⬜ Not used yet · 00:00:02:12 – 00:04:31:06 (4:29)
00:00:02:12 आजकल इस वालों में प्रेमानंद जी महाराज को लेकर के बहुत भय व्याप्त हो गया है। मैंने देखा था कुछ समय पूर्व अमोग लीला ने किसी मामले में प्रेमानंद जी की अवमानना की थी और उसके बाद में मेरे ख्याल से कुछ स्पष्टीकरण भी प्रस्तुत किया था। और प्रेमानंद जी का उस विषय में यही कहना था कि भाई देखो एक ने हमारी राधा रानी के लिए कुछ कहा था तो उस व्यक्ति को एक महीने के लिए जो है किसी ना किसी मामले में प्रतिबंध लगा दिया गया था अमोग लीला पर। उसके बाद मैंने ऐसे भी कुछ वीडियोस देखे जिसमें कि इस से जुड़े हुए मंदिरों के संचालक जो हैं वो खींचे निपोल रहे हैं। खीज खा रहे हैं प्रेमान जी के नाम पर। नाम लेकर नहीं बोल रहे मगर बोल रहे हैं कि पीले वस्त्रों में एक जो है साधु बना फिरता है। वो मायावादी है वो यह है वो वो है। और मैं तो क्या कहूं मैं तो बहुत घनघोर कट्टर विरोध करता हूं एसो का। पर पता नहीं हमारे आगे कुछ लोग हैं जो उसकी उसको एप्रिशिएट करते उसकी प्रशंसा करते हैं और शायद संभवतः उसको इस बात पर भी आपत्ति थी कि वो उसको सुनने जाते हैं। अब हाल ही में एक-दो दिन पूर्व मैंने अमोग लीला का एक वीडियो देखा है जिसमें वह
00:01:18:24 कुछ कुतर्क करते हुए अनर्गल प्रलाप करते हुए और इस बात पर जोर दे रहे हैं कि जो इस्कॉन के भक्त हैं या इस से जुड़े हुए जो इस के अनुयाई हैं वो किसी भी और संत साधु आचार्य की वाणी सुनने श्रवण करने ना जाएं और इस बात को स्थापित करने के लिए सिद्धांत को स्थापित करने के लिए बहुत सारे कुतर्क दे रहे हैं। गलत है ये। हम लोग फिर बाहर के बाबाओं को सुन रहे हैं आज क्योंकि बाहर के बाबा जी बड़ा अच्छा बोलते हैं। बड़ा अच्छा बोलते हैं। बड़ा अच्छा बोलते हैं। हम जो सुनने के लिए आ रहे हैं ना इस डिवोटीज हमारी इससे निष्ठा टूटती है अपने गुरुजनों के अंदर। सबसे पहली बात है कि जब हमने कुंभ में जाकर पूज्य राघवाचार्य जी महाराज का साक्षात्कार लिया था। उनकी वाणी प्राप्त की थी इस के विषय में। तो पूज्य राघवाचार्य जी महाराज ने भी अपना एक अनुभव हमें साझा किया था। उन्होंने कहा था कि और उनकी एक छोटी मानसिकता यह भी मैंने देखी जो इस कान से जुड़े हुए युवा वर्ग के लोग हैं उसमें कुछ लोग मेरे वक्तव्य को कथा को श्रवण करते हैं। तो कथा में वो लोग बहुत दूर पीछे बैठते थे। तो एक दिन हमने कथा के
00:02:33:25 बाद उनको बुलाया और बुला के पूछा कि आप लोग भक्त हैं भगवान के। आप लोगों को आगे बैठकर के कथा श्रवण करना चाहिए तो रुचि भी होगी और सुनाने वाले को भी आनंद की अनुभूति होगी। उन्होंने एक बड़ी गंभीर बात बताई कि स्वामी जी आपके यहां ये YouTube पर प्रसारण हो रहा है और यह रिकॉर्डिंग हो रही है। एक चैनल पर दिखेगा और कहीं कैमरा हमारे तरफ घूम गया और हम उसमें दिख गए तो हमारे इस संस्था के जो लोग हैं वो मुझे दंडित करेंगे और मुझे फटकार लगाएंगे कि दूसरे संप्रदाय के आचार्यों का प्रवचन सुनने क्यों गए? दूसरे संप्रदाय के आचार्यों की कथा सुनने क्यों गए? तो राघवाचार्य जी महाराज की इस बात को जब हमने अपने YouTube चैनल पर प्रसारित किया तो बहुत से लोग ऐसे आए जो यही कहने लगे कि नहीं भाई नहीं इस में ऐसा कहीं नहीं सिखाया जाता पर आज प्रमाण सबके सामने है। अमोग लीला और इस के अन्य कई प्रचारक मंच पर बैठ करके चिल्ला चिल्ला कर यह सब बातें बोल रहे हैं कि किसी भी और संत की वाणी नहीं सुननी चाहिए अपने गुरु के अलावा और यही नहीं बहुत ही अभद्र तरीके से क्योंकि उसमें वो बातें तो घुमा फिरा करके प्रेमानंद जी के लिए ही है। वृंदावन में कौन प्रसिद्ध संत
00:03:48:26 हैं जिनको सुनने इस के लोग भी चले जाते हैं। यह बातें कोई छुपी हुई नहीं है। ये बातें जग जाहिर बात है। तो यहां पर जो मूल में है प्रेमानंद जी हैं। अब प्रेमानंद जी हो या फिर कोई भी आचार्य हो जिसके लिए इस अमोग लीला ने बहुत भद्र तरीके से बात की है। क्या बातें की है? कह रहे हैं कि भैया वृंदावन के सभी साधु संतों को हमारा प्रणाम है। आ जाएंगे तो दंडवत होंगे। यहां तक कि मायावादी भी आ जाएंगे तो दंडवत होंगे। हम प्रणाम करेंगे हम। लेकिन लेकिन यह जितने भी बाबे हैं बाबे इत्यादि शब्दों का उसने उपयोग किया है। ऑलदो
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00:04:31:06 सारे वृंदावन के बाबा जी हमारे लिए पूजनीय है भाई। हम तो उनके चरणों की धूल भी नहीं है। लेकिन हमें किसी बाबे के पास नहीं जाना चाहिए सुनने के लिए। तो पहली बात तो यह है ये जो बाबे हैं ना यह तुम जैसों की खाट खड़ी करने के लिए पर्याप्त है। जिस दिन सामना करोगे तुम दंडवत क्यों होते हो मालूम है? चापलूसी करने के लिए
⬜ Not used yet · 00:04:53:03 – 00:21:34:00 (16:41)
00:04:53:03 चापलूसी करने के लिए तुम दंडवत होते हो। जो कुछ वो एक फिल्म आई थी ना हाउसफुल टू जय भद्रकाली उसमें जो अभिनेता था अक्षय कुमार वो क्या करता था? अपनी बात किसी से मनवाने के लिए उसके पैर पकड़ लेता था। है ना? इसी प्रकार से जब तुम पर तुम जानते हो कि हम किसी भी आचार्य का साधु संतों का सामना तो कर नहीं सकते तो जब भी किसी के सामने जाएंगे तो दंडवत हो जाएंगे। भाई तुम मायावादी कह रहे हो अगर सामने खड़े रहोगे मायावादी बोलोगे तो वो कहेगा ना सिद्ध कर मुझे मायावादी। इसीलिए तुम उसके सामने दंडवत होते हो और दिखाते हो कि हम सम्मान करना है। फिर लोगों को बताते हो कि मायावादी का भाष्य सुन लो तो सर्वनाश हो जाए। मायावादी का चेहरा देख लो तो यह हो जाए। मायावादी वैसा ही अभक्त है जैसे मुसलमानों के अनुसार काफिर होता है। तो पहले तो थोड़ी तमीज सीख लो। हम थोड़ी जो बदतमीजी कर रहे हो मंच पर बैठकर के साधु संतों के लिए थोड़ी तमीज सीख लो। सबसे पहले तो और दूसरी बात अपनी इस कायरता को सामने रखो कि हम जो है प्रकट क्यों? हम जो है दंडवत क्यों हो जाते हैं। रामभद्राचार्य
00:06:08:26 जी ने माता के दूत की चुनौती दी थी ना तुमको। राम और कृष्ण में भेद करते हो ना। कृष्ण ही सर्वोपरि है। तुम्हारे यहां के भक्त लोग गाली देते हैं। अगर उनसे यह बात कहो नहीं राम और कृष्ण बराबर है तो और मैं अभी 28 साल से इस से जुड़ा हूं और मेरे बच्चे भी दीक्षित भक्त हैं। मेरी बीवी दीक्षित भक्त हैं। राम नरसिंह वराह ये सब एक कारण के लिए आते हैं। बस वो कारण के लिए आते हैं। इसलिए राम जी की भक्ति उतनी श्रेष्ठ नहीं है। हां राम जी में पावर कम है या कृष्ण जी में पावर ज्यादा है ज्यादा है क्योंकि वो पूर्ण पुरुषोत्तम है मर्यादा पुरुष लिखा है अपने शास्त्रों में कौन से शास्त्र में मैं आपसे पूछ रहा हूं कम पावरफुल है आप एक बताओ मर्यादा या पूर्ण इसमें पूर्ण कौन सा है बता रहा हूं ना बताओ अक्षर पुरुष के लिए मर्यादा बना है या पूर्ण बना है पूर्ण राम जी पूर्ण भी है कहां लिखा सब मानते हैं नहीं मानोगे नहीं आप सब झूठ बोल रहे हो आप साले आप साले आप साले ये आप ये बना रहे
00:07:24:00 आप ये आप में लायक नहीं है जानने की वो आया ना आया ना भी सुना था उसने कहा था जब कृष्ण ही भगवान है और उसके लिए उदाहरण देते कृष्ण जो है पूर्णिमा का चांद है और बाकी सारे जो भगवान के रूप है उसमें कहीं ना कहीं कुछ ना कुछ अभाव है। वो पूर्णिमा का चांद नहीं है। फिर अपनी रामायण में क्या लिखते हो? वहां पर राम भगवान को परम ब्रह्म बोला जा रहा है। छठवे अध्याय में युद्ध कांड में वहां पर भी तुम घुसेड़ देते हो अपना एजेंडा अब्राहमिक वाला जिसमें कि भगवान के कई रूप नहीं हो सकते। एक ही रूप हो सकता है। यही तो है अब्राहमिक एजेंडा एक ही अल्लाह या एक ही क्राइस्ट वही एक रूप हो सकता है। इसलिए दूसरे रूपों से भी तुम्हारे ही अनुसार श्री कृष्ण भगवान के ही दूसरे रूपों से भी तुम्हें एलर्जी है। क्योंकि एजेंडा अब्राहमिक डालना है भारत में हिंदुओं में। तो क्या डाला वहां पर रामायण में? राम जी की महिमा गान हो रहा है। वहां पर भी कह रहे हैं कि अगर तुम ऐसा करोगे तो तुम्हें पूर्ण जो
00:08:39:03 भगवान है कृष्ण उनकी शरणागति प्राप्त हो जाएगी। यह है तुम्हारा एजेंडा और फिर जब तुम्हें कोई आचार्य गण चुनौती देते हैं तुम्हारे माता की दूध का वास्ता देते हुए कि जिसकी मां ने ध्यान है ना क्या कहा था? जिसकी मां ने निष्ठा पूर्वक दूध पिलाया हो वह मुझे आकर सिद्ध करें कि राम जी पूर्ण नहीं है। ये 16 कला 12 कला की जो बातें करते हो फिर तुम लोगों ने क्या किया था? कि जैसे ही उन्होंने मां के दूत की चुनौती दी तुमको मां के दूत का स्मरण कराते हुए तो तुमने क्या किया वहां पर? तुरंत दंडवत हो गए। अरे करते ना वहां शास्त्रार्थ नहीं श्री संप्रदाय वालों से करो। कहो उनको भगवत गीता अपनी भगवत गीता एज इट इस में तुमने लिखा है 2.2 में कि नारायण भी पूर्ण ऐश्वर्यवान नहीं है। जाओ करो नहीं तो हम दंडवत इसलिए होते हैं कि हमारे पास इस बारे में तर्क वितर्क करने की क्षमता नहीं है। ना ही हमारे पास हमारे कोई परंपरा का ज्ञान है तो हम ढिंढोरा पीटते हैं। हमारा यह दोगलापन है। वास्तविकता यह है कि हम अपनी कायरता को छिपाने के लिए दंडवत
00:09:54:16 होते हैं। बाला 12 कला और 16 कला में केवल इतना ही तो अंतर मात्र है कि जो श्री राम जी हैं वो सूर्यवंशी है और श्री कृष्ण भगवान है वो चंद्रवंशी हैं। तो क्योंकि सूर्य अपने 12 रूपों में अपने आप को प्रकट कर सकता है। उसी आधार पर हमारा वर्ष गिना जाता है। तो इसलिए वह 12 कलाओं के हो गए और क्योंकि चंद्रमा जो है 16 रूपों में अपने आप को विभाजित करके दिखा देता है। इसलिए उनको जो है 16 कला का कहा जा सकता है। इतनी सी बात है। यह ठीक इस प्रकार से है। जिस प्रकार से एक के सिक्के को तुम चवन्नियों के आधार पर गिनोगे तो चार टुकड़े होंगे। और अठन्नी के आधार पे गिनोगे तो दो टुकड़े होंगे। मगर दो अठन्नी और चार चवन्नी का जो मूल्यांकन है उनमें कोई बदलाव नहीं होगा। दोनों का मूल्यांकन एक रुपया ही आएगा। और यह बात भी वैष्णवाचार्य माधवाचार्य शास्त्री जी ने अपने ग्रंथ में लिखी है। समझ में आया जो फिर बरगलाने लगो नहीं नहीं ये जो है वो ये तो शंकर संप्रदाय वाले बोल रहे हैं। वैष्णवाचार्य ने बोली ये बात
00:11:10:09 श्री संप्रदाय तुमसे कहीं श्रेष्ठ वहां तक पहुंच पाना तुम्हारे लिए पता नहीं कितने जन्मों में होगा। खैर बैक टू द पॉइंट। तो यह जो दंडवत होने का दिखावा कर रहे हो फिर अगली ही पंक्ति में बाबे बोल रहे हो ये सब बाबे हैं तुम्हारे लिए। शंकराचार्य राघवाचार्य प्रेमानंद जी ये सब बाबे हैं तुम्हारे लिए। और फिर कह रहे हो हम सम्मान बहुत करते हैं। इसी प्रकार से सम्मान भगवान श्री शिव जी का है। क्या सम्मान है? कि हम शिव जी को बहुत मानते हैं। हम शिव जी को वैष्णव मानते हैं। परम वैष्णव मानते हैं। वैष्णवा नाम यथा शंभू और फिर अगले ही बार में भगवत गीता 265 में लिखते हैं कि भगवान ध्यान मग्न थे। शिवजी तो ध्यान मग्न थे। उनको जब पार्वती माता ने विषय भोग के लिए उकसाया। माता भी नहीं है वहां। जैसे तुम्हारी कोई तुम्हारे लिए कोई ऐसी वैसी कोई स्त्री हो। है ना? क्या लिखा है वहां? उनको जब पार्वती ने विषय भोग के लिए उकसाया तो वह सहमत हो गए। वहीं पर हरिदास ठाकुर को वहां पर एक वैश्या स्त्री ने उकसाया विषय भोग के लिए तो वो सहमत नहीं हुए क्योंकि वो भगवान के भक्त थे। कहां गई उनकी परम वैष्णवता शिव जी की श्रेष्ठ कर दिया तुमने तो वैष्णवता में भी
00:12:25:13 नहीं माना। फिर कि हम तो बहुत सम्मान करते हैं। मगर शिव जी की पूजा करने वाले पापी हैं। शिवजी को भगवान के तुल्य समझने वाले पापी हैं। नीच हैं। मूर्ख हैं। मगर हम शिवजी को बहुत मानते हैं। शिवजी को भगवान मानने वाले अभक्त है। जैसे कुरान ना मानने वाला काफिर है। वैसे ही शिवजी को भगवान मानने वाला अभक्त है। उससे दूर रहो। उससे बात भी मत करो। तो शिव जी का हम बहुत सम्मान करते हैं। पर शिव जी अपनी इंद्रियों को अपने नियंत्रण में नहीं रख पाते हैं। हम बहुत सम्मान करते हैं भैया शिवजी का। यह सम्मान वैसा ही है जैसे वो एक प्रासंगिक विनोद पूर्ण एक चुटकुला है ना। वो एक मातृशक्ति होती है। वो अपने सखा से पूछती है। कहती है कि मैं तुम्हारी आज्ञा का उल्लंघन नहीं कर सकती। पर तुम मेरे पिता नहीं हो। फिर कहती है कि मैं जब तुम्हारे साथ होती हूं ना तो बहुत सुरक्षित फील होता है। पर तुम मेरे भाई भी नहीं हो। फिर कहती है कि मैं तुम्हारे बिना एक पल भी जी नहीं सकती पर तुम मेरे प्रेमी भी नहीं हो। तुम तुम तुम समझ रहे हो ना जानू तुम मेरे लिए क्या हो? तो
00:13:40:16 जानू कहता है हां मैं समझ रहा हूं। मैं बेवकूफ हूं। वही हाल है। हम बहुत सम्मान करते हैं पर बाबे हैं। हम बहुत सम्मान करते हैं पर उनकी पूजा करने वाले नीच हैं। तो तुम समझ रहे हो ना शिव जी? तुम समझ रहे हो ना वृंदावन के संतों? तुम हमारे लिए क्या हो? तो क्या कहेंगे? वृंदावन के संत और शिवजी क्या कहेंगे? उसी प्रकार से है बाबे बाबे कह दो श्रवण करने तक के लिए मना कर दो और फिर कह दो हम बहुत सम्मान करते हैं तो तुम्हारा ये सम्मान का जो दिखावा है दोगलापन है यह वैसे ही है ठीक वैसे ही जैसे आर्य समाज कहता है ईश्वर सर्वशक्तिमान है पर अगले ही पल अवतार नहीं ले सकता हम तो कह रहे हैं ना सर्वशक्तिमान है अरे भैया सर्वशक्तिमान है तो अवतार क्यों नहीं ले सकता इस्लाम वाले भी कहते हैं सर्वशक्तिमान है मगर अवतार नहीं ले सकता। मूर्ति नहीं बन सकती। क्यों भाई? तो सर्वशक्तिमान कहां से सिद्ध होगा? जो सर्वशक्तिमान के घटक है वो कहां से सिद्ध होंगे? उसी प्रकार से तुम्हारा ये दोगलापन है कि हम बहुत सम्मान करते हैं। अब जरा तर्क पर बात कर लेते हैं। पहला तर्क है कि
00:14:56:02 आप किसी भी दूसरे गुरु को सुनने जाएंगे तो आपकी जो निष्ठा अपने गुरु के प्रति है वह डगमगाएगी। यही कुतर्क रामपाल वाले भी करते हैं। रामपाल वालों का कहना है कि भाई दूसरों को मत सुनो क्योंकि दूसरों को सुनोगे तो हो सकता है पोल खुल जाए। तो इसमें यही क्यों सुना सोचा जाए कि भैया निष्ठा डगमगाएगी। ये क्यों ना सोचा जाए कि उसके द्वारा जो अवैदिक अप्रामाणिक ज्ञान दिया जा रहा है तथाकथित गुरु के द्वारा उसकी पोल खुल जाएगी। इसलिए यह माना जाए कि भैया अन्य को ना सुनो। तो मूल रूप से वह अपने भेद को खुलने से बचाने के लिए और अपने झूठ को और अपने आडंबर को सुरक्षित रखने के लिए वो अपने आदमियों को अपने से जुड़े लोगों को किसी अन्य आचार्यों के पास जाने का पर भी रोक लगाते हैं। गु का मतलब होता है अंधकार। रू का मतलब होता है निकालने वाला अद्वैत का उपनिषद। यदि कोई तथाकथित गुरु अपने शिष्य का अंधकार रूपी अज्ञानता को अंधकार रूपी संशय को दूर नहीं कर पा रहा है तो वह उसका गुरु ही सिद्ध नहीं होगा तो तुम ये किस आधार पर कह सकते हो कि इस गुरु को छोड़ के उस गुरु की बात सुनने मत जाओ पहले इसको गुरु तो सिद्ध करो उसका अंधकार तो मिटाओ
00:16:11:03 किस शास्त्र में लिखा है कहां पर लिखा है कि अपने गुरु को छोड़ के किसी की बात नहीं सुननी है अच्छा फिर आगे तुम कुतर्क क्या करते हो कि भैया जो पत्नी जो पतिव्रता पत्नी होती है उसका वो जो है अपने पति को छोड़ के किसी और के संसर्ग में नहीं जाती हम तो क्या इस के अनुसार जिस कुल खानदान में एक स्त्री ब्याही जाती है उस कुल खानदान के सारे पुरुष उसके पति होते हैं क्या
00:16:44:14 नीचता भरे कुतर्क है यह गुरु से तुलना तुम पति पत्नी की कर रहे और इस आधार पर यदि तुम यह कह रहे हो कि जो व्यक्ति जिसका शिष्य है वह अपने ही गुरु को सुने अन्य गुरुओं को ना सुने तो फिर इस के अन्य गुरुओं को क्यों सुना रहे हो उसे हम अब तुम कहोगे हम संप्रदाय की बात कर रहे हैं जिस जिस संप्रदाय के तुम हो उस संप्रदाय पे आओ यानी तुम कुल खानदान की बात कर रहे हो तो पहली बात तो पत्नी से यहां कंपैरिजन नहीं हो सकता सजातीय की अगर बात करें तो इस कब से जाती हो गई भाई ह वैष्णव जाति क्यों नहीं होगी और चलो वैष्णव भी नहीं होगी श्री संप्रदाय नहीं होंगे मध संप्रदाय नहीं होगा जबकि मधु संप्रदाय में स्वयं को गिनते हो गय संप्रदाय के अन्याचार्य क्यों नहीं होंगे उनकी भी यही शिकायत है कि हमें सुनने नहीं दिया जाता इसॉन के यहां पर इस्कॉन एक संस्था है एक विदेशी संस्था वो कब से जाती हो गई भाई हिंदुओं की किसने तय किया कि इस एक जाति है और उसके उसके आधार पर तुम कह रहे हो कि सजातीय गुरुओं को सुनो। और दूसरी बात यह है कि अगर संप्रदाय की बात की जाए तो पहली बात तो तुम यह बताओ तुम जब अपना वीडियो
00:17:59:18 बनाते हो तो क्या कोई ऐसा फिल्टर लगाते हो कि मेरे वीडियोस को दूसरे संप्रदाय वाले ना देख पाए। इस के बाहर के लोग ना देख पाए। श्री संप्रदाय के ना देख पाए। चलो मान लिया शंकर संप्रदाय तो तुम्हारे लिए अप्रामाणिक है। दुर्जन ऐसे मगर श्री संप्रदाय वाले ना देख पाए। रामानंदी ना देख पाए। अन्य जो वैष्णवाचार्यों से जुड़े हुए भक्त हैं वो ना देख पाए तुम्हारा चैनल। इस विषय में तुमने क्या किया है? और जब तुमने ऐसा कुछ नहीं किया तो तुम ये बात कैसे कह सकते हो कि अन्य गुरुओं को मत सुनो या अन्य संप्रदाय के गुरुओं को मत सुनो।
00:18:36:07 मीठा मीठा गपगप कड़वा कड़वा थू हमारा कोई बाहर ना जाए। बाहर वाला हमारे पास आ जाए क्योंकि चंदा इकटठा करना है। चर्च जैसे मंदिर बनाने हैं नीले नीले इस कौन वो ईश्वर अल्लाह और यहोवा को एक करना है यह मकसद है ना और और सुनो अगर संप्रदाय से बाहर ना जाने की बात है तो तुम्हारे अनुसार चैतन्य महाप्रभु तो मधुबर संप्रदाय के हैं। तो क्यों गए वो श्रीधर स्वामी की टीका को पढ़ने? वो किस संप्रदाय से श्री स्वामी अगर तुम यह भी कह दो कि वो शंकर संप्रदाय के भले ही थे मगर उन्होंने जो टीका लिखा था वो वैष्णव टीका ही लिखा था क्यों अरे वैष्णव भी था तो शंकर संप्रदाय का तो क्यों गए चैतन्य महाप्रभु वहां पर लेने के लिए क्यों सुनने गए दूसरे गुरु को इसका मतलब यदि तुम चैतन्य महाप्रभु का जाना स्वीकार करते हो और यहां पर स्वीकार नहीं करते हो अपने भक्तों का किसी और के पास जाना तो मतलब वहां पर निष्ठा डगमगाने से नहीं है। मतलब वहां अनन्यता से नहीं है। मतलब वहां पर है चंदा कम हो जाने से, भीड़ कम हो जाने से, फॉलोअ
00:19:51:08 कम हो जाने से मतलब है पोल खुल जाने से, बचाना है। हमको तो वर्णाश्रम की धज्जियां उड़ानी है। हिंदुस्तानियों को दोबारा से गुलाम बनाना है। मानसिक तौर पर वैचारिक तौर पर मलच्छों का शासन करवाना है। मलच्छों को गुरु के रूप में पुजवाना है। बाहर से ला लाला करके लोगों को यहां खड़ा कर देना आचार्य के रूप में। हमारा तो यह एजेंडा है। तो दूसरों के पास अगर हमारे अब भक्तगण जाएंगे तो वह लोग हमारे इस एजेंडे को समझ जाएंगे। इसलिए दूसरों के पास नहीं जाना चाहिए। कलेक्शन करते रहना चाहिए। और नहीं तो बताओ चैतन्य महाप्रभु क्यों गए थे श्रीधर स्वामी जी के पास किस संप्रदाय से थे वो उन्होंने वो जो भाष्य लिखा था किस संप्रदाय से वो ज्ञान उनके पास तक आया था और श्री श्रीधर स्वामी के टीके को यदि चैतन्य महाप्रभु प्रामाणिक मानते हैं तो इस में वो टीका क्यों नहीं पढ़ा रहे हो तुम लोग चैतन्य महाप्रभु के अनुसार उस टीके के विरोध में जाकर के उसकी सीमा से बाहर जाकर के जो भाष्य करने का प्रयास करेगा वो वैश्या है भाष्य
00:21:06:09 करने वाला लिखा है तुम्हारी चैतन चरितामृत में तो फिर क्यों नया भाष्य लिखा गया है वहां पर और किसने लिखा है वो और उसको क्या कहा जाएगा चैतन महाप्रभु के अनुसार कुतर्क कुतर्क कुतर्क कुतर्क इज इक्वल टू इस जय श्री राम [संगीत]
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