगर कोई लाइन कही जाए तो वो बदलेगी नहीं वही सनातन सत्य है। किसी भी सिचुएशन में बदल नहीं सकती थी। जैसे कि मैंने कहा कि मैं अह अब वर्तमान का समय चल रहा है। शिवश नारायण द्विवेदी 2026 में जीवित थे। जीवित हैं। एक्सिस्ट करते हैं। मगर यही जो सत्य है 2075 में बदल जाएगा। अब एक्सिस्ट नहीं करते। शिवश नारायण द्विवेदी
00:40:37:06 नहीं करते। आत्मिक रूप से करते पर शिवांश नारायण द्विवेदी जो उपाधि प्राप्त है शरीर के माध्यम से वो नहीं है। एक्सिस्ट नहीं करती। यानी कि ये सनातन सत्य नहीं है। शिवश नारायण द्विवेदी है ना क्योंकि यह असत्य है। यह सत्य है। हां। तो इसी तरीके से दूसरी एक बिंदु आती है कि शिवश नारायण द्विवेदी चेयर पे बैठे हैं। चेयर पे बैठा है शिवश नारायण द्विवेदी मगर सोफे पे नहीं बैठा है। इससे भी ये सिद्ध हो रहा है कि मैं सनातन सत्य नहीं हूं। क्योंकि मैं यहां हूं वहां नहीं हूं। मेरी जो ये मेरा जो सत्य है वो बदल रहा है। तो जब हम ईश्वर को सनातन कह रहे हैं। ईश्वर सनातन है। तो वो तो था और है और रहेगा। तो इसमें तो वो सनातन है। मगर उसके लिए हम कहें कि ईश्वर यहां है और वहां नहीं है। तो ये सत्य बदल गया उसका। तो ये सनातन का टकराव हो रहा है ना। एक्चुअली ऐसा नहीं है ईश्वर यहां है वह तो एक माना इतनी परमात्मा की और मेरी दूरी है सेकंड में मैं चाहूं जो वो परमधाम निवासी है ब्रह्मांड का निवासी है शांति हां सेकंड में देखो आज पहुंचेगा तो दीदी मगर हमने कहा वो यहां नहीं है इसका मतलब कहीं पे है कहीं पे नहीं है तो उसका जो सत्य है वो बदल रहा है नहीं वो अभी जैसे देखो आप हैं अभी आप कहां
00:41:53:08 म आप कहीं जा रहे हैं आ रहे हैं यहां नहीं है कहीं कहीं जाएंगे ना सब जगह तो नहीं जाएंगे ना तो मैं जहां उसकी हां क्योंकि बॉडी है बॉडी सनातन सत्य नहीं हूं जी जी मैं आत्मा सनातन सत्य ईश्वर सनातन सत्य है सनातन सत्य माने सदा ही है मतलब उसको से बाधित नहीं है मगर देश से बाधित है हां कहीं आप उसको बुलाओ उसको आप याद करो सेकंड में हाजिर हो जाएगा हां क्योंकि उसके लिए कोई बॉडी नहीं है। तो दीदी जो ये वाला अर्थ है ना सनातन निज स्थाई हर तरह से स्थाई है। मतलब तीन तरह की बाधाएं होती है। एक होती है कालकृत, एक होती है देशत, एक होती है परिस्थिति। परिस्थिति बाधा कैसी हो गई कि भाई परिस्थिति बाधा ऐसी कि ये मेरी बहन है। मैं विवाह नहीं कर सकता। ये परिस्थिति बाधा है। है ना? तो इसी तरीके से जो ईश्वर है उसके लिए हमने जो भी कुछ कहा वो ना तो देश से बदलना चाहिए ना ही काल से ना ही परिस्थिति से। मगर देश से बदल रहा है। हमने कहा ईश्वर ईश्वर अपनी कही उनका लोक है। मान लीजिए हां लेकिन उसका जो लोक है इस दुनिया से पार चांद सितारों से पार सूक्ष्म लोक से भी पार अखंड ज्योति तत्व तो वो है वहां वो वहां वो
00:43:08:14 यहां नहीं तो ये उसका वहां होना यहां ना होना ये देश कृत बाधा से बाधित हो रहा है तो वो मतलब वो सनातन कैसे कहा जाए फिर उसे क्योंकि सनातन सनातन काल नहीं आता सनातन आप कह रहे हैं मैं नहीं कह रही हूं अच्छा वो सनातन ईश्वर नहीं है हां परमात्मा तो सदा शिव सत्यम शिवम सुंदरम गॉड इस ट्रुथ ट्रुथ ही गॉड है तो सनातन सत्य तो कहते हैं उसे परमात्मा को सनातन सत्य नहीं है शाश्वत सत्य शाश्वत सत्य तो वही तो हुआ जो देश माना आप वो सनातन फिर आप शब्द ले लेते हैं इस सृष्टि पर मुझे ऐसा सृष्टि में नहीं रहता है मुझे ऐसा लगता है कि ब्रह्मा कुमारी के अनुसार जो ईश्वर है वो कालकृत बाधा से तो बाधित नहीं है कि है और रहेगा वो नहीं अनादि अनंत है अगर देश कृत बाधा से बाधित है वो किसी बंधन बनता ही नहीं है। कोई बाधा उसके अंदर है ही नहीं। वो न्यूट्रल और न्यारा और प्यारा है। सारे विश्व से न्यारा है। सारे विश्व का वो प्यारा है। नहीं इस इस बाधा से बाधित है ना कि वो यहां है तो वहां नहीं है। नहीं ये तो हम हम तो जहां उसको बुलाए वो आ जाएगा। आज मैं अगर कहीं तो अलग बात है हां तो वो वही है ना ऊपर परमधाम जिसको ज्योति मह तत्व कहते हैं वो ज्योति
00:44:23:18 जो सभी ज्योति आत्माएं वो भी वहीं से आती है सृष्टि रूपी रंगमंच पर पाठ प्ले करने के लिए और परमात्मा एक ही बार इस सृष्टि पे आता है इस सृष्टि का परिवर्तन करने के लिए जो कलयुगी दुनिया है उसको सतयुगी पैराडाइज बहिस्त बनाने के लिए आता है उसके लिए वो ज्ञान योग की शिक्षा देता है राजयोग मेडिटेशन सिखलाता उसको सीख के जो हमने कहा कि नर नारायण नारी लक्ष्मी बन जाती है। मतलब वो आता जाता है मगर वो सनातन रूप से क्योंकि जैसे अभी मैं आत्मा हूं गर्भ में प्रवेश किया मैंने और फिर मैं बच्चा बच्ची बन गई तो मैं 15 साल 20 साल 100 साल तक भी मैं रहूंगा। इस शरीर में बंधन है। परमात्मा को इस तरह का बंधन नहीं है। वह सेकंड में आ जा सकता है क्योंकि उसका रीइकार्नेशन होता है। उसका अवतरण होता है। मगर दीदी इसमें तो ये है ना कि परिस्थिति कृत बाधा से हम बाधित होते हैं। वो नहीं जैसे वो नहीं होता। जैसे हमने कहा कि हम इस शरीर में आ गए। तो हम क्योंकि बाधित हैं इसलिए बंधन फील करेंगे। जी मगर जैसे ईश्वर है ईश्वर के लिए मान लीजिए वीडियो गेम हो हां वीडियो [गला साफ़ करने की आवाज़] गेम हम खेल रहे हैं और हम उसके अंदर जो कारें आ रही हैं हमको धक्का लग रहा है तो झटका भी आ रहा है मगर फिर भी हम ये जानते हैं ये वीडियो गेम मैंने चालू किया मैं इसको बंद कर सकता हूं तो परमात्मा इस तरीके से उसमें रहते हुए भी मुक्त भी
00:45:38:24 रहता है है ना डिटच अच्छा एक चीज इसमें ये आ रही है कि जैसे हमने कहा ऑलमाइट ऑलमाइटी है ना ऑलमाइटी अथॉरिटी तो क्या मतलब ऑलमाइटी का मतलब अनंत अनंत सामर्थ्यवान सर्वशक्तिमान अनंत ऑलमाइटी मन हां या सर्वशक्तिमान पावरफुल अनंत सामर्थवान हां सामर्थवान समर्थ है सदा अनंत शक्ति है उसकी अनंत उसका कोई मना ऐसे माफ लिमिटेड नहीं अनलिमिटेड है मतलब कुछ भी उसके उसमें आ सकता है वो कुछ भी कर सकता है कुछ भी कर सकता है अच्छा पॉजिटिव अच्छा नेगेटिव कुछ नहीं करेगा पॉजिटिव वो उसके लिए एवरीथिंग पॉसिबल है हमारे लिए भी एवरीथिंग पॉसिबल है पॉजिटिव मगर नेगेटिव तो यह दुनिया है। नेगेटिविटी तो खत्म करते हैं। मतलब यह जो नेगेटिविटी है वह ईश्वर की सत्ता से बाहर है। मतलब उसके दायरे के बाहर है। ये बिल्कुल इसका पूरा कोर्स है अगर आप करेंगे क्योंकि ये एक सेकंड में मैं नहीं समझा पाऊंगा। हां। क्योंकि जो परमात्मा प्योर सत्ताएं हैं वो इस दुनिया की जो नेगेटिविटी है नेगेटिविटी क्या है? काम है, क्रोध है, लोभ है, मोह है, अहकार है, ईर्ष्या है, द्वेष है, बदले की भावना है,
00:46:54:00 नफरत है। यह नेगेटिविटी है। समझो एक पिता है, एक माता है, बच्चा गुस्सा करता है, किसी को गलत दृष्टि से देखता है, कुछ करता है तो वो भी उसको समझाएगा। बेटे ये ठीक नहीं है। ऐसा नहीं करना चाहिए आपको। तो उसको भी अच्छा नहीं लगेगा क्योंकि उसको पता है यह नेगेटिविटी है। यह गलत है। परमात्मा तो सर्वोच्च है। ऑलमाइटी अथरिटी पोरिटी उसके अंदर सदा ही है तो वह परमात्मा यह काम क्रोध लोभ मोह अहंकार ईर्ष्या द्वेष नफ तो नहीं आता ये नहीं आ सकता तो मुक्त है ना सदा के लिए सदा के लिए मगर बच्चों को भी मुक्त बनाकर चाहता है हम कह रहे हैं कि जैसे मान लीजिए वो सर्वशक्तिमान है बुरे कार्य नहीं करता नहीं करता है क्योंकि वास्तविकता में तो उसकी नजरों में तो ये नाटक मात्र है कुछ भी बुरा कार्य है ही नहीं कुछ है ही नहीं नाटक मात्र माया मात्र है प्रपंच तो जैसे जैसे उसने जैसे हमने कहा सर्वशक्तिमान तो फिर हम ये क्यों कहते हैं कि वो अवतार नहीं ले सकता कि योग नहीं लेता है अवतार मां के गर्भ से जन्म नहीं लेता नहीं पर काया प्रवेश करता है हां वो माना स्वयं नहीं है स्वयं से प्रकट नहीं नहीं अगर मैंने आपको एग्जांपल दिया ना कि जैसे आप है मैं हूं हम आ गए एक बार गर्भ में फिर हम बच्चा बन गए अब हम अगर आत्मा निकल जाएगी तो कहेंगे मर
00:48:09:06 गया लेकिन परमात्मा का जो अवतरण ऋण कार्नेशन होता है वह आता और जाता है आता और जाता बंधन में नहीं बंधा हुआ है। बंधन में कहां आया? नहीं आया। नहीं बंधन में आ सकता। कर्म से भी प्रकट हुआ तो बंधन में कहां आया? मेरा शरीर का बंधन ही हो गया ना। मैं किसी की मां हूं, किसी की बहन हूं, किसी की पत्नी हूं। किसी की क्या किसी की क्या तो मैं इस शरीर को अगर छोड़ दूं मैं आत्मा हूं। मैं बोल रही हूं आत्मा। नहीं जैसे ईश्वर ने केवल एक लीला की कि वो प्रकट हुए हम और भाई बहन बने सबके जो भी बनना है हम और उसके बाद वो अप्रकट हो गए। हम तो उन्होंने तो वास्तविकता में लीला की है। मगर देखने में यह भी लग रहा है कि जो है देह त्याग कर दिया। हां लेकिन लीला में हम सभी इनवॉल्व है ना। लीला में आप भी मैं भी ये भी हम सब लीला में है ना तो हम उसने जो लीला की या जो रचना रची तो वो रचना रची कि हम 100 साल 150 साल 50 साल 60 साल इस शरीर को छोड़ नहीं सकते। छोड़ना माना क्या होगा? जैसे शास्त्रों में कहा गया ना दीदी नृत्य अवतार नहीं भगवान का अभी यह भी बहुत गहरी पॉइंट है समझने की जी एक्चुअली उसका अवतार इस तरह के सब होते ही नहीं एक ही अवतार होता है हां वो तो
00:49:24:09 आप आपने बताया परमेश्वर वो वाला वो तो एक बात है मगर एक पूछने वाली जब वो ऑलमाइटी है वो सब कुछ कर सकता है तो फिर वो अवतार धारण करने में दिक्कत क्या है और जो हम अवतार भी उसको इसलिए लेना पड़ता है अगर यह कहें कि जैसे वो बंधनों से बंध जाता तो जैसे फॉर एग्जांपल एक वीडियो गेम खेलने वाले के लिए वीडियो गेम में होते हुए भी वीडियो गेम से वो मुक्त रहता है। मुक्त रहता है ना? तो तो ईश्वर तो क्योंकि उसने वीडियो गेम बनाया तो वो कभी भी वीडियो गेम से फंसता ही नहीं है। वो नहीं फंसेगा। मतलब फिर भले ही वो अवतार धारण करे या ना करे उससे क्या फर्क पड़ता है? वो तो कभी बंधन में आए ही। नहीं अगर वीडियो गेम में कोई वो फंस गया कुछ हो गया तो उसको निकालना तो पड़ेगा ना। तो उसको निकालने के लिए तो कोई दूसरा अगर मैं नहीं इस वीडियो गेम को ठीक कर पा रही हूं। कुछ ऐसा गड़बड़ हो गया जिसको आता है वह तो फिर ठीक करेगा ना तो परमात्मा तो वो है ना जो जिसने उसको बनाना ठीक करना चालू करना बंद करना सब कुछ मालूम है नहीं वो वो ठीक है आपकी बात लेकिन परमात्मा ने जो सी सृष्टि रची वो जो परमात्मा आता है वो हम मनुष्य आत्माओं के सदस्य संसार में नहीं आता और दीदी जो ये वाला वाक्य है गीता का यदा यदा धर्मसानी सजाम में हम मैं अपना सृजन करता हूं हां तो वो सजन करता है नहीं सृष्टि का नहीं सजाम में
00:50:39:10 हम मैं सजन करता हूं अपना सृजन मींस स्वयं के रूप का सृजन करता हूं हां तो आता है ना लेकिन परकाया परकाया देखो आपने परकाया नहीं कहा हम तो ये कहते हैं नहीं गीता में लिखा है परकाया प्रवेश करता हूं ये जो श्लोक है परकाया प्रवेश भी ईश्वर कर सकता है इसमें कोई दिक्कत नहीं है बहुत बार बहुत सारी चीजें जो शिव अवतार शंकराचार्य जी हैं उनके ही बारे में आता है कि उन्होंने एक राजा के शरीर में परकाया प्रवेश करके और वो जो उनसे एक शास्त्रार्थ के बीच में एक कुछ प्रश्न पूछ लिया गया था। जी तो उन्होंने वो वो जो अनुभव था उनको अनुभव नहीं था तो उन्होंने वो अनुभव लिया था राजा के शरीर में प्रवेश करने का तो ये तो बहुत छोटी सी बात हो गई मगर उन्होंने वहां पर कहा परकाया प्रवेश से कोई दिक्कत नहीं है मगर जब वो ये कह रहे हैं ना यदा यदा धर्मस ग्लन भवती भारत अभस तदात्म शजाम में हम मैं अपना सृजन करता हूं अपने रूप का सृजन करता हूं ना वो फिर प्रलोप हो जाते हैं मींस कि वो जब आते हैं सृष्टि रूपी रंगमंच पर सृष्टि की स्थापना करते हैं नई सृष्टि की फिर अपने आप को परमधाम में जैसे आते हैं फिर वो चले जाते हैं। नहीं नहीं जो उन्होंने कहा ना मैं अपना सृजन करता हूं। ये सृजन कर रहे हैं ना अपना स्वयं के रूप का सृजन कर रहे हैं। ऐसा है गीता जो है ना बहुत सारी गीताएं हैं।
00:51:55:03 ये श्लोक तो सब में है ना? हां। तमिल गीता, टैगोर गीता, गांधी गीता। अब हम उस गीता की बात को सत्य कैसे मान ले? तो गीता को हम सत्य नहीं मान रहे। नहीं माना। कोई उसमें श्लोक किसी ने अपने भी मिक्स किए होंगे या कुछ ऐसा किया होगा तो उस बात को हम कैसे सत्य मान ले तो फिर गीता है ये हमें कैसे पता नहीं ये देखो कोई भी घटना घटती है पहले घटना घटित होती है फिर वो पेपर में आता है या टीवी पर आता है बाद में जो गीता है महाभारत का अंश है हां है ना अच्छा महाभारत से प्रथम बार शंकराचार्य जी ने गीता निकाली थी आदि शंकराचार्य जी जिनको शिव अवतार भी माना गया तो उन्होंने क्या किया था कि महाभारत का वह पार्ट है गीता उसको निकाल के उन्होंने जो है उसका ट्रांसलेशन किया था कमेंट्री की थी फर्स्ट टाइम गीता ऐसे बनी थी वरना पहले महाभारत ही था महाभारत से गीता इस तरह से अलग की थी तो आदि शंकराचार्य जी ने जो गीता के श्लोक स्वीकार किए महाभारत में भी वो श्लोक मिलते हैं तो अगर हम ये कह रहे हैं कि जैसे उसमें मिलावट हो गई तो फिर अगर जिससे हम गीता को ले रहे हैं हम कह रहे हैं कि मिलावट हो गई तो फिर हम ये कैसे कह रहे हैं कि कृष्ण थे एक्सिस्ट करते थे देखो आप शंकराचार्य जी कह रहे हम शिवाचार्य जी कह रहे हैं जी हमें शिवाचार्य जी ने यह बताया
00:53:10:14 कि मेरा रीइकारनेशन होता है सिर्फ बच्चों को परिवर्तन करने के लिए प्रवेश हां और इस सृष्टि का परिवर्तन करने के लिए तो मेरा ऐसा सर्जन ये नहीं वो तो समझो शंकराचार्य जी तो मनुष्य हुए है ना नहीं वो शास्त्रों में उनको शास्त्रों में हां वो तो शंकर भगवान अब यहां ये भी पॉइंट एकदम अलग हो जाती है शिव और शंकर दोनों में महान अंतर है ये भी एक पूरा लेसन शिव पुराण में यही कहा गया है कि वो मैं ही शिव हूं। हां आपके पुराण में ये कहा गया पर स्वयं शिव परमात्मा ने हमें जो बताया जो हमने सीखा जो हमने समझा शिव और शंकर दोनों में अंतर है तो एक तरीके से तो ये भी पूरा एक हमारा मना वो लेसन है जो हम इसको समझते हैं और लोगों को समझाते हैं तो दीदी ये जो मतलब एक तरीके से जो एक तरीके से पूरी तरीके से शास्त्रों पर डिपेंड नहीं है जो जितनी चीजें सभी शास्त्रों का सार आकर के मैं बतलाता हूं हम साधु संत महात्माओं का भी आकर के मैं उद्धार करता हूं। मतलब सीधे भगवान आकर बता रहे हैं। जी तो इसलिए हम उसको प्रायोरिटी देते हैं और गीता और बाकी शास्त्र उतने मान है जितने कि लोग मानते हैं उनका भी सार परमात्मा आकर के बतलाते हैं। जैसे कोई बात है आपको कोई बताई
00:54:25:18 जा रही है। मुझे बताइए। एक चीज आती है कि जैसे मान लीजिए हमारे पास तो भगवान स्वयं आ रहे हैं। तो हमने उनकी बात मान ली। जी मगर जैसे कोई व्यक्ति ये कहता है कि मेरे पास भी आ रहे हैं वो आपके ठीक उलट बात करता है और वो भी कहता है मेरे पास आके भगवान ने कहा है तो फिर ये कैसे पता किसकी बात सही है किसकी बात गलत है एक चीज एक बिल्कुल राइट तो ये बात हो गई दूसरी बात एक ये आती है कि परमात्मा ने सब कुछ बनाया है हम खैर आपने ये कहा कि नई सृष्टि बनाई नई सृष्टि बनाई है मगर आपने कहा कि वो सर्वशक्तिमान है जी अ वो सिर्फ अच्छे कार्य करता है जी मगर मगर जब हम देखते हैं वो सर्वशक्तिमान है और अच्छे कार्य करता है तो सृष्टि जब बिगड़ रही है तो परमात्मा उसको रोक सकता है बिगड़ने से मगर किनहीं कारणों से नहीं रोक रहा है वो होने दे रहा है है ना हम तो इसमें क्या आ गया कि ये जो बिगड़ा परमात्मा की सत्ता में ही बिगड़ा हम परमात्मा अगर वो सर्वशक्तिमान है तो रोक सकता है और रोकना तो अच्छा कार्य है रोकना तो पॉजिटिव है ना तो वो रोक सकता है मगर उसने नहीं रोका तो परमात्मा की सत्ता में बिगड़ा हम तो इसका मतलब कि अगर कोई आकर के हमसे गलत बात कहेगा परमात्मा के नाम से तो वह भी परमात्मा की सत्ता में ही आ गया ना। यह
00:55:40:19 नहीं है राज हम क्योंकि परमात्मा जो यह सृष्टि है क्योंकि यह नाटक है दुख और सुख हार और जीत का अभी इस दुनिया में जो कलयुगी दुनिया चल रही है इसमें सब कुछ नेगेटिव नेगेटिव माना गलत गलत गलत हो रहा है लेकिन वह गुप्त वेश में अपना कार्य कर रहा है। संदेशवाहक हैं हम सभी को संदेश दे रहे हैं कि सृष्टि पुरानी हो चुकी है। अब इस सृष्टि को नया बनाने के लिए परमपिता परमात्मा आ चुका है। तो जो आप यह बात कह रहे थे कैसे माने कि यहां परमात्मा है देखो हम उनको आप आप भी हो गए मैं भी हो गई मैं आपको सुना रही हूं बता रही हूं अपने अनुभव के आधार पर जो मैंने यह ज्ञान सुना है और सुनकर के अपने जीवन में धारण करना किया है वो मैं आपको बता रही हूं कंपलसरी नहीं है कि आप मेरी बातों को मानो जजमेंट आपकी है कि वो भी आपने सुना ये भी आपको आप सुन रहे हैं तो उसकी जजमेंट आपने करनी है जी हम लोगों को यही बताते हैं। यह भी आप सुन रहे हैं। वह भी हम आपको यह नहीं कहते कि आपको यह बात माननी ही है। तो इसलिए आपकी अपनी जजमेंट है। हम कहें शास्त्र गलत है, महात्माएं गलत है, वो गलत है। नेवर हम ये नहीं कहते हैं। आपने अपनी बात बता दी
00:56:55:20 और जितना उसको सुनना है और सुनकर के उसको जजमेंट उसने करनी है। मतलब कहने का ये है कि अगर कोई आकर के ये कहता है मुझे भी परमात्मा ने कुछ बताया तो हम ठीक है भैया। तुम्हें अगर परमात्मा बता रहे हैं तो ठीक है। फिर चाहिए। वैसे देखो मुझे एक बात याद आती है कि रावण था बहुत उसने वेद शास्त्र क्या है ना कि जब हम अ कहीं आज के युवाओं के बीच में खड़े हैं तो ये लूप होल्स वो लोग पकड़ते हैं जैसे आपको आ के भगवान बता रहे हैं डायरेक्ट ठीक है हमको वो वाला कह रहा है वो मेरे पास आ रहे हैं तो फिर चूज़ कैसे करें और अनुभव करके ही चूज़ होगा तो हमें वहां अगर उसने कहा कि आप हमारे यहां सात दिन नहीं 50 दिन आओ वो 50 दिन का अनुभव उसको को देना पड़ेगा और फिर अगर हमें अनुभव नहीं हुआ उसके बाद तो कोई तीसरा कहेगा 100 देना हो तो हमें उसको अनुभव देना तो हमें कुछ ना कुछ एक शुरुआती का जैसे कुछ भी कहने का पैरामीटर एक रखना पड़ेगा और उसमें ये वाली बात आती है कि जैसे हमने कहा कि ईश्वर सब कुछ अच्छा कर सकता है। अच्छा तो मतलब है कि वो रक्षा कर सकता है। जी तो जैसे कोई झूठ बोलने आ रहा है ईश्वर उसका मुंह बंद कर सकता है। ये तो अच्छा कार्य है। सत्य की स्थापना मगर उसने नहीं किया जबकि वो कर सकता है। तो इसका मतलब जो झूठ बोला गया
00:58:11:03 ईश्वर के नाम से वो उसकी सत्ता में आ गया। मतलब उसके अंडर में आ गया। अब उसने क्यों नहीं बोला वो उसकी एक रीजनिंग अलग है कि वो पकड़ता क्यों नहीं है उसका मुंह। है ना? मगर उसकी सत्ता में हुआ। उसकी सत्ता में यदि हुआ तो फिर हम यह पता कैसे लगाएं कि कौन सी गलत चीज उसकी सत्ता में हो रही है? कौन सी चीज उसकी सत्ता में नहीं हो रही है? यह वाली चीज से ये तो साफ मालूम पड़ता है एक चोर है, चोरी कर रहा है, झूठ बोल रहा है। ये भी कर रहा है। ये एक कर्म फिलॉसफी है। हां। तो उसके पास एक सवाल एक्सजेक्टली ये है कि उसके पास एक रीजनिंग है उसका मुंह बंद ना करने के ठीक। तो इसका मतलब है कि जो किसी कारण से ही सही यदि कोई झूठा ज्ञान दे रहा है भगवान के नाम से वो उसी की सत्ता में हो रहा है। वो होने दे रहा है। हां हो रहा है। चल रहा है उसको क्या कहूं? न्यारा प्यारा है। तो फिर जो एक्टर एक्टिंग कर रहा है ये भी एक एक्टिंग ही है। कि किसी कारण से धर्म के नाम से गलत ज्ञान देना भी ईश्वर की उसमें आ गया सत्ता में। तो फिर इसमें एक दिक्कत ये आती है कि ईश्वर जब स्वयं आकर के हमसे कुछ कह रहे हैं तो हो सकता है कि वो भी एक फिलॉसफी के अनुसार हो। जैसे उसने कहीं पर जैसे उसने फॉर एग्जांपल जैसे उसने कहीं पर किसी को धर्म के नाम से झूठ बोलने दिया उसका मुंह नहीं पकड़ा। ठीक है? तो क्योंकि किसी का कर्म ऐसा रहा होगा कि उसको धर्म के नाम से झूठ मिले
00:59:26:09 और किसी का कर्म ऐसा रहा होगा कि वो धर्म के नाम से झूठ बोले। इसलिए उसने ऐसा होने दिया। तो उसने नहीं होने दिया राज क्योंकि यह कर्म फिलॉसफी ऐसी है कि कर्म के बंधन में मनुष्य ऐसा बन जाता है कई बार उसको यह मालूम होता है यह गलत है क्योंकि कॉन्शियस माइंड सबकॉन्शियस माइंड दो चीजें होती है जो मनुष्य जैसे चोरी करता है झूठ बोलता है उसकी कॉन्शियस ये अलऊ ही नहीं करती है कि यह मैं गलत कर रहा हूं पहले उसकी कॉन्शस ये हां सॉरी यह एहसास उसको एहसास होता है कि जो मैं यह काम कर रहा हूं। यह गलत है। लेकिन ऐसे कुछ अपने संस्कारों के वशीभूत आत्मा हो जाती है जो ना चाहने के बावजूद भी झूठ भी बोल रहा है तो आप चोरी भी कर रहे हैं। वो कर लेता है। ये बात तो बाकी कोई भी मनुष्य ऐसा नहीं है। अंदर से एक आवाज आती है गलत आवाज आती है। मगर प्रॉब्लम ये है ना कि जैसे कोई किसी की बहन के प्रति कुदृष्टि हो रही है। है ना? मगर उसके अंदर से आवाज आई। उसने अंदर की आवाज को दबा दिया। दबा दिया। तो हम उससे यह नहीं कह सकते अगर हमने एक निश्चित पैरामीटर नहीं बनाया ना धर्म तो हम उससे ये नहीं कह सकते कि तू इसकी ओर कुदृष्टि मत डाल क्योंकि वो ये कहेगा कि क्यों ना डालूं तो हम कहेंगे धर्म ने कहा है या ईश्वर ने कहा है मैं क्यों मानू तो तो वो ये कहेगा वो ये कहेगा कि मेरे
01:00:41:13 पास जो ईश्वर आ रहा है वो वो ये कह रहा है और इसमें हम सिद्ध नहीं कर सकते हां इसमें नहीं लॉजिकली कुछ नहीं कर सकते इस चीज बिल्कुल ये चीज है अच्छा दीदी एक बात और है थोड़ा सा एक टॉपिक और है छोटा सा कि जैसे हम हम ये कहते हैं कि ईश्वर सर्व दृष्टा तो है। हम दृष्टि रखता है। साक्षी होकर देखता है। पूरे विश्व को जानता है कि कौन क्या कर रहा है क्या नहीं कर रहा। वो देख रहा है। लेकिन वो क्योंकि यही बात आ जाती है। वो आत्मा कर्म के बंधन में है जो करती ही है और करेगी। क्योंकि उस परमात्मा से जैसे अभी मैं कह सकती हूं मेरा डायरेक्ट संबंध है क्योंकि राजयोग के द्वारा कंट्रोलिंग पावर आती है। अगर मैं गलत संकल्प भी कर रही हूं ना तो मैं उस संकल्प को भी खत्म करूंगी। मैं पॉजिटिव संकल्प करूंगी। बोल भी पॉजिटिव बोलूंगी। कर्म भी पॉजिटिव करूंगी। क्योंकि डायरेक्ट उससे कनेक्शन होने से मुझे वो सर्वशक्तिमान परमात्मा से शक्ति प्राप्त होती है कि मैं गलत ना करूं। मैं वही कह रहा हूं। वो अगर सर्वद है हां तो यानी कि उसकी दृष्टि सब जगह है। हम वो सब देख रहा है। देख सकता है। तो कई ऐसी चीजें होती हैं इस संसार में जिन्हें देखना हमारे लिए पाप होता है। है ना? हम मगर वो उनको
01:01:56:14 देख रहा है। हम इसका अर्थ यह माना जाए कि जो हमारे लिए पाप है उसके लिए पाप नहीं है। या फिर यह माना जाए वो इतने अंश में वो भी पाप कर रहे हैं। नहीं नहीं वो न्यूट्रल है। न्यूट्रल है क्योंकि उसको वो देखते हुए भी उसको कोई मतलब ही नहीं है। न्यूट्रल है। देखते हुए भी नहीं देखता। वही मैं कह रहा हूं कि बुरी चीजों से हम लोग ये सोच जैसे अभी हम होते हैं ना कहीं जा रहे हैं। हमें पता है कचरा पड़ा है। कहीं नॉनवेज है ये है। तो एकदम ऐसे कर लेंगे। पता है यह ऐसे है। पर देखते हुए भी हम जैसे इग्नोर करते हैं। जैसे डॉक्टर का उदाहरण हां डॉक्टर कई अंशों में ऐसी चीजें कर रहा होता है जो दूसरे सामान्य व्यक्ति के द्वारा देखा जाना पाप है। मगर डॉक्टर देखता है तो हम देखने देते हैं क्योंकि वो डेफिनेटली क्योंकि वो पाप है तो क्योंकि वो उसको ठीक कर रहा है क्योंकि उसका उसका उद्देश्य वहां पर वो गलत नहीं है। गलत जिस हिसाब से जिन कर्मों से मनुष्य को दोषी माना जाता है उन्हीं कर्मों से ईश्वर को दोषी नहीं माना जाएगा क्योंकि उसका जो वो किसी भी अहम के लिए विषय के लिए आसक्त नहीं है। अच्छा है ना भूख के लिए आसक्त नहीं है। इसीलिए वो किसी भी उससे माना नहीं जाएगा। तो फिर फिर किसी सभी कर्मों से को करने में क्या दिक्कत है? क्योंकि नहीं दिक्कत क्यों नहीं? कर्म प्रधान है ना जो मनुष्य कर्म कर लेता है उसका फल चाहे वह समुद्र की गहराई में चला जाए या कहीं भी चला जाए
01:03:11:20 वह फल तो उसको मिलेगा ही मिलेगा ये मनुष्य आत्माओं के कर्म अकर्म विकर्म की गति है परमात्मा इन सबसे भी न्यारा है जी नहीं उनको उसको कुछ सही है मैं ये कह रहा था जैसे हमने कहा ना वो बुरे कर्म नहीं करता तो परमात्मा के लिए जो हमारे लिए बुराई है वो तो बुराई है ही नहीं देखो ऐसा है ऐसा नहीं है वो इस दृष्टिकोण से नहीं देखता है क्योंकि उसके लिए किसी जैसे उन्होंने ने कहा ना मैं किसी समस्त कर्मों को करते हुए मैं करता हूं तो मैं क्योंकि मैं किसी भी कर्म के फल में लिप्त नहीं हूं। लिफ्ट नहीं होता क्योंकि उनको जैसे मान लीजिए वो कहीं पर है और उसको कुछ दिख रहा है जो पाप है जिसको देखना हमारे लिए क्योंकि हमारे अंदर उसके लिए वासना है जिसको देख के पाप आ रहा है पाप का दोष लग रहा है मगर ईश्वर तो मुक्त है न्यारा प्यारा चाहिए ही नहीं जब चाहिए नहीं तो उसको देखने से उसे पाप नहीं लग रहा क्योंकि वो आसक्त नहीं है तो फिर हम फिर एक्चुअली हम इन चरम चक्षु से देख रहे हैं ना इसलिए उसमें बंध गए हम तो फिर क्योंकि देखना भी पाप है ना जो कहा और ये डेफिनेटली है किसी को हम देख रहे हैं और उसको कुछ नहीं कर पा रहे हैं। ये भी पाप हो जाता है। लेकिन परमात्मा इन नेत्रों से नहीं देखता है। हम वो जानता है, पहचानता है सब कुछ कि संसार ऐसा हो रहा है। इसलिए इसमें रचक मात्र भी इनवॉल्व नहीं होता है। तो फिर दीदी वो तो अच्छाई और बुराई
01:04:27:01 से परे हो गया ना। परे हो गया। तो जब परे हो गया तो हम ये क्यों कह रहे हैं कि मतलब वो सिर्फ अच्छे काम करता है और बुरे काम नहीं करता। करता नहीं है वो सिखलाता है सिर्फ। देखो अभी समझो। नहीं नहीं किसी ने नहीं। किसी ने रास्ता पूछा मेरे से तो मैंने उसको रास्ता बता दिया। रास्ता उधर जा रहा है। यह रास्ता उधर जा रहा है। अगर एक दुख का रास्ता मैं उधर जा रही तो मैं दुखी होऊंगी। डेफिनेटली अगर सुख के रास्ते पे जाऊंगी सुखी होंगी। लेकिन आपने तो बता दिया और बता के आप चले गए। मगर यदि कर्म किया होगा कि उसको दंड मिलना है कि उसको जो है इधर भेजा जाए। भटकाया ही जाए। तो वो उसको भटकाएगा नहीं। भगवान नहीं भटका सकता ना। मनुष्य भी जो सही मनुष्य होगा वह भी उसको भटकाएगा नहीं। बाकी मनुष्य कर्म का भगवान के लिए तो कुछ भी अच्छा और बुरा है ही नहीं ना जैसा हमने अभी पता किया। हां नहीं अच्छा बुरा नहीं है। अगर देखिए जैसे दुख हर्ता सुख्ता तो है ना। मैं एक चीज बता जैसे कि हमारे लिए अच्छाई और बुराई इस बात पर डिपेंड है कि हमें देवत्व को प्राप्त करना है। मगर ईश्वर तो पहले से ही देवत्व को प्राप्त किए हुए हैं। उसको देवत्व को नहीं है। वो तो परम परम पद को प्राप्त किए हुए हैं। है ना? सदा ही है। सदा ही है। सदा ही है। तो फिर उसको ये अच्छाई बुराई में कैसे फर्क इंटरेस्ट वगैरह उसको तो ये इंटरेस्ट नहीं है। ज्ञाता तो सारी सृष्टि का है ना।
01:05:42:04 ज्ञान का सागर है वो। हां। तो फिर हम उससे उससे धर्म का पाल तो हर ज्ञान हमें देता है। वो समझ देता है। ये समझ दे रहा है। अब उस पर चलना ना चलना और चलते हैं नहीं चलते हैं। वैसा ही फल हम पाते हैं। जो करेगा सो पाएगा। जैसा करेगा वैसा पाएगा। जितना करेगा उतना पाएगा। तो वह सिर्फ हमें एक कर्म फिलॉसफी बताता है। उस पर चलना ना चलना यह हमारे ऊपर है। नहीं उसने बता दी वह ठीक है। मगर ये जो गलत विचार आ रहे हैं मन में क्योंकि संसार ऐसा है ना तो ये ऑटोमेटिकली आते हैं। हां ये कोई भगवान नहीं देता है। तो दूसरी चेतन आत्मा के नहीं आत्मा चेतन शक्ति है ना। हां। आत्मा चेतन शक्ति है। आत्मा के अंदर मन बुद्धि संस्कार है। जी जी जी नहीं मैं समझ गया। इसमें ऐसे करते हैं। जैसे आत्मा है वो खाली है। मतलब जब मुक्ति है तो खाली है। उस टाइम में खाली कहेंगे लेकिन क्योंकि उसमें वो संस्कार उस तरह के है तो सही जैसे फोन है, डेड है। हमने चार्ज नहीं किया। मतलब आत्मा के अंदर ये पहले से ही है। बुरे कर्म। पूरे आत्मा के अंदर जैसे फोन के अंदर सभी चिप के अंदर सब होता है। लेकिन समय अनुसार वो उसकी रिकॉर्डिंग जैसे भरी गई उसको आप कहां प्रेस करते हैं वो चलती रहती है। यानी कि
01:06:57:08 आत्मा का ये स्वभाव है बुरे कर्म कर्म। ये आत्मा के अंदर रिकॉर्डिंग भरी हुई है। लेकिन मर्ज इमर्ज होती है। तो फिर ये तो फिर वो हो गया ना कि भाई जैसे हमने कहा था आत्मा का धर्म में शांति है। अब आत्मा का धर्म बुरे कर्म हो गया। नहीं क्योंकि दोनों पार्ट है ना उसमें तो संसार ही संसार ही दुख सुख का नहीं आत्मा का धर्म शांति है। नेचुरल इनबिल्ट है ना उसमें हां नेचुरल नेचर तो शांति ही है लेकिन जब बॉडी कॉन्शियसनेस में आते हैं तो मन अशांत होता है। आप यह अनुभव करके देखो कि जब मैं सोल कॉन्शियसनेस में हूं जी मैं आत्मा शांत स्वरूप हूं। प्रेम स्वरूप हूं। सुख स्वरूप हूं। ज्ञान स्वरूप हूं। पवित्र स्वरूप हूं। शक्ति स्वरूप हूं। जी यह आत्मा की नेचुरल नेचर है। लेकिन जब मैं बॉडी कॉन्शसनेस में आती हूं तो मेरी वृत्तियां भी खराब होती है, गुस्सा भी आता है, लालच भी आता है, मोह भी पैदा होता है, ईगो भी अहंकार भी आता है। दिक्कत यही पे यहीं पे कंफ्यूजन है कि पहले जब शरीर से पहले आत्मा में वो चीजें थी कि नहीं थी? थी थी। तो फिर उसका उसके मूल में जैसे शांति है आत्मा के अंदर तो जैसे ही वो शरीर में आती है तो शांति भी ढूंढती है। तो ऐसे ही जब वो मूल में उसके शांति के साथसाथ बुराई भी है। तो
01:08:12:09 जब वो शरीर से जुड़ती है तो बुराई भी ढूंढती है। फिर बुराई ऑटोमेटिकली आ जाती है। यानी कि आत्मा का धर्म सिर्फ शांति नहीं है। बुराई भी है। आत्मा का धर्म आत्मा का धर्म नहीं कहेंगे। जब बॉडी में आती है तो अधर्म करना शुरू कर देती है। तो अनंत पहले से था ना उसके अंदर नहीं आत्मा में है या नहीं है लेकिन बॉडी कॉन्शियसनेस नहीं आत्मा में था ना शुरू से में तो भरा हुआ है सारा 84 जन्मों का आत्मा में पार्ट भरा हुआ है मतलब उसके अंदर बुराई इनबिल्ट है तो अगर वो शांति में जाएगी तो उसको एक ना एक दिन बुराई करनी ही करनी है और अगर वो बुराई में जाएगी तो एक ना एक दिन शांति पानी ही पानी आएगी क्योंकि 50-50 है वो होती रहती है जब द्वापर से आत्मा आती है कि आत्मा के दोनों धर्म हो गए शांति भी हो गई बुराई भी हो गई जब वो शांति को पकड़ेगी तो बुराई नहीं आएगी। जब बुराई को पकड़ेगी तो शांति खाएगी। यही कह सकते हैं जब सोल कॉन्शसनेस है तो शांति है। बॉडी कॉन्शियसनेस है तो अशांति है। और अशांति से माना बॉडी से सारे विकार जितने भी संसार में आत्मा में शरीर में आ जाते हैं। जैसे देवत्व में प्राप्त हो गए। फिर नहीं होगा। फिर नहीं तो वहीं से तो गिरता है ना दोबारा आता है। हां पहले तो 16 कला संपूर्ण संपूर्ण निर्विकारी मर्यादा पुरुषोत्तम अहिंसा परमो धर्म है। हो गए। फिर धीरे-धीरे उतरता जाता उतरता जाता फिर वो शांति से अधर्म की ओर अधर्म से शांति शांति तो दोनों धर्म हो गए
01:09:27:25 खेल हो गया ये आत्मा के दोनों धर्म हो गए दुख सुख का जीत का खेल कहेंगे इसको बहुत बहुत धन्यवाद दीदी आपका ये ईश्वरीय विश्वविद्यालय कोरा कागज है कोई कुछ भी पूछे किसी भी स्टेज पर पूछे कहां भी पूछे जो हम हैं वो हम पूछ सकते तो जैसे ज्यों का त्यों ही बताया जाता है कोई बात नहीं ठीक है दीदी बहुत-बहुत आपका आभार आपने इतना समय मैं दिया और मेरा अनुभव बहुत अच्छा रहा आपके साथ। बहुत सारी चीजें जानने को मिली। इसके लिए आपको बहुत-बहुत धन्यवाद। तो आप लोगों को ये चर्चा कैसी लगी? आप लोग अवश्य बताएं और दीदी से यदि आपको मिलना है तो राजौरी गार्डन में है। बहुत ही वरिष्ठ विद्वान है ब्रह्मा कुमारीज की। तो आप लोग बताएं कैसा लगा और यहां जब भी आए दिल्ली में तो जरूर एक बार राजरी गार्डन दिल्ली से आकर जय श्री राम। ओम शांति।
⬜ Not used yet · 01:10:24:24 – 01:10:26:00 (0:01)
01:10:24:24 [संगीत]
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