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00:00:02:12 तो सभी को जय श्री राम। आशा करते हैं आप सभी कुशल पूर्वक

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→ Used in: B · Video रामपाल का मनमौजी गीता अर्थ #6 अध्याय 3 का #श्लोक #gita #gitagyan at 0:09 ↗

00:00:07:22 होंगे और इस बात का मुझे फेर है इन दिनों मैं आप लोगों को समय कुछ कम दे पा रहा हूं। YouTube पर बहुत ज्यादा एक्टिव नहीं हूं। बट इसके साथ ही साथ मुझे भी प्रसन्नता है और आप लोगों को भी इस बात का संतोष होगा। प्रसन्न आप अवश्य यह जानकर प्रसन्न हुए होंगे कि हमने विधर्मियों की अधर्मियों की पाखंडियों की खाट खड़ी कर रखी है धरातल पर।

00:00:48:19 तो इसीलिए थोड़ा सा समय कम मिल पा रहा है। पर जो इस कारण से हम पिछले सप्ताह उपस्थित नहीं हो पाए थे मगर ना उपस्थित होने की स्थिति में आपको कई सारी शुभ सूचनाएं अच्छे समाचार अच्छे संकेत प्राप्त हुए तो थोड़ा सा विवरण भी बात कर लेते हैं। जैसा आप सभी को पता ही होगा कि रामपाल का एक व्यक्ति यहां पर ठेले पर किताबें बेचते बेचते पकड़ा गया है और उस पर जो है मुकदमा दर्ज हो गया है। अ इस संबंध में किसी का फोन भी मेरे पास आया था तो उससे वार्ता हुई है।

00:01:39:01 उनकी उनके पक्ष से रखने वाला एक व्यक्ति तो इस संबंध में वार्ता हुई है। आने वाले समय में वह वीडियो भी आपको मिल जाएगा कि किस तरह के कुतर्क करते हैं ये लोग? क्या पराकाष्ठा है? कहां तक जा सकते हैं? कुतर्कों में इनका लेवल क्या हो सकता है? किस तरह जब बात इनकी खंडित होने लगती है तो टॉपिक बदल करके दूसरा टॉपिक लाने का प्रयास करते हैं। वो सभी आपको आने वाले टाइम में दिख जाएगा। जो बात हुई है। फिलहाल हम लोग जल्दी से जो पिछला वाला हमारा चैप्टर था उसका कुछ बुलेट पॉइंट्स हमने तैयार किए वो हम ले लेते हैं।

00:02:22:04 सबसे पहला है 31 से स्टार्ट करेंगे। तो 3:19 का संभता इन्होंने अर्थ लिया नहीं है। पृष्ठ संख्या 3 20 पृष्ठ संख्या 48 इसमें इन्होंने 48वें पृष्ठ में गरिमा गीता की हम पढ़ रहे हैं। 48वें पष्ठ में तीसरे अध्याय के 20वें श्लोक का अर्थ दिया है और इससे पहले यानी कि पृष्ठ संख्या 47 में इन्होंने तीसरे अध्याय के 17 से 18 श्लोक का अर्थ दिया है। इन्होंने 19वें श्लोक का अर्थ नहीं किया है। तो इसका अर्थ है कि हमें जो है 19वें श्लोक को अमान्य मानना पड़ेगा। उस कैटेगरी में डालना पड़ेगा कि भाई वह काल ने अपने मन से बोल दिया था इसलिए इन्होंने लिया नहीं। तो हम ये भी काउंट करते जा रहे हैं कि कितने श्लोक इन्होंने अमान्य घोषित किए हैं। कितने श्लोकों की बात को इन्होंने माना नहीं। तो इसको भी उसमें डाल दिया। और इसके बाद इन्होंने तीन 20 में सीधे अगली बात कही है कि जो श्रद्धालु किसी मनोकामना

00:03:37:06 की पूर्ति की इच्छा ना रखकर अपना धार्मिक कर्तव्य जानकर दान करता है वह वास्तविक दान है। जबकि उसमें और कुछ कहा जा रहा है। तो उसमें बताया जा रहा है कि जो भगवान ने धर्म धर्म यज्ञ बताया है उसके अनुसार चलने वाले जो लोग हैं जनक आदि वह भी मोक्ष को प्राप्त कर गए थे। मतलब वहां भगवान ये बता रहे थे गृहस्थ होते हुए भी जनक ने मुक्ति प्राप्त की थी। वो बता रहे थे। तो यहां पे इन्होंने पूरा अर्थ ही बदल दिया। मुक्ति वाला हिस्सा हटा ही दिया। यहां सिद्धि की कोई बात ही नहीं की। है ना? और अलग ही एक इनका गाना चलने लगा। 320 में इसके बाद 31 से 24 में इन्होंने क्या किया है तुलना की है काल और कृष्ण की यह बहुत जरूरी है। काल और कृष्ण की तुलना कैसे की है कि तीन 21 से 24 में इन्होंने बताया है कि गीता को बोलने वाला यह कह रहा है यदि मैं अच्छे कर्म ना करूं तो मुझे क्योंकि मैं श्रेष्ठ हूं तो मुझे फॉलो करने लगेंगे लोग और मैं अगर अच्छे कर्म नहीं करूंगा तो लोग भी अच्छे कर्म नहीं करेंगे मतलब बुरे कर्म करने लगेंगे। अब यहां पर रामपाल ने अपनी पुस्तक में यह बताने

00:04:52:16 की कोशिश की है कि विचार करें कृष्ण भगवान के तो इतने बुरे बुरे कर्म है उसके अनुसार तो फिर जब कृष्ण भगवान के इतने बुरे बुरे कर्म है तो वो यहां पे ये कैसे कह सकते हैं कि मैं अगर अच्छे कर्म ना करूं तो इससे पता लगता है गीता बोलने वाले कृष्ण नहीं है बल्कि काल है काल है कृष्ण से सेपरेट है तो कृष्ण भगवान अच्छे कर्म करने वाले नहीं है रामपाल के अनुसार तो क्या काल अच्छे अच्छे कर्म करने वाला है। बलात्कारी, झूठा, राक्षस, अपना उल्लू सीधा करने वाला हम जो उसकी भक्ति करे उसको वो खा जाता है। तो कृष्ण भगवान अच्छे कर्म करने वाले नहीं है। मगर रामपाल यहां पर काल को अच्छा कर्म करने वाला मान रहा है। ये क्यों? पहली बात। दूसरी बात यह है इसने यहां पर इस पृष्ठ पर 48 वे पृष्ठ पर 48 वे पष्ठ की बात चल रही है। इसने इस पृष्ठ पर जो है बहुत सारी बुराई की है। कृष्ण भगवान के जो लीलाएं उनका जो वृतांत है उनका अपार्थ करके बहुत सारी बकवास यहां लिखी है। तो इसने ये दर्शाने की कोशिश की है। कृष्ण भगवान तो इतने बुरे कर्म करने वाले थे। तो फिर वह यह क्यों कह

00:06:07:20 रहे हैं कि अगर मैं अच्छे कर्म ना करूं इससे पता लगता है कि अच्छे कर्म जो ना करने की बात जो कह रहा है वह काल है जो कृष्ण से अलग है। मगर मैं आपको एक बात बताऊं ये इनका कबीर सागर का सरल अर्थ है और इसमें प्रश्न संख्या 70 कबीर सागर का सरलार्थ पृष्ठ संख्या 70

00:06:44:00 यहां पर 71 में आप पढ़िए 71 पृष्ठ में और नीचे से तीसरा पैराग्राफ है ना वास्तव में यह काल का जाल है मन मन काल का सूक्ष्म रूप है। काल ने प्रत्येक प्राणी को धोखे में रखकर अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए 100 छल कपट किए हैं। श्री कृष्ण में प्रवेश करके अनेकों रूप बनाकर काल ब्रह्म स्वयं भोग विलास करता था। भार श्री कृष्ण जी के सर पर रख देता था। अर्थात रामपाल के अनुसार कृष्ण जी ने कोई बुराई नहीं की है। काल ने की है। तो फिर वहां यह क्यों कह रहा है कि भाई कृष्ण जी तो बुरे हैं। काल अच्छा है। तो ये पहले खुद डिसाइड कर ले कि कृष्ण और काल में से कौन अच्छा? फिर तत्व ज्ञान के रूप में बता दे अपने चंपूओं को। हम चलिए आगे चलते हैं। बुलेट पॉइंट। इसके बाद काल ने यहां पर तो कहना पड़ेगा कि यह इस श्लोक को अमान्य मानना पड़ेगा। कौन सा श्लोक जिसमें यह कहा है कि यदि मैं अच्छे

00:07:59:03 कर्म ना करूं तो श्लोक चाहे वो कृष्ण के रूप में मान लीजिए या या वो काल के रूप में मान लीजिए। अच्छे कर्म कहने वाली बात दोनों ही तरीके से लागू नहीं होती है। तो जब लागू नहीं होती है तो फिर ये इस बात को भी अमान्य मानना पड़ेगा। हम इसलिए काउंट करते चल रहे हैं क्योंकि इसने कहा है 5% ज्ञान जो है वो काल ने दिया है। तो हम यह देखेंगे कितने श्लोकों को ना मानने के बाद इसकी गीता बचती है और क्या वो 5% ही है या 5% से ज्यादा है। हालांकि आपको बता दूं अभी तक 17 श्लोक तो अमान्य हो चुके हैं उन श्लोकों के अलावा जो मोटे तौर पर अमान्य हुए हैं। ठीक है? जैसे अभी ये मोटे तौर पर अमान्य हुआ है। 21वा श्लोक यदि मैं अच्छे कर्म ना करूं। इसके बाद

00:08:45:06 इसने यहां पर यह माना है कि गीता बोलने वाला यह कह रहा है कि मेरा कोई प्रयोजन शेष नहीं है। हम यह इसने माना है। मेरा कोई भी प्रयोजन मेरा तीनों लोकों में ना तो कुछ कर्तव्य है ना प्राप्त करने योग्य कोई वस्तु अप्राप्त है। ठीक है? कुछ भी अप्राप्त नहीं है। ठीक है? मतलब काल को कुछ करने की आवश्यकता नहीं है। मगर ये कहां पे कहा है इसने? 49व प्रश्न में 49वा प्रश्न दिखा दीजिए गरमा गीता का

00:09:24:12 49व प्रश्न में इसने ये कहा है और आपको बताएं 52 वे प्रश्न में 49व प्रश्न में गरमा गीता में क्या कहा है 49वा प्रश्न जिसमें इसने माना कि काल को ना तो कोई कर्तव्य शेष है और ना ही कोई प्राप्त करने योग्य वस्तु अप्राप्त है। कुछ भी अप्राप्त नहीं है। कुछ करने की आवश्यकता नहीं है। गीता बोलने वाला वह है। गीता बोलने वाला कौन है? जिसे कुछ भी

00:10:10:02 प्राप्तव्य अप्राप्त नहीं है। और ऐसा कुछ नहीं जो उसको कुछ करना पड़े हाथ पैर मारना पड़े मगर यही व्यक्ति यही रामपाल यही जेल निवासी पष्ठ संख्या 52 में क्या लिख रहा है गरमा गीता की दिखाइए पष्ठ संख्या 52 निकालिए हां इसमें देखिए क्या है काल को डर है कि क्या डर है काल को? काल को डर बना रहता है कि कहीं जीव मेरे जाल से निकल ना जाए। ठीक है? इसको कुछ करने की जरूरत नहीं है। यह खुद मान रहा है रामपाल गीता बोलने वाले को। मगर काल को डर बना रहता है। इसलिए काल को झूठ बोलना पड़ता है। इसलिए काल को यह सब रचना पड़ता है। तो या तो यह तय कर ले तो यहां पर यह जो श्लोक है इसको भी अमान्य मानना पड़ेगा कि गीता बोलने वाले को कुछ भी प्राप्त करने योग्य अप्राप्त नहीं है। ठीक है। आगे चलते हैं। क्या कहा है? अच्छा एक बात है। एक काल को श्राप मिला था।

00:11:26:12 कि काल इतनी इतनी आत्माएं बार-बार पैदा करेगा। यह श्राप मिला था काल को। हां। तो काल जीव पैदा करता है, प्राणी पैदा करता है। आत्मा पैदा करता है। वैसे फॉर योर काइंड इनेशन मैं आपको बता दूं। काल आत्मा भी पैदा करता है। यह बात भी लिखी है। अब बताइए यदि काल आत्मा को बना रहा है आत्मा हम।

00:12:16:16 अच्छा वह उसमें है चौथे अध्याय चलिए खैर आगे बुलेट पॉइंट में चलते हैं। क्या है कि इसने बता दिया कृष्ण का चरित्र बोला नहीं है। फिर इसने 49 पृष्ठ में पृष्ठ संख्या 49 है। इसमें इसने माना है यजुर्वेद के अध्याय 40 के मंत्र 13 में 13 का समर्थन कहा है कि भाई धीरा नाम पुरुषों से जाकर के मोक्ष का ज्ञान जो है तत्व ज्ञान वो पूछो। जबकि वहां पर ऐसा नहीं है। वहां यह कहा गया है कि धीरा नाम जो बुद्धिमान होते हैं, मनीषी होते हैं, वह ऐसा बताते हैं। तो यहां से उसने हिंदी पलट दी है। खैर चार 13 में धीरा नाम पुरुषों का मंडन कर रहा है, समर्थन कर रहा है। मगर यजुर्वेद के 40व अध्याय के दव मंत्र का दव मंत्र के मंत्र में ये धीरा नाम पुरुषों का विरोध करता है। तो पहले तय कर ले कि धीरा नाम से ज्ञान लेना है कि नहीं लेना है क्योंकि 40 वे अध्याय के दव दव मंत्र में लिखा है कि

00:13:27:22 पवित्र वेदों को बोलने वाले ब्रह्म ने कहा 39वा प्रश्न निकालिए 39 39वा प्रश्न निकालिए इसका पवित्र वेदों को बोलने वाले ब्रह्म ने कहा कि पूर्ण परमात्मा के विषय में कोई कोई तो कहता है कि यह वह अवतार रूप में उत्पन्न होता है। अर्थात आकार में कहा जाता है। कोई उसे कभी अवतार रूप में आकार में भी हां चार 10 का समर्थन किया है। यहां पे समर्थन है। ठीक है? धीराम पुरुषों से जाकर के सुनने वाली जो बात इसने मानी है वो 40व अध्याय के दव मंत्र में माना है कि धीराम पुरुषों से सुनो। फिर उसके बाद 49 वे प्रश्न पर दोबारा आ जाइए। 49वा प्रश्न 49 वे प्रश्न में 40 वे अध्याय के 13 वे मंत्र का खंडन कर रहा है और उस खंडन में धीरा नाम पुरुषों का की बुराई कर रहा है। क्या बुराई है कि भाई

00:14:28:07 जिसको ये यहां ये कह रहा है जिस व्यक्ति को अक्षर ज्ञान है उसे विद्वान कहते हैं। और ये ज्ञान देने वाले वहां पर धीरा नाम कहे गए हैं। जो ज्ञान यजुर्वेद के 40 वे अध्याय के 13 वे मंत्र में है वह ज्ञान देने वाले धीरा नाम है और यहां पर यह कह रहा है कि नहीं नहीं यह बात वेद की गलत है कि जिस व्यक्ति को हालांकि इसने अर्थ गलत लिया है ये जो अर्थ इसने लिया है वो गलत है वहां पर अलग अर्थ है मगर अगर इसने यह अर्थ लिया है कोई भी अर्थ लिया बात तो धीराम पुरुषों की है ना तो जब ये धीराम पुरुषों के पास जाने को कह चुका है 40 वे अध्याय के दव मंत्र का अर्थ बताते हुए अपनी ही किताब में 39 वे प्रश्न प्रश् तो फिर 49व पृष्ठ पर धीर नाम पुरुषों की बात को खुद ही गलत क्यों कह रहा है क्योंकि यह पोलू है दिमाग से इसके दिमाग में पोल है खाली पड़ा है इसलिए ऐसा करता है ठीक है आगे चलते हैं अच्छा एक चीज और है तीसरे अध्याय के ये 48वा पेज निकालिए 48वा प्रश्न संख्या 48 इसमें उसने क्या किया है तीसरे अध्याय के 31 से 32 श्लोक में गीता कहने वाले भगवान श्री कृष्ण ने कहा है कि ऐसा मेरा मत है। तो इसने अपने अनेकों जगह

00:15:43:10 कहा है कि हम केवल वह मानते हैं जो उसको भगवान ने दिया उसने जहां पर अपना मत दिया तो बताया कि अपना मत है वो हमें नहीं मानना है। काल का अपना मत नहीं मानना है। मगर इसने जो है काल का मत माना है। कहां पे माना है? 50वें पृष्ठ में निकालिए। 50वा 50व प्रश्न में इसने काल का मत मान लिया। क्या लिखा है? गीता अध्याय तीन के श्लोक 31 32 का सात सबसे नीचे सबसे नीचे जो ऊपर लिखे मेरे मत का अनुसरण करते हैं, वे सब बुरे कर्मों से बच जाते हैं। जो ऐसा नहीं करते हैं, वह मूर्ख अज्ञानी है। अब इसमें यहां पर रामपाल ने काल का मत मान लिया। तो यह नहीं कह सकते हैं काल का मत नहीं मानना है। ठीक है? आगे चलते हैं। फिर इसने 51 वे प्रश्न में फिर वही किया है। राग द्वेष ना करने का राग द्वेष का करने का जो विरोध होता है। है ना?

00:16:54:09 राग द्वेष का यहां पर समर्थन किया है। 33 34 कि क्या कहा है कि शिक्षित व्यक्ति जो तत्व ज्ञान हां 33 34 में ये कहा है कि क्या कहते हैं राग राग द्वेष नहीं करना चाहिए स्वयं भगवान श्री कृष्ण जी भी राग द्वेष के बिना नहीं रह पाए थे। मतलब यहां पे राग द्वेष ना करने की जो शिक्षा दी जा रही है उसका विरोध कर रहा है। ठीक है?

00:17:28:02 और एक बात और है इसी में 33 34 में क्या कहा है कि शिक्षित व्यक्ति जो तत्व ज्ञान हीन है मूढ़ स्वभाव वाले शिक्षित व्यक्ति कौन है और हां पीछे एक बात और है तत्वदर्शी के पास कौन जाता है 49वा प्रश्न दिखा दीजिए एक बार 49वा 49वें प्रश्न में इस बेवकूफ व्यक्ति ने यह भी लिखा है कि तत्व ज्ञानी से तत्वदर्शी से जो

00:18:06:00 ज्ञान लेने जाते हैं शास्त्रानुकूल साधना प्राप्त करने जाते हैं वो कौन होते हैं? अविद्वान भोलेभाले अशिक्षित अर्थात अनपढ़ और गवार जितने लोग यहां पर हैं लिखे मैं गवार हूं मैं अनपढ़ हूं। दोबारा आ जाइए वहां पर 334 वाले में तो 33 34 का वो बात करते समय इसने जो है राग द्वेष नहीं करना चाहिए इस बात का जो है विरोध किया है और जबकि 52 प्रश्न में राग द्वेष ना करने का समर्थन किया है। देखिए कैसे 52 प्रश्न में क्या लिखा है? काल को डर बना रहता है। कहीं जीव तेरे जाल से निकल ना जाए। इसलिए तत्व ज्ञान सुनकर पूर्ण संत की शरण ग्रहण करके पूर्व परमात्मा की भक्ति करो। तब राग द्वेष समाप्त हो जाएंगे। राग द्वेष समाप्त हो जाएंगे। यानी होने चाहिए। राग द्वेष समाप्त होने चाहिए। तो जब समाप्त होने चाहिए तो बार-बार तू यह क्यों कह रहा है कि राग द्वेष समाप्त नहीं हो पाए, समाप्त नहीं हो पाए। क्यों कह रहा है? क्योंकि

00:19:21:08 हमें तो हर बात का विरोध करना है। फिर हमें खुद वही बात कह देनी है। जैसे कि कभी-कभी ऐसा हुआ हो आपके घर में शायद कि मान लीजिए कोई आप लोग चुनाव कर रहे हैं कि दीवार का जो कलर है वो हरा किया जाए या सफेद किया जाए या पीला किया जाए। या इस तरह से घर घर से जुड़ा हुआ कोई भी प्रसंग ले लीजिए जिसमें कि घर के जितने भी सदस्य हैं वह चुनाव कर रहे हैं कि कौन सी चीज किस तरह से इसको करना चाहिए विषय वस्तु अथवा स्थिति को चुन रहे हैं। तो एक कोई ऐसा आया भैया अहंकारी व्यक्ति उसने कहा नहीं ना पीला ना हरा ना लाल ना सफेद उसने घर की घर के सभी सदस्यों की सारी बातों को काट दिया तो फिर सब ने उससे पूछा कि फिर कौन सा पीला समझ रहे हैं इस बात को समझ रहे हैं ना जो बात पहले ही कही जा रही है उसको तो मना कर दिया ये गलत बोल रहा है मूर्ख है ये तो पीला कहने वाला ये क्या है सही पीला ये तरीका है रामपाल का

00:20:34:09 खैर आगे चलते हैं कृष्ण ने एक बात मानी है काल के अवतार काल ने जब ये घोषणा कर रखी है कि मैं किसी को दर्शन नहीं दूंगा तो काल का अवतार कहां से हो रहा है भाई? काल का अवतार कहां से हो रहा है? घोषणा कर रखी है मैं किसी को दर्शन नहीं दूंगा तो काल का अवतार क्यों हो रहा है? और कौन से अवतार है फिर वो बताएं। हालांकि बताए गए हैं महा विष्णु ये वो है वो अवतार सिद्धि नहीं होते काल के। खैर आगे चलते हैं।

00:21:10:14 इसने यहां पर देखिए इसने यहां पर भी द्वेष बिना युद्ध हो ही नहीं सकता। फिर इस बात को माना है राग द्वेष को त्यागने को। द्वेष बिना युद्ध हो ही नहीं सकता। इसका मतलब इसके जितने भक्त इस समय कोर्ट कचहरी में जा रहे हैं। इसका जो भाई जो अरेस्ट हुआ है गलत किताबों के साथ जिसमें हिंदू देवी देवताओं के बारे में अभद्र आपत्तिजनक अश्लील टिप्पणियां लिखी हुई है। उसको बचाने के लिए जो वो न्यायालय में जो युद्ध लड़ने जा रहे हैं तो ये राग द्वेष ले जा रहे हैं। और राग द्वेष के बिना क्योंकि युद्ध हो नहीं सकता। इसका बाबा खुद कह रहा है। यानी कि यह लोग अभी सही तत्वदर्शी की शरण में नहीं है। पूर्ण संत की शरण में नहीं है। इसी के अनुसार इसी का खंडन ठीक है ना? क्यों? क्योंकि राग द्वेष के बिना युद्ध हो ही नहीं सकता। हम

00:22:13:10 अच्छा इसने क्या किया है? फिर तीन 35 का अर्थ करते हुए कहा है कि दूसरों की गलत साधना से शास्त्रानुकूल नहीं है। इसने 52 वे उसमें कहा है 52 वे अध्याय में 52 वे प्रश्न में कहा है वही वाला निकालिए 52 प्रश्न गरिमा गीता की क्या कहा है कि भैया

00:22:46:00 दूसरों की गलत साधना से जो शास्त्रानुकूल नहीं है चाहे वे कितनी भी कितनी ही अच्छी नजर आए वैज्ञानी चाहे आपको कितना ही डराए उनकी साधना भयवश होकर स्वीकार नहीं करनी चाहिए अब यहां क्या हुआ यहां भगवान कह रहे हैं कि जो स्वधर्म होता है दूसरे का धर्म जो है भले ही गुणवान दिख रहा हो अपना धर्म जो है गुणहीन दिख रहा हो ठीक है यहां पे इस बात का खंडन किया है कि भाई ब्राह्मण क्यों नहीं बन सकता वो क्यों नहीं बन सकता क्योंकि शद्र का जो धर्म है वही उसके लिए उपयोगी है। क्षत्रिय का जो धर्म है वही उसके लिए उपयोगी है। तो किसी भी हाल में स्वधर्म को त्यागना नहीं चाहिए। भले ही दूसरे का धर्म कितना भी श्रेष्ठ दिख रहा हो। ठीक है? तो क्या हुआ यहां पर? अब इसने इसकी गाथा ही बदल दी। इसने कहा कि दूसरे की साधना नहीं करनी चाहिए। गलत साधना नहीं करनी चाहिए। तो जब यहां गलत साधना की बात हो रही है तो स्वधर्म का पालन किस हिसाब से करना चाहिए? स्वधर्म मतलब कि अगर मैं मैं जो है शिवाश नारायण द्विवेदी होते हुए किसी का पुत्र हूं, किसी का भाई हूं। ठीक है? तो मेरा धर्म है। यह स्वधर्म में आ गया कि मैं किसका भाई हूं। मैं किसका पुत्र हूं। तो उनकी सेवा जिनका मैं पुत्र हूं।

00:24:01:01 उनकी सेवा उनके प्रति जो भी कार्य करने हैं वह कार्य करना मेरा धर्म है। तो भले ही कोई कोई और व्यक्ति अपने पिता की सेवा करते हुए मुझसे ज्यादा सुखी हो, मुझसे ज्यादा आनंदमय जीवन जी रहा हो अपने पिता की सेवा करते समय तो मैं यह नहीं मैं यह नहीं कर सकता वहां पर कि अपने पिता की सेवा छोड़कर के क्योंकि वहां वहां जिस पिता की सेवा हो रही है जिसके पिता की सेवा हो रही है उस सेवा को करते समय आनंद मिल रहा है सांसारिक तुम्हें उससे आकर्षित होकर के अपना जो स्वधर्म का पालन है वो मुझे नहीं त्यागना है। अपने पिता की सेवा को नहीं त्यागना है कि भाई यहां पर भी तो मैं पिता एक पिता की सेवा कर रहा हूं। मेरा नहीं है तो क्या हुआ? तो यानी कि उसके पिता की सेवा मेरा स्वधर्म नहीं है। ठीक है? तो उसके उससे आकर्षित होकर के मुझे अपने स्वधर्म का त्याग नहीं करना चाहिए। यह वहां पर कहा जा रहा है। मगर इसने पूरा बदल दिया कि भैया दूसरे की गलत साधना से अपनी अच्छी साधना और यही बात वर्णाश्रम में भी आती है। यही बात वर्णाश्रम में आती है कि आपको लग रहा है कि ब्राह्मण का क्षत्रिय का श्रेष्ठ जीवन है ये है वो है मगर उससे आकर्षित हो के अपना जो आपको गुणहीन दिख रहा है। हालांकि है नहीं मगर चलो मान लो दिख भी रहा है तो उसको त्यागना

00:25:16:07 नहीं चाहिए। भले ही आपको लग रहा है कि उसका जीवन जो है सरल है जबकि वह कठिन है। फिर भी आप उसके लालच में आकर के अगर आपको दिख भी रहा है तो उसके लालच में आकर के अपने स्वधर्म को नहीं छोड़ना चाहिए। ये कहा जा रहा है। ठीक है? ये सार्वभौम सिद्धांत भी है ले लीजिएगा। अब आगे क्या है कि हां इसने एक बात और मान ली है कि संसार के नर नारी पृष्ठ संख्या 59 संसार के नर नारी सनक सनंदन सनत कुमार सनातन नारद व्यास जी पाराशर जी प्रह्लाद मुनेंद्र ऋषि जी ये सब स्वयं कबीर थे। भक्त प्रह्लाद कौन थे? कबीर थे। ये बात किसने मान ली? रामपाल ने। ठीक है? और एक चीज और देख लेते हैं। हां, यहां पर लालच भी दिया गया है।

00:26:36:02 ज्ञानी विद्वान पुरुष मानवश ज्ञानी विद्वान पुरुष मानवश पैसा प्राप्ति व अधिक शिष्य बनाने की इच्छा के कारण गलत कर्म छोड़कर यह पृष्ठ संख्या है 53 छोड़कर सच्चाई का अनुसरण नहीं करते दोनों ज्ञानी व अज्ञानी स्वभाव व शल रहे हैं। इसलिए भक्ति मार्ग गलत दिशा पड़ चुका है। तो अब क्या है जो ज्ञानी है जो गलत मार्ग पर चलने वाला है वह ज्ञानी कैसे है

00:27:14:00 जब मार्ग ही गलत है तो वो अज्ञानी कैसे है वो तो अज्ञानी कहा जाना चाहिए तो ये एक बात सोचने वाली ठीक है ये बेवकूफियां है हर पन्ने पर की है इसने तो उसी का आप लोग मनोरंजन लीजिए और समय पढ़ने करने पर चैप्टर वाइज ये जो व्याख्या चल रही है इसको देखते रहिए। 59व पे 59 वे प्रश्न में क्या माना है कि स्वयं कबीर परमात्मा ही प्रह्लाद थे। हम भी तो यही कहते हैं प्रह्लाद थे। हां मान लिया ना 59 में रख लो इसको संभाल के। आगे चलते हैं।

00:28:04:09 वह परमात्मा उस परमात्मा कहता है ना जब वह स्वयं ही परमात्मा थे तो उन्होंने ये क्यों कहा कि वह परमात्मा उस परमात्मा तो यहां पे तुम्हारे कबीर बाबा जी भी कह रहे हैं क्या कह रहे हैं वह परमात्मा जिसका काल ना हो यानी अविनाशी सत्पुरुष वह सच्चा परमात्मा जिसका नाश ना हो यानी अविनाशी वह परमात्मा जिसकी वास्तविक वह परमात्मा जो अविनाशी है भाई वह परमात्मा क्यों कह रहे हो मुझ परमात्मा कहो ना मुझ परमात्मा मुझ परमात्मा ये कहो ठीक है कबीर साहब कह रहे हैं ये नहीं कहना चाहिए वह नहीं कहना चाहिए वह और उस वो तो थर्ड पर्सन हो गया ना

00:28:45:20 और क्या है 69 काल जब दोबारा सृष्टि रचेगा वही बात आ गई दोबारा सृष्टि रचेगा दोबारा जो है उसमें जीवात्माएं फसेंग तो कौन सी जीवात्माएं होंगी काल के लिए दोबारा से जीवात्माएं बनाई जाएंगी। पहले वाली जीवात्माएं कहां होंगी? क्या होगा? बहुत सारे क्वेश्चन है। हालांकि हमने इनकी सृष्टि रचना कबीर सागर का सरलार्ध में भी पढ़ी है। तो उसमें बहुत सारी खामियां है। हालांकि आगे चलते हैं। श्लोकबद्ध तरीके से चलते हैं। इसने रामपाल ने नाम देने का अधिकारी माना है। किसको? जिसको नाम देने का अधिकार मिला हो। प्रश्न क्रमांक 70

00:29:41:27 नाम देने का अधिकारी इसने कहा है कि नाम देने का अधिकार केवल उसी को है जिसने अपने गुरु से उस नाम को लिया हो। तो क्या नाम देने का अधिकार अगर सिर्फ उसे है जिसने अपने गुरु से उसको ज्ञान को लिया हो। तो रामपाल का गुरु जो था वह तत्वज्ञानी था। जिससे रामपाल ने ज्ञान लिया वह तत्वदर्शी था। वह गुरु था। यह प्रश्न आ जाता है। ठीक है? क्योंकि इसने 79 नंबर के पृष्ठ में कहा है। इसने कहा है कि केवल मुझ संत रामपाल सारनाम दान करने का केवल मुझ संत रामपाल दास को आदेश मिला है। केवल संत रामपाल दास को आदेश मिला है। आदेश किससे मिला भाई? ये तो खुद कबीर का अवतार है। ये तो खुद कबीर है। तो आदेश किससे मिल रहा है? यानी कबीर के ऊपर

00:30:56:28 भी कोई और है। और अगर गुरु से मिल रहा है तो वह गुरु कौन है? हम बहुत सी बातें हैं। आगे चलते हैं। पृष्ठ क्रमांक 76 वही ब्रह्मा विष्णु महेश की पूजा करने वाले मनुष्यों में नीच दूषित कर्म करने वाले हैं। ठीक है? और फिर भगवान का अपमान है 88 से 89 पृष्ठ में शिव भगवान से सेक्स कंट्रोल नहीं हुआ। सीता माता वाला विवरण है। यहां पर शिव जी को काल ने भड़काया। जैसे काल वहां कृष्ण को भड़काता है। मगर फिर भी ये कृष्ण को दोषी मानते हैं। यहां शिव जी को काल ने भड़काया। 89 नंबर पर है

00:31:53:06 और यह सब होते होते फिर अर्ध नग्न शरीर वाली पोशाक पहनी ये सब बातें हैं सब निरलज्जता पूर्वक लिखी गई है यहां विष्णु भगवान से सेक्स कंट्रोल नहीं हुआ एक बात ध्यान रखने के लिए मन स्वयं काल ब्रह्म है और 3.35 के बाद तीन 3.35 का अर्थ क्या है जो हमने बता दिया है कि अगर सभी कार्य धर्म है तो दूसरे का धर्म क्या है? धर्म उसे कहते हैं धर्म किसे कहते हैं? समझिए जो मोक्ष दिलाए। तो दूसरे का जो धर्म है जो इसने व्याख्या की है कि दूसरे की साधना नहीं लेनी चाहिए। वहां शब्द क्या आया है? धर्म। दूसरे के धर्म में नहीं जाना चाहिए। तो स्वधर्म से तो वो बात समझ में आ रही है। मगर जब दूसरे की साधना की बात आ जाएगी तो वहां साधना नहीं कहा गया। वहां धर्म कहा गया है तो उसको साधना क्यों बोल रहे हो? और जब धर्म कहा गया है ठीक है? तो धर्म का तो अर्थ ही है जो मोक्ष दिलाए। फिर आप उसमें भेद कैसे कर रहे हो? हम या तो उसको दूसरे

00:33:08:09 की साधना को धर्म मत कहो। अगर धर्म के अर्थ में तुम जब साधना ले रहे हो तो दूसरे की साधना को आप धर्म मत कहिए क्योंकि वह गलत है। वह मोक्ष नहीं दिला रही तो उसको धर्म क्यों कह रहे हो? यह है कहने का मतलब। तो

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00:33:22:09 ये थे बुलेट पॉइंट्स। अब हम लोग उस चैप्टर पर आ जाते हैं जहां से इनकी धुलाई बहुत अच्छे से शुरू हो जाती है। क्योंकि इस चैप्टर में वो श्लोक है जो संसार के प्रत्येक मनुष्य को एक बार अवश्य सुन लेना चाहिए। सभी जान रहे होंगे भगवत गीता चार सात में भगवान ने कहा यदा यदा धर्मस भवती भारत अभान धर्मसात्मानम सजाम्य

00:34:01:18 तो वही यहां से इनका धुलाई सेंटर और बढ़ जाएगा। सबसे पहले हम अपनी भगवत गीता को पढ़ लेते हैं। क्या है? श्री भगवान बोले मैंने इस अविनाशी योग को सूर्य से कहा था। सूर्य ने अपने पुत्र वैवस मनु से कहा और मनु ने अपने पुत्र इक्षवाकु से कहा।

00:34:37:13 इसके बाद कहा है इस प्रकार परंपरा से प्राप्त इस योग को राज ऋषियों ने जाना किंतु उसके बाद वह योग बहुत काल से इस पृथ्वी लोक में लुप्त प्राय हो गया है। निकालिए ना तत्व विवेचनी वाला जय दयाल गोविंद का जी का भगवत गीता तू मेरा भक्त है और प्रिय सखा है। अच्छा अब यहां पे बात ये आती है कि यहां लिखा हुआ है तू मेरा भक्त है और प्रिय सखा है। ठीक है। भगवत गीता चार तीन की बात कर रहे हैं हम लोग।

00:35:20:02 क्या हुआ? अरे जय दयाल गोविंद का वाला जो हर बार आप हमारी भगवत गीता दिखाते थे वह लगाइए ना जिसमें अंदर शब्दार्थ लिखे रहते थे आपको तो मालूम था वो है जय दयाल गोयका वाली होगी और तत्व विवेचनी उसमें लिखा होगा तो फिर अब यहां पर भगवान ने कहा है तू मेरा भक्त है और प्रिय सखा है तो पहली बात आती है क्या काल को अर्जुन प्रिय था? क्या काल को अर्जुन जानता था?

00:36:02:16 हम अर्जुन तो श्री कृष्ण को जानता था ना। काल को तो जानता नहीं था। तो जब यह लोग कई बार एक तर्क लेते हैं। यह वाली नहीं है। इसमें निकालिए चौथे अध्याय का तीसरा श्लोक तो पता चलेगा। हां यही है। चौथे अध्याय का तीसरा निकालिए।

00:36:36:00 अब यह देखिए चौथे अध्याय के तीसरे श्लोक में मैंने कहा था ना इस इस चैप्टर से बैंड और अच्छी तरीके से बजने वाली है। तो क्या काल को अर्जुन पहले से जानता था? जानता था तो कब जानता था? कहां से जानता था? वो स्टोरी क्या है? दूसरी बात यह है कि इन्होंने कई बार ये कहा है कि अर्जुन कृष्ण की शरण में तो पहले से हैं। है ना? तो फिर उन्होंने ये वो ये क्यों कहेगी तू मेरी शरण में आ जा। तो भाई अब तुम्हारी बात ले लेते हैं कि तुम कहते हो ना कि गीता बोलने वाला और कृष्ण अलग है। तो इसको ये मान लो कि जो गीता बोलने वाला जो रूप है उसने कहा कि मेरी शरण में आजा। अब देखिए आप अगर गीता बोलने वाला अलग है कृष्ण से तो अर्जुन भक्त किसके हैं? सखा किसके हैं? और काल जो अपने खाने का इंतजाम कर रहा है वह यह क्यों कह रहा है कि मेरा मेरे प्रिय तू मेरा प्रिय सखा है। तो इसका मतलब जहां जहां पर भगवान ने अर्जुन को अपना प्रिय कहा है उन उन श्लोकों को अमान्य घोषित करना पड़ेगा। देखिएगा अभी अंत तक कितने श्लोक अमान्य हो जाएंगे।

00:37:49:20 अभी देखिएगा कितने श्लोक अमान्य हो जाएंगे। क्योंकि अब इस बात को अमान्य करना पड़ेगा ना कि वह अर्जुन काल काल का प्रिय है। इस बात को अमान्य करना पड़ेगा। नहीं तो गाड़ी आगे नहीं चल पाएगी। अर्जुन काल का प्रिय नहीं है रामपाल के अनुसार। तो यह बात यहां पर गलत है। रामपाल के अनुसार और तू मेरा भक्त है। ये भक्त कैसे बना? उसको क्या पता चल गया था काल के बारे में? हम और यानी वो भक्त है। तो यहां से एक पॉइंट और आ जाता है। यह लोग चिल्लाते हैं कि भैया वो उसके काल स्वरूप को देख के वो डर क्यों रहा था? अरे भैया क्यों डर रहा था? अब तुम बताओ ना यहां पर तो कहा वो उसका भक्त है पहले से। अब तुम बताओ क्यों डर रहा था? तुम तो खुद मान रहे हो ना यहां पर भगवत गीता। या तो इसको अमान्य कर दो उस श्लोक को कि तू मेरा भक्त है। तो इन्होंने अमान्य नहीं कहा है। यहां इन्होंने यह नहीं कहा है कि यह श्लोक गलत है। क्या कहा है? देख लेते हैं। तो क्या है? चार एक से तीन में गीता ज्ञान दाता ने कहा कि मैंने इस अविनाशी योग को अर्थात यह गीता वाला आध्यात्मिक ज्ञान को सूर्य देव से कहा था। इनकी गीता दिखा दो। चौथा अध्याय 94 पृष्ठ

00:39:05:25 अर्थात ये गीता वाला आध्यात्मिक ज्ञान जो सूर्य देव से कहा था। सूर्य ने अपने पुत्र मनु से कहा था। अमुक अमुक चला। इस प्रकार यह परंपरा कुछ समय तक चली। वर्तमान में यह श्रेष्ठ ज्ञान बहुत समय से लगभग लुप्त हो गया है। तू मेरा प्रिय मित्र है इसलिए मैंने वही ज्ञान तुझे कहा है। ज्ञान को गुप्त रखने योग्य क्यों कहा? क्योंकि यदि आम जीव को काल के जाल का पता लग जाए तो काल लोक खाली हो जाए। ठीक है? तो इसलिए ज्ञान को गुप्त रखते हैं। मतलब पहली बात तो यह है। अब देखिए यहां से एक पॉइंट और निकल रहा है। वो क्या निकल रहा है कि

00:39:57:20 बहुत अच्छी बात है। ये कहते हैं कबीर वाणी पंचम वेद है ना। पंचम वेद। ठीक है? कबीर वाणी पंचम वेद है जो काल ने छुपा जो लोगों से नहीं दी। ठीक है? मगर यहां पर क्या कह रहा है रामपाल खुद कि जो ज्ञान काल यहां भगवत गीता में दे रहा है वो ज्ञान उसने छुपा के रखा था। पंचम वेद के लिए नहीं कह रहा है और अगर कह रहा है तो यहां पर देने की बात हो रही है। यहां तो गीता में तो उसने पंचम वेद नहीं दिया है। पंचम वेद तो स्वयं कबीर आके देते हैं। यहां तो काल दे रहा है। तो जो ज्ञान छुपाया गया था वो ज्ञान कौन सा था? इसके अनुसार यहां पे इसने माना ना क्या कहा? देखो कि ये विचार करें। ज्ञान को गुप्त रखने योग्य क्यों कहा? क्योंकि यदि आम जीव को काल के जाल का पता लग जाए तो काल लोक खाली हो जाए। जबकि गुप्त ज्ञान क्या है? कबीर वाणी तो क्या कबीर वाणी गीता में कह दी काल ने? कबीर वाणी कह दी क्या गीता में? नहीं कही। गीता में तो गीता कहा है इनका कबीर वाणी तो बाद में वो खुद कबीर ने कहा है तो

00:41:12:26 यानी कि या तो यह मान ले कि यहां पर तत्व ज्ञान गीता में ही गीता ज्ञान दाता ने ही सही मगर दे दिया रामपाल के अनुसार और या फिर ये माने कि गुप्त ज्ञान अभी भी दिया नहीं है गीता में क्यों और गुप्त ज्ञान नहीं दिया है तो यहां पे गुप्त ज्ञान देने की बात क्यों मान रहा है भाई तू तो इसका मतलब ये जो इसके अनुसार ये 4 टू और थ्री ये दोनों दोनों श्लोक भी अमान्य सिद्ध हो जाएंगे। ठीक है? अमान्य समझ में आ रहा होगा। रोचक लग रहा होगा प्रबुद्ध लोगों को। दूसरी बात तू मेरा प्रिय मित्र है इसलिए दे रहा हूं। तो प्रिय मित्र है तो कैसे भाई? वो संबंध बना कैसे? कब बना? भगवान तो श्री कृष्ण को अर्जुन तो श्री कृष्ण को जानते थे। तो भक्ति कहां से आई? यह सब बातें हैं। जहां जहां अर्जुन को प्रिय मित्र कह दिया तो अर्जुन किसको जानता है? श्री कृष्ण को। तो गीता ज्ञान दाता काल जो है ये नहीं कह सकता तू मेरा प्रिय मित्र है। तू मेरा भक्त है। ठीक है? और अगर कह रहा है तो फिर ये नहीं कह सकते कि काल की शरण में तो पहले से था। अर्जुन फिर जो है

00:42:28:00 वो कृष्ण की शरण में तो पहले से था। फिर कृष्ण क्यों कहेंगे अपनी शरण में आने को? फिर ये नहीं कह सकते। और अगर यही बात सिद्ध करनी है तो फिर यहां पर वो तो भक्त पहले से ही है। फिर क्यों कह रहे हैं कि मेरी शरण में आ जा और तो और दूसरी बात कि अगर अर्जुन काल का भक्त है पहले से तो फिर तुम ये क्यों ढिंढोरा पीटते हो कि भैया काल को देख के डर गया। वो तो भक्त था पहले से ही प्रिय था। फिर क्यों पूछ रहे हो कि काल को देख के क्यों डर रहा है? वहां तुम सिद्ध करना चाहते हो का जब वो अर्जुन भगवान के विराट रूप को देख के घबरा गए तो वहां तुम उस सीन से सिद्ध करना चाहते हो। देखो देखो पहचान नहीं पा रहा है। जबकि वो तो उनका रिश्तेदार था। ये था वो था। हां पहचान नहीं पा रहा है। इसका मतलब उस समय उसने काल को पहली बार देखा। तो फिर यहां पर प्रिय भक्त और वो कैसे हो गया? सखा मूर्ख।

00:43:28:02 चलिए आगे चलते हैं। इसके बाद चौथा अध्याय चौथे अध्याय का पांच से नौ तक का श्लोक हम पढ़ लेते हैं। क्या है? अच्छा यह भी अच्छी बात है। यहां पर 4.4 गायब है। 4.4 गायब है। 4.3 के बाद सीधे 4.5 और पिछले में भी ध्यान रखिएगा इन्होंने अपनी भगवत गीता गरिमा गीता की में जो है 3.35 तक ही अर्थ किया है। जिसमें से 19वें श्लोक का अर्थ नहीं किया है। तो उसमें जबकि 3.35 तीसरे अध्याय में कितने श्लोक हैं?

00:44:19:10 तीसरे अध्याय में 43 है। आठ श्लोक ये और 19वा श्लोक वो। ठीक है? तो नौ श्लोक सीधे सीधे मानने मोटे तौर पर। नौ श्लोक तो केवल तीसरे अध्याय से अमान्य है और ये 4.4 का अर्थ नहीं किया है। तो यहां पर ये भी अमान्य हो गया। पर 4.4 देख लेते हैं क्या है।

00:45:00:26 नहीं 4.4 का अर्थ किया है। यहां गलती हो गई। 4.4 का अर्थ किया है। अर्जुन ने जब प्रश्न किया है कि आपका जन्म तो अभी का है तो आपने सूर्य को सूर्य का जन्म बहुत पुराना है तो आपने उनको ज्ञान कैसे दिया? इस बात को मैं कैसे समझू? ठीक है? तो इसके उत्तर में भगवान कहते हैं फिर और इसके अनुसार काल कहता है पहले भगवान क्या कहते हैं वह देख लेते हैं। हे परम तप अर्जुन मेरे और तेरे बहुत से जन्म हो चुके हैं। उन सबको तू नहीं जानता किंतु मैं जानता हूं। मैं अजन्मा और अविनाशी स्वरूप होते हुए भी समस्त प्राणियों का ईश्वर होते हुए भी अपनी प्रकृति को अधीन करके अपनी योग माया से प्रकट होता हूं। जब जब धर्म की हानि होती है और अधर्म की वृद्धि होती है तब तब ही मैं अपने रूप को रचता हूं। अर्थात साकार रूप से लोगों के सम्मुख प्रकट होता हूं। ठीक है।

00:46:10:09 किस लिए होते हैं? परित्राणाय साधु नाम विनाशाय चष्कता धर्म संस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे साधु पुरुषों का उद्धार करने के लिए पाप कर्म करने वालों का विनाश करने के लिए और धर्म की अच्छी तरह से स्थापना करने के लिए मैं युग युग में प्रकट हुआ करता हूं। यह आठवां हो गया और

00:46:44:16 विनाशाय चतुष्कता फिर आगे 4.9 में क्या कहा है?

00:46:50:19 मेरे जन्म और कर्म दिव्य है अर्थात निर्मल और अलौकिक है। इस प्रकार जो मनुष्य तत्व से जान लेता है, वह शरीर को त्याग कर फिर जन्म को प्राप्त नहीं होता। किंतु मुझे ही प्राप्त होता है। ठीक है? अब देखते हैं बात क्या है? इन्होंने क्या कहा? अध्याय चार के श्लोक पांच से नौ तक गीता ज्ञान दाता ने कहा है कि अर्जुन तेरे और मेरे

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00:47:17:10 बहुत से जन्म हो चुके है इन सबको तू नहीं जानता में जानता हूं। मैं मनुष्य की तरह तरह जन्म ना लेने वाला अविनाशी आत्मा होते हुए भी तथा सर्व 21 ब्रह्मांड के प्राणियों का स्वामी होते हुए भी है ना ये सब इसने बकवास यहां कर दी। उन्हीं में अंश अवतार रूप में श्री कृष्ण राम परशुराम आदि की रचना करता हूं। तो यहां पर इसने कुछ अलग से वो लिए हैं। जैसे इसने कहा है कि सर्व और सर्व के बाद कोष्टक में इसने लिखा है 21 ब्रह्मांड। सर्व का मतलब सब कुछ होता है। अगर तुम मान रहे हो कि समस्त प्राणियों के ईश्वर हैं। तो यह मत कहो कि 21 ब्रह्मांड के हैं। सर्व का मतलब सब होता है। सब कुछ। ठीक है? और अगर सर्व का मतलब सब कुछ नहीं होता तो सर्व्यापी मत कहना। सर्वज्ञ मत मानना। 21 ब्रह्मा 21 अगर सर्व का अर्थ जो है 21 ब्रह्मांड है तो जो कबीर है वो 21 ब्रह्मांडों को जानने वाला है क्योंकि उसको सर्वज्ञ भी कहा है तुमने कई जगह। दूसरी बात ये है कि इसमें अंश अवतार के रूप में प्रकट होता हूं। ये कहां लिखा है? इसमें तो लिखा है मैं अपना सजन करता हूं। सजाम में हम

00:48:32:28 इन्होंने यह नहीं कहा कि मैं अपने अंश अवतार का सजन करता हूं। क्या कहा है? तदात्मान सजाम हम इसमें कहां लिखा है अंश अवतार? उनमें गुप्त रूप से प्रकट होता हूं। इसका शब्द कहां है भाई? गुप्त रूप वाला कि मैं उनमें गुप्त रूप से प्रकट होता हूं। फिर उन्होंने आगे बहुत सारी बकवास की है। गीता ज्ञान दाता ने यहां देखिए बहुत अच्छी बात है। यहां सुनने लायक है। गीता ज्ञान दाता ने कहा है कि जब जब धर्म की हानि तथा अधर्म की वृद्धि होती है तब तब मैं अपने अंश अवतार रचता हूं। पहली बात तो अंश घुसेड़ दिया अपने मन से। और वह अवतार साधुओं की रक्षा तथा असाधुओं का संहार करने के लिए प्रकट हुआ करते हैं। अब यह बताइए इनके हिसाब से साधु कौन है? रामपाल और असाधु कौन है? मैं और या मुझे मानने वाले मेरे साथ चलने वाले तार पहाड़ी या उनके समर्थक ये सब लोग असाधु हैं। जितने लोगों को पाखंडी कहते हैं, लोभी कहते हैं, लालची कहते हैं वो सब असाधु हैं।

00:49:48:16 ठीक है? तो हमको यह खुद कहते हैं हम लोग काल के द्वारा भेजे गए एजेंट हैं। काल के दूत हैं। इसने भी किताब में कई बार कहा है कि जो ऐसा ऐसा कार्य करेगा जो कार्य मैं कर रहा हूं इसके विरोध में बोलेगा वो काल का एजेंट मान लेना काल का दूत। दूसरी बात काल को क्योंकि डेली एक लाख प्राणी खाने हैं। एक लाख खाने और सवा लाख उत्पन्न करने हैं। तो काल तो खुद लोगों से पाप करवा रहा है। अभी हमने देखा था श्री कृष्ण से पाप किसने करवाए? काल ने। काल तो साधुओं की रक्षा नहीं साधुओं को मरवाने के लिए जन्म ले रहा है। तो फिर यहां ये वाला काल कौन सा है? जो कह रहा है कि मैं साधुओं की रक्षा और असाधुओं के संहार के लिए प्रकट होता हूं। यह कौन सा काल है फिर? ठीक है। अब आगे जन्म मृत्यु की बात आ जाती है। इसको भी ले लेते हैं अच्छे से। वो क्या है? कि भगवान यहां बता रहे हैं कि वास्तविकता में आत्मा भी अविनाशी है। भगवान तो परमात्मा तो अविनाशी है ही। आत्मा क्योंकि

00:51:03:27 बंधन में है, जीव रूप में है तो बंधन में होने के कारण प्रपंच रूपी संसार में होने के कारण माया से बंधी बंधन में बंधन में होने के कारण आत्मा को यह लगता है कि उसका जीवन और मरण हो रहा है और वो मर रही है और वो जीवित हो रही है। और वो ये नहीं जानती है कि वो अविनाशी है। नैन चिनती शस्त्राण नैन वो ये सब फील नहीं करती है। वो नित्य है। वो ये जानती नहीं है। यह इस श्लोक का मर्म है। मगर भगवान ने क्या कहा? तू नहीं जानता मैं जानता हूं। जन्म और मरण बहुत हो चुके हैं। मगर मैं मुक्त हूं। मैं जानता हूं कि मैं जन्म जन्मता मरता कुछ नहीं। मैं तो सदा सत स्वरूप हूं। और तुम भी नित्य हो। मगर तुम नहीं जानते हो ना जानने के कारण। इसका मतलब नित्य दोनों है। आत्मा और परमात्मा दोनों नित्य है। अंतर क्या है? कि परमात्मा जानता है, परमात्मा जानने वाला है। परमात्मा इस ज्ञान को जानने वाला है और आत्मा ना जानने वाली है। इसलिए वो फंसी हुई। ठीक है? तो तू जान तू नहीं जानता मैं जानता हूं। यहां ये कहने का अर्थ है। मगर इसने क्या कहा? कि

00:52:18:16 इसने अलग-अलग प्रमाण दिए हैं कि गीता अध्याय दो में श्लोक में ये भी कहा है भाई जो भी कहा हो मगर यहां इस श्लोक को आप काट तो नहीं सकते कि दव अध्याय के दूसरे श्लोक में ये कहा है इसलिए उस जैसी बात यहां भी मानो भाई इस जैसी बात वहां क्यों नहीं मान रहे जैसे गीता के अध्याय दव श्लोक में तुमको लगता है कि उसने इसके विरोध में बात की है किसके विरोध में कि भगवान अविनाशी है। भगवान का जन्म मरण केवल एक लीला मात्र है। अर्जुन को वो जन्म मरण लगता है। वो वास्तविक वास्तव में तत्व से जानने वाले हैं। जन्म मरण अर्जुन की दृष्टि से क्योंकि वो जन्म मरण है तो उसे वो जन्म मरण कह रहे हैं। वस्तुतः वो कभी जन्मते ही नहीं है। अर्जुन की दृष्टि वो माया से ग्रसित है। इसलिए उनका जन्म और आना जाना उनको दिखाई दे रहा है। मगर अगर तुमको ये लगता है कि इसी गीता के दूसरे कहीं पर जाकर के उन्होंने अपनी इस बात का विरोध किया है तो उसके अनुसार तुम इसका अर्थ क्यों मान रहे हो? इसके अनुसार उसका अर्थ क्यों नहीं मान रहे हो? ये है दोगला। ठीक है? तो कुल मिलाकर के इस श्लोक को अमान्य मानना ही पड़ेगा। क्योंकि इसमें बहुत सी बातें आ गई हैं गीता के चार सात में क्योंकि काल जो है

00:53:33:20 असाधुओं को बचाने वो असाधुओं को मारने नहीं बल्कि बचाने आता है और साधुओं को मारने आता है। साधुओं को कष्ट देने आता है। रामपाल के अनुसार तो आपको यह मानना पड़ेगा कि चार सात गलत है। अमान्य है। ठीक है? इसके साथ ही साथ जन्म मृत्यु वाली बात जो है तो जन्म मृत्यु वाली बात जब उन्होंने कह दिया कि मेरी और मेरे जन्म कई जन्म हो चुके हैं। तू नहीं जानता मैं जानता हूं तो

00:54:15:27 जब ये कह दिया 95 नंबर में पहले पैराग्राफ में इस समय हम लोग पढ़ रहे हैं। हम तो भगवान का कहने का अर्थ यह है कि उनके जन्म जो जन्म और आना और जाना है वो मात्र आव भाव भाव है संसार रूपी प्रपंच में इस बात को कौन जानता है भगवान जानते हैं अर्जुन नहीं जानता तो यह ना जानने का ही पूरा भेद है विद्या और अविद्या माया में लिप्त माया से मुक्त ठीक है आगे चलते हैं मेरे जन्म व कर्म अद्भुत है जो कोई इस प्रकार तत्व से जान लेता है वह शरीर त्याग कर मेरे जाल में फंसा रह जाता है। अब देखो तो क्या है

00:55:02:26 मेरे जन्म और कर्म कर्म जो है दिव्य है अलौकिक है। इस प्रकार जो मनुष्य तत्व से जान लेता है वह मनुष्य शरीर को त्याग कर फिर जन्म को

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00:55:11:27 प्राप्त नहीं होता। किंतु मुझे ही प्राप्त होता है। अब इसमें काल का जाल कहां लिखा है कि मेरे जाल में फसा रह जाता है। कहां से आया है जाल? ठीक है? तो यह हमें जानना होगा। यह आपको सिद्ध करना होगा कि काल का कोई जाल है। शास्त्रों से सिद्ध करना होगा। जो मुझ काल को और यहां पे ये कहा है ये सबसे बड़ी बात है कि चलो काल के जाल में फंसा रह जाता है। ठीक है? ये भी मान लिया काल के जाल में फसा क्योंकि भगवान ने कहा है ना यहां पे किंतु मुझे ही प्राप्त होता है। तो यह मान लिया काल के जाल में फंसा रह जाता है। मगर यहां ये तो मानना पड़ेगा कि वह फिर जन्म को प्राप्त नहीं होता। यह कहां ले जाओगे?

00:55:55:20 इसने यहां पर जन्म को प्राप्त ना होने वाली बात को अलग कर दिया। इसने सीधे काल के जाल में फंसा रह जाता है। ये कर दिया। ठीक है? तो वो जन्म को प्राप्त नहीं होता। इस बात को कहां ले जाओगे? पुनः पुनः जन्म ना एति। संस्कृत में लिखा है ना पुनः जन्म ना एति। इसको कहां ले जाएगा भाई? जेलधाम निवासी जो भगवान को कृष्ण को तत्व से जान लेता है उनके जो दिव्य जन्म है उनको उनकी अलौकिकता को समझ जाता है कि केवल विद्या का फर्क है वो धीरे धीरे धीरे उसकी प्रैक्टिसिंग कर करके उसी उसी के अनुगत चल चल के वो मोक्ष को प्राप्त हो जाता है पुनः जीवन और मरण में नहीं आता बल्कि भगवान के भगवान को ही प्राप्त होता है अर्थात सत स्वरूप हो जाता है ये तो रही हमारी बात मगर ये क्या कह रहे कि वो शरीर के त्याग कर मेरे जाल में फंसा रह जाता है। भाई इसकी हिंदी तो करना पुनः जन्म को प्राप्त नहीं होता। इसकी हिंदी नहीं की। ठीक है? और ये मिल गया। ये देखो वो जगह मिल गई। काल आत्माओं को रचता है। आत्माओं को कौन रचता है? काल। बेवकूफ।

00:57:11:25 95 नंबर पर दूसरा दूसरा उसमें आइए दूसरे तीसरे पैराग्राफ में विशेष गीता जी के अध्याय दो के श्लोक 12 में तथा इसी अध्याय चार के श्लोक पांच तथा नौ में प्रत्यक्ष प्रमाण है कि गीता ज्ञान दाता तथा इसके पुजारी का जन्म मरण बना रहेगा। जबकि क्या कहा गया है नौवे श्लोक में जन्म नहीं होगा फिर भी यह कह रहा है जन्म मरण बना रहेगा फिर अध्याय नौ के श्लोक सात में कहा है कि कल्प के अंत में सर्व प्राणी कल्प के अंत में कल्प प्रलय प्रलय के टाइम अंत में सर्व प्राणी तथा स्वर्ग नरक व पृथ्वी लोक तक नष्ट हो जाते हैं। फिर कल्प के प्रारंभ में मैं रचूंगा अर्थात अस्थाई जन्म मरण समाप्त हुआ स्थाई नहीं। है ना? काल ब्रह्म अच्छी आत्माओं को रचता है। अर्थात पैदा करता है। यह लो आत्माओं को रचने वाला कौन है? काल ब्रह्म। और दूसरे अध्याय का ये मैं आपको पष् संख्या बता रहा हूं।

00:58:26:16 इसी इसी ग्रंथ का 17 नंबर का पेज निकालिए। आत्मा की उत्पत्ति परमात्मा ने अपने वचन से की है। 17वां पृष्ठ है ये। किसने की आत्मा की उत्पत्ति? परमात्मा ने अपने वचन से की है।

00:59:07:08 और यहां आत्मा को जन्म देने वाला कौन है? शरीर धारी प्राणी को जन्म दे रहा है तो ठीक है। आत्मा को जन्म दे रहा है। भाई वो क्या लिख रहा है? मैं और जन्म नहीं कोई कोई कह सकता है वो शरीर के रूप में नहीं है। अच्छी आत्माओं को रचता हूं। अर्थात पैदा करता है, रचता है, उत्पन्न कर रहा है। तो यहां 95 में कौन है? गीता ज्ञान दाता आत्माओं को रचने वाला है। 95 नंबर पृष्ठ पर और अभी हमने देखा कि 17 नंबर पृष्ठ पर आत्माओं को उत्पन्न करने वाला कौन है? परमात्मा। तो यहां से रामपाल के अनुसार हमने परमात्मा किसको सिद्ध कर लिया? गीता बोलने वाले को आगे चलते हैं।

01:00:04:02 आगे क्या लिखा है? इसमें 95 नंबर पृष्ठ पर नीचे आ जाइए। जो व्यक्ति मुझे इस प्रकार से जान लेता है वह ब्रह्मा विष्णु महेश को छोड़कर मेरा ही स्मरण करता है और मेरे को ही प्राप्त होता है। अर्थात मेरा ही आहार होता है। अब ये बताइए कि जो व्यक्ति जन्म और मरण से मुक्त हो गया जो कि भगवत गीता में चौथे अध्याय के नौवे श्लोक में बोल दिया भगवान ने या तो इसको ना मानो। अगर दूसरों का सहारा ले इस बात का खंडन करना है तो यह बोलो कि चौथे अध्याय का नौवा श्लोक हम नहीं मानते। इसको भी हम लिख लेंगे। काल का अपना मत है। ऐसे बोलना पड़ेगा ना। अच्छा दूसरी बात क्या है कि भाई मुझे प्राप्त होता है। इसका अर्थ मेरा आहार होता है। ये कहां से सिद्ध कर लिया? सिद्ध तो करो इसको। तो सिद्ध नहीं है। जो इसके माया जाल को तत्व से जान लेता है उनका पुनर्जन्म नहीं होता है। क्योंकि वह भक्त पूर्ण संत अर्थात तत्वदर्शी की शरण में जाकर पूर्ण परमात्मा की भक्ति करके पूर्ण मोक्ष को प्राप्त हो जाता है।

01:01:20:00 तो अब यहां पर दिक्कत क्या है? कि जब ब्रह्मा विष्णु महेश एक बात ऊपर कही जाए जो व्यक्ति मुझे इस प्रकार से जान लेता है। वह ब्रह्मा विष्णु महेश की भक्ति छोड़कर मेरा ही स्मरण करता है। मुझे को प्राप्त होता है। अब पहली बात ब्रह्मा विष्णु महेश की बात तो हो नहीं रही। माया की बात हो रही है। गुणों की बात हो रही है। और दूसरी बात यह है कि अगर कोई बुरी चीज है कि ब्रह्मा विष्णु महेश की भक्ति बुरी है। उनकी भक्ति छोड़ के किसको प्राप्त होना चाहिए? और इनकी भक्ति छोड़ के जाना कहां है? यह बताना है। तो भाई वो बताओ ना कि कबीर को प्राप्त होना चाहिए। कबीर की भक्ति करो। व्यक्ति यह क्यों बताएगा कि इनकी भक्ति छोड़कर मुझे प्राप्त मैं खा लेता हूं। आसमान से गिरा खजूर पेटका वाली बात यहां पर गपोड़ गपोड़ संत कर रहे हैं। और एक बात और ध्यान रखने की है। इसमें आगे भी कई जगह कहा गया है कि जो गीता बोलने वाले को तत्व से जान लेगा उसको कुछ और जानना बाकी नहीं रह जाता। मतलब उसको फिर कबीर सागर नहीं चाहिए। उसको तत्वदर्शी के पास जाना नहीं है। हालांकि हमने तत्वदर्शी गीता बोलने वाले को दूसरे अध्याय के 16व श्लोक से सिद्ध कर लिया है। तो हम यहां से भी कह सकते हैं कि जाना नहीं चाहिए। जाना और कहीं आवश्यकता नहीं है। और कबीर

01:02:35:10 वाणी जो कि स्वयं इनके अनुसार परमेश्वर की किताब है। ये कह रहे हैं कि उस उसको छोड़कर के भी जो है जब तक आप जो है गुरु के पास नहीं जाओगे तो कबीर वाणी से भी मुक्ति नहीं मिलेगी। इसका मतलब कबीर वाणी में भी तत्व ज्ञान नहीं है। है ना? तो कहा यह जा रहा है कि ग्रंथों को समझने के लिए तत्वदर्शियों के पास जाना चाहिए। यह नहीं कहा जा रहा है कि अर्जुन तू मेरे से यहां से अभी के अभी चला जा तत्वदर्शी के पास क्योंकि मैं तत्वदर्शी नहीं हूं। पहली बात वो तत्वदर्शी है दो में। दूसरी बात अगर ऐसा था तो अर्जुन गया क्यों नहीं? फिर क्यों रुका रहा?

01:03:12:24 कहीं नहीं गया वो और किसी के पास ज्ञान लेने। खैर और फिर भी तुमने अर्जुन का मोक्ष भी माना है। चलेंगे आगे बात करेंगे। आगे चलते हैं। आगे क्या है? फिर जो है इन्होंने अध्याय चार के श्लोक 10 से 15 में क्या कहा है वो देख लेते हैं। और हम पहले अपना पढ़ लेते हैं 10 से 15 तक।

01:03:39:20 पहले भी जिनके राग भय और क्रोध सर्वदा नष्ट हो गए थे। और जो मुझ में अनन्य प्रेम पूर्वक स्थित रहते थे। ऐसे मेरे आश्रित रहने वाले

⬜ Not used yet · 01:03:48:16 – 01:05:56:00 (2:07)

01:03:48:16 बहुत से भक्त उपयुक्त ज्ञान रूप तप से पवित्र होकर मेरे स्वरूप को प्राप्त हो जाते हैं। ये बहुत अच्छी बातें हैं। यहां पर हम बहुत महीनमहीन चीजों पर ध्यान देंगे। ये इसके बाद अगला पढ़ेंगे। हे अर्जुन जो भक्त मुझे जिस प्रकार बजते हैं मैं उनको मैं भी उनको उसी प्रकार बजता हूं क्योंकि सभी मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं। इस मनुष्य लोक में कर्मों के फल को चाहने वाले लोग देवताओं का पूजन किया करते हैं क्योंकि उनको कर्मों से उत्पन्न होने वाली सिद्धि शीघ्र ही मिल जाती है। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इन चार वर्णों का समूह गुण और कर्मों के विभाग पूर्वक मेरे द्वारा रचा गया है। इस प्रकार उस सृष्टि रचना आदि कर्म का कर्ता होने पर भी मुझ अविनाशी परमेश्वर को तू वास्तव में अकर्ता जान। ठीक है? एक बात और है यहां पर। हमने पहले देखा था भगवान के लिए क्या क्या कहा गया था कि भगवान को कुछ भी करने की आवश्यकता नहीं है। ऐसी कोई चीज नहीं जो उन्हें प्राप्त करनी है और ऐसा भी कुछ नहीं है जो उन्हें मतलब जो जिसकी जिनकी उसे उन्हें रक्षा करनी है। यहां पर भी देखिए ये बात सिद्ध हो रही है कि मुझे तू अकर्ता जान के कि सब कुछ मैंने किया

01:05:03:20 है मगर मैं अकर्ता हूं क्योंकि मुझे किसी भी कर्म में लिप्त नहीं हूं। क्यों लिप्त नहीं हूं? क्योंकि मुझे कुछ भी प्राप्त नहीं करना है। ठीक है? और क्या है आगे? कर्मों के फल में मेरी स्प्रह नहीं है। इसलिए मुझे कर्म लिप्त नहीं करते। इस प्रकार जो मुझे तत्व से जान लेता है, वह भी कर्मों के बंधन में नहीं बंधता। और 15वा क्या है? पूर्व काल के मुमुक्षुओं ने भी इस प्रकार जानकर ही कर्म किए हैं। इसलिए तू भी पूर्वजों द्वारा सदा से किए जाने वाले कर्मों को ही कर। सदा से किए जाने वाले कर्मों को ही कर। पूर्वजों द्वारा किए जाने वाले कर्म। ठीक है? पूर्वजों को गाली देते हैं ना यह लोग। अब पढ़ते हैं इनका अर्थ। क्या कहा है? क्या बकवास की है इसने? तो इसने कहा है अध्याय चार से श्लोक चार के श्लोक 10 से 15 में क्या कहा है?

01:05:56:00 काल ब्रह्म ने कहा है कि जिनके राग द्वेष मर गए हैं। जिसने मुझे यहां 21 ब्रह्मांड के कर्मों का कर्ता तथा मालिक हूं। ऐसा तत्व से जान लिया है। ये

⬜ Not used yet · 01:06:03:25 – 01:26:42:00 (20:38)

01:06:03:25 कहां लिखा है उसमें? भाई 21 ब्रह्मांड, 21 ब्रह्मांड। भगवान कह रहे हैं कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र यह सारी जो सृष्टि रचना आद कर्म मैंने किए फिर भी मैं करता हूं क्योंकि मेरी कर्म में कर्म के फल में आसक्ति नहीं है। ऐसा जिसने तत्व से जान लिया है वह मतावलंबी हो चुके हैं। अब ये क्या है? मतावलंबी भाई जो काल इसके अनुसार जो काल को तत्व से जान लेता है वह मतावलंबी हो जाता है। और जबकि भगवत गीता में भगवान ने क्या कहा है कि जो

01:06:43:18 बहुत से भक्त मेरे आश्रित रहने वाले बहुत से भक्त मेरे आश्रित आश्रित रहने वाले बहुत से भक्त उपयुक्त ज्ञान रूप तप से पवित्र होकर इन शब्दों को कहां ले जाओगे जो व्यक्ति काल की भक्ति कर रहा है वो पापी है वो पवित्र कैसे है तो इन सब श्लोकों को तुम्हें अमान्य करना पड़ेगा नहीं तो पवित्र का अर्थ बताओ तुमने क्या लिया है क्या लिया है पवित्र का अर्थ ज्ञान रूप तब से यानी यहां पर ज्ञानी माना गया है और तुम कह रहे हो ज्ञान होगा जब वो दूसरे के पास जाएंगे यहां तो ज्ञानी माना गया है भगवान के भक्त को ऐसे मेरे आश्रित रहने वाले बहुत से भक्त उपयुक्त ज्ञान रूप तप से पवित्र होकर मेरे स्वरूप को प्राप्त होते हैं। मेरे मदद भावम

01:07:36:19 चार द पढ़ रहा हूं। चार 10 मद भावम दिखाइए इनको ये सब ये सब शब्दों का अर्थ कहां ले जाओगे भाई तुम मदद भावम हम ये सब आप अर्थ कहां ले जाएंगे मदद भावम तो यह वाली बात आ गई इसके बाद क्या लिखा है इसने आगे जो पढ़ने लायक मतलब आपको बताने लायक है जो मुझे अच्छी तरह जान लेता है वह मेरे जाल में नहीं फसता। तो अर्जुन तो अच्छी तरह जान गया था। क्या रामपाल ये डिक्लेअ करता है। हालांकि इसने रामपाल रामपाल ने लिख दिया है कहीं पर गलती से कि अर्जुन को मुक्ति मिली थी। मगर रामपाल ये डिक्लेअ नहीं करता है क्योंकि रामपाल के अनुसार अब अगर मान लेंगे कि मुक्ति हुई थी तो उसको तत्व ज्ञानी कौन मिला भाई? तो अर्जुन की मुक्ति नहीं। अर्जुन को इसने बहुत पापी पाप कर्म करने वाला भी कहा है। तो दोबारा मेरे जाल में नहीं फसता तो अर्जुन तो जान गया था तो अर्जुन जाल में क्यों नहीं फिर अर्जुन जाल से क्यों मुक्त नहीं हुआ? इससे ही पूछो क्या मुक्त हुआ? मुक्त हुआ तो तत्वदर्शी

01:08:52:02 कौन है? कॉमेडी कॉमेडी किंग रामपाल इसका नया नाम रख दो आज से। यह कॉमेडी किंग रामपाल है। ठीक है। तो जो देवताओं की ब्रह्मा विष्णु महेश की साधना करते हैं। भाई देवता का मतलब है अमुक अमुक जो सिद्धि देने वाली जो साधनाएं होती है उनकी बात हो रही है। वहां हर जगह तुम गुणों को गुणों में भी ब्रह्मा विष्णु महेश को डाल देते हो। गुण गुण गुण गुण इज इक्वल टू ब्रह्मा विष्णु महेश। देवता इज इक्वल टू ब्रह्मा विष्णु महेश। क्या बात की साधना करते हैं। वह जल्दी प्रकट होकर उन्हें कुछ राहत दे देते हैं। परंतु पूर्ण मुक्त नहीं कर सकते। इसलिए तू अपने पूर्वजों की तरह शास्त्रानुकूल भक्ति कर्म कर लो भाई।

01:09:46:26 पूर्वजों की तरह ये बाबा रामपाल ने मान लिया भाई। ये दिखाओ भैया पहले पैराग्राफ की आखरी लाइन। बाबा रामपाल पूर्वजों की तरह भक्ति कर्म। यह तुम्हारे बाबा रामपाल कह रहे हैं भाई तुम कह रहे हो कि हमको सही भक्ति से दूर रखा। पूर्वज ऐसी गलत साधना करते आए, बताते आए हैं। तो क्या कर रहे हो ये तुम? हां। चलिए लिंक दे दीजिए। कोई आना चाहता हो। चार से 15 तक हमने कर लिया यहां पर। फिर आगे से कर्म की बात हो रही है। करने योग्य कर्म कौन-कौन से हैं? अगले भाग में करेंगे।

01:10:33:27 लिंक दे दीजिए। कोई कनेक्ट हो जाए। पूर्वजों के अनुसार पूर्वजों ने जो किया है वो कर्म आपको करने हैं। तो पूर्वज पूर्वज तो श्राद्ध करते आ रहे हैं। नहीं करते आ रहे हैं तो उनको तत्व ज्ञानी कौन सा मिला है? ये बता दो। तत्वदर्शी कौन सा मिला है? वो बताना पड़ेगा। इतने पोल है बाबा रामपाल का क्या मैं बताऊं वही प्रबुद्ध जना है जो सुन ले इन चीजों को तो उसको तुरंत अलर्ट हो जाना चाहिए और मैं तो ये कह रहा हूं वो लोग कहां है जो कहते हैं वेद प्रमाणित है वेद प्रमाणित है जाओ कोर्ट में जाके सिद्ध कर दो ना वेद प्रमाणित चीजें है तुम्हारी जो

01:11:20:16 आइए पहाड़ी जी आप जाइन कर लीजिए पहाड़ी जी हैं शायद चैट में इसका जो इसकी किताब किताब पढ़ने से सर में दर्द हो जाता है भाई थोड़ा सा कुछ हल्कीफुल्की बातें भी हो जाए हमने यह दे दिया है स्ट्रीम यारार्ड का लिंक अगर कोई महानुभाव आज की व्याख्या से संबंधित कोई बात करना चाहता है तो आ सकता है जिसने अपनी मां का दूध पिया हो निष्ठा पूर्वक उसको दूध पिलाया हो और जो ब्रह्मा विष्णु महेश की भक्ति को व्यर्थ रामपाल के ज्ञान को सही सिद्ध करने का सामर्थ्य रखता हो तो वह आकर के बात कर ले जिसकी मां ने निष्ठा पूर्वक दूध पिलाया हो और जो रामपाल की रामपाल की बकवास को रामपाल के द्वारा किए जाने वाले कुतर्कों को और तुम लोग ये कहते हो ना रामपाल रामपाल क्यों कर रहे रामपाल जी क्यों नहीं कहो सोचा करो कि जब तुम यह चाहते हो कि हम रामपाल की बकवास को बकवास जानते हुए भी उसको रामपाल जी कहे तो पहले तुम अपनी किताबों को फाड़ डालो जिसमें ब्रह्मा

01:12:35:22 विष्णु महेश पार्वती गई उमा गई ये लिखा है वो लिखा है समझे न्याय पूर्ण आचरण करना सीख लो भाई तुम नहीं सीखोगे तो न्यायालय है अभी वो सिखा देगा चलिए खैर मेरे ख्याल से सहज नहीं है कोई भी आने में जय श्री राम पहाड़ी जी जय श्री राम हर हर महादेव जी बताएं बहुत सुंदर जो पोल खोल रहे हैं आप इनकी बड़ा

01:13:13:15 पिन पॉइंट ले चल रहे हैं बिल्कुल ये आप इनकी जो किताब पढ़ते हैं बिना ना हंसे आप कैसे पढ़ लेते हैं? मैं तो हंसी रोक नहीं पाता हूं। मैं कभी पढ़ता हूं ना कभी-कभी देखता हूं कि कर रखा है इन लोगों ने तो अपनी हंसी मैं रोक नहीं पाता हूं इस प्रकार से। अच्छा नीचे कुछ भाई साहब को रामपाल के जो चेले हैं बोल रहे थे कि हमें आपसे बात करनी है आपसे। हम तो लिंक दे दिया गया है। भाई साहब ऊपर आ जाइए। ऐसा है सांप और बिच्छू शेरों को कांटा नहीं करते। दूरी दूर से रेंग कर निकल जाते हैं।

01:13:57:25 जी जी सही कहा है। आज एक व्यक्ति का फोन आया था। वो बोला कि वेद प्रमाणित है ये तो मैंने उसको जरा कुछ प्रमाण दे दिए। वो नान पंथिया वाला है ना यजुर्वेद का। हां हां हां जन्म मरण से मुक्ति पाने का एकमात्र यही उपाय और कोई उपाय नहीं है। ये मैंने दे दिया। अब वो भाई साहब प्लॉट छोड़ने लगे। तुरंत आर्य समाज चलने लगे अभी वो डाल देंगे हम लोग कल परसों में डाल देंगे भाई चमकाने लालचवाने लालच ले लो लालच ये ले लो कि भाई तुम्हारा जो है धन धनधान्य का लालच दिया जाता है ये कर देंगे तुम्हारे लिए तुमको इतना पैसा दे देंगे ये कर देंगे ये सब सामर्थ सब लालच दिए जा रहे हैं कि आप आ जाओ हमारे में आप जो है हमसे जुड़ जाओ और जो है और पता है आपको एक खास बात क्या थी? मैंने उसके मुंह से निकलवाने की कोशिश की थी कि भाई तू बता मुझे कि वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से बात होती है कि नहीं होती रामपाल से। अच्छा बड़ी देर अटक गया। हां बड़ी देर अटक गया। बड़ी अच्छी बात अच्छी बातें हुई है। बताता तो है कि मैं मैं अधिवक्ता हूं। वो वास्तविकता में क्या है क्या नहीं है बताता अपने आप को एडवोकेट है। अच्छा

01:15:12:26 इसके लिए इसी प्रकार से एक बात मैं कहना चाहूंगा शिवा भाई उसी एडवोकेट की थी। उसी एडवोकेट की बात थी जिसने पहले एक बार मैंने डाल बताया था। अच्छा अच्छा तो मैं एक चीज और एक चीज और देख रहा हूं मैं कि हमारे एक आान चैनल को बंद कराने के लिए इन्होंने स्ट्राइक भेजी थी। उसके बाद चार पांच नए चैनल खुल गए। हां। है ना? अब जब ये चार पांच चैनल पर स्ट्राइक भेजेंगे तो अब कितने खुलेंगे? तीन गुना बढ़ा लो उसके।

01:15:50:07 तो एक बात कहना चाहूंगा मैं। यह खास मैसेज रामपालियों के लिए है। देखिए अभी चारप दिन से जो आपका जो गुरु भाई है जेल के अंदर है अब उसके लिए कोई कारवाई करने को तैयार नहीं। आश्रम वालों ने तो हाथ खड़े कर दिए हैं जब चार पांच दिन में कुछ ऐसा हुआ नहीं तो अब कुछ लोग वीडियो बना रहे हैं और वीडियो बना के रामपाल के जो चेले हैं वो खुश हो रहे हैं। हो गया शिवश का खंडन हो गया शिवश का खंडन। हां बेचारा तड़प रहा है। राजू

01:16:23:22 वो एक एक कोई फिल्म थी ना जिसमें अभिनेता होता है। हां हां हां अभिनेत्री को प्रभावित करने के लिए ये कह देता है कि मैंने कातिल को देखा है। हम ठीक है। हां हां और वो अभिनेत्री प्रेस रिपोर्टर होती है तो मतलब उसको उससे प्रभावित करना था। उसका उससे साथ प्राप्त करना था। तो वो यह कह देता है कि भाई मैंने कातिल को देखा है। एक मर्डर हुआ था। कोई हत्या हो गई थी। अब उसने कातिल को देखा नहीं था। मगर उसको इंप्रेस करने के लिए कह देता है मैंने कातिल को देखा है। तो होते उसे कहानी कुछ इस तरह से चलती है कि एक दिन वो उसको हुलिया बताना पड़ जाता है कि क्या हुलिया था कातिल का बता। तो वो गप्प में एक हुलिया बताता है। गप्प मारते समय। हां हां हां और उलिया बताता है आंख मोटी और छोटे वो करके और वो ऐसा बनाता है वो बन जाता है जानी लीवर

01:17:24:14 और वो उसका और वो उसका बहुत परम मित्र था जिसका वो चेहरा तैयार होता है अच्छा ठीक है तो अब क्या होता है पुलिस उसको पकड़ लेती है उसके थर्ड डिग्री देना चालू करती है तो वहां जेल में वो बेचारा चिल्लाता है राजो ए राजू तो ये वही वाली बात है यहां ये लोग ये गप्प सड़ाका कर रहे हैं। वहां बेचारा वो जो भुगत रहा है उस उस कष्ट से होके गुजर रहा है। हां कह रहा होगा इन लोगों का नाम ले ले राजू यह सतलोक आशुराम है बाबा रामपाल इसमें एक बात है ना जो उस वीडियो पे जो रामपाल के लोग वीडियो बना रहे हैं आपके ऊपर कि उस वीडियो के नीचे बैठ के तालियां बजा रहे हैं रामपाल के चेले बहुत बढ़िया बहुत बढ़िया सत साहिब जी सत साहेब जी हो सकता है कि अगले दिन आप फसो वो फिर से वीडियो बनाए और दूसरे लोग आपके ऊपर तालियां बजाए बहुत अच्छा बहुत अच्छा तो इस परिस्थिति को समझिए रामपाल के चलो आप आज मैं आपके हितषी के रूप में आपसे बात कर रहा हूं कि हां आश्रमों में फोन लगाइए उनसे कहिए वीडियो बनाने से नहीं चलेगा आप कोर्ट में आइए 11 से 12 बार आप क्लीन चिट मिली है वो क्लीन चिट भी लेके आइए और उसको

01:18:40:26 मैंने उससे ये भी पूछा आज जो वो वकील बताता है स्वयं को मैंने उससे पूछा क्लीन चिट कहां है अरे मैं इस पर बात नहीं कर रहा मैं दूसरी बात कर रहा हूं अरे क्लीन चिट कहां है भाई? कहां है? क्लीन चिट ड्रामा चिट सपोर्ट चिट। जी जी बिल्कुल इसी प्रकार से है। आज तुम उसके ऊपर जो वीडियो बनाई है उस पर तुम तालियां बजा रहे हो। अगले दिन हो सकता है तुम फसो और वो तुम्हारे नाम के ऊपर वीडियो बनाए और फिर लोग तालियां बजाएं। तो ये परिस्थिति तुम्हारे साथ भी आ सकती है। अगर अभी से वो नहीं किया तो तुमने कोई कठोर ये क्या है? ठेले वाले का राम ठेले वाले रामपाली का

01:19:24:28 बिल्कुल बिल्कुल देखिए हां भाई कौन आए हैं गणेश पौडियाल हैरी बताएं बताएं भाई नहीं बता जी इनको मैं जानता हूं। मैं बताता हूं। भाई सबसे छोटे भाई किनके?

01:20:02:28 इनके इनके जो छोटे भाई हैं वो रामपाल के तंत्र में ऐसे फंस गए हैं कि घर में किसी की बात नहीं मानते और घर में यहां तक कि झगड़ा तक कर इनके छोटे भाई। चलो अब अब कोई मत जुड़ना। ठीक है हो गया समय काफी है ना जी पियाल जी बताइए अच्छा वो उस दिन जो व्यक्ति था जो आया था आपके चैनल पर लाइव चल रही थी जब तो उसने उसको विकल्प दिए गए थे उसने मुझे चुना वो नहीं समझ में आया उसने मुझे क्यों चुना

01:20:44:09 क्या मैं कहा कि तुम्हारे तरफ से कोई भी नहीं नहीं नहीं हुआ क्या उसने उसने बोला कि सीधे रामपाल रामपाल से हम ज्ञान चर्चा करवाएंगे तो हमने कहा तो रंजीत जी ने कहा कि बताइए किसके हाथ से पीटना है तुमको पीआर पहाड़ी रंजीत सिंह या हमारे शिवश भाई और उनकी फोटो दिखा दी आपकी ये बंदा है शर्मा जी ने फोटो दिखा दी ये है बोले हां चलेगा कोई कोई बात नहीं कर लेंगे इनसे इन्हीं को बुला लो तब ये तब आपको बुलाया गया कि हां ये ज्ञान चर्चा कराने के लिए वो है पर मुझे लग रहा है कि कुछ

01:21:27:01 पेय पदार्थ पी के आया था मुझे ऐसा ही लग रहा था क्योंकि जिस प्रकार से वो कह रहा था कि रामपाल से सीधे वो भी कल के दिन ही अब बताइए इतनी जल्दी कोई चीज हो सकती है अरे भैया इनका चाय परोठा क्या देवड़े हैं ये जी बिलकुल ये चलिए ठीक है ये श्रंखला इस तरह से आवाज पर आ रही है आ रही है

01:22:04:16 तो ठीक है हम अपनी श्रंखला को इसी तरह से प्रसारित करते रहेंगे और आप लोगों को अगर अच्छा लगे तो आप इसको मतलब शेयर भी करें ज्यादा से ज्यादा लोगों तक क्योंकि हम लोग बाल की खाल निकालते हुए एक एक बात करते हुए हर पिन पॉइंट जितने तर्क और प्रमाण युक्ति के साथ सोचा जा सकता है रामपाल की कही हुई चीजों को तुलनात्मक ढंग से जो हमारे प्रमाणिक ग्रंथ है उनके साथ बात करते समय तो उससे हम बात कर रहे हैं आशा करते हैं आपको कि यहां से कुछ प्राप्त हो सकारात्मक आप लेकर के जाएं और रामपाल के लोगों से मैं यह कहूंगा कि भाई आप लोग स्वयं की चिंता भी करें। अंध अंधपने में जाकर के अपने परिवार का सर्वनाश मुझे पता चला जो व्यक्ति इस समय जो जिस जिसके जिस पर मुकदमा दर्ज हुआ है उसकी उसकी जो पत्नी है वो रो रही है उसकी बिटिया रो रही है मेरे पिता जेल में है या मेरे पिता जेल गए थाने गए रात भर वही सड़े एक एक भले ही कोई सब्जी बेचने वाला हो उसका भी आत्म सम्मान होता है और जब वो इस तरह से थाना थाने इत्यादि में रात

01:23:19:25 बिताता है तो वह कैसा लगता है वो आप सब लोग समझते हो भलीभांति हालांकि रामपाल के फॉलोअर्स के लिए तो जेल क्या बात है वो तो जेलधाम है फिर भले ही वहां शौचालय साफ करवाया जा रहा हो बाबा जी से है ना अरे भैया रामपालियों में साहस नहीं है इनके यहां फतवा जा रही है मेरे नाम का उससे दूर रहना तुम्हारे बस की बात नहीं है उससे निपटना जी कुछ दिखा रहे हैं क्या करा रहे हो बताओ आप डेट बताओ किस डेट को आप फ्री हो कल कल फिर ठीक है फोटो और नंबर अपना भेज दो कहां पर करनी है क्या चर्चा अपनी लोकेशन भी डिसाइड कर लो 44083018

01:24:07:13 69 ये नंबर है ठीक है फोटो तुमको प्राइवेट चैट में दे दी है देखो चैट को खोल के चैट पे बात बन जाती इतने लाइव में जुड़ रहे हैं। अरे भाई तो पैसे दे तुम बता दो ना। इतनी व्यर्थ की बातें क्यों कर रहे हो भाई? तुम बता दो इस नंबर पे भेज दो फोटो। बकवास करने आते हैं क्या ये लोग? भाग गया। हमने तो कहा ही था।

01:24:46:07 रामपाल का खेल अच्छा था। ये आवाज रिपीट क्यों आ रही है? क्यों आ रही है? मेरे उधर से आ रही है क्या? मुझे लग रहा है कि मेरे उधर से आ रही है। अब आ रही है। अब नहीं आ रही है। मैंने कहा कि भाई हमने कहा ही था कई बार खेल अच्छा है। व्यक्ति गलत चुन लिया। जितना पीछे पढ़ोगे उतना ही तुमको ही नुकसान होगा।

01:25:19:15 खैर जी देव जी बोले जी राम हर हर महादेव हर हर महादेव हेलो जी ठीक है फिर पहाड़ी जी आने के लिए आपका धन्यवाद देव जी आपका भी आभार और किसी को भी अगर वैचारिक मतभेद के निमित्त तुमसे चर्चा करनी है तो

01:25:53:18 वह जो है हमसे संपर्क कर सकता है। नंबर है 7408301869 और वह आए अगर उसको कोई भी माई का लाल ऐसा है जिसको उसकी माताजी ने निष्ठा पूर्वक दूध पिलाया है और वो रामपाल के ज्ञान को बकवास की बजाय कुछ अर्थपूर्ण सिद्ध कर सकने की क्षमता रखता है तो आए हमसे संपर्क करें बाकी तो मैंने कई बार इशारा किया है कि मत पड़ो चक्कर में कोई है नहीं टक्कर में और अगर रामपालियों की तरह लिए बात करें तो खेल इस बार भी अच्छा था तुम्हारा। व्यक्ति गलत चुन लिया। ठीक है? बिल्कुल जय श्री राम। सभी को जय श्री राम। जय श्री राम।

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A: AHVAAN - Call Of Dharma Live 1:26:44 · 19 Jun 2025

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