⬜ Not used yet · 00:00:07:03 – 00:32:52:00 (32:45)
00:00:07:03 अब आप ये बताइए आप कमेंट तो भरभ के करते थे। आज आप भरभात में कह रहे हैं कि मुझे नहीं पता मुझे नहीं पता। खैर अब आप ये बताइए मुझे कि क्या क्या काल तत्वदर्शी है? क्या यह क्लेम किया जाता है कि भैया काल ने कहा कि तू तत्वदर्शी की शरण में जा ठीक है और 1866 में भी कहा कि तू जा ठीक है चार 34 में कहा कि तत्वदर्शी की शरण में जा 1866 में कहा कि तू और किसी दूसरे प्रभु की शरण में जा आपके अनुसार है ना इसका मतलब वो जिस चीज के लिए भेज रहा है वह चीज उसके पास नहीं है। हेलो हां जी
00:01:04:26 तो क्या आ गया था काल तत्वदर्शी है क्या आप डीएनडी लगा दीजिए उसमें अच्छा क्या काल तत्वदर्शी है नहीं काल तत्वदर्शी नहीं है। काल तत्वदर्शी होते तो दूसरे के शरीर में जाने के लिए क्यों कहते? बस गुड। और आपके रामपाल ने भी यही माना है। ठीक है? तो इसका मतलब 1866 में तत्वदर्शी की 434 में तत्वदर्शी की शरण में जाने को कहा जा रहा है। तत्वदर्शी की शरण में जाने पर मोक्ष मिल जाएगा। पक्का? पक्का।
00:01:54:18 [हंसी] तो आपके पास भगवत गीता है भगवत गीता है ना तो दूसरे अध्याय का 16वा श्लोक खोलिए खोला खोलना खोला पढ़िए क्या लिखा है इसमें लिखा है असत भाव न विद्यते तू सत अभाव अरे हिंदी पढ़ लो भैया संस्कृत मत पढ़ो हिंदी पढ़ लो आप असत की सत्ता नहीं है और सत का अभाव नहीं है। इस प्रकार इन दोनों का तत्व तत्व ज्ञानी पुरुषों द्वारा देखा गया है। यहां पे
00:02:46:07 असत का भाव नहीं है और सत का अभाव नहीं है। ठीक है? हम ठीक है ना? असत का भाव नहीं है और सत का अभाव नहीं है। इस प्रकार इस बात को जानने वाले को ऊपर संस्कृत में देखिए क्या लिखा है? नीचे तो तत्व ज्ञानी लिखा हुआ होगा। ऊपर क्या लिखा है? संस्कृत में क्या शब्द है? तत्वदर्शी भी। हां क्या लिखा है? तत्वदर्शी भी मतलब तत्वदर्शी संतों के द्वारा देखा जाता है। यानी कि तत्वदर्शी कौन है? जो यह बात जानता है कि सत्य का कभी अभाव नहीं होता और असत का कभी भाव नहीं होता।
00:03:41:18 है ना? तत्वदर्शी कौन है? का अरे इस श्लोक के हिसाब से कौन है? जो ये जानता है कि सत्य का कभी अभाव नहीं होता और असत का कभी भाव नहीं होता। ठीक है? हम [गला साफ़ करने की आवाज़] तो
00:04:15:03 अब बात ये आती है कि जो व्यक्ति यह बता रहा है कि तत्वदर्शी कौन है जिसको यह पता है कि सत्य का कभी अभाव नहीं होता और असत का कभी भाव नहीं होता। जो व्यक्ति ये बता रहा है उसको ये बात मालूम है ना कि सत्य का कभी अभाव नहीं होता और असत का कभी सत का कभी अभाव नहीं होता और असत का कभी भाव नहीं होता। जो व्यक्ति जो व्यक्ति यह बता रहा है कि भैया जो भी व्यक्ति यह जानता है कि सत और असत का ये ये होता है वो व्यक्ति तत्वदर्शी है। जो व्यक्ति ये बता रहा है उसको ये मालूम है ना कि सत और असत का क्या मामला है? किसी ने तो दिया है ना कि तत्वदर्शी के द्वारा देखा जाता है। किस प्रकार देखा जाता है? सत्य और असत सत्य और असत क्या है? तत्वदर्शी ही बताता है। हां। मगर वो क्या है कि सत्य का कभी अभाव नहीं होता। वहां लिखा है ना इस प्रकार क्या लिखा है?
00:05:28:00 क्या लिखा है? हम इस प्रकार हम यानी कि मैं एग्जांपल ले लूं जैसे कि मान लीजिए कि मैं ये बता रहा हूं कि जो व्यक्ति ये जानता है कि कुर्सी को इंग्लिश में चेयर कहते हैं। ठीक है? मैं ये कह रहा हूं कि जो व्यक्ति ये जानता है कि कुर्सी को इंग्लिश में चेयर कहते हैं उसको इंग्लिश जानने वाला माना जाता है। ठीक है? तो मेरा मेरे ऐसे बताने से ये सिद्ध हो गया ना कि मैं जानता हूं कि कुर्सी को इंग्लिश में चेयर कहते हैं।
00:06:12:09 नहीं समझे? तो यहां तो आत्मा परमात्मा की बात चल रही है। चेयर कहां से भाई साहब? में एक एक करके बात करिए। मैंने अभी ये पूछा है कि अगर कुर्सी को इंग्लिश में चेयर जानने वाला मैं कह रहा हूं कि तत्वदर्शी है तो मैं यह बात जानने के कारण कि कुर्सी को इंग्लिश में चेयर कहते हैं। मैं भी तत्वदर्शी सिद्ध हो रहा हूं ना। जब मुझे पता है कि कुर्सी को इंग्लिश में क्या कहना चाहिए तभी तो मैं यह बता रहा हूं कि जो यह बात जानता है वह तत्वदर्शी है।
00:06:52:12 ये भी जो चीज है कि कुर्सी बनी किस पे है? कुर्सी बनने की बात वहां आ रही है क्या? खाली कुर्सी पे ही क्यों? नहीं भाई श्लोक में क्या लिखा है? श्लोक में खाली कुर्सी की बात जानने वाले को तत्वदर्शी कहा गया कि नहीं कहा गया? हां, ये चीज ठीक है। लिखा है यहां पे लेकिन ये चीज लिखा है। एक मिनट भाई भाई साहब भाई साहब एक मिनट भाई साहब एक एक करके चलिए वहां पर केवल सत और असत के बारे में सही से जानकारी रखने वाले को तत्वदर्शी कहा गया है कि सत्य का कभी सत्य का कभी अभाव नहीं होता और असत का कभी भाव नहीं होता। इसका मतलब जो इस बात को बता रहा है कि जो लोग यह जानते हैं वह तत्वदर्शी है वह बताने वाला भी तत्वदर्शी सिद्ध हो रहा है। तो इस श्लोक के अनुसार इस श्लोक के अनुसार काल भी तत्वदर्शी सिद्ध हुआ। ठीक है? अब दूसरी एक बात आती है कि आपके अनुसार जो रामपाल है वो तत्वदर्शी है। ठीक है? इसके
00:08:07:15 अनुसार इसके अनुसार काल कैसे तत्वदर्शी संत हुए सिद्ध हुए इस श्लोक में तो ये खुद कह रहे हैं कि तत्व ज्ञानी पुरुषों द्वारा देखा गया है। वो अपने आप को थोड़ी बता रहे हैं यहां पे। अरे भाई क्या देखा गया है? क्या देखा गया है? इसमें जब श्लोक में खुद कह रहे हैं कि असत का तत्वज्ञानियों तत्व ज्ञानियों के द्वारा क्या देखा गया है भाई साहब तो जब ये कह रहे हैं कि सत्य का भाव नहीं और असत का अभाव नहीं और ये ये तत्व्ञानियों के द्वारा देखा ये तत्वज्ञानियों के द्वारा देखा गया तो काल जो काल है जो जो इस श्लोक को बोल रहा है उसको को पता चल गया ना कि सत्य का भाव अभाव नहीं होता है और जिसको पता चल गया उसको तत्वदर्शी माना उन्होंने
00:09:11:06 तो फिर वो दूसरे के पास जाने के लिए क्यों कहा है ये तो आप बताओगे ना मुझे आपने कहा है ना काल तत्वदर्शी नहीं है मैंने तो नहीं कहा और आप ये कहते हो दूसरे एक मिनट एक मिनट भाई साहब आप ये कहते हो कि वहां दूसरे के पास जाने की बात कही गई है हम नहीं कहते ये क्लेम हम नहीं करते हैं कि दूसरे के पास जाने को कहा है। ये आप करते हो। हम गीता का परंपरा से प्राप्त अर्थ लेते जिसमें जाने की बात को नहीं कहा गया है। हमने वहां कहा है कि आ जाने की बात को वहां कहा गया है। मगर आप कहते हो कि नहीं जाने को कहा गया है। तो अगर जाने को कहा गया है तो यहां तो तत्वदर्शी सिद्ध हो रहे हैं। काल आपके अनुसार अब दूसरी बात अब दूसरी बात भाई साहब। दूसरी बात ये है कि हमने एक बात जान ली कि सच का कभी अभाव नहीं होता। सत का कभी कभी अभाव अभाव नहीं होता। जीवन मरण से छूट जाना क्या उसे सत स्वरूप हो जाना कह सकते हैं?
00:10:19:22 जीवन मरण से छूट जाना। क्या उसे सत स्वरूप हो जाना कह सकते हैं। सत स्वरूप मतलब सत जो कभी बदलता नहीं है। इस शरीर का अगर वृत्ति हो गई। शरीर खत्म हो गया। इसका मतलब यह नहीं हुआ कि हमारी हमारी मुक्ति हो गई। मैं कहां कह रहा हूं? मैं कह रहा हूं क्या जो आत्मा है वो छूट के कभी सत स्वरूप हो सकती है। सतलोक में पहुंचने के बाद वो सत स्वरूप हो जाएगी कि नहीं? जिसको कभी जो सत स्वरूप हो जाएगी। हां। अच्छा पक्का पक्का। हां तो इसका मतलब आत्मा एक ऐसा तत्व है जिसका कभी अभाव नहीं हो सकता
00:11:14:21 क्योंकि वो सत है ना सत हो जाएगी ना सतलोक जाकर के तो अभाव तो हो नहीं सकता उसका तो आपके बाबा जी तो यहां पर लिख रहे हैं कि उसका अभाव था आत्मा का पहले पहले यानी कि तत का भी किसी समय अभाव हो सकता है। ये पहले की बात है और पहले या बाद में तत का अभाव माना जा सकता है कि नहीं? यानी पहले वो असत थी। चलो ऐसे मान लो पहले असत थी असत तो बाद में हुई सत्य पहले थी पहले सत्य थी तो सत्य पहले थी तो अभाव कैसे हो गया क्योंकि यहां है इसके लिए अभाव पहले मान रहा है आने से पहले मेरे भाई पहले अपनी पढ़ो पहले हमारे ग्रंथों को पढ़ने की बजाय अपने बाबा जी के ग्रंथ को पढ़ो ये देखिए आप दूसरे अध्याय के
00:12:29:06 16व ही श्लोक का वर्णन करते हुए आपके जो रामपाल जी हैं कहते हैं कि उत्पत्ति से पहले आत्मा का अभाव था। दिख रहा है ठीक है। तो यदि आत्मा का अभाव था यानी कि वो असत हो गई। ठीक तो परमात्मा के साथ थे ना इसके लिए अरे इधर उधर देख के झूठ मत बोलो भाई नहीं वो कह रहे हैं सुनो सुनो आपके बाबा जी क्या लिख रहे हैं सुनिए [गला साफ़ करने की आवाज़] परमात्मा से संपूर्ण संसार व्याप्त है यानी कि विस्तार को प्राप्त हुआ है। उस अविनाशी परमात्मा का अभाव किसी भी समय में नहीं होता है। ठीक है? सही बात है। परमात्मा के अतिरिक्त कोई भी नित्य नहीं है। यानी कि आत्मा का अभाव था। परमात्मा से अलग है ना आत्मा? कोई भी नित्य नहीं है। क्योंकि आत्मा की उत्पत्ति परमात्मा ने अपने वचन से, अपने शरीर से की है। उत्पत्ति से पहले आत्मा का अभाव था। उत्पत्ति से पहले
00:13:44:09 आत्मा का अभाव था। तो अभाव किसका होता है? असत का जो असत है। तो अगर आत्मा अगर आत्मा असत है सुनिए अगर आत्मा असत है तो दो 16 के अनुसार उसका कभी भाव नहीं हो सकता। वो कभी सत नहीं हो सकती। यह ज्ञान यहां पे है 21 ब्रह्मांड के लिए। ये कहां लिखा है? काल के काल काल के लिए प्रमाण कहा है कि यह ज्ञान यहां के लिए है क्योंकि काल खुद दे रहे हैं ना अब मैं प्रमाण पूछ रहा हूं इस समय आपसे काल खुद दे रहे हैं ये ज्ञान तो इसके लिए वो कह रहे हैं भाई साहब ये कहां लिखा है कि ये सत असत का जो बात है ये किस ब्रह्मांड के लिए है ये बात ये कहां लिखा है जब वो खुद कहते हैं ना कि हां भाई भाई साहब मैंने कहा अगला शब्द आप बताएं कि अध्याय नंबर यह श्लोक क्रमांक ये प्रमाण पूछ रहा हूं। प्रमाण आपका पक्ष नहीं दो तीन चीजें हैं कन्वर्सेशन में। पक्ष तर्क प्रमाण तो पक्ष आपने रख दिया कि ये तो 21 ब्रह्मांडों की बात है।
00:15:00:04 सत असत वाली बात 21 ब्रह्मांडों के लिए है। ठीक है। तर्क भी मैंने आपसे मांगा नहीं। फिलहाल अब मैं आपसे प्रमाण मांग रहा हूं। प्रमाण बताइए। यह जो सतत की व्याख्या की है जिसके कारण तत्वदर्शी कहा गया व्याख्या को जानने वाले को। यह व्याख्या केवल 21 ब्रह्मांडों के लिए है। ये कहां लिखा है? आपको कोई मतलब नहीं है क्या सच्चाई से? हैं? क्यों नहीं मतलब है? साफ दिखाई दे रहा है कि यहां पे आप अटक रहे हो। कुछ भी बोलते जा रहे हो। नहीं नहीं ऐसी बात तो नहीं है। आपके बाप जी ने कहां लिखा है ये? कहां लिखी है वाली बात? एक ये सत असत वाली बात 21 ब्रह्मांडों के लिए है। कहां लिखी है?
00:15:48:16 अरे कुछ तो शर्म कर लो आप लोग। थोड़ी शर्म आती है कि नहीं? कुछ भी बोल दो बस मुंह से। बाबा जी ने यह लिखा है कि असत औसत की जो बात है वह केवल उसके लिए है 21 ब्रह्मांडों के लिए और ना ही हमारे सनातन शास्त्रों में कहीं लिखा है और तर्क के अनुसार भी देखेंगे तो यदि आप आत्मा का अभाव मान लोगे जिसका आपने जवाब नहीं दे पाए थे कि मटेरियल कहां से आया अभाव अगर मान लोगे तो जिस चीज का अभाव था उसका कभी शाश्वत सत स्वरूप नहीं हो सकती फिर आप उसको मुक्ति नहीं दे
00:16:28:21 जो सतलोक वाली अनंत काल की मुक्ति है वो फिर आप क्लेम नहीं कर सकते क्योंकि उसका अभाव था वो भाव वाली नहीं हो सकती फिर सत स्वरूप हो ही नहीं सकती क्योंकि सत स्वरूप थी नहीं सत स्वरूप तो वही हो सकता है जो सत स्वरूप है समझ रहे हैं कुछ सब बातें थोड़ा सोचा करिए कुछ भी बोल दो चाहे वो अपने बाबा जी से मैच कर रही है कि नहीं कर रही आपने 10 बातें अभी तक बोल दी जो आपके बाबा जी से मैच नहीं कर रही पहले आप आत्मा को नित्य कह रहे थे। आपके बाबा जी ने नित्य नहीं माना आत्मा को।
00:17:02:26 ठीक है? थोड़ा थोड़ा अपने सेंस ऑफ ह्यूमर का इस्तेमाल करो मेरे भाई। अच्छा बाबा जी ने बाबा जी ने नित्य नहीं माना है कि परमात्मा के जीव अविनाशी जीव है। अविनाशी अलग हो गया। और फिर वो क्लेम बनता है जो कह रहा है कि पहले जो है यह नित्य नहीं यह अभाव था और फिर कह रहा है बाद में अविनाशी है। अच्छा अब दूसरी बात अब ये बताओ कि आप कहते हो कि जब आत्मा ये हम अंतिम अंतिम थोड़ी सी बात कर रहे हैं। फिर उसके बाद किसी और से बात करेंगे। आपके साथ काफी बातें हो चुकी थी। [गला साफ़ करने की आवाज़] अर्जुन जब भगवान श्री कृष्ण के साथ में खड़ा है शरीर से आपके अनुसार उनके उनके अंदर काल जाकर के बोल रहा था। ठीक है? तो यदि अर्जुन श्री कृष्ण की शरण में पहले से ही है तो फिर कृष्ण क्यों कहेंगे कि वो मेरे पास आए? है ना?
00:18:06:28 अर्जुन श्री कृष्ण की शरण में पहले से ही है। तो फिर यह तर्क नहीं बनता कि भाई मेरे अपने पास आने को क्यों कहेंगे वो यह क्लेम किया जाता है ना रामपाल रामपाल वालों की तरफ से हम तो अब बात यहां पर ये आती है कि क्या ये जो जीव है उसको जो अविनाशी कहा गया है वो किस कारण से कहा गया है क्यों है जीव अविनाशी परमात्मा का अंश है इसके लिए अविनाशी कहा गया नहीं
00:18:43:15 इसलिए कहा गया है कि वह सदैव परमात्मा के साथ रहती है। ये आपके बाबा जी ने अपनी किताब में कहा है। सदैव परमात्मा के साथ होने से आत्मा अविनाशी है। समझ रहे हैं मेरी बात? परमात्मा के ऐसा लिखे हैं कि परमात्मा के साथ रहती थी। वहां से हम बिछड़ के आए। इसके लिए नहीं अविनाशी अविनाशी तो है। नहीं परमात्मा के साथ है इसलिए अविनाशी है। साथ में है। जैसे ही वो साथ कट होगा हटेगा वो अविनाशी नहीं रह जाएगी। वो साथ में है परमात्मा के। इसलिए अविनाशी है।
00:19:34:12 अब कुछ बातें थोड़ी सी मैं पूछ लूं आपसे। मैं एक बात खत्म कर लूं फिर हम लोग करेंगे बात तो परमात्मा जो है क्या कहते हैं परमात्मा के साथ रहने के कारण आत्मा अविनाशी बताई गई है आपके रामपाल के द्वारा ठीक है तो अब बात ये आती है कि
00:20:09:08 यदि आत्मा सदैव परमात्मा के साथ होने के कारण अविनाशी है तो यानी कि जिस समय जो अर्जुन है वो काल की शरण में था श्री कृष्ण की शरण में था उसी समय अर्जुन परमात्मा की शरण में भी था तो फिर किस परमात्मा की शरण में जाने को बोला गया। यही चीज तो हम आपसे पूछना चाहते हैं। अरे हमारे अनुसार तो जाने को बोला ही नहीं जा रहा ना भाई। हमारे अनुसार तो ज्ञान दो तरीके की गति होती है। एक होती है ज्ञानार्थक और एक होती है गत्यार्थक। ज्ञानार्थक गति यह होती है कि मैं भले ही आपके पास भी खड़ा हूं पर फिर भी मैं मन से आपकी शरणागत नहीं हुआ हूं। ज्ञानार्थक गति नहीं है वहां पे। गत्यार्थक गति तो है। समझ रहे हैं? फिर
00:21:24:24 आपने कहा कि तू मुझको अपना ले। तू मेरे पास आजा, मेरा हो जा, मेरी शरण में आजा। तो यह हो गई ज्ञानार्थक गति। वहां होते हुए भी आप उसकी शरण आपने उसकी सत्ता को स्वीकार नहीं किया था पहले मन से अब जो है मन से ज्ञानार्थक गति करने को बोला जा रहा है गत्यार्थक गति करके तो तुम आ गए हो मगर ज्ञानार्थक गति अभी नहीं कर पाए हो तो ज्ञानार्थक गति के लिए वहां बोला गया तो हमारे अनुसार जाने के लिए बोला ही नहीं गया है आपके अनुसार बोला गया है तो सवाल फिर आपसे है कि यदि वहां पर परमात्मा भी था तो फिर किसके पास जाने को बोला गया? क्योंकि परमात्मा के साथ रहने के कारण ही आत्मा अविनाशी है।
00:22:15:01 ठीक है? अब इस सब के बाद एक बात ये आ गई कुल मिलाकर के तत्वदर्शी हम सिद्ध नहीं कर पाए आपका। ठीक है? आपने आत्मा के बारे में कुछ बताया नहीं। आपने मोक्ष के बारे में कुछ बताया नहीं। काल के वो जीवन मरण के बारे में कुछ बताया नहीं। अब कुल मिलाकर के बात आ जाती है कि भाई जब आपके द्वारा मिलने वाला मोक्ष मोक्ष ही नहीं है। ठीक है। अच्छा ये बता दो ईश्वर है ये सिद्ध कैसे होता है? बस ये बता दो।
00:22:54:14 सीता ईश्वर है सिद्ध कैसे होता है [गला साफ़ करने की आवाज़] ईश्वर की कुछ सत्ता होती है कि नहीं मैं आपसे पूछ रहा हूं कैसे सिद्ध करोगे ईश्वर है मुझे बताओ ईश्वर की सत्ता को सिद्ध करिए अब इस चीज को हम नहीं सिद्ध कर पाएंगे। आप सिद्ध कर सकते हैं। आपके तत्वदर्शी ने तात्विक चीजें कुछ बताई है कि नहीं बताई है? सुनो।
00:23:34:26 ईश्वर सिद्ध कैसे होता है? अगर इस चीज को अगर आप समझ लोगे ना और न्यूट्रल होकर के एक बार को सोचने का प्रयास करोगे तो मेरे भाई आप चीजों को समझ पाओगे कि सत्य वास्तविकता में है क्या केवल इसी बात से हम आपकी सारी बातें बहुत ध्यान से सुन रहे हैं। सुनिए समझने की कोशिश कर रहे हैं। सुनिए प्रदारक उपनिषद का एक वचन है। उसके आधार पर मैं आगे की व्याख्या करूंगा आप समझ जाएंगे। असतो मा सद्गमय तमसो मागमय मृत्य मतम गमय संसार के प्रत्येक जीव में कभी ना मरने की अखंड ज्ञानी बन जाने की सदा सुखी रहने की चाह विद्यमान है। उसी चाह को इस वचन में कहा गया है। असतो मा सद्गमया तमसो मा ज्योतिर्गमया मृत्यु मामया अब क्या है कि हमारे अंदर की वह चाह जिससे हम चाह करके भी अलग नहीं हो सकते। उस चाह के विषय का होने का उस चाह का विषय का अस्तित्व
00:24:51:13 डंके की चोट पर हमें मानना पड़ेगा। जैसे कि अगर हमारे अंदर भूख है भोजन की तो उससे सिद्ध हो जाता है कि इस दुनिया में भोजन है। हमारे अंदर प्यास है पानी की उससे सिद्ध हो जाता है कि इस दुनिया में कोई पानी है। इसी प्रकार से जिस प्रकार से भूख मात्र होने के कारण भोजन का अस्तित्व सिद्ध होता है। प्यास मात्र सिद्ध होने के कारण पानी का अस्तित्व सिद्ध होता है। उसी प्रकार सच्चिदानंद स्वरूप परमेश्वर की प्यास होने के कारण सच्चिदानंद स्वरूप परमेश्वर का अस्तित्व सिद्ध होता है। अब इसमें एक फैक्ट आएगा। फैक्ट क्या आएगा? कि एक बच्चे ने जन्म लिया। ठीक है? उसको कुछ नहीं बताया गया कि इस दुनिया में कोई भगवान है। कोई सच्चिदानंद स्वरूप परमेश्वर है। या उसको यह नहीं बताया गया कि इस दुनिया में अनंत सुख है। या फिर उसको यह नहीं बताया गया कि इस दुनिया में अनंत ज्ञान है। या फिर उसको ये नहीं बताया गया कि इस दुनिया में अमरता है। फिर भी बचपन से ही वो सचित आनंद को ढूंढता है। हर चीज में वो उसी को ढूंढ रहा है।
00:26:06:19 तो जब उसको यह बताया ही नहीं गया कि इस दुनिया में सच्चिदानंद स्वरूप परमेश्वर है तो फिर वो उसको ढूंढ क्यों रहा है? इससे सिद्ध होता है कि जो जीव है वो ईश्वर का अंश है। उसके अंदर भी अपनी क्वालिटीज वो विद्यमान है। वो जिसकी कारण वो आकर्षित हो रहा है। अंश हमेशा अपने अंशी की ओर आकर्षित होता है। समझ रहे हैं? अंश हमेशा अपने अंशी की ओर आकर्षित होता है। तो जैसे कि जो अग्नि है जब वो लपट बनती है तो वो दाएं हवा अगर नहीं चलेगी तो वो सीधे आकाश में स्थित अपना जो उसका अंशी है अग्नि हो गई अंश और उसका अंशी सिद्ध हुआ ऊपर आकाश में सूर्य तो वो अपने अंशी की ओर भागने का प्रयास करती है। कोई भी चीज जहां से निकली है वहीं जाने का प्रयास उसका होता है। नदियां, झरने, जल प्रपात इत्यादि सब पेड़ पौधे जहां से निकलते हैं उसी में
00:27:21:20 मिल जाने के लिए हर दिन वो गति करते हैं। इसी प्रकार जो जीव है क्योंकि वो ईश्वर का अंश है। सच्चिदानंद स्वरूप परमेश्वर का अंश है। इसीलिए वो उसी उसी में मिल जाने के लिए प्रयासरत होता है। बिना बताए ही बिना स्वीकार किए ही उसके अंदर सच्चिदानंद स्वरूप परमेश्वर के लिए आकर्षण होता है और उस आकर्षण से ही हम सिद्ध कर पाए हैं कि भगवान है वरना आप सिद्ध नहीं कर सकोगे। ठीक है? यहां पे इतने लोग इतने लोग नास्तिक है जो कभी भगवान को मानते ही नहीं तो उनको कैसे सिद्ध करेंगे कि ईश्वर है। सिद्ध कर तो दिया नास्तिक भी कभी मरना नहीं चाहता है। हम सिद्ध कर भाई उसको तो पता है कि मरना है एक दिन मरे मरेंगे हम भी मरेंगे मगर मरना नहीं चाहता मरना नहीं चाहता अलग बात मैं बता रहा हूं ना जब उसको पता है कि मरना है एक दिन फिर भी वो मरना क्यों नहीं चाहता है क्यों दुख है आपके मन में यानी कि वो मुंह से कह रहा है कि इस दुनिया में कोई अमर नहीं है। मगर खुद कह रहा है कि मुझे अमर अमर के पास ही जाना है। खुद कह रहा
00:28:36:21 है इस दुनिया में कोई अखंड ज्ञानी नहीं है। ईश्वर का मतलब क्या है? सच्चिदानंद स्वरूप परमेश्वर। सतचित आनंद स्वरूप परमेश्वर। जो अमर है जो अखंड ज्ञानी है जो कभी दुखी नहीं होता। ठीक है? ये है भगवान का अर्थ। तो भगवान शब्द से भगवान को नकार कर अपनी क्रियाओं में अपनी इच्छाओं में वो उसी भगवान को ढूंढ रहा है जिस भगवान के होने से वो मना कर रहा है। जैसे एग्जांपल ले ले वैज्ञानिक वैज्ञानिक कहते हैं कि इस दुनिया में ऐसा कोई नहीं है जो सब कुछ कर सकता है। सर्वशक्तिमान है। कहते हैं ना कहते हैं। मगर उनसे यह पूछा जाए कि भैया यह बताओ कि वह कौन सा आविष्कार होगा जिसको करने के बाद तुम शांत बैठ जाओगे?
00:29:31:06 तो वो क्या जवाब होगा? जिस दिन मैं कुछ ऐसा यंत्र बना लूंगा कि मैं सब कुछ कर सकूं। तब तक वैज्ञानिक शांत नहीं बैठेंगे। जिस दिन मैं कुछ ऐसा बना लूंगा कि मैं जो चाहूं कर सकूं। इसका मतलब वह जा उसी तत्व की ओर रहे जिस तत्व के अस्तित्व को अभी नकार रहे हैं। सिद्ध कर दिया हमने बहुत से नास्तिकों को आस्तिक बनाया है। बहुत से नास्तिकों का मुंह बंद किया है। मेरे ख्याल से रामपाल जी ने कभी नहीं किया होगा। आपके गुरु है इसलिए जी लगा रहा हूं। अब दूसरी बात ये आती है। मैं अपने मूल विषय पे आ जाता हूं जो चल रहा था। तो क्योंकि उसके अंदर भी वही क्वालिटीज है जो परमात्मा के अंदर है। इसलिए जीव आकर्षित होता है परमात्मा की ओर। परंतु
00:30:25:08 जिसके कारण उस अट्रैक्शन के कारण हम ईश्वर को सिद्ध कर पाते हैं। ईश्वर को सिद्ध करने के कारण हम धर्म को सिद्ध कर पाते हैं। परंतु आपके जो ये जो बाबा जी हैं इन्होंने आत्मा के अंदर वो क्वालिटीज मानी ही नहीं है। तो फिर आत्मा अट्रैक्ट कैसे होगी? ईश्वर की ओर जब उसके अंदर ईश्वर की क्वालिटी है ही नहीं तो अट्रैक्ट कैसे होगी ईश्वर की ओर और जब अट्रैक्ट नहीं होगी तो ईश्वर सिद्ध कैसे होगा और जब सिद्ध नहीं होगा तो धर्म कैसे सिद्ध होगा ये सब सोचने वाली बात है और इसके साथ ही साथ जब आत्मा के अंदर सच्चिदानंद की क्वालिटी है ही नहीं तो उसे तुम सच्चिदानंद स्वरूप मोक्ष कैसे दोगे? अभी हो गया 11 बज गए
00:31:22:12 लाइट बंद हो भाई वो सच्चिदानंद है ही यहां तो मोक्ष तब दे रहे है ना वो सच्चिदानंद है बस उसको उस तक पहुंचाना है उसका बोध कराना है तब तो ठीक है आपने मान लिया कि वो वो सच्चिदानंद है ही नहीं उसका तो अभाव था तो ना तो वो अट्रैक्ट होगी ना तो वो अट्रैक्ट होगी ईश्वर के लिए और ना ही उसको आप कभी अनंत वो जीवन वो अनंत मुक्ति दे पाओगे। क्यों नहीं दे पाओगे? क्योंकि वो तत स्वरूप है ही नहीं। सच्चिदानंद का अभाव कहां है? सच्चिदानंद अब आप जाइए। अब आप जाइए। हंसीखुशी जाइए। आप मैंने जो आपको समझाया उसको जरा मनन करिए। चिंतन करिए। अभी आपको बहुत अध्ययन की आवश्यकता है। ठीक है? आप चिंतन मनन करिए और आप एक बात बताइए कि आपको क्या आपके गुरु जी ने यह बताया है कि आपकी ये किताबें कहां छपती हैं?
00:32:39:15 चले गए क्या? [संगीत]
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असली तत्वदर्शी श्री कृष्ण! पाखंडी रामपाल का भंडाफोड़, लाइव में चेला हुआ परेशान
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