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00:00:01:08 तो सभी को जय श्री राम। आशा करते हैं आप सभी कुशल पूर्वक होंगे। और आपको यह जो सीरीज हमने चालू की है वर्ड टू वर्ड इनके इन्होंने जो गीता का अनर्थ किया है रामपाल ने। तो उसका एक-एक शब्द देखते चल रहे हैं हम। हमने पिछले जो सेशन वन हुआ था पिछले एपिसोड में तो उसमें जो इन्होंने रामपाल ने भगवत गीता का जो अपार्थ करना शुरू किया है वो किया है 2.6 से मतलब 2.16 से पहले तक इसने कुछ नहीं कहा। हालांकि उसमें युद्ध भूमि का वर्णन हो रहा है और युद्ध भूमि का वर्णन में कोई ऐसा दार्शनिक पक्ष भी नहीं है। धर्म अधर्म का पक्ष नहीं है। वहां पर वस्तुनिष्ठ जानकारियां है कि ऐसा है ऐसा है। सभी को जय श्री राम। सभी को जय श्री राम। तो इसने उसमें हस्तक्षेप नहीं किया और सीधे इसने 2.6 से अपना जो कूड़े वाला कूड़ा अपना फैलाना गंदगी फैलाना इसने शुरू

00:01:16:14 किया। तो 2.16

00:01:18:14 से ले 2.30 तक हमने पिछले एपिसोड में कवर किया था। उसमें जो कुछ बुलेट पॉइंट्स है वह हम आपको यहां बता दे रहे हैं। सबसे पहले इसने यह मान लिया कि आत्मा नित्य नहीं है। अनित्य है। इसने 2.10 के आसपास जो सबसे पहला हिंदी अर्थ लिखा है तो उसमें इसने माना है कि आत्मा की भी उत्पत्ति होती है और परमात्मा से भिन्न कोई भी ऐसा नहीं है जो सत हो। जो सदैव मतलब सदैव था है और रहेगा। तो क्या है कि आत्मा को कई जगह सनातन कहा गया है। देही नित्यम कहा गया है दोती में और बहुत सी जगह आत्मा को सनातन कहा गया है। तो यहां पर इसका ये झोल पकड़ में आ जाता है। आत्मा सनातन है। वो थी है और रहेगी। तो इसने कहा कि परमात्मा से भिन्न और कुछ भी नहीं था। अब बात ये आती है कि परमात्मा से भिन्न और कुछ भी नहीं था। तो इसको ये मानना पड़े। फिर ये जो आत्मा उत्पन्न हुई है परमात्मा से ही हुई है। है ना? तो परमात्मा से उत्पन्न होने के बाद भी इसने आत्मा को जब नित्य नहीं माना है तो परमात्मा से परमात्मा से निकला होने

00:02:33:18 के बाद भी क्योंकि अद्वैत जो दर्शन है उसके उसके भिन्न कोई भी दर्शन जो जीव और परम ब्रह्म में भेद मानता है तो वो कोई भी दर्शन जो है ये नहीं कहता कि आत्मा जो है नित्य नहीं है चाहे द्वैत हो चाहे विशिष्टा द्वत हो कोई भी दर्शन ऐसा नहीं ऐसा नहीं कहता मगर ये परमात्मा से आत्मा को भिन्न भी मान रहे हैं और फिर ये भी कह रहे हैं कि जो आत्मा है वो नित्य नहीं है, सनातन नहीं है। तो फिर अब इसमें दिक्कत क्या है कि आत्मा कहां से निकली? परमात्मा से ही निकली। ब्रह्म से ही निकली। तो फिर आत्मा में वो सारी क्वालिटीज कैसे नहीं आई? जो ब्रह्म में थी। फिर ये सब चीजें हो जाएंगी। तो आत्मा फिर इसके अलावा जो इनकी जो फेरी टेल्स हैं जो परिकथाएं हैं इनकी। उसमें क्या है कि जैसे सृष्टि की रचना होती है। तो सृष्टि की रचना में इन्होंने बताया कि काल उत्पन्न होता है। काल भी सदैव से नहीं था। पहले से नहीं था। इनके कुछ लोग आकर के कुतर्क करते हैं कि काल पहले से था, सदैव था। तो काल भी पहले से नहीं था। परमात्मा से भिन्न इसने बोला है कि कोई भी नित्य नहीं है। ठीक है? तो अब दिक्कत ये आती है कि जब आत्मा एक बार उत्पन्न हो गई। उत्पन्न होने के बाद काल भी उत्पन्न हुआ और काल ने सृष्टि बनाई।

00:03:50:04 काल की वजह से यह जो आत्माएं उत्पन्न हुई थी यह जाल में फसी। फिर काल मरता भी है तो कभी ना कभी जब काल मरेगा अगर इनको वैसे मोक्ष नहीं मिला अपने कर्मों से तो कभी ना कभी काल मरेगा तो इनको मोक्ष मिलेगा। तो इन प्रश्नों का जवाब है ही नहीं। पहली बात फिर भी यह मानना तो पड़ेगा ना हमें कि काल मरता है तो मोक्ष उस समय सभी जीवात्माओं को मिल जाता है। तो जब सभी जीवात्माओं को मोक्ष मिल जाता है तो उसके बाद काल जब दोबारा दोबारा जन्म लेता है तो उसके जन्म लेते समय यह जो सतलोक गई हुई आत्माएं हैं। यहीं से उठाता है वह अपना माल या फिर नया उत्पन्न किया जाता है। नया प्रोडक्शन हाउस चालू किया जाता है उसके लिए। तो ये सब चीजें सवाल खड़े हो जाते हैं। इसके साथ ही साथ काल से रिलेटेड एक बुलेट पॉइंट और है। वो क्या है कि काल जो है वो समय को भी कहा जाता है। तो बात यह है कि काल की गणना माना जा सकता है कि वहां से शुरू होती है जब कल्प चालू होता है। परंतु क्या जब ईश्वर सृष्टि सृष्टि की रचना कर रहा है उस समय क्या समय नहीं है उस समय क्या टाइम नहीं बीत रहा है बीत रहा है तो वो कौन है वो भी तो काल है तो ये भी एक क्योंकि काल का अर्थ समय भी है समय को भी काल कहा

00:05:05:06 गया है और इनका जो काल है वो वही है वो जो राक्षस जैसा है जो लोगों को फंसाता है आत्माओं को खाता है वो वो नहीं है पूर्ण ईश्वर का नाम काल नहीं है जो हर जगह यत्र तत्र सर्वत्र है वो नहीं है तो फिर प्रश्न ये आ जाता है कि उस समय कौन सा काल था जब सृष्टि की रचना हो रही थी तो उस समय कौन सा काल था जब ये काल नहीं था जो इनका तथाकथित काल है इसके अलावा एक चीज और है कि आत्मा नित्य नहीं है तो उसके अंदर की प्यास नहीं बुझ सकती यहां से एक एक बुलेट पॉइंट और आता है कि आत्मा जब नित्य नहीं है आत्मा के अंदर प्यास किस बात की आ रही है सत स्वरूप हो जाने की मगर वह सत है ही नहीं वो नित्य है ही ना कभी ना कभी उसका भाव था तो जो दो 16 में आया ना कि असत वस्तु का कभी वो सत्ता नहीं होती और सत जो सत सत रूपी तत्व होता है उसका कभी अभाव नहीं होता पर इसका अभाव था यानी कि सत नहीं है परंतु इसके अंदर आत्मा के अंदर सत की प्यास तो आ रही है तो पहली बात तो प्यास क्यों आ रही है जब यह स्वयं सत्य नहीं है दूसरी बात इसकी प्यास रामपाल के अनुसार मोक्ष की प्यास नहीं बुझ सकती क्योंकि यह सत स्वरूप नहीं हो सकती पहली। इसके अलावा एक चीज और है कि जब जीव

00:06:20:14 की चाह का विषय सिद्ध ही नहीं हो रहा है तो फिर ईश्वर को सिद्ध कहां से करेंगे? तो रामपाल का ईश्वर भी सिद्ध नहीं होता क्योंकि आत्मा जो है सत स्वरूप नहीं हो सकती। सत स्वरूप वही हो सकता है जो सत स्वरूप हो। तो ये आ गया एक। तो ना ही ईश्वर का अस्तित्व सिद्ध होगा और ना ही मोक्ष का कोई अस्तित्व सिद्ध होगा। यदि आत्मा को नित्य नहीं माना जाएगा। हालांकि शास्त्रों में भरभर के आत्मा को नित्य कहा गया है। मगर इनका जो यह ढोल की पोल है उस पर हम बात करते जा रहे हैं। अच्छा इसके बाद जो काल है वो नित्य नहीं है। ब्रह्मा विष्णु महेश भी नित्य नहीं है। किसी ना किसी समय पर वो नहीं थे। फिर हैं तो जब हैं तो वो कहां से आए हैं? क्या वो अलग है? क्या वो ईश्वर से ही निकले? अगर ईश्वर से निकले हैं तो फिर वही जब ईश्वर है तो फिर सारी पावर्स होनी चाहिए। ईश्वर ईश्वर के सभी गुण होने चाहिए क्योंकि ईश्वर पूर्ण है। उससे कुछ भी घटाया बढ़ाया नहीं जा सकता। ईश्वर में कुछ जाएगा तो भी ईश्वर की क्वांटिटी वही रहेगी और ईश्वर से कुछ निकलेगा तो निकले हुए की क्वांटिटी भी वही रहेगी। ठीक है? पूर्ण पूर्ण मददम। अच्छा जब काल एक बार मर गया और हमने देख लिया कि काल ने क्या किया था? तो फिर काल को दोबारा क्यों जन्म दिया जाता है? क्यों बनाया जाता है? क्यों बनने

00:07:35:18 दिया जाता है? तो ये भी एक बुलेट पॉइंट आ गया था। पिछले सेशन में जो हमने बातें की थी। इसके अलावा अगला क्या है? इसके अनुसार ईश्वर ईश्वर जो है वह कण-कण में व्याप्त नहीं है। रामपाल के अनुसार सर्वव्यापक ईश्वर नहीं है। उसकी निराकार शक्ति जरूर व्याप्त है। जिस प्रकार से सूर्य की किरणें पूरे संसार को प्रकाशित करती हैं। पर सूर्य हर जगह नहीं होता। उसी प्रकार से ईश्वर है। उसकी निराकार शक्ति संसार भर में व्यवस्था करती है। अब इसमें एक बात यह आ जाती है।

00:08:09:21 कि यदि ईश्वर यदि ईश्वर जैसे सूर्य है और सूर्य की रोशनी पूरे संसार को प्रकाशित कर रही है। परंतु सूर्य की ऊष्मा जहां पर सूर्य है वहां जितनी गर्म है जहां जितनी उसमें दाहकता है जहां उसका प्रकाश है जितना दूर वो प्रकाश की दूरी होती जा रही है उतना ही उसकी जो दाहकता है कम होती जा रही है। तो क्या इसी तरह का ईश्वर है कि ईश्वर से जो जो जितना दूर है उतना ही क्या कहते हैं? ईश्वर से जो जितना दूर है उतना ही ईश्वर की पावर उसके ऊपर जो नियंत्रण है वो कम होता जाएगा। तो दूसरी बात ये आ गई। इसके अलावा इसने एक षड्यंत्र और किया है कि दूसरे अध्याय के पता नहीं 10व अथवा हां 2.10 से 2.30 2.10 से दूसरे अध्याय के दव श्लोक से और दूसरे अध्याय के 30व श्लोक तक हमने पिछला सेशन किया था क्योंकि दूसरे अध्याय का 16वा नहीं दव श्लोक से इसने रामपाल ने अपार्थ करना भगवत गीता का शुरू किया है। तो 2.10 से 2.30 तक पिछला सेशन है। जिसने ना देखा वह देख ले। बुलेट पॉइंट्स जो है मुख्य पॉइंट वो हम यहां बता दे रहे हैं। इसने क्या किया है? 2.10 का अर्थ करते समय पंडित

00:09:24:24 और विद्वान को अलग-अलग बताया। जबकि वहां पर दो बार पंडित शब्द आया है। हम फिर इसने क्या किया? पंडित अलग होते हैं, विद्वान अलग होते हैं। मतलब एक जो जो वो है ना द्वेष ब्राह्मणों के प्रति, पंडितों के प्रति तो वो इसमें दिखाई देता है। इसके साथ ही साथ क्या है? बिना प्रसंग के हां इसके साथ ही साथ हमने ये देखा कि जब वहां पर अर्जुन अपने नाते रिश्तेदारों को देख के युद्ध भूमि में और हथियार डालने लगता है, शस्त्र छोड़ने लगता है तो भगवान उसको यह बता रहे हैं कि तुम किसी को मारते नहीं हो। ये सभी जीवात्माएं नित्य हैं। आत्मा के गुण बता रहे हैं। विवेचना कर रहे हैं कि आत्मा को तुम मारते नहीं हो। और उसको कारण बता रहे हैं अलग-अलग कि क्यों तेरे मारने से कोई नहीं मरता है। यह नित्य है। और अगर तुम यह सोच के मार रहे हो कि तुम उसके शरीर को बचा रहे हो तो शरीर का नष्ट होना निश्चित है। इसलिए भी तुम्हारा इनको इनके शरीर मात्र को नष्ट करने के लिए दुखी होना वो नहीं है। आवश्यक नहीं है। तो ये जब बोध करा रहे हैं तो उस बीच में परमात्मा की बात क्यों आ रही है? हालांकि वहां पर और भी बातें हैं जिससे कि सिद्ध होता है कि वहां पर परमात्मा की नहीं आत्मा की बात हो रही है। जैसे आत्मा को जब नित्य कहा गया तो राम रामपाल

00:10:40:00 ने कह दिया कि भाई आत्मा जो यहां आत्मा की नहीं परमात्मा की बात हो रही है। परमात्मा के अलावा कोई भी नित्य नहीं है। आत्मा को सर्व्यापक भी कहा गया है। तो वहां पर भी इसने कह दिया कि नहीं हां परमा सर्व्यापक केवल परमात्मा है। तो बात यह आ रही है कि बिना प्रसंग के वहां पर आत्मा की बात होते होते बीच में अचानक से परमात्मा की बात क्यों हुई? उससे क्या निकला? अगर कहोगे भक्ति बताना चाहते तो वहां पर बहुत दूर दूर तक भक्ति की बात भी नहीं की गई है कि तुम भक्ति करो भक्ति करो। ठीक है? दूसरी बात क्या है कि एक बात और इन्होंने स्पष्ट करने की कोशिश की है कि परमात्मा के बिना आत्मा को मारा जा सकता है। तो परमात्मा मतलब परमात्मा साथ में है इसलिए परमात्मा वो जो आत्मा है अविनाशी है। यह भी बहुत जरूरी बुलेट पॉइंट है। आत्मा परमात्मा के सानिध्य में है इसलिए आत्मा अविनाशी है। स्वतंत्र रूप से आत्मा अविनाशी नहीं है। ये कहीं पर नहीं कहा कि वो स्वतंत्र रूप से भी अविनाशी है। यदि कहा जाए कि परमात्मा का भजन करके ध्यान करके दुख दूर हो सकता है तो भजन की वहां पर कोई बात नहीं हुई है। पीछे और आगे के श्लोकों में दूर दूर तक तो फिर क्यों वहां पर अचानक से अ परमात्मा की बात आई जब आत्मा की

00:11:55:01 बातें चल रही। दूसरी बात क्या है कि यदि आत्मा सदा परमात्मा के साथ होने के कारण अवध्य है तो वह काल के जाल में कैसे फंसी? जब वो परमात्मा के साथ है क्योंकि इनके हिसाब से जहां पर अर्जुन है, काल है वहां परमात्मा नहीं है। है ना? परमात्मा की निराकार शक्ति है। मगर ये क्या है कि ये तो परमात्मा के साथ में है। सदा परमात्मा के सानिध्य में है। साथ में है। तो परमात्मा के साथ में है तो फिर काल के जाल में नहीं फंसना चाहिए था क्योंकि परमात्मा तो वही है इनकी थ्योरी के हिसाब से जब परमात्मा अलग है वो अद्वैत और द्वैत ये विशिष्टा द्वैत इत्यादि को के पर्सपेक्टिव से ना देखें अभी इनकी जो थ्योरी है वो कहती है काल अलग है और ब्रह ब्रह ब्रह्म काल अलग है परमात्मा अलग है तो इनकी थ्योरी के हिसाब से वहां पर परमात्मा नहीं था नहीं था ना क्योंकि भगवान कृष्ण थे उन्होंने कहा कि उस परमात्मा की शरण में जा तो इनकी थ्योरी के हिसाब से वहां पर परमात्मा नहीं था। मगर यह मान रहे हैं कि था। तो अभी यहां से एक पॉइंट और उत्पन्न होगा बुलेट पॉइंट। मगर यदि परमात्मा के साथ इन्होंने माना है कि परमात्मा के साथ है आत्मा नित्य है तो इनको जो है फिर वह काल के जाल में कैसे फंस रही है? क्योंकि परमात्मा तो सदा

00:13:10:07 उसके साथ है। यदि परमात्मा के सानिध्य में है तो उसे किसकी शरण में जाने को कहा? देखो ये बार-बार कहते हैं ना कि अरे वो तो अर्जुन तो पहले से ही अ भगवान श्री कृष्ण की शरण में था। तो जो ब्रज जो शब्द का उपयोग हुआ है वहां पर पहली बात तो इसको थोड़ा समझ लेते हैं। ब्रज जो क्रिया होती है धातु उसमें गत्यार्थक अर्थ भी होता है और ज्ञानार्थक अर्थ भी होता है। आप किसी के पास खड़े हैं तो आपको कोई गति नहीं करनी है। शारीरिक है ना? आपको चल चलना नहीं है। परंतु आपको मेंटली उनहीं के जिसके पास आप खड़े हैं। उनहीं की शरण को स्वीकार करना है। तो मेंटली आपको आपकी जो गति है वो मेंटली करनी है। तो उस मेंटली गति को ज्ञानार्थक अर्थ हो गया उसका ब्रज शब्द का। तो गत्यार्थक अर्थ नहीं है वहां पर। ब्रज का ज्ञानार्थक है कि आप उस ज्ञान को स्वीकार कर लो कि ये परमात्मा है। ठीक है? मगर फिर भी जब यह यह कहते हैं कि अर्जुन तो पहले से ही श्री कृष्ण की शरण में था तो फिर यहां पर इन्होंने यह माना है कि यदि ये यहां पर इन्होंने कई जगह दूसरे अध्याय में कई जगह यह माना है

00:14:25:26 कि अ आत्मा जो है वो सदा परमात्मा के सानिध्य में रहती है। इसलिए अवध्य है। तो यानी कि अर्जुन उस समय भी आत्मा उसकी भी उस समय परमात्मा के सानिध्य में थी। तो जब परमात्मा के सानिध्य में थी तो उसके उसको जाने के लिए कहां कहा जा रहा है? यानी कि परमात्मा कोई और है। अकॉर्डिंग टू इनकी थ्योरी के अनुसार भी परमात्मा कोई और है। अच्छा अब एक चीज और कह रहे हैं ये कि एक चीज इन्होंने मान ली क्योंकि ये आगे काम आएगी बुलेट पॉइंट्स में वो क्या है कि अविनाशी का कभी नाश नहीं होता। क्योंकि इन्होंने कई जगह कहा है अमर। थोड़ी देर के लिए अमर तो उस पर हम बात करेंगे। जब इन्होंने खुद लिखा है कि अविनाशी का कभी नाश नहीं होता। परमात्मा के लिए यह शब्द का उपयोग हुआ है। देखिए दो 16 या 17 में 216 या 17 में रामपाल ने गीता का अर्थ करते हुए उस कि शाश्वत तो वो है। है ना? उस परमात्मा को कहते हैं। तो परमात्मा के लिए उसका शब्द उसका उस शब्द का उपयोग हुआ है। दो 16 या 17 में 17 में हुआ शायद। तो उस शब्द का उपयोग यानी कि उस यानी कि हमसे दूर है। हम पास में नहीं है उसके। मगर यहां पर एक जगह पर

00:15:41:20 आप डिटेल में देखना है तो आपको पीछे जाना होगा। वो एपिसोड देखना पड़ेगा। मगर इन्होंने एक जगह पर आत्मा के लिए जो बात कही जा रही है वो परमात्मा और परमात्मा पर फिट करने के लिए इन्होंने क्या किया है? यह शब्द का उपयोग यह यह परमात्मा जैसे यहां खड़ा है कहीं दूर नहीं है उस परमात्मा नहीं यह परमात्मा तो आत्मा की जगह पर परमात्मा को फिट करने के लिए आत्मा के लिए जो यह शब्द का उपयोग हुआ था वो इसने रामपाल ने क्या कहते हैं परमात्मा के लिए यूज़ कर दिया तो अब इसमें दिक्कत क्या है कि जब यह परमात्मा हो गया तो यानी कि परमात्मा वही है दो तरीके से सिद्ध हो रहा है परमात्मा वहां पर है एक यह परमात्मा से सिद्ध हो रहा है और दूसरा कि आत्मा सदैव परमात्मा के सानिध्य में रहती है। हम तो परमात्मा के सानिध्य में होने की वजह से वो अबद्ध है। उसके साथ बुरा नहीं हो सकता मगर बुरा हो रहा है। काल के जाल में फंस रही है। तो दो बातों से सिद्ध हो रहा है कि रामपाल के ही वचनों के अनुसार वहां पर परमात्मा है। तो जब वहां पर परमात्मा है तो किस परमात्मा के लिए उस परमात्मा उस परमात्मा की बात हो रही है। किस परमात्मा के सानिध्य में जाने की बात हो रही है? यह बुलेट पॉइंट आपको मिल जाता है। इसके

00:16:56:21 बाद अगला क्या है? जब जब आत्मा की बातें हो रही है और उसमें अयम अयम करके शब्द आ रहा है जिसको रूपांतरित करके यह कहा जाएगा तो अयम अय करते हुए आत्मा के लिए बात हो रही है। अचानक से बीच में ये कहते हैं कि अब यहां पर आत्मा नहीं परमात्मा की बात हो रही है। तो परमात्मा के लिए वहां पर परमात्मा शब्द आना चाहिए संस्कृत में। है ना? वो तो आया नहीं है भगवत गीता में। अय से ही बात हो रही है। पिछले श्लोकों में आत्मा की बात हो रही है जिसको रामपाल ने भी माना है। तो अचानक से बात हो और उसमें जब एक बार बता दिया गया आत्मा की बात हो रही है तो उसमें फिर यह यह करके आगे की बातें हो रही है। अचानक से जब परमा अचानक से जब रामपाल ने परमात्मा को डाला है तो वहां पर यह शब्द से यह शब्द अगर उपयोग करेंगे तो हमें आत्मा को पीछे से लेना पड़ेगा। नहीं तो परमात्मा का अगर हमें अर्थ लेना है तो वहां पर परमात्मा का दतक कोई शब्द होना चाहिए जो कि संस्कृत में वहां पर अवेलेबल नहीं है। तो इससे भी इनका जो अपार्थ है जो ढोल की पोल है वो हमें पता चल जाती है। यदि परमात्मा के लिए माना जाए तो आत्मा की संस्कृत क्या है? जब अयम शब्द से उन्होंने किसी एक को पॉइंट आउट किया है तो इसने एक ही श्लोक में

00:18:12:00 यह परमात्मा आत्मा को अपनी शरण में रखता है। एक ही अयम शब्द से वहां पर परमात्मा आत्मा दोनों की बात कर दी है। तो अगर अयम से मान भी लो के पिछले श्लोक के अनुसार आत्मा को नहीं लेना है। परमात्मा को ले लेना है अचानक से मान भी लो। तो फिर वहां पर दिक्कत ये आएगी कि फिर आत्मा शब्द की संस्कृत कहां है? वहां पर और इसके साथ ही साथ यह कहा गया है के सानिध्य में रहती है के साथ रहती है तो के सानिध्य में रहने की संस्कृत कहां है के साथ रहने की संस्कृत कहां है दो 28 में इसने महा घोटाला कर दिया क्या कर दिया जो श्लोक है दो 28वा दूसरे अध्याय का 28वा श्लोक है जो उसमें दो बार अव्यक्त शब्द आया है और एक बार व्यक्त शब्द आया है। ठीक है? जब भगवान कह रहे होते हैं कि यह जितने भी तुझे प्राणी दिख रहे हैं ये सब प्राणी जो थे वो प्रकट वो एक उत्पन्न होने से पहले जन्म से पहले अप्रकट थे और मृत्यु के बाद भी अप्रकट हो जाएंगे केवल बीच में ही प्रकट है। तो इसने क्या किया है कि तीनों बार अप्रकट की बात ही नहीं की है। इसने तीनों बार प्रकट कर दिया है कि जन्म के पहले भी प्रकट थे। मृत्यु के बाद भी प्रकट रहेंगे और बीच में भी प्रकट है। तो अव्यक्त शब्द का अर्थ ही नहीं

00:19:27:03 हुआ। ठीक है? तो यह भी ढोल में बड़ी वाली पोल है। अब जब हम नहीं लेते हैं तीनों बार जब यह मान लेंगे कि तीनों बार प्रकट प्रकट प्रकट कह रहे हैं कि जन्म से पहले भी प्रकट थे बाद में भी प्रकट होंगे और बीच में ही प्रकट है तो दिक्कत क्या आएगी कि क्या समझाया जा रहा है ये कहकर कि जो जिन लोगों को तू देख रहा है जिनका तू शोक कर रहा है वो पहले भी प्रकट थे बीच में भी प्रकट है आगे भी प्रकट रहेंगे इसलिए तू शोक मत कर तो इसको कुछ समझाया नहीं गया है क्योंकि ये ढोल पोल है। अच्छा इसने क्या किया है? रामपाल ने सर्वगत का जो अर्थ है सर्वगत का अर्थ इसने बदल दिया है। सर्वगत का अर्थ सर्वव्यापक ना लेते हुए वही है कि अ सर्वगत का अर्थ इसने ये लिया है कि वो सर्व्यापक इसलिए क्योंकि उसके कारण संसार विस्तार को प्राप्त हुआ है। है ना? या फिर उसकी निराकार शक्ति पूरे संसार में व्याप्त है। तो इसलिए वह ईश्वर के लिए सर्वगत वो आया है। सर्वगत ईश्वर के लिए आया है। पहली बात तो यह है कि वहां पर निराकार शक्ति के लिए फिर अलग से कोई वो होना चाहिए शब्द। दूसरी बात यह है कि अगर निराकार

00:20:42:19 शक्ति व्याप्त है संपूर्ण संसार में तो फिर ईश्वर के लिए सर्वगत शब्द क्यों आ रहा है? सर्व्यापक शब्द क्यों आ रहा है? और यदि शक्ति के रूप में अ व्यापक होने वाले को हम सर्वव्यापक कहते हैं। तो फिर जो शक्ति स्वयं सर्वव्यापक है जो पूरे संसार में फैली हुई है निराकार शक्ति फिर उसके लिए कौन सा शब्द होगा? क्योंकि सर्व्यापक तो हमने उसको दे दिया जो सर्वव्यापक शब्द हमने उसे दे दिया जिसकी शक्ति पूरे संसार में व्याप्त है। वो स्वयं नहीं। तो यह भी एक बात आ जाती है। दूसरी बात क्या है कि अगर हम यह कहेंगे कि शक्ति पूरे संसार में व्याप्त है। ईश्वर व्याप्त नहीं है तो हमें मानना पड़ेगा कि ईश्वर का जितना कंट्रोल जहां पर स्वयं ईश्वर है वहां है उतना कंट्रोल जहां पर वो नहीं उसकी शक्ति है वहां नहीं है। तो एक रस नहीं है। है ना? शाश्वत नहीं है। ईश्वर घट बढ़ रहा है। ठीक है? दूसरा क्या है? 217 में सत और असत को तत्व से बताने वाले को तत्वदर्शी कहा गया है। सत और असत को और यह भी कहा गया इस प्रकार से जानने वाले इस प्रकार से बताने वाले तत्वदर्शी है। तो जब ये तत्वदर्शी हो गए सत और असत को बताने वाले तो भगवान

00:21:57:20 श्री कृष्ण तत्वदर्शी क्यों नहीं हुए? भगवान श्री कृष्ण ने ही तो बताया है जो पीछे से समरी चली आ रही है सत और असत की तो सत और असत को उन्होंने बताया श्री कृष्ण भगवान ने और बताने वाले को तत्वदर्शी कहते हैं तो दो 17 में तत्वदर्शी श्री कृष्ण भगवान सिद्ध होते हैं। ठीक है? ये ध्यान रखना ये लोग कभी यहां वाले तत्वदर्शी के श्लोक की बात नहीं करते। 434 की बात करते हैं क्योंकि उल्टे हैं तो उल्टे पेड़ की बात इनको ज्यादा समझना है। अच्छा इन्होंने एक जगह और यह कह दिया है जब यह कहते हैं वेदों में प्रमाण है कबीर भगवान है तो आज के बाद नहीं कहेंगे क्योंकि इसने अपनी भगवत गीता में एक जगह लिखा है परमात्मा प्रमाण रहित है। ठीक है? मतलब जो समझदार लोग हैं वही विश्वास करेंगे बाकी नहीं करेंगे। परमात्मा प्रमाण रहित है। तो जब परमात्मा का प्रमाण है ही नहीं तो क्यों हाथी बैठ के चिल्लाया करते हो? वेदों में प्रमाण है। वेदों में प्रमाण है। या प्रमाण रहित ही कहना है। अच्छा यह सब परमात्मा का ज्ञान आत्मा ज्ञान यह सब गलत था क्योंकि यह सब काल की चाल थी। दो 30 तक आते-आते ये बोल दिया है रामपाल ने कि यह सब काल इसलिए बोल रहा है कि उसको अपने भोजन का इंतजाम करना है। तो उसमें क्या किया? ये सब उसकी चाल है जिससे कि अर्जुन

00:23:12:21 युद्ध करे। तो जब चाल है तो परमात्मा का ज्ञान भी चाल हो गया। परमात्मा के बारे में जो चीजें बताई सारी चीजें जो बताई जा रही है वो चाल हो गई और अगर नहीं हुई तो स्पेसिफाई करिए कि कौन सी चीज नहीं हुई है कौन सी है तो स्पेसिफिकेशन ये ढोल की पोल में नहीं किया गया है और आगे क्या है जो लोग दुखी होते हैं वह तत्वदर्शी अथवा मुक्त नहीं होते हैं तो दुखी होने का मतलब रामपाल ने स्वयं अपने एक उसमें कहा है कि मुझे अफसोस है इंटरव्यू में मीडिया के तो यानी उसे अफसोस है यानी उसे दुख है। जब दुख है तो इसका अर्थ है वो मुक्त नहीं है और वह तत्वदर्शी नहीं है। अच्छा एक और बात कही गई है। इसने एक जगह यह कहा है कि यदि मतलब यह बात कही है कि अर्जुन जो भगवान कह रहे हैं ना कि तू लाभ हानि में समदृष्टि रख जीवन और मृत्यु में समदृष्टि रख है ना सबको समान भाव से देख तो ये वहां पर कटाक्ष कर रहे हैं उनकी एक बात पर भगवान की बात पर और इसीलिए आगे चलके ये कहा है कि ये सब काल की चाल है। क्या कटाक्ष कर रहा है रामपाल वहां पर कि भैया क्या भला

00:24:28:20 अर्जुन है ना उसमें कटाक्ष ये कर रहा है कि बताओ कि जिसको जिसके चोट लगेगी वही तो जानेगा ये कैसी बात है कोई भला किसी को ऐसा कुछ कह रहा है वो बताता हूं क्या कह रहा है हां बिना बिना लाभ हानि क्या युद्ध हो सकता है क्या क्या आवश्यकता पड़ी है छाती में तीर खाने की? हां। सब लोग किसी ना किसी कारण से ही कुछ करते हैं। तो यहां पे ये जो बात कह रहा है काल रामपाल का काल कि भैया तुम लाभ हानि में समदृष्टि रखो। यह सब गलत बातें हैं और ये उसकी चाल है उसको फंसाने के

00:25:18:06 लिए। हम ये सब ब्रह्म की चाल थी। है ना? यह लिखा हुआ है। देखिए यह पेज नंबर 22 दिखा दीजिए इनको। पेज नंबर 22 इसकी गीता का। इसमें इसने लिखा है कि द्रोणाचार्य तो विद्वान गुरु थे। वे भी अपने पुत्र अश्वत्थामा के मरने का समाचार सुनकर कलेजा पकड़ कर बैठ गए। युद्ध नहीं कर सके। फिर अर्जुन कौन से खेत की मूली था जो स्वजनों की मौत पर दुखी ना हो। यह सब काल ब्रह्म की चाल है। मतलब यह कहना कि तू मौत किसी की मृत्यु से दुखी मत हो। यह बस हां जो नीचे हेडिंग है ना नकली संत की कथा इससे ठीक ऊपर वाला जो पैराग्राफ है वही है

00:26:00:22 हम तो इसमें इसने स्वीकार कर लिया कि ये सब काल की चाल है मतलब जो भगवान ये कह रहे हैं कि तुझे सर्दी गर्मी धूप छांव और मृत्यु जीवन इन सब में किसी के प्रति आसक्त भेद नहीं देखना चाहिए तो सम दृष्टि रख और प्रभावित मत हो इनमें आने वाली चीजों से तो ये यहां पर इसने डिक्लेअ किया है कि ये ऐसा नहीं है। यह गलत बात है। व्यक्ति का कोई मरेगा तो वो दुखी उसको होना चाहिए। इसमें कोई दिक्कत नहीं है। ठीक है? तो इसने खंडन किया है समदृष्टि का। ये मैं क्यों बता रहा हूं? क्योंकि आगे इसी ने पक्ष भी लिया है समदृष्टि का। क्योंकि कैसे करेगा भाई? कितना झूठ बोलेंगे? कहीं तो गलती होगी ना। अच्छा इसके आगे क्या है? कुल मिला के इसने यहां पर ये कहा है कि अर्जुन कौन से हेतु मूली था जो स्वजनों की मौत पर दुखी ना हो। तो ये सब काल ब्रह्म की चाल थी। यानी इसने खंडन कर दिया। दुखी होने दुखी ना होने वाले जो शिक्षा है भगवत गीता की लाभहानि में वो नहीं करना चाहिए अंतर तो इसने वहां खंडन कर दिया अच्छा सच्चाई क्या है कि अर्जुन के दुखी होने और ना होने में व्यवहार और परमार्थ का अंतर है जो हम आगे चलकर के समझाएंगे। तो यह बुलेट पॉइंट्स हैं जो हमने अह जो सेशन

00:27:16:00 वन है इसका भगवत गीता को लेके हम जो चल रहे हैं एक-एक श्लोक इसने क्या-क्या बिगाड़ा है क्या-क्या अपार्थ किया है तो वो हम ले चल रहे हैं और इसने अपार्थ करना शुरू किया 2.10 से ले 2.10 से तो हमने वहां से समराइज किया है कि भाई 2.10 से लेकर के 2.30 तक जो इसने अपार्थ किया था भगवत गीता का उसके बारे में हमने अभी बताया उसको समराइज किया। पहले एपिसोड के बुलेट पॉइंट्स आपको बता दिए। अब हम आगे

⬜ Not used yet · 00:27:39:27 – 01:00:43:03 (33:03)

00:27:39:27 चलते हैं। अब क्या है आगे? तो ये हमारे पास दोनों हैं। यह जय दयाल गोविंदका जी की है। समय आने पे आपको प्रदर्शित कर दी जाएगी। और तो अब हम चालू करते हैं यह इनकी गीता का 23 नंबर का पेज खोल दीजिए जरा 23 हां इससे

00:28:22:18 अगला इसमें आप देख सकते हैं ये कोई दृष्टांत बता रहा है रामपाल और देखिए कितना मूर्ख मूर्खता की पराकाष्ठा देखिए कितना कितना अज्ञानी है ये खुद ही पूरे पूरे जीवन पूरे सब जगह पर यह करता रहता है कि भगवत गीता कृष्ण ने नहीं काल ने कही है। मगर यहां देखिए पहले पैराग्राफ की लास्ट लाइन पे क्या लिखा है? यही ज्ञान भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को श्री गीता जी के माध्यम से दिया है। अब बताइए कहां-कहां तक

00:29:01:16 भागोगे? है ना? मूर्खता की पराकाष्ठा है और कुछ नहीं है। हम ऐसा है ना यह जो हम चला रहे हैं असल में वास्तविकता में हम लोग आपके साथ भगवत भगवत गीता पर डिस्कशन कर रहे हैं। ये मान के चलिए ऐसा नहीं है कि हम रामपाल के लिए विशेष टाइम निकाल रहे हैं। क्योंकि ये हर पेज पर लगभग हर पंक्ति में मूर्खता से भरी हुई किताब है। रामपाल की प्रत्येक किताब कोई सर पैर नहीं कुछ नहीं है। अब देखिए यही ज्ञान भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को श्री गीता जी के माध्यम से दिन भर ढिंढोरा पिटेंगे कि नहीं कृष्ण ने नहीं काल ने दिया कृष्ण ने नहीं काल ने दिया है उनको प्रमाण दिखा देंगे महाभारत से सब सब जगह से की नहीं कृष्ण भगवान ने नहीं दिया भागवत से मगर नहीं कृष्ण ने नहीं काल ने दिया कृष्ण ने नहीं काल ने दिया है मगर खुद ही मान रहे है यही ज्ञान भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को श्री गीता जी के माध्यम से दिया आगे चलते है अब इसमें आता है कि अध्याय दो 31 वे श्लोक में हमारी भगवत गीता क्या कह रही है जय दयालका जी की खोल दीजिए भगवत

00:30:22:08 गीता 31वा श्लोक तो इसमें 31 वे श्लोक में कहा जा रहा है कि अपने धर्म को देखकर भी तू भय करने योग्य नहीं है। अब यहां तक बता दिया गया कि ना कोई मतलब वह आत्मा कभी मरती नहीं है और अगर तू उनके शरीर के नष्ट होने की आत्मा कभी मरती नहीं तो आत्मा को लेकर तुझे चिंता नहीं करनी है और यदि तू उनके शरीर को नष्ट होने को लेकर के परेशान हो रहा है तो उनका नष्ट होना निश्चित है तो फिर भी तेरा शोक करना उचित नहीं है। फिर आगे कहा जा रहा है कि अपने धर्म को देखकर जो लौकिक धर्म है व्यवहारिक धर्म है अर्जुन का उसको देखकर भी तू भय करने योग्य नहीं है। यानी तुझे भय नहीं करना चाहिए क्योंकि क्षत्रिय के लिए धर्म युद्ध धर्म युक्त युद्ध से बढ़कर दूसरा कोई कल्याणकारी कर्तव्य नहीं है। अगर आपके सामने कोई ऐसा युद्ध है आप अगर क्षत्रिय हो और आपके सामने कोई ऐसा युद्ध है जिसमें आपको धर्म के पक्ष की ओर

00:31:37:08 से लड़ना है तो यह आपके लिए सौभाग्य की बात है। है ना? तो अब इस व्यक्ति ने क्या कहा है? इस व्यक्ति ने यहां पर इस बात को ज्यादा उससे नहीं लिया है। यहां पर इस बात को इसने प्रायोरिटी से नहीं लिया है। मगर इसने ये भगवत गीता में इसका पेज नंबर आप खोलिए। अ दो नंबर पेज पर

00:32:09:21 जाइए। दो नंबर पेज पर ऊपर से सेकंड लाइन जो यह बोलता है ना कि 5% श्लोक जो है वो काल ने अपने मन से बोले हैं। इसकी खाट खड़ी हो जाएगी। इसको इतने श्लोकों को मानना पड़ जाएगा। कभी सामने तो आए। हां। इसमें देखिए क्या कहा जा रहा है। पहली लाइन में अंत में देखिए क्वेश्चन मार्क के बाद से पहली लाइन में क्वेश्चन मार्क जो दिख रहा है लास्ट में एकदम

00:32:46:16 इस युद्ध को धर्म युद्ध की संज्ञा नहीं दी जा सकती। पहली लाइन के लास्ट में देखिए राइट कॉर्नर इस युद्ध को धर्म युद्ध की संज्ञा नहीं दी जा सकती। जैसे अर्जुन ने युद्ध करने से इंकार कर दिया था। युद्ध क्यों हो रहा था? इस युद्ध को धर्म युद्ध की संज्ञा भी नहीं दी जा सकती। तो इसने यहां ये मान लिया कि यह जो युद्ध है वह धर्म युक्त नहीं है। हम और उसके आगे उसने बात की है कि वो क्यों हो रहा है क्यों नहीं हो रहा है। तो ये जो इसके हिसाब से जो ये युद्ध था वो धर्म युक्त नहीं था। मगर भगवत गीता में दूसरे अध्याय के 31 वे श्लोक में भगवान श्री कृष्ण ने और अगर इनकी भाषा में कहा जाए तो गीता कहने वाले काल ब्रह्म ने इसको धर्म युक्त युद्ध कहा है तो ये भी इसने अपनी मर्जी से बोला होगा अब कितने श्लोकों को आप नहीं मानोगे जैसे कि आपने उस श्लोक को नहीं माना है जो अभी ये सब काल की चाल है हां सम विषम जो होने को बोल रहा है भगवान श्री कृष्ण बोल रहे हैं कि लाभ आदि में समांतर एक तो वहां पे इसने

00:34:01:22 माना कि काल की चाल है समस अंतर करना चाहिए समदृष्टि नहीं रखनी चाहिए और अभी आगे खुद ही बोलेगा समदृष्टि रखनी चाहिए मूर्खता का पहाड़ पहाड़ है मूर्खता का तो दो दो श्लोक तो यही हो गए जिसमें इसने अस्वीकार कर दिया क्योंकि इन्होंने यहां पर भगवान श्री कृष्ण ने इसको धर्म युक्त युद्ध कहा है। इसके बाद क्या है आगे? इसका पहले पढ़ देते हैं जो इसने बोला है। तो अध्याय दो के श्लोक 31 37 में कहा है कि क्षत्रिय का धर्म नहीं है कि युद्ध में कायरता दिखाए और फिर युद्ध में मर भी गया तो स्वर्ग का दरवाजा खुला। इसने समराइज किया 31 37 को। जीत गया तो राज्य का सुख भोगेगा। ऐसा अवसर बड़े भाग्य से मिलता है। अर्जुन तेरे तो दोनों हाथों में लड्डू है। क्षत्रिय की अपकीर्ति ये 23 नंबर का प्रश्न है। लास्ट पैराग्राफ क्षत्रिय की अपकीर्ति मरने से भी दुस्तर है। मतलब क्षत्रिय की जो अपकीर्ति होती है वो मरने से भी ज्यादा खराब मानी जाती है। मरने

00:35:17:03 से भी दुस्तर है। इसलिए अर्जुन मान जा मेरी बात युद्ध कर ले। अध्याय दो के श्लोक 38 में कहा है कि हारजीत दुख सुख लाभ हानि को समान समझकर युद्ध करे तुझे पाप नहीं लगेंगे हम अब बिना लाभ हानि के अब यहां ये कटाक्ष कर रहा है इस श्लोक में भी कटाक्ष कर रहा है ना यहां पे इन्होंने फिर से लाभ हानि की बात कर दी है ना तो इस श्लोक में भी कटाक्ष कर रहा है कहां की है लाभ हानि की बात

00:35:51:01 हां जय पराजय लाभ हानि और सुख दुख को समान समझकर उसके बाद युद्ध के लिए तैयार हो जाए। तो इसने ये तीसरा श्लोक है जो इसने गलत सिद्ध किया। क्या कह रहा है कि अब कृपया पाठक विचार करें बिना लाभ हानि के युद्ध कैसे हो सकता है? बिना लाभ हानि के नहीं कहा जा रहा है। कहा जा रहा है वहां पर कि लाभ और हानि में समदृष्टि रख। हानि से दूर मत भाग और लालच के लिए दौड़ मत लगा उसके निकट जाने के लिए। अच्छा दूसरी बात अब यह आती है कि यदि समदृष्टि नहीं है व्यक्ति के पास तो क्या वो कभी मुक्त है? यदि वो व्यक्ति लाभ हानि से प्रभावित होने वाला है तो वो कभी मुक्त कहला सकता है? नहीं कहला सकता। मुक्त वही है जो लाभ हानि में प्रभावित ना हो। समदृष्टि वाला मुक्त है। ईश्वर मुक्त है क्योंकि उनके लिए सब कुछ एक बराबर है। इक्वल इसीलिए ईश्वर वही है जो कुछ भी कर सकता है। खैर तो सम विषम परिस्थिति को मानने से मना कर दिया इसने। जीवन मृत्यु के में समानता जो देखने को भगवान ने कहा है। समत्व बुद्धि और समत्व का अर्थ भी कुछ निराला कर दिया है।

00:37:06:07 समत्व बुद्धि मतलब दो अलग-अलग प्रकार के तत्वों में समान बुद्धि रखो। तो समत्व का कुछ अलग ही अर्थ कर दिया है। है ना? तो विद्यावान कौन हो जाता है? जो ये जो हम लोग प्रभावित हो रहे हैं ना कि अरे ये हो गया वो हो गया। विद्यावान वो है अविद्या से मुक्त वो ही है जो जो जानता है कि कुछ नहीं हुआ है सब खेल है और दोनों चीजों को इक्वली देख रहा है वो विद्यावान है जैसे कि एक छोटे बालक के कंपैरेटिवली उसके जो माता-पिता होते हैं वो विद्यावान होते हैं। क्यों होते हैं? क्योंकि जो छोटा शिशु है वह कई ऐसी छोटी छोटी चीजों में परेशान होता है खुश होता है जो नगण्य है बड़े लोगों के अनुसार तो वो विद्यावान है इसलिए उनके पर्सेक्टिव से वो कुछ नहीं है नथिंग तो वो जो छोटे बच्चे के लिए जो चीजें जो प्रभाव डालने वाली है वही चीजें जो उसके माता-पिता है उनके लिए प्रभाव डालने वाली नहीं है तो वो एक तरीके से उन चीजों से मुक्त है उन परेशानियों से मुक्त है जिन परेशानियों से घिरा हुआ वह बालक तो इनका कहना है कि नहीं समत्व बुद्धि नहीं रखनी चाहिए।

00:38:21:14 अगर इसने यहां पर मना कर दिया। अब काल ब्रह्म ने इसी नेक्स्ट पेज पर 24व पेज पर इसने कहा है कि फिर स्वयं काल काल ब्रह्म ने ये पांचवी लाइन है काल ब्रह्म ने अपना स्वार्थ सिद्ध करने यानी महाभारत का युद्ध करवाने के लिए पूरा जोर लगाया। झूठ सच का सहारा लिया। यहां पे फिर से इसने काल को झूठा कहा। तो प्रश्न फिर से आ जाता है यदि काल झूठ बोल सकता है तो हम उस पर विश्वास किस आधार पर करें। किसी भी बात के लिए अगर कहे तत्वदर्शी जो कहेगा उस बात पर विश्वास करो तो तत्वदर्शी तत्वदर्शी तब बनेगा जब काल की कोई भी एक बात मान ली जाए वो बात किस आधार पर मानी जाए ये इन्होंने कभी नहीं बताया तो सच झूठ का सारा अच्छा अब एक बात ये आती है कि ये इसकी चाल है काल की कि वो महाभारत के युद्ध को करवा करके और अपना का काम निकलवाना चाहता है। ये काल की चाल है। तो मैं यह मान सकता हूं कि उसको श्राप मिला है और वह सूंघता है या खाता है मगर उसको जीवात्माएं चाहिए। प्रतिदिन सवा लाख जीवात्माएं चाहिए। तो फिर क्या उस समय लोग मर नहीं रहे थे। अपनी मृत्यु जो होती है वो मर नहीं रहते मरते नहीं है और

00:39:36:24 जो उसको खाने के लिए जीवात्मा जो चाहिए वो जो है उसके लिए युद्ध ही करवाना पड़ रहा है तो ऐसे में उन दिनों क्या होता है जिस दिन पूरे संसार में कोई युद्ध नहीं होता है तब क्या होता है तो ये एक बात सोचने की है अगर यह कहा जाए कि पूरे संसार में लगभग कुल मिलाकर के इतने लोग मर जाते हैं कि उसकी स उसको जो है सवा लाख का भोजन मिल मगर महाभारत के काल में नहीं मिल रहे थे तो यह कितनी हंसी की बात होगी भाई चींटियां मरती होंगी बहुत सारे जीव जंतु होते हैं जो डेली प्रतिदिन मरते होंगे जीवात्मा तो सबकी एक है हम अच्छा इसमें एक पॉइंट और आता है

00:40:17:12 कि जब सृष्टि रचना होती है तो सृष्टि रचना होते समय कुछ जीवात्माओं को जानवर के रूप में जन्म दिया जाता है हम क्यों यहां सारी पहले पूरी सृष्टि में केवल मनुष्य होते हैं तो ये सब सोचने वाली बातें हैं। प्रश्न की बातें हैं। जब इनके वो आएंगे ना दोनों आते हैं चंगूमंगू या कोई और तब पूछा जाएगा। खैर आगे चलते हैं। अब यहां तक इन्होंने जो है 38 तक अर्थ बता दिया तो हम अपने अर्थ पढ़ लें 38 तक। तो [संगीत]

00:41:00:07 यहां पर फिर हम अपने अर्थ पढ़ रहे हैं क्योंकि जितनी भी वैसी चीजें थी वो हमने ले ली है विवादास्पद तो 335 में 235 में कह रहे हैं भगवान कि जिनकी दृष्टि में तू पहले बहुत सम्मानित होकर अब वो बता रहे हैं कि लघुता को अब लघुता को प्राप्त होगा वह महारथी तुझे भय के कारण युद्ध से हटा हुआ मानेंगे तेरे वैरी लोग तेरे सामर्थ की निंदा करते हुए तुझे बहुत से ना कहने योग्य वचन कहेंगे 36 में 37 में क्या है? या तो तू युद्ध में मारा जाकर स्वर्ग को प्राप्त हो जा अथवा संग्राम में जीतकर पृथ्वी का राज्य भोगेगा। इस कारण हे अर्जुन तू युद्ध के लिए निश्चय करके खड़ा हो जा। तो इन्होंने जो ये समराइज किया था उन सबको उसने तिलांजलि दे दी। अपने घटिया ज्ञान के आधार पर जय पराजय लाभ हानि और सुखदख को समान समझकर उसके बाद युद्ध के लिए तैयार हो जा। यह 38वा है। इस प्रकार युद्ध करने से तू पाप को प्राप्त नहीं होगा। अब 39वा आता है तो हम 39 नंबर का अपना वाला पढ़ लेते हैं। हे पार्थ यह बुद्धि तेरे लिए ज्ञान योग के विषय में कही गई। यहां तक क्या चल रहा था? ज्ञान योग्य सांख्य योग्य योग विषय में कही गई। और अब तू इस इसको कर्म योग के विषय में सुन। जिस बुद्धि से युक्त

00:42:15:08 हुआ तू कर्मों के बंधन को भलीभांति त्याग देना देगा। यानी सर्वथा नष्ट कर डालेगा। तो अब कर्म योग ज्ञान क्या सोचे जिसके कारण हम मुक्ति की ओर बढ़े अब बताया जा रहा है क्या करें हाथ पैरों से क्या करें जिसके कारण हम मुक्ति की ओर बढ़े ठीक है उसने अगला जो वो किया है 39 से 45 तो हम अपने पहले 39 से 45 तक के पढ़ लेते हैं। इस कर्म योग में आरंभ का अर्थात बीज का नाश नहीं होता और उल्टा फल रूप दोष भी नहीं है। है ना? बल्कि इस कर्म योग रूप कर्म योग रूप धर्म का थोड़ा सा भी साधन जन्म मृत्यु रूप महान भय से रक्षा कर लेता है। यह 40वा हो गया। अब 41वा है वो क्या है? हे अर्जुन इस कर्म योग में निश्चय निश्चयात्मिका बुद्धि एक ही होती है। किंतु अस्थिर विचार वाले विवेकहीन सकाम मनुष्यों की बुद्धियां निश्चय ही बहुत भेदों वाली और अनंत होती है।

00:43:16:21 क्या कहा जा रहा है? हे अर्जुन जो भोगों में तन्मय हो रहे हैं जो कर्म फल के प्रशंसक वेद वाक्यों में प्रीति रखते हैं जैसे वेदों में क्या है ना ऐसे वाक्य आते हैं ना आप ये करोगे तो ये मिलेगा ये करोगे तो ये मिलेगा तो उसको करना गलत नहीं है परंतु यदि हम अंतिम रूप से देखें जैसे कोई शुरुआत कर रहा है तो उसके लिए बिल्कुल ठीक है कि वो अभी भगवान की शरण में नहीं है तो किसी लालच के कारण ही वो धर्म का रास्ता अपना लेता है। जैसे एक एक जो बालक है सामान्य बालक वो पहली बार मंदिर की ओर कब देखता है जब उसकी मां वहां खड़ी होती है। लालच उसकी मां वहां पर है। है ना? तो इसी तरीके से शुरुआत है तो आप धर्म में प्रवेश कर रहे हैं। मगर जब आपका जो क्या कहते हैं? उद्देश्य मुक्ति है तो उस मुक्ति के उद्देश्य के रूप में आपका भोगों के लिए बात करने वाले जो वाक्य हैं उन उनमें उनकी प्रीति का गुणगान करना प्रशंसा करना है ना तो उन लोगों को यहां पर निम्न कहा गया है जो स्वर्ग से बढ़कर दूसरी कोई वस्तु ही नहीं है जो ऐसा सोचते हैं ऐसा कहने वाले वे अविवेकी जन है इस प्रकार जिस पुष्पित यानी दिखाऊ शोभा युक्त वाणी को कहा करते जो कि

00:44:31:25 जन्म रूप कल कर्म फल देने वाली एवं भोग तथा ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिए नाना प्रकार की बहुत सी क्रियाओं का वर्णन करने वाली है। उस वाणी द्वारा जिनका चित्त हर लिया गया है जो भोग और ऐश्वर्य में अत्यंत आसक्त है उन पुरुषों की परमात्मा में निश्चयात्मिका बुद्धि नहीं होती। मतलब जो धर्माचरण में जैसे कर्मकांड करना या ऐसे यज्ञ करना जो इसी में ही कर रहे हैं सदैव उससे आगे नहीं बढ़ रहे हैं और किसी ना किसी फल की प्राप्ति के लिए कर रहे हैं तो वो कभी मुक्ति के पथ पर नहीं पहुंच पाएंगे क्योंकि वो भोगों को प्राप्त करने के लिए कर रहे हैं। ये सब कहा गया 37 38 से लेकर 44 तक 45वा भी पढ़ लेते हैं। हे अर्जुन वेद उपयुक्त प्रकार से तीनों गुणों के कार्य रूप समस्त भोगों एवं उनके साधनों का प्रतिपादन कराने वाले हैं। तो वेदों में सब बताया गया कि आपको ये लक्ष्मी की कमी है तो वो उसके लिए कैसा पूजन होना चाहिए ये सारी चीजों की बात की गई है। ऐसा नहीं है हर मंत्र में केवल मुक्ति की बात हो रही है। मगर उसका भी परवसान किस में है कि व्यक्ति किसी प्रकार से लक्ष्मी के कारण रोग दोष दूर हो जाने के कारण या किसी फल की प्राप्ति हेतु धर्म का मार्ग अपनाएगा जिससे कि उसकी बौद्धिक क्षमता प्रज्ञा शक्ति का विकास होगा जिससे कि वो

00:45:46:28 फिर आगे मोक्ष के मार्ग पर आगे बढ़ेगा तो वेद ने उपयुक्त प्रकार से तीनों गुणों के कार्य रूप समस्त भोगों एवं उनके साधनों का प्रतिपादन करने वाले हैं। इसलिए तू उन भोगों एवं उनके साधनों में आसक्ति हीन हर्ष शोका आदि द्वंदों से रहित यहां फिर वही कहा जा रहा है यहां क्या कहा जा रहा है 45 वे श्लोक में हर्ष शोक मतलब ये विषम बुद्धि मत रख समुद्धि रख द्वंदों से रहित नित्य वस्तु यानी जो परमात्मा है परमात्मा में स्थित योगक्षेम को ना चाहने वाला और स्व यानी योगक्षेम मतलब परमात्मा तुम्हें फल की प्राप्ति देंगे ये करेंगे वो करेंगे तो ऐसी बुद्धि रखने वाला और ऐसी बुद्धि ना रखने वाला और स्वाधीन अंतःकरण वाला हो जा मतलब जो वेदों का आलंबन लो या धर्म का आलंबन लो तो लालच की वजह से मत लो यदि आपको मोक्ष के मार्ग पर आगे बढ़ना है यदि आपको स्वयं को विद्यावान कहलवाना है तो तो यहां तक हमने 45 तक सही अर्थ क्या है वह पढ़ लिया अब हम देखते हैं इन्होंने क्या किया तो 39 से 45 का अर्थ है समबुद्धि होकर कर्म बंधन

00:47:03:14 से मुक्त हो जा। ऐसे डगमग बुद्धि वाले कामयाब नहीं होते। अच्छा इसमें एक और है इससे थोड़ा सा ऊपर चलते हैं। पहले कि क्षत्रिय का धर्म होता है क्षत्रिय का धर्म होता है युद्ध करना। ठीक है? ऊपर सेकंड पैराग्राफ है इसी पेज में। क्षत्रिय का धर्म होता

00:47:36:06 है तो कृष्ण भगवान के लिए क्या कह रहा है ये व्यक्ति? कि यदि श्री कृष्ण जी यह ज्ञान कहते तो काल वन के साथ युद्ध छोड़कर नहीं भाग भागते। यानी कि क्षत्रिय का जो युद्ध करने वाली बात है। है ना? वो वो उस श्लोक का भी खंडन है कि क्षत्रिय का धर्म युद्ध करना तो उसका भी खंडन कर दिया। चार श्लोक हो गए अभी तक खंडन। चार श्लोकों को अमान्य कर दिया। तो अब ये यहां कह रहे हैं यदि श्री कृष्ण जी यह ज्ञान कहते तो कालवन के साथ युद्ध छोड़कर कभी नहीं भागते। वो भी क्षत्रिय थे। इसने क्या माना कि भगवान श्री कृष्ण जो काल्यावन को मारा था राक्षस को मकुंद जी महाराज की कथा वो कभी और सुनाएंगे अ मगर उसको जो मारा था काल्यावन को तो उसको एक लीला के रूप में मारा था कि वो उससे पहले भाग के गए कहीं पर मचकुंद जी महाराज सो रहे थे भाग के वहां पर जाकर उसको मरवाया खुद नहीं मारा भाग के गए रणछोड़ तो यहां पर एक बात सोचने की है पहली कि यह व्यक्ति वर्ण को जन्म से मानता है। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र ये क्या मानता है? जन्म से। जो ये कहता

00:48:51:08 है ना जो ब्रह्म को जान गया वो ब्राह्मण ना है। क्यों? क्योंकि जब यह खुद कह रहा है कि कृष्ण जी मैदान छोड़कर भागे नहीं भागते। तो जब वो भागे हैं तो उनको क्षत्रिय क्यों कह रहा है? या तो तू यह मान ले कि क्षत्रिय का धर्म नहीं है युद्ध करना। या फिर तू यह मान ले कि भागने के बाद भी वो क्षत्रिय थे। तो तू जब दोनों ही बातें मान रहे हो तो यहां पर इसने वर्णाश्रम आचरण के विपरीत कार्य करने की स्थिति में भी यहां पर क्या कहा है? भगवान श्री कृष्ण को क्षत्रिय कहा है। तो इसने भी वर्ण को जन्म से माना है। ये ध्यान रखने योग्य बात है। अब नीचे आ जाइए थर्ड पैराग्राफ। तो 39 से 45 तक का अर्थ है समबुद्धि होकर कर्म बंधन से मुक्त हो जा। ऐसे डगमग बुद्धि वाले कामयाब नहीं होते। राग द्वेष मत रख तथा तीनों गुणों ब्रह्मा रजोगुण रजोगुण विष्णु सतगुण शिव तमोगुण की भक्ति से रहित हो जा। अब ये लोग क्या कहते हैं कि कौन कहता है हम ब्रह्मा विष्णु महेश की भक्ति नहीं बताते। तो यहां नोट कर लीजिए ये लोग अब की बार जब ये झूठ बोले तो ये तमाचा मारना इनके मुंह पर। क्यों? क्योंकि ये क्या सिखा रहा है? ब्रह्मा

00:50:06:09 विष्णु महेश की भक्ति से भी रहित हो जा। जबरदस्ती यहां पर तीन गुणों के प्रति आसक्त नहीं होना है। राजसिक, तामसिक और ये जो सात्विक भाव होते हैं उनके प्रति आसक्त ना होने की बात कही जा रही है। तो इसने बिना सोचे समझे वो सारी थ्योरी एक है। बुलेट पॉइंट्स बताए थे पहले वाले भाग में तो वो सारी थ्योरी एक है। ब्रह्मा जी ब्रह्मा विष्णु महेश यदि गुण है और यदि शिव जी तामस गुण है और उनकी उत्पत्ति प्रकृति से हो रही है तो शिवजी के उत्पन्न होने से पहले जो काल ने गलत चीजें की तामस गुण वाली चीजें की वो कैसे कर दी यानी कि शिवजी तब भी थे किसी और रूप में विद्यमान थे जिसके कारण जो है काल प्रभावित हुआ यदि शिवजी गुण है केवल गुण है हां तो पहली बात वो बात हो नहीं रही है मगर फिर भी इसने अपने मन से ब्रह्मा जी की ब्रह्मा विष्णु महेश की भक्ति को त्याग दे जबकि भक्ति की यहां बात ही नहीं हो रही है हम देखिए राग द्वेष वाला जो है वो खोल ले जरा यहां बीच में

00:51:39:09 हम तो यहां पे भक्ति की कोई बात नहीं हो रही है। फिर भी ये भक्ति को त्यागने की बात कर रहा है कि जो है राग द्वेष मत रख तथा तीनों गुणों से तीनों गुणों से दूर होने की बात हुई बात की है। तो गुणों से दूर होने का मतलब हो गया कि ब्रह्मा विष्णु महेश की भक्ति से दूर हो जा। योगक्षेम से भी रहित हो जा। योगक्षेम का अर्थ इसको मालूम नहीं है क्योंकि कम पढ़ा लिखा है। हिंदी में भी कमजोर है। तो योगक्षेम का अर्थ नहीं समझ पाया है ये। योगक्षेम से रहित हो जा। इसने बताया नहीं योगक्षेम का अर्थ क्या है? योगक्षेम का अर्थ क्या है? कि भगवान से इस तरह से सोचना कि वह मुझे फल की प्राप्ति दे। ऐसा करें, वैसा करें तो इससे भी आप रहित हो जाओ। अब यहां पर कह रहा है कि पूर्ण परमात्मा के परायण हो जा। ये कहां पे माना है

00:52:33:19 इसने? स्वाधीन अंतःकरण आत्मवान होने की बात की जा रही है। 45 वे श्लोक में। तो ये आत्मवान होने की बात नहीं कह रहा है। वहां पे क्या बोल रहा है? पूर्ण पूर्ण परमात्मा 45 व श्लोक में लास्ट में जो लाइन आई है वही है कि योगक्षम को ना चाहने वाला और स्वाधीन अंतःकरण वाला यानी कि आत्मवान हम आत्मवान हो जा तो इसने क्या कर दिया पूर्ण परमात्मा के आश्रित हो जा तो अब क्या दिक्कत आती है कि यहां पर पूर्ण परमात्मा को इंगित करने वाला कौन सा शब्द है 45 4 वे श्लोक में कौन सा शब्द है? कोई शब्द नहीं है। यह है ढोल का पोल। ठीक है? आगे चलते हैं। आगे देखिए नेक्स्ट इनका एक दावा है जो इनहीं की देखो हम लोग तीन चार तरीके से यहां पे प्रतिकार कर रहे हैं। पहला प्रतिकार तो है कि रामपाल ने संस्कृत का कुछ अलग ही हिंदी कर दिया। जैसे अव्यक्त अव्यक्त और व्यक्त तो उसने कर दिया प्रकट प्रकट और प्रकट ठीक है तो यानी संस्कृत की हिंदी नहीं आती दूसरा क्या है उसने

00:53:48:24 अपने ही सिद्धांतों को कई जगह खुद ही मना किया है तो यानी कि उसी की वाणी से जो है गलत सिद्ध होता है तीसरा क्या है तर्क से उसकी बातें तार्किक रूप से जब हम कुछ ऐसा पूछते हैं कि अगर वो गुणों से प्रभावित था तामस उसने आचरण किया तो वो तामस आचरण कैसे किया जब शिव थे ही तमोगुण था ही नहीं जब तो उसने तामस आचरण कैसे किया? कैसे प्रभावित हुआ? वो किससे प्रभावित हुआ? तो ये तीसरी बात हो गई। और चौथी बात हो गई प्रमाण से। चौथी बात क्या हो गई? प्रमाण से कि हमारे पास शास्त्रों के प्रमाण है। तो चार तरीके से प्रतिकार कर रहे हैं रामपाल का। तो अब यहां पे क्या आ रहा है? देखिए जस्ट 39 से 45 तक इसने जो अपार्थ किया उसके बाद क्या लिखा है अगली लाइन में? यह जो व्यक्ति वेदों यानी ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद की वाणी यानी मंत्रों पर वाद विवाद करते रहते हैं। ये पूर्ण परमात्मा वाला जो पैराग्राफ है ना इससे जस्ट पहले वाला जो पैराग्राफ है उसमें अंडरलाइन करिए। जो व्यक्ति इसके नीचे वाला इसके नीचे वाला जो हां नीचे वाला जो व्यक्ति ये अब इसमें देखिए क्या कहा है? जो व्यक्ति वेदों

00:55:04:00 यानी ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद वेदों का अर्थ क्या बताया इसने? और एक नहीं कई बार बताया है। चार वेद। इसने यहां पे माना चार ही वेद हैं। वेदों का अर्थ क्या बताया? ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद। तो अब इसकी ही बात से इसकी बात कट रही है। पांचवा वेद होना चाहिए था यहां पर। अगर इसका सिद्धांत है तो मगर क्या है ना यह यह क्या है? वह 250 ग्राम मिर्ची वाले हैं। यह बेईमानी करने में भी आलसी है। मन से बेईमानी नहीं करते हैं। यू ही जो मन में आए लिख दो और लोग मान लेंगे। मतलब होता है ना एक मेहनत करता है बेईमानी करने के लिए वो नहीं है। मेहनत नहीं है। कुछ भी कुछ भी कहो सब चल जाएगा। तो इसने यहां ये मान लिया कि वेद जो है चार है। इसने यहां सूक्ष्म वेद की बात नहीं कही। अच्छा वह सांसारिक वस्तुओं की कामना करते हैं। तो अब यहां सांसारिक वस्तुओं की कामना करते हैं। कौन? जो विवाद करते हैं मंत्रों पर उनको वेदों का पूर्ण ज्ञान नहीं होता है। तो मंत्रों पर विवाद ये लोग करते ही हैं। ठीक है? दूसरा उनको वेदों का पूर्ण ज्ञान नहीं होता। अब इसमें एक कैच और आता है। यह लोग बहुत चिल्लाते हैं कि

00:56:19:06 वो मर गया, यह मर गया। है ना? सांसारिक चीजों की कामना करते। मैं वहां गया तो मेरी ये ठीक हो गई। मेरा ऐसा हो गया, मेरा वैसा हो गया। हां। तो ये सांसारिक वस्तुओं की कामना करते हैं। तो रामपाल की शरण में जाने वाले कितने लोग हैं जो ये सब बताते हैं। मुझे वहां जाने से ये मिल गया, वो मिल गया, ऐसा हो गया, वैसा हो गया। सांसारिक चीजों की कामना करते हैं। तो ऐसे व्यक्तियों की साधना में लास्ट लाइन ऐसे व्यक्तियों की साधना में निश्चयात्मिका बुद्धि नहीं होती। यानी कि यह जो यह बातें हैं इनहीं के ऊपर फिट हो रही है। वेद मंत्रों पर वाद विवाद करने वाले ये ठीक है। उसके बाद ये क्या बताते हैं कि मुझे ये मिला मेरा ये मरने से बच गया। मेरा ये कैंसर ठीक हो गया। ये है वो है। ये सब तो बताते हैं। गरीबों को पिछड़े हुए को इसी तरीके से अपने उसमें लाते हैं। ज्ञान से नहीं आते। आज तक उन्हें ज्ञान नहीं होगा। और अभी मैं इनहीं के लेख के द्वारा सिद्ध करूंगा कि कितने बड़े ज्ञानी है। अब

00:57:22:07 आगे चलते हैं। 246 का अनुवाद 246 पढ़ लेते हैं। पहले हमारा क्या लिखा है? सब ओर से परिपूर्ण जलाशय के प्राप्त हो जाने पर छोटे जलाशय में मनुष्य का जितना प्रयोजन रहता है ब्रह्म को तत्व से जानने वाला ब्राह्मण का समस्त वेदों में उतना ही प्रयोजन रहता है। ब्रह्म शब्द आया है तो हम एक बार देख ले ब्राह्मणस्य

00:58:02:21 अर्थ प्रयोजन रहता है ब्रह्म को तत्व से विजानतः ठीक है यहां शब्द नहीं आया कोई बात नहीं तो ब्रह्म को तत्व से जानने वाले ब्राह्मण का समस्त वेदों में उतना ही प्रयोजन रहता है तो व्यक्ति जो निष्काम होकर के कर्म करता है ना वो वाली बात यहां कही जा रही है कि आपको मन में ये नहीं सोचना है कि मैं अगर यह युद्ध जीतूंगा अभी अगला हमारा वही है कर्म्यवादी अधिकार माले गदाच तो दो 46 में यही कहा जा रहा है कि सब ओर से परिपूर्ण जलाशय प्राप्त हो जाने पर छोटे जलाशय में मनुष्य का जितना प्रयोजन रहता है ब्रह्म को तत्व से जानने वाले ब्राह्मण का समस्त वेदों में उतना ही प्रयोजन रहता है तो वहां वो उनको उनको लेकर के जब उसको परमात्मा की हो जाती है ना चीजें परमात्मा से जब वो जुड़ जाता है तो जो छोटी चीजें होती हैं जो उसको फिर व्यर्थ दिखने लगती है तो क्योंकि वो मनुष्य देह में है तो आचरण तो करता है मगर सदा सदा परमात्मा में लीन रहता है। यानी ज्ञानार्थक रूप से परमात्मा में और गत्यार्थक रूप से यहां की चीजों में। तो अब इसने क्या किया है 246 में देखते हैं जिस प्रकार सब ओर से अब पहली बात ये समझ लीजिए कि ये अ दो

00:59:18:00 के श्लोक 46 का अनुवाद कह रहा है। अनुवाद। ठीक है? अनुवाद क्या होता है? जिसमें अपने मन की बातें हम नहीं डालते। शब्द का हिंदी अर्थ करते चलते हैं। कुछ एक दो कुछ सेंटेंस को समझने के लिए कुछ एक दो चीजें डाल दी जाए बात अलग है। मगर बहुत सारे भावनाएं भावार्थ सब नहीं डाल देते उसमें अनुवाद। तो जिस प्रकार से सब ओर से परिपूर्ण जलाशय को प्राप्त हो जाने पर छोटे से तलैया के प्रति जो आस्था रह जाती है। इसी प्रकार तत्व ज्ञान को प्राप्त तत्वदर्शी संत की आस्था अन्य ज्ञानों में रह जाती है। ठीक है कोई बात नहीं। तत्व ज्ञान के आधार पर तत्वद संत को पूर्ण परमात्मा की जानकारी हो जाती है। जिस कारण से उसकी अन्य प्रभुओं ब्रह्मा विष्णु महेश तथा छर ब्रह्म परब्रह्म व देवी देवताओं में आस्था कम रह जाती है। अर्थात वह विद्वान पूर्ण परमात्मा के आश्रित हो जाता है। तीन लोक की साधना त्याग कर सतलोक की साधना करता है। ठीक। अब इसने यहां पर भी ब्रह्मा विष्णु महेश के पूजा से खंडन कर दिया। पूर्व समय में अब इसने एक बहुत सारा वृतांत दे दिया तो हम थोड़ा

01:00:33:03 सा आगे चलते हैं। अब सीधे आ जाते हैं 247 में। अब 247 में क्या बात है? 247

01:00:43:03 बड़ा टिपिकल भगवत गीता का 247 वाला जो श्लोक है कर्मवादी कारस्ते माले सुदाच ये एक जटिल मतलब श्लोक समझने में लोगों को परेशानी होती है तो इस पे यहां पर ये ज्यादा बात नहीं करते देखिए क्या लिखा है इन्होंने 247 के अर्थ में 247 में कहा है कि कर्म फल की इच्छा मत कर बस देखिए क्या लिखा है 246 का कितना लंबा चौड़ा भाव बात की थी और 247 में क्या लिखा है अंडरलाइन करके दिखाइए यह है इनका तत्व ज्ञान। ऐसे होती है तत्व ज्ञानी की पिक्चर पढ़ो क्योंकि जटिल है ना इसका मतलब बताना। तो अभी हम बात करेंगे इस पे क्रमबद्धता से। फिलहाल हम दो 47 का अर्थ बता दें। जैसे भगवान कहते हैं कि तुम्हारी परिणाम में कोई अधिकार नहीं है। केवल कर्म करने में अधिकार है। तो यहां पर प्रश्न कई बार यह आ जाता है कि यदि व्यक्ति जीतने के लिए नहीं लड़ रहा है तो उसके लड़ने में वो जो स्तर है उसका लड़ने का वो उतना प्रभावशाली नहीं हो पाएगा। यदि उसके मन में लक्ष्य नहीं होगा कि मुझे जीतना है। है ना? तो यानी कि परिणाम को तो ध्यान में रखकर ही करना है। तो फिर यहां क्या कहा जा रहा है कि परिणाम

01:01:58:14 को ध्यान मतलब परिणाम पर तेरा अधिकार नहीं है। तो बात यह है कि ऐसा नहीं है कि आपको युद्ध जी युद्ध लड़ना है तो जीतने के लिए लड़ना है। ऐसा नहीं है कि नहीं लड़ना है। जीतने के लिए लड़ना है। पर उस जीत से आपको क्या मिलेगा? सिर्फ एक भाव। क्या कि मैं वह करूंगा जो शास्त्र कहते हैं। सिंपल यहां अगर आपके मन में यह भाव है कि मैं जो लड़ रहा हूं युद्ध वो इसलिए मैं जो जीतने के लिए युद्ध लड़ रहा हूं। जीतने के लिए लड़ रहा हूं। परिणाम पे ध्यान दे रहा हूं। मगर उस परिणाम पर मेरा ध्यान इसलिए भोग करना है। उस परिणाम पर मेरा ध्यान इसलिए है कि शास्त्र ने कहा है। ठीक है? अब जैसे जीत जाओगे तो क्या मिलेगा? जीत जाओगे तो महल मिलेगा। तो ठीक है। मैं महल के लिए जीत रहा हूं। मगर मैं महल के लिए इसलिए जीत रहा हूं क्योंकि शास्त्र ने कहा है। मुझे पर्सनल कोई इंटरेस्ट नहीं है। अच्छा महल में जाऊंगा तो ऐसे रहूंगा वैसे रहूंगा। वहां भोग होगा तो ठीक है। मैं वहां के महलों के भोग भोग रहा हूं। मगर इसलिए भोग रहा हूं क्योंकि शास्त्र ने कहा है मेरी अपनी कोई प्रीति नहीं है। अपनी कोई आसक्ति नहीं है उन

01:03:13:18 भोगों के प्रति। यह बात भगवान शंकराचार्य जी ने अपनी भगवत गीता में बताई। तो जब ऐसा जटिल समस्या वाला आया जैसे योगक्षेम का कोई अर्थ बताया ही नहीं इन्होंने। उसी तरीके से यहां पर भी धीरे से आगे सरक गए कि वह तेरा कर्म में वह है और बस आगे बढ़ दिए। तेरा कर्म में ही अधिकार है। ज्ञान निष्ठा में नहीं। वहां कर्म करते हुए तेरा फल में भी अधिकार नहीं है। अर्थात यह भगवान शंकराचार्य जी ने अर्थ किया है इसका 247 का। अर्थात तुझे किसी भी अवस्था में कर्म फल की इच्छा नहीं होनी चाहिए। यदि कर्म फल में तेरी तृष्णा होगी तो कर्म फल प्राप्ति का का कारण होगा। अतः इस प्रकार कर्म फल प्राप्ति का कारण तू मत बन। क्योंकि जब मनुष्य कर्म फल की कामना से प्रेरित होकर कर्म में प्रवृत्त होता है तब वह कर्म कर्म फल रूप पुनर्जन्म का हेतु बन जाता है। यदि कर्म फल की इच्छा ना करें तो दुख रूप कर्म करने की आवश्यकता क्या है? तो इसका जवाब आगे दिया है कि योग में स्थित होकर 48व में योग में स्थित होकर केवल ईश्वर के लिए कर्म कर। क्यों कर रहा हूं मैं? मैं क्यों जीत रहा हूं? मेरा जीतने का उद्देश्य यह नहीं है कि मुझे भोग प्राप्त

01:04:28:21 हो। मेरा जीतने का उद्देश्य इसलिए है क्योंकि मुझे वो करना है जो ईश्वर ने कहा है। तो केवल ईश्वर के लिए कर्म कर। उनमें भी ईश्वर मुझ पर प्रसन्न हो। इस आशा रूप आसक्ति को छोड़ दे। ईश्वर मुझसे प्रसन्न होंगे। यह भी ध्यान मत दे। केवल एक मुझसे कहा है मुझे करना है बस मुझे क्रेडिट नहीं लेना है कौन क्या कहता है यह सब नहीं देखना है ईश्वर प्रसन्न होंगे मुझसे इसके प्रति आसक्ति भी नहीं रखनी है केवल मुझे वो करना है जो ईश्वर ने कहा है ठीक है इस भावना के साथ अपना कर्म करिए तो यह समय पर आ जाती है कांकर भाष्य से चीजें समझ में तो

01:05:15:16 48 पर आ जाते हैं हम। 47वा हो गया। अब इसने 48 से 50 तक एक साथ लिया। तो हम 48 से 50 पहले इसका पढ़ लेते हैं। इसका पढ़ते हैं। पहले 48 से 50 क्या लिख रहा है ये? 48 से 50 तक का भाव है कि शास्त्र विधि अनुसार। अच्छा इसने यहां पर एक बात और है 247 में जब इसने कहा कि कर्म फल की इच्छा मत कर तो जब इसने वहां पीछे कहा था कि लाभ हानि लाभ हानि वाले लाभ हानि में समत्व बुद्धि रखने का खंडन किया था तो इसका मतलब ये दो 47 वाला जो श्लोक है इसका भी खंडन हो गया क्यों खंडन हो गया क्योंकि यहां भी यही कहा जा रहा है लाभ हानि पर ध्यान मत रख हमने बताया था पीछे पीछे के दो श्लोक ऐसे थे इसमें लाभ हानि और समत्व बुद्धि रखने को कहा जा रहा है तो उसने मना कर दिया था कि नहीं अर्जुन कौन से खेत की मूली है जो दुखी नहीं होगा है ना और लाभ हानि के बिना युद्ध कैसे हो सकता है दो श्लोकों में इसने मना किया था तो इसका अर्थ है कि यहां कर्म फल की इच्छा मत कर यहां पर भी खंडन हो रहा है ठीक है क्योंकि पीछे इसने माना

01:06:30:21 है लाभ हानि में समुद्धि नहीं रखनी है और राग द्वेष में समुद्धि नहीं रखनी है तो 247 का भी खंडन हो गया। लगभग मेरे ख्याल से अभी तक पांच श्लोक हो गए हैं। यह श्लोक भी ध्यान रखिएगा कि इसने हम लोग कितने श्लोक निकालेंगे जो इसने नहीं माने। एज इट इज नहीं माने या तो गलत कह दिया सीधे-सीधे अर्थ बदलने की तो बात दूर है। इसने गलत कह दिया। मैं पेज नंबर बता दूं क्या आपको? दिखाना है आपको तो। वैसे वह हो चुका है। पेज नंबर 23 देखिए।

01:07:09:01 लास्ट लाइन देखिए 23 में बिना लाभ हानि के युद्ध हो सकता है। हां। ठीक है? तो यहां पर इसने 31 से 37 के बीच में कोई श्लोक है जिसमें लाभहानि को समान समझकर युद्ध करने की बात कही है भगवान ने तो उसका खंडन कर रहा

⬜ Not used yet · 01:07:32:04 – 01:30:20:26 (22:49)

01:07:32:04 है। ये बिना लाभहानि के युद्ध हो सकता है और इससे और पीछे एक और है। यह देखिए इसने क्या कहा है 24वें पेज पर काल ब्रह्म ने अपना स्वार्थ सिद्ध करने यानी महाभारत का युद्ध करवाने के लिए पूरा जोर लगाया। यह वाली बात है जो लाभहानि वाली

01:08:27:01 ठीक है। आगे चलते हैं। हम तो अब थोड़ा सा आगे बढ़ते हैं। तो 48 में क्या कहा जा रहा है कि 48 से 50 तक इसने कहा है कि भाव है कि शास्त्र विधि अनुसार भक्ति कर्म एक प्रभु का ही करना श्रेयकर है। अब यह कहा जा रहा है शास्त्र विधि के अनुसार भक्ति कर्म एक प्रभु का ही करना श्रेयकर है। आपको सिद्धि प्राप्त हो या ना हो इस बात को भूल जाओ। प्रभु जो करता है वह अच्छा ही होता है। यह ध्यान में रखकर साधना करता रहे। अब यहां साधना की बात नहीं हो रही है। यहां बात हो रही है कि तुमको कर्म जो शास्त्रों में वर्णित कर्म है उनको किस भाव के साथ करना चाहिए। यानी कि अगर तुम युद्ध किसी की रक्षा करने जा रहे हो तो वो कैसे करना चाहिए? अगर तुम्हें क्या कहते हैं कोई यज्ञ करना है तो वो किस भाव के साथ करना चाहिए? क्योंकि ईश्वर ने कहा है। ईश्वर प्रसन्न होगा इस भाव को भी नहीं। ईश्वर ने कहा बस मुझे करना है। तो इस बात को ध्यान में ना रखकर करना चाहिए। तो आपको सिद्धि प्राप्त हो या ना हो इस बात को भूल जाओ। प्रभु जो करता है अच्छा ही होता है। ये ध्यान

01:09:42:02 में रखकर साधना करता है। तो इसने यहां पे शास्त्र विधि के अनुसार भक्ति साधना यह सब बताया है। पहले वाले सर्व शास्त्र विरुद्ध भक्ति कर्म त्याग दे। चाहे वे तुझे अच्छे लगते हैं तथा अन्य दूषित कर्म जैसे मांस निद्रा यह सब इसने बातें की है। त्याग कर तत्वदर्शी संत द्वारा बताए गए भक्ति मार्ग है ना यह सब कुछ त्याग दो। अच्छा और क्या त्यागना है जैसे किसी को बुलाकर पाठ इत्यादि करवाना भिखारी को पैसे देना वह भिखारी उन पैसों से शराब का सेवन भी कर सकता है। तो अब यहां देखिए कि 48 से 50 में क्या यह सब बातें हो रही है? भक्ति की बात हो रही है या यह बताया जा रहा है कि आपको कर्म कर एक बात आई है ना कि कोई व्यक्ति एक क्षण के लिए भी बिना कर्म किए हुए नहीं रह सकता। तो इसलिए तुझे शास्त्र भेद कर्म करना है। तो यानी तुम्हें शास्त्र भेद कर्म तो करते रहना है। तो यहां उन कर्मों की बात जब हो रही है कि तुम्हें कर्म जो करने हैं अपने जीना उठना रहना खाना पीना शास्त्र के अनुसार वो किस भाव को मन में रखकर करने यहां भक्ति की बात नहीं हो रही है। मगर इसने क्या किया? साधना भक्ति और तत्वदर्शी द्वारा बताया गया भक्ति मार्ग

01:10:57:10 शास्त्र विरुद्ध सब डाल दिया। जबकि अब हम अपना पढ़ लेते हैं क्या लिखा है? तू आसक्ति को त्याग कर तथा सिद्धि और असिद्धि में समान बुद्धि वाला होकर। अब देखिए इस इसका भी खंडन हो रहा है कि सिद्धि और असिद्धि में समान बुद्धि वाला हो। एक ही बात हो गई। सिद्धि और असिद्धि में समान बुद्धि वाला हो। योग में स्थित हुआ कर्तव्यों को कर्तव्य कर्मों को समत्व कर। तो यह छठवां श्लोक हो गया जिसका इसने खंडन कर दिया यह कहकर कि लाभ हानि में समत्व बुद्धि नहीं रखनी है क्योंकि यहां पर भी सिद्धि असिद्धि में समान बुद्धि वाला होने की बात कही जा रही है 48व में 49 में क्या जा रहा है कहा जा रहा है इस समत्व रूप बुद्धि योग से सकाम कर्म अत्यंत ही निम्न श्रेणी का है अब जब हम लोग शास्त्र में वर्णित कर्म ऐसे करते हैं मैं तो सिर्फ ईश्वर के लिए कर रहा हूं ईश्वर ने कहा है इसलिए कर रहा हूं तो वो तो ठीक है मगर यदि हम सकाम किसी फल की प्राप्ति के लिए करते हैं तो उसको निम्न श्रेणी का कहा जाएगा। इसलिए हे धनंजय तू समबुद्धि की में ही रक्षा का उपाय ढूंढ अर्थात बुद्धि योग का ही आश्रय ग्रहण कर क्योंकि फल के हेतु बनने वाला अत्यंत दीन है। तो इस श्लोक का भी खंडन हो गया है।

01:12:12:24 लाभ हानि में समत बुद्धि नहीं। राग द्वेष में समत्व बुद्धि नहीं होनी चाहिए। रामपाल कह चुके तो ये कौन सा? सातवा ये सातवां हो गया। सातवा श्लोक है जिसका खंडन इसने किया परंतु यहां नहीं कर रहा है हम अच्छा यहां पे इसने बदल दिया सिद्धि असिद्धि में समान बुद्धि वाला नहीं कहा है इसने इसने कहा है आपको सिद्धि प्राप्त हो या ना हो इस बात को भूल जा अब बात ये है कि अगर यह नहीं कहा है समान बुद्धि वाला हो तो यहां पे समत्वम 48 नंबर के श्लोक में समत्व समत्वम नामक एक समत्वम शब्द आया है तो समत्वम जो शब्द उसका उसकी हिंदी कहां गई? खा गए क्या? तुम्हें समत्व का खंडन करना है वो ठीक है। मगर यहां पर समत्व शब्द आया है तो तुम्हें इसका खंडन करना पड़ेगा। यदि तुम यहां पर इसका अर्थ ना लिखकर कुछ अपना मनमाना अर्थ लिख रहे हो कि सिद्धि प्राप्त हो या ना हो इस बात को भूल जा प्रभु जो करता है अच्छा होता है। ठीक है? ये बात भी ठीक है। मगर यहां समत्व की बात की जा रही है। तो आपको समत्व की बात करनी पड़ेगी जो कि आपने नहीं की। इसी प्रकार से समत्व की बात आगे भी की है। क्या की है कि सम बुद्धि योग से सकाम कर्म

01:13:27:27 49 में तो इसका भी आपने यहां पे भी समत्व शब्द आया है। हम सकाम कर्म बुद्धि योग बुद्धि योग को समत्व कहा गया। चलिए ठीक है। इसमें मान लेंगे समत्व की बात नहीं की है। शब्द नहीं आया क्योंकि ठीक है। जब मगर बुद्धि युक्त तो वो समबुद्धि युक्ति ही कहा जा रहा है। मगर ठीक है। और 50 में क्या जा कहा जा रहा है? इस प्रकार की बुद्धि से युक्त पुरुष यानी किस प्रकार की बुद्धि सम सम सम सम सम सम सम सम सम सम सम सम सम सम सम सम सम सम सम सम सम सम सम सम सम सम सम समत्व रूप बुद्धि उसी की बात हो रही है तो ये आठवां और ये यानी कि 49वा और 50वा श्लोक भी क्योंकि वहां समत्व बुद्धि रखने की बात कर रहे हैं भगवान तो रामपाल ने लाभ हानि में समदृष्टि ना रखने के लिए राग द्वेष में समदृष्टि ना रखने के लिए कहा है तो यहां पर भी इन दोनों श्लोकों का भी उसने खंडन किया है पहले भी बाकी इसने इनमें जो बुद्धि की बात हो रही है यहां पे कोई बात नहीं की है और अपने मन से कुछ भी अर्थ कर दिया है तत्वदर्शी संत द्वारा बताए गए भक्ति मार्ग तो इन इन अर्थों को प्रकट करने वाले शब्द भी संस्कृत में होने चाहिए जो कि नहीं

01:14:43:19 है। अब एक चीज और है अह यह जो पैराग्राफ है दो 48 से 50 तक इसका रामपाल का इसमें इसने क्या कहा है कि गुरुदेव के आदेश का पालन करना ही सत्य भक्ति में हितकर है। अब रामपाल कभी गुरु शब्द गुरु किसे कहते हैं? ये नहीं बताता है। गुरु वो है जो अंधकार को मिटाए। ठीक है? अंधकार क्या है? कि मैं कौन हूं? मुझे कहां जाना है? मुझे क्या करना है? यह सब अंधकार है। असतो मादम तमसो मागमया मृत्युमा मृतमय ये सब अंधकार है। तो गुरु वो है जो तत्व से आपको आपके बारे में बताए और आपका जो प्रतिपाद्य विषय है उसके बारे में बताए। तो वो तो इसने बताया नहीं है कभी। तो उल्टा पेड़ करता रहता है। उल्टी व्याख्या यह सब करता रहता। तो यह गुरु कहां से हो गया? खैर आगे बढ़ते हैं। अब देखिए यहां पे एक बहुत जरूरी पॉइंट आने वाला है। 251 में यह क्या कह रहा है? ध्यान से देखिए। यह कह रहा है कि जो भजन अभ्यास शास्त्रानुकूल अर्थात मतानुसार मेरे बताए अनुसार करता है। मत परायण होकर करता है। वह सतलोक

01:15:58:26 में जाकर फिर वहां से आगे अनामी लोक को चला जाता है। अब देखिए प्रॉब्लम क्या है? यहां पर भगवान कह रहे हैं जो मेरे बताए हुए अनुसार चलता है वह अमुक अमुक जगह पहुंच जाता है। यह तो भगवान श्री कृष्ण कह रहे हैं। ठीक है? वो भी हम अपना अपना अर्थ भी पढ़ लेंगे। मगर पॉइंट यह इसने भी माना है कि जो गीता कहने वाले के अनुसार चलता है वह अमुक अमुक जगह पहुंच जाता है। तो गीता कहने वाले के अनुसार चलता है तो गीता कहने वाला तो कई जगह चाल चल रहा है। कई जगह झूठ बोल रहा है। सात आठ श्लोकों का तो नौ श्लोकों का तो आप अभी तक खंडन कर चुके हो गीता कहने वाले के और कह रहे हो 5% ज्ञान उसका गलत है। 5% नहीं गीता जब तक पूरी होगी तुम्हारी तुम्हारा 90 पर तुम्हारे अनुसार 80 या 90% जो है गीता में लिखी हुई बातें गलत होगी। 5% नहीं। खैर तो एक तो बात रही यह कि गीता कहने वाले के अनुसार जो चलता है जो उनको फॉलो करेगा वो कहां पहुंच जाएगा? सतलोक में अमुक अमुक स्थान पर पहुंच जाएगा। ठीक है?

01:17:07:12 फिर हमारे में दो 51 में क्या कहा गया है? क्योंकि समबुद्धि से युक्त वो वही पीछे से बुद्धि जो चली आ रही समुद्धि समुद्धि से युक्त ज्ञानी जन कर्मों से उत्पन्न होने वाले फलों को त्याग कर जन्म रूप बंधन से मुक्त होकर निर्विकार परम पद को प्राप्त हो जाते हैं। ये जो अनामयम शब्द आया है ये इसका अर्थ है निर्विकार। विकार रहित परम तत्व को प्राप्त हो जाते हैं। विकार रहित क्या है? जैसे हमने पूछा ना कि कबीर जब कहीं एक जगह बैठा है और सूर्य की तरह उसकी रोशनी जिस तरह फैलती है उसी तरह उसकी शक्ति फैली हुई है तो सूर्य की रोशनी जितना सूर्य से दूर होती है उतनी उसकी दाहक क्षमता कम होती है हम तो क्या कबीर की दा कबीर का जो नियंत्रण है संसार में वो भी कम होता जाता है जितना दूर है कबीर से कोई तो अगर नियंत्रण कम हो रहा है क्योंकि शक्ति है वो स्वयं तो है नहीं तो कम होगा तो जब नियंत्र नियंत्रण कम हो रहा है तो विकार आ गया। कम हो गया। यहां इसको कहते हैं विकार। विकार आ गया। तो कबीर जो है निर्विकार नहीं है। परंतु वहां रामपाल को भजने वाले लोग निर्विकार परम परम पद को प्राप्त

01:18:22:16 अवश्य हो जाएंगे। ये दावा है जेल में बैठे हुए व्यक्ति का। वो बात अलग है कि उसकी तबीयत खराब होती है। उसके जीवन में स्वयं विकार आते हैं। चश्मा लगाता है। उसका ऐसेसे हंठ फड़कता है। यहां ऐसेसे बात करता है रामपाल। वह सब विकार है सब और क्या है? मगर वो स्वयं परमात्मा का वो है अवतार है भाई। अच्छा तो यहां पर कहा जा रहा है 51 में कि जो लोग इस प्रकार समबुद्धि से युक्त ज्ञानी जन कर्मों से उत्पन्न होने वाले फल को त्याग कर जन्म रूप बंधन से मुक्त हो निर्विकार परम तत्व को प्राप्त हो जाते हैं। और इसने क्या लिखा है? दो 51 में स्पष्ट है कि जो भजन अभ्यास शास्त्र अनुकूल ये मतलब कोई अनुवाद है क्या ये ये कौन से एंगल से अनुवाद है दो के श्लोक 51 में स्पष्ट है कि जो भजन अभ्यास शास्त्रानुकूल अर्थात मतानुसार मत परायण होकर मेरे अनुसार करता है वह सतलोक में जाकर फिर वहां से आगे अनामी लोक को चला जाता है। अब देखिए सतलोक जाकर वहां से आगे अनामी लोक को चला जाता है। यानी

01:19:37:22 कि सतलोक इस नॉट द एंड सतलोक भी शाश्वत नहीं रहा फिर क्योंकि उससे आगे भी कोई लोक है अनामी लोक और क्या है? अर्थात अनामी परमात्मा को प्राप्त हो जाता है। अर्थात जन्म मरण का रोग समाप्त हो जाता है। तो कहां जाके जन्म मरण का रोग समाप्त होता है? सतलोक जाके नहीं अनामी लोग जाकर के और सतलोक में यदि कबीर है तो फिर अनामी लोक में कौन है तो अभी बात करेंगे वो भी बहुत मजेदार चीज है। तो यह अनामी लोक की बात हो गई। अब आगे चलते हैं। इसने बहुत सारी बातें कही हैं। हम लोग जहां से आ जाते हैं। जो अंतिम गति बताई है ना पूर्ण परमात्मा का ज्ञान होने पर अगले पेज पर 26वें पेज पर लास्ट पैराग्राफ पढ़ रहा हूं। पांचवी गति यानी कि मुक्ति का स्थान। सतलोक में मुक्ति नहीं है। पहले ध्यान रख लीजिए। सतलोक से आगे जाना है आपको। इसमें क्या लिखा है? पूर्ण परमात्मा का ज्ञान होने पर उसी परमात्मा प्राप्ति की साधना करते हैं। इसी प्रकार यह आत्मा तत्वदर्शी संत से उपदेश मंत्र प्राप्त करके सत्य भक्ति की कमाई करके उसके आधार से सतलोक चली जाती है।

01:20:52:28 क्या करती है? यह आत्मा तत्वदर्शी संत से उपदेश मंत्र प्राप्त करके सत्य भक्ति की कमाई करके उसके आधार पर सतलोक चली जाती है। तो सत्य भक्ति करके कहां पहुंचे हैं? सतलोक। उसके बाद यह वह स्थान है जहां प्राणी मानव रूप में आकार मानव रूप के आकार में रहता है। अब दिक्कत क्या है यहां पर? कि प्राणी मानव रूप के आकार में रहता है। तो क्या प्राणी का और कोई आकार भी है? मानव रूप के आकार में रहता है। यानी कि उसका कोई और आकार भी है। यहां इसने ये

01:21:39:04 माना। आगे और भी कुछ कह रहा है। यहां पर गए प्राणी आत्मा कभी नहीं मरते। इसका तो मतलब ही क्या है? जब आत्मा को अविनाशी कहा है। तुम समझ से बाहर है। खैर सतलोक वह स्थान है जिसमें हंस आत्मा आकार में मौज करती है। सतलोक से आगे अलख लोक है। अलक लोक में अलक पुरुष का राज्य है। ये बहुत ध्यान से सुनिए। बहुत जरूरी बात है यहां पर। देखिए जो ये लोग कहते हैं ना ब्रह्मा विष्णु महेश वो तो यहां पर उनकी भक्ति करने मना किया जा रहा है। वही पॉइंट आ रहा है क्या है कि अलक्ष लोक से आगे आगम लोक है। आगम लोक में अगम पुरुष का राज्य है। अगम लोक के आगे अकह लोक है। अर्थात अनामी लोक है। इसमें अनामी परमात्मा पुरुष का राज्य है। ऊपर के तीनों लोकों में एक ही परमात्मा पूर्ण ब्रह्म कबीर देव है। वह तीन अलग-अलग स्थितियों में रहता है। एक ही परमात्मा तीनों लोकों में अलग-अलग स्थितियों में रहता है। मगर एक ही एक ही परम तत्व स्वयं को पांच अलग-अलग रूपों में प्रकट नहीं कर सकता। आई बात समझ में? और सुनिए। जैसे भारत के प्रधानमंत्री जी के शरीर का नाम कुछ और होता है। परंतु प्रधानमंत्री उनका पद का उप्मक नाम होता है। उपाधि। कई बार प्रधानमंत्री जी अपने पास अन्य विभाग रख

01:22:54:09 लेते हैं। यह लेता है बोल रहे हैं। प्रधानमंत्री जी भी कहा और लेता है भी कहा। तो इससे भी इसका गवारपन देख लो। जैसे गृह विभाग अपने पास रख लिया। जब गृह मंत्रालय के दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करता है तो वह अपने आप को गृह मंत्री लिखता है। उस समय उनकी शक्ति प्रधानमंत्री वाले हस्ताक्षरों से कम होती है। हो गया। एक ही परमेश्वर परम तत्व होते हुए भी जब किसी और किसी विभाग को अपनाता है वहां का रोल निभा रहा होता है तो उसमें कई बार वो ऐसा रोल भी निभाता है जिसमें कि उसके परम तत्व वाले रूप से उसकी शक्ति यहां पर कम दिख रही है। यहां इसने माना परमेश्वर जो है अलग-अलग लोकों में अलग-अलग स्तर की शक्तियों से युक्त होता है। इनका भी क्यों भाई या तो मान लो कि कम वाला परमेश्वर नहीं है खंडन कर दो कबीर का बड़े वाले से वो अकाल पुरुष से सतलोक के कबीर का खंडन हो जाता है क्योंकि मुक्ति धाम तो वही है अकाल लोक जब अकाल लोक मुक्ति है तो जो सतलोक का कबीर है उसकी भक्ति करना बेकार है ना और तुम खुद मान भी रहे हो

01:24:09:22 कि प्रधान कई ये जब गृह मंत्रालय के दस्तावेजों पर प्रधानमंत्री हस्ताक्षर करता है तो अपने को गृह मंत्री लिखता है। उस समय उनकी शक्ति प्रधानमंत्री वाले हस्ताक्षरों से कम होती है। हो गया। तो इसी प्रकार से ब्रह्मा विष्णु महेश भगवती और गणेश के रूप में जब वह प्रकट होते हैं तो कई बार ऐसे रोल निभाते हैं जो कि उनका जो पूर्ण रूप है जो परम तत्व वाला रूप है उसकी अपेक्षाकृत वो दासत्व भाव में होता है तो वहां पर उनका जो पावर्स है उनकी वो सब कम बताई जाती है। जैसे यहां तुम अपने ईश्वर के बारे में बता रहे हो। खैर यही बात हम समझाते हैं तो समझ में नहीं आती है। अब यहां अपने लिए मान लिया। मगर अब तुम उस आधार पर शिव जी की तो यहां पूजा करने मना किया तो हम कहेंगे कि सतलोक सतलोक में जो कबीर है वह तो मोक्ष दे नहीं रहा वहां से आगे वाला देगा जिसको कहा गया है अलख पुरुष जब अलग पुरुष से भक्ति मिलनी है तो कबीर की भक्ति क्यों करें हम तो ये कहेंगे तुम्हारी चाल चाल चलेंगे खैर आगे चलते हैं ठीक इसी प्रकार पूर्ण ब्रह्म सत्पुरुष का वास्तविक नाम कबीर देव कबीर देव है भाषा भिन्न होने से वो यह वो सब इसने बता दिए जो आत्मा सतलोक में जाकर अनामी

01:25:25:06 पुरुष की साधना करती है। देखिए वहां वहां जाकर के भी भक्ति होनी है। सतलोक में पूर्ण मुक्ति नहीं है। वह आत्मा भक्ति के कारण उस परमात्मा की परम गति को प्राप्त होकर भगवान में लीन हो जाती लीन हो जाती है। और अनामय अर्थात पूर्ण रूप से जन्म मरण रूपी दीर्घ रोग से रहित कर होकर अनामी पद यानी मुक्ति स्थान को प्राप्त हो जाती है। इसको अनाम है पद प्राप्ति कहते हैं। तो क्या हुआ? सतलोक में जाने के बाद जीवन मरण से मुक्ति नहीं होगी। सतलोक में अगर कबीर है तो फिर परमात्मा कोई और है। ऐसे ही पकड़ेंगे। खैर आगे चलते हैं। अभी जो लीन होने वाली बात आई है परमात्मा में वह लीन हो जाती है। सबसे पहली बात है कि यह जो आत्मा है क्योंकि वो एक अलग से एक तत्व है। यह तत्व आया कहां से? अब जब वो अलग तत्व है क्योंकि उसमें परमात्मा के गुण तो है नहीं। तो जब गुण नहीं है परमात्मा के तो उसको अलग तत्व मानना पड़ेगा। जब अलग तत्व मानेंगे तो फिर वह परमात्मा में जब जाएगा तो परमात्मा की क्वांटिटी जो होगी बढ़ जाएगी। ना जाने कितनी आत्मा उसमें जा रही है। और जब वह आत्माएं उससे निकल

01:26:40:07 रही है जब वह उत्पन्न हो रही है परमात्मा से तो क्वांटिटी कम हो जाएगी। तो परमात्मा पूर्ण नहीं है। सर्वशक्तिमान नहीं है। घट बढ़ रहा है, निर्विकार नहीं है। यदि आप आत्मा को अभेद दृष्टि से नहीं देखते। आत्मा में भी परमात्मा वाले गुण नहीं देखते। जैसे आत्मा सर्वव्यापी नहीं है। हम बहुत से नित्य नहीं है आत्मा। तो जब गुणों में वह अलग है तो तत स्वरूप नहीं है आत्मा तो क्या है जब वह अलग है तो फिर ये वाली चीजें लग जाएंगी आत्मा लीन हो रही है तो क्वांटिटी बढ़ेगी आत्मा उत्पन्न हो रही है तो क्वांटिटी घटेगी ये भी एक मेजर पॉइंट

01:27:21:12 है इन्होंने एक पांचवी मुक्ति और बताई है वही अद्वैत वाली मुक्ति है शायद संभवत अब इन्होंने आगे अगले पेज पर आ जाइए। अगले पेज पर इन्होंने कहा है भक्त भक्त मती अपनी आस्था पूर्ण मोक्ष प्राप्ति के लिए दृढ़ कर। हम हां यह याद रखने वाली बात है। इस पैराग्राफ में इन्होंने यह भी कह दिया है कि वर्तमान में मेरे रामपाल दास के अतिरिक्त अरब मनुष्यों में कोई भी वह संत नहीं है। कौन सा संत नहीं है जो तत्वदर्शी हो। इस दुनिया में एक ही तत्वदर्शी है और वो है रामपाल। इस इसका आलंबन हमें आगे लेना है तो वो हमें देखना है। अब क्या है? अब आ जाते हैं दो श्लोक 56 से 53 का अनुवाद। अगला प्रश्न पर आ जाइए। अगले प्रश्न पर यह है

01:28:36:06 30वां। अनुवाद पढ़ लें 56 से 53 का। फिर उसके बाद हम लोग लिंक दे देते हैं। किसी को अगर आना होगा थोड़ा सा आ जाएगा हम तो अनुवाद क्या है दो श्लोक 56 से 53 का पहले सारा कर आए हैं मगर इनका मन नहीं भरा होगा कुछ रह गया होगा जो तो फिर दोबारा लिख रहे हैं सब ओर से परिपूर्ण जलाशय वाली बात हो चुकी है 247 13 कर्म करना अधिकार है फल की इच्छा मत कर इसलिए कर्तव्य कर्म बिना आसक्ति के कर इसका खंडन कर दिया है। हे धनंजय तू आसक्ति को त्याग कर सिद्ध यानी सिद्धि यानी जय तथा सिद्धि यानी पराजय में समुद्धि होकर योग यानी सत्य साधना में लगा हुआ भक्ति कर्म कर यहां पर इन्होंने भक्ति को बिना अर्थ के डाल दिया उसका कोई शब्द नहीं है वहां पर हम अच्छा एक बात और है एक पॉइंट की बात है यदि भगवान ये कह रहे हैं कि तू अपने जीवन के जो कर्म करता है उनको शास्त्रों के अनुसार इस बुद्धि से कर कि तू फल की प्राप्ति के लिए नहीं बल्कि इसलिए कर रहा है क्योंकि ईश्वर ने कहा है इस बुद्धि के साथ कर तो अगर यहां पर भक्ति की बात हो रही है तो कर्मों की बात कहां पर हो रही है यह भी तो बताना पड़ेगा।

01:29:51:15 अगर यहां पर इन्होंने इसको भक्ति का दे दिया है कि तू भक्ति कर्म कर तो कर्म के बारे में कहां बताया है कि हमको कर्म किस किस तरह से करने चाहिए वो कहां बताया है? समत्व का भावार्थ है परमात्मा की इच्छा पर आश्रित रहकर फल की इच्छा ना करें। यह समत्व का भावार्थ है दो 48 गीता अध्याय दो 49 तत्व ज्ञान से प्राप्त बुद्धि से समझ ले कि इच्छा रखकर किए गए भक्ति कर्म अत्यंत निम श्रेणी के हैं। वही रिपीट कर रहा है। तत्वदर्शी की शरण

01:30:20:26 में जाने का मार्ग खोज क्योंकि फल की इच्छा रखने वाला तो कृपण यानी कंजूस होता है। जो धन का यथार्थ

⬜ Not used yet · 01:30:26:12 – 01:45:02:00 (14:36)

01:30:26:12 प्रयोग यहां पे देखिए फिर से तत्वदर्शी की शरण में कौन जाता है? जो धन इत्यादि की मतलब इच्छा नहीं करता है। तो जो लोग यह सोचकर हमारे वहां जाने से यह काम बन गए, वह काम बन गए। हम इसलिए जा रहे हैं जो ऐसा पाखंड फैला रखा है तो उनके गाल पर ये तमाचा है रामपाल के ही उसके द्वारा अर्थ के द्वारा दो 31 से 37 की चीजों को यहां काट दिया है। क्यों? क्योंकि यहां पर समत्व बुद्धि होने की बात कर रहे हैं। यहां अनुवाद में समत्व बुद्धि होने की बात हो रही है। वहां लाभ हानि को मना कर दिया। यहां कर्मवादी कारस्ते मा फलेशु कदाचना कहा जा रहा है। वहां कहा जा रहा है कि कोई ऐसा कैसे कर सकता है? उसका कोई मरेगा तो वो तो दुख तो होगा। वो लाभानि में सब बुद्धि कैसे रख सकता है? तो काट कर दी। दो श्लोक 50 में तत्व ज्ञान प्राप्त साधक पाप तथा पुण्य की कामना ना करके केवल मोक्ष उद्देश्य से भक्ति करता है। हम किसके उद्देश्य से भक्ति होती है? मोक्ष से। मोक्ष तो इनको मिलता नहीं है। खैर पूर्ण रूप से मुक्त होकर 51 में कहा जा रहा है

01:31:41:19 अनामयंम जन्म जन्म मरण के रोग से रहित अनामी परम पद को प्राप्त हो जाते हैं। यानी उस सनातन परमधाम में चले जाते हैं। जहां पर परम शांति है। यानी कि सतलोक में परम शांति नहीं है। उस स्थान पर आए गए उस उस स्थान पर गए साधक फिर लौट कर संसार में नहीं आते। कहां कहां जाकर? अनामय लोक में। तो सतलोक में शांति नहीं है। अब यह दो श्लोक 52 से हम लोग अगले वाले चैप्टर में देखेंगे। है ना? आप लिंक दे दीजिए। कोई आया आना चाहे तो आ सकता है।

01:32:20:26 जय श्री राम श्याम। श्याम जी जय श्री राम। राधे राधे जी। अभी बीच में आपने बंद कर दिया था वीडियो बनाना। नहीं दूसरी चीजों में व्यक्त हो गए थे। मैं काफी दिन से देख रहा था। आप आ रहे नहीं क्या बात हुई पता नहीं क्या नहीं ऐसा कुछ नहीं है। ऐसा कुछ नहीं है। किसी को कोई आपत्ति है तो आ सकता है भाई चेहरा लेकर। किसी प्रकार की कोई आपत्ति है और आज के जो बुलेट पॉइंट्स है यह हम अगले

01:32:59:09 वाले अगला जो सेशन होगा दो श्लोक अध्याय दो श्लोक 52 से दो 72 तक उस सेशन में इसके आज के जो बुलेट पॉइंट्स है वो हम बता देंगे जरूरी जरूरी हमने क्या-क्या सीखा ऐसे ही 20 25 पॉइंट्स श्लोक लेकर के चलना पड़ेगा क्योंकि इसने बहुत कचरा कर रखा है। रायता फैला रखा है अपने अर्थ में रामपाल ने। आपने आपने नंबर से संपर्क किया है शायद फोन द्वारा। हां श्याम स्टूडियो

01:33:40:00 जी जी तो मैंने आपको मैसेज भी किया था मैंने बात भी थी। जी जी काफी समय से आप लाइव नहीं कर रहे थे तो आप आ रहे थे के बारे में क्योंकि मुझे इसमें ज्यादा इंटरेस्ट रहता है कि आप इसके इनके बारे में बात करते सबका अपना बताया था ससुर साहब जुड़े हैं हां आपने बताया था बताया था

01:34:15:13 तो कोई आना आना चाहे तो आ सकता है भाई। [संगीत] लाइव स्ट्रीम का दिया हुआ है। [संगीत] अगर किसी के अंदर सामर्थ्य हो कोई प्रतिकार करना चाहता हो वैचारिक मतभेद के निमित्त ठीक है। तो आशा करते हैं आपको यह सीरीज पसंद आ रही हो। हमने एक-एक करके कई बातें की हैं और दो श्लोक 52 से 72 के बीच का

01:34:59:13 टीवी चैनल बुक करवा लीजिए। उस पर चर्चा करेंगे। करवाइए आप आपत्ति आपको है ना? करवा लीजिए बुक। वहां आ जाएंगे। और किसी ठीकठाक व्यक्ति को जो जिसको निरुत्तर कर देने पर जिसको निरुत्तर कर देने पर प्रभाव पड़े ये नहीं कोई अमित दास जैसा कोई व्यक्ति है उसको रोज आए दिन हम लोग निरुत्तर करते हैं उससे फर्क कुछ पड़ता नहीं किसी बड़े व्यक्ति को लाइए तब हम उसके लिए बाहर निकले टीवी चैनल तक जाए वहां पर बात करेंगे ठीक है कोई खड़ा तो करिए आपकी तरफ से कोई खड़ा हो रहा है क्या आज तक नहीं हुआ यही चिलांटू जैसे लोग चूर्ण चटनी वाले वो आया करते हैं। अब आप पता नहीं हो कि नहीं चूरन चटनी वाले मगर जो आए हैं अभी तक वो ऐसे ही होते हैं। अब्बा डब्बा

01:36:04:08 चब्बा ये आप पर भी लागू होता है। भाई आप यह चर्चा को बुक करने के बारे में आप आ जाइए। इसी बारे में बात कर लीजिए। तू बड़ा आदमी है क्या? तो हम थोड़ी ना आए हैं आपके पास। आप ही तो आ रहे हैं यहां कमेंट करने। मैंने कहा ना अगर आपको आपत्ति है तो आप यहां आ जाइए और टीवी चैनल पर लाना है, कहीं बुलाना है तो किसी ऐसे व्यक्ति को खड़ा करिए दूसरी ओर से जिसको चुप कराने से हमारा कुछ फल प्राप्त हो। हमें। हम मालूम पड़ा आप जैसे चूर्ण चटनी टाइप के लोगों को मुंह बंद करा भी दिया प्रभाव उससे कुछ हुआ नहीं भटके हुए लोगों में

01:36:53:07 हम चलिए तो आज की चर्चा आज की इस लाइव स्ट्रीम को हम यहीं विराम देते हैं और हमने आज अ बुलेट पॉइंट्स तो हम अगली बार दे देंगे मगर हमने कुछ जरूरी जरूरी चीजें हमने जानी है कि आठ नौ श्लोक ऐसे हैं जो इसके इसने खंडित किए हैं क्योंकि इसने समत्व बुद्धि का समत्व बुद्धि के लिए इसने मना किया है कि समबुद्धि नहीं रखनी चाहिए। लाभ हानि में समानता नहीं देखनी चाहिए। बाद में गीता में कई जगह पे समत्व बुद्धि की बातें हो रही है। वो अर्थ इसने भी किया है कई जगह। और इसके साथ ही साथ एक चीज हमने जानी कि वर्ण को जन्म से माना। इसने एक चीज हमने जानी कि ब्रह्मा विष्णु महेश की जो भक्ति करने की लोग बात कहते हैं तो दूसरे अध्याय में ब्रह्मा विष्णु महेश की भक्ति ना करने के लिए स्पष्ट रहित हो जाने के लिए लिखा हुआ है। है ना? यह भी जाना कि भगवान श्री कृष्ण ने गीता का ज्ञान कहा है रामपाल के अनुसार हम और क्या जाना है कि सतलोक से आगे भी एक लोक है। यानी कि सतलोक में पूर्ण मुक्ति नहीं है। यानी कि सतलोक में पूर्ण ईश्वर नहीं है। और जो आत्मा है वह उसमें

01:38:08:16 भगवान के गुण नहीं है। अगर गुण नहीं है तो वह एक अलग तत्व है। जब वो अलग तत्व है तो वो जब अंदर जाएगी नहीं तो आपको आपत्ति है ना यहां आप आके बात कर रहे हो ना आप आपको ऐसा लग रहा है कि मुझे निरत्तर करना आवश्यक है तो करिए। आपको नहीं लग रहा तो मत करिए। राकेश दास जी मैंने कब कहा मैं थोड़ी ना आपके घर पे आया हूं। यह सवाल आप तब करिएगा जब मैं आपके घर पे आऊं। आपकी चीजों पे आऊं। आप कुछ कर रहे हो। मैं उसमें आकर के बोलूं कि मुझे बात करनी है। टीवी चैनल पर आ जाओ। तब आप यह बात बोल सकते हैं। मैंने कुछ ऐसा किया जिससे आपको दिक्कत हो रही है। जिससे आप मुझे ये बात कह रहे हो कि टीवी चैनल पे आ जाओ। ठीक है? तो आप कुछ ऐसा करिए कि मुझे आपसे दिक्कत हो जाए। सिंपल ऐसे बन जाइए। आप जब ऐसे बन जाएंगे तो मैं जरूर आपसे बात करने के लिए टीवी चैनल पर आना चाहूंगा। फिलहाल आप नगण्य हैं।

01:39:08:00 और क्या जाना हमने कि सतलोक में पूर्ण ईश्वर नहीं है क्योंकि सतलोक में पूर्ण मुक्ति नहीं है और क्या जाना है और भी कुछ चीजें थी जरूरी हां वेद वेद केवल चार हैं। यह भी जाना हमने। पांचवा कोई वेद नहीं है। रामपाल ने खुद ही कहा है। और हां धर्म युक्त युद्ध ने खंडन किया है इस बात का। ठीक है? ये कुछ मोटी-मोटी चीजें। बाकी अगले एपिसोड में हम जो बुलेट पॉइंट्स होंगे इस स्ट्रीम के वो बता देंगे। जय श्री राम भैया। जय श्री राम। जय श्री राम। बताइए भैया। मैं आज थोड़ा सा अपना नाम बदल के आया हूं यहां पे वैसे क्योंकि अपनी पहचान राम हनुमान हम बताइए। जय श्री राम। सबसे पहले तो जो पहला मंगल था उसकी आपको शुभकामनाएं देता हूं। लेट लेट से ही लेकिन बहुत-बहुत शुभकामनाएं आपको जो पहला मंगल था चेष्ट

01:40:23:01 का और मैं आपको एक बहुत-बहुत आभार व्यक्त करना चाहूंगा। बहुत बड़ा थैंक यू। कल जो आपने वीडियो बनाया ना और जो आप खूब गरजे इन लोगों के ऊपर खूब गरजे खूब खूब खूब आपको मैंने पहली बार इतना तब देखा था जब आपने उसको एक्सपोज किया हुआ था हाइपर क्वेस्ट को अच्छा उसमें और कल जो जो हनुमान जी के रूप को जो लेके बातें बोली थी ना मैं सच में बहुत अंदर से इतना आहत था आपने जो उस पर बनाया तो एक हनुमान भक्त होने के नाते उसका तो मैं आपको बहुत-बहुत आभार व्यक्त करना चाहूंगा आपने पढ़ा था आपका आपका जो वीडियो वो कमेंट था वो पढ़ लिया था बहुत-बहुत आभार आपका। आप ऐसे ही घर से रहो। मत पड़ो चक्कर में कोई नहीं है टक्कर में। इनसे पूछिए ना हनुमान जी की पूंछ थोप दी हिंदुओं ने जो भाषा बोली भाई फिर लंका कैसे जली? हनुमान जी की पूंछ कहां से आई? फिर क्या बातें करते हो भाई? और बोलते हो पूंछ नकली वो नकली पूंछ लगाकर घूमते थे। अरे तो भाई वो उसमें ये भी तो प्रसंग आता है ना कि वो पता है वो अलंकार समाजियों से भी आगे का दोगला व्यक्ति है वो। इन हिंदुओं ने हनुमान जी की ठोक दी। अरे अंजनी इंसान उनकी मां पवन इंसान उनके पिता और बेटा बंदर पैदा हो जाएगा। दुनिया में कहीं

01:41:38:02 ऐसा होता है कि अनसाइटिफिक बातों को क्यों लीला का नाम देकर ये हिंदू लोग स्वीकृति देते। जो उनके इष्ट है उनके लिए किस संबंध से कृष्ण की बहन राधा। यहां कहीं पर भी किसी भी पुराण में हमको ये देखने को नहीं मिला कि कृष्ण की प्रेमिका राधा तो हम क्यों कह रहे हैं अगर आप इस प्रमाण को माने तो कृष्ण का राधा के साथ ये ये संबंध है तीन संबंध जो मैंने बताए अगर आप विशुद्ध चरित्र माने तो कृष्ण का राधा के साथ सभी लोग ये वीडियो देखें इंपॉर्टेंट वीडियो है और कोई आया है क्या अब यहां पे इन्होंने क्या कहा इन्होने कहा कि अंजनी उनकी की माता इंसान पवन उनके पिता इंसान तो अब इनको यह तक नहीं पता कि जो हनुमान जी की माता अंजना थी वो एक देव कन्या थी और जो हनुमान जी की पिता पवन थे वो वायु देव थे और ये केसरी मैं ये कह रहा हूं ईश्वर का कांसेप्ट ही शुरू होता है चमत्कार से विज्ञान मानता है क्या कोई ईश्वर है मानता है क्या कोई ईश्वर है विज्ञान कोई ऐसी सुपर कॉन्शियसनेस है जो ये सब बना रही है चला रही शिवश जी इस प्रश्न का जवाब दीजिए। यह

01:42:53:09 संसार पंच देव यानी ब्रह्मा विष्णु महेश दुर्गा जी की भक्ति कर रहा है। फिर भी लोग सभी बुराइयों में लिप्त हैं। जैसे चोरी बेईमानी मांस खाना कहां कर रहा है? जो जो भक्ति कर रहे हैं वह नहीं पढ़े हैं। जो भक्ति नहीं कर रहे हैं वह पढ़े हैं। और दूसरी बात तुम्हारे अनुसार अगर चले तो तुम्हारे बाबा जी कह तो रहे हैं कि जो आत्मा है वो सदा उसके सानिध्य में है परमात्मा के। वो कैसे फस गई काल के जाल

01:43:26:13 में? कभी आओ तो हवेली पे तब तो पता चले। दूर सही बातें करते हैं। अरे भाई जब वह सुख में थी, सतलोक में थी तो उनके मन में क्या कमी रह गई थी जो उनके मन में आया कि काल के पीछे जाए हम लोग और काल तो मरने के बाद दोबारा फिर जन्मेगा फिर पीछेंगी क्योंकि काल तो जीता मरता है। कोई एक बार का खेल थोड़ी ना है तुम्हारा। काल से याद आया। काल से याद आया। अभी एक महीना पहले ना मैं गीता गीता प्रेस गोरखपुर की दुकान पे गया हुआ था अपने कानपुर में तो इस बार मैं वहां से दो खंडों की शिव पुराण ले आया जिसमें संस्कृत हिंदी दोनों है तो अभी मेरा वो चल रहा है उसमें तो लिखा ही हुआ है कि जो ब्रह्मा विष्णु महेश है वो सदा शिव का ही रूप है उनमें कोई भेदभाव नहीं है और जो भेदभाव करता है वो नरक में पड़ता है सदा शिव ने खुद ये बात बोली है उसमें जो संस्कृत हिंदी वाली शिव पुराण है दो खंडों की वो है मेरे पास बहुत बढ़िया तो ठीक है चलते सभी को जय श्री

01:44:31:19 राम और हम लोग वीक में ट्वाइस इन ए वीक ना करके वंस इन ए वीक ही करेंगे। जो हमारे कार्यों से सहमत हैं वो अ यहां पर डिटेल दी गई है। इसका आलंबन लेते हुए हमारी सहायता कर सकते हैं। आर्थिक बल हमें प्रदान कर सकते हैं। और वेडनेसडे की शाम को हम लोग फिर मिलते हैं 8:00 बजे। जय श्री राम।

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A: AHVAAN - Call Of Dharma Live 1:45:09 · 18 May 2025

गीता के नाम पर रामपाल के बोलबचन अध्याय 2 Ep-2 #satlokashram #rampalmaharajbooks

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A · Live गीता के नाम पर रामपाल के बोलबचन अध्याय 2 Ep-1 #satlokashram #rampalma...
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A · Video गौतम खट्टर का दोगलापन #satyarthprakash #आर्यसमाज @TheAryasamaj
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