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00:00:02:12 तो सभी को जय श्री राम। तो इसने लखनऊ में आकर के जो प्रलाप किया था उसका निराकरण तो हम आपको पिछले भाग में दे चुके हैं। अब बात करते हैं इसने जो निगमंद के विषय में हमने जो प्रश्न उठाए थे उस विषय को लेकर के इसने जो विधवा विलाप किया है उस पर हम थोड़ी सी आज चर्चा करेंगे। सबसे पहली बात तो क्या है कि हमने जितने प्रश्न उठाए थे वो सभी प्रश्न वो सभी आक्षेप सत्य सिद्ध हुए। वो बात और है कि इसने बाद में उसमें लीपापोती की है। जैसे कि हमने कहा था कि निगमानंद मां भगवती को अपनी पत्नी के रूप में देखता है। तो इसने माना कि हां देखता था। फिर इसने बाद में अपनी उसमें विवेचना लगा दी कि परमहंस के रूप में देखता था। यह है वो है। ठीक। दूसरी बात कि हमने कहा था कि निगमानंद अपनी पूजा करवाता है। उसकी मूर्ति है। उसके मठ में जाएंगे तो मूर्ति मूर्ति बना करके वहीं पर हमारे रामकृष्ण आदि की मूर्ति भी होती है कहीं-कहीं पर। मगर वहां पर सबसे विशाल काय विशाल मूर्ति मुख्य मूर्ति कभी भी कहीं भी गर्भ गृह में निगमंद की होती है भगवान के रूप में। [संगीत]
00:01:24:24 तस्मै श्री गुरु नम [संगीत] तस्मै श्री गुरु नम [संगीत] और जबकि इस विषय में पूरी के शंकराचार्य जी का वक्तव्य हमें प्राप्त है। जगदगुरु शंकराचार्य जी ने कहा था यदि आपकी अपनी आस्था है तो ठीक है मगर जहां पर हमारे भगवान हमारे देवी देवताओं के विग्रह हैं वहां पर आपको अपनी आस्था हम पर थोपने की कोई आवश्यकता नहीं है। हमारे मंदिरों में आप जॉइ अपनी जिस किसी पर किस जिस किसी व्यक्तित्व में आपको आस्था है उसको हम पर थोपने की आवश्यकता नहीं। उन्होंने यह भी कहा था क्या हमारे यहां आचार्य नहीं हुए एक से एक बड़े आचार्य हुए हैं विश्वामित्र इत्यादि नई सृष्टि बना दी थी उन्होंने तो क्या उतने बड़े हो गए निगमंद जब हमने उनकी पूजा नहीं की मूर्ति बनाकर तो निगमानंद की पूजा क्यों हो साईं की पूजा क्यों हो तो इस विषय में इसने कुछ नहीं बोला है मौन हो गया अच्छा एक हमने बात की
00:02:39:27 थी वर्णाश्रम पर कि वहां पर वर्णाश्रम का विरोध किया जा रहा है जो कि उनके यहां पर हम गए थे पहले तो हमने हमने थ्योरिकली उस चीज को प्रस्तुत किया। फिर हम वहां पर उनके निगमंद के जो प्रामाणिक मठ हैं वहां पर जाकर के जो उसके प्रामाणिक उत्तराधिकारी हैं वहां पर नियुक्त जो प्रामाणिक हैं वहां से निगमानंद की ओर से उनसे जाकर के उन चीजों को हमने आश्वस्त हुए कि भाई हम जो समझ रहे हैं निगमंद ऐसा मानते थे कि नहीं मानते थे। तो उन्होंने कहा ऐसा ही मानते थे। तो वर्णाश्रम के विषय में वह ऐसा मानते हैं कि जाति जो है कर्म से वर्ण जो है कर्म से बदल सकता है। यह निगमानंद वाले मानते हैं। परंतु इसने वर्णाश्रम के संबंध में निगमानंद की व्याख्या बताते हुए यह तो बताया कि निगमानंद को वर्णाश्रम से प्यार है। यह नहीं बताया कि निगमानंद वर्ण वर्ण को कर्म से बदलना मानते थे कि नहीं मानते थे। इस विषय में कोई विवेचना इसने नहीं बताई। जबकि हमने विवेचना बताई किसके द्वारा? उसके प्रामाणिक शिष्यों के द्वारा। और उन ग्रंथों के द्वारा जो प्रामाणिक रूप से उन्हीं प्रामाणिक संस्थानों के द्वारा छापे जाते हैं। जिन प्रामाणिक संस्थानों के द्वारा निगमंद के वो ग्रंथ हमें प्राप्त होते
00:03:54:28 हैं। जिन ग्रंथों को भागवतानंद भी प्रामाणिक मानता है निगमानंद के संदर्भ में। ठीक है? थोड़ा रिवर्स करके देख लेना। थोड़ा हो जाता है। लंबी लाइन हो जाती है कोई भी। तो इसने यह व्याख्या कहीं पर नहीं दिखाई कि निगमानंद ने कहीं पर मना किया हो कि भैया कर्म से वर्ण नहीं बदलता। जबकि इसके ग्रंथों के अनुसार हम ये दिखा चुके हैं कि निगमानंद सबको वेद पाठ में अधिकृत मानता था। स्त्रियों को भी प्रणव का उच्चारण देता था। और इस बात को हमने इस बात को हमने कंफर्म भी किया सत्यापित भी किया निगमानंद द्वारा स्थापित उसके प्रामाणिक मठ में बैठे हुए उसके प्रामाणिक सन्यासी के द्वारा हमने एक प्रश्न उठाया था कि भाई निगमानंद का एनी बेसेंट के साथ गुरु भाई बहन का संबंध है जो कि इसने माना की है। अब वो बात अलग है। इसने उस पर लीपापोती कर दी कि वो पहले गए थे। वो बाद में गए थे। उस पर आगे बात करेंगे। हमने इसको बताया था कि निगमंद ईश्वर अल्लाह को एक करता है। मोहम्मद इत्यादि को भी धर्म की संस्थापना करने के लिए आया हुआ मानता है। और
00:05:13:01 ईसा इत्यादि को भी भगवान या भगवान का अवतार या भगवान का पुत्र इत्यादि बताता है जो इसने अपने वीडियो में माना है। मगर वो बात और है कि इस पर उसने लीपापोती कर दी। तो यह कुछ प्रश्न जो जितने भी आक्षेप हमने लगाए थे या तो उन आक्षेपों को लेकर विदेश यात्रा के विषय में मौन रहा। तो जितने भी आक्षेप जितने भी प्रश्न उठाए गए थे उन सब प्रश्नों पर इसने माना है कि हां हम जो कह रहे हैं वह सही है। मगर उसका अर्थ है या उसका उस पर लीपापोती इसने कर दी है। आगे मगर हमने जो कहा वो असत्य नहीं था। इतना तो क्लियर हो गया। दूसरी बात अब ये आती है कि कई विषयों पे ये मौन हो गया। जिस पर इसने बात ही नहीं की कि भाई निगमानंद अपनी पूजा कैसे करवा रहे हैं या फिर निगमानंद ने विदेश यात्रा के विषय में क्या किया है? अच्छा एक बात और है कि भागवतानंद के जो फॉलोअर्स हैं इसने निगमानंद के विषय में एक बात कह दी कि अब मैं जो है निराकरण प्रस्तुत कर रहा हूं जो शिवश ने जो आरोप लगाए या जो भी प्रश्न उठाए उनके विषय में तो इसको वो कहते हैं इसके अंधभक्त ये ले तेरा खंडन हो गया खंडन किसे कहते हैं पता भी है किसे कहते हैं खंडन
00:06:28:14 मैंने कहा मेरा नाम शिवश नारायण द्विवेदी दी है। तुमने कह दिया मैंने अपने विषय में अपना पहचान पत्र दिखा दिया, पैन कार्ड दिखा दिया। आत पुरुषों से पूछवा दिया। जिन पर तुम्हें विश्वास है उनसे भी पूछवा दिया मेरा नाम क्या है? और तुम कह रहे हो और मैं नहीं मानता। यह खंडन है। यह खंडन है। बेवकूफ कहीं के। और एक बात और कह रहा है कि भाई मेरा तो इतना ही संबंध है निगमंद से कि मैंने तो वहां से उस मंत्र को सत्यापित किया जो मंत्र मुझे स्वप्न में मिला था। अरे भैया वह जो तेरी मां भगवती है कि नहीं है वह इस बात पर निर्भर करता है कि तुझे किसी प्रमाणिक आचार्य ने कहा हो कि हां यह मंत्र है यह मंत्र मंत्र ही है और उसके लिए उसका प्रमाणिक आचार्य होना सिद्ध होता है और उसके लिए उसका अपनी पूर्व की प्रामाणिक आचार्यों की शिक्षा का यथावत पालन करने वाला बताने वाला कम से कम होना आवश्यक है।
00:07:30:21 तो तेरा जो इतना सा संबंध है ना वह जो संबंध है उसी संबंध के आधार पर तो तूने व्यू रचना की है कि मैं निग्र आचार्य हूं क्योंकि मुझे मां भगवती ने वो दिया है मंत्र भगवान ने तो बुद्ध के रूप में आकर के भी ज्ञान दिया था ना प्रामाणिक आचार्यों से वो सत्यापित नहीं हुआ मान्य नहीं हुआ तो तू अपना सत्यापन करा रहा है ना स्वप्न प्राप्ति दीक्षा को अमृतानंद सरस्वती के पास जाकर वह भी है कि नहीं इस दुनिया में वह बाद की बात है। मगर है यदि है तो उससे तू सत्यापन करा रहा है ना तो हम देखेंगे ना कि जिससे तू सत्यापन करा रहा है वो कितना प्रामाणिक है और जिस जिससे वो जिससे तू उसके प्रामाणिक सिद्ध होने की बात कर रहा है फिर हम ये देखेंगे वो कितना प्रामाणिक है और यदि वो प्रामाणिक नहीं है तो उस आधार पर तुझे प्रामाणिक कैसे माना जाएगा तेरी उस भगवती को भगवती क्यों माना जाएगा क्यों ना एक काली शक्ति माना जाएगा तेरे द्वारा जो है प्रामाणिक आचार्यों का विरोध करने के द्वारा सनातन धर्म को नष्ट करने के लिए कार्य कर रही है। तुझे सपना दिया। एक अप्रामाणिक व्यक्ति के पास भेज के सत्यापित करवा दिया अपना सपना और तू पागल हो गया कि मुझे मां भगवती ने बताया उसको भी बता दिया। क्या कारी शक्तियां चमत्कार नहीं कर सकती? जो सनातन धर्म को नष्ट
00:08:46:00 करना चाहती है। तू तो अपने में बोलता है कि इनमें पीर वाणियों में ऐसी शक्तियां होती है जो मुसलमानों से संबंधित होती हैं। तो क्या वो तुझे सपना नहीं दे सकती? तुझे अप्रामाणिक व्यक्ति के पास नहीं पहुंचा सकती। तो पहले तू तय कर ले तेरा संबंध है कि नहीं। तू अगर अपने मंत्र प्राप्त होने को ज्ञान प्राप्त होने को किसी प्रामाणिक परंपरा से जोड़ पाया व्यवहारिक रूप से तब तो तेरा प्रमाण तब तो तू प्रामाणिक सिद्ध हो सकता है। अन्यथा तू प्रामाणिक सिद्धि नहीं हो सकता। कर ले तू 800 ग्रंथ। वो बात और है कि तूने 800 ग्रंथों की सूची तक नहीं प्रदान की है। कौन से 800 ग्रंथ भाई?
00:09:34:07 हम और जिनका तू नाम ले रहा है कि मैंने अपना भगवती का जो मंत्र है वो यहां से सत्यापित कराया है वो प्रामाणिक ही नहीं सिद्ध हो रहे हैं। वर्णाश्रम विरोधी सिद्ध हो रहे हैं। ईश्वर अल्लाह को एक करने वाले सिद्ध हो रहे हैं। मां भगवती को पत्नी कहने वाले सिद्ध हो रहे हैं। अपनी पूजा कराने वाले सिद्ध हो रहे हैं। विदेश यात्रा कराने वाले सिद्ध हो रहे हैं। इसलिए तेरे उस तूने सत्यापित कराया है ना अपने मंत्र को इसलिए उसकी बात की जाएगी तुझसे जोड़कर समझ में आया एनी बेसेंट से संबंध था और तूने कह दिया पहले था बाद में था वो तो कह रहे है बाद तक भी था तो किसकी बात मानी जाएगी जो उसके प्रामाणिक उसके द्वारा नियुक्त प्रामाणिक लोग होंगे और अगर इस तरीके से नहीं माना जाएगा तो विद्या भास्कर जी महाराज की भी बात नहीं मानी जाएगी पूरी के शंकराचार्य जी की भी बात नहीं मानी जाएगी सब तहसनहस कर दो सनातन धर्म टिका हुआ है परंपरा पे हमारे आचार्यों ने क्या कहा यह उनके जो उत्तराधिकारी शिष्य हैं वो बताएंगे उनके जो प्रामाणिक शिष्य हैं वो बताएंगे और इसी तरीके से पीढ़ी दर पीढ़ी ये जो सनातन ज्ञान है वो सुरक्षित रहेगा विशुद्ध रहेगा
00:10:49:20 समझ में आ रहा है कुछ खोपड़ी खोल के सुन लो तो पहले ये तय कर ले कि तुझे अपना संबंध सिद्ध करना है कि नहीं सिद्ध करना। यदि सिद्ध होता भी है तो संबंध तेरा आदि शंकराचार्य जी से शंकराचार्य परंपरा से सिद्ध हो जाएगा। फिर तू शंकराचार्य का विरोध करने वाला कैसे कहेगा? इतना खिचड़ी पकी है ना तेरे में तो और यदि सिद्ध होता भी है तो क्योंकि निगमानंद शंकराचार्य का विरोध कर रहे हैं तो वो प्रमाणिक सिद्ध नहीं होंगे तो तू प्रमाणिक सिद्ध नहीं होगा। और यदि वह प्रामाणिक सिद्ध हो जाते हैं किसी तरीके से दुरंतोष न्याय से तो उनका उसका विरोध करने वाला उसकी शिक्षाओं का विरोध करने वाला तू सिर्फ प्रमाणिक सिद्ध नहीं होगा तो तेरी प्रमाणिकता छिन्न भिन्न हो के रह जाएगी ना तूने एक ऐसे व्यक्ति के साथ अपने आप को जोड़ा है जिसके सिद्धांत तुझसे ठीक विपरीत है अब बात कर लेते हैं
00:11:43:20 आगे इसने क्या कहा है कि तो जरा अपने चेलों को यह बता खंडन किसे कहते हैं और परंपरा किसे कहते हैं यह खुद समझ अगर ना समझ पाए तो हमारा कोर्स चलता है। प्रत्येक रविवार को सुबह 8:00 से नौ क्लासेस चलती हैं। अगर कुछ मामला हो जाए कोई दिक्कत हो जाए तो कभी-कभी थोड़ा आगे पीछे हो जाती है। उसमें आ जा। मैं समझाऊं तुझे परंपरा क्या है? उसकी उपयोगिता क्या है? और कैसे वो हमें बचाती है? धर्म की रक्षा करती है परंपरा। यह सब समझ ले आकर के एक बार और एक इसने कुतर्क और किया है उदाहरण ये व्यक्ति क्या करता है कि अगर मैंने कहा निगमानंद भी तो एनी बेसेंट के पास जाकर के वापस आए थे। मैंने कहा वापस नहीं आए थे। यद्यपि निगमानंद के लोगों के अनुसार अंत समय तक निगमानंद ने कभी भी एनी बेसेंट का विरोध नहीं किया है। वह तो अपनी किताबों में खुद ही लिख रहा है ईसा भगवान। यह खुद बता रहा है भागवतानंद अपने उसमें। मगर फिर भी अभी मान लो कि इसका कहना है कि निगमानंद जो है वह एनी बेसेंट से मिले या उसके सदस्य बने या उससे कनेक्टेड रहे। फिर वहां से वापस आ गए। साधना मार्ग में आने से
00:12:58:21 पहले की बात थी। जबकि पहले की बात नहीं है। साधना मार्ग की बात है। क्योंकि पहले गुरु इनके हुए थे वो तांत्रिक गुरु। दूसरे गुरु हुए इनके क्या कहते हैं? वो ज्ञानी गुरु और तीसरे गुरु हुए थे इनके योगी गुरु और योगी गुरु की योगी गुरु जो थे सुमेर सुमेरू दास उनकी शिष्या थी एनी बेसेंट जो चलाती थी थियोसफिकल सोसाइटी ऑफ इंडिया और सुमेरूदास जो कहते थे मैं अपने अन्य जन्मों में जो है औरंगजेब रह चुका हूं यह रह चुका हूं वो रह चुका हूं धर्म संस्थापना के लिए आते हैं यह सब मोहम्मद इत्यादि यह सब फिलॉसफी है भैया इनकी अगर एनी बेसेंट से डायरेक्ट कनेक्शन नहीं भी है तो सुमेरूदा दास से तो है जो अपने आप को बता रहा है जो जो मोहम्मद को धर्म संस्थापना के लिए आने वाला बता रहा है ये सब चीजें कहां चली जाएंगी
00:13:57:06 वही ना खाता चुनाव चिन्ह छाता जेब में नहीं है टल्ला टिल्ला मांग रहे लाल किला प्रमाणिक कर दो मुझे अरे भैया तुमने हमने जिसके अपने प्रमाण पत्र के लिए जिसको चुना है वही प्रमाणिक नहीं है। इसलिए हम उसको खोद रहे हैं। अच्छा दूसरी बात तो इसने क्या कही इसने सबसे पहले तो अपने आप को अलग दिखाया। भाई मेरा तो इतना सही संबंध है। वो वो रीड की हड्डी है। वो संबंध मुख्य बात है। इसको समझ उसको उसको कुरेदा जाएगा। उससे अपने आप को बचा नहीं सकते हो। और कह चुके हो तो पलट नहीं सकते हो। पलट देना भाई। उसके लिए भी कोई निकालना है। भगवती ने स्वप्न दिया। मैं पलट रहा हूं अब। हम तो जब हमने यह कह दिया कि निगमानंद जो है वो इसकी बात मान लेते हैं और मेरे सामने ये बात रखी गई कि निगमानंद जो है वो कुछ समय के लिए वहां से जुड़े थे। यद्यपि ऐसा है नहीं। वो पूरे समय ही जुड़े रहे और उनकी शिक्षाओं में उनकी किताबों में वो सारी बातें दिखाई देती हैं। थियोसफिकल सोसाइटी वाली ईश्वर अल्लाह एक है वाली। तो वह तो वह जो जुड़े थे अब
00:15:12:16 इसका कहना है कि वह साधना मार्ग में आने से पहले जुड़े थे। तो इस पर यह बात आती है कि विजयश्री भी तो साधना मार्ग में शंकराचार्य की शरण में आने से पहले जुड़ी हुई थी। हम तो यह वहां पर कटाक्ष करता है कि नहीं विजय श्री के मामले में ऐसा नहीं है क्योंकि विजय श्री अभी भी योग का व्यापार करती है। अच्छा भाई सबसे पहले तो यदि योग एक स्त्री व्यायाम के रूप में योग के जो आसन होते हैं वह एक स्त्री यदि नहीं सिखा सकती है तो इसके संबंध में प्रमाण क्या है? वैदिक मंत्र यदि वह अपने पूर्व के जीवन में उच्चारित करती थी योग के समय तो उसने तो अपने जीवन को बदला। वह वर्णाश्रम नहीं जानती थी। प्रणव का उच्चारण के विषय में विधि निषेध इत्यादि मर्यादाएं नहीं जानती थी। शंकराचार्य की शरण में आने से आने के बाद उसने इन चीजों को को लागू किया। तीसरी बात यह है कि यदि किसी की आजीविक को पार्जन का माध्यम केवल एकमात्र वही है कि उसने योग की पढ़ाई की है। उसने योग का प्रशिक्षण प्राप्त किया है और वह योग व्यायाम के रूप में योग सिखाकर अपना घर चलाती है और वह अपने घर में मुख्य आजीव कोपार्जन करने वाली के रूप में भी है। तो
00:16:27:18 वह इसमें आग लगा दे। अपने घर वालों को भूखा मार दे। मगर इस विषय में जब तुमसे तुम्हारा अनुयाई कोई पूछता है कि मैं जॉब इत्यादि के साथ सामंजस्य नहीं बिाल पा रहा हूं तो तुम तो खुद कहते हो वहां पर कि शास्त्र के नाम पर आत्महत्या नहीं कर लेनी है। हम जितने यथासंभव जितना शास्त्र का पालन हो पा रहा है वह करना है। और यदि नहीं कर पा रहे हैं तो क्योंकि हमारी प्रमाण्य बुद्धि है। हमारे मन में इस बात को लेकर के पश्चाताप है कि मैं इतने अंशों में शास्त्र सम्मत नहीं चल पा रहा हूं। जो आज मैं आज प्रासंगिक है तो भी होता है। बात ऐसी है कि
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00:17:05:25 यदि आपके मन में यह ग्लानी हो रही है कि उस नियम का हम पालन नहीं कर पा रहे हैं तो इसका अर्थ है कि आप शोधन की इच्छा रखते हैं और शक्य नियम ही व्यक्ति के लिए ग्राही होता है। यहां तक कि जिन व्रतों में कहा कि निर्जला करे वहां भी अपवाद दिया कि शक्य स्थिति में करे मर ना जावे शास्त्र का नाम लेकर। शास्त्र मरने नहीं कहा है। शास्त्र समुद्र होने का है। मृत्युंग का निर्देश करती है ना कि मर जाओ। तो शास्त्र के वह नियम जो मौलिक है उनका परित्याग तो नहीं कर सकते हैं। जैसे कि सदाचार संयम व्यभचार ना करो और प्राणी पीड़न ना करो मदिरापान ना करो। अब कोई अब वाम मार्ग में दीक्षा ले जाओ तो बाद अलग बात करेंगे हम उसके। लेकिन वहां भी अशोधित का विधान नहीं है। उसमें शोधन कर्म का विधान है। खैर ऐसे नियम जो मूलभूत हैं। फंडामेंटल कहते हैं ना मूलभूत नियम का परित्याग तो नहीं हो सकता है। जिसमें वर्णाश्रम होती है तो जो मौलिक कर्तव्य हो उसमें कोई समझौता नहीं हो सकता है। उसमें तो प्रयत्न पूर्वक अधिकाधिक आपको पालन करना है। कुछ ऐसे नियम जो मौलिक तो नहीं है लेकिन लोकोपकारी हैं। उनमें
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00:18:10:07 अपने सामर्थ्य की सर्वोच्च सीमा तक उनका पालन करना चाहिए। और अगर अपरिहार या अशक्या अवस्था में आप उसका पालन नहीं कर पा रहे हैं तो उस संस में हमारे अंदर यह दोष है हम इससे ग्रस्त है ऐसा स्वीकार करते हुए उसका अधिकाधिक शोधन करने का समय अनुसार प्रयास करते रहना चाहिए और जो आज का ऐसा वातावरण ही बन गया है मगर तुम्हारे साथ पतलूून पहनने वाले खड़े होंगे तुम जाओ जाकर के कोर्ट में कह उनहीं पतलून वाले अधिवक्ताओं के साथ जो है अपना मुकदमा लड़ोगे तो वह सही है। वह शास्त्र सम्मत है। उनको प्रश्रय दोगे तो वह शास्त्र सम्मत है। मगर दूसरा व्यक्ति कोई पतलूून पहन लेगा तो ये देखो पतलून पहनता है। तुम अपने लोगों से कहोगे कि भाई आजीवोपार्जन नष्ट ना करो। हां मूलभूत सिद्धांतों का विरोध ना करो। मूलभूत सिद्धांत क्या है? वर्णाश्रम धर्म। क्या इसका विरोध किया विजयश्री ने? नहीं किया। मूलभूत सिद्धांत क्या है? मूर्ति पूजा क्या इसका विरोध किया विजय श्री में विजय श्री ने नहीं किया मूलभूत सिद्धांत क्या है स्त्रियों का जनेऊ नहीं हो सकता वेदा वेदाधिकार नहीं है वेदा अध्ययन का इसका विरोध किया विजय श्री ने नहीं
00:19:25:15 किया शंकराचार्य की शरण में आने के बाद अब तुम उसके पहले के वीडियो दिखा करके अगर वो अपनी बात को मन सिद्ध करना चाहो तो वो वो तो चल ही रहा है अच्छा तो ये व्यक्ति खुद के अनुयायियों के लिए सब बातें मान लेगा कि भैया या अगर कोई किसी व्यक्ति की व्यवस्था है कि कुछ अंशों में वह शास्त्र का पालन पूर्ण रूप से नहीं कर पा रहा है तो उसको अपने मन में पश्चाताप पूर्वक भावना रखते हुए अपने जीवन को गतीत प्रदान करनी चाहिए ये भावना रखते हुए कि ईश्वर ही कुछ ऐसा करेंगे कि आगे जाकर के शास्त्र सम्मतता पूर्णतया आ जाए क्या भागवतानंद के जीवन में शास्त्र सम्मतता है नहीं है जाने कितने अंशों में वह शास्त्र सम्मत आचरण नहीं कर पा रहा होगा क्योंकि वातावरण ही ऐसा है कार में चल रहा है ब्रेक पैड काहे के लगे हुए हैं? YouTube पर वक्तव्य निर्गत कर रहा है? YouTube के साथ कौन सी संस्थाएं जुड़ी हुई हैं? आलंबन ले रहा है ना यूर्स? YouTube तो है ही है। भगवतन यू आचार्य तो है ही है। तो बहुत से अंशों में तुम भी उस तंत्र से जुड़े हुए हो जिस तंत्र का तुम विरोध करते हो। बहुत से अंशों में तुम्हारे द्वारा भी तुम्हारे अनुयायियों के द्वारा भी बहुत सी चीजें शास्त्र के विरुद्ध हो रही हैं।
00:20:40:16 ठीक है? पर तुम वहां पर अपनी जो सिद्धांत है शास्त्रों का क्या कि शास्त्रों का अनुकरण ना कर पाना अज्ञानता वश अथवा विवशतावश ना कर पाने की स्थिति में यदि आपके हृदय में पश्चाताप की भावना है और शास्त्रों के लिए प्रमाण्य बुद्धि है तो भी आप धर्मज्ञ ही कहलाओगे। यह बात बिल्कुल सत्य है। मगर यह बात यह व्यक्ति भागवतानंद अपने अनुयायियों पर तो लागू करता है। मगर जिनका ऐसे विरोध करना होता है वहां पर यह लागू नहीं करता। वही वाली बात कि जो भी नियम सिद्धांत है अपने अनुसार बदलता है। अपने लिए कोई सिद्धांत दूसरे के लिए कोई सिद्धांत। अब एक उदाहरण वाली बात है कि उदाहरण कहते किसे हैं। थोड़ा समझ ले। यदि मैंने कहा एक बात होती थी कि माता सीता एक बात उठी थी कि एक स्त्री क्या मठ में रुक सकती है? उसका भाई उसके साथ नहीं, उसका पति उसके साथ नहीं है। उसका उसका पिता उसके साथ नहीं है। क्या ऐसी स्थिति में एक स्त्री किसी आचार्य के किसी संत के मठ आश्रम में रुक सकती है? तो इस विषय में पूरी शंकराचार्य जी से एक समाधान प्राप्त
00:21:55:18 हुआ था कि माता सीता भी वाल्मीकि जी के आश्रम में रुकी थी। इस पर कटाक्ष करते हुए यह व्यक्ति बोला था कि माता सीता को तो घर से निकाला गया था। क्या सी क्या विजयश्री को घर से निकाला गया है? मतलब कि इसके अनुसार उदाहरण वही होता है जिसमें किसी भी तरीके से ना देश से ना काल से ना परिस्थिति से कोई अंतर नहीं होना चाहिए। यदि अंतर होगा तो उदाहरण को उदाहरण काट दिया जाएगा। इसका मतलब क्या माता सीता ने अगर अमुक गेरुए कलर की साड़ी पहनी हुई थी तो क्या विजय श्री ने गेरुए कलर की साड़ी पहनी है माता सीता के पति का नाम राम था रामचंद्र थे उनके पति क्या विजय श्री रामचंद्र विजय श्री के पति रामचंद्र हैं तो इन इनका माता सीता का उदाहरण यहां फिर कैसे होगा माता सीता के जो ससुर थे वह तो दशरथ थे और जो पिता थे वो जनक थे क्या वो वो तो अह धरती से प्राप्त हुई क्या विजय श्री के साथ यह सब चीजें लागू होती है? तो इसलिए माता सीता का उदाहरण विजयश्री पर लागू नहीं होता है। बेवकूफ बेवकूफ व्यक्ति पहले समझ ले अगर तेरे हिसाब से चलेंगे तो दुनिया में कोई भी उदाहरण कहीं भी लागू ही नहीं होगा।
00:23:10:28 तो कैसे लागू होगा कि प्रश्न यह है कि स्त्री आश्रम में रुक सकती है कि नहीं बिना भाई पिता अथवा पुत्र के तो उस रुकने के संबंध में सीता माता का उदाहरण दिया है यदि तुम्हें यह सिद्ध करना है कि विजयश्री जैसी स्त्री नहीं सिद्ध कर सकती तो उस संबंध में तुम्हें प्रमाण देना होगा हां कि हां अगर अमुक लक्षण है स्त्री का अगर वो अगर वो ऐसी है तो ही रुक सकती अगर वह ऐसी नहीं है तो नहीं रुक सकती या वो ऐसी है तो नहीं रुक सकती ऐसी है तो रुक सकती है इस संबंध में तुम प्रमाण प्रस्तुत करो ना स्त्री के किसी संत के आश्रम में रुकने के संबंध में हमने उदाहरण प्रस्तुत कर दिया पूरी के शंकराचार्य जी ने समर्थन दे दिया प्रमाणिक आचार्य वो वो वाले आचार्य जिनकी परंपरा का नाम तुम्हारे द्वारा प्रमाणिक माने जाने वाले पीठ आचार्यों के द्वारा भी प्रमाणिक मानी जाती है। ठीक है। इसी प्रकार से इसने क्या किया कि निगमानंद जी निर्दोष हैं क्योंकि वह थियोसफिकल सोसाइटी में जाकर वापस लौट आए थे साधना मार्ग में आने से पहले और विजय श्री साधना मार्ग में आने के बाद भी योग का
00:24:26:02 व्यापार कर रही है। तो इसने क्या जोड़ दिया कि उसके जीवन में भले ही उसने प्रणव का उच्चारण त्याग दिया हो। भले ही उसने गायत्री मंत्र त्याग दिया हो। भले ही उसने वर्णाश्रम का पक्ष लिया हो। भले ही उसने स्त्री के जनेऊ का विरोध किया हो। भले ही उसने ये जो सनातनावासी संस्थाएं हैं इसका विरोध किया हो। परंतु क्योंकि वह व्यायाम के रूप में योग की शिक्षा प्रदान कर रही है। अपने आप को आचार्य नहीं कह रही है और अपने परंपरा प्राप्त आचार्य से इस बात की उसने अनुमति भी ले ले रखी है। परंतु क्योंकि वह भागवतानंद की समर्थक नहीं है। इसलिए वह अभी भी गलत ही कहलाएगी। यह इसका उदाहरण है। तो सबसे पहले में हमने क्या तीन चीज पकड़ी है? खंडन, परंपरा और उदाहरण क्या होता है? इस विषय में भागवतानंद को भागवतानंद के चेलों को हमारे पास आकर के अध्ययन कर लेना चाहिए। हां, जब हम अध्ययन करा देंगे, उपयुक्त तर्क इत्यादि प्रस्तुत कर देंगे तो हो सकता है भागवतानंद के भागवतानंद का जो वस्तुनिष्ठ ज्ञान है, कहां क्या लिखा है इस संबंध में उस ज्ञान में अच्छा है वो। तो वह उस तर्क के समर्थन में चीजें निकाल लेगा। यह बात अच्छी है। मगर तर्क और प्रमाण के अनुसार आपको अभी यह
00:25:41:06 ज्ञान नहीं है कि उदाहरण किसे कहा जाता है। इसको समझिए। ठीक है? सारी चीजें लागू हो जाएंगी तो अद्वैत की स्थिति हो जाएगी। भैया फिर तो कोई दूसरा है ही नहीं। तो उदाहरण की जरूरत कहां पड़ती है? उदाहरण इस बात में दिया गया है कि क्या कोई स्त्री मठ में रह सकती है कि नहीं? उदाहरण इस बात में दिया गया है कि मलेच्छराज की किसी संस्था के द्वारा यदि जुड़ा होने के बाद भी निगमानंद के वापस आ जाने पर तुम उसको निर्दोष मानते हो तो विजय श्री के पूर्व के जीवन के कारण उसका जो आज शंकराचार्य की शरण में वो आने के बाद अपना यथा सामर्थ्य वो यथा सामर्थ्य भी तुम्हारे द्वारा स्वीकार रहे उसके अनुसार जब वह अपना जीवन जी रही है तो तुम उस पर आपत्ति कैसे उठा सकते हो दिक्कत यह है कि तुम अब आपत्ति उठा चुके हो और बंदूक से निकली गोली और जुबान से निकली गोली वापस नहीं जाती। वही तुम्हारे साथ है। अब तुम चाह करके भी पीछे नहीं आ सकते हो और आ भी जाओगे तो कोई फायदा नहीं होगा क्योंकि वो बहुत देर हो चुकी। हमने तो शुरू में ही कहा था कि इस बात को मत खींचना। तीन बार हमने वीडियो बनाते समय इस व्यक्ति के लिए जी लगाकर बात की। इसका जो लौकिक नाम इसको जाना जा रहा था। निग्रहचार्य के रूप में वह भी कहा। निग्रहाचार्य जी कहा इसके
00:26:56:07 लिए। पहले वीडियो में तो इसका नाम भी नहीं लिया। अप्रत्यक्ष रूप से इसने इसने जो आक्षेप लगाए थे एक स्त्री पर उन आक्षेपों का निराकरण प्रस्तुत कर दिया। दूसरे वीडियो में इसके लिए जीजी लगाकर बात की। तीसरे वीडियो में इसके लिए जीजी लगाकर बात की। मगर इसने अपने वीडियो में क्या कहा? तेरे जैसों के लिए हम ऐसे ही बात करेंगे। तू तड़ाक। इसने अपने वीडियो में क्या कहा कि तूने हमें लाइव में नहीं लिया नहीं तो मैं तेरा करियर खा जाता। अब तू है कौन? मिल तो सही जरा कहीं
00:27:29:27 आमने सामने की चर्चा जब करेगा ना तो यह जो भ्रम है ना तेरा टूट जाएगा और इसीलिए तू भागता फिर रहा है और इसीलिए तेरा नाम भागतानंद उचित दिखाई देता है खैर ये तीन बातें हमने जान ली उदाहरण खंडन और परंपरा इन विषयों में थोड़ी अध्ययन करो प्रायोगिक उसकी उपयोगिता को भी समझो क्या होती है परंपरा अब बात आती है कि इसने क्या लीपापोती की है? तो पहली बात आ जाती है मां भगवती को पत्नी मानने के रूप में इसने लीपापोती की है कि वो परमहंस भाव को प्राप्त हो गए थे। परमहंस भाव को प्राप्त हो जाना मतलब मुक्त हो जाना। क्या मुक्त हो जाने के बाद किसी को पत्नी की आवश्यकता पड़ती है? क्या नहीं पड़ती है। अच्छा कहां का सनातन सिद्धांत है कि आप कौन से मोक्ष को प्राप्त कर लेंगे? कौन सी स्टोरेज को प्राप्त कर लेंगे तो आप मां भगवती को पत्नी मानने लग जाए। कौन सा सनातन सिद्धांत है? अरे इससे तो अच्छे हैं इस वाले। कम से कम मां भगवती को पत्नी तो नहीं बना रहे हैं ना। ईश्वर अल्लाह एक कर रहे हैं तो वर्णाश्रम विरोध कर रहे हैं तो
00:28:41:20 अपनी पूजा तो नहीं करवा रहे। वहां मंदिरों में कृष्ण का ही स्वरूप बनाया है ना वहां पर। शर्म भी नहीं आती इस तरह की बातें करते हुए परमहंस भाव को प्राप्त हो गए तू भी करेगा यही जो मां भगवती तुझे पढ़ाने आ रही है जिनको तू मां मां कह रहा है उनको तू आगे चलकर के कहेगा कि वो मेरी पत्नी है और हमारे भगवानों के बीच में निगमानंद की मूर्ति बनाकर के पूजा हो रही है अब ये कहेगा भाई इसके साथ ही साथ विदेश यात्रा वर्णाश्रम धर्म इन विषयों में निगमानंद के द्वारा स्थापित जो उसके प्रामाणिक लोग हैं मठ हैं आश्रम है वहां से गलत सूचना दे रहे हैं। मगर भागवतानंद जो अपने अनुसार जो व्याख्या कर रहा है वो व्याख्या सही है। तीन बेर खाती थी वो तीन बेर खाती है। इस पंक्ति में बेर शब्द दो बार आया है। एक बार कहा जा रहा है एक रानी की व्यथा बताई जा रही है कि वह अपना जब वह समृद्ध थी तो दिन में थ्री टाइम्स इन ए डे खाती थी। दिन भर में तीन बार खाती थी और अब वो दिन भर
00:29:56:26 में तीन बेर खाती है। सिर्फ थ्री फ्रूट्स इन ए डे। थ्री टाइम्स इन ए डे। थ्री फ्रूट्स इन ए डे। बेर शब्द से ही दो बार दोनों बार अलग-अलग अर्थ ले लिया। अब कोई दूसरा आए। अब यह जो व्यक्ति है इस पंक्ति को लिख के इसने अपने उत्तराधिकारी को अपने प्रामाणिक शिष्य को बताया। उसने कहा कि दोनों शब्द तो दोनों बार तो बेर ही है। फिर उसमें अलग क्या हो गया? फिर आपने दो बार क्यों लिखा? तो उसने बताया कि एक बार वो तीन बेर खाती थी। एक बार वो सिर्फ तीन वो बेर नामक जो फल है वो खा रही है।
00:30:34:19 तो अब कोई दूसरा आएगा। वो रानी की जो व्यथा है उसको बदल देगा। क्या कहेगा कि वह पहले तीन बेर खाती थी। अब वह तीन बेर खाती मतलब पहले थ्री फ्रूट्स इन ए डे था और अब उसका बाद में थ्री टाइम्स इन ए डे हो जाएगा। तो उसकी बात मान ली जाए जो भी बाहर से आ रहा है। तो कहने का मतलब यह है कि अगर इस प्रकार से हम इसने जो कहा कि निगमानंद के विषय में मेरी व्याख्या को मानो और उसके द्वारा बता जो स्थापित जो उसके आश्रम है और उन आश्रमों में नियुक्त जो वहां के पदाधिकारी हैं या प्रामाणिक रूप से वहां के सन्यासी हैं, उत्तराधिकारी इत्यादि हैं उनकी बातें मत मानो। मेरी बातें मानो। यदि इस विधा का आलंबन ले लेंगे तो दुनिया में कोई भी व्यक्ति उसकी किसी भी बात को जिसको हम बुरा समझते हैं, अच्छा समझते हैं, हम उसके ठीक विपरीत विवेचना कर सकते हैं। मोहम्मद भी अच्छा था। उसके लोग जो हैं इस्लाम को आज जो बता रहे हैं, वो गलत बता रहे हैं।
00:31:43:10 प्रभुपाद भी अच्छे थे। आज के जो इस वाले हैं गलत बता रहे हैं। प्रभुपाद तो वर्णाश्रमी थे। प्रभुपाद ने कभी नहीं कहा ईश्वर अल्लाह है। तो उसके लोग बता रहे हैं। हां मोहम्मद को कई लोग अच्छा बताते हैं इस वाले ही और यही तर्क देते हैं कि मुसलमान जो है वो गलत बताते हैं मोहम्मद के बारे में यही तर्क देते हैं मोहम्मद को अच्छा करने के लिए तो अच्छा हो गया मोहम्मद फिर वो मलेच्छराज कहां चला जाएगा तुम्हारा
00:32:16:26 तो ये इस कौन से कॉपीट चीज है कि भैया वो अच्छे थे मगर उनके आज के लोग गलत बता रहे हैं तुमको कैसे पता चला उनके आज के लोगों से ही तो उनके अस्तित्व का बोध है तुम्हें। निगमानंद की जिन किताबों को यह प्रामाणिक मानता है। ज्ञानी गुरु हां ये तांत्रिक गुरु यह प्रेमिका गुरु हां ये किताबें कहां से छप रही हैं? यह किताबें छप रही हैं आपका असम वांगीय सारसत मठ बंगाल आसाम बंगाल सारसत मठ यहां से छप रही है और उनहीं और उनहीं संस्थानों से छपने वाले जो अन्य ग्रंथ है निगम तत्व इत्यादि वो मान्य नहीं होंगे वही वाली बात है कि रामानुजाचार्य जी ने क्या कहा ये वो नहीं बताएंगे रामानुजाचार्य जी के प्रमाणिक शिष्य ये कौन बताएगा भागवतानंद फिर तो जाकिर नायक भी बताएगा फिर तो वो भी बताएगा आचार्य प्रशांत फिर तो आर्य समाज भी बताएगा फिर परंपरा की उपयोगिता क्या रह गई
00:33:23:08 उसी प्रामाणिक संस्थान से जहां से तुमको तांत्रिक गुरु प्राप्त हो रहा है जहां से तुम्हें ज्ञानी गुरु प्राप्त हो रहा है वहीं से तुम्हें निगम तत्व प्राप्त हो रहा है और अन्य जो पुस्तकें हैं जिनसे जिनके संदर्भ के आधार पर जो है ये निगमनंद पर सारे जो चीजें हैं वह सिद्ध होती हैं कि वह सनातन धर्म का कितना अनुसरण करता था कितना नहीं करता था और तुम अन्यों को छोड़ दोगे वहां के वहां के जो निगमंद के द्वारा जो नियुक्त 11 वो जो सदस्य थे उनको माना नहीं जाएगा। निगमानंद ने क्या कहा क्या नहीं कहा। ये निगमंद के द्वारा नियुक्त जो 11 सदस्य हैं वो नहीं बताएंगे। भागवतानंद बताएगा जो निगमानंद से किस प्रकार से जुड़ा हुआ है कि कोई काल्पनिक कैरेक्टर या फिर या फिर कोई अज्ञात कैरेक्टर जिसको कोई जानता मानता नहीं है निगमानंद के यहां उससे भागवतानंद ने मंत्र लिया है। इसलिए अब भागवतानंद निगानंद ने क्या कहा क्या नहीं कहा ये भागवतानंद बताएगा। तो इस प्रकार से तो मुसलमानों के विषय में भी इस वाले जो बताएंगे वो वो माना जाएगा। मुसलमान जो बताएंगे वो नहीं माना जाएगा। तो वो कह रहे हैं मोहम्मद अच्छे मान लो। कुरान कुरान की मैक्सिमम शिक्षाएं बहुत सारी शिक्षाएं जो हैं वह हमारे जो धर्म ग्रंथ है उनसे
00:34:38:12 मिलती हैं। लेकिन उसमें आज जो लोग कुरान पढ़ते हैं जिसमें मैक्सिमम चीजों को कन्वर्ट कर दिया गया बदल दिया गया जिसकी शिक्षाओं को कहीं भी कुरान कहीं पर हिंसा करने की अनुमति नहीं देता। है ना? अच्छा इसमें अब ये बात आती है कि जैसे हम लोग ये क्लेम करते हैं कि जो कुरान में जो शिक्षाएं हैं वो बदल दी गई है या कुछ ऐसा क्लेम करते हैं या वो समझ नहीं पा रहे हैं वास्तव में ऐसा है और उसके ये है तो जैसे हम एक तरफ कहते हैं कि ज्ञान परंपरा से आता है। ठीक है? तो अगर हम कुरान को सही से जानते हैं। हां या बाइबल को सही से जानते हैं। तो वो जो कुरान वाली बुक का ज्ञान है वो हमारे पास किस परंपरा से आया जो हम क्लेम कर रहे हैं उसे ज्यादा सही से जानने की बल उन लोगों की अपेक्षाकृत जिनके पास वो परंपरा से आ रहा है। हां ऑब्वियस है मोहम्मद पे जैसे मोहम्मद जी ने जब आए तो कुरान कंपाइल हुई उनके जाने के बाद उसके बाद वो पीढ़ी दर पीढ़ी जो चेन ऑफ नरेशन उनकी चल रही है वो लोग जो क्लेम कर रहे हैं कि नहीं हमें मोहम्मद जी ने ये बताया है मगर हम क्लेम कर रहे हैं नहीं नहीं यहां पे मुसलमान गलत समझ रहे हैं हम सही समझ रहे हैं तो हमें कुरान का ज्ञान परंपरा से किस तरह से प्राप्त हुआ जो हम क्लेम कर रहे हैं कि नहीं तुम गलत जान रहे हो हम सही जान रहे हैं तो देखिए हमें परंपरा से प्राप्त हुआ क्योंकि शीला प्रभुपाद ने
00:35:53:13 ऐसे कई ऐसे कई जितने मौलवीज़ थे या उस समय जो धर्माधिकारी थे वहां के उनसे कई बार उनसे बात हुई। इसी तरह से कई पादरियों से बात हुई। जब उनसे बात हुई उनकी व्याख्याओं पर गहन चर्चा हुआ तो पता चला कि आप जो कह रहे हैं इसमें आपको कंफ्यूजन है क्या आप इसके अर्थ को कहीं गलत तरह से एक्सप्लेन तो नहीं कर रहे हैं? नहीं नहीं बात ये आती है कि अगर कुरान का जो चैन ऑफ़ नरेशन से जो आ रहा है या बाइबल का जो आ रहा है हम अगर वो ये कह रहा है कि नहीं ये जो ईश्वर है कुरान का वो निराकार है हम तो फिर हम उस पे ये क्लेम कैसे कर रहे हैं कि नहीं वो निराकार नहीं है वो साकार है तुम शब्दों का अर्थ नहीं समझ पा रहे हो हम समझ रहे हैं जबकि हमें वो परंपरा से प्राप्त नहीं है हमारी परंपरा तो गुरु परंपरा इधर है मधवाचार्य जी की वहां से कुरान का कोई ज्ञान आया नहीं है तो फिर हम वहां कैसे क्लेम कर सकते हैं कि नहीं तुम गलत समझ रहे हो तो हम उसमें हस्तक्षेप कर ही नहीं सकते ऐसा कुरान में कहीं नहीं लिखा हुआ है कि जो अल्लाह है वो निराकार है। उसमें कई जगह ऐसा लिखा हुआ है जैसे आपको एक छोटी सी बात बताता हूं। जी छ 150 में लिखा हुआ है हां कि उसकी कोई संतान नहीं हो सकती। यहां यहां जो ईश्वर है वो अपूर्ण हो गया। हां क्योंकि उसमें अभाव आ गया किसी चीज का बाद। अब और हमारे जो ईश्वर है वो कहीं से भी कितनी भी
00:37:08:16 संताने निकाल दे। निकाल सकते हैं। बिल्कुल बिल्कुल। तो वो पूर्ण ईश्वर है। हां। तो वो तो एक डिफरेंट आ गया कि अल्लाह और कृष्ण एक नहीं है। मगर हम ये कह रहे हैं कि अल्लाह और कृष्ण एक है। क्योंकि हम ये कह रहे हैं कि तुम कुरान का अर्थ नहीं समझ पा रहे हो। अब कुरान में ये लिखा है छ 150 में कि मेरी कोई संतान नहीं हो सकती। जबकि जबकि मेरी कोई पत्नी ही नहीं है। तो हम ये क्लेम कैसे कर रहे हैं फिर कि नहीं हमें कुरान ज्यादा समझ में आती है। तुमको नहीं। जब वहां पे कुछ शब्द ऐसे हैं जो ईश्वर को बाध्य कर रहे हैं। है ना? उसका भी अर्थ हम ऐसा कर रहे हैं कि नहीं हम जो कह रहे हैं वो सही है और तुम जो कह रहे हो वो गलत है जबकि हमारे पास कुरान का परंपरा से ज्ञान नहीं आया। तो मैं ये कैसे कहूं कि 610 में जो लिखा हुआ है वो परंपरा से आया है। क्योंकि कुरान को आप जानते कहां से हो? कुरान एक्सिस्ट कैसे कर रही है आपके? आपकी जानकारी बताइए। उन्हीं से कुरान को आज आप जानते हैं कुरान हम उनसे ही जानते हैं। तो फिर तो फिर जो कुरान के लिए ये कह रहा है कि 650 में ऐसा लिखा है उसको हम डिनाई नहीं कर सकते। अगर हम जी आप इस तरह से अगर आप देखेंगे तो आज लोगों ने आज हमारे शास्त्रों में सनातन धर्म के कई शास्त्रों में लोगों ने फेरबदल कर दिया। तो परंपरा से हम पहचान लेंगे ना। हमारे गुरु हैं। परंपरा से बता देंगे। उसी तरह से हमारी परंपरा में हमारे गुरु महाराज ने हमको ये बताया इसलिए हमको हम मानेंगे ना। कुरान हमारी
00:38:23:18 परंपरा में नहीं है ना। कुरान हमारी परंपरा लेकिन हमारे गुरु महाराज तो परंपरा में है ना उनकी वाणी पर तो हमको भरोसा करना होगा भाई कुरान भाई क्योंकि उन्होंने डिस्कस करके ये बताया अगर उन्होंने ये डिस्कस करके बताया तो हमें ये मानना होगा क्योंकि गुरु परंपरा से क्योंकि इंफॉर्मेशन आप उनकी परंपरा में घुसने मैं नहीं जाऊंगा मैं अपनी परंपरा में ही बात करूंगा क्योंकि मुझे नॉलेज कहां से आता है मेरी परंपरा से पूछ रहा हूं श्रील प्रभुपाद जी के पास कुरान का किस परंपरा से ज्ञान आया है जो वो ये क्लेम कर रहे हैं कि श्लोक है कि नहीं है जो भी है अब ये बात भाई ये बात मुझे इस तथ्य की एक्स सिर्फ जानकारी नहीं प्रभुपाद के पास यह एक चीज़ बताइए कि बिना परंपरा के क्या ज्ञान प्राप्त हो सकता है? मानते हैं तो क्या कुरान का ज्ञान बिना परंपरा के आ सकता है? नहीं। तो इसका मतलब कुरान पे हम क्लेम नहीं कर सकते कि उसमें उसमें तुम जो कह रहे हो वो नहीं जो हम कह रहे हैं वो लिखा है क्योंकि हमारी कोई परंपरा नहीं है कुरान से जुड़ी हुई। हमें वही मानना पड़ेगा जो कुरान जब प्रभु जी एक लाइन खड़ी कर लूं। जो जो हमें कुरान दे रहा है उसी पर हमको रिलाई करना पड़ेगा कि भाई तुम जो कह रहे हो 60 अगर कुरान को हम एक्सिस्टेंस मानते हैं तो उसकी लिखी हुई वही बातें माननी पड़ेगी जिससे वो कुरान आ रही है। एक्सक्टली अभी हमारे मेरे बहुत सारे ऐसे मित्र हैं जो मुस्लिम है या फिर ऐसे इस
00:39:38:24 में बहुत सारे फॉलोअ हैं जो कि मुस्लिम से आज सनातन धर्मी हो गए हैं। ठीक है ना? यदि हम उनसे बात करते हैं जब हम उनसे यही हिंदी अनुवाद जो आप 6 150 की बात करते हैं तो कहते हैं ऐसा नहीं है। यदि आपको एग्जैक्ट चाहिए तो आपको अरबी भाषा में इसे पढ़ना पड़ेगा। हमारे ऐसे मुस्लिम भाई हैं जिन्होंने इसको बताया है कि आप हमें यहां पर जो परोसा जा रहा है वो गलत तरीके से परोसा जा रहा है। ऐसे प्रभुपाद जी की गुरु परंपरा के कुछ नाम बता दीजिए थोड़ा सा दो चार पांच कुछ भी जी श्रीला प्रभुपाद के गुरु महाराज भक्ति सिद्धांत ठाकुर उनके गुरु महाराज गौर किशोर दास बाबा जी महाराज उनके गुरु महाराज भक्ति विनोद ठाकुर उनके गुरु महाराज जगन्नाथ दास बाबा जी महाराज तक अब कुरान की परंपरा बताइए थोड़ी सी कुरान की परंपरा मुझे नहीं पता तो फिर हम उसको ढूंढे ना जो कुरान का परंपरा प्राप्त व्यक्ति हो और उसकी बात को माने ना कि ऐसे कि किसी ने कह दिया कि वहां उर्दू में लिखा है अरबी में लिखा है तो बहुत ऐसे तो हमारे मेरे लिए ज्ञान का स्रोत मेरी परंपरा होगी। हां और मेरी परंपरा मेरे गुरु महाराज हैं और मेरे गुरु महाराज शकरशीला प्रभुपाद ने कहा है तो मैं ये बात एक्सेप्ट करता हूं। तो फिर हमें जानना होगा ना कि आपके गुरु श्रील प्रभुपाद जी ये बताते हैं कि व्हाई आई एम ऑथेंटिक बताते हैं ना क्योंकि उन्होंने अपनी परंपरा बताई। अगर वो कुरान का ज्ञान होने का दावा कर रहे हैं तो उन्हें अपनी परंपरा बतानी पड़ेगी ना कुरान का ज्ञान कैसे आया उनके पास में?
00:40:55:01 ठीक है। ये तो फिर ये एक चर्चा का विषय है। एक एक मतलब एक ऐसा विषय है जिस पर हम थोड़ा सा लंबा चर्चा कर सकते हैं। बिल्कुल। तो परंपरा की फिर आवश्यकता क्या है? भाई क्यों कह रहे हो कि मेरी ये परंपरा है। मत कहो परंपरा। परंपरा का अर्थ तो यही है कि परंपरा से जो होगा वही अपनी परंपरा में क्या कहा गया है वो बताएगा। तो तुम पहले निगमानंद से अपना संबंध सिद्ध करो। प्रामाणिक रूप से सिर्फ अनुयाई नहीं प्रामाणिक वक्ता अनुयाई तो बहुत होते हैं। प्रामाणिक वक्ता कौन है? प्रामाणिक वक्ता है। वह जो बोल रहा है वह बात मानी जाएगी निगमानंद के विषय में। और उसने बोला है कि निगमानंद इनको धर्म संस्थापना हेतु आने वाला मानते थे। मोहम्मद इत्यादि को ईसा को भगवान मानते थे। ईश्वर अल्लाह एक है मानते थे। वर्णाश्रम का वर्णाश्रम को जो है कर्म के अनुसार बदलने वाला मानते थे। विदेश यात्रा मानते थे। अपनी पूजा करवाते थे। यह सब संस्थान छाप रहे हैं किताबें। खूब छप रही है। तुम्हारी बात क्यों मान ली जाए? अब दूसरी बात एक आ जाती है कि इसने यह माना। यह हमने बता ही दिया कि कहीं पर भी कोई ऐसा सनातन संविधान नहीं है कि अमुक स्थिति
00:42:10:07 में वो उसको प्राप्त हो जाएंगे। परमहंसत्व को तो वह पत्नी के रूप में अपने को देखने लगे। अपनी मूर्ति पूजा कराने लगे। यद्यपि मुझे अभी तक यह प्राप्त नहीं है। कि शंगेरी पीठ के किस मान्य शंकराचार्य ने इनको परमहंस की उपाधि दी थी। ठीक है? प्राप्त हो जाएगा। बाद की बात है। हो सकता है दी हो। मगर अगर उपाधि दे दी उसके बाद वो जाकर के शास्त्र विरुद्ध और परंपरा विरुद्ध गुरु विरुद्ध कार्य करे तो उससे उसका उसके उन कार्यों को प्रमाणिक नहीं मान लिया जाएगा। क्योंकि शंकराचार्य ने उन्हें अपना उत्तराधिकारी नहीं घोषित कर दिया कि मेरी शिक्षा को यह बताएगा। मैंने क्या कहा, क्या नहीं कहा। तो इसलिए अगर उसको परम परमहंस की उपाधि प्राप्त भी हुई थी किसी कारण से मुझे आदित्य वाहिनी का कोई पदाधिकार प्राप्त हो गया मैं जाकर के आदित्य वाहिनी के विरोधाभासी कार्य करने लगूं तो मेरे कार्य को प्रमाणिक मान लिया जाएगा क्या क्योंकि आदित्य वाहिनी की ओर से मुझे उत्तराधिकारी के रूप में नियुक्त नहीं किया गया है। मैंने अगर दीक्षा ले ली शंकराचार्य जी से और मैं जाकर के शंकराचार्य जी के विरोध में ही बात करने लगूं और लोग मुझे आकर के बताएं तुम शंकराचार्य जी का विरोध कैसे कर रहे हो तो कहा जाए कि शंकराचार्य जी ने शंकराचार्य जी ने ही तो इसको दीक्षा दी है दीक्षा दी है कोई अपना उत्तराधिकारी नहीं नियुक्त कर दिया है इसीलिए
00:43:25:10 परंपरा होती है निगमानंद किसी भी प्रकार से शंकर संप्रदाय के प्रामाणिक उत्तराधिकारी या शिष्य नहीं है प्रामाणिक वक्ता नहीं है जो उनकी बातों को इसलिए मान लिया जाए सही क्योंकि भैया उनको परमहंस की उपाधि दी गई थी। वह बात और है कि अभी परमहंस की उपाधि दी गई थी कि नहीं दी गई थी यह भी विवेचना का विषय है। दूसरी बात आती है कि आफ्टर ऑल यह देखा जाएगा कि परम परमहंस अगर कह भी दिया है भी तो कौन सा सनातन सिद्धांत है कि उसके बाद मां भगवती को पत्नी के रूप में देखने लगो। और इसने एक बात कही या अपनी मूर्ति की पूजा करवाने लगो। अपने नाम जप को दे दो। जय गुरु जय गुरु जपो मेरी पूजा करो। अब इसने एक जगह क्या कहा है? इसने एक जगह यह तक कह दिया है कि मुसलमानों ने निगमानंद ने अपनी पुस्तक में कहा है जिसका समर्थन इसने का करा है। कैसे करा है वो मैं बता रहा हूं। निगमानंद ने कई जगह पर मुसलमानों के लिए कहा है कि वह धर्म सबसे श्रेष्ठ धर्म सनातन है और ये मुसलमान इत्यादि जो धर्म है ये जो है आधुनिक है। तो सबसे पहले तो निगमानंद ने मुसलमान इत्यादि को इस्लाम इत्यादि को धर्म कहा है।
00:44:40:12 ईसा को भगवान कहा है। इस्लाम और क्रिश्चियनिटी को उसने द्वैत मूलक बताया है। मतलब वह द्वैत हमारा द्वैत है और यह सब द्वैत परक है। द्वैत परक बताया है। मतलब जो हमारे यहां के संप्रदाय हैं तो वह सब इसने वही उन्हीं का दूसरा रूप इस्लाम इत्यादि बता दिया है। मोहम्मददी और ईसाई धर्म भी द्वैतवाद मूलक है। अवेकी सामान्य जनों की नास्तिकता नष्ट कर भक्ति के उत्कर्ष साधन के लिए ही द्वैत मतानुसार उपदेश प्रदान करना होगा। उसके बाद उसमें अद्वैत की प्रतिष्ठा होती है। इसने रामकृष्ण परमहंस का उदाहरण भी दिया है। विवेकानंद के गुरु जिनका विरोध इसने इस व्यक्ति ने भागवत आनंद ने किया है अपनी सीरीज में और
00:45:33:22 निगमानंद ने सन्यास द्विजों के द्वारा सन्यास धारण किया जाएगा। मतलब जरूरी नहीं ब्राह्मणी करे। द्विजों के द्वारा सन्यास धारण किया जाएगा। यह बात भागवत ने अपने वीडियो में मान ली है। ठीक है? अब मुसलमान इत्यादि को सम्मान देना या फिर ईसा को भगवान कहना इस संबंध में भागवतानंद ने एक समाधान प्रस्तुत किया है। हम वो समाधान क्या है कि निगमानंद ने अपने ग्रंथ की शुरुआत में अपनी किताब की शुरुआत में ही यह लिखा है कि इसमें मैंने पाश्चात्य जो पंडित जन है उनकी भी चीजों को उनके भी संदर्भों को लिखा है। मगर उनका अनुवाद नहीं किया है क्योंकि जो हिंदी भाषी हैं जो अंग्रेजी नहीं जानने वाले हैं उनका काम उसके अनुवाद को जाने बिना भी चल जाएगा। यदि वो अंग्रेजी नहीं जानते हैं तो उसका अर्थ जाने बिना भी उनका काम चल जाएगा। तो मैंने उनका अनुवाद नहीं किया। इसी में आगे वह लिखते हैं कि दोषांश को त्याग कर यदि दोषांश को त्याग कर सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ इसे पढ़ेंगे तो आप जो है कल्याण को प्राप्त होंगे तो मुझे अच्छा लगेगा। ऐसा वहां पर इसने कहा। तो इसका मतलब
00:46:48:28 है इसने यह कहा कि निगमंद की पुस्तकों में जो दोषांश है उसको हटा के पढ़ना है। तो पहली बात तो यह है कि तुलसीदास जी ने भी अपने आप को बहुत बड़ा मूर्ख कहा है जिसको रामपाल वाले कहते हैं कि तुलसीदास तो मूर्ख है। फिर उनकी बातों को प्रामाणिक क्यों मानोगे? तो कई बार जो लेखक होता है वह अपने आप अपनी तुच्छता को प्रदर्शित करने के लिए इस प्रकार की पंक्ति लिखता है। अपना जो बड़प्पन है वह दिखाने के लिए भी लिखता है। जैसे हमें जैसे यहां पर निगमानंद ने इसी कारण से यह लिखा है। जिस प्रकार से इसने कहा कि एक ठप्पा चाहिए होता है। भागवतानंद ने अपनी वीडियो में कहा कि जिन लोगों की सनातन धर्म शास्त्रों में आस्था नहीं है उन लोगों को एक विदेशी ठप्पा चाहिए होता है। एक तरीके से वही इस वाली बात कि उनको अपने में मिलाने के लिए जो है हम ऐसा करते हैं कि ईश्वर अल्लाह एक है। तो विदेशी ठप्पा चाहिए होता है। तो इसलिए निगमानंद जी ने वो बातें लिखी हैं। सनातनी धर्म शास्त्रों के प्रति अनास्था से युक्त है। जिनको एक व्यस्त ठप्पा चाहिए होता है कि नहीं यह बात जब तक विदेश से प्रमाणित होकर नहीं आएगी
00:48:04:07 हम नहीं मानेंगे। उन मूर्खों के दुर्जन तोष न्याय के लिए उतने अंश को डाला। लेकिन जो पाठक गण हैं जो अपने भारतीय हिंदू समाज के वो उसको दोषांश को ना ग्रहण करें उसका परित्याग करके पढ़ें इसलिए उसका अनुवाद भी अलग से नहीं किया गया और यदि उसके ग्रंथ में दोष है तो क्या निगमानंद ने स्पष्ट रूप से कौन सी चीज दोष है दोषपूर्ण है और कौन सी चीज दोष रहित है यह व्याख्या की है अपने किसी उसमें ग्रंथ में निगमानंद जी की किताब जब कोई विदेशी पढ़ रहा है तो तुमने माना है कि सनातन शास्त्रों में उसकी अनास्था स्था है तो जब कोई विदेशी उनकी बात पढ़ रहा है तो उसके अनुसार तो दोष किसमें है सनातन शास्त्रों में तो वो तो जो वो जिसको तुम दोषांश मान रहे हो जिसको तुम दोषांश मान रहे हो उसके लिए तो वही दोष रहित है तो वो तो निगमानंद की बुक पढ़ के अपना कल्याण नहीं कर पाएगा अकॉर्डिंग टू यू अकॉर्डिंग टू निगमानंद वो बुक कल्याणकारी है तो जो दोषांश कहते हैं कि यदि मुझसे कहीं कोई भूल चूक हो गई हो भाई तो उस पर ध्यान मत देना। उसको छोड़ के पढ़ लेना और जो है इस तरह से मगर यदि तुम निगमानंद को अपना गुरु मानते हो, निगमानंद की किताब को अपना प्रमाण मानते हो तो तुम्हें उसकी
00:49:19:10 किसी भी बात में दोष नहीं दिखाई दे सकता। यही सिद्धांत है। देगा। यदि उसकी कोई एक बात दोष पूर्ण हो सकती है तो फिर उसके द्वारा प्राप्त होने वाला मंत्र जो उसके द्वारा प्राप्त होने वाला वो ज्ञान जो स्वामी अमृतानंद सरस्वती को हुआ और जिस ज्ञान के आधार पर प्रामाणिक होने के कारण उसने तुमको स्वप्न में प्राप्त मंत्र को सत्यापित किया उसकी प्रामाणिकता सिद्ध नहीं होगी। भाई निगमानंद ने स्वामी अमृतानंद सरस्वती को जो ज्ञान दिया था वह दोष रहित था कि दोष पूर्ण था। यदि किसी पर हमें डाउट है तो फिर हमें उसकी सभी चीजों पर डाउट है। उसका फिर सत्यापन कहीं और से होगा। इसको ऐसे समझो कि यदि हमको
00:50:12:07 निगमंद की लिखी हुई बातों में यह लग रहा है। निगमंद ने कह दिया दोषपूर्ण चीजों को छोड़ देना। तुम्हारे हिसाब से अवैदिक चीजों को छोड़ देना। जबकि उसने वहां क्लेरिफाई नहीं किया अवैदिक चीजों को छोड़ने की बात कर रहा हूं। उन्होंने तो एक बात कही है कि कहीं अगर मैंने कोई गलती कर दी हो तो उस पर ध्यान मत देना। बाकी चीजें पढ़ लेना। ठीक है? इसका मतलब यह नहीं है कि उन्होंने यह माना है कि ईसा भगवान है तो गलत गलत हो गया। उन्होंने झूठ कह दिया उसको ना। उन्होंने अपनी तुच्छता को प्रदर्शित किया है कि भाई मुझसे पौरुष के दोष के कारण कहीं कोई गलती हो गई तो उस पर ध्यान मत देना। अपना कल्याण कर लेना। मगर उन्होंने ईशा को भगवान कहा है। यह उन्होंने वहां क्लेरिफाई नहीं किया कि ईशा को भगवान मानना दोषपूर्ण है। मोहम्मद को धर्म संस्थापना करने वाला मानना दोषपूर्ण है। तो यदि तुमको दिख रहा है कि उसके कार्यों में दोष हो सकता है। तो तुम्हारे पास जो नियमावली है जिन गुरुओं से प्राप्त जिनके आधार पर तुम ये जांचोगे कि निगमानंद ने कहां पर दोष पूर्ण कहा है। कहां पर दोष रहित कहा है वह तुम्हारे गुरु सिद्ध हो जाएंगे और 100 की सीधी एक बात निगमानंद झूठ बोलने वाले तो सिद्ध हो ही गए ईसा भगवान सन्यासी झूठ नहीं बोलेगा झूठ बोलने वाले सिद्ध
00:51:27:13 हो गए झूठ बोल रहा है ना सन्यासी एक इन्होंने बात लिखी जिस पर आपत्ति हो सकती है क्या ये लिखते हैं भगवान ईशा ने अपने शिष्यों को सब कुछ बेचकर गरीबों में वितरण करके फकीर बनने का उपदेश दिया है और बाइबल का संदर्भ दे दिया हं तो बाइबल का जो संदर्भ दे दिया और फारसी शायर हाफिज का एक दिया है संदर्भ तो क्या यह ग्राह्य है? तो निगमानंद का सन्यासत्व भंग हो गया। जब सन्यासत्व भंग हो गया तो उसका उसके द्वारा दिया जाने वाला ज्ञान अप्रामाणिक सिद्ध हो गया। जब अप्रामाणिक सिद्ध हो गया तो उसके द्वारा प्रामाणिक कहे जाने वाला जो अमृतानंद सरस्वती जिसको तुम कह रहे हो वह भी अप्रामाणिक सिद्ध हो गया। और जब वह अप्रामाणिक सिद्ध हो गया तो उसके द्वारा सत्यापित होने वाला जो मंत्र है देवी भगवती का जो तुमने अपने स्वप्न में प्राप्त किया है वह भी अप्रामाणिक सिद्ध हो गया। तो तुम तय कर लो कि निगमानंद के ग्रंथ में तुम्हें दोष दिख रहा है कि नहीं दिख रहा है। ठीक है? सनातनी धर्म शास्त्रों के प्रति अनास्था से युक्त है। जिनको एक व्यस्त ठप्पा चाहिए होता है कि नहीं यह बात जब तक विदेश से प्रमाणित होकर नहीं आएगी हम नहीं मानेंगे। उन मूर्खों के दुर्जन तोष न्याय के लिए उतने अंश को डाला। लेकिन जो पाठक गण हैं जो
00:52:42:24 अपने भारतीय हिंदू समाज के वो उसको दोषांश को ना ग्रहण करें। उसका परित्याग करके पढ़े। इसलिए उसका अनुवाद भी अलग से नहीं किया गया। ये सब क्यों दिए? ताकि जिनको विदेशी ठप्पा ही चाहिए वो विदेशी ठप्पा के माध्यम से ही सही लेकिन कुछ समझ लें, सीख लें। इस भाव से कहा कुरान जिसमें मोहम्मद पैगंबर साहब ने कुरान को जो यहां पर ले आए। उन्होंने कहा मैं मैसेंजर हूं। मैं एक संदेश वाहक हूं। किसका? उनका भगवान का। उन्होंने भी अपने आप को भगवान के पुत्र के रूप में स्थापित किया। मैसेंजर के रूप में, उनके दूत के रूप में आप कुछ भी कह लीजिए। जी। तो उन्होंने स्थापित किया तो इस कौन मानता है कि वे थे तो भगवान के मैसेंजर लेकिन आपने कहा ना वो अश्रद्धालु वाली बात है। तो ये उस ऐसे समुदाय के लिए इस ज्ञान को लेकर आए जो समुदाय भगवान को पूर्ण रूप में समझने के लायक नहीं था या पूर्ण रूप से नहीं समझ पाया। तो उन्होंने कुछ क्रियाकलाप सिखाए, कुछ नियम सिखाए क्योंकि ये अरब कंट्रीज से शुरू हुआ। उस जगह से शुरू हुआ जहां पर लोग भगवान को जानने का प्रयास ही नहीं कर रहे थे या भगवान को समझ पाने में सक्षम नहीं थे। क्वेश्चन ये था कि कुरान के द्वारा पूजा किसकी हो रही है? क्योंकि हमने जो जैसे कि इस के जो डिवोटीज है उनको सुना भी है और कुछ बुक्स भी है तो उसमें कहा जाता है कि कृष्ण और अल्लाह
00:53:58:02 और जो क्राइस्ट है बाइबल का ईश्वर ये एक ही है वो लोग नहीं जानते बात अलग है तो इसमें आपका क्या कहना है मैं इस बात पर इसमें कैसे संदेह हो सकता है जब मोहम्मद पैगंबर साहब ने कहा कि मैं भी उन्हीं परमात्मा का उन्हीं का मैसेंजर हूं बस उन्होंने नाम बदल कर बताया शायद लोग ना मानने को तैयार रहे हो इसलिए उन्होंने नाम बदल कर बताया है ना तो बिल्कुल यदि आपके अंदर श्रद्धा है तो बिल्कुल अल्लाह को आप कह सकते हैं कि वो कृष्ण के स्वरूप हैं लेकिन अल्लाह बस वो जानते नहीं है क्योंकि अल्लाह उन्हीं कृष्ण उन्हीं राम उन्हीं के अंश हैं। अब उनकी अनभिज्ञता है जैसे कई बार बच्चे को टेबलेट लड्डू के अंदर मिलाकर खिलाई जाए ताकि वह बच्चा खा ले कि कुरान की यदि आप शिक्षाओं को एज इट इज फॉलो करें तो आप भी कहीं ना कहीं आप कुछ स्टेप आगे बढ़ेंगे इस भक्ति पथ पर। तो सर ये क्यों कह रहे हैं कि कृष्णा क्यों छाप रहे हैं किताब में? ये तो लोगों की श्रद्धा सबसे पहले लोगों को एज इट इज चीजों को समझाने के लिए मैंने कहा उनका ज्ञान अधूरा है लेकिन सनातन धर्म का ज्ञान पूरा है। देखिए मैथमेटिक्स में जब ने क्या बच्चा छोटा रहता है उसको बोला जाता है कि बड़े संख्या से छोटा संख्या जा सकता है मतलब माइनस हो सकता है। लेकिन
00:55:13:08 वो उसको अगर कहा जाए दो माइनस अगर तीन अगर कहा जाए बोले इंपॉसिबल संभव ही नहीं है बोलेगा वो अरे भाई हमारे टीचर ने नहीं क्या हमको बोला है कि बड़े से नहीं क्या छोटा जाता है छोटे से बड़ा जाता नहीं तुम पागल हो गए हो वो हमको उल्टा गाली देगा तो अब क्या होगा कि अब चलो ठीक है कि तू प्राइमरी बच्चा है अब आगे पढ़ेगा तो नो डाउटली कोई एक टीचर तो आएगा ना पढ़ाने के लिए तेरेको जब नहीं क्या हमारे जैसे टीचर वहां पे जाएंगे उसको बोलेंगे कि बेटा अभी तेरा पढ़ाई हो गया। अब ज्यादा पढ़ आगे चल के पढ़ेगा कि 2 3 -1 होता है। उनके कुरान के हिसाब से उनको जो भी ज्ञान है थोड़ा बहुत उनको भगवान बोले तो कोई है ये तो उनको पता है। अब नहीं क्या हम जाके उनको बताते हैं। अरे बेटा तुम जो भगवान या अल्लाह जिसको मानते हो अब नहीं क्या उससे भी नहीं क्या थोड़ा आगे जानो। अल्लाह ने क्या ऐसा भी हो सकता है वो उसका नाम भी है उसका नाम है कृष्णा तो फिर उनको समझ में आ जाता है जिसको समझ में आ जाता है वो फिर से सनातन धर्म में फसा जाता है वो फिर माला करने लगता है जप करने लगता है सब कुछ करता है पर कोई व्यक्ति अगर नहीं क्या उसका मानसिक इतना कमजोर
00:56:28:09 है कि वो शास्त्र को अभी मानने के लिए योग्य नहीं बना है जिसका स्थिति इतना अभी नहीं है कि जो शास्त्रों को मानने के योग्य हुआ है तो उसको क्या करते हैं पहले थोड़ा मनुष्य बनाते हैं और यह जो तर्क है यह रामपाल वाले अनेकों बार जैसे वो वाला तर्क है ना कि मोहम्मद भी अच्छे थे वो तो उनके अनुयाई गलत बता रहे हैं स्कन से उठाया है और यह वाला जो तर्क है कि हमें जितना अच्छा लगेगा जितना हमारे अनुसार होगा उतना हम ले लेंगे और जितना हमारे अनुसार नहीं होगा उतना हम नहीं लेंगे यह तर्क जो है रामपालियों का है हम उनसे पूछते हैं कि भाई जब तुम किसी को सद ग्रंथ कह रहे हो तो उसकी एक एक बात को मानोगे कि नहीं मानोगे हमारे अनुसार हम लेंगे। इसका मतलब तुम्हारा अनुसार कुछ है। वो अनुसार कहां से आया? और तुम्हारा वास्तविक गुरु गुरु वो सिद्ध होगा जो तुम्हारा अनुसार जहां से आ रहा है। वो सिद्ध नहीं होगा जिसमें तुम दोष दृष्टि रख सकते हो। गुरु कौन है? अद्वैतिका उपनिषद। गु का मतलब गुरु का मतलब अंधकार और रू का मतलब निकालने वाला। अंधकार से निकालने वाला गुरु होता है। यह पहले ही बता चुके हैं अनन्य ग्रंथों से भी कि दोषांश का नीरछ विवेक से परित्याग कर दें। मैं मैं आपको गीता लाके
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→ Used in: B · Video रामपाल को शास्त्र सम्मत कहने वालों के गाल पर जोरदार तमाचा at 11:17 ↗
→ Used in: B · Video सतलोक आश्रम में 2023 की ज्ञान चर्चा at 29:12 ↗
00:57:40:12 दूंगा मान लोगे क्या? मैं गीता ला के दूंगा मान लोगे। जितना मेरे मानने का तो ये ये किस परिमाप पे निर्धारित होगा? कितना मानने के लायक है? इसका पैरामीटर क्या है? मतलब भाई किसी किताब से कितना मानना है, कितना नहीं मानना किस पे आधारित है? प्रैक्टिकल पर। क्या प्रैक्टिकल है? जिस चीज का प्रैक्टिकल हो वही सही है। नहीं सब तो प्रैक्टिकल के नियम क्या है? प्रैक्टिकल के नियम उसी में दिए हैं। उसी में दिया है नियम। क्या नियम? किस में दिया है? आपकी में गीता में रामायण में हां तो प्रैक्टिकल के नियम तो यह है कि राम जब जन्म लेगा तो वशिष्ठ के पास जाएगा। उसके अनुसार भ्रमण मिलेगा। कबीर अपने गुरु का ज्ञान नहीं दे रहे हैं। आपके हिसाब से वो अपना ज्ञान दे रहे हैं। तो इसका अर्थ क्या हुआ? प्रैक्टिकल का नियम खारिज हो गया। वेद को वेद को पूरा मानते हो अधूरा मानते हो? इसका जवाब दो पहले। वेद को जो अच्छा लगता है वो मानता हूं। गीता मानता हूं। गीता गीता गीता हमारे लिए अगर आप अगर आप शास्त्र की बात करें तो हमारे लिए सिर्फ एक ही है जो प्रमाणित है कबीर सागर।
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00:58:42:00 तो यदि तुम्हारी दोष दृष्टि हो रही है। निगमानंद के विषय में तो तुम्हारा उस पर उसमें प्रमाण्य बुद्धि होना सिद्ध नहीं होता। यदि उसमें प्रमाण्य बुद्धि नहीं है तो उसके द्वारा उसकी परंपरा में आने वाले उसके शिष्य का उसके शिष्य में तुम्हारी प्रमाण्य बुद्धि होना सिद्ध नहीं होता तो फिर तुम्हें भगवती ने तुम्हारे अनुसार जो मंत्र दिया है वह काली कोई शक्ति नहीं है कोई नकारात्मक शक्ति नहीं है तुम्हें उल्लू बनाने वाली तुम्हें मूर्ख बनाने वाली कोई शक्ति नहीं है यदि और तुम उसको सत्यापित करा रहे हो जो प्रमाणिक सिद्ध नहीं होता वह अमृतानंद सरस्वती से तो उसके द्वारा सत्यापित होने वाला तुम्हारा मंत्र जो है वह सत्यापित होना सिद्ध नहीं होता तो तुम्हें मिलने वाला जो मंत्र है वह प्रामाणिक सिद्ध नहीं होता। मंत्र देने वाली भगवती प्रमाणिक सिद्ध नहीं होती तो तुम्हारा निग्रचारत्व प्रमाणिक सिद्ध नहीं होता। यह कारण है दोषांश वाली बात का इसको समझो।
00:59:44:28 और एट द एंड यह रामपाल और स्कॉन के कुतर्क लेकर के यहां मत आया करो। कुछ लाओ ऐसा जिसका निराकरण प्रस्तुत करने में थोड़ी मेहनत लगे। बच्चों जैसा खिला रहे हैं। जाने कितने समय से इनको तर्कों को ध्वस्त कर रहे हैं। देख लेना कभी चैनल अगर किसी को सद ग्रंथ कह रहे हो तो सो सद ग्रंथ है। उसमें लिखी हुई बातें सत्य हैं। और दोषांश रहित की बात अगर कर लोगे जैसे वो वाली बात है ना कि भाई किसी की भी बारे में कोई भी बता सकता है। है ना? परंपरा से कि निगमानंद के बारे में उसके प्रामाणिक जो शिष्य हैं वो नहीं बताएंगे। भागवत आनंद बताएगा। तो इस प्रकार से तो मोहम्मद के बारे में भी मुसलमान नहीं बताएंगे। कोई इस वाले बताएंगे। मोहम्मद अच्छा हो गया। विवेकानंद के बारे में भी सब लोग दूसरे बताएंगे। वो अच्छा हो गया। दुनिया में कोई भी गलत सिद्ध नहीं होगा। उसी प्रकार से उसी प्रकार से दोषांश रहित ग्रहण करने पर तो तुम किसी की भी किसी पर भी
01:00:51:15 कटाक्ष करने वाले सिद्ध नहीं हो पाओगे। दोश को रहित करके ग्रहण करो। राजेंद्र दास जी महाराज की अवेलना तुमने क्यों की? दोश को रहित करके ग्रहण कर लो। फिर तो किसी पर कुछ मत बोलो। और यदि सब पर तुम बोल रहे हो दो होने के कारण तो इनका निग्रह कब करोगे अपने निगमानंद का? ये सड़ी हुई बातें क्यों की आपने? हमारी आप में प्रमाण्य बुद्धि नहीं है। अब हमारा भगवती का मंत्र जो है उसको कहां से सत्यापित करवाते डोले? निग्रह करो। अरे तुम्हारे हिसाब से कम से कम उनके आज के जो मठ इत्यादि है वह तो गलत प्रचार प्रसार कर रहे हैं सनातन धर्म के नाम से उसका निग्रह तो करो भाई तुमने तो वो भी नहीं किया है करो निग्रह तुम ज्योतिष पीठ वाले महाराज जी से कहते हो कि भैया पीएन मिश्र जी तुम्हारे संप्रदाय का हो के ऐसा ऐसा कर रहा है तुम चुप क्यों हो तुम खंडन करो अरे भैया तुम्हारे संप्रदाय के लोग निगमानंद का संप्रदाय तुम्हारा ही तो है तुम्हारे संप्रदाय के लोग विदेश विदेश यात्रा कर रहे हैं। विदेश यात्रा को सही ठहरा रहे हैं। अपने गुरु की भगवान बनाकर के पूजा कर रहे हैं। मां भगवती को जो है पत्नी के रूप में स्थापित कर रहे हैं। वर्णाश्रम का विरोध कर रहे हैं। कर्म के अनुसार बदल जाने वाला मान रहे हैं।
01:02:07:08 हम और ईश्वर अल्लाह एक कर रहे हैं। तुम क्यों नहीं बोल रहे हो अपने तंत्र के विषय में? ये सब बातें कहां है? क्या कुतर्क की है तुमने? वर्णाश्रम के विरोध में यह दिखा दिया बहुत बड़े वर्णाश्रमी थे। वर्णाश्रमी से प्यार करने वाले तो इस भी दिखाई देगा, आर्य समाज भी दिखाई देगा। परंतु वो जो ट्विस्ट है कि वो कर्म से मान लेते हैं वर्ण वर्ण को या कर्म के आधार पर बदलना मान लेते हैं। वो वो चीज को सॉर्ट आउट करो ना। तुमने निगमानंद के विषय में क्या दिखाया कि वो वर्णाश्रम का समर्थन करते थे। वर्णाश्रम का समर्थन तो इस भी करने का दावा करता है। परंतु वर्णाश्रम का स्वरूप क्या मानता है कि कर्म के आधार पर वो चेंज हो जाएगा। इसी तरीके से हार समाज है। तो तुमने इस विषय में कोई व्याख्या दी क्या कि वो ऐसा नहीं मानते थे कि कर्म से वर्ण चेंज हो जाएगा।
01:03:07:08 कुल मिलाकर के ईश्वर अल्लाह एक वाले विषयों में तुमने कोई उदाहरण प्रस्तुत नहीं किया। वही इस के कुतर्क रख दिए। रामपाल के कुतर्क रख दिए। ऊपर से तुम यह दावा कर रहे हो कि निगमानंद के बारे में उनके प्रमाणिक संस्थान जहां से छपी हुई किताबों को मैं प्रमाणिक मानता हूं। उन प्रमाणिक संस्थानों से बताई जाने वाली व्याख्या को मैं नहीं मानता। तो आर्य समाज में और तुम में क्या अंतर रह गया? हम अच्छा तुमने एक जगह एक बात और कही है कि एनी बेसेंट का तो मैंने खुद से वो किया है। खंडन किया है। मेरा उससे कैसे संबंध होगा? अगर मुझे मैं नाटक के स्वरूप में जिसके साथ में संबंध रखता हूं मेरा संबंध सिद्ध होता है उसके साथ मैं लड़ाई कर लूं तो यह चलेगा क्या अगर तुम एनी बेसेंट का खंडन कर रहे हो तो तुम्हारा निगमांद के निगमानंद के साथ संबंध सिद्ध नहीं होता निगमंद के द्वारा तुम्हारे मंत्र का सत्यापन सिद्ध नहीं होता और यदि तुम निगमंद के द्वारा निगमानंद की परंपरा में आने वाले किसी व्यक्ति के द्वारा अपने मंत्र का सत्यापन सिद्ध कर रहे हो तो तुम्हारे द्वारा एनी बेसेंट का खंडन सिद्ध नहीं होता ये दोनों बातें आपस में विरोधाभासी समझे मिस्टर लल्लू लाल
01:04:18:12 जाओ और मेहनत करो थोड़ी दोषांश दोषांश रहित होकर लो दोषांश रहित होकर ले लो सबकी शिक्षा है आईएस आईएस के जो आतंकवादी है ना वो भी दिन भर में किसी व्यक्ति को पानी पिला देते होंगे तो उसके उसका भी समर्थन ले लो उससे भी अपने मंत्र को जो है वो सत्यापित करा लो दोषांश रहित दो वाले चीजों को त्याग दो जिसमें हमारी दोष दृष्टि हो सकती है वह हमारे लिए प्रमाण नहीं है। इस बात को समझ ले बेवकूफ। हमारा प्रमाण वही है जिसमें दोष दृष्टि नहीं हो सकती है। प्रमाण बुद्धि होनी चाहिए। और इसीलिए गुरु है। गुरु में प्रमाण्य बुद्धि होनी चाहिए। तभी उससे मिलने वाले मंत्र और ज्ञान पर हमारा विश्वास होना सिद्ध होता है। अगर हमारी उस पर प्रमाण बुद्धि नहीं है। दोश हम उसमें देख रहे हैं तो उसके द्वारा मिलने वाले ज्ञान और मंत्र इत्यादि विषयों में हमारी प्रमाण्य बुद्धि होना सिद्ध नहीं होगा। गचो
01:05:20:19 जय श्री राम सभी को। [संगीत]
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भागवतानंद का निगमानंद पर प्रलाप । इस्कॉन व रामपाल जैसी संस्थाओं द्वारा प्रशिक्षण
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