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00:00:01:22 तो सभी को जय श्री राम। आशा करते हैं आप सभी कुशल पूर्वक होंगे और आज एक बहुत ही महत्वपूर्ण चर्चा होने जा रही है। आचार्य हैं आर्य समाज से हैं और काफी योग्य हैं। तो सबसे [गला साफ़ करने की आवाज़] पहले हम उन्हें ले लें ऊपर फिर आपसे उनका परिचय करवाते हैं। जी जय श्री राम आचार्य जी। जय श्री राम श्री राम जी आप आचार्य संजीव वेदालंकार हैं संस्थापक और अध्यक्ष सनातन प्रहरी संस्थान वेद मंदिर पानीपत अगर योग्यता की बात करें तो प्रारंभिक शिक्षा गुरु गुरु विजानंद स्मारक गुरुकुल करतारपुर पंजाब अह एक वेदालंकार समकक्ष स्नातक दो आचार्य परा स्नातक एमए संस्कृत से किया है इन्होंने और तीसरा क्रमांक पे डिप्लोमा है मानव चेतना एवं योग विज्ञान पर यह इन्होंने गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय हरिद्वार से किया है। YouTube एवं Instagram चैनल वैदिक ध्वनि
00:01:17:01 के नाम से है इनका। विगत 20 वर्षों से गुरुकुलय शिक्षा पद्धति के संवर्धन, ध्यान, योग, वैदिक विचारधारा के पोषण, गौ रक्षण एवं वैचारिक क्रांति के द्वारा समाज में कार्यरत हैं। तो आपका बहुत-बहुत स्वागत है हमारे चैनल पर। धन्यवाद। जी। तो [गला साफ़ करने की आवाज़] थोड़ा सा अगर कुछ आप अपने बारे में हमारे दर्शकों को संक्षिप्त में कुछ थोड़ा सा जो बताना चाहे अपने शब्दों में आप बता दे जी मेरा नाम आचार्य संजीव वेदालंकार है। सबसे पहले मैं आपको सबको प्रणाम करता हूं और सबको जय श्री राम। जय श्री राम। मेरी शिक्षा जैसा कि श्रीमान जी ने बताया कि गुरुकुल कांगड़ी से हुई है और उससे पहले की जो पूर्व शिक्षा है वो गुरुकुल करतारपुर जालंधर के पास एक स्थान है। वहां से हुई उसके बाद उच्च शिक्षा के लिए गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय हरिद्वार और उसके बाद से फिर मैं सेवा के कार्य में धर्म क्षेत्र में विगत 20 वर्षों से कार्य कर रहा हूं। जी अच्छा तो आपका वो जो कार्य क्षेत्र है वो ये पानीपत और उसके आसपास का ही
00:02:32:04 स्थान माना जा सकता है। इस तरह से मतलब वहां केंद्रित वो है सेंट्रिक हां कार्य क्षेत्र में तो पूरे भारतवर्ष में है केवल पानीपत नहीं पानीपत तो मेरा निवास स्थान है। वैसे पूरे भारतवर्ष में मैं कार्यक्रम के लिए आता जाता रहता हूं और भारत से बाहर भी मेरा जाना होता है। अच्छा मेरी आवाज क्लियर नहीं आ रही है क्या? नहीं बिल्कुल आपकी आवाज बहुत साफ आ रही है। आपको आ रही पर कुछ लोग कह रहे हैं कि क्लियर नहीं आ रही है। किसकी आवाज क्लियर नहीं आ रही? आप लोग बताएंगे कमेंट करके। [हंसी] [गला साफ़ करने की आवाज़] आचार्य जी की वॉइस ब्रेक हो रही है। अच्छा थोड़ा हां वो आपकी में वो जो ब्लूटूथ लगा हुआ है ना उसमें नहीं लगा है। नहीं लगा है। हां बिना ब्लूटूथ के अच्छा तो तो ठीक है एक बार ब्लूटूथ लगाकर ट्राई करें क्या दोनों की आवाज ठीक है ठीक है चलने दीजिए वो ठीक है समझ में आ रही है ठीक है ओके जी तो पानीपत के आसपास ही आपका कार्य क्षेत्र है तो पानीपत के अलावा पूरा भारतवर्ष पूरा पूरा भारतवर्ष पूरा भारतवर्ष उसको केंद्र
00:03:47:13 मान लें पानीपत हां पानीपत मेरा निवास है मैं पानीपत से हूं हां जी हां जी तो संजीव जी थोड़ा सा हमें आर्य समाज के अनुसार ईश्वर की जो धारणा है अवधारणा कि किस तरह से ईश्वर को देखता है आर्य समाज वो हमें थोड़ा सा बताएं आप [गला साफ़ करने की आवाज़] मैं आप सभी का स्वागत करता हूं और ईश्वर के विषय में आर्य समाज की क्या विचारधारा है ये मैं रखने का प्रयास करूंगा जी सर्वप्रथम
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00:04:18:26 अधिकतम आप में से जितने लोग हैं वो यह सब जानते होंगे कि आर्य समाज जो है वह मूर्ति पूजा का पक्षधर नहीं है। सैद्धांतिक रूप से हम लोग इससे इसमें अपनी आस्था नहीं रखते हैं।
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00:04:31:08 और जो निराकार ईश्वर है जो सर्वव्यापक है उसकी उपासना पद्धति आर्य समाज में होती है। लेकिन यदि आकार रूप में भी ईश्वर को हम देखना चाहे तो शास्त्रों के माध्यम से यह कहा गया है कि ये सारा संसार उस परमात्मा की बनाई हुई प्रतिमा ही है। आकाश है, जल है, वायु है, अग्नि है। ये पांचो तत्व जो है ईश्वर के बनाए हुए हैं। उसके अतिरिक्त इतना सुंदर संसार जो उस परमात्मा ने बनाया है ये उसकी रचना है। और यदि हम भगवान को देखना चाहे तो हम इस संसार के माध्यम से ही भगवान को देख सकते हैं। जैसे कि भगवान कृष्ण ने अर्जुन को अपने स्वरूप का ज्ञान करवाया था जिसे हम विराट रूप कहते हैं। विराट रूप का अभिप्राय है हर स्थान पर उसका दर्शन होने लगना। वैसे तो हमें हर स्थान पर उसके दर्शन नहीं होते। हम यह कहते तो जरूर हैं। हम भी कहते हैं आर्य समाज में लोग के ईश्वर का संसार के कण-कण में वास है। परंतु जब हम व्यवहारिक रूप से इस बात पर विचार करते हैं तो यह विचार हमारे व्यवहार में दिखाई नहीं देता है। क्योंकि जो आस्तिक है चोरी करने से वो भी चूकता
00:05:46:16 नहीं। और जो नास्तिक है वो भी नहीं चूकता। जो मूर्ति पूजक है वो भी चोरी करने से चूकता नहीं। जो उसे सर्व्यापक मानता है तो वह भी समय आने पर कुछ ना कुछ गड़बड़ कर ही देता है। तो
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00:05:57:15 हम यदि सैद्धांतिक रूप से देखें तो जो हम कहते हैं ईश्वर व्यापक है उसकी व्यापकता का जब तक हमें सम्यक आभास नहीं होगा जब तक इस बात को हम समझ नहीं लेंगे तब तक व्यापक ईश्वर से हम पूरा लाभ नहीं उठा पाएंगे। तो आर्य समाज की मुख्य विचारधारा है कि ईश्वर कोई व्यक्ति नहीं क्योंकि व्यक्ति होगा तो जन्मेगा जन्मेगा तो मरेगा और जन्म मरण के बंधन में कोई शास्त्र भारत का जो ऐसा है चाहे वो पौराणिक मान्यता हो चाहे वो आर्य समाज मान्यता हो ईश्वर को जन्मने और मरने वाला कोई भी नहीं मानता है और उसे सर्वव्यापक मानते हैं क्योंकि वो हर स्थान पे है। हर स्थान पे है तो न्यायकारी है। यदि वो सब स्थान पर होगा ही नहीं तो न्याय कैसे करेगा?
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00:06:40:00 यदि हम यह मानेंगे कि परमात्मा इस स्थान पर रहता है। इससे बाहर नहीं रहता। तो इससे बाहर जो घटनाएं हो रही है उनका ईश्वर न्याय कैसे करेगा? तो यहां बेसिक बिल्कुल विचारधारा इसमें कोई भेद ना समझे आप। यदि कोई परमात्मा को एक व्यक्ति के रूप में देखता है तो यह उसकी अपनी अप्रोच है। उसकी अपनी समझ है। और यदि कोई ईश्वर को बड़े विरा रूप में और हर जगह देखता है ये उसकी जागरूकता है। तो जो जागरूक नहीं हुआ है उसके लिए प्रारंभिक अवस्था किसी मूर्ति आदि से किसी विग्रह से किया जा सकता है। लेकिन जिसकी चेतना विकसित हो गई और जो इतनी समझ और जिसने चेतना को विकसित कर लिया वो उसके दर्शन हर कहीं कर पाता है। इसमें एक छोटा सा उदाहरण हम संत नामदेव का लेंगे। जब उनकी रोटी एक कुत्ता उठा के भाग चला तो महात्मा नामदेव जो है वो घी की लुटिया ले उसके पीछे पीछे भाग पड़े और ये कहने लगे कि प्रभु अब सूखी रोटी ले जा रहे हो कम से कम इसे घी तो लगवा लो चुपवा तो लो इसलिए हम हां वो कहते हैं कि चुपवा के खाओ प्रभु और वो उसको कुत्ता नहीं कह रहे वो कह रहे प्रभु कहां जा रहे हो पीछे पीछे भाग रहे हैं आगे आगे कुत्ता भाग रहा है रोटी लेकर और पीछे पीछे संत नामदेव जा रहे हैं लुटिया लेकर जिसमें घी था कि महाराज ऐसे ऐसे मत खाओ। इसे चुपड़वा
00:07:55:08 के खाओ। तो अब आप इसे क्या कहेंगे? जिसकी दृष्टि अच्छी है वो पशुओं में भी ईश्वर के दर्शन कर सकता है। और जिसका दृष्टिकोण विकसित नहीं है उसे अपनी मां में मां दिखाई नहीं देती। पिता में पिता दिखाई नहीं देते। भाई में भाई दिखाई नहीं देता। मित्र में मित्र नहीं दिखता। ईश्वर के दर्शन तो बड़ी दूर की बात है। तो आर्य समाज की जो विचारधारा है ईश्वर की सर्वव्यापक विचारधारा एक बात है। दूसरी उसकी कोई आकृति नहीं है। क्योंकि जिन जिन वस्तुओं की आकृति होती है उन वस्तुओं के रूप में परिवर्तन होता है और जिन वस्तुओं के रूप में परिवर्तन होता है वो एक दिन नष्ट भी हो जाती हैं। तो आर्य समाज की बड़ी एक क्लियर और साफ मान्यता है कि परमात्मा कोई वस्तु नहीं है। वो कोई पदार्थ नहीं है। वो इतनी बड़ी एक शक्ति है। शुद्ध ऊर्जा है जो हर कहीं मेरे अंदर बाहर सब जगह व्याप्त है। यदि उसकी व्याप्ति को मैं समझ लेता हूं तो मुझे जीवन जीने में सरलता होती है और मैं पाप कर्मों से बहुत बच जाता हूं। तो बहुत मुख्य विचारधारा ये है। अच्छा तो
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00:09:02:28 इसमें आचार्य एक चीज हमने देखी कि अगर ईश्वर को न्यायकारी होना है तो उसका सर्वव्यापक होना आवश्यक है। आवश्यक है। है ना? तो इसमें जैसे हम ये देखते हैं कि जैसे मान लीजिए न्यायकारी होना है यानी कोई ना कोई क्रिया करनी है। न्याय
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00:09:18:28 करने के न्याय करने के लिए उसको कोई ना कोई क्रिया करनी होगी। जैसे कि मान लीजिए कि कोई हाथ उठा रहा है तो उसका हाथ हाथ रुके। मतलब एग्जांपल के लिए मैं ले रहा हूं। ऐसा डायरेक्टली वो करता नहीं है। मगर अगर सृष्टि रचना सृष्टि रचना को अगर हम देखें सीधे तौर पर [गला साफ़ करने की आवाज़]
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00:09:35:20 जैसे कि ईश्वर ईश्वर सर्वव्यापक तो है पर क्रिया भी उसने की। कहीं पर उसने सूर्य बनाया कहीं पर उसने पृथ्वी बनाई और कहीं
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00:09:45:25 पर उसने अन्य ग्रह बनाए या जो भी उसे बनाना था वो उसने बनाए। तो ये जो ये जो क्रिया उसने की जगह-जगह पर और कहीं-कहीं पर नहीं भी की। तो एक शक्ति के रूप में वह कार्य कर रहा है। निराकार शक्ति के रूप में हमें यह मानना पड़ेगा कि वो जो दो दो प्रकार की क्रियाएं होती हैं। एक होता है पुश और एक होता है पुल। दो प्रकार की क्रियाएं होती हैं। तो ये पुश और पुल वो कर रहा है शक्ति के रूप में। तभी वो सृष्टि की रचना कर रहा है। है ना? जी। हां। हां। तो तो [गला साफ़ करने की आवाज़] इसका मतलब यह है कि ईश्वर सर्वव्यापक होते हुए भी जहां पर चाहता है वहां पर वो किसी चीज को पुश कर सकता है शक्ति के रूप में और जहां पर चाहता है किसी चीज को अपनी ओर खींच भी सकता है, पुल भी कर सकता है। मैं ठीक समझ रहा हूं ना? हां, इसमें थोड़ा सा परिवर्तन करें आप। जी आपने ये कहा कि कहीं वो नहीं भी है। नहीं नहीं हर है। मगर हर जगह होते हुए भी हर जगह होते हुए भी वो जो शक्ति के रूप में क्रियान्वित हो रहा है कि किसी चीज को संरचना कर रहा है तो वो शक्ति रूप शक्ति के रूप में सब जगह व्याप्त है वो पूर्ण रूप से एक
00:11:01:10 फिर जहां पर उसको क्रिया करनी है वहां पर एक्टिव मोड पर आकर के वो क्रिया कर रहा है। जी है ना? सब जगह होते हुए भी वह कहीं पर क्रिया कर रहा है और कहीं पर क्रिया नहीं कर रहा है। कहां पर क्रिया नहीं कर रहा है? जैसे मान लीजिए कि पृथ्वी बनाई जा रही है तो पृथ्वी के जस्ट बगल में जो खाली स्पेस है उसमें वो क्रिया नहीं [गला साफ़ करने की आवाज़] हो रही है। मान लीजिए पृथ्वी बनाने के लिए एक मान लीजिए पुश हो रहा है। पुश जिसको हम आम भाषा में कह दे कि धक्का तो मैं एक लाइन में एक थोड़ी सी लाइन उसमें और शामिल करना चाहूंगा। जी एक तो हम ईश्वर को ना किसी पुरुष के नजरिए से ना देखें।
00:11:44:02 उसको उसका नजरिया एक बहुत बड़ा है।
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00:11:47:08 परमात्मा की जो स्थिति है वो संसार में सर्वोपरि है। और हम जो उसे देख रहे हैं हम एक मानवीय दृष्टिकोण से उसे देख रहे हैं। सबसे पहले ये दृष्टिकोण छोड़ना होगा।
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00:11:57:25 मानवीय दृष्टिकोण से परमात्मा थोड़ा ही समझ आ पाएगा। पूरी तरह से समझ नहीं आएगा। और फिर ऊपर से जो मानवीय समझ है उसकी अपनी सीमाएं हैं। पूरी तरह से कोई मनुष्य भगवान को जान भी नहीं सकता है। क्योंकि अगर पूरी तरह से ईश्वर को हमने जान लिया तो हम भी ईश्वर के जैसे ही हो जाएंगे। फिर उसमें हम में कोई अंतर नहीं रहेगा। तो जैसे पिता और पुत्र में अंतर होता ही है। पिता की अलग क्षमताएं हैं। पुत्र की अपनी अलग क्षमताएं हैं। पिता मेरा पिता है और मैं अपने बच्चों का पिता हूं। पिता पद तो दोनों के पास है। तो जब हम ईश्वर की चर्चा करेंगे तो हम उसको किसी एक तो तत्व पदार्थ के रूप में नहीं मानेंगे और उसमें मानवीय दृष्टिकोण आरोपित नहीं करेंगे। और एक जो आपने कहा क्रिया तो एक सूत्र है कि परमात्मा कैसे काम करता है तो एक सूत्र है अनंत ज्ञान बल क्रिया च उस परमात्मा में अनंत ज्ञान है अनंत बल है अनंत क्रिया है और और ये इसमें एक छोटा उदाहरण आप अपने से भी देख सकते हैं। जैसे अब हम अभी बात कर रहे हैं और हम अपनी आंखों को झपक रहे हैं। इन आंखों को झपकने के लिए क्या हम परिश्रम कर रहे हैं? अपने आप हो रहा है। बात करते करते हम स्वास भी
00:13:12:28 ले रहे हैं। ये भी स्वाभाविक है। हमें इसके लिए प्रयास नहीं करना पड़ रहा। यदि हम स्वास लेने का प्रयास करेंगे तो जीवन की बहुत सारी प्रक्रियाएं हमारी जो है ना अव्यवस्थित होंगी। स्वाभाविक है। जी हां। तो उस परमात्मा में भी ज्ञान बल क्रिया स्वाभाविक है। जैसे हम उसको इंप्लांट कर रहे हैं कि उसने ये बनाया फिर उसने वो बनाया। ये हम अपनी अपनी भावना अपने विचार आरोपित कर रहे हैं। जबकि उसका स्वभाव ही है। उसका ये स्वभाव है। जैसे स्वास लेना छोड़ना हमारा और आपका स्वभाव है। हम इसके लिए प्रयास नहीं करते। मैं समझ गया। तो हम क्या यह माने कि हम क्या यह माने कि ईश्वर इस तरह से कार्य करता है जो हमारी मनुष्य दृष्टि से समझ में ना आने वाले कार्य हैं। हां वो बड़े कार्य है वो समझ में आ भी सकते हैं यदि हमारा स्तर ऊंचा हो ध्यान उपासना के द्वारा और यदि देखो एक बात है यदि समझ में ना आए तो मनुष्य को गणित है विज्ञान है बड़ी छोटी छोटी बातें जीवन में नहीं समझ में आती और [हंसी] यदि समझ में आने लगे तो उसे परमात्मा के नजदीक जाने में भी समय लगता नहीं है वैसे अभ्यास करे तो हो जाता है जी तो इसमें एक्चुअली मैंने ये प्रश्न क्यों किया है क्योंकि बात ये है कि जैसे हम लोग मानते हैं कि ईश्वर जो सर्वव्यापक है, एक रस है उसने सृष्टि
00:14:28:04 रचना की है। ठीक है? जब सृष्टि रचना करेगा तो जाहिर सी बात है जो जड़ पदार्थ है जो भौतिक पदार्थ हैं उनके वो व्यवहार का विषय बनेगा कहीं ना कहीं और जो स्वाभाविक है जो स्वाभाविक आपने कहा कि नहीं उनके व्यवहार का विषय नहीं बनेगा। वो पदार्थों के व्यवहार निश्चित करेगा। ईश्वर कोई इस तरह का विषय नहीं। मतलब ईश्वर जो है पदार्थों का व्यवहार निश्चित करता है। अग्नि ताप देगी जल अपना काम करेगा। जी जी संजीव जी मैं थोड़ा सा पूरा कर लूं। मैं आपको शायद अपनी चीज समझा पाऊं कि मैं कहना क्या चाह रहा हूं। तो मुझे एक बार पूरा करने दीजिएगा। तो क्या है कि जैसे आपने कहा कि स्वाभाविक कर्म तो कर्म तो स्वाभाविक है। उसमें कोई इशू नहीं है कि वह स्वतः हो रहे हैं। पर होने के लिए भी वो एक शक्ति काम कर रही है। ईश्वर ईश्वर के द्वारा एक शक्ति काम कर रही है कि भाई यह जो पृथ्वी है यहां से यहां चली गई। वहां से वहां चली गई। जो भी है जो भी कुछ हो रहा है संसार में वहां पर एक इनविज़िबल निराकार दिखाई ना देने वाली शक्ति वहां पर कार्य करना मालूम हो रही है हमें। अब हमने यह भी मान लिया कि वो जो है कई कार्य उसके ऐसे होते हैं जो हमें मनुष्य दृष्टि से समझ में नहीं आते। तो बात यह है कि जब हम देखते हैं सृष्टि रचना को तो हमें यह मानना पड़ता है कि
00:15:43:08 ईश्वर भले ही सर्वव्यापक है पर उसके बावजूद भी वो एक ऐसा रूप धारण कर रहा है जहां वो सर्वव्यापक होते हुए भी कहीं पर किसी के लिए पुश और पुल क्रिया का विषय बने अथवा किसी के लिए ना बने तभी क्रिया तभी रचना संभव है। एक मिनट पूरा कर लूं। तो अब यहां पर क्या आता है कि अगर हमने यह माना कि ईश्वर जैसे मान लीजिए पृथ्वी को ले लेते हैं। ठीक है? अब पृथ्वी को मूव कराना है। मूव केवल हिलाना है। तो दो तीन तरीके हैं जिससे वो मूव होगी पृथ्वी। या तो ईश्वर जो अंदर है जो पृथ्वी में भी समाया हुआ है। बाहर का ईश्वर निष्क्रिय रहते हुए केवल अंदर का ईश्वर सक्रिय हो जाए और क्योंकि बाहर का ईश्वर निष्क्रिय है। मतलब अभी वो किसी से टकराव के उसमें नहीं है। अंदर का ईश्वर सक्रिय हुआ और जब वो सक्रिय हुआ तो उसने अपने आप को मूव कराया तो वो अपने ही स्वरूप में रहते हुए मूव कर गई पृथ्वी। ठीक है? एक तो यह हो गया। एक हो गया कि पृथ्वी के बाहर से ईश्वर एक्टिव हुआ। बाकी सब जगह वही क्षेपक के रूप में नहीं है। बाहर पृथ्वी के बाहर करेक्ट उतने स्पेस में वो क्षेपक बना और पृथ्वी को धक्का लेकर के दूर ले गया। एक ये स्थिति हो गई। एक ये स्थिति हो गई कि वो पृथ्वी के दूर जाकर के अपने आप को उसने
00:16:58:12 एक्टिव किया और पृथ्वी को उसने खींच लिया अपनी ओर। ये दो तीन तरीके से मतलब कहने का यह है कि सर्वव्यापक एक रस होते हुए भी उसने एक ऐसा रूप धारण किया जहां पर वह सब सब जगह जो है टकराव का विषय ना बनते हुए केवल एक ही जगह शक्ति का विषय बना। टकराव का विषय बना तो पृथ्वी अपनी मूव की। अब हम अगर यह कहते हैं कि इस तरीके से मानवोचित दृष्टि से ईश्वर को तराजू में तोलना नहीं चाहिए तो फिर एक बात आती है सामने से कि जब हम कहते हैं कि ईश्वर अवतार ले रहा है या ईश्वर की जो मूर्ति पूजा हो रही तो हम वहां पर एक काउंटर करते हैं कि जो सब जगह है वह एक जगह कैसे हो सकता है या जो अजन्मा है वह जन्म कैसे ले सकता है? तो जो सब जगह है वह कहीं एक जगह पृथ्वी या सूर्य इत्यादि के धक्के या आकर्षण का विषय बन रहा है जो सब जगह है। यदि वह आकर्षण का विषय बनेगा तो सब जगह बनेगा। तो कहने का
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00:17:53:13 मतलब यह है जब हम यहां पर यह मान लेते हैं कि ईश्वर के कार्य मनुष्य दृष्टि से समझ में ना आने वाले हैं तो वहां पर भी मान लेना चाहिए। नहीं तो यदि हम वहां पर तर्क कर रहे हैं कि जो सर्वव्यापक है वो मूर्त रूप में क्यों नहीं आ सकता है तो फिर हमें यहां पर भी जवाब देना चाहिए कि फिर वो यहां पर कैसे कर रहा
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00:18:10:21 है? कहने का मतलब ये है जी [गला साफ़ करने की आवाज़] आपने कहा कि ईश्वर सृष्टि के बाहर है और एक अंदर है। एक बात तो हमेशा आप ध्यान रखें। ऐसा कोई स्थान ही नहीं है जहां वो ना हो। नहीं सृष्टि के बाहर नहीं। सृष्टि आपने कहा पृथ्वी के अंदर है ईश्वर एक ईश्वर पृथ्वी के बाहर है और वो बाहर वाला सक्रिय अंदर वाला अक्रिय है या अंदर वाला अक्रिय है बाहर वाला सक्रिय है ठीक है ना आप मेरी बात समझ नहीं पाए मैंने ये कहा कि जैसे कि ईश्वर सर्वत्र व्याप्त है ठीक है और वो पृथ्वी के पृथ्वी के अंदर भी व्याप्त है अब उसने क्या किया क्योंकि अगर वो खुद को बदलेगा अगर वो खुद को बदलेगा कि वो कहीं पर एक्टिव हो जाए सक्रिय हो जाए और कहीं पर निष्क्रिय रह जाए। यदि वह खुद को बदल रहा है तो वह सनातन नहीं रहा। शाश्वत सत्य नहीं रहा। अगर उसने खुद को बदला तो कहने का मतलब यह है कि उसने स्वयं का वो जो रूप है ना जो एक रस है एक रस किसी के भी व्यवहार में ना आ सकने वाला उसने वो उसको अपने आप को बदला नहीं बल्कि उसने क्या किया? एक शक्ति के रूप में रूप और धारण किया। और अब उस रूप से वह कहीं पर एक्टिव कहीं पर निष्क्रिय, कहीं पर सक्रिय
00:19:26:12 कहीं पर धक्के का विषय और कहीं पर धक्के का विषय नहीं के रूप में काम कर रहा है। जी इस बात को और नजदीक ले जाओ। इसको समझो जैसे आत्मा ने हमारा शरीर धारण किया हुआ है। अब हम शरीर में कहीं सुई चुभोते हैं तो दर्द तो कहीं भी चूने का अनुभव होता है। और हम कहे कि आत्मा का इस शरीर में निवास स्थान क्या है? तो जब हम सुई चुभते तो हर जगह ही दर्द होता तो लगता है वो हर जगह ही है और उसी के कारण शरीर गति करता है तो जैसे आत्मा शरीर में व्याप्त है और उसकी गति का कारण है आंतरिक बाहरी दोनों चाहे मन मन अपना काम करे बुद्धि अपना काम करे शरीर में कोई क्रिया हो आत्मा के कारण से होती है आत्मा ना हो तो शरीर निष्क्रिय हो जाता है अब [गला साफ़ करने की आवाज़] आत्मा की जो सक्रियता है वैचारिक शारीरिक आंतरिक और बाह्य बिल्कुल इसी तरह की भगवान की सक्रियता है सृष्टि के अंदर। जैसे जैसे उसकी शक्ति से आंखें देखती हैं। उसी की शक्ति से कान सुनते हैं। जबकि कान अलग है। आंखें बिल्कुल अलग है। नाक बिल्कुल अलग है। तो ईश्वर एक ऊर्जा है। उसी जैसे जैसे बिजली विद्युत ये एक ऊर्जा है। इसी से पंखा चलता है तो हवा देता है। इसी से एसी चलता है तो
00:20:41:13 ठंडक दे देता है। यही हीटर चलाती है तो गर्म हो जाती है। इसी ऊर्जा से आटा चक्की आटा पीस देती है। इसी ऊर्जा से तेल निकालने वाली मशीन तेल निकाल देती है। अब उसमें इस प्रकार का कोई बंटवारा नहीं हो सकता। मैं मैं अब आपने बिल्कुल बिल्कुल सही उदाहरण दिया है। मैं इसी बात को कह रहा हूं आपको कि जो ईश्वर एक रस है समान रूप से सर्वत्र व्याप्त है। जैसे बिजली [गला साफ़ करने की आवाज़] तो जहां पर जहां पर बिजली को पंखा चलाना है या जहां पर बल्ब चलाना है वहां पर अलग-अलग पावर में बिजली जो है रेगुलेट हो रही है। मतलब जहां पर पंखे के लिए बिजली चाहिए वहां पंखे वाली पावर मिल रही है और जहां पर बल्ब वाली पावर चाहिए वहां पर बल्ब वाली पावर मिल रही है। जहां पर वाशिंग मशीन और बड़े-बड़े जो अह इलेक्ट्रॉनिक अह यंत्र होते हैं वहां पर और भी ज़्यादा हैवी पावर की बिजली मिल रही है। तो ये शक्ति के रूप जब ईश्वर कार्य करने वाला हो रहा है बिजली के समान अगर माने तो वो रेगुलेट वो रेगुलेट हो रहा है। कहीं पर ज्यादा है कहीं पर कम है। हम तो नहीं कम ज्यादा नहीं है। जी जैसे आप समुद्र का जल ले। समुद्र का जल आप समुद्र [गला साफ़ करने की आवाज़] के जल को एनालाइज कैसे करेंगे? सारे समुद्र का तो नापतोल नहीं करेंगे। एक बूंद आप उसको लेबोरेटरी में चेक कर लेंगे। एक बूंद के अंदर जो अनुपात है वही
00:21:56:14 अनुपात सारे समुद्र में है। तो आप समुद्र को नापने के लिए बड़े स्तर पर नहीं जाएंगे। विद्युत बिजली बिजली है। चाहे वो छोटे रूप में काम करती हो चाहे वो बड़े रूप में काम करती हो। उसकी लेवल्स अलग-अलग हो सकते हैं। लेकिन अल्टीमेटली वो रहेगी विद्युत। आप ऐसा नहीं कह सकते कि जो एसी में है वो दूसरी तरह की विद्युत है। तीसरी तरह की विद्युत विद्युत है। फ्रीक्वेंसी अलग-अलग हो सकती है। आप कहीं 220 वोल्ट दे सकते हो। 440 हो सकती है कहीं ज्यादा कम हो सकती है लेकिन है तो वो बेसिकली विद्युत उसके मूल रूप में कभी परिवर्तन नहीं होता हां मूल रूप में परिवर्तन नहीं हो रहा है पर कार्य करने वाली कार्य करने वाली जो स्थिति है वो अलग-अलग है वो मशीनों के कारण वो भेद मशीनों का है बिजली का नहीं अगर चक्की और पंखे की तुलना करोगे तो ये यंत्रगत भेद है बिजलीगत भेद नहीं मैं बता रहा हूं यंत्र यंत्रगत भेद हो गया ना ये तो मैं बता रहा हूं कैसे जैसे कि मान लीजिए कि पृथ्वी को धक्का लगाना है। मान लीजिए पृथ्वी को फेंकना है। दूर फेंकना है। ठीक है? तो यहां पर जो बल शक्ति चाहिए वहीं पे किसी और छोटे से मिट्टी के ढेले को दूर फेंकना होगा। तो वहां पर हमें शक्ति कम लगानी होगी। और यदि वहां पर भी पृथ्वी वाली ही शक्ति लगा दी जो हमने पृथ्वी को धक्का देने में लगाई थी वही शक्ति मिट्टी
00:23:11:15 के ढेले में लगा दी तो मिट्टी का ढेला जहां पहुंचना चाहिए वहां से कहीं और पहुंचेगा। तो इससे कोई अंतर तो पड़ा ही ना। मैं यह कह रहा हूं आपको कि जो शक्ति है ना शक्ति तो शक्ति है और वो वो इसी बात को ज्ञान कहते हैं कि जब ये पता करना हो कि पृथ्वी घुमानी है तो अलग तरह से है। चंद्रमा का मास अलग है तो अलग तरह से घूमेगा। बृहस्पति का मास अलग है तो अलग तरह से घूमेगा। तो उन सब सबको के अंतर्गत जो उनकी अपनी भार है उस अनुसार शक्ति लगी। इस ये ज्ञान के कारण बंटवारा हुआ। क्योंकि मैंने कहा ना स्वाभाविक की ज्ञान बल क्रिया तो यह ज्ञान के कारण भेद है कि उसे अणु परमाणुओं में भी गति हो रही है और ब्रह्मांड में भी गति हो रही है। मतलब मतलब सब जगह एक समान पावर लग रही है ईश्वर की। पावर का अंतर है। शक्ति तो उतनी शक्ति तो शक्ति है। फ्रीक्वेंसी का देखो परमाणु भी उछल रहे हैं। छोटेोटे परमाणु है। जी [गला साफ़ करने की आवाज़] पावर का अंतर आ रहा है ना दोनों में। हर शक्ति का फ्रीक्वेंसी का मतलब उसकी मात्रात्मक भेद है। ये इसे आप इसको आप सुनो इसके स्वरूप का भेद नहीं कह सकते। मात्रात्मक भेद स्वरूप का भेद एक बूंद एक बूंद में जो है वही बिल्कुल समुद्र में है। बूंद भी समुद्र
00:24:26:24 है। समुद्र भी बूंद है। बस अब आप ये कहेंगे कि जो बूंद है उसमें कुछ अलग तरह का समुद्र है या जो ये बड़ा समुद्र है इसमें अलग तरह की शक्ति ज्यादा है। नहीं वो बराबर है। सिर्फ हम अपने क्योंकि हमारी क्षमता कम है बेटे हम उसमें से एक बूंद निकालना है क्योंकि हम सारे समुद्र को नहीं एनालाइज कर सकते जैसे उसमें ना एक एक बच्चा ना रो रहा था वो समुद्र के किनारे पात्र लिए रो रहा है और एक कोई सयाना आदमी आया तो उसने कहा अरे तुम क्यों रो रहे हो उसने कहा भाई मैं ना ये समुद्र को इसमें भरना चाहता हूं कटोरे में और ये तो आ नहीं रहा इसमें तो उसने कहा कोई बात नहीं अगर ये इसमें नहीं आ रहा तो तुम ना कटोरा इसमें फेंक दो समुद्र में जी जी तो जब कटोरा आप समुद्र में फेंक देते हो तो वो कटोरे के चारों ओर समुद्र ही होता है और वैसे आप समुद्र में उसको भर नहीं सकते कटोरे में समुद्र को तो ये सिर्फ हमारी सोच का अंतर है ऐसा कोई ऐसे इतना कोई बड़ा भेद नहीं है और इसमें भी जो आप आर्य समाज और सनातन की जो आप विचारधारा कह रहे हो उसमें भी कोई भेद नहीं है ध्यान रखना आप ये भारतीय परंपराएं हैं सबसे पहले जब हम बात शुरू करें तो इस बात का ध्यान रखें भारतीय जो दर्शन शास्त्र है या भारतीय जो चिंतन और जो भारतीय मनीष है उसके अंतर्गत नास्तिक दर्शनों को
00:25:41:25 भी स्थान है और आस्तिक दर्शनों को भी स्थान है। आस्तिक दर्शनों पे भी चर्चा होती है। नास्तिक दर्शनों को भी मान्यता है। चारबा बौद्ध जैन आदि के जो नास्तिक दर्शन है उनको बिल्कुल मान्यता है। इन पे भी डिस्कशन होती है। इनको इनको डिनाई नहीं करता है कोई। तो ऐसा कुछ नहीं। हम बांट नहीं सकते। हम ना इसको अलग-अलग ले ना चले। जब हम आकार और निराकार पे आते हैं तो वहां हम अपने कई बार ना हम जानबूझ के शायद भेद पैदा करना चाहते हैं। वहां है नहीं है। हो सकता है हमसे कोई गलती हो साकार साकार पूजा भी वैदिक पूजा ही है। देखो वैदिक नहीं कह सकते आप उसको इसको आप ये कह सकते हो कि वैचारिक भेद कह सकते हो। देखो मैं बताता हूं आपको थोड़ा सा और समझ लो। उसमें कोई ऐसी बात भी नहीं है। जैसे बच्चा स्कूल जाता है तो सबसे पहले स्कूल जाके जब स्लेट उसको लिखवाते हैं मान लो अ लिखवाया अ अनार तो पूरी स्लेट पे सिर्फ अ लिखा जाता है और वो भी डॉट डॉट डॉट डॉट डॉट डॉट करके पूरी स्लेट पे अ क्योंकि वो अभ्यास करवाना है। बच्चा भी जड़ है। उसमें बहुत बुद्धि नहीं है। उसके हाथ पैर नहीं चलते ढंग से। तो उसको डॉट डॉट डॉट डॉट करके फिर वो धीरे-धीरे बड़े परिश्रम से अ लिख पाता है। बड़ी मेहनत लगती है और उसको लगता है भगवान एक ऐसा काम है और खींच खींच घर चले जाना पड़ता है और रोतेरोते जाता है और जब वो अभ्यासी
00:26:57:10 हो जाता है तो उसी एक स्लेट पे वो सारी बारा कड़ी लिख देता है। सब कुछ लिख देता है। तो यहां भेद जो है ना यहां प्रारंभ देखिए आप एक बात को समझो। जब हम बात कौन कैसे ये बात समझो आप जब एक बच्चा अ लिख रहा है एक समय उसके लिए बहुत बड़ा कार्य है जब वो विद्या का ज्ञानी हो गया चीजों को समझने लगा तो हो सकता है वो कविता लिख दे हो सकता है कहानी लिख दे हो सकता है शब्दों से खेलने लगे इसमें एक कैच आता है जी इसमें एक कैच आता है कि जब बच्चा बड़ा हो जाता है बहुत ज्ञानी हो जाता है पीएचडी कर लेता है मगर वो जो सिलेट स्लेट में लिखा हुआ अ है ना वो कभी भी ये नहीं कहता कि वो अ गलत गलत था उसमें ये तो कोई बात नहीं समझे नहीं उसमें तो हम भी नहीं कह रहे गलत है मैं मैं ये कह वही मैं कह रहा हूं जैसे हमने कहा कि मूर्ति पूजा वैदिक नहीं है वो ठीक नहीं है तो ये वैदिक नहीं है वैदिक तो नहीं ये तो हम मना कर रहे हैं ना कि स्लेट में लिखी हुई जो पहली बात थी वो गलत है वो गलत नहीं नहीं गलत क्यों है नहीं नहीं नहीं समझे नहीं आप सुनो इसमें आप इसमें ना चीजें डालो मत सिर्फ एक बात देखो आप वहां भी अ लिखा जा रहा है वहां भी अ लिखा जा रहा है बाद में भी सिर्फ सिर्फ योग्य उसके सामर्थ्य का अंतर है। ये बच्चे का सामर्थ्य अलग है और बड़े का सामर्थ्य अलग है। ये भाषा का अंतर
00:28:12:14 नहीं है। आप इसे भाषा के अंतर में ना लेके जाओ। ये बच्चे के सामर्थ्य का अंतर है कि उसे शुरू में लिखना नहीं आता। बाद में वो उसी स्लेट पर सारा कुछ लिख देता है। तो ये बच्चे के सामर्थ्य के घटने बढ़ने की बात है। इसमें इसमें भाषा की घटोतरी बढ़ोतरी नहीं है। मैं वही इसमें बच्चे के सामर्थ्य की बढ़ोतरी ऐसे भगवान को जानने समझने में मनुष्य के सामर्थ्य की बढ़ोतरी घटोतरी है। ईश्वर की नहीं जी। जैसे ना आप देखो चार अंधे थे। उन्होंने कहा यार हाथी हाथी की बड़ी है। तो कहने लगे हमें हाथी दिखाओ। अब वो चारों अंधे उन्होंने कहा चलो दिखाते हैं। तो एक की पकड़ में पूछ आई। उसने पूछ को ऐसे ऐसे देखा। ओ हो अच्छा समझ गया समझ गया। एक के हाथ में उसका पैर आया तो उसने कहा अच्छा अच्छा ऐसा एक के हाथ में सूंड आ गई। उसने कहा अरे अच्छा अच्छा ईश्वर ऐसा एक के हाथ में कान आ गया। उसने कहा अच्छा अच्छा ईश्वर ऐसा। तो फिर उसने उसने पूछा अंधों को हां भाई जान गए तुम ईश्वर कैसा है? कि हां जी जान गए कि बताओ कैसा है? तो जिसके हाथ में पूछ आई थी उसने कहा वो तो झाड़ू जैसा है। जिसके हाथ में पैर आया था उसने कहा अरे ये तो बहुत बड़े खंबे जैसा होता है। फिर किसी के हाथ में सूंड आई तो उसने कहा अरे नहीं नहीं ये तो बड़ा नरम नरम सा होता है। सांप जैसा जिसके हाथ में कान आया था उसने कहा नहीं वो तो बड़े पंखे जैसा होता है। तो एक्चुअली वो सब सत्य कह रहे हैं। सामर्थ्य का अंतर है। जिसने जैसा जाना वैसा समझ लिया।
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00:29:25:25 और वैसे मैं एक बात आपको बताऊं ईश्वर विषय पर मैं चर्चा नहीं करना चाहता हूं। वैसे बेसिकली मैं अपना निजी विचार बता रहा हूं। उसका कारण
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00:29:34:00 यह है कि यह चर्चा का विषय नहीं है। ये तो अनुभूति का विषय है। चर्चा तो आप अगर गुड पे भी करोगे ना गुड़ इतनी बड़ी चीज होती है। गुड़ एक डेली गुड़ तो है। कितनी बड़ी बात है। आप चर्चा चर्चा में उस गुड़ की ही व्याख्या नहीं कर सकते। मैं गुड़ की कितनी मर्जी व्याख्या करूं। मैं आपका मुंह मीठा नहीं करा सकता। आप गुड़ की कितनी मर्जी लच्छेदार बात करो। आप मेरा मुंह नहीं मीठा करा सकते। वास्तव में गुड़ एक अनुभव का विषय है। तो जब हम पदार्थों को ले विषय करते हैं और एक होती है चर्चा। चर्चा और अनुभूति हमेशा ही अंतर वाली होती है। जो चर्चा के विषय है वह हमेशा उलझे ही रहते हैं। चर्चा वाले लोग मैंने हमेशा उलझे देख। मुझे कभी अंतर नजर नहीं आया। जैसे कोई व्यक्ति मूर्ति पूजा करने गया। मुझे वो कभी शत्रु नहीं लगा। मैं सच बताऊं आपको। मैं यह मानता हूं कि वो उस रूप में उसको जान समझ रहा है। कभी साना होगा, बड़ा होगा, दूसरे रूप में समझेगा। कोई फर्क नहीं है इस बात में। और हम इस तरह से इसको ना ले चले कि मैं आरस से हूं तो इस विषय को खींच खींच के लाया जाएगा। वैदिक विषय मूर्ति पूजा नहीं है। ये कभी भी होता नहीं। ये होगा भी नहीं। आप चाहे वेदों से कुछ चीज लाके दे। मेरे सामने भी रखे हुए और मैं आपको देख के भी बता सकता हूं। ऐसी कोई बात नहीं। लेकिन हम उसको ना खींचातान ना करें। मतलब आप समझे भगवान हम और आप जैसे तुच्छ मनुष्यों की खींचातान का
00:30:49:03 विषय नहीं है। अनुभूति का विषय हो सकता है कि जो मूर्ति पूजा करता हो वो ज्यादा साना समझदार शुद्ध पवित्र आदमी हो सकता है। और हो सकता है जो निराकार की उपासना करता हो वो शरारती हो शैतान हो चालाक हो झूठ बोलता हो शरारत करता हो ये हो सकता है तो इसमें ना तो उसके आकार के कारण कमी है ना उसके निराकार के कारण कमी है। मनुष्य की अपनी समझ है। एक्चुअली तो क्या है ईश्वर का सहारा हम अपनी अपनी चेतना और अपनी बुद्धि के विकास के लिए करते हैं। ईश्वर एक माध्यम है जिसके द्वारा मनुष्य अपनी आत्मा की पूर्णता को प्राप्त करता है। यहां विषय ईश्वर नहीं है। यहां विषय है आत्मा कैसे पूर्ण होगी? आत्मा को पूर्णता कैसे मिलेगी? और पूर्णता ईश्वर के पास है। तो ईश्वर दो मिनट मैं यहां पे थोड़ा सा लेना चाहूंगा आपसे। जी एक पहली बात यह है कि जैसे हमने कहा कि यह जो है आप नहीं करते कहीं पर भी और जैसे हम गुण की व्याख्या कितनी भी करते जाए तो वो जो है कभी भी हम प्रॉपर सामने वाले को वो नहीं कर सकते सेटिस्फाइड नहीं कर सकते उसमें भी ये बिल्कुल आप अच्छी बात कर रहे हैं बट इसमें फिर ये एक लकीर खींच देना कि आप गलत हो मतलब वेदों में नहीं दिया या वो तर्क के द्वारा सिद्ध नहीं होता तो ये लाइन भी नहीं खींचनी चाहिए
00:32:04:04 यदि हम नहीं लाइन नहीं देखो सुनो ये हमने आपने नहीं खींची देखो आचार्य आचार्य जी आचार्य आचार्य जी दो मिनट दो मिनट दो मिनट मुझे बस पूरा करने ले दीजिए दूसरी बात ये है कि हमने ये तो माना कि शक्ति के रूप में कम और ज्यादा के रूप में भेद है स्वरूप से भेद नहीं है ईश्वर में है ना कार्य करने वाली शक्ति के रूप में भेद है कहीं पे ज्यादा है कहीं पे कम है नहीं यंत्रगत भेद है शक्ति यंत्रगत भेद कहीं वो शक्ति बड़े प्रकट रूप में आती है कहीं कहीं वो शक्ति बड़े कम रूप में आती है तो तो शक्ति के जैसे जैसे भगवान राम में भगवान राम में वो ज्यादा दिखाई देते हैं। ईश्वर मैं मैं वही कह रहा हूं। व्यवहार में ज्यादा दिखाई देते हैं। और
00:32:52:26 बिल्कुल सर दूसरा रूप है। मैं वही कह रहा हूं। जी जी इसका मतलब जी आ रही इसका
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00:32:58:26 मतलब ईश्वर ईश्वर यह रेगुलेट कर सकते हैं कि वो कहां पर शक्ति के रूप में ज्यादा प्रकट हो और कहां पर शक्ति के रूप में कम प्रकट हो। ठीक है? हां।
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00:33:11:13 तो अब इसी में एक आगे की चीज आती है कि जैसे ईश्वर डिसाइड कर सकते हैं कि वह कहां पर जैसे पृथ्वी का ही मान लिया कि पृथ्वी के लिए वो धक्के का या पुश का या पुल का विषय बने ज्यादा और किसी और ग्रह के लिए या और किसी जड़ पदार्थ के लिए नहीं बने या किसी के लिए कम बने या किसी कैसे निर्धारित करोगे किसी के लिए नहीं बने आप कैसे निर्धारित करोगे कि वो किसी कहीं जगह पूर्ण और कुछ का विषय नहीं बने क्यों नहीं बने इस संसार में कोई भी वस्तु स्थिर है ही नहीं। कोई भी वस्तु स्थिर नहीं है। इवन आप कोई आपके सामने कोई मेज पड़ा है, कुर्सी पड़ी है, उस कुर्सी के परमाणुओं में भी गति हो रही है। उस मेज के परमाणुओं में भी गति हो रही है। कोई वस्तु चम्मच है, किताब है, जो भी है सबके परमाणुओं में गति है। तो हम इस बात पे हम फैसला ना करें। नहीं नहीं मैं ये नहीं कह रहा क्योंकि हम अपनी चीजें कहीं कहीं ऐसा लगता है कि हम उस ना आरोपित कर रहे हैं और उससे उसका स्वरूप खराब हो जाएगा। मैं इसको मैं इसको थोड़ा सा एक बार एक बार आचार्य जी मैं अपनी बात पूरी कर लूं क्योंकि मुझे लगता है मैं जब बात पूरी करूंगा तो आप जब मुझे बताएंगे नहीं ये बात ना पहले कह चुके हो जैसे पुश और पुल की बात है वो आप पहले कह दी ये बार-बार कहने से
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00:34:25:06 वास्तव में तो मैं इसे समझ भी नहीं पाया मैं सच बताऊं तो आपको अब तक
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00:34:28:12 जैसे आपने कहा ना पुश और अंदर बाहर पूरी वास्तव में तो मेरी समझ में अब तक नहीं आया मैं पूरी बात करता हूं या कहीं से कोई उठा लाई हुई चीज कोई के भ आज मैंने ये चीज रखनी है नहीं नहीं [हंसी] सर मैं इसको जब मैं जब मैं पूरा करूंगा ना तो आपको समझ में आ जाएगा। मैं बता रहा हूं। आपने जैसे जैसे कि जड़ पदार्थ के लिए भगवान यह डिसाइड कर रहे हैं कि उन्हें कहां अपनी शक्ति के रूप में ज्यादा प्रकट होना है। कहां कम प्रकट होना है। इतना तो आप मानते हैं। और दूसरी बात यह है कि सारे ही परमाणु गति कर रहे हैं। मगर उनकी कई कई वस्तुओं की कई जड़ पदार्थों की गति इतनी कम है कि वो हमारे व्यवहार के विषय में ना आने वाली। मतलब हम देख नहीं पा रहे हैं। कर तो वो रही हैं मगर हम देख नहीं पा रहे हैं। इतनी कम है उसकी गति। तो उसको हम लोग व्यवहारिक दृष्टि से ही मानते हैं कि वो चीज स्थिर है और जो वास्तविकता में हमारे व्यवहार में जिनकी गति आ रही है वो हमारे व्यवहारिक दृष्टिकोण से गति कर रही है। अब दूसरी बात यह आती है कि जैसे ईश्वर पृथ्वी सूर्य इत्यादि के मार्ग में बाधक बनता है या उन्हें उनके आकर्षण अथवा उनके पुश अथवा पुल का विषय बनता है। तो क्या इसी प्रकार से ईश्वर प्रकाश के मार्ग में भी बाधा बन सकता है ना? किसी विषय से नहीं
00:35:45:10 नहीं बन सकता असल में क्या है देखो ईश्वर इतना सूक्ष्म तत्व है कि उससे सूक्ष्म तत्व इस संसार में है ही नहीं और जो
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00:35:56:14 जो अत्यंत सूक्ष्म होता है वो बाधक हो ही नहीं सकता तो वो प्रति बाधक होने के लिए उसका स्थूल होना जरूरी है किसी भी अर्थों में
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00:36:07:06 ठीक है और जबकि ईश्वर सिद्धांत जो उसका मूल स्वरूप है वो इतना सूक्ष्म है कि उससे सूक्ष्म कोई पदार्थ नहीं और सूक्ष्मता के कारण ही व्यापकता है। ठीक है? स्थूलता में तो व्यापकता नहीं हो सकती। मैं यहां बैठा हूं आप कहीं और बैठे। तो इसको हमने माना ना कि वह एक शक्ति के रूप में कार्य करता है। जैसे सत्यार्थ प्रकाश मैंने पढ़ा तो उसमें वो कह रहा है कि ईश्वर ईश्वर अपने शक्ति रूपी हाथों से कार्य कर रहा है। शक्ति रूपी हाथ मतलब दिखाई तो नहीं दे रहा है पर ईश्वर सब जगह होते हुए भी किसी विशेष स्थिति में हाथ जैसे मतलब हाथ की तरीके से इधर से उधर मूवमेंट करने वाले कार्य कर रहा है। हां वो तो वो तो तुलसीदास भी कहते हैं बिनु पद चले सुने बिनु कान्हा वो तो उसमें क्या वो तो जैसे आप जैसे आप जैसे आपने कहा कि वो इतना सूक्ष्म है कि वो कहीं पे बाधक नहीं बन सकता किसी का भी तो फिर वो तो
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00:36:59:13 फिर वो ये जो जड़ पदार्थ है पृथ्वी इत्यादि मिट्टी के कण इनके लिए बाधक कैसे बना फिर रचना कैसे की उसने
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00:37:06:07 कहां बाधक बना मिट्टी का कण मान लीजिए पड़ा है उससे पृथ्वी बन रही है तो कैसे बनेगी? अच्छा कैसे बनेगी मतलब प्रोसेस है जैसे शुक्र और रज मिलने से बच्चा बन जाता है। क्या कहेंगे उसको कैसे बनना है? तो तो पृथ्वी उसकी प्रक्रिया है और ईश्वर के ज्ञान में वो देखो मिट्टी पड़ी है। आपकी मेरी दृष्टि में मिट्टी है। कुमार की दृष्टि में वो उसके [हंसी] लिए साधु तो उसको लेके आएगा। फिर उसको चाक पे रखेगा। फिर चीजें करेगा और उसमें ज्ञान भी लगाएगा। ऐसेसे करे तो घड़ा बनेगा। बिल्कुल यदि यदि मिट्टी हो कुम्हार ना हो चाक ना हो फिर सब चीजें तो तो कुम्हार मिट्टी के लिए बाधक कुम्हार मिट्टी के लिए बाधक बना ना कुमारक शब्द गलत इस्तेमाल कर रहे हैं बाधक नहीं है वो वो साधक है साधक है वो तो मिट्टी से उसने घड़ा बनाया उसने साधन किया बाधक कैसे मैं मैं बता रहा हूं बाधक कैसे हुआ कि जैसे उसने मिट्टी को उठाया तो मिट्टी उसके हाथ के उसके हाथ के नीचे नहीं जा सकती ये बाधा है जैसे उसने मिट्टी को उठाया तो अब मिट्टी ठीक है उसकी बात लेकिन सुनो अब इसमें
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00:38:13:18 क्या है अब यही मैंने यही शुरू किया था कि आप मनुष्य की वस्तुएं भगवान पे आरोपित ना करें
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00:38:19:03 वो कुम्हार के जैसे हाथ का ऊपर नीचे नहीं होगा उसका वो सिस्टम नहीं है लेकिन अगर हम दिया है नहीं नहीं वो ठीक है नहीं आप ओ मेरी बात सुनो उदाहरण उदाहरण लक्ष्य नहीं है बेटे हम यहां कुम्हार और की चाक और मिट्टी की चर्चा नहीं कर रहे हम उसके माध्यम से किसी चीज को समझने की कोशिश कर रहे उसका सहारा ले सहारा गौण होता है और जहां मैं पहुंचना वो मुख्य होता है। मैंने दिल्ली जाना है तो मैं गाड़ी का सहारा ले सकता हूं। रिक्शा में जा सकता हूं हूं। पैदल जा सकता हूं। साइकिल पे जाऊं कैसे जाऊं? अब इस बात की व्याख्या नहीं हो सकती कि रिक्शा है ये साइकिल अपना नहीं लक्ष्य है गति लक्ष्य है दिल्ली। तो सिर्फ उदाहरणों को ना पकड़ के कहे कि जी कुमार ने मिट्टी उठाई। अब उसके आरपार नहीं हो सकता। भगवान के ऐसे नहीं हुई होगी। अब आपने क्या करा? उसका रूप एक व्यक्ति के जैसा मान लिया और यहां बाधा हो गई। अब वो इस तरह से चीजें नहीं करता है। आंतरिक शक्ति है। अब आप मैं आपको कह रहा हूं कि आपकी आंखें झपक रही है। बताओ आप तो झपका नहीं रहे तो अपने आप झपकती रहती है। तो ऐसे संसार के कुछ कार्य नैमितिक होते हैं। कुछ स्वाभाविक है। भगवान ने सृष्टि घुमा के चला दी। स्वाभाविक तो है मगर कहने का मतलब जब तक वो जड़ पदार्थों के लिए बाधक नहीं बनेगा तो वो सृष्टि रचना पॉसिबल नहीं दिख रही। और यदि
00:39:34:04 एक मिनट भाई साहब एक मिनट और यदि हमने उसका बाधक बनना मान लिया जड़ पदार्थों के लिए तो हम यह भी मान सकते हैं कि प्रकाश के मार्ग में भी वो बाधा बन जाए तो फिर उसका वो जो तर्क की दृष्टि से अवतार या जो स्वरूप है मूर्त रूप वो आ जाएगा। मगर मगर मगर एक मिनट अगर हम यह कहें कि ठीक है वह बाधक तो नहीं बनता है मगर वो कुछ ऐसा करता है जो हमारी समझ से परे है मगर वो सृष्टि रचना कर देता है तो फिर इस चीज को हम उसके मूर्त रूप के लिए भी ले सकते हैं कि वो जो है एक देशीय तो नहीं होता है बाधक तो नहीं बनता है प्रकाश के मार्ग में मगर वो कुछ ऐसा करता है जिसकी वजह से वो हमारे आंखों का विषय किसी निश्चित देश काल परिस्थिति में हो जाता है। अगर हम अचिंत एक मिनट अगर हम अचिंत शक्ति को मान रहे हैं तो वहां पे क्यों नहीं मान सकते और अगर हम वहां पर तर्क कर रहे हैं तो यहां पर हमारे तर्क का उत्तर क्यों नहीं है ये मेरा मतलब वहां और यहां का बताओ एक बार जरा वहां और यहां हम एक बार बताओ कि वहां मान रहे और यहां नहीं मान रहे एक बारी बताओ कैसे जैसे हमने कहा कि ईश्वर उसका जो बाधा का विषय नहीं बनता है जड़ पदार्थों के लिए मगर सृष्टि रचना वो करता है अब वो कैसे करता है वो मनुष्य दृष्टि से समझाने तो आपकी बेटी बात
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00:40:42:00 नहीं समझ पा आप ये बाधा शब्द का प्रयोग क्यों कर रहे हो? बार-बार
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00:40:45:06 बाधा कैसे होती? कैसे बाधा बन जाता है? मतलब मेरे को आप आप मुझे बता दो कि कैसे उसने सृष्टि रचना की जो आपने आप कैसे जकी? आपका हृदय कैसे धड़का? आपका हृदय कैसे धड़क रहा है? ठीक है। आपका हृदय जब से आप पैदा होते हैं तब से मरने तक धड़कता है। अपने आप तो आप इसकी व्याख्या कैसे करोगे? बता रहा हूं ना। किसी बता रहा हूं। किसी निश्चित देश काल परिस्थिति में मेरी जो स्वाभाविक रूप से काम करने वाली जो चेतना शक्ति है वो मुझे मिलने वाली जो सूर्य की सूर्य से मिलने वाली जो एनर्जी है उसके साथ संयोग करके बार-बार दिल को धड़का रही है। जिस दिन मेरे अंदर वो एनर्जी नहीं होगी निश्चित रूप से। जैसे निश्चित रूप से मतलब किसी देश का तो इसका मतलब ये हो गया कि जो आप सूर्य और फला चीज का संयोग बता रहे हो यदि उनके संयोग को स्थापित रखा जाए तो फिर व्यक्ति अमर भी हो सकता है। जीवन का कारण क्या सूर्य और पदार्थों की की अलाइनमेंट है या कोई और कारण है? अगर अगर ईश्वर ने हमें ऐसी क्षमता दी हो मान लीजिए कि हम उसको स्थापित रख सके तो अमर भी हो सकता है। मगर उसने ऐसी क्षमता नहीं दी है ना। नहीं नहीं नहीं आप मुझे समझाएं। एक तो पहली बात यह है कि हम अपनी मर्जी से कोई बात करें या शास्त्रगत परंपरा के बंधन में बंध के काम करें।
00:42:00:19 ये जो नियम बनाए हैं जो वेद आदि शास्त्र ठीक है? उसका कारण क्या है? थोड़ा सा बस एक दो मिनट में कहूंगा फिर आप जैसा भी कहेंगे चलता रहेगा।
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00:42:09:20 जैसे बंधन का मतलब हो गया यदि हम विचार उन्मुक्तता की बात करें। कि जिसके मन में जो आए वो कहे जिसके मन में जो आए वो सिद्धांत खड़ा कर दे। लेकिन आश्चर्य की बात है कि यह सिद्धांत गणित में नहीं है। मनमानी गणित में नहीं चलती। मनमानी विज्ञान में नहीं चलती। ये धर्म में मनमानी चलती है। क्योंकि इसको विषय एक विषय के रूप में हम कभी मानते नहीं ना जानते ना पढ़ते। तो ये ध्यान रहे हर विषय की अपनी परिधि है। सीमाएं हैं। उन सीमाओं में जो बंधा हुआ है वही लक्ष्य तक जाएगा। जो बिखरा हुआ है वो लक्ष्य तक
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00:42:45:27 नहीं जाएगा। जैसे नदी को कहीं ले जाना है तो मजबूत किनारों में बांध के हम कहीं भी उसको ले जाए। यदि हम कहे जी नहीं हम तो फैलेंगे तो वह विनाशकारी होगा। तो पहले तो चिंतन शक्ति को एक दिशा की धारा में देना होगा। वो दिशा कौन निर्धारित करे?
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00:43:02:04 पैरामीटर कौन है? मैं नहीं हूं। मैं पैरामीटर नहीं हूं। पैरामीटर है ऋषि। पैरामीटर है मुनि ऋषि मुनि योगी वेद वो पैरामीटर है
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00:43:14:04 वो बताता है कि हमें सोचना भी है तो कैसे सोचना है ऐसे तो कोई कुछ भी सोचेगा आप देखो कि यही वो कह रहा है पीली चटनी खा लो तो तुम्हारा कल्याण हो जाए कोई कहता है लाल चटनी खा लो तो कल्याण इसका मतलब है आचार्य मैं समझ गया आपकी बात मैं समझ गया हमने उसका हमने चिंतन को बांधा नहीं हमने चिंतन को छोड़ दिया तो कोई कुछ भी कहे मतलब तो ये होगा नहीं ऐसे तो इसका निष्कर्ष नहीं निकलेगा। इसका मतलब यह है कि जो तर्क है तर्क से तो यह [गला साफ़ करने की आवाज़] है कि भाई तर्क से तो अवतार संभव है क्योंकि जैसे मैं बताता हूं आपको सुनिए आचार्य शंकर ने शंकराचार्य जी ने एक बात कही है एक तर्क है एक आचार्य जी एक मिनट एक मिनट तो मैं ये कह रहा हूं कि तर्क से तो हमें ये मानना पड़ेगा कि यदि वो पृथ्वी इत्यादि के लिए बाधक क्षेपक या जो भी बन सकता है अगर तो वो जो है प्रकाश के मार्ग में भी बाधक मुझे तो आपके
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00:44:09:20 बाधक क्षेपक वाली बात नहीं समझ में आई। ये क्या कहना चाह रहे हो आप? मुझे बाधक ही समझ में नहीं आया मुझे तो अब तक आप कह रहे हो वो बाधक है। कैसे बाधक है? आप मुझे समझाओ। मैं मैं बता रहा हूं। यदि दुनिया में कोई भी जड़ पदार्थ इधर से उधर मूव करेगा ईश्वर के कारण। तो उसमें ईश्वर का धक्का, बल इत्यादि लगेगा। जो बल होने की बात स्वीकार की है सभी ग्रंथों में। वो
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00:44:32:28 बल बल जो है वहां पर उसको इधर-उधर मूव कराएगा। तो बल जो होगा वो ऐसा नहीं है कि पूरी दुनिया में एक साथ काम करे। क्यों? कि मान लीजिए मुझे मेरे सामने इस समय आप लैपटॉप में मुझे दिख रहे हो। ठीक है? और मुझे केवल लैपटॉप को हिलाना है। तो ऐसा नहीं है कि पूरे पूरी टेबल पे मेरी पूरी टेबल पर मैं बल लगा दूं तो सारे सामान नीचे गिर जाए। मैं केवल बल लगाऊंगा लैपटॉप में और लैपटॉप खिसक जाएगा। तो इस रूप में जो ईश्वर सर्वत्र व्याप्त है वो एक देश कार्य करने वाला बन रहा है। ठीक है? तो वो बाधा ज्ञान से पूरी हो जाती है। जो आप कह रहे हो ना ऐसा हो रहा है ऐसा हो रहा है वो एक ही सूत्र में समाप्त हो जाती है बात कि अनंत ज्ञान बल क्रिया उसकी क्रिया केवल क्रिया नहीं है। ज्ञान युक्त क्रिया मैं पूरा कर लूं एक मिनट कि अगर हम ये मानते हैं कि उसने किसी निश्चित देश काल परिस्थिति में सृष्टि रचना के लिए जड़ पदार्थों के व्यवहार का विषय बना। बाधक बना या छेपक बना कुछ भी बना। व्यवहार का विषय नहीं बना। आप फिर आप इसको अपनी मनमानी से इस विषय को कहीं और ले जाना चाहते हो। मैं आपकी बात भी ला रहा हूं। आचार्य जी मैं आचार्य आचार्य जी मैं आपकी बात ला रहा हूं। मैं बोल रहा हूं मैं ऑप्शन वो भी बोलूंगा। या तो वो व्यवहार का विषय बना और या फिर हम लोग ये कहेंगे कि व्यवहार का विषय नहीं बना। उसने कुछ ऐसा
00:45:48:09 किसके व्यवहार का विषय किसके व्यवहार का विषय व्यवहार चेतन का होता है। जड़ का कोई व्यवहार नहीं होता। अरे आचार्य जी मैं कह रहा हूं धक्के का विषय बना, बल का विषय बना, पुश का विषय बना, क्रिया का विषय बना। यह चीज यहां से ये जो है बल बल की समीक्षा करना चाहते हो धक्के की ताकत की समीक्षा करना चाहते हो या जो पदार्थ इधर से उधर घूम रहा है उसकी समीक्षा करना चाहते हो या जो जिस पीछे से ताकत लग रही है जो जो कोई शक्ति है उसकी समीक्षा करना चाहते हो किसकी समीक्षा करना चाहते हैं आप हां ठीक है तो मैं इसको एक बार पूरा कर लूं आप बीच में अगर इंटरप्ट नहीं करेंगे तो हम आगे बढ़ जाएंगे मतलब हो गया है ऑलमोस्ट कंप्लीट तो तो क्या है कि सृष्टि रचना के लिए यदि हम यह मानेंगे कि वो शक्ति के रूप में कहीं पर छेपक बना मूव कराने के लिए पदार्थों को और कहीं पर नहीं बना या तो ये मानेंगे तो हमें ये मानना पड़ेगा कि वो प्रकाश के रास्ते में भी क्षेपक बन सकता है बाधा बन सकता है और तब वो जो है मूर्त रूप ले सकता है। मगर यदि हम ये कहें भाई साहब एक मिनट एक मिनट भाई साहब और यदि हम यह कहें कि वो अचिंत तरीके से काम करता है। उसने कैसे सरकाया, कैसे जड़ पदार्थों को सरकाया, वह मनुष्य दृष्टि से
00:47:03:10 समझ में नहीं आ सकता है। मगर वह क्षेपक बाधक नहीं बना। तो फिर हम यह कह सकते हैं कि वह जो है सर्वत्र व्याप्त होते हुए भी कैसे अपने आप को मूर्त रूप दे रहा है, उसमें हम नहीं बता सकते, पर वो दे सकता है। अगर ये अब बात आ जाती है एक ही कि क्या ये बात हमारे शास्त्र आवाज बीच-बीच में से गायब हो रही है। अब आ रही है। बीच में से कुछ चीजें चली जाती है ऐसे अचानक। अब अब आ रही है आवाज आपको? हां जी। हां जी। ठीक है। तो ये दो चीजें तो हो गई। अब हमने कहा कि ठीक है हम स्वतंत्र रूप से मनमानी व्याख्या नहीं कर सकते। जो हमारे शास्त्रों में दिया गया है हम वही मानेंगे। तो
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00:47:39:15 तर्क की दृष्टि से भले ही मूर्त रूप धारण करना सिद्ध हो सकता हो मगर नहीं सिद्ध करिए। करो हो सकता नहीं। आप सिद्ध करिए तर्क से। ऐसा हो सकता है। बताइए। तो भाई साहब मैं कह तो रहा हूं कि आप जब यह तय करने चलेंगे कि उसने सृष्टि कैसे बनाई उसी से तय हो जाएगा कि वह अवतार कैसे लेगा। अच्छा आप क्या सोचते हैं ईश्वर ने सृष्टि कैसे बनाई? मैंने आपकी दोनों बातें ले ली है। अगर वो धक्के का विषय बनेगा तो प्रकाश के मार्ग में माधक बन जाएगा। और अगर आप अगर अगर आप अचिंत शक्ति मान रहे हैं। आप ये नहीं बता पा रहे हैं वो कैसे जड़ पदार्थ जड़ पदार्थ मूव कैसे किया। आप अगर यह नहीं बता रहे हैं तो फिर हम यह कहेंगे कि वो अचंत शक्ति से ही अवतार धारण करेगा। यह तर्क की मेरी दो बातें हैं। जी
00:48:28:00 अब आप प्रश्न क्या करना चाहते हैं वो बताइए आप।
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00:48:31:10 आपने मुझसे कहा है ना कि आप सिद्ध करिए तर्क से कैसे सिद्ध होगा? हां मैंने आपको कहा कि आप ये बताइए वो कैसे मूर्त रूप हो जाएगा बताइए आप। जब मूर्त रूप होगा मूर्त रूप होगा तो परिवर्तनशील होगा। कोई ऐसी वस्तु जो परिवर्तनशील ना हो। मैं वही तो बता रहा हूं। मैं वही तो बता रहा हूं। मैं वही बता रहा हूं आपको कि जब अगर हम यह मानते हैं कि वो परिवर्तनशील है जो मूर्त रूप है तो हमें ये भी मानना पड़ेगा जो पृथ्वी को धक्का दे रहा है जो सृष्टि रचना कर रहा है वो भी परिवर्तनशील है क्योंकि वो कहीं पर ज्यादा है कहीं पर कम है। ये तो आपने फिर आप इस विषय को ना उलझा ही रहे हो। वैसे व्यर्थ में इसका कोई लाभ नहीं है। और इसीलिए मैं इस विषय पे चर्चा नहीं करता हूं कि ये वाद विवाद का विषय तो वैसे है नहीं। आप मान लो उसको किसी मूर्ति के रूप में मान लो तो आपकी इच्छा है भाई इसमें कोई आपको आकर रोकेगा थोड़ी यहां भगवान कहां किसी को कहता है ये तो हम में और आप में असमानता हो रही है ना बेचारी अब भगवान बैठा होगा ऊपर आनंद में देख रहा होगा कि ये देखो लगे हुए हैं दोनों ना वास्तव में ना वो जानता है ना वो जानता है
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00:49:30:00 तो ये बेटे साक्षात्कार का विषय है ये इस तरह की चर्चा का विषय नहीं है
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00:49:33:13 आप उसे किसी रूप का मानो कि जो उसका आकार होता है आकृति संभव नहीं है बस इतनी सी ही बात है और वो संभव क्यों नहीं है क्योंकि आकृति कोई भी हो वो प्रकृति है आकृति किसी भी चीज की है ना प्रकृति के परमाणु हो कुछ भी हो वो आकृति है और आकृति है तो वो प्राकृतिक है ईश्वर प्राकृतिक नहीं है क्योंकि प्रकृति नष्ट हो जाती है तो ईश्वर भी नष्ट हो जाएगा वो नष्ट नहीं होता है क्योंकि वो कोई किसी प्राकृतिक परमाणु से नहीं बना है और जिस शक्ति के आक्षेप की आप बात करते हो आप आक्षेप का मतलब किसी पुरुष शक्ति की बात कर रहे हो कि जैसे इस हाथ ने इस हाथ को धक्का मारा तो ये भी एक हाथ है यह भी एक हाथ है। आप यह कह रहे हो इस धक्के में अंतर से ईश्वर धक्का नहीं करता जैसे आप कह रहे हो जैसे जैसे विद्युत ऊर्जा निराकार होते हुए भी कहीं पर धक्के का विषय बनती है निराकार होते हुए वहां वो हाथ नहीं होता है पर विद्युत ऊर्जा ऐसा प्रभाव उत्पन्न करती है वो केवल ऊर्जा है और उसमें भी आप ध्यान रखना जो परमात्मा है चेतन ऊर्जा है [गला साफ़ करने की आवाज़] ये अंतर समझो आप मैं ये कह रहा हूं एक बात मैं दो मिनट की कह दूं फिर आप उसके बाद बात कह देना एक तो ऊर्जा होती है जड़ और एक ऊर्जा होती है चेतन। [गला साफ़ करने की आवाज़] जो जड़ ऊर्जा है वो विद्युत है
00:50:48:16 और प्रकार की जो संसार की शक्तियां है बारूद की शक्ति कह लो आप गम विस्फोट होता है जो ये सारी शक्तियां जड़ शक्तियां वायु की शक्ति कह लो अग्नि की शक्ति कह लो ये जड़ शक्ति है और एक होती है चेतन शक्ति जो चेतन शक्ति है वो निर्णय करती है जो जड़ शक्ति है वो निर्णय नहीं करती जैसे आपने बिजली को छुआ जो स्वामी छुए सन्यासी छुए योगी छुए धनी छुए करण खाएगा और जब बिजली यह नहीं देखेगी कि इसको करंट देना है कि नहीं देना उसको देना ही है। बम गिरेगा तो लोगों को मरना ही है। योगी हो, सन्यासी हो, ध्यानी हो सब मरेंगे। लेकिन जब आप और हम ये फैसला करते हैं कि मुझे इसको मारना है और वो हाथ जोड़ के खड़ा हो जाए तो हम कहते हैं नहीं छोड़ो। अभी जब इसने हाथ जोड़ दिए तो तो यहां जो ईश्वर की शक्ति है आप उसे उस तरह की शक्ति भी ना समझे जो आप कुदरत में शक्तियां देखते हैं प्रकृति में। चेतन शक्ति है जो निर्णय करती है जिसमें साथ में ज्ञान जुड़ा हुआ है जब उसमें ज्ञान जुड़ गया तो फिर उसको यह पता है कि किस चीज का क्या करना है कैसे करना है आप और मैं उसको नहीं बनाएंगे यहां पे आपने बिल्कुल सही बात बोली कि किसको झटका मारना है किसको नहीं मारना है ये वो तय कर सकती है कि फिर आप कह रहे हो किसको नहीं मारना है मुझे समझाओ आप फिर आप इसमें दो भेद पैदा कर देते हो झटका मारना है
00:52:03:18 कि नहीं मारना है ऐसा क्या ये विषय कैसे हो गया उसने इस संसार का नाम है जगत। जगत का मतलब है जो लगातार गतिशील है और परिवर्तनशील है। अब कम है ज्यादा है वो उसका अपना पृथ्वी की गति और तरह की है। मनुष्य की गति और तरह की है। ठीक है। ठीक है वो ये तय करता है। ठीक है वो ये तय करता है कम अथवा ज्यादा किसको मारना है। ये तो तय करता है। ये तो तय करता है। कैसे? किसको तेज किसको तेज आपने कहा कि जो विद्युत होती है वो यह तय नहीं कर सकती कि मुझे किसको झटका मारना है। ना विद्युत इसलिए नहीं तय कर सकती क्योंकि वो जड़ है। भाई साहब मेरे को बोलने दीजिए। मुझे बोलने दीजिए भाई साहब। [गला साफ़ करने की आवाज़] तो क्योंकि वो जड़ है। अब जो ईश्वर की शक्ति है वो जड़ शक्ति नहीं है। वो चेतन शक्ति है। वो तय करती है कि मुझे कहां कम अथवा कहां ज्यादा रूप में कार्य करना है। ठीक है? उसका स्वाभाविक ज्ञान है। बिल्कुल ठीक है। हां। तो इस रूप में ईश्वर एक रस होते हुए भी अपनी शक्ति के रूप में कहीं कम कहीं ज्यादा हो रहा है। किस रूप में? सोते हुए नहीं होते हुए
00:53:10:28 होते हुए अपने एक रस रूप में होते हुए भी फिर कहीं कम कहीं ज्यादा रूप में शक्ति के रूप में वो आ रहा है। तो मेरी बात सुनो वो तो एक शक्ति है। वो जब आप उसे कह रहे हैं एक रस। एक रस का मतलब है जिसके स्वरूप में कभी परिवर्तन नहीं होता। बिल्कुल बढ़िया। ठीक है। एक रस इसको कहते हैं जिसके स्वरूप में कभी परिवर्तन ना हो। तो परमात्मा को एक रस कहते हैं और उसके रूप का परिवर्तन हम लेते हैं मनुष्य के हिसाब से ऐसा बदलेगा ऐसा बदलेगा क्योंकि हमारी नेचर हम उसी तरह से हमारी ग्रोथ हुई है ना तो हम उसी तरह के परिवर्तनों को परिवर्तन मानते हैं। कुछ परिवर्तन ऐसे भी है जो हमारी पकड़ से ही बाहर है। तो उनको ऐसा थोड़ी हम परिवर्तन नहीं मानेंगे। तो परिवर्तन तो मानने ही पड़ेंगे किसी ना किसी को। मेरा कहने का मतलब यह है कि ईश्वर जब सब जगह एक समान है तो सृष्टि करने के समय वो कहीं पर जो है शक्ति बन के निराकार शक्ति के रूप में कार्य करने वाला होता है और कहीं नहीं होता है तो ये ईश्वर ने अपने आप को परिवर्तित करते हुए कहीं ना होना कैसे परिवर्तित कर दिया बताओ कैसे परिवर्तित कर दिया सबने पांच किलो का पांच किलो का वजन उठाना आपने 5 किलो की ताकत लगाई आपने 10 ही किलो का वजन उठाना आपने 10 किलो की शक्ति लगाई आपकी शक्ति है। आप जितनी चाहे इस्तेमाल करें, कम करें। उसमें भेद कहां से हो गया? शक्ति के रूप में भेद
00:54:26:00 हुआ ना? नहीं। तो शक्ति का भेद हो तो हमने देखना है। किस में ज्यादा लगानी है, किस में कम लगानी है। इसमें क्या हुआ? तो भेद हुआ ना शक्ति के रूप में। पदार्थों के कारण हुआ। उसकी मूलभूत शक्ति का उसके स्वरूप में अंतर थोड़ी आ गया। मैं मैं नहीं कह रहा उसके स्वरूप में अंतर हुआ। शक्ति के रूप में भेद हुआ ना। वो तो चलो उसमें भेद में क्या अंतर है? अगर मान लो भेद हुआ। शक्ति रूप में भेद यानी कि ईश्वर सर्वत्र एक रस होते हुए भी कहीं पर कम कहीं पर ज्यादा रूप में क्रियान्वित हो सकता है। वो ठीक
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00:54:58:26 बात है। वो देखो जड़ जगत में वो अलग तरह से प्रकट करता है अपने आप को और चेतन जगत में वो अलग तरह से प्रकट करता है। बहुत बढ़िया। तो इसका मतलब इसका मतलब इसका मतलब जिस प्रकार से वो जड़ पदार्थों के लिए धक्के इत्यादि का विषय बन रहा है उसी प्रकार से वो प्रकाश के मार्ग में भी धक्के का या टकराने का विषय बन
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00:55:17:27 सकता है। निराकार रहते हुए निराकार जैसे निराकार जैसे निराकार रहते हुए वो पृथ्वी को सरका रहा है वैसे ही निराकार रहते हुए प्रकाश के मार्ग में बाधा उत्पन्न कर देगा। तो आप अपने मन से ही कह रहे हो कि इसके लिए ना कोई सूत्र बताओ। आप अपनी मर्जी से बात मत करो। आप ना कोई सूत्र बताओ। कोई वेद का मंत्र बताओ। अब आ जाते हैं। इस तरह से बताओ। फिर चर्चा मैं समझ गया कि अब जो है तर्क वाली जो बात है जो आर्य समाज की ओर से जो एक तर्क आपने रखा कि सर्वत्र व्याप्त होते हुए वो आंखों का विषय नहीं बन सकता। ये वाली बात तो अब उतनी ज्यादा हम मतलब हमने काफी देर चर्चा कर ली। अब हम आते हैं इस पे कि क्या शास्त्रों में ऐसा लिखा है कि वो मूर्त रूप धारण कर सकता है। अब हम इस पे आते हैं। है ना? कैसे कैसे लिखा है क्या शास्त्रों में यह बात लिखी है कि वो मूर्त रूप धारण कर सकता है इस रूप में आते हैं हम मेरी आवाज सबको आ रही है क्लियर इंटरेस्ट हो रही है बीच-बीच में कट जाती है मेरी आवाज सबको आ रही है क्या जरा कमेंट कर दीजिए
00:56:22:13 [हंसी] हां मेरी आवाज सबको आ रही है ये एक कमेंट आया है ओके सभी आपको आ रही है संजीव जी हां हां जी हां बिलकुल बिलकुल बिलकुल आ रही है जी जी ठीक है अब हम लोग शास्त्रों की बात करते हैं कि शास्त्र में कहां लिखा है तो जैसे शास्त्र में कई जगह लिखा है या कई जगह नहीं
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00:56:46:07 लिखा है इस पर जाने से पहले मैं एक बात पूछना चाहूंगा कि आर्य समाज के पास ये वेद कैसे आए वेद के जो आर्य समाज के पास वेद कैसे आए जी हां असल में क्या था जब ऋषि दयानंद सरस्वती यहां घूमे गए दाएं बाएं जहां भी काशी आदि तो वहां पूर्ण रूप में उनको वो चीजें प्राप्त नहीं हुई तो उन्होंने फिर ये जर्मनी से मंगवाए
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00:57:11:10 जर्मनी से तो वहां से मंगवाने के बाद फिर उनको देखा सारा करा तो वहां से मंगवाने पड़े अच्छा अच्छा हां जर्मनी से मंगवा तो जैसे ये कैसे तय किया मतलब जर्मनी में जिससे उन्होंने वेद लिए हैं उन्होंने जो वेदों की व्याख्या की थी क्या वो व्याख्या स्वीकार है उन्हें दयानंद किनोंने की थी व्याख्या
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00:57:34:14 उन्होंने किससे वेद लिए थे जर्मनी में? जर्मनी में कोई व्यक्ति थोड़ी जर्मन से उन्होंने मंगवाए थे। भाई जर्मन में उनको पता चला कि महा वेद रखे हुए हैं। उन्होंने जर्मन से मंगवा लिया लाइब्रेरी से मूल संगीता पाठ होता है। व्याख्या तो नहीं होती। आप समझ रहे मेरी बात? जो वेद है वो संगीता पाठ है। संगीता पाठ है। जी जी उन्होंने किया ये वेद है। अच्छा अच्छा हां उन्होंने तय कैसे किया? अच्छा देखो ये है कि वो हम इसको तय नहीं करते कि वेद है। वेद की रचना छंदोबद्ध रचना है। उसके अंदर स्वर है, ऋषि है, देवता है और हर चीज का एक हिसाब किताब है। एक प्रकार एक रचना है। तो जब हम ये देखते हैं कि सारी ठीक है तो भी हमें पता चल जाता है कि वेद का मंत्र है। ऐसा श्लोकों में आदि दूसरी चीजों में नहीं होता है। उसमें घटोरीत बढ़ोतरी हो सकती है। इसमें नहीं हो सकती [गला साफ़ करने की आवाज़] क्योंकि बड़ी एक जटिल रचना है। तो यह जो वेदों को पहचानने की व्याख्या है यह दयानंद जी के पास कैसे आई? छह ग्रंथ पढ़ने पड़ते हैं बेटे। वेदों के पढ़ने से पहले छह ग्रंथ होते हैं। षडंग कहते हैं उनको निरुक्त कल्प छंद ज्योतिष आदि ये छे होते हैं। छह ग्रंथों को पढ़ने से पता चलता है कि कौन किसको हम मंत्र मंत्र संज्ञा किसकी है? किसको
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00:58:48:07 मंत्र कहा जाएगा? क्या तुलसीदास की चौपाई में मंत्र हो सकते हैं। क्या रामायण में मंत्र है? क्या महाभारत में मंत्र है? क्या पुराणों में मंत्र है ये सब या वेदों में ही मंत्र है तो वहां वेद में ही मंत्र है। पुराण, गीता, रामायण, महाभारत इन सब में श्लोक है। मंत्र नहीं है क्योंकि मंत्र रचना का जो मापदंड है वो अलग है और जो श्लोक रचना का मापदंड है वो अलग है। तो ये जो जो षडंग आपने बताए ये उनके पास कहां से आए? दयानंद जी के पास। ये तो बेटे हां बेटे ये तो भारतीय शास्त्र परंपरा में शुरू से है मतलब उनके पीछे उनके पीछे उनको किसी ने दिए होंगे ना उनके नहीं नहीं ये तो जैसे पढ़ना अब आप कहोगे जी क ख ग कहां से लाए हो ये किसने दिया है स्वर कहां से आए हैं ये तो जब से भाषा का विकास हुआ अब ये भाषा का विषय हो गया अब अलग से भाषा का जैसे विकास होता है ये उस तरह का विषय है ठीक है ना कहां से नहीं आती होती है चीजें होती है ऐसा है जैसे कि जो मुंडकोपनिषद उसमें एक एक से ले चार के बीच में ऋषि गण ये बता रहे हैं कि उन्होंने जो ब्रह्म विद्या है वो कहां से ली और आचार्य या आचार्य यास्क भी बता रहे हैं कि मैंने जो है जो जो अर्थ किया है इस ग्रंथ का वो
01:00:03:18 श्रुति से और परंपरा से तर्क और युक्ति के प्रमाण परंपरा और तर्क से किया है। तो कहने का अर्थ यह है कि कहने का अर्थ यह है कि हम जिस भी किताब को वेद मानेंगे उसके लिए हमें किसी गुरु पर विश्वास होना चाहिए कि इस ये कह रहा है एक एक मिनट अच्छा जी एक मिनट तो अगर हमने जैसे किसी पुराने जैसे वेद आज तो उत्पन्न हुए नहीं है। वेद तो आज से हजारों वर्ष लाखों साल पहले आप जैसे आर्य समाज का मानना होगा कि शायद 20 हजार वर्ष पहले कितने हजार वर्ष पहले मानता है आर्य समाज जब से जब से मनुष्य है तब से वेद है ठीक है तो जब से मनुष्य है तो काफी प्राचीन हो गया फिर वहां से हमारे पास तक वेद आ रहे हैं तो वेद हमने वेद या वेदों को समझने के लिए षडंग ले लिए तो वो षडंग हमने किसी से लिए तो क्या हमें उस पर भरोसा है जिसने हमें षडंग दिए हैं अथवा नहीं है यह बात हां हां हां बिल्कुल है ये तो [गला साफ़ करने की आवाज़] ये ना भाषा के टूल्स है जो चलते आते हैं हमेशा से जैसे किससे लिए किससे लिए थे लेना नहीं है तो भाषागत होते ही है जैसे आपने कहा सूर्य जमा उदय तो सूर्योदय हो गया ये संधि हो गई यहां पे अब आप कहोगे जी ये कहां से आई तो ये भाषा का विषय ही आना कहां से है उसमें वो तो वो
01:01:18:24 तो पठन पाठन की परंपरा से है जो पठन पाठन की परंपरा है उसमें अब आप कहो क ख ग कहां से आए क ख ग कहां से आए जो परंपरा आप कह रहे हो वही परंपरा है। वही परंपरा मैं पूछ रहा हूं कि वो परंपरा क्या है? क्योंकि ऐसा है कि कई ऐसे आचार्य हैं जिन्होंने वेदों के ही अर्थ में मूर्ति पूजा को स्वीकार किया है और उनकी परंपरा है प्राचीनता से प्राचीनतम से लेकर के आज तक की परंतु नहीं किसने किया है? आप ना ऐसे बातें ना करें कि उसने किया है। आप मुझे व्यक्ति का नाम मंत्र संख्या मंत्र का अर्थ ये बताएं बेटे। मैं बात तो आप कुछ भी कह देंगे तो कुछ ही परंपरा शुरू आप मुझे युक्ति बताओ फिर मैं अपना वेद उठाऊंगा और उसी में से आपको तुरंत ही अर्थ बता दूंगा आपको बहुत देर नहीं लगेगी उसमें मैं मेरे पास चारों वेद है भाष्य के सहित है आप अपने तरफ से ऐसे कुछ कुछ बना के ना बीच में रखें इसमें ठीक ठीक है मैं युक्ति बता रहा हूं कि दयानंद
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01:02:17:15 जी ने किसी व्यक्ति से वेद लिए तो क्या किसी से भी वेद लेने को हम ये मान ले कि वेद है आजकल बच्चे इंटरनेट से वेद पढ़ रहे हैं इंटरनेट से डाउनलोड करके तो ऐसे में इंटरनेट पर कोई भी कोई भी मिलावट कर देगा कुछ भी वेद के नाम से दे देगा तो हम लोग ये प्रमाणित कैसे कर हम लोग ये प्रमाणित कैसे कर रहे हैं कि वो वेद ही है जो हम ले रहे हैं वेदों के नाम पे अगर हम कहें कि षडांग के आधार पे हमने प्रमाणित किया तो हमें ये देखना होगा वो षडांग हमें किसने दिए
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01:02:44:12 अगर हमने कहा कि षडांग के आधार पर प्रमाणित है ना एक मिनट एक मिनट आचार्य जी एक मिनट तो अगर हम कहें कि षडांग के आधार पे हमने प्रमाणित किया यहां समस्या जो है हां आप एक ना उसको नाप रहे हो किसी सोफा सेट को फीते से। अब आप कह रहे हो कि सोफा सेट और फीता और ये फीता किसने दिया? ऐसे ही कह रहे हो ना आप फीता किसने दिया? कैसे हम माने कि फीता है। कैसे माने इसका ये पैरामीटर ठीक है।
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01:03:12:26 आपसे मैं पूछूं कि आपको वेद किसने दिए? तो आप कहोगे ना दयानंद जी ने दिए। नहीं दयानंद जी हां ठीक है। उन्होंने मंगाए और हम उनसे पढ़ रहे हैं। बिल्कुल ठीक है। हां। अब दयानंद जी से लिए हुए वेद आप इसलिए मानते हो क्योंकि आपको दयानंद जी पर विश्वास है। चलो कह भी सकते हो लेकिन उसके अलावा उन्होंने ऐसी बहुत सारी चीजें दी है कि हम परीक्षण भी कर सकते
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01:03:32:26 हैं। ऐसी बात नहीं है कि उन विश्वास है। उन्होंने हमें परीक्षण करने के तरीके बता परीक्षण कर लो। तो जब परीक्षण कर लोगे तो जान लेना। और जो उन्होंने मंगाए वो मूल संगीिता थी। मूल संगीिता ठीक है। मूल जैसे मैंने बताया कि हर मंत्र का ऋषि होता है। हर मंत्र का देवता होता है। हर मंत्र का छंद होता है। हर मंत्र के स्वर होते
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01:03:53:06 हैं। ये जो ये जो परीक्षण की विधि है ना यह भी जिससे ली होगी उस पर आपको विश्वास होना चाहिए। ये जो आप मेरी बात समझो अब आपने कहा जी बच्चे ने अ लिखना सीखा तो कहते हैं किसी पे ये अ कहां से आया और किसी पे इस पर विश्वास होना चाहिए। अब एक बात बताओ। हमने अ लिखा मैं बता रहा हूं। हमने अ लिखा और अंग्रेजों ने ए लिखा। ठीक है? अब आप कहेंगे ये तो भेद हो गया दोनों में। वो कह रहे हैं ए माने ए और हम कह रहे आ माने आ दूसरी भाषा में उसकी लिपि दूसरी हो जाएगी। तो आप इतना मानो मोटे रूप में कि दुनिया की सबसे प्राचीन भाषा संस्कृत है। उसमें भी सबसे प्राचीन वैदिक संस्कृत है। एक लौकिक संस्कृत एक वैदिक संस्कृत मैं बता रहा हूं। मैं बता रहा हूं कि आ का अर्थ क्या है और उपयोग क्या है। इस विषय में जो हमारा निर्णायक स्त्रोत है वो हमारे सामने व्यवहारिक है। जैसे कि
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01:04:46:00 हम कहें कि मुझे मालूम है कि अ से अनार होता है। तो इस विषय में जो मेरा आपको मालूम है अ से अनार होता है। आपको कैसे मालूम है अ से अनार होता है। मैं मुझे मुझे बोलने तो दीजिए भाई साहब। आलू भी हो सकता है। मैं बता रहा हूं। मैंने ये नहीं कहा कि आलू नहीं होता है। मैंने ये नहीं कहा। मैंने कहा कि आ का अर्थ और आ का उपयोग यह मुझे मालूम है कि भैया इसका निर्णायक कौन है और क्या निर्णय होगा और अगर मैं आ का यह अर्थ लिखूंगा तो मैं पास हो जाऊंगा। ठीक है? मगर
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01:05:16:02 जो वेद इत्यादि है वो अती्द्रिय विषय है। अती्द्रिय विषय जैसे गायत्री मंत्र से मुक्ति मिलेगी या नहीं मिलेगी? आवाज आ रही है मेरी? बीच में चली जाती है? हां आवाज आ रही है ना? तो जो वेद इत्यादि कुल मिलाकर के जो धर्म है वो अती्द्रिय विषय है। जैसे गायत्री मंत्र से मुक्ति मिलेगी कि नहीं मिलेगी इसका निर्णय मैं यहां पर व्यवहारिक जगत में नहीं कर सकता हूं। तो इसमें मुझे विश्वास करना होगा कि जिससे मैं गायत्री मंत्र ले रहा हूं उस पर मुझे विश्वास है कि हां ये गायत्री मंत्र के नाम पर मुझे वही गायत्री मंत्र दे रहा है जो आज से कई वर्षों पूर्व हमारे ऋषियों ने जिसका दर्शन किया था।
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01:05:52:14 ठीक है? आप कैसे निर्णय करोगे? जब आपने किसी से लिया आप कैसे निर्णय करोगे कि वर्ष पुराना वही है? वही तो मैं कह रहा हूं कि वहां पर आपके पास भी जो कुछ भी है जिन जिन चीजों को आप आधार बना रहे हो उनका भी आधार क्या है? चीजों को आप आधार मान के चल रहे हो। उनका भी आधार मैं बता रहा हूं ना मैं आपको बता रहा हूं। इसीलिए मैंने जिससे वो गायत्री मंत्र लिया है वो वेद मंत्र लिए हैं या उसको पहचानने की जो विधि है जो आपने बताई षडांग वगैरह उस वो जिससे मैंने लिए है उस पर मैं विश्वास प्रकट करूंगा। अगर मैंने कहा कि मुझे विश्वास थोड़ा सा धीरे बोलोगे तो शायद बीच में आवाज कटेगी नहीं। जैसे जोर जोर से बोलने से ना कई बार उसमें कुछ ऐसा होता है कि बीच में से आवाज गायब हो जाती है थोड़ी देर के लिए। जैसे आराम आराम से बोलेंगे तो पूरी आवाज सुनी। मुझे क्या लगता है जैसे आप बोलते हो तो बीच में से कुछ चीजें एकदम गायब हो जाते हैं। फिर एकदम आवाज आ जाती है। ऐसा हो रहा है कुछ। अच्छा मैं एक मिनट पूछ लेते हैं। शायद कुछ गड़बड़ हो रही हो। कोई मुझे दिक्कत है। किसी के पूछ लेने से क्या होगा? जब मुझे इसमें दिक्कत आ रही है ना? जी हो सकता है मेरे यहां समस्या है कि आपके यहां है। ये बात है। जैसे आप कुछ बोलते हो तो बीच में कुछ शब्द कट जाते हैं। कुछ कुछ शब्द ठीक है। ठीक है। आवाज सही आ रही है। जी ठीक है। अभी आपको मेरी आवाज आ रही है? साफ अब देखो फिर गायब हो गई बीच में। फिर गायब हो गई।
01:07:07:22 तो आप थोड़ा सा एक बार ना मूव हो के दोबारा आ जाइए आप। मूव हो के मतलब इसको बंद करके। हां लीव लीव मैं आपको लीव करवा देता हूं और फिर आप एक बार दोबारा कर दीजिए। कोई ग्लिच आ रहा होगा आपके क्योंकि मेरी आवाज सही आ रही है। मेरे यहां अभी एक बार तो बहुत सीख आती है लाइन में फिर एकदम बीच में से कुछ शब्द गायब हो जाते हैं। आप एक बार लीव करके आ जाइए। ठीक है। अब देखो फिर गायब हो गई। आप लीव करके आ जाइए। एक मिनट एक मिनट करना बेटे एक बार आकाश करना इसको। [गला साफ़ करने की आवाज़]
01:07:46:00 जय श्री राम और आशा करता हूं आप सभी को काफी ठीक-ठाक चर्चा अपना स्वरूप लेते हुए दिख रही होगी और [खांसने की आवाज़] वॉइस इज क्लियर हां जी वॉइस वही मैं कह रहा था वॉइस क्लियर है उनको कोई ग्लिच आ रहा होगा संजीव जी को और काफी सुंदर तरीके से वार्ता अपना एक निष्कर्ष को पहुंच रही है।
01:08:24:08 [गला साफ़ करने की आवाज़] ये भाई साहब पूछ रहे हैं कि आपका उद्देश्य क्या है? उद्देश्य वैसे हमारे YouTube चैनल के उसमें डिस्क्रिप्शन में लिखा हुआ है। पीछे जाकर पढ़ सकते हैं। अन्यों के हित का ध्यान रखते हुए समाज को सुसंस्कृत सुसंगठित एक सूत्र में बांधते हुए जो है हिंदुओं के अस्तित्व और आदर्श की रक्षा करना ही एकमात्र उद्देश्य है। जी संजीव जी वेलकम बैक। हां जी हां जी जी जी अब क्या? पुनः स्वागत है आपका। अब मेरी आवाज ठीक से आ रही है आपको? हां अभी तो आ रही है फिलहाल। जी जी जी तो मेरा कहने का मतलब यह है कि जो अती्द्रिय विषय है धर्म और ब्रह्म जैसे कि आपने बताया कि मनुष्य दृष्टि से वो समझ में आने वाली चीजें नहीं है। तो उस विषय में क्योंकि हम यहां पर उसका उपयोग और प्रयोग नहीं कर सकते कि भाई गायत्री
01:09:39:13 मंत्र से मोक्ष मिलना है कि नहीं मिलना। तो व्यवहारिक जगत में इसका कोई प्रयोग प्रयोग नहीं कर सकते। तो इसलिए हमें किसी जिससे हम ले रहे हैं हमें यह प्रकट करना होगा कि हमें उस पर विश्वास है। तो
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01:09:52:12 जिससे हमने गायत्री मंत्र लिए उसके यदि अर्थ पर विश्वास नहीं है तो हम यह कह रहे हैं कि वो हमको झूठ बोल सकता है। अज्ञानता वश या किसी लोभ लालच वश वो हमें झूठ बता सकता है। तो वो जो गायत्री मंत्र को हम मंत्र मान रहे हैं वो भी झूठा हो सकता है। हो सकता है कि ईश्वर ने कुछ और दिया हो और वो हमें झूठ कह रहा है। और यदि हमें उसके अर्थ पर विश्वास नहीं है तो उसके मंत्र पर भी विश्वास नहीं होना चाहिए और यदि मंत्र पर विश्वास नहीं है, यदि मंत्र पर विश्वास है तो उसके अर्थ पर भी विश्वास होना चाहिए। तो इसके लिए सबसे पहले तो यह जरूरी होगा कि दयानंद जी ने मंत्र लिए कहां से? एग्जजेक्टली ये पता होना चाहिए।
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01:10:29:22 जैसे कई ऐसी गुरु परंपरा है जिसमें काफी पीछे तक के गुरुओं के नाम है। जैसे शंकराचार्य परंपरा। शंकराचार्य परंपरा में अभी वर्तमान के जो शंकराचार्य हैं उनसे पीछे के आज से ढाई हजार वर्ष पूर्व जो आदि शंकराचार्य हुए थे। वहां तक के जो आदि दैविक गुरु मान लीजिए या लौकिक गुरु मान लीजिए उनके नाम है। उनके बाद जो दिव्य जो आपके यहां शायद नहीं माना जाता हो उनके पीछे के दिव्य गुरुओं के नाम वहां तक के प्राप्त है जहां से सृष्टि रचना हुई है। तो कहने का मतलब है वर्तमान में अगर कोई भी व्यक्ति वेद मंत्र ले रहा है तो उसको किसी ना किसी परंपरा प्राप्त आचार्य से वेद मंत्र लेना होगा। अगर नहीं लेना होगा तो उनकी प्रामाणिकता सिद्ध नहीं होगी। सत्यापन नहीं होगा उनका कि यह वेद मंत्र ही है। तो ऐसे में सबसे पहले देखना
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01:11:13:27 होगा कि दयानंद जी ने वेद मंत्र लिए किससे हैं? स्वतंत्र रूप से लेकर स्वतंत्र भाष्य किया या किसी प्रामाणिक परंपरा प्राप्त आचार्य से लिए? जी
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01:11:23:08 इसमें ऐसा है बेटे हर मंत्र की अपनी एक रचना है। हर मंत्र की अपनी रचना है और वो आप तब समझ पाएंगे जब आप यह विद्या पड़े होंगे। अब हमारी समस्या क्या है? हम तो हिंदी भाषी लोग हैं। संस्कृत लौकिक भी नहीं जानते। वैदिक तो बहुत ही दूर की बात है। तो हम इस बात को इसका निर्णय तो हम कभी भी नहीं कर पाएंगे क्योंकि हमें संस्कृत लौकिक भी नहीं आती। वैदिक तो कहां से आएगी? उसका पठन पाठन ही नहीं है। तो हर मंत्र का एक स्ट्रक्चर है। मैंने जो आपको बताया स्ट्रक्चर वो स्ट्रक्चर ही ये सिद्ध करता है कि ये मंत्र है या नहीं। स्ट्रक्चर है। आप किसने बताया आपको? वो तो उसमें वेद में है आलरेडी उसके ऊपर अंक लिखे हुए हैं। हर हर हर जो मंत्र है ना यानी यानी यानी कि वेद अच्छा मेरी बात सुनो आप पहले ना भाषा होती है। देखो आप आपको अब शायद समझ में आ जाएगा। जैसे बच्चा पैदा होता है तो ना वो लेखन नहीं करता है। पहले क्या करता है? पहले बोलता है, लिखना बाद में करता है, कानों से सुनता है और फिर वो लेखन बाद में आता है, वाचन बोलना पहले आता है। तो ऐसे जो वेद है
01:12:38:12 ये प्रथम में लिखित रूप में नहीं थे। ये ध्यान रखना इनको श्रुति इसलिए कहते हैं कि सुनने की परंपरा से चले। जैसे बच्चे की विद्या सुनने की परंपरा से चलती है और फिर पुस्तकों पर आ जाती है बाद में। तो कालांतर में पहले तो यह छंदोबद्ध रचना श्रुति के रूप में रही और इनको श्रुति और वेद कहते इसलिए हैं कि सुनने से चले। श्रुति माने सुनना कान का विषय तो श्रुति परंपरा से चले। बहुत समय तक श्रुति परंपरा से चलते रहे। किसी ने सामवेद याद कर लिया, किसी ने यजुर्वेद याद कर लिया। परंपरा से फिर वो अपने गुरुओं से याद करते रहे। ऐसे चलता रहा। ठीक है? फिर धीरे-धीरे जब बुद्धि का रास होने लगा क्योंकि स्मृति भी धीरेधी क्षय [गला साफ़ करने की आवाज़] हुआ ना समय के अनुसार। तो जैसे स्मृति का क्षय हुआ तो फिर भाषा का विकास हो के फिर उनको बांधा गया। फिर वो लेखन में आए। तो ऋषि परंपरा से जब वो लेखन में आए तो उन्होंने फिर उनके अब जैसे बच्चे ने कहा पापा तो अब तो उसे नहीं पता था पापा। फिर उसने कहा पी ए पी ए फिर वो आया लिखने में पी पी यू पी ए नहीं अब वो कहेगा पी यू पी को मैं पाप नहीं करते पुपा हो जाएगा पी ए पी ए तो भाषा और जो उसके लिखने का ढंग इकार अ उ अ आदि मात्राओं के हिसाब से तो सबसे पहले तो ये समझना है कि मंत्र
01:13:53:22 प्रथम श्रुति है बाद में रिटन है तो श्रुति परंपरा से चलते आए चलते आए फिर धीरेधीरे जब स्मृति लुप्त होने लगी तो फिर वो भाषा में बांधे गए। भाषा में बांधे गए तो उच्चारण के हिसाब से बांधे गए। जब मैं कहता हूं आपका नाम क्या है? शिवश नारायण द्विवेदी। हां जब मैं कहता हूं शिवंश तो मैं शिवंश नहीं लिख सकता उसे। भाषा में आपका नाम वैसा ही लिखा जाएगा जैसा उच्चारित होता है। उच्चारण को वैसा ही लिखा जाएगा जैसा उच्चारण है। ऐसा नहीं होगा कि हम उच्चारण कुछ और करें और लिख कुछ और दे। तो प्रथम जो आई श्रुति श्रुति से आई वाणी और जैसे सुनते थे उस मात्रा से फिर उसको लिखा गया बांधा गया उसको इस प्रकार कीति परंपरा समझ गया मैं समझ मैं समझ गया हमने [गला साफ़ करने की आवाज़] ये माना कि श्रुति परंपरा चली नहीं माना नहीं बेटे बेटे माना नहीं यही परंपरा है उसका नाम श्रुति ही इसलिए आप ऐसे ना करो कि हमने माना आप कुछ मानने वाले नहीं मैं मानू ना मानू मैं वेद का पोषक नहीं हूं मेरी कोई ऐसी नहीं है कि मेरे होने से वेद होंगे या आपके कहने से होंगे तो मानना नहीं ऐसा है उसका नाम श्रुति है। ये वो सिद्ध कर रही है
01:15:09:01 कि वो स्रोत परंपरा से ही चले हैं। ठीक है। ठीक है। अभी मैं अपनी पंक्ति को सही करता हूं कि श्रुति परंपरा से वेद वेद हमें प्राप्त होते हैं। श्रुति परंपरा से आगे चलकर के कालांतर में जब लोगों की सामर्थ्य कम हो जाती है तो वो उसको लिपिबद्ध कर दिया जाता है। ठीक है? अब इसमें ये बात आती है कि सबसे पहले तो हमने ये मान लिया कि श्रुति परंपरा से यानी कि शिष्य ने अपने गुरु से सुने और जब बाद में वो लिपिबद्ध किए गए तब भी एक गुरु की आवश्यकता इसलिए है कि जो लिखा हुआ हम वेद मान रहे हैं वो वेद ही है कि नहीं जिस जो हम सोच रहे हैं ईश्वर की वाणी वो वही है कि नहीं तो जिस गुरु हमारे जिस गुरु ने जो हमको मंत्र दे रहा है या जो हमें बताने वाला है वो ये सत्या करेगा हां ऋषियों ने हां गुरु ने यही एक मिनट ना गुरु ना मनुष्य मनुष्य ना महापुरुष आपने नहीं दे रहे मैं कुछ ऋषि मैं कुछ ऋषि तो वो थे जिन्होंने दर्शन किया था दर्शन तो किया लेकिन परंपरा से उन्होंने चलाया उन्होंने परंपरा से चलाया उसके उसके बाद अभी जो दो ढाई हजार साल पहले से हमने जब किसी से वेद मंत्र लिए वेद मंत्र लिए ना जब लिपिबद्ध लिपिबद्ध कब हुए लिपिबद्ध
01:16:24:04 भी बहुत समय पहले हो गए थे लिपिबद्ध भी बहुत समय पहले हो गए थे। आप कितना मान के आप कितना मान के चलते हो बताइए? कितने समय से लिपिबद्ध हुए? भाई साहब मूल विषय ये नहीं है। लिपिबद्ध मूल विषय ये है कि शुरुआत हुई श्रुति परंपरा से और एक आप मैं समझ गया। आप ये कहना चाह रहे हो कि इसका आधार क्या है कि शुद्ध है कि अशुद्ध है। नहीं नहीं पहले मुझे बोलने दीजिए आप। एक मुझे पूरा करने दे। श्रुति परंपरा से वो चले और फिर एक समय पर आकर के उसको लिपिबद्ध किया। जब लिपिबद्ध किया तब किसी ने उसको वेद समझा कि यह किताब, यह पोथी, यह पत्र यह वेद ही है। उसके लिए जिसने अपने गुरु से उनको सुना था उससे पूछा क्या यह वेद मंत्र ही है? तो उसने बताया हां तब हमने उसे वेद माना। उसके बाद फिर आगे और इस तरह से चलते गए, चलते गए, चलते गए। अन्यथा अगर हम स्वतंत्र रूप से किसी चीज को वेद मानेंगे तो परेशानी यह आएगी कि हमने जिससे हमने वेद लिए हैं तो वो हमारा प्रमाण हो जाएगा। मान लीजिए आज कोई इंटरनेट से डायरेक्ट बिना किसी से कोई मार्गदर्शन लिए और इंटरनेट से वेद नाम की कोई पुस्तक जो है डाउनलोड कर लेता है। अब उसको तो नहीं मालूम उसको पहचानना कैसे है उसमें क्या सिस्टम है क्या नहीं है वो वेद नाम से कोई मैक्स मूलर टाइप का या कोई क्या नाम है और भी कई
01:17:39:13 लोग रहे मिलावट करने वाले कोई इस तरह का जो असामाजिक तत्व है वो वेद के नाम से कोई किताब रख देगा तो अगर हम स्वतंत्र रूप से वेद को लेने लगेंगे अपने हिसाब से तो कोई भी चीज हमें वेद के रूप में प्राप्त हो सकती है। इसलिए श्रुति परंपरा के बाद जब वो लिपिबद्ध हुए तब भी हमने किसी ना किसी गुरु से उसे वेरीफाई कराना है कि वो वेद ही है या नहीं है। अगर हम यह कहते हैं कि हमको पद्धति मिली है वेद को पहचानने की तो वो पद्धति प्रामाणिक पद्धति है वेद को पहचानने की नहीं पहचानने की। इस पद्धति को भी वेरीफाई कराना है किसी ना किसी गुरु से। तो मैं पूछ रहा हूं दयानंद जी ने किससे वेरीफाई कराया? [हंसी] मैं आपको कितनी देर पहले से मैं यही कह रहा हूं और आप इतनी देर में वही आए हो घूम के क्या आप वेरिफिकेशन की बात कर रहे हो घुमा फिरा के मैं सिर्फ आपको ये कहना चाहता हूं आप कहो कि जी आकाश आकाश है किसने वेरीफाई किया पानी पानी है किसने वेरीफाई किया आप कह रहे हो कि शब्द ऐसे बना किसने वेरीफाई किया ये चीजें परंपरा से चली आई और मैंने बताया कि उसकी रचना का एक प्रकार है आपको मैंने कितनी बार ये बात कही है कि रचना का है जो प्रकार है वो आपको कैसे जो रचना का प्रकार है वो वो बंधा हुआ है पहले से ही आपने मैंने नहीं निर्धारित किया इस बार वो आप वो किसने और आप उसमें
01:18:54:14 गलत सही का निर्णय भी नहीं कर पाओगे मुझे आश्चर्य इस बात का है मुझे नहीं पता आपकी संस्कृत की बैकग्राउंड क्या है लेकिन आप कैसे निर्णय करोगे आप वो आप पूछ रहे हो ऐसी बात हो रही है कि जैसे गरीब आदमी अंबानी के धन की चर्चा करता हो है दोनों गरीब यानी कि मेरा यानी कि मेरा कहने का मतलब है यानी कि मेरा मेरा कहने का मतलब है कि हम लोग किसी भी किताब को वेद के रूप में अपना लें। कोई टेंशन नहीं है। कोई वहां पर प्रामाणिक कैसे? बताओ कैसे बताओ। आप मुझे बता के दिखाओ। बना के मुझे तो आप ही मुझे बताइए ना। मैंने बताया कि आप मेरे सामने लाओगे तो पता चल जाएगा। आप आप अपना सकते हो। आप ही अपनाओगे क्योंकि आपके पास वो पैरामीटर है नहीं। आप जब उन पैरामीटर को ना पढ़ोगे, ना देखोगे, ना सुनोगे, ना समझोगे और उस बात को खींचते ही चले जाओगे तो फिर निर्णय कभी भी होगा नहीं।
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01:19:44:24 मैंने कहा वेद का मंत्र एक छंदोबद्ध रचना है। स्वरों में बंधी हुई रचना है। उसके अपने उसके छंद है अलग-अलग। उसके स्वर है उसके प्रकार है। आप किसी दूसरे शब्द की कविता में वो प्रकार डाल ही नहीं सकते।
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01:20:01:22 आप डाल ही नहीं पाओगे। आप कहोगे कि वेद सिद्ध कर दो। हम कुछ भी लिख देंगे वेद होगा। आप करके दिखाओ। ठीक है। कोई भी करके दिखाए। इस संसार का कोई विद्वान एक मंत्र बना के दिखाए। और मैं छह श्लोक बना के दिखाता हूं अभी आपको। कोई विद्वान दुनिया भर का संस्कृत का वेद का एक मंत्र बना के दिखाए। वेद के मंत्र नहीं बनाए जा सकते। ये समझो आप इस बात को और वो तब पता चलेगा बेटे जब आप परंपरा से पढ़ोगे तब। ये ऐसे सिद्ध नहीं होगा किसने कहा, फलाने ने कहा, उसको किसने कहा, उसने कहा, उसको किसने कहा, उसने कहा। फिर तो आप लगे रहो। पिता आया, उससे पहले पुत्र था, फिर कुत्ता था। बीज खा के पेड़ था, अंडा था, मुर्गी थी। आपकी बात फिर चलते रहोगे ऐसे। मैं समझ गया। मैं समझ गया संजीव जी मैं समझ गया। आपने कहा जब परंपरा से पढ़ेंगे तब तो आपने किस परंपरा से पढ़ा है? जो जो हमारी भारतीय परंपरा है जो सनातन वैदिक परंपरा है वो परंपरा बताई है ना वैदिक परंपरा क्या है? आश पाठ विधि होती है। एक आर्ष पाठ विधि कहते हैं उसको विधि विधि नहीं परंपरा बताइए। परंपरा हां आश पाठ विधि कहते हैं। आर्ष पाठ परंपरा कहो विधि कहो उसको परंपरा का मतलब है कि एक चैन ऑफ नरेशन चैन गुरुओं की चैन वो क्या है आपकी? वैदिक विचारधारा वैदिक वैदिक मैं तो आपको आपके गुरुओं के कुछ नाम होंगे
01:21:16:28 ना पीछे जाते हुए कि मेरे नहीं कोई गुरुओं के नाम नहीं है। मेरी बात सुनो जी आप आप ये ये क्यों कहना चाहते हो कि गुरु का नाम होना चाहिए। हां ठीक है। जंगल में कोई बहुत से लोग हैं जो बिना दूसरी भाषाओं में भी ज्ञान प्राप्त किए जा रहे हैं। पहली तो बात आप ये भी समझो ज्ञान एक मिनट एक मिनट विषयंतर हो जाएगा। तो आपने यह कहा कि गुरु की आवश्यकता जरूरी नहीं है। हमको नियम मालूम है कि कैसे वेद को पहचानना है। पक्का ठीक है ना? हमको मालूम है कैसे वेद को पहचान। उस तरह से नहीं जैसे आप कहोगे उससे लिया फलाने से लिया। एक सिस्टम है बस बात खत्म हो गई। अब आप जयशंकर प्रसाद ने जो कविता लिखी जयशंकर प्रसाद ने जो कविता लिखी उन्होंने कहां से लिखी? मुझे बताओ। सुनो बस अब एक बात सिर्फ एक मेरी बात सुनिए। आप लास्ट इसी से करते हैं। जयशंकर प्रसाद ने कविता लिखी। वो कविता कहां से लाए? ठीक है। अब मैं अपनी बात कर लूं जो मैं कहना चाहता हूं। कहां से लाए वो कविता? ये बताइए। जय शंकर जयशंकर बात की जयशंकर ने जो कि कविता लिखी उस की भी बात करेंगे। अभी मैं ये पूछ रहा हूं कि गुरुओं की आवश्यकता है नहीं। हमारे पास नियम है जिसमें भेद कर रहे हैं। आप मेरी बात सुनिए। गुरु की आवश्यकता किस अर्थों में है? इस अर्थों में है कि भाषा का ध्यान कराए। व्यवहार
01:22:32:07 का ध्यान कराए, विद्याओं का ध्यान कराए। इस तरह से ध्यान कराए और गुरुओं की आवश्यकता मतलब आप ऐसे कांटा मार दोगे कि गुरु की आवश्यकता ही नहीं। ऐसे थोड़ी होता है। माने गुरु माने गुरु माने वो विद्या शास्त्र वेद किसी पुरुष के अधीन नहीं है। और आप इन चीजों को पुरुष के अधीन करना चाहते हो। फला गुरु फला गुरु उसका गुरु उसका गुरु। फिर सबसे पहला गुरु कौन? मुझे आप ही बताओ। आप मुझे बताइए। आप बताते हो कि फला ऋषि का फला हुआ। फला का फला हुआ। वो दिव्य रूप हुए। आप मुझे दिव्य रूप की व्याख्या करके बताओ जी पहले तो आपने कहा पहले सन्यासी हुए फिर उनका दिव्य रूप था जो शायद आप नहीं मानते मुझे वो दिव्य रूप बताओ आप क्या था आप बताओ मैं कैसे मानू उस दिव्य रूप को वो ठीक है आप ही स्वयं कह रहे हो आप स्वयं कह रहे हो उस विषय को तो हो जाने दीजिए आप मेरी बात सुनो आपने स्वयं ये विषय उठाया कि गुरु पहले दिव्य रूप में होता है और दिव्य रूप के बाद वो मनुष्य रूप में होता है आपको आपने बताया कि पहले गुरु दिव्य रूप में होता है फिर वो मनुष्य रूप में होता है। अब आप ही बता रहे हो दोस्त किसी हाथ ही कर दिया। अब बता ठीक है। अब मैं बोलूं? जी अब आप मेरी आपसे प्रार्थना है। आप जब मैं बोल रहा हूं तो मुझे बीच में मत इंटरप्ट करिएगा। आप अपनी बात मेरी बात सुनो। आप तो फिर कुछ भी बोलोगे तो फिर तो विषय फिर कुछ और हो जाएगा उसमें।
01:23:47:10 भाई साहब आप कैसे बोलोगे? आपको एक विधि का अनुपालन तो करना होगा। आप मुझे बात बताइए। एक गणित का व्यक्ति है। कोई कहे जी मुझे बोलने दो। तीन और तीन सात होते हैं। पहले मेरी बात सुनो आप। तीन और तीन सात होते हैं। आपकी बात तीन और तीन सात होते हैं। ऐसा तो कभी हो नहीं पाया। मैंने आपकी बात सुन ली है काफी। मैंने आपकी बात सुन ली है। मैंने बेटे सुन ली होती तो अब एक कुछ देर के लिए आपको मैंने म्यूट किया है भाई साहब। मेरी एक बात प्रार्थना है। मुझे थोड़ा सा आप सुन लीजिए। मैं जो कहना चाह रहा हूं वो सुन लीजिए। हां। तो मैं ये कह रहा था कि हम आवाज नहीं आ रही आपकी। एक मिनट रुको। कह रहे हैं आप? हां। आप कुछ मत करिए। हां बस हो गया हो गया। ठीक है। आ गया। जी जी जी मैं ये कह रहा हूं कि ये जो है हमने ये
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01:24:36:12 कहा कि वेद मंत्रों को हम जो है एक निश्चित नियमावली है। उसके द्वारा पहचानते हैं कि ये वेद मंत्र है। ठीक है? अब ये जो निश्चित नियमावली है ये हमने जिससे [गला साफ़ करने की आवाज़] ली जिससे भी ली क्या हमें उस पर विश्वास नहीं होना चाहिए? जो हमें निश्चित नियमावली दे रहा है वेद मंत्रों को पहचानने की। बेटे वो तो जब आप पढ़ोगे ना तो आपको तभी पता चल जाएगा
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01:24:59:10 कि ये गलत पढ़ा रहा है कि ठीक पढ़ा रहा है। कई बार बच्चे ही टीचर को कह देते हैं सर आप गलत पढ़ा रहे हो। मैं आपकी बात करते ये तो सामान्य सी बात है। अगर कोई अध्यापक ये कहने लगे कि अभी तीन और तीन छह होते हैं आठ होते हैं। तो बच्चा खुद ही कहता है नहीं सर ऐसे नहीं होते। इतना ज्ञान तो भाई साहब मैंने आपको म्यूट किया क्योंकि आप थोड़ा सा म्यूट म्यूट मैंने किया है। एक मिनट थोड़ा सा इंट्रप्ट हो रहा है। ओवरलैपिंग हो जाती है। तो मैं ये कह रहा
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01:25:23:25 हूं कि जैसे मैंने आपकी बात मान ली कि जब मैं पढूंगा डायरेक्ट जाकर के तब मुझे पता चलेगा। तो मैं किसी से पढ़ने कहां पर जाऊं वेद? ये बताइए आप मुझे। कौन प्रामाणिक रूप से वेद पढ़ा रहा है? जी अनम्यूट करो। आप प्रमाणिक रूप से अगर वेद पढ़ना चाहते हैं तो आप गुरुकुलों से संपर्क कर सकते हो। हमारे यहां रेवली गुरुकुल है पास में ही
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01:25:45:13 प्रभात आश्रम है रेवली है पास में ही तो रेवली गुरुकुल है सोनीपत में आप वहां जाइए पढ़िए बड़ा मजा आएगा आपको पढ़ के आप आनंदित हो जाओगे शंकराचार्य और रामानुजाचार्य द्वारा जो गुरुकुल चलाए जा रहे हैं वहां पर प्रामाणिक रूप नहीं है देखो अब हमें कोई बताए तो पता चलेगा ऐसे आप कुछ भी किसी को कुछ मानोगे तो कैसे होगा
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01:26:06:12 आप आप जो मूर्ति पूजक हैं जो वेदों का अर्थ मूर्ति पूजा बताते हैं उसको प्रामाणिक मानते हैं क्या? नहीं नहीं मानते। तो फिर मैं ये तय कैसे करूं कि वो प्रामाणिक नहीं है। आप प्रामाणिक हो। हां ये तो भाषा के नियम तय कर देंगे। अब अब किसी ने कहा मैं सुनो मेरी बात। अभी एक एक एक मिनट इसका मतलब आपसे मुझे जो है प्रामाणिक रूप से अध्ययन करने से पहले मुझे ज्ञात होना चाहिए कि जो है नियम क्या है। जी
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01:26:35:01 भाई साहब इसको अन म्यूट करो ना पहले आप। एक मेरी बात सुनो आप। एक शब्द है संध एक मिनट एक मिनट कुछ हो गया है आप जो रिमूव हो गया हेलो ये क्या हो गया हेलो ये इनको स्टेज पर लाइए ऑपरेटर जी एक मिनट आप स्टेज पे नहीं है इस समय हां आ गया जी हां बताइए बताइए एक शब्द है सेंधव सेंधव सेंधव माने नमक हम सेंधव माने घोड़ा हम एक ही एक ही शब्द के एक ही अर्थ इसके अलग है। शब्द एक ही है। सेंधव माने नमक। सेंधव माने घोड़ा। तो जब युद्ध की बात हो रही हो तो उसने कहा सेंधव लाओ। तो फिर आप नमक लाओगे कि घोड़ा लाओगे?
01:27:22:19 मैं तो घोड़ा ही लाऊंगा जब युद्ध की बात हो रही है। हां हां जी हां। और मैं भोजन करने बैठा हूं। तो मैंने कहा सेंधव लाओ तो घोड़ा लाओगे कि नमक? नमक लाऊंगा। क्या? हां। बस इसी बात से देखना होता है मंत्र किस पृष्ठभूमि में कहा जा रहा है वहां मेरी मर्जी नहीं है बेटे या किसी व्यक्ति की मर्जी नहीं है कि उसका मनवाना मरोड़ के कोई भी अर्थ निकाल दे वो यही तो मजेदार बात है इसी कारण वेद बचे हुए हैं नहीं तो इसका कुछ का कुछ हो जाता अब तक ठीक है इनमें मनुष्य का दखल है ही नहीं आप जो अर्थ करोगे वो ऐसा नहीं होगा कि मैं इस मंत्र का कुछ पूर्वाकर पूर्वापर संबंध भी होता है [हंसी] कोई चला रहा माने कोई सूक्त है उस सूक्त का नाम है अग्नि सूक्त तो उसमें मुख्य विषय वही रहेगा देवता रहेगा उन सब का मुख्य विषय वही रहेगा तो उससे हम यह पता कर लेंगे कि इस मंत्र का देवता तो अग्नि है और ये अर्थ कर रहा है जल पर या दूसरी चीजों से परख तो ये बना ही नहीं अर्थ परंपरा से अपने आप इसका मतलब मुझे प्रामाणिक रूप से वेद पढ़ने से जाने से पहले मालूम होना चाहिए प्रामाणिक रूप से वेद क्या है हां आपको बड़ी संस्कृत पढ़नी पड़ेगी बेटे ये तो है ही है ऐसे कैसे पता चलेगा प्रामाणिक रूप से वेद वेद पढ़ने जाने से पहले मुझे मालूम होना चाहिए प्रामाणिक रूप से वेद क्या है? मतलब पहले ही
01:28:38:02 मालूम होना चाहिए। आप फिर
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01:28:39:08 वही बात कर रहे हो। आप तो कह रहे हो स्कूल जाने से पहले पता चलना चाहिए कि स्कूल प्रमाणिक है कि नहीं। ऐसा नहीं होता। वो प्रमाणिक ही है। आप ही तो कह रहे हो। आप जाओ पढ़ो तो पता चलेगा। आप जाके तब जाके पता पढ़ो ना बेटा। तब पता चलेगा। मुझे बताइए ना कि मैं शंकराचार्य के यहां क्यों ना जाऊं और आर्य हां अब मैंने बता तो दिया आपको कि इसमें जो जो रिफरेंट और कॉन्टेक्स्ट चल रहा है किस विषय में कौन मंत्र जा रहा है उसी विषय व्याख्या होगी जो उसके विरुद्ध व्याख्या करेंगे तो वो व्याख्या नहीं मानी जाएगी ये तो स्पष्ट सी बात है संजीव जी ये तो तब है ना जब मुझे मालूम हो कि वेद में क्या चल रहा है क्या नहीं चल रहा है ये तो तब होगा ना अभी तो मैं न्यूट्रल है मुझे तो कुछ पता ही नहीं ना कहां वेद में क्या है क्या नहीं है तो मैं कैसे निर्धारित करूंगा कि ये प्रामाणिक है जाने आने से पहले यह तो आप जो बोल रहे हो तब है जब मैं अंदर जा चुका हूं और मुझे मालूम पड़ गया क्या है क्या नहीं है उसमें
⬜ Not used yet · 01:29:26:24 – 01:29:52:14 (0:26)
01:29:26:24 क्या लिखा है किस रेफरेंस में बात चल रही है किस कॉन्टेक्स्ट में बात चल रही है ये तो तब की बात है जब मुझे मालूम ही नहीं है कि वो खाना खाने के विषय में बात चल रही है या युद्ध के विषय में बात चल रही है तो मैं कैसे तय करूंगा कि नहीं यहां पर इन्होंने नमक की जगह घोड़ा घोड़े की जगह नमक किया है अभी तो मैं बाहर हूं ना वेद से तो मैं कैसे डिसाइड करूं कि ये प्रामाणिक है जी आपने कहा अभी कैसे
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01:29:52:14 डिसाइड करूं तो उसके लिए पढ़ो उनको बस पढ़ने से ही पता चलेगा आपको पढ़ना
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01:29:56:19 पड़ेगा ऐसा कोई प्रकार नहीं है कोई उपाय नहीं है कि मैं कुछ दे दूं आपको आपके हाथ में कुपुड़िया आ जाए ऐसा कोई उपाय नहीं है मैं आपको आप कहो जी मुझे अंग्रेजी की पोयम बनानी है तो बेटे पहले भाषा का ध्यान करो दो चार कवियों को पढ़ो और उसके बाद राइमिंग वर्ड सीखो तो आपको आ जाएगा अब आप चाहते हो कि मैं वेद बिल्कुल नहीं जानता आप मुझे बताओ वेद कैसे जानू जाके पढ़ो बस ऐसी जानो और कैसे जानोगे जैसे आपने इतनी बात करना जान लिया कैसे जाना तो यानी कि ब्रह्मा कुमारी के पास जाकर के वेद अगर वो पढ़ाने का दावा कर रही तो वहां पढ़ लूं पढ़ लो जाओ देखो कोई बुद्धि ईश्वर ने इंसान की भी तो दी है इंसान तो दी है तर्क भी तो है दर्शन भी तो है अरे सिर्फ वेद थोड़ी है साथ में दर्शन भी है साथ में उपनिषद भी मेरी मेरी जानकारी में जो बुद्धि है वो ये है कि जिससे हमें वेद मेरी बात सुनो मेरी बात सुनिए आप पहले आप ये मेरी मेरी जानकारी शब्द छोड़ दीजिए। मेरी जानकारी में है। फला की जानकारी में नहीं। आप एक निश्चय बात करो। तो इधर आपकी जानकारी आपकी या मेरी जान मैं कहूं जी मेरी जानकारी कोई मेरी जानकारी नहीं। मैं कहता हूं जो ऋषि कहता है जो जो वेद की संरचना उस हिसाब से है। मेरी मर्जी नहीं है। जहां मेरी मर्जी आएगी वहां स्वार्थ आ जाएगा। वहां चीजों में बदलाव आ जाएगा। वहां चीजें गड़बड़ांगी।
01:31:12:04 मनुष्य तो शरारती होता है ऋषी होते हैं वो निर्द होते हैं। तो आप मुझे निश्चित जानकारी दीजिए कि मैं किस किस जगह जाऊं वेद पढ़ने प्रामाणिक रूप से आप रेवली चले जाए गुरुकुल रेवली चले जाए आप कह रहे हो ना प्रामाणिक किसी को प्रामाणिक मानने की जाके देखोगे तो बेटे ऐसे थोड़ी होता है अब आप बताओ जी प्रामाणिक मैं आप कहो कि मैं पानी पीना चाहता हूं मुझे बताओ प्रमाणिक पानी कहां है ये क्या बात हुई हर हर पानी प्रमाणिक जाओ नदी में जाके साफ सुथरा पानी पी लो उसका फैसला भी तो करोगे मैं कहूंगा सुनो मैं कहूं गंदे नाले का पानी पी लो पी लोगे आपकी आंखें हैं दिख रहा अरे तो मामला खराब है और एक स्वच्छ बैरा तो आप ही लोगे तो इसमें क्या प्रमाण है? अब मैंने आपको जगह बताई कि रेवली जाओ पढ़ो रेवली जाकर पढ़ो। अब आप रेवली जाकर नहीं पढ़ोगे। आप सोचोगे कि मैं यही बैठे-बैठे बता दूं आपको सारा कुछ वो संभव नहीं है। आपको
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01:31:59:27 एक बड़ा लंबा समय देना होगा। बट ढंग से उसको पढ़ना होगा और अपने आप चीजें स्पष्ट हो जाएंगी। कुछ भी नहीं। इतनी बहस इसलिए करनी पड़ रही है क्योंकि परंपरा से जो पठनपाठन की जो विधि है उस तरह से नहीं पढ़ा गया है। इसलिए बहस हो रही है। तो परंपरा क्या है आर्य समाज की? वही तो पूछ रहा हूं। रेवली गुरुकुल में जा रेवली गुरुकुल किसी भी गुरुकुल में चले जाओ आर्य समाज से जुड़े हुए। देखिए आप अब यहां पर देखिए क्या हो रहा है। आपने कहा कि आपको किसी को गुरु को प्रमाण मानने की आवश्यकता नहीं है। परंतु जब मैं पूछ रहा हूं आपसे कि कौन सा गुरुकुल प्रमाणिक है तो आप अपने आप को प्रमाण रूप में वहां ज्ञापित कर रहे। हां देखो क्या है हमें ये भी देखना है कि कहां पठनपाठन विधि पूर्वक हो रहा है। वेदोक्त विधि जो पठन पाठन किया आप ये चाहते हो आप ये चाहते हो कि मैं आपको प्रमाण मान लूं। आप ये चाहते हो कि मैं आपको प्रमाण नहीं मुझे नहीं बेटे मुझे नहीं फिर गलती कर रहे हो आप। मुझे क्यों प्रमाण मान रहे हो? मैं थोड़ी प्रमाण हूं। मैं नहीं मैं नहीं जो लोग इस विषय में परिश्रम कर रहे हैं जिन्होंने जीवन खपाया है उनके पास जाओ उनके
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01:32:58:12 पास जाओ थोड़ी कोई सड़क चल आदमी कुछ भी कहने लगे आप जो बीटेक करना चाहते हो तो किसी जाके आर्ट के स्कूल से थोड़ी बीटे होगी बीटेक के कॉलेज अलग है इंजीनियरिंग और दूसरी मेडिकल के अलग है तो ऐसे जाके जाके देखना पड़ेगा आपको विद्याएं तो सीखने से आती है बेटे कैसे तय करूं जाने से पहले कि आप जाओ ना यार तय कैसे करोगे आप जाओ ना वहां जाके पढ़ो आप कह रहे हो मैं तय करूं कैसे आप स्कूल स्कूल जाते हो जैसे
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01:33:21:10 तय करते हो स्कूल जाके आपके द्वारा बताया मैं क्यों जाऊं आपके द्वारा बताए हुए मैं क्यों जाऊं किसी और में मत जाओ मत जाओ फिर आप ये तो आपकी यानी कोई यानी कि कोई निश्चित नियम नहीं है आपके पास पहचान फिर वही मैंने आपको निश्चित नियम बताया कि ऐसे पढ़ लो आप कह रहे मैं आपको ये बात मानूंगा नहीं तो फिर मैं कैसे आप कह रहे हो कि मैं मुंह से नहीं खाऊंगा मैं कान से खाऊंगा मुझे प्रमाणित करो कि मुंह से ही खाना होता है आप मुझे प्रमाणित करो कि मुंह से ही खाया जाता है ये क्या बात है आप आप नियम नहीं बता रहे हो आप सीधे बोल रहे हो वहां चले जाओ नियम नहीं है
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01:33:50:26 बेटे पद्धति तो है ना आप स्कूल तो गए हो ना बच्चे आप स्कूल गए हो पढ़ने के लिए इतने वर्ष भाषा सीखी तब तो बातचीत करनी आई ना ऐसे संस्कृत पढ़नी भी आ जाएगी जैसे आप जाओगे तो आ जाएगी वो कोई ऐसी बड़ी बात नहीं मैं पूछ रहा हूं कि आपने मुझे शास्त्रोक्त कोई विधि तो बताई नहीं है कि वहां अरे विधि तो वो बेटे वो बताएंगे ना मैं कैसे विधि बताऊंगा आपको तो फिर वहां मैंने बता दिया आपको सुनो नहीं जाने से पहले मेरी बात सुनो आप कह रहे हो जाने से पहले मैं उसको मैं उसको प्रमाणिक क्यों मानू ये पूछ रहा हूं ना मानू आपके प्रमाण मानने से क्या है आप नहीं मानोगे तो कोई चीज प्रमाणिक नहीं होगी आप कल को कहोगे मैं तो गणित को नहीं मानता मैं सूर्य को कुछ नहीं मानते इस संसार में ऐसे बहुत से लोग हैं वो कहते हैं सूर्य कोई चीज देवता ही नहीं है तो फिर आप ठीक है वो नहीं है तो नहीं है बात खत्म आप उनको कैसे मनाओगे आपके
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01:34:37:10 पास निश्चित निश्चित नियमावली नहीं है प्रमाणिक अथवा अप्रामाणिक में अंतर करने की मेरी बात सुनो मैं तो आपको बता रहा हूं जो ऋषियों के द्वारा दी गई चीजें वो प्रमाणिक है जो मनुष्य के द्वारा प्रचलित है वो अप्रामाणिक है तो कैसे पता पता करें। ये ऋषियों के द्वारा दिया गया है जो आर्य समाज बता रहा है। पढ़ो पढ़ो अध्ययन ही इसका एकमात्र उपाय है अध्ययन। ये जो आप कर रहे हो ये वाघ विलास है। वाग विलास इसके अलावा कुछ नहीं है। आप एक स्टैंड लेके बैठे हो और आप तय करके बैठे हो कुछ मुझे ऐसा ही करना है। तो फिर ये तो इसका तो किसी के पास भी इलाज नहीं होता। यानी यानी कि मैं इंटरनेट खोलूं वहां से वेद डाउनलोड करूं और पढ़ लढू। पढ़ो पढ़ो पढ़ो कहीं भटकोगे कुछ उलटम पलटम करोगे तो कुछ शायद समझ में भी आए ये आपकी इच्छा है ना बेटा आपको स्कूल जाना है मैं सेंट मैरी में जाऊं मैं डीएवी में जाऊं मैं सनातन धर्म वाले में जाऊं जिसे मर्जी जाओ पढ़ो पढ़ना ही उपाय है और कोई उपाय नहीं आप सोचो
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01:35:30:00 मैं ही सिद्ध कर दूं ना मैं प्रमाण हूं मैं एक मनुष्य हूं और मनुष्य होने के नाते जितनी जानकारियां मैंने जुटाई है इधर उधर से पढ़ने पाठन करने से वही जानकारियां आपको उतना ही समय लगेगा आप ये ना समझे कि आप गलत जगह भी जाइए अगर आपको ऐसा लगता है ना कि मेरे जगह से नहीं जाना है तो आप जहां जाना चाहते हो वहां जाके पढ़ लो। पढ़ो तो सही। आप मुझे आप मुझे सिद्धांत नहीं बता रहे हैं ना। सिद्धांत तो बताइए कि [हंसी] आपके द्वारा बताई गई जगह को क्यों चुने? मैं आपको सारी बात बता चुका हूं। जब इस पडकास्ट को आप या जो भी कर रहे हो इसको रिकॉर्ड किए इसको आप सुनोगे तो आपको सब पता चल जाएगा। अब एक दो तीन चार की गिनती है। आप कहो जी पहले मुझे प्रमाण दो कि एक दो तीन चार है और किसी से तब मैं शुरू करूंगा पढ़ना। ऐसे नहीं होता। हां तो इसका मतलब किसी पे मुझे विश्वास करना है ना किसी पे हां तो जिस पे भी विश्वास करके पढ़ो पढ़ो बिल्कुल पढ़ो ना अरे स्वामी कहते हैं कि अगर वो पुराण ना पढ़ते तो उनको ये भी ना पता चलता कि इसमें क्या है वो तो कहते तभी समझ में आएगा क्या ठीक है क्या बुरा मैं कह रहा हूं वही मैं कह रहा हूं दयानंद जी ने किस पर विश्वास किया था ईश्वर पे नहीं ईश्वर मुझे मुझे आप ईश्वर के पास भेज रहे हो क्या [हंसी] आप चले जाओ उन्होंने ईश्वर को आगे 17 साल लगाए पहले तो उन्होंने अपने आप को शुद्ध किया फिर उनको पता चला पढ़ना है तो चले
01:36:45:08 गए दंडीजानंद जी के पास उस समय जो व्याकरण पढ़ाया करते थे उस समय स्वर्णानंद जी ने कहा कि व्याकरण पढ़ाने वाले भारतवर्ष में सबसे बढ़िया व्यक्ति है तो वहां चले गए पढ़ने अब वो कहे नहीं जी पहले तो मुझे ये बताओ ये प्रमाणिक है क्या भाई जब जाओगे पढ़ोगे बेटे खाओगे तो पता चलेगा ये रोड़ा आ गया ये चबाने योग्य नहीं है इसको थूक दो ये खाने योग्य है इसको खा लो सबकी बुद्धि इतनी काम करती है यहां कोई कुछ नहीं यहां जितना आप फैला रहे हो उतना है नहीं कुछ भी दो परंपरा है एक साकार परंपरा एक निराकार परंपरा आपकी इच्छा है आपको शरीर के रूप में लेना तो आप साकार हो आत्मा के रूप में ले तो आप निराकार हो और भारत की परंपरा है इसमें इतनी लंबी बहस करने का कुछ मतलब है नहीं ठीक है नहीं आपने जैसे कहा ना कि खाने पे पता चलेगा तो बात ये है कि जो खाने पे पता चल रहा है कि ये खाना नहीं है रोड़ा है ये हमको व्यवहार जगत में ही हम इसका निर्णय कर सकते हैं मगर ऐसे ही हो जाएगा उसका भी हो जाएगा जिसको हम जिसको हम वेद विद्या मान [गला साफ़ करने की आवाज़] करके मोक्ष की कामना कर रहे हैं वो व्यवहार जगत में हम लोग सिद्ध नहीं कर सकते उसमें तो हमें किसी ना किसी क्यों नहीं कर सकते क्यों नहीं सिद्ध कर सकते क्यों नहीं सिद्ध कर सकते बताइए क्या सिद्ध करना चाहना बताओ मुझे आप क्या पूछना कैसे सिद्ध करना उसको एक मंत्र गायत्री मंत्र गायत्री मंत्र से मोक्ष
01:38:00:12 मिल रहा है ये सिद्ध कैसे होगा सिद्ध थोड़ी होना चाहिए कैसे सिद्ध होगा [हंसी] तो इसका मतलब इसका मतलब यहां लोग रो है कि नहीं है वो तय नहीं सुनो सुनो गायत्री मंत्र से मोक्ष नहीं होता मोक्ष तो जब आपके सारे जब आप जीना सीखते हो अपने कर्मों के बंधनों को काट देते हो सारे कर्म समाप्त होते तो मुक्ति मिल जाती है उसमें गायत्री मंत्र का कुछ बीच में रोला नहीं है कि गायत्री मंत्र से ही मोक्ष मिलेगा फला मंत्र से मोक्ष मिलेगा मंत्र तो हां मंत्र तो है ना आपकी शक्तियां जो है जो बिखरी हुई है उनको आप बांध लेते हो किसी मंत्र के माध्यम से और जब वो शक्तियां बंध जाती है तो उसके अच्छे परिणाम आते हैं। अगर हम मंत्र का आश्रय ना ले तो पता नहीं आदमी क्या सोच के बैठ जाए। यह भगवान है। वो कहता है यह भगवान है। तो कुछ भी मान के बैठे मंत्र से शक्तियां बंधती है। हां जो आपकी शक्ति है आपकी जो शक्ति है वो मंत्र से एकाग्र हो जाती है। कौन सी? जो मान आपकी मन की शक्तियां है। आपकी बुद्धि की शक्तियां है। जो आपका मन एक विषय में 20 चीजें सोचता है। एक थोड़ी देर में कुछ सोचेगा, थोड़ी देर में कुछ सोचेगा, थोड़ी देर में कुछ सोचेगा। तो इसको जो बिखराव है ना जो मल्टीपल ये ट्रांसफर हो रहा है कभी इस सब्जेक्ट पर कभी इस सब्जेक्ट के कभी इस सब्जेक्ट पर उसको इन सब से हटा के एक मंत्र पर ले आओ तो अब आपके पास
01:39:15:18 एक मंत्र है अब आपका 20 विषय नहीं है जो आपके दिमाग को खा रहे थे और जिन जिन विषयों के चिंतन का कोई लाभ भी नहीं था अब अब आपके पास एक एक चिंतन है बस तो जब आप एक मंत्र के माध्यम से बहुत सारी विचारधारा जो मन में उठ रही थी तरह-तरह की उसको आपने समाप्त करके एक मंत्र का सहारा लेकर अपने आप को एक विचारधारा पे ले आए अब आपने इतना काम तो कर लिया कि आपने मन के भटकाव को इतनी जगह से कम से कम एक जगह ले आए और वहां से फिर उसको प्रवेश कराएंगे हम ईश्वर में। जब वो हमारी शक्ति एकदम इकट्ठी हो जाएगी फिर उसे ईश्वर में प्रवेश कराएंगे। तो मंत्र जो है मनुष्य की शक्तियों को मैं समझ गया। मैं समझ गया। मैं समझ गया। तो गायत्री मंत्र से बुद्धि हमारी एक जगह आ जाती है। एक तो ये माना कि मंत्र से बुद्धि एक जगह। मन के विचार दूसरी बात यह है। दूसरी बात यह है कि एक जगह आ जाने पर बुद्धि का बुद्धि का एक जगह आ जाने पर मोक्ष हो ही जाएगा। इस विषय में नहीं नहीं मोक्ष नहीं होगा। वो विषय के समझने योग्य हो जाएगी। आप समझे मेरी बात जब बुद्धि एकाग्र होगी तो गढ़ विषय को समझ पाएगी क्योंकि ईश्वर दुनिया का सबसे गढ़ विषय है। आप जो कहते हैं ना कोई कोई कहे जी मेडिकल बड़ा मुश्किल है। परमाणु मुश्किल है। संसार का सबसे मुश्किल विषय ईश्वर है और इसके लिए बड़ी सूक्ष्म बुद्धि की आवश्यकता पड़ती है। इसी को तप कहते हैं। ये बात है।
01:40:30:24 यही यही मैं कह रहा था कि वो इतना सूक्ष्म विषय है कि उसका इस तरह से हम यहां पर निर्णय नहीं कर सकते कि ये रोड़ा है या भोजन है। वो इतना सूक्ष्म विषय है। तो इसलिए ही इस विषय में हमको किसी ना किसी आप मेरी बात यह जो व्यवहारिक विषय हैं उनमें रोड़ा और भोजन का प्रमाण है। जी ईश्वर विषय में नहीं समझे आप यही बात है। जी जी ठीक है। तो मेरे ख्याल से कुल मिलाकर के हमारे पास ये नहीं है कि किसी चीज को प्रमाणिक वेद के विषय में कैसे किसी चीज को अप्रामाणिक और किसी को प्रमाणिक कैसे माना जाए। जैसे हम लोग स्कूल जाते हैं मान लीजिए तो स्कूल जाते समय या अपने बच्चे को एडमिशन दिलाते समय हम विश्वास करते हैं कि यह वही शिक्षा दे रहा है जिस शिक्षा के द्वारा हमको अभीष्ट फल की प्राप्ति होती है। तब हम स्कूल भेजते हैं। या तो हम या तो हम या तो हम हमारे पूर्वज भी उसी स्कूल से पढ़े हैं। उन्होंने वहीं से सफलता पाई है। ऐसा है। हां जी।
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01:41:26:24 हां जी। तो दयानंद जी के पूर्वज कौन थे जो कहां से पढ़े थे जहां से उनको सफलता मिली थी? के पूर्व कहने कहने का मतलब हम लोग यहां पे क्यों आए मैं बता दूं क्यों आए सुनो जी क्या है उनके जो पिताजी थे कृष्ण जी तिवारी औदित्य ब्राह्मण थे उनके गर्भ के अंदर वेद पाठ की बड़ी अच्छी परंपरा थी और उनको उसी समय में हां उनके यहां परंपरा थी वेद पाठ की यानी कि उनको
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01:41:53:01 वेद वेद वगैरह वेद मंत्र जो है वो अपने पिताजी से मिले हैं हां भाई पिताजी से नहीं उनके यहां ब्राह्मण आचार्य जो आदि आया करते थे उनको याद करते थे तो उनको शुक्ल यजुर्वेद उसी समय याद हो गया था। तो शुक्ल यजुर्वेद हां ठीक है। शुक्ल यजुर्वेद उनको उनके यहां आने वाले आचार्य उनको याद हो गया था। जी हां जी हां
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01:42:10:12 यानी कि शुक्ल यजुर्वेद के विषय में जो उनके आने वाले आचार्य हैं वो दयानंद जी के प्रमाण है। संगीिता उन्होंने संगीिता बताई सिर्फ संगीिता पाठ केवल पाठ। ठीक
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01:42:21:20 है। ठीक है। पाठ जो है ना वो अलग है, अर्थ अलग है। तो पहले शुद्ध पाठ होना जरूरी है। तो उनको शुद्ध पाठ सिखाया जो जैसे मंत्रों के उच्चारण करने का एक विशेष तरीका है। ऐसे नहीं कि जैसे हम बोल रहे हैं हम तो अलग बोल रहे हैं। किस किस शब्द पे आघात देना है, किस पे करना गण पाठ ये बहुत सारे प्रकार के पाठ होते हैं। तो इस प्रकार से उनको जो संगीिता पाठ है वो उन्होंने याद करा दिया। उस समय जो परंपरा रही होगी जो उनके पास थी उसे प्रमाणित कहे अपमाण कहे जो भी उनके यानी कि उनके यहां जो आचार्य आते थे उस उन पर उन्होंने बिलीव किया कि यह अगर मुझे शुक्ल यजुर्वेद के पाठ बता रहे हैं तो ये ये सही बता रहे हैं। ठीक है। हां। हम अब अब ये बताइए जो शिवलिंग की पूजा है वो उनके घर में होती थी ना? हां बिल्कुल होती थी। तो वो जो शिवलिंग की पूजा बताई वो भी आचार्य ने ही बताई। हां परंपरा जो घर में चल रहा था वही बिल्कुल ठीक है। तो यानी कि शिवलिंग की पूजा बताने के विषय में आचार्य जी झूठ बोल रहे हैं और सुनो मेरी बात। अब एक छोटी सी बात कहूंगा। उससे आपको सब समझ में आ जाएगा। एक छोटी सी बात बस। एक अंधे अंधी की शादी हुई। अंधे अंधे की शादी हो गई तो अब समस्या यह रही कि दोनों अंधे खाना बनाए तो कुत्ता
01:43:36:28 आकर मुंह मार जाए खाने में तो क्या करें तो उन्होंने फिर वो एक योजना बनाई कि तुम ना यहां कुर्सी पर बैठो और मैं जब खाना बनाऊंगी तो बांस फड़फड़ाते रहा करो जमीन पे ऐसे बजाते रहो ताकि पशु आदि ना आए तो ऐसे करके उनके यहां चलने लगा काम कालांतर में उनके संतान हो गई संतान थी आंखों वाली हम लेकिन आंखों वाली थी तो वो भी यही देखती थी कि जब खाना बनता है तो पिताजी बांस फटाने लगते हैं। तो फिर वो बड़ा हुआ। उसका विवाह हो गया। उसकी पत्नी भी आंखों वाली थी। वो भी आंख वाला था। अब उसकी पत्नी लगी खाना बनाने। तो उसने क्या करा कि वो बांस उठा के ऐसे फटपटा के बजाने लगा। तो उसने कहा अच्छा जी ये क्यों बजाते हो? तो कहा जी देखो मुझे तो पता नहीं ये हमारी ना परंपरा है। मेरे पिताजी बजाया करते थे और भोजन के समय बजाते थे तो मुझे भी इसको बजाना ही है। तो जिस रूप में वो क्यों बजाते थे कि वो अंधे थे बेचारे इसलिए बजाते आंख वाला भी बजा रहा है। इसीलिए बजा रहा है कि उसने विचार तो किया नहीं। क्यों बजा रहे हैं? वो बजा रहा है। तो ऋषि दयानंद ने उस समय चीजें पढ़ी तो सही। बाल बुद्धि से जो उपलब्ध था वो पढ़ा। लेकिन एक बात आप ध्यान रखना वही ऋषि दयानंद सरस्वती जिसे आप आज मूर्ति पूजक कहना चाहते हो जिसे आज आप शिवलिंग का पुजारी कहना चाहते हो। उसी व्यक्ति ने सारा जीवन लगा दिया उधेड़ने में इन सब चीजों को। वो समझ गए। उनको ये समझ आ
01:44:52:00 गई कि ये सब चीजें मैं ना आपने आप वही आ रहे हो। मुझे पता है आप ध्यान रखो इस बात का आप आप दुनिया को बहलाओ मुझे नहीं बहला सकेंगे आप मैं आपके हर शब्द को पकड़ रहा हूं मुझे हर चीज का आपकी बिल्कुल पूरा अंदाजा है आप क्या योजना बनाए मुझे इतना भी पता है जब आप कहते हो कि कोई ब्राह्मण आया उसने सिखाया वो प्रमाणिक था कि नहीं था फिर आप वहां घुस जाते हो जाके भाई साहब आपके परिवार में शिवलिंग के आपको भाई साहब आप प्लीज मुझे बोलने दीजिए आपसे निवेदन है मुझे प्लीज बोलने दीजिए बोलने दीजिए आपसे निवेदन है विनम्र सुनिए आपने एक उदाहरण दिया है फिर से आपने वही सही उदाहरण दिया है लौकिक वाला उदाहरण कि हम लौकिक चीजों से पता कर सकते हैं क्या सही है और क्या गलत है क्योंकि वो हमारा इंद्रियों का विषय है मगर धर्म और ब्रह्म का जो विषय है वो हमारी इंद्रियों का विषय नहीं बहुत सूक्ष्म है तो उसमें हम बुद्धि लगाएंगे बुद्धि लगाएंगे मगर एक जगह जाकर के हमें शब्द प्रमाण मानना पड़ेगा ना किसी को और शब्द प्रमाण तो अपने आप में आप कैसे किसी को शब्द प्रमाण मानोगे शब्द तो मनुष्यों के आने से शब्द के बाद शब्द आए उससे पहले किस रूप में था मैं कह रहा हूं अरे भाई मेरी बात सुनो बेटे जिससे हम वेद मंत्र ले रहे हैं जिससे हम वेद मंत्र ले रहे हैं भाई साहब यदि हमें
01:46:07:13 नहीं अरे आप बीच में जब आप बोलते हो सुनिए ऐसा है जब आप बोलते हो तो आप मैं आपको सुनता हूं पर मैं जब आपसे कुछ बोलना चाहता हूं आप बीच में इंटरप्ट कर देते हो ये बात है मुझे बोलने तो दीजिए अपनी बात बोलूं मैं आप इंटरप्ट ना करो मैं एक बार बोलूं अपनी बात जी तो ऐसा है कि जो छन्नी वाली बात है वो हम देख पता कर सकते हैं कि वहां पर क्या सही है और क्या गलत क्योंकि वो हमारी इंद्रियों का विषय है मगर जो धर्म है आपने भी कहा धर्म ब्रह्म वो अति सूक्ष्म विषय है तो उसमें हम अपनी इंद्रियों से स्वतंत्र रूप से व्याख्या नहीं कर सकते कि अगर हमने किसी से वेद का मंत्र लिया तो हम सुनो मेरी बात एक धर्म ये कहता है कि मनुष्यों की हत्या कर दो। आप भाई साहब मुझे आप मुझे बोलने दीजिए। प्लीज पूरा बोलने दीजिए। आप बीच में रोक देते हैं। मुझे बोलने दीजिए। तो ऐसा है कि सीधी सी बात है जब सूक्ष्म विषय है तो उसमें शब्द ही प्रमाण है। जैसे कि बुद्धि का मैं बताऊं आपको सत्यार्थ प्रकाश में एक जगह आया नियोग विषय। वहां पर जब पूर्व पक्ष रखते हुए दयानंद जी ने यह बताया कि यह व्यभचार जैसा लग रहा है। मतलब वहां पर पूर्व पक्ष को रखने वाला एक व्यक्ति मान लीजिए तो वो क्वेश्चन कर रहा है कि जो नियोग
01:47:22:21 है मुझे व्यभचार जैसा लग रहा है। तो वहां दयानंद जी ने कहा कि भैया जिन विषयों में शास्त्र ही प्रमाण है उसको शास्त्र को ही हमको प्रमाण मानना पड़ेगा। वहां पर अपनी बुद्धि काम नहीं कर सकती है। सीधी बात ठीक है? तो इसी तरीके से यह जो धर्म और ब्रह्म का विषय है यह अति सूक्ष्म विषय है। तो इन विषयों में हम लोग लौकिक दृष्टि से स्वतंत्र रूप से तय नहीं कर सकते कि क्या सही है और क्या गलत है। तो ऐसे में ये जो ये है किस लिए वैसे भाई साहब एक मिनट मुझे पूरा करने लेने दीजिए। मुझे पूरा मुझे पूरा तो करने दीजिए। मेरी बात पूरी होती ही नहीं है। मुझे पूरा करने दीजिए प्लीज। मेरा निवेदन है आपसे। पूरा तो करने दीजिए। बहुत अच्छा चल रहा है चर्चा। फिर
01:48:06:26 आप मुझे मेरी लाइन तो पूरी करने दीजिए भाई साहब। नहीं नहीं नहीं [गला साफ़ करने की आवाज़] सुनिए आप सर मैं आप देखो अगर आप ऐसे बोलेंगे और एक बिल्कुल ही और आप ना बहुत भाई साहब मेरी बात पूरी हो जाने दीजिए भाई साहब मेरी बात पूरी हो जाने दीजिए मैं यह कह रहा हूं बात तो पूरी होने दीजिए भाई साहब आप बीच में बार-बार बोलते हैं मैं कितनी विनम्रता से आपसे निवेदन कर रहा हूं मेरी कोई लाइन आप पूरी नहीं होने दे रहे हो चलिए मैं पूरी कर लेता हूं तो ऐसा है कि जो अति सूक्ष्म विषय है उसमें उसमें हम स्वतंत्र रूप से व्याख्या कैसे करेंगे? उसमें तो हमें शब्द ही प्रमाण मानना पड़ेगा। और जब शब्द को प्रमाण मान रहे हैं। जैसे
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01:48:45:25 मान लीजिए हमने किसी आचार्य को ये माना कि इससे हमारे पास यजुर्वेद आया है। वही आचार्य बता रहा है कि भैया यहां शिवलिंग की पूजा हो रही है। वेदों के अनुसार हो रही है। और हम कह रहे और हम ये कह रहे हैं कि नहीं इस विषय में तुम झूठ बोल रहे हो। तुम अंधे हो। हमें पता है कि यहां पर जो है जो है गलत है। तो अगर वह हमसे झूठ बोल सकता है तो वह हमको गलत मंत्र भी दे सकता है। और यदि वो हमें सही मंत्र दे रहा है हमें विश्वास है तो फिर हमें उसके अर्थ पर भी विश्वास करना होगा। मेरा
⬜ Not used yet · 01:49:13:08 – 01:50:30:24 (1:18)
01:49:13:08 ये कहना है बस। जी जब आप ऋषि दयानंद को एक मूर्ति पूजक के रूप में मान रहे हो। [गला साफ़ करने की आवाज़] बचपन में वही व्यक्ति प्रबुद्ध हो के मूर्ति पूजा का खंडन कर रहा है तो आप अपनी चॉइस से उसको उसी समय का प्रमाणिक मान रहे हो। निराकार नहीं मान रहे आप अपनी चॉइस से चल रहे हो ये मेरी और ये ध्यान रखना अब आप कहते हो धर्म और विज्ञान जो धर्म और ईश्वर सूक्ष्म विषय है पर एक बात ध्यान रखना ये अपने व्यावहारिक को ही शुद्ध करने के लिए है ईश्वर केवल ईश्वर के लिए नहीं है धर्म केवल धर्म के लिए नहीं है ये हमारे दैनिक जो नित्य व्यवहार है उनको शुद्ध करने का कारण है आप इसको व्यवहार को लौकिक को और इसको अलग मत करो जो धर्म और ईश्वर है वो मनुष्य के व्यवहारों को ही शोधित करने के लिए यह अलग से कोई विषय नहीं है। आप ना कहे कि लौकिक ऐसा है वहां ऐसा है। आप एक तरफ में उसे प्रमाण मान रहे हैं। वही व्यक्ति थोड़े समय के बाद एक दूसरी बात कहता है। आप कहते नहीं अब ये प्रमाण नहीं माना जाएगा। आप कह रहे हैं कि गुरु ने उससे सीखा तो उन्होंने कहा ऐसा ही है। उसके बाद वो कुछ और कहने लगे तो आप ना डिपार्टली इसको ना बांट कर ना देखिए। आप बांटिए मत एक मैं समझ गया। कुछ और तरह का था और बाद में उसकी बुद्धि का विकास हुआ तो उन्होंने दूसरी बात कही। तो ये बात और कुछ बात ठीक ठीक अब मैं यह
01:50:28:09 कहना चाहता हूं इस बात पर आपकी कि अच्छा
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01:50:30:24 मेरी समय क्या हो गया समय समय एक मिनट समय एक घंटे 50 मिनट हो गई हमारी चर्चा तो अब ना फिर इसको अगले उसमें रखें सत्र में ठीक
⬜ Not used yet · 01:50:40:24 – 01:51:27:06 (0:46)
01:50:40:24 है बस मैं अपनी एक बात कह दूं फिर अगले सत्र में रखते हैं मैं कोई बात नहीं मैं मैं दयानंद जी को नहीं कह रहा था कि दयानंद जी जो है पहले मूर्ति पूजक थे ना मैंने कहा कि उनके यहां जो आचार्य आते हैं जिससे उन्होंने मंत्र लिए वो वहां पर बाद में उन्होंने मंत्र की दूसरी व्याख्या की। अब आप कैसी बात कर रहे हो? मतलब मैं आप इतनी छोटी सी बात को बहुत बड़ी-बड़ी करके करके समय नष्ट कर रहे हो। ये बात इतनी है ही नहीं। आप कह रहे हो एक आचार्य आए। उन्होंने कैसे प्रमाण उन्होंने स्वयं ही बता दिया कि ये बात गलत थी। अपने कौन से आचार्य आए थे? जो उनके परिवार में सुनो बेटे नाम नहीं होता। उनके वहां लिखा है जीवनी में। कोई आते होंगे उनके परिवार में जो भी व्यक्ति आते हो किसी का नाम थोड़ी है वहां लिखा होगा। नहीं होता तो ये हिस्ट्री है कि वो ये हिस्ट्री है कि बाद में उन्होंने ये कह दिया कि नहीं नहीं गलत था
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01:51:27:06 वो सुनो जैसे जब उन्होंने व्याख्या करी तो आप इसी से बेटे अंदाजा लगाओ कि उनके पिताजी रहे शिवजी के पुजारी बिल्कुल घोर और बड़े बड़े अच्छे वाले मतलब जिनको आप कह सकते हो बिल्कुल शव मत के बड़े अच्छे वो मानने वाले थे और उनकी शिव जी के प्रति बड़ी आस्था थी। इसमें कोई खराब बात भी नहीं है। लेकिन ऋषि दयानंद सरस्वती जी ने अपने पिता के द्वारा जो उनकी परंपरा से था, अच्छा था, बुरा था, उन्होंने ठीक गुरु से समझा कि गलत गुरु से समझा हमें नहीं पता। लेकिन ऋषि दयानंद सरस्वती ने 17 18 वर्ष लगाए इस बात को जानने के लिए कि जो ये जो चल रहा है ये युक्ति संगत तर्क संगत है कि नहीं?
⬜ Not used yet · 01:52:06:12 – 01:53:00:00 (0:54)
01:52:06:12 व्यावहारिक है कि नहीं? यह चीजें वैसी है कि नहीं जैसी कही जा रही है और 181 19 वर्ष उन्होंने तपस्या करी जिसमें उन्होंने लगभग 17 बार विष पिया जहर का भी उनको 17 बार जहर दिया गया कि व्यक्ति चुप कर जाए ना बोले तो लेकिन वो फिर भी लोक कल्याण के लिए गए। अच्छा उन्होंने एक और मैं बात बताऊं आपको ऋषि दयानंद सरस्वती स्वयं लिखते हैं कि मैं कोई नई मत परंपरा नहीं शुरू करना चाहता। मेरा वही मान्यता है जो ब्रह्मा से ले जैमिनी पर्यंत ऋषियों ने कहा है। वो स्वयं लिखते हैं। ब्रह्मा कुमारी वाले भी कहते हैं। ये चलो कहते होंगे देखो मेरी बात सुनो जी या तो आप ब्रह्मा कुमारी वाले को लेके आओ। आप सबके ठेकेदार मत बनो। ये फलाना भी कहता है ढिमका आप किस वर्ग से हो मुझे उस वर्ग की बात करो। ऐसे बातें बिखर जाती है। वो कहते होंगे मुझे क्या पता। कोई कहेगा जी मैं तो हाथों के बल चलता हूं तो पैरों के बल चला ही नहीं जाता। अब तो मैं हाथों के बल चला तो चले भाई। इसमें क्या अब किस बात को ले तर्क करो। अच्छा चलिए छोड़िए मैं वो मैं वो कह
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01:53:00:00 रहा हूं कि दयानंद जी ने जिससे वेद मंत्र लिए उस पर दयानंद जी को विश्वास नहीं था बाद में उन्होंने वेदों की स्वतंत्र व्याख्या की अपनी बुद्धि से ठीक है अब उन विश्वास नहीं था उस समय तो उन्होंने याद कर ही लिया था ना एक मिनट आपने कहा एक जगह कि हमें परंपरा से पठनपाठन करना चाहिए पर आप वहीं पर दूसरी जगह कह रहे हैं कि दयानंद जी ने परंपरा से पठनपाठन नहीं किया क्योंकि उनके यहां की जो परंपरा थी उसके विरुद्ध उन्होंने 17 साल जाकर के पढ़ाई की और जो है उन्होंने अपना स्वतंत्र हां बिलकुल बिलकुल बिलकुल तो अब इसी के लिए उन्होंने जीवन लगाया और लोगों को ये समझाने की कोशिश की कि मैंने जैसे मैंने अपना जीवन नष्ट कर दिया बिना बात के तो मैं ऐसी परंपरा चीजें बना के जाऊंगा कि लोगों का जीवन नष्ट ना हो। उनको चीजें जल्दी और रिफाइन रिफाइन रूप में समझ में आ जाए। यानी कि वो स्वयं तो परंपरा को तोड़ रहे हैं। मगर आगे चाहते हैं कि लोग परंपरा को थोड़ी तोड़ रहे हैं। बेटे प्राइमरी क्लास में पढ़ने वाला बीए में पढ़ने लगे तो वो मैथ की परंपरा तोड़ रहा है। अरे पांचवी का मैथ अलग है, बीए का मैथ अलग है।
⬜ Not used yet · 01:53:59:10 – 01:54:15:01 (0:16)
01:53:59:10 आप क्या बात करते हो? कैसे परंपरा टूट गई भाई? उसने गणित के परिष्कृत रूप को समझा है। जो पांचवी क्लास में वो नहीं समझ सकता था। वो एमए में समझ पाया। उसकी बुद्धि अब आप कैसे कहोगे कि एमए वाला ठीक है कि प्राइमरी वाला ठीक है। कैसे कहोगे? अलग-अलग है। ये बीए बीए
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01:54:15:01 में जाने के बाद यह नहीं होता है कि पांचवी की पढ़ाई गलत है। यहां गलत बात है। मैंने आपको आप समझे नहीं। मैंने आपको शुरू में यह बात कही थी कि कोई व्यक्ति विग्रह पर आस्था करता है। आप आप मेरी बात समझ ही नहीं रहे। आपने दो घंटे खराब कर दिए।
⬜ Not used yet · 01:54:30:26 – 01:54:47:10 (0:16)
01:54:30:26 दो घंटे इसलिए खराब कर दिए। मैं कह रहा हूं कोई व्यक्ति विग्रह पूजा करे और अपने व्यक्तित्व का विकास करे तो वो ठीक है। मैंने आपको कहा कि कोई निरा निराकार की पूजा करे और उसका व्यक्तित्व अच्छा ना हो तो व्यर्थ है। बताओ इसमें आपके सारे उसका निष्कर्ष है। आप लास्ट में ये
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01:54:47:10 कह देते हो ना वेदों में मूर्ति पूजा नहीं है। वेद नहीं है नहीं फिर मैं तो अभी भी कह रहा हूं। वो बात को मैं आपको आप मुझसे कभी नहीं कहवा। यही है कि आप पांचवी के पांचवी की पढ़ाई को गलत बता रहे
⬜ Not used yet · 01:54:58:00 – 01:56:54:14 (1:56)
01:54:58:00 हो। बेटे वो अभी प्राइमरी वाले हो तो आप आपको ऐसे ही लगेगा यही तो गड़बड़ है। यहां क्या हो रहा है कि आप उच्च शिक्षा पढ़ना चाह रहे हो लेकिन अपना मानसिक स्तर उठाना नहीं चाह रहे हो तो वो ऐसे नहीं होगा। पांचवी के बच्चे को बीए की चीजें समझने में बाधा ही लगेगी। वो ये पूछेगा ही कि जो ये कह रहे हैं ठीक है कि नहीं प्रमाण क्या है? ये सच है कि झूठ है मुझे नहीं पता। क्योंकि उसकी बुद्धि उस विषय को ग्रहण करने के योग्य नहीं हुई है अभी। ये बात और कुछ नहीं। बेटे इसमें कोई विरोध नहीं है। आप आप ना समझ नहीं रहे बात को। आपने बात ही गलत शुरू कर दी। आप इस बात को घुमा फिरा के मूर्ति पूजा ईश्वर निराकार उसमें ले चले गए। मैंने आपको सीधे शब्दों में कहा बेटे यदि आपको आकृति प्यारी है तो आप अपने शरीर को बढ़िया बनाइए। इसको बलवान बनाइए। ये आकार है। ये बोलता है। ये सुनता है। ये देखता है। ये काम करता है। अच्छे बुरे की पहचान रखता है। लेकिन नहीं आप कहते हो मैं इस ईश्वर की बनाई रचना पे विश्वास नहीं करूंगा। मैं तो उस मूर्ति को मानूंगा जो किसी मनुष्य ने जो बनाया फिर आप फिर वही कर रहा हूं। आप ये कहने के बाद आप ये कह के आप मान रहे मानो सुनिए आप ये कह के आप आप सामंजस्य वाली बात कह के अपनी बात को बड़ी रख रहे हो। ये बात नहीं नहीं देखो अब आप कोई रास्ता नहीं देते। आपने नहीं सामंजस्य नहीं कहता मैं देखो भाई
01:56:13:03 मेरी बात सुनो। वर्तमान समय में दोनों चीज़ हैं। आपने एक लाइन एक लाइन एक लाइन नहीं आप मुझे एक मिनट बोल देते। एक लाइन में बोलने आप मुझे आप मुझे बोलने नहीं देते। सबसे बड़ी बात है। आप बोलने नहीं देते। आपने जब यह कह दिया आपने जब यह आपने जब यह कह दिया भाई साहब सुनिए तो आपने जब यह कह दिया कि भाई आप जो दोनों तरह की चीजें आपको जिसमें जो हो आपको जिसमें जो हो आपने जब यह कह दिया कि आपको जिसमें वो हो उसको आप मान सकते हो तो फिर आप यह बात क्यों कहते हो कि नहीं आपको यह समझ में नहीं आया वहां पर अब मानना नहीं है सामने वाले की वहां पर आप क्रॉस नहीं कर रहे लाइन यह कहने का मतलब मेरा जी बोले
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01:56:54:14 या तो फिर आप सिद्ध करिए अपनी चीजों को तो सिद्ध करने के नाम पर आप परंपरा बता नहीं रहे हो तर्क बता नहीं रहे हो शास्त्र कहां से आए वो बता नहीं रहे हो आप जी देखो बेटे ये जो वर्तमान में समय है ये इस बात के झगड़ने का नहीं है कि मूर्ति पूजा सही है कि निराकार पूजा सही है तुम ऐसे ही मारे जाओगे ये जो तुम कर रहे हो ना यहां बैठ के ये हम जो झगड़ रहे हैं ना तुम मुझे शत्रु फिर आप गलत तरीके से बोल रहे हैं मारे जाओगे ये सब नहीं बोलना चाहिए आप विषय विषय पर रहिए। दूसरी बात यह है लाइन को क्रॉस करके लाइन को क्रॉस करके आप हमें गलत ठहरा करके झगड़ तो आप रहे हो ना। मैं तो आपसे नहीं कह रहा हूं कि नहीं वेदों में निराकार की पूजा नहीं है। आप मुझसे कह रहे हो कि वेदों में साकार की पूजा नहीं है। तो झगड़ तो आप रहे हो। मुझे गलत तो आप ठहरा रहे हो। आखिर में कह रहे हो तुम मारे जाओगे। तो ये सब गलत बात है। भाई साहब ऐसी बातें ना करें कृपा करके। जी देखो ऐसा यही तो मजा है। कोई व्यक्ति दूसरा भी उसको देखेगा तो बड़ा ही खुश होएगा कि देखो भैया दोनों हिंदू आर्य हैं। एक अपने आप को आर्य कहता है एक अपने आप को हिंदू कहता है और आज तक ये फैसला ही नहीं कर पाए कि सही और गलत क्या है? तो ऐसे लोग अच्छा चारा बनते हैं दूसरे लोगों के लिए जो बिल्कुल जिनके सिद्धांत हो सकता है गलत हो लेकिन उस पर वो बड़ी बड़ी तत्परता से चलते हैं वो बड़े अच्छे से उसका पालन करते हैं। हम सिर्फ
01:58:09:15 बहस करते हैं। मैं इसलिए मैं ये कह रहा हूं कि मूर्ति आप कह रहे हो कि आप मूर्ति पूजा को भी सही ठहरा रहे हो। ठहरा नहीं रहा बेटे बेटे। मैं ये ठहरा रहा हूं कि भारत में बहुत से लोग मूर्ति पूजा करते हैं। क्या मैं उनसे शत्रुता कर लूं? शत्रुता कर लूं उनसे। मैं उनको स्वीकार कर रहा हूं। ये मैं उनका विरोधी नहीं हूं। देखो आर्य समाधि होने का अभिप्राय मूर्ति पूजा का विरोधी नहीं है। ये क्या बात हो गई आज? आप तो कुछ और ही सिद्ध करने में लगे हो। ये इससे तो हम बट जाएंगे और ये समय आज का समय बटने का नहीं है। आज का समय इकट्ठे होकर चलने का है। मैं मैं इस दृष्टि से सामंजस्य से बैठा रहा हूं। अपने को बड़ा दिखाने के लिए नहीं बेटे। अपने देश की रक्षा के लिए हिंदुत्व की समृद्धि के लिए। हम लोगों का एकजुट रहना जरूरी है। ये यहां ये लड़ाई मेरी और तुम्हारी नहीं है बेटे। के मैं क्या कह रहा हूं। हम और तुम क्या है यार 6 साल के बाद 10 साल मर जाएंगे। को पूछेगा भी नहीं ठीक है जो परंपरा है उसको आशा करता हूं आशा करता हूं आप लोगों को आज की चर्चा काफी मतलब कुछ ऐसी लगी हो जिससे आपको कुछ सीखने को मिले और हो सका तो हम और आचार्य जी एक बार दोबारा कभी ना कभी कनेक्ट होंगे और इस चर्चा को आगे बढ़ाएंगे आपका आने के लिए बहुत-बहुत आभार आचार्य जी बहुत धन्यवाद बहुत धन्यवाद
⬜ Not used yet · 01:59:20:00 – 02:19:55:00 (20:35)
01:59:20:00 अन्यथा ना लीजिएगा ये क्योंकि नहीं कोई बात नहीं कोई हमारे जिज्ञासा कोई बात नहीं। मैंने तो समाप्त बात ऐसी की है कि हम दोनों एक ही परंपरा से हैं। भारतवासी हैं और भगवान को मानने वाले हैं। ऐसी कोई बात नहीं है ना जी। बहुत-ब आपका आपका बहुत धन्यवाद। समय दिया। बहुत धन्यवाद। थैंक यू। धन्यवाद। तो ठीक है। हमने कई स्तरों पर बात की। लगभग दो घंटे की चर्चा हो चुकी है और सबसे पहले हमने जो निर्गुण सगुण वाला विषय था कि ईश्वर सृष्टि रचना करता कैसे है? तो वहां पे यदि जो तार्किक व्याख्या अगर मानी जाए तो भी हमारा पक्ष वहां पर मजबूत है कि अ ईश्वर को सगुण साकार सगुण निराकार अवतार लेना पड़ेगा। तब वो जो है सृष्टि रचना करेगा। कहीं पर शक्ति के रूप में क्रियान्वित होगा, कहीं पर नहीं होगा। कहीं पर कम होगा, कहीं पर ज्यादा होगा। इतना तो मानना ही पड़ेगा। और इसके बाद थोड़ा लिंक दे दीजिए अगर जो कुछ वैचारिक मतभेद के निमित्त तो नहीं मगर थोड़े से विचार प्रकट करने हो तो
02:00:37:24 [खांसने की आवाज़][गला साफ़ करने की आवाज़] जुड़ सकते हैं वैसे काफी देर हो गई है और मैंने सोचा था कि इस कन्वर्सेशन को बहुत हेल्दी बना करके चल चलना है तो मैंने पूरा प्रयास किया तो इसमें भी आप लोगों का मुझे वह चाहिए होगा भाई कॉम्प्लीमेंट वगैरह कि कैसी लगी आपको यह चर्चा जो है इस तरह की चर्चा जो हुई है अभी अच्छा तो मुख्य बातें मैं आपको बता दूं कि पहली बात तो वो सगुण निराकार वाली है कि ईश्वर अगर हम तर्क के रूप से देखें तो ईश्वर की व्याख्या माननी पड़ेगी राम अखिलेश कुमार अगर वैचारिक मतभेद के निमित्त आए हैं तो आप ना आए और वीडियो के अंत में दिए गए नंबर पर WhatsApp करें।
02:01:32:24 जी अनिकेत जी मैं एक बात पूरी कर दूं फिर आप बोलिए। है ना? तो सगुण निराकार वाली बात हमने युक्ति से बात की वहां पर केवल चेहरा लेकर आए। चेहरा आप लाएंगे साथ में तभी हम आपको स्टेज पर लेंगे और अगर वैचारिक मतभेद के निमित्त आ रहे हैं तो ना आए है ना अभी से बता दूं वैचारिक मतभेद के निमित्त ना आए इस चीज को क्लियर रखें पंडित बहुत सारे लोग आ रहे हैं चलिए मैं अपनी बात पहले पूरी कर दूं तब किसी को लूंगा स्टेज पर तो हमने जब तर्क से देखा कि यदि हम यह कहते हैं कि जो सर्वत्र व्याप्त है वह एक जगह कैसे दिख सकता है तो हमने उसमें बताया कि जो ईश्वर जड़ पदार्थों के लिए फोर्स का विषय बन सकता है। शक्ति का विषय बन सकता है। क्रिया का विषय बन सकता है। तो वह जो ईश्वर है वही प्रकाश के मार्ग में भी फोर्स इत्यादि के रूप में वो बाधक क्षेपक का विषय बन सकता है। पहली बात तो यदि युक्ति से देखेंगे तो इस प्रकार से यदि हम यह यहां कह देते हैं कि यहां हमें नहीं पता ईश्वर ने कार्य कैसे किया परंतु वो क्षेपक नहीं बना। तो फिर हम यह कह सकते हैं कि भैया हमें नहीं पता वह अचिंत वाली बात कि हमें नहीं पता कि ईश्वर ने अवतार
02:02:47:25 कैसे किया परंतु उसने स्वरूप को बिना परिवर्तित होते हुए भी वह प्रकट हो गया। हमारे पास युक्ति भी है और जिस भाषा में आप जैसे जो भी सामने वाला कहना चाहता है वो भी है। अब इसके बाद क्रमबद्धता से बात आ गई कि भैया ऐसे हम अपने आप नहीं मानेंगे। शास्त्र से मानेंगे। क्रम को समझिए। किस क्रम में बातचीत हुई है कि पहले युक्ति उसके बाद अचिंत शक्ति उसके बाद अब बात आ जाती है कि अब मानेंगे तो शास्त्र की कही हुई बात मानेंगे। हालांकि यह बात तब फेल हो जाती है जब हम विधर्मियों से बात करते हैं। जो वैदिक होगा वही बात मानेगा हमारी। तो ठीक है। अब दो वैदिक बात कर रहे हैं तो फिर वहां पर यह बात आ जाती है कि शास्त्र की बात मानेंगे। तो यहां पर आ जाती है कि शास्त्र का मनमाना अर्थ किसने कर रखा है और किसने नहीं कर रखा है? तो इसमें पूछा जाता है कि भाई प्रामाणिकता कैसे जांच होगी कि किसने अर्थ प्रामाणिक किया है वही अर्थ किया है जो आपको शास्त्र दे रहे हैं वो जो मानते थे वही अर्थ किया है या अपना स्वतंत्र अर्थ किया है तो अब जैसे कि उन्होंने दोनों बातें कही कि जो मैंने वही चीज मानी है जो जैमिनी मानते थे वो चीज आप तक आई कैसे है तो मैंने स्वतंत्र व्याख्या की है तो इस विषय में भी आपने देखा कि क्या बातचीत हुई है और प्रमाणिकता को पहचानने के लिए अगर यह नियम है कि हमें पहले जानना होगा कि कौन ज्ञानी है और कौन ज्ञानी नहीं है उसके लिए मुझे ज्ञानी
02:04:03:03 बनना होगा। इसका मतलब है कि मुझे पढ़ाई प्रामाणिक पढ़ाई करने से पूर्व ही पढ़ाई होनी चाहिए। तब मैं तय कर पाऊंगा कि कौन प्रामाणिक है कौन प्रमाणिक नहीं। यह सारी चर्चा का सारांश हमारा रहा। काफी देर तक और वो भी सज्जन ही थे। उन्होंने कहीं पर भी हां बस थोड़ा सा यह दिक्कत आ रही थी कि वो जब अपनी बात बोल रहे थे बहुत लंबी-लंबी बोल रहे थे और मैं जब बोल रहा था तो बीच में इंटरप्ट कर देते थे जिससे कि मेरी एक जो क्रमबद्धता से कोई भाव मैं व्यक्त करना चाहता था वो हो नहीं पाते थे हालांकि फिर बाद में विनम्रता पूर्वक और सद्भाव पूर्वक यह चर्चा पूरी हुई जी अनिकेत जी बताएं और जो अब जो जुड़े हुए हैं वह अपना चेहरा दिखाएं अन्यथा और यह बात समझ लें कि वैचारिक मतभेद के निमित्त यदि वह आए हैं तो अगली बार ही उनके साथ चर्चा होगी ऑलरेडी दो घंटे हो चुके हैं। जी एन के जी बोल जय श्री राम भैया प्रणाम जय जय श्री राम जय हो बताइए [हंसी] मैंने सुना तो मुझे तो यहां तक लगा कि एक्चुअली वो परंपरा सिद्ध नहीं कर पाए। हालांकि कर भी नहीं पाएंगे। वो खाली बात को यहां वहां यहां वहां नहीं गए। और यह बात तो मुझे जरा भी लॉजिकल नहीं लगी कि अगर मुझे मान लीजिए किसी को स्कूल में अगर एडमिशन कराना है तो पहले उसको पूरा पीएचडी करा
02:05:18:04 दूं समझा दूं फिर उसको स्कूल में भेजूं तो ये लॉजिक मुझे समझ में नहीं आया पहली बात तो ये चीज और यहां पे यहां पे यहां पे क्या है यहां पे एक अंतर और है मां-बाप स्कूल में एडमिशन कराते हैं तो मां-बाप पढ़े हुए होते हैं बच्चे की नजरिए से स्वतंत्र रूप से अच्छा बच्चा मां-बाप को भी प्रमाण नहीं मानेगा क्योंकि क्योंकि इनके केस में बच्चे को मां-बाप को भी प्रमाण नहीं मानना है। स्कूल को भी प्रमाण नहीं मानना है। तो वो किस रूप से कहेगा जाकर के कि भैया डीओ डू होता है और जिओ गो होता है। समझ रहे हैं आप? इसमें क्या बुद्धि लगाएगा? इसमें कौन सा तर्क लगाएगा कि डीओ डू होता है, जिओ गो होता है। उसको जिओ गो बोलेगा तभी उसको मार्क मिलेंगे। वो जिओ को कुछ और बोल देगा ना डीओ डू वाले तरीके से तो उसके मार्क कट जाएंगे। कटेंगे कि नहीं? जी
02:06:06:09 तो कौन प्रमाणिक है मतलब कि शब्द प्रमाण मान करके हमको फिर वहां से शिक्षा लेनी होती है और यहां पर जो शब्द प्रमाण किसे मान रहे हैं कि किसको जिस शिक्षा से हमें अभीष्ट फल की प्राप्ति होनी है और जो अभीष्ट फल देने वाला है उसने जो अभीष्ट फल देने वाला है उसने किस शिक्षा के स्त्रोतों को प्रमाणिक मान रखा है वही हमारे लिए प्रमाणिक है तो हमें यहां पे स्त्रोत प्राप्त है निर्णय करने वाला दोनों दोनों प्राप्त है। ठीक है? जी। उन्होंने एक चीज और बोला था कि हम जरूरी नहीं है कि उनके अनुसार मुझे समझ में आया कि जरूरी नहीं है कि हम दयानंद जी के ही भाष्य को पढ़कर वेद समझे। हम किसी के भी भाष्य को अब उन्होंने कहा ना कि आप इंटरनेट से पढ़िए। आपके बुद्धि है। तो ये चीज भी मुझे समझ में नहीं आई। हालांकि वो यह क्वेश्चन ही इतना अपने आप में इतना प्रबल है कि आपकी परंपरा बताइए। कि इसका उत्तर ना हो के अगर व्यक्ति को अपने आप को बचाना या तो व्यक्ति अपने आप को यह कह दे कि हां परंपरा तो नहीं है या तो व्यक्ति अपने साथ में अपने आप को सिद्ध करने के लिए यहां वहां की बात करके जबरदस्ती ले जाए। यह प्रश्न इतना प्रबल है कि आज तक कोई भी इसका उत्तर ही नहीं दे पाया कि हां मेरी परंपरा ये
02:07:21:13 है। जैसे आपने कहा ना कि ब्रह्मकुमारी भी वेद दे रहा है तो हम उसको मान ले तो उन्होंने कहा कि हां मान लीजिए। हम बिल्कुल तो हमें विश्वास प्रकट करना ही होगा। जिससे हम वेद लेना मान रहे हैं उसके प्रति विश्वास प्रकट करना होगा। अविश्वास यदि हम कहेंगे तो वहां पर जो है प्रकट करना होगा। अविश्वास यदि हम कहेंगे आपके यहां टीवी चल रहा है क्या? वहां पर अविश्वास यदि प्रकट करते हैं तो फिर हमारा उनके द्वारा प्राप्त होने वाले शास्त्रों पर विश्वास होना सिद्ध नहीं होगा। यदि हम उस पर अविश्वास करते हैं तो जो आ रहे हैं वह अपना चेहरा दिखाएं। यह भाई साहब आ तो गए हैं मगर चेहरा बहुत अंधेरे में है। भाई साहब चेहरा अपना प्रकाश में ले आए।
02:08:12:04 पंडित आदित्य नारायण जी हां जी आदित्य जी बताएं। जय श्री राम। नारायण भैया नारायण नारायण आरंभ से ही हम सुन रहे थे तो एक हम कुछ बोले जी जी बोलिए बोलिए तो एक चीज ये है कि पहली बात तो जो प्रश्न आप उठाते हैं परंपरा वाले ये तो हमें पता ही है कि हम ही ने रट रट के वेदों को लाया है तो इस प्रश्न का उत्तर तो किसी से मिलने वाला है। यह असंभव है। कुल मिला के चाहे कोई सामंजस्य बिठाए या कोई जो है भाग जाए अथवा कोई जो है भड़क जाए या कोई कुछ बहाना बना ले परंतु उत्तर तो कोई देने वाला है नहीं ये निश्चित है। आदिकाल तक कोई उत्तर नहीं दे सकता। अब आचार्य जी ने क्या किया? उन्होंने बड़ी मधुरता से इस बात को स्वीकार कर लिया कि भाई अगर आप अपनी पर्सनालिटी डेवलपमेंट कर पाते हैं मूर्तियों से सो यू कैन डेवलप लेकिन मैं मूर्ति पूजा को प्रामाणिक नहीं मानता मैं मूर्ति पूजा को वैदिक नहीं मानता माने कि कैसे हमें आप गलत भी सिद्ध कर रहे हैं बड़े प्रेम से
02:09:27:18 ना परंतु हां उसके बाद जो है जब कह रहे हैं कि भाई हम आपसे शत्रुता नहीं रखते। ठीक है? आप नहीं रखते। आप सज्जन पुरुष हैं। आप साधु हैं। परंतु जो छोटे छोटे बच्चे आप ही के परंपरा में वेदों को इस तरीके से पढ़ेंगे कि भाई मूर्ति पूजा करना गलत है। वो तो हमसे शत्रुता रखेंगे ना। उनकी जिम्मेदारी कैसे लेंगे आप? मैंने कुछ विवादित चीजें उठाई नहीं। जैसे कि सत्यार्थ प्रकाश इत्यादि में सीधे-सीधे लिखा है कि मूर्ति पूजा अधर्म है। तो इसको कैसे कोई एक्सेप्ट कर सकता है? पर ठीक है। सज्जन व्यक्ति थे। वह विवाद में पड़ना भी नहीं चाहते थे। तो इसलिए सब मतलब ऐसी बात बोल दे रहे थे कि काम खत्म करो और आगे बढ़ो। ऐसा कुछ मुझे लगता है। और ठीक है। हमें जो देखिए हमें हमारा मकसद ये नहीं किसी को नीचा दिखाना या किसी को गलत साबित करना। हमारा मकसद यह है कि जो जनता है वह तय करे जो सामान्य व्यक्ति है जो दर्शक है वह यह जान पाए कि कौन तर्क की तर्क पे खड़ा हुआ है प्रमाण पे खड़ा हुआ है तो जब चर्चा देखते जिसको उनकी बात बिल्कुल सटीक लगेगी तो वो निर्णय कर पाएगी तो ये जो प्रश्न है ना जैसे आप कह रहे हैं आदित्य जी कि हमने कई बार पूछा उसका मिलना है नहीं वो सही बात है मगर जितनी ज्यादा बार ये
02:10:42:19 प्रश्न होगा और किया जाएगा और उस पे जो दृश्य होगा वो जितने ज्यादा लोग देखेंगे उतनी जागरूकता आएगी। परंपरा से जुड़ने के प्रति जागरूक यह हमारा उद्देश्य है। जी हां जरूरी भी है भैया। जरूरी भी है। जी जी शास्त्रवाद जी जय श्री राम। जय श्री राम भैया। जय श्री राम। पूरा चर्चा जबरदस्त रहा है आज का। और जो मुख्य बात था वो जो परंपरा पे वो अपना बता रहे। परंपरा नहीं बता पाए लेकिन परंपरा में घुमाते रह गए घुमाते रह गए लेकिन परंपरा नहीं बताए और अच्छा अच्छा कहा भी उन्होंने उन्होंने उन्होंने कहा भी कि जो है परंपरा से पढ़ना चाहिए मगर परंपरा क्या है वो नहीं मगर दयानंद जी परंपरा से नहीं पढ़ेंगे दयानंद जी तो परंपरा को ब्रेक करके पढ़ेंगे और फिर ये भी दावा करेंगे कि हम जैमिनी वाली परंपरा को फॉलो करते हैं। तो ये मतलब अगर तार्किक दृष्टि से जब भी देखेंगे तो इन बातों का कोई बेस है ही नहीं। स्टैंड नहीं करती। हालांकि ठीक व्यक्ति थे तो बिल्कुल जी। अरे [गला साफ़ करने की आवाज़] आपने जो वो उदाहरण दिया कि उनके दयानंद जी के जो माता-पिता थे वो तो शिवलिंग पूजा करते थे। शिव जी के परम जो थे भक्त
02:11:57:27 थे। ठीक है। तो वहां पे वो अंधा और आंख वाला का जो उदाहरण दिया उन्होंने। ये बहुत ही गलत काम। मतलब वो क्या कहना चाहते हैं कि उनके जो दयानंद जी थे जो जो आचार्य थे और जो परिवार वाले थे वो अंधे थे। अच्छा अंधे थे तो फिर वो आपको वेद मंत्र सही कैसे दे रहे बात ये है फिर उनकी किसी चीज पर विश्वास मत करिए फिर आपने वेद मंत्र पर विश्वास क्यों कर लिया अंधे हैं वो तो हो सकता है आपको गलत वेद मंत्र दे रहे हो आपको कैसे पता ये वही वेद मंत्र है जो ईश्वर ने दिए थे ऋषियों को उनके अंतकरण में बात ये है बहुत सरल सा प्रश्न है पर अब कोई इसको विवाद के रूप में देखे तो बात अलग है जी वेद में मूर्ति पूजा के प्रमाण पूछ रहे हैं तो भाई साहब बहुत सारे प्रमाण है मूर्ति पूजा के वेद में ईश्वर अपनी माया द्वारा विभिन्न रूपों में स्वयं को प्रकट करता है। गर्भ में विचरण करता है और जो है ऋग्वेद में है। यजुर्वेद में शायद 31 18 या 19 में है। यजुर्वेद में तो ऐसे बहुत सारे प्रमाण हैं। प्रमाण हमने दे रखे हैं। वेद में मूर्ति पूजा वाला हमारा वीडियो देखे। बहुत सारे प्रमाण हमने दे रखे हैं। ठीक है?
02:13:08:16 अब बात यह है कि उस मंत्र का वह अर्थ आप मानते नहीं हैं। आप जो है अलंकार कह देते हैं। विराट पुरुष की व्याख्या जहां पर होगी वहां आप अलंकार कह देते हैं। जहां पर शर्मा जो शर्मा जो स्वान है मादा स्वान वो आकर के वेद मंत्र बताएगी। वहां आप अलंकार कह देंगे। उसको यह अलंकार कह देंगे। तो फिर अवतार में आकर के आप कहते हैं कि अवतार की आवश्यकता क्या है? फिर अलंकार की आवश्यकता क्या है? यह प्रश्न भी हो सकता है। अच्छा कबूतर जो कपोत सूक्त है उसमें आप अलंकार अपने हिसाब से आप जहां पर भी आपकी मान्यता के विरुद्ध जाता हुआ अर्थ आपको दिखाई देगा वहां आप अलंकार कह देते हैं तो इसीलिए हम ये जो व्यर्थ की चर्चा है ना कि यहां दिया हुआ है अब वहां पर वो अपनी संस्कृतज्ञता दिखाएंगे फिर वो अपना स्वतंत्र व्याख्या दिखाएंगे तो इसीलिए हम सीधे मूल विषय पर आते हैं जिस पर बाद में भी आना है बाद में क्या आना है कि भाई आपको वेद मंत्र जहां से मिले हैं वहीं से मिले हुए अर्थ पर विश्वास है कि नहीं और यदि नहीं है तो आपका वेद मंत्र पर विश्वास होना सिद्ध नहीं होता या फिर आप स्वतंत्र रूप से अपनी परंपरा बता दीजिए कि आपके पास वेद मंत्र कहां से आए। ठीक है जी शास्त्रवाद जी इस तरीके से अगर अलंकार ही सिद्ध करने पे आ जाए तो फिर तो
02:14:23:20 यज्ञ इत्यादि जो ये सब करते हैं सब भी सब खत्म हो जाएगा। उसमें भी अलंकार सिद्ध हो सकता है। भाई अग्नि ये है, कुंड ये है, अरण ये है। अब देखो जैसे एक बात उठी कि वो वो दिव्य थे। दिव्य का मतलब कि जैसे कि हमारे कई ऐसे हमने गुरु माने हैं जो कई लाख वर्ष तक जीवित रहे हैं। ठीक है? तो अब ये कहते हैं कि भाई वो कई लाख वर्ष तक जीवित कैसे रह सकते हैं। जब वो यह स्वयं मान रहे हैं कि ईश्वर जड़ पदार्थों में प्राण शक्ति डालता है। चेतना डालता है। ठीक है? तो अगर इन्होंने ये माना कि वशिष्ठ जी हैं मान लो वशिष्ठ जी की ये मान रहे हैं मैक्सिमम आयु जो है 150 वर्ष इतनी तो मानेंगे ही किसी मनुष्य की आर्य समाज या मान लो 100 वर्ष मानते हैं तो जब ईश्वर मिट्टी के कणों को जोड़ करके उसको एक पुतला बना करके उसमें जो है प्राण शक्ति चेतना शक्ति डाल सकता है तो वो पहले से जो मिट्टी का पुतला बना हुआ है उसको केवल रीस्टॉल नहीं कर सकता क्या उसको ठीक नहीं कर सकता पुनः 100 वर्षों के लिए और ऐसा क्या वो 10,000 बार नहीं कर सकता? तो इस प्रकार से तो वशिष्ठ जी 1 लाख वर्ष तक जी सकते हैं। अगर यह मानते हैं कि ईश्वर ने जड़ पदार्थों में को इकट्ठा करके मनुष्य का शरीर बनाया। उसमें चेतना शक्ति डाली। उसमें जो है
02:15:38:24 प्राण शक्ति डाली। या तो यह मान ले कि उसने ऐसा नहीं किया। इनके वेद भाष्यों में तो महापुरुषों के लिए यह भी माना है कि महापुरुष जो है कालातीत यात्रा करते हैं। त्रिकाल आबाधित यात्रा करते हैं। सूर्य चंद्र आदि महत लोकों में भी यात्रा करते हैं। इस न्याय से भी इस वाक्य से भी यह सिद्ध होता है कि जो ऋषि कोटि के विद्वान होंगे। मतलब जो ऋषि कोटि के महात्मा रहे होंगे वह तो त्रिकाल आज भी आना चाहे तो आज भी प्रकट हो जाए। आनंद जी के ही वेद भाष्य से यह बात सिद्ध है। अगर मान ले तो एक भाई साहब पूछ रहे हैं कि आपका कैमरा ऑन करने को क्यों नहीं कह रहे हैं? यह जो इनकी फोटो है, यह यही है। यह इनके वास्तविक फोटो ही है। दूसरी बात यह है कि वैचारिक मतभेद के निमित्त हमें आवश्यकता होती है कि हम जो है कैमरा ऑन करके ही बात करें क्योंकि उसमें सारी और भी चीजें हैं जो हम बता चुके हैं। ऐसा [नाक से की जाने वाली आवाज़] है कि जब हम फोटो लगा सकते हैं तो हम चेहरा भी दिखा सकते हैं। ठीक है? परंतु अब ये क्या शयन का शयन का समय है और हम त्रिपुंड वगैरह सब मिट जाता है तो ब्राह्मण का चेहरा जो है वो देखने योग्य नहीं होता। ठीक है। चलिए ऐसा कहा गया है शास्त्रों में। ठीक ठीक है। आने का बहुत-बहुत धन्यवाद। जी शास्त्रवाद जी आप अपनी बात कर
02:16:53:27 दीजिए। जी ये जो आए थे और जो कह रहे थे कि बार-बार बीए और प्राइमरी इस तरह की जो बातें कर रहे थे तो ये हम अपने ऊपर ही क्यों माने इस इस उदाहरण को आपके ऊपर क्यों नहीं माने आप प्राइमरी पे क्यों नहीं हो सकते नहीं वो हालांकि वो असल में क्या होता है कि जब ये दो कारें अटकी हुई होती है ना तो अगर आपको बात को आगे बढ़ाना है किसी निष्कर्ष की ओर ले जाना है तो फिर उनमें से दो को कारों में से किसी एक को पीछे हटना पड़ता है। तो मैं उस उसमें नहीं था कि मैं भी उनको उन पलटवार वैसा ही करने लगूं जैसा वो कर रहे हैं। क्योंकि मुझे जो ये इधर की ओर ले जाना था कि जो सैद्धांतिक निष्कर्ष है वो प्राप्त करने थे। वो मुझे लगता है कि उसमें मैं सफल हुआ आप लोग निर्णय करिएगा। तो इसलिए मैंने उनको उन्हीं की भाषा में उस तरह के जवाब देना उचित नहीं समझा। तो बस ठीक है। जी मैं मैं ये मैं ये कह रहा था कि जिस प्रकार प्राइमरी क्लास के जो स्टूडेंट होते हैं यदि उनको हम इंजीनियरिंग का कुछ बताएंगे तो वो तो हसेंगे ना इस बारे में कि उन्हें तो पता नहीं होगा कि भाई पानी से भी बिजली बन सकती है। ठीक है? यदि देखेंगे तो पानी से भी बिजली बन सकती है। तो इस बात पे लोगों
02:18:09:06 पता ही नहीं चलेगा। वो तो हसेंगे। वो बोलेंगे पानी तो तो प्यास बोझता है। बिजली कैसे बनेगी? तो अब वो नहीं समझ पा रहे। इसका मतलब यह नहीं है कि हमारा इंजीनियरिंग का पढ़ाई गलत है। ठीक है? तो अच्छा एक बात और है। ना समझने वाली बात उन्होंने कई बार कही है कि मैं तो आपकी बात समझ ही नहीं पा रहा हूं। उन्होंने शुरुआत में जब वो वाली बात चल रही थी ईश्वर का शक्ति के रूप में अवतरण तो उस समय जब मैं बता रहा था कि क्षेपक बनेगा या बाधक बनेगा या फिर आप बताओ क्या बनेगा? कैसे होगी क्रिया? क्रिया कैसे होगी? तो वो उसमें ना बता रहे थे और ना ही मेरी बात को समझ पा रहे थे। करीबन उन्होंने 810 बार तो कहा होगा और फिर यह कहना कि आप जो है प्राइमरी वाले हो आप कैसे समझो तो वो सब चीजें ठीक है मैंने बड़े बड़े भी थे बेटा बेटा करके बात कर रहे थे तो मैं उसमें फिर मैंने उचित नहीं समझा कि मैं ऐसे ही बात करूं जो है जो क्या कहते हैं उसको क्या कहते डोमिनेटिंग तरीके से बात करूं ठीक है काफी निष्कर्षपूर्ण रहा तो आप लोगों को अच्छा लगा होगा सीखने को भी मिला होगा शास्त्रवाद जी आपकी मुझे लगता है कोई बात रह नहीं गई तो अब हम चर्चा को विराम दे दे। जी भैया जी चर्चा बहुत नारायण नारायण नारायण जय
02:19:24:09 श्री राम सभी को जय श्री राम [संगीत]
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