⬜ Not used yet · 00:00:02:07 – 00:06:20:07 (6:18)
00:00:02:07 तो सभी को जय श्री राम और एक बहुत ही शुभ समाचार प्राप्त हुआ है। हद्वानी के जो हिमांशु शुक्ल जी हैं उनके अथक प्रयासों द्वारा उनका जो उनकी जो संस्था है उनका जो संगठन है उसके अथक प्रयासों द्वारा जो हद्वानी का जो ये रामपाल का आश्रम था उसमें आप उसमें आज ताला लग चुका है तो हमारे और आपके लिए ये बड़े ही हर्ष का समाचार है और इसी प्रकार से हम प्रार्थना करते भगवान से आने वाले भविष्य में जगह-जगह पर रामपाल के जो कुकृत करने वाले केंद्र खुल गए हैं वो सब इसी प्रकार से बंद हो। इसी प्रकार से जन सामान्य में चेतना आए और वो अपने आसपास हो रहे अधर्म के विरोध में खड़ा हो जाए। क्योंकि हम कितना भी प्रयास कर ले मगर हमारी एक सीमा हो सकती है। हम हर जगह जाकर के खड़े नहीं हो सकते। तो हमें ऐसे धर्मज्ञ महानुभावों को जगह-जगह पर खड़े करना है जो हिमांशु
00:01:17:10 शुक्ल जी जैसों के रूप में वहां पर अपने आसपास अपने आसपास हो रहे इस प्रकार के अधर्म को प्रतिकार करने लगे। जिसके फलस्वरूप आपके आसपास से अधर्म की जो छाया है काली छाया वो समाप्त होने लगेगी। स्वतः ही हिंदू राष्ट्र का निर्माण होने लगेगा। स्वतः ही धर्म संस्थापना होने लगेगी। यदि प्रत्येक व्यक्ति अपने आसपास अधर्म को ना होने दे। बहुत शुरुआती स्तर पर यह बहुत आसानी से आप कर सकते हैं। समस्या क्या है कि हम यह सदैव इस प्रतीक्षा में रहते हैं कि कोई और कुछ करे हम ना करें। हमें कुछ ना करना पड़े। हम केवल बता दें मगर करें कोई और। तो इस भावना को त्यागते हुए केवल समीक्षक ना बने, केवल तटस्थ ना बने और मैदान में उतरे यदि कुछ बदलाव लाना है तो। और इसी प्रकार से मैदान में उतर के जो हमारे एक ध्राता हैं हिमांशु शुक्ल जी उन्होंने और उनके संगठन ने यथोचित शक्ति का प्रदर्शन करके बल बुद्धि और शौर्य के साथ
00:02:32:19 आज हलवानी में वहां पर ताला लगवा दिया है रामपाल के एक आश्रम में और जल्द ही यह लहर एक राष्ट्रव्यापी आंदोलन के रूप में उद्भाषित हो और जगह-जगह राम भोपाल के जो तथाकथित आश्रम है उनमें ताला लगे ऐसी हम कामना करते हैं। ऐसी हम प्रार्थना करते हैं। ठीक है। एक मिनट जरा। अच्छा अब एक आवश्यक बात कि आज से जो सीरीज शुरू हो रही है कि श्रीमद् भगवत गीता पर रामपाल के बोल वचन इस सीरीज में हम एक एक अध्याय का एक एक श्लोक लेते चलेंगे कि क्या-क्या उसने किया है रामपाल ने किस तरह से मैंने प्लेट किया है। यह देखिए आज के वह चित्र हैं जो हमें प्राप्त हुए हैं। यह वहां ताला लगाया जा रहा है। सील किया जा रहा है आश्रम को। देखिए ये है आप चिल्लाते रहो।
00:03:48:00 वेदों में प्रमाण है। वेदों में प्रमाण है। हम यह करेंगे धरती पर। है ना? आप चिल्लाते रहो। वीडियो बना के खुश हो जाओ। फैक्ट फैक्टफुल डिबेट्स बना लो और वह क्या कहते हैं? वह बना लो। क्या नाम है उसका टीवी चैनल का? ऐसे न्यूज़ चैनल। वाह दिखाओ उसमें ये न्यूज़ कैसे बंद किया गया तुम्हारे आश्रम को? कैसे ताला लगाया गया? हम दिखाओ ये न्यूज़। तुम वो करो। तुम वीडियो बनाओ। हम धरती पर काम करेंगे। हम अवैध रूप से छापी जाने वाली किताबों को जलाएंगे चौराहे पर। आश्रमों में ताला लगवाएंगे। तुम वो करो। तुम उसमें खुश रहो। हम यह करेंगे।
00:04:34:10 तो आज हम ये जो सीरीज शुरू करने वाले हैं इसमें रामपाल के द्वारा ये जो भगवत गीता ये इसका अर्थ अपार्थ रामपाल ने किया है और एक-एक श्लोक को हम लेते चलेंगे कि उसने कहां क्या-क्या गड़बड़ की है और बहुत ही रोचक रहेगा ये ये यात्रा। इसमें एक तरीके से आप प्रॉपर हमारी जो प्रामाणिक अर्थ है उसमें क्या लिखा है और इस गपोड़ बाज ने क्या लिखा है अपनी गीता में गीता गीता में नहीं मतलब अपने किताब में क्या लिखा है गीता का अर्थ के गीता के अर्थ के नाम पर यह सब आपको पता चलेगा और साथ ही साथ आपको क्रमबद्धता से प्रत्येक श्लोक की व्याख्या एक प्राप्त हो जाएगी कि यदि कोई व्यक्ति कहीं पर आपको रामपाल के बताए हुए अर्थ के आधार पर दबाने की कोशिश कर रहा है भगवत गीता के किसी श्लोक के आधार पर तो आप यहां से यह जो प्लेलिस्ट बन के तैयार होगी आने वाले कुछ समय में यहां प्लेलिस्ट में जाएंगे और अध्याय कौन सा है किस अध्याय का वो श्लोक है जैसे आज हम दूसरे अध्याय के 30वें श्लोक तक बात करने वाले हैं। तो आप प्लेलिस्ट
00:05:49:10 के अनुसार जिस जो श्लोक आपको परेशान कर रहा है उस श्लोक के उस श्लोक को फॉलो करते हुए वहां पहुंचेंगे। प्लेलिस्ट में वीडियो में और आपको वो जवाब आपका मिल जाएगा। है ना? एक तो यह है। अच्छा अब सबसे पहले ये सीरीज शुरू करने से पहले हम कुछ बुलेट पॉइंट्स जो है वो एक बार सरसरी निगाहों से देख देख लें। वैसे तो अ
✅ This part is already used · 00:06:20:07 – 00:24:49:18 (18:29)
→ Used in: B · Video रामपाल का मनमौजी गीता अर्थ #1 अध्याय 2 #gita #gitagyan at 0:02 ↗
00:06:20:07 आप लोग जो भी इस चैनल के रेगुलर फॉलोअर्स हैं जो इसको फॉलो करते हैं चैनल्स को आह्वान को और सर्वशक्तिमान धर्म को तो उसमें उन लोगों को ये मालूम होंगे जो हमारे बुलेट पॉइंट्स हैं। मगर फिर भी क्योंकि आज ये बिगिनिंग है। आज ये प्रारंभ हो रही है श्रंखला। तो इसमें आपको बुलेट पॉइंट्स हम बता देते हैं। देखिए जो रामपाल के द्वारा दिया जाने वाला ज्ञान है उसको प्रारंभिक स्तर पर जब आप श्लोकों को ना खोलें जब आप प्रमाण को ना खोलें उससे पहले वो कौन से सवाल हैं जो रामपाल के लोग कभी नहीं दे सकते हम तो वो पहला सवाल तो है क्या रामपाल के द्वारा प्रतिपादित होने वाला ईश्वर सर्वशक्तिमान है यदि वह सर्वशक्तिमान है तो क्या वह माता के गर्भ से जन्म ले सकता है। क्या वह अपने रूप को बदल सकता है? यदि माता के गर्भ से जन्म लेगा तो उनका ही एक सिद्धांत खंडित खंडित हो जाएगा जिसमें वो ये प्रचारित करते हैं कि जो ईश्वर है वो माता के गर्भ से जन्म नहीं ले सकता। इसकी व्याख्या किसी और दिन करेंगे। मगर फिलहाल इतना है कि रामपाल के ईश्वर
00:07:35:08 के सामने एक बाधक बंधन है कि वो दुनिया में कुछ कार्य ऐसे हैं जो नहीं कर सकता जैसे कि माता के गर्भ से जन्म नहीं ले सकता। दूसरा वह अपनी देह का नाश करके नहीं दिखा सकता। नष्ट नहीं कर सकता। क्यों? क्योंकि वो सका शरीर आता है। अगर वो ऐसा हो कि परमार्थ जो एक स्पिरिचुअल वर्ल्ड है स्पिरिचुअल जो दुनिया है उसमें उसका उसकी जो देह है वो अलग है। मगर यहां पे वो आपको देह प्रकट करके दिखाता है इस प्रपंच रूपी संसार में। तो उस प्रकट होने वाली देह को वो आपको नष्ट करके भी दिखा सकता है। क्योंकि वो उसके द्वारा सृजन किया हुआ है। सजाम में हम है ना? तो वह उसको नष्ट करके भी दिखा सकता है लीला पूर्वक क्योंकि यहां पर इस प्रपंच रूपी संसार में भगवान जो भी करते हैं वह उनकी लीला होती है तो वो उसमें सब कुछ करके दिखा सकता है जो एक व्यक्ति सोच सकता है मगर रामपाल का ईश्वर क्योंकि सशरीर आता जाता है तो वो तो जैसा वहां था वैसे ही आता है थोड़ा सा अपने जो ग्लो है वो कहते हैं वो कहता है कि तेज को कम कर लेता है प्रकाश को कम कर लेता है थोड़ा सा ग्लो है उसको वो कम कर लेता है मगर आता है रामपाल का मैं कबीर कबीर जी जो संत कबीर दास जी है उनकी बात
00:08:50:09 नहीं कर रहा हूं। रामपाल के द्वारा बनाया गया गाढ़ा गया एक तथाकथित ईश्वर उसकी बात कर रहा हूं। काल्पनिक ईश्वर तो वो अपने शरीर का नाश नहीं कर सकता है। तीसरी बात क्या है कि वो अपने शरीर को परिवर्तित भी नहीं कर सकता है। क्योंकि अगर परिवर्तित कर लेगा तो शाश्वत शरीर नहीं रह जाएगा। शाश्वत तो वही है ना जो परिवर्तन जो परिवर्तनी परिवर्तनशील ना हो। यदि वह शरीर जिस रूप में वह दिखाई दे रहा है और उसको परिवर्तित कर सकता है। यदि वह करता है तो वह सर्वशक्तिमान रहेगा। मगर जब जब वो कर लेगा तो वो शाश्वत नहीं रहेगा और अगर वो नहीं कर पाता है तो वो सर्वशक्तिमान नहीं रहेगा। तो इस तरीके से बहुत
00:09:33:21 से कारण हैं जो उसके रामपाल के ईश्वर को सर्वशक्तिमान सिद्ध नहीं करते हैं। दूसरा क्या है कि जो रामपाल का ईश्वर है वो सर्वव्यापक भी नहीं है। वैसे रामपाल के ही द्वारा बताया गया जो जितनी भी वो है क्या कहेंगे उसको फिलॉसफी तो नहीं कह सकते। कूड़ा कूड़ा है वह क्योंकि मगर क्या कहें उसको रामपाल के द्वारा दी गई जो भी जानकारी है जो भी तथ्य प्रस्तुत किए गए हैं उसके अनुसार जो काल है वो मन भी है और काल जो है वो इस तरीके का है कि वो सब जगह मौजूद है और काल को इसने रामपाल ने महाविष्णु भी माना है विष्णु को सर्व्यापक भी माना है इसी भगवत गीता की ट्रांसलेशन तो उस हिसाब से देखा जाए तो काल काल तब भी सर्व्यापक है जो रामपाल का काल वह सर्वव्यापक है। मगर रामपाल का ईश्वर सर्वव्यापक नहीं है। ईश्वर क्या है? ईश्वर ईश्वर की जो शक्ति है वह सब जगह है जिसमें रामपाल उदाहरण भी देता है कि भाई जिस प्रकार से सूर्य की जो रोशनी सूर्य की जो किरणें होती है सूर्य वही रहता है मगर किरणें सब जगह जाती है और उसमें पूरे जगत में
00:10:48:24 व्यवस्था बनाती है तो उसी प्रकार से जो ईश्वर है रामपाल का रामपाल का पूर्ण ब्रह्म कबीर तो वो जो है एक जगह रहता है और उसके उसके द्वारा प्रकाशित होता है पूरा संसार और उस प्रकाश से उस निराकार शक्ति से व्याप्त है। तो सर्वव्यापक का अर्थ वो यह नहीं लेता कि वो स्वयं सर्वव्यापी है। वो यह लेता है कि वो शक्ति के रूप में उसकी शक्ति सर्वव्यापी है। उसकी शक्ति सब जगह है। वो बात आगे देखेंगे कि सर्वव्यापक का अर्थ क्या होता है? वो सही से अर्थ लेता है कि नहीं लेता। मगर उसका ईश्वर सर्वशक्तिमान नहीं है। फर्स्ट दूसरा उसका ईश्वर सर्वव्यापक भी नहीं है। अच्छा सर्वव्यापक में एक दिक्कत क्या आती कि जैसे उसने कहा कि जो सूर्य है उसकी जो किरणों के समान ईश्वर एक जगह है और उसकी क्या कहते हैं शक्ति सब जगह व्याप्त है। प्रॉब्लम यह है कि सूर्य से जितना दूर हम हैं उसके हिसाब से उसकी जो किरणों की जो गर्मी होती है, उसकी जो लपट होती है, जो उसका उसकी दाहक क्षमता होती है, वो प्रभावित होती है। यानी कि जहां पर सूर्य है वहां उसकी दाह क्षमता बहुत है। और जहां हम लोग हैं वहां ऐसा नहीं है कि सूर्य की किरण पड़ी और हम जल गए। मगर
00:12:04:04 जहां पर सूर्य स्वयं है वहां हम जाएंगे तो वहां पर उसकी इतनी दाहकता है, इतनी दाहक क्षमता है कि हम उससे जल जाएंगे। इसका अर्थ क्या हुआ? यदि सूर्य के समान ईश्वर को माना जाए तो ईश्वर की पकड़ उतनी यहां पर नहीं है जितनी पकड़ वो जहां पर स्वयं बैठा है वहां पर है। इसका मतलब ईश्वर समान रूप से सब जगह पावरफुल नहीं है। जितना पावरफुल वो वहां पर है उतना पावरफुल यहां पर नहीं है। जिस प्रकार से सूरज जितना पावरफुल जहां पर सूरज है वहां पर है उतना उतना पावरफुल सूरज सूरज की किरणों के द्वारा जो जो सूरज अपनी ऊष्मा को भेजता है एनर्जी को भेजता है पृथ्वी पर उतनी ऊर्जा सूरज की नहीं होती है जितनी ऊर्जा जहां पर सूरज स्वयं है वहां पर होती है तो इस नजरिए से सर्वव्यापकता जब हम नहीं स्वीकारते हैं ईश्वर की तो ईश्वर वहां भी बाधित सिद्ध होता है और उसके जो ईश्वर होने में ही दोष आ जाता है ठीक
00:13:08:01 है। अच्छा अब इसके बाद क्या आता है? कुछ इनके द्वारा जो गढ़ी गई चीजें हैं जो बेची जाने वाली किताबें हैं समाज में उसमें कुछ एक जरूरी प्रश्न है जिनका जवाब उसने कभी दिया ही नहीं है। जैसे कि रामपाल ने कभी भी नास्तिकता का खंडन नहीं किया। रामपाल ने पहले से जो आस्तिक है उनको यह बताया कि तुम जिसे भगवान मान रहे हो वह भगवान नहीं है। मैं बता रहा हूं वास्तविक भगवान मगर उसने कभी भी यह किसी को नहीं बताया कि भगवान है ये कैसे सिद्ध होता है? भगवान है। ये कभी इसने बात नहीं की। ना ही इसका कोई ग्रंथ है नास्तिकता के खंडन में ना ही इसका कोई लेक्चर है। हां अब हमारे वीडियोस को देख कर के जरूर इनके जो चेले हैं इनके गुरु ने तो इनको वो ज्ञान नहीं दिया। मगर हमारे वीडियो से वो ज्ञान ले ले के जरूर ये लोग आकर के जवाब दे सकते हैं कि हां ये नास्तिकता का खंडन है। मगर सवाल ये उठता है कि इनके गुरु ने वो इनको सिखाया है कि नहीं सिखाया है ना उन और धर्म की जो वास्तविक परिभाषा है वो भी रामपाल ने अपने लोगों को नहीं सिखाई। तो ये तो हो गई ये तो हो गए कुछ बुलेट पॉइंट्स। ठीक है? एक और है तात्विक विवेचना में अगर जाए तो यदि कबीर
00:14:23:10 ने सृष्टि को बनाया है पूरी की पूरी तो हमें यह मानना पड़ेगा कि कबीर ने जब सृष्टि बनाई है सूरज चंदा जो भी बनाया है उस समय अगर कबीर को सरीर मानेंगे तो हमें मानना पड़ेगा कि उसके कंधे के आसपास के बाहर की जगह कंधे के बाहर की जगह वहां स्पेस है जहां कबीर था तो उस स्पेस को किसने बनाया इस तरीके के सवालों का जवाब भी उसने नहीं दिया है। ठीक है? अब बात आती है कि आगे चलते हैं तो उसने कुछ गपोड़ बाजियां भी की है रामपाल ने। जैसे षष्ठी रचना की अगर बात करें तो काल का कहना है कि वो काल का कहना है कि वो उसका भी जन्म जन्म मरण होता है। चलो यही बात ले लेते हैं। काल का भी जन्म मरण होता है। मगर प्रॉब्लम यह है कि जब काल मर जाता है तो काल की वजह से ही लोग फंसे हुए हैं। जब काल की वजह से जीवात्माएं फंसी हुई हैं। जब काल मर जाता है तो उन जीवात्माओं को मुक्ति मिल जाती है। मोक्ष मिल जाता है। क्या होता है उन जीवात्माओं को? अगर मोक्ष नहीं मिलता तो फिर उसको उनको फंसाने वाला काल नहीं है। और अगर मोक्ष मिल जाता है तो उसके बाद काल का दोबारा जन्म
00:15:38:14 होता है तो वो जो मोक्ष में चली गई थी जीवात्मा उनको उनको ही दोबारा फसाया जाता है। दोबारा से वो जीवात्मा उससे अट्रैक्ट होती हैं। एक बात और है अह कि अह आत्माओं को अविनाशी तो माना है रामपाल ने मगर आत्माओं को जीवात्मा को रामपाल ने नित्य नहीं माना है। मतलब कि जो आत्मा है वो हमेशा से नहीं थी। यानी कि वो उसका जन्म हुआ है उसके बाद वह अविनाशी। अब उसका नाश नहीं हो सकता। ऐसा है। अब जब अविनाशी कह दिया आत्मा का तो
00:16:18:16 जब हमने काल जब काल को बनाया था और काल मर जाता है तो काल का अभाव हुआ कि नहीं हुआ या उसमें क्या थ्योरी है ये सब बातें ये नहीं बताते रामपाल के लोग तब उसमें प्रॉब्लम यह है कि आत्मा की कभी आत्मा जो है अविनाशी है उसका उसका जन्म होता है मगर वो अविनाशी उसको मारा नहीं जा सकता मगर उसका जन्म नित्य है नित्य नहीं है शाश्वत नहीं है तो इसमें जब आत्माओं को मुक्ति मिल जाती है। है ना? और यह काल की मृत्यु हो जाती है। आत्माओं को मुक्ति मिल जाती है। काल की मृत्यु हो जाती है। तो दोबारा जब सृष्टि रचनी होती है। है ना? तो वहां पर क्या काल को दोबारा से उत्पन्न करता है? क्या काल भी अविनाशी वो क्या काल भी शाश्वत था जो पहले से था? है और रहेगा क्योंकि आत्माएं तो नहीं है। तो यह कुछ खिचड़ी पकाई जाती है जो अभी धीरे-धीरे जब हम इसको इस सफर में आगे चलेंगे इस यात्रा में तो आपको रोचकता के साथ जानने को मिलेगी चीजें। इसके बाद एक बुलेट पॉइंट और है कि हम जो काल है वो बताया जाता है कि काल ने
00:17:34:04 प्रकृति के साथ रमण किया। अपनी भाषा में ये लोग नीचता के साथ परोसते हैं उस तथ्य को प्रकृति देवी के साथ उसने रमण किया काल ने और जो है ब्रह्मा विष्णु महेश उत्पन्न हुए उनकी संतान है यानी कि ब्रह्मा विष्णु और ब्रह्मा विष्णु महेश को ये कहता है ये गुण है सतराज और तम गुण है ये इन इनका गुण के गुण के बिना इनका कोई अस्तित्व नहीं है ये ये कहता है तो ब्रह्मा विष्णु महेश अगर गुण है तो क्योंकि इसके अनुसार रामपाल के अनुसार काल ने देवी दुर्गा के साथ छोड़ो देवी दुर्गा नहीं प्रकृति के साथ रमण किया वह भी उसकी इच्छा के विरुद्ध जाकर के और उससे ये लोग उत्पन्न हुए हैं तो जब इच्छा के विरुद्ध जाकर के काल ऐसा कार्य कर रहा है तो वहां पर ये मानना पड़ेगा कि काल जो है तमोगुण से प्रभावित है यानी कि शिवजी से प्रभावित है। मगर शिव जी कौन है? शिवजी उत्पन्न कब होते हैं? इसके अनुसार जब काल प्रकृति से रमण करता है तो यदि वह प्रकृति से जोर जबरदस्ती से रमण कर रहा है तो वो शिवजी से प्रभावित मानना उसे शिवजी से प्रभावित मानना पड़ेगा और अन्यथा यदि शिवजी को काल से उत्पन्न मानना माना जा रहा है तो फिर यह मानना पड़ेगा
00:18:49:08 कि वह रमण नहीं था कुछ और था जिसको इसने लोगों को मूर्ख बनाने के लिए कुछ का कुछ बोला है। इसके अलावा काल के ऊपर ही और मीमांसा अगर करें तो काल यह कहता है कि काल की भक्ति जो करेगा उसको काल खाएगा जबकि आत्माओं को कोई खा नहीं सकता है। अच्छा दूसरी बात कहीं-कहीं पर मिलेगा कि उनको तप्तशिला पर भूजा जाएगा फिर उसकी महक सूंघेगा तो फिर खाएगा वाली बात कट जाती है। सूंघेगा या खाएगा दोनों अलग-अलग चीजें हैं। तो यह भी कंट्राडिक्शन है। इसके बाद काल को लेकर के यह भी बातें आती है कि काल ने जब अपना रूप दिखा दिया था वैसे वो अपना रूप दिखा। हां उसकी एक प्रतिज्ञा है कि वह अपना रूप किसी को दिखाता नहीं है। काल की एक प्रतिज्ञा है कि वह अपना रूप दिखाता नहीं है। मगर रामपाल के ही अनुसार अर्जुन को उसने अपना रूप दिखा दिया। क्यों दिखाया? दूसरी बात यह है कि जब अर्जुन ने काल का रूप देख लिया। पता चल गया कि कृष्ण नहीं है। गीता बोलने वाला कोई और है। उसके बाद भी अर्जुन ने गीता बोलने वाले को कृष्ण ही कहा। हे कृष्ण हे मधुसूदन यह सब उसमें आगे कहा है। ठीक है? अभी किसी को आप वो ना
00:20:05:00 दीजिएगा। कबीर सागर के कबीर सागर के अनुसार अभी इसमें आपको लिंक दे दिया जाएगा थोड़ी देर बाद। कबीर सागर के अनुसार जो काल को पहले ही शब्द के रूप में उत्पन्न कर दिया गया था। तो बहुत सी चीजें हैं। यदि हम काल से उत्पन्न ब्रह्मा विष्णु महेश को मानेंगे तो हम तो काल का ब्रह्मा विष्णु महेश को अगर गुण मानते हैं तो काल का इस तरह की ऐसी कोई गतिविधि जो जिसको तामस कहा जा सके तो उसमें लिप्त होना नहीं मान सकते और यदि लिप्त मान रहे हैं और ब्रह्मा विष्णु महेश को गुण मान रहे हैं तो हमें मानना पड़ेगा काल से उत्पन्न नहीं हुए ब्रह्मा विष्णु महेश का जो अस्तित्व है वो काल से भी पहले है और काल ब्रह्मा विष्णु महेश के अनुगत है क्योंकि वो प्रभावित हो रहा है उनसे। ठीक है? ये भी एक चीज हो गई। अब इसके बाद यह सारी जो खिचड़ी इसने पकाई है रामपाल ने वह हां जी पहाड़ी जी आज ताला लग गया है तो इसके बाद ये सारी खिचड़ी जो पकाई है रामपाल ने
00:21:17:16 वो यह कहते हुए पकाई है कि मैं तत्वदर्शी हूं। है ना? तो सबसे पहले एक बोले मैं तत्वदर्शी हूं। इसलिए और तत्वदर्शी के पास जाने के लिए भगवत गीता में कहा गया है। इसलिए तुम्हें मेरे से मेरी बात को प्रमाण मानना चाहिए। अब इसमें प्रॉब्लम क्या है कि ये लोग कहते हैं कि काल वो है जो धोखेबाजी भी करता है। अपना काम निकालता है। झूठ भी बोलता है। यहां तक कि ये भी कहते हैं कि भगवत गीता में पांच पांच% जो श्लोक हैं वो काल ने अपने मन से कह दिए। उनको माना नहीं जा सकता। मानना नहीं है और बाकी 95% जो श्लोक है वह सही है। वह परमेश्वर की वाणी है जो काल ने कही है। तो सबसे पहली बात है कि इन्होंने कहीं पर भी यह नहीं बताया कि एग्जैक्ट वो 5% श्लोकों का अर्थ हो जाता है 35 श्लोक। 700 श्लोक है अगर भगवत गीता में तो 10% हुआ 70 और 35 श्लोक। तो 35 जो श्लोक है वो कौन से हैं ये स्पष्ट नहीं करते। स्पष्ट इसलिए नहीं करते क्योंकि अगर उन 35 श्लोकों को छोड़ के बात की जाएगी तो उसके बाद ये कभी किसी श्लोक के लिए नहीं कह सकते कि ये नहीं माना जाएगा। है ना? तो इसलिए कभी ये क्लियर नहीं करेंगे कि 35 श्लोक कौन से हैं जिनको नहीं मानना है। दूसरी बात ये है
00:22:32:19 कि काल जब झूठ बोल सकता है तो वो ये बात भी तो झूठ बोल सकता है कि तत्वदर्शी के पास जाओ। या वो ये बात भी तो झूठ बोल सकता है कि तत्वदर्शी वो होगा जो उल्टे वृक्ष की व्याख्या करेगा। तो यहां पर भी यह फस जाते हैं कि यह भगवत गीता के अकॉर्डिंगली रामपाल को तत्वदर्शी सिद्ध नहीं कर सकते। और अगर रामपाल भगवत गीता के अनुसार तत्वदर्शी है तो इन्होंने अपने गीता में कई जगह पर ये लिख दिया है कि ज्ञान यज्ञ से भी मुक्ति नहीं मिलेगी। और भगवत गीता में जिस चार 34 की बात करते हैं तत्वदर्शी के पास जाने की तो भगवत गीता में वह तत्वदर्शी उसे किया उसे कहा गया है जो ज्ञान यज्ञ का ज्ञान आपको देगा यानी कि ऐसा ज्ञान देगा जो रामपाल के अनुसार मुक्ति दायक नहीं है। तो रामपाल के ही अनुसार वो जो तत्वदर्शी है भगवत गीता का रामपाल के अनुसार वो मोक्ष देने वाला नहीं है। मोक्ष का ज्ञान बताने वाला नहीं है। तो इसका मतलब क्या हुआ? रामपाल के ही अनुसार रामपाल मोक्ष दायक नहीं है।
00:23:44:15 और तो यहां से इसकी रामपाल की जो तत्वदर्शी होने का वो है वो खत्म हो जाता है। अगर काल को झूठा मान लेंगे अप्रामाणिक मान लेंगे तो अरे हटाओ भाई इनको। अगर काल को हम झूठा मान लेंगे तो हमारा उसकी क्रेडिबिलिटी पे फर्क वो आ जाता है कि भाई अह क्या कहते हैं कि इसने कहां पर सच बोला है, कहां पर झूठ बोला है। इसके अलावा एक बात और है। ये शास्त्र हमें प्रदान करने वाले ब्रह्मा, विष्णु, महेश, व्यास जी इन सबको इसने अज्ञानी भी बोला है रामपाल ने। तो जब ये सब अज्ञानी है तो इसकी इन बातों पर विश्वास कैसे किया जाए कि तत्वदर्शी वही होगा जो उल्टे वृक्ष के रूप में व्याख्या कर देगा संसार की या कोई भी बात जिसके आधार पर अपनी बिल्डिंग खड़ी कर रहा है। उस बात को क्यों मान लिया जाए? जब वो काल ने बोली या व्यास जी ने कही है। ब्रह्मा, विष्णु, महेश में से किसी एक ने कही है। क्योंकि
00:24:38:28 तो एक यह भी बात आ जाती है। इसके अलावे बहुत से बुलेट पॉइंट्स हैं जरूरी जरूरी। इसमें से ज्यादातर मैंने आपको बता दिए हैं।
⬜ Not used yet · 00:24:49:18 – 00:26:56:00 (2:06)
00:24:49:18 तो अब हम लोग शुरू करते हैं। ये गरिमा गीता की मेरे पास है। इसको मैं पढूंगा और इसमें हम लोग संस्कृत हिंदी जो शब्दकोश है इसका भी सहारा लेंगे कई जगह रामपाल को वो करने के लिए और मुख्य रूप से जो भगवत गीता हम कंपेयर करेंगे वह यह होगी जय दयाल गोविंद जी की भगवत गीता श्रीमद् भगवत गीता तत्व विवेचनी और साथ ही साथ कहीं-कहीं पर जहां पर पूर्ण अर्थ हमें समझने होंगे भगवत गीता के वहां पर हम शंकर भाष्य का भी संदर्भ लेंगे। ठीक है? और आज एक सरप्राइज भी है कि आज जो है यह इस की यथारूप का भी संदर्भ लेना पड़ेगा क्योंकि इसमें इसने बात की है रामपाल ने इस के बारे
00:25:43:16 में कुछ और बुलेट पॉइंट्स मुझे अगर याद आएंगे तो मैं कल बताऊंगा आपसे। हां एक बात और है कि अभी थोड़ी देर में जब आज की व्याख्या कंप्लीट हो जाएगी तो थोड़ी देर के लिए लिंक दे दिया जाएगा तब आप लोग जुड़ सकते हैं और जो कुछ अगर ठीक है दिखाइए तो ये रामपाल वाले भगवान को किस तरह से गाली दे रहे हैं वह आप देख सकते हैं। कुछ अभी कमेंट्स आए थे हमारे सामने तो हमने प्रथम अध्याय छोड़ दिया है क्योंकि प्रथम अध्याय में ना तो इसने कोई कुतर्क किया है। कुतर्क इसलिए नहीं किया क्योंकि वहां पर युद्ध स्थल की व्याख्या हो रही है और इसने इसमें बहुत सारी खिचड़ी भी पकाई है। मगर हम लोग अभी बहुत सारी चीजों पर बात ना करते हुए इसमें इसने पहले अध्याय को एक एक पेज में ही समाप्त कर दिया है। यह पहला अध्याय है। एक पेज में ही समाप्त हो गया पहला अध्याय तो पहले अध्याय पर इसने ज्यादा बात नहीं की है और उससे पहले काफी कुछ खिचड़ी पका चुका है यहां पर आने से पहले अच्छा एक बुलेट पॉइंट और मुझे याद आया
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→ Used in: B · Video रामपाल का मनमौजी गीता अर्थ #1 अध्याय 2 #gita #gitagyan at 18:29 ↗
00:26:56:00 कि इसका कहना है कि अह भगवत गीता में जो ज्ञान वेदों से मैच खाएगा वेद से मैच खाएगा उस ज्ञान को ही माना जाएगा और जो ज्ञान वेद से मैच नहीं खाएगा उसको नहीं माना जाएगा। अब यह कहता है कि भगवत भगवत गीता को बोलने वाला जो काल ब्रह्म है वो उसने कहा कि तुम मेरी मेरी शरण से किसी और की शरण में जाओ है ना यानी कि किसी और के लिए आचरण करो इसका कहना है ब्रज किसी और के लिए गति करो किसी और के लिए जाओ किसी और की शरण में जाओ ये भग इसके अनुसार भगवत गीता कहने वाले ने कहा है अब यहां पर वेदों में आता है एक ब्रह्मचर्य सूक्त पूरा का पूरा वेदों में पूरा कई जगह जगह ब्रह्मचर्य के बारे में बात हो रही है। ब्रह्मचारी कौन है? ब्रह्म के लिए आचरण करने वाला। ब्रह्म के लिए गति करने वाला। है ना? तो अब वेदों में कहा जा रहा है ब्रह्म के लिए गति करो। ब्रह्म के लिए आचरण करो। और गीता में यदि इनके अनुसार से कहा जा रहा है कि जाओ मेरी शरण से किसी और की शरण में जाओ। ब्रह्म की शरण से पूर्ण ब्रह्म की शरण में जाओ। तो वहां कहा जा रहा है ब्रह्म की शरण में जाने के लिए और यहां कहा जा रहा है ब्रह्म की शरण से जाने। वहां कहा जा रहा है ब्रह्म की शरण में जाने के
00:28:11:03 लिए और यहां कहा जा रहा है ब्रह्म की शरण से कहीं और जाने के लिए तो भगवत गीता की इस बात को क्यों मान रहे हो हम इसी प्रकार से और भी कई बातें हैं जो अगर इनका अर्थ लेंगे भगवत गीता का तो वो मैच नहीं करती वेदों से तो ये कुछ बुलेट पॉइंट्स हैं और कुछ याद आते रहेंगे तो हम बताते रहेंगे
⬜ Not used yet · 00:28:33:02 – 00:44:08:19 (15:36)
00:28:33:02 तो ये तत्व विवेचनी जय दयाल गोविंदका जी की आप स्क्रीन पे ला दीजिए और श्लोक क्रमांक आप लाइए दवां दूसरे अध्याय का दवा श्लोक यहां से इसने व्याख्या करना शुरू किया है दूसरे अध्याय के दव श्लोक से रामपाल ने क्यों किया है क्योंकि यहां तक युद्ध क्षेत्र की चीजें थी अर्जुन का शोक था अर्जुन की बातें थी तो उसको इसने नहीं कहा जब भगवान ने बोलना शुरू किया है कि अर्जुन तू दुखी क्यों होता है तो तब से इसने व्याख्या करना शुरू की है तो आप जो है भगवत गीता का दूसरे दूसरे अध्याय का दवां श्लोक स्क्रीन पर लगा दें
00:29:13:21 और हम पहले देख लेते हैं हमारी प्रामाणिक भगवत गीता में क्या कहा जा रहा है दूसरे अध्याय के दव श्लोक से लेकर 16व श्लोक तक और एक बात और याद रखिएगा यह जो सीरीज है यह प्रत्येक बुधवार और प्रत्येक शनिवार शाम 7 या 8:00 बजे यह एपिसोड्स आएंगे। तो आप इन दोनों दिनों के लिए तैयार रह।
00:29:48:13 तो स्क्रीन पर लगा दीजिए। हे भरतवंशी धृतराष्ट्र दूसरा अध्याय दसवां श्लोक। इसमें कह रहे हैं अंतर्यामी श्री कृष्ण महाराज दोनों सेनाओं के बीच में शोक करते हुए उस अर्जुन को हंसते हुए यह वचन बोले तो यह कौन कह रहा है? यह संजय कह रहा है। है ना? किसको बता रहा है? संजय को संजय जो है बता रहा है धृतराष्ट्र को कि श्री कृष्ण महाराज दोनों सेनाओं के बीच में शोक करते हुए उस अर्जुन को हंसते हुए यह वचन बोले क्या बोले तो प्रमाणिक भगवत गीता में कहा गया है कि हे अर्जुन तू ना शोक करने योग्य मनुष्यों के लिए शोक करता है
00:30:42:08 और तू ना शोक करने योग्य मनुष्यों के लिए शोक करता है और पंडितों कैसे वचनों को कहता है। परंतु जिनके प्राण चले गए हैं उनके लिए और जिनके प्राण नहीं गए हैं उनके लिए भी पंडित जन शोक नहीं करते। इसमें भी इसने यही कहा है कि अर्जुन शोक ना करने वाली बात पर बात का शोक कर रहा है और ज्ञान कह रहा है पंडितों जैसा। अब देखिए यहां पर इसने क्या किया है रामपाल ने कि वहां पे ये कहा जा रहा है कि तुम्हारे जो वचन है वो पंडितों जैसे दिख रहे हैं। सुनाई दे रहे हैं। है ना? तुम्हारे जो वचन है वह पंडितों जैसे दिख रहे हैं, सुनने में लग रहे हैं। मगर वास्तविकता यह है कि तुम ऐसी बातों पर शोक कर रहे हो जिन पर शोक जो शोक करने योग्य नहीं है। और वास्तविकता में जो पंडित जन होते हैं वो ऐसी बातों के लिए शोक नहीं करते हैं। है ना? यह यहां पर है। मगर यहां क्या किया गया कि एक पंडित शब्द से इसको रामपाल को एक प्रॉब्लम है। क्योंकि
00:31:57:13 पंडित के पंडित शब्द के प्रति अगर अ नफरत द्वेष नहीं भरेगा तो व्यक्ति कहीं ना कहीं किसी ना किसी वास्तविक जो ज्ञानी भी हो जो आचरण से भी सही हो और ज्ञान से भी सही हो ऐसे पंडित के पास अगर चला जाएगा तो इसके जो ताश के पत्तों के महल जो इसने खड़ा किया ताश के पत्तों पर एक महल बनाया है तो उसको हल्की सी हवा लग जाएगी वह गिर जाएगा तो यह शुरुआत से ही पंडितों के विरुद्ध ब्राह्मणों के विरुद्ध एक लोगों के मन में जहर भरने की कोशिश करता है। तो इसलिए इसने क्या कहा है यहां पर? इसने उसको थोड़ा सा मैनपुलेट किया और यहां कहा कि हे अर्जुन शोक ना करने वाली बात का शोक कर रहा है तथा ज्ञान कह रहा है पंडितों जैसा। पंडितों जैसा ज्ञान कह रहा है। पंडितों जैसा ज्ञान की बात नहीं हो रही
00:32:51:00 है। आगे क्या लिखा है कि विद्वान लोग मरने जीने की चिंता नहीं करते। मतलब पंडित लोग इसके अनुसार विद्वान नहीं है। कुल मिला के इसने कहने का प्रयास ये किया है कि तुम जो बोल रहे हो वो ऐसा पंडित लोग कहते हैं और पंडित विद्वान नहीं होते। विद्वान लोग पंडित से अलग है। इसलिए ये लिखा जबकि आगे क्या आया है? आगे आया है पंडित जन शोक नहीं करते। इस श्लोक में आया है आगे नानु शोचती पंडितः तो इस श्लोक में आगे ये आया है। मैं अपने ऑपरेटर से कहूंगा कि भाई आप भगवत गीता क्यों नहीं दिखा रहे हैं?
00:33:42:20 तो क्योंकि इसे विद्वान से पंडित को अलग करना था तो इसने क्या किया कि तू जो मूर्खता कर रहा है मतलब जो अज्ञानता वश जो बोल रहा है वो पंडितों जैसा है ना वो वो सही है वो पंडित पंडित ऐसा बोलते हैं पंडितों जैसा ज्ञान कह रहा है पंडित जैसा और उसके बाद विद्वान लोग जीने मरने की चिंता नहीं करते मतलब मतलब विद्वान को पंडित से अलग कर दिया इससे। ठीक है? खैर आगे चलते हैं। तो छोटी सी चीज है मगर किया इसने। इसके बाद इसने
00:34:19:26 कहा दूसरे अध्याय का 12वा श्लोक है। उसका अर्थ मैं पढ़ रहा हूं। ना तो ऐसा ही है कि मैं किसी काल में नहीं था या तू नहीं था अथवा यह राजा लोग नहीं थे और ना ही है कि इससे आगे हम सब नहीं रहेंगे और इसने अर्थ क्या किया है इस श्लोक का दूसरे अध्याय के 13 वे श्लोक का अ यह नहीं है कि हम तुम और यह सभी सैनिक पहले कभी नहीं थे या आगे ना होंगे इसलिए सुख दुख सहन करने की हिम्मत रख और हम तुम यह सब सदा जन्म मरण में ही है। तो यह इसने अपने आप ही एक यहां पर खिचड़ी पका दी। यहां पर वह जो श्लोक है 12वा उसका अर्थ ना करते हुए अपने मन से खिचड़ी पका दी है। हालांकि इसने यह कहा है कि दूसरे अध्याय के 10व से 16व श्लोक का यह अर्थ है जो यह बता रहा है। ठीक है? अब ये मुख्य आता है सीधे गीता अध्याय दो श्लोक 16 पे।
00:35:29:21 एक यह है यह श्रीमद् भगवत गीता और इसका यह तत्व वेदनी है और इसमें दूसरे अध्याय के 16व श्लोक तक आते हैं हम तो यहां पे भगवान आत्मा अमर है, अविनाशी है और नित्य है। यह श्लोक 17 से लेकर के 30 31 तक यही बताएंगे अर्जुन को और यहां पर जो क्या कहते हैं संदर्भ है जो विषय है वो भी यही है कि अर्जुन ऐसे लोगों के ऐसी चीज के लिए श्लोक शोक कर रहा है जो शोक करने योग्य नहीं है। क्यों? क्योंकि आत्मा जो है वह कभी मरती नहीं है। तो यहां पर आत्मा के बारे में पूरा बताया है। मगर इसने कैसे मैनपुलेशन किया है वह अभी आप देखेंगे।
00:36:32:02 खोल कर तो मैं खोल कर ही दिखा रहा हूं। यह है तत्व विवेचनी भगवत गीता जय दयाल गोविंद का द्वारा रचित इसको तत्व विवेचनी कहते हैं। और ये इसका है 13वां श्लोक है फिलहाल। तो आप देख सकते हैं इसी में अगला पेज है। फिर अगला पेज भी दिखा देंगे। तो 13वा श्लोक क्या कह रहा है? जैसे जीवात्मा इस देह में बालकपन, जवानी और वृद्धावस्था जैसे जीवात्मा की इस देह में बालकपन, जवानी और वृद्धावस्था होती है। वैसे ही अन्य शरीर की प्राप्ति होती है। उस विषय में भी धीर पुरुष मोहित नहीं होता। देखिए मोहित होना ही व्यक्ति के दुखों का कारण है। इस बात को समझ लीजिए सारांश है और इसको भी एक बुलेट पॉइंट में डाल लीजिएगा। जीवात्मा ये जो जैसे भगवान ने कहा कि हे अर्जुन अभी मैं रामपाल की गीता को साइड में रख के जो प्रामाणिक भाष्य हैं उनका अर्थ आपको बता रहा हूं। कि भगवत गीता में भगवान ने कहा हे अर्जुन तेरे और मेरे बहुत से जन्म हो चुके हैं। मैं जानता हूं तू नहीं जानता। ये तू नहीं जानता। यही बंधन
00:37:47:16 है। यही है जो वह मुक्त नहीं है। जो नहीं जानता जो मोहित है इस प्रपंच रूपी संसार से जो मोहित है तो जो जानता है वो मोहित नहीं होता। जो इस आत्मा की सच्चाई को जानता है वो मोहित नहीं होता। तो भगवान जैसे कि यह भी मानता है कि जो आत्मा है वो अविनाशी है उसका वध नहीं हो सकता। तो जिसका वध नहीं हो सकता और उसका मूल स्वरूप वही है। तो फिर वो किस चीज के लिए डर रहा है? क्यों डर रहा है? क्योंकि जो उसका नहीं है उसको उसने मान रखा है अपना। यानी शरीर जो शरीर पंच भौतिक शरीर है वह उसका नहीं है। उसने वही मान रखा है
00:38:37:26 अपना। है ना? तो इसको अपना ना मानने वाला मुक्त है और इसको अपना मानने वाला फसा हुआ है। बंधन में है। इसी को अहंकार मान लीजिए। यह मेरा शरीर है। यह मेरे पिता हैं। यह मेरी मां है। तो अपना मानने वाला शरीर के द्वारा प्राप्त होने वाले प्रपंच रूपी संसार में प्राप्त होने वाले जो बंधन है उनको अपना मानने वाला बंधन हो गया। बंधक हो गया और यहां फंसा हुआ हो गया और जो भगवान है वो मुक्त है। क्योंकि उनको पता है कि ये सब कुछ प्रपंच रूपी संसार है। माया है। तो जो लोग कहते हैं ना कि जो भगवान है वो जीवन मरण में नहीं आता। ऐसा नहीं है। भगवान जीवन मरण में आ सकते हैं। परंतु इस बोध के साथ कि मैं कौन हूं उनको पता है। इसलिए वो जीवन मरण में आते हुए भी मुक्त है। और जिसको नहीं पता है वो बंधन में है। वो मुक्त नहीं है। ये सारांश है। बुलेट पॉइंट है। तो क्या है कि जैसे आत्मा जैसे जीवात्मा की इस देह में बालकपन, जवानी और वृद्धा अवस्था होती है। वैसे ही अन्य शरीर की प्राप्ति होती है। उस विषय में धीर पुरुष मोहित नहीं होता। यह 13वा श्लोक हो गया। अब यहां पर देखिए पूरी आत्मा की
00:39:52:28 बातें चल रही है। अब ये कैसे घुमाएगा बात को वो देखिएगा। रामपाल सर्दी गर्मी और सुख दुख को देने वाले इंद्रिय और विषयों के संयोग को संयोग तो उत्पत्ति विनाशील और अनित्य है तो यह जो इंद्रिय विषयों के संयोग है इनकी उत्पत्ति होती है। यह विनाशशील है। इनका विनाश भी होता है और यह नित्य नहीं है। ऐसा नहीं है पहले भी थे आगे भी रहेंगे। इसलिए हे भारत तू उनको सहन कर। तो यानी कि जो ज्ञानी है जिसके पास वास्तव में विद्या है कौन सी विद्या असतो मा सदमयातमया वाली विद्या जिसके पास विद्या है ये आपके सामने अब 14वा श्लोक ला दीजिए ये तो हो गया वाला इसके बाद
00:40:46:20 वाला हां 14वा तो यहां पे भी आत्मा के लिए ही बताया जा रहा है कि देखो देखो आत्मा जो है वो नित्य है, अविनाशी है और नित्य है यानी कि उसकी उत्पत्ति भी कभी नहीं हुई। हालांकि इसने उत्पत्ति मानी है और इसलिए तुझे उसके लिए शोक नहीं करना चाहिए और जो यह जो विनाशशील अनित्य ये जो कष्ट तुझे आ रहे हैं इनको तू सहन कर। ये कहा जा रहा है दो श्लोक 14। इसके बाद भगवान कह रहे हैं अच्छा यह हो क्यों रहा है मैंने थोड़ा सा प्रीफिक्स नहीं बताया समय जिन लोगों को ना पता हो वो जान ले कि जब अर्जुन युद्ध में पहुंचा प्रभु जो भगवान श्री कृष्ण उसके सारथी थे तो जब वो युद्ध में पहुंचे अर्जुन और सामने अपने गुरु द्रोणाचार्य को देखा अपने नाते रिश्तेदारों को देखा कि उनसे उसे युद्ध लड़ना है और उनको देखा अपने भाइयों को चचेरे भाइयों को बहुत से लोगों को देखा उसने तो उसका हृदय जो है विदर्ण हो और उसके मन में भाव आया कि मैं इनको ना मारू मैं इनसे ना लडू इससे अच्छा है कि मैं स्वयं ही मर जाऊं। तो इस तरह का जब भाव आया
00:42:01:22 तो भगवान उसको समझा रहे हैं कि तुम्हारे मारने से ना कोई मरता है और ना कोई तुम्हारे ना मारने से बचता है और ना कोई तुम्हारे मारने से मरता है। ठीक है? वही सब यहां चल रहा है। उसी को भगवान समझा रहे हैं कि वह अपना जो उसके अंदर यह जो इस भाव को नपुंसकता भी कहा गया है आगे। तो ऐसे जो भाव उत्पन्न हुए हैं वो ना आए। तो अब यहां पर दूसरे अध्याय के 15 वे श्लोक में कहा जा रहा है कि क्योंकि हे पुरुष श्रेष्ठ दुख सुख को समान समझने वाले जिस धीर पुरुष को ये इंद्रिय और विषयों के संयोग व्याकुल नहीं करते वह मोक्ष के योग्य है। मोक्ष के योग्य कौन है? मोक्ष के योग्य वो है जो सुख दुख को समान समझे। सुखदख को समान कौन समझेगा? जो विद्या और अविद्या में अंतर जानता है। विद्या और अविद्या के सही स्वरूप को जानता है। यह बात वेद में भी आई है। यानी कि फंसे होने और ना फंसे होने में ज्ञान और अज्ञान विद्या और अविद्या का ही फर्क है। अगर
00:43:17:28 बहुत गुण दृष्टि से देखा जाए। ठीक है? तो इसीलिए भगवान यह कहते हैं कि मैं जानता हूं पर तू नहीं जानता। तो भगवान जन्म मरण में होते हुए भी मुक्त क्यों है? ईश्वर क्यों है? क्योंकि वो जानते हैं वो विद्यावान हैं। विद्यावान और हम अविद्यावान हैं। इसलिए हम नहीं जानते कि हमारे कितने जन्म हो चुके हैं। हम शब्द प्रमाण से जानते हैं मगर हमें फील नहीं होता है कि हमारे बहुत से जन्म हो चुके हैं। ठीक है? तो मैंने अभी जैसा कि कहा कि मुक्त कौन है या मुक्ति के योग्य कौन है? मोक्ष के योग्य कौन है? जो अविद्या और विद्या को जानता है। तो आगे देखिए दो 16 में क्या कहा जा रहा है? असत वस्तु की तो
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00:44:08:19 सत्ता नहीं है और सत का अभाव नहीं है। इस प्रकार इन दोनों का ही तत्व तत्व ज्ञानी पुरुषों द्वारा देखा गया है।
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00:44:18:07 तो सबसे पहली बात क्या है कि मुक्ति और बंधन में विद्या और अविद्या ही हेतु है। और इस तरीके से जानने वाला विद्या और अविद्या को जानने वाला होने के लिए वेद में भी कहा गया है। यजुर्वेद के कुछ अंतिम अध्याय है। उनमें 39वा या 40वा है। उसमें कहा गया है। ठीक है? तो इसमें क्या कहा जा रहा है? दो 16 में कि असत वस्तु की तो सत्ता नहीं है और सत का अभाव नहीं है। तो यहां आत्मा के लिए बताया जा रहा है कि जो जो आत्मा है उसको कोई मार नहीं सकता। और अगर तू इसके शरीर इत्यादि को बचाने सामने वालों के शरीर इत्यादि को बचाने के लिए वो कर रहा है। प्रयत्न या दुख शोक कर रहा है तो उसकी कभी सत्ता नहीं हो सकती। उसको कभी तू बचा नहीं सकता। तो तू तेरा शोक शोक करना तो व्यर्थ है। तो इस तरीके से यहां पर और इस प्रकार से दोनों और इन दोनों के सही सही स्वरूप को जानने वाला कौन है? तत्वज्ञानी और यहां पर इसे तत्वदर्शी कहा गया है। ध्यान रखना। तो विद्या और अविद्या सत और असत के इस फर्क को इस अंतर को जानने वाले को भी तत्वदर्शी यहां कह दिया गया है। भगवत गीता में दो में। ठीक है? अब यहां दो6 तक इन्होंने क्या खिचड़ी पकाई
00:45:33:08 है? वह यह है कि अविनाशी का अस्तित्व सदा रहता है। यहां देखिए यह बुलेट पॉइंट है याद रखने योग्य। यहां इसने बोला रामपाल ने कि असत यानी नाशवान का अस्तित्व चिर काल तक नहीं रहता है। सत यानी अविनाशी का अस्तित्व सदा रहता है। यानी कि यहां पर इसने मान लिया यह पेज नंबर 17 है इसकी भगवत गीता के अनुसार।
00:46:06:16 हां यही है लास्ट पैराग्राफ यही यही है जो सामने है नहीं नहीं ऊपर मत करिए ऊपर मत करिए है ना तो क्या है कि दो के श्लोक 16 में वर्णन है कि असत यानी नाशवान का अस्तित्व चिरकाल तक नहीं रहता तथा सत्य यानी अविनाशी का अस्तित्व सदा रहता है। तो इसने यानी यहां क्या मान लिया? कि अविनाशी का अस्तित्व सदा रहता है। इसका अर्थ क्या है? कि यदि कहीं पर भी किसी के लिए भी अविनाशी शब्द आ जाएगा तो मानना पड़ेगा कि अविनाशी जो है वह सदा रहने वाला है। वहां पर यह नहीं कह सकते कि थोड़ी देर के लिए क्योंकि इसने यहां स्वयं माना है कि अविनाशी का अस्तित्व सदा रहता है। उसका अंश आत्मा भी अविनाशी है और परमात्मा भी अविनाशी है। परमात्मा से संपूर्ण संसार व्याप्त है। देखिए यहां पर इसने मान लिया परमात्मा से संपूर्ण संसार व्याप्त है यानी विस्तार को प्राप्त हुआ है। अब यह बताइए कि परमात्मा से संपूर्ण संसार व्याप्त है। व्याप्त मतलब संपूर्ण संसार के कण-कण में ईश्वर
00:47:21:25 है। मगर इसने आगे क्या कहा? यानी उसके कारण विस्तार को प्राप्त हुआ है। तो भाई कौन सी डिक्शनरी ऐसी है जहां पर व्याप्त होने का अर्थ जो है यह हो कि उस व्याप्त होने का अर्थ यह है कि उसके द्वारा विस्तार को प्राप्त हुआ है। तो यहां पर इसका यह भी एक झोल जो है पकड़ के रखिए कि भाई व्याप्त होने का मतलब है कि व्याप्त है रमा हुआ है। व्याप्त होने का मतलब ये नहीं है कि उसके कारण वो विस्तार को प्राप्त हुआ है। तो ये अपने मन से इसने डाल दिया यहां पर क्योंकि इसको अपनी आईडियोलॉजी लेकर चलनी है ना। इसलिए उस अविनाशी परमात्मा का अभाव किसी समय में नहीं होता है। अविनाशी परमात्मा का अभाव किसी समय में नहीं होता है। यह बोल दिया। फिर गीता अध्याय दो श्लोक 17 के अर्थ में इसने ये बताया है कि यहां पे परमात्मा की महिमा बताई है। अब देखिए यहां पर इसने खेल क्या खेला है? बात हो रही है भगवान श्री कृष्ण उसको यह समझा रहे हैं
00:48:36:26 अर्जुन को कि अर्जुन आत्मा ना कभी मरती है और ना ही उसका कभी अभाव होता है और यदि तू शरीर के लिए चिंतित है तो शरीर की कभी सत्ता नहीं होती जैसे यहां असत वस्तु की सत्ता नहीं होती और सत का अभाव नहीं होता ठीक है आत्मा की बात चल रही है लगातार अचानक से दो 17 में भगवान की बात कैसे आ जाएगी जबकि इसके बाद वाले श्लोक में भी आत्मा की ही बात चल रही है। तो यहां क्यों क्यों इसने कहा परमात्मा की बात वह समझिए। तो आत्मा की उत्पत्ति परमात्मा से परमात्मा ने अपने वचन से अपने शरीर से की है। गीता अध्याय दो श्लोक 17 में उस अविनाशी परमात्मा की महिमा बताई गई है कि परमात्मा के अतिरिक्त कोई भी नित्य नहीं है। क्योंकि आत्मा की उत्पत्ति परमात्मा ने अपने वचन से अपने शरीर से की है। यह तो इसने अपने मन से बता दिया। उत्पत्ति से पहले आत्मा का अभाव था। यानी कि आत्मा नित्य नहीं है। यहां इसने मान लिया। अभी देखिए आत्मा को आगे कितनी बार नित्य कहा गया है। ठीक है?
00:49:47:12 और दो श्लोक 17 में सीधे सीधे आत्मा की ही बात हो रही है कि भाई अगर हम प्रसंग अनुसार चलेंगे तो यहां पर भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि जिसको मारने के लिए तू दुख प्रकट कर रहा है जिसको मारने से तू कतरा रहा है वो तो कभी मरती नहीं है तो तू दुखी क्यों हो रहा है और जिसको बचाने के लिए तू प्रयत्न कर रहा है वह तू कभी बचा नहीं सकता तो तू दुखी क्यों हो रहा है तो तू वह कार्य कर तो तू इसके मरने और ना मरने दोनों की स्थिति में समान देख और अपना कर्म कर शास्त्र भेद कर्म कर अपने धर्म का रक्ष अपने धर्म की रक्षा कर तो इसी को कहा गया धीरवान और जो मोह नहीं मोह को प्राप्त जो मोहित नहीं होता और जो सत और असत दोनों को सही से जानता है वही मोक्ष के योग्य है। यही सब कहा ना भगवान ने केवल जानने का जानने की बात है। विद्या से जितना लिप्त होते जाएंगे और अविद्या से जितना दूर होते जाएंगे हम मोक्ष के करीब जाते जाएंगे। तो जो यह बात कहते हैं ना कि नहीं परमात्मा जो है जीवन मरण में नहीं आ सकते। हां वो जानता है कि मैं जीवन मरण में नहीं हूं। मगर जो हम लोग जिसको जीवन मरण कहते हैं उस जीवन मरण में परमात्मा आ
00:51:02:16 सकता है। परमात्मा स्वयं ये जानता है कि मैं जीवन मरण में नहीं गया हूं। मगर हमारी दृष्टि में वह ऐसी लीलाएं कर सकता है कि वह आया वो गया जीवन मरण में और जीवन मरण में आते हुए भी क्योंकि वो जानता है इसलिए वो मुक्त है और हम नहीं जानते तो हम मुक्त नहीं है। ये अंतर है जो उस बात का गलत अर्थ निकालते हैं कि तू जानता है मैं नहीं मैं जानता हूं तू नहीं जानता है। खैर आगे चलते हैं। तो 217 में यहां पर इसने क्या किया कि जब लगातार आत्मा की बात आ रही है। दो6 तक आत्मा के बारे में बातें की गई है और इससे आगे भी आत्मा के बारे में भी बात की गई है। मगर यहां पर क्योंकि आत्मा को ये कहा गया है कि आत्मा को यहां पर अविनाशी कहा गया है। नित्य कहा गया है। तो और दूसरी बात संपूर्ण जगत दृश्य वर्ग व्याप्त है। ये भी कहा गया है आत्मा के लिए। हालांकि इस श्लोक को लेकर के जैसे कुछ ऐसे हैं हमारे संप्रदाय भी वह भी नहीं मानते कि भाई यहां पर जो है क्या कहते हैं आत्मा को सर्वव्यापी कहा गया है। जैसे स्कॉन वालों ने आत्मा को यहां पर सर्वव्यापी नहीं माना है और कुछ और माना है जिसके बारे
00:52:18:01 में इसने बात की है रामपाल ने अपने इसमें भाष्य में क्या माना है देख लेते हैं हां जो सारे शरीर में व्याप्त है। तो जैसे यहां पर क्या माना गया? सर्वम का अर्थ संपूर्ण जगत माना गया। सर्वम मतलब सब मगर यहां पर इन्होंने कर दिया कि आत्मा जो है जो सारे शरीर में व्याप्त है। हालांकि वहां पर शरीर शब्द नहीं आया है। ये मैं बात कर रहा हूं इस की भगवत गीता की स्मृति। इसमें इन्होंने क्या अर्थ किया है कि जो सारे शरीर में व्याप्त है। क्यों? इन्होंने ऐसा अर्थ क्यों किया? इन्होंने एक अच्छी चीज की कि इन्होंने आत्मा का प्रसंग चल रहा है। तो ये नहीं कहा कि यहां दो अध्याय दो श्लोक 17 में आत्मा की बात नहीं परमात्मा की बात हो रही है। इन्होंने ये अच्छा कार्य किया। परंतु क्योंकि इनको आत्मा को परमात्मा की तरह सर्वव्यापक नहीं मानना था। क्योंकि ये द्वैतवादी है। आत्मा के कुछ लक्षण अलग बताते हैं। द्वैतवादी भी नहीं है। इनका तो खैर कुछ और ही है। अचिंत वेदावेद और पता नहीं क्या है। उसमें भी मिक्स है। मगर इन्होंने कम से कम यह कहा कि यहां परमात्मा की बात नहीं हुई है। आत्मा की हुई है और आत्मा के इन्होंने संपूर्ण
00:53:33:01 शरीर में व्याप्त कर दिया। संपूर्ण विश्व में व्याप्त नहीं संपूर्ण शरीर में व्याप्त कर दिया। तो इसने यहां पर इनकी आलोचना की है इस वालों की और कहा है कि भैया यह जो दो श्लोक 17 का इस का अर्थ है वो गलत है क्योंकि उसने कह दिया कि जो आत्मा है वो पूरे शरीर में व्याप्त है जबकि शरीर की बात वहां हो ही नहीं रही है। तो इसको दोनों को काटना पड़ेगा। क्यों? क्योंकि अगर आत्मा को सर्वव्यापी मान लेगा तो वो ईश्वर जैसी हो जाएगी। तो जब ईश्वर ही सर्वव्यापी नहीं है तो आत्मा को सर्व्यापी कैसे कहे भाई? है ना? दूसरी बात कि उसको नित्य कहा गया है और व्यापकता वाला शब्द भी आ गया है। तो इसलिए वो यह भी नहीं मान सकता इनकी बात नहीं मान सकता। इस कौन की बात भी नहीं मान सकता कि वह शरीर की बात हो रही है। तो यहां पर इसने बिना किसी अर्थ के बिना किसी प्रयोजन के दो 17 में कह दिया कि यहां पर जो है परमात्मा की बात हो रही है। जबकि यहां पर भी आत्मा की ही बात हो रही है। और इसने यह भी कह दिया यह बताते बताते कि आत्मा अविनाशी तो है। आत्मा का आत्मा को मारा तो नहीं जा सकता। मगर कभी ना कभी एक समय ऐसा था जब आत्मा
00:54:48:09 का भी अभाव था। यानी कि आत्मा सत नहीं है। आत्मा सत नहीं है। सत का मतलब जब वो सत नहीं है तो यह समझ लो कि रामपाल के अनुसार मोक्ष हो ही नहीं सकता। क्योंकि वो सत है ही नहीं। आत्मा सत है ही नहीं तो उसको मोक्ष कहां से मिलेगा? सत वाला। उसको तो बनती और वो होती रहेगी। ठीक है? अब इसमें एक प्रश्न और आ जाता है कि आत्मा अविनाशी है मगर उसका कभी अभाव था तो क्या काल का भी कभी अभाव था तो फिर कहां से उत्पन्न हुए हैं ये लोग वो तत्व कहां से आए यह सब सोचने वाली बातें हो जाती है फिर अच्छा अब इसके बाद आगे चलते
00:55:37:14 हैं तो इसने क्या कहा प्रभुपाद जी की गीता का खंडन करते हुए कि गीता अध्याय दो श्लोक 17 के एस्कॉन वाले श्रील प्रभुपाद द्वारा किए गए अनुवाद में गड़बड़ी की है। आत्मा की महिमा बताइए। जबकि मूल पाठ उस अविनाशी परमात्मा का गुणगान कर रहा है। देखिए आत्मा को स्कॉन के अनुसार संपूर्ण शरीर में शरीर में व्याप्त मान लीजिए या फिर आत्मा को क्या कहते हैं? जो अन्य भाष्यकार है उनके अनुसार संपूर्ण विश्व में व्याप्त मान लीजिए। मगर दो अध्याय दो श्लोक 17 में बात किसकी हो रही है? आत्मा की। मगर इसको क्योंकि आत्मा को भी अनित्य सिद्ध करना है कि कोई एक समय था जब आत्मा का अभाव था। तो अगर आत्मा का अभाव मान लेंगे तो फिर आत्मा अपनी सत वाले रूप में कभी पहुंच ही नहीं सकती। सत स्वरूप हो ही नहीं सकती। तो पूर्ण मोक्ष उसको मिल ही नहीं सकता। है ना? तो यह भी एक बात है सोचने वाली इनके अनुसार इसके बाद क्या है? आगे क्या लिखा है? जिससे यह संपूर्ण जगत
00:56:52:21 यानी दृश्य वर्ग व्याप्त है। यानी विद्यमान है। एस्कॉन वालों ने अनुवाद गलत किया है। यह एस्कॉन नहीं बोलता है। एस्कॉन बोलता है क्योंकि ये थोड़ा गवार रहा है इसलिए एस्कॉन वालों ने अनुवाद गलत किया है। शब्दों के अर्थ अनुवाद से पहले लिखे हैं। जिनमें शब्द का अर्थ तो ठीक किया जिससे परंतु अनुवाद मैं कर दिया जो उनके द्वारा किया अनुवाद इस प्रकार है जो सारे शरीर में व्याप्त है उसे ही तुम अविनाशी समझो उस अव्यय आत्मा को नष्ट करने में कोई भी समर्थ नहीं है ठीक है तो आत्मा को क्योंकि इसे नित्य नहीं मानना था तो इसलिए ना तो इसने अन्य भाष्यकारों का लिया है कि वहां आत्मा की बात हो रही है और
00:57:42:16 क्योंकि वहां पर इसको परमात्मा को डालना था। तो इसलिए जो श्रील प्रभुपाद जी ने इस की भगवत गीता में आत्मा को पूरे शरीर में व्याप्त बताया है। तो वहां आत्मा की बात ना होकर के परमात्मा की बात हो रही है। यह बताने के लिए इस का भी खंडन है और जितने भी अन्य भाष्यकार है उनका खंडन है। इसके बाद इसी गीता अध्याय दो श्लोक 17 का अनुवाद गीता गोरखपुर से मुद्रित प्रकाशित है। जय दयाल गोविंद का द्वारा अनुवादित वो उसमें ठीक किया है जो इस प्रकार है नाश रहित तो तू उसको जान जिससे संपूर्ण जगत यानी दृश्य वर्ग व्याप्त है उसे अविनाशी का उस अविनाशी का विनाश करने में कोई भी समर्थ नहीं है तो अब यहां आगे इसने तर्क दिया है कि दोनों अनुवाद ऊपर लिखे हैं पाठक जन स्वयं निर्णय कर सकते हैं सत्य तथा असत्य का वर्तमान में एस्कॉन वालों के श्रील प्रभुपाद जी द्वारा इसने फिर उनकी आलोचना की है श्रील प्रभुपाद
00:58:44:16 अच्छा इसने एक बात और मान ली है कि दो 16 में सत और असत को तत्वदर्शी संत ही ठीक ठीक बताते हैं। उन्होंने दोनों को देखा है यानी जाना है। तो सबसे पहली बात हमको अभी तक क्या जानने को मिल गई? रामपाल के अनुसार जो आत्मा है वो नित्य नहीं है। वो सत नहीं है। जब वो सत्य नहीं है तो इसका अर्थ क्या हुआ? कि कभी भी पूर्ण मोक्ष आपको मिल ही नहीं सकता है। आप सत स्वरूप हो ही नहीं सकते हो। क्यों नहीं हो सकते हो? क्योंकि आप सत हो ही नहीं। तो जब हो ही नहीं तब तो सत्य तक पहुंचोगे कैसे? भाई अपने मूल स्वरूप को प्राप्त करने का संघर्ष एक अलग है कि तुम कुछ थे और यहां फस गए। मगर तुम जो हो ही नहीं वो तो तुम्हें प्राप्त हो ही नहीं सकता। तो तुम सत्य नहीं हो। अच्छा यहां से उत्पन्न करने वाली बात से एक बात और आती है कि जब आत्माएं मुक्त हो जाती हैं तो वो जब काल दोबारा जन्म लेता है एक बार मृत्यु होने के बाद और जब मृत्यु होती है उस समय सारी आत्माएं मुक्त हो जाती है और वो मुक्ति धाम में पहुंच गई जब उसके बाद काल दोबारा जब जन्म लेता है तो
00:59:59:18 दोबारा काल के जन्म होने से पहले क्या ये जो इनके कबीर हैं वो नई आत्माएं फिर से उत्पन्न करते हैं इनकी सृष्टि रचना के अनुसार या फिर वो जो पुरानी आत्माएं मुक्त हो चुकी थी उन्हीं को दोबारा से समेटता है काल अपने जाल में तो ये सब चीजें इन्होंने बताई नहीं है। आगे अगर आगे बात करते हैं अध्याय दो के श्लोक 17 का भावार्थ इन्होंने किया है कि गीता ज्ञान दाता काल भगवान ने ऊपर के श्लोकों में कहा है कि अर्जुन हम सब मैं और तू तथा सर्व प्राणी जन्म मरण में है। श्लोक 17 में कहा है कि वास्तव में अविनाशी तो तू उसी परमेश्वर को ही जान जिससे यह सर्व ब्रह्मांड व्याप्त है। यहां पर परमेश्वर की बात बताई क्यों गई? क्यों बताई जा रही है? भाई परमेश्वर की बात जब बताई जाएगी तो इसलिए बताई जाएगी जाएगी ना कि परमेश्वर आपको उनकी शरण में जाना है। परमेश्वर को भजना है। परमेश्वर की भक्ति करना है। जबकि यहां बात क्या चल रही है कि आत्मा कभी मरती नहीं है। तो उसके लिए दुख क्यों मना रहा है? तो सबसे बड़ा इनका झोल
01:01:14:26 यहीं से शुरू हो गया। रामपाल का बोल वचन कि दो श्लोक 17 में आत्मा की नहीं परमात्मा की बात हो रही है। ठीक है? अब दूसरी बात यह है कि आत्मा को संपूर्ण परमात्मा को इसने मान लिया कि संपूर्ण विश्व में व्याप्त है। यह भी ध्यान रखने योग्य बात है। ठीक है? तो क्या है? इसने कहा दो श्लोक 17 में कहा है कि वास्तव में अविनाशी तो उसी परमेश्वर को ही जान जिससे यह सर्व ब्रह्मांड व्याप्त है। अब इसने व्याप्त होने को मान लिया कि परमेश्वर से ये पूरा जो संसार है वो व्याप्त है। मगर समस्या क्या है? समस्या यह है कि इसका जो ईश्वर है वो एक जगह बैठा है। उसकी शक्ति सब जगह है। तो क्या दिक्कत है? कि वो सर्वव्यापी नहीं हो सकता। वह व्यापक नहीं है। इसीलिए आगे कह रहा है कि उसी की शक्ति प्रत्येक जीव में और कण कण में विद्यमान है। तो क्या हो गया? इनका ईश्वर सर्वव्यापी नहीं है। शक्ति व्याप्त है। जब शक्ति व्याप्त है तो जैसे सूर्य की जो ऊष्मा है, जो दाहकता है, जहां पर सूर्य है वहां बहुत ज्यादा है और जहां पर जहां जैसे
01:02:29:27 जैसे दूर होते जाते हैं तो दाहकता उसकी कम होती जाती है। इसने सूर्य का उदाहरण दिया कई बार इस बात को समझने के लिए कि कैसे जो ईश्वर है उसकी जो शक्ति है वह पूरे विश्व में ब्रह्मांड में फैली हुई है। तो अब यहां पर इसने यह तो मान लिया एक तरफ कि वह सर्वव्यापक है। मगर सर्व्यापक का पूरे ब्रह्मांड में व्याप्त है ईश्वर। यह मान लिया। मगर पूरे ब्रह्मांड में व्याप्त होने का अर्थ क्या बता रहा है? कि उसकी शक्ति प्रत्येक जीव और कण-कण में विद्वान है। अब इससे पूछो कि ये अर्थ कहां लिखा है? पूरे ब्रह्मांड में व्याप्त होने का यह अर्थ कहां लिखा है कि उसकी शक्ति व्याप्त है। वह नहीं व्याप्त है। अगर तुम यह कहोगे कि शक्ति के रूप में वो स्वयं है तो तो ठीक है। शक्ति और उसमें कोई भेद नहीं है। यदि तुमने भेद किया शक्ति और उसमें भेद है तो तुम्हें तो तुम ये अर्थ दिखाओ। देखो आगे जैसे बता रहा है जैसे सरलार्थ करके बता रहा है जैसे सूर्य के सामने होते हैं यह सब चीजें आगे बता रहा है। इसके बाद दूसरे अध्याय का 18वा श्लोक हम पढ़ रहे हैं। उसका अर्थ पढ़ रहे हैं। इस नाश रहित
01:03:45:02 अप्रममेय नित्य स्वरूप जीवात्मा के ये सब शरीर नाशवान कहे गए हैं। इसलिए हे भरतवंशी अर्जुन तू युद्ध कर वो वाला दिखा दीजिए जय दयाल जय दयाल गोका जी का तो अभी तक इनकी दो चोरियां पकड़ी गई क्या पकड़ी है वैसे तो हर शब्द में ही चोरी है इसकी मगर एक चोरी पकड़ी गई कि इसने आत्मा को नित्य नहीं माना तो मोक्ष हो ही नहीं सकता। सत सत स्वरूप नहीं हो सकते हो क्योंकि सत है नहीं और मतलब इनका जो अभाव है वह होता रहेगा क्योंकि सत नहीं है तो उसका अभाव होगा तो अभाव होता रहेगा। दूसरी बात तो इसका अर्थ हो गया कि यहां इसके हिसाब से मुक्ति है ही नहीं। दूसरा क्या है कि इसने आत्मा की बात हो रही है और बीच में अचानक से अपने विपरीत बात जाते हुए देखी तो दूसरे अध्याय के 17व श्लोक में यह कह दिया कि यहां तो परमात्मा की बात हो रही है और तीसरा क्या जाना कि परमात्मा के लिए इसको यह मानना पड़ा कि संपूर्ण ब्रह्मांड में परमात्मा व्याप्त
01:05:00:22 है। मगर वहां पर यह कहना मगर अपनी आईडियोलॉजी को सेफ करने के लिए इसको यह कहना पड़ा कि परमात्मा की शक्ति व्याप्त है। परमात्मा व्याप्त नहीं है। तो कितने झूठ पहले तो यह है कि आत्मा की जगह परमात्मा को ले आया। अब जब ले आया तो फिर वहां पर तब भी परमात्मा को पूरी तरीके से नहीं वहां रखा। वहां क्या कर दिया कि वो सर्वव्यापी नहीं है। उसकी शक्ति व्याप्त है। ठीक है? और एक बहुत बड़ी चीज है यहां ध्यान रखिएगा क्योंकि यह कभी भी तत्वदर्शी सिद्ध करने के लिए चार 34 के अलावा किसी और श्लोक का वो नहीं लेते हैं रेफरेंस जबकि यहां दो 16 में भी तत्वदर्शी की व्याख्या की गई है। कौन है? जो सत और असत तत्व को जानता है कि इसकी क्या प्रकृति है और इसकी क्या प्रकृति? जो विद्या और अविद्या को जानता है। ठीक है? यह चार चीजें आपको यहां से बुलेट पॉइंट्स मिल गए अभी तक की व्याख्या से। अब आगे हम लोग चलते
01:06:01:28 हैं। 18वा श्लोक यह कह रहा है कि इस नाश रहित अप्रममेय नित्य स्वरूप जीवात्मा के यह सब शरीर नाशवान कहे गए हैं। और आगे कहा जा रहा है 19 में कि जो इस आत्मा को मारने वाला समझता है तथा जो इसको मरा मानता है वह दोनों ही अज्ञानी है। देखिए बार-बार देखिए जानने वाला और ना जानने वाला विद्या और अविद्या सत और असत इसी के बीच में अंतर है। यहीं पर ईश्वर और जीव है। जीव और ब्रह्म है। ब्रह्म वो है जो जानता है। जीव वो है जो नहीं जानता है। ब्रह्म वो है जो विद्यावान है। जीव वो है जो अविद्या से ग्रसित है। तो जो इस आत्मा को मारने वाला समझता है। जो इसको मरा मानता है वह दोनों ही नहीं जानते हैं क्योंकि यह आत्मा वास्तव में ना तो किसी को मारता है और ना किसी के द्वारा मारा जाता है। अब एक बात बताइए जब इसने दो 17 में यह कहा कि परमात्मा की बात हो रही है अचानक से पीछे से आत्मा की बात होती चली आ रही है और आगे भी आत्मा की बात हो रही है। अचानक से दो में परमात्मा की बात होती है। परमात्मा वो जो कि नाश रहित तो तुम परमात्मा
01:07:17:03 को जानो जिनसे संपूर्ण जगत व्याप्त है। उसमें झोल कर दिया कि संपूर्ण जगत उसकी शक्ति से व्याप्त है। मगर अचानक से परमात्मा की बात आगे वो क्यों की भगवान ने? भाई उसका कोई कारण तो हो जब अचानक से आत्मा की बात करते परमात्मा की बात कर दी। तो आगे कहे तो कि तुझे उसकी शरण में जाना है। तुझे उसकी भक्ति करनी है, तुझे ये करना है, तुझे वो करना है। कुछ तो बताते मगर कुछ नहीं बताया। अगले श्लोक में भी जैसे क्योंकि वास्तविकता यह है यहां पर परमात्मा नहीं आत्मा की बात हो रही जीवात्मा की बात हो रही है तो अगले श्लोक में भी जीवात्मा के बारे में ही बात हो रही है कि इस नाश रहित अप्रममेय नित्य स्वरूप जीवात्मा के ये सब शरीर नाशवान कहे गए हैं इसलिए हे भरतवंशी तू युद्ध कर यानी नाशवान यानी कि असत है तो असत के लिए तू शोक मत कर सत और असत के स्वरूप को समझ वही तत्व ज्ञानी होता है वही तत्वदर्शी होता है तो तत्वदर्शी का ज्ञान कौन दे रहे हैं यहां पर? भगवान श्री कृष्ण। मगर इसके हिसाब से भगवान श्री कृष्ण के अंदर काल था और काल और भगवान श्री कृष्ण दोनों ही इसके हिसाब से तत्वदर्शी नहीं है। ठीक है? जबकि सत और असत को तत्व के तत्व को बताने वाला भी तत्वदर्शी है। और सत्य के और असत के तत्व को यहां बता दिया उन्होंने। आगे
01:08:32:04 भी बता रहे हैं जो इस आत्मा को मारने वाला समझता है तथा जो इसको मरा मानता है वह दोनों ही नहीं जानते क्योंकि यह आत्मा वास्तव में ना तो किसी को मारता है और ना किसी के द्वारा मारा जाता है। 20वा और पढ़ ले 20वा इसके आगे का और यह आत्मा किसी भी काल में ना तो जन्मता है। ठीक है? यह देखिए ना मरता ही है तथा ना यह उत्पन्न होकर फिर होने वाला ही है। क्योंकि यह अजन्मा नित्य, सनातन और पुरातन है। ठीक है? और शरीर के मारे जाने पर भी यह नहीं मारा
01:09:12:10 जाता। अब दिक्कत क्या है? देखिए इसने क्या कहा कि कोई एक काल ऐसा था जब आत्मा का अभाव था मगर परमात्मा का नहीं था। मगर यहां पर इन्होंने क्या कह दिया कि आत्मा किसी भी काल में ना तो जन्मता है ना मरता है तो ना मरने की बात तो उसने भी मानी कि नहीं अविनाशी है मगर जन्मने की बात उसने नहीं मानी उसने क्या माना है पीछे कि उसकी भी उत्पत्ति होती है किसी ना किसी समय एक समय था जब उसका अभाव था यानी वो सत नहीं है आत्मा को यहां पर क्या क्या कहा गया है देखिए इस श्लोक में यह आत्मा किसी भी काल में ना तो जन्मता है थोड़ा नीचे कर दीजिए वो वाली लाइन दिख नहीं रही होगी दर्शकों को हां ठीक है ठीक है ठीक है ठीक है दिख रहा है दिख रहा है यह आत्मा किसी भी काल में ना तो जन्मता है ना मरता ही है ना यह उत्पन्न होकर फिर होने वाला देखिए उत्पन्न होकर यहां आ गया स्पष्ट ना यह उत्पन्न होकर और ये किस शब्द का अर्थ है भूत्वा ठीक ठीक है? ये भूत्वा शब्द दिया है। उसका अर्थ है उत्पन्न होकर। तो उत्प उत्पन्न
01:10:27:10 होकर फिर होने वाला ही है। मतलब ये उत्पन्न नहीं होता है। और इसने दो 17 के अर्थ में माना है पीछे कि आत्मा भी उत्पन्न होती है। ठीक है? क्योंकि दिखा दीजिए एक बार इनका। ये पेज नंबर 17 दिखा दीजिए। गरिमा गीता की का पेज नंबर 17 दिखा दीजिए। वही लास्ट का पैराग्राफ था जो आत्मा की उत्पत्ति सेकंड लास्ट पैराग्राफ है। पहली बात तो तर्क से समझ लीजिए कि यदि आप सत हैं तो ही आप सत स्वरूप हो सकते हैं। यदि यदि आप किसी समय मुक्त थे तो ही आप मुक्त हो सकते हैं। ठीक है? आप मोक्ष में थे तो आप मोक्ष तक पहुंच सकते हैं। तो अगर आप सत स्वरूप है ही नहीं तो आपका आप सत्य कहां से हो जाएंगे फिर? यदि आप असत हैं तो तो ये देखिए इसमें मेरी फोटो के जस्ट पीछे ही है। हां परमात्मा अपने वचन से अपने शरीर से की है। आत्मा की उत्पत्ति किसने की है? क्योंकि आत्मा की उत्पत्ति परमात्मा ने अपने वचन से अपने शरीर से की है। यहां पर इसने
01:11:42:16 मान लिया आत्मा की उत्पत्ति होती है। मगर भगवत गीता अध्याय दो श्लोक 20 यह कह रहा है कि आत्मा कभी भी उत्पन्न होकर फिर दोबारा होने वाली नहीं है। ना तो उत्पन्न होती है ना ही नष्ट होती है। दोनों का आप मैच कर सकते हैं। ठीक है? तो यह इसके मूल वचन अभी तक के अब इसने क्या किया है 1820 में ज्यादा बात नहीं की है इसने ज्यादा लिखा नहीं है वो पेज लाइए 19वा इसकी बुक का 19वा पेज लाइए रामपाल की बुक
01:12:20:18 [संगीत] का अब इसने क्या किया है श्लोक क्रमांक 18 से 20 में ज्यादा बात नहीं की है क्या बात की है कि यह पंच भौतिक शरीर नाशवान है ठीक है नाशवान तो कोई बात नहीं भैया आगे चलो शरीर नाशवान है। ठीक है। अविनाशी परमात्मा नाश रहित है। अब इसमें अविनाशी परमात्मा की बात कहां से आ गई? जब यहां पे शरीर की बात हो रही है। अब यहां देखिए परमात्मा की बात क्यों नहीं हो सकती? यहां आत्मा की बात ही क्यों माननी पड़ेगी? क्योंकि इसमें एक शब्द आया है देह शरीर। ठीक है? और एक शब्द आया है शरीरण। शरीरण तो इसका मतलब है जीवात्मा के शरीरण देहा तो इसमें परमात्मा का किसी भी प्रकार से सिद्धि नहीं हो रही। वो वाला आगे देखिए।
01:13:33:08 यह आत्मा किसी भी काल में ना तो जन्मता है ना मरता है। तो यह सब बातें तो इसने गण कर दी। अब इसने एक बात कही है। प्रमाण रहित अर्थात सामान्य साधक नहीं समझ सकते। इसने यह बात कही है। प्रमाण रहित अर्थात यह सेकंड पैराग्राफ में कही है इसने बात। यह देखिए प्रमाण रहित अर्थात सामान्य साधक नहीं समझ सकते। अब इसमें प्रमाण रहित इसका क्या अर्थ माना जाए कि इसके पास अपनी बात को कहने का प्रमाण नहीं है और जो मना करेगा तो वो कहेगा कि साधारण जो सामान्य साधक है वो समझ नहीं सकते। भाई प्रमाण के बिना बात कह रहा हूं। इसलिए आपको माननी है तो मानो और अगर आप नहीं मानते हो तो आप मूर्ख हो और परमात्मा नाश रहित है। जीवात्मा के साथ नित्य रहने वाला है। ये कहां से आ रहा है? ना तो यहां पर परमात्मा की संस्कृत है। ना ही के साथ रहने वाला है। इसकी संस्कृत है। परमात्मा को नित्य कहा जा रहा है। मगर ये क्या चल रहा है? आत्मा को नित्य ना मानना पड़े इसलिए परमात्मा
01:14:48:24 के साथ नित्य रहने वाला है। तो जब हम यह कहेंगे कि परमात्मा के साथ नित्य रहने वाला है तो भाई साहब उसकी संस्कृत आपको देनी पड़ेगी ना के साथ नित्य रहने वाला इतनी संस्कृत लानी पड़ेगी ना और परमात्मा को लाना पड़ेगा। यह सब शब्द तो है नहीं क्योंकि यहां बात लगातार आत्मा की भी हो रही है। अच्छा यह अभी और सिद्ध हो जाएगा। आगे आगे चलते हैं। फिर इन्होंने जो है अपनी अज्ञानता दिखाई है कुछ इधर-उधर के श्लोकों की बात करके
01:15:27:21 और इन्होंने एक वो और दिया है। परमात्मा की निराकार शक्ति आत्मा के साथ ऐसे है जानो जैसे मोबाइल फोन की रेंज। अब जैसे मोबाइल फोन की रेंज फिर से वही बात आ गई कि मोबाइल फोन की जो रेंज होती है वो दूरी के साथ-साथ कम होती है। हम फिर इन्होंने एक जगह निराकार शक्ति की बात की। तो इतना जान लीजिए कि इसने यह तो ठोस तरीके से माना है रामपाल ने कि जो परमात्मा है वह सर्वव्यापक नहीं है बल्कि उसको सर्वव्यापक कहने का अर्थ है कि उसकी जो शक्ति है वो संपूर्ण विश्व में व्याप्त
01:16:13:12 है। एक मिनट हां तो इसकी अभी ये जो पोल है ना ढोल की पोल वो खुल जाएगी अभी कुछ ही देर में। अब यह बात आगे बात करता है कि श्लोक अब देखिए एक बात और है यहां बात पहली बात तो यह है कि आत्मा की बात इसलिए की जा रही है प्रसंग को भी ध्यान में रखना पड़ेगा कि हम यह बता रहे हैं कि आत्मा को कुछ हो नहीं सकता है। अर्जुन का वो जो शोक हो रहा है ना कि मैं इसको मार रहा हूं ये कर रहा हूं तो भगवान वहां बता रहे हैं कि आत्मा को कुछ नहीं हो रहा। तुम किसी को नहीं मार रहे हो। और यदि तुम किसी को बचाने की शरीर इत्यादि को बचाने की कोशिश कर रहे हो तो शरीर कभी बच नहीं सकता है। उसका तो नाश होना ही है। और आत्मा को यहां पर क्या-क्या कहा गया है? 20 20 वे श्लोक में कि यह आत्मा किसी काल में ना तो जन्मता है ना मरता है ना उत्पन्न होता है हम ये सब कह दिया
01:17:28:12 गया यहां पर सनातन पुरातन नित्य अजन्मा सब कुछ कह दिया गया मगर इसने यहां पर क्या किया पूरा अपना गड़बड़ झाला कर दिया और यहां पर कुछ बोला ही नहीं शांत हो के थोड़ा बहुत बोल के आगे निकल गया क्योंकि भाई उसकी भी एक सीमा सीमा है ना उसको कितना वो करेगा कहीं ना कहीं तो वो फंसेगा तो इसलिए यहां पर ज्यादा ना बोल के आगे निकल गया तो इसने कहा दो श्लोक के 19 से 21 तक का भाव यह है कि सर्वव्यापक पूर्ण परमात्मा आत्मा के साथ ऐसे रहता है। अब जब आत्मा के साथ रहने की बारी आ रही है तो आत्मा के साथ रहना इसकी संस्कृत आपको बतानी होगी। मिस्टर रामपाल जी आत्मा के साथ रहने की बात यहां कहां हो रही है? रहना रहने की बात तो यहां कहीं नहीं हो रही जिससे पता लगता है कि यहां आत्मा की बात हो रही है। यहां पर परमात्मा की बात नहीं हो रही है। दूसरी बात परमात्मा करके भगवान आगे ये बताएंगे ना फिर कि अगर परमात्मा की बात हो रही है तो ठीक है उनकी भक्ति कर। मगर यहां तो आगे के बहुत से पेजेस में भक्ति की बात नहीं होगी। ठीक है? चलिए।
01:18:44:19 तो फिर परमात्मा के बारे में बताने का प्रयोजन क्या रहा? कुछ नहीं। तो अभी बुलेट पॉइंट क्या आए हैं? कि रहने की संस्कृत नहीं है। आत्मा के साथ रहने की संस्कृत नहीं है और परमात्मा के बारे में बताने का प्रसंग नहीं है। प्रसंग अनुसार नहीं है। ये देखिए वो वाला उदाहरण इसने दे दिया इस पेज में। दूर रहते हुए भी सूर्य के सूर्य के निराकार प्रभाव उष्णता से प्रत्येक प्राणी प्रभावित रहता है। तो दूर रहते हुए भी सूर्य के सूर्य के निराकार प्रभाव उष्णता से प्रभावित रहता है। यानी कि क्या उतनी ही उष्णता होती है जितनी जब सूर्य के पास होते हैं वहां होती है नहीं होती। इसका मतलब हमें मानना पड़ेगा सूर्य की तरह परमात्मा भी जहां स्वयं है वहां ज्यादा पावरफुल है। जहां वो नहीं है उसकी शक्ति है। वहां वो थोड़ा बहुत कहीं ना कहीं कुछ ना कुछ कम है। तो वो एक रस नहीं है। वो भी घट बढ़ रहा है। आगे देखते हैं 21व में क्या कहा है। जो पुरुष इस आत्मा को नाश रहित नित्य अजन्मा और
01:19:59:22 अव्यय जानता है। वह पुरुष कैसे किसी को मरवाता है? फिर से वही कह रहे हैं। जो पुरुष आत्मा की सच्चाई को जान लेता है तो वो ये कैसे सोच सकता है कि हम किसी को मरवा रहे हैं, मार रहे हैं या कुछ कर रहे हैं। ठीक है? तो इसने 21वें का क्या किया है? इसने कुछ नहीं किया है। इसने अपनी अपनी बातें की है। इसने 21व का अर्थ ही नहीं किया। जहां पर इसको ज्यादा टिपिकल लग रहा होता है वहां पर यह अर्थ ना करके आगे बढ़ जाता है। अब यहां पर यहां पर साफ साफ हो गया कि जो पुरुष इस आत्मा को नाश रहित नित्य अजन्मा और अव्यय जानता है। यहां बात लगातार हो रही है शरीर में रहने वाली आत्मा की देही की जो नित्य है जो शाश्वत है जो पुरातन है जो अजन्मा है जो कभी उत्पन्न होने वाला नहीं है हम उसकी बात हो रही है और जो उसको इस स्वरूप में जानता है तो वो कैसे उसको मारे जाने के दुख में दुख से प्रभावित हो सकता है अब 22वा पढ़ते हैं जयदयाल गोविंदका जी का जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्याग कर दूसरे नए वस्त्रों को ग्रहण करता है। वैसे ही जीवात्मा पुराने शरीरों को त्याग कर दूसरे नए शरीरों को प्राप्त होता है। और 23वां क्या है? नैनम
01:21:15:03 चिनती शस्त्राण मेरा फेवरेट है ये। इस आत्मा को शस्त्र काट नहीं सकते। आग जला नहीं सकती। इसको जल नहीं गला सकता और वायु सुखा नहीं सकती। अब इसने क्या किया है? इसने क्या किया है? दो के श्लोक 22 का अनुवाद जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्याग कर दूसरे नए वस्त्रों को ग्रहण करता है वैसे ही जीवात्मा पुराने शरीरों को त्याग कर दूसरे नए शरीरों को प्राप्त होता है। अब देखिए परमात्मा का संदर्भ आया बीच में जहां पर आत्मा को नित्य कहा गया है वहां पर परमात्मा का संदर्भ आया और यहां गायब हो गया। अब यहां पर इसने परमात्मा की बात नहीं की। दूसरे अध्याय के 22 वे श्लोक में इसने सिर्फ आत्मा की बात की है। 23 में क्या कहा है? दूसरे अध्याय के 23 वे श्लोक में इस जीवात्मा को शस्त्र काट नहीं सकते तो इस इसको वायु सुखा नहीं सकती। ये सब इसने मान लिया। तो क्या हुआ कि परमात्मा की बात हुई क्यों है? पीछे जो परमात्मा का गुणगान हुआ परमात्मा की महिमा गान हुई गान हुआ वो क्यों हुआ? ना तो परमात्मा के साथ रहने वाली
01:22:30:07 संस्कृत है यहां पर अगर है तो यह दिखाएं बाबा जी जेलधाम निवासी और ना ही प्रसंग है और जिस कारण से आपको बाद में स्वयं ही प्रसंग को छोड़कर आगे बढ़ना पड़ेगा तो आगे बड़े हैं यह इसके बाद फिर दूसरे अध्याय के 24 वे और 25 वे श्लोक में फिर उस सर्व व्यापक परमात्मा की महिमा कही गई है देखिए पहले आई परमात्मा की महिमा फिर गई और अब फिर आ गई। क्यों आ गई? क्योंकि बार-बार जो आत्मा की जो नित्यता है वह इनको इनको दिक्कत दे रही है। जो मोक्ष स्वरूप आत्मा है उससे इन्हें प्रॉब्लम है। तो गीता अध्याय दो श्लोक 24 25 के अनुवाद में एस्कॉन एस्कॉन वालों सहित अन्य सब ने गलत अनुवाद किया है। इन दोनों श्लोकों में परमात्मा का वर्णन है। श्लोक 24 में सर्वगत शब्द आया है। अब देखो इसने सर्वगत शब्द मान लिया जिसका अर्थ तो सर्वव्यापी सभी अनुवादकों ने ठीक किया है परंतु आत्मा को सर्वव्यापी बताया है। इसी एक शब्द से भावार्थ बदल जाता है। आत्मा सर्वव्यापी नहीं है। परमात्मा सर्वव्यापी है। अधिक स्पष्ट जानकारी
01:23:45:18 के लिए आगे इन्होंने श्लोकों के संदर्भ दिए हैं। ठीक है? अब बात यह आती है कि पहले तो फिर वही आ गया कि जब तुम खुद मान रहे हो कि परमात्मा चलो सर्व्यापी है। तो फिर तुम यह कैसे कह सकते हो कि वह नहीं है। उसकी आत्मा है सब जगह। उसकी निराकार शक्ति है सब जगह। हम तो पहले तो यहां पर तुम्हारा ही वो हो जाता है। मगर अब इन्होंने आगे अपना अर्थ भी दिया है। और यहां पर बहुत एक कैची पॉइंट है। वो क्या है? तो इन्होंने क्या अर्थ किया है? अध्याय दो के श्लोक 24 का अनुवाद। यह अच्छे है। यह परमात्मा अधाय है। हां। यह यहां पर कहा जा रहा है यह आत्मा आत्मा के लिए आयाम यह है आत्मा तो यहां इसने परमात्मा कर दिया तो अब जो आत्मा के लिए यह परमात्मा कर रहा है तो इसको वहां पर देना पड़ेगा संस्कृत का वर्ड कि परमात्मा शब्द को दर्शाने वाला संस्कृत का वर्ड कौन सा है और अगर इसको यह कहेंगे कि जिसकी बात पीछे हो रही थी उसी के बारे में आगे हुई है अयम यह तो पहली बात तो पीछे आत्मा की बात हो रही थी। उसकी बात आगे हो
01:25:00:21 रही है क्योंकि इसने खुद माना कि श्लोक 22 और 23 में जीवात्मा की स्थिति बताई गई है। जीवात्मा की बात हो रही है। परमात्मा की बात तो हो नहीं रही। तो अयम का अर्थ हम ये नहीं ले सकते कि यह परमात्मा अयम का अर्थ यह आत्मा लेना पड़ेगा। दूसरी बात दूसरी बात यह है कि अब इसकी भाषा शैली के अनुसार जैसे कि यह करता है कि इसने यहां पर ये बोला है यह परमात्मा कर रहा है अगले और निसंदेह अशोष है तथा यह परमात्मा नित्य सर्व्यापी अचल स्थिर रहने वाला और सनातन है। अब इसकी टांग खींची जाए थोड़ी सी यहां टांग खींची जाए कि हम लोग यह शब्द किसके लिए इस्तेमाल करते हैं? किसके लिए प्रयोग में लाते हैं? यह जब कोई हमारी पहुंच में होती है कोई चीज यह है यह यह है। यही खड़ा है। तो हम कहते हैं यह है। ठीक है? तो इसके अनुसार परमात्मा वहीं पर है। जबकि इसके अनुसार हमारे अनुसार हमारी जो चीज है वह मान लोगे तब तुम यह कह भी दोगे परमात्मा वहीं पर है। मगर इसका तो परमात्मा कहीं और बैठा है। उसकी शक्ति वहीं पर है और शक्ति को परमात्मा कह नहीं सकते। तो ये कह रहा है यह परमात्मा यानी
01:26:16:02 जो अर्जुन है वो परमात्मा की शरण में था उस समय। इसके अनुसार क्योंकि इसने क्या कहा? यह परमात्मा अधाय है। तो यह परमात्मा यानी वहां पर परमात्मा था। तो फिर अगर हम बाद में जाएंगे कि तू उस परमात्मा की शरण में जा जैसा कि उस उस उस यह सब खेल खेलता है यह जो है ना अब देखिए अब इसको कैसे पकड़ेंगे 217 में इसने परमात्मा के लिए कहा है ना रहित तो तू उसको जान ये उस और इसका बहुत खेल खेलता है ना तो इसने क्या खेला है दो7 में उस परमात्मा को वहां तो नहीं कहा है यह परमात्मा को जान इस परमात्मा को जान मगर मगर यहां पे क्या कह रहा है? यह परमात्मा अवध्य है। है ना? अवध्य है। अबाध्य है। यह परमात्मा तो इसका मतलब इसके अनुसार वहां पर परमात्मा है। है ना? अब हमारे अनुसार क्या है? भगवान श्री कृष्ण ज्ञान दे रहे हैं और बताते टाइम अलग-अलग प्रसंग अनुसार उसमें सीएस भी होता है। मगर भगवान श्री कृष्ण ज्ञान दे रहे हैं तो वो अर्जुन को जीवात्मा के बारे में बता रहे हैं तो जीवात्मा वहां पर है अर्जुन के शरीर में और
01:27:31:06 अन्यों के शरीर में जीवात्मा है तो उसके लिए तो यह कहा जा सकता है कि यह जीवात्मा मगर यह परमात्मा नहीं कहा जा सकता क्योंकि इसके अनुसार भी परमात्मा वहां पर नहीं है। हमारे अनुसार तो है परमात्मा वहां पर भगवान कृष्ण के रूप में मगर इसके अनुसार तो नहीं है ना तो यह क्यों बोल रहा है यह परमात्मा ऐसा है वैसा है सदा स्थिर रहने वाला है और देखिए और आगे 25 के अनुवाद में क्या कह रहा है यह परमात्मा गुप्त है परंतु तेजोमय सूक्ष्म शरीर सहित अचिंत है और विकार रहित है हालांकि यह आत्मा के बारे में बताया जा रहा है 2425 का मैं आपको पढ़ के बता देता हूं जय दयाल गोविंद का जी का क्या है कि क्योंकि यह आत्मा अच्छेद्य यह आत्मा अदाहाय अकले निसंदेह अशोष्य है तथा यह आत्मा नित्य सर्वव्यापी अचल स्थिर रहने वाला और सनातन है। यह 24वें का अर्थ है और आगे यह आत्मा अव्यक्त है। यह आत्मा अचिंत है। यह आत्मा विकार रहित है। इससे हे अर्जुन
01:28:46:24 इस आत्मा को उपयुक्त प्रकार से जानकर तू शोक करने योग्य नहीं है। अर्थात तुझे शोक करना उचित नहीं है। भगवान यहां पर आत्मा की जो शाश्वतता है उसको बता रहे हैं। वो ना ही कभी जन्मती है ना ही कभी मारी जा सकती है। इसलिए तुझे आत्माओं के मरने का शोक नहीं होना चाहिए। ठीक है? ये 25 वे तक बताया। मगर इसके अनुसार वहां पर परमात्मा नहीं है। हमारे अनुसार तो परमात्मा है भी। यदि कोई भगवान श्री कृष्ण को परमात्मा मानते हुए यह बात कहे कि यह परमात्मा सर्वव्यापी है। हालांकि यहां पर परमात्मा की बात हम क्यों नहीं मान सकते कि यहां परमात्मा की बात हो रही है। क्योंकि पिछले श्लोक में इसने स्वयं माना है कि जीवात्मा की बात हो रही है। तो आगे जब अयम शब्द आएगा तो हम यह नहीं कह सकते कि पीछे वाले श्लोक में परमात्मा अगर पीछे वाले श्लोक में परमात्मा की बात इसने कम से कम मान ली होती। हालांकि हमारे में तो कहीं नहीं मानी है। मगर इसने कम से कम अगर पिछले श्लोकों में मान ली होती है ना तो यह माना जा सकता था कि यहां पे अयम जो कहा जा रहा है उसमें कहा जा रहा है यह परमात्मा। मगर पिछले श्लोकों में तो इसने खुद माना है कि आत्मा की बात है। तो फिर जब पिछले श्लोकों में आत्मा की बात है और जब यहां पर
01:30:01:27 अयम शब्द आएगा तो फिर अयम शब्द पिछले श्लोकों में जिसकी बात हो रही है उसी के लिए आएगा ना तो यह आत्मा मानना पड़ेगा। परंतु इस बात को थोड़ी देर साइड में रख भी दिया जाए तो फिर भी इसके अनुसार तो परमात्मा वहां पर नहीं है। युद्ध के मैदान में नहीं है। क्योंकि भैया ये लोग तो बड़ा वो करते हैं कि अर्जुन तो पहले से कृष्ण जी की शरण में था। तो किस परमात्मा के पास जाने की बात कर रहा है? तो ये देख लो। तुम्हारे बाबा जी क्या कर रहे हैं? अर्जुन को यहां पर परमात्मा के बगल में खड़ा हुआ दिखा रहे हैं कि नहीं? यह परमात्मा यह परमात्मा। हां। अरे भाई वो परमात्मा करो ना फसोगे ना चोरी करोगे तो फसोगे पग पग पर फसोगे आगे
01:30:55:12 देखिए अब देखिए आगे दो अध्याय दो श्लोक 12 से 25 का भाव इसने बताया कि अर्जुन सर्व प्राणी मैं तथा तू जन्म मरण में है परंतु अविनाशी तो तू उसे जान जिससे संपूर्ण जगत व्याप्त है। इस अविनाशी पूर्ण ब्रह्म का विनाश करने में कोई भी समर्थ नहीं है। इसने अपनी फिर फिजूल की वो उदाहरण वगैरह सब दोहरा दिए हैं। उसके बाद अध्याय दो श्लोक 26 से 30 हम पढ़ लेते हैं। फिर इसका हम देखेंगे मीमांसा। तो अध्याय दो श्लोक 26 में क्या है? अथ किंतु यदि तू इस आत्मा को सदा है ना किंतु यदि तू इस आत्मा को सदा जन्मने वाला तथा सदा मरने वाला मानता है तब भी हे महाबाहु तू इस प्रकार शोक करने योग्य नहीं है। ये 26व वे का अर्थ है। अब देखिए अगर हमने पिछले श्लोकों में परमात्मा को मान लिया तो इन श्लोकों से उसका कोई कनेक्शन ही फिट नहीं होगा। आगे क्योंकि भगवान क्या कह रहे हैं? भगवान कह रहे हैं कि यदि वैसे तो आत्मा कभी नहीं मरती। मगर यदि तू आत्मा को जन्म लेने वाला और मरने वाला भी समझता है तब भी तेरा शोक जो है वो
01:32:10:16 व्यर्थ है। क्यों? क्योंकि अगर तू उसको ऐसा समझता है कि वह जन्मेगी और मरेगी तो फिर तू उसमें शोक करके क्या कर लेगा। उसका तो जन्मना मरना निश्चित है। ठीक है? और यदि हम पीछे वाले श्लोक में परमात्मा को मान लेंगे तो यहां पे क्या अर्जुन परमात्मा के जन्म और मरण का शोक शोक में डूबा हुआ होगा। परमात्मा के जन्म जन्म और मरण के शोक से मुक्त करने को कह रहे होंगे भगवान श्री कृष्ण। तो यह कोई कनेक्शन रिलेटिव प्रासंग अप्रासंगिक अर्थ तो 26व का पढ़ लिया 27 वे का पढ़ते हैं क्योंकि इस मान्यता के अनुसार जन्मे हुए की मृत्यु निश्चित है और मरे हुए का जन्म निश्चित है। देखिए वही वाली बात जो मैंने कही तो इससे भी इस बिना उपाय वाले विषय में तू शोक करने योग्य नहीं। जिसमें तू कुछ कर नहीं सकता। तूने मान लिया कि उसका जन्म और मरण होता है तो तू कुछ कर नहीं सकता। तो फिर तू शोक कर करना तेरा व्यर्थ
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01:33:09:08 है। संपूर्ण प्राणी जन्म से पहले अप्रकट थे और मरने के बाद भी अप्रकट हो जाने वाले हैं। केवल बीच में ही प्रकट है। फिर ऐसी स्थिति में शोक
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01:33:18:24 क्या करना? अगर तू उनके दिखाई देने वाले स्वरूप की चिंता कर रहा है कि ये नष्ट हो जाएगा। तो जन्म लेने से पहले वो अप्रकट थे। और मृत्यु के बाद उनको अप्रकट होना ही है। तू उसको मारे या ना मारे। केवल वो बीच में जो प्रपंच रूपी संसार है उस खेल में वो प्रकट है तो ऐसे अस्थाई अस्तित्व को बचाने के लिए अस्थाई जो अस्तित्व मिट जाना ही है निश्चित है उसके मिट जाने का तू शोक क्यों कर रहा है यहां पर ये कहा जा रहा है 28व वे में ठीक है और आगे क्या कहा जा रहा है हम कोई एक महापुरुष ही इस आत्मा को आश्चर्य की भांति देखता और वैसे ही दूसरा कोई महापुरुष ही इसके तत्व का आश्चर्य की भांति वर्णन करता है। जय दयाल गोका जी वाली लगा दीजिए तथा दूसरा कोई अधिकारी पुरुष ही इसे आश्चर्य की भांति सुनता है और कोई कोई तो सुनकर भी इसको नहीं जानता। यह 29व का हो
01:34:23:16 गया। और यह आत्मा अयम देही। अब देखिए यहां पर यह आत्मा आ गया स्पष्ट आ गया अय देही सबके शरीरों में सदा ही अवध्य है देह नित्यम ठीक है इस कारण संपूर्ण प्राणियों के लिए तू शोक करने योग्य नहीं है तो क्या हुआ यहां पर किसकी बात हो रही है यह आत्मा और इसका ये वर्ण एक मिनट वो शब्दार्थ दिखाइए दूसरे अध्याय का तीसवा श्लोक
01:35:04:08 30वां ये देखिए देह नित्यम इसमें यह दिखाइए अयम अयम देही अयम का मतलब यह और आगे देही आ गया देही यह आत्मा ठीक है देह में रहने वाली आत्मा इसको नित्य कह दिया गया अवध्य कह कह दिया गया। तो यहां पर हमें दूसरे अध्याय के 30 वे श्लोक में प्रमाण के साथ यह क्लियर हो गया कि पीछे से श्लोकों में बात किसकी चली आ रही है? आत्मा की। ये है आत्मा। परमात्मा की बात कहीं नहीं हुई है। मगर क्योंकि कहीं-क आत्मा के गुण इसके विरोध में जा रहे थे। इसने कहीं-कहीं पे बिना प्रसंग के परमात्मा को डाल दिया और वहां पे अपनी आईडियोलॉजी को भी खंडित कर दिया कि यह परमात्मा यह परमात्मा। भाई जब अयम के साथ लिखोगे तो यह मानना पड़ेगा ना परमात्मा का अपने स्वतंत्र शब्दार्थ तो है नहीं संस्कृत का और अयम के रूप में लोगे तो उसी को मानना पड़ेगा जिसकी बात पीछे हो रही है हम और तीसरी बात उसके आने और जाने का कोई प्रसंग ही नहीं है। चलो तो इसने अब क्या कहा है दो से दूसरे अध्याय के 26
01:36:19:10 से 30 में कहा है कि जीवात्मा शरीर ना रहने पर भी नहीं मरती है क्योंकि परमात्मा इसके साथ अदृश्य रूप से रहता है यह कहां लिखा है ये अदृश्य का परमात्मा इसके साथ अदृश्य रूप से रहता है ये रहते की संस्कृत दिखानी पड़ेगी इसको रामपाल बाबा को दिखाओ परमात्मा रहता है रहता है रहता है कर रहा है ना ये हर श्लोक में आत्मा की नित्यता को अस्वीकार करने के लिए वहां पर परमात्मा को डालते हुए यह घुसेड़ दे रहा है कि आत्मा के साथ वो रहता है तो आत्मा के साथ रहता है कि संस्कृत दिखाइए कहां है हम जब यह परमात्मा की बात हो रही है तो अलग से आत्मा शब्द भी आना चाहिए। जब आपने अयम का अर्थ तो ले लिया कि यह परमात्मा की बात हो रही है। चलो मान लिया पीछे वाले से कनेक्शन नहीं है। मगर जब अयम का अर्थ आपने यह आत्मा नहीं माना है। यह परमात्मा माना है तो आपको आत्मा के लिए अलग से शब्द लेना लाना पड़ेगा ना संस्कृत का और उसके साथ रहने के साथ रहना ये संस्कृत में दिखाना पड़ेगा। तो नहीं दिखाया इन्होंने बाबा जी ने आगे कि क्योंकि परमात्मा इसके
01:37:34:19 साथ अदृश्य रूप से रहता है तो इसीलिए जीवात्मा को ना काटा जा सकता ना जलाया जा सकता है। मतलब परमात्मा के रहने के कारण जीवात्मा ऐसी है। अन्यथा जीवात्मा को काटा जा सकता होता। इनके हिसाब से ये कहे तो ऐसा ही रहे। यह परमात्मा जो जीवात्मा के साथ उपदृष्टा रूप में रहता है जो निर्विकार है। देखिए आत्मा को निर्विकार कहा गया है तो उपदृष्टा के रूप में खड़ा करके बिना किसी सर पैर के और यहां पर खड़ा कर दिया और उसको निर्विकार कहा गया। आत्मा को नहीं परमात्मा को निर्विकार। यदि जीवात्मा को नित्य मरने जन्मने वाली भी माने तो भी दुखी नहीं होना चाहिए। अब यहां पर तो यह नित्य मरने जन्मने वाले में खुद ही वर्तनी का दोष है इसकी क्योंकि पुराने वस्त्र त्याग कर नए पहन लिए इसलिए शोक मत कर जिसका जन्म हुआ वह अवश्य मरेगा मरेगा उसका जन्म अवश्य है भगवान कह रहा है तू तथा मैं तथा सर्व प्राणी पहले भी थे आगे भी होंगे फिर चिंता
01:38:42:15 कैसी तर्क वितर्क इस श्लोक अब यहां पर इसने एस्कॉन वालों की चीज को मान लिया है। हम क्या माना है कि इस शरीर में एक अन्य दिव्य भोक्ता है जो ईश्वर है। यहां पे इस वालों को प्रमाण के रूप में ले लिया है। परम स्वामी है और साक्षी तथा अनुमति देने वाले के रूप में विद्यमान है। यही मैं कहता हूं ना रामपाल जैसे लोग कब बनते हैं? जब विकृति इन जैसे लोग विकृति को जन्म देते हैं। खैर स इसके अलावा अन्य सभी अनुवादों ने गलत अर्थ किया है जो इस प्रकार है। इस देह में स्थित आत्मा वास्तव में परमात्मा ही है। साक्षी होने से उपदृष्टा और अच्छा ये 22 23वें का किया है। 13वा अध्याय तो आगे आएगा। खैर अब इसने क्या करा है? तो इसके दो दूसरे अध्याय के 26व श्लोक का अर्थ इसने क्या लिखा है? अगले पेज पर आ जाइए। पेज नंबर 22 हां तो इसमें देखिए गीता अध्याय दो श्लोक 26
01:39:58:02 यदि तू इस आत्मा को सदा मरने वाला व जन्म लेने वाला मानता है तो भी शोक करने योग्य नहीं है। क्योंकि तेरी मान्यता के अनुसार जन्मे हुए की मृत्यु और मरे हुए का जन्म निश्चित है। इस बिना उपाय वाले विषय में तू शोक करने के योग्य नहीं है। यह सर्व
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01:40:14:28 प्राणी जन्म से पहले भी प्रकट थे। मरने के बाद भी प्रकट होंगे और बीच में भी है। देखिए
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01:40:21:10 सबसे बड़ा आज का बुलेट पॉइंट क्या है? सबसे बड़ा बुलेट पॉइंट क्या है? इसने अप्रकट को प्रकट कर दिया। यह है बाबा जी का गवारपन। क्या किया इसने? यह परमात्मा यह सर्व प्राणी जन्म से पहले भी प्रकट थे। मतलब यह जो प्राणी है पहले भी प्रकट थे। अप्रकट नहीं थे। वहां कहा जा रहा अप्रकट। देखिए कौन सा श्लोक है ये? यह है 29वा
01:40:54:20 श्लोक। हम 28वा श्लोक है। अब देखिए साफ-साफ लिखा है। अव्यक्ता दीनी लगाइए जरा जय दयाल गोविंद का जी का लगाइए। वाह। इनका गमपन देखिए कैसे मैनपुलेट किया है। हां ये देखिए अव्यक्ता दीनी अव्यक्त यानी जन्म से पहले अप्रकट थे। अव्यक्त दोबारा आया है। मरने के बाद भी अप्रकट हो जाने वाले हैं। केवल बीच में ही व्यक्त है। एक बार व्यक्त आया है और दो बार अव्यक्त आया है। ठीक है? तो इससे हमारी बात सिद्ध हो रही है कि जन्म से पहले अव्यक्त थे और मृत्यु के बाद अव्यक्त होने वाले केवल बीच में ही व्यक्त है। जन्म से पहले अप्रकट थे। बाद में भी अप्रकट हो जाने वाले केवल बीच में ही प्रकट है। मगर इसने क्या माना है बाबा ने? रामपाल ने क्या माना है? यह आत्मा परमा श्लोक 28 का अर्थ क्या लिखा है इसने? यह प्राणी जन्म से पहले भी प्रकट थे। मरने के बाद भी प्रकट होंगे
01:42:09:22 और बीच में भी प्रकट है। ऐसे में शोक क्या करना है? यह है बाबा जी का अर्थ। देख लीजिए। तीन बार प्रकट कर दिया। तीन बार प्रकट का मतलब संस्कृत में अप्रकट तीन बार होना चाहिए। हो गया। तो अब इसने 30 के श्लोक में फिर कर दिया हे भारतवंशी अर्जुन यह आत्मा परमात्मा के सानिध्य में है। इस शरीर में है। इसलिए यह अवध्य है। यानी इसका वध नहीं किया जा सकता। कुल मिला के जीवात्मा स्वतंत्र रूप से अवध्य अवध्य नहीं है। परमात्मा के सानिध्य में ही जीवात्मा जो है अवध्य है। परमात्मा अगर अपना वो हटा लेगा तो आत्मा को भी जला मारा जा सकता है। काटा जा सकता है। ये सब यहां से आ रहा है। दूसरी बात इनके अनुसार आत्मा नित्य नहीं है। तीसरी बात यह खुद कहते हैं कि जो संसार है वह ईश्वर से व्याप्त है। मगर फिर खुद कहते हैं कि ईश्वर से व्याप्त नहीं है। की शक्ति से व्याप्त है। श्लोक नंबर 28 में यह पूरी गड़बड़ कर देते हैं। दो बार अव्यक्त और एक एक बार व्यक्त है तो दो बार प्रकट और एक बार प्रकट मानना पड़ेगा। मगर इन्होंने तीनों बार प्रकट माना है।
01:43:25:03 ठीक है? और इन्होंने संस्कृत नहीं बताई। आत्मा के साथ रहने वाला आत्मा के साथ रहने वाला। कई श्लोकों में इन्होंने कर दिया। जैसे यहां दो दूसरे अध्याय के 30व श्लोकों में भी श्लोक में भी कर दिया कि यह आत्मा परमात्मा के सानिध्य में शरीर में है। इसलिए परमात्मा के सानिध्य में है। यह कहां लिखा है संस्कृत में? मन घंत मन घड़ंत बात है। कहां लिखा है? दूसरी बात जब अयम की बातें करेंगे तो पीछे के श्लोकों में जब आत्मा की बात हो रही है तो इस श्लोक में भी अयम का अर्थ हमें आत्मा से लेना पड़ेगा। यह है आत्मा। मगर इसने कई जगह पर यह परमात्मा कर दिया है पीछे के श्लोक से। तो पहली बात तो वहां पर संस्कृत ठीक नहीं बनती। दूसरी बात प्रसंग भी ठीक नहीं बनता। और तीसरी बात कि जब इसने यह परमात्मा कह दिया यह परमात्मा यह परमात्मा तो क्या हुआ? इसको ये मानना पड़ेगा कि अर्जुन परमात्मा के सानिध्य में था। इसका मतलब जब ये ये कहता है कि 1866 में कि जा उस परमात्मा में उस परमात्मा की शरण में जा तो जो इसका ये परमात्मा है जो वहां पर पहले से था उसको छोड़ के जाने की बात हो रही है। ये हम लोग टांग खींच लेंगे थोड़ी सी। ठीक है? तो यह आज का था। हमने
01:44:40:12 दूसरे अध्याय के 30 तक की इसकी व्याख्या पढ़ी है और 30 से ले आगे की व्याख्या हम लोग अगले एपिसोड में करेंगे। एक बार सभी को दोबारा से बहुत सारी शुभकामनाएं। जो रामपाल का एक अड्डा अज्ञानता का और विधर्म का वो बंद हुआ और थोड़ा सा लिंक दे दीजिए। किसी को दिक्कत हो तो वो आ सकता
01:45:20:03 है। आज के बारे में या कोई थोड़ी बहुत बात करनी हो तो आ सकता है। ज्यादा समय नहीं है। बस 15 मिनट रुकेंगे। आशा करते हैं कि आपको ये सीरीज पसंद आने वाली है। जहां से इसने गड़बड़ करना चालू किया है भगवत गीता में दूसरे अध्याय का दव से लेकर के श्लोक से आज हमने आपको व्याख्या प्रस्तुत कर दी है।
01:46:07:22 हां भाई निखिल सिंह जी जय श्री राम जय श्री राम जय श्री राम आवाज आपकी कम आ रही है जी जी बताइए बताइए बस कृपा है आप बताएं मेरे दो तीन क्वेश्चन वर्ण व्यवस्था को ले थे तो उसका आज रामपाल के विषय में आप बात करें क्योंकि वर्ण व्यवस्था को लेकर के हम मेरा गला अभी थक गया है ना मैं काफी देर से लगातार बोल रहा हूं तो हम एक लंबी चर्चा को अभी जन्म नहीं दे सकते अभी की जो चर्चा है उससे इनको ले कोई डाउट नहीं है इनको ले डाउट नहीं है आप मेरे को हटा दीजिए ठीक ठीक आप फॉर्म भर दीजिएगा निखिल जी को मेरे मेरा वो है संदेश आप फॉर्म भरिए। किसी दिन हम लोग व्यवस्थित एक चर्चा रखते वर्ण व्यवस्था पर।
01:47:11:08 तो देखिए अब दो से लेकर 30 तक के बीच के किसी श्लोक का रेफरेंस देकर के अगर आपको कोई कुछ कहता है तो आप यहां पर आ सकते हैं और इस सीरीज में जो प्लेलिस्ट बन जाएगी वहां से उठा करके वो देख समझ सकते हैं कहां-कहां पर उनके पीक पॉइंट्स है कहां-कहां गलती की है और ये अनुवाद में भी गलतियां की है इन्होंने अपनी ये रामपाल ने अपनी गीता में तो क्या है कि तीन दो बार अव्यक्त शब्द आया है और एक बार व्यक्त और इसने तीनों बार व्यक्त कर दिया है तो इसको तीन बार व्यक्त की संस्कृत देनी पड़ेगी। इसको के सानिध्य में रहता है के साथ रहता है। इसकी संस्कृत देनी पड़ेगी। अगर इसने अय का अर्थ यह परमात्मा माना है तो इसे आत्मा की संस्कृत लानी पड़ेगी। ये सब पॉइंट की बातें हैं। कोई नहीं आ रहा है तो फिर हम आज की पूरी करते हैं। अरनव करके कोई हैं उनसे मैं कहूंगा कि अपना चेहरा दिखाएं। पहाड़ी जी अगर देख रहे हो तो थोड़ा सा आ जाए। उनसे कुछ बातें करके हम लोग आज का इस जो शुभारंभ किया है उसका आज के इस एपिसोड का समापन
01:48:22:20 करेंगे। अगला एपिसोड शनिवार सायं काल में 7 या 8:00 बजे आपको प्राप्त हो जाएगा। एक धरातल पर कार्य करने वाला योद्धा भी हूं भाई। तो इसलिए समय का थोड़ा हेरफेर हो जाया करें तो उसको इग्नोर किया करें आप लोग क्योंकि केवल शास्त्र नहीं शस्त्र की भी बात करते हैं इसलिए। चलिए तो कोई नहीं है अभी
01:48:56:06 और आज ये ताला पड़ा है हद्वानी में। जल्द ही ऐसे बहुत से ताले लगेंगे रामपाल के अन्य केंद्रों में और सनातन की शक्ति लोगों को दिखाई देगी। तो सभी को जय श्री राम। समय देने के लिए आभार। आशा करते हैं आपको यह एक विवेचना जो है यह अच्छी लगी हो और अगले एपिसोड में मिलेंगे हम लोग शनिवार के दिन। उससे पहले भी कुछ चीजें होती रहेंग तो आप अपडेटेड रहिएगा। सभी को जय श्री राम। और अपने घर के बाहर अवश्य लिखवाएं। मेरा घर हिंदू राष्ट्र हमारा घर हिंदू राष्ट्र हर घर हिंदू राष्ट्र जय श्री राम।
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