⬜ Not used yet · 00:00:03:25 – 00:24:38:00 (24:34)
00:00:03:25 अच्छा एक चीज इसमें यह आ रही है कि जैसे हमने कहा ऑलमाइट ऑलमाइटी है ना ऑलमाइटी अथॉरिटी तो क्या मतलब ऑलमाइटी का मतलब अनंत सामर्थ्यवान सर्वशक्तिमान अनंत ऑलमाइटी माने हां या सर्वशक्तिमान पावरफुल अनंत सामर्थ्यवान हां सामर्थ्यवान समर्थ है सदा अनंत शक्ति है उसकी अनंत उसका कोई मना ऐसे माफ लिमिटेड नहीं अनलिमिटेड है मतलब कुछ भी उसके के उसमें आ सकता है। वो कुछ भी कर सकता है। कुछ भी कर सकता है। अच्छा पॉजिटिव अच्छा नेगेटिव कुछ नहीं करेगा। पॉजिटिव वो उसके लिए एवरीथिंग पॉसिबल है। हमारे लिए भी एवरीथिंग पॉसिबल है। पॉजिटिव मगर नेगेटिव तो ये दुनिया है। नेगेटिविटी तो खत्म करता है। मतलब ये जो नेगेटिविटी है वो ईश्वर की सत्ता से बाहर है। मतलब उसके दायरे के बाहर है। ये बिल्कुल। इसका पूरा कोर्स है अगर आप करेंगे क्योंकि एक सेकंड में मैं नहीं समझा पाऊंगा। हां क्योंकि जो परमात्मा प्योर सत्ता है वो इस दुनिया की जो नेगेटिविटी है, नेगेटिविटी क्या है? काम है, क्रोध है, लोभ है, मोह है, अहकार है, ईर्ष्या है, द्वेष है, बदले की भावना है, नफरत है। यह नेगेटिविटी है।
00:01:20:02 समझो एक पिता है, एक माता है, बच्चा गुस्सा करता है, किसी को गलत दृष्टि से देखता है, कुछ करता है तो वो भी उसको समझाएगा। बेटे ये ठीक नहीं है। ऐसा नहीं करना चाहिए आपको। तो उसको भी अच्छा नहीं लगेगा क्योंकि उसको पता है यह नेगेटिविटी है। यह गलत है। परमात्मा तो सर्वोच्च है। ऑलमाइटी अथरिटी पोरिटी उसके अंदर सदा ही है तो वह परमात्मा यह काम क्रोध लोभ मोह अहंकार ईर्ष्या द्वेष नफ तो नहीं आता ये नहीं आ सकता तो मुक्त है ना सदा के लिए सदा के लिए बच्चों को भी मुक्त बनाकर चाहता है हम कह रहे हैं कि जैसे मान लीजिए वो सर्वशक्तिमान है बुरे कार्य नहीं करता नहीं करता है क्योंकि वास्तविकता में तो उसकी नजरों में तो ये नाटक मात्र है कुछ भी बुरा कार्य है ही नहीं कुछ है ही नहीं नाटक मात्र माया मात्र है प्रपंच तो जैसे जैसे उसने जैसे हमने कहा सर्वशक्तिमान तो फिर हम ये क्यों कहते हैं कि वो अवतार नहीं ले सकता कि योग नहीं लेता है अवतार मां के गर्भ से जन्म नहीं लेता नहीं पर काया प्रवेश करता है हां वो माना स्वयं नहीं है स्वयं से प्रकट नहीं नहीं अगर मैंने आपको एग्जांपल दिया ना कि जैसे आप है मैं हूं हम आ गए एक बार गर्भ में फिर हम बच्चा बन गए अब हम अगर आत्मा निकल जाएगी तो कहेंगे मर गया लेकिन परमात्मा का जो अवतरण
00:02:35:13 ऋण कार्नेशन होता है वह आता और जाता है आता और जाता बंधन में नहीं बंधा हुआ है। बंधन में कहां आया? नहीं आया। नहीं बंधन में आ सकता। कर्म से भी प्रकट हुआ तो बंधन में कहां आया? मेरा शरीर का बंधन ही हो गया ना। मैं किसी की मां हूं, किसी की बहन हूं, किसी की पत्नी हूं। किसी की क्या किसी की क्या तो मैं इस शरीर को अगर छोड़ दूं, मैं आत्मा हूं। मैं बोल रही हूं आत्मा। नहीं जैसे ईश्वर ने केवल एक लीला की कि वो प्रकट हुए हम और भाई बहन बने सबके भी बनना है। और उसके बाद वो अप्रकट हो गए। हम तो उन्होंने तो वास्तविकता में लीला की है। मगर देखने में यह भी लग रहा है कि जो है देह त्याग कर दिया। हां लेकिन लीला में हम सभी इनवॉल्व है ना। लीला में आप भी मैं भी ये भी हम सब लीला में है ना तो हम उसने जो लीला की या जो रचना रची तो वो रचना रची कि हम 100 साल 150 साल 50 साल 60 साल इस शरीर को छोड़ नहीं सकते। छोड़ना माना क्या होगा? जैसे शास्त्रों में कहा गया ना दीदी नृत्य अवतार नहीं भगवान का अभी यह भी बहुत गहरी पॉइंट है समझने की जी एक्चुअली उसका अवतार इस तरह के सब होते ही नहीं एक ही अवतार होता है हां वो तो आप आपने बताया परमेश्वर वो वाला वो तो एक बात
00:03:50:21 है मगर एक पूछने वाली जब वो ऑलमाइटी है वो सब कुछ कर सकता है तो फिर वो अवतार धारण करने में दिक्कत क्या है और जो हम अवतार भी उसको इसलिए लेना पड़ता है अगर यह कहें कि जैसे वो बंधनों से बंध जाता तो जैसे फॉर एग्जांपल एक वीडियो गेम खेलने वाले के लिए वीडियो गेम में होते हुए भी वीडियो गेम से वो मुक्त रहता है। मुक्त रहता है ना? तो तो ईश्वर तो क्योंकि उसने वीडियो गेम बनाया तो वो कभी भी वीडियो गेम से फंसता ही नहीं है। वो नहीं फंसेगा। मतलब फिर भले ही वो अवतार धारण करे या ना करे उससे क्या फर्क पड़ता है? वो तो कभी बंधन में आए ही। नहीं अगर वीडियो गेम में कोई वो फंस गया कुछ हो गया तो उसको निकालना तो पड़ेगा ना। तो उसको निकालने के लिए तो कोई दूसरा अगर मैं नहीं इस वीडियो गेम को ठीक कर पा रही हूं। कुछ ऐसा गड़बड़ हो गया जिसको आता है वह तो फिर ठीक करेगा ना तो परमात्मा तो वो है ना जो जिसने उसको बनाना ठीक करना चालू करना बंद करना सब कुछ मालूम है नहीं वो वो ठीक है आपकी बात लेकिन परमात्मा ने जो सी सृष्टि रची वो जो परमात्मा आता है वो हम मनुष्य आत्माओं के सदस्य संसार में नहीं आता और दीदी जो ये वाला वाक्य है गीता का यदा यदा धर्मसानी सजाम में हम मैं अपना सृजन करता हूं हां तो वो सजन करता है नहीं सृष्टि का नहीं सजाम में हम मैं अपना सजन करता हूं अपना सृजन मींस स्वयं
00:05:05:25 के रूप का सृजन करता हूं हां तो आता है ना लेकिन परकाया परकाया देखो आपने परकाया नहीं कहा हम तो ये कहते हैं नहीं गीता में लिखा है परकाया प्रवेश करता हूं ये जो श्लोक है परकाया प्रवेश भी ईश्वर कर सकता है इसमें कोई दिक्कत नहीं है बहुत बार बहुत सारी चीजें जो शिव अवतार शंकराचार्य जी हैं उनके ही बारे में आता है कि उन्होंने एक राजा के शरीर में परकाया प्रवेश करके और वो जो उनसे एक शास्त्रार्थ के बीच में एक कुछ प्रश्न पूछ लिया गया था। जी तो उन्होंने वो वो जो अनुभव था उनको अनुभव नहीं था तो उन्होंने वो अनुभव लिया था राजा के शरीर में प्रवेश करने का तो ये तो बहुत छोटी सी बात हो गई मगर उन्होंने वहां पर कहा परकाया प्रवेश से कोई दिक्कत नहीं है मगर जब वो ये कह रहे हैं ना यदा यदा धर्मस ग्लन भवती भारत अभस तदात्म शजाम में हम मैं अपना सृजन करता हूं अपने रूप का सृजन करता हूं ना वो फिर प्रलोप हो जाते हैं मींस कि वो जब आते हैं सृष्टि रूपी रंगमंच पर सृष्टि की स्थापना करते नई सृष्टि की फिर अपने आप को परमधाम में जैसे आते हैं फिर वो चले जाते हैं। नहीं नहीं जो उन्होंने कहा ना मैं अपना सृजन करता हूं। ये सृजन कर रहे हैं ना अपना स्वयं के रूप का सृजन कर रहे हैं। ऐसा है गीता जो है ना बहुत सारी गीताएं हैं। ये श्लोक तो सब में है ना? हां। तमिल गीता, टैगोर
00:06:21:08 गीता, गांधी गीता। अब हम उस गीता की बात को सत्य कैसे मान ले? तो गीता को हम सत्य नहीं मान रहे। नहीं माना। कोई उसमें श्लोक किसी ने अपने भी मिक्स किए होंगे या कुछ ऐसा किया होगा तो उस बात को हम कैसे सत्य मान ले तो फिर गीता है ये हमें कैसे पता नहीं ये देखो कोई भी घटना घटती है पहले घटना घटित होती है फिर वो पेपर में आता है या टीवी पर आता है बाद में जो गीता है महाभारत का अंश है हां है ना अच्छा महाभारत से प्रथम बार शंकराचार्य जी ने गीता निकाली थी आदि शंकराचार्य जी जिनको शिव अवतार भी माना गया तो उन्होंने क्या किया था कि महाभारत का वह पार्ट है गीता उसको निकाल के उन्होंने जो है उसका ट्रांसलेशन किया था कमेंट्री की थी फर्स्ट टाइम गीता ऐसे बनी थी वरना पहले महाभारत ही था महाभारत से गीता इस तरह से अलग की थी तो आदि शंकराचार्य जी ने जो गीता के श्लोक स्वीकार किए महाभारत में भी वो श्लोक मिलते हैं तो अगर हम ये कह रहे हैं कि जैसे उसमें मिलावट हो गई तो फिर अगर जिससे हम गीता को ले रहे हैं हम कह रहे हैं कि मिलावट हो गई तो फिर हम ये कैसे कह रहे हैं कि कृष्ण थे एक्सिस्ट करते थे देखो आप शंकराचार्य जी कह रहे हैं हम शिवाचार्य जी कह रहे हैं जी हमें शिवाचार्य जी ने यह बताया कि मेरा रीइकारनेशन होता है सिर्फ बच्चों को परिवर्तन
00:07:36:26 करने के लिए प्रवेश हां और इस सृष्टि का परिवर्तन करने के लिए तो मेरा ऐसा सर्जन ये नहीं वो तो समझो शंकराचार्य जी तो मनुष्य हुए है ना नहीं वो शास्त्रों में उनको शास्त्रों में हां वो तो शंकर भगवान अब यहां ये भी पॉइंट एकदम अलग हो जाती है शिव और शंकर दोनों में महान अंतर है ये भी एक पूरा लेसन शिव पुराण में यही कहा गया है कि वो मैं ही शिव हूं। हां आपके पुराण में ये कहा गया पर स्वयं शिव परमात्मा ने हमें जो बताया जो हमने सीखा जो हमने समझा शिव और शंकर दोनों में अंतर है तो एक तरीके से ये भी पूरा एक हमारा मना वो लेसन है जो हम इसको समझते हैं और लोगों को समझाते हैं तो दीदी ये जो मतलब एक तरीके से जो एक तरीके से पूरी तरीके से शास्त्रों पर डिपेंड नहीं है जो जितनी चीजें सभी शास्त्रों का सार आकर के मैं बतलाता हूं हम साधु संत महात्माओं का भी आकर के मैं उद्धार करता हूं। मतलब सीधे भगवान आके बता रहे हैं। जी तो इसलिए हम उसको प्रायोरिटी देते हैं और गीता और बाकी शास्त्र उतने मान्य है जितने की लोग मानते हैं उनका भी सार परमात्मा आकर के बतलाते हैं। जैसे कोई बात है आपको कोई बताई जा रही है मुझे बताइए। में एक चीज आती है कि जैसे
00:08:52:07 मान लीजिए हमारे पास तो भगवान स्वयं आ रहे हैं तो हमने उनकी बात मान मगर जैसे कोई व्यक्ति ये कहता है कि मेरे पास भी आ रहे हैं वो आपके ठीक उलट बात करता है और वो भी कहता है मेरे पास आके भगवान ने कहा है तो फिर ये कैसे पता किसकी बात सही है किसकी बात गलत है एक चीज बिल्कुल राइट तो ये बात हो गई दूसरी बात एक ये आती है कि परमात्मा ने सब कुछ बनाया है खैर आपने ये कहा कि नई सृष्टि बनाई नई सृष्टि बनाई हम मगर आपने कहा कि वो सर्वशक्तिमान है। जी वो सिर्फ अच्छे कार्य करता है। जी मगर जब हम देखते हैं वो सर्वशक्तिमान है और अच्छे कार्य करता है। तो सृष्टि जब बिगड़ रही है हम तो परमात्मा उसको रोक सकता है बिगड़ने से मगर किनहीं कारणों से नहीं रोक रहा है। वो होने दे रहा है। है ना? हम तो इसमें क्या आ गया कि ये जो बिगड़ा परमात्मा की सत्ता में ही बिगड़ा। हम परमात्मा अगर वह सर्वशक्तिमान है तो रोक सकता है और रोकना तो अच्छा कार्य है। रोकना तो पॉजिटिव है ना हम तो वह रोक सकता है मगर उसने नहीं रोका तो परमात्मा की सत्ता में बिगड़ा हम तो इसका मतलब कि अगर कोई आकर के हमसे गलत बात कहेगा परमात्मा के नाम से तो वो भी परमात्मा की सत्ता में ही आ गया ना यह नहीं है राजे हम क्योंकि परमात्मा जो यह
00:10:07:13 सृष्टि है क्योंकि ये नाटक है दुख और सुख हार और जीत का अभी इस दुनिया में जो कलयुगी दुनिया चल रही है इसमें सब कुछ नेगेटिव नेगेटिव माना गलत गलत गलत हो रहा है लेकिन वह गुप्त वेश में अपना कार्य कर रहा है। संदेशवाहक हैं हम सभी को संदेश दे रहे हैं कि सृष्टि पुरानी हो चुकी है। अब इस सृष्टि को नया बनाने के लिए परमपिता परमात्मा आ चुका है। तो जो आप यह बात कह रहे थे कैसे माने कि यहां परमात्मा है। देखो हम उनको आप आप भी हो गए मैं भी हो गई। मैं आपको सुना रही हूं बता रही हूं। अपने अनुभव के आधार पर जो मैंने यह ज्ञान सुना है और सुनकर के अपने जीवन में धारण करना किया है वो मैं आपको बता रही हूं। कंपलसरी नहीं है कि आप मेरी बातों को मानो। जजमेंट आपकी है कि वो भी आपने सुना यह भी आप आप सुन रहे हैं तो उसकी जजमेंट आपने करनी है। हम लोगों को यही बताते हैं। ये भी आप सुन रहे हैं। वो भी हम आपको ये नहीं कहते कि आपको ये बात माननी ही है। बिल्कुल तो इसलिए आपकी अपनी जजमेंट है। हम कहें शास्त्र गलत है, महात्माएं गलत है, वो गलत है। नेवर हम ये नहीं कहते हैं। आपने अपनी बात बता दी और जितना उसको सुनना है और सुनकर के उसको जजमेंट उसने
00:11:22:16 करनी है। मतलब कहने का यह है कि अगर कोई आकर के यह कहता है मुझे भी परमात्मा ने कुछ बताया तो हम ठीक है भैया तुम्हें अगर परमात्मा बता रहे हैं तो ठीक है फिर चाहिए वैसे देखो मुझे एक बात याद आती है कि रावण था बहुत उसने वेद शास्त्र क्या है ना कि जब हम कहीं आज के युवाओं के बीच में खड़े हैं तो ये लूप होल्स वो लोग पकड़ते हैं जैसे आपको आ के भगवान बता रहे हैं डायरेक्ट ठीक है हमको वो वाला कह रहा है वो मेरे पास आ रहे हैं तो फिर चूस कैसे और अनुभव करके ही चूज़ होगा। तो हमें वहां अगर उसने कहा कि आप हमारे यहां 7 दिन नहीं 50 दिन आओ वो 50 दिन का अनुभव उसको देना पड़ेगा और फिर अगर हमें अनुभव नहीं हुआ उसके बाद तो कोई तीसरा कहेगा 100 दिन आओ तो हमें उसको अनुभव देना तो हमें कुछ ना कुछ एक शुरुआती का जैसे कुछ भी कहने का पैरामीटर एक रखना पड़ेगा और उसमें ये वाली बात आती है कि जैसे हमने कहा कि ईश्वर सब कुछ अच्छा कर सकता है। अच्छा तो मतलब है कि वो रक्षा कर सकता है। जी तो जैसे कोई झूठ बोलने आ रहा है ईश्वर उसका मुंह बंद कर सकता है। ये तो अच्छा कार्य है। सत्य की स्थापना मगर उसने नहीं किया। जबकि वो कर सकता है। तो इसका मतलब जो झूठ बोला गया ईश्वर के नाम से वो उसकी सत्ता में आ गया। मतलब उसके अंडर में
00:12:37:18 आ गया। अब उसने क्यों नहीं बोला? वो उसकी एक रीजनिंग अलग है कि वो पकड़ता क्यों नहीं है उसका मुंह। है ना? मगर उसकी सत्ता में हुआ। उसकी सत्ता में यदि हुआ तो फिर हम यह पता कैसे लगाएं कि कौन सी गलत चीज उसकी सत्ता में हो रही है? कौन सी चीज उसकी सत्ता में नहीं हो रही है? यह वाली चीज से ये तो साफ मालूम पड़ता है एक चोर है, चोरी कर रहा है, झूठ बोल रहा है। ये भी कर रहा है। ये एक कर्म फिलॉसफी है। हां। तो उसके पास एक सवाल एक्सजेक्टली ये है कि उसके पास एक रीजनिंग है उसका मुंह बंद ना करने के ठीक। तो इसका मतलब है कि जो किसी कारण से ही सही यदि कोई झूठा ज्ञान दे रहा है भगवान के नाम से वो उसी की सत्ता में हो रहा है। वो होने दे रहा है। हां हो रहा है। चल रहा है उसको क्या कहूं? न्यारा प्यारा है। तो फिर जो एक्टर एक्टिंग कर रहा है ये भी एक्टिंग ही है। कि किसी कारण से धर्म के नाम से गलत ज्ञान देना भी ईश्वर की उसमें आ गया सत्ता में। तो फिर इसमें एक दिक्कत ये आती है कि ईश्वर जब स्वयं आकर के हमसे कुछ कह रहे हैं तो हो सकता है कि वो भी एक कर्म फिलॉसफी के अनुसार हो। जैसे उसने कहीं पर जैसे उसने फॉर एग्जांपल जैसे उसने कहीं पर किसी को धर्म के नाम से झूठ बोलने दिया। उसका मुंह नहीं पकड़ा। ठीक है? तो क्योंकि किसी का कर्म ऐसा रहा होगा कि उसको धर्म के नाम से झूठ मिले और किसी का कर्म ऐसा रहा होगा कि वो धर्म के नाम से झूठ बोले। इसलिए उसने
00:13:52:19 ऐसा होने दिया। तो उसने नहीं होने दिया राज क्योंकि यह कर्म फिलॉसफी ऐसी है कि कर्म के बंधन में मनुष्य ऐसा बन जाता है कई बार उसको यह मालूम होता है यह गलत है क्योंकि कॉन्शियस माइंड सबकॉन्शियस माइंड दो चीजें होती है जो मनुष्य जैसे चोरी करता है झूठ बोलता है उसकी कॉन्शियस ये अलऊ ही नहीं करती है कि यह मैं गलत कर रहा हूं पहले उसकी कॉन्शस ये हां सॉरी यह एहसास उसको एहसास होता है कि जो मैं यह काम कर रहा हूं। यह गलत है। लेकिन ऐसे कुछ अपने संस्कारों के वशीभूत आत्मा हो जाती है जो ना चाहने के बावजूद भी झूठ भी बोल रहा है तो आप चोरी भी कर रहे हैं। वो कर लेता है। ये बात तो बाकी कोई भी मनुष्य ऐसा नहीं है। अंदर से एक आवाज आती है गलत आवाज आती है। मगर प्रॉब्लम ये है ना कि जैसे कोई किसी की बहन के प्रति कुदृष्टि हो रही है। है ना? मगर उसके अंदर से आवाज आई। उसने अंदर की आवाज को दबा दिया। दबा दिया। तो हम उससे ये नहीं कह सकते अगर हमने एक निश्चित पैरामीटर नहीं बनाया ना धर्म तो हम उससे ये नहीं कह सकते कि तू इसकी ओर कुदृष्टि मत डाल क्योंकि वो ये कहेगा कि क्यों ना डालूं तो हम कहेंगे धर्म ने कहा है या ईश्वर ने कहा है मैं क्यों मानू तो तो वो ये कहेगा वो ये कहेगा कि मेरे पास जो ईश्वर आ रहा है वो वो ये कह रहा है और इसमें हम सिद्ध नहीं कर सकते
00:15:07:22 हां इसमें नहीं लॉजिकली कुछ नहीं कर सकते इस चीज बिल्कुल ये चीज है अच्छा दीदी एक बात और है थोड़ा सा एक टॉपिक और है छोटा सा कि जैसे हम हम ये कहते हैं कि ईश्वर सर्वदृष्टा तो है। हम हां दृष्टि रखता है। साक्षी होकर देखता है। पूरे विश्व को जानता है कि कौन क्या कर रहा है क्या नहीं कर रहा। चीज वो देख रहा है। लेकिन वो क्योंकि यही बात आ जाती है। वो आत्मा कर्म के बंधन में है जो करती ही है और करेगी। क्योंकि उस परमात्मा से जैसे अभी मैं कह सकती हूं मेरा डायरेक्ट संबंध है क्योंकि राजयोग के द्वारा कंट्रोलिंग पावर आती है। अगर मैं गलत संकल्प भी कर रही हूं ना तो मैं उस संकल्प को भी खत्म करूंगी। मैं पॉजिटिव संकल्प करूंगी। बोल भी पॉजिटिव बोलूंगी। कर्म भी पॉजिटिव करूंगी। क्योंकि डायरेक्ट उससे कनेक्शन होने से मुझे वो सर्वशक्तिमान परमात्मा से शक्ति प्राप्त होती है कि मैं गलत ना करूं। मैं वही कह रहा हूं। वो अगर सर्वद है हां तो यानी कि उसकी दृष्टि सब जगह है। हम वो सब देख रहा है। देख सकता है। तो कई ऐसी चीजें होती हैं इस संसार में जिन्हें देखना हमारे लिए पाप होता है। है ना? हम मगर वो उनको देख रहा है। हम इसका अर्थ ये माना जाए कि जो हमारे लिए पाप है
00:16:22:24 उसके लिए पाप नहीं है। या फिर ये माना जाए वो इतने अंश में वो भी पाप कर रहा है। नहीं नहीं वो न्यूट्रल है। न्यूट्रल है क्योंकि उसको वो देखते हुए भी उसको कोई मतलब ही नहीं है। न्यूट्रल है। देखते हुए भी नहीं देखता वो। वही मैं कह रहा हूं कि बुरी चीजों से हम लोग ये सोच जैसे अभी हम होते हैं ना कहीं जा रहे हैं हमें पता है कचरा पड़ा है कहीं नॉनवेज है ये है तो एकदम ऐसे कर लेंगे पता है ये ऐसे है पर देखते हुए भी हम जैसे इग्नोर अवॉयड कर जैसे डॉक्टर का उदाहरण हां डॉक्टर कई अंशों में ऐसी चीजें कर रहा होता है जो दूसरे सामान्य व्यक्ति के द्वारा देखा जाना पाप है मगर डॉक्टर देखता है तो हम देखने देते हैं क्योंकि वो डेफिनेटली क्योंकि वो पाप है तो क्योंकि वो उसको ठीक कर रहा है क्योंकि उसका उसका उद्देश्य वहां पर वो गलत नहीं गलत जिस हिसाब से जिन कर्मों से मनुष्य को दोषी माना जाता है उन्हीं कर्मों से ईश्वर को दोषी नहीं माना जाएगा क्योंकि उसका जो वो किसी भी के लिए विषय के लिए आसक्त नहीं है अच्छा है ना भूख के लिए आसक्त नहीं है इसीलिए वो किसी भी उससे माना नहीं जाएगा तो फिर किसी सभी कर्मों से को करने में क्या दिक्कत है क्योंकि नहीं दिक्कत क्यों नहीं कर्म प्रधान है ना जो मनुष्य कर्म कर लेता है उसका फल चाहे वो समुद्र की गहराई में चला जाए कहीं नहीं चला जाए वो वो फल तो उसको मिलेगा ही मिलेगा। ये मनुष्य आत्माओं के कर्म
00:17:37:25 अकर्म विकर्म की गति है। परमात्मा इन सब से भी न्यारा है। जी नहीं उनको उसको कुछ सही है। मैं ये कह रहा था जैसे हमने कहा ना वो बुरे कर्म नहीं करता। तो परमात्मा के लिए जो हमारे लिए बुराई है वो तो बुराई है ही। नहीं देखो ऐसा है। ऐसा नहीं है। वो इस दृष्टिकोण से नहीं देखता है। क्योंकि उसके लिए किसी जैसे उन्होंने कहा ना मैं किसी समस्त कर्मों को करते हुए मैं करता हूं। तो मैं क्योंकि मैं किसी भी कर्म के फल में लिप्त नहीं हूं। लिफ्ट नहीं होता क्योंकि उनको जैसे मान लीजिए वो कहीं पर है और वो उसको कुछ दिख रहा है जो पाप है जिसको देखना हमारे लिए क्योंकि हमारे अंदर उसके लिए वासना है जिसको देख के पाप आ रहा है पाप का दोष लग रहा है मगर ईश्वर तो मुक्त है न्यारा प्यारा चाहिए ही नहीं जब चाहिए नहीं तो उसको देखने से उसे पाप नहीं लग रहा क्योंकि वो आसक्त नहीं है तो फिर हम फिर एक्चुअली हम इन चरम चक्षु से देख रहे हैं ना इसलिए उसमें बंध गए हम तो फिर क्योंकि देखना भी पाप है ना जो कहा और ये डेफिनेटली है किसी को हम देख रहे हैं उसको कुछ नहीं कर पा रहे हैं। ये भी पाप हो जाता है। लेकिन परमात्मा इन नेत्रों से नहीं देखता है। हम वो जानता है, पहचानता है सब कुछ कि संसार ऐसा हो रहा है। इसलिए इसमें रचक मात्र भी इनवॉल्व नहीं होता है। तो फिर दीदी वो तो अच्छाई और बुराई से परे हो गया ना। परे हो गया। तो जब परे हो गया तो हम ये क्यों कह रहे हैं कि
00:18:52:28 मतलब वो सिर्फ अच्छे काम करता है और बुरे काम नहीं करता। करता नहीं है वो सिखलाता है सिर्फ। देखो अभी समझो। नहीं नहीं नहीं किसी ने नहीं। किसी ने रास्ता पूछा मेरे से तो मैंने उसको रास्ता बता दिया। रास्ता उधर जा रहा है। यह रास्ता उधर जा रहा है। अगर एक दुख का रास्ता मैं उधर जा रही तो मैं दुखी होगी। डेफिनेटली अगर सुख के रास्ते पे जाऊंगी सुखी होंगी। लेकिन आपने तो बता दिया और बता के आप चले गए। मगर यदि कर्म किया होगा कि उसको दंड मिलना है कि उसको जो है इधर भेजा जाए। भटकाया ही जाए। तो वो उसको भटकाएगा नहीं। भगवान नहीं भटका सकता ना। मनुष्य भी जो सही मनुष्य होगा वह भी उसको भटकाएगा नहीं। बाकी मनुष्य कर्म का भगवान के लिए तो कुछ भी अच्छा और बुरा है ही नहीं ना जैसा हमने अभी पता किया। हां नहीं अच्छा बुरा नहीं है। अगर देखिए जैसे दुख हर्ता सुख्ता तो है ना। मैं बस एक चीज बता जैसे कि हमारे लिए अच्छाई और बुराई इस बात पर डिपेंड है कि हमें देवत्व को प्राप्त करना है। मगर ईश्वर तो पहले से ही देवत्व को प्राप्त किए हुए हैं। उसको देवत्व को नहीं है। वो तो परम परम पद को प्राप्त किए हुए हैं। है ना? सदा ही है। सदा ही है। सदा ही है। तो फिर उसको ये अच्छाई बुराई में कैसे फर्क इंटरेस्ट वगैरह उसको तो ये इंटरेस्ट नहीं है। ज्ञाता तो सारी सृष्टि का है ना। ज्ञान का सागर है वो। हां। तो फिर हम उससे
00:20:08:04 उससे धर्म का पल तो हर ज्ञान हमें देता है। वो समझ देता है। ये समझ दे रहा है। अब उस पर चलना ना चलना और चलते हैं नहीं चलते हैं। वैसा ही फल हम पाते हैं। जो करेगा सो पाएगा। जैसा करेगा वैसा पाएगा। जितना करेगा उतना पाएगा। तो वह सिर्फ हमें एक कर्म फिलॉसफी बताता है। उस पर चलना ना चलना यह हमारे ऊपर है। नहीं उसने बता दी वह ठीक है। मगर ये जो गलत विचार आ रहे हैं मन में क्योंकि संसार ऐसा है ना तो ये ऑटोमेटिकली आते हैं। हां ये कोई भगवान नहीं देता है। तो दूसरी चेतन आत्मा के नहीं आत्मा चेतन शक्ति है ना। हां। आत्मा चेतन शक्ति है। आत्मा के अंदर मन बुद्धि संस्कार है। जी जी जी नहीं मैं समझ गया। इसमें ऐसे करते हैं। जैसे आत्मा है वो खाली है। मतलब जब मुक्ति है तो खाली है। उस टाइम में खाली कहेंगे लेकिन क्योंकि उसमें वो संस्कार उस तरह के है तो सही जैसे फोन है डेड है। हमने चार्ज नहीं किया। मतलब आत्मा के अंदर ये पहले से ही है बुरे कर्म पूरे आत्मा के अंदर जैसे फोन के अंदर सभी चिप के अंदर सब होता है लेकिन समय अनुसार वो उसकी रिकॉर्डिंग जैसे भरी गई उसको आप कहां प्रेस करते हैं वो चलती रहती है यानी कि आत्मा का ये स्वभाव है बुरे कर्म करना ये आत्मा
00:21:23:18 के अंदर रिकॉर्डिंग भरी हुई है लेकिन मर्ज इमर्ज होती है तो फिर यह तो फिर वो हो गया ना कि भाई जैसे हमने कहा था आत्मा का धर्म में शांति अब आत्मा का धर्म बुरे कर्म हो गया नहीं क्योंकि दोनों पार्ट है ना उसमें तो संसार ही संसार ही दुख सुख का नहीं आत्मा का धर्म शांति है। नेचुरल इनबिल्ट है ना उसमें हां नेचुरल नेचर तो शांति ही है लेकिन जब बॉडी कॉन्शियसनेस में आते हैं तो मन अशांत होता है। आप यह अनुभव करके देखो कि जब मैं सोल कॉन्शियसनेस में हूं जी मैं आत्मा शांत स्वरूप हूं। प्रेम स्वरूप हूं। सुख स्वरूप हूं। ज्ञान स्वरूप हूं। पवित्र स्वरूप हूं। शक्ति स्वरूप हूं। जी यह आत्मा की नेचुरल नेचर है। लेकिन जब मैं बॉडी कॉन्शसनेस में आती हूं तो मेरी वृत्तियां भी खराब होती है, गुस्सा भी आता है, लालच भी आता है, मोह भी पैदा होता है, ईगो अहंकार भी आता है। दिक्कत यही पे यहीं पे कंफ्यूजन है दीदी कि पहले जब शरीर से पहले आत्मा में वो चीजें थी कि नहीं थी? थी थी। तो फिर उसका उसके मूल में जैसे शांति है आत्मा के अंदर तो जैसे ही वो शरीर में आती है तो शांति भी ढूंढती है। तो ऐसे ही जब वो मूल में उसके शांति के साथसाथ बुराई भी है। तो जब वो शरीर से जुड़ती है तो बुराई भी ढूंढती है। फिर बुराई ऑटोमेटिकली आ
00:22:38:21 जाती है। यानी कि आत्मा का धर्म सिर्फ शांति नहीं है। बुराई भी है। आत्मा का धर्म। आत्मा का धर्म नहीं कहेंगे। जब बॉडी में आती है तो अधर्म करना शुरू कर देती है। तो अनंत पहले से था ना उसके अंदर नहीं आत्मा में है या नहीं है लेकिन बॉडी कॉन्शियसनेस नहीं आत्मा में था ना शुरू से में तो भरा हुआ है सारा 84 जन्मों का आत्मा में पार्ट भरा हुआ है मतलब उसके अंदर बुराई इनबिल्ट है तो अगर वो शांति में जाएगी तो उसको एक ना एक दिन बुराई करनी ही करनी है और अगर वो बुराई में जाएगी तो एक ना एक दिन शांति पानी ही पानी आएगी क्योंकि 50-50 है वो होती रहती है जब द्वापर से आत्मा आती है कि आत्मा के दोनों धर्म हो गए शांति भी हो गई बुराई भी हो गई जब वो शांति को पकड़ेगी तो बुराई नहीं आएगी। जब बुराई को पकड़ेगी तो शांति आएगी। यही कह सकते हैं जब सोल कॉन्शसनेस है तो शांति है। बॉडी कॉन्शियसनेस है तो अशांति है। और अशांति से माना बॉडी से सारे विकार जितने भी संसार में आत्मा में शरीर में आ जाते हैं। जैसे देवत्व प्राप्त हो गए। फिर नहीं होगा। फिर नहीं तो वहीं से तो गिरता है ना दोबारा आता है। हां पहले तो 16 कला संपूर्ण संपूर्ण निर्विकारी मर्यादा पुरुषोत्तम अहिंसा परमो धर्म है। हो गए। फिर धीरे-धीरे उतरता जाता उतरता जाता फिर वो शांति से अधर्म की ओर अधर्म से शांति शांति तो दोनों धर्म हो गए खेल हो गया ये आत्मा के दोनों धर्म हो गए दुख सुख का जीत
00:23:53:22 का खेल कहेंगे इसको बहुत बहुत धन्यवाद दीदी आपका ये ईश्वरीय विश्वविद्यालय कोरा कागज है कोई कुछ भी पूछे किसी भी स्टेज पर पूछे कहां भी पूछे जो हम हैं वो हम पूछ सकते तो जैसे ज्यों का त्यों ही बताया जाता है कोई बात नहीं ठीक है दीदी बहुत-बहुत आपका आभार आपने इतना समय दिया और मेरा अनुभव बहुत अच्छा रहा आपके साथ। बहुत सारी चीजें जानने को मिली। इसके लिए आपको बहुत-बहुत धन्यवाद। तो आप लोगों को ये चर्चा कैसी लगी? आप लोग अवश्य बताएं और दीदी से यदि आपको मिलना है तो राजौरी गार्डन में है। बहुत ही वरिष्ठ विद्वान है ब्रह्मा कुमारीज की। तो आप लोग बताएं कैसा लगा और यहां जब भी आए दिल्ली में तो जरूर एक बार राजरी गार्डन दिल्ली से आकर जय श्री राम। ओम शांति।
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⬜Cards
YouTube Studio → Editor → Cards. The API does not report this, so press Done after adding them.
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⬜Playlist Automatic
YouTube Studio → Details → add to Playlists. It gets ticked ✓ automatically at the next sync.
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⬜Thumbnail
YouTube Studio → Details → Thumbnail → upload a custom thumbnail.
"Done" is your confirmation. The YouTube API does not report things like End Screen and Cards.
Playlists
Not in any public playlist (or YouTube sync has not run yet).
क्या ब्रह्माकुमारी का ईश्वर सर्वशक्तिमान है, तो क्या वह सब कुछ कर सकता है?
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