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00:00:02:12 जय श्री राम सभी को। आशा करते हैं आप सभी कुशल पूर्वक होंगे और आप जानते हैं अभी एक आर्य समाज को मानने वाले हैं। वो यहां पर उपस्थित हैं। मैं उनको स्टेज पर ले लेता हूं। जी मयंक जी मयंक [गला साफ़ करने की आवाज़] जी आप अपना कैमरा ऑन कर लें। सुन पा रहे हैं मयंक जी? जी मैं सुन पा रहा हूं। एक मिनट वाईफाई से कनेक्ट कर लूं वरना ये अटकेगा थोड़ा। एक मिनट एक मिनट बस और आपके यहां किसी और भी डिवाइस में चल रहा है क्या ये लाइव मतलब जिससे आप बात कर नहीं वो दूसरा हां उसको आप कहीं और भेज दीजिए। मतलब आपके आप जहां पर है वहां पर रहेगा तो दिक्कत आएगी। रिपीटेटिंग आवाज सुनाई देगी। हेलो नहीं नहीं बंद कर दिया हमने बंद कर दिया। दूसरा फोन था वो बंद कर दो। ठीक ठीक है तो मैं तो सबसे पहले थोड़ा सा मयंक जी आप अपने बारे में थोड़ा सा बता दीजिए दर्शकों को।

00:01:10:14 क्या बताऊं इसमें? मैं मतलब आर्य समाज से कहां से जुड़े हुए हैं? कैसे फॉलो करते हैं आर्य समाज को? जी ऐसे आधिकारिक रूप से संस्था से तो नहीं जुड़े होते हैं लेकिन आर्य सामाजिक विचारधारा को फॉलो करते हैं। बस इतना ही तो ठीक है। सीधे सर्वशक्तिमान अवतार पर आते हैं। तो आप यह बताएं कि क्या आर्य समाज को आर्य समाज ईश्वर आर्य समाज के द्वारा परिभाषित ईश्वर वो यदि सर्वशक्तिमान है क्योंकि आर्य समाज मानता है कि है तो फिर वो अवतार क्यों नहीं ले सकता

00:01:54:00 अच्छा अवतार वाले पे मुझे लगा था पहले सर्वशक्तिमान वाले से शुरुआत करें सर्वशक्तिमान एक ही बात है मैं आप सर्वशक्तिमान के अर्थ को बताएं ऐसा जो जिससे कि अवतार देखिए जी आप हां वही उसी पे आ रहा था मैं कि सर्वशक्तिमान का अर्थ कुछ भी कर सकता है उसी आधार पे आप अवतार को बताते हैं कि अवतार भी ले सकता है तो उसी पे आ जाता है ना कुछ भी कर सकने वाली बात पे आ जाते हैं हां ठीक है आ जाते हैं तो कुछ भी मतलब सर्वशक्तिमान का अर्थ आप आप ये नहीं मानते कि सर्वशक्तिमान का अर्थ ये नहीं मानते हैं कि वो कुछ भी कर सकता है। सर्वशक्तिमान का अर्थ है कि जो जो वो आप अपनी एक बात को रख दीजिए कि सर्वशक्तिमान का अर्थ यही है तब जिससे कि हम उस पर डिसाइड करें आगे। हां हां सर्वशक्तिमान का अर्थ [गला साफ़ करने की आवाज़] यही है कि ईश्वर अपने सभी गुण कर्म स्वभाव के अनुसार अपने सभी कार्यों को करने में सामर्थ्य है। स्वयं से करने में ईश्वर सामर्थ रखता है। अब उसमें ऐसा नहीं कि कुछ भी कर दे जैसा आप बताते हैं वो वाली बात नहीं आती। ईश्वर के जो कार्य हैं ईश्वर उन सभी कार्यों को करने में समर्थ है। ऐसा कह सकते ईश्वर के जो कार्य हैं मतलब गुण कर्म स्वभाव के अनुसार ईश्वर के जो कार्य हैं

00:03:09:15 वो करने में वो समर्थ है। इसलिए वो वो जो कार्य करता है उसके अनुसार वो सर्वशक्तिमान सिद्ध होता है। ठीक है? अच्छा इसमें एक चीज ये आएगी जैसे ईश्वर को आपने अनंत भी कहा है। अनंत सामर्थ्यवान जब हम ये कहते कि वो यह कर सकता है, यह नहीं कर सकता तो यहां पर अनंतता को कैसे आप डिफाइन करेंगे? इसमें ये है कि अनंत सामर्थ्यवान का आप ऐसा लेते हैं कि अनंत प्रकार के सभी प्रकार के अनंत प्रकार के सामर्थ्य उसमें है। आप इसी प्रकार से लेते हैं ना हम है ना? मतलब कंफर्म कर दीजिए। बात आ गई भाई हां इसी प्रकार से तो अनंत अनंत अनंत का मतलब अनंत हां मेरी आवाज में लैग तो नहीं हो रहा है कि मैं बोल रहा हूं दो तीन सेकंड बाद आ रही है ऐसा तो नहीं है ना नहीं नहीं बिल्कुल बिल्कुल तो अनंत सामर्थ का इस तो प्रकार वाले तरीके से लेते हैं तो अनंत का जो अनंत सामर्थ का जो परिभाषा हम जो उस तरीके से लेते हैं कि अनंत जैसे ब्रह्मांड अनंत है तो अनंत ब्रह्मांड को क्या बोलना चाहिए धारण करा हुआ है ईश्वर अनंत ब्रह्मांड में अपनी क्रिया कर रहा है। इस प्रकार से अनंत सामर्थ प्रकार की दृष्टि से अनंतता के फैलाव की

00:04:24:16 दृष्टि से अनंत अनंत आत्मा हो या अनंत प्रकृति मतलब कि अनंत प्रकार के जो बल एकिस्ट करते हैं वो सारे बल नहीं है उसमें। अनंत प्रकार के जो सामर्थ्य एक्सिस्ट करते हैं वह सारे सामर्थ्य नहीं है। उसमें अब वो वही बात है ना एक्सिस्ट करते या नहीं करते उसी पे तो बात है कि वो जो आप कुछ भी कह सकते हैं जो सामर्थ्य ले रहे हैं वो एक्सिस्ट करता है या नहीं कहां कहां पे आप उसका बंधन मान रहे हैं कि कौन सा वाला सामर्थ उसमें नहीं है

00:04:57:03 विरोधाभासी जैसे आप मानते चीजें और भी काफी चीजें हैं पर एक आप मुझे एक प्रैक्टिकल उदाहरण दीजिए कि यह वाला सामर्थ उसमें नहीं है भाई जैसे आपने प्रकार से जोड़ा है ना प्रकार देखिए प्रकार क्या है चीजों को धक्का मारना खींचना देखना ये सब [गला साफ़ करने की आवाज़] प्रकार है बल के है ना जानना ये भी एक बल है ये भी एक शक्ति है जानना अब्सॉर्ब करना ज्ञान ग्रहण करना चीजों को तो कौन से प्रकार का है जो उसके पास नहीं है जो आप प्रकार से उसको कह रहे हैं अनंतता को कह रहे हैं जैसे आप ये ले सकते हैं कि ईश्वर जो है सर्वव्यापक है। ईश्वर सर्वव्यापक है तो सर्व्यापक ही रहेगा। कभी भी अपने आप को किसी एक जगह से हटा नहीं सकता या उस जगह में से व्यापक होने से हट नहीं सकता। ऐसा कह सकते हैं। ये एक अगर आपकी दृष्टि से देखा जाए तो बाधा है। लेकिन हमारी दृष्टि से बिल्कुल सही है। क्योंकि ईश्वर अपने आप को सर्वव्यापकता से हटा नहीं सकता। बेसिकली सर्व्यापक है तो सर्वव्यापक ही रहेगा। हर जगह रहेगा ही रहेगा। ईश्वर और भी ईश्वर जो है वो सर्व्यापक है। सर्व्यापक ही रहेगा। ये तत्व की दृष्टि से तो सही है। बिल्कुल मगर क्या लौकिक दृष्टि

00:06:12:04 से भी ये ये बाधा है ईश्वर के ऊपर और क्या ये क्या ये एक प्रकार का बल है? क्या ये एक प्रकार का बल है? मतलब कि ये जो आप कह रहे हैं ना कि इधर से उधर नहीं होगा। अगर वह सर्वव्यापक है तो वह सर्वव्यापक रहेगा। मगर कहीं ऐसी जगह नहीं आएगी जहां पर वो ना हो। है ना? तो क्या ये एक प्रकार का बल है? मैं फिलहाल बात कर रहा हूं फोर्स की। होता क्या है? बल मतलब क्या? बल बल मतलब शक्ति। शक्ति। प्रकार की शक्ति। ठीक है? प्रकार की शक्ति। अब जैसे आपकी दृष्टि से क्या होता है कि कई बार यह वाली बात आती है सामने से कि क्या ईश्वर कुरान का ज्ञान दे सकता है? ठीक है? तो कुरान जैसे जैसे मेरी बातचीत हो रही थी अग्निव्रत जी से मेरे ख्याल से आप वही चीजें देख के आए हैं। है ना? तो अग्निव्रत जी ने एक उदाहरण दिया था। जब मैंने उनसे कहा था क्या नाली में भी ईश्वर हो सकता है? तो मैंने जब यह कहा तो अग्निव्रत जी ने उसका जो तात्विक विवेचन है वह करना चालू कर दिया वैज्ञानिक दृष्टिकोण से कि नाली है क्या मॉलिक्यूल्स ये है वो है मतलब जो चीज हमें बुराई बुराई दिख रही है उस चीज को तत्व की दृष्टि से देखने लगो

00:07:27:13 तो उसकी वो जो बुराई दिख रही है बुराई देखना बंद हो जाएगा तो अगर हम कुरान से इस चीज को जोड़ें कुरान के ज्ञान देने से इस चीज को जोड़ें या अन्य जो चीजें हमें पाप लग रही गलत चीज में आ रही मगर उसमें वहां पर बल तो वही है ना जैसे किसी को को कुछ ज्ञान देना, कुछ बताना, कुछ हम हमारे पास कुछ ऐसा है जो हम किसी को कह रहे हैं। जैसे कि मैं किसी को कोई बात कह रहा हूं तो मेरे पास अपने विचार दूसरे को प्रदान करने की शक्ति है। अब वो मैं कर रहा हूं कि नहीं कर रहा हूं वो तो बाद की बात हो जाएगी। मगर मैं मेरे अंदर क्षमता है कि मैं कुछ बात किसी को कह सकूं। तो जब यह आएगा कि क्या वो उसके अंदर क्षमता है किसी को कुरान जैसा ज्ञान दे देने की? तो कुरान जैसा ज्ञान एक हो गया मान्यता। कुरान जैसी ज्ञान हो गया मान्यता। मगर वहां पर क्रिया क्या हो रही है? वहां पर व्यवहार क्या हो रहा है? कि विचार प्रदान किया जा रहा है। यानी कि भौतिक जो एक क्रिया है वहां पर वो क्या हो रही है? विचार प्रदान करने की। तो ऐसा कौन सा ऐसी भौतिक कौन सी कौन सा बल है जो ईश्वर के पास नहीं है? पहले तो मैं ये पूछ रहा हूं। कोई आप मानते हैं जो उसके पास ना हो। भौतिक भौतिक में जाने की जरूरत नहीं ना मैंने बता तो दिया सर्वव्यापकता ईश्वर अगर आप

00:08:42:14 बोलते हो जाने की जरूरत है ना मैंने क्या कहा जाने की जरूरत है इसलिए है क्योंकि जब हम ईश्वर की सर्वशक्तिमत्ता की बात करते हैं तो आप उसमें उसकी क्रियाओं से उत्पन्न होने वाली जो मान्यता है उसको साथ में ऐड करके यह प्रयास होता है कि भाई वह गलत काम नहीं कर सकता। जबकि गलत काम करने में भी उसी प्रकार से तात्विक विवेचना में ईश्वर के दृष्टिकोण से न्यूट्रल न्यूट्रल दृष्टिकोण छिपा हुआ है। जैसे उसके लिए नाली क्या है? वो बताने लगे मॉलिक्यूल्स हैं ये हो वो ये मतलब जिसको जिसके लिए जिससे एक मनुष्य को दिक्कत हो सकती है, समस्या हो सकती पर ईश्वर को नहीं हो सकती। वो वहां पर भी है। तो ये जो दोष और निर्दोष वाली बात है दूषित और निर्दोष दूषित और निर्दोष वाली बात है इसके आधार पर वो कहते हैं कि भाई जहां पे गलत कार्य हो रहा है वो ईश्वर नहीं कर सकता। जैसे किसी की हत्या हो रही है वो ईश्वर नहीं कर सकता। फिर हम उसकी तात्विक विवेचन में जाएंगे कि भाई गोली चल रही मान लीजिए। तो गोली चल रही किसी को बहुत फोर्सफुली धक्का मिला बुलेट को और बुलेट आगे गई। तो यह जो गोली चलने वाला बल है यह ईश्वर के पास है कि नहीं? तो यहां पर वो कहेंगे है इसका मतलब वो गोली भी चला सकता है।

00:10:00:24 यह वाली चीज आ जाती है। इसलिए मैंने आपसे पूछा कि कई कई प्रकार के बलों की जब बात हो रही है तो कोई ऐसा बल एक्सिस्ट करता है जो है मगर ईश्वर में नहीं है। जितने बल आप मानते हैं कि हैं। अभी उसकी बात कर रहे हैं। वो जो है ना स्वरूप विरुद्ध कार्य जो आप कह रहे हैं सर सर वो जो है स्वरूप विरुद्ध कार्य वाला आपके हिसाब से वो एक्सिस्ट नहीं करता है। और उस पर हम बात करेंगे। वो एक अलग चैप्टर हो गया। फिलहाल मैं यह कह रहा हूं कोई भौतिक बल ऐसा है जो एक्सिस्ट तो करता है परंतु ईश्वर में वो नहीं है। इसमें ये बात आ जाएगी ना कि जैसे आपने उदाहरण दिया गोली चलाना। तो क्या गोली चलाने में ईश्वर ने मतलब जितने भी बीच में जो चीजें थी बल परमाणु वगैरह सारी ईश्वर ने धारण करे हो। ठीक है? प्रक्रिया पूरी ईश्वर के द्वारा मैं नहीं मैं यह नहीं कह रहा पूरी ईश्वर के द्वारा हो रही कि नहीं उसमें इच्छा किसकी मैं यह नहीं कह रहा जो वहां पर एनर्जी यूज़ हो रही है जो वहां पर बल यूज़ हो रहा है वो बल ईश्वर के पास है कि नहीं

00:11:04:12 पास है का मतलब क्या ईश्वर सामर्थ्य मेरा पूरा सुन लीजिए फिर जवाब दे देना क्या ईश्वर आप ये पूछना चाह रहे कि क्या ईश्वर परमाणुओं को क्या बोलते गति कराने में सामर्थ्यवान है या अगर ये पूछ रहे हैं तो बिल्कुल है लेकिन हां तो ये इसमें तो हां जवाब है तो फिर आगे बढ़ जाता तो क्या तो क्या बुलेट बुलेट वाले जो परमाणु है उसको गति कराने में सामर्थ नहीं है नहीं नहीं सभी सब बुलेट वाले तो सभी आ गए ना परमाणु में तो सारे आ जाएंगे कुछ मैंने बोला नहीं इसका अर्थ यह है कि ईश्वर के पास समस्त भौतिक क्रियाओं को करने का सामर्थ्य है जितने प्रकार के बल है वो हमारे ऊपर है कि हम कौन सी चीज को पाप और पुण्य से जोड़ सकते हैं। यही बात हो गई ना मैं नहीं सामर्थ्य है का फिर उसमें यह बात आ जाएगी कि क्या ईश्वर के गुण में वो सामर्थ्य आएगा या नहीं जैसे मैं समझाता हूं आपको कि ईश्वर के गुण में जैसे मैं उदाहरण के लिए बोलूं कि क्या ईश्वर अभी ये जो पेन है इसको अभी के अभी हवा में उड़ा के दिखा दे मुझे क्या ये वाला सामर्थ्य है या नहीं ठीक है तो सामर्थ है तो बोलना चाहिए सामर्थ है सामर्थ्य है परंतु उसकी इच्छा है कि नहीं वो स्वतंत्र है अपना निर्णय लेने के लिए दिखा दे। हां। तो

00:12:19:25 तो वही तो इसमें ये आती है ना कि ईश्वर जो अपनी ऐसे कुछ भी फालतू-फालतू चीजें नहीं करता। इच्छा में भी अगर वो फिर इच्छा वाली बात पूछा है मैंने पूछा है समस्त क्रियाओं को करने का सामर्थ्य है कि नहीं? जितने बल है दुनिया में एकिस्ट कर रहे हैं वो सारे कार्य करने का सामर्थ्य है कि नहीं? देखिए प्रश्न के लिए फिर हमको डीप में जाना ही पड़ेगा। मैं ऐसे हां या ना में जवाब दे ही नहीं सकता क्योंकि फिर वो स्पष्टता नहीं आ रही ना प्रश्न में से डीप डीप में जाइए आप डीप में जाइए देखिए मैं समझना चाहता हूं इसमें हां जी तो इसमें ये बात आती है कि जैसे अभी अभी ये जो पेन है ये सारे नियमों को फॉलो कर रही है ज्ञान के जो नियम है उसमें से एक है गुरु गुरुत्वाकर्षण बल ठीक है उसकी वजह से ये ऐसे नीचे गिर रही है ठीक है तो आपका प्रश्न मतलब फिर ये है कि क्या ईश्वर अभी के अभी इसका गुरुत्वाकर्षण बल को तोड़ मतलब गुरुत्वाकर्षण बल को हटा हटा के इसको हवा में उड़ा सकता है। तो यहां मेरा जवाब होगा नहीं। अब मैंने अभी आप बार-बार मेरी बात में अभी जोड़ दे रहे हैं। जब अभी जोड़ दे रहे हैं तो ईश्वर क्या मेरे अनुसार कार्य कर सकता है ये वाली बात आ जाएगी। वो स्वतंत्र है ना। मैं कह रहा हूं उसमें सामर्थ्य है कि नहीं? सामर्थ्य में फिर वो बात आ जाएगी।

00:13:35:06 ईश्वर अपने अपने ईश्वर का गुण जो है जैसे ईश्वर वही बात आ जाएगी ना कि ईश्वर कोई भी कार्य क्यों करेगा बात आ जाएगी। तो क्यों मैं फिर बात करेगी कि क्या ईश्वर देखिए बात यह हो रही है जैसे मैंने पूछा है आपसे क्या मैं पानी पी सकता हूं कि नहीं फिर आप कह रहे हैं कि आप पानी क्यों पिएंगे ये एक अलग बात है कि मुझे पानी पीना है कि नहीं नहीं इसी से जुड़ी हुई है इसी से नहीं इसी से जुड़ी हुई है क्यों जुड़ी हुई है क्योंकि कोई भी आप स्वतंत्र बोलते हैं ईश्वर को मतलब कि मतलब कि वो समस्त परमाणुओं को गति करा सकता है गति में अवरोधक बन सकता है ना? अवरोधक भी तो बन सकता है। हां। और यहां तक कि जो पृथ्वी इसको खींच रही है पेन को जो पृथ्वी गुरुत्वाकर्षण शक्ति वो खींच रही है पेन को तो वो भी वो कर सकता है। परंतु एक समय आएगा जब कहेंगे कि यहां पे ईश्वर की शक्ति नहीं है। यह वाली शक्ति नहीं है। तो वो कौन सी शक्ति है जो उसमें नहीं है?

00:14:35:27 मैंने बताया तो सही ईश्वर के अंदर वही बात है फिर क्यों पर बात आ जाएगी ना ईश्वर क्यों करेगा तो ईश्वर के अंदर यह इच्छा वाली जो बात है ना यह वाली इच्छा है ही नहीं कि किसी भी प्रकार से जो नियमों को तोड़ा जाए या नियम मैंने आपसे पूछा सामर्थ्य के बारे में उसका निर्णय क्या होगा क्या नहीं होगा ये एक अलग चैप्टर है ये एक अलग मैं पूछ रहा हूं सामर्थ्य है कि नहीं जो जो क्रियाएं एक्सिस्ट कर रही है देखिए जैसे जैसे कि किसी ने किसी को धक्का दिया। अब ये जो धक्का दिया है धक्के में जो फोर्स लग रही है पुश करने की फोर्स ये उसके अंदर एक्सिस्ट कर रही है। अब वो बात अलग है कि इसका उपयोग कहीं पर ऐसा हो जाए किसी धक्के का उपयोग कहीं पर ऐसा हो जाए कि किसी के साथ कोई अत्याचार हो जाए। उस क्रिया से होने वाली मान्यता क्या है? वो एक अलग मैटर है। मगर जितनी क्रियाएं हो रही है उसका अधिष्ठान ईश्वर है कि नहीं? या फिर कोई जवाब उसका तो जवाब दे दिया ना मैंने परमाणु को संसार में यानी कि संसार में जो कुछ भी हो रहा है वो सारी शक्तियां ईश्वर में है। हां है ही पर हां ठीक है। आप जाना नहीं वो सब कुछ करने की शक्तियां ईश्वर में है। है ना?

00:15:53:08 फिर मैं उसी में फिर डिटेल में जाऊंगा तो आप रोक लेंगे बीच में। इसलिए अब क्या बोलूं? मैं इसका उत्तर दे ही नहीं सकता ना। मुझे जाना ही पड़ेगा। आ जाता हूं। अब मैं डिटेल पे आ जाता हूं। आपका मानना है [गला साफ़ करने की आवाज़] ईश्वर का अवतार लेना। उसके जो क्या कहते हैं जो उसके स्वरूप है ईश्वर का अवतार अवतार पर नहीं आना चाहता। चलिए नहीं नहीं नहीं वो मैं अभी सर्वशक्तिमान पे ही रहूंगा मैं। अभी मैं सर्वशक्तिमान पे ही रहूंगा। मगर एक टैगलाइन फिट कर रहा हूं कि आप आपका मानना है आर्य समाज का मानना है कुल मिलाकर के कि ईश्वर का अवतार इसलिए निषेध है क्योंकि ईश्वर का अवतार उसके स्वरूप के विरुद्ध कार्य है क्योंकि वो सर्वव्यापी है तो एक जगह नहीं हो सकता इसलिए अवतार नहीं हो सकता सर्व्यापी ही रहेगा वो यानी अवतार होना एक तो अवतार होना कि जो दूसरे तरीके से ईश्वर सर्वव्यापक होकर एक देश हो जाए वो वाली बात अलग है और इच्छा वाली जो बात है ना ईश्वर के अंदर इच्छा होना भी संभव नहीं इच्छा होती उसके अंदर है जिसके अंदर कोई कमी

00:16:56:28 स्वयं के लिए कुछ करने के लिए करने को अभी तक आपकी जो बातें मुझे समझ में आई है कि जो उसके गुण कर्म और स्वभाव के अनुसार जो सारे कार्य हैं वो सारे कार्य ईश्वर कर सकता है इसलिए वो सर्वशक्तिमान है और है ना जी और अवतार लेने वाला जो विषय है और एक आपकी ओर एक आपकी ओर से यह तर्क जो आया आता है कि क्योंकि वो अपने सारे कार्य बिना किसी सहायता के कर सकता है। यह वाले तर्क का आप सपोर्ट नहीं करते हैं। एक नहीं वही वही मैंने जो बोला वो उसी में आ जाएगा ना। ईश्वर के जितने भी समस्त कार्य ईश्वर स्वयं करने में स्वयं से सक्षम है। उसी के अंदर ही आएगी। सारे कार्य एक मिनट वो अपने सारे कार्य बिना किसी की सहायता के कर सकता है। इसलिए वो सर्वशक्तिमान है। यह बात ठीक है ना? और एक आपने अनंत की बात तो स्वीकार कर ली कि उसके उसके अंदर अनंत बल है। हां अनंत बल है अनंत अनंत बल किस तरीके से बता दिया क्योंकि अवतार लेने वाला जो बल है आपके हिसाब से एक्सिस्ट ही नहीं करता है इसलिए वो बल नहीं है यही तो हुआ वही ना बल बल एक्सिस्ट करता नहीं करता बात आएगी नहीं ना ईश्वर के अंदर वो इच्छा ही एक्सिस्ट नहीं करती है मैं ये बोलना चाह रहा हूं या इच्छा होने की संभावना भी नहीं करती चलिए महेंद्र

00:18:12:02 जी मैं वो बात ला रहा हूं मैं कह रहा हूं अवतार लेने का बल आपके अकॉर्डिंग एक्सिस्ट करता है कि नहीं करता है मैं यह पूछ रहा हूं आप क्या कहना चाह रहे कि फिर वही बात आ जाएगी परमाणु वाली बात दुनिया में जैसे दुनिया में धक्का देने का बल एक्सिस्ट करता है। हम थोड़ी चीजें क्लियर करते चले कि हमें एक दूसरे को काउंटर किस बात पे करना है। है ना? तो जैसे दुनिया में धक्का देने का बल एकिस्ट करता है। वो ईश्वर में है। ठीक है? दुनिया में ज्ञान आदान प्रदान करने की जो शक्ति है वह एक्सिस्ट करती है व्यवहार करने की तो वह ईश्वर में है। ठीक है? ठीक है ना? ईश्वर में है का अब वही बात आ जाएगी ना ईश्वर में है का मतलब आप ये पूछना चाह रहे हैं कि क्या ईश्वर स्वयं से किसी नियम मतलब एट एन इंस्टेंस खुद से कोई बल लगा दे जो पहले से जो नियम है उनको तोड़ करके तो वो सामर्थ्य नहीं है जो नियम बने ईश्वर ने बनाए है वो ईश्वर नियम के अनुसार ही चलेगा वो वाला सामर्थ ईश्वर में नहीं है कि ईश्वर अभी के अभी इस फोन को हवा में उड़ा के बता दे वो वाला सामर्थ ईश्वर में नहीं है आप आपसे जब मैं फाइनल बात करने जाता हूं तो आप पीछे आते हैं जब मैं पीछे पे आके बात करता हूं तो आप फाइनल पे जाते हैं। नहीं

00:19:27:10 क्योंकि आप कंक्लूजन गलत दे रहे हैं ना आप गलत मैं क्लियर बोल रहा हूं। पहले तो यह देख लेते हैं कि उसके अंदर बल है कौन-कौन से। तो अगर सामान्य तौर पर बात करें पुश पुल। ठीक है? देखना और बताना, ज्ञान धारण करना, ग्रहण करना और प्रदान करना ये सारे बल है उसके अंदर। ठीक है ना? हम तो अब मैं पूछ रहा हूं कि आपके अकॉर्डिंगली क्योंकि अह या कोई भी ऐसा कार्य जो कार्य आप जिन कार्यों से अवतारों अवतार को जोड़ रहे हैं वो जो कार्य है एक्सिस्ट ही नहीं करता है। अभाव है उस बल का इसलिए आप मानते हैं कि ईश्वर जो है अवतार नहीं ले सकता या फिर वह सर्वशक्तिमान के अकॉर्डिंगली खड़ा नहीं उतरता। उस सामर्थ्य का अभाव है। बल का अभाव बल अभी छोड़ दीजिए। उस सामर्थ्य का अभाव इतना रख लीजिए बस। इससे आगे बढ़ जाइए क्योंकि फिर बल में देखिए जो अनंत सामर्थ की बात आपने कही थी ना कि सभी प्रकार के सामर्थ है तो हम उनको कहते हैं सभी प्रकार के नहीं है ठीक है तो सभी प्रकार के सभी प्रकार के हम कहते हैं आप कहते सभी प्रकार के नहीं मगर जो भी है वो अनंत है सभी प्रकार के नहीं है मगर जितने प्रकार के हैं वो अनंत है

00:20:42:16 नहीं नहीं नहीं नहीं ये नहीं बोला मैंने नहीं नहीं नहीं आप गलत गलत समझ रहे गलत मैं क्लियर कर देता हूं मैं क्लियर कर देता हूं थोड़ा रोक देता हूं क्लियर कर दीजिए। सभी प्रकार के हैं। लेकिन जितने प्रकार के अनंत ऐसा तो बोला ही नहीं मैंने। उसमें यह है कि ईश्वर का जो अनंत ब्रह्मांड को धारण कर रखा है। उस दृष्टि से विस्तार की दृष्टि से कह सकते हैं या फिर आप उस दृष्टि से भी कह सकते हैं कि भाई अनंत प्रकृति के जो कण है उनको धारण कर रखा। उस दृष्टि से अनंत प्रकार की दृष्टि से मैं कभी नहीं बोल रहा हूं। यानी मैंने कब कहा? मैंने कहा जितने मैंने यह कहा है जितने प्रकार के हैं वो है उसमें अनंत [गला साफ़ करने की आवाज़] प्रकार जितने प्रकार के बल एक्सिस्ट करते हैं वो उसके अंदर है हां बल नहीं सामर्थ बल बल से समस्या सामर्थ ले लीजिए जितने जितने प्रकार के सामर्थ्य एक्सिस्ट करते हैं वो उसमें है ईश्वर ठीक है और जो भी है मतलब जैसे मान लीजिए मेरे पास धक्का देने का सामर्थ है तो धक्का का मैं अनंत दे सकता हूं। यही तो हुआ। हम अनंत बल है ना? हां हां तो अनंत है वो खत्म नहीं होता। तो जितने प्रकार के बल है वो अनंत रूप से उसके पास है। इसलिए वो अनंत सामर्थ्यवान है।

00:21:57:22 जितने प्रकार के सामर्थ है वो अनंत रूप से उसके पास है। इसलिए वो अनंत सामर्थ्यवान है। यही तो हुआ। जी हम जी। तो इसका मतलब ये है कि जो अवतार का निषेध किया जाता है वो इसलिए किया जाता है क्योंकि अवतार धारण करने वाला जो सामर्थ्य है वो एक्सिस्ट ही नहीं करता और इसलिए नहीं करता क्योंकि वो स्वभाव के विरुद्ध है। ये बात मान लो। हां। ठीक

00:22:21:01 है। तो अब आपने एक बात कही कि ईश्वर अपने सारे कार्य करता कर सकता है बिना किसी की सहायता के। तो वो सर्वशक्तिमान कहा जाता है। है ना? हां तो जब ईश्वर ईश्वर का कार्य क्या है? [गला साफ़ करने की आवाज़] पूछ रहे हैं आप मेरे से। हां तो ईश्वर का ईश्वर का कार्य यही है सृष्टि रचना करना धारण करना फिर प्रलय करके फिर पूरा सृष्टि चक्र चलाना और जितने भी चीजें बीच में आती है कर्म सिद्धांत मनुष्य की मनुष्य कह रहा हूं सभी जीवों के लिए रचनाएं करना और सस्टेन करना हर चीज को बेसिकली यानी उत्पत्ति उत्पत्ति स्थिति संहार और कर्म फल देना ये चार चीजें मैंने पढ़ी थी उसमें शायद है ना यही है ना हां यही है तो तो ये बताइए कि ईश्वर के अलावा और कौन-कौन से तत्व हैं जो एक्सिस्ट करते हैं सृष्टि रचना से पहले?

00:23:24:09 वो प्रकृति अब क्योंकि आप मैं सोचा था कि सर्वशक्तिमान वाले पे आएंगे तो आप दिशा अलग ही ले जा रहे हैं। इससे क्या होगा? मतलब इसमें इससे फर्क क्या पड़ेगा? तो इससे सर्वशक्तिमान फर्क पड़ेगा ना फर्क ये पड़ेगा कि जो ईश्वर है वो प्रकृति की और जीव की सहायता ले रहा है उत्पत्ति स्थिति संहार और ये सब करने में सहायता ले रहा है वो फिर आप ये क्यों कह रहे हो कि वो अपने से कर लेता है कौन से माना जाए कि हां हां निमित्त है सर ये तो निमित रूप से सहायता नहीं ले रहा। उपादान तो चाहिए ना ईश्वर को। मूल प्रकृति आप आज में समझ गया। आप ये कहना चाह रहे हैं कि मूल प्रकृति एक्सिस्ट कर रही है। तो मूल प्रकृति के अस्तित्व के बिना ईश्वर नहीं बना सकता। तो इससे आप वो दिखाना चाह रहे समझ रहे। दो ही चीजें वहां पे दो ही चीजें ईश्वर के अलावा है। उन दोनों चीजों का वो उपयोग कर रहा है। ये वाली बात जो कही जाती है कि ईश्वर बिना किसी की सहायता के नहीं करता। तो इसमें ये मानना पड़ेगा या तो कोई एक और ईश्वर था जिसकी सहायता उसने नहीं ली। क्योंकि जिसकी जो उपलब्ध है उसको उसको तो यूज़ कर रहा है। अगर बात करें कि जड़ जड़ यही सही सही सही पकड़ा

00:24:39:15 पॉइंट पहला वाला सही पकड़ा। एक मिनट एक मिनट जड़ का वो यूज़ कर रहा है। अगर कहे चेतन का नहीं कर रहा है तो वो अपने धर्म का जो धार्मिक ज्ञान है उसका विस्तार करने के लिए भी चेतन का यूज़ कर रहा है। पहले वो ऋषियों को देता है। ऋषियों से प्रवाह आगे बढ़ता है। चेतन का यूज़ भी हो गया। जो वो है ना उत्पत्ति स्थिति स्थिति में आ गया धर्म और धर्म के प्रवाह के लिए वो ऋषियों की ऋषियों की सहायता ले रहा है। चेतन की सहायता ले रहा है। वो खुद तो हर एक को जाकर के वेद नहीं दे रहा है। वो चार ऋषियों को दे रहा है। फिर चार ऋषि आगे काम कर रहे हैं। ठीक है। ठीक है। मैं इसका जवाब दे देता हूं। पॉइंट समझ गया मैं। तो ईश्वर जो है उपादान तो ईश्वर को चाहिए ही चाहिए। जो आप बोल रहे हो मूल प्रकृति ईश्वर उपादान चाहिए चाहिए। और सहायता ना लेने का कारण क्या है? वो बताइए। सहायता ना लेने का अर्थ यानी किसी और की सहायता ना लेकर के खुद से कर रहा है वो चीजें और खुद से करने का मतलब जो है निमित्त रूप से सहायता सृष्टि बिना जीव के भाई किस चीज की सहायता नहीं लेनी जड़ की या ची दोनों की नहीं लेनी सहायता लेने का अर्थ गलत समझ रहे हैं क्योंकि ये तो फिर आप ये तो शुरू से ही गलत समझ रहे हैं आप ये तो आर्य समाज में कोई भी नहीं बोलता है कि ईश्वर जो है बिना मूल प्रकृति के बिना जीवात्मा के एक्सिस्टेंस के बना देता नहीं कह रहा मैं ये नहीं कह कि आर्य समाज यह बोलता है कि वो बिना

00:25:54:16 प्रकृति की बिना प्रकृति का उपयोग किए बना देता है। मुझे इस बात का अर्थ समझाइए वो यह जो यह जो तर्क दिया जा रहा है आर्य समाज की ओर से कि वो अपने सारे कार्य बिना किसी की सहायता अन्य आपने जो पहले वाली बात बोली थी ना वही बात है कि अन्य किसी और चेतन सत्ता और को एक्सिस्ट नहीं कर रही जिसकी सहायता लेके वो कुछ बना रहा है। जैसे उदाहरण के लिए अ बोतल है ये ईश्वर का ईश्वर का कार्य ईश्वर का कार्य स्थिति है ना स्थिति पालन स्थिति रखना मेंटेन रखना पालन उसमें धर्म की स्थापना आ गया ना ईश्वर का कार्य कि नहीं आया हम धर्म की स्थापना अब वो उसप बात चली जाएगी वो फिर दूसरा विषय हो जाएगा नहीं होगा धर्म की स्थापना का मतलब यही नहीं है कि जब जब कंस आए रावण आए तब स्थापना करनी है कोई व्यक्ति धर्म को जानने वाला नहीं है तब चार ऋषियों के अंतःकरण में वेद का ज्ञान देना ये भी धर्म ठीक है। मैं इसका हां मैं इसका जवाब ऐसा देता हूं। ईश्वर जो है समस्त आत्माओं का कल्याण चाहता है और कल्याण चाहने के लिए व्यवस्था जो बनाई कल्याण करने के लिए चाहने के लिए नहीं नहीं मैं कह रहा हूं वो सहायता ले रहा है ना चेतन की

00:27:10:04 आपने कहा चेतन की सहायता नहीं लेता है। वो तो ले रहा है। चेतन से अपना काम करवा रहा है ना। अपना काम वही अपना काम कुछ उसका थोड़ी है धर्म की धर्म की स्थापना करना या जो भी करना वह ईश्वर का काम नहीं है वो चेतन मतलब हमारा काम है बेसिकली तो वो क्या चीज है जिसके कारण ये कहा जा रहा है ये जो है ये हमारा काम है ये धर्म की स्थापना करना ईश्वर का नहीं है हम ईश्वर का नहीं है ना ईश्वर ने हमें हमारे हमें स्वतंत्र छोड़ रखा है यदि ईश्वर हस्तक्षेप करके स्थापना कर देगा तो फिर वो तो ईश्वर का काम हो जाएगा वो मैंने आपको क्या कहा है मयंक जी असल में क्या है कि आप मुझे लगता है कि मेरी कुछ चर्चाओं को देख के एक लिमिटेड क्राइटेरिया को लेकर के यहां उपस्थित हुए हैं और शायद मैं वो विषय ला नहीं पाया जिसके लिए आप प्रिपेयर हो के आए हैं मुझे ऐसा लग रहा है क्योंकि बात नहीं नहीं मैं ये तो चाह रहा था कि पहले से हम थोड़ा डिसाइड कर ले किस पर बात होनी है एक मिनट मैं जरा पूरा बात तो सर्वशक्तिमान पे ही चल रही है ना सर्वशक्तिमान पे ही बात चल रही है जो सर्वशक्तिमान के लिए तर्क दिया जा रहा है ईश्वर अपने सारे कार्य कर सकता है वो तर्क मुझे वहां से संतुष्टि नहीं मिल रही है क्योंकि ईश्वर अपने सारे कार्य कर सकता है इसलिए वो सर्वशक्तिमान है उसका कार्य उत्पत्ति स्थिति सब पार

00:28:25:08 और ये अब उसी उत्पत्ति में वो जीव का भी उपयोग कर रहा है संसार बनाने के लिए जीव का उपयोग हो रहा है चेतन का उपयोग हो रहा है उसके बाद स्थिति में धर्म के लिए वो जीव का उपयोग कर रहा है उसको बता रहा है कि ये ले भाई वेद और इसको जाकर के आगे आप बढ़ाइए तो ये उपयोग हो गया तो वो कौन सा फिर अंतर क्या रहा जब वो तो दूसरी चीजों का जो जो भी चीज एक्सिस्ट कर रही है वो उसका उपयोग कर रहा है उसकी सहायता ले रहा है तो अंतर क्या रहा [नाक से की जाने वाली आवाज़] तो वही है ना आप सहायता का अर्थ गलत समझ रहे हैं वही है उसका उत्तर हो गया सहायता का अर्थ आप ये समझ रहे हैं कि क्या ईश्वर स्वयं से बिना मूल प्रकृति के एक्सिस्टेंस के उसके बना दे रहा है या फिर स्वयं से आत्मा मैं नहीं कह रहा कि मैं ये नहीं कह रहा कि मैं सहायता का अर्थ मुझे आप इस वाक्य का अर्थ बताइए कि वो बिना किसी की सहायता के करता है वो अर्थ बताइए मैंने सहायता सिद्ध कर दी वो सबकी सहायता ले रहा है जो भी उपलब्ध है उनकी सहायता ले रहा है वो

00:29:19:20 वही है ना सहायता तो लेता ही है ना आप समझ ही नहीं रहे सहायता लेने का अर्थ अगर आप ये करें कि भाई कुछ एक्सिस्ट ना करे मैं मैं ये नहीं कह रहा कि मैं आप यह मत बताइए कि क्या नहीं है अच्छा मैं मैं बताता हूं चलो मैं एग्जांपल देता हूं एक मिनट थोड़ा टाइम क्यों लग रहा है आप ये मत बताइए कि क्या नहीं है आप ये बताइए क्या है अपनी बात बताइए आप ठीक तो मूल प्रकृति है जीवात्माएं जीवात्माओं के लिए जो है संसार बनाना ये है ईश्वर का एक कार्य ठीक है अब इस कार्य को करने के लिए जीवात्माओं की जरूरत तो पड़ेगी शरीर में जीवात्मा को डालेगा और किसको डालेगा मूल प्रकृति से ही वह संसार बनाएगा ठीक है यह कार्य मैंने डिफाइन कर दिया ठीक है अब इस कार्य को करने के लिए ईश्वर को और किसी की सहायता की जरूरत नहीं है ईश्वर स्वयं सामर्थ्य रखता है यह कार्य करने का ठीक है और किसी और और कौन है जीव की सहायता ले ली जड़ की सहायता ले ही ली अच्छा ये भी हो कि चलो मेरा कंट्रोल है अगर मैं कहूं कि मेरा कंट्रोल है सहायता करना ना करने के ऊपर ठीक है कि भाई मैं जीव की इच्छा के बिना भी उसका उपयोग कर सकता हूं है ना आप वो बात नहीं कह

00:30:34:21 पा रहे मैं आपके पक्ष की ओर से नहीं नहीं नहीं नहीं कर नहीं नहीं ईश्वर फिर वही बात आ जाएगी ना ईश्वर क्यों करेगा पे ही आना पड़ेगा कि ईश्वर की अगर आत्मा है मान लीजिए जीवात्मा एक्सिस्ट नहीं कर रही है ईश्वर मूर्त प्रकृति से अपना कुछ कर रहा है सुन रहे मैं क्या कह रहा हूं आपने मेरी बात समझी नहीं आप नहीं बोलने लगे पहले ही मैंने कहा कि प्रकृति निर्णय नहीं ले सकती कि मुझे उपयोग में आना है कि नहीं आना है जीव निर्णय नहीं ले सकता है कि मुझे जन्म लेना है कि नहीं ले तो उसका क्योंकि कंट्रोल होता है इस कारण से जीव का उसमें कोई हस्तक्षेप नहीं हो सकता नहीं मैं संसार नहीं बनने दूंगा मैं नहीं आऊंगा तो इस तरीके से देखा जाए तो वह स्वतंत्र रूप से यह निर्णय लेता है कि मुझे संसार बनाना है, कैसे बनाना है, आगे क्या करना है, जीव को कैसे जन्म देना है? इस तरीके से वो बिना किसी की सहायता के क्योंकि करता है अपना कार्य इसलिए वो सर्वशक्तिमान है। मैंने आपकी ओर से एक पक्ष रख दिया क्योंकि वो क्योंकि वहां क्योंकि जीव और प्रकृति दोनों उसके अधीन होते हैं। हां होते हैं। है ना? ठीक है। जीव और प्रकृति दोनों उसके अधीन होते हैं। इस कारण से ये कहा जाता है कि उसने उनकी बिना मर्जी उनसे कोई इच्छा थोड़ी ना पूछता है वो कि भाई

00:31:49:22 तुझे जाना है कि नहीं जाना है संसार है ना हम तो वहां पे जो सहायता होती है वो इच्छा पूर्वक नहीं होती मगर दिक्कत ये है जब वो पालन करता है ना स्थिति करता है जब वो धर्म धर्म का ज्ञान देता है पालन में स्थिति में तो वो धर्म का जब ज्ञान देता है तो वहां पर उनकी इच्छा है कि मैं इसको आगे बढ़ाऊं कि ना बढ़ाऊं तो ये सहायता हो गई चेतन की सहायता यहां हो गई और जड़ की सहायता वो ले ही रहा है। नहीं आपने क्या बोला लास्ट लाइन कि भाई धर्म का ज्ञान देने के लिए ईश्वर इच्छा करता है। ये बोलना चाह रहे हैं। मैंने इच्छा कहा क्या आप बार-बार इच्छा इच्छा में फसा के दूसरी ओर क्यों ले जा रहे हैं? मैं कह रहा हूं वो वो कार्य वो एक कार्य करता है कि नहीं करता है उनको ज्ञान देने का ऋषियों को ज्ञान देने का? हां बिल्कुल यह कार्य अनावश्यक है या फिर उसके चार कामों में से एक काम है? हां आवश्यक है। तो चार में से किसी एक में है ना वो ये अलग से एक्सिस्ट करता है। नहीं ये ईश्वर ने बनाई ही जो दुनिया वगैरह सब बनाया है जीव कल्याण के लिए और कल्याण के लिए धन को देना ही पड़ता। पूछा चार में से मैंने पूछा चार में से किसी एक काम में आता होगा ना धर्म का क्या ज्ञान देना? चार में से अगर आप

00:33:04:26 ये चार पांच ये तो फिर [हंसी] आप मैंने ये बोला ही नहीं कि ये चार में ये चीजें नहीं आती है। ये फिर आप समझने की गलती कर रहे हैं। ये मैंने कभी नहीं बोला। आती है। बोल दीजिए आती है चार में से। अब आप ये ये सवाल पहले ही पूछ लीजिए। आप इतना लंबा लाने की जरूरत नहीं है। आप पूछ लीजिए ना मुझसे पहले से ही। मतलब अब अब आप ये टॉपिक नहीं आप जो टॉपिक चल रहा है वो नहीं डिसाइड वो ये कहेंगे आपने पहले क्यों नहीं पूछा। ये है मतलब मैं ऐसा करके आया हूं कि आपको किस किस वे में आपसे स्ट्रक्चर [गला साफ़ करने की आवाज़] में आपसे क्वेश्चन अब इस बात पे हमारी चर्चा होगी कि मैंने पहले क्या नहीं पूछा बाद में क्या नहीं पूछा मैं पूछ रहा हूं ये जो धर्म का ज्ञान है देना है ये आवश्यक कार्य है ना हां आवश्यक है हां तो अच्छा मैं एक लाइन एक लाइन बोल देता हूं एक लाइन बोल देता हूं तो उससे थोड़ा क्लेरिटी आ जाएगी ईश्वर जितने भी कार्य करता है सारे ही आवश्यक है अनावश्यक कुछ भी नहीं करता ठीक है? तो यह जो धर्म का ज्ञान देना है, यह उसके चार में से एक काम में आ गया। हम इसको स्थिति में मान लेते हैं। पालन में हां, किसी में मान सब में आएगा। वैसे तो किसी में मान ले। सृष्टि सृष्टि रचना में मान ले क्या? हां सब में ही आएगा क्योंकि ईश्वर रचना के लिए धर्म सृष्टि रचना सृष्टि रचना के लिए

00:34:20:16 ये ज्ञान देना आवश्यक हो गया। क्योंकि रचना कर रचना के लिए ज्ञान देना आवश्यक नहीं। रचना कर किसके लिए रहा है? जीवात्मा के लिए तो कर रहा है। तो अल्टीमेटली जीवात्मा के कल्याण के लिए भाई फिर तो पालन जीवात्मा के आप ना आप खामखा उसको खींच रहे हैं बात को। ऐसे अगर ऐसे अगर सृष्टि रचना में ही सब कुछ आ गया तो आप पालन को भी रचना में डाल दो। आप प्रलय को भी रचना में डाल दो। आप कर्म फल नहीं एक मिनट अब मुझे बोलने दीजिए। आप कर्म फल को भी रचना में डाल दो। पता नहीं क्यों स्पष्टता से दूर रहना मैं मैं क्योंकि मैं मैंने ठीक है मैं मैं बोल देता हूं स्पष्टता से दूर नहीं मैं इस मतलब ये जो आप बोल रहे हैं ना मैं हर चीज को आवश्यक कार्यों के अंदर पूरी एक उसमें डाल के चल रहा हूं ऐसे तीन चार पांच ऐसे ये नहीं करके चल रहा हूं इसमें इसकी आवश्यकता भी नहीं है करने की इसलिए मैंने बोल दिया कि आप सब आवश्यकता है पालन सृष्टि के पालन में धर्म का ज्ञान देना एक अंग है और उसके लिए वो चेतन की सहायता ले रहा है कि धर्म कैसे स्थापित हो दुनिया दुनिया में कि चार ऋषियों को ज्ञान दो। नहीं तो सारे नास्तिक हैं। जानवर हैं। धर्म नहीं है। माता कौन है? पत्नी कौन है? बहन कौन है? नहीं पता। सीधी

00:35:35:22 बात धर्म का ज्ञान दे रहा है। और उसके लिए सहायता ठीक है। मैं मैंने पहले ही बता दिया। सहायता किस दृष्टि से ले रहा है और किस दृष्टि से नहीं ले रहा है। मैंने एक्सप्लेन कर दिया। आप आप अंतर बता दीजिए कि मनुष्य ऐसा ऐसा काम करता है। यहां पे देखिए वो बाधित हो रहा है और देखिए ईश्वर ऐसा-सा नहीं करता है इसलिए बाधित नहीं होता है। अंतर बताइए उदाहरण के साथ जी मतलब समझा नहीं मैं कैसे मनुष्य क्या कर सकता है? ईश्वर क्या कर सकता है? मैंने आपने कहा ईश्वर बिना किसी की सहायता के अपने सारे कार्य कर सकता है। ठीक है? अपने सारे कार्य कर सकता है। इसलिए वो सर्वशक्तिमान है। अब आप मुझे उदाहरणार्थ बताइए कि मनुष्य ने ये यहां पर देखिए मनुष्य का मनुष्य कोई भी अपना कार्य बिना किसी की सहायता के नहीं कर सकता। इसलिए मनुष्य जो है बाधित है और ईश्वर सर्वशक्तिमान है क्योंकि उसने इस इस तरीके से अपना कार्य बिना किसी की सहायता के किया। वो मुझे उदाहरणार्थ बता दीजिए। उदाहरण देते हुए। हां तो हां जीवात्मा जैसे सृष्टि रचना ही है। जीवात्मा जो है खुद से जो है मूल प्रकृति में बल या फिर कुछ मतलब मूल प्रकृति पर इन्फ्लुएंस नहीं कर सकती। खुद से ईश्वर करके जीवात्मा का ये काम है। नहीं कर सकती। मैं वही तो बोल रहा हूं। नहीं कर सकती। मनुष्य का यह काम

00:36:51:01 है भाई। आप मैं पूछ रहा हूं मनुष्य के जो जो काम है वो बिना किसी की सहायता के कर नहीं कर सकता। ऐसे करके मुझे उदाहरणार्थ बताइए। जैसे उसको सांस चाहिए सांस। मनुष्य को सांस लेनी है मान लीजिए तो उसको प्रकृति चाहिए, ऑक्सीजन चाहिए तो वो सांस ले पाएगा। है कि नहीं? है ना? या फिर उसको इधर उधर चलना फिरना है रोटी खानी तो उसे ईश्वर से ईश्वर के द्वारा मिलने वाली शक्ति चाहिए तो वो चल फिर पाएगा अपने भोजन पान की व्यवस्था कर पाएगा तो इस तरीके से जो मनुष्य है वो निर्भर हो गया ऐसे उदाहरण उदाहरण देते हुए अंतर करिए ईश्वर ईश्वर के कार्य और मनुष्य के कार्य में जी मैं उदाहरण मनुष्य कोई भी कार्य एक भी कार्य बिना सहायता कर ही नहीं सकता इसमें उदाहरण क्या देना आपको एक उदाहरण दे दीजिए तो मैं उससे नाप के दिखाऊंगा। यह मैंने बोतल ठीक है ये ये मैंने बोतल उठाई है अपने हाथों में यह मैं ईश्वर की सहायता के उठा बिना ईश्वर की सहायता के उठा ही नहीं सकता। ये ले लीजिए उदाहरण। अच्छा मतलब सबसे पहले तो एक चीज हो गई कि अगर किसी ने किसी को चाकू मारा तो वो बिना ईश्वर की सहायता के नहीं मार सकता। कुछ भी नहीं हो सकता। बिना ईश्वर की सहायता

00:38:06:02 के। एक भी कार्य बहुत बढ़िया। बहुत बढ़िया। बिना ईश्वर की सहायता के नहीं हो सकता। इसको रख लेना बात के लिए। अब दूसरी बात आ गई सहायता निमित हर कार्य में ईश्वर ही है ना बीच में इसमें मैंने ईश्वर के सस्टेन नहीं कर सकते इसमें मैंने ईश्वर की किस रूप में सहायता ली है किस रूप में सहायता ली है चेतन के रूप में

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00:38:26:12 या जड़ के रूप में समझा नहीं क्या मतलब जड़ के रूप में चेतन के रूप में मतलब जब मैंने बोतल उठाई जब मैंने बोतल उठाई तो ईश्वर की मैंने सहायता किस रूप में ली है एक एक सहायता इस रूप में ली है क्योंकि जो बोतल है या कुछ भी है वह संसार एक्सिस्ट करने के लिए जिस प्रकार जो बेसिकली विज्ञान के जितने भी नियम है उनकी वजह से जो है हर चीज एक्सिस्ट कर रही है मेरा शरीर भी ठीक है तो आत्मा जो है अपने अंदर चेष्टा करती है और बाकी चेष्टा के बाद बीच में जितनी भी चीजें आती है वो सारी ईश्वर की सहायता से ही होती है ईश्वर के निमित्त से होती है यानी मैं एज एन आत्मा खुद से शरीर नहीं बना सकता। खुद से कुछ भी नहीं कर सकता। खुद से मोशन कुछ भी नहीं कर सकता। शरीर बनाना आत्मा का काम है ही नहीं। आत्मा का कार्य तो अभी हम मनुष्य की बात कर रहे हैं। पहली बात तो मनुष्य का कार्य तो खाना खाना है। उसका कार्य मैं मनुष्य थोड़ी मैं तो मैं तो आत्मा आत्मा की दृष्टि से बता रहा हूं ना आपको। तो मैंने तो आपसे पूछा है ना? मनुष्य से पूछा है ना मैंने आपसे। अच्छा आप आप स्पेसिफाई स्पेसिफाई करिए। कौन कौन सी चीज की बात कर एक उदाहरण आप मैं स्पेसिफाई

00:39:41:27 कर दिया। मनुष्य और ईश्वर के कार्य में अंतर बताइए कि कैसे मनुष्य बाधित है और कैसे ईश्वर अपने कार्य कर लेने पर सर्वशक्तिमान है। ऐसे अंतर बताइए मनुष्य के कार्यों से क्योंकि यह कहा जाता है कि मनुष्य अपने सारे कार्य जो है वो करने के लिए किसी ना किसी की सहायता लेता है और वो नहीं लेता है। अब इसमें बात ये आती है जैसे आपने कहा कि बोतल को उठाया तो बोतल को उठाया इसमें ईश्वर ने किस रूप में सहायता की? ईश्वर ने सहायता की जड़ रूप में चेतन रूप में नहीं की। हालांकि वह चेतन है पर यहां पर उसने अपने आप को न्यूट्रल दिखाया। आप मेरी शक्ति में नहीं नहीं चेतन रूप में की है। चेतन रूप में ही की है। इस बोतल को धारण करने में मतलब इस बतल के एक्सिस्ट होने में या फिर जितनी भी चीजें हैं बीच में सब कुछ एक्सिस्ट होने के लिए ईश्वर चेतन रूप से ही रचना मतलब धारण किए हो है ना। मूल प्रकृति को जितना भी मोशन में रखे हो ईश्वर क्योंकि ईश्वर मोशन में नहीं रखा हुआ होगा बाकी एक्सिस्ट नहीं करेगी जहां पर चाकू चल रहा होता है वहां ईश्वर बुद्धि पूर्वक सहायता करता है चाकू मारने वाले की हां आप अब आप उस मतलब उस बात पे आए आप ये बोलना चाह रहे हैं क्या ईश्वर मेरे उस एक्शन को मैंने इन्फ्लुएंस नहीं कर रहा है अगर मैं चाहता हूं किसी को चाकू मारना

00:40:57:01 तो उसमें ईश्वर बुद्धि पूर्वक वहां पर उपलब्ध होता है बुद्धि पूर्वक उसका भी चयन बुद्धि पूर्वक मतलब बिना बुद्धि पूर्वक उपलब्ध होता बुद्धि पूर्वक ये क्या बात हुई बिना बुद्धि पूर्वक कहां उपलब्ध होता है आप कह रहे हैं चेतन आप कह रहे हैं चेतन रूप में वो इनकी सहायता कर रहा है मनुष्यों की कोई भी कार्य करने में है ना हर छोटे से छोटा कार्य चेतन

00:41:18:00 चेतन चेतन रूप का मतलब क्या समझ रहे हैं आप मुझे बता दीजिए पहले चेतन रूप का मतलब किस प्रकार बता देता हूं बता देता हूं बता देता हूं जैसे मेरे पास मेरे पास एनर्जी है खाना खाया तो इस समय जो मेरी एनर्जी है ना अगर मैं भौतिक दृष्टि से देखूंगा तो यह एनर्जी मेरे लिए क्या कहते हैं ऐसी है कि इसके पास अपना कोई प्रज्ञा नहीं है या बुद्धि नहीं है या वहां पर कोई भी दिमाग अक्ल इस तरह की कोई चीज नहीं निर्णायक क्षमता नहीं है मैं जैसा इसको उपयोग करना चाहता हूं मैं जैसा इसको उपयोग करना चाहता हूं वो हो रही है उपयोग अब अगर आप यह कहेंगे जो शक्ति है जिसका मैं अपने मन मुताबिक उपयोग कर रहा हूं यह जड़ रूप से है तो यह मानना पड़ेगा कि ईश्वर यहां चेतन होते हुए भी जड़ के रूप में उपस्थित हो रहा है तो हम उसके उसकी सहायता ले रहे हैं। ठीक? चेतन होते हुए भी जड़ रूप में उपस्थित हो रहा है तो हम उसकी सहायता ले रहे हैं। और या फिर यह मानना पड़ेगा कि ईश्वर ईश्वर जो है बुद्धि पूर्वक हमारे समस्त कार्यों में उतना ही भागीदार होता है जितना हम होते हैं। वही ना भागीदारी यानी निर्णय लेने में ईश्वर का कितना भागीदारी है। यही बोलना चाह रहे ना अल्टीमेटली यही सवाल है आपका। यही बोला आपने अभी मैं मैं इस पर चर्चा आगे नहीं

00:42:33:03 बढ़ाना चाह रहा हूं। यह तो मैं बाद के लिए रख रहा हूं। वो मुझे बस इतना बता दीजिए कि वो जड़ के रूप में उपयोग होता होता है ईश्वर शक्ति जड़ के रूप में या चेतन के रूप में होती है। ये बता दीजिए बस फिर बाद में बात कर लेंगे इस बारे में। अभी वो सर्वशक्तिमान वाला चल रहा है। वो चलता रहेगा। जी देखिए जड़ के रूप में फिर वही बात है ना। जड़ के रूप में नहीं चेतन सत्ता के रूप में अवेलेबल है। जड़ के रूप में मूल प्रकृति अवेलेबल है। जड़ के रूप में ईश्वर नहीं ईश्वर से इंटरेक्शन नहीं करते। बात को समझ थोड़ा सा स्ट्रक्चरल वे में चाहिए। बात ये अभी हो रही है कि मनुष्य जो भी काम करता है उसमें ईश्वर सहायक होता है। ठीक है? तो क्योंकि ईश्वर तो चेतन है। ईश्वर चेतन है ना? तो तो मैं यहां पर आपसे ये पूछ रहा हूं कि चेतन होते हुए भी वो जड़ जैसा बिहेव करता है क्या? चेतन होते हुए भी नहीं करता। तो इसका मतलब वहां पर वो जो ईश्वर की सहायता ली जा रही है वो ईश्वर की चेतना के साथ ली जा रही है। मतलब चेतना भी वहां इन्वॉल्व है। ईश्वर एक ईश्वर का निर्णय है वहां पर। ईश्वर की सत्ता है। निर्णय नहीं है। वही तो आप गलती कर रहे हैं। निर्णय नहीं है। निर्णय मेरा स्वयं

00:43:48:12 का है। निर्णय में ईश्वर ने कैसे आ सकता है? आप क्या बात कर रहे हो? तो निर्णय आएगा नहीं। निर्णय नहीं है तो वो जड़ जड़ के बिहेव कर रहा है। हां नहीं आप शब्दों का चुनाव आप शब्दों का चुनाव गलत कर रहे हैं। मैं बताता हूं मैं बताता हूं कैसे जड़ को ईश्वर ने धारण किए हुआ। जड़ के रूप में ईश्वर बिहेव नहीं कर रहा है। जड़ को ये ईश्वर ने खुद जो है जड़ को यानी मूड प्रकृति देखो धारण किए हुए इसलिए एक्सिस्टेंस है सारी। ईश्वर खुद नहीं बिहेव कर रहा है उस रूप में या फिर हां रूप यानी ईश्वर का फॉर्म ट्रांसफॉर्म नहीं हो रहा है जिस प्रकार से आप ले जाना चाहे बात को वो नहीं हो रहा है ईश्वर निर्णायक रूप से बिल्कुल नहीं सहायता कर रहा है ईश्वर ने जो है ऐसा कह लीजिए कि बना रखी है हमारे लिए है वो बुद्धि है फिर भी वहां पर अपनी बुद्धि पूर्वक वहां पर हस्तक्षेप नहीं कर रहा है इसका मतलब कि मैं डला हुआ हूं आप मुझे जैसा उपयोग में लेना चाहते हो ले सकते हो यही जड़ होता है इसी को मैं जड़ कह रहा हूं ऐसा ही कर रहा

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00:44:42:12 है ईश्वर नहीं मूल प्रकृति आप मुझे का शब्द मुझे का शब्द ईश्वर के लिए उपयोग कर रहे हैं ना वो गलत कर रहे हैं आप मूल प्रकृति का जो सुनिए सुनिए सुनिए मूल प्रकृति की बात भी कर ले प्रकृति ये है उपादान मैं इस थोड़ा सा इस कंक्लूड कर दूं फिर आप अगली बात करना थोड़ा सा आप कंफ्यूज हो रहे हैं मूल प्रकृति जो प्रकृति है ना वो उपादान कारण है जिससे सब कुछ बना हुआ है है ना जिसको अब हम छू भी रहे हैं बाद में। ठीक है? छू रहे हैं ना स्पर्श रूप रस रूप रस स्पर्श गंध इत्यादि उसमें गुण है। ये तो हो गई प्रकृति। मगर ये प्रकृति रूपी पदार्थों को गति कराने के लिए जो मैं कर रहा हूं। गति ये प्रकृति थोड़ी ना है। ये तो भगवान की शक्ति है।

00:45:31:22 ये प्रकृति नहीं है। ये बोलना चाह रहे। अरे अरे भाई ये प्रकृति है। मगर जो मैं इसमें गलती कराने के लिए फोर्स का इस्तेमाल कर रहा हूं। फोर्स फोर्स क्यों लग रही है? फोर्स वो प्रकृति ना है। वो भी प्रकृति है। वो भी प्रकृति फोर्स तो सारी प्रकृति से ही लगती है ना। मतलब ईश्वर फोर्स बलवान नहीं है। वो बल जो है प्रकृति में है। अब वही है ना फोर्स की जो डेफिनेशन आप लेंगे पुष्प पुल वाली तो वो तो मूल प्रकृति के वजह से पुष्प पुल एक्सिस्ट करता है। लेकिन ईश्वर में क्या स्वयं से बल है? आपका सवाल ये है कि ईश्वर में क्या स्वयं से बल है कि मूल प्रकृति में कंपन करा दे वो सामर्थ्य है या नहीं? तो वो तो है ईश्वर में। बिल्कुल आप कंफ्यूज कर रहे हैं। ईश्वर का जो बल है और इस वाले फोर्स को आप दोनों को मिक्स कर रहे हैं। गलत है ये। अच्छा अच्छा मैं मैं क्लियर कर लेता हूं। यानी कि जब कोई मनुष्य कार्य करता है तो ईश्वर की सहायता से नहीं करता है। वो प्रकृति से ही करता है।

00:46:36:00 मैंने एक्सप्लेन कर तो दिया। किस तरीके से एक्सप्लेन कर दिया भाई साहब। मैं पूछ रहा हूं आपसे। आपने कहा था ईश्वर की सहायता के बिना नहीं कर सकता। मैंने कोई काम बताया तो आप कह रहे हो नहीं प्रकृति हर तरह से यूज़ हो रही है। जो उपादान कारण के रूप में भी यूज़ हो रही है। उसको गतिमान कराने वाले कारण के रूप में भी वही है। यही कह रहे हो ना? तो फिर ईश्वर की ईश्वर का उपयोग कहां हो गया? ईश्वर की सहायता कहां हो गई? इसमें ईश्वर की सहायता ये है कि उस मूल प्रकृति को बनाए रखने या फिर उस मूल प्रकृति में अभी अभी भी तो इसमें गति हो रही है। इसमें अभी गति नहीं हो रही है। क्या? ठीक है। अभी इस चीज में गति हो रही है। तो वह गति कौन कर रहा है?

00:47:14:02 बताइए यानी कि यानी कि प्रकृति में जो गति आ रही है वह ईश्वर से ही आ रही है। हां प्रकृति में जो गति आ रही है वो ईश्वर से ही आ रही है ना। हां हां अब ईश्वर ने जो है संसार बना रखा है। प्रकृति सब कुछ बना रखा है। निर्णय लेने में ईश्वर का कोई इन्फ्लुएंस नहीं है। आप जिस ला रहे थे कि बुद्धि पूर्वक एक्सिस्ट। नहीं नहीं नहीं मैं मैं मैंने अभी यहां पर है हम लोग कि प्रकृति में जो गति हो गति आ रही है वो ईश्वर से आ रही है। गति होने की शक्ति

00:47:48:26 गति होने की शक्ति प्रकृति में नहीं आ रही। गति होने की शक्ति ईश्वर में वो शक्ति या फिर सामर्थ ईश्वर में है। उस सामर्थ की वजह से ईश्वर प्रकृति में गति करवा रहा है। ट्रांसफर नहीं हो जा रही है। यानी की जो यानी की जो गति है वो ईश्वर के कारण है ना? जड़ पदार्थों में जो गति है वो ईश्वर के कारण है ना? बिल्कुल बिल्कुल गति है जो ईश्वर के कारण है। यानी कि कोई जड़ पदार्थ जब मैं हिला रहा हूं ईश्वर स्वयं हिला रहा है तो वो तो उसके कार्य हो गए। जब मैं हिला रहा हूं तो उसमें ये देखा जाएगा मेरी इंटेंशन क्या है? उसके हिसाब से पाप पुण्य मुझे लगेगा। हालांकि हालांकि हालांकि हालांकि जड़ पदार्थ को गति जब मैंने भी कराई है तब भी ईश्वर की ही शक्ति का उपयोग हुआ है। आप वही तो मैं बोल रहा हूं। आप आत्मा की दृष्टि से आप कुछ कर ही नहीं रहे हो कि आप मनुष्य नहीं हो आप आत्मा हो जब आप बोलते हो मैं इसलिए मैंने शुरुआत में ही वो जवाब दे दिया था आपको कि आत्मा केवल चेष्टा करती है बाकी मैंने चेष्टा की उसके बाद बीच के जितने भी प्रोसेससेस हैं जो जिसमें मेरा इन्फ्लुएंस हो ही नहीं सकता आत्मा कुछ कर नहीं सकती वो सारा ईश्वर ही कर रहा है बीच में जितने भी सारी प्रोसेससेस है गुड समझे आप गुड आत्मा ने आत्मा ने प्रेरणा की और फिर ईश्वर ने सब कुछ किया उसमें आत्मा कुछ नहीं कर सकती ये हो गया हां मान आत्मा कुछ नहीं कर सकती। नहीं आत्मा ही प्रेरणा कर

00:49:04:00 रही है। जी आत्मा ने प्रेरणा की और ईश्वर ने सारी प्रोसेसिंग कर दी। हम ठीक है। तो अब ईश्वर यहां पर जड़ के रूप में उपयोगित हुआ ना। जड़ के रूप में उपयोग होने का मतलब क्या है? आप मतलब ही गलत समझ। बताइए। प्रयोगित होने का मतलब यह है कि ईश्वर स्वतंत्र है। ईश्वर जो है बुद्धिमान है। ईश्वर सर्वशक्तिमान है। [गला साफ़ करने की आवाज़] ईश्वर चेतन है। उसके पास अपना निर्णय लेने की क्षमता है कि वो क्या करता है, क्या नहीं करता है। सारी क्षमता है ना? मगर उसने मुझे उसने प्रेरणा की। जीव ने प्रेरणा की कि मुझे किसी को चाकू मारना है। वो सारी प्रोसेससेस उसने कर दी ईश्वर ने। तो ईश्वर ने यहां पे अपना जो स्वतंत्र होने वाला वो था व्यवहार कि भाई मेरे पास अपनी नॉलेज है मेरे पास अपनी निर्णायक क्षमता है उसको एक साइड रखते हुए उसने जीव के अनुसार जो वो करना चाहता था वो कर दिया यही तो हुआ मतलब ये तो हां ये स्वतंत्र का अर्थ क्या है सर ये बताइए आप लोग स्वतंत्र का अर्थ क्या आप ये लेते हैं कि ईश्वर अपने जो गुण है गुण स्वभाव है जो ईश्वर उसके विपरीत जाके कोई कार्य आप ना आप किसी बात को नहीं आपने सही बात सही बात बोली

00:50:19:06 आपने तो आप पहले उसको क्लेम को कर दीजिए कि हां ईश्वर ने ऐसा ही कार्य किया है नहीं क्योंकि उसमें समस्या ये है कि आप जो जब शब्दों का अर्थ आप वो नहीं समझ रहे हैं जो मैं समझ रहा क्योंकि शब्दों के अर्थ में वो आप समझाइए वो आप समझाइए पहले हेडलाइन बता दीजिए ईश्वर ने क्षमता चेतन होते हुए भी पूरी तरीके से जीव के ऊपर निर्भर रहते हुए वो कार्य कर दिया। जीव की बुद्धि पर निर्भर रहते हुए वो कार्य कर दिया। ये हो गया। तो जीव की

00:50:55:01 अपनी बुद्धि उसमें नहीं लगाई। ठीक है। तो यहां पर ईश्वर जड़ जड़ के तरीके से ही तो उपयोगित हुआ। जीव के द्वारा फिर वही बात है ना। जड़ के तरीके से उपयोग नहीं हुआ। देखिए देखिए मैं बताऊं। चेतन के तरीके से उपयोग क्या होगा? जैसे कि ये आप अपने हिसाब से फिर शब्द अपने हिसाब से परिभाषा बना रहे ना आप नहीं बात एक मिनट जैसे जैसे कि मान लीजिए जैसे कि मेरा कोई मित्र है मैंने कहा कि भाई बैंक डकैती डालनी है। ठीक है हम बैंक डकैती डालनी है। तो मित्र ने कहा अब मित्र की मुझे सहायता चाहिए क्योंकि वहां पर मुझे एक से ज्यादा अपने से ज्यादा और चेतन चाहिए। है ना? मुझे वहां पर और लोग भी चाहिए जो अपना दिमाग यूज़ कर सकें। केवल मेरे पास ये नहीं कि मेरे पास जड़ पदार्थ हो केवल मशीन गन वगैरह मुझे जो है और भी चीजें चाहिए वहां पर बैंक डकैती के लिए। मगर मेरा जो मित्र है उसने मुझे परामर्श दिया कि यार इसमें जो है ये बाधा हो सकती तो ये जेल हो सकती है। ये परामर्श भी दिया। इसके साथ ही साथ [गला साफ़ करने की आवाज़] अगर मैं नहीं माना और वह भी मान गया तो फिर उसने मुझे चेतन होने के जरिए और

00:52:10:04 भी चीजें उपलब्ध करवाई। जैसे कुछ प्लान था उसमें कमी थी तो उसने और प्लान को दुरुस्त किया। ये हो गया। ये हो गया। मैंने किसी चेतन की सहायता ली। ठीक। अब मेरे साथ में एक रोबोट खड़ा हुआ है। और मैं उस रोबोट को ले जाकर के यूज़ कर लूं। तो मैंने चेतन की सहायता नहीं ली। भले ही उस रोबोट में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंसी थी मगर मैंने उसकी सहायता नहीं ली। मुझे मैंने उससे उसका कोई दिमाग का उपयोग नहीं लिया। मैंने उसको एज इट इज जाकर के यूज कर लिया। तो मैंने उसके जड़ रूप में सहायता ली। या फिर कोई मनुष्य ही रख लीजिए जो है चेतन वाला। मगर वो इतना ज्यादा मेरे ऊपर डिपेंड है कि मैंने उससे जब सहायता मांगी तो उसने कहा भाई मेरे शरीर का तुम्हें जैसे उपयोग करना है वैसे कर लो तो ये हो गया वो न्यूट्रल रहा जैसे करना है करना है नहीं करना है वो तुम कर लो तो जब ईश्वर ईश्वर ईश्वर की सहायता ले रहा है जीव अपने कार्य करने में बीच में तो थोड़ा हम लोग वो हो गए थे ट्रैक भदक भटक गया था बीच में हम यहां चले गए थे कि भाई वो आप यह कहने लगे थे नहीं नहीं वो प्रकृति करती है वो केवल

00:53:25:10 ईश्वर ने एक बार दे दिया काम खत्म करती प्रकृति है हालांकि एक बार दे दिया नहीं नहीं नहीं ये फिर आप गलत बोल रहे हैं ये नहीं बोला था आपने आपने बोला था आपने बोला था जो जो कार्य कर रही है वो प्रकृति कर रही है ईश्वर कोई कार्य फिर उसके बाद बात आई प्रकृति में तो इस समय भी गति हो रही है बोतल के अंदर वो कौन कर रहा है फिर मैंने और डीपली पूछा तो आपने फिर ये माना कि नहीं नहीं सारे कार्य ईश्वर ही कर रहा है जीव तो केवल इच्छा कर रहा है। ये सब हो चुका है। आप देखिए केवल ठीक है। छोड़िए आप क्योंकि मैंने ऐसा मैंने क्या बोला था वो है उसमें रहेगा। हम तो अब आप यहां पर अब हम यहां पर आ गए हैं कि

00:54:07:06 ईश्वर की स्वतंत्र बुद्धि लेने की निर्णायक लेने की क्षमता होते हुए भी फुली पूरी तरीके से वो डिपेंड होता है वहां जीव के ऊपर और जो है वो वहां बिहेव करता है कि उसका जैसा उपयोग वो करना चाहता है उसकी सीमा में जो आ सकता है वो कर लेता है। जैसा भी उपयोग वो करना चाहता है। अब मैं बोलूं इसका उत्तर। हां बोलिए। जी बोलिए। इसका जवाब यह है कि जो संसार बना है ईश्वर ने बनाया है ईश्वर की खुद की ईश्वर का खुद का गुण है कि उस गुण की वजह से ईश्वर ने संसार बनाया है। और वो संसार ईश्वर ने खुद से ही जानबूझकर ऐसा बनाया है कि हमारी कर्म करने की स्वतंत्रता बनी रहे। ठीक है? अब कर्म करने की स्वतंत्रता बनी रहे। ये अह क्या बोलना चाहिए? ये जो मर्जी है वो ईश्वर की है। ईश्वर ही चाहता है कि हमारे पास कर्म करने की सुंदरता बनी रहे। ठीक है? ऐसा मैंने क्या कहा? देखिए है क्या? कंप्लीट कर सुन लीजिए ना टोकिए मत बीच में। ये जरूरी है कंप्लीट करना। अच्छा कर लीजिए। इसमें क्या समझ मुझे कंप्लीट करने दीजिए ना पूरा पॉइंट। कर लीजिए कर लीजिए। तो ये जो हम ये जो संसार में क्या बोल रहा हूं? कर्म करने की स्वतंत्रता जो है ईश्वर की

00:55:22:26 हमारी सॉरी तो यह ईश्वर अपनी मर्जी से बनाता है और ईश्वर चाहता है कि मतलब चाहता है शब्द गलत हो जाएगा ईश्वर खुद से ये चलो चाहता ही ले लो अभी के लिए क्योंकि फिर अभी बेटर अवार्ड ईश्वर खुद ही चाहता है कि हम जो है कर्म स्वतंत्र स्वतंत्र रूप से करें इसीलिए ईश्वर ने हमें यह अवसर प्रदान कर रखा है और इस अवसर प्रदान करने में ही ये निहित है कि ईश्वर इंटरफेयर नहीं करेगा जिस प्रकार से हम इंटरफेरेंस करवाना चाह रहे हैं कि भाई या फिर आप बोल रहे हैं कि भाई बीच में क्या अपना चेतन रूप से क्या कोई प्रभाव डाल दे। ठीक है? एक तो ये बात है और एक दूसरी बात ये है कि आप जो बोल रहे जड़ रूप में प्रयोग में आता है वो शब्द गलत है। प्रोसेस मैंने आपको समझा दिया। अब शब्दों की आवश्यकता ही नहीं है क्योंकि मैंने पूरा एक्सप्लेन कर दिया। लेकिन आप अगर वो शब्द डालेंगे जो कि मैं करना चाहूंगा। वो शब्द नहीं डाल सकते। जड़ रूप में प्रयोग का जड़ रूप में प्रयोग मूल प्रकृति हो रही है। आप उसको किसी और सेंस में समझ रहे हैं तो उसको छोड़ दीजिए। अभी

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00:56:18:28 हम देखिए मैं आपसे दो रिक्वेस्ट करूंगा। एक उसको छोड़ दीजिए। इस बात का निर्णय ना करिए। उसमें आप पूछिए क्या नहीं चलो उसको मत छोड़िए। उस बात को मत छोड़िए। मैं मैं ये बोल रहा हूं उस बात को मत छोड़। बोलने के बाद इतनी देर बोलने के बाद मैं बोला हूं। आप प्लीज इंटरप मत करिए। पहली बात आप यह मत बोलिए कि उसको छोड़ दीजिए। इसमें आप तर्क वितर्क करिए कि उस उस पर बात क्यों करनी है? क्यों नहीं करनी है? अगर आपको लगता है। दूसरी बात आप यह मत कहिए कि एक चीज और थी। आपने इंटरप्ट करके बुलवा दी मुझे। आपने इंटरप्ट करके बुलवा दी। एक चीज और थी। छोड़ दीजिए वाला कंप्लीट कर दूं मैं। छोड़ दीजिए वाला। मतलब मेरा कहने का मतलब है। नहीं नहीं अभी कुछ मत बोलिए। आप दो मिनट प्लीज शांत रहिए। तो एक तो आप ये छोड़ दीजिए वाली बात मत बोलिए। और एक बात और आपने बोली थी वो मैं रिवाइंड करके देखना पड़ेगा। खैर अभी इस पर ही चलते हैं हम लोग जो बात चल रही है। अब इसमें [गला साफ़ करने की आवाज़] ऐसा है कि एक व्यक्ति मैंने फिर पूछा कि जड़ रूप में उसे नहीं कह सकते हैं। यानी कि ईश्वर वहां बुद्धि पूर्वक देखिए हां प्रश्न यह था। मूल प्रश्न यह था।

00:57:26:21 आपने जवाब क्या दिया है? कि ईश्वर ने कर्म फल करने की स्वतंत्रता दी है। इसलिए वह वहां पर कुछ हस्तक्षेप नहीं करता है। ठीक है? बोलता नहीं है बीच में। यही कहा ना आपने? पर मैं ये पूछ रहा हूं कि इसका मतलब यह है कर्म फल की स्वतंत्रता देने के कारण ईश्वर वहां पे जड़ की तरह से व्यवहार करता है ना। उसका व्यवहार क्या हुआ वहां पर? कैसा व्यवहार हुआ? जड़ का व्यवहार का हुआ। अगर जड़ का व्यवहार हुआ जैसे कि मान लीजिए ईश्वर की शक्ति है। मैं मैं [गला साफ़ करने की आवाज़] शब्द दे देता हूं आपको। आप थोड़ा थोड़ा इंटरफेर कर रहा हूं। यह कंप्लीट हो जाएगा एक पॉइंट। आप जड़ शब्द को हटा दीजिए। आप आप सिंपली यह बोलना चाह रहे हैं कि ईश्वर पैसिवली पैसिवली समझ रहे एक्टिवली या पैसिवली तो ईश्वर वहां पर है। कुछ कर नहीं रहा है। बीच में हस्तक्षेप नहीं कर रहा है निर्णायक रूप से और ईश्वर बस वहां पर है। एक्सिस्ट कर रहा है। इसको ये रख दीजिए। जड़ जड़ रूप। जड़ रूप बोलेंगे तो फिर वो गलत हो जाएगा। जड़ रूप उसमें उसमें बात है। एक बात उठाई जाती है। ईश्वर लीला कर सकता है कि नहीं? एक बात उठाई जाती है। मैं यहां पर ईश्वर की लीला सिद्ध कर रहा हूं। समझे आप? क्या सिद्ध कर ईश्वर की लीला सिद्ध कर रहा हूं ना मैं यहां पे?

00:58:41:25 ईश्वर के पास निर्णय लेने की स्वतंत्र सत्ता है। ईश्वर चेतन है। ईश्वर बुद्धिमान है। सर्वशक्तिमान है। फिर भी वो अपने से निकृष्ट जो तत्व है अल्पज है जीव के द्वारा उपयोग होता है। न्यूट्रल रहता है। चाहे भले ही वो उसका उपयोग किसी भी कार्य में कर रहा हो। वो न्यूट्रल रहता है। तो यह जो ईश्वर का बिहेव है, यह बिहेव उसका जो चेतन स्वरूप है, सर्वशक्तिमत्ता का स्वरूप है, उसके विपरीत लीला है। अब वो करता क्यों है? वो बात एक अलग है। उसने लीला क्यों की? वो शांत क्यों रहा? वो चुप क्यों रहा? उसने अपने आप को उपयोग में क्यों आने दिया? इसके पास आपके अकॉर्डिंगली उसके पास एक लॉजिकल कारण है। क्योंकि वो कर्म फल के लिए स्वतंत्रता देता है जीव को। स्वतंत्रता देने के लिए ही ईश्वर वहां पर ऐसा बिहेव करता है जैसे कि उसके पास कोई बुद्धि है ही नहीं। पूरी बुद्धि जीभ लगा रहा है। उसकी शक्ति का उपयोग कर रहा है और मर्डर हो रहा है। चीजें हो रही है। ईश्वर वहां पर शांत रह रहा है। वो कोई भी हस्तक्षेप नहीं कर रहा। जैसा जीव के द्वारा उसको उपयोग किया जाना वैसा

00:59:56:28 होने दे रहा है। कारण आपने दिया है वह बात एक अलग है कि ऐसा करने का उसके पास एक कारण है। वो बात एक अलग है। मगर वो कर तो रहा है ना वहां पर लीला वो चेतन होते हुए भी वहां पर जड़ जैसा उपयोग में आ रहा है। जैसे मैं इस बोतल है। मैं इसको उठा रहा हूं। अब यह जो बोतल है प्रकृति तत्व जो इसमें है प्रकृति उसका इसमें कोई हस्तक्षेप नहीं है। उठाने अथवा ना उठाने। इसी प्रकार से इस बोतल को उठाने के लिए जो शक्ति एनर्जी यूज़ हुई जो कि ईश्वर से मुझे प्राप्त हो रही है उसने भी कोई हस्तक्षेप नहीं किया इसको उठाने ना उठाने हां वो तो है ही ना हस्तक्षेप तो मैंने प्लेन क्लियर कर दिया हस्तक्षेप बिल्कुल नहीं किया तो इसका मतलब ईश्वर यहां पर जड़ की तरह से बिहेव कर रहा है ना

01:00:47:06 जिस प्रकार आप चलो मैं इसको और अच्छे से रख देता हूं जिस प्रकार जड़ हस्तक्षेप नहीं कर रहा है वैसे ही उसी प्रकार ईश्वर भी हस्तक्षेप नहीं कर रहा। क्या आप यह बोलना चाह रहे हैं? हां हां ये बात सही है। लेकिन आप फिर उसको जड़ रूप एक शब्द दे देंगे ना वो मत दीजिए। मैं खाली उसके लिए छोड़ दीजिए। रुकिए ईश्वर का जो व्यवहार ईश्वर का जो व्यवहार यहां पर हुआ वो जड़ के जड़ जड़ पदार्थ के व्यवहार के समान हो गया ना। ईश्वर का जो व्यवहार हुआ जैसा जड़ जैसा जड़ पदार्थ व्यवहार कर रहा है। वैसा ही व्यवहार ईश्वर कर रहा है ना यहां पर। ये तो बोल ही रहा हूं। ये तो बोल ही बोला है मैंने। लेकिन आप मैंने छोड़ने वाली रुकिए रुकिए मैं क्लियर करूंगा। क्लियर करूंगा। छोड़ने वाली बात जो मैंने बोली वो जड़ रूप जो शब्द इस्तेमाल कर रहा थी क्योंकि उसका फिर मतलब कुछ और निकल कर रहा था। छोड़ने वाली बात इसलिए अगर आप हस्तक्षप नहीं रहे। इसीलिए इसीलिए बोला मैंने अब मैंने क्लियर कर दिया मेरा जड़ रूप क्या है कि यहां पर ईश्वर और जड़ के व्यवहार में समानता आ गई। बिल्कुल ना वो हस्तक्षेप कर रहा है जड़ और ना ईश्वर कर रहा है। अब जड़ तो जड़ है। तो जड़ है। जड़ तो [गला साफ़ करने की आवाज़] जड़ है। वो तो इसलिए कर ही नहीं सकता। मगर ईश्वर चेतन है। फिर भी वो जड़ जैसा व्यवहार कर रहा है। इसका मतलब यहां पे

01:02:02:09 वो लीला कर रहा है। जो वो नहीं है उसके जैसा बिहेव कर रहा

⬜ Not used yet · 01:02:06:14 – 01:02:44:19 (0:38)

01:02:06:14 है। अब मैं बता दूं वो वैसा ही है। अच्छा लीला का मतलब अपने मतलब ये है कि जो जैसा नहीं है वो बिहेव कर रहा है। ऐसा बोलना चाह रहा हूं। अब ईश्वर स्वतंत्रता की बात आ जाती है। आपने बोला था ईश्वर स्वतंत्र है। इसके विपरीत व्यवहार करने में भी स्वतंत्र है। फिर भी नहीं करता है। आप ये बोलना चाह रहे थे। तो इसीलिए मैंने स्वतंत्र शब्द पर बीच में रोका था आपको। आपने बोला था स्वतंत्र। तो स्वतंत्र का मतलब आप क्या कहना चाह रहे हैं कि क्या ईश्वर का जो व्यवहार करना चाहिए ईश्वर का सुनिए मैं कंप्लीट कर लूं आप। सवाल पूरा रख देता हूं। फिर आप आराम से जवाब देना। आप यह बोलना चाह रहे हो कि भाई ईश्वर

01:02:44:19 का जो गुण कर्म स्वभाव है जो आप भी मानते हैं कुछ ना कुछ है उसके विपरीत जाके कुछ कार्य कर सकने की स्वतंत्रता ईश्वर के पास है या नहीं ये सवाल है ना आपका मुझसे नहीं ये सवाल है ही नहीं वो

⬜ Not used yet · 01:02:57:15 – 01:03:53:06 (0:56)

01:02:57:15 तो बाद की बात है कि हम उसको उसके व्यवहार नहीं आपने बोला ना कि ईश्वर आपने जब आपने जब सुनिए सुनिए रुकिए रुकिए आपने जब कंक्लूजन दिया था अपनी बात का आपने ये बोला था कि आपके यहां पर ईश्वर के पास स्वतंत्रता है कि ईश्वर आपके उपयोग में आए आए या नहीं आए फिर भी देखिए आपके उपयोग में आ रहा है पैसिवली करवाया जा रहा है सब कुछ तो आप यह मानते हो ना कि भाई उसके अलावा ईश्वर उस रूप में मतलब उस प्रकृति के मतलब जो भी व्यवहार में आ रहा है व्यवहार नहीं आपने क्या बोला था यार हमारे उपयोग में आ रहा है तो उस तरीके से उपयोग में ना आए हालांकि ईश्वर डायरेक्टली उपयोग में नहीं आ रहा मूल प्रकृति बीच में साधन तो वही है तो उस तरीके से उपयोग में ना आए इस प्रकार की स्वतंत्रता ईश्वर के पास है आपने ये बात बोल करके अपनी बात कंप्लीट की थी तो वो मैं पूछ रहा हूं आपसे तो आप यही बोलना चाह रहे हो कि इस प्रकार की स्वतंत्रता ईश्वर के पास है। ऐसा मैं मानता हूं। आप ये पूछना चाह रहे हैं मुझसे। स्वतंत्र स्वतंत्रता आपने उस का्टेक्स्ट में यूज़ किया। स्वतंत्रता का मतलब ये है कि उस उसके अलावा कुछ करने का ऑप्शन था। आप ये पूछना चाह रहे हैं।

01:03:53:06 ईश्वर चेतन है। हां। चेतन है। वो एक जीव के अकॉर्डिंगली कार्यरत हो रहा है ना। नहीं हो रहा। बोल रहा हूं। जीव ईश्वर जो हां मैं बता देता हूं। ईश्वर के अकॉर्डिंग ही कर्म कर्म फल करने की स्वतंत्रता प्रदान ईश्वर ने की है और उसके अकॉर्डिंग ईश्वर का में आ रहा है। आप उसको गलत तरीके से ले रहे हैं। आप अगर ईश्वर के अकॉर्डिंग जीव के निर्णय कर दोगे तो फिर तो सीधे-सीधे मर्डर का निर्णय फिर वही फिर वही बात है। फिर जो बात मैंने बोली नहीं आप वो बोल रहे निर्णय की बात मैंने बोली नहीं। तो मैं बोल रहा हूं। मैं आप देखिए क्या करें? कान को इधर से पकड़ ले। कान को इधर से पकड़ ले। वो जीव के अनुसार चल रहा है ईश्वर या जीव उसके अनुसार चल रहा है ये बता दीजिए। कर्म करने वाली बात जो है कर्म करने वाली जो बात चल रही है उसमें जीव के अनुसार ईश्वर काम कर रहा है या ईश्वर के अनुसार जीव काम कर रहा है? बताइए जीव के अनुसार काम करना ही ईश्वर के अनुसार है। अब ये दिक्कत हो जाएगी समझने में। यानी वही मैं समझ गया। आप जो भी कार्य आपने क्या किया है? जो जो चीजें आप स्वीकार करते हो उनको आपने कह दिया यह उसका कार्य इसलिए वो कर रहा है।

01:05:08:14 यह बात यह उसका कार्य इसलिए वो कर रहा है। कुल मिलाकर के सारी कहानियों के पीछे यही है कि आप पहले ये कर देते हैं कि ये उसका कार्य है इसलिए उसने किया और जो जो चीजें हमारी है क्योंकि वो उसका कार्य नहीं है। इसलिए वो नहीं कर सकता। अब ये जो अब ये जो उसका कार्य है अब ये जो उसका कार्य है वो उसने किया। यह फैसला कहां से होगा? यह प्रमाण से होगा। तर्क है नहीं इसमें कोई। क्या उसका कार्य है? क्या उसका कार्य नहीं है? फैसला प्रमाण से होगा। उसमें तर्क है नहीं। प्रमाण क्या है? वेद है। वेद का वो वो आंसर है जो हम करेंगे। यही यही बात आ गई। नहीं

⬜ Not used yet · 01:05:41:15 – 01:08:20:02 (2:39)

01:05:41:15 ये ये आप ये आप बोल रहे हैं। मैंने तो बोला ही नहीं है बात। ये आपने बात ये आप उस पॉइंट तक मैंने बोला ही नहीं। आपके हिसाब से निर्णायक बन रहे आप गलत बात। आपको निर्णायक नहीं बनना चाहिए। निर्णायक निर्णायक दूसरा वर्ड था। हां अच्छी बात आई। एक आपने छोड़ दीजिए कहा था वहां पर और एक दूसरा वर्ड था जो आपने निर्णय दिया था मैं रिवाइंड करके दिखाऊं आप निर्णायक बने थे अच्छा हुआ आपने याद दिला दिया मैं कहां मैं तो जितना बोला उतनी बार बोल भैया जो पीछे है जहां पे मैंने कहा था थोड़ा रिवाइंड करके दिखा दीजिए नहीं नहीं मैं पूछ आप सुना नहीं आपने सुन लीजिए मैं दिखाता हूं आपने निर्णय कहां दिया है मैं निर्णय दिखा रहा हूं आपने कहां दिया है दिखा दीजिए वहां पर जब अभी जहां मैं अटका था थोड़ी देर पहले जहां मैं भूल गया था

01:06:47:10 [संगीत] मैं अटका था थोड़ी देर पहले कि ऐसा करने का इसके पास आप एक्सिस्ट कर रहा इसको ये रख दीजिए। जड़ रूप जड़ रूप बोलेंगे तो फिर वो गलत हो जाएगा। हां ये बात सही है। इसका मतलब यहां नहीं आए फिर भी देखिए आपके उपयोग में आ रहा है पैसे। इसका मतलब जो और पीछे जहां मैं अटका था ना बुद्धि लेने की निर्णायक उसमें कमी थी तो उसने और प्लान को दुरुस्त किया। यहां पर ईश्वर जड़ क्षमता है उसको एक मैंने शुरुआत में ही वो जवाब दे दिया था आपको कि आत्मा केवल चेष्टा गति होने की शक्ति ईश्वर में वो शक्ति वाले के रूप में भी वही है ईश्वर जो है कि आप जो ठीक है बैंक डकैती डालनी है जड़ रूप में प्रयोग मूल वो गलत हो जाएगा तो वो अपने से जड़ जैसा उपयोग में आ रहा है जैसे मैंने प्ले ले ले बिल्कुल नहीं तो इसका मतलब ईश्वर कर रहा है ना यहां पर

01:07:57:13 हां सवाल पूरा रख देता हूं फिर आराम से जवाब हमारे उपयोग में आ रहा है उस तरीके से उपयोग में ना आए हालांकि ईश्वर डायरेक्टली उपयोग में नहीं आ रहा मूल प्रकृति बीच में साधन तो वही है तो उस तरीके से उपयोग में ना आए इस प्रकार की स्वतंत्रता ईश्वर के पास है आपने यह बात बोल करके अपनी बात कंप्लीट की थी तो वो मैं पूछ रहा हूं आपसे तो आप यही बोलना चाह रहे हो इस प्रकार की स्वतंत्र कर्म

01:08:20:02 करने वाली बात जो है कर्म करने वाली जो बात चल रही है उसमें जीव के अनुसार ईश्वर काम कर जहां

⬜ Not used yet · 01:08:27:08 – 01:09:29:27 (1:03)

01:08:27:08 मैं भूला हूं ना जहां जहां मैं भूला हूं वहां से ठीक एक दो मिनट पहले आप बोल रहे मैंने तो बोला ही नहीं है ये बात आपाइए ये चलाइए ये चलाइए मैंने कहा था थोड़ा रिवाइंड करके दिखा दीजिए अरे नहीं नहीं मैं पूछ आप सुना नहीं आपने सुन लीजिए भाई कोई टाइम टाइमिंग बता दो कोई वो कर रहा है के अनुसार चल रहा है ईश्वर चेतन है उसके अलावा कर ही नहीं सकता मगर ईश्वर जिस प्रकार जड़ांत रह रहा है चलिए कोई नहीं कोई नहीं ठीक है कोई बात नहीं इसको हम अगर कोई भाई कोई देख के थोड़ा सा रिपीटेशन में जहां पर भुला हूं तो मैं मैं जहां पर भला था वहां पर इनकी एक बात थी इसको छोड़ दीजिए तो छोड़ दीजिए वाली मुझे बात याद रही। फिर इन्होंने इंटरप्ट कर दिया तो उससे एक इन्होंने निर्णय भी दिया था वहां पर। अगर कोई है थोड़ा सा पीछे करके देख करके आए और यहां टाइमिंग बता दे तो मैं इनको दिखाऊंगा। इन्होंने निर्णय दिया था। अब

01:09:29:27 मैं बात कर रहा हूं यानी कि जो ईश्वर नहीं है उसके अनुसार बिहेव करना भी ईश्वर ने तय किया है कि मुझे ऐसा करना पड़ेगा। वही तो बोल रहा हूं। ईश्वर नहीं किया। जो ईश्वर है उसके अनुसार ही बिहेव कर रहा है। जो ईश्वर नहीं है उससे अनुसार बिहेव नहीं कर। यानी कि ईश्वर के अनुसार ईश्वर के ईश्वर के उसमें स्वरूप में लीला करना भी आ गया ना। लीला करना क्या है? नहीं आया। लीला सुनिए आप आपने अभी बोला लीला करना यानी स्वरूप में के विरुद्ध जाना। अब मैं जब स्वरूप के विरुद्ध जाना मान ही नहीं रहा हूं तो लीला कहां से आई? बीच में लीला आएगी नहीं ना।

01:10:11:10 वहां पर वो अपने से अपने से निकृष्ट चेतन सत्ता वाले के अनुसार बिहेव कर रहा है ना क्या बिहेव कर रहा छोड़िए आपको मैं समझा दिया और कितनी बार रिपीट कर भाई वो बिहेव कर तो रहा है जड़ के समान वहां पर जीव के द्वारा उपयोग में आ रहा है हां आ रहा है जड़

⬜ Not used yet · 01:10:35:13 – 01:14:35:25 (4:00)

01:10:35:13 के समान आ रहा है नहीं मैंने बोल पहले आप ये पहले आप ये समझ लीजिए कि लीला किसे कहते हैं। पहले आप मैं थोड़ा बोल आप आप थोड़ा सा मुझे टोकिए मत आपके यहां पर क्या है मैं बताऊं ना तो अवतार को कभी किसी ने समझा किसी सामर्थवान के पास ये टिप्पणी टिप्पणी वाली बातें हो जाएंगी ये मत करिए नहीं नहीं फिर मैं आपके ऊपर टिप्पणी करूंगा अच्छा नहीं लगेगा इसको छोड़ ठीक है इसको छोड़ते इसको छोड़ देते हैं आपके यहां पर एक चीज मुझे समझ में आ रही है कि आप लोगों ने लीला या अवतार को ठीक से हमारे अकॉर्डिंगली कि हम क्या उसके बारे में जानते हैं? इस बारे में विवेचना नहीं प्राप्त की है समर्थवान लोगों के द्वारा। इस कारण से मिसअंडरस्टैंडिंग होती है कि हम अवतार किसे कह रहे हैं? लीला किसे कह रहे हैं? आप किसे कह रहे हैं? अब लीला क्या है? नहीं नहीं अब बोलूं मैं बोलू। आप बताइए लीला क्या है? बताइए। आप बताइए लीला क्या है? लीला क्या है? कि ऐसा बिहेव करना जो क्या कहते हैं? जो वो नहीं है उसके अनुसार बिहेव करना। जैसे वो जड़ नहीं है पर जड़ जैसा बिहेव करना। यह यह लीला में आ गया। अब आप इसको और पीछे वाले डायमेंशन से देख रहे हैं कि ये जो लीला करना

01:11:50:21 है ये जो लीला करना है जो लीला हमें दिख रही है ये भी उसके स्वरूप का कार्य है। ये भी उसका कार्य है। यही तो कह रहे हैं आप। अगर जो हमें लीला दिख रही है। हां बोलिए। हां। जैसे मूल प्रकृति हस्तक्षेप नहीं करती वैसे ईश्वर का पैसिव बने रहना और हस्तक्षेप ना करना यह भी ईश्वर के स्वरूप के अंदर ही आता है। लीला बताने के लिए आपको स्वरूप के बाहर बताना पड़ेगा। स्वरूप के अंदर ही आता है। ये ईश्वर के स्वरूप के अंदर तो लीला हम कहां लीला को स्वरूप के बाहर बता रहे हैं। यही तो बात है। यही तो मैं कह रहा हूं। आप नहीं जानते। चलिए आपने आपने थोड़ी देर पहले आपने खुद ही बोला था कि लीला यानी वो जैसा आप आप अब सुन लीजिए थोड़ा सा। आपने जो बात बोली मैं वो रिपीट कर रहा हूं। आपकी बात रिपीट कर रहा हूं। आपने भी थोड़ी देर पहले लीला वाले मतलब थोड़ी शायद 10 पांच 10 मिनट पहले बोला होगा कि जैसा वो है उसके विपरीत बिहेव करना इसको लीला बोलते हैं। ये आपने खुद बोला उसके उसके गर्भ में ये बात छिपी हुई है कि वो प्रतीत मात्र होता है। वो करता है। अब नहीं पॉइंट नहीं बदल रहा हूं मैं। आप इसीलिए तो जानिए ना हम कह रहे हैं। और अगर देखिए सीधी सी बात है। अगर किसी को यानी ईश्वर अपने यानी आपके हिसाब से सुनिए सुनिए मैं एक सवाल

01:13:05:22 पूछता हूं क्लियर आपके हिसाब से ईश्वर अपने स्वरूप के विरुद्ध कार्य नहीं कर सकता। ठीक है? स्वरूप के विरुद्ध कार्य व्यवहार में कर सकता है। लौकिक दृष्टि से कर सकता है और पारमार्थिक दृष्टि से नहीं कर सकता है। वास्तविकता में ईश्वर स्वरूप के विरुद्ध कार्य नहीं कर सकता है। मगर लीला लीला करना भी लीला शब्द का अर्थ क्या बचेगा? जो लौकिक संसार है जो लौकिक संसार है व्यवहारिक लौकिक दृष्टि से ईश्वर जितनी क्रियाएं हो सकती है जितना कोई कुछ सोच सकता है वो सब कर सकता है अवतार लेना ईश्वर के स्वरूप के अंदर ही आता है ना हां तो फिर लीला कैसे हुआ अवतार अवतार लेना उसके स्वरूप के अंदर ही है तो फिर लीला लीला शब्द का अर्थ ही नहीं बचा कुछ क्यों नहीं बचा लौकिक दृष्टि से लीला हुई पारमार्थिक दृष्टि से उसने अपने स्वरूप का कार्य लीला लीला लौकिक में होगी। परमार्थी में तो लीला हो भी नहीं सकती ना। लौकिक में होगी जितनी होगी। हां नहीं उसमें भी कई डायमेंशंस है। सीधे व्यवहार से परमार्थी नहीं है। बीच में और भी कई डायमेंशंस है। मगर अंतत परमार्थ है। बीच में और क्या-क्या है बता दीजिए थोड़ा सा। वो फिर एक लंबा प्रोसेस हो

01:14:20:24 जाएगा और क्या-क्या है। मगर डायमेंशंस और भी है। तो अभी बात ये चल रही है कि आपका पॉइंट क्या है? पॉइंट बताइए। अपना कंक्लूजन बता दीजिए आप कि आप जो जो मैंने बातें बोली उसके आधार पे आप निष्कर्ष क्या निकाल पॉइंट मैं बता

01:14:35:25 रहा हूं। पॉइंट मैं बता रहा हूं कि जड़ ना होते हुए भी चेतन होते हुए भी जड़ के जैसा व्यवहार करना यह ईश्वर के स्वरूप में है शामिल है। इस आप उसे कॉन्टक्स्ट ऐड करना जरूरी है। कॉन्टक्स्ट अगर आप फिर वही बात है ना आप अगर जड़ जड़ का स्वरूप है जड़ के स्वरूप में अलग-अलग क्वालिटीज भी आती है जड़ की वो क्वालिटीज वाली बात नहीं आएगी। यहां पर केवल और केवल हस्तक्षेप ना करना। जैसे जड़ हस्तक्षेप तो कर ही नहीं सकता। कौन सी कौन सी क्वालिटी नहीं आएगी बताइए जरा। देखें क्वालिटी वो मेरा पूरा गजब हो जाना चाहिए। फिर बाद में क्वालिटी कौन सी आएगी नहीं आएगी उस पे आ जाएंगे। और अभी तक आप सवाल पूछने केवल मुझे अभी तक सवाल पूछने का मौका दिया नहीं। अभी समझ रहे हैं आप

⬜ Not used yet · 01:15:22:24 – 01:19:56:28 (4:34)

01:15:22:24 उसको उस दिशा में बात है। तो मेरा क्वेश्चन अभी तक एक भी नहीं आया। तो अब मैं बता देता हूं कि जिस प्रकार से जड़ हस्तक्षेप नहीं कर रहा है तो आपका सवाल है कि जिस प्रकार जड़ हस्तक्षेप एट इंस्टेंट अभी नहीं कर सकता कर भी नहीं सकता वैसे ही क्या ईश्वर भी हस्तक्षेप नहीं कर रहा बिल्कुल नहीं कर रहा यही जवाब है इसका तो हां बिल्कुल और ये स्वरूप के अंदर ही आएगा या स्वरूप के बाहर नहीं आएगा क्योंकि आपने पहले बोला था स्वरूप के बाहर जाएगा वैसे लीला यानी यानी कि छोड़ क्यों दे भाई यही तो निर्णय है आपका छोड़ दीजिए बार-बार अरे छोड़ दीजिए मतलब जो शब्द आप पकड़ रहे हो गलत शब्द बोल रहे शब्द पे बता रहा हूं मैं जो आप बातें बोल रहे सारी

01:15:58:21 मैं बता रहा हूं हो क्या रहा है जैसे कि लौकिक दृष्टि से हम देखें अगर तो ईश्वर ने ऐसा कुछ किया जो कि उसके जो कि वो जैसा नहीं है मगर उसने वैसा व्यवहार किया जैसे वो परतंत्र नहीं है परंतु उसने जी से एक मिनट भाई मुझे बोलने [गला साफ़ करने की आवाज़] दीजिए मुझे बोलने दीजिए मुझे बोलने दीजिए लौकिक दृष्टि से जब हम देख रहे हैं तो हमने क्या देखा कि ईश्वर स्वतंत्र है, सर्वशक्तिमान है। परंतु क्या हुआ कि उसने जीव की इच्छा मात्र से बिहेव कर दिया। जीव के परतंत्र हो के जीव की इच्छा अनुसार बिहेव कर दिया। एक तरीके से। मगर अब तात्विक और एक डायमेंशन खुल गया पीछे का। वो डायमेंशन क्या खुला है? कि इस तरीके से कर्म फल के निमित्त ईश्वर का इस तरीके से बिहेव करना भी उसका स्वरूप है। इसलिए उसने अपने स्वरूप के विरुद्ध कुछ नहीं किया। वास्तविकता में उसने अपने स्वरूप के विरुद्ध कुछ नहीं किया। ठीक है। मगर एक लौकिक सत लौकिक स्तर से लौकिक दृष्टि से उसने स्वरूप के विरुद्ध उसने ऐसा बिहेव किया जो वो नहीं है। जी बोलिए। हालांकि जब आपने पहली बार जब ये कंक्लूजन दे रहे थे आपने डायमेंशन वगैरह ये शब्दों का इस्तेमाल नहीं किया था

01:17:13:27 और आपने क्लियरली बोला था कि स्वभाव के विरुद्ध। अब आप बोल रहे हैं कि वहां स्वभाव उसका वही है। यहां पे स्वभाव के विरुद्ध जा रहा है। तो आपने अपनी बात को और क्लेरिफाई किया। आपने अगर मेरे वीडियोस देखे हो तो मैं हमेशा अपने वीडियोस में व्यवहार और परमार्थ शब्द का उपयोग करता हूं। आपने अगर वाला भी देखा होगा तो उसमें करता हूं। जैसे कि मैं आपको बता देता हूं व्यवहार परमार्थ का अंतर। एक जीव का यहां पॉइंट नहीं है। आगे बढ़ जाता हूं। बेवजह क्यों लंबा खींच रहे? ये खत्म हो गई है बात। ठीक है बोलिए। हम तो इसलिए आप बीच में कहते हैं ना व्यवहार हां जिस प्रकार से व्यवहार परमार्थ आप मानते हैं वैसे हम नहीं मानते तो आप हमारा जो मत की बात है कि ईश्वर यहां पे इस प्रकार स्वभाव में कर रहा है नहीं कर रहा उस सुनिए सुनिए सुनिए सुनिए सुनिए आप बीच में मत ठोके ना बीच में नहीं टोके फिर वो लिंक टूट जाता है बात तो कंप्लीट हो नहीं पाती मेरा मेरा जिस प्रकार से व्यवहार पॉइंट था वो

01:18:12:14 चलिए अभी या पहले कब की बात कर रहे अभी तो आपने टोका मुझे पहले तो पहले पहले टोक चुके हैं ठीक है तो जिस प्रकार हां व्यवहारिक परमार्थिक आप देखते हैं या मानते हैं अलग-अलग तरीके से उस प्रकार से हम व्यवहारिक परमार्थिक नहीं मानते तो जो आंसर हम अपने फिलॉसोफी के डायमें डायमेंशन कहना चाह फ्रेमवर्क के अंदर दे रहे हैं उस आंसर को यूज़ करके आप वहां यूज़ कर रहे हो जो फ्रेमवर्क हम मानते नहीं है समझ रहे हो आप क्या कहना चाह रहा हूं मैं तो गलत गलत उस तरीके से आप दर्शाना चाह रहे हैं। फ्रेमवर्क हम व्यवहारिक परमार्थ को उस तरीके है ही नहीं वो जो आप मान रहे हैं। ठीक है? तो इस आंसर को आप उधर यूज़ कर रहे हैं जो कि ये वाली पॉइंट मुझे बोलना था। ठीक है? अब इससे आपने जो कंक्लूजन निकाला आपने बता दिया आप दूसरा दूसरा टॉपिक करिए। मैं ए वाले का आंसर दे दूं ना। आप दो बातें कर रहे हैं ना। दे दीजिए दे दीजिए दे दीजिए। मैं दिक्कत आएगी वो वाला जब वो जब करेंगे तब मैं आपको दे दूंगा। अभी इसका ले लीजिए उत्तर जो आप बोल चुके हैं। ठीक है मैं पूरा बोल देता हूं। उसके बाद आप दूसरा फिर आपके हिसाब से देख लेना। मैं अभी क्या बोल रहा था यार हम

01:19:22:21 चलिए छोड़िए अब भूल गया मैं ऐसा कुछ यार कंप्लीट करनी चाहिए। आप बोलिए। ठीक है। अब बात यह आती है कि आपने कहा कि हम आपके फ्रेम वर्क को आपके फ्रेम के अंदर से निकल के अपने में ले रहे हैं। तो मैं इसको क्लियर कर देता हूं कि आप व्यवहार और परमार्थ को नहीं मानते हैं एक तरीके से। ठीक है? अब मैं व्यवहार परमार्थ आपका सिद्ध करता हूं। जीव की दृष्टि से अच्छा ये बताइए कोई व्यक्ति जन्म होता है तो लौकिक दृष्टि से हम उत्सव मनाते हैं कि नहीं मनाते? देखिए आप व्यवहार प्रमाण सिद्ध करिए सब ठीक है लेकिन

01:19:56:28 अब मेरा भी तो अवसर आना चाहिए क्या मैं पूछूं कुछ सवाल है आप सर्वशक्तिमान पे मैं ही सर्वशक्तिमत्ता का हमारी जो बात है वो तो हो गई जो हमारी बात है वो तो रह ही गई आप आपने अपना पॉइंट पूरा कर दिया ना कंप्लीट मैंने भी अपनी तौर से बता दिया आप आप अपना अंत में भारी रख के जाना चाह रहे हैं यहां से फिर नहीं नहीं नहीं आप मुझसे सवाल में पूछिए इस विषय इस विषय में जितनी बात हुई आपके हिसाब से जो भी आपको लगा आप क्लिक कर दीजिए फिर मैं सवाल पूछूंगा अलग तरीके से हो मतलब अलग विषय हो जाएगा एक

⬜ Not used yet · 01:20:26:00 – 01:21:24:07 (0:58)

01:20:26:00 तरीके से मैं कंप्लीट कर देता हूं। सवाल पूछेंगे फिर मुझे रिप्लाई देना ही पड़ेगा। व्यवहार और परमार्थ का अंतर बता रहा हूं। एक व्यक्ति ने जन्म लिया। उसका हम उत्सव मना रहे हैं। प्रतिवर्ष उसकी वर्षगांठ बन रही है। वास्तविकता में तो उस दिन वो बंधन में आया था। जबकि हम उस दिन का वर्षगाठ बना रहे हैं। यह हो गया लौकिक और पारमार्थिक दृष्टि में अंतर। पारमार्थिक दृष्टि में उस जीव के साथ उस दिन गलत हुआ था। उसके उसके पर्सेक्टिव से तो वो भैया बंधन में आया था। फसा था वो तो मोक्ष से भी आता है आपके यहां बंधन में। तो उस दिन तो वो फंसा था। तो वह फंसे फंसने का भी हम उत्सव मना रहे हैं क्योंकि लौकिक दृष्टि में उस दिन वह उत्पन्न हुआ है। वह अब शरीर धारण कर रहा है। अब आगे बढ़ रहा है। लौकिक दृष्टि में उसका जन्म जन्म दिवस की हम खुशियां मनाते हैं। ऐसे बहुत सारे उदाहरण मिल जाएंगे लौकिक और परमार्थिक। तो इसी प्रकार से बात यह

01:21:24:07 है कि ईश्वर होना उसी का सिद्ध हो सकता है जो लीला कर सकता हो। कहने का मतलब यह था मेरा ईश्वर होना जो व्यक्ति कहता है ना ईश्वर मिथ्याचारी कैसे हो सकता है? ईश्वर तो ऐसा नहीं कर सकता। फिर वहां पर वो झूठ वाली वो अगर दूसरा आचरण कर रहा है तो वो तो झूठा आचरण हो जाएगा। जबकि यहां पर जड़ के साथ जीव के द्वारा उपयोग होने वाले विषय में वो ऐसा आचरण कर रहा है जो जड़ का आचरण होता है। न्यूट्रल रहना। मुझे जैसा चाहो वैसा उपयोग में ले लो। ऐसा ही आचरण वो कर रहा है। जबकि उसके पास अपनी स्वतंत्र तो ईश्वर हो ही वो सकता है जो ऐसा आचरण कर सके। आप जो यह कहते हैं कि वह उसका स्वरूप है इसलिए वो नहीं कर रहा है। तो वही मैं कह रहा हूं। ईश्वर हो ही वो सकता है जो लीला कर सके। क्योंकि ईश्वर में अगर सर्वशक्तिमत्ता है तो कर्म फल के निमित्त आपके ही अनुसार ले रहा हूं। फिलहाल कर्म फल के निमित्त जीवों को स्वतंत्र देने का भी उसका कार्य है। तो यह दोनों कार्य जहां साथ में एक्सिस्ट कर सके। समझ रहे हैं? यह दोनों कार्य जहां साथ में एक्सिस्ट करें

⬜ Not used yet · 01:22:29:10 – 01:24:32:07 (2:03)

01:22:29:10 वह ईश्वर है। ना कि सिर्फ क्या कहते हैं? सृष्टि और प्रलय करना ईश्वर का कार्य है। साथ ही साथ जीव का पालन वाला जो हिस्सा है उसमें भी इनवॉल्व रहना ईश्वर का कार्य है। इसलिए ईश्वर हो ही वो सकता है जिसमें लीला भी शामिल हो जाए। पहली बात। ठीक है? अब दूसरी बात अब तक हमारे बीच में यह आई है कि ईश्वर आपके हिसाब से वह स्वरूप के विरुद्ध कार्य कर सकता है कि नहीं कर सकता है। हमारे हमारे हिसाब से तो व्यवहार में सब कुछ कर सकता है। ऐसी कोई क्रिया नहीं है जो वो नहीं कर सकता है। अब उससे होने वाली मान्यता वो एक अलग बात है कि माने क्या व्यक्ति। ठीक है? जैसे कि सत्यार्थ प्रकाश में एक बात कही गई कि अब विषय मत चालू करिए। इसको कंप्लीट करिए फिर दूसरे विषय चढ़ जाएंगे। अगर मैं जवाब नहीं दूंगा तो फिर ऐसा लगेगा कि भाई मैंने जवाब नहीं दिया वो दिक्कत हो जाएगी ना आप फिर मैं अपनी बात को पूरा ही कर रहा हूं जैसे कि सत्यार्थ प्रकाश में एक बात कही गई कि भाई बिना ज्ञान दिए व्यक्ति को ज्ञान हो नहीं सकता मनुष्य को ज्ञान हो नहीं सकता ठीक है तो जब वो ईश्वर बन के सतोगुण संपन्न हो के आया उसने ज्ञान दिया सतोगुणी तरीके से तो वो तो हमने मान लिया कि ये धर्म है

01:23:44:14 मगर अधर्म का ज्ञान कहां से आया अधर्म का ज्ञान आपने प्रश्न फिर प्रश्नात्मक शैली हुई ना पूछ रहे दूसरा मुझे जवाब देना पड़ेगा या तो आप इस बात को खत्म कर दीजिए मैं जो पूछना चाह रहा हूं उस पर आ जाते हैं फिर गलत हो जाएगा इसलिए आपको रोक रहा हूं तो कहने का मतलब यही है कि ईश्वर व्यवहार में सब कुछ कर सकता है। समस्त क्रियाएं कर सकता है। हम उसको किस रूप में मान्यता लेते हैं वो हमारी दृष्टि है। ईश्वर तो सभी कार्यों में वैसे भी इनवॉल्व है ही जैसा कि आपने बताया। और अभी मैं अगर इसके और धागे खोलूंगा कि कितना परसेंटेज इनवॉल्व है। तो देखने देखा जाए आपने कहा कि जीव जो है पूरी सहायता जीव केवल प्रेरणा करता है। सारा कार्य ईश्वर करता है। लो ईश्वर स्वयं कर रहा है। ठीक है? तो यह वाली बात हो गई। अब

01:24:32:07 आ जाती है कुल मिलाकर के एक बात अटक रही है क्योंकि हमारे और आपके बीच में एक ही डिफरेंस है कि ईश्वर अवतार ले सकता है कि नहीं? और अवतार ले सकने में बाधा है क्योंकि वह सर्वव्यापक है। वह सर्वशक्तिमान है। तो वह अपने स्वरूप के विरुद्ध नहीं हो सकता। इसलिए वो है। तो क्या इस पर आप बात करना चाहते हैं या कुछ और है? जी ठीक है। अब वही है लीला शब्द का अर्थ कैसे मतलब हमारी धारणा में फिर मैं एक्सप्लेनेशन दूं या फिर वही बात कंटिन्यू हो जाएगी। मैंने पहले बता दिया कि लीला का अर्थ और व्यवहार परमार्थ आप जिस तरीके से लेते हैं अलग-अलग वैसा हमारे में नहीं। हमारे में एक ही है व्यवहार को अलग नहीं आप अगर आपके में नहीं है मैंने सिद्ध किया अगर आपको चाहते हैं तो उसको काटिए आप तो फिर व्यवहार परमार तो वो तो वो विषय चला जाएगा ना फिर इसीलिए मैं बोल रहा था कि आप वही तो आपके कंक्लूजन के बाद मुझे अपना कंक्लूजन देना पड़ेगा ना आप ये कह के खत्म मत करिए कि भैया आपके यहां व्यवहार परमार्थ हमारे यहां नहीं है ये कौन सी बात है हम लोग सत्य का अनुसंधान कर रहे हैं किसके यहां क्या माना जाता है उसका अनुसंधान नहीं कर रहे हैं सत्य का कर रहे हैं। हमने यह नहीं कहा हमारे यहां क्या चलिए व्यवहार और परमार्थ में भेद है ना आपके यहां बिल्कुल है आपके यहां भी है चलिए ठीक है अब खत्म करते हैं इसको इतने पे ही रख देते हैं वरना

01:25:47:08 फिर मैं बताऊंगा कि कैसे नहीं है कैसा है फिर वो अलग नीचे चला जाता है हां ठीक है तो अब इस पे इस पे आते हैं अपना सर्वशक्तिमान पे जैसे सर्वशक्तिमान का अर्थ आपके द्वारा जो बताया जा रहा है वो है कि कुछ भी कर सकता है हम यही अर्थ है। तो इसमें जो जैसे बेसिकली आपने यह सवाल जो इसके बाद जो सवाल आएगा वो सुना भी होगा पहले कि भाई क्या ईश्वर ऐसी चीजें कर सकता है विरोधाभास? क्या ऐसा पत्थर बना सकता है जो खुद ही ना उठा पाए? तो एक तो ये बात है। ठीक है। अब पहले चलो इसका उत्तर दे दीजिए आप। फिर आगे कंटिन्यू करते हैं। ठीक है। इसका आज नए तरीके से उत्तर देता हूं। मैंने बहुत बार दे चुका हूं। आज नए तरीके से देता हूं। आप मुझे मैंने कहा ईश्वर सर्वशक्तिमान है। यानी सारी क्रियाएं वो कर सकता है। तो आप मुझे यह बताइए क्रिया क्या करनी है? उस क्रिया से आपको क्या मानना है ये एक अलग विषय है। जैसे कि मैं मुझसे कहा जाए कि इस मोबाइल को यहां से यहां सरकाओ। ये हो गई क्रिया। अब इस मोबाइल को सरकाने से आप ये मान लो कि मैं फलाना काम नहीं कर सकता। या फिर जैसे मैंने इसमें हाथ लगाया। ठीक? हाथ लगाने के बाद मैंने ऐसे किया।

01:27:04:10 [गला साफ़ करने की आवाज़] ठीक है? तो ये हो गई करने की क्रिया। हाथ लगाया और किया। ये क्रिया हो गई। तो ये क्रिया ईश्वर कर सकता है। अब आप इससे मान लो कि ईश्वर पत्थर नहीं उठा सका। वो आपके ऊपर है। अगर केवल मान्यता बदलनी है तो बिना किसी क्रिया के ईश्वर मान्यता बदल सकता है। आपकी

⬜ Not used yet · 01:27:24:12 – 01:33:51:13 (6:27)

01:27:24:12 मान्यता बदलने की बात नहीं ना। ये तो वो बात हो गई। क्या ईश्वर मेरे दिमाग में जो है छेड़छाड़ कर रहा है या फिर मेरी बुद्धि में उस चीज को लेके जो ज्ञान है उसके प्रति छेड़छाड़ कर रहा है वो बात नहीं है। क्या ईश्वर ऐसा मैं फिर से रिपीट कर देता हूं। क्या ईश्वर ऐसा पत्थर बना सकता है जो खुद ना उठा सके? दो चीजों को मिक्स कर रहे हैं। इस सवाल में दो चीजों का मिक्स मिक्सचर है। एक है क्रिया का। एक है क्रिया का और एक है क्रिया से बनने वाली मान्यता का। तो आप कह रहे हैं क्या है? इसमें मान्यता यह है कि आपको यह बिलीव हो जाए कि मैं नहीं कर सका। यह मान्यता ना कर सकने का सिद्धि कैसे होगी? नहीं बिलीव बिलीव बिलीव करने की करवाने या करने की का तो सवाल ही नहीं था। बिलीव करने कह रहा हूं नहीं कर सकने का वो क्या होगा? उदाहर वो क्या होगा? क्रिया क्या होगी? नहीं कर सका। उसमें क्रिया क्या है? नहीं कर सका। क्रिया ये है कि जैसे ये मोबाइल फोन है। मान लीजिए मोबाइल फोन ऐसा है जो ईश्वर नहीं उठा सकता। यानी उसने ऐसे ऐसे सुनिए तो सही मैं बता यानी आप ये कैसे आप यह कैसे मानोगे कि ईश्वर नहीं उठा सका क्योंकि ईश्वर अपने मन के अंदर जानता है कि मैं क्या कर सकता हूं क्या नहीं कर सकता मुझे मुझे नहीं मानने की बात ही नहीं अरे भैया यही तो मैं कह रहा हूं इसको

01:28:39:13 समझो आप मेरी बात को आप बिलीव कैसे करोगे आप इस बात को कैसे मानोगे कि ईश्वर पत्थर नहीं उठा सका कैसे मानोगे इस बात को जैसे जैसे कि आपने कहा क्या एक मिनट क्या ईश्वर पत्थर बना सकता है? तो यानी कि अभी यहां पर हवा है और और जो है मैंने यदि यहां पर या ईश्वर ने यदि यहां पर पत्थर बना दिया तो हां आपने मान लिया कि ईश्वर पत्थर बना सकता है। ठीक है? दो क्रियाएं आपने कही। क्या ईश्वर ऐसा पत्थर बना सकता है जो जिसे वो स्वयं ना उठा सके। ठीक? दो क्रियाएं कही ना? एक तो ना उठा सकने वाली क्रिया और एक बनाने वाली क्रिया। ठीक है? ना उठा सकने वाली क्रिया नहीं ना उठा सकना वो समता है। सामर्थ हेलो आपका स्क्रीन अटक गया। हां मेरा स्क्रीन अटक रहा है। तो नहीं वो एक सेकंड के लिए अटका था। शायद मेरे इशू होगा। एक सेकंड के लिए अटका था ज्यादा नहीं। तो मैं ये बोल रहा हूं कि आप इस जो सवाल है इस सवाल का उत्तर ना देकर के आप इसका उत्तर दे रहे हो कि आपको कैसे मनवाया जाए। आप मुझे मनवाने पे तुले हुए हो कि भाई मुझे कैसे मैं बता रहा हूं ना आप मुझे क्रिया बता दीजिए क्या-क्या क्रिया करनी है वो क्रिया बता दी क्रिया क्रिया क्रिया

01:29:54:16 बता दी क्या इस ऐसा पत्थर बना सकता है तो जिसको ना जिसको ना उठा सके ना उठा सकने वाली क्रिया का बिलीव कैसे पता चलेगा कि हां इस पत्थर को वो नहीं उठा पा रहा यह कैसे पता कैसे चलेगा यह पता कैसे चलेगा? निर्णय कैसे होगा? जैसे मान लीजिए पता चलने निर्णय देने की जरूरत ही नहीं है। हमें उस हमें उस क्रिया आप ये बोलना चाह रहे हैं क्या? हमें उस क्रिया का साक्षी हो के कैसे पता चलेगा? ये बोलना चाह रहे हैं आप। हमारे अंदर क्या इन आएगी उस क्रिया को मान ले। आप सुन। आप ईश्वर से कुछ करने को कह रहे हो। ठीक है? उस करने में ये है कि वो ऐसा पत्थर बनाए जिसे नहीं उठा सका। अब जैसे मान लीजिए उसने पत्थर बना दिया और आपसे ये कह दिया कि ठीक है इसको मैं नहीं उठा सकता तो क्या इस बोलने से आप मानोगे कि हां उसने ऐसा पत्थर बना दिया जो वो नहीं उठा सकता वही ना मुझे बनवाने पे आप लेके आ रहे हैं मुझे बनवाना या ना मानना ये विषय ही नहीं चल रहा है विषय विषय चल रहा है विषय ये चल रहा है कि ईश्वर सभी क्रियाएं कर सकता है जितनी क्रिया दिख रही है आप मुझे बता दीजिए कौन सी क्रिया करनी है यानी यानी ये जो ये जो मैं बात बोल रहा हूं। ये क्रिया नहीं की जा सकती। आप ये बोलना चाह रहे हैं। इसमें क्रिया कहां है? आप बताइए ना कौन-कौन सी क्रिया करनी है? सब क्रिया

01:31:09:18 करेंगे। नहीं कर अरे तो क्रिया से अपनी बात अपनी बात को क्रिया से जोड़िए। तो क्रिया क्रिया क्रिया बता देता हूं। आपके वाक्य में एक ही क्रिया दिख रही है मुझे। पत्थर बनाना ना उठा सकने में क्रिया बताइए। कौन सी क्रिया होगी? ना उठा सकने की? ना जैसे मैंने फोन उठाया वैसे ना उठा सका तो आप कैसे चीज तो आप यह कैसे चीज मानोगे कि वो नहीं उठा सका मुझे मनवाने की बात ही नहीं है ना अगर देखिए आप समझ नहीं रहे हैं मैं उस क्रिया को देखूं या मैं उस क्रिया को मानू या मैं कैसे मान लूं आप उस पे लाना चाह रहे जबकि वो बात ही नहीं हो रही है बात सिंपल सी ये हो रही है ना सुनिए सुनिए सुनिए सुनिए बात इसमें ये हो रही है देखिए अगर हमने कहा कि जिसको वो स्वयं ना उठा सके तो उसमें इसमें निर्णय कैसे होगा? जैसे मान लीजिए ईश्वर ने केवल कह दिया कि भैया मैं इस पत्थर को नहीं उठा पा रहा। मैंने बना दिया तो उससे आप संतुष्ट हो जाएंगे। यानी ईश्वर में पत्थर उठाने का सामर्थ्य नहीं है। ईश्वर ऐसा बोल सकता है आपसे। मैं ये कह रहा हूं। ईश्वर ऐसा बोलने की तो बोलने की बात ही नहीं बोल रहा हूं ना। बोल के थोड़ी बताना है। बोलना थोड़ी है। तो फिर तो फिर तय कैसे होगा कि वो पत्थर को उठा नहीं पा रहा है।

01:32:24:21 बताइए। तय नहीं तय करने पे तो बात आएगी ना। किसी को कर ही नहीं पाएगा। क्या नहीं कर पाएगा? भाई ईश्वर ईश्वर आपके सामने आया। ईश्वर ने ऐसा पत्थर बना दिया जिसको कोई नहीं उठा। बात है थोड़ा सा थोड़ा सा बुद्धि पूर्वक इस बात को समझिए। इस बात में जब आप ये कहते हैं क्या ईश्वर ऐसा पत्थर बना सकता है जिसको वो स्वयं ना उठा सके। तो स्वयं ना उठा सकने वाली बात में उसके अंदर की क्षमता का निर्णय होता है। उसका निर्णय होता है कि वो आपको क्या प्रदर्शित करे। इसमें क्रिया नहीं है कोई भौतिक। ठीक है? आप

01:33:00:16 भौतिक क्रिया बताइए कौनिक नहीं भौतिक क्रिया क्यों बताइए इंद्रियों के द्वारा दिखाई देने वाली समझ में आने वाली कौन सी क्रिया है जो आपके अनुसार ईश्वर नहीं कर सकता मैं बता दूंगा कर सकता है बस सीधी बात नहीं तो वही आप वही ना पॉइंट डायबिट करना चाह रहे हैं आप इस पर लाना चाह रहे हैं कि भाई इंद्रियों के द्वारा तुमको क्या दिखा दो कि ईश्वर ये चीज मान ले जबकि बात ये है ही नहीं। बात ये है कि क्या ईश्वर ऐसा पत्थर कोई बना सकता है? ईश्वर ने एक पत्थर बना दिया। ठीक है? आप ये समझिए। ईश्वर के एक पत्थर बना दिया। ठीक है? और ईश्वर ने बोला कि ये पत्थर मैं खुद नहीं उठा सकता हूं। ठीक है? और ईश्वर ये बात सत्य बोल रहा है। झूठ नहीं ये सत्य बात है। ठीक है? ईश्वर ने ये बात बोल दी कि ये पत्थर मैं खुद नहीं उठा सकता हूं। ईश्वर ने ये सत्य बोला है। झूठ बोला है। निर्णय कैसे करेंगे आप?

01:33:51:13 हां। तो आप भ्रम पे लाना चाह रहे हैं ना कि ईश्वर झूठ बोल रहा है वहां पे। आप ये बोल रहे है ना ईश्वर झूठ बोल रहा है वहां पे। तो जहां पर ईश्वर बिना उसके उपयोग में आ रहा है वहां पर क्या हो रहा है? मैं जब चाह बोतल उठा ली यहां पे क्या कर रहा है ईश्वर जड़ की तरह सेव कर रहा है कि नहीं विपरीत आचरण कर रहा है कि नहीं इसका इसका इसका मैं सवाल पूछ रहा हूं उससे क्या संबंध है संबंध ये है कि ईश्वर जो ईश्वर लीला कर सके जो ईश्वर ऐसी चीजें कर सके वही ईश्वर है जो नहीं कर सके वो ईश्वर नहीं है उसकी सत्ता में ही कुरान का ज्ञान दिया जा रहा है वेद विरुद्ध है दिया जा रहा है वो चुप है तो उसी तरीके से वो यहां पर वो यहां पर आपको कह सकता है मैं नहीं उठा पा रहा ले मान लो नहीं उठा पा रहा यानी यानी झूठ बोल रहा है ना ईश्वर तो वहां पे भी झूठा आचरण कर रहा है ना ईश्वर झूठा वहां पे मत जाइए आप यहां वो वहां पे झूठा आचरण नहीं कर

⬜ Not used yet · 01:34:42:26 – 01:35:24:26 (0:42)

01:34:42:26 मैं बता देता हूं आप ऐसे सुनिए सुनिए सुनिए आप आप क्या कर रहे हैं मैं मैं बता रहा हूं मैं बता रहा हूं मैं एक्सप्लेन दो मिनट बोलूंगा आप बीच में रुकिए दो मिनट आप क्या कर रहे हैं एक तो एक तो झूठा आचरण नहीं है मैं पहले स्टेटमेंट दे देता हूं ठीक है झूठा आचरण नहीं है वो आचरण सही है मैं मैं सिद्धू हां बोलिएगा बोलिएगा आप बोलिएगा मैं रिपीट कर लूं अपना पॉइंट आप क्या कर रहे हो कि देखो देखो आपके यहां ये दिक्कत है तो मेरे यहां मतलब मैंने जो आपके ऊपर आक्षेप लगाया कि भाई देखो आपके यहां ये समस्या है आपके इस सिद्धांत में दिक्कत आ रही है तो देखो देखो आपके यहां भी तो दिक्कत है वो बाउंड्री हो गई है हमारे यहां दिक्कत अगर मान लीजिए सुनिए पूरा पूरा पूरा पॉइंट कर देता हूं पूरा पॉइंट कर देता हूं मैं आप बोल लीजिएगा आप बोल लीजिएगा बोल लीजिएगा मेरा

01:35:24:26 कहने का मतलब सिर्फ इतना सा है कि अगर मैं अब सिद्धांत से दुर्जन जो नया बोलते हैं उससे मान भी लूं एक बार के लिए कि भाई मेरी बात गलत है वहां पे हमारी गलत बात गलत सिद्ध हो रही है तो इससे आपका सही होना कहीं से भी सिद्ध नहीं हो जाएगा मैं बता रहा हूं ना सिद्ध कैसे हो रहा है चलिए बोलिए क्योंकि हमने हमने ईश्वर को माना ही वो उसको है जब वो अपनी चीजों के विपरीत आचरण भी करता हमें दिख सके उसकी विपरीत आचरण करने की प्रतीति हो आपने आपने माना मैंने नहीं माना आपने फिर आप पीछे चलो बता दो बिना उसको माने कैसे हो जाएगा सिद्ध या तो क्या [हंसी] बिना आप सवाल क्या बिना क्या माने ईश्वर जब स्वतंत्र सत्ताधारी है चेतन है तो दूसरे जो चेतन उससे निकृष्ट जीव है उसके अंतर्गत जाकर के उसके द्वारा नियंत्रित हो रहा है लो ये दोनों विपरीतार्थक वो है उसमें हो रहे हैं घटित ईश्वर में नहीं हो रहा विपरीतार्थक है ही नहीं मैंने पहले ही बता दिया कि भाई ईश्वर जो है ईश्वर अपनी स्वयं की स्वतंत्रता के वजह स्वतंत्रता का आप अरे भैया वहां ईश्वर का ईश्वर का जीव की प्रेरणा से काम करना हो तो रहा है सिद्ध हां हो रहा है लेकिन वो स्वभाव के विरुद्ध है ही नहीं मैंने एक्सप्लेन कर दिया था पहले भी वो वो वो जो वहां पर लीला है उसको आपने स्वभाव

01:36:39:27 माना है ना फिर लीला वो जो वो जो विपरीत आचरण है उसको स्वभाव मान लिया है तो विपरीत आचरण तो कर रहा है ना और वही उसका स्वभाव नहीं है विपरीत मैं वही आप देखिए वही है ना आप बोल रहे हैं विपरीत आचरण मैं बोल रहा हूं नहीं जबरदस्ती आप क्यों अपनी बात मनवाना चाह रहे हैं मैं बोल बोल ही रहा हूं आचरण है। वही उसका आचरण है। मैं तो पहले से ही मान के चल रहा हूं। तो बस यही उसका आचरण है। यही जो आचरण भटक रहे हैं। हां हां हां बताइए। अब अब एक सुन करिए क्या आचरण है यहां पे ये बताइए। तो ठीक है आप वहां बताइए। झूठा आचरण है वहां पे। वही उसका आचरण है। झूठा आचरण करना। नहीं कैसे फसाएंगे ना तो मैं भी फसाऊंगा। अरे फसाएंगे फसाने वाली क्या बात है? मैंने अपना पूरा अरे भैया एक ऐसा वर्ड नहीं एक्सप्लेन किया। जैसे यहां पर वो जो नहीं है वो बोल रहा है तो आप कह रहे झूठ बोल रहा है। इसी प्रकार से वो जो नहीं है वहां वो उस तरह से बिहेव कर रहा है। तो अमित क्या मैंने तो एक्सप्लेन कर दिया ना कि वो वही है। आप जबरदस्ती मान रहे हो कि वो वो नहीं है। मैं तो बोल ही रहा हूं कि वो वही है। तो मैंने मैंने उसको माना ना मैंने आप मैं उसको मान रहा हूं ना कि भैया ईश्वर वही हो सकता है जिसमें अपने स्वरूप के विरुद्ध कार्य करते हुए दिखना प्रतीति करवाना भी शामिल हो। वही हो सकता है ईश्वर। लेकिन मैंने एक्सप्लेन कर दिया नहीं नहीं

01:37:55:13 मैंने एक्सप्लेन कर दिया कि वो स्वरूप के विरुद्ध है ही नहीं। आपने आपने हां सुनिए सुनिए अब आप सुन अब रुकिए आप रुकिए रुकिए रुकिए रुकिए रुकिए आपने बोला था आपने आपने अपने मुंह से ही बोला था कि आपने अनुसार एक मिनट एक मिनट मैं क्लिटी पे पहुंच गया हूं। हमारी आपकी मिसअंडरस्टैंडिंग में आपने उसका जो मिथ्या आचरण है उसको ही उसका स्वरूप मान लिया है। नहीं नहीं फिर गलत शब्द है। मिथ्या आचरण है ही नहीं वो। नहीं नहीं नहीं गलत शब्द है। ये आप जबरदस्ती मान के चल रहे हैं। ये गलत बात है। मैंने ये कहीं पर भी ना बोला ना तो मैंने लीला बोला ना तो मैंने मिथ्या आचरण बोला। फिर से अगर नहीं बोला तो बता दो ना भाई। वहां पे वो जीव के अनुसार बिहेव क्यों कर रहा है? बता दो। क्योंकि वही उसका स्वरूप है। तो बस इसका मतलब जीव के अनुसार आश्रित जैसा बिहेव करना भी उसका स्वरूप है ना। आश्रित फिर चलो मान लो अभी ठीक है। दूसरे चेतन के अनुसार कार्य करना भी उसका स्वरूप है ना? हां कार्य करना। ठीक है। दूसरे चेतन से निर्देश लेकर के कार्य करना भी उसका स्वरूप है ना। ठीक है। हां। तो यही तो मिथ्या आचरण उसका स्वरूप हो गया। कहां क्या मिथ्या आचरण है स्वतंत्र मैंने एक्सप्लेन किया था ना सुन लीजिए आपने पहली बात तो लीला वाली

01:39:10:16 बात मैंने एक्सप्लेन किया था मैंने कि स्वतंत्रता कर्मों की स्वतंत्रता देने के लिए ईश्वर को ये जो आचरण है जिसको आप मिथ्या आचरण आचरण बुलवाना चाह रहे कि स्वरूप के विरुद्ध स्वरूप के विरुद्ध नहीं क्योंकि ईश्वर ने अपने स्वरूप के अनुसार ही जीवो को कर्म करने की स्वतंत्रता दी है और उसके अंतर्गत ही जितने भी कार्य उसमें अंतर्गत खुद उपयोग में आ रहा है। जड़ के जैसा व्यवहार कर रहा है। जड़ के जैसा व्यवहार अपना इंटरफेरेंस ना करके कर रहा है। हां, ठीक है। यही उसका स्वरूप है। इसमें दिक्कत क्या है? दिक्कत क्या है? इसका मतलब इसका मतलब जो वो नहीं है उसके जैसा व्यवहार करना ही उसका स्वरूप है। वही मैंने ये कहां बोला कि वो वो नहीं है। मैंने आप मुझे लाइन बताओ। मैंने कब बोला? मिलाकर मैं बताऊं। वो हो क्या रहा है? मैं बताऊं। ईश्वर को केवल यहां पे सीमित नहीं किया जा सकता। वो केवल सत्य ही बोलता है या वह सत्य आचरण ही करता है। वह अपने स्वरूप के बाहर जाकर के भी कार्य करता दिख सकता है क्योंकि उसके स्वरूप के बाहर जाकर के कार्य करना दिखना ही उसका परम स्वरूप है। वास्तविक स्वरूप है। ये मानना पड़ेगा। अगर ये नहीं मानेंगे ये नहीं मानूंगा। ये नहीं एक मिनट। अगर ये नहीं मानेंगे तो जड़ के जैसा आचरण आप सिद्ध करिए। वो कैसे कर रहा है? वो तो सत्यवादी है केवल। अगर केवल में सीमित

01:40:25:20 करेंगे ना उसे कि वह केवल वही करेगा है। आप मुझे समस्या आप मुझे समस्या बता दीजिए ना कि जड़ के जैसा हस्तक्षेप ना करने वाला व्यवहार जड़ जड़ बोल रहे हो गलत है। हस्तक्षेप ना करके वो अपने स्वरूप के विरुद्ध कैसे जा रहा है आप ये मुझे एक्सप्लेन कर दीजिए।

⬜ Not used yet · 01:40:40:26 – 01:44:09:08 (3:28)

01:40:40:26 हालांकि आपने पॉइंट डाइवर्ट किया है। अपनी बात का जवाब नहीं दिया आपने। हमने दे दिया मेरे पास उसके बहुत सारे बहुत सारे उसके जवाब है। ठीक है? अभी उसप आएंगे उसको भूलिएगा नहीं। ठीक है। उसप आइएगा। उस पर आएंगे उसको भूलिएगा नहीं। मुझे मालूम था सर्वशक्तिमान के लिए आप यही तोप एक लाए हैं। मुझे मालूम था अब ये फिर टिप्पणी कर रहे हैं आप। मत करिए टिप्पणी बीच में। यही एक तोप लाए हैं। आप कोई बात मत करिए। ठीक है। ठीक है। ठीक है। मैं आता हूं। क्षमा करिए मुझे। जी क्योंकि ज्यादातर आपकी तरह आर्य समाजी होते नहीं है। तो ऐसा वो एक हो जाता है। मुझे क्षमा कर दीजिए। हां। [गला साफ़ करने की आवाज़] तो अब हम आते हैं उस पे कि आपने कहा कि उसका स्वरूप ही है कि वो क्या कहते हैं जीवो के अनुसार कार्य करेगा। ये उसका स्वरूप ही है कर्म फल देने के लिए। हम ठीक है? यानी कि उसके स्वरूप में ये आ गया कि वो जो नहीं है वैसा व्यवहार करेगा। ये आ गया ना गलत बात है। जब आप बोल रहे हैं कि उसका स्वरूप ही है तो फिर बोल रहे हैं उसके स्वरूप के विरुद्ध जा रहा है। ये दोनों बातें आप अपनी पहली बात दूसरी बात काट रहे हैं। आप मैं बता रहा हूं। मैं बता रहा हूं पहली बात से दूसरी बात या तो वो उसका सुनिए सुनिए मैं मैं मैं क्लियर कर या तो वो उसका स्वरूप है या तो वो उसका स्वरूप नहीं है उसके विपरीत जा रहा है दोनों बातें साथ में कैसे हो सकती है

01:41:56:14 मैं बता रहा हूं साथ में कैसे हो रही है इसका मतलब ये मान ले कि ईश्वर का गुण केवल सत्य बोलना सत्य आचरण करना नहीं है ये माने क्यों क्यों माने क्योंकि वो अपने जड़ जैसा व्यवहार भी कर रहा है जड़ जैसा व्यवहार हस्तक्षेप ना करने वाला जड़ जैसा व्यवहार उसके स्वरूप के अंदर ही है। कर रहा है ना स्वरूप के अंदर जड़ जैसा व्यवहार कर रहा है ना वो चेतन होते हुए हां हां तो यानी यानी कि उतने हिस्से में वो जड़ जैसा व्यवहार करके ऐसा कर रहा है। चेतन होते हुए जड़ जैसा उपयोग में आ रहा है। ये क्या हुआ? चेतन मिथ्या मैं बताता हूं। चेतन रुकिए रुकिए रुकिए। आपका ये कहना है कि चेतन आप क्या करते हैं आप क्या करते हैं? मैं बताता हूं। दिक्कत कहां? एक मिनट एक मिनट। आप क्या करते हैं? दिक्कत वहां आ रही है कि जितनी भी चीजें आपके बनाए हुए सिद्धांत के बाहर जाती हैं, यह उसका कार्य नहीं है। इसलिए वो उसके स्वरूप में शामिल नहीं है। इसलिए ये नहीं हो सकता। बाकी वही सब चीजें दूसरे रूप में आपने अपने अंदर स्वीकार कर रखी है। नहीं कर रखी। अब मैं बता देता हूं। आप टोकते हैं तो पॉइंट दिमाग से उतर जाता है। आपने लास्ट क्या

01:43:11:18 बोला था? इस ये बात के पहले इसके पहले क्या लास्ट बात बोली थी आपने? हां चेतन वाली याद आ गई। याद आ गई। हां चेतन वाली बात आपने बोली थी कि चेतन जैसा व्यवहार करने का मतलब आपका ये निकल रहा है कि भाई चेतन जैसा व्यवहार है। यानी हस्तक्षेप करना ही पड़ेगा। तभी वो चेतन वाला व्यवहार है। हस्तक्षेप नहीं कर रहा है। जड़ जैसा व्यवहार है। ठीक है? ये समझू मैं? हस्तक्षेप नहीं कर रहा है तो जड़ जैसा व्यवहार है। वो जड़ जैसा व्यवहार है। यही बोला ना? यह तो यह तो आप कह रहे हैं कि वह हस्तक्षेप नहीं कर रहा है। कर रहा है। मेरा तो कहने का मतलब यह है कि वहां पर वह जब शांत रह रहा है और निर्णय नहीं दे रहा है ना ही रोक रहा है। हां ठीक है। इसको कह सकते हैं ठीक है। हां तो यही ये चेतन के व्यवहार के अंतर्गत ही आता है। ये अलग हां ना करना चेतन के व्यवहार के अंदर ही आएगा। आप इसको क्या कर रहे हैं कि आप ये बताना चाह रहे हैं। आप सुनिए सुनिए मैं कंप्लीट [हंसी] कर कंप्लीट कर दे रहा हूं। हां हां हां

01:44:09:08 आप ये बताना चाह रहे हैं कि क्योंकि वो हस्तक्षेप नहीं कर रहा यानी वो चेतन जैसा व्यवहार नहीं कर रहा है वहां पे आप ये बताना चाह रहे हैं और चेतन जैसा व्यवहार नहीं कर रहा है यानी अपना स्वरूप जो चेतन वाला है उसके विरुद्ध जाके चेतन जैसा व्यवहार कर रहा है वो पैसिव रहना भी चेतन का ही गुण है ठीक है ठीक है इसका मतलब कि जहां पर पाप आचरण हो रहा है वहां पर जैसे मनुष्य को दोष लगता है मनुष्य को दोष लगता है ना हस्तक्षेप ना करने में दोष लगता

⬜ Not used yet · 01:44:36:14 – 01:45:05:25 (0:29)

01:44:36:14 है कि नहीं हम हम हां हां हस्तक्षेप ना करना भी पाप माना जाता है कि नहीं? हां बिल्कुल तो वहां हेलो हेलो हेलो हेलो आवाज आ रही आवाज आ रही है आ रही है जी तो मैंने बोल दिया हां इस तरीके का कार्य भी ईश्वर कर सकता है जी जी बोलिए हां

01:45:05:25 मैंने हां बोल दिया जी बोल दिया मैंने इस तरीके का कार्य भी ईश्वर कर सकता है तो [गला साफ़ करने की आवाज़] अब इसमें यह वाली बात आती है कि आपने कहा कि हस्तक्षेप ना करना भी चेतन का ही व्यवहार है। शांत रहना भी चेतन का ही व्यवहार है। इसलिए जो है हम यह मानते हैं कि ईश्वर जो है अपने स्वरूप के निमित्त कार्य कर रहा है। ठीक है? अब पहली बात तो ये आ गया कि शांत रहना। शांत रहना हस्तक्षेप ना करना मनुष्यों में पाप माना जाता है कई जगह पर। हम भीष्म जी को भीष्म जी को दोष लगा ना द्रोपदी का चरण देखने पर पाप माना जाता है हस्तक्षेप ना करना तो जो हां उसको एक्सप्लेन कर सकता हूं ठीक है ठीक है वो करेंगे अब दूसरी बात ये आती है कि जब हम इसको इधर से उधर कर रहे होते हैं व्यवहार में तो हम अपने मन में क्या सोच रहे होते हैं ईश्वर करवा रहा है या मैं कर रहा हूं बंधन की ओर से देख रहा हूं मुक्ति की ओर से नहीं देख रहा बंधन संसार में बंधन में जो है क्या आता है क्या आता है भौतिकवादी विचार क्या आएगा क्या कि मैं कर रहा हूं मतलब अरे भैया मैं कर रहा हूं मैं कर रहा हूं

01:46:21:06 अगर यहां पे ईश्वर की उपस्थिति मानू तो ईश्वर कैसा उपयोग में आ रहा है मेरी जानकारी में ईश्वर तो वही कर रहा है जो वो करता है मेरी जानकारी में क्या आ रहा है यही आ रहा है कि ईश्वर की वजह से मूल प्रकृति है उसकी वजह से सॉरी मूल प्रकृति से बनी हुई सारी चीजें हैं मैं भी वो मेरा शरीर मतलब मेरा ऐसा शरीर मैं नहीं मैं मेरा शरीर भी बना हुआ है और उसी वजह से मैं व्यवहार कर रहा हूं। ये जानकारी है नहीं जानकारी ये है कि मैं ही कर रहा हूं। जानकारी यही है। हां तो मैं मैं कर रहा हूं ना देखिए मैं अभी कर रहा हूं। इसका मतलब ये नहीं है। एक्सप्लेन कर दूंगा। मैं मैं बता रहा हूं। व्यवहार में हमारे यही है। व्यवहार में हमारे यही है। व्यवहारिक सत्य हमारा यही है कि हम यह सोचते हैं कि इसको हमने उठाया ना कि ईश्वर ने उठवाया। ठीक है? और इसीलिए हम बंधन में है। इसीलिए बंधन में है ना? नहीं तो ये नहीं नहीं नहीं। ये तो अज्ञान और ज्ञान की जैसे मुझे अगर जानकारी नहीं है कि ईश्वर है, मूल प्रकृति है। ईश्वर ने संसार को बनाया है। तब मैं ये सोच रहा हूं कि ईश्वर को मैंने उठाया। जो बंधन में है वही पूरा पूरा पूरा एक्सप्लेन कर दूं मैं लेकिन अभी तो मुझे पता है ना कि भाई ईश्वर के निमित के बिना मैं कर ही नहीं सकता हूं ये काम

01:47:38:00 इसमें दिक्कत क्या है मुझे पता है ये चीज ठीक है पता है तो फिर आपके जीवन में आपके मुख से दिन भर में एक भी बार ऐसे नहीं निकलता है कि मैंने ये किया मैंने वो किया आप हर बार ऐसे ही बोलते हो कि मैंने ही नहीं मैंने किया ये गलत नहीं है मैं एक्सप्लेन कर देता हूं मैंने किया एक बात गलत मैं इसको वो नहीं बोल रहा हूं कि मैंने किया ये बात गलत है आप अगर वो उस पॉइंट पे लाना चाहते समय एक तरीके से जिसने ईश्वर को मान लिया आर्य समाज के अनुसार जान लिया वो हर काम करते समय अपने मन में यही सोच रहा होता है कि ये सब ईश्वर ने करवाया है और वो अपने मुंह से अपनी धारणा ये नहीं होती मैंने कुछ किया मैंने कुछ पास आउट किया मैंने ये बोला मैंने बोला धारणा नहीं होती है मैंने किया का तो गलत मैं बोल नहीं रहा हूं मैंने किया मतलब मैंने ही किया यानी मैंने ही चेष्टा करी है मैंने चेष्टा चे आपके मन में आपके मन में सिर्फ चेष्टा की भावना होती है। यह भावना नहीं होती है कि इसमें शक्ति मेरी लगी कि नहीं लगी? इससे क्या फर्क पड़ता है? मेरे मन में होती है या नहीं होती? जो सच है वो सच ही है। मैं वो बताऊंगा मैं आपसे पूछ रहा हूं। जो सच है वो तात्विक सत्य है। मैं आपसे आपका व्यवहारिक सत्य पूछ रहा हूं ना। भौतिक सत्य क्या है? आपको ये फील आता है ना मेरी ताकत लगी कि नहीं लगी कि नहीं आता है?

01:48:55:15 मेरी मैं अगर मैं अपने आप को शरीर देख के चल रहा हूं। शरीर यानी मनुष्य देख के चल रहा हूं। मेरे भाई मैंने अभी आपको एक सामान्य पुरुष जो बंधन में उसी हिसाब से हम लोग बात कर रहे हैं। तो क्यों बात को ला रहे हैं कि मैं शरीर देख के चल रहा हूं। आप जो सोचते हैं किसी कार्य को करने में वो क्या सोचते हैं? वो बताइए। क्या सोचते हैं? हेलो यही सोचता हूं कि मैंने किया हां मैंने अपनी शक्ति से किया कि नहीं नहीं मैंने अपनी शक्ति से नहीं किया ये तो ये तो तात्विक जानकारी आप हर कार्य को करते समय यही सोचते हैं कि मैंने नहीं किया अपनी शक्ति से यही सोचते हैं

01:49:42:12 नहीं उस कार्य को करते समय नहीं सोचते हैं पर ये बात पता तो है ना कि मैंने पता है वही मैं यही होता है व्यवहार और परमार्थ पता होते हुए भी हमारे व्यवहार के अनुसार हमारे दिमाग में दूसरी जानकारियां चल रही होती है। अभी मैं आ रहा हूं। व्यवहार परमार्थ पे आपको अटकाऊंगा नहीं। अब मैं आ रहा हूं। यानी कि ईश्वर ऐसा कुछ कर सकता है जिससे हमें प्रतीति ईश्वर के विपरीत हो जाए। हस्तक्षेप ना करके आप सतही स्तर पर जितनी बार सोच रहे हो इस बोतल को मैंने उठाया और आपने इसी इसी के अंदर बोला है। चार पांच बार मैंने ये बोला मैंने ये बोला मैंने बोला। उसमें यही आ रहा है निकल कर के कि वहां आप मान रहे हो मैंने नहीं किया जबकि उसमें आपने केवल चेष्टा की है और कर रहा है ईश्वर वास्तविकता ये है पर आप मान के चल आप मैं एक्सप्लेन [गला साफ़ करने की आवाज़] कर देता हूं करने का मतलब ये है कि जो कर्म की चेष्टा जो है वो मैंने की है। उसके आगे की जो प्रोसेस प्रोसेससेस है उसमें तो ईश्वर की सहायता ही है। केवल चेष्टा मैंने की है। और जब भी हम मैं का उपयोग सुनिए सुनिए सुनिए सुनिए आप दिन भर आप दिन भर में जब काम करते हैं आप दिन भर में जब काम करते हैं तो आप यही पूरी लाइन उसमें ध्यान रखते हैं

01:50:57:15 कि मैंने केवल चेष्टा की है और ये सारी शक्ति ईश्वर की है मेरी शक्ति नहीं है ऐसा सोच सोच करके कार्य कर रहे होते हैं सोच सोच के नहीं करते पर ये ध्यान तो होता ही है ना तो क्या सोच रहे होते हैं उस समय आप जब आप आप जब पास हो जाते हैं या कोई दौड़ जीत जाते हैं तो आप वहां पर ऐसा फील करते हैं कि नहीं मैंने देखो उसको पटक दिया मैंने उसको यह बोला मैंने वो किया मैं जो दौड़ में जीत गया अपनी शक्ति पर आपको गर्व होता है आप चलिए आपने ये बोला ना कि मिथ्या मतलब मिथ्या ज्ञान आपको मिथ्या मिथ्या मिथ्या ये है कि आपके पास तो शक्ति है ही नहीं फिर भी आप अपनी शक्ति पर गर्व करते हो लो नहीं मैं अपनी चेष्टा पर गर्व करता हूं। मैं चेष्टा पर गर्व करता हूं। मैंने जो चेष्टा की थी यहां यहां आप यहां जनता देख रही है। यहां आपकी बात वो तय करेगी जनता। आप चेष्टा पे गर्व करते हो। पूरा आर्य समाज चेष्टा पे गर्व करता है। अपने शक्ति

01:52:02:19 आप ये बोलना चाह रहे हैं कि अगर कोई अज्ञानी है और अज्ञानी होने की वजह से जो है अपने अज्ञानी बंधन में जब तक है तब तक हम अज्ञानी ही हैं। क्योंकि हमारी व्यवहारिक जो क्योंकि हमारे अंदर जो व्यवहारिक इंफॉर्मेशन आ रही है मैं बता रहा हूं आपको क्योंकि हमारे अंदर जो इंफॉर्मेशन आ रही है बंधन में जब तक है तब तक हम इंद्रियों से इंफॉर्मेशन हासिल कर रहे हैं और इंद्रियों से आने एक मिनट भाई साहब एक मिनट पूरा कर लीजिए इंद्रियों से इंद्रियों के ऊपर हम इंडिपेंड है ठीक है हमें अनुमान प्रमाण और शब्द प्रमाण गुरु इत्यादि जब तक नहीं है हम एक जीव होते मनुष्य होते हुए प्राणी मात्र होते हुए हम इंद्रियों से जानकारी हासिल करने वाले हैं और उन जानकारियों के अनुसार बिल्कुल ऐसी प्रतीति होती है कि हां भाई मैंने ही किया ये सारी जो जानकारी है कि ईश्वर ने किया ईश्वर ने करवाया ये हमारी इंद्रियों से आने वाली सीधे तौर पर जानकारी नहीं होती है अनुमान प्रमाण इनडायरेक्ट वे में या फिर शब्द प्रमाण इन चीजों से आने वाली जानकारी होती है तब हम ये लोग ये मानते हैं तो वो जो सत्यता है उसको ना जानने के संबंध में जितनी बार हम अपनी इंद्रियों पर डिपेंड होंगे चीजों को जानने के लिए उतनी बार हम लोग अज्ञानी ही कहलाएंगे

01:53:17:25 उस दृष्टि से भले ही हम यहां पर बहुत बड़े संस्कृतज्ञ अरे तो ठीक है वो ज्ञानी अज्ञानी पे फिर मैं एक्सप्लेन करने लग जाऊंगा मुझे बताइए इस बात का उससे क्या संबंध कि ईश्वर पत्थर उठा सकता है नहीं उठा सकता क्या संबंध है इस बात का इससे संबंध है कि आपने बोला कि ईश्वर झूठ बोल देगा तो आप वहां पर आपत्ति जता रहे हैं कि ईश्वर झूठ नहीं बोल

⬜ Not used yet · 01:53:38:14 – 01:53:58:24 (0:20)

01:53:38:14 सकता नहीं तो आप बोल दीजिए ना बोल सकता है आपत्ति तो उसके बाद जताऊंगा ना झूठ बोलना जिस प्रकार जिस प्रकार रुकिए रुकिए अब मैं उसी पे आ रहा हूं बात आप भाई साहब पूरी बात बोलने दीजिए वहां पे जैसे आपको बोलनी थी ना एक्सप्लेनेशन करनी पड़ेगी केवल टैगलाइन नहीं बोल सकते मैंने कहा था वो करिए एक्सप्लेनेशन

01:53:58:24 तो ईश्वर ऐसी प्रतीति करवा सकता है अपनी विपरीत प्रतीति वो करवा सकता है जैसे वो यहां पर करवा रहा है एक मनुष्य को कि करो रहा है जबकि मनुष्य को प्रतीति हो रही है कि वो कर रहा है ईश्वर नहीं कर ईश्वर उसके कंट्रोल में अगर

⬜ Not used yet · 01:54:12:09 – 02:44:53:00 (50:41)

01:54:12:09 यह मानेंगे तो इसको तो यह लगेगा तो मैं अपने अनुसार कार्य करवा रहा हूं ईश्वर से तो ये तो प्रतीति यही होगी ना यहां पे वो बात अलग है कि गुरुजनों के वचनों के द्वारा शास्त्र के वचनों के द्वारा अनुमान प्रमाण के द्वारा हम लोग ये पता लगाएंगे नहीं साहब यहां पर भी वो अपने अनुसार ही कार्य कर रहा है ठीक है तो इसी प्रकार से वो वहां पर भी प्रतीति करवा सकता है जिसको आप लौकिक दृष्टि से झूठ या मिथ्या आचरण कह सकते हैं वो कर सकता है ऐसा अब आप आपका जो पत्थर बनाने वाला प्रश्न था। उसका और उत्तर भी ले लीजिए। और उत्तर भी ले लीजिए। आपने जब बात बोली क्या ईश्वर ऐसा पत्थर बना सकता है जो जिसको वो स्वयं ना उठा पाए। ठीक है? तो इसमें क्या है? दो दो बातें हैं आपकी। ईश्वर पत्थर बना सकता है जिसको वो स्वयं ना उठा पाए। तो इसमें आप जब ईश्वर कह रहे हैं तो ईश्वर हमने क्लेम ये किया है कि ईश्वर वो है जो सब कुछ कर सकता है। ये हमने स्वरूप बताया ईश्वर का। ठीक है? हम अब आपने कहा वो ईश्वर पत्थर बना सकता है। तो ना करने की बात ना कर सकने की बात उसके स्वरूप के विपरीत हो गई। ठीक। तो आपने यहां पर दो बातें

01:55:27:20 कर दी। एक क्या वो क्या ईश्वर पत्थर बना सकता है इस रूप में? आपने कहा कि क्या वो ईश्वर अपने सर्वशक्तिमत्ता को सिद्ध कर सकता है और फिर दूसरी बार कह दिया क्या ईश्वर ईश्वर ना हो के अपने आप को सिद्ध कर सकता है? ठीक है तो एक मिनट एक मिनट आपने आपने आपने अपनी पहली बात से दूसरी बात को काट दिया। आपने एक पंक्ति ऐसी बोली जिसमें आपने ये कहा क्या ईश्वर ऐसा कर सकता है? और फिर आगे कहा कि नहीं नहीं जैसे आपने कहा कि क्या ईश्वर ऐसा करके दिखा सकता है? उसके बाद आपने कहा क्या ईश्वर ऐसा नहीं करके दिखा सकता है? यह दो बातें हो गई। ईश्वर जब कह दिया तो आपने मान लिया सब कुछ कर सकने वाला। और ना कर सकने वाली बात जब कह दी तो आपने ईश्वर को काट दिया। जब ईश्वर को जब आपने उसे ईश्वर कहा तो आपने उसका ना कर सकना काट दिया। और जब आपने ना कर सकना कहा तो आपने ईश्वर काट दिया। इस तरीके से आपने अंतत गतवाई जो बात कही है उसका जब निचोड़ निकालेंगे तो निचोड़ निकलता है। क्या ईश्वर ऐसा कुछ कर सकता है कि वो कुछ ना करे? क्योंकि जब आपने ईश्वर कहा एक मिनट जब आपने ईश्वर कहा तो ना कर सकने को काट

01:56:42:26 दिया। जब आपने ना कर्षक ना कहा तो आपने ईश्वर को काट दिया। ठीक है? तो अब इसका इसका जो आपके द्वारा मांगी जाने वाली क्रिया है वो क्रिया आती है शून्य अभाव क्रिया तो जब अभाव क्रिया आती है तो हम कहेंगे कि भैया आप हमें क्रिया बताइए जिसका भाव हो जिससे कि हम करके दिखाएं आपको अभाव क्रिया आपने कहा कि क्या ईश्वर आपने कहा कि क्या ईश्वर ऐसा कुछ कर सकता है कि वो कुछ ना करे हां जैसे आपने कहा था ना हस्तक्षेप वाली बात यहां वो ऐसी स्टेज में रह सकता है रह सकता है कुछ ना करे आप अपनी क्रिया सिद्ध कर दीजिए इस वाक्य को। बोलिए। अब आपने काफी लंबा बोला इस और आपने बीच में एक चीज बोली है कि जो

01:57:29:13 ईश्वर ऐसा पत्थर बना दे जो खुद ही ना उठा सके। ये बात ईश्वर के स्वरूप के विरुद्ध है। ये आपने बोला है ना? ना उठा सकना। ना उठा सकना। ये जो है इससे ईश्वर की सिद्धि नहीं होगी। तो ईश्वर होना कटेगा इससे। ना उठा सकने से ईश्वर होना कटेगा। तो या तो आप उसे ईश्वर कह लीजिए या ना उठा सकने वाला कह लीजिए। तो ना उठा अगर नहीं उठा सकता यानी ईश्वर उस उस सेंस में ईश्वर नहीं रहेगा। फिर किस सेंस में? आप मुझे ये बताइए कि ऐसा पत्थर बनाना कि जो खुद ना उठा सके। ये बात ईश्वर के स्वरूप के विरुद्ध है ना? अल्टीमेटली आप यही बोलना चाह रहे हैं। आपने खुद ये बात बोली है अभी आपने इतना लंबा मैं आपको दोबारा से बता देता हूं। आपने एक क्रिया बोली है कि ऐसा पत्थर बना सकता है जिसको वो स्वयं ना उठा सके। पहला आंसर मैं दे चुका हूं। पहला वाला आंसर कि वो कौन सी क्रिया होगी जिससे आपको यह ज्ञात हो जाएगा कि जिससे वह मान तो बता दी मैंने आप वही आप अब गलती कर रहे हैं। आप फिर उसी मानने मनवाने पर आ गए फिर से। आपने वहां खुद कहा था कि तो कैसे मानूंगा मैं तो ईश्वर कहेगा कि हां

01:58:44:16 भाई मैं नहीं उठा पा रहा तो आपने मान लिया आपने यही तो [हंसी] फिर उससे बात आई थी फिर वहां से बात चली गई थी इसका मतलब ईश्वर झूठ बोल सकता था तो मैंने झूठ बोलने तो मैंने कहां से झूठ बोलने वाली बात से यानी आपके हिसाब से ईश्वर झूठ बोल रहा है वो ऐसा पत्थर नहीं उठा सकता यानी उठा सकता है जब ईश्वर मुझे बोल रहा है कि मैं नहीं उठा सकता यानी ईश्वर झूठ बोल रहा है। एक बात मेरी बात सुन मेरी बात सुन सुन देखिए आपकी मान्यता को प्रभावित करना ये एक अलग बात है। ठीक समस्त क्रियाओं को कर पाना ये अलग बात है। आप मुझे बता दीजिए आपकी मान्यता को प्रभावित करना है या समस्त क्रियाएं करनी है। अगर क्रिया करके दिखानी है तो बता दीजिए कौन सी क्रिया? आपकी मान्यता को प्रभावित करना है तो वो बता दीजिए। आपने इसका मतलब यह है कि यह जो क्रिया है यह नहीं आ रही है। समस्त क्रियाओं में नहीं आ रही है। यही कहना चाह रहा हूं ना। ये क्रिया है ही नहीं ना। हां ये क्रिया है। ये क्रिया है ही नहीं। ये क्रिया है ही नहीं। हां। है ही नहीं। एक्सिस्ट ही नहीं करती। एक्सिस्ट नहीं करती। तो इसको एक्सिस्टेंस में ला सकता है। किसको? इस क्रिया को। इस क्रिया को हां

01:59:59:18 ला सकता है। आपको अविद्या से वो मूर्ख बना देगा। साक्षी कौन होगा? एक्सिस्टेंस में। फिर वही फिर वही बात आ गई। आप मुझे मूर्ख बनाने वाली बात पे आ गए। आपने क्या बोला? यह अब रुकिए। अब रुकिए। आपने स्टेटमेंट दिया कि यह जो क्रिया है जो समस्त क्रियाएं कर सकने वाली है वो सब ईश्वर कर सकता है। ठीक है? ये जो क्रिया है उन समस्त क्रियाओं में नहीं आ सकती। तो सीधा सवाल है क्या इन इस क्रिया को ना कर सकने वाली जो क्रिया है या एक्सिस्ट नहीं करती। जो क्रिया घपोड़े हैं। इस जो क्रिया को है कर सकने वाली क्रिया में ला सकता है। यह जो एक्सिस्ट नहीं करती है। यह जो क्रिया है जो मैंने बताई एक्सिस्ट नहीं करती उसको कर सकने वाली क्रिया में ला सकता है। मैं फिर वही कहूंगा कि कर सकने वाली क्रिया में जब वो लाएगा मान लीजिए मैं स्वीकार कर लेता हूं आपको कैसे पता चलेगा कि वो आ गई। मुझे पता चलना ना चलना ये पॉइंट ही नहीं है। मैं पता करके अरे तो हम तो यही कह रहे हैं ना। हम तो यही कह रहे हैं कि ईश्वर वो समस्त कार्य कर सकता है जो मुझे पता चले। मैं तो यही कह रहा हूं। मेरा दावा यह थोड़ी ना है कि मुझे पता चले ईश्वर सब कुछ कर ले। हां। यानी मुझे मुझे जो पता नहीं चलेगा वो यह जो कार्य है मुझे पता नहीं चल सकता। अल्टीमेटली कंक्लूजन ये है आपका। हां ठीक है। तो मुझे ये कार्य पता नहीं वो क्रिया है। फिर वही बात फिर

02:01:15:06 अच्छा तो ये ये क्रिया जो है मुझे पता सकने पता चल सकने वाली क्रिया बन जाए ऐसा कर सकता है ईश्वर। फिर मैं कहूंगा वो कैसे पता चलेगा आपको? अटक जाओ आप इसी पे। तो वो तो आपको बताना पड़ेगा। वो मैं क्यों बताऊं? वो तो आप बताओ। अरे आप मुझे यह बताओ कि भैया इस चीज को इधर से उधर सरकाना यह क्रिया है। अब आप कहोगे कि मैं यह मान लूं कि ईश्वर है ही नहीं। क्या ईश्वर ऐसा कर सकता है कि मैं मान लूं कि ईश्वर है ही नहीं। तो उसके लिए ईश्वर को किसी क्रिया की आवश्यकता नहीं है। वो आपके दिमाग को घुमा देगा। मान लो। बहुत से नास्तिक घूम रहे हैं। उनको किसने घुमाया? दिमाग को दिमाग को घुमाए बिना नहीं कर सकता। बेसिकली तो दिमाग को ही तो घुमाया है। हां। तो दिमाग को घुमाए बिना नहीं कर सकता। दिमाग अल्टीमेटली आपका आंसर यही है कि भाई आपके जो दिमाग को घुमा देगा यानी जो मैं अस क्रिया को असंभव मान रहा हूं वो क्रिया को संभव मुझे मनवा देगा। वास्तविकता में असंभव ही रहेगी। वास्तविकता में असंभव ही रहेगी। वास्तविकता का साक्षी कौन होगा? जो आप उस रूप में साक्षी की आवश्यकता साक्षी की आवश्यकता क्या है? मुझे साक्षी की आवश्यकता है। मैं बताता हूं आपको। साक्षी की आवश्यकता ये है कि अगर आप यह कहेंगे कि देखिए वहां पे बाधित हो रहा है ईश्वर। ठीक है? आप यह कहेंगे कि वहां पर देखिए बाधित हो रहा है। तो बाधित हो रहा है इसलिए आपका भी ईश्वर

02:02:30:07 सर्वशक्तिमान नहीं है। तो मैं ये पूछूंगा आपसे कि आप वहां पे पहुंचे कैसे? आपने कैसे जाना कि वहां वो नहीं कर पा रहा है या कर पा रहा है। तब आप कहोगे भैया तुम ही बता रहे हो। तो भैया मेरी बात पे तुम्हें तब विश्वास हुआ जब तुमने मुझे ईश्वर मान लिया है। और ईश्वर तुमने मुझे तब माना जब मैं यहां तुम्हें दिखाई देने वाली समस्त क्रियाएं कर सकता हूं। तो ईश्वर का सभी क्रियाओं को कर सकने वाला होना आवश्यक है। भौतिक दृष्टि से होने वाली क्रियाएं जो पारमार्थिक या दिव्य दृष्टि है, आध्यात्मिक दृष्टि है उन क्रियाओं से उसके उसके जो है सर्वशक्तिमत्ता होते हुए उसकी सिद्धि की कोई आवश्यकता नहीं। और ये मैं अपने सभी वीडियोस में बताता हूं। जैसे कि एग्जांपल ले लीजिए। एग्जांपल ले लीजिए। एग्जांपल ले जिस प्रकार कोई जिस प्रकार कोई व्यक्ति यह नहीं कह सकता कि किसी के आवाज देने के कारण मैं जाग गया क्योंकि अगर वो सुन रहा है तो उसका सोना सिद्ध नहीं होता और अगर वो सो रहा है तो उसका सुनना सिद्ध नहीं होता तो सुनने वाला होने के आधार पे वो अपने जागने का खंडन नहीं कर सकता। सुनने वाला होने के आधार पर वो अपने जागने

02:03:45:10 का खंडन नहीं कर सकता। क्यों? क्योंकि सुनने वाला वो हुआ तभी है जब उसने जागने को स्वीकार किया है। इसी प्रकार से आध्यात्मिक दृष्टि से पारमार्थिक दृष्टि से जो बाध्यता इत्यादि जिसको आप बाध्यता के रूप में वो कर रहे हैं प्रस्तुत जिसके आधार पे आप ये कह रहे हैं भैया आपका भी ईश्वर वहां पर सर्वशक्तिमान नहीं है। है ना? उसके आधार पे आप ईश्वर का खंडन नहीं कर सकते। मगर जब हम उसको भौतिक क्रियाओं में ही बाधित करते हैं, दिखाई देने वाली क्रियाओं में ही बाधित करते हैं, तब वहां पर जो है उसकी जो सर्वशक्तिवत्ता बाधित होती है जिससे कि उसकी सिद्धि नहीं हो पाती। तो हमने हमेशा यही क्लेम किया है। नहीं तो आप बता नहीं क्योंकि तो सुनिए सुनिए सुनिए मैं ये मान के चल रहा था कि कुछ भी का मतलब कुछ भी। ठीक है? अब आप यह कहना चाह रहे हैं कि वो जो आप आप जो क्रिया बता रहे हो पत्थर बनाना आदि ये जो क्रिया है ये क्रिया ही नहीं है। संभव क्रिया ही नहीं असंभव क्रिया है। ठीक है? नहीं ना मैं बता रहा हूं। मेरे शब्दों में सुनो। आपने खुद बोला क्रिया ही नहीं है। वो एक्सिस्ट ही नहीं करती। बता रहा हूं ना मैं बता रहा हूं। मैं बता रहा हूं ना। आप एक्सिस्ट करा दो ना उसको। देखो मैंने क्या वो सब कर सकता है। मैं क्यों मैं क्यों करा रहा हूं? वो ईश्वर करवाएगा ना। जो एक्सिस्ट नहीं करती उस में ईश्वर लाएगा ना। उसका एक्सिस्टेंस उसका उसको एक्सिस्ट कराना भी एक क्रिया के रूप में आप एक्सिस्ट करा दो। लो लूप में

02:05:00:12 फंस जाओगे करते जाओगे नहीं तो मैं क्यों कराऊं नहीं मैं क्यों कराऊं भाई ईश्वर कराएगा ना वो तो क्योंकि आप कह रहे हो आप ये कर सकते हो कि नहीं मैं कह रहा हूं बताओ क्या करना है तो आप कह रहा जीरो आप कह रहे हो ये कर सकते हो कि नहीं एक मिनट आप कह रहे हो ये कर सकते हो कि नहीं जब मैं आपको कह रहा हूं बताओ क्या करना है तो आप कह रहे हो जीरो कुछ नहीं करना है तो भैया मुझे मैं आपको यह दिखाऊंगा ये बोतल इधर से उधर गई आप मुझे बता दो क्या करके दिखाना जाएगी वो यानी आपका कहना ये अल्टीमेटली मैं कंक्लूजन सही दे रहा हूं गलती आप हां या ना जवाब देना सुनिए सुनिए मैं भी अपना कंक्लूजन दूंगा मैं भी अपना कंक्लूजन दूंगा नहीं नहीं मैं आपकी बात सही समझा हूं या नहीं मैं वो पूछना चाह रहा हूं आपसे ठीक है यानी समझ हमारी जो हमारे भौतिक भौतिक दृष्टि से आपने बोला था भौतिक दृष्टि से या व्यवहारिक दृष्टि से जो भी क्रियाएं हो मतलब कर सकने वाली है वो सारी कर सकता है ईश्वर परमा परमार्थिक दृष्टि से नहीं कर सकता। पारमार्थिक दृष्टि से क्रिया है ही नहीं। व्यवहार है ही नहीं। परमार्थिक दृष्टि से क्रिया नहीं है। व्यवहार है। सुनिए। ठीक है। तो परमार्थिक दृष्टि में क्रिया नहीं है। क्रिया होना कर सकता है।

02:06:15:25 फिर मैं वही पूछूंगा कि क्रिया नहीं है जहां पे वहां पे क्रिया होना ये क्रिया है। ये आप बता दीजिए मुझे के सिद्ध कर दीजिए। चलिए नहीं अरे आपने व्यवहारिक दृष्टि में तो माना ना कोई सीधी सी बात है सीधी सी बात है मान्यवर सीधी सी बात है आपको ऐसी क्रिया के लिए चैलेंज करना है जिसका कोई साक्षी बन सके स्वतंत्र रूप से बिना ईश्वर की दृष्टि लिए हुए बस ऐसी क्रिया पूछिए आप मैं दूंगा आपको जवाब अब जिसमें साक्षी ही मैं हूं जिसमें साक्षी ही मैं हूं तो मैं आपको कहता जाऊंगा कर दिया फिर आप क्रिया सिद्ध करते जाइए उसको कैसे सिद्ध करेंगे क्रिया? यानी साक्षी बन सकने वाली जो क्रियाएं हैं संभव क्रिया में आ रही है वही सारी ईश्वर कर सकता है। साक्षी बनने वाली तो दूसरी क्रिया है ही नहीं ना। मैंने कहा सब कुछ कर सकता है। मैंने ही नहीं कहा जिसका एक्सिस्टेंस ही नहीं है वो नहीं वो भी करेगा वो। हां। भाई जिसका एक्सिस्टेंस ही नहीं है जिसका एक्सिस्टेंस जिसका अस्तित्व ही नहीं है तो उसको अगर वो करेगा भी तो आपको पता कैसे चलेगा? मैं ये पूछूंगा ना। आप बोलो करेगा या नहीं कर सकने का सामर्थ्य है या नहीं उसके अंदर आप आप ये बोलो आप दोहरी बातें कर रहे हो आप एक तो आप बोल रहे हो कि उसका एक्सिस्टेंस नहीं है इसलिए नहीं

02:07:30:26 कर सकता और दूसरी तरफ आप बोल कर देगा तो पता कैसे चलेगा मैंने आप एक बात या तो कर सकता है या नहीं कर सकता आप मुझे मैंने क्या कहा आप मुझे जो भी क्रिया दोगे वो वो कर सकता है। आप क्रिया के नाम पर चूर्ण दोगे तो मैं भी आपको चूर्ण दूंगा। सीधी सी बात यानी क्रिया नहीं है बेसिकली फिर वही बात आ जाएगी यह क्रिया नहीं है आपके हिसाब से आप जो मुझसे बुलवाना चाहोगे मैं आपसे बुलवाना चाहूंगा क्रिया सिद्ध करो चलो आप नहीं है ना अभी इस पॉइंट को इस पॉइंट को रखते हैं ये क्रिया नहीं है ठीक है आपने जो क्रिया दी है आपने जो क्रिया दी है वो अभाव क्रिया है अभाव क्रिया का मतलब आप मुझसे ये कह रहे हो क्या ईश्वर कुछ ऐसा करके दिखा सकता है जिसमें वो कुछ ना करे तो हां ईश्वर ऐसा करके दिखा सकता है। यह हो गया उसका करना। यह हो गया उसका करना। और मैं आपको बता दूं कि ईश्वर के पास एक अविद्या नामक शक्ति है। वो आपके मन को कंट्रोल करेगा। आपको आपको कहां-कहां से पता चलेगा कि जो जो आप सोचते थे वो सब ईश्वर ने कर दिया। मन को कंट्रोल वाली बात तो हटा दी थी हमने ना। मन को कंट्रोल वाली बात नहीं कर रही। अब एक और ये एक और आंसर है इसी प्रश्न का।

02:08:46:02 देखिए बात ऐसी है अगर आप थोड़ा सा एक मिनट अगर आप सकारात्मक दृष्टि से देखेंगे तो यह जो आप कह रहे हैं यह क्रिया नहीं कह रहे हैं आप कह रहे हैं क्या ईश्वर मुझको गलत इन दे सकता है या नहीं बस इसके मूल में ये है गर्भ में उसको क्रिया के डिजाइन में आप कह रहे हैं बस इतना है अंत गतवा उसमें आप इन मांग रहे हैं तो आपको इन गलत दे सकता है ईश्वर बिल्कुल दे सकता है नास्तिक कैसे घूम रहा है क्रिया जो है यह नहीं आपने बोला ठीक है वो वो करते रहो आप वो करते रहो मैं भी करता हूं करते रहो आप आप बोलना नहीं चाह रहे हो देखिए देखिए आप आप आप भी तो नहीं बोलना चाह रहे हो आप भी तो आप भी तो नहीं बोलना चाह रहे हो आप भी तो नहीं बोलना चाह रहे हो मैं तो देखिए अगर मैं मैं आप आपने ये बोला कि क्रिया नहीं है। मैंने इस बात को मान लिया अब्दुल मुस्कान से कि भाई ये क्रिया नहीं है। ठीक है। दीजिए करने के लिए मुझे दीजिए क्रिया करने के लिए क्रिया नहीं है ना यह आपने ये बोला ना स्टेटमेंट अभी यह क्रिया नहीं है आपने ऐसी बात बोली है जिसमें आपने जो करने को कहा है उसको ना करने को भी कहा है ये बात है ये क्रिया नहीं है ना अल्टीमेटली आपने आंसर यही दिया है

02:10:02:07 अल्टीमेटली आंसर ये है कि आपने शून्य क्रिया दी है तो शून्य क्रिया जो ईश्वर है करके दिखा रहा है खड़ा है नहीं कर रहा है कुछ नहीं अब आप बदल रहे है आपने बोला था कि आप ऐसी क्रिया आप बदल रहे हैं आप बदल बदल रहे हैं। आपने ये बोला था कि आपने ऐसी क्रिया दी है जो क्रिया है ही नहीं। या फिर क्रिया दोबारा सुन आप दोबारा सुन लीजिए। मैंने सभी चीजें बोली है जो आवश्यक है और कोई भी इस चर्चा को देखेगा तो वो निकाल लेगा अपना निर्णय। हां निर्णय को तो छोड़िए। निर्णय तो जो लोग देख रहे हैं वो निकाल ठीक है। अब हम इसको एक चीज से ले आते हैं। अल्टीमेटली सुनिए तो सही करेंगे फिर मैं क्रिया करूंगा। लूप में फंसे रहोगे। नहीं नहीं मुझे बोलने दीजिए ना। मैं क्या बोल रहा हूं? सुन तो लीजिए। सुन तो लीजिए। बोल लीजिए। बोल बोल सुन तो लीजिए। यानी ये जो क्रिया है ये क्रिया नहीं है। तो फिर वही सवाल आ जाएगा कि ये जो क्रिया है ये क्रिया नहीं है। तो इसको क्रिया ना होने से क्रिया हो सकना में ला सकता है ईश्वर। क्रिया ना होने से क्रिया हो सकने में लाना एक क्रिया है। ये आप बता दीजिए कैसे क्या करना होगा उसके लिए कि आप मान लो उसको। तो हां मैं करके दिखा। करेगा मैं क्यों बताऊंगा कैसे करेगा आप तो प्रक्रिया कैसे करेगा नहीं कैसे कैसे करेगा नहीं कैसे करेगा

02:11:17:10 नहीं मैं पूछ रहा हूं कि ये क्रिया है तो इसको क्रिया सिद्ध करके दिखाइए आप अगर ये क्रिया है तो इसको क्रिया सिद्ध करिए ना आप क्रिया क्रिया नहीं है ना हम ये मान के चल रहे है ना कि क्रिया नहीं है अभी तो हमने मान लिया क्रिया नहीं है है ये क्रिया है ये शून्य क्रिया है अभाव क्रिया है इसका अभाव है अगर भाव है अभाव है। भाव है तो आप भाव करके दिखा दीजिए मुझे कैसे भाव सिद्ध होगा मैं करके नहीं दिखाऊंगा ना करेगा तो ईश्वर अभाव से भाव ईश्वर करेगा ना इस क्रिया को अभाव से भाव करने करना क्रिया है ये भी एक अभाव क्रिया है लो मानोगे कैसे सब कुछ कर सकता है वो खड़ा है हां यानी हां हां हां हां यानी ये अभाव से भाव नहीं हो सकता असंभव क्रिया है बेसिकली अभाव से भाव आप ये बोल रहे हो ना कि आप जो क्रिया बता रहे हो वो क्रिया हो है ही नहीं असंभव क्रिया है यही बोलना चाह रहे हो ना आप नहीं मैं यह बोलना चाह रहा हूं यह क्रिया है। शून्य क्रिया है। यह इस क्रिया में ना कुछ ना करना ही यह क्रिया है। हस्तक्षेप ना करना ही क्रिया है। लो मैं ये कहना चाह रहा हूं। फसो असंभव क्रिया है ना ये बेसिकली। नहीं शून्य क्रिया है। अभाव क्रिया। फिर वही अभाव से अभाव

02:12:32:14 वाली बात आ जाएगी। फिर आप क्या बोलोगे? मैं फिर वही कहूं वो भी अभाव क्रिया है। हां वो भी नहीं कर सकता। कर तो रहा है कुछ ना करके वो अभाव क्रिया कर तो रहा है। जिसका अभाव है वो। लो मैं क्यों कहूं क्यों नहीं कर सकता? कर रहा है। तो ये तो असंभव को संभव कर रहा है क्या वो? वह कुछ ना करके कुछ ना करने वाली क्रिया कर रहा है। आपने कहा मैं यह नहीं कह रहा असंभव को संभव कर रहा है। आपने क्रिया ही ऐसी दी है जिसका एकिस्टेंस नहीं है। तो यानी कि आप कह रहे हो वो असंभव है। असंभव है वो क्रिया। नहीं शून्य क्रिया है। क्योंकि वो बोली जा रही है इसलिए क्रिया तो है। मगर उसका क्या अंतर है? अगर यह शून्य क्रिया असंभव क्रिया जो बोल रहा हूं उसमें अंतर क्या है? बता रहा हूं। बता रहा हूं बता रहा हूं। आपने क्योंकि वह बोली है क्रिया के रूप में तो इसलिए क्रिया को लेना पड़ा और क्योंकि अभाव है इसलिए शून्य है तो शून्य प्लस क्रिया को जोड़ा तो हुआ कि भैया कुछ ना करना ही वो क्रिया है। लो अब ठीक है काफी देख लिया यहां तक लोग समझ जाएंगे नहीं हो गया आपको आगे बढ़ना है इस पॉइंट को ठीक है इस पॉइंट को जितना ठीक है इस पॉइंट को यही खत्म करते हैं देर तक खींच लेना वो लूप है उसमें ही आप घूमते घुमाते रहोगे ठीक है

02:13:48:02 लोग निर्णय अब इसमें एक बात अब इसमें एक जरूरी बात है। जरूरी बात है। इसमें एक जरूरी बात यह है कि आप जो ये जोड़ रहे हो इस तरह की चीजों क्या क्या ईश्वर मर सकता है? क्या ईश्वर अपना अंत बता सकता है? क्या ईश्वर ऐसा पत्थर बना सकता है? जो इन चीजों से आप जोड़ रहे हो अवतार को। ठीक है? यानी कि अवतार को मैंने ये बोला ही नहीं। मैंने ये नहीं बोला। आर्य समाज की ओर से आए हो ना आप और ये सारी जनता के लिए हो रही है ना ये सरता दोनों के लिए हो रही है क्या ईश्वर सर्वक्तिमान [हंसी] जो आप बता रहे हो तो आप ये गलत है फिर आप अवतार में जाके इसका कुछ पॉइंट बना के निकाल रहे हो ये गलत बात है मैंने अवतार की बात करी नहीं अवतार में आए नहीं भाई अवतार के अवतार इसमें अवतार कहां है अभी तो हम इसमें अवतार में आए नहीं अरे भैया तुम नहीं ला रहे तो मैं तो ला सकता हूं मैं स्वतंत्र नहीं हूं क्या? आप नहीं लाओगे तो मैं तो लाऊं। मेन जो हमारा हां चलिए बोलिए। हां ठीक है। तो कुल मिलाकर के ये सारे जो तर्क दिए जाते हैं ये वाले प्रश्न किए जाते हैं। इस पर हमने खूब देर तक बात कर ली है। अब बात आगे बढ़ती

02:15:03:03 है कि क्या कहते हैं? ये जो हां ये सारे तर्क इसलिए दिए जाते हैं क्योंकि आपके अनुसार अवतार लेना इसी तरह का एक अभाव शून्य वाली क्रिया वाला कार्य है क्योंकि अवतार लेना मतलब किसी एक जगह आ जाना ईश्वर का और जबकि ईश्वर सर्व्यापक है तो जब ईश्वर सर्वव्यापक है तो उसके स्वरूप में स्थापित है कि वो सर्व्यापक है। तो इसलिए वो किसी एक जगह आएगा तो उसका ईश्वर होने का खंडन हो जाएगा। तो इसलिए कह सकते हो आपकी ओर से बोल रहा हूं। आपने आप बोलते हो कि नहीं बोलते हो मुझे नहीं पता। आपकी ओर से बोल रहा हूं। तो इसलिए यह भी शून्य क्रिया हो जाएगी अवतार लेना। तो इस पर बात करें हम

02:15:42:04 इस पर बात करेंगे उस फिर आपकी ओर से आपको फिर उसमें बहुत लंबा चला जाएगा ना फिर आपकी ओर से या आपने जो आर्य समाज का कंक्लूजन निकाला वो सही भी है या नहीं। ये विषय पूरा चिढ़ जाएगा। सीधे आप सीधे आप ये बता दो कि अवतार को आप मानते क्यों नहीं हो? बस ये बता दो सीधे काम खत्म जो शुरू में मैंने पूछा था। यही तो बात है। आप बता दो मैं उसका खंडन करता चलूं। अरे क्या खंडन करेंगे? इसमें तो फिर दूसरा विषय हो जाएगा ना वो। हम

02:16:20:16 दूसरा विषय हो जाएगा। तो आप अवतार को मानते हो क्या? नहीं मानते। पर ये तो अवतार को ना मानने के चक्कर में ही तो सर्वशक्तिमान पे हम लोग वो कर रहे हैं ना। ऐसा भी ऐसा नहीं है। सर्वशक्तिमान का अर्थ जो आप कुछ भी कर सकना बता रहे थे उस पर उस पर आ रहा था मैं तो उस पर तो हो गई चर्चा आपके पास और भी कुछ है कुछ भी करना कर सकना मैं या ये शून्य क्रिया वाला ही है या और कुछ भी है इसमें और भी चीजें आती है ना जो जैसे ईश्वर कुछ भी कर सकता है ये बात आप रखते हैं ठीक है तो ये बात रखते रखना यानी ये बात जो है ये सत्य है ठीक है। प्रतीति है। प्रतीति है। वास्तविकता में तो ईश्वर हलचल भी नहीं कर रहा है और आपका भी नहीं कर रहा है। आप कहते हो गति कर रहा है। गति करवा रहा है। यही यही दिक्कत आ जाएगी। बिना ये बात सत्य नहीं है। पारमार्थिक सत्य है। व्यवहारिक सत्य नहीं है। व्यवहारिक सत्य है। पारमार्थिक सत्य नहीं है। उल्टा बोल दिया आपने। [हंसी] तो व्यवहार व्यवहारिक सत्य है ये। व्यवहार में ही आते हैं हम। ठीक है? व्यवहारिक सत्य

02:17:35:20 में तो यानी इसका उल्टा असत्य होगा। ईश्वर कुछ भी कर सकता है। इसका उल्टा ईश्वर कुछ भी कर सकता है। ये बात सत्य नहीं है। इसका उल्टा असत्य ही होगा ना। ईश्वर कुछ भी कर सकता है। ईश्वर कुछ भी नहीं कर सकता है। असत्य हो गया। हम ईश्वर कुछ भी कर सकता है। हां यानी इसका जस्ट उल्टा। सिंपली बोलो तो तो क्या उल्टा नहीं ये जो बात ये जो बात मैंने बोली कि ईश्वर कुछ भी कर सकता है ये बात सत्य है व्यवहारिक में चलो व्यवहारिक में बात करते हैं अभी सत्य है ये बात व्यवहारिक सत्य इसका उल्टा इसका उल्टा असत्य है इसका उल्टा असत्य है किस परिपेक्ष में पूछ रहे हैं वो परिपेक्ष अपना पूरा बताइए ना आप अपना पूरी बात अपना अपना क्लेम रखिए पूरा तो इसका उल्टा क्या होगा आप मतलब मतलब आप समझ नहीं पा रहे मैं क्या बोलना चाह रहा हूं। आप मेरा टेस्ट ले रहे हैं क्या? आप अपने पक्ष को रख टेस्ट टेस्ट ईश्वर ईश्वर जो है कुछ भी कर सकता है यानी सर्वशक्तिमान है। ठीक है? तो यानी ईश्वर सर्वशक्तिमान सर्वशक्तिमान जो आपकी परिभाषा है उसके हिसाब से ईश्वर सर्वशक्तिमान नहीं है। ये बात असत्य है ना? फिर आप शून्य क्रिया में जाएंगे लेके इसको। इसीलिए तो

02:18:50:21 बोल रहे हैं। आप असत्य असत्य ही हुआ ना? इसका क्या मतलब हुआ? क्या? यानी ईश्वर जो है सर्वशक्तिमान नहीं है। ईश्वर जो है अल्पशक्तिमान है। यह बात झूठ हुई ना? व्यवहारिक चलो व्यवहारिक में झूठ है कि नहीं? हां हां झूठ है। ये बात झूठ है। व्यवहारिक में ठीक है। तो इसका मतलब ये है कि आप जो है ये ये बातें जो है एक दूसरे को आपस में काटती। ठीक है ना? कि वो अल्पशक्तिमान नहीं है। ये वाली बात यार फिर आप वहीं पे लेके जा रहे हो। मुझे लग रहा है थोड़ा सा इंटेलेक्चुअल व्यक्ति आया है उससे बात हो फिर आप शून्य क्रिया में लेके जाओगे इसीलिए तो मैं कह रहा हूं अपना पक्ष आप आप सुनिए आप मैं मैं बता दूं आप मुझसे कुछ बुलवाइए मत आप अपना पक्ष रखिए जैसे आपने एक समय कहा था मैं आपसे प्रश्न एक मिनट पक्ष कैसे रखा जाएगा यह बताइए आप तो आप अपनी आप मैं बता रहा हूं मैं बता रहा हूं ना मैं बता रहा हूं ना कंफर्म आप मेरे पर्सेक्टिव से जो जो आप समझ रहे हैं वो वो समझ के अनुसार अपना पक्ष रख दीजिए। फिर मैं कहूंगा कि यहां पे आपने गलत समझा उसको करेक्ट करूंगा। रखिए हम ये बात क्या बोलते हैं अपना जो एक तार्किक

02:20:08:00 कैसे होंगे इस बात को? बहुत परेशान है आप शुरू से ही। कहां परेशान हो? मैं क्योंकि जब सीधा सवाल पूछ रहा हूं तो आप दो ही नहीं हो तो आपको एक्सप्लेन करना पड़ेगा डिटेल में। इसका मतलब सीधा सवाल सीधा सवाल पूछ रहे हैं आप। शून्य क्रिया मांग करते पूछ रहे हैं। सीधा ही सवाल असंभव शून्य ये सब जो ये सब जो नास्तिकों की चीजें हैं ना क्या ईश्वर ऐसा पत्थर ये सब बहुत सालों से चली आ रही है। कोई आज पहली नहीं है। बस ये है कि आप वहां से उठाकर यहां दे देते हो। बस

02:20:42:07 ठीक है। टिप्पणीपणी इस प्रकार की ना करें। छोड़िए। ये टिप्पणी नहीं है। मैं आपका आर्य समाज का ऑफिशियल चैनल दिखा दूंगा। जहां पर उन्होंने यही कहा है ऊटपटांग प्रश्न नाम से वीडियो है उसमें यही कहा है आपके आर समाज जी ने ऑथेंटिक आचार्य हैं जो उन्होंने ये ऐसा ऐसा प्रश्न करते हैं ऊटपटांग नास्तिक ईश्वर को ना मानने वाले तो ऊटपटांग आर्य समाज के फेम में लेंगे ना आपके में तो ऊपटांग है ही नहीं वो बातें छोड़िए फिर मैं उस पे आ जाऊंगा तो रहने दीजिए फिर वो अलग विषय चला जाएगा तो पॉइंट मेरा यही था कि क्या ईश्वर मैंने आपसे कहा था ना आपसे मैंने ने कहा था ना कि आप जो है परेशान तो आप शुरू से कई बार बड़बड़ा चुके छोड़िए फिर ऐसा हो जाएगा। छोड़िए फिर ऐसा हो जाएगा। छोड़िए फिर ऐसा हो जाएगा। आपने करीबन अब तक कुछ नहीं तो 1500 रखा है। इसलिए दूसरी में चले जाएगा। मैं आपको कुछ ऐसा में नहीं बोल रहा हूं। क्या नहीं तो इससे मुझे प्रतीति हो रही है ना कि आप परेशान है। थोड़ा सा बुदबुदा लेते हैं। अपने मन में ही कुछ दो चार बातें अपने आप से बात कर लेते हैं। तो कुछ परेशानियों का सामना कर रहे हैं। तो इसलिए मुझे वो 20 बार लगा एक जैसा। इसलिए मैंने कहा कि आप परेशान दिख रहे हैं शुरू से। जी। हालांकि ये टिप्पणी नहीं करनी चाहिए। चलो ठीक है। आपने जब टिप्पणी कर दी

02:21:57:08 कि आपके लिए तो वो पटांग नहीं है और अभी मैं छोड़ के आया हूं वहां पर एक जगह आपने निर्णय दिया था वो भी आपको नहीं करना चाहिए था और मुझे जो प्रतीति आप बार-बार बड़बड़ा लेते हैं ना मन में। अपने अपने आप से बातें कर लेते हैं ऑनलाइन लाइव चर्चा में बार-बार और एक ही बार नहीं कई बार इसलिए मुझे ऐसा लगा कि आप परेशान है शुरू से ही आप ऐसा अपनी सामान्य जीवन में भी करते हो तो बात अलग है मुझसे तो आप पहली बार मिल रहे हैं तो मुझे यही लगेगा ठीक है इस बात को छोड़ दीजिए इस बात को छोड़ दीजिए ठीक है ना इसमें तो कोई समस्या नहीं हम जी तो होता क्या है व्यवहारिक इसमें सप्ताह काम है। कारण कार्य के नियम काम करते हैं। यह बात आप मानते हो? कारण कार्य के नियम या फिर विरोधाभास ना हो सकने वाले जो नियम पूरी पूरी बात करने की कारण कार्य के नियम काम करते हैं। ये बात आप मानते हो कि नहीं? क्योंकि उसके बाद ही बात कही जाएगी ना। देखिए पहली बात तो यह है कि इन सबके गर्भ में यह बात है कि भैया हम यह बात इसलिए कहते हैं क्योंकि ईश्वर अवतार ले सकता है पर आप अवतार पर बात करने वाली बात से बच रहे हैं। पे भी करेंगे

02:23:12:24 करेंगे। नहीं नहीं कोई दिक्कत नहीं है। उस भी करेंगे बात। सवा दो सवा दो घंटे हो चुके हैं। सवा दो घंटे हो चुके हैं। सवा दो घंटे में आपने कितनी कितना सवाल पूछे? मैंने कितने सवाल पूछे वो छोड़ दीजिए उस बात को। बात सवाल पूछने की नहीं होती। ये बात होती है किसने किसके विषय पर कितना टाइम गया। बात सवाल पूछने की नहीं होती है। बात होती है किसके विषय में कितना टाइम गया? तो विषय तो आप वही सेम ही चल रहा है। विषय कहां बदल रहे हैं? सर्वशक्तिमान वाले पे विषय चल रहा है। हां तो आप अपनी बात बोलिए। फिर आप हां बात तभी बोली जाएगी ना जब आप यहां नाम में उत्तर देंगे। व्यवहारिक दृष्टि से नहीं होता मुझे। मैं मैं आपको ये बता रहा हूं कि आप अपने पक्ष को इस्टैब्लिश करिए कि ये है मेरा मत। अब आप बताइए इसमें मैंने क्या-क्या गलत कहा है। मैं उसको बता दूंगा। जी कैसे कंप्लीट होगी बात? क्योंकि आप शुरुआत में अगर अपनाट कंप्लीट नहीं आप उत्तर अगर हां या ना में जवाब देंगे उसके आधार पे ऐसा है जैसे आपने कार्य कारण वाला सिद्धांत कहा तो मैं किस परिपेक्ष में उसका उत्तर दूंगा। उसमें कितनी बड़ी एक्सप्लेनेशन होगी? उसमें एक अलग से व्यर्थ का टाइम जाएगा। आप पहले अपनी किस परिपेक्ष में आप मुझसे क्या प्रश्न पूछ रहे हैं उस परिपेक्ष

02:24:28:02 के साथ उस प्रश्न को रख दीजिए। फिर मैं अपना उत्तर दे दूंगा। जैसे जब लीला की बात आई थी पूछ रहा हूं अपना परिप एक मिनट जैसे अब मैं यहां पे बता दूं जैसे कि बीच में एक बात अटकी थी कि क्या ईश्वर ऐसा आचरण कर सकता है जो जड़ के जैसा हो। जबकि वो है चेतन। तो जब आप मेरी चीज को समझ नहीं पा रहे मैंने अपना परिपेक्ष बताया था कि मैं यहां पर लीला सिद्ध कर रहा हूं भगवान की। ठीक है? तो आपने फिर जो जिसको हम लीला कह रहे हैं उस अगर वो लीला है आपके अनुसार जिसको हम लीला कर रहे कह रहे हैं। अगर वो लीला है तो आपने उस लीला को जिसे हम अपने शब्दों में लीला कहते हैं। उस लीला को आपने स्वरूप ईश्वर के स्वरूप में फिट कर लिया। यहां ये उसका स्वरूप का कार्य है। इतने अंशों में इस इस कारण से फिट कर लिया नहीं। ये गलत गलत बात है। फिट कर लिया नहीं। इसका मतलब यह है कि आपको पहले से पद पता नहीं। अब आप अपने अब आप अगर आप आर्य समाज के ऊपर आक्षेप कर रहे हैं। आर्य समाज के हिसाब से पहले से ही आपको अब आप अपने अब आप अपने परिपेक्ष से बता दीजिए। अब आप अपने परिपेक्ष से बता दीजिए कि आप कौन सा प्रश्न क्यों पूछ रहे हैं। जी बताइए। मेरा ठीक है। प्रश्न सिंपल सा ये है कि या फिर ऐसे

02:25:44:12 या फिर ऐसे ऐसे कर लेते हैं या फिर ऐसे कर लेते हैं। जैसे आपने मुझसे प्रश्न पूछा कारण कार्य तो इसका सर्वशक्तिमान से या अवतार से क्या संबंध है वो बता दीजिए। हां हां बिल्कुल संबंध पहले बात बताऊं उसके बाद संबंध बताऊंगा ना। हम अपनी जो बात है वो स्थाप रखूंगा उसके बाद संबंध इसका वो बताऊंगा क्या संबंध है इसका हां बताइए है ना तो कारण कार्य ये जो बात है ईश्वर कुछ भी यानी एक सत्य स्टेटमेंट जो व्यवहारिक दृष्टि में सत्य स्टेटमेंट है ईश्वर सर्वशक्तिमान है ये बात सत्य है इसका उल्टा असत्य है इस पर हमने एग्री कर लिया ठीक है तो होता क्या है कि किसी सत्य बात को आप सुन रहे हैं क्या बोल रहा हूं सुन रहा हूं सुन रहा हूं सुनो हम किसी सत्य बात को रखने सत्य बात को रखने के लिए कुछ नियम है जो हम पहले से मान के चलते हैं। ठीक है? जैसे लॉज़ ऑफ लॉजिक बोला जाता है जिनको कि भाई लॉ ऑफ़ नॉन कंट्राडिक्शन हो गया या फिर कारण कार्य को हम पहले से मान के चलते हैं कॉज एंड इफेक्ट को। उसके आधार पे हम अपनी बात रखते हैं। हां मैं पूरा बोल ही रहा हूं ना। उसके आधार पर हम कोई भी बात रखते हैं कि भाई यह बात सत्य है या कोई भी क्लेम करते हैं बेसिकली। ठीक है?

02:26:59:18 उस नियम को मान करके लेकिन अगर हम यह बात अगर हम यह सवाल पूछेंगे कि क्या ईश्वर उस नियम को तोड़ सकता है या नहीं तोड़ सकता है? इस पर आप क्या जवाब देंगे? इस सवाल का आर्य समाज और मेरे बीच में जो मतभेद है उससे क्या संबंध है? सर्वशक्ति मता की परिभाषा में आएगा नहीं। सर्वशक्तिता मैं एक्सप्लेन एक्सप्लेन एक्सप्लेन कर देता हूं। एक मिनट एक मिनट एक मिनट क्या है? चर्चा चर्चा सुनिए चर्चा बहुत लंबी हो चुकी है। तो अब जो है मैं थोड़ा सा मेन पॉइंट पे आना चाह रहा हूं। इसलिए मैं अब आपसे पूछ रहा हूं। ये जो सर्वशक्तिमत्ता से जोड़ते हुए आप ये पूछ रहे हो कि क्या बोला आपने? क्या पूछा है? मैंने यह पूछा कि सर्व यह अपना जो नियम है लॉ मतलब यह कारण कार्य वाले कारण कार्य समझ लो अभी के लिए इस बात को मानकर ही हम कोई चीज आधार रखते हैं किसी भी चीज का ये जो बात है कि ईश्वर कोई सर्वशक्तिमान है ये एक सत्य बात है व्यवहारिक दृष्टि में चलो व्यवहारिक का ही ले लेते हैं व्यवहारिक दृष्टि से ये बात सत्य बात है इस बात को कहने के लिए हमें कारण कार्य को आधार बनाना पड़ेगा ठीक है हम अब कारण कार्य जो है आधार बन गया हमारा हम

02:28:14:21 तो अब हम उस आधार को छोड़ नहीं सकते ठीक है कारण कार्य ही आधार बनेगा हमारा मतलब कार्य के पीछे कारण होना चाहिए ना ये कह रहे हो आप हां हां कह रहे हो तो यानी कि सीधी बात बोलो ना अवतार लेने के पीछे का कारण क्या है नहीं नहीं नहीं नहीं अवतार का तो बोल ही नहीं रहा हूं मैं सर्वशक्ति माता की परिभाषा भी आ रहा हूं अभी अवतार की बात नहीं अवतार की बात भी है दूसरी आगे आएगी तो क्या जो ये सिद्धांत है कारण कार्य का। क्या ईश्वर इस सिद्धांत को भंग कर सकता है या नहीं कर सकता? अरे यार फिर तुम शून्य क्रिया पे आ गए। अब आप जाओ बहुत देर हो गई। हो गया काफी लंबा टाइम हो गया। आप जा सकते हो। कल बात रुकिए इसका जवाब दीजिए। इसका जवाब नहीं। फिर से फिर से शून्य क्रिया पे आ गए ना आप। हो चुकी शून्य क्रिया पे बात। उसी का एक दूसरा रूप प्रस्तुत कर रहे हो आप। आप यही तैयारी करके आए हो शून्य क्रिया। फिर मैं आपको फसाऊंगा के ये क्रिया है ये शून्य। आप देखिए मैं मैं बताता हूं। आप जो है उसकी नहीं मेरा काम है मेरा काम है क्रिया करने का। आपका काम है मुझे क्रिया बताने का। आप क्रिया बताओ मैं करके दिखाता हूं सीधी। क्रिया बता दी ना मैंने कारण कार्य कारण कार्य को भंग कर दे ईश्वर। यही क्रिया है। ये ये क्रिया है या सिद्ध करके बताओ। मैं तो शून्य क्रिया बोल रहा हूं ना इसको। नहीं ये क्रिया है ना? जैसे उदाहरण

02:29:30:02 के लिए कारण से ही कार्य होता है। ये आप जानते हो। मतलब ये आप बोल रहे हो। ठीक है? व्यवहार में चलिए तो व्यवहार में कारण से कार्य होता है। यह दिया है। व्यवहार में बिना कारण के कार्य करके दिखा दे तो आप भंग हो जाएंगे। तो यही तो बात है। अब ये बिना कारण के उसने कार्य किया है। ये ये सिद्ध कैसे होगा? आपने कहा दिखा दे। दिखा दे। आपने क्या बोला? दिखा दे नहीं। नहीं नहीं अब दिखादे को पकड़ो ना। अब पकड़ो दिखादे को। दिखादे को पकड़ो ना। हां दिखा दे अब किस चीज अब कैसे देखोगे कैसे डिसाइड होगा देखा आपने बताओ चलो

02:30:12:04 यही है कि भाई बिना जैसे हम कारण के बिना कार्य नहीं मानते ठीक है मैंने कहा आप कैसे मानोगे उसने बिना कारण के किया कि कारण से किया है ये आप कैसे मानोगे बस ये बताओ अरे फिर आप मानने का मानने की बात ही नहीं ना आपने कहा ना दिखा दे आपने कहा दिखा दे अरे तो दिखा देते आप कर रहे हो बात कर कर दे चलो ठीक है आप अब आप अब जा सकते हो भाई साहब जा सकते हो आप अब अगली बार जो है अवतार विषय पर चर्चा करने आइएगा शून्य क्रिया पे हमारी बहुत सारी बात हो चुकी है जनता देख चुकी है ठीक है अब आप जो है सवा दो घंटे हो चुके हैं और अब अवतार पे अगली बात हम करेंगे कि आप ये जो शून्य क्रिया से अवतार को जोड़ते हो तो हम देखेंगे कि जुड़ता है कि नहीं। ठीक है? जय श्री राम।

02:31:02:20 [गला साफ़ करने की आवाज़] ले दे के जो अभी तक मुझे समझ में आया जो महानुभाव थे हां हालांकि इनसे बात करने में आज मुझे जो अभी तक जितने भी आर्य समाजियों से बात की हो सकता है कि निर्भय के साथ उस लेवल तक जा सकते थे मगर वो शायद क्या कहते हैं निर्भय जो है उस मूड में आया था कि उसको जो है लड़ना ही शायद उस मूड में आया था। वो बता भी रहा था कि मेरा पहले से एक पर्सेक्टिव था। मगर अगर निर्भय के साथ और बहुत आगे तक जा सकती थी चर्चा। इनके साथ चर्चा करके बहुत आनंद आया और थोड़ा सा ये क्या है कि अभी तक का निष्कर्ष ये निकल रहा है। ये आए थे शून्य क्रिया लेकर के अभाव क्रिया लेकर के और उसके ही कई सारे उदाहरण होंगे अलग-अलग तरीके से। है ना? तो वही जैसे पहले हो गया क्या ईश्वर ऐसा पत्थर बना सकता है? फिर बिना कार्य के कारण बिना कारण के कार्य कर सकता है। वो सब शून्य क्रिया का ही एक प्रवाह है। तो शून्य क्रिया वो कर सकता है। शून्य क्रिया का गर्भ में क्या है? कोई क्रिया नहीं है तो कोई क्रिया ना करने की उसमें रह सकता है। वो नहीं कर रहा क्रिया। अच्छा

02:32:18:02 अब जैसे इन्होंने कहा बिना कारण के कार्य। ठीक है? तो नास्तिक क्या मानते हैं? कि बिना कारण के सृष्टि बनी हुई है। ईश्वर नहीं मानते वो। तो अब वो नास्तिक जो मान रहे हैं वो किसकी सत्ता में मान रहे हैं? वहां ईश्वर की सत्ता नहीं है। है तो हां तो रावण ने वेद को नष्ट नहीं करने मोहम्मद ने वेद को नष्ट करने की कोशिश नहीं की। क्या उसने क्या कहते हैं जो स्वामी प्रसाद मौर्य ने रामचरितमानस को जलाया नहीं क्या? तो कहने का मतलब यह जो महानुभाव आए थे यह अलग-अलग प्रकार से वह सर्वशक्तिमान का खंडन करने आए थे। हालांकि इनके पास संभवत अभी अवतार की तैयारी नहीं है। इसलिए जितनी बार हमने इन्हें अवतार पे लाना चाहा तो आ नहीं रहे। सर्वशक्तिमान पे ही शुरू से चले हैं। तो पहला मैंने रख दिया था कि भाई उस सर्व का अर्थ है। अनंत का अर्थ भी मान लिया इन्होंने कि जितने कार्य हो सकते वो कर सकता है। शून्य क्रिया वाले नहीं करेगा। तो वहां पर अनंत माना हां क्रिया शून्य से लिंक दे दीजिए थोड़े थोड़ा सा वह कर लेते हैं काफी देर तक चर्चा हो गई है तो हल्का सा बात कर लेते हैं लिंक दे दीजिए शास्त्रवाद जी आप जुड़ जाए शास्त्रवाद जी को तो लिंक

02:33:33:06 दिया था आप जुड़ जाइए तो कहने का अर्थ यह है कि आज जो भाई साहब आए थे बहुत अच्छा लगा इनसे चर्चा करके बहुत लंबी वार्ता भी हुई हालांकि एक ह्यूमन नेचर है तो कहीं कहीं पर मुझसे कुछ गलतियां हुई इसके लिए मैंने क्षमा भी मांगा और इनसे भी हुई है हालांकि इन्होंने नहीं मांगा वो बात अलग है और दूसरी बात यह है कि इनके पास तैयारी इसी संबंध में है कि सर्वशक्तिमान में शून्य क्रिया का खंडन। तो हमने वो शून्य क्रिया पर अच्छे से बात की है। आप लोग देख सकते हैं और फिर कोई आएगा तो फिर बात होगी। अच्छा अवतार पर बात करने का प्रयत्न किया हमने क्योंकि यह शून्य क्रिया से जोड़ रहे हैं। अवतार को भाई यह चीज आ क्यों रही है? क्योंकि अवतार नहीं मानना है। तो यानी शून्य क्रिया से अवतार को जोड़ रहे हैं। है ना? तो

02:34:25:15 यह बात है। अ जी जय जय श्री राम। एक तो क्या होता है बहुत देर तक बहुत देर तक बात होते ये भी होता है कि एकदम मतलब कई बार ऐसा होता है ब्लैक आउट जैसा हो जाता है। काफी देर तक चर्चा जी बताइए जय जय श्री राम। जी जी जय श्री राम आवान जी बहुत अच्छा लगा आज का डिबेट सुनके और मेरा बस ये कहना था जी जी बहुत अच्छा लगा आज का डिबेट थोड़ा पहले की डिबेट से बढ़िया था इसमें थोड़ा सा न्याय के परिपेक्ष से कुछ बताना चाहूंगा और मतलब कि इसमें थोड़ा सा दोष मैंने उनके पक्ष में देखा है। अब देखिए एक होता है अन्वय एक होता है व्यतिरेक तो ये कार्यकारणता का जैसे सिद्धांत बता रहे थे तो कार्यता के सिद्धांत में ही आता है कि जहांजहां कारण उपलब्ध होगा वहां वहां कार्य होगा। जहांजहां कार्य जहां जहां कारण का अभाव होगा वहां वहां कार्य का अभाव होगा। तो अब यह बोल रहे हैं कि ईश्वर सृष्टि करने में अकेला निमित्त बनता है। इसमें एक सवाल है कि ईश्वर सृष्टि करता किसके लिए? हमारे लिए है। अब हम कौन सा कारण बन रहे हैं इस जगत का? क्या उपादान उपादान कारण बन नहीं सकता है? क्योंकि उपादान

02:35:40:19 कारण जो होता है वो तो वही पदार्थ होता है। उसी पदार्थ का जो है परिणाम स्वरूप हो जाता है। वही कार्य बन जाता है। उपादान कारण तो बोल नहीं सकते। सामान्य कारण होता ही हर सामान्य कारण का लक्षण ही है कि जो हर चीज का कारण हर चीज के कारण हम है नहीं। इससे हम सामान्य कारण भी नहीं होंगे। तो तीन ही तो कारण माने जाते हैं। अब बचा निमित्त कारण। निमित्त कारण के अलावा आपके पास कोई और चीज कारण नहीं कहने को बचेगा। अगर आप यह बोलते हैं कि ईश्वर अपने कार्य करने में सिर्फ अकेला है निमित्त बनने में तो यह गलत है क्योंकि जीव भी जीव के लिए ही क्योंकि सृष्टि बनाई जा रही है उसकी मुक्ति के लिए। अच्छा आप इसको सोच के देखिए कि अगर जीव नहीं होता सृष्टि बनती। नहीं क्योंकि वो ऐसा काम नहीं करता जो कि जिसका कोई मतलब नहीं बनता। जिसका कोई प्रयोजन नहीं बनता। तो अगर जीव है तब सृष्टि बनती है। उसकी मुक्ति नहीं होती। तो हां बिल्कुल यानी कि अन्वय व्यतिरेक से जब जब सृष्टि बनती है वो जीव के लिए बनती है तो जीव किसी ना किसी प्रकार से तो कारण होगा जगत का बिल्कुल बिल्कुल उपादान हो नहीं सकता है जी उपादान निमित्त बन गया निमित्त बन गया ये ये सिंपल हेतु है और दूसरी बात इन्होंने बोला कि जो है ईश्वर अपने

02:36:55:20 कार्य को करने में किसी भी प्रकार का जो है किसी और पे किसी भी दूसरे निमित्त पे एक तो यह हमने उदाहरण दिखाया। इसमें दूसरा उदाहरण क्या हो सकता है कि मान लीजिए ईश्वर इनका भविष्य जानता नहीं है। सर्वमान्य सिद्धांत है आर्य समाज का। अब ईश्वर किसी कर्म सामान्य को जब जानता है तो उस ज्ञान में क्या वो वस्तु उपादान कारण बनती है? यानी कि जैसे मान लीजिए आहान जी आपने कोई कार्य किया तो जब आपने वह कार्य किया तो उस कार्य का ज्ञान जो है उसके क्या आप कारण बनेंगे? निमित्त बनेंगे। उपदान बन नहीं सकते हैं। फिर से आप तो फिजिकल चीज है। आत्मा है आपकी। आपकी तो उपदान कोई विचार में आप बन नहीं सकते हैं। सामान्य कारण फिर से बन नहीं सकते हैं। निमित्त ही कारण बन सकते हैं। तो इसमें भी फंस गए कि अगर ईश्वर को कोई ज्ञान भी हो रहा है तो अपने ज्ञान के लिए भी उसको दो निमित्त पे डिपेंडेंट होना पड़ रहा है। एक मुझ पे और एक स्वयं पे। [हंसी] बहुत अच्छे पॉइंट्स हैं। बहुत बढ़िया। जबरदस्त। जी। बाकी आज की चर्चा में काफी कुछ सीखने को मिलेगा। दोनों पक्षों को मिलेगा। ऐसा नहीं है। उनके पक्ष को भी काफी चीजें समझ में आ रही होंगी कि यह कहना क्या चाहते हैं। भाई कोई दुश्मन नहीं है। समझने का प्रयास करो। हम जिन बातों को मान के बैठे हैं उनहीं बातों को आपने दूसरे शब्दों में माना। मैंने तो

02:38:10:21 यही देखा है। माना तो है। दूसरे शब्दों में माना है। बस इतनी सी बात है। तो आप गौर करो कि आप क्या मान के बैठे हो। ये वाली बात है। जी शास्त्रवाद जी जय श्री राम। जय श्री राम भैया। आज का चर्चा बहुत लंबा चला बहुत देर तक और देखने को अच्छा भी लग रहा था लेकिन यह क्या कर दी अंत में आते ये क्रिया शून्यता तो ये सब बीचबीच में लाना वो दोबारा से एक और उदाहरण लाए भाई क्रिया शून्य पे हमने जब इतनी देर बात कर ली है तो दोबारा से क्यों क्रिया शून्यता पे जा रहे हो एक उदाहरण दे दिया बहुत देर खींच लिया उसको हमने अब आओ उस नहीं वो तैयारी करके आए थे कई सारे उदाहरण तो ऐसे थोड़ी ना चलता है बात घूम फिर के वही आएगी शून्य अभाव क्रिया पर तो हां भाई अभाव क्रिया कर सकता है अभाव क्रिया क्या जिसका एक्सिस्टेंट ना हो ठीक है कर रहे हैं जी बिल्कुल बिल्कुल बाकी फिर भी चर्चा बहुत चर्चा बहुत बढ़िया रही है आज की सीखने वाली है और क्या कहते हैं निर्भय के साथ भी अच्छी हो सकती थी पर वो बीच में डिस्टर्ब हो गई शायद और और आगे के लेवल पर हम लोग जा पाते आते तब

02:39:26:00 है ना वहां पर समझ सकते थे यहां पे तो अच्छा एक अवतारवाद के ऊपर जी जी जी आप बोल लीजिए आप बोल लीजिए जय जी जी जी मैं ये कह रहा था कि एक अवतारवाद के ऊपर चर्चा की बात आती है तो इसमें एक चीज ध्यान देने की बहुत ज्यादा चीज है आवाहन जी कि जब हम कहते हैं कि आत्मा का ये शरीर है तो इसका अर्थ क्या होता है कि आत्मा इस शरीर के साथ और मन के साथ संयोग में है या जो भी संबंध आप उसका मानिएगा उसके अंदर होने से या किस प्रकार से आप यह बोलिएगा कि आत्मा के आत्मा का ये शरीर है क्योंकि आप ये दो ही चीज हो सकती है या तो आप बोलिएगा कि क्योंकि आत्मा का ये शरीर इसलिए है क्योंकि वह आत्मा उस शरीर के पूरे तरीके से अंदर है। मतलब हर एक कड़े के अंदर है और उसको कंट्रोल कर पा रही है। यानी कि हाथ हिला पा रही है, पैर हिला पा रही है। अब ये चीज अगर इसको आप अवतारवाद मानते हैं या इसको मतलब अवतारवाद हटा दीजिए। इसको आप कम से कम ये मानिएगा कि इसका मतलब ये शरीर कंट्रोल करना हो गया। ये हमारा शरीर हो गया। ऐसा हम बोल सकते हैं। अच्छा तो ईश्वर जब कण कणों के अंदर है और जब वो परमाणुओं में वियोग सहयोग करता है तो वो तो उसके अंदर होता है और उसके अंदर होते हुए उसी में परिवर्तन लाता है तो ईश्वर का शरीर

02:40:41:08 कैसे नहीं हुआ ये पूरा जगत। जिस प्रकार से हम अपने शरीर का हम कब मतलब यह सवाल बेसिकली यही है कि हम किस तरीके से यह कहते हैं कि यह शरीर हमारा है क्योंकि दो ही चीजें हो सकती है मन और इंद्रियों के साथ हमारा पूरा तरीके से हम उसके अंदर हैं और उसका हम जो है उसको हम शक्ति से अपने हिला डुला पा रहे हैं तो वो चीज तो ईश्वर कर रहा है तो ईश्वर का शरीर क्यों ना माना जाए उसको हम ये इस बारे में धक्के को लेकर के हम इस तरह के कुछ चर्चा वो जो विभू है ना वो सर्व्यापक होते हुए भी केवल कुछ चीजों को गति करवाता है। तो हम इस तरह की चर्चा बहुत सारी कर चुके हैं। हालांकि आज तक मुझे यह लगता था कि आर्य समाज से जितनी भी चर्चाएं हुई है उसमें सबसे अच्छी चर्चा मुझे वो लगती थी जो निर्भय के साथ हुई थी। हालांकि वो एक परफेक्ट निष्कर्ष तक नहीं पहुंची। मगर अब यह जो आज जो चर्चा हुई है यह जो है उससे भी अब और जो अच्छे लेवल पर गई चर्चा और इसके लिए बहुत-बहुत धन्यवाद दूंगा और जरूर मैं इनको दोबारा लूंगा पर परंतु अपना ये हट छोड़ के आए कि इनको शून्य क्रिया पर ही बात करनी है। शून्य क्रिया पर बात हो गई है। जनता निर्णय ले लेगी। ठीक है। अच्छा अ

02:41:56:09 जी कन्हैया जी जय श्री राम। जय श्री राम सभी लोगों को जी हां मैं तो यह कहना चाह रहा हूं कि मेरा तो पर्सपेक्टिव ही अलग है शिवा जी मैं इससे थोड़ा डिफर करता हूं मैं आपसे इस चीज में कि जैसे कहते हैं क्या ईश्वर ऐसा पत्थर बना सकता है जिसे वो स्वयं ना उठा सके इसका भी उत्तर सीधा है हां बिल्कुल कर सकता है वो लेकिन वो करे क्यों वो सर्व स्वतंत्र है मेरा कहना ये है ठीक है आप समझे कि नहीं मेरी बात आपको मैं देखिए मैं आपसे आपसे यहां पर अभी एक और चर्चा नहीं खोलना चाहता हूं। तो इस चीज को मैं आगे नहीं बढ़ाना चाहता। आप और कुछ अगर कहना चाहे तो कहिए। जी नहीं मैं तो यही कहना चाह रहा था। दूसरा दूसरा मैं ये कह रहा हूं कि कोई भी व्यक्ति यदि ये पूछता है कि हां उत्तर हां या ना में दीजिए। जैसे वो भैया भी पूछ रहे थे कि अभी उत्तर हां या ना में दीजिए तो फिर हमारी तरफ से एक प्रश्न है कि क्या एक व्यक्ति ने चोरी करना छोड़ दिया है? तो ये तो लॉजिकल फैलेसी हुई। चलिए ठीक है तो हां या ना उत्तर दीजिए ना हर चीज ऐसा है ना मैंने इनसे जो पहला प्रश्न जो किया था अग्निव जी ने अपने में कहा था कि देखो भाई हम अपने कार्य को करने के लिए सहायता लेते हैं क्या सहायता लेते हैं कि

02:43:12:14 ये हम लोग देख नहीं पा रहे तो चश्मा है देखो हम इससे देखते हैं ठीक है जड़ पदार्थ का उपयोग करते हैं और ईश्वर का चेतन चेतन का उपयोग कर ही रहे हैं चेतन तत्व का उपयोग कर ही रहे हैं जड़ का उपयोग कर ही रहे हैं ईश्वर भी अपना कार्य करने के लिए अगर देखा जाए तो जो जड़ अवेलेबल है उसका उपयोग कर ही रहा है और जो क्या कहते हैं चेतन अवेलेबल है उसका उपयोग कर ही रहा है ना तो फिर यहां पर सर्वशक्तिता कहां कैसे सिद्ध होगी उस वाले तर्क से तो मेरे को मैंने सवाल इसलिए किया था उसमें उन्होंने ये वाली बात की थी कि हम लोग जो है चश्मा चश्मे का उपयोग करते हैं और योगेश भारद्वाज जी ने भी जो वीडियो बनाया उसमें भी बात की है। ठीक है यह वाली बात चलिए काफी देर की चर्चा हो चुकी है 2 घंटे 43 मिनट की और काफी अच्छी रही और दोबारा यह आना चाहेंगे महानुभाव तो अवश्य आएंगे ठीक है जय जी आपने भी बहुत बढ़िया तर्क पूर्ण बातें कही आप को साधुवाद बहुत सारा जी जी धन्यवाद चर्चा को पूर्ण करते हैं जय श्री राम

02:44:19:01 जय श्री राम जय श्री राम जय श्री राम [संगीत]

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A: AHVAAN - Call Of Dharma Live 2:44:55 · 09 Jul 2026

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