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00:00:02:19 तो सभी को जय श्री राम। आशा करते हैं आप सभी कुशल पूर्वक

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→ Used in: B · Video रामपाल का मनमौजी गीता अर्थ #7 अध्याय 4 का #श्लोक #gita #gitagyan at 0:07 ↗

00:00:07:22 होंगे और धरातल पर कार्यों की अधिकता होने के कारण आपके समक्ष यथावत जिस तरह से पूर्व में YouTube चैनल के माध्यम से इनेटिव वीडियोस हम प्रदान कर रहे थे। उसमें थोड़ी सी रुकावट आई धरातल पर ज्यादा एक्टिव होने के कारण। परंतु जो भी हम कर रहे हैं यहां समय ना देकर के जो धरातल पर समय अधिक दे रहे हैं। धरातल पर पहले भी समय देते थे पर इस समय बहुत ज्यादा दे रहे हैं। तो उसका जो अभी जो ऐसा परिवर्तन किया तो उसके द्वारा मिलने वाले जो परिणाम है जो फल हैं वो आपको आपके लिए अत्यंत लाभदायक होंगे। आपको जब प्राप्त होंगे वो फल जब आपको सूचनाएं प्राप्त होंगी तो आपको अत्यंत हर्ष होगा।

00:01:06:24 तो सबसे पहले आ जाते हैं आज के बुलेट पॉइंट्स पर बिना विलंब के। हम तो हमने पिछले अध्याय में पिछले एपिसोड में जो चौथा अध्याय है उसके कुछ 15 श्लोकों की विवेचना कर ली थी। उसमें रामपाल ने अपनी गरिमा गीता की पृष्ठ संख्या 94

00:01:49:03 उसमें रामपाल ने माना है रामपाल की गरिमा गीता की खोल लीजिए रामपाल के द्वारा लिखी गई या जो भी है पता नहीं किसने लिखा है पृष्ठ संख्या 94 तो इसमें रामपाल ने सर्वप्रथम गीता जी के अध्याय चार से चार के श्लोक एक से तीन में इसने माना है कि गीता कहने वाला अर्जुन को बोल रहा है कि तू मेरा प्रिय मित्र है। अब यदि गीता बोलने वाला गीता बोलने वाले भगवान श्री कृष्ण नहीं है। कोई और एंटिटी इनके द्वारा बनाई गई जो तथाकथित इनका जो काल है वह है जो कि ब्रह्मा विष्णु महेश नहीं है जो कृष्ण नहीं है जो राम नहीं है जो ईश्वर भी नहीं है जो एक राक्षस है तो यदि इस राक्षस यह राक्षस अर्जुन को अपना प्रिय मित्र बता रहा है क्यों बता रहा है भगवान श्री कृष्ण की और अर्जुन की मित्रता प्रासंगिक

00:03:04:21 है हम सब लोग जानते हैं जग जाहिर रहे। परंतु यह अर्जुन को अपना प्रिय मित्र क्यों बोल रहा है? कब हुई इनकी मित्रता? कैसे हुई? इस बारे में कोई विवेचना नहीं है। कोई शास्त्र नहीं है, कुछ नहीं है। क्योंकि वास्तविकता क्या है कि भगवान श्री कृष्ण ने ही गीता का ज्ञान दिया है। उसके बाद इसने इसमें शब्दों की चोरी भी बहुत सारी की है। हम बहुत सारी इस में चोरी की है। तो आप उसको देख सकते हैं जाकर के। कहा जो इसका जिस एपिसोड के हम बुलेट पॉइंट्स आज बता रहे हैं उस एपिसोड को आप देख लेंगे तो कई ऐसे शब्द बोले हैं जो है ही नहीं। जैसे फॉर एग्जांपल मैं दे देता हूं जैसे आगे अगले पैरा अगले दूसरे पैराग्राफ में ये कह रहा है कि चार के श्लोक पांच से नौ तक गीता ज्ञान दाता ने कहा है कि अर्जुन तेरे और मेरे बहुत से जन्म हो चुके हैं। इन सबको तू नहीं जानता मैं जानता हूं। इसके बाद इसने कहा कि मैं मनुष्यों की तरफ तरह जन्म ना लेने वाला अविनाशी आत्मा होते हुए भी यह मनुष्यों की तरह ये क्या है? अच्छा सर्व के बाद इसने कोष्टक में लिखा है 21 ब्रह्मांड।

00:04:21:22 ये दिखाइए जरा ये वाला। सर्व का अर्थ 21 ब्रह्मांड कैसे हुआ? सर्व प्राणियों का स्वामी होते हुए भी ये कौन से हिसाब से स्वामी है? सर्व प्राणियों का हम किस हिसाब से स्वामी है ये? ये तो एक चोर टाइप का व्यक्ति है ना। स्वामी तो कोई और है। 21 ब्रह्मांडों के लोगों का भी ये स्वामी नहीं है। स्वामी तो कोई और है। कबीर है रामपाल के हिसाब से। ये किस हिसाब से स्वामी हुआ? ये तो चोरी और डकैती करने आया हुआ व्यक्ति है। इसको आप स्वामी बोल रहे हैं। मूर्खता की पराकाष्ठा हर पन्ने पर मिलती रहेगी। तो इस तरह से इसने जो है बहुत सारे शब्दों का हेरफेर किया है। जो है ही नहीं वह शब्द बोले हैं। है ना? जैसे मैं इसी पैराग्राफ में देखिए अंतिम लाइन में उनहीं में से अंश अवतार रूप में श्री कृष्ण राम श्री परशुराम आदि सजामि रचता हूं। अंश अवतार कहां लिखा है? इसमें उसमें तो लिखा है मैं अपना सजाम में हम अपना सजन करता हूं। उसमें यही कहना पड़ेगा अपने रूप का सजन करता हूं। परंतु इसमें कहां लिखा है कि अंश अवतार का सजन करता हूं और उनमें गुप्त रूप से प्रकट होता हूं।

00:05:36:26 यह कहां लिखा है? इसकी संस्कृत कहां है? जेल वाले बाबा जी वाले बाबा मेरा गाना बजा दो, गाना बजा दो। यह रामपाल के जो फॉलोअर्स हैं वहां जाकर कहते होंगे जेल वाले बाबा मेरा गाना बजा दो, गाना बजा दो। वो गाना बजाता होगा। जेलर कहता होगा जेल वाले बाबा इसका गाना बजा दे। कौन सा जनता कह रही है बाकी फिर प्रशासन कहेगा बाकी पूरी कर दूंगा मैं वही कसर जो रह रही है। हां नहीं वो शिवश कहेगा जेल वाले बाबा गाना बजा दो। कौन सा जनता कह रही है बाकी पूरी कर दूंगा मैं कोई कसर जो रह रही है हम

00:06:32:24 खैर आगे चलते हैं तो क्या है कि काल ब्रह्म जो मुझे अब इसमें क्या है सा अच्छा हां दो चीजें हमें माननी पड़ेगी 95वें पृष्ठ पर इसने मतलब गीता इस इस पृष्ठ के अंत से जो है इसने कहा है कि यह जो अवतार होता है साधुओं की रक्षा के लिए और असाधुओं के संहार के लिए होता है। ठीक है? जबकि यही अपने लेक्चर्स में यही लोग ढिंढोरा पीटते हैं कि जो लोग मर रहे हैं वह काल की वजह से मर रहे हैं और शास्त्र विरुद्ध भक्ति की वजह से इनके अनुसार जो शास्त्र विरुद्ध भक्ति है उसकी वजह से मर रहे हैं। तो पहले तय कर ले कि वह शास्त्र विरुद्ध जो लोग हैं जिनको धर्म और अधर्म का बोध नहीं है वह साधु है कि असाधु है धर्मी है कि अधर्मी है तो इनके अनुसार काल जो है खुद ही एक तरफ कहते हैं कि काल जो है वो आता है किस लिए लोगों को खाने के लिए लोगों को परेशान करने के लिए झूठ बोलने के लिए भ्रम में डालने के लिए इन इन सारे बुरे

00:07:47:27 कारणों की वजह से काल है और यहां पर क्या आ रहा है चार सार्थ के अर्थ में खुद ही कह रहा है कि वह अवतार जो होते हैं वह साधुओं की रक्षा और असाधुओं का संहार करने के लिए होते हैं। ठीक है? तो इसके अलावा धर्म स्थापना तो चार सात चार आठ चार छ इन सब श्लोकों को अमान्य मानना पड़ेगा। अगर तुम यह मानते हो कि काल अपना उल्लू सीधा करता है या उसकी भक्ति घटिया है या ये है वो है जो पंचौरा अपना छाप रखा है। ठीक है? जो बकवास कर रखी है तो इन श्लोकों को भी अमान्य मानना पड़ेगा। कौन-कौन से हैं? चार, छ, सात, आठ ये सब अमान्य मानने पड़े। चार, तीन भी अमान्य मानना पड़ेगा। जिसमें कि ये कहा है कि अर्जुन तू मेरा मित्र है। इसलिए तुझे बता रहा हूं। इसने कहा नहीं है कि ये गलत श्लोक है। क्यों भाई? अर्जुन काल का मित्र था क्या? हां।

00:08:44:26 कब हुई मित्रता? चलिए आगे चलते हैं। अब पृष्ठ संख्या 95 पर आ जाते हैं। क्या हुआ है? इसमें इसने माना है कि काल अच्छा जो मुझे तत्व से जान लेता है जो मुझे तत्व से जान लेता है वह पुनः जीवन मरण को प्राप्त नहीं होता। यह भगवत गीता में कहा गया है। जो भगवत गीता के श्लोक का अर्थ है। परंतु इसने क्या लिखा है? जो मुझे तत्व से जान लेता है उस पूर्ण ज्ञानी का पुनर्जन्म नहीं होता। तो जब काल को तत्व से जान लेना ही पूर्ण ज्ञान है तो फिर काल से अलग किसी और का ज्ञान क्यों लेने जाए? क्योंकि इसने यही कहा ना कि जो मुझ काल को तत्व से जान लेता है उस पूर्ण ज्ञानी का यानी काल को तत्व से जान लेने वाला पूर्ण ज्ञानी हो गया। पुनर्जन्म नहीं होता। ठीक है? और जो तत्व से नहीं जानता है वह मेरे जाल में फंसा रह जाता है।

00:09:52:14 जो इस प्रकार तत्व से मुझे नहीं जानता है वो मेरे जाल में फंसा रहता फंसा रह जाता है। तो यानी कि गीता बोलने वाला ही ये कह रहा है यहां पर इसके हिसाब से भी कि जो उसको जान लेगा वो पुनर्जन्म को प्राप्त नहीं होता। और यह बात भगवान ने और भी कई जगह पर कही है कि वो ऐसा ज्ञान है जिसके बाद और कुछ जानना बाकी नहीं रह जाएगा। मेरे बारे में अपने बारे में ये बात कही है। आगे के चैप्टर्स में आएगा। तो जब भगवान ने कह दिया कि मुझे ही जानना तत्व ज्ञान है और मुझे जान लेने के बाद पुनर्जन्म नहीं होता है। इसके हिसाब से काल ने कहा हमारे हिसाब से भगवान ने कहा। तो फिर क्यों जाए कबीर को जानने? भाई जब यहां पर पूर्ण ज्ञान हो गया व्यक्ति पूर्ण ज्ञानी हो गया जान के वो किसी भी रूप में जाने तुम्हारे हिसाब से बुरे रूप में जाने हमारे हिसाब से अच्छे रूप में जाने मगर यहां पर जान करके तुमने भी मान लिया कि वो पूर्ण ज्ञानी हो गया पूर्ण ज्ञानी हो गया जिसने काल को तत्व से जान लिया तो कबीर को क्यों जाने सूक्ष्म वेद क्यों पड़े हो गया खत्म यही पर हो गया इनका चैप्टर क्लोज ठीक है आगे चलते है इसके आगे इसने क्या बेवकूफी की जेल वाले बाबा ने गाना बजाया है तो क्या बजाया है? काल ब्रह्म अच्छी

00:11:07:22 आत्माओं को रचता है अर्थात पैदा करता है। अब ये बताओ आत्माओं को अ क्या कहते हैं? परमेश्वर रचता है क्योंकि इसने दो दूसरे अध्याय के दव श्लोक में जो बातें की है उसमें यह माना है कि जो कबीर परमेश्वर है इनके हिसाब से वो आत्माओं को उत्पन्न करता है रचता है और यहां क्या कह रहा है कि काल ब्रह्म रचता है तो क्या काल ब्रह्म और कबीर एक ही है परमेश्वर काल ब्रह्म ही है और दूसरी बात यह है कि अच्छी आत्माओं को रचता है इसका अर्थ क्या हुआ कि वो अच्छा अच्छा है यानी कि काल ने अगर यह मानेंगे अगर ये मानेंगे कि काल यहां पे जो है आत्मा जो मनुष्य रूप में जन्म लेती है। हालांकि वो अर्थ निकलेगा नहीं पर मान लेते हैं कि आत्मा जो है मनुष्य रूप में जो जन्म लेती है उसको काल रचता है। मतलब उसके शरीर को काल रचता है। तो फिर ये फिर क्या बुरे शरीर वाले जो मनुष्य हैं उनको काल नहीं रचता है क्या? तो अच्छी आत्माओं को रचता है। यह क्या है? हम तो खैर कुल मिला के बात यह है कि आत्माओं को रचने वाला परमेश्वर इसने ही माना है।

00:12:23:22 यद्यपि आत्माओं को रचने वाला कोई है ही नहीं। परंतु इस मूर्ख ने माना है कि आत्माओं को परमेश्वर ने रचा। और यहां पे खुद कह रहा है कि आत्माओं को कौन रचता है? काल। ठीक है? और क्या है? आकार में प्रकट नहीं होता है। अब यहां आगे कह रहा है कि यह जो है आकार में प्रकट नहीं होता है। इसका अटल अविनाशी नियम है। क्या नियम है कि अपने आकार में प्रकट नहीं होता है। मतलब दिखाई देने वाला स्वरूप नहीं प्राप्त लेता है। तो फिर खुद ही कह रहा है कि मैं अवतार लेता हूं। मैं आता हूं। मैं ये करता हूं। मैं विष्णु रूप में प्रकट हो जाता हूं। ये वो ये क्या है? हम यानी वह आकार लेता है ना साकार रूप में आकार रूप में प्रकट होता है ना तो ये खुद ही माथा पीटते रहो इसके बाद आगे क्या है कि

00:13:26:03 [संगीत] 96 वे पृष्ठ पर इसने एक शब्द लिखा है अगला पृष्ठ है 96 इसमें दूसरी लाइन के अंत में इसने कहा है चार द का अर्थ करते समय कहा है कि काल ब्रह्म ने कहा कि जिनके राग द्वेष मर गए हैं जिसने मुझे यहां 21 ब्रह्मांड के कर्मों का कर्ता अर्थात मालिक हूं ऐसा तत्व से जान लिया है देखिए तत्व से जानने को बार-बार ये सीमित कर रहा है भगवान की असीमितता अलौकिकता जो उन्होंने बताई है कि मेरे मैं तू जानता है मैं नहीं जानता मेरे जन्म कर्म तीव्र होते हैं तो उसको बार-बार ये सीमित कर रहा है कि 21 ब्रह्मांड चलो चलो ठीक है। 21 ब्रह्मांड ठीक है मान लिया। फिर आगे वह मतावलंबी हो चुके हैं। यह शब्द कहां से आ गया? वह मतावलंबी हो चुके हैं। जबकि वहां भगवत गीता में कहा गया है कि वो सिद्ध माना गया उनको जो भगवान को तत्व से जान लेंगे। मगर इसने क्या किया? इसने उसको मतावलंबी कहा है। मतावलंबी का क्या अर्थ है यहां पर लेने का? हम तो यह भी एक हर बात में बोल वचन है भैया हर बात में कहां तक क्या-क्या करोगे ठीक है इसको निकाल लेता हूं क्या कहा है जिनके

00:14:41:10 राग द्वेष खत्म हो चुके हैं पहले भी जिनके राग द्वेष भय और क्रोध सर्वदा नष्ट हो गए थे और जो मुझ में अनन्य प्रेम पूर्वक स्थित रहते थे ऐसे मेरे आश्रित रहने वाले बहुत से भक्त उपयुक्त ज्ञान रूप तप से पवित्र होकर मेरे स्वरूप को प्राप्त कर चुके हैं। ठीक है? मतलब सच्चिदानंद वाला जो मोक्ष होता है उसको प्राप्त कर चुके हैं। मगर यहां पे वह मतावलंबी हो चुके हैं। ये क्या है? क्या बकवास है भाई? खैर आगे चलते हैं। इसी में इसने कहा है कि ज्ञानी मुझे अच्छे लगते हैं तथा मैं ज्ञानी को ज्ञानियों को प्रिय हूं। ठीक है? इसको क्या अच्छे लगते हैं? ज्ञानी और यह ज्ञानियों को प्रिय है और क्योंकि वे तीनों गुणों की भक्ति ना करके मेरी अर्थात ब्रह्म की भक्ति करते हैं। तो जो व्यक्ति ज्ञानी है और जिसको यहां पर क्या कहा जा रहा है? उपयुक्त ज्ञान रूप तप से पवित्र होकर तपस्वी कहा गया है। ज्ञान तपसा चार 10 भगवत गीता चार 10 ज्ञान तपसः ज्ञान तपसा ज्ञान रूप तप से

00:15:55:10 और जो पवित्र है तो वो काल की भक्ति कैसे कर रहे हैं भाई पहली बात तो जो काल की भक्ति करने वाला वो काल की भक्ति करने वाला अज्ञानी वो अज्ञानी है ज्ञानी कहां से हुआ और फिर जब वो अज्ञानी है तो वो ज्ञान रूप तप से पवित्र कैसे हुआ? तपस्या से पवित्र कैसे हुआ? तब का तो यह खंडन करता है। इसी में आगे देखेंगे तो यह भी एक झोल का ढोल में पोल और बहुत सारे यहां पर शब्द छिपाए गए हैं बार-बार वो आप उसमें देख लीजिएगा जो पूरा एपिसोड है। इसके बाद इसने यहां पर देखिए देवताओं के लिए जहां शब्द आया देवताओं की जो अपना लौकिक फल प्राप्त करने के लिए हम देवताओं का पूजन करते हैं। उनको जो देवताओं से मिलने वाली सिद्धि है जल्दी प्राप्त हो जाती है। तो यह ब्रह्मा विष्णु महेश जबरदस्ती यहां बात बात में ब्रह्मा विष्णु महेश को डाल रहा है। ठीक है? इसके बाद क्या हुआ कि चार 13 में भगवान ने कहा कि समस्त कर्मों को करते हुए भी संपूर्ण सृष्टि की रचना करते हुए भी तू मुझे अकर्ता जान। क्यों? क्योंकि उनकी कर्म फल में आसक्ति नहीं है। केवल लग रहा है कि

00:17:10:12 वो कर्म कर रहे हैं। वास्तविकता में वो कर्म कुछ वो कुछ नहीं कर रहे। सब कुछ करते हुए भी वह कुछ ना करने वाले हैं। इसलिए उनको कर्म बांधते नहीं है। ठीक है? यह चार 13 और चार 14 से हमें पता चलता है। पर इसने क्या किया? इसने क्या किया? कि इसने इस बारे में बात ही नहीं की है कि काल को जो है अकर्ता मानना है क्योंकि काल तो भाई अपने उल्लू सीधा करता है। काल तो अपने खाने पीने का इंतजाम करता है। तो काल ना ही कर्म फल से अनासक्त है और ना ही वो अकर्ता है। मगर इसने अपनी भगवत गीता गीता का अर्थ करते समय इसने ये बात ही नहीं की। ठीक है? तो इस हिसाब से जो चार 13 है जिसमें गीता कहने वाले को अकर्ता कहा गया है। चार 14 है जिसमें गीता कहने वाले को क्या कहते हैं? कर्म फल से अनासक्त कहा गया है। ये दोनों ही अमान्य मानने पड़ेंगे। नोट करते जाना मैं कर रहा हूं। कितने श्लोक अभी तक अमान्य हो चुके हैं। इसकी थ्योरी के अनुसार है ना जो यह कहता है ना 5% ज्ञान गलत है। इसकी बैंड बजेगी कम से कम कुछ नहीं तो 80% श्लोक जो होंगे

00:18:25:18 70 से 80% वो इसने नहीं माने हैं गीता के और कहने को कह दिया कि 5% ज्ञान गलत है। ठीक है? आगे चलते हैं। इसके लास्ट में इसी पैराग्राफ के लास्ट में इसने क्या बात मान ली है? इसलिए तू अपने पूर्वजों की तरह शास्त्रानुकूल भक्ति कर्म कर। अब यह बताओ कि इसके पूर्वजों को तत्वदर्शी कौन मिला था? और यह बात कह कौन रहे हैं? यह बात कह कौन रहे हैं? यह बात कह रहे हैं भगवान श्री कृष्ण यानी भगवान श्री कृष्ण तब कह रहे हैं जब तक कबीर नहीं आए हैं। तो कौन तत्वदर्शी मिला था जिसने गीता की व्याख्या या जो भी व्याख्या की थी तात्विक ज्ञान की वेदों की व्याख्या तो वो कौन सा तत्वदर्शी था जिसने ज्ञान दिया था जिसके कारण जो है वो पूर्वज यह लोग दिन भर गाली देते हैं कि पूर्वजों ने गलत भक्ति की और ये वो ये भक्ति हम बता रहे हैं आज कलयुग में आज हम भक्ति बता रहे हैं तब से कोई मुक्ति नहीं हुआ है और कुछ दो चार लोग जो इनकी चपेट में आ गए हैं जेल धाम जाकर के वो मुक्त होते जेल वाले बाबा

00:19:40:19 का गाना सुन के। मगर यहां क्या कह रहा है कि तू अपने पूर्वजों की तरह शास्त्रानुकूल भक्ति कर्म कर। ये भी मान लिया इसने 4:15 में। तो अब इनका कोई बेवकूफ फॉलोअ आए तो उनके मुंह पे ये मारना। ये देख तेरे बाबा ने क्या लिखा है। जेल वाले बाबा ने गाना बजाया तेरा। तो ये है लास्ट एपिसोड के बुलेट पॉइंट्स। ठीक है? आप लोग नोट कर लीजिएगा। पूर्वजों की तरह भक्ति करना इसने मान लिया। तो अर्जुन के वह कौन से पूर्वज है जो शास्त्रानुकूल भक्ति करते थे वो बताए रामपाल का कोई नुमाइंदा अंधेरा कायम रहे का नुमाइंदा अंधेरा कायम रहे। बाबा जेल में रहे बाबा का गाना बजता रहे। खैर आगे चलते

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00:20:29:27 हैं। हम तो अब बात आती है कि इसने सबसे पहले अध्याय चार के श्लोक 16 से 22 तक को 22 तक की बात की है। तो उसे हम पढ़ लेते हैं। क्या है 16 से 22 में? अब यह आगे कर्म बता रहे हैं। वही जो पहले लगभग सभी चैप्टर्स में बताते आए हैं कि कर्म में कर्म को करते हुए भी तुम्हारी बुद्धि कैसी होनी चाहिए। तो भगवान जो बार-बार यही बात करते आए हैं तो कुछ अलग तरह से यहां पर भी इन्होंने वही बात कही है कि कर्म करते हुए आपकी बुद्धि कैसी होनी चाहिए? कर्म क्या है? अकर्म क्या है? इस प्रकार का इस प्रकार इसका निर्णय करने में बुद्धिमान पुरुष भी मोहित हो जाते हैं। इसलिए वह कर्म तत्व में तुझे भलीभांति समझाकर कहूंगा जिसे जानकर तू अशुभ हो। अर्थात बंधन में डालने वाले

00:21:45:01 कर्म बंधन से मुक्त हो जाएगा। तो और यहां पे इस बात के लिए मोक्ष शब्द का उपयोग हुआ है मोक्ष। मोक्ष से। ठीक है? आगे देखते हैं। कर्म का स्वरूप भी जानना चाहिए और अकर्म का स्वरूप भी जानना चाहिए तथा विकर्म का स्वरूप भी जानना चाहिए। क्योंकि कर्म की गति गहन। अब यहां पे तीन बातें जान लेने की। कर्म क्या है? जो शास्त्र कर्म करना चाहिए। अकर्म क्या है? जो

00:22:20:21 शास्त्र वेत कर्मों के प्रति कर्मों से मिलने वाले फल के प्रति आसक्त ना होना यह है अकर्म और विकर्म क्या है जो करना नहीं है जो निषेध ठीक है अब आगे चलते हैं क्या कहा है जो मनुष्य कर्म में अकर्म देखता हुआ और जो अकर्म में कर्म देखता हुआ देखता है वह मनुष्यों में बुद्धि मान है और वह योगी समस्त कर्मों को करने वाला है। तो कर्म में अकर्म देखने का मतलब क्या है? तो कर्म में अकर्म देखने का मतलब अर्थ है कि कर्म को तो करो। शास्त्र कर्मों को तो करो परंतु उससे मिलने वाले फल की ओर अनासक्त रहो। तो अकर्म जैसा मतलब कि यह मैं कुछ कर ही नहीं रहा हूं। इस तरह का भाव अपने मन में लाएं। ठीक है? और अकर्म में कर्म को देखने का मतलब कि जो आपकी विरक्तता है वह आपको पकड़ के रखना है। तो यानी विरक्तता को अपना एक कर्म समझो और उसको पकड़ के रखो। तो अकर्म में कर्म को देखो और कर्म में अकर्म को। इसके बाद क्या कहा है? कि

00:23:36:24 जिसके संपूर्ण शास्त्र सम्मत कर्म बिना कामना और संकल्प के होते हैं। है ना? मतलब आप केवल क्यों कर रहे हो? क्योंकि ईश्वर ने कहा है। यह बात हमने 247 के उसमें भगवत गीता 247 की विवेचना में अच्छे से समझ ली थी। देख लीजिएगा अलग से वीडियो बना के डाला हुआ है। जिसके समस्त कर्म ज्ञान रूप अग्नि द्वारा भस्म हो गए हैं। उस महापुरुष को ज्ञानी जन भी पंडित कहते हैं। ठीक है? एक ये हो गया। इसके बाद 20वा क्या कह रहा है श्लोक? जो पुरुष समस्त कर्मों में और उनके फल में आसक्ति का सर्वथा त्याग करके संसार के आश्रय से रहित होता हो गया है। परमात्मा में नित्य तृप्त है। हम वह कर्मों में भलीभांति बरतता हुआ भी वास्तव में कुछ भी नहीं करता। और यह बात हम लोग बहुत बार समझ चुके हैं कि गृहस्थ होते हुए भी कर्मों में बरतने वाला होते हुए भी व्यक्ति यदि अपने उन उन कर्मों से मिलने वाले फल के प्रति आसक्त ना हो तो वह कर्म करता हुआ भी मुक्त मुक्त होने के पथ पर चलने वाला ही कहलाएगा। और इसी बात का खंडन किया उसने कि देखो श्रृंगी ऋषि थे और वह देखो

00:24:53:03 क्या कहते हैं गृहस्थ उन्हें जो कर्म योग है उसका खंडन करने के लिए शंगी ऋषि की वो दे दी उदाहरण कि शंगी ऋषि देखो वो अपने आप को संभाल नहीं पाए और देखो उसमें भोग विलास में पड़ गए और फिर यह भी बात है कि इंद्रिय संयम का खंडन करने के लिए उसने दूसरी बात कह दी कि नहीं नहीं हठ योग तो गलत होता है। हठ योग लोग जो कर रहे थे वो देखो कभी मुक्त नहीं हो पाए। तो कुल मिला के गीता जो भी बात कहेगी वो नहीं माननी है। वो गलत है। दोनों बातों गलत कहेगा। फिर जो खुद कहेगा वो सही है। हम उनमें से एक बात खुद बोलता है और वो सही है। वो हठ योग के रूप में इंद्रिय संयम का खंडन करेगा। ठीक है? कि इंद्रिय संयम नहीं करना है। हठ योग कह करके इंद्रिय संयम का खंडन करेगा रामपाल। और फिर दूसरी जगह जब इंद्रिय संयम नहीं करना यानी जो कर्मों में होकर गुजरना है तो गस्थ गस्थ जीवन की बात कर रहा है तो वहां पर गस्थ जीवन का भी खंडन करेगा तो वही व्यक्ति करे क्या तो गीता के नाम पर मत करो कुछ भी जो मैं कहूं वो करो मेरे द्वारा जो जो गधों को शिक्षा दी जाती है जो मैं वो दे रहा हूं उसको मानो भगवत गीता के अनुसार नहीं चलो पहली बात तो मेरे अनुसार

00:26:08:12 चलो मेरा ठप्पा होना चाहिए मैं सही बताऊं या गलत बताऊ उस पर जो मार्क होना चाहिए मेरा मार्क इधर है मार्क इधर है मेरा मार्क होना चाहिए ठीक है आगे चलते हैं जिसका अंतःकरण और इंद्रियों के सहित शरीर जीता हुआ है और जिसने समस्त भोगों की सामग्री का परित्याग कर दिया है ऐसा आशा रहित पुरुष केवल शरीर संबंधी कर्म करता हुआ भी पाप को नहीं प्राप्त होता है। वही वाली बात कि आपका शरीर है उससे वह काम आप करवा रहे हो कार्य करवा रहे हो जो जो कार्य शास्त्रों के अनुसार है और ऐसा बरतते हुए आप कर्मों में लिप्त नहीं होंगे मुक्त होंगे ठीक है पाप तो होना दूर की बात है और 22वा क्या कह रहा है जो बिना इच्छा के अपने आप प्राप्त हुए पदार्थ में सदा संतुष्ट रहता है है ना बिना इच्छा के मतलब जो कर्तव्य कर्म करते हुए प्राप्त हो गया इच्छा मतलब उसमें आसक्ति नहीं थी कि मुझे ये मिलेगा मिलेगा, चोला भटूरा मिलेगा या कुलचा मिलेगा, नान मिलेगी यह सब नहीं उनके प्रति आसक्ति नहीं थी। जो मिला कर्तव्य कर्म करके उसी से ही तृप्त उसी से संतुष्ट ये भी अच्छा है। जो हर्ष शोक आदि द्वंदों से सर्वथा अतीत हो

00:27:23:13 गया। ऐसा सिद्धि और असिद्धि में सम रहने वाला कर्म योगी ज्ञान कर्म करता हुआ भी उनसे नहीं बनता। अब देखिए सबसे पहले तो यहां पर वही वाली बात जो सम बुद्धि वाली बात समत पुरुष होने की बात जो शुरू से अब तक कही गई है वही यहां भी कही गई है अलग शब्दों में मगर इसने क्या किया था कि दूसरे अध्याय में किसी पृष्ठ पर हमने बार-बार बताया है कि ये जहां पर गीता राग द्वेष से हटने की बात करती है भगवान राग द्वेष से हटने की बात करते तो वहां कहता है अरे राग द्वेष के बिना युद्ध हो सकता है क्या राग राग द्वेष से मुक्त कोई हो पाया है क्या यह कहता है और उसके बाद खुद अपने नाम पर राग द्वेष से अलग होने अलग होने की बात करता है। राग द्वेष से राग द्वेष के बिना कुछ नहीं हो सकता। राग द्वेष के बिना कुछ नहीं हो सकता। युद्ध भी नहीं हो सकता। धर्म युद्ध भी नहीं हो सकता। ये सब इसने बातें कही है। फिर जब राग द्वेष से अलग होने का पहले खंडन करेगा कि अलग नहीं होना चाहिए। ठीक है? जैसे हठ योग का इंद्रिय संयम को खंडन करेगा। पहले उसके बाद फिर अपने नाम पर राग द्वेष से अलग होने की बात कहेगा। अपने नाम पर इंद्रिय संयम की बात कहेगा। ठीक है? खैर यहां पर भी सिद्धि और सिद्धि में समान बुद्धि रखने वाला रखने वाले को मुक्ति का कहा गया है। मुक्ति के पथ पर चलने

00:28:38:19 वाला। अब इसने देखते हैं क्या क्या अकर्म किया है विकर्म किया विकर्म इसने क्या कहा है कि चार अध्याय चार के श्लोक 16 से 22 में कर्मों का विवरण कहा है जो व्यक्ति जिस कर्म का वो करे उसमें कर्ता पन का अभिमान नहीं लाए तथा कहे कि कर्म मालिक आपके आश्रित होकर कर रहा हूं। कर्म अकर अकर्म का ज्ञान इस तुच्छ जीव को नहीं है जो निष्काम भावना से कर्म करता है वह पंडित विद्वान है तथा कर्मों के बंधन में नहीं बंधता इसलिए इसी अध्याय के श्लोक 34 में कहा है कि अब यहां अपना तत्व ज्ञान डाल दिया हम तो इसने अब देखिए यहां पर राग द्वेष की बात को माना है कि जो ये सब कर्म कर्म का ज्ञान अच्छे से हो आए और कर्तापन का अभिमान ना आए। निष्काम भाव से कर्म करता है। जबकि यही व्यक्ति आपको एक उदाहरण दे दूं। यही व्यक्ति

00:29:48:16 राग द्वेष की बात मुझे याद है। इसने दूसरे अध्याय में मना किया था। राग द्वेष के बिना जो है युद्ध नहीं हो सकता। कर्म नहीं हो सकता है। यह देखिए। देखिए लाभ हानि को यहां पर भगवान ने कहा था पष्ठ संख्या 23 दिखाइए। 23 थोड़ा नीचे का 23 में नीचे का पार्ट दिखाइए। 23 हां इसमें नीचे का पार्ट दिखाइए। इसमें देखिए सबसे लास्ट जो लाइन है वह क्या है? बिना क्या बिना लाभ हानि के युद्ध हो सकता है? क्या आवश्यकता पड़ी है छाती में तीर खाने की? मतलब कोई भी कर्म अगर करेगा व्यक्ति तो लाभ हानि देख के ही करेगा। ठीक है? इससे जस्ट पहले भगवान क्या कह रहे थे? कि इसलिए अर्जुन मान जा मेरी बात युद्ध कर ले। इसके अनुसार भगवान कह रहे हैं। अध्याय दो के श्लोक 38 में कहा हारजीत दुख सुख लाभानि को समाज समान समझ कर युद्ध कर। अब देखो यहां भगवान के इस भाव का खंडन कर रहा है और फिर बाद में यह जो लाभ हानि में समत्व बुद्धि वाली बात है इसका कई

00:31:03:20 जगह पर इसने समर्थन भी किया है। ये चाहता क्या है भाई? बेवकूफ है क्या दुनिया का सबसे बड़ा? मतलब भगवान कह रहे हैं तब तो वो बात गलत है। और फिर कहीं दूसरी जगह सही भी मानता है। भगवान की ये दोहरा कही गई बात। पागल है ये। विक्षिप्त है दिमाग से जो इस किताब को लिख रहा है बेवकूफ कहीं का। खैर चलते हैं आगे। तो इसने यहां पे जो निष्काम भावना है वो रखने की बात मान ली। और जबकि वहां क्या लिख रहा है? यही व्यक्ति क्या लाभानि के बिना युद्ध हो सकता है? क्या यहां निष्काम बना रहा है। वहां पर निष्कामता का खंडन कर रहा है। यहां पर निष्कामता का पक्ष ले रहा है। अजीब भैया जेल वाले बाबा का गाना है यह। कोई लिखे कोई अगर थोड़ा पंक्ति लिख सकता हो तो जेल वाले बाबा मेरा गाना बजा दो यह वाला टाइटल ले गाना लिखिए उस पर फिर थोड़ा सा हम लोग बनवा के उसको डालेंगे आप लोगों के एंटरटेनमेंट के लिए है ना लिखिए गाना जेल वाले बाबा मेरा गाना बजा दो फिर शिवश उसमें कैसे आकर के कहेगा कि ओ जेल वाले बाबा इसका गाना बजा दे कौन सा जनता है कौन सा तेरे मूर्ख कह रहे हैं और बाकी पूरी कर दूंगा मैं कोई कसर

00:32:19:01 जो रह रही है हम ठीक है आगे चलते हैं। तो इसने जो है अच्छा इसने एक बात और लिखी है यहां इसी पैराग्राफ में बात करते समय यह 96 नंबर पृष्ठ पर कि अब ये कर्म और अकर्म में जब हम पहचान कर रहे हैं कि भाई अगर तुम्हें भोजन करना है तो कैसे करना है युद्ध करना है तो किसके लिए करना है किसके लिए नहीं करना है इन सब बातों का यहां भगवान ज्ञान दे रहे हैं। मगर ये हर बात में जाकर के कर्म अकर्म को एक ही दृष्टि से देखता है कि किसकी पूजा करनी है और किसकी पूजा नहीं करनी है। तो प्रॉब्लम यह आएगी कि जब हम हर जगह पर पूजा किसकी करनी है, किसकी नहीं करनी है, कैसे करनी है, कैसे नहीं करनी है। जब हम यह देखने लगेंगे तो फिर जो बाकी के कर्म है जो पूजा से अतिरिक्त जैसे स्नान करना है तो कैसे करना है? विवाह करना है तो किससे करना है, कैसे करना है। उसमें कर्म और अकर्म इससे नहीं करना। यह हो गया विकर्म। और इससे करना है ये हो गया कर्म। तो जब अगर हर जगह हम लोग पूजा के बारे में ही जान रहे हैं कि पूजा किसकी करनी है, किसकी नहीं करनी है तो फिर यह इन बातों की जानकारी कहां से प्राप्त

00:33:34:02 हो रही है कि धर्म क्या है? अधर्म क्या है? विवाह किससे करना है, किससे नहीं करना है? क्योंकि इसने तो हर जगह घुसेड़ दिया कि ये देखिए क्या घुसेड़ा है? कर्म और कर्म और अकर्म का मतलब क्या बताया इसने? कि तत्व ज्ञान से ही सर्व कर्मों का ज्ञान होगा कि कौन पूजा के योग्य कौन नहीं है। फिर साधक ब्रह्म द्वारा लगाए गए कर्मों के बंधन में ना बंधकर सत्यलोक सदा चला जाएगा। वह सदा के लिए कर्म बंधन से मुक्त हो जाएगा। अब इसने यहां अगले पैराग्राफ में भगवान विष्णु से बढ़कर कौन विद्वान हो सकता है? उनका भी कर्म बंधन में बंधकर श्री रामचंद्र के रूप में जन्म हुआ। तो अब मैं पूछ रहा हूं इनके अनुसार कबीर के कबीर से ज्यादा विद्वान कौन हो सकता है? इनके अनुसार कबीर परमात्मा है भाई। तो रामपाल के रूप में कर्म कौन भोग रहा है? जेल में पड़ा पड़ा गाना बजा रहा है। कौन कर्म बंधन में कर्म बंधन को भोग रहा है? जेल वाले बाबा मेरा गाना बजा दो।

00:34:41:01 ठीक है क्योंकि यह सब हो गया क्योंकि इन्होंने कुछ उदाहरण दिए हैं अंट सीधे आ जाते हैं अध्याय चार के श्लोक 23 24 का भाव अब ये भाव क्यों बता रहे हैं अनुवाद क्यों नहीं बता रहे हैं ये यही बताएं मगर इसमें है क्या भाव क्या बताया है जो साधक सर्व कर्म परमात्मा को साक्षी रखकर कर रहा है उसके सर्व कर्म ब्रह्म परमात्मा जैसे होते हैं। अब देखिए पहली बात तो यहां पर जो यह कारक शब्द आए हैं जैसे होते हैं। है ना? जो एक दूसरे से पंक्ति को जोड़ते हैं जो शब्द ये सब जो शब्द आ रहे हैं यहां पर इन शब्दों को प्रकट करने वाले संस्कृत शब्द भी होने चाहिए। संस्कृत में वो भाव होना चाहिए। पहली बात। दूसरी बात यह है कि यहां पर इसने ब्रह्म शब्द का अर्थ क्या माना है? परमात्मा जबकि ब्रह्म तो अलग है क्योंकि ब्रह्म शब्द यहां आया है। 23 वे श्लोक में 24 वे श्लोक में ब्रह्म शब्द आया है। तो 23वा श्लोक क्या कह रहा है? जिसकी आसक्ति सर्वथा नष्ट हो गई है। पहले हम पढ़ लेते हैं। 23 वा श्लोक

00:35:56:07 क्या कह रहा है। जिसकी आसक्ति सर्वथा नष्ट हो गई है। जो देह अभिमान से और ममता से रहित हो गया। जिसका चित्त निरंतर परमात्मा के ज्ञान में स्थित रहता है। ऐसे केवल यज्ञ संपादन के लिए कर्म करने वाले यज्ञ संपादन मतलब धर्म शास्त्र के द्वारा कहे गए कर्म को करने वाले मनुष्य के संपूर्ण कर्म भलीभांति विलीन हो जाते हैं। करने वाला होते हुए भी वो कर्म विलीन हो जाते हैं। उनका कर्म फल नहीं बनता है। आगेकि

00:36:30:21 और आगे इसमें क्या है? वही अपना फेवरेट वाला जो श्लोक है ब्रह्म्पणम ब्रह्म अभी ब्रह्माो ब्रह्मणा हुतम ब्रह्मते गंतव्यम ब्रह्म कर्म समाधि चार 24 जिसमें इस वालों ने भी बहुत हेराफेरी कर रखी है इस श्लोक में खैर जिस यज्ञ में अर्पण अर्थात स्त्रवा आदि भी ब्रह्म है और हवन किए जाने योग्य द्रव्य भी ब्रह्म है तथा दता ब्रह्म रूप कर्ता के द्वारा ब्रह्म रूप अग्नि में आहुति देना रूप क्रिया भी ब्रह्म है। उस ब्रह्म कर्म में स्थित रहने वाले योगी द्वारा प्राप्त किए जाने योग्य फल फल भी ब्रह्म ही है। अब यहां एक यज्ञ के पर्सपेक्टिव से आपको धर्म का धर्म रूपी जो यज्ञ है धर्म का पालन करने वाले का फल बताया जा रहा है कि आप जो धर्म धर्म कार्यों में जो आप क्रिया करते हो वो भी ब्रह्म होती है। धर्म कार्यों में जो आपका जो सामग्री यूज़ होती है वो अलग-अलग तरीके की सामग्री कही जा सकती है। तो वह भी ब्रह्म है और फल स्वरूप आपको प्राप्त भी ब्रह्म होता है मगर इसने क्या किया है इसने कहा है कि जो साधक सर्व कर्म परमात्मा को साक्षी रखकर कर रहा है अब ये साक्षी क्या है

00:37:46:07 हम इसका वो कहां है संस्कृत शब्द उसके सर्व कर्म ब्रह्म परमात्मा जैसे हो जाते तो यहां पे सबसे पहली बात तो यह है ब्रह्म की बात हो रही है एक बार नहीं कम से कम ब्रह्म शब्द कितनी बार आया है इस श्लोक है 44 किसी को भी रामपाल को मुंह तोड़ जवाब अगर देना हो तो चार 24 खोलना गीता का क्योंकि इसमें ब्रह्म की बात हुई है और इस बेवकूफ व्यक्ति ने यहां पर ब्रह्म को परमात्मा कहा है। ठीक है? अगर यह कहे कि नहीं एक ही शब्द के अलग-अलग अर्थ हो सकते हैं तो इसी व्यक्ति ने अगले पृष्ठ में गीता प्रस के अनुवादको द्वारा और अन्य आचार्यों के भाष्यों में जो एक ही शब्द के अलग-अलग अर्थ लिए गए हैं उस पर कटाक्ष किया है कि देखो ये लोग कितना गलत करते हैं। एक जगह यहां पर ब्राह्मण का अर्थ जो है ब्रह्म लिया है। सच्चिदानंद ब्रह्म लिया है। दूसरी जगह ब्राह्मण ब्रह्मण शब्द का अर्थ लिया है वेद। एक ही शब्द के अलग एक ही शब्द के अलग-अलग अर्थ दूसरे लोग नहीं कर सकते मगर रामपाल कर सकता है। ठीक है? तो यहां देखो इसने ब्रह्म को परमात्मा खुद कहा है और इसमें ब्रह्म शब्द आया है। एक भी बार जो है परम ब्रह्म शब्द नहीं आया है। ये भी बात है। एक बार तो आता इसमें कई बार ब्रह्म शब्द है। देखिए जिस यज्ञ में

00:39:01:13 अर्पण अर्थात स्त्रवा आदि भी ब्रह्म है। हवन किए जाने योग्य द्रव्य भी ब्रह्म है। तथा ब्रह्म रूप कर्ता द्वारा करने वाला भी ब्रह्म है। ब्रह्म रूप कर्ता के द्वारा ब्रह्म रूप अग्नि में आहुति देना रूप क्रिया भी ब्रह्म है। उस ब्रह्म कर्म में स्थित रहने वाले योगी द्वारा प्राप्त किए जाने योग्य फल भी ब्रह्म ही है। अब इतनी बार ब्रह्म आया है। इस व्यक्ति ने इसका अनुवाद क्यों नहीं किया? इसलिए नहीं किया क्योंकि अगर कर देगा तो इसके ढोल की पोल खुल जाएगी। चार 24 में अच्छे-अच्छों की ढोल की पोल खुल जाएगी। जो सनातन सिद्धांतों के विरुद्ध सनातन धर्म ग्रंथों का सहारा लेकर के शिक्षा देने का प्रयास कर रहा होगा। उसकी चार 24 में आकर के पोल खुलनी निश्चित है। कोई भी हो। निश्चित है। क्योंकि यहां सनातन सिद्धांत है कि सब कुछ ब्रह्म है। ठीक है।

00:40:02:07 खैर आगे चलते हैं। अब चार के श्लोक 25 से 30 तक में क्या कहा है? पहले हम 25 से 30 अपना पढ़ ले। अन्य योगी जन श्रोत्र आदि समस्त इंद्रियों को संयम रूप अग्नियों में हवन किया करते हैं। देखिए मैंने कहा ना कि इंद्रियों इंद्रिय संयम की जो बात कही गई है उसका ये खंडन करता है। जबकि एक जगह भगवत गीता में यह कहा गया है कि जो व्यक्ति इंद्रिय संयम तो कर रहा है परंतु मन से जिन इंद्रियों को उसने सिकोड़ के रखा है उनहीं इंद्रियों का जो विषय है उसका चिंतन कर रहा है तो वो भी मूर्ख है तो उस चिंतन वाली बात को कट कर दिया और ये कहा कि इंद्रिय संयम करने वाले मूर्ख है बीच में जो चिंतन है विषयों का चिंतन करने वाला मूर्ख है उसको इसने कट कर दिया ठीक है तो अभी देखना ये इंद्रिय संयम का विरोध भी करेगा और इंद्रिय संयम का समर्थन भी करेगा। ये है जेल वाले बाबा। ठीक है? तो देखो कैसे विरोध करेगा। अभी ये पहले हम पढ़ लेते हैं। 25 से 30 तक में भगवान ने कहा क्या है? जो सार है 25 से 30 तक का वह यह है कि भगवान ने अलग-अलग तरह से भगवान के लिए प्रयत्न करने वाले

00:41:17:10 मुमुक्षुओं की बात की है कि कोई योग के द्वारा करता है। कोई अपने शरीर पर नियंत्रण करता है। कोई भगवान का तप करता है। नाम जप करता है। इस तरह की भाव यहां से प्रकट किए हैं। आगे इसको देख लेते हैं। योगी लोग और देखिए कुछ योगी योगी जो होते हैं वो इंद्रियों इंद्रियों को संयम रूप अग्नियों में हवन किया करते हैं। मतलब अपनी इंद्रियों को संयम कर उसको हवन का रूप दिया है। फिर दूसरे शब्दा आदि समस्त विषयों को इंद्रिय रूप अग्नियों में हवन किया करते हैं। ठीक है? इंद्रियों की संपूर्ण क्रियाओं और प्राणों की समस्त क्रियाओं को ज्ञान से प्रकाशित आत्म संयम योग रूप द्वारा अग्नि में हवन किया करते हैं। कई पुरुष द्रव्य संबंधी यज्ञ करने वाले हैं। कितने ही तपस्या रूप यज्ञ करने वाले तो कुछ है जो सामग्री से यज्ञ करते हैं। ठीक है भगवान का कुछ है तपस्या तपस्या रूप सामग्री से यज्ञ करते हैं। तथा दूसरे कितने ही योग रूप यज्ञ करने वाले हैं।

00:42:24:07 कितने ही अहिंसा आदि तीक्षण व्रतों से युक्त यत्नशील पुरुष स्वाध्याय रूप ज्ञान यज्ञ करने वाले हैं। है ना? ज्ञान यज्ञ से करते हैं। मतलब भगवान के प्रति जो चरण हम लोग क्या कहते हैं उसको? स्टेप्स जो ले रहे हैं वह अलग-अलग प्रकार से ले रहे हैं। अब देखिए आगे जो जो हम लोग शरीर का वो करते हैं उपयोग क्या करते हैं? दूसरे कितने ही योगी जन अपान वायु में प्राण वायु को हवन करते हैं। वैसे ही अन्य योगी जन प्राण वायु में अपान वायु को हवन करते हैं। अन्य कितने ही नियमित आहार करने वाले प्राणायाम परायण पुरुष प्राण और अपान की गति को रोक कर प्राणों को प्राणों में ही हवन किया करते हैं। ये सभी साधक यज्ञों द्वारा पापों का नाश कर देने वाले और यज्ञों को जानने वाले हैं। यज्ञ विद है ना यज्ञों को जानने वाले हैं। और यहां पर यज्ञ का अर्थ क्या है? धर्म धर्म कार्यों को जानने वाले हैं। धार्मिक अनुष्ठानों को जानने वाले हैं। यानी कि ब्रह्म ब्रह्म की परम ब्रह्म परमेश्वर मुक्ति को प्राप्त करने की विधि को

00:43:39:08 जानने वाले हैं। ये सभी ठीक है? अब इसने क्या अनर्थ किया है यहां पे? 25 से 30 में भगवान ने जो भी कहा है उसका खंडन किया है कि इन सबको त्यागना है। कैसे त्यागना है बताते हैं। इसने क्या कहा है? अध्याय चार के श्लोक 25 से 30 तक में कहा है कि पष्ठ संख्या 97 कहा है कि इनमें भिन्नभिन्न प्रकार की कर्म उपासना का विवरण किया है। कहा है कि कुछ साधक तो हवन यज्ञ करके कर्म योग को कर रहे हैं। कुछ एक स्थान पर विशेष आसन पर बैठकर कान नाक आंक आदि इंद्रियों को हट के रोक कर संयम

00:44:17:18 करने की साधना में लगे हैं। अन्य भक्त जन देवी देवताओं की भक्ति करते हैं। कुछ दान कुछ घोर तप करते हैं, कुछ व्रत कर पहली बात तो शब्द जो है शब्दों का ध्यान रखिएगा। अपने आप शब्द आ जाते हैं कुछ भी कहीं से भी। ठीक है? कुछ व्रत कर रहे हैं। कुछ अन्य अभ्यास तथा स्वाध्याय, धार्मिक शास्त्र पढ़ना यह सब कर रहे हैं। ठीक है? तो धार्मिक शास्त्र पढ़ना। स्वाध्याय की बात कहां पर आई है?

00:44:57:13 स्वाध्याय को ज्ञान यज्ञ भगवत गीता में कहा गया है अध्याय भगवान को जानना तत्व ज्ञान प्राप्त करना तो ज्ञान यज्ञ कहा गया है भगवत गीता में भी ठीक है और ये सभी करने वालों को इस प्रकार से सभी हवन करने यज्ञ करने वालों को धार्मिक कार्य करने वालों को मुमुक्षु भी कहा है और तत्व से जानने करने वाला भी कहा है और मुक्त हो जाने वाला भी कहा है। तो क्या कहा है आगे? इसने भी माना यहां पर कुछ स्वाध्याय, धार्मिक शास्त्र पढ़ना, कर्म श्रेष्ठ मानकर आध्यात्मिक कर्मों में संलग्न है तथा अन्य प्राणायाम कर रहे हैं और मान रहे हैं कि यह सर्व भक्ति कर्म पाप नष्ट करने वाले हैं। विचार करें। भगवान कृष्ण अर्जुन के रूप में थे। फिर इसने बकवास की अपनी। ठीक है? बकवास करने के बाद इसने इस पैराग्राफ के अंत में कहा है कि

00:45:48:26 इससे सिद्ध है कि वेद व गीता में वर्णित साधना से पाप विनाश नहीं होते। भोगने ही पड़ते हैं। अन्य उपलब्धियां जैसे सिद्धियां व स्वर्ग

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00:46:01:13 महास्वर्ग की प्राप्ति हो जाती है। तो पहली बात तो यह भैया कि सांसारिक सुख सुविधाएं तुमको किससे मिलती है? जो सनातन पद्धति जिसको तुम कहते हो कि गलत है उसी से मिलती है। परंतु पाप कर्म नहीं करते क्योंकि वेदों तथा गीता का ज्ञान अधूरा है। ये ऑफेंसिव वर्ड है यहां पर। वेदों तथा गीता का ज्ञान अधूरा है। झूठा तो है ही है अधूरा भी है। ठीक है? अब इसके बाद ये क्या कह रहा है?

00:46:33:18 इसके बाद इसने फिर अगले पृष्ठ पर 98 पर ऑफेंसिव वो लैंग्वेज की है। क्या कहा है कि ब्रह्मा विष्णु महेश आदि आदि देवताओं की पूजा करने वाले राक्षस स्वभाव को धारण किए हुए मनुष्यों में नीच दूषित कर्म करने वाले मूर्ख कहे। ठीक है? ये सब करा है इसने। अब इस पूरे पैराग्राफ को हम लोग छोड़ करके आगे चलते हैं। इसमें बहुत सारी बकवास की है।

00:47:07:13 वो बकवास क्या है? देखते हैं चार

00:47:12:00 के श्लोक 31 32 में कहा है कि गीता अध्याय चार श्लोक 25 से 30 तक वर्णित शास्त्र विरुद्ध साधना से बचे हुए साधक शास्त्र शास्त्र विधि अनुसार अर्थात नाम साधना करते हैं।

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00:47:27:20 अब सबसे पहली बात है कि चार 31 में कह क्या रहे हैं वो देखना पड़ेगा। फिर आपको समझ में आएगी कहानी। तो यह भगवान ने 25 से 30 तक में यज्ञ यानी धर्म कार्य बताए। ठीक है? भगवान को प्राप्त करने के निमित्त जो कार्य होते हैं उन सब की विवेचना की। उसके बाद उसको यज्ञ का नाम दिया वहां पर। उसके बाद कहा कि इस प्रकार यज्ञ से बचे हुए जब हमने यज्ञ किया तो यज्ञ के परिणाम स्वरूप हमें क्या प्राप्त होता है? उसको कहा है भगवान ने। यज्ञ से बचे हुए अमृत का अनुभव करने वाले योगी जन सनातन परम ब्रह्म को प्राप्त हो जाते हैं। ठीक है? सनातन ब्रह्म सनातन परम ब्रह्म को प्राप्त हो जाते हैं। बात लिखित में आई है। सनातनम ब्रह्म याती प्राप्त होते हैं। यानी 25 से 30 में जो यज्ञ कर्म बताए हैं धर्म बताया है। उसको करने वाला सनातन परमात्मा को प्राप्त होता है। भगवत गीता में स्पष्ट लिखा है। सनातनम ब्रह्म याती सनातन सनातन जिसके आगे लग गया उसके आगे परम अरम लगाने की जरूरत नहीं है। सनातन

00:48:42:21 जिसके आगे लग गया वो सच्चिदानंद स्वरूप हो गया। ठीक है? खैर आगे चलते हैं। तो और क्या लिखा है कि और यज्ञ ना करने वाले पुरुष के लिए तो यह मनुष्य लोक भी सुखदायक नहीं है। फिर परलोक कैसे सुखदायक हो सकता है? तो यानी यज्ञ यानी धर्म। ठीक है? अब इसने क्या कहा है यहां पर जेल वाले बाबा ने कि

00:49:12:21 चार के श्लोक 31 32 में कहा है कि गीता अध्याय चार श्लोक 25 से 30 तक वर्णित शास्त्र

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00:49:19:03 विरुद्ध साधना। अच्छा चार अध्याय चार के 25 से 30 में साधना शब्द आया है क्या? नहीं आया है। बार-बार क्या आया है? यज्ञ। यज्ञ शब्द आया है 25 से 30 में तो यह और यज्ञ से बचे हुए अमृत का अनुभव अब यह यज्ञ से बचने का कह रहा है कि जो शास्त्र विरुद्ध भक्ति से बच जाते हैं मतलब उसमें फंसने से बच जाते हैं। यानी कि यहां पर इसने यज्ञ का अर्थ क्या लिया है? शास्त्र विरुद्ध भक्ति। देखो इसका पंचर दिमाग इसने यज्ञ का अर्थ क्या लिया है? शास्त्र विरुद्ध भक्ति। ठीक है? कि शास्त्र विरुद्ध भक्ति से जो लोग बच जाते हैं वह शास्त्र विरुद्ध

00:50:03:25 कार्य करके या जो भी इसके अनुसार वो करके अपना माथा फोड़ते हैं। मतलब इसके अनुसार शास्त्र विरुद्ध भक्ति से बच जाते हैं। वो शास्त्र विधि अनुसार साधना करते हैं। सबसे पहले तो ये शास्त्र विरुद्ध भक्ति छोड़ के और शास्त्र विधि के अनुसार साधना करने की बात कहां है यहां? कहां लिखी है? कौन से शब्द से वो निकल रहा है? यहां तो 25 से 30 तक भगवान ने बताया कि इस इस तरह से भगवान को प्राप्त करने के कार्य करते हैं और इस प्रकार किए गए यज्ञ से बचे हुए अमृत का अनुभव करने वाले योगी जन सनातन परमात्मा को प्राप्त होते हैं। प्राप्त कर लिया। मगर यहां पर इसने पूरा भाव ही बदल दिया 25 से 30 श्लोकों का। यानी 25 से 30 में जो बातें कही है वह सारे उन कर्मों से बचना है। उनमें फसना नहीं है। इंद्रिय संयम में नहीं फसना है और वो जो अनुशासित रूप से आहार वगैरह में ध्यान रखना है। भक्ष का ध्यान रखना है वो सब नहीं करना। जबकि खुद ही अभी आगे कहेगा भी देखना। बेवकूफी की पराकाष्ठा भाई पराकाष्ठा। अगर तुमसे कोई कभी जीवन में कहे ना कि दुनिया के सबसे बड़े मूर्ख को ले आओ तो तुम्हें ढूंढने जाने की जरूरत नहीं है। इस किताब को लिखने वाला यदि वो रामपाल है और दुनिया का सबसे बड़ा मूर्ख है सीधे हिसार जेल दो में चले जाना।

00:51:19:13 ठीक है? ब्रह्मा विष्णु महेश को अज्ञानी कहने वाला और ब्रह्मा विष्णु महेश की भक्ति करने वालों को राक्षस और नीच और दूषित कर्म दूषित कर्म करने वाला कहने वाला मूर्ख कहने वाला खुद कितना बड़ा मूर्ख है देखो तो अब पहली बात तो ये आती है क्या यज्ञ का अर्थ शास्त्र विरुद्ध साधना होता है अब हम इसी के अनुसार अगर यज्ञ का अर्थ शास्त्र विरुद्ध साधना है जिससे बचे हुए जो तत्व जो जिसके हमारे अनुसार जिसके परिणाम स्वरूप जो हमें जैसे भगवान पे हमने प्रसाद चढ़ाया प्रसाद चढ़ाया तो उसके बाद जो प्रसाद हम ग्रहण करते हैं वो क्या हुआ भगवान को चढ़ाए जाने के बाद बचा हुआ प्रसाद उसी तरीके से जो हमने यज्ञ कर्म किया धर्म कर्म किया उस उसके द्वारा मिलने वाला जो हमें फल है वो होता है मोक्ष ठीक है तो अब हम इसको इसी की बात से काटते हैं कि क्या यज्ञ का मतलब यज्ञ का अर्थ ये शास्त्र विरुद्ध साधना मानता है कि नहीं तो भैया पृष्ठ संख्या इनको दिखाओ 40

00:52:26:26 यज्ञ का अर्थ इसने शास्त्र विरुद्ध साधना कैसे ले लिया पूछो इससे डीजे नहीं जेल वाले बाबा से 40 नंबर प्रश्न पे दिखाइए इनको तीन 11 का वहां अर्थ किया गया है हां इसमें देखिए 31 का अर्थ करते हुए 3 10 का अर्थ करते हुए क्या बता रहा है यह बाबा क्या बता रहा है? पूर्ण तीन 10 से पढ़ते हैं। ठीक है? अनुवाद प्रजापति यानी कुल के मालिक ने कल्प के अंत आदि में यज्ञ सहित प्रजाओं को रचकर उनसे कहा कि अन्न द्वारा होने वाला धार्मिक कर्म जिसे धर्म यज्ञ कहा कहते हैं। ठीक है? इसने यज्ञ का अर्थ क्या माना है? धार्मिक धार्मिक कर्म धार्मिक अनुष्ठान ठीक है नीचे भी आप देख लीजिए यज्ञ के द्वारा देवताओं अर्थात संसार रूपी पौधे की शाखाओं को उन्नत करो और देवताओं ये वो यज्ञ का अर्थ इसने धार्मिक अनुष्ठान माना है तो यहां पर इसने यज्ञ का अर्थ क्या माना धार्मिक

00:53:42:00 अनुष्ठान और यहां पर यज्ञ का अर्थ क्या बता रहा है कि शास्त्र विरुद्ध साधना यह है जेल वाले बाबा। ठीक है? अब बात यह है कि शास्त्र विरुद्ध साधना जो है वो तो बुरी है ही। फिर आगे क्या है? आगे भगवान ने कहा है कि जो लोग यज्ञ नहीं करते यानी धर्म कार्य नहीं करते हैं ऐसे 31 वे श्लोक में और यज्ञ ना करने वाले अब यज्ञ का अर्थ तो इसने शास्त्र विरुद्ध कर्म कहा है तो और यज्ञ ना करने वाले पुरुष के लिए तो यह मनुष्य लोक भी सुखदायक नहीं है। फिर परलोक कैसे सुखदायक हो सकता है? तो भगवान ने यज्ञ ना करने वालों को क्रिटिसाइज किया यहां पर। वो गलत है। तो यह यह कह रहा है कि यज्ञ का अर्थ है शास्त्र विरुद्ध साधना। यह यह कह रहा है। यानी कि शास्त्र विरुद्ध साधना ना करने वाले लोग जो होते हैं वो गलत होते हैं। अब देखो इसने क्या किया? इसने शास्त्र विरुद्ध साधना जब यज्ञ को मान लिया है तो आगे यज्ञ ना करने वालों को फिर से कह रहा है कि वह दयाहीन श्रद्धाहीन हो जाते हैं। वास्तविक जाप

00:54:57:03 मंत्र बिना केवल यज्ञ करना भी निष्फल है। अब इस पर आ गया। इधर यज्ञ करने को मना किया। यज्ञ का अर्थ शास्त्र विरुद्ध साधना। और फिर अगले पृष्ठ पर 99 वे प्रश्न पर इसमें क्या कह रहा है कि इस प्रकार यज्ञ ना करने से साधक अहंकारी दयाहीन श्रद्धाहीन हो जाता है। वास्तविक जाप मंत्र बिना केवल यज्ञ करना भी निष्फल है। अभी कह रहा था कि यज्ञ करना गलत है। यह धार्मिक जो 25 से 30 में बताए। अब कह रहा है कि यज्ञ करो। परंतु वास्तविक जाप मंत्र के साथ करो। तो यह बात कहां गई कही? इन श्लोकों में कहीं नहीं कही। परंतु भगवान ने इस प्रकार यज्ञ करने वालों को मुक्त बता दिया। सनातन परम ब्रह्म को प्राप्त करने वाला बता दिया। तो यह है जेल वाले बाबा का गाना। आगे यदि गुरु जी से नाम नहीं ले रखा है तो उसने फिर अपनी वही बकवास की है। आगे चलते हैं। अब चार श्लोक 32 में क्या कहा है? कि चार श्लोक 32 में 99 वे पष्ठ पर 99

00:56:02:14 चार श्लोक 32 में कहा है कि पूर्ण परमात्मा द्वारा अपने मुख कमल के सूक्ष्म वेद में सभी यज्ञों यानी धार्मिक अनुष्ठानों का विस्तार पूर्वक विवरण है जो सांसारिक कर्तव्य कर्मों तथा शारीरिक यानी शरीर द्वारा दान सेवा स्मरण आदि भक्ति कर्मों से संपन्न होते हैं। इस प्रकार जानकर साधक मुक्त हो जाता है। उस तत्व ज्ञान को मैं गीता बोलने वाला प्रभु भी नहीं जानता जो पूर्ण परमात्मा के पूर्ण मोक्ष मार्ग का विवरण है। ठीक है? उसके लिए अध्याय चार श्लोक 34 में कहा है कि उस तत्व ज्ञान को जानने वाले संतों की खोज कर। ठीक। अब इसमें नोट करके इसने एक बात और कही है। वह भी पढ़ लेते हैं। गीता जी के अन्य अनुवाद्ताओं ने गीता अध्याय चार श्लोक 32 का अनुवाद ठीक नहीं किया है क्योंकि उन्होंने ब्राह्मण का अर्थ वेद किया है। अब यहां देखिए कॉमेडी देखिए कॉमेडी किंग है रामपाल देखिएगा कि ब्राह्मण ब्राह्मण शब्द का अर्थ वेद किया है तो उसको प्रॉब्लम है। ठीक है? तो ब्रह्मण का शब्द का अर्थ जो है फिर यह बोल रहा है जबकि गीता अध्याय 17 श्लोक 23 में ब्रह्मण का का अर्थ उन्होंने ही सच्चिदानंद घन ब्रह्म किया है जो सही है। तो इसने

00:57:17:15 मान लिया कि ब्रह्म का अर्थ जो है सच्चिदानंद घन ब्रह्म होना चाहिए। वेद नहीं होना चाहिए। ठीक है? इसलिए मानव समाज गीता जी के अनमोल ज्ञान को यथार्थ भाव से नहीं जान पाया। अब बात यह आती है कि इस व्यक्ति ने यहां पे वेद मानने से मना कर दिया। उसका मतलब क्या माना कि वहां पर तो सच्चिदानंद ब्रह्म होना चाहिए। मगर अगले पैराग्राफ में देखिए गीता अध्याय चार श्लोक 25 से 30 तक में कहा है कि कुछ साधक देवताओं की पूजा रूपी यज्ञ अर्थात धार्मिक कर्म करते हैं। दूसरे हट योग द्वारा कर्म इंद्रियों को साधते हैं। दूसरे स्वास क्रिया करते हैं। अन्य घोर तप तथा अहिंसा आदि घोर व्रत करते हैं। अन्नदान ही करते हैं। दूसरे योगी जन केवल अल्पाहार करते हैं। या सर्व साधक अपनी अपनीपनी साधनाओं को पाप नाशक जानते हैं। पाप नाशक जानते नहीं। वहां कहा गया है कि वो यज्ञ यज्ञ को जानने वाले धर्म को जानने वाले होते हैं। मोक्ष मार्ग को जानने वाले होते हैं। श्लोक 32 में कहा है कि उपरोक्त साधनाओं सहित पूर्ण मोक्ष का मार्ग ज्ञान सच्चिदानंद घन ब्रह्म अर्थात पूर्ण परमात्मा के द्वारा अपने मुख कमल से कहे जाने कहे गए ज्ञान अर्थात सच्चिदानंद की घन सच्चिदानंद घन की वाणी में है। सूक्ष्म वेद यानी कबीर वाणी

00:58:32:19 में है। अब देखिए इसने ब्राह्मण शब्द का अर्थ वेद मानने से मना कर दिया। वहां कहा कि नहीं नहीं वहां तो सच्चिदानंद घन ब्रह्म होना चाहिए। जबकि ये कुतर्क भी इसका गलत है। क्योंकि खुद ही ये एक ही शब्द के अनेक अर्थ लेता है। पर यदि कोई दूसरा करे तो वहां टोकता है। एक ही शब्द के कई अलग-अलग हो सकते हैं। इस हमने कई बार विवेचना कर रखी है। और ब्रह्म शब्द का अर्थ वेद भी हो सकता है। इसके बारे में भी हमने कहा है। ब्रह्म शब्द का अर्थ वेद भी माना है निरुक्त में। यह भी हमने बताया है। पर यह टोकता है। जब एक ही शब्द के अलग-अलग अर्थों का प्रसंग के अनुसार उपयोग करे कोई तो यह टोकता है। इसको वहां प्रॉब्लम है। खुद करता है। जैसे परम का अर्थ इसने कई जगह कहा है कि परम और कई जगह परम का अर्थ परदादा वाला कोई और है। पर जबकि वहां पर दादा में भी जो पर लगा होता है वो परम के रूप में होता है। परमदा जो परदादा दूसरे दादा नहीं जो इनसे श्रेष्ठ है। है ना पर दादा। खैर इस पर बात कर लेते हैं। तो एक तो यह दूसरे के द्वारा एक ही शब्द के अलग-अलग अर्थ किए जाने पर टोकता है। इसको प्रॉब्लम है। और दूसरा उसने वेद ने वेद उसने सच्चिदानंद घन ब्रह्म क्यों क्यों नहीं किया? वेद क्यों

00:59:47:22 किया? सच्चिदानंद घन ब्रह्म सही अर्थ है किस शब्द का? ब्रह्मण का। तो इसको वहां प्रॉब्लम थी। तो वहां पर वेद को नहीं माना इसने। मगर वही पर थोड़ी देर बाद अपनी कबीर वाणी को ठूस दिया। जैकपॉट मतलब ब्रह्मणा शब्द का अर्थ तो परमेश्वर हो सकता है। वेद नहीं मगर थोड़ी देर बाद खुद ही कह रहा है कि ब्रह्मणा शब्द का अर्थ कबीर वाणी है। वेद नहीं कह सकते तुम। तुमने ही कहा है कि ब्रह्म होता है उसका अर्थ परम ब्रह्म। इसलिए वेद मत कहो। उसके बाद थोड़ी देर बाद खुद कहेगा कि नहीं यहां पे तो उसने कबीर वाणी के लिए कहा है। ठीक है? अब समझ में आया थोड़ा बात मेरी समझ में आ रही होगी अब फिर गीता अध्याय चार के श्लोक 34 में कहा है कि उस ज्ञान को तू तत्वदर्शी संतों से समझ तत्वदर्शी संत की पहचान आगे बताई है अब 33 34 आने वाला उससे पहले हम अपना अर्थ पढ़ ले 32 33 का तो 32 में क्या कहा है भगवान ने इस प्रकार और भी बहुत तरह के यज्ञ वेद की वाणी में विस्तार से कहे गए हैं। ठीक है? अब

01:01:02:24 यहां पे देखिए वेद की वाणी में विस्तार से कहे गए हैं। उन सबको तू मन इंद्रिय और शरीर की क्रिया द्वारा संपन्न होने वाला जान। इस प्रकार तत्व से जानकर उनके अनुष्ठान द्वारा तू कर्म बंधन से सर्वथा मुक्त हो जाएगा। और इसने क्या कहा है? अब 33वा पढ़ते हैं। 33 का पहले अपना पढ़ लेते हैं। द्रव्यमय यज्ञ की अपेक्षा ज्ञान यज्ञ अत्यंत श्रेष्ठ है। ज्ञान यज्ञ ध्यान दीजिए। द्रव्यमय यज्ञ की जगह अपेक्षा ज्ञान यज्ञ अत्यंत श्रेष्ठ है। तथा यावन मात्र संपूर्ण कर्म ज्ञान में समाप्त हो जाते हैं। ठीक है? तो यहां पर ज्ञान यज्ञ की बात हो रही है और ज्ञान यज्ञ के लिए 34 में कहा है कि उस ज्ञान को तू ज्ञान यज्ञ के ज्ञान को तू तत्वदर्शी ज्ञानियों के पास जाकर समझ उनको भलीभांति दंडवत प्रणाम करने से उनकी सेवा करने से और कपट छोड़कर सरलता पूर्वक प्रश्न करने से परमात्म तत्व को भलीभांति जानने वाले ज्ञानी महात्मा तुझे तत्व ज्ञान का उपदेश करेंगे।

01:02:18:12 यहां केवल नाम देते हैं। तत्व ज्ञान नहीं है कुछ। तत्व ज्ञान यह है कि यह लोग गलत है। मैं सही हूं और मैं तुम्हें क्या दूंगा? नाम। कोई तत्विक विवेचना नहीं है मेरे पास। मेरे पास केवल नाम है। ये सब है कि वो फेंटसी जो इसने बना रखी है ना परिक कथाएं वो सब है। अच्छा इसको जानने से क्या होगा? ये ध्यान देने योग्य बात है। जिसको जानकर तू इस प्रकार मोह को प्राप्त दोबारा नहीं होगा। जिस ज्ञान के द्वारा तू संपूर्ण भूतों को संपूर्ण प्राणियों को निशेष भाव से पहले स्वयं में और उसके बाद मुझ सच्चिदानंद घन ब्रह्म परमात्मा में देखेगा मतलब वही ब्रह्म ब्रह्म ब्रह्म सब कुछ ब्रह्म है और ये हमने 35 वे तक पढ़ लिया अब ये बहुत इंपॉर्टेंट है पूरा एक तरीके से इसके द्वारा इसके अनुसार इसके शब्दों में कहे तो रामपाल की जो पूरी एक वो है ना षड्यंत्र उसका का एक बहुत महत्वपूर्ण पहलू है चार चौथे तत्वदर्शी तो क्या है अब हमने पढ़ लिया कि ज्ञान यज्ञ श्रेष्ठ है और उसी ज्ञान यज्ञ के बारे में 34व में बताया जा रहा है कि वो ज्ञान यज्ञ कहां से मिलेगा तत्वदर्शी के पास जाने से मिलेगा और ज्ञान

01:03:33:13 स्वरूप तुमको क्या प्राप्त होगा कि तुम सब में ईश्वर को देखोगे सब में परमात्मा को देखोगे या इसके अनुसार गीता बोलने वाले को देखोगे क्योंकि उसने कहा ना मुझ मई है ना मई शब्द आया है 4:35 में ध्यान देने योग की बात है। मई शब्द आया है। मई का अर्थ मुझ ठीक है? अगर इसके अनुसार वो परमात्मा नहीं है तो संपूर्ण प्राणियों को पहले खुद में स्वयं में और फिर मुझ में देखेगा। किस किस ज्ञान से? जो ज्ञान तुझे तत्वदर्शी से मिलेगा। उसको ज्ञान एक का ज्ञान है। अब पहली बात आती है कि ये क्या कहता है? पहले इसका पढ़ लेते हैं। क्या कहा है इसने? तो अध्याय चार के श्लोक 33 34 तथा 35 का भाव है कि गीता ज्ञान दाता ने अर्जुन से कहा कि हे अर्जुन इस प्रकार पूर्ण परमात्मा के ज्ञान को अब भाई यहां पूर्ण परमात्मा शब्द कहां आया है? ज्ञान यज्ञ आया है ना पूर्ण परमात्मा कहां आया है? ज्ञान परमात्मा के ज्ञान को व समाधान को जानने वाले तत्वदर्शी संतों के पास जा। यहां पूर्ण परमात्मा का ज्ञान नहीं आया। भाई यहां शब्द आया है ज्ञान यज्ञ। ठीक है? उनको अधिनी पूर्वक आदर के साथ धन प्रणाम कर प्रेम प्रेम विनय पूर्वक उस परमात्मा का मार्ग पूछ फिर वह संत पूर्ण परमात्मा के को

01:04:48:16 पाने की विधि वो विधि क्या है सतनाम व सारनाम अर्थात ये तत्सत मंत्र बताएंगे इनकी संस्कृत क्या है बताएंगे जिसको जानकर तू फिर इस प्रकार अज्ञान रूप मोह को प्राप्त नहीं होगा फिर तू इसी ज्ञान के आधार पर पहले अपने आप को जानेगा कि मैं काल के जाल में फंसा हूं। ठीक है? अब देखिए इसमें ढोल की पोल हम पकड़ेंगे कैसे? कैसे पकड़ेंगे? देखिए कि पहले तू अपने आप को जानेगा कि मैं काल के जाल में फंसा हूं तथा फिर मुझे काल रूप से देखेगा तथा तब तू यहां से निकलने की पूरी चेष्टा करेगा। अब सबसे पहली बात है कि उस ज्ञान से तुझे क्या मिलेगा? तो इसमें आया है तू संपूर्ण भूतों को निशेष भाव से पहले अपने में। तो यहां भूतानी शब्द आया है। जिस ज्ञान के द्वारा तुम भूतानी संपूर्ण भूतों को अगर संपूर्ण नहीं लगाओगे तो भूतों को तो लगाओगे तो उसको उनको पहले मुझ में देखेगा पहले स्वयं में देखेगा तो संपूर्ण भूत कहां गए भैया यहां से अर्थ करते समय कहां गए वो उनके बारे में बात क्यों नहीं की है कि पहले खुद में देखेगा पहले तू अपने आप को जान लेगा नहीं अपने आप को जानने की बात नहीं कही है संपूर्ण भूतों

01:06:03:25 को स्वयं में देखेगा और उसके बाद गीता को कहने वाले में देखेगा। तो यहां क्या लिख रहा है तू बेवकूफ बाबा कि पहले तू स्वयं को जानेगा कि मैं काल के जाल में फसा हूं और फिर तू ये जाने और फिर तू मुझे देख लेगा कि मैं कौन हूं और फिर तू भैया संपूर्ण भूतों को पहले स्वयं में और फिर मुझ और अगर हमारी दृष्टि से कहे तो मुझ परमात्मा में सबको देखेगा। ये आपको तात्विक ज्ञान मिलना चाहिए। तत्वदर्शी से यही बताया है। 15 एक में नहीं बताया है। तीन चार 35 में ही बता दिया कि तत्वदर्शी क्या ज्ञान देगा आपको। एक पहली बात दूसरी बात यह है कि तत्वदर्शी कौन है? ज्ञान यज्ञ का ज्ञान देने वाला। चार 33 में क्या कहा जा रहा है? कि ज्ञान यज्ञ श्रेष्ठ होता है। उस उसके ज्ञान को तू तत्वदर्शी के पास जाके समझ। तो तत्वदर्शी कौन हुआ? ज्ञान यज्ञ का ज्ञान देने वाला। अब जरा इनको वो

01:07:05:15 इसी का नौव अध्याय में एक जगह इस व्यक्ति ने ज्ञान यज्ञ का अर्थ माना है। शास्त्रों का पठनपाठन। हालांकि ज्ञान यज्ञ का अर्थ है शास्त्रों का पठन पाठन भी है, प्रवचन सुनना भी है, सब कुछ है। मगर ये ज्ञान यज्ञ का जो अर्थ है वो निश्चित मानता है शास्त्र पढ़ना। ठीक है? नौव अध्याय में वह मैंने आपको जो फोटो बताई थी लिंक भेजा था एक वह दिखाइए उसमें नौवा अध्याय है नौव अध्याय का कोई पष्ठ है वहां से आप निकाल के इनको दिखाएं

01:08:03:13 मिला आपको खैर अभी हम बात कर लेते हैं वो जब तक निकाल के दिखा रहे हैं तो ज्ञान यज्ञ का अर्थ इसने माना है ज्ञान यज्ञ का अर्थ इसने माना है। मैंने आपको लिंक भेजा है ना एक जब मैंने आपको ये ढूंढने को कहा था तो उसके बाद मैंने आपको लिंक भेज दिया था कि अब नहीं ढूंढना है। उस लिंक में आप स्क्रॉल करोगे तो लास्ट से सेकंड लास्ट वगैरह कुछ है। नौवें अध्याय का ही है वो। जहां पे इसने ज्ञान यज्ञ का अर्थ माना है। बुलेट पॉइंट में ऐड कर देंगे ज्ञान यज्ञ का। ये टाइमिंग नोट कर लीजिएगा। बुलेट पॉइंट में ऐड कर देंगे। आप टाइमिंग नोट कर लीजिए। बुलेट पॉइंट में ऐड कर देंगे। तो

✅ This part is already used · 01:09:02:00 – 01:12:30:24 (3:29)

→ Used in: B · Video रामपाल का मनमौजी गीता अर्थ #7 अध्याय 4 का #श्लोक #gita #gitagyan at 20:00 ↗

01:09:02:00 अब पहली बात है ज्ञान यज्ञ क्या है? इसके अनुसार ज्ञान यज्ञ है। शास्त्रों का पठन पाठन और शास्त्रों के पठन पाठन से मुक्ति नहीं है। इसने अपने कई पष्ठों में कह दिया है कि पांचों यज्ञों से मुक्ति नहीं है। मुक्ति किसी और चीज से है। और तो और अभी इसने थोड़ी देर पहले ही जो भगवत गीता का ज्ञान यज्ञ कहा गया है जो 25 से 30 के बीच में उनका भी खंडन किया है। उनसे भी मुक्ति नहीं है। तो ज्ञान यज्ञ के ज्ञान को देने वाले को तत्वदर्शी कहा है। तो यदि रामपाल यह वाला तत्वदर्शी 434 का ठीक है? यदि रामपाल 434 का तत्वद है तो मुक्ति देने वाला नहीं है क्योंकि वह ज्ञान यज्ञ का ज्ञान देने वाला है। हां यदि वह नाम देने वाला है तो उसका श्लोक यहां होना चाहिए। उसके बारे में श्लोक यहां होना चाहिए कि वो ये ज्ञान यज्ञ का ज्ञान नहीं ये वाला ज्ञान भी देगा। ये भी देगा ये भी देगा। वो श्लोक होना चाहिए ना प्रमाण। तुम इस श्लोक के आधार पर उसको तत्वदर्शी सिद्ध मत करो। मोक्ष देने वाला सिद्ध मत करो। दूसरी बात यह है कि भगवान ने इसकी बेवकूफी की देखिए सीमाएं क्या है? इसने अपनी भगवत गीता में यह गरमा गीता की का कचरा करते समय और उसमें ये लिखा है कि अर्जुन को मोक्ष भी मिला। मोक्ष कैसे मिल गया? उसको तत्वदर्शी तो मिला

01:10:17:06 नहीं था। अच्छा हम अगर देखें तो अर्जुन को मोक्ष मिला? बिल्कुल मिला। और जो गीता कहने वाला जो है यहां पर भगवान श्री कृष्ण गीता कहने वाले हैं और दो 16 में विद्या और अविद्या को जानने वाला होने के रूप में वो वहां पर तत्वदर्शी सिद्ध हो रहे हैं। विद्या और अविद्या को जानने वाला तत्वदर्शी है। वहां पर कहा गया है। ठीक है? तो भगवान श्री कृष्ण तत्वदर्शी वहां सिद्ध हो रहे हैं। तो यहां पे भगवान कहना क्या चाह रहे हैं कि तू भैया उसको तत्वदर्शी के पास जाके जान। अच्छा उस समय तत्वदर्शी था कौन? जो कह रहे हैं कि तू तत्व के पास जाकर जान क्या वो लगभग महाभारत के कितने वर्षों के बाद ये आए हैं कबीर कुछ नहीं तो मेरे ख्याल से दो ढाई हजार वर्ष के बाद तो आए हैं तो क्या दो ढाई हजार वर्ष के लिए कह रहे थे कि अर्जुन तू जब मैं 600 क्या कहते हैं कलयुग में जब ये कबीर आएंगे तो उससे लेना तुम ज्ञान कौन था उस समय तत्वदर्शी जिसके पास जाने को कह रहे हैं। दूसरी बात अर्जुन गया क्या? तीसरी बात भूलक से लिख दिया है रामपाल ने कि अर्जुन को मोक्ष मिला मगर क्या यह मानता है कि अर्जुन को मोक्ष मिला मिला तो उसको ज्ञान किसने दिया ये बहुत सारी बातें यहां पर खड़ी हो जाती है एक कि तत्वदर्शी गीता कहने वाले सिद्ध है दो 16 से दूसरा

01:11:32:28 कि चार 34 के अनुसार रामपाल के शब्दों में अगर कहा जाए तो तत्वदर्शी जो है चार 34 वाला तत्वदर्शी मोक्ष देने वाला नहीं है मोक्ष ज्ञान देने वाला नहीं है बल्कि यज्ञों का ज्ञान देने वाला है अगर वो साथ में नाम भी देता है रामपाल के अनुसार तो वो नाम का नाम लेने जाने वाला श्लोक यहां होना चाहिए कि भैया तू उसको उस नाम को तू तत्व दृष्टि से जाके जान किस नाम को तुझे जपना है मगर यहां ऐसी कोई बात नहीं कही गई तो मोक्ष देने वाला सिद्ध नहीं है तीसरा क्या है कि भगवत गीता चार 35 के अनुसार तत्वदर्शी जो ज्ञान देगा उसके अनुसार आपको क्या प्राप्त होगा कि पहले पूरी दुनिया में पूरी दुनिया स्वयं में दिखने लगेगी और फिर सारे समस्त संसार तुम्हें ईश्वर में दिखने लगेगा। यह ज्ञान प्राप्त होता है तत्व ज्ञान से। तो ये सारी चीजें अप्लाई नहीं होती है और तुम तत्वदर्शी नहीं बन पाते हो। तुम बन पाओगे जेल वाले बाबा। ठीक

⬜ Not used yet · 01:12:30:24 – 01:20:29:10 (7:59)

01:12:30:24 है? लिंक दे दीजिए अपना पूरा होने वाला है और इन सब इन सब शब्दों का तो यहां अर्थ है संस्कृत शब्द है ही नहीं कि मैं काल के जाल में कैसे फसा तब तू यहां से निकलने की पूरी चेष्टा करेगा यह है वो है ठीक है अच्छा इसने देखो क्या खुराफात की है 15 से तत्वदर्शी के तत्वदर्शी के द्वारा दिए जाने वाला ज्ञान कैसा होगा तो इसने 435 को नहीं उठाया है 435 की बात नहीं की है। तत्वदर्शी से तुझे कैसा ज्ञान मिलेगा? सीधे चला गया 15 एक में 15 एक से चार में। अरे क्यों भाई? तत्वदर्शी से तुझे कैसा ज्ञान मिलेगा? यही पे बता ना तो वो उसको दिक्कत है। हर जगह बात करेगा। 15 एक में देखो। 15 एक में चार 35 मत देखो। कि तुमको क्या ज्ञान मिलेगा तत्वदर्शी से? तो ये तत्वदर्शी वाला चैप्टर अलग से बना के डाल देना भाई।

01:13:24:28 अब इसके बाद क्या बोल रहा है यह? पवित्र गीता जी को बोलने वाला काल प्रभु ने कहा है कि द्रव्यम में यज्ञ यानी धन से होने वाले धार्मिक अनुष्ठान जो बिना तत्व ज्ञान समझे करते हैं जैसे दान देना धर्म भंडारा लंगड़ भोजन करना वस्त्रदान करना कुएं धर्मशाला प्याऊ आदि आदि धर्म बनवाना से ज्ञान यज्ञ श्रेष्ठ है अर्थात पहले पूर्ण संत से आध्यात्मिक संपूर्ण ज्ञान समझ फिर उनके द्वारा बताए गए धर्म यज्ञ कर अपने मन से कुछ भी बोल लो। अब यहां पर जो है यज्ञ का अर्थ इसने धर्म यज्ञ ले लिया। अब देखिए इसकी बाल की खाल पकड़ते हैं। क्या है? गीता अध्याय चार श्लोक 36 से 42 का सारांश नीचे है ना? गीता अध्याय चार श्लोक 36 से 42 का सारांश। सबसे लास्ट पैराग्राफ की हेडलाइन पे वो कर लीजिए अंडरलाइन। अब यहां देखिए इसने क्या कहा है अध्याय चार श्लोक 36 पहले हमारा 36 पढ़ ले क्या लिखा है यदि तू अन्य सभी तब पापियों से भी अधिक पाप करने वाला है तो भी तू ज्ञान रूप नौका द्वारा निसंदेह

01:14:40:21 संपूर्ण पाप समुद्र से भलीभांति तर जाएगा अब इसने क्या लिखा है उपरोक्त ज्ञान तथा साधना के करने से अब देखिए यहां फस गया उपरोक्त क्या है मतलब कि उपरोक्त जो ज्ञान दिया गया है और और तथा साधना यानी कि उक्त साधना यानी यहां पे इसने मान लिया कि गीता में साधना बताई गई है। इसने मान लिया देखिए क्या लिखा है। उपरोक्त ज्ञान तथा साधना के करने से साधक पापियों से भी अधिक पाप करने वाला है तो भी तत्व ज्ञान रूपी नौका द्वारा पाप के समुद्र से भलीभांति तर जाएगा। ठीक है? इसने यहां यह मान लिया उपरोक्त ज्ञान उक्त ज्ञान यानी उपरोक्त साधना उक्त साधना यानी गीता में साधना लिखी हुई है कौन सी साधना जिसको जिसका जो करने से है ना जो करने से समुद्र से भलीभांति तर जाएगा ये उक्त अगर गीता में वो साधना नहीं लिखी हुई है तो उक्त शब्द नहीं आएगा फिर वो आएगा कि इन दिशा दिशा निर्देशों के अनुसार जो है जो दिशा निर्देश दिए जा रहे हैं ज्ञान प्राप्त करने हेतु उनका पालन

01:15:55:22 करने से तुम्हें वो ज्ञान प्राप्त हो जाएगा मगर उक्त ज्ञान उक्त साधना नहीं दिए गए दिशा निर्देशों के अनुसार तुम्हें जो मोक्ष दिलाने वाली साधना है वो प्राप्त हो जाएगी ये कहा जाएगा मगर उक्त साधना उक्त साधना का मतलब यहां साधना दी गई है तो इस बेवकूफ ने जो ये भाषा का भी ज्ञान है वो कम होने के कारण यहां पे एक और अपने लिए पंचर कर लिया। किसी को अपना दिमाग पंचर कराना हो तो वो इसका ज्ञान लेने जाए इसके उसमें।

01:16:28:02 ठीक है? अगला पढ़ते हैं क्या है? अध्याय 37 इस श्लोक में क्या कह रहे हैं? क्योंकि हे अर्जुन जैसे प्रज्वलित अग्नि अब यहां पे भगवान ने एक उदाहरण दिया है इस श्लोक में। ईंधनों को भस्म भस्मय कर देता है। वैसे ही ज्ञान रूप अग्नि संपूर्ण कर्मों को भस्मय कर दे। ज्ञान क्या है? संपूर्ण प्राणियों को अपने आप में। ज्ञान क्या है? वो क्या कहते हैं? जो अभी चार 24 हमने पढ़ा था वो ज्ञान चार 24 क्या पढ़ा था हमने? ब्रह्मपणम ब्रह्म अभी ब्रह्मा है ना ब्रह्मणाम ब्रह्मते गंतव्यम ब्रह्म कर्म समाधना ये ज्ञान है तो इस जब ये ज्ञान हो जाता है और वो ज्ञान समस्त प्राणियों को स्वयं में फिर भगवान में देखना वो ज्ञान जब हो जाता है कि एक ही परम तत्व है तो वो ज्ञान हो जाता है तो उसके कारण उस ज्ञान के कारण समस्त जो कर्म है कर्म फल है उनके प्रति आसक्ति वो सब नष्ट हो जाती है भस्म हो जाता है इसने क्या कहा है चार 37 में इस श्लोक में कहा है कि तत्व ज्ञान को जानकर

01:17:43:06 तत्वदर्शी संत से नाम दीक्षा लेकर बस नाम मिलेगा तत्वदर्शी के पास और कुछ नहीं वो पर कथाएं मिलेंग बाकी दीक्षा लेकर साधना करने से साधक के पाप कर्म ऐसे भस्म हो जाते हैं जैसे वो भावार्थ है कि तत्व ज्ञान बताने वाला संत साधना की साधना भी बताएगा जिससे पाप नष्ट हो जाएंगे साधक भविष्य में कोई पाप कर्म नहीं करता ठीक है आगे चलते करके चार 38 में क्या कहा है भगवान ने इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला निसंदेह कुछ भी नहीं है। उस ज्ञान को कितने ही काल से कर्म योग द्वारा शुद्ध शुद्ध अंतःकरण वह मनुष्य अपने आप ही आत्मा में पा लेता है। तो ये जो ज्ञान क्या कहते हैं? कर्म का फल क्या है? जो कर्म योग के रास्ते पर चल रहा है जो अपना मैं ऐसा कर्म करूंगा ऐसा नहीं करूंगा ऐसा करूंगा ऐसा नहीं करूंगा तो कर्म योग का भी फल क्या है एक अंतत गथवा ज्ञान ही है बस होने वाला है ठीक है

01:18:45:15 कर्म योग का फल भी ज्ञान ही है तो वो जो कर्म योग पर चलने वाला जो योगी होता है वो भी प्राप्त कर लेता है इस ज्ञान को अपने आप ही आत्मा में पा लेता है इसने क्या लिखा है। इसने लिखा है कि इसलिए इस संसार में तत्व ज्ञान के समान कोई पवित्र करने वाला नहीं है। जो संपर्क में आने वाले को शुद्ध कर देता है। उस ज्ञान के आधार पर तत्वदर्शी संपर्क में के संपर्क में आकर शुद्ध अंतःकरण हुआ भक्त स्वयं ही अपना अनुभव बताता है। क्या है भाई? बताता है।

01:19:20:21 बहुत इसने बकवास की है। कुछ भी कहीं पर भी लिख देता है। अब इसकी इससे कहो इसकी संस्कृत करो। वो मैच करो भगवत गीता की संस्कृत से मैच हो रही है कि नहीं तत्व ज्ञानी इंद्रिय इंद्रियों पर संयम करके देखो मैंने अभी थोड़ी देर पहले कहा था ना 25 से 30 के बीच में इंद्रिय संयम आया था तो इसने खंडन किया था वहां पे अभी देखो इंद्रिय संयम तत्व ज्ञानी इंद्रिय संयम उससे आगे का सूक्ष्म वेद वाला संपूर्ण ज्ञान इंद्रिय संयम करके ठीक है यहां इंद्रिय संयम का समर्थन हो गया अभी 25 से 30 में जब गीता यही बात बोल रही थी तो उसका खंडन था। अब अपने मन से इंद्रिय संयम ला दिया। यहां 39 में भगवान ने क्या कहा है? जितेंद्रिय यहां पर भगवान ने भी इंद्रिय संयम की बात की है। साधना परायण मगर इसने एक जगह खंडन किया। एक जगह यहां मान लिया। साधना परायण और श्रद्धावान मनुष्य ज्ञान को प्राप्त होता है तथा ज्ञान को प्राप्त होकर वह बिना विलंब के तत्काल ही भगवत प्राप्ति रूप परम शांति को प्राप्त हो जाता है। इसने क्या कहा है? कि वो सूक्ष्म वेद का ज्ञान प्राप्त करता है। उस

01:20:29:10 तत्व ज्ञान को तत्व ज्ञानी से प्राप्त करके साधक शीघ्र ही परम ब्रह्म साधना से होने वाली गति से दूसरी

⬜ Not used yet · 01:20:36:00 – 01:40:01:00 (19:25)

01:20:36:00 गति से दूसरी गति से होने वाली परम शांति को प्राप्त हो जाता है। परम शांति की बात हो रही है। ब्रह्म साधना से होने वाली गति से दूसरी गति से होने वाली परम शांति को प्राप्त हो जाता है। 440 440 क्या कह रही है कि विवेकहीन यानी 440 तो हमारा भी फेवरेट श्लोक है। कई बार उपयोग में आता है। क्या है? विवेकहीन और श्रद्धा रहित संशय युक्त मनुष्य परमार्थ से अवश्य ही भ्रष्ट हो जाता है। ऐसे संशय युक्त मनुष्य के लिए ना यह लोक है ना परलोक है और ना ही सुख ही है। अब इसने क्या कहा है कि इसको पढ़ लेते हैं अपनी अपनी वाली गीता का। आगे दो ही तीन है। जिसने कर्म योग की विधि से समस्त कर्मों का परमात्मा में अर्पण कर दिया है और जिसने विवेक द्वारा समस्त संशयों का नाश कर दिया है। ऐसे व में किए हुए अंतःकरण वाले पुरुष को कर्म नहीं मानते। इसके बाद क्या है? इसलिए हे भारतवंशी अर्जुन तू हृदय में स्थित इस अज्ञान जनित अपने संशय का विवेक ज्ञान रूप तलवार द्वारा छेदन करके समत्व रूप कर्म योग

01:21:51:01 में स्थित हो जा और युद्ध के लिए खड़ा हो जा। ठीक? अब देखिए इसमें मजा आने वाला है। बहुत बहुत आनंद आएगा आपको। जेल वाले बाबा के गाने में। अब इसका पढ़ते हैं। अब इसने क्या कहा है? 40 वे में विवेक हीन आदि से जिसको तत्व ज्ञान नहीं मिला उसका संशय समाप्त नहीं होता। ठीक है? वह सत्य मार्ग से अवश्य भटक कर नष्ट हो जाता है। संशय युक्त व्यक्ति के लिए ना यह लोक सुखदायक है ना परलोक सुखदायक है। अब यहां पे कहा है कि भाई और आगे संशय की बात और कर लेते हैं। जिसने तत्व ज्ञान सुनकर विवेक द्वारा संशय का नाश कर लिया है। जिसने सर्व भक्ति कर्म परमात्मा पर छोड़ दिए है। वह पुनः पाप कर्म नहीं करता जिस कारण से वह कर्म के बंधनों में नहीं बंधन। मगर बात यह है कि क्या यह तत्वदर्शी अपने फॉलोअ के संशय दूर करने वाला है? इतने संशय है ना इसकी बुक में ही इसकी बुक में वो तत्व ज्ञान तो छोड़ो कबीर परमेश्वर के संबंध में सतलोक सतलोक आश्रम के संबंध में सतलोक के संबंध में इतने इतने संशय है कि पूछो नहीं

01:22:54:09 और ये तो इसकी किताब में इतने संशय है उनको ही नहीं समाप्त कर सकता हम क्यों आज मैंने एक व्यक्ति से पूछा जो सतलोक वाला जो अता पता बताने वाला जो इनका कस्टमर केयर वो कह रहा है मैं अपना नाम नहीं बताऊंगा। उसका नाम ना उसका नाम जानना भी एक संशय पूर्ण कार्य है। नाम तक नहीं बता पा रहे हैं शर्म के मारे। इतनी लज्जा है इनको अपने तत्व ज्ञान पर।

01:23:28:21 है ना? और ये है तत्वदर्शी संशय नष्ट करने वाले। खैर तो अंत में बात करते हैं। इसमें इसने बहुत से ऐसे शब्द है ना कि द्वारा संशय का नाश कर जिसने सर्व भक्ति कर्म परमात्मा पर छोड़ दिए हैं। परमात्मा पर छोड़ दिए कि संस्कृत कहां है? कहीं नहीं है। फिर इसने आगे कहा है कि चार के 42 में भगवान ने क्या कहा? इस प्रकार विचार करके हे भारत अपने हृदय में उत्पन्न अपने संशय को ज्ञान रूपी तलवार से काटकर भक्ति कर्म में स्थित होकर साधना के लिए खड़ा हो जा यानी भक्ति के लिए कमर कस ले। अब देखो जब ये भगवान श्री कृष्ण यह कहते हैं ज्ञानार्थक दृष्टि से मेरी शरण में आ जा चल के नहीं गत्यातार्थक नहीं ज्ञानार्थक दृष्टि से मेरी शरण प्राप्त कर यानी कि जो तू सोच रहा है कि भाई परमात्मा कोई और है वो जो परमात्मा की शरण में तुझे जाना है तो वो मेरी शरण में आ जा ठीक है ज्ञानार्थक दृष्टि से तो ये वहां पर कहते अर्जुन तो पहले से ही वहां पर है फिर उसको जो है जाने जाने की क्यों कह रहे हैं? अर्जुन तो पहले से ही कृष्ण की शरण में है। तो फिर वो क्यों कहेंगे कि मैं मेरी शरण में आजा। है ना? अब ये बताइए इसने

01:24:43:22 यहां पर ये इस बेवकूफ ने यहां पर ये लिखा है कि भक्ति करने के लिए खड़ा हो जा। भक्ति करने के लिए खड़ा हो जा। भक्ति बैठ के नहीं होगी। इससे पूछो इस बेवकूफ से। वहां पर भगवान कह रहे हैं कि समस्त कर्मों को मुझ में अर्पित करके तू युद्ध करने के लिए खड़ा हो जा। कर्मों को इस भाव के कुल मिलाकर के पूरा सारांश क्या है कि कर्मों को तू इस भाव के साथ कर कि तू केवल शास्त्र भेद कर्म कर रहा है। ईश्वर के द्वारा कहे गए वचनों का पालन कर रहा है। बस तू अपने फल की आसक्ति को ध्यान में रख के कर्म मत कर तू नहीं बंधेगा। और ये युद्ध भी मत कर। ऐसा सोच करके तू अपने केवल शास्त्र वेद कर्मों के कहे गए वचनों के अनुसार तू अपना कर्म कर। ये पूरा चैप्टर समझाया है। तो ये वहां पर युद्ध युद्ध के लिए खड़ा हो जा। इसको यह कह रहे हैं आगे कि विचार करिए कि चार के श्लोक 42 में मेरे अलावा सभी अनुवादों ने गलत अर्थ किया है और यह कहा है कि युद्ध के लिए खड़ा हो जाओ जबकि युद्ध के लिए वहां कह रहा है युद्ध के लिए खड़ा होने को नहीं कह रहे हैं और इसमें इसने तर्क दिया है कि पूरे अध्याय में परमात्मा के तत्व ज्ञान तथा अज्ञान का विश्लेषण है तो फिर वो युद्ध के लिए खड़ा होने की बात क्यों कहेंगे? परमात्मा की भक्ति के लिए खड़ा होने की बात कहेंगे।

01:25:58:28 अरे भैया पहले परमात्मा की भक्ति के लिए खड़ा होना आवश्यक है क्या? ऐसे ही पकड़ते हो ना तुम बातों को। खड़ा हो खड़ा होना आवश्यक है क्या? परमात्मा की भक्ति के लिए खड़ा हो जा। युद्ध के लिए तो खड़ा होना समझ में आता है। बैठ के तो लड़ेंगे नहीं। हां। तो जब खड़ा होने की बात आ रही है तो वो युद्ध से ही रिलेट करेगी ना। यह है गप वाले गपोड़ जेल वाले बाबा का गाना तो यह इनकी अल्पज्ञता का प्रमाण है कि खड़े होने को भी इन्होंने भक्ति से जोड़ा युद्ध हटा के कि भक्ति के लिए खड़ा हो जा और फिर कह रहे हैं मतलब भक्ति के लिए कमर कस ले यानी अगर इनकी बात मानी जाए तो वास्तविकता में कमर नहीं कसनी है या फिर इनसे पूछो कि इनके जितने ये जो टहल रहे हैं ना मार्केट में वो सब क्या कमर को कस के टहलते हैं क्या? पूछो तुम्हारी कमर कसी है क्या तुमने? तो तुम्हें मानना पड़ेगा कि ज्ञानार्थक दृष्टि से कमर कसने की बात कह रहे हैं। अगर रामपाल की बात को यहां माना भी जाए तो ज्ञानार्थक दृष्टि से तुम कमर कस सकते हो। मगर ज्ञानार्थक दृष्टि से अर्जुन भगवान की शरण में नहीं जा सकता।

01:27:15:06 धर्त तो यहां पर ये 42वा श्लोक 42वा श्लोक के साथ ये चैप्टर चौथा पूर्ण हुआ और आपने देखा कि और ये तर्क क्या दे रहा है? इस तर्क को बताना भूल गया। तर्क दे रहा है कि पूरे अध्याय में परमात्मा की बात हो रही। भाई पूरे पूरी भगवत गीता में भगवत गीता शुरू ही इसलिए हो रही है कि अर्जुन जो है युद्ध नहीं करना चाहता था। उसको धर्म और अधर्म में निर्णय लेना कठिन हो गया था। इसलिए भगवान बार-बार बहुत सारा विश्लेषण दे के उसको बता रहे हैं कि यह धर्म युक्त युद्ध है। शास्त्र अनुसार युद्ध है। अनासक्त होते हुए कर्म फल से अपने दृष्टि को हटाते हुए मुझ परमात्मा में लगाते हुए तू युद्ध के लिए खड़ा हो जा। तो तुम्हारा यह तर्क भी एक गधा बुद्धि तर्क है। जब तुम कह रहे हो कि पूरा चैप्टर जो है परमात्मा के लिए है। यह पूरा चैप्टर ये बताने के लिए कि तुमको क्या करना है और क्या नहीं करना है और किस आधार पर निर्णय लेना है। अपने मन में कौन से भाव को रखना है और ये पूरा जो चैप्टर है वो युद्ध की युद्ध की पृष्ठभूमि पर है। कि तुमको यह युद्ध क्यों करना चाहिए? यह धर्म युक्ति युद्ध है। धर्म को धर्म की रक्षा के लिए

01:28:30:09 युद्ध है। ऐसा युद्ध क्षत्रियों को सौभाग्य से प्राप्त होता है। गधे कौन है यहां पर? अमित जी। लिंक एक बार और दे दीजिए। थोड़ी बहुत बात करेंगे। लंबी चर्चा हम लोग किसी और समय कर लेंगे।

01:29:06:26 ले लीजिए इनको अमित जी को। आज का चैप्टर बहुत अच्छा था। रोचक था। जय श्री राम भैया जी। जय श्री राम। जय श्री राम आप आप आ चुके हैं क्या स्क्रीन पर हां बिल्कुल जी बताइए जय श्री राम जय श्री राम जी नहीं एक धर्म गुरु नाम से एक सज्जन थे वो चैट में काफी भगवत गीता के बारे में बकवास करे जा रहे थे तो मैंने कहा कि अभी ऐड हो जाना तुम वीडियो के बाद तुम्हें सारे आपके उत्तर मिल जाएंगे अभी बोल रहे हैं कि मैं बैकस्टेज में हूं मुझे लेते नहीं है क्योंकि क्योंकि सब डरते हैं मुझसे तो धर्म गुरु नाम का अगर कोई है तो उसको भी तुम हो कौन भाई जो तुमसे डरेंगे पहले तुम्हें जानने वाले तो होने चाहिए कि तुम भी वही ऐसा आदमी है कि ना अपना धर्म बता रहा है धर्म बताने में इसको अपनी शर्म आ रही है मैंने कहा तुम्हें अपने पिता का नाम नहीं पता तो तुम क्या भगवत गीता के बारे में बात करोगे पहले अपना तो परिचय दो हम्म नहीं वो गलत भाषा बोलने

01:30:21:27 वाले को नहीं लिया जाएगा और मैं कुछ चीजों पर दृष्टि डाल दूं कि इन दिनों ऐसी कुछ चर्चाएं सामने आ रही है। आने वाले टाइम में हम लोग वीडियो के माध्यम से बताएंगे। हमको नोटिस दिए जा रहे हैं। ये जो हमने कल जो वीडियो डाला है ना ऑडियो हां जिसमें व्यक्ति हम पर अरेस्ट कर रहा है और बार-बार परेशान कर रहा है। जी बिल्कुल। है ना? हमने उसका जो ऑडियो डाला उसके संबंध में हमको एक नोटिस आया है। उस संबंध में हम एक वीडियो बना देंगे आगे। ठीक है। और ये कुछ बातें फैलाई जा रही है कि हम जो है विदेशों से पैसा मांगते हैं। ये है वो है। भाई सबसे पहली बात है कि विदेश विदेश से आपका यदि संपर्क है तो इसका अर्थ ये नहीं हो गया कि आप जो है वहां से विदेश से जो है पैसा मंगाने वाले हो गए। दूसरी बात है तो हां जी। दूसरी बात यह है कि भाई विदेश से गलत रूप से गलत तरीके से पैसा मंगाना गलत है। ठीक है। विदेशों में आश्रम इनके भी है। ये खुद ही बोलते हैं ना यहां हो गया, वहां हो गया। तो क्या इनमें लेन देन नहीं होगा? विदेशों से होगा ना। इनके यहां तो सब फर्जी होगा। हां नहीं फर्जी होगा। मगर लेनदेन तो हो ही जाएगा ना। अगर हमारा कोई

01:31:37:03 जानने वाला या हमारा कोई फॉलो करने वाला कहीं विदेश में शिफ्टेड है जैसे इस समय पहाड़ी जी की बात ही ले ले तो पहाड़ी जी इस समय वहां है शायद मलेशिया में तो अब उनसे अगर हमारा आदान प्रदान होगा तो क्या इसको ऑफेंस के रूप में लेंगे और फिर दूसरी बात ये भी तो देखो कितना आता है क्या आता है कोई बिल्कुल देशों से कोई ₹31 भी भेज देता है कहीं-क कभी-कभी ₹51 भी भेज देता है इसकी इसका उड़ा इसका चौआ उड़ाने का जो है इसको आधार बनाने का आहान के अभियान को दबाने का इसको आधार बनाया जा रहा है और खुद फर्जी संस्था खोल करके विदेशों में यहां ये झंडे गाड़ दिए वो झंडे गाड़ दिए वो वो तब नहीं ध्यान है ठीक है इससे कुछ होने वाला नहीं है अगर कोई भेज रहा है तो सब सनातनी भेज रहे हैं। कोई रामपाली थोड़ी ना आके भेज रहे हैं इनको। एक बात और है अभी एक ब्राह्मण वाला वो हुआ है। उसकी बात भी बोलनी थी कि ये वो ब्राह्मणों ने ऐसा किया। देखो सबसे पहली बात जो है वो जो इटावा वाला जो वो हुआ है इटावा इटावा में एक घटना हुई है कि कहीं पे कोई यादव जो है ऐसा दिखाया जा रहा है। हालांकि वो प्रायोजित घटना दिखाई दे रही है। मैं बता देता हूं क्या है कि इटावा में कोई यादव जो है यादव जी जो है

01:32:52:26 प्रवचन दे रहे थे या भागवत कह रहे थे तो उनको आकर के ब्राह्मणों के एक समूह ने तिरस्कृत किया और नीचे उतार के मतलब उनको जो अपमानित किया उनके जो है उनको सर के बाल जो है मुंडवा दिए गए। सर मुंडा दिया गया उनका चोटी सब और भी अपमानजनक बातें हुई हैं। ऐसा प्रायोजित किया जा रहा है। परंतु वास्तविकता क्या दिख रही है कि क्या आज के वातावरण में यह घटना आपको प्रासंगिक दिख रही है। यह एक नाटकीय प्रस्तुति है। राजनीतिज्ञों के द्वारा यादव और ब्राह्मण यादव और ब्राह्मण में लड़ाई कराने के लिए हिंदू हिंदू में लड़ाई कराने के लिए और यादव ब्राह्मण के नाम पर वोट कमाने के लिए ठीक है ये ऐसा प्रतीत हो रहा है कि भाई यह सारी चीजें जो है यह पूर्व में ही सुनिश्चित थी क्या होना है क्या नहीं होना है और उसको आधार बना करके और यह जो है कार्य किया गया है तो इसलिए जो वास्तविकता में धर्म के पक्षधर है सत्य के पक्षधर हैं वो इस यह जो विवाद खड़ा किया जा रहा है जबरदस्ती का उसके आधार पर उस पर टीका टिप्पणी तर्क वितर्क करने से स्वयं को बचाएं। हां ठीक है

01:34:07:27 जो व्यवस्था आज लागू ही नहीं है आज जब जो व्यवस्था आज लागू ही नहीं है उस व्यवस्था को गरियाने के नाम पे बुरा भला कहने के नाम पर वोट कमाने की राजनीति दिखाई दे रही है जैसे कि आर्य समाज क्या करता है या इस क्या करता है कि देखो तुम्हारे जैसे जातिवादियों के चक्कर में आज धर्म परिवर्तन हो रहा है। अरे भैया जातिवाद आज लागू जो जातिवाद शास्त्र सम्मत जातिवाद जातिवाद घृणा मूलक नहीं व्यवस्था मूलक जो वर्ण व्यवस्था है वो आज लागू कहां है आज लागू ही नहीं है कोई व्यक्ति बाहर अपने घर से बाहर भोजन प्राप्त भोजन करते समय ये नहीं देखता है इस भोजन को किसने बनाया तो आपका ये कहना गलत है कि उस व्यवस्था के कारण धर्म परिवर्तन हो रहा है और वो एक समाज को चलाने की व्यवस्था थी और आज तक की व्यवस्था पिछले 1400 सालों में जो व्यवस्था लागू हुई है वर्ण व्यवस्था के विरोध में आज वो लागू है और यदि जो वातावरण है उसके अनुसार आप ये मानते हो कि धर्म परिवर्तन हो रहा है तो आपकी व्यवस्था वर्णाश्रम के विरोध में जो व्यवस्था खड़ी की गई है उसके कारण धर्म परिवर्तन हो रहा है। मैं अभी हो सका समय मिला तो वीडियो बनाऊंगा। बहुत सारे मंदिर ऐसे बहुत

01:35:23:03 सारे जिसमें पुजारी अ्राह्मण है। कौन जाकर के उनको हस्तक्षेप कर रहा है कि तुम हटो तो फिर ये नाटकीय रूपांतरण प्रस्तुत करने की आवश्यकता क्यों है कि देखो देखो वो ब्राह्मणों ने यादव को हटा दिया। यह सारी प्रस्तुति है। राजनीतिक प्रस्तुति है। इसलिए जो पक्षधर है धर्म के वो इस पर टीका टिप्पणी करने से दूर रहे। इसमें अपना समय इसमें अपना समय देने से दूर रहे। उसका चैट मैंने पढ़ लिया है उस व्यक्ति का। ठीक है। और चलिए आज के लिए इतना कार्य काफी है। इतना हमने बताया। अमित जी आप आए अच्छा लगा। और जिसकी मां ने निष्ठा पूर्वक दूध पिलाया हो वह आकर के रामपाल की बकवास को शास्त्र सम्मत तत्व ज्ञान सिद्ध करें उसके लिए आमंत्र उसके लिए स्वागत है। यदि कोई है हमसे संपर्क करें 7408301869

01:36:24:26 ठीक है और बुलेट पॉइंट्स इस एपिसोड के आपको मिल जाएंगे अमित जी आप बोले नहीं बिल्कुल ठीक बात है शिवास जी और आप अगर हमारे राम मंदिर में भी देख लीजिए वहां पे सभी जातियों के पंडित हैं उनको अपनी योग्यता के अनुसार अपॉइंट किया गया है जो नया राम मंदिर बना है वहां भी जी देखिए सार ये है कि जो व्यवस्था लागू ही नहीं है जिस व्यवस्था को लागू करवाने के लिए हम लोग दिन रात परिश्रम कर रहे हैं उस व्यवस्था को आधार बना करके आप जो है समाज का नुकसान दिखा रहे हो। अगर वास्तव में जो क्रियान्वित व्यवस्था है उसके आधार पर अगर आप मान रहे हो कि विप्लव है तो आपको अपनी व्यवस्था को दोष देना चाहिए जो आपने वर्णाश्रम के विरोध में खड़ी की है। वर्णाश्रम को दोष नहीं दे सकते। वर्णाश्रम लागू कहां पर है?

01:37:23:20 बिल्कुल जी भैया जी। चलिए ठीक है अमित जी आप आए अच्छा लगा और तो आने वाले समय में हमारी जो धरातल पर कारवाही हो रही है चल रही है उसको लेकर के एक समीक्षा और जो हमें नोटिस प्राप्त हो रहे हैं उनका उत्तर देने का प्रयास करेंगे क्योंकि हमारे पास इतना समय नहीं है कि ऐसे जो कोई भी व्यक्ति कुछ भी बकवास करता रहे हम बार-बार उसको जो है श्रम करके और उसको उसकी अपेक्षा अनुसार उत्तर देते रहे। तुम करो तुम बस ये याद रखना कि तुम प्रारंभ करोगे और हम उसका अंत तुम बस यह याद रखना कि

01:38:24:12 यह क्या बोल रहा है? अरे मूर्ख छह लोगों की मौत हरियाणा सरकार के द्वारा हुआ है। तुम बस ये याद रखना कि तुम यह जो सोच रहे हो कि हम इस तरह से दबा देंगे, यह कर देंगे, वह कर देंगे। तो यह व्यक्ति जिससे तुम्हारा इस बार सामना है, यह अ जो शिष्य है अल्पज्ञ शिष्य श्रीमद जगतगुरु शंकराचार्य पूरी पीठाधीश्वर जी का जिसके साथ तुम इस समय सामना कर रहे हो तो यह अपने अंतिम सांस तक तुमसे पीछे तुम्हारे पीछे पड़ा रहेगा और तुम्हारे लिए जो है कार्य करता रहेगा तुम्हारा प्रतिकार करता रहेगा तो तुम यह समझना भूल जाओ कि तुम इस तरह के नोटिस भेज के 15 लाख का यह नोटिस ढाई लाख का यह नोटिस भेज के मेरी आवाज को दबाओगे या करोड़ों रुपए का लालच देकर के मुझे खरीद लोगे। यह सारी चीजें तुम भूल जाओ कि ऐसा तुम्हें कुछ मिलने वाला है। ठीक है? और फिर कह रहा हूं व्यक्तिगत राय

01:39:40:00 कि मत पड़ो चक्कर में। कोई नहीं है टक्कर में। सभी को जय श्री राम। [संगीत]

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A: AHVAAN - Call Of Dharma Live 1:40:07 · 26 Jun 2025

गीता के नाम पर रामपाल के बोलबचन अध्याय 4 Ep-7 #satlokashram

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