⬜ Not used yet · 00:00:03:15 – 00:04:58:16 (4:55)
00:00:03:15 सर्वशक्तिमान को लोग अधिक समझ रहे हैं कि वह इतना सर्व शक्तिमान है कि सब कुछ कर सकता है। ईश्वर भी सब कुछ नहीं कर सकता। यहां लोग भूल रहे हैं। सब कुछ नहीं कर सकता। सर्वशक्तिमान तो है। सर्वशक्तिमान इसलिए है कि वह अपने कार्यों में किसी की सहायता नहीं लेता। तो फिर आत्मनिर्भर किसे कहेंगे? तो फिर सर्वशक्तिमान और आत्मनिर्भर क्या एक दूसरे के पर्यायवाची माने जाए? हां मान भी सकते हैं। हम मान भी सकते हैं। नहीं अनंत सामर्थ्यमान इसलिए है कि उसके अनंत ऐसे कार्य जिसको हम समझ नहीं पा रहे हैं। देख नहीं पा रहे हैं। अभी जान नहीं पा रहे हैं। कहा गया है। मतलब एक फैक्ट यहां पे निकल के आ रहा है कि वो और क्या-क्या कर सकता है ये कहा नहीं जा सकता है। मगर वो क्या-क्या नहीं कर सकता है ये हमें पता चल चुका है। जी ऐसा तो नहीं कि वो और क्या-क्या जो कर सकता है उसमें ये वाली चीज भी आ जाए कि हमने जिसको लगाम लगा दी है कि वो ये नहीं कर सकता। ये शायद और क्या-क्या कर सकता है मैं इंक्लूडेड हो जाए जो हमें नहीं पता चल रहा है। अभी हां बिल्कुल सही ऐसा भी हो सकता है क्योंकि उसकी व्यवस्था को वही जान सकता है। हम लोग पूर्ण नहीं जान सकते। उसके विषय में कभी हम पूर्ण घोषणा कर ही नहीं सकते हैं। जी ना करने की ना करने की। तो ये ना करने की है ना कि वो कुछ कार्य है जो वो नहीं कर सकता है। जैसे अवतार नहीं ले सकता। तो
00:01:18:24 कुछ है लेकिन हम उसके विषय में घोषणा नहीं कर सकते। मतलब यह निर्णय नहीं है। बिल्कुल निश्चय आप लेने का अधिकारी नहीं हो ना आपकी सामर्थ है। अच्छा नहीं कुछ विषय में तो है उसमें जैसे अवतार की बात लें जी अवतार में हम निर्णय हम ले सकते हैं। हम कह सकते हैं कि अवतार नहीं ले सकता ना लेगा ना लिया है। ऐसा देश कौन सा है? ऐसा काल कौन सा है? ऐसा स्थान कौन सा है जो परमपिता परमात्मा उस जगह पर उस समय पे है नहीं। सब तो कहां से जाएगा? कहां जाएगा? क्योंकि जब न्यून और अधिक होगा तभी तो जाना आना संभव हो सकेगा। जी। जब वो प्रलय जैसी व्यवस्था को करता है। प्रलय इस संसार को जब प्रलय में बदलता है तब किसी अवतार के माध्यम से नहीं बदलता। तो क्या छोटे-छोटे जो दुष्ट प्रवृत्ति के लोग हैं जैसे रावण हुए, कंस हुए क्या इनको मारने के लिए इनको खत्म करने के लिए क्या उसको अवतार लेने की आवश्यकता पड़ेगी? नहीं उसके वो ले सकता है कि नहीं? नहीं ले सकता है जब वो उसे जरूरत ही नहीं है भाई जरूरत ही नहीं है और लेगा तो वो सीमित हो जाएगा क्योंकि फिर वो सर्वदेशी नहीं रहेगा जी अवतार वाला एक देसी हो जाएगा तो उसकी शक्ति सामर्थ घटी क्षेत्र घटा कि बढ़ा है तो हमें अब देखिए चार अवतार वहां हुए धर्म बढ़ना चाहिए था नहीं बढ़ना चाहिए अगर
00:02:33:25 स्थापना का नया धर्म बढ़ना चाहिए था लेकिन अगले युग में क्या हुआ त्रेता आया तो धर्म की हानि और हुई बढ़ा नहीं भाई सतयुग में चार डॉक्टर आए चार वैद आए, चार धर्म की स्थापना करने वाले महापुरुष आए या भगवान आए कहे उनको तो धर्म बढ़ना चाहिए नहीं बढ़ अगला युग हमारा उससे बेहतर होना चाहिए नहीं होना चाहिए लेकिन नहीं हुआ थोड़ा महापुरुष जन्म लेकर युग युग में आते हैं आकर भूमंडल का वो भार हटाते हैं। ठीक इसी तरह समय-समय पर महापुरुषों को परमपिता परमात्मा भेजता है और इस राष्ट्र की व्यवस्था को समाज की व्यवस्था को परिवर्तन करते हैं। आए हैं भी उससे पहले भी आए हैं। लेकिन ईश्वर स्वयं में नहीं आता। ईश्वर आता है तो धर्म की स्थापना होती है। मगर धर्म की स्थापना हुई नहीं और पतन हुआ। मगर वहीं पर आपने यह मान लिया कि महापुरुष आते हैं भार हटाने के लिए भार हटा दिया। कि भगवान के आने पर तो आपने पतन माना। मगर महापुरुष के आने पे आपने भार हटाना मान लिया। तो एक तरफ कह रहे हैं कि पतन हुआ। एक तरफ महापुरुष के रूप में ये मान रहे हैं कि नहीं पतन नहीं हुआ। धर्म की रक्षा हो गई। तो ये दो बातें हो गई। वामन अवतार में भी राजा बलि के साथ छल किया गया। छल करने वाला तीन कदम उसकी जमीन मांगी। जमीन के साथ उसका पूरा राज्य ही नाप लिया। अंत में जब उसका
00:03:48:28 तीसरा कदम उस भगवान का नहीं पूरा हुआ तो उसने कहा आप कहां रखें? इसको बताओ स्थान तुम्हारा तो ढाई कदम में पूरा नप गया। तो राजा बलि धर्मात्मा अपने आप लेट गया। साहब मैं नापता हूं। मुझे नाप लीजिए। इसको छल कहेंगे। ईश्वर छल द्वेष रहित है। वो किसी के साथ छल नहीं करता। साथ कपट नहीं करता। मगर व्यक्ति एक ऐसी जगह खड़ा है जहां पर उल्का पिंड आकर के गिर गया। जी तो यह ईश्वरीय माना जाएगा या व्यक्ति को माना जाएगा? ये भी ये उसके पूर्व जन्मों का जैसे मान लिया जाए कर्म का फल है ये। ये कर्म का फल है। मतलब ईश्वर के द्वारा हत्या की है उसको एक दंड मिला कि भाई वो कहीं खड़ा हुआ और उसके ऊपर उल्कापिंड आकर के गिर गया। जी तो ये ईश्वर द्वारा प्रदत कार्य। इसमें तो उसका कोई हस्तक्षेप है ही नहीं। कि उल्का पिंड गिरता है कि नहीं। तो क्या ये ईश्वर के द्वारा उसके साथ छल हुआ कि नहीं? जैसा छल आपने बताया कि बाली के साथ हुआ था। बलि के साथ हुआ था। जी इसको भी तो छल माना जाएगा। कैसे छल माना जाए? उसको नहीं पता था कि उल्लका पिंड मेरे ऊपर गिर सकता है। उसको नहीं पता था। लेकिन ईश्वर न्यायकारी है। यानी कि जिसके जो छल कर रहा है उसके साथ छल हो सकता है। ईश्वर के द्वारा छल हो सकता है। क्यों नहीं हो सकता? तो तो बलि ने कुछ हो सकता है ऐसा किया हो जो उसके साथ छल पूर्वक किया। हो सकता है। हम ये भी नहीं कह सकते। सकता। हम
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→ Used in: A · Video सर्व व्यापक ईश्वर एकदेशीय कैसे हो सकता है? अवतारसिद्धि at 0:50 ↗
00:04:58:16 देखते हैं कि ईश्वर पृथ्वी सृष्टि की जब रचना करते हैं तो कहीं पे वो सूर्य बना रहे हैं। जी कहीं पे वो क्या कहते हैं? चंद्रमा बना रहे हैं। पृथ्वी बना रहे हैं। तो अब इसमें बात ये आती है कि सूर्य को बनाने में फोर्स ज्यादा चाहिए। और पृथ्वी को बनाने में फोर्स कम चाहिए। जी। जो ईश्वर है अपनी शक्ति के रूप में कार्य कर रहा है, चंद्रमा को बना रहा है, सूर्य को बना रहा है। तो वह खुद को जो एक रस था अब वो कहीं पर कम ज्यादा होकर के कार्य कर रहा
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00:05:31:15 है या नहीं? नहीं। जैसे जीव आत्मा शरीर के माध्यम से क्रिया करता है। कार्य करता है। ठीक? विविध प्रकार कार्य करता है। ऐसे ही परमपिता परमात्मा इस प्रकृति के माध्यम से सारे कार्य करता है। ईश्वर स्वयं कार्य नहीं करता। पृथ्वी के माध्यम से वो प्रकृति के माध्यम से कार्य करता है। जी तो यहां पे तो सहायता हो गई। नहीं सहायता कहां हो गई? प्रकृति की ऋषिवर देवदयाल ने कोई अपनी बात नहीं लिखी। सत्यार्थ प्रकाश उसका मूल ग्रंथ है। आपने पढ़ा हो नहीं पढ़ा हो पढ़ के देख लेना। कहीं पर भी उन्होंने कोई बात कही। वो प्राचीन ग्रंथों से लेकर के कही है। और उसका उन्होंने प्रमाण दिया है। एक ऐसे ऋषि हुए जिन्होंने अपनी बात का प्रमाण दिया कि मैं कहां से कह रहा हूं। ये फला ग्रंथ में देखिए जाकर। ये तो सभी आचार्यों ने दिया है। सबने नहीं दिया है। सबने अपनी भी बात रामानुजाचार्य सब ने दिया कोई प्रमाण नहीं दिया उन्होंने। अपनी बात की बल्कि उनके ग्रंथों के प्रमाण नहीं होंगे। होंगे तो बहुत कुछ ग्रंथों को होंगे। कुछ नहीं अब जैसे शंकर शंकर जी लिख रहे हैं। ठीक है ये विषय नारी नरक सुधार बताओ कहां से प्रमाणित किया उन्होंने? मैं देखूंगा एक भी अगर कहीं ऋषि ने ऐसी बात लिखी हो जिसका प्रमाण नहीं दिया। जैसे जैसे उन्होंने ये बात कही रहने दीजिए। अह जैसे उन्होंने यह बात कही जी कि अगर जो जीवात्मा है मुक्त हो जाती है जब जी तो मुक्त होने के बाद वो इतने इतने लाख जो वर्ष होते हैं
00:06:46:16 कुछ एक अवधि वहां बताई है परांत काल जी उसके बाद वो वापस आती है जी तो वहां पर उन्होंने एक तर्क दिया है जी वो तर्क ये है कि बहुत लंबे समय तक अच्छा भोजन भी करते रहेंगे तो उससे भी मन आपका ऊब जाएगा अपनी भाषा में दिया उन्होंने तर्क दिया इस तर्क का कोई प्रमाण नहीं है जी ऐसा ऐसा सत्यार्थ प्रकाश में नहीं लिखा है आनंद को लेकर के आनंद को लेकर के क्योंकि सुख तो संसार का है और सुख एक मिनट नहीं सुख है लेकिन सुख संसार उसको सुख नहीं कहा सकता जो ब्रह्मानंद है जो मुक्ति का आनंद होने के बाद दयानंद जी ये कह रहे हैं कि उस मुक्ति से आप ऊब जाओगे इसलिए वापस आना उचित है। नहीं वापस इसलिए भी आना है क्योंकि मैं ये नहीं कह रहा उन्होंने इस बात का प्रमाण नहीं दिया ऐसी हजारों बातें मिल जाएंगी जिसका उन्होंने प्रमाण नहीं दिया नहीं नहीं ऐसा नहीं है चलिए इसको छोड़ अगर अगर वो परमानंद की उभने वाली बातें ही नहीं है वो वहां तो उभने वाली बात तो वहां तो वहां तो जीवात्मा निरंतर चाहता हमें यही मिला रहे कि उसको सर्व स्वतंत्रता प्राप्त होती है। दयानंद सरस्वती जी कहा है डूबने का। चलो मैं मान लिया कह भी लेकिन वहां कोई स्वतंत्रता वहां इतनी स्वतंत्रता उसे हमें जीवन काल मिल ही नहीं सकती। जीवन काल में नहीं मुक्ति के बाद मुक्ति का वो आनंद
00:08:01:22 है वो स्वतंत्रता है कि अन्य किसी क्षेत्र में अन्य किसी अवस्था में प्राप्त नहीं हो सकता। मगर दयानंद जी लिख रहे हैं कि आप ऊब जाओगे। नहीं उसके लिए मैंने विचार नहीं उसके लिए नहीं कहा होगा। उसके विषय जरूर कोई विषय होगा। मैं अभी दिखा। चलिए मैं देख लूंगा बाद में। चलिए चलो आगे बात करिए। अच्छा ठीक है मैं होता है तो अभी ईश्वर जो है वो हमें शब्द प्रमाण से मालूम पड़ रहा है प्रातिभाषिक सत्ता है उसकी जी पर वो अभी भी हमारी इंद्रियों का विषय नहीं है भौतिक इंद्रियों का इस कारण से जी एक नास्तिक उसे नकार सकता है ईश्वर को जी है ना कि भाई नहीं मानता जो मेरे को प्रूफ नहीं हो रहा क्यों प्रूफ नहीं हो रहा कि वो इंद्रियों का विषय नहीं है वो ठीक है वो एक अलग बात है तो निराकरण इस बात का ये है कि वो अभी इंद्रियों का विषय नहीं था मगर फिर वो इंद्रियों का विषय बना तो इसी को कहा गया कि आना जाना सिद्ध होता है। अब इसको एक उदाहरण है कि ईश्वर सब जगह पहले से ही है। उस तो जब ईश्वर है सब जगह पहले से ही तो ईश्वर ऋषियों के मस्तिष्क में भी है। तो ईश्वर के रूप में उसका ज्ञान भी है। जी। फिर किसी देश काल परिस्थिति में उसके मंत्रों का आना जाना कैसे सिद्ध होगा? जी। उसके मंत्र भी तो हैं पहले से ही। जी। मगर वो मंत्र आ जा रहे हैं। तो इसमें हमें ये मानना पड़ेगा पहले वो मन का विषय नहीं थे। बाद में वह मन रूपी इंद्रिय का विषय बन गए
00:09:16:28 तो मंत्रों का प्रकट होना इस तरह से सिद्ध हुआ। ईश्वर जो मंत्र आप जो हम देख रहे हैं कि अब पहले हम मंत्र को नहीं जानते थे। मगर हम किसी देश काल परिस्थिति में मंत्र को जान गए। जबकि हम जब ये कहते हैं कि जब ईश्वर पहले से ही है तो उसके रूप में उसके मंत्र भी पहले से हैं। पहले से पहले से हैं। मगर फिर भी हम ये कहते हैं कि हमने मंत्र को पढ़ा देखा। हमें मंत्र हमने जाना। तो ये आना जाना क्यों हो रहा है? जब ईश्वर पहले से ही है तो हम मंत्रों का आना जाना क्यों स्वीकार कर रहे हैं और अगर मंत्रों का आना-जाना स्वीकार कर रहे हैं तो जिस तरह से मंत्रों का आना जाना स्वीकार कर रहे हैं उस तरह से ईश्वर का क्यों नहीं स्वीकार कर सकते नहीं ईश्वर आता है उसमें आने की जरूरत ही नहीं है भाई ईश्वर वो अगला चरण है आवश्यकता है कि नहीं वो अगला चरण है हमें हमें ज्ञान देने के लिए उसको कोई साकार रूप लेने की आवश्यकता नहीं है नहीं नहीं ईश्वर आत्मा का विषय है ईश्वर आत्मा का विषय है इसमें भी एक पॉइंट है कि जैसे आपने कहा कि ईश्वर को ज्ञान देने के लिए अवतार साकार रूप लेने की आवश्यकता नहीं है। तो अगर ज्ञान ही कराना है, विद्याद का भेद बताना है, केवल ईश्वर अपने मन में सोच ले। आपने कहा इच्छा से हो तो हमें ज्ञान हो जाएगा विद्या का। ये क्यों इतनी व्यवस्था है कि गायत्री मंत्र पढ़ो। तो फिर प्रश्न यही है ना कि जब उनको आपको ज्ञान कराना है जो अविद्या से मुक्ति का
00:10:32:00 ज्ञान विद्या तो जब ज्ञान कराना है तो डायरेक्ट वो ज्ञान दे सकते हैं। मंत्रों का फॉर्म की आवश्यकता क्या है? फिर वो इसलिए थी अगर उन चार ऋषियों को तो ऐसे ही बोध करा सकते थे। लेकिन जो आगे परंपरा चलती वो तो किसी व्यवस्था से चलती ना। किसी भाषा के माध्यम से किसी व्याकरण के माध्यम से जिससे गुरु शिष्य परंपरा में ढलेगी तो गुरु कैसे पढ़ाएगा उसको? ईश्वर ने उनको फॉर्म इसलिए दिया जिससे कि क्योंकि फॉर्म है तभी तो हम आगे प्रदान कर पाएंगे। जी तो ईश्वर ने वैदिक ज्ञान का जो ज्ञान का स्वरूप साकार स्वरूप यानी कि मंत्रों के रूप में वो ऋषियों को इसलिए दिया जिससे कि वो आगे किसी को दे पाएं। है ना? तो क्या यह मान सकते हैं कि ईश्वर का जो साकार स्वरूप होता है वह इसलिए होता है कि उसके बारे में कोई किसी के कोई किसी को बता पाए वो वाणी का विषय बन पाए। अब बात इस पर हो रही है कि जो जिस चीज की आवश्यकता नहीं है मगर आपने कहा कि जो वैदिक ज्ञान है जिससे कि उसको हम किसी को बता सके, किसी को प्रदान कर सके आसानी से इसलिए उसको ऐसा रूप दे के भेजा मंत्रों के रूप में। तो हम ये भी कह सकते हैं कि ईश्वर के जो ईश्वर के बारे में हम किसी को बता सके हम उसके व्यवहार कर सके। व्यवहारिक हो सके। इसलिए ईश्वर ने ऐसा रूप बनाया कि जो जो मनुष्य के व्यवहार का विषय बन सके जिससे कि आगे परंपरा चल सके। अच्छा जो
00:11:47:03 इस पे बात चल रही थी कि वो व्यवहारिक हो सकता है व्यवहार करने के लिए जिससे कि ऋषि उस ज्ञान को आगे दे पाए। इसलिए मंत्र के रूप में जो ईश्वर है वो अपना ज्ञान देते हैं। तो इसी तरीके से हम कह सकते हैं कि ईश्वर को लेकर के लोग व्यवहारिक हो पाए। इसलिए ईश्वर अपना दर्शन या ईश्वर अपना स्वरूप बनाते हैं। है ना? [संगीत]
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क्या आर्य समाज गुरुकुल के आचार्य ने ईश्वर अवतार को मान लिया
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