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00:00:02:00 अब मैं अतिथि वक्ता हमारे शिवान जी से अनुरोध करूंगा कि कृपया अपने वक्तव्य से हमें कृता [प्रशंसा] करें यहां उपस्थित जितने भी धर्म भाव से धर्मा भाव यहां पर बैठे हैं उन सभी का सादर नमस्कार उनको यथोचित अभिवादन मेरी ओर से अभी तक मैंने देखा कि मंच पर जितने भी हमारे गुरु भाई हैं या फिर जिनकी मध्यस्थता से जिनके सहयोग से कार्यक्रम आयोजित हो सका है इन सभी ने अपने अपने भाव के द्वारा मेरा परिचय आपको प्रदान किया पर उस परिचय में मुझे एक थोड़ा सा अभाव लगा वो शायद इन सभी के जो मेरे प्रति भाव है उनके कारण था पर जो मैं अपना परिचय समाज में ख्या पित करना चाहता हूं वह वह परिचय नहीं था जो इनके द्वारा आपको दिया गया तो सर्वप्रथम ज मैं अपने परिचय से ही इस वक्तव्य

00:01:17:09 की वक्तव्य का प्रारंभ करना चाहूंगा मेरा नाम शिवांश नारायण द्विवेदी है और मैं पुरी के शंकराचार्य जी का एक अल्पज्ञ शिष्य हूं अल्पज्ञ कृपा पात्र शिष्य में अल्पज्ञ अगर नहीं जोड़ेंगे तो कहीं ना कहीं ऐसा समझा जा सकेगा कि उनके पास जो असीम ज्ञान का भंडार है उसका काफी एक बड़ा भूभाग मेरे पास होगा मगर ऐसा नहीं है मैं उनका एक अल्पज्ञ शिष्य हूं और अगर इससे अधिक मेरा और कुछ परिचय हो सकता है तो प्रभु श्री राम का एक साधारण सा भक्त हूं साधारण कोई ऐसा विशेषज्ञ नहीं है मेरे पास जो मुझे कहीं पर किसी विशेष प विशेष सभा में य इनका सबका भाव है जो इन्होंने प्रकट किया उसके लिए मैं आभारी हूं अब मैं जो अपना वक्तव्य दे रहा हूं आप लोगों को और हम लोग यहां क्यों एकत्रित हुए हैं उस पर सीधे आता हूं मुख्य विषय पर देखिए मैं तीन सूत्रों में अपनी बात को आपके सामने रखूंगा पहला सूत्र समस्या दूसरा सूत्र है समस्या का कारण और तीस सूत्र है उसका समाधान

00:02:32:26 समस्या कारण और समाधान इस शैली में मैं आपके समक्ष अपना वक्तव्य रखने वाला हूं तो समस्या क्या है जब तक हमें समस्या मालूम नहीं होगी तब तक हम उस समस्या के निवारण के लिए प्रतिज भावना क्यों लाएंगे अपने मन में समस्या यह है कि आज अपने आसपास जब हम दृष्टि डालते हैं तो धर्म का लोप बहुत तेजी से हो रहा है फिर वह भले ही समलैंगिक विवाह को लेकर के हो लिविन रिलेशनशिप को लेकर के हो या फिर अन्यतम अनेका अनेक प्रकार से धर्म का लोप समाज में जो धर्म का स्तर है लोगों के बीच में वह गिरता जा रहा है इसका कारण है कि भागवत में एक वचन आया है कि मैंने तुम्हें मध्य मास और मैथुन इन तीन गुणों से युक्त करके बनाया है यह भगवान का वचन है भगवान ने जो मनुष्य की प्राणी मात्र

00:03:47:28 की रचना की है तो भगवान ने ही उनके अंदर तीन चीजें डाली है मध्य मास मैथुन मगर इस यह जो आपकी स्वाभाविक प्रकृति है इस धर्म का नियंत्रण लगाकर ऐसे इनका जो परव सान है इनका जो नियोजन है ऐसे कार्यों को करना उनका नियोजन उन कार्यों में करना जिनसे कि ब्रह्म की प्राप्ति हो सके मुक्ति की प्राप्ति हो सके उन कार्यों को हम धर्म कहते हैं अर्थात कभी भी हमें गलानी नहीं आनी चाहिए कि हमारे अंदर यह तीन चीजें कहां से आ गई जो तामसिक प्रवृत्ति है वो कहां से आ गई गलानी नहीं आनी चाहिए मगर उस तामसिक प्रवृत्ति का नियोजन हम क कर रहे हैं उस प्रवृति का प्रवृत्ति को हम एमप्लीफाई कहां कर रहे हैं कहां पर उसको व्यवहारिक रूप से यूज कर रहे हैं उस प्रवृत्ति को यही धर्म है अगर हमने शास्त्रो चित तरीके से इन प्रवृत्तियों का नियोजन किया तो वह धर्म कहलाएगा और शास्त्र के विरुद्ध जाकर के इस प्रवृत्ति का नियोजन किया तो वह अधर्म

00:04:52:22 कहलाएगा अब धर्म और अधर्म का युद्ध क्यों है दुनिया में यह भी हमें समझना है समस्या को जान गए जब हमें पता चल गया कि हमारे अंदर पशु की प्रवृत्ति है तो दो तरह के लोग उसम उस यह जानने के बाद बाहर निकलते हैं एक जिन्होंने माना कि हां यह प्रवृत्ति मेरे अंदर है और इसको इस पर मैं धर्म की लगाम लगा कर के इसका जो परव सान है वह भगवत प्राप्ति में कर दूंगा या मोक्ष में कर दूंगा या ब्रह्म प्राप्ति में कर दूंगा एक तो इस प्रकार के लोग निकलते हैं और यह ने के बाद दूसरे प्रकार के लोग निकलते हैं कि नहीं हम तो अपनी इस प्रवृत्ति को ही पूरी तरीके से पोषित करेंगे हम तो यह जो व्यभिचार आदि के जो गुण हमारे अंदर आ रहे हैं कामा सक्त हम हो रहे हैं धर्म विरुद्ध हम हो रहे हैं हम इसी को पोषित करेंगे तो दो दो प्रवृत्ति के लोग जब बाहर निकले तो उसमें से एक हो गया धर्म और दूसरा हो गया अधर्म अब ये जो अधर्म वाले हैं इनको धर्म वालों से परेशानी है इसका उदाहरण है यदि कहीं पर कोई चार मदिरा पान करने

00:06:07:27 वाले व्यक्ति बैठे होंगे उनके बीच कोई यदि दूध पीने वाला व्यक्ति होगा तो मधरा पान वालों को दूध पीने वाले से समस्या होगी यही धर्म और अधर्म के बीच की युद्ध है अब धर्म और अधर्म को और ज्यादा हम मूल में देखें तो धर्मेन हीना पशु भी समाना जिसके पास धर्म नहीं है उसके पास सामने खड़ी हुई तीन स्त्रियों में से कौन माता है कौन बहन है कौन पत्नी है इसमें से किसको किस प्रकार देखना है इसका कोई आधार नहीं है जिसके पास धर्म नहीं है अर्थात धर्म के मूल में है मानवता और अधर्म के मूल में है पशुता तो जब ये दो तरह के लोग निकलते हैं तो मानवों से पशुओं का युद्ध है उसी युद्ध को दूसरे शब्दों में कहते हैं धर्म का अधर्म से युद्ध है धर्म को रक्षा कर धर्म की रक्षा करनी है किससे अधर्म से मानवता की रक्षा करनी है किससे पशुवैद्यकीय

00:07:29:14 चे आते समय आंख बंद कर लेता है मगर वो नीचे तो आएगा ही इसी प्रकार से हमारा जो आम जन समाज है वो इससे मुंह अवश्य फेर सकता है कि चलो ठीक है यह सब हमारे आसपास हो रहा है हमारे घर में तो नहीं हो रहा है मगर शौक आश्चर्य झटका उसे उस दिन लगता है जब उसके बिल्कुल निकट उसके घर में उसके किसी सगे संबंधी के आसपास यह सब घटनाएं घटित हो जा हो जाती है अब बंगाल का जो दृश्य है वो यहां बैठे सभी महानुभाव मुझे अपेक्षा है कि वह सभी उनको मालूम होगा कि बंगाल में क्या हो रहा है वहां पर जो हिंदुत्व है उसको नष्ट करने का पूर्णतया प्रयास किया जा रहा है अब मैंने बताया कि प्रयास होता क्यों है क्योंकि जब तक हिंदुत्व जीवित है तब तक हम अपने

00:08:29:15 हिंदुत्व जीवित है वह धर्म और ब्रह्म के संबंध में वह मूल शिक्षा देता रहेगा जिसके कारण से कोई भी व्यक्ति उससे प्रभावित होकर के हमारा शत्रु बन जाएगा जो लोग अपने पशुवैद्यकीय घर में सौतन होती है जिस स्त्री की कोई सौतन होती है वह स्त्री अपने जीवन में दुख भगती है मन में दुख होता है अगर किसी स्त्री की कोई सौतन होगी तो उसको दुख होता है तो यहां पर शिक्षा दे दी गई कि स्त्री की सौतन नहीं होनी चाहिए एक विवाह की शिक्षा यहां पर दे दी गई प्रोत्साहन दे दिया गया इसके बाद मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम आते हैं रामो विग्रहवां धर्मः वाल्मीकि रामायण 33713 में श्री राम धर्म का साक्षात स्वरूप है क्या करना है क्या नहीं करना है तो जो जो राम ने किया सब धर्म और जो जो राम के विरुद्ध है सब कुछ अधर्म तो उन्होंने क्या किया जब सूपनखा उनसे कहने

00:09:44:20 गई कि मुझे अपना लो पत्नी रूप में तो उन्होंने कहा नहीं मैं एक पत्नी व्रत धारी हूं मैं तुम्हें नहीं अपना सकता तो उन्होंने जो वेद की वह शिक्षा थी उसको आगे बढ़ाया इसीलिए उनको मर्यादा पुरुषोत्तम कहा गया अब हमारे यहां पर शिक्षा दे दी गई है एक नारी सदा ब्रह्मचारी मगर किसी को यदि यह शिक्षा अच्छी नहीं लगती है तो वह क्या करें अपनी उन इच्छाओं को पोषित करने के लिए एक से ज्यादा विवाह करने के लिए वह क्या करेगा उसके पास दो रास्ते हैं या तो वह यह कहेगा कि मैं भगवान को मानता ही नहीं हूं जो यह कह रहा है एक से ज्यादा विवाह करो और या फिर वो यह कहेगा कि मेरे पास एक और भगवान आए थे तो ये जो दूसरे वाले लोग हैं मेरे पास एक और भगवान आए थे उन्होंने कहा एक नहीं तुम पांच विवाह करो छह विवाह करो सात विवाह करो तो इस तरह से दुनिया में धर्म के नाम पर एक धर्मा आवास खड़ा होता है धर्म को नष्ट करने के लिए धर्मा भास एक खड़ा होता है फिर यह धर्मा भास इस धर्म को मिटाना चाहता है क्योंकि इन नियमों को तब तक लोग नहीं माने अच्छा क्यों चाहते हैं हम लोग कि ज्यादा से ज्यादा लोग जिस धर्म को

00:10:59:28 जिन नियमों को हम मानते हैं उन्हीं को वो भी माने क्यों सुरक्षित रहने के लिए अगर हम लोग मैं एक से ज्यादा विवाह करना चाहता हूं मदरा पान करना चाहता हूं तो मैं चाहूंगा कि 10 लोग और ऐसे हो क्यों क्योंकि जब मैं मदरा पान करूंगा तो मैं सुरक्षित रहूं मधरा ना पीने वाले लोग मुझे प्रहार ना पहुंचा पाए एक विवाह करने वाले लोगों से मुझे खतरा ना हो इसलिए यह जो धर्म और अधर्म का जो युद्ध है वो दुनिया में घटित होता है मानवता बनाम पशुता ये धर्म धर्म तो उसकी शाब्दिक भेद है वास्तविकता क्या है इंग्लिश में बोले तो एनिमलिज्म वर्सेस ह्यूमिज हिंदी में बोले तो मानवता बनाम पशुता और उसी को कहते हैं धर्म और अधर्म तो अब जैसे हमने देखा बंगाल में हमारे मंदिरों को तोड़ा जा रहा है अभी एक स्कन मंदिर को तोड़ दिया गया वहां पर और वहां पर स्त्रियों के साथ दुराचार हो रहा है लगातार और बेहद हृदय को विदीर्ण कर देने वाले वहां से चलचित्र प्राप्त हो रहे हैं हमें आए दिन तो ऐसा इसीलिए हो रहा है कि जो लोग अपने

00:12:29:14 विचार से यदि आपको कोई आपत्ति है वैचारिक मतभेद है तो आप तुरंत हमसे संपर्क करें हमने जो भी कहा उससे यदि आप स सहमति नहीं रखते समर्थन नहीं है तो आप हमसे बात करिए इस बारे में तो मुझे एक कॉल आया था कहीं से और उसने मुझसे कहा कि यदि दुनिया में कोई समलैंगिक विवाह कर भी रहा है तो आपसे उसको आपत्ति क्या है आपको उससे क्या आपत्ति है दुनिया में यदि कोई व्यभिचार कर भी रहा है तो आपके घर में तो नहीं हो रहा आपको उससे क्या आपत्ति होनी चाहिए या फिर अगर आजकल क्या हो रहा है कि पश्चिमी संस्कृति में देह व्यापार आदि को बढ़ावा दिया जा रहा है और हमारे यहां भी ऐसे वहां से आए हुए कुछ लोग है जिनको प्रोत्साहित किया जाता है युवा का आदर्श बना दिया जाता है तो उसने मुझसे सवाल किया यदि दुनिया में दे व्यापार हो भी रहा है तो हमें उससे क्या आपत्ति होनी चाहिए हमारा तो कार्य है भगवान की भक्ति करना हम लोग तो जानते हैं ना क्या सही है क्या गलत तो जो वो लोग कर रहे उन्हे करने दो और हम लोग अपने मन का करते रहे जो भगवान की भक्ति के लिए करना है अच्छा जो इसकन मंदिर पर यह जो वहां पर आक्रमण हुआ है क्षतिग्रस्त हुआ इकन मंदिर इकन मंदिर भी यही सिखाता है केवल

00:13:44:18 भक्ति करो तुम्हें कोई मतलब नहीं है कि आसपास राष्ट्र की चिंता या धर्म की चिंता केवल भक्ति करो तो इसका क्या है जब उस व्यक्ति ने मुझसे प्रश्न किया कि अगर कोई कहीं पर दे व्यापार हो भी रहा है समलैंगिकता को बढ़ावा दिया जा रहा है लिविंग रिलेशनशिप हो रहा है उससे हमें क्या मतलब हमें तो मालूम है कि सही क्या है गलत क्या है तो हम अपना देखें हमें क्या मतलब तो फिर मैंने उसको एक दृश्य दिखाया हमने कहा कि जो यह जो देह व्यापार आदि है यह अगर हो भी रहा है तो इससे हमें क्या मतलब है वही देव व्यापार आपके घर के बिल्कुल बगल वाले घर में जब होने लगेगा तब तब क्या करेंगे हमारे घर की स्त्रियां भी बाहर निकलेंगी और और वहां पर देव व्यापार आदि हो रहा होगा तो उनके जो आगंतुक होंगे वह आएंगे वहां पर और जब आएंगे तो क्या होगा कि वह हमारे घर की स्त्रियों को भी उसी दृष्टि से देखेंगे जिस दृष्टि से देव व्यापार वालों को देख रहे हैं इसका अर्थ यह है कि अगर दुनिया में कहीं पर आग लग रही है तो हम इस प्रतीक्षा में नहीं बैठ सकते कि वह आग पहले हमारे घर पर आए तब हम उसको रोकेंगे वो आग जिस जगह है जहां पर है वहीं पर उसे से हमें दबाने

00:14:59:21 का प्रयास करना होगा अब यह जो प्रयास है ये क्या हो सकता है हम क्या वहां पर बांग्लादेश चले जाए नहीं प्रयास एक ही है हमें हाथी बनना होगा हमें हाथी बन के बैठना होगा हम जब हाथी बन जाएंगे तो हमें किसी से लड़ने जाने की आवश्यकता नहीं होगी अपनी रक्षा के लिए कोई हमसे लड़ने की चेष्टा ही नहीं करेगा यदि हम हाथी बन जाएंगे कोई भी स्वान हमारी तरफ काटने आने का प्रयास नहीं करेगा जब हम हाथी बन जाएंगे तो हमें हाथी बनकर बैठने की आवश्यकता है हमें नहीं हाथ में बर्ची भाला लेकर के और लड़ने मरने कटने के लिए जाना है मगर हमें हाथी बनना है हम हाथी कैसे बन सकते हैं जब हम संगठित हो जब हम जरा जरा सी बात पर विघटित ना हो जब हम ऐसा ना करें कि मैं तो मंगल को ही जाऊंगा मंदिर मैं तो शनिवार को ही जाऊंगा मंदिर कोई एक जगह एक दिन एक मंदिर ऐसा हो जहां पर हम सभी इकट्ठा हो जाएं यह हमारे संगठन होने का प्रतीक है हम लोग बहुसंख्यक है भारत में मगर

00:16:14:28 विघटित होने के कारण हम निर्बल दिखाई देते हैं मगर जो लोग बहुसंख्यक नहीं है वोह संगठित होने के कारण सबल दिखाई देते हैं तो हमें जो है अपनी जो वो जो मूल पहचान है जैसे हनुमान जी अपनी मूल पहचान को भूल गए थे तब उन्हें नारद जी ने बजरंग बली कहां गई वह शक्ति विलक्षण कुछ याद करो अपना पवन सुत व बालपन हमें अपनी उस मूल पहचान को वापस प्राप्त करना होगा हम लोग अगर संगठित हो गए तो फिर किसी के अंदर यह प्रयास नहीं हो सकेगा कि वह हमारी ओर कुदृष्टि डाल सके कोई हमारी तरफ आंख उठाकर देख सके हमें किसी को नुकसान नहीं पहुंचाना वो जैसा कर रहा है उसके अनुसार जो नियम है वो उसको फॉलो करे मगर यदि हम हाथी बन जाते हैं तो उसके मन के अंदर यह भावना नहीं आएगी कि मैं इस पर प्रहार करूं इसका उदाहरण देख लीजिए पहले युद्ध बहुत होते थे परमाणु बम का जब तक आविष्कार नहीं हुआ था तब तक युद्ध बहुत होते थे बात बात पर युद्ध होते रहते थे मगर जब से परमाणु बम आ गया है परमाणु बम का आविष्कार हो गया इस वजह से युद्ध कम हो गए क्यों क्योंकि हाथ बन के बैठ गए

00:17:29:28 लोग परमाणु बम के कारण भी आज युद्ध में कमी आई युद्ध का स्तर गिर गया है उतना युद्ध नहीं होता जैसे 65 में हो गया 72 में हो गया बार-बार युद्ध हो रहा है लोगों के बीच में क्यों परमाणु बम है तो ये परमाणु बम की जो स्थिति है ये हमें अपने हिंदुत्व में लानी है संगठन में लानी है हमें संगठित होना है तो हमने अभी पहला चैप्टर पूरा किया समस्या समस्या यही है जो मैंने आपको चित्रित किया अब उसका कारण क्या है हम लोग विघटित क्यों है यह हमारा दूसरा चैप्टर है आज का क्यों विघटित है हम लोग क्यों संगठित नहीं है हम लोग तो इसके लिए अच्छा यह जो मैं बोल रहा हूं कि हमें संगठित होना चाहिए यह मन से नहीं बोल रहा हूं मैं यह शास्त्र में दिया गया है ऋग्वेद के दसव मंडल के 192 सूक्त के दूसरे मंत्र में लिखा हुआ है कि आप सभी लोग एक मत होकर पूजा भक्ति करें तब आप मनुष्य हैं तब आप मगर हम लोग क्या कर रहे हैं एक मत होकर नहीं रह रहे हैं यानी कि शास्त्र हमारे कुछ और कह रहे हैं और हम कर कुछ और रहे हैं अच्छा हमें एक कर कौन सकता है हमें दुनिया

00:18:45:08 में कोई भी मानव एक नहीं कर सकता मनुष्य एक नहीं कर सकता क्यों क्योंकि हम भी मनुष्य ही है तो हम उसकी बात क्यों माने हमें एक कर सकते हैं ईश्वर जो हमसे शास्त्र जो हमसे श्रेष्ठ है गुरु गोविंद और ग्रंथ यह तीन नाम ऐसे हैं जो हमें संगठित कर सकते हैं वरना यहीं पर अभी किसी एक विषय को लेकर के अगर यहां पर 50 लोग हैं तो उनमें से 40 विचार अलग अलग होंगे मगर वहीं पर जब ईश्वर की बात आ जाएगी कि रघुकुल रीत सदा चली आई प्राण जाई परवचन ना जाई भगवान ने कहा तो हम लोग इस बात को तुरंत मान लेंगे तो हम एक कौन कर सकता है ईश्वर हम एक क्यों नहीं है हमारी समस्या क्या है क्या कारण है पहला कि शास्त्र कह रहे हैं एक होकर के रहो और हम एक होकर के नहीं रह रहे हैं आज हम बटे हुए इसका दृश्य में आगे दिखाऊंगा जैसे कि मान लीजिए कि मेरे घर के आसपास के मंदिर में कोई मूर्ति को तोड़ने आया तो मैं अपने अपने जिस जहां पर मैं रहता हूं वो स्थिति बता रहा हूं वो तोड़ने आएंगे अगर म झुंड बना कर के तो मैं

00:20:00:09 जब बुलाने जाऊंगा किसी को कि चलो चलो मंदिर तोड़ा जाता जा रहा है शिवजी का मंदिर है शिवलिंग है वहां पर उसको तोड़ा जा रहा है तो मैं एक घर कट कटाऊ वहां से बाहर निकलेगा व्यक्ति कहेगा मैं ब्रह्मा कुमारी जाता हूं मैं वह मंदिर जाता ही नहीं उस मंदिर की मुझे आवश्यकता ही नहीं है दूसरे को खटखटा उा वो लोग कहेंगे हरे कृष्णा मैं इस कौन मंदिर जाता हूं मैं कृष्ण को भगवान मानता हूं शिवलिंग रहे ना रहे को क्या दिक्कत है तीसरा मंदिर खटखटा हंगा वह निकलेगा आर्य समाज से वह कहेगा कि भगवान की मूर्ति होती ही नहीं है भगवान अवतार लेते ही नहीं है तो ऐसे मंदिर को बचाने का क्या फायदा और इस तरीके से अन्य अनेका अनेक फिर और आगे चला गया तो कबीर पंथी वह भी हिंदू हैं वह कहेंगे कि भाई कबीर ईश्वर है शिवजी ईश्वर ही नहीं है तो उनका मंदिर क्यों बचाया जाए मतलब हिंदू बहुसंख्यक तो है मगर वैचारिक मतभेद के कारण बटा हुआ है जिस वजह से हम लोग क्षतिग्रस्त हो होते जा रहे तो हमारी मूल समस्या है कि हम संगठित नहीं है और जबकि संगठित रहने को कह रहे हैं कौन हमारे वेद भगवान अब यह संगठित क्यों नहीं है वैचारिक एकता क्यों नहीं है हमारे और आपके बीच में इसका कारण है

00:21:15:21 सार्वभौम सिद्धांतों का अभाव हमें पता ही नहीं है हमारे धर्म में क्या लिखा है हमें पता ही नहीं है हमारा धर्म किस विषय में क्या बात करता है फॉर एग्जांपल इसको भगवत गीता 440 में भगवान ने कहा संशय आत्मा विनती हे अर्जुन जिस व्यक्ति के मन में संशय होता है वह इस लोक में तो क्या परलोक में भी सुखी नहीं रह पाता यह भगवान श्री कृष्ण का वचन है तो हम लोग वैचारिक दृष्टि पर बटे हुए हैं और बटे हुए के कारण ही निर्बल दिखाई दे रहे हैं अब इसको एक चित्रित कर लेते हैं कि कैसे बटे हुए हैं जैसे कि सनातन धर्म के बारे में हम लोग सभी सनातनी है मगर एक लाइन क्या हम कोई ऐसी बोल सकते हैं जो स्वयं को सनातनी कहने वाला हिंदू कहने वाला हर व्यक्ति मान जाए नहीं कह सकते अभी एग्जांपल देता हूं आपको जैसे कि मैंने कहा सनातन धर्म में मांस खाने के लिए मना किया गया है और अमुक अमुक विषम परिस्थितियों में अलाउ किया गया है उसकी परमिशन दी गई है आज्ञा अनुमति दी ग मगर नहीं

00:22:31:01 पूर्वांचल में चले जाइए दक्षिण भारत में चले जाइए वहां पर वो लोग कहेंगे नहीं भाई हमारे यहां तो मास जो है खाना परंपरा है तो क्या हुआ कि एक और कहा जा रहा है मास मत खाओ दूसरी ओर कहा जा रहा है खूब खाओ मगर फिर भी वो लोग सनातनी है अगर हम मैं कहूं कि हमारे सनातन धर्म में जो चचेरी ममेरी फुफेरी बहन मनुस्मृति में लिखा हुआ है कि इनसे विवाह नहीं करना चाहिए मगर नहीं कई कुल परंपराएं ऐसी मिल जाएंगी आपको जहां चचेरी मुरी ममेरी फुफेरी बहनों से विवाह हो रहा है मगर फिर भी वह सनातनी है अगर मैं कहूं हमारे य राम कृष्ण हनुमान यह सब भगवान के अवतार है भगवान है ईश्वर है नहीं कई लोग ऐसे आपको मिल जाएंगे जो यह कहेंगे नहीं यह भगवान नहीं थे यह महापुरुष थे फिर भी वह अपने आप को सनातनी कहेंगे हिंदू कहेंगे और इस तरीके से हर मूल विचार पर अनेका अनेक आपको मत मिल जाएंगे तो इन कारणों से दिखाई देता है जब धर्म भी जब ना करना भी धर्म है और करना भी धर्म है इसका मतलब धर्म का कोई अस्तित्व बचा ही नहीं केवल नाम है हम सब सनातनी है मगर हम आचरण से कुछ भी करते रहे फिर भी हम सनातनी कहलाएंगे तो यह

00:23:46:15 हमारी स्थिति है और इसका कारण है कि हमें अपने धर्म के जो मूल सिद्धांत है वास्तविक सिद्धांत कि चचेरी ममेरी फुफेरी बहन से विवाह करना है कि नहीं करना है वो हमें नहीं पता है बस हम हिंदू हैं क्योंकि हमने हिंदू कुल में जन्म लिया है हमारे हिंदू होने की भावना का एक मात्र कारण है आज के टाइम में ज्यादातर लोगों का सभी की बात नहीं कर रहा हूं ज्यादातर लोगों का एक मात्र कारण है क्योंकि उन्होंने हिंदू कुल में जन्म लिया है बाकी उन्हें हिंदुत्व का ए बी सीडी नहीं पता है तो सार्वभौम सिद्धांतों से अविज्ञता संचय यह है हमारे वैचारिक तौर पर बटे हुए का कारण इसका एक चित्र और मैं बता दूं आपको जैसे कि अभी कुछ समय पूर्व स्वामी प्रसाद मौर्य नाम के व्यक्ति ने चौराहे पर खड़े होकर के रामचरित मानस को जलाया वहां पर वह हिंदू जाएगा जो रामचरित मानस को और उत्तरकांड को मानता होगा कि यह सही है मगर स्वयं को हिंदू कहने वाला ही एक तबका ऐसा है जो यह कहता है कि रामचरित मानस गलत है उत्तर कांड गलत है वो हिंदू तो नहीं जाएगा उसको बचाने तो हिंदू ज्यादा होते हुए भी अपनी रामचरित मानस की रक्षा नहीं कर पा रहा है क्यों क्योंकि वह बट गया

00:25:03:00 है विरुद्ध विचारों से बट गया है तो यह अगर हम इस पर ध्यान दें कि हमारी जो हमारे जो सार्वभौम सिद्धांतों का अभाव है समाज में वह सार्वभौम सिद्धांत हम लोग ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाने का प्रयास करें तो उन सिद्धांतों के छत्र के नीचे हम सनातन समाज को ज्यादा से ज्यादा संगठित कर सकते हैं ऐसा नहीं है कि ऐसा करने से 100 के 100 अगर 100 100% हिंदू है वो संगठित हो जाएगा नहीं 60 होगा 70 होगा भगवान ने कहा था कर्मण्य वादी का रस्ते मा फलेशु कदाचना जब अर्जुन ने कहा कि सामने इतने सारे कौरव है हम लोग उनसे जीतेंगे कैसे तो भगवान ने कहा कर्मण्य वादी कारस से मा फलेशु कदाचना तो हमें संगठित करने की भावना से सार्वभौम सिद्धांतों को लोगों तक पहुंचाना है इसी के लिए हम लोग प्रयासरत हैं जिन सिद्धांतों के अभाव में हिंदू बटता है वह सिद्धांत में अभी आगे आपको बताऊंगा इसी क्रम में क्या है मगर हमने पहले स्टेप में जाना कि हमारी जो मुख्य समस्या है वह है वैचारिक भिन्नता और उसका कारण है सार्वभौम सिद्धांतों

00:26:18:04 का अभाव यानी कि संशय अब इसका कारण क्या है क्यों है हमारे मन में संशय इसका भी शास्त्र मेंही वर्णन है मैं अपने पास से कुछ नहीं बोलूंगा शास्त्र में इसका वर्णन दिया गया है क्या स्कंद पुराण में गुरु गीता में लिखा हुआ है कि जिसका गुरु नहीं वह भले ही चारों वेद पढ़ ले सारे पुराण पढ़ ले सारे उपनिषद पढ़ ले जप तप व्रत दान पुण्य तीर्थ दान सब कुछ व्यर्थ है जिसका गुरु नहीं है गुरु का जो गुरु की जो परिभाषा आई है अद्वय तारका उपनिषद में वो आई है गु का मतलब अंधकार और रू का मतलब निकालने वाला अंधकार यानी संशय यानी अज्ञानता रूपी अंधकार से निकालने वाला आपका गुरु होता है तो संशय संशय क्यों है हिंदू समाज में क्योंकि वह अपने गुरुओं से दूर है गुरु तत्व से अन विज्ञ है उसको मालूम नहीं है कि चचेरी बमेरी फुफेरी बहन से विवाह करना हमारा धर्म कहता है या नहीं कहता है यह बताने के लिए उसके पास गुरु नहीं है मास खाना है कि नहीं खाना नहीं खाना तो क्यों

00:27:33:07 नहीं खाना कहां लिखा है यह जानने के लिए हिंदू के पास उसका गुरु नहीं है गुरु तत्व से अन विज्ञ के कारण है संशय यह हमारा तीसरा कारण है समस्या का और गुरु तत्व से अनुविजय जानते हैं कि गुरु होना चाहिए तो उनके पास वह सार्वभौम सिद्धांत नहीं है कि गुरु कौन होना चाहिए इस कारण से गुरु तत्व से अनभिज्ञता भी है कोई किसी को भी गुरु बना लेता है और कभी-कभी कई ऐसे गुरु के नाम पर गुरु घंटाल होते हैं जो जनता को ठग हैं या गुरुओं का नाम खराब कर देते हैं गुरुओं के प्रति वास्तविक गुरुओं के प्रति अनास्ता उत्पन्न कर देते हैं तो हमें यह नहीं पता है कि गुरु किसे बनाना चाहिए तो गुरु किसे बनाना चाहिए

00:28:30:16 अथर्व वेद 115 16 में लिखा हुआ है ब्रह्मचारी सन्यासी ही आचार्य बनता है तो अंतिम निर्णायक गुरु कौन होगा आपका जो ब्रह्मचारी सन्यासी हो आप दीक्षा ले सकते हैं यह शास्त्र कहते हैं आप दीक्षा ले सकते हैं किसी गृहस्थ से मगर जो आपको दीक्षा दे रहा है वह किसी सन्यासी के द्वारा स्वीकार किए गए जो सिद्धांत हैं उनकी सीमा में रहता हो जैसे मान लीजिए कि शंकराचार्य जी के पूरी शंकराचार्य जी के कई शिष्य हैं जो गृहस्थ है आचार्य हैं पढ़ा रहे हैं उ वो भी दीक्षा देते हैं मगर वह किसी सन्यासी के सानिध्य में है सीमा में है तो आपका गुरु गृहस्थ हो सकता है मगर अंतिम निर्णायक कौन होगा ब्रह्मचारी सन्यासी तो यह गुरु तत्व की पहली पहचान लक्षण से सन्यासी मनुस्मृति में कहा गया कि धर्म में संशय होने पर अधिष्ठाता ब्रह्मचारी सन्यासी को बनाए यह भी मनुस्मृति में कहा गया फिर गुरु की दूसरी पहचान है कि वह समस्त सुति स्मृति शास्त्रों में सामंजस्य की शिक्षा देता हो मतलब यह ना कहे कि विष्णु पुराण मानो शिव पुराण मत मानो

00:29:46:13 वेद का यह समता भाग मत मानो और रिचा वाला भाग मान लो य ऐसा ना कहे समग्र रूप से पूरे शास्त्रों को स्वीकार करे और उसका निचोड़ निकाल करके आपको दे तब वो गुरु की सीमा में आता है शास्त्र यह कहते हैं यह कहां पर आया मत्स पुराण 145 वा अध्याय 5वा श्लोक समस्त शति स्मृति शास्त्रों में साधु सामंजस्य की शिक्षा ही साधु सम्मत धर्म है और इसके बाद गुरु तत्व की अगली पहचान क्या है कि ज्ञान वही प्रमाणिक जो परंपरा से हो परंपरा हम अपने बालक का अपने घर के बच्चों का अगर एडमिशन कराने जाते हैं विद्यालय में तो हम यह चाहते हैं कि वह विद्यालय कहीं से सर्टिफाइड हो हम बच्चों को पढ़ाने कोचिंग ले जाते हैं तो हम य चाहते हैं कि हमारा बच्चा जहां पर कोचिंग करेगा वह कोई सर्टिफाइड टीचर हो यह जो सर्टिफिकेशन है य क्या बताता है सर्टिफिकेशन में उस व्यक्ति ने वह डिग्री वह शिक्षा कहां से प्राप्त की है उसका स्त्रोत का नाम लिखा होता है यानी कि उसके गुरु का नाम लिखा होता है और उसके पास जाएंगे तो उसके पास भी एक सर्टिफिकेट होगा वो उसके गुरु

00:31:01:14 का नाम बताएगा तो ये क्या बन रहा है गुरु का गुरु का गुरु का गुरु का गुरु यह परंपरा बन रही यानी कि पूरी दुनिया आज सर्टिफिकेट मार्कशीट डिग्री के रूप में गुरु परंपरा के नियम को ही फॉलो कर रही है और भगवत गीता चार दो में भगवान कह रहे हैं कि यह वाला जो ज्ञान है मुझे परंपरा से प्राप्त हुआ मांडो उपनिषद में ऋषि गण बता रहे हैं एक से लेकर चौथे मंत्र तक कि यह वाला जो ज्ञान है मुझे गुरु हमें जो है ऐसे ऐसे मिला तो जो तीसरा लक्षण है वो क्या है गुरु तत्व का कि परंपरा से होना चाहिए वो गुरु परंपरा अपने आप स्वघोषित गुरु नहीं होना चाहिए और अंतिम नियम है गुरु का कि गुरु वही जो आपका संशय दूर कर दे क्योंकि गुरु सर्व संश हों का छेदन करते हैं किससे प्रमाण और युक्ति से प्रमाण और युक्ति से वो सभी संशय का छेदन कर देते हैं गुरु ऐसा नहीं होना चाहिए कि जब आप अपना संशय लेकर उनके पास गए तो उन्होंने कहा कि तुम तो अपना जो हमने बताया बस वो करते रहो और कुछ नहीं है वह आपके संशय का समाधान करे वही आपका गुरु हो सकता है अन्यथा यदि आपको वह आपके संशय का समाधान नहीं दे रहा है तो वह आपका गुरु नहीं

00:32:16:14 है क्योंकि गुरु की परिभाषा हीय है कि वह आपके जीवन से अंधकार को दूर कर दे अज्ञानता रूपी अंधकार को दूर कर दे तो जिन लोगों को गुरु तत्व के प्रति आस्था भी है थोड़ी बहुत उन लोगों को य नियम नहीं पता है शास्त्रों के कि गुरु को किसको बनाए बिल्कुल क्लियर है चार कि पहला ब्रह्मचारी सन्यासी होना चाहिए परंपरा से होना चाहिए समस्त शति स्त्री शति स्मृति शास्त्रों में सामंजस की शिक्षा देने वाला होना चाहिए और चौथा गुरु वही जो आपके संशय दूर कर दे इतनी सरल सी व्याख्या है गुरु की मगर हम पूरा भूमंडल करते रहते हैं गुरु के जो चार सिद्धांत है इनको एमप्लीफाई करके गुरु के पास नहीं जाते तो क्या होता है जब हम गलत गुरु के पास चले जाते जिस पर ये चार नियम एमप्लीफाई नहीं होते तो क्या होता है उस कारण से वहां पर उसको कुछ ऐसा प्राप्त हो जाता है कि उसकी अनास्ता हो जाती है पहले गुरु के प्रति फिर धर्म के प्रति फिर ईश्वर के प्रति और फिर ऐसे में ही कुछ लोग आते हैं अरे तुम्हारे भगवान तो रास लीला चाहते हैं तुम्हारे भगवान तो यह करते हैं और इस तरीके से धर्म परिवर्तन कराते हैं और अपने उस पशु का घेरा बढ़ाते जाते हैं अपने को पोषित करते जाते हैं तो गुरु तत्व के कारण हमारे गुरु तत्व से सही गु की पहचान ना मालूम होने के कारण गुरुओं से दूर है गुरुओं

00:33:31:15 से दूर होने के कारण संशय है और संशय होने के कारण बटे हुए हैं यह क्रम है तो जो भगवान की जय जय तो अब बात आती है कि हमने यह सब चार चीजें जान ली अब करना क्या है व्ट टू डू एटली करना क्या है तो सबसे पहली बात है कि वह पांच सिद्धांत ऐसे हैं जो हमें जनजन तक पहुंचाने हैं उनके आधार पर हम अपने समाज को बहुत आसानी से संगठित कर सकते हैं अब इसको समझिए जो सनातन का ईश्वर का धर्म का पहला शत्रु है वह है नास्तिक जब आप किसी को बुलाने जाएंगे कि चलो धर्म के लिए संगठित होना है मंदिर चलो तो सबसे पहला जो होगा वह होगा नास्तिक जिसे धर्म से और ईश्वर से कोई मतलब ही नहीं है तो जो जितने प्रकार के धर्म के और ईश्वर के शत्रु हैं उतने प्रकार के हमारे पास सार्वभौम सिद्धांत होने चाहिए जिनके कारण हम ऐसे शत्रुओं से

00:34:46:20 लड़ पाए तो पहला शत्रु है नास्तिक उससे लड़ने के लिए सार्वभौम सिद्धांत क्या है जीव की चाह का वास्तविक विषय ही ईश्वर है यह सार्वभौम सिद्धांत है और सरल व्याख्या हमने इसकी ऐसे की है कि संसार का प्रत्येक मनुष्य भगवान को ही ढूंढ रहा है फिर वह भले ही स्वयं को नास्तिक ही क्यों ना कहता हो यह जो हमारे गुरुदेव के जो गुरु थे पूज्य करपात्री जी महाराज धर्म सम्राट करपात्री जी उन्होंने एक ग्रंथ लिखा है नास्तिक भी आस्तिक यह जो सार्वभौम सिद्धांत हमें वहां से प्राप्त हुआ है इसमें क्या है उन्होंने प्रमाण और तर्क के आधार पर य सिद्ध किया नास्तिक व्यक्ति के भी मन में भगवान का ही चिंतन चल रहा है नास्तिक कैसे अतो मा सद्गमय तमसो मा ज्योतिर्मया मृत मा मतम गम मुझे सत

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→ Used in: A · Live रामपाल के जाल में पीड़िता #तत्त्वदर्शीसंत #rampaljimaharaj at 2:52:24 ↗

00:35:47:13 से असत से सत की ओर ले चलो अंधकार से उजाले की ओर ले चलो मृत्यु से अमृत्व

⬜ Not used yet · 00:35:52:25 – 00:59:34:02 (23:41)

00:35:52:25 की ओर ले चलो एक नास्तिक के अंदर भी कभी ना मरने की चा विद्यमान है एक नास्तिक व्यक्ति के अंदर भी समस्त ज्ञान प्राप्त कर लेने की चा विद्यमान है फॉर एग्जांपल एक जैसे मान लीजिए कि मुझे यहां कोई नहीं जानता और मैं यहां मुझे यहां कोई अचानक से देखता है तो वह अपना प्रयास करने लगता है आंकलन करने लगता है कि यह व्यक्ति कौन हो सकता है मैं जान सकूं मनी मन यह क्या है उसके अंदर चाह है दुनिया का सभी प्रकार का ज्ञान प्राप्त कर लेने की इसलिए इस प्रकार का चिंतन उसके अंदर हर जीव के अंदर चल रहा है और दुनिया का प्रत्येक एक नास्तिक व्यक्ति भी सदा सुखी रहना चाहता है बेटा इस बच्चे को थोड़ा एक जगह बिठा लीजिए एक जगह बैठ जाओ तो एक नास्तिक व्यक्ति भी सदा आनंदित रहना चाहता है वह कभी नहीं चाहता उसके बाल सफेद हो नास्तिक है तब भी वो कभी नहीं चाहता मेरे कभी झुर्रियां पड़े वो कभी नहीं चाहता कि मैं बूढ़ा हूं वो कभी नहीं चाहता मेरी मर्सडीज मेरी कार के टायर घिस जाए वह कभी नहीं चाहता कि मेरे मेरा जो मोबाइल है उस पर स्कच आ जाए कभी नहीं चाहता वह सदैव एज इट इज बना रहना चाहता है जो स्थिति उसको

00:37:07:25 सुख दे रही है वह बस उसी स्थिति को चाहता है उसको बिगड़ने को स्वीकार नहीं अब क्या मतलब है कि भगवान का अर्थ क्या है सत चिता आनंद यानी कभी ना मरने वाला सदा सुखी रहने वाला और अखंड ज्ञानी उसी का नाम भगवान है उसी को ईश्वर कहते हैं तो इनडायरेक्ट वे में यानी कि प्रत्यक्ष रूप से जो नास्तिक व्यक्ति है व कह क्या रहा है कि इस दुनिया में कोई भी ऐसा नहीं है जो सदा सुखी रहता हो और मांग क्या रहा है सदा सुखी रहना वो कह रहा है कि इस दुनिया में कोई नहीं है जो सब कुछ जानता हो मगर मांग क्या रहा है सब कुछ जानना वो कह रहा है कि इस दुनिया में कोई ऐसा नहीं है जो सदा अमर रहे मगर खुद क्या चाहता है अमरता अब एक नियम है इन तीनों का अगर निचोड़ कर दें तो एक नास्तिक व्यक्ति के अंदर भी कई बार इस प्रकार की बातें आती है कि बारिश ज्यादा हो रही है तो कम हो जाए यानी कि वह मौसम को कंट्रोल करने वाला बनना चाहता है नास्तिक व्यक्ति के अंदर भी यह भावना आती है कि धूप ज्यादा पड़ रही है तो कम हो जाए तो यह क्या हुआ मौसम इंडिया पाकिस्तान का मैच है कल वह आज जानना चाहता है काश कल ऐसा हो जाए मेरी टीम जीत जाए यानी कि

00:38:22:25 भविष्य देखना चाहता है तो वो कह रहा है कि कोई भगवान नहीं है मगर व भगवान ही बनना चाहता है नास्तिक व्यक्ति भगवान की सारी शक्तियां मेरे पास हो यही तो चाहता है तो अब एक नियम है कि जीव के अंदर यानी हमारे अंदर जो जो प्यास है उसका जो निवारण है निराकरण है वह इस दुनिया में मौजूद है जैसे कि हमारे अंदर भूख है हम चाह करके भी भूख को अपने अंदर से अलग नहीं कर सकते भूख है दुनिया में भोजन है जैसे कि हमारे अंदर प्यास है तो दुनिया में क्या है पानी है हमारे अंदर देखने की चाह है तो दुनिया में क्या है दृश्य है हमारे अंदर सुनने की चा है तो दुनिया में क्या है आवाज है ध्वनि है स्वर है तो जिस प्रकार देखने की चाह से दृश्य सिद्ध हो जाता है सुनने की चाह से आवाज सिद्ध हो जाती है उसी प्रकार से एक नास्तिक व्यक्ति के अंदर भी सत चित आनंद की चाह से सच्चिदानंद स्वरूप परमेश्वर का अस्तित्व सिद्ध हो जाता है

00:39:29:02 तो जो पहला सिद्धांत हम लोगों ने प्राप्त किया वो क्या किया नास्तिक से लड़ने के लिए पहला शत्रु कौन है धर्म और ईश्वर का नास्तिक तो उससे लड़ने के लिए हमने पहला सिद्धांत क्या प्राप्त किया कि एक नास्तिक व्यक्ति भी भगवान को ही ढूंढ रहा है उसकी भी चा का मूल विषय वही है भगवान अब यह जब अलग हो जाते हैं तो इससे थोड़ा और स्ट्रंग शत्रु आता है सामने वो होता है धर्मा भास वह क्या करता है धर्मा भास का अर्थ है धर्म का आभास है आपको मगर वस्तुतः वह धर्म नहीं है वह क्या करता है वेदों को ठुकरा आता है और वेदों द्वारा प्रतिपादित होने वाले सर्वशक्तिमान ईश्वर को ठुकरा आता है ऐसे में यह वेदों को ठुकराने के लिए सर्वशक्तिमान ईश्वर को ठुकराने के लिए उसे ईश्वर को बाधित करना पड़ता है बाधित बाधित का मतलब समझ लीजिए कि जीव की चाहती सब कुछ कर सक सकने वाला बनना यही चाह थ ना सब कुछ कर सकने वाला बनना मैं उड़ सकू मैं गायब हो सकू मैं सो सकू मैं रो सकू कुछ भी कर सकू यह है जीव की मूल चाह मैं कुछ भी कर सकूं चंद्रमा को हाथ में लेकर के मैं बॉल बॉल खेल सकूं यह भी चा है अगर

00:40:44:07 अगर हम साइंटिस्ट से जाकर के पूछे वैज्ञानिकों से कौन सा आविष्कार ऐसा होगा जिसको करने के बाद आप शांति से बैठोगे तो वो कहेंगे सब कुछ कर सकने वाला आविष्कार यही होगा ना नहीं तो वो कुछ ना कुछ कुछ ना कुछ खोजते रहेंगे कि अब मैं ऐसा ऐसा कोई यंत्र बनाऊ जिससे हम इतने बड़े हो जाए कि चांद का कैच कैच खेले जब यहां की चीजें पूरी हो जाएंगी तो इससे आगे बढ़ेंगे तो मनुष्य की जो चाह है वह क्या है सब कुछ कर सकने वाला बनना तो उसकी चाह का विषय जो ईश्वर है वो कौन होगा जो सब कुछ कर सकता है तो जब व्यक्ति को नास्तिक बनने से काम नहीं चलता है तो वो धर्मा भासी बनता है यानी कि धर्म का चोला ओढ करके वो नास्तिकता ही फैलाता तो वो क्या करता है ऐसे ग्रंथों की रचना करता है जो वेद विरुद्ध हो ऐसे ईश्वर की रचना करता है जो सर्वशक्तिमान ना हो तो क्या हुआ अब इससे कैसे इससे कैसे निपट तो हमारा दूसरा जो सार्वभौम सिद्धांत है वो क्या है ईश्वर वही है जो कुछ भी कर सकता है सत्यम ज्ञानम अनंतम ब्रह्म ईश्वर पूर्ण है ईश्वर सभी नियमों को बनाने वाला सर्व नियामक है वो किसी भी नियम के नीचे नहीं आ

00:41:59:08 सकता इसका अर्थ क्या है यदि कोई कहे वह जन्म नहीं ले सकता तो व राम कृष्ण के रूप में जन्म लेगा यदि कोई कहे कि वह अपनी देह का नाश नहीं कर सकता तो व इन्हीं रूपों में आकर के अपनी देह का नाश करके दिखाएगा यदि कोई कहे वो वामन नहीं बन सकता वो वामन अवतार लेगा वो कछुआ नहीं बन सकता कुर्म अवतार लेगा मछली नहीं बन सकता वो मत्स अवतार ले लेगा कोई कहे कि वो झूठ नहीं बोल सकता वो काना बन जाएगा कोई कहे कि वो सत्य नहीं बोल सकता वो राम बन जाएगा और कोई कहे कि वो मूर्ख नहीं हो सकता वो मानव बन जाएगा हमारे आपके रूप में क्या बना ईश्वर मानव कोई कहे कि ईश्वर पाप नहीं कर सकता तो वो रावण बन जाएगा तो ईश्वर कौन है जो किसी भी प्रकार के नियम के नीचे नहीं आ सकता संसार में कोई भी ऐसा कार्य नहीं है मनुष्य की दृष्टि से सोचा जा सकने वाला जिसको ईश्वर नहीं कर सकता यानी कि एकमात्र हमारे सनातन धर्म के द्वारा जो प्राप्त होने वाला ईश्वर है जो जीव की चाह का मुख्य विषय है उसके सामने हम एक लाइन नहीं लिख सकते कि दुनिया में कोई ऐसा कार्य जिसके कारण उसके

00:43:14:14 लिए लिखा जा सके ही कांट डू इट यह हम सनातन ईश्वर के सामने नहीं लिख सकते अन्य जितने भी सनातन विरुद्ध तंत्र है उनमें ऐसा ईश्वर है जो कोई ना कोई काम करने से रुक जाता है इसीलिए कहीं पर मूर्ति पूजा नहीं है कहीं पर भगवान अवतार नहीं ले सकते हमारे यहां मूर्ति भी है निराकार भी है साकार भी है तो इसका अर्थ क्या हुआ यदि कोई कह रहा है कि भगवान साकार नहीं हो सकता तो गलत और कोई कह रहा है भगवान निराकार नहीं हो सकता तो गलत क्योंकि भगवान के सामने कोई नियम नहीं लग सकता वह अबाध है ईश्वर अबाध है वो बाधित नहीं हो सकता तो अब क्या हुआ जितने भी ईश्वर को बाधित करने वाले धर्मा भासी लोग हैं उनका तोड़ हमें क्या मिला अगर कोई हमें कहे कि ईश्वर य नहीं कर सकता हम तुरंत उसको कह देंगे नहीं भाई अब इसका एग्जांपल लीजिए जैसे कि अभी आपने के केरला स्टोरी वगैरह जैसी जो चलचित्र आए थे वीडियो के माध्यम से आपने देखा होगा उसमें हमारी युवा पीढ़ी को समझाया जा रहा है यह तुम्हारा कैसा राम है जो रोता है यह तुम्हारा कैसा भगवान है जो रास रचा है यह तुम्हारा कैसा भगवान है शिव जो अपनी पार्वती पत्नी के भस्म जाने पर रोता है तो वैसे

00:44:29:19 इन लीलाओं के पीछे भगवान के अन्य कई उद्देश्य थे मगर एक उद्देश्य जो मेन था भगवान आपको बता रहे हैं मैं ईश्वर हूं यह सारे नियम मेरे ऊपर लागू नहीं होते इसलिए हमारा ईश्वर रोएगा भी हमारा ईश्वर नाचेगा भी हमारा ईश्वर राज भी रचाए और दूसरों से मदद भी मांगेगा वह हर वो काम कर सकता है जो हम सोच सकते हैं उसके ऊपर हम बाधा नहीं लगा सकते इस बात को भगवान श्री कृष्ण ने कहा भी है भगवत गीता में कि मुझे मानव देह में देखकर मेरे ब्रह्म भाव को लोग भूल जाते हैं वो मूर्ख होते हैं मैं मानव देह में आया हूं यह बताने के लिए कि मैं ईश्वर हूं और तुम सोच रहे हो कि इसने यह कैसे कर दिया कृष्ण बन के यह कैसे कर दिया वह कैसे कर दिया इसका एग्जांपल सुन लीजिए जैसे कि हवा है हवा हर हिस्से में जा सकती है कान के अंदर नाक के अंदर आंख के अंदर सब जगह जा सकती है हवा अब हवा को आपको बताना है कि मैं यह ये जगह जा सकती हूं हवा ने एक अवतार लिया एक रूप लिया मानव वाला जिससे वह आपसे बात कर सके हवा ने वह अवतार लिया अब उसने अवतार लेकर के फिर आपको बताया कि देखो मैं कान में जा सकती हूं जाकर बताया देखो मैं नाक में जा सकती हूं जाकर

00:45:44:22 बताया और उसके बाद हम उससे कहने लगे अरे तुम मानव होकर के एक कान में कैसे जा रहे हो नाली में कैसे जा रहे हो उसका उद्देश्य आपको यह बताना है कि मैं ईश्वर हूं मैं ब्रह्म हूं इसलिए उसने वो रूप धारण कि मगर हम उसे बाधित करना चाहते हैं तो दूसरा जो सिद्धांत है वह क्या है ईश्वर वही है जो कुछ भी कर सकता है पहला सिद्धांत क्या है जीव की चाह का वास्तविक विषय है ईश्वर दुनिया का हर प्राणी भगवान कोही ढूंढ रहा है फिर वह भले ही नास्तिक ही क्यों ना हो अब तीसरा सिद्धांत आ जाता है तीसरा सिद्धांत है जो हमें जनजन तक पहुंचाना होगा वह क्या है कि ईश्वर के विषय में केवल वही शास्त्र प्रमाणिक जिनको ईश्वर ने भी ना रचा हो यह क्यों है अब आपके पास कोई यह आकर के कहने लगे मेरे पास रात में भगवान आए थे उन्होंने कहा एकादशी के दिन चावल खा लिया करो है ना उन्होंने कहा है कि खूब बकरा खाओ उन्होंने कहा है कि चचेरी बहन से ब्याह कर लो स्वयं भगवान आए थे तो वह इस नाम पर आपको भटका सकता है व्यक्ति तो ये जो तीसरे प्रकार का व्यक्ति है जो वेद विरुद्ध बातें करेगा इसका निवारण यही है बृहदारण्यक उपनिषद

00:47:00:16 दो चर द में लिखा हुआ है कि हमारे वेदों को सनातन शास्त्रों को भगवान ने भी नहीं लिखा है वह भगवान की सांस के रूप में सदैव विद्यमान थे उनकी रचना नहीं हुई है कभी तो क्या है अगर भगवान आ करर के आपको कुछ बता रहे हैं तो हमें उनको नहीं मानना यदि वह वेद विरुद्ध है इसका उदाहरण समझ लीजिए सांस क्या होती है हम दो प्रकार के कार्य करते हैं एक हम चाहकर करते हैं और दूसरा हम बिना चाहकर करते हैं जब हम चाहकर कुछ करते हैं तो हमारे पास विकल्प होता है कि हम उस कार्य को कैसे करें जैसे कि मेरे सामने नारियल भी है और माला भी है अब मेरा यदि मेरी यदि इच्छा है कुछ उठाने की तो मैं चाहूं तो नारियल उठाऊं और मैं चाहूं तो माला उठाऊं मगर कुछ कार्य हम ऐसे भी करते हैं जिसमें हमारी इच्छा नहीं होती है बस करते हैं शुद्ध होते हैं वह कार्य जैसे कि सांस लेना एक बच्चा माता के गर्भ से जन्म ले रहा है मगर वह सांस ले रहा है तो जिस प्रकार से बच्चे ने वह कार्य किया सांस लेने का उसी प्रकार से भगवान के

00:48:15:18 वेद हैं सांस के रूप में भगवान ने उनको सोच समझ के रचा नहीं है तो इसलिए यदि भगवान आकर के कोई ऐसी बात कह रहे हैं जो वेद विरुद्ध है तो वहां भगवान को नमस्कार करेंगे मगर मानेंगे किसकी बात अपने शास्त्रों की वेदों की बात वो प्रामाणिक है हमारे लिए भगवान पूजनीय है मगर यदि वोह वेदों के विरुद्ध हो गए तो वहां पर हम वेद वेद को भी ब्रह्म ही कहा गया है शास्त्रों में तो वेद भी भगवान का ही स्वरूप है मगर हम भगवान को मानेंगे वहां पर उतने अंश में हम भगवान की बात भी नहीं मानेंगे हो सकता है रामचंद्र जी के रूप में आ जाए वह और चार विवाह करने लगे तो क्या करें ये मान ले राम ने चार विवाह कि हम ये मानेंगे तो माया है यही तो मानेंगे हनुमान जी के रूप में आ जाए और वह विवाह करने लगे तो हम यह नहीं मानेंगे हनुमान जी है क्या मानेंगे यह कोई माया है कोई दूसरी शक्ति है तो इसीलिए देखिए इतिहास में क्या है कि जब भगवान विष्णु ने बुद्ध का अवतार लिया तो उन्होंने यज्ञों की रक्षा करने के लिए वेदों के विरुद्ध शिक्षा दी तो हमने बुद्ध भगवान को तो भगवान माना मगर हमने उनकी शिक्षा ग्रहण नहीं किया हम आज सनातनी इसीलिए हैं हम आज

00:49:30:22 जो सनातनी है वह इसलिए हैं क्योंकि हमने बुद्ध की शिक्षाओं को स्वीकार नहीं किया तो तीसरा सिद्धांत हमें मिला कि ईश्वर के विषय में केवल वही शास्त्र प्रमाणिक जिन्हें ईश्वर ने भी ना रचा हो इसके बाद चौथा सिद्धांत है अब शत्रु थोड़ा सा क्वालिटी बदल लेता है पहला था नास्तिक दूसरा था धर्मा भास तीसरा शत्रु आएगा सनातना भास यह उससे भी ज्यादा खतरनाक है वो वहां पर धर्म का आभास था यहां पर सनातन का आभास है सनातन का चोला पहन कर के आपको ऐसी बातें बताई जाएंगी जो हमारे धर्म के हमारे शास्त्रों के हमारे ईश्वर के विरुद्ध है उससे कैसे निपटें तो वहां पर क्या होगा ज्ञान वही प्रमाणिक जो परंपरा से प्राप्त हो यह हमारा चौथा सिद्धांत है जो हमको बच्चे बच्चे तक सामान्य व्यक्ति तक पहुंचाना है जब भी कोई व्यक्ति शास्त्रों की कोई बात बता रहा हो हमें ये जानना है कि इसने इन शास्त्रों का अध्ययन कहां से किया है क्यों क्योंकि शास्त्र कहते हैं मनुष्य चाहे चारों वेद पढ़ ले सारे पुराण पढ़ ले सारे उपनिषद पढ़ ले उसका सब कुछ बेकार है यदि उसका कोई परंपरा प्राप्त आचार्य

00:50:46:03 गुरु नहीं है स्कंद पुराण में तो यहां तक लिखा हुआ है कि यदि आपने कोई गलत गुरु कर लिया तो ब्रह्म प्रलय तक आप राक्षस योनि में रहेंगे गलत गुरु अगर कर लिया तो तो इसलिए चौथा सिद्धांत है ज्ञान वही प्रमाणिक जो परंपरा से प्राप्त हो तो गुरु होना बहुत आवश्यक है वह भी परंपरा प्राप्त गुरु होना यह हमें भावना सबके मन में डालनी है इसका भी उदाहरण सुन लीजिए इससे प्रॉब्लम क्या आती है समस्या क्या होती है रामायण में एक दृश्य ऐसा है जहां पर जो बजरंग बली है माता सीता को लेने वो भगवान की जो मुद्रा है वो लेकर के जब वहां पहुंचते हैं वाटिका में तो सीता के पूरे शरीर का वर्णन उन्होंने अपने मन में किया है वाल्मीकि रामायण में पूरे शरीर का और उसमें स्पष्ट स्पष्ट जो है उन शरीर अंगों का नाम तक लिखा हुआ है नाम भी लिखा है वहां तो अब भावना क्या आएगी जब हम गुरु के बिना उसका अध्ययन कर रहे होंगे कि अरे हनुमान जी एक तो बाल ब्रह्मचारी और ऊपर से माता सीता के बारे में यह कैसा सोच रहे हैं यह कैसे बोल रहे हैं तो क्या हुआ गुरु के अभाव में में अनास्ता उत्पन्न हो गई किसके प्रति रामायण के प्रति हनुमान जी के प्रति क्योंकि गुरु

00:52:01:06 के अभाव में थे अब जब गुरु होगा तो हमें पता चलेगा कि हम अपने घर की माताओं और बहनों को भी जब ढूंढने जाते हैं कहीं पर भीड़ में मेले में तो हमारा सबसे पहला पैरामीटर क्या होता है अपने घर की स्त्री को पहचानने के लिए सबसे पहला पैरामीटर होता है कि हम एक स्त्री को ढूंढ रहे हैं किसको ढूंढ रहे हैं स्त्री को ढूंढ रहे हैं और स्त्री की पहचान कैसे होगी कि हम स्त्री को ढूंढ रहे हैं उसके स्त्रीत्व से तो उस परिपेक्ष में हनुमान जी ने सीता माता के बारे में वो वर्ण किया इसी बात को दूसरे तरीके से समझ लीजिए कि यदि कोई व्यक्ति किसी के कांटा

00:52:39:08 चुबे बदल जाए वह आपका इलाज करना चाहता है इंजेक्शन आपके घुसे रहा है मास में प्रविष्ट हो रहा है वहां पर दर्द भी हो रहा है मगर वो हिंसा नहीं है क्यों क्योंकि वो आपका इलाज कर रहा है डॉक्टर तो मास्क को काट भी देता है ना कभी-कभी ऑपरेशन में वो भी हिंसा नहीं है तो जब उद्देश्य सही है तो वहां पर उनका जो है विचार गलत स्वीकार नहीं किया जा सकता तो यह गुरु के अभाव में इस तरह की दिक्कतें आती है तो यह भी स्कंद पुराण में लिखा है कि गुरु के बिना शास्त्र वगैरह जो है ये सभी मति भ्रष्ट कर देंगे अब सोचिए जो व्यक्ति रामायण वाल्मीकि रामायण बिना गुरु के पढ़ लेगा उसकी मति भ्रष्ट हो जाएगी हनुमान जी के प्रति तो इसीलिए गुरु वही जो प्रमाणिक हो परंपरा से हो इसके बाद लास्ट में जो फाइनल सिद्धांत हमारा पांचवा है वह क्या है कि जब कोई बात समझ में ना आ रही हो धर्म की यह धर्म है इससे भी थोड़ा अगला चरण आ जाता है क्योंकि कुछ लोग नकली परंपरा लेकर के भी आ जाते हैं कुछ लोग नकली परंपरा लेकर के भी आ जाते हैं पहला क्या था नास्तिक है उसको हम पहचान लेंगे दूसरा धर्मा भास है वह ईश्वर को मानेगा मगर होगा वास्तविक वास्तविकता में नास्तिकता

00:53:54:15 की ओ ले जाने वाला उसको भी पहचा पन ले फिर पहचानने में थोड़ी कठिनाई आएगी कब जब वो सनातना भासी हो जाएगा वो सनातन का दिखावा करके आपको सनातन के विरुद्ध शिक्षा देगा जैसे हम किसी को लेने जाएंगे कि चलो शिव मंदिर में पूजा है वो कहेगा नहीं शिव जी भगवान नहीं है केवल कृष्ण भगवान है चलो शिव मंदिर में चलकर भगवान की पूजा करें तो वो कहेगा नहीं भगवान अवतार नहीं ले सकते तो ये क्या है सनातनी तो है मगर सनातना भास है सनातन का चोला ओड़कर आपको ऐसी शिक्षा दे रहा है जो सनातन के विरुद्ध है अब इसके बाद एक स्टेप और बढ़ जाता है लोगों का वह क्या करते हैं कि अपनी एक नकली परंपरा भी बना लेते हैं आपको झूठ परोसने के लिए तो उसका निवारण क्या है उसका निवारण है नारायण समारंभा शंकराचार्य मध्यमाम अश्म चार्य पर्यंत वंदे गुरु [प्रशंसा] परंपराम तो जब आपको धर्म और अधर्म कुछ समझ ना आ रहा हो जब आपको सनातन विरुद्ध लोगों की बात का जवाब ना मिल रहा हो दीक्षा लेने नहीं उस प्रश्न का निराकरण प्राप्त करने के लिए आपको जाना होगा कहां शंकराचार्य के

00:55:09:25 पास जब आपको जीवन में कभी समस्या आएगी धर्म और अधर्म में तब आपको शंकराचार्य के पास जाना होगा तो शंकराचार्य से आपको वो सार्वभौम जो मैंने पीछे आपको चार सिद्धांत बताए वो और पांचवा स्वयं में ये वो सिद्धांत आप आपको प्राप्त होंगे जिसके कारण आप जो बात जिससे कह रहे हो वह अकाट्य बात होगी उसके पास आपका उत्तर नहीं होगा तो जब आप किसी को लेने जाओगे मंदिर संगठित होने के लिए बचाने के लिए अपने धर्म को तो वह आ सकेगा आपके पास उसका निराकरण होगा तो जो ऐसी ही महान परंपरा से इस परंपरा के बारे में जान लीजिए क्या है यह कि आज से लगभग ढाई हजार वर्ष पूर्व हमारा सनातन धर्म विलुप्त होने का कगार पहुंच चुका था स्थिति यह थी कि जहां से बौद्ध भिक्षु गुजर जाते थे बुद्धम शरणम गच्छामि कहते हुए वहां पर लोगों का धर्म परिवर्तन स्वीकार कर लिया जाता था कि अब बौद्ध हो गया ऐसी स्थिति आ चुकी थी जो हमारे यहां के पंडित थे वह अपना धर्म छोड़ छोड़ कर के बुध बौद्ध हुए जा रहे थे और बौद्ध मत का अनुकरण अनुगमन कर रहे थे ऐसी स्थिति में कर्मा जो कर्म पुराण है जो हमारे अन्यान्य

00:56:25:06 शिव पुराण में वर्णन है कि कलयुग में भगवान शिव अवतार लेते हैं शंकराचार्य के रूप में और ऐसी स्थिति में भगवान आदि शंकराचार्य जी ने उस समय जन्म लिया था जब हमारा सनातन धर्म विलुप्त होने के कगार पर था आज कोई ऐसा सनातन को मानने वाला तंत्र नहीं है जो यह नहीं मानता कि सनातन को बचाया था भगवान आदि शंकराचार्य ने बौद्धों को हराकर कोई नहीं कहता यहां तक कि शंकराचार्य को ना मानने वाले तंत्र भी इस बात को स्वीकार करते हैं कि बौद्धों से हमें बचा बचाने वाले कौन है भगवत पाद आदि शंकराचार्य तो ाज वर्ष पूर्व जब उन्होंने जन्म लिया तो उन्होंने शास्त्रार्थ कर कर के पूरे भारत में भ्रमण कर कर के यह जो नास्तिक शिक्षा दी जा रही थी बुद्ध के द्वारा बुद्ध का जो सिद्धांत है नास्तिक है उनके य ईश्वर की कल्पना नहीं है बिल्कुल भी ईश्वर का कोई जगह नहीं है नित्य ईश्वर नहीं है जो वो पूजते भी हैं बुद्ध को जिस बुद्ध को वो पूजते हैं उसको वो नित्य नहीं मानते हैं यहां से कोई व्यक्ति सिद्धि प्राप्त कर लेगा तब वो ईश्वर बनेगा ठीक है ईश्वर का सिद्धांत क्या है ईश्वर वही है जो कुछ भी कर सकता है उसके ऊपर कोई नियम लागू नहीं हो सकता मगर यहां बुद्ध में जो ईश्वर है उसके ऊपर एक नियम लागू हो रहा है बिना तपस्या के ईश्वर नहीं बन सकता

00:57:40:13 तो नियम लागू हो गया तो व ईश्वर नहीं तो क्या हुआ भगवान भगवत पाद आदि शंकराचार्य जी ने जगह-जगह भ्रमण कर कर के उनको शास्त्रार्थ में हराया कुमारिल भट्ट जी जैसे महान क्रांतिकारी संत आदि को साथ लिया जो क्या कहते हैं मंडन मिश्र थे उनके साथ उनका शास्त्रार्थ हुआ उन्होंने अपना शिष्य बनाया और बौद्धों से बचाकर हमारे धर्म को संरक्षित कर उन्होंने चार मठों की स्थापना की और उन चार मठों कोय दायित्व सौंपा कि आपको आने वाली सदियों तक इस धर्म के मूल स्वरूप को बचाकर रखना होगा शंकराचार्य भगवान की जय पूरी पीठाधी सर जगतगुरु महा भाग की जय तो वह जो चार मठ है उसमें आज भी वह जो गुरु शिष्य परंपरा भगवत पाद आदि शंकराचार्य जी के उन्होंने ज्ञान दिया पद्मनाभ को उसके बाद पद्म भुवन को उसके बाद वहां से लेकर आज तक शिष्य के शिष्य के शिष्य के रूप में वहां पर एक व्यक्ति ऐसा बैठा हुआ है जो आपकी धार्मिक समस्याओं को तुरंत हल कर देगा आप उनसे दीक्षा लेने नहीं जाना है अपने जीवन में बस इतना ठान लीजिए धर्म और अधर्म

00:58:55:19 के वि जब मुझे परेशानी होगी तो मैं वहां जरूर जाऊंगा हम सब लोग एक हो जाएंगे क्योंकि हमारा धर्म और अधर्म एक हो जाएगा अधर्म हमारा एक हो जाएगा धर्म हमारा एक हो जाएगा तब हम लोग संगठित हो जाएंगे जो भगवान भगवत पाद आदि शंकराचार्य जी ने भी जो जन्म लिया था उनका भी जन्म ऐसे ही नहीं कि व स्वघोषित आचार्य थे वो भी शास्त्रों में दिया गया वायु पुराण में पूरा वर्णन है वायु पुराणो एक लिंग महात्म है जिसमें य वर्णन दिया गया है भग पाद आदि शंकराचार्य जी ज्ञान जो भगवान नारायण है विष्णु जब सृष्टि की रचना करते हैं तो वह सबसे पहले ज्ञान देते

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00:59:34:02 हैं ब्रह्मा जी को ब्रह्मा जी ज्ञान देते हैं वशिष्ठ जी को वशिष्ठ जी ज्ञान देते हैं शक्ति को शक्ति ज्ञान देते हैं पाराशर को पारा सर ज्ञान देते हैं व्यास जी को व्यास जी ज्ञान देते हैं सुखदेव जी को सुखदेव जी ज्ञान देते हैं गड पादा चार्य को गड पादा चार्य ज्ञान देते हैं गोविंद

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00:59:51:21 योगिंद्र मतस्य को और फिर वो ज्ञान देते हैं भगवत पाद आदि शंकराचार्य को इसे कहते परंपरा तो ऐसी परंपरा में आज भी वह गुरु विद्यमान है बैठे हुए हैं जो हमें धर्म का वास्तविक स्वरूप दे सकते हैं जो हर सनातन विरुद्ध प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं जैसे स्वामी श्री कपाती जी महाराज ने नास्तिक भी आस्तिक जैसा ग्रंथ लिखा काल काल जाई ग्रंथ लिखा अभी उनकी जो प्रकट उत्सव है वो निकल के गया है 6 तारीख को उन्होंने ग्रंथ लिखा मार्क्सवाद और रामराज्य पूरे विश्व में जिसकी आज भी चर्चा है पूरे विश्व में तो जब भी कोई धर्म अधर्म के विषय में प्रश्न आएगा अंतिम अंतिम निर्णय जितने भी हमारे वरिष्ठ नेतृत्व राजनेता है अभि वो सब जानते हैं कि हमारा अंतिम निर्णायक कौन है शंकराचार्य के पद पर बैठने वाला आचार्य शंकराचार्य तो ऐसे ही हमारे पूज्य गुरुदेव हैं जो इस समय पूरी पीठ के शंकराचा रहे हैं इन्होंने आज से लगभग न वर्ष पूर्व भविष्यवाणी की थी कि ऐसा विपलव पूर्ण वातावरण आ रहा है जिससे होकर के निकलने के बाद

01:01:07:01 सृष्टि में संसार में एक नया परिवर्तन आएगा और धर्म की संस्थापन होगी विप्लव पूर्ण स्थितियां पहले आएंगी तो आप देख रहे हैं आसपास हमारे कितना विप्लव हो रहा है बाढ़ आ रही है प्राकृतिक आपदाएं आ रही है साथ ही साथ आपके बगल में बांग्लादेश में हो रहा है तो हमें अब जो जो शुरुआत मैंने जो की थी वहां पर दोबारा आ जाता हूं हमें इन स्थितियों से निकलने के लिए एक छत्र होने की आवश्यकता है हाथी बन के बैठने की आवश्यकता है हमें किसी से लड़ने नहीं जाना है कुछ नहीं करना है केवल संगठित होना है हम अगर संगठित हो गए तो सुरक्षित हो गए और आदित्य वाहिनी जिसके द्वारा ये कार्यक्रम आयोजित किया गया है जिसके द्वारा आप सबको आमंत्रित किया गया है उससे जुड़ने का अर्थ यह नहीं है कि आप अपना काम धाम सब छोड़ कर के और जो है पूरी पीठ चले जाए या शंकराचार्य के पास चले जाए नहीं आप यदि अपने गली मोहल्ले में रहते हुए अपनी अपने बच्चों की अपने परिवार की अपने खानदान की जिस बिल्डिंग में आप रहते हैं उस बिल्डिंग की जिस मोहल्ले में आप रहते हैं उस मोहल्ले की नगर की शहर की चिंता अगर आप कर रहे हैं तो आप आदित्य वाहिनी के सैनिक हैं अगर आपके मन में इन चीजों के लिए चिंता है तो आप आदित्य वाहिनी के सैनिक है तो संगठित होने के लिए

01:02:22:02 हमें इन सिद्धांतों की आवश्यकता है हाथी बन के बैठने के लिए इन सिद्धांतों की आवश्यकता है हमें बस करना इतना है कि अपने जन समुदाय को इन सिद्धांतों से अवगत कराएं कि भैया ज्ञान वही प्रमाणिक जो परंपरा से प्राप्त हो ईश्वर वही है जो कुछ भी कर सकता है नास्तिक भी आस्तिक ही है नास्तिक भी भगवान को ढूंढ रहा है इतनी बातें अगर हम बताना शुरू करें तो हम इन सिद्धांतों के सानिध्य में ईश्वर के सानिध्य में गुरु गोविंद और ग्रंथ के सानिध्य में संगठित हो जाएंगे और हाथी बनक बैठ जाएंगे फिर किसी स्वान के अंदर ये चेष्टा नहीं होगी कि कि वो हमारे ओ आक्रमण की दृष्टि डाल सके इसी के साथ मैं अपनी वाणी को विराम करता हूं गुरुदेव को प्रणाम [प्रशंसा] [संगीत]

01:03:11:13 करते कर सकते हैं धन्यवाद शिवान जी आपने बहुत अच्छा हमारा मार्गदर्शन [संगीत]

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