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00:00:01:10 तो सभी को जय श्री राम। आशा करता हूं आप सभी कुशल पूर्वक होंगे। तो जैसा कि प्रकरण आप सभी को मालूम है। आप सभी अवगत हैं। एक वातावरण क्रिएट हो गया है हमारी चर्चा के बाद से और हर कोई व्यक्ति अपनीपनी टपली अपना अपना राग बजा रहा है। कुछ ऐसे भी लोग हैं जो मौका परस्त हैं अवसरवादी जो बहती गंगा में हाथ धोने का प्रयास में लगे हुए हैं। फिलहाल जो दो मेन मुख्य रूप से मेरे सामने मुझे दिख रहे हैं आर्य समाज के जो विद्वान है एक योगेश भारद्वाज जी और एक जिनके साथ हमारी चर्चा हुई थी अग्निव्रत जी इसके साथ ही साथ एक व्यक्ति और दिख रहा है मुझे कोई सवाई माधोपुर का है कोई कुटापिटा संगीतकार जैसा दिखता है वो क्या नाम है सोमदेव करके कुछ है तो वह भी सोच रहा है कि बहती गंगा में हाथ धो ले हम भी वैसे कोई सुनता नहीं है। चलो इसी प्रकार से कोई सुन ले हमारा वह भी इसमें लगे हुए हैं। खैर कोई बात नहीं। तो योगेश भारद्वाज जी ने हमें लेकर के एक प्रतिक्रिया

00:01:16:07 प्रदान की है और उसमें जो है उन्होंने बताया कि उनके पास कौन-कौन से बहाने हैं जिनके कारण वो अपनी जिनके आधार पर वह अपनी जो सामने ना आ पाने की जो असमर्थता है उसको छुपाने का प्रयास कर रहे हैं। तो उन्होंने वह बहाने बड़े ही सुंदर तरीके से प्रस्तुत किए हैं अपने वीडियो में जिस पर अभी हम चर्चा करेंगे। चर्चा दो भागों में है। तीन भागों में पहला भाग है जो योगेश भारद्वाज जी ने प्रतिक्रिया दी है चर्चा के विषय में और दूसरा भाग है जो कुछ प्रतिक्रिया दी चर्चा को लेकर के और उसके बाद के कुछ दिन जो बीते उसको लेकर के अग्निव्रत जी ने उसके बाद उन्होंने तीसरी जो अप्रामाणिकता और अपनी हमारी अप्रामाणिकता और अपनी प्रामाणिकता सिद्ध करने के लिए जो विधि का आलंबन लिया है जिस विधि का तो उस पर भी बात करेंगे और आज बहुत सारी यह मान के चलिए कि तड़कती भड़कती चीजें आपको प्राप्त होने वाली हैं। जिस तरीके से अग्निव्रत जी ने दी हैं वीडियो में तो आपको यहां पर भी मिलने वाली है। तो

00:02:32:04 अंत तक बने रह और सीट की पेटियां बांध ले कमर कस। तो [गला साफ़ करने की आवाज़] सबसे पहले मैं एक बात कहूंगा कि आर्य समाज अपने आप को तार्किक रूप में प्रस्तुत करता रहा है सदैव कि हमने तर्क किया, हमने प्रश्न किया और अ इसके बाद वो अपने आप को इस तरह से ख्यापित करते हुए बड़े लॉजिकल तरीके से और वो प्रयास करता रहा। उसके विद्वान इस तरीके से प्रयास करते रहे स्वयं को तार्किक दिखाते हुए कि उनसे बड़ा तार्किक कोई है नहीं और तर्क से उन्होंने सभी को परास्त किया हुआ है। तर्क तर्क तर्क चिल्लाते रहे और आज देखिए आप कि अवतारवाद पर चर्चा प्रारंभ होती है। उसमें जब व्यवस्थित तरीके से तर्क प्रस्तुत किए जाते हैं। एक सवाल पूछा जाता है। यद्यपि वह बहुत कठिन सवाल नहीं है। मुझे मालूम है कि आर्य समाज में ऐसे लोग हैं। जो उस सवाल से आगे बढ़कर के आगे आने वाले सवालों पर अटकेंगे। अटकेंगे वह भी पर इस सवाल पर नहीं अटकेंगे। यह हमारे बीच में वो

00:03:47:15 वाला सवाल नहीं है जिस पर कि मैच का कोई निर्णय निकले। है ना? परंतु यहां पर अग्निव्रत जी अटक जाते हैं। कहां पर? कि जब निराकार ईश्वर जो है जिन कार्यों में लिप्त होने के बाद भी निराकार ईश्वर को दोष नहीं लग रहा है तो उन्हीं कार्यों में लिप्त होने पर अवतार लेने पर ईश्वर को दोष क्यों लगेगा? अवतार ना लेने वाले ईश्वर पर जब दोष नहीं लग रहा है तो अवतार लेने वाले ईश्वर पर दोष क्यों लग जाएगा? भाई हम ये थोड़ी ना कहते हैं कि जब उसने अवतार लिया तब वो सर्वव्यापक नहीं है। वही सर्व्यापक ईश्वर सब जगह जो अगोचर है वहां पर दृष्टिगोचर हो गया। सिर्फ इतना अंतर है आंखों का विषय बनने में और आंखों का विषय ना बनने में। इतनी जगह पर आंखों का विषय बन गया और बाकी की जगह आंखों का विषय अभी भी नहीं है। जैसे पहले था तो हम यह नहीं कहते कि अब वो सर्व्यापक नहीं है। वो जब अवतार अवतार में आ गया और यह बात उन्हें भी पता है। ऐसा नहीं है कि वो कोई पुराने चावल है वो भी तो यह सब मान्यताएं उनको पता है। और अगर नहीं पता है और तब वो इस तरीके से विवाद उत्पन्न कर रहे हैं। तब कटाक्ष करते हैं। मूर्ति पूजा का विरोध करते हैं। तो यह एक विचारणीय बात है। सोचना चाहिए। तो कहने का तात्पर्य यह है कि एक सवाल पूछा जाता है कि भाई जिन कार्यों को करने पर मनुष्य

00:05:02:21 को पापी माना जाता है। उन्हीं कार्यों को करने पर निराकार ईश्वर को पापी नहीं माना जाता। परंतु ईश्वर अवतार कर माना जाएगा। अंतष्ट आ जाएगा। थोड़ी लाइट तो तब उसके अंदर अंत का चतुष्ट आ जाए कोई परेशानी आ रही है। नेटवर्क का कुछ इशू आ रहा है। खैर कोई बात नहीं हम लोग आगे बढ़ते हैं। [गला साफ़ करने की आवाज़] तो इन प्रश्नों पर जब जब हम इस पॉइंट पर पहुंच गए अग्निवत जी के साथ और जब मैंने पूछा कि ऐसा क्यों है तो उन्होंने वहां जवाब नहीं दिया और वहां पर वो बात अभी तक रुकी हुई है ना तो योगेश भारद्वाज जी ने जवाब दिया है उसके बाद उन्होंने बड़े व्यक्तिगत कटाक्ष किए ये सब वो अभी भी मैं बात करूंगा उन पर अब देखिए कि दोनों ही लोगों ने ऐसा पलायन किया है ऐसी भागमभाग स्टार्ट की है एक

00:06:17:25 व्यक्ति जाकर के व्याकरण के पीछे अपना मुंह छुपा रहा एक व्यक्ति जाकर के उसकी जानकारी में जो अप्रामाणिक भाष्य है शय आचार्य शण का उसके पीछे अपना मुंह छुपा रहे पर कोई भी यह बात नहीं कर रहा है कि ईश्वर अवतार क्यों नहीं ले सकता बात यह हो रही है शिवश नारायण द्विवेदी को व्याकरण नहीं आती इसलिए चर्चा नहीं होगी तो मैं पूछना चाहूंगा बड़े ही सम्मान के साथ योगेश जी आपने क्या हमारे ऊपर टिप्पणी संस्कृत में की थी। आप संस्कृत में कटाक्ष करते हैं। आचार्य शारण के भाष्य का अपमान आप संस्कृत में करते हैं। क्यों करते हैं हिंदी में? संस्कृत में करिए। हमें आवश्यक लगेगा तो टोकेंगे। संस्कृत सीख के टोकेंगे वरना नहीं टोकेंगे। सत्यार्थ प्रकाश केवल संस्कृत में छप पाइए।

00:07:13:06 मतलब आप क्लेम कर सकते हो हर भाषा में। पर कोई व्यक्ति जिस भाषा में उसको हर्ट हुआ है, जिस भाषा में उसको उसके हृदय को चोट पहुंची है, वह व्यक्ति उस भाषा में जिस भाषा में उसको पता चला कि भाई मेरे बारे में ऐसा-सा कहा जा रहा है, उस भाषा में वो प्रश्न नहीं कर सकता। प्रश्न करेगा तो उससे कहोगे कि व्याकरण सीख के आओ। और तुम्हारा वो तुम्हारी ओर का व्यक्ति था राहुल आर्य। इस से तर्क कर रहा था जब वह इस वालों ने कहा था भाई व्याकरण में आइए संस्कृत में होगा शास्त्रार्थ जब शास्त्रार्थ की बात आई थी तब तुमने क्यों नहीं कहा था भाई सही कह रहे हैं इस वाले राहुल आर्य को पहले जो है व्याकरण सीखनी चाहिए हां तब तो राहुल आर्य पीछे हट गए थे तो आप अपना वीडियो हमें लेकर के जो आपत्ति जता रहे हो वो वीडियो भी संस्कृत में बनाइए ना हम फिर देखेंगे हमें करना है कि नहीं आपको चर्चा के लिए बोलना है कि नहीं मतलब एक तो आप पहले कायरता पूर्वक यहां वहां पीठ पीछे मुंह छुपा करके शिवश नारायण द्विवेदी यह कर रहे हैं वह कर रहे हैं यह सब कर रहे हो और फिर हमने कहा कि भाई पीठ पीछे क्यों कर रहे हो कायरता क्यों दिखा रहे हो सामने आकर के बात कर लो तो आप फिर अब व्याकरण को ला रहे हो मगर इस प्रश्न का उत्तर

00:08:28:12 नहीं है कि ईश्वर अवतार क्यों नहीं ले सकता ईश्वर अवतार इसलिए नहीं ले सकता क्योंकि शिव मोहिनी प्रकरण आपको समझ में नहीं आता है ऑब्जेक्टिव हो गए भाई शिव मोहिनी प्रकरण समझ में नहीं आता है। इसका मतलब यह यह माना जाएगा ना कि ईश्वर अवतार ले तो सकता है पर वो शिव मोहिनी वाला रूप नहीं। वो कहानी ठीक नहीं है। तो पहले इतना मानो फिर हम देखें शिव मोहिनी वाले में आपको निराकरण क्या प्रस्तुत करना है क्या दिक्कत है क्या नहीं तो सबसे पहली बात यह है कि अगर आपको व्याकरण चाहिए तो आप व्याकरण में वीडियो बनाइए ना टिप्पणी व्याकरण में करिए ना

00:09:07:03 बात चल रही है अवतारवाद की आप ला रहे हो कि भैया व्याकरण सीख के आओ तब होगा शास्त्रार्थ। अच्छा शास्त्रार्थ की बात भी कर लो। नहीं कुछ ठीक शास्त्रार्थ की बात भी कर लो। हमने कब कहा शास्त्रार्थ? हमने कहा है क्या शास्त्रार? हमने तो चर्चा के लिए कहा है। शास्त्रार्थ तो आपके लोगों के अंदर गूंजा करता है कि मैंने इसको चुनौती दे दी। उसको चुनौती दे दी। मैंने ये चैलेंज कर दिया। वो चैलेंज कर दिया। का जब सामना हो जाता है तो अपना जो स्तर है ज्ञात हो जाता है। इसी तरीके से बगले झांकते घूमते हैं आपके लोग और आप फिलहाल आप भी ऐसा ही कर रहे हैं। अच्छा व्याकरण जानने वाला ही यदि विद्वान हो सकता है, चर्चा के योग्य हो सकता है तो फिर आप क्यों सम्मान दे रहे हैं इनको? आपके जो तथाकथित सो कॉल्ड वैज्ञानिक यह तो खुद कह रहे हैं कि इनको व्याकरण नहीं आती है। और ही भाष्य करके बैठे हैं शास्त्रों के खुद कहते हैं मैंने तो और ही भाष्य कर रखे हैं। तो अगर व्याकरण के आधार पर चर्चा हो सकती है तो फिर आप उनकी साइड क्यों खड़े हैं? वो भी अयोग्य व्यक्ति हैं। आपको उन्हें भी कह देना चाहिए। तो यह बहाने बनाना छोड़ो। मुझे आपसे उम्मीद नहीं थी क्योंकि आप एक

00:10:22:07 कुशल वक्ता मैंने देखा है ना यह आप जो जो एक छीछा लेदर करवा रहे हैं आप इस समय इस तरीके से यह जो आपका बहाने प्रस्तुत करना है यह छीछा लेदर है। आपके पक्ष की छीछा लेदर अवतार ना ले सकने वाले ईश्वर की छीछा लेदर दयानंद जी की मान्यता की छीछा लेदर उनके भाष्य की छीछा लेदर ये सब आप छीछा लेदर करवा रहे हैं इस तरह से तो सबसे पहले तो इस पर थोड़ा ध्यान दीजिए कि आप दोहरी बातें कर रहे हैं। रामो दभाषते हम राम को मानने वाले लोग हैं ना इसमें तो मैं और आप एक होंगे शायद राम दो प्रकार की बातें नहीं करता। महाभारत

00:11:07:08 में क्या लिखा है? अन्यों के साथ वही व्यवहार करिए जो स्वयं के लिए स्वीकार

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00:11:11:03 रहे हो। तो ये क्या दोगलापन है? अग्निव्रत जी के लिए अलग मेरे लिए अलग। क्यों? क्योंकि मैं दयानंद जी को नहीं मानता हूं इसलिए पक्षपात करेंगे। यही तो है पहली नजर। अच्छा अब दूसरी बात आती है अशिष्टता। मैंने आपके नाम के सामने जी नहीं लगाया। अच्छा अगले ही पल आप यह भी बात बता रहे हैं कि भाई वह जो साहित्य भाषा होती है आपने आगे बात करेंगे आपने समालोचना की एक आपने चर्चा देखी उसकी आपने समीक्षा कर दी उसमें आपका कुछ ऐसा नहीं था कि आपको किसी की वो करनी पता नहीं मुझे बुरा क्यों लग गया उसमें आपने मेरे ऊपर टिप्पणी की कि शायद मैं साहित्य की साहित्य में मेरी गति नहीं है इस कारण से आप मैं जो है बुरा मान गया आपकी उस समालोचना को स्वीकार नहीं कर पाया तो जब आपको साहित्य में इतनी गति है आप बड़े ही कुशल साहित्य वाले व्यक्ति हैं। बहुत गति है आपकी साहित्य में। तो आपको यह नहीं पता है कि साहित्यिक जब साहित्य के रूप में काव्य रचना इत्यादि होती है तब जो सम्माननीय व्यक्ति होता है उसके लिए भी कई बार तू तड़ाक जैसी भाषा आ जाती है।

00:12:22:26 ईश्वर के लिए आ जाती है। ईश्वर ऐसा करता है। कृष्ण ऐसा करता है। राम ऐसा करता है। आप लोग निराकार ईश्वर ऐसा करता है। क्यों आ रहा है कर्ता? वहां जी क्यों नहीं लगा रहे? श्री क्यों नहीं लगा रहे? अनेकानेक बार काव्य रचनाओं में इस तरह का आ ही जाता है। और जो आपके नाम के आगे जी नहीं लगा है वो क्यों नहीं लगा है? क्योंकि एक गाने की पंक्ति थी जो आप पर शूट शूट कर रही थी। शूट नहीं आपसे मैच कर रही थी। शूट नहीं करूंगा। चिंता ना करिएगा। आप ही का बालक हूं छोटा। है ना? तो क्या है? आपसे मैच कर रही थी। मैच तो मिलान करने की वजह से उस पंक्ति को मैंने आपसे जोड़ा कि 150 बरस की समाजी उपज को सलाम भरद्वाज तेरी तेरी नहीं भरद्वाज की तेरी भी नहीं बोला उसमें तेरी शब्द फिट बैठ रहा था पर मैंने उसको रोका कि नहीं तेरी ना बोलूं भरद्वाज की पैनी नजर को प्रणाम यह पंक्ति में वहां पर जी नहीं लगाया और उसको लेकर के आपने एक शिष्टता का एक बड़ा लंबा सा लेक्चर दे दिया। अच्छा तू तड़ाक प्रारंभ किसने की है?

00:13:38:12 आपका ही वीडियो है जिसमें आप किसी व्यक्ति के साथ बातचीत कर रहे हैं और उसमें कह रहे हैं तेरी परंपरा तो कोर्ट की परंपरा है। आज से कम से कम तीन महीने पहले का प्राप्त है वीडियो मुझे। दो-तीन महीने पहले का अभी का नहीं। तू तड़ाक तो आप चालू कर रहे हैं। तेरी परंपरा कोर्ट की परंपरा है। तो इस तरह की बातें जो आप कह रहे हैं कि अपनी ओर से आपने प्राथमिकता से यह सब चालू किया कि तेरी परंपरा कोर्ट की परंपरा है और खुद मुझे ज्ञान दे रहे हैं। आप साहित्य का और स्वयं साहित्य में गति होने के बाद भी देख नहीं पा रहे हैं। इसको कहते हैं त्रयाचरित्र। दोगलापन कहते हैं और टपोरी होना छपरी होना या और कौन सा वर्ड था वो टपोरी छपरी और और भी एक आध वर्ड था ये सब चल जाता है मगर साथ में अगर वो छपरी टपोरी इत्यादि होने के साथसाथ दोगला भी हो ना तो बड़ा ही नीच हो जाता है व्यक्ति आपकी बात नहीं कर रहा हूं सामान्य तौर पर बात बता रहा हूं यदि व्यक्ति सामने वाला अशिष्ट हो छपरी हो टपोरी हो और साथ में दोगला भी हो ना

00:14:53:18 तो फिर वह बहुत नीच हो जाता है। नीचों की कैटेगरी में आने लगता है। तो यह परंपरा आपके यहां की है। दोगलापन परंपरा प्राप्त दोगलापन विषयांतर परंपरा प्राप्त विषयांतर विषयांतर परंपरा दोगलापन परंपरा ये सब आपके नाम है। तो अब इसमें आप एक बात आपने बताई कि भाई आपने मुझे शिवशु कह दिया। मैंने आपत्ति जताई। फिर आपने बताया जो है कि आपके यहां हरियाणा में ऐसा कहा जाता है वैसा कहा जाता है। तो पहले थोड़ा अकल के आपको पता नहीं कौन से पर्दे पड़े हुए हैं। कौन से अपने चापलूसों के इर्दगिर्द घिरे रहते हैं आपके। चापलूसों के बीच में रहते हैं क्या जो आपको वही सुनाते हैं जिससे कि आपकी वो भड़भड़ाती हुई आवाज बाहर निकले। उनहीं के बीच में रहते हैं क्या? आपको ऐसी ही जानकारियां पहुंचाते हैं जिन जानकारियों के कारण आप भड़काऊ भाषण दें। उनका काम चले एंटरटेन हो उनको और शायद और कुछ लाभ हो उनको। अरे भाई अपनी भी तो अकल दौड़ाइए। वैसे तो बड़े घोड़े दौड़ते हैं आपके। यहां पे क्या हो जाता है?

00:16:09:10 मेरी वो पंक्ति दिखा दीजिए मुझे जहां पर मैंने आपत्ति जताई हो। शिवांशु कहने पर उस पर आप स्पष्टीकरण दे रहे हैं। बताइए कितने कितना निम्न स्तर का हो गया ये कार्य आपसे अनजाने में आपके लोगों के कारण हा कौन सी पंक्ति में आपत्ति जता दी मैंने जो आप स्पष्टीकरण दे रहे हैं। व्यक्ति विषय से हटकर दूसरी बातें बड़ी-बड़ी सजा के बहुत अच्छे से एक वैश्या होती है ना वो स्वयं को बहुत सजा के रखती है इसलिए रखती है सजा करके क्योंकि वो जो मूल विषय है ना यह अपवित्र है अशुद्ध है दूषित है उस पर व्यक्ति की नजर ना जाए उसी प्रकार से वैश्या की भांति इस प्रकार से दूसरी दूसरी चीजों से अपने को सजा रहे हैं आप

00:17:03:06 यह सजा रहे हैं व्याकरण और जबरदस्ती शिवंश के नाम पर जो है शिवांश और शिवांशु के नाम पर स्पष्टीकरण फिर अपनी कुल परंपरा को बताना यह सब क्या है जैसे वैश्या लिपस्टिक लगाती है टीका लगाती है सब वो सब चल रहा है ऐसा आपको शोभा नहीं देता है आपको ऐसा नहीं करना चाहिए ऐसी चीजों से आपको दूर रहना चाहिए तो [गला साफ़ करने की आवाज़] आप बच रहे हैं मूल विषय क्या है अवतार ईश्वर अवतार क्यों नहीं ले सकता तो आप क्या कर रहे हैं अन्य विषयों से स्वयं को सजा रहे हैं लोग उस पर इतना वाह वाह वाह वाह वाह वाह करने लग जाए वाह क्या व्याकरण बोली वाह क्या कुल परंपरा बताई वाह शिवांशु शिवंशु में क्या स्पष्टीकरण दिया वाह क्या कटाक्ष मारे व्यक्ति ये प्रश्न ना पूछे कि ईश्वर अवतार क्यों नहीं ले सकता है आप ही तो अपने वीडियो में कहते हो कि आजकल के युवाओं को प्रश्न करना चाहिए प्रश्न करना करना चाहिए। प्रश्न करना चाहिए। आज एक साधारण सा व्याकरण विहीन युवक आपसे प्रश्न कर रहा है कि आप मुझे बताइए योगेश भारद्वाज जी ईश्वर अवतार क्यों नहीं ले सकता है? तो आप कह रहे हो कि व्याकरण सीख के आओ।

00:18:18:28 अशिष्टता की बात करते हो। भांड है, पोंगे हैं, पंडे हैं, रामानुजाचार्य हुआ। ये सब भरा पड़ा है आपकी सत्यार्थ प्रकाश में। उसको छोड़ो। वृंदावन को वैश्यावन भागवत लिखने वाला मर क्यों नहीं गया? कौन बोल रहा है यह सब? कौन बोल रहा है? आपके ही इर्दगिर्द के लोग बोल रहे हैं ना सच्चिदानंद स्वामी को सुन लेना। तब आपको याद नहीं आता है कि मलच्छ देख रहे हैं हमारी ये सब चीजें। अरे भैया निराकार ईश्वर से हमने कब आपत्ति की? करो निराकार की पूजा। आप हमारी चीजों को अधर्म कहने आए हो ना? और उसके आधार पर अपना प्रचार तंत्र खड़ा कर रखा है। और तो और हमारे लोग गुमराह हो रहे हैं।

00:19:11:15 जब हम मूर्ति की रक्षा करने जाते हैं वो आते नहीं है। ईश्वर तो मूर्ति पूजा तो अधर्म है। लो क्या करूं मैं? ऐसा नहीं था मैं। आप जैसे लोगों ने मुझे ऐसा बनाया। सामान्य जीवन था। अपना आजीविकोपार्जन हो रहा था। एक सामान्य जीवन काट रहा था मैं। आप जैसे लोगों के ऊपर दायित्व था। सही जानकारी लोगों तक पहुंचाने का। आपने मिलावट की। आपने परंपरा प्राप्त सिद्धांतों में मिलावट की। अपना मंतव्य उसमें डाला। आप जैसे लोगों ने तब मुझ जैसे किसी व्यक्ति का भाई छीना गया। बहन छनी गई। तब मेरे जैसा कोई व्यक्ति घातक बनता है, खड़ा होता है।

00:20:12:12 आप लोग अपनी दायित्व को निभाइए ना अगर बने हैं आचार्य तो वरना हर दिन कोई नया शिवाश द्विवेदी खड़ा होगा जो पूछेगा आपसे और पूछ रहे हैं आपसे। कल जो आपने वह वीडियो बनाया है मेरे लिए उसमें आप ही के यहां पर मेरे पूज्य गुरुदेव जगदगुरु शंकराचार्य बोलते थे आज उनकी वाणी मुझे याद आ रही है अपने जैसे 10 बनाओ बनाए मैंने 10 पूछ रहे हैं वहां पर जाकर के बता रहे हैं आपको विषयांतर कर रहे हो और ऐसे प्रश्न पूछ रहे हैं कि आपके पास उत्तर नहीं है उनके उनके प्रश्नों का वहां पूछ रहे हैं धक्का कैसे लगा? वहां पूछ रहे हैं लोग कि भौतिक प्रकृति का सृष्टि के रूप में निर्माण करने के लिए भौतिक व्यवहार हुआ तो कैसे किया? ईश्वर ने

00:21:15:20 कैसे किया? भौतिक व्यवहार हुआ या नहीं हुआ? वहां प्रकृति के साथ पूछ रहे हैं वहां। इतने डेप्थ में वहां पर आपके प्रश्न पड़े हुए हैं। तो आपने अगर अपना दायित्व सही से निभाया होता, गुरुकुल चरा रहे हो, यह कर रहे हो, वो कर रहे हो। अगर आपने अगर अपना दायित्व सही से निभाया होता तो मुझे क्या जरूरत पड़ी थी? आपको बड़ी चिंता है ना मेरे पेट की। सिक्स पैक ऐप ले घूम रहा था। वर्कउ करता था।

00:21:53:08 मुझे क्या जरूरत पड़ी थी यह सब पूछने की लोगों से? मगर नहीं देखा गया। अपने धर्म का अपमान नहीं देखा गया। अपने भाई को दूर जाता हुआ नहीं देखा गया। इस जैसी संस्थाएं आके सिखा रही हैं कि हम अभक्त हैं। हमसे बात नहीं करनी चाहिए। जैसे काफिरों से बात नहीं करनी चाहिए। आर्य समाजी जैसी संस्थाएं सिखा रही है। ये तो पौराणिक पंडे हैं। मूर्ति पूजा अधर्म है। गए गुजरे लोग हैं ये लोग। तो कोई ना कोई तो आता है ना। तो बस भगवान ने मुझे ही भेज दिया। खैर कोई बात नहीं। अब आगे आपने कहा है हम

00:22:46:09 फिर आगे आपने अपनी कुल परंपरा बताई है। अब जरा कुल परंपरा पर बात होगी। तो आप बता रहे हैं

00:23:01:06 कुल परंपरा। आपने अपनी कुल परंपरा बताई है कि आप फला है। वो भारद्वाज जो हमने कहा वो भारद्वाज है। है ना? पहली बात तो हमने इस बात पर बहुत ज्यादा गौर किया ही नहीं कि आप भारद्वाज हैं कि भारद्वाज है और ना ही हमें कोई आवश्यकता इतना महत्व नहीं रखता है आपका यह भारद्वाज टाइटल हमारे लिए। हां अगर आप परंपरा प्राप्त सिद्धांतों को मानने वाले होते तब हम अवश्य ये चीज देखते। अरे क्या रखा है आप लोगों के भारद्वाज और इत्यादि चीजों में? सब तो आपने सप्रेटा दही बना रखा है। क्या कुल परंपरा बता रहे हो? सबसे पहले तो बेसिक यह बता दो कि नियोग वाले हो कि नॉर्मल वाले हो।

00:23:40:19 नियोग माना गया ना आपके यहां। फिर नियोग वाले हो तो कौन से वर्ण से आया था? वह जो नियोग का पिता था तो वो कहां से आया था? ये सब चीजें आ जाएंगी ना। तो क्या करें आपका ये भारद्वाज और भारद्वाज जान के? भाई कौन से वाले पिता से आया है ये जो आप बता रहे हैं कि मैं फलाना हूं। भाई नियोग आपके यहां पर माना गया है कि नियोग है 11 पति हो सकते हैं। आगे बात होगी तो आपके यहां उसको एक सामान्य रूप से लिया गया है नियोग को तो आपका जन्म सामान्य रूप से हुआ है या फिर नियोग के प्रक्रिया से हुआ है यह पहली बात तो आ जाएगी। इतनी सारी चीजें आपने डाल रखी है। क्या करना आपके भारद्वाज और भारद्वाज से? जिनके साथ माता जी का विवाह हुआ था वहां से संतान की प्राप्ति हुई है उन्हें वह हैं आप या फिर नियोग वाले तरीके से हुए हैं वो हैं आप कौन से तरीके से होने पर आपका वो जो कुल वंश परंपरा आप प्रवर इत्यादि बता रहे हैं क्या करूंगा ये भारद्वाज भारद्वाज जान के दूसरी बात करणा वर्ण व्यवस्था है जो व्यक्ति जिस समय जो कार्य कर रहा हो वह वही है

00:24:53:06 अगर एक सिक्योरिटी गार्ड कहीं पर खड़ा हुआ है और उसने भय देख के कि भैया यहां पर इस समय ड्यूटी करना ठीक नहीं है। यहां पे जान के लाले पड़ जाएंगे। जान को खतरा है। टमाटर बेचना शुरू कर दिया। वैश्य बन गया। तो ड्यूटी से भागना आपने उसकी ड्यूटी बना दी है। कर्तव्य से पलायन भी आपने उसको कर्तव्य बना दिया। तो उसको दोष कैसे लगेगा? कर्तव्य से भागना भी जब कर्तव्य हो जाएगा तो दोष कैसा भाग गया

00:25:31:03 हम फिर तो कौन सी भैया किसकी बेटी कहां बाई क्या है कैसे आपकी कुल परंपरा चली है ये वाली बात एक आ गई तो जो आप कुल परंपरा पे बता रहे हैं इतनी अच्छी स्पीच पहले तो इसमें ये बेसिक से प्रश्न है कि कुल परंपरा किस ओर से बताई है सामान्य विवाह से बताई है या अग्नि नियोग वाले विवाह से बताई है। नियोग वाला विवाह नहीं सॉरी नियोग वाली प्रक्रिया से बताई है। फिर उसमें नियोग वाले में भी कौन से वाले भाई उसमें 11 तक होते हैं। तो पांच छ सात आठ नौ 10 कौन से नंबर का वो था मामला? ये भी आ जाएगा। अगर है तो नहीं है तो फिर वो बात अलग है। पहले तो यही क्लियर हो। सामान्य विवाह के नियोग है। अच्छा उसके बाद फिर वर्ण परंपरा का आपके अनुशासन पालन किया गया कि नहीं किया गया? किसके यहां कैसे हालांकि सत्यार्थ प्रकाश में दयानंद जी स्वयं लिखते हैं कि भैया अच्छे कुल में जहां पर वेद का वो हो रहा हो पाठ वहां पर विवाह करें। यानी कि यहां पर यह जन्म से थोड़ी थोड़ी सी चीजें आ रही है कि भाई वेद का पाठ जहां पर हो रहा है इसका अर्थ यह थोड़ी ना है कि वहां पर उत्पन्न होने वाली जो संतान होगी वो भी गुणी होगी वो तो कर्म से होगी जन्म से नहीं होती है

00:26:46:09 मगर यहां पर उन्होंने कह दिया कि ऐसे घर में विवाह करें जहां वेद का पाठ हो रहा है। तो अब आपके यहां कुल परंपरा का इसका ध्यान रखा गया है कि नहीं रखा गया विवाह होते समय और फिर उस तरीके से आप परिपूर्ण है कि नहीं तब तो हम ये सोचे कि भारद्वाज है कि भारद्वाज है। अच्छा इसके बाद फिर एक चीज और आ जाती है कि आपके माता-पिता जो थे वो मूर्ति पूजक थे या नास्तिक थे या हर समाजी थे।

00:27:23:01 अग्निव्रत जी ने कहा है कि आर्य समाज था ही नहीं। दयानंद से पहले दयानंद जी से पहले तक। ठीक है? था ही नहीं। इसका अर्थ क्या हुआ कि आज अगर आपने दयानंद जी के सिद्धांतों को विधि विधानों को आपने कहा कि यह ठीक है। यह धर्म है। और दयानंद जी ने कहा कि वो अधर्म है मूर्ति पूजा। और आपके घर में जो विवाह हुआ है वह मूर्ति पूजा के अनुसार हुआ है। मूर्ति पूजा को करने वाले लोगों के द्वारा हुआ है। तो वह विवाह तो वैध है ही नहीं आर्य समाज के अनुसार क्योंकि आर्य समाज के लॉ वहां पर लागू नहीं है। धर्म क्या होता है? धर्म का पर्यावसान मोक्ष में है। और मूर्ति पूजकों का मोक्ष तो आर्य समाज के अनुसार है ही नहीं। तो जहां मोक्ष नहीं है वहां धर्म कैसे?

00:28:13:13 तो जो आपने कहा कि आज अगर आप अपनी पीढ़ी में आर्य समाज बने हैं क्योंकि आपसे पहले तो आर्य समाज था नहीं या आपके शायद माता-पिता बने हैं तो फिर उनकी बात आ जाएगी कि भाई उन्होंने तो वैध तरीके से आर्य समाज के ही अनुसार विवाह हुआ नहीं तो फिर वो संतान क्या कहलाएगी साथ में रहने वाली मातृशक्ति क्या कहलाएंगी ये सारी चीजें आ जाएंगी ना तो क्या करें आपका भारद्वाज और भारद्वाज जान के आचार डालेंगे क्या इसका इतनी सारे प्रश्न तो पहले ही खड़े हुए हैं। पहले तो उनको सॉर्ट आउट करें। तब जो आप जब उससे आश्वस्त हो जाए तब हम पूछे कि भैया आप तब हम यह विचार करें कि भैया आपका नाम भारद्वाज है। हमसे त्रुटि हो गई बोलने की। कुल परंपरा बता रहे हो। आपको ध्यान देना चाहिए था। परंपरा की बातें हमसे नहीं करनी चाहिए थी। है ना? उसमें आपने शटर घोट कर रखा है अपने यहां। सटर घोट सपरेटा दही बना रखा है। इसलिए और या फिर कहने को आप बन गए हैं। दयानंदी आर्य समाजी आप बन गए हैं। पर आपके हृदय में कहीं ना कहीं अभी भी वो बीज बाकी है। शुद्ध कुल परंपरा वाला जिसकी वजह से आपने उसको बड़े ही गर्व के साथ बताया। अगर ऐसा है तो बहुत अच्छी बात

00:29:28:16 है भाई। आपके हृदय में अभी भी वो बाकी है। बीज कुल परंपरा का बीज की रक्षा भगवान को अभीष्ट है। करते रहना। अगर ऐसा है तो स्वागत है आपका। तो पहले आपको कुल परंपरा से पहले अपने यह वाले जो मामले हैं तीन प्रकार से आपकी जो कुल परंपरा की शुद्धता है उससे संबंधित आर्य समाज को लेकर के मामले उस पर बात करनी चाहिए।

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00:29:54:26 वो तो आपने की हमारे यहां नहीं है। हमारे यहां जन्म से माना जाता है। नियोग इत्यादि को पहली बात तो आपत धर्म उसमें भी प्राथमिकता वो वाली थी। कलयुग में निषेध है। द्वापर तक मान्य था जब तक लोगों के अंदर इतना बल था कि अगर वह इस प्रकार की प्रक्रिया से होकर के गुजरे भी तो उसमें वो लिप्त ना हो जाए, आसक्त ना हो जाए। इतनी प्रज्ञा शक्ति थी। तीसरी बात उसमें भी प्राथमिकता थी कि जो मानसिक रूप से आधान हो जाए बीज का दय रूप से यह सब चीजें तो आपके यहां स्वीकार्य है नहीं।

00:30:35:22 आपके यहां तो नियोग का मतलब यही है कि दो शरीरों में जो है पुरुष का स्त्री के साथ संग शारीरिक रूप से व्यवहारिक रूप से हमारे यहां केवल इतना नहीं है। तो वो बात हो गई। ठीक है। अच्छा अब आगे चलते हैं। फिर आपने कहा कि बुरा क्यों माना? आपने समालोचना की थी। आपने हमारी जो चर्चा हुई थी उसकी समालोचना की है। अब मैंने बुरा क्यों मान लिया? भाई मैंने कब कहा कि आपने बुरा मैंने बुरा माना है। पूरे वीडियो में एक जगह बता दीजिए। कहां पर कह दिया? मैंने तो उल्टा आपको कहा कि आप निशुल्क आइए हमारे यहां पर और निशुल्क आकर के पढ़िए। आपने कहा था कि मुझे आप समझाइए। तो मैंने कहा था पढ़ लीजिए आप आकर के निशुल्क आपके यहां आर्य समाज मंदिरों में जो जिहादियों के साथ हिंदू बेटियों के विवाह होते हैं वो विवाह करके जो धन जो धनोपार्जन होता है 5100 5100 कहीं-कहीं तो 2100 में भी हो जाता है उस धनोपार्जन के लिए हम आपसे

00:31:50:24 नहीं कहेंगे कि उससे हमें आप शुल्क दीजिए ना फ्री फ्री कक्षाएं हम हमने कहां बुरा मान लिया आपने कहा बुरा मान गए आप मुझे लगता है आप बुरा मान गए मेरी समालोचना को। अच्छा तो एक ये बात हो गई। फिर आपने बताया कि भाग क्यों गए? भाग क्यों गए? आपकी नजरों में मैं चारों खाने चित हूं। इससे मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। मैं आपकी नजरों में क्या हूं। है ना? मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है। मुझे वैचारिक क्रांति लानी है। लोगों को बताना है कि ईश्वर वही है जो कुछ भी कर सकता है। ईश्वर सर्वशक्तिमान है और वह वैचारिक क्रांति आ रही है।

00:32:44:19 आपके हिसाब से भाग क्यों गए? जो आपने कहा भाग क्यों गए भाई? आपके हिसाब से मुझे कब तक बैठे रहना था वहां पर? जब तक आपके जो तथाकथित आचार्य या वैज्ञानिक महोदय हैं जब तक वह यह ना कह दे कि हां मैं हार मानता हूं ईश्वर अवतार ले नहीं सकता। इस जन्म में तो वो ये कहने वाले नहीं है। तो मैं उनके चैनल पर बैठा रहूं। अगर वो गाली दे तो गाली सुनू। मेरी मान्यताओं का उपहास उड़ाए तो उपस सुनू। अगर वो संडास जाए पानी पिए तो मैं बैठा रहूं।

00:33:18:21 हिलूं ना वहां से। और यह यह सब बातें ना शिष्टता की वो मुझे मत बताया करिए पहले जाकर देखिए सत्यार्थ प्रकाश भांड यह वो आपसे लाख गुना वो जो शैली अपनाई है ना सत्यार्थ प्रकाश में और आपके लोग जो अपनाते हैं शिव क्या है यदि उसका कैलाश में घर है तो वहां पर जो वो हो गया क्या जो यहां तुम उसकी पूजा कर रहे हो ये क्या है जो हमारे भगवान हैं जिनके प्रति हम भगवान की बुद्धि रखते हैं उसके लिए तू तड़ाक कर रहे हो और बिना किसी काव्य रचना के फिर कह रहे हो शिष्टता

00:33:59:13 मैंने पूरे वीडियो में आपके लिए जहां भी है अभी भी जी लगा के ही बात की थी केवल एक जो वो गाना था गाने की जो पंक्ति थी उसके लिए आवश्यकता थी अपेक्षा थी कि वहां पर आपके साथ अगर जी लगाएंगे तो र ठीक से नहीं आएगी बस उसमें लगाया बस उसी को आपने जो है सबसे बड़ा बड़ा राई का पहाड़ बना लिया अपने लिए और मुझे साहित्य का आप ज्ञान दे रहे हैं जबकि गति आपकी साहित्य में है। [खांसने की आवाज़] [गला साफ़ करने की आवाज़] तो भाग क्यों गए? आपके हिसाब से ये होना चाहिए था कि वो पलंग लगा के अपना सोते कहते तुम अगर जाओगे तो तुम भगोड़े कहलाओगे। मैं आ नहीं सकता वहां से। भले ही वो ये कहने लगे। मैं नहीं दूंगा उत्तर। मैं जो कहूंगा वो बात होगी। तुम जो कहोगे वो बात नहीं होगी। पूछा यह जा रहा है कि निराकार ईश्वर पर पाप नहीं लग रहा है तो ईश्वर अवतार ले लेगा तो पाप क्यों लगेगा? पूछा ये जा रहा है तो वो कह रहे हैं शिव मोहिनी पे आओ।

00:34:56:04 विषयांतर पर विषयंतर कर रहे हैं। बीच-बीच में पापी कह रहे हैं कि तुम्हारे यहां पाप लिखा हुआ है। इससे सिद्ध होगा अवतार ना होना। चले क्यों गए? तो बैठ के उनकी वहां डींगे सुनता। रश्म थ्योरी की सोते तो मैं बैठा रहता जागते तो मैं बैठा रहता और जाता तो आप जैसे लोग पक्षपाती लोग वो कहते हैं कि भाई भाग गए चारों खाने चित्त हो गए एक सवाल का जवाब नहीं था अग्निव्रत जी के पास एक सवाल का हर जगह अटके हैं जिस सवाल पर पकड़ रहा था उसी सवाल पर अटक रहे थे कौन से सवाल का जवाब नहीं दिया उनके

00:35:44:09 प्रमाण मांगा प्रमाण दिया नहीं मेरा अर्थ चलेगा तो भाई अपनी प्रमाणिकता बताओ अगर तुम्हारा ही चलेगा तो आप मेरी पूछ रहे हो तो छोड़ दो प्रमाण मैं भी अप्रामाणिक तुम भी अप्रामाणिक चलो अब बताओ तर्क से सिद्धि कर दो नहीं ले सकता ईश्वर अवतार बड़े तार्किक घूमते हो ना कर दो भाई मुझे अपनी प्रमाणिकता के लिए तुम्हारे ऊपर डिपेंड रहना नहीं है जरूरी आपको मेरी प्रमाणिकता आपको मेरी प्रमाणिकता पर आप डिपेंड हो। आप अगर मुझे नकारोगे कि मेरे पास वेद मंत्र कहां से आए तो आप अपने आप को नकारोगे। आपको घोषित करना पड़ेगा। आप अवैदिक हो। सुन लो अगर आप शंकराचार्य परंपरा की प्रमाणिकता पर प्रश्न कर रहे हो तो आप पहले स्वयं को ये घोषणा कर दो कि आप अवैदिक हो। क्योंकि शंकराचार्य परंपरा अप्रामाणिक है। तो उससे होकर पास होकर आने वाले जो ग्रंथ है उन पर आपका बिलीव सिद्ध नहीं होगा। अर्ध कुकुट न्याय हो जाएगा। हम आप पर डिपेंड नहीं है। हम स्वतंत्र हैं। तो हम आपसे क्वेश्चन कर सकते हैं। कहां से आए? पर आप जब क्वेश्चन करेंगे तो साथ की साथ क्वेश्चन करते समय सबसे पहले यह कहना होगा कि हम अवैदिक हैं और यही सच्चाई तो आपके सामने लानी है और तमाम सारे जितने भी ये तथाकथित सनातन का चोला ओढ़ के सनातन में दीमक की तरह छेद करने वाले लोग हैं उनकी

00:36:59:18 यही सच्चाई बाहर लानी है कि वो वेद वेद का नाम लेकर के जो हमें दबाना चाहते हैं ना अपनी मन मुखी व्याख्या के नीचे वेद का नाम लेकर के उस वेद के नाम को छोड़ना पड़ेगा हमसे आया है ना वह आपके बीच में हम पर विश्वास नहीं वेद पर विश्वास नहीं बात खत्म इसीलिए लाता हूं परंपरा आप शब्द शब्द प्रमाण को आप ला रहे हो ना बीच में तर्क पर बात हो रही है सिद्धांतिक तरीके से सिद्ध करिए नहीं कर पा रहे हैं तो प्रमाण ला रहे हैं प्रमाण लाओ बीच में प्रमाण लाए अच्छा वो कह रहे परता प्रमाण स्वता प्रमाण स्वता प्रमाण नहीं मानते तुम वेद को स्वता प्रमाण मानते तो उसमें अपना भाष्य क्यों डालोगे? वेद कहां रह गया? स्वता प्रमाण? प्रमाण तो वो है कि जो वेद का अर्थ तुम करोगे। जो तुमसे मैच खाएगा आपसे जो मैच खाएगा वो उसको तुम प्रमाण मानते हो।

00:38:10:00 अच्छा फिर आपने एक बात कही कि भाई आपके पास टाइम बहुत ज्यादा है मैंने तो आपके ऊपर वीडियोस नहीं बनाए थे। आप मेरे ऊपर वीडियोस बना रहे थे। Facebook पे मैंने देखा यहां वहां हाइपरस्ट के यहां आपके दिमाग से मैं उतर ही नहीं रहा था। शायद आपके सपनों में भी आता होगा और आपसे परंपरा पूछताऊंगा। आपसे पूछता हूंगा अगर ईश्वर सब शक्तिमान है तो अवतार क्यों नहीं ले सकता शायद अच्छा आपने मेरे ऊपर जो वीडियो बनाया था पहला वो 30 मिनट का था और वो एडिटेड वीडियो था तो लगभग उसमें कितनी देर लगी होगी एडिटिंग वगैरह करने में रेंडर होने में 20 मिनट लग जाते हैं फाइल तो एक डेढ़ घंटा तो आपने भी लगाया मैंने जो बोला नेचुरल बोला लाइव बोला आपने बोला वो रिहर्सल करके बोला तैयारी करके बोला जो गलत चीज हो गई काटी एडिट किया

00:39:08:19 टाइम तो आपका भी उतना ही गया मैंने उस दिन आपके लिए जो बोला है वो 1 घंटे 50 मिनट बोला है उसके बाद आपके बारे में बात मतलब आपके बारे में बात हुई है मगर जो मेरा आपको मैसेज था 1 घंटे 50 मिनट पर हो गया था पूरा और वहां पर मैंने बोला भी है कि बस यहीं तक का मैसेज है जो जरूरी है आप तक पहुंचे तो लगभग इससे मिलती जुलती कहानी तो आपकी भी है जब आप मेरे ऊपर वीडियो बना रहे हो। फिर कहां से टाइम मेरे पास ज्यादा हो गया? दूसरी बात एक चीज मुझे बहुत अच्छी लगी आपकी। एक चीज के लिए मैं आपको जो है धन्यवाद देना चाहूंगा। साधुवाद करना चाहूंगा कि आपने पहले वीडियो में ना मेरी तुलना रामपाल से की थी।

00:39:51:22 दूसरे वीडियो में आप इस पर आ गए कि भाई तुम रामपाल वालों को ही ठीक करते रहो। उसकी बैंड अच्छे से बजा रखी है। उसके लिए साधुवाद। ये ये है परिवर्तन। इसको कहते हैं वैचारिक क्रांति। गुरुदेव कहते हैं आपकी तारीफ जब सामने वाला करे तब समझ लेना कि आप सही रास्ते पर जा रहे हो। तो पहले वीडियो में क्या कह रहे थे कि रामपाल और मेरे लिए मेरे में और रामपाल में समानता ढूंढ रहे थे ना। दूसरे वीडियो में खुद ही कह रहे हो कि रामपाल की हमने बैंड बजा रखी है। पर यहां पर भी आपका एक वह है। आपकी बातें आपस में टकरा रही हैं। दोगलापन है। आप मुझसे कह रहे हो मेरे पास टाइम बहुत ज्यादा है। फिर दूसरी ओर कह रहे हो कि एक बहुत बड़ा जो स्कैम चल रहा है भारत में उससे मैं लड़ रहा हूं। उसको चटनी चटा रहा हूं। उसके सेंटर्स बंद करवा रहा हूं। आपको शायद ये सब मालूम नहीं होगा। आपके वो होता है चापलूसों से घिरा हुआ जो व्यक्ति होता है उस तक वो सही खबरें आती नहीं है। चापलूसों से घिरा है। चापलूस अपने दृष्टिकोण से देते हैं और वो व्यक्ति उसी के अनुसार जो है रिएक्ट करता है। वो हो रहा है। पता करो फिर बोलो अर्ध ज्ञानी भयंकर हम तो टाइम नहीं है। रामपाल के

00:41:06:24 साथ व्यवहारिक युद्ध चल रहा है। आप जैसों के साथ वैचारिक शोधन के निमित्त कई सारी चीजें चल रही हैं। और फिर आप एक एक ओर को कह भी रहे हो कि अच्छा कार्य कर रहे हैं। यानी कि वहां पर टाइम स्पेंड हो रहा है। फिर दूसरी ओर कह रहे हो कि भाई टाइम बहुत है आपके ऊपर आपके पास। यह सब चीजें आपके जैसे जो महान वक्ता हैं, इतने प्रखर विद्वान हैं, स्वयंभू हैं, भगवान के बाद सीधे महर्षि और तथाकथित महर्षि और फिर सीधे आप आपके जैसे लोगों के ऊपर ये शोभा नहीं देता है।

00:41:46:21 [गला साफ़ करने की आवाज़] अच्छा फिर आप जो है इस पर आ गए कि भाई परंपरा परंपरा कोर्ट की परंपरा हमारी कोर्ट की परंपरा है। चलो कोर्ट की परंपरा ही है तो तुम्हें कोट परंपरा से वेद मंत्र मिले हैं ना अग्निवृत से वीडियो में देख लो। बोल रहे हैं कि मूल तो सारणी है। अरे वेद मंत्र के लिए तो कोट परंपरा पे आधारित हो। कहां जाओगे? हमसे बच के जाओगे कैसे? खुद से हमें छुपाओगे कैसे? हम वो खुशबू हैं जो तुम्हारे वेद मंत्रों में बसते हैं। हम वो खुशबू हैं जो तुम्हारी वेद मंत्र रूपी सांसों में बसते हैं। अपनी सांसों को रोक पाओगे कैसे? कैसे हमको नकारोगे भाई? या तो अपनी असलियत बता दो समाज को। हम अवैदिक हैं। हम वेद विरोधी नास्तिक हैं। अकॉर्डिंग टू मनुस्मृति। हां। समझ रहे हैं ना? हमसे खुद को अलग भी नहीं कर सकते। प्रॉब्लम तो आपकी यह है ना। कैसे कर लोगे अलग? मूल में हम बैठे हुए हैं ना। हां। तो क्या है? कोर्ट परंपरा से आपको वेद प्राप्त हुआ है। तो अगर कोर्ट परंपरा से आने

00:43:01:25 वाली चीजें अप्रामाणिक है। सम्माननीय नहीं है। तो वेद को क्यों स्वीकार कर लिया भाई? क्योंकि ढिंढोरा पीटना है। वेद के नाम पर अपने मन मुखी व्याख्याएं डालनी है। ईश्वर के अवतार की असिद्धि करनी है। मूर्ति पूजा को अधर्म बोलना है। इस्लाम बनाना है। बुत परस्ती का विरोध करना है। ईसाइयत फैलानी है। रूपांतरित करके सनातन के नाम से। इसलिए इसलिए वेद का नाम लेकर के और इस्लामिक बातें बतानी है। ईश्वर अवतार नहीं ले सकता। बाधित है। बहुत से कार्य नहीं कर सकता। त्रिकालदर्शी नहीं है। यह नहीं है, वो नहीं है। और फिर कहीं पर त्रिकालदर्शी बोल भी देंगे

00:43:46:00 कोर्ट की परंपरा। [गला साफ़ करने की आवाज़] तो आपका ये समाज क्या है? रजिस्ट्रेशन समाज। हमारा तो विभाग जो है तब भी न्यायालय है। आपका कहां है? रजिस्ट्रार ऑफिस तक सीमित हो गया। आपका तो पंजीकरण कार्यालय। और आप कह रहे हो मुक्तेश्वर जी का निर्णय हो गया कि नहीं हो गया? अरे तुम अपना निर्णय कर लो जाकर के। जगह-जगह लोग मंदिर खोल रहे हैं आर समाज मंदिर और हिंदू बहन बेटियों का विवाह करा रहा है जिहादियों से जाओ जाके उनको देख लो पहले कोर्ट जब यह कहता है कि अमुक शंकराचार्य हैं अथवा अमुक नहीं है तो अंबेडकर के सिद्धांत के आधार पर कहता है कोर्ट किस आधार पर कहता है मठामना अनुशासनम

00:44:32:28 कोर्ट को जवाब देने का अर्थ केवल इतना है कि यदि हमारी प्रामाणिकता पर किसी ने उंगली उठाई है तो हम वहां जाकर के प्रस्तुत हो रहे हैं। अपने दस्तावेज दे रहे हैं। जो वर्तमान में शासन तंत्र लागू है उसके अकॉर्डिंगली हम अपनी प्रमाणिकता को ख्यापित कर रहे हैं। अच्छा चलो यही मान लिया जाए कि भाई हम जो है वर्तमान के शासन तंत्र का आलंबन ले रहे हैं तो ना ले वर्तमान के शासन तंत्र का शोधन करने के लिए मनुवादी शासन तंत्र लाने के लिए उसकी ही विधियों का ऐसा आलंबन ना ले अपने उसके लिए लड़े नहीं अधिकारों के लिए तो राम मंदिर के लिए बेकार ही लड़े वही मंदिर मंदिर का निर्णय कैसे होगा कोर्ट से होगा तो मंदिर के लिए ना लड़े हालांकि आपके लिए तो अधर्म है। वो बात अलग है कि दोहरी चाल चलते हुए वहां भी जाकर खड़े हो जाते हो। वाह वाह वाह वाह। आपके लिए तो वो अधर्म है। और आपके यहां ना जाने कितने मुकदमे चल रहे हैं। यह मंदिर, वो प्रॉपर्टी ये सब आपके यहां चल रहा है। आप बात करते हो। कितने निचले लेवल पर चल रहा है आपके यहां।

00:45:44:16 आज अगर मैं पूछने निकल जाऊं ना अगर मैं एक एक बुक छपवा दूं सत्यार्थ प्रकाश नाम से। यह आपकी सच्चाई सुन लो अब आंख खोल के आपकी स्थिति क्या है? कान भी खोल लेना जो जो जिन जिन छिदों से अंदर सूचनाएं जाती है वो सब खोल लेना। तो क्या है मैं एक बुक छपवा लूं अगर सत्यार्थ प्रकाश नाम से उसमें ये लिख दूं ना गिल्ली डंडे से मोक्ष होता है फुटबॉल खेलने से मोक्ष होता है जो तथाकथित जो काल नेमी है ना उनको गली में दौड़ा दौड़ा कर पीटने से मोक्ष होता है अगर मैं यह सब भी लिख दूं ना चैलेंज के साथ कह रहा हूं कोई मालाल ऐसा जना नहीं किसी माता ने ऐसा पूत नहीं जना है जो आकर के यह अकाट रूप से स्थापित कर दे कि वो जो सत्यार्थ प्रकाश है वो अप्रामाणिक है। समझ रहे हो? यह है परंपरा को त्यागने का नतीजा। आज कोई भी दयानंद जी के नाम से खड़ा होकर के खुद को आर्य समाझी कह सकता है। कह रहा है और आपके पास क्वेश्चन करने का अधिकार नहीं है। क्योंकि खुद आपने परंपरा के सिद्धांत को त्यागा हुआ है। झांक लो अपने अंदर खुद

00:47:00:00 जाके देखो रायपुर छत्तीसगढ़ में मरही माता का मंदिर कौन सा चौक है? फाफड़ी चौक के आसपास कवर किया था हमने वहां का। मरई माता का मंदिर आर्य समाज बढ़िया माता पिता की मर्जी हो या ना हो आओ विवाह करो जाओ छुट्टी सेम डे चल रहा है वहां पर आप कुछ नहीं कह सकते अरे हम कह तो सकते हैं क्योंकि हमारे यहां सिद्धांत है कि भैया शंकराचार्य कौन बनेगा जिसको उसने जिसको शंकराचार्य ने शंकराचार्य बनाया हो सिद्धांत है आपके यहां कोई सिद्धांत ही नहीं है ना कर्मणा वर्ण व्यवस्था कर्मणा गुरु व्यवस्था कि जिसको ब्रह्म का ज्ञान होगा वही जो है वह होगा विद्वान। इसका मतलब विद्वान की विद्वता को जानने के लिए हमें पहले विद्वान बनना पड़ेगा। तब हम जाकर के विद्वान की विद्वता जान पाएंगे। पहले हम विद्वान बन जाए। फिर फायदा क्या है भैया किसी गुरु के पास जाने का? किसी गुरु के गुरु की प्रामाणिकता को समझने के लिए हमें यह जानना होगा कि उसको ब्रह्म ज्ञान है कि नहीं। उसके लिए पहले हमें ब्रह्म ज्ञान चाहिए तो बिना गुरु के ही चाहिए। फिर क्या फायदा

00:48:15:08 गुरु का? ये सब तार्किक बातें कभी सोचने बैठो तो सही। चिंतनशील व्यक्ति लगते हैं आप। थोड़ा बैठ के विचार मंथन तो कर लीजिए। तर्क पर कभी तार्किक बुद्धि से सोचेंगे। छोड़ दिया, लपेट दिया कह के भैया हम बहुत बड़े तार्किक हैं। हमारा सबसे बड़ा तर्क है कि तुम कुतर्की हो। यही था ना उस दिन। उत्तर क्या आप कुतर्क कर रहे हैं? यह उत्तर था आपके आर्य समाज का। आप कुतर्क कर रहे हैं। ये

00:48:53:08 अरे बैठ के चिंतन तो करो भाई। कह क्या रहा है सामने वाला। पहले ही एक अपने अंदर जो है एक बना लिया एक स्वरूप कि भाई यह व्यक्ति जो है विरोधी है। इसका तो विरोध ही करना है। [गला साफ़ करने की आवाज़] तो कोर्ट की परंपरा आपका है रजिस्ट्रेशन समाज और रजिस्ट्रेशन समाज ऐसा वैसा नहीं है। रजिस्ट्रेशन वो पहले स्वयं का कराता है रजिस्ट्रार ऑफिस में जाकर के और फिर उसके बाद जिहादियों के साथ हिंदू बिटियाओं का विवाह हो करके उनका रजिस्ट्रेशन करता है। एक दिन में कर्मणा ब्राह्मण बनाता है। एक दिन में कर्मणा वैश्य क्षत्रिय इत्यादि बनाता है उनका भी रजिस्ट्रेशन करता है तो आपका क्या है रजिस्ट्रेशन समाज तो आपने तो उस हिसाब से यदि हमारे को कोर्ट की कोड परंपरा कहोगे तो आप कौन से वैदिक हैं रजिस्ट रजिस्टर्ड वैदिक रजिस्टर्ड ऑफिस से मान्यता प्राप्त वैदिक

00:50:01:01 सीधी सी बात है धरती पर जो वायु वायुयान होता है जिसको आकाश में उड़ना होता है। आप सिद्धांत सुनिए। आपके यहां पर इतने गढ़ सिद्धांत है ही नहीं। बहुत सही स्तर तक बातें होती फिर छोड़ दिया जाता है। ज्यादा सवाल मत करो। वही कुरान पांच पांच 101 ज्यादा प्रश्न मत करो। नहीं तो तुम्हारे लिए वो आयतें खोल दी जाएंगी जो तुमसे पहले जो है कुछ लोगों ने प्रश्न किए थे और वो इन आयतों की वजह से बागी हो गए थे। वही हाल है आपका। अब सुनिए सिद्धांत। धरती पर दौड़ने वाला जो एरोप्लेन है उसका उसका जो गंतव्य होता है वह होता है आकाश में उसे दौड़ना है। उसके लिए वो धरती का ही आलंबन लेता है। उसी प्रकार यदि आपको मनुवाद स्थापित करना है। आपको आज की अराजकता जो हो रही है उसका शोधन करना है तो आपको उसी अराजक शासन तंत्र का आलंबन लेना पड़ेगा।

00:51:02:04 [गला साफ़ करने की आवाज़][खांसने की आवाज़] अच्छा फिर आपने एक और लगाया है आरोप कि आपके मठों में हत्याएं होती हैं बलात्कार होता हमने तो भाई हमारे यहां ये सब नहीं सुना है हां कुछ जो नकली नाम ओढ़ के बैठ जाते जिनको हम कह सकते हैं सीना तान के आपकी तरह नहीं पीठ पीछे कहे मराई माता का मंदिर हो रहा है जाओ जा के रोक लो उसको जाओ बंद करवा दो और मुझे बता दो कहां नकली शंकराचार्य मैं जाकर के चिल्ला करके कह दूंगा नकली शंकराचार्य भाई और कहते हैं देख लो नकली शंकराचार्य जो बनकर के घूम रहे हैं पूर्णतः अप्रमाणिक अप्रमाणिक है जो उनके गेट पर जाकर के वीडियो बनाया है आप जाओ मरही माता मंदिर ऐसे ना जाने कितने अभी मैंने लखनऊ में एक किया था कवर जहां वो हिंदू बहन बेटियों का विवाह करना स्वीकार कर रहे हैं। कोर्ट के अनुसार हम कर देते हैं। एक ही दिन में कर देते हैं। जाओ जाकर के उनको कहो कि तुम गलत हो फर्जी हो बंद करो करवा दो एक दो बंद अरे बंद मत करवाओ घोषणा करो अभी देखो दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा है साहस नहीं है क्योंकि परंपरा है ही नहीं तो कैसे कहोगे कि तुम फर्जी हो वैदिक रश्मि

00:52:17:10 थ्योरी वाला भी प्रमाणिक आर्य समाजी और वैदिक रश्मि थ्योरी को ना मानने वाला भी प्रमाणिक आर्य समाजी ये है वास्तविक ता कौन आर्य समाजी है कौन नहीं है यही नहीं पता बस हाथी पर बैठ के चिल्लाओ आर्य समाज आर्य समाज है कहां आर्य समाज वही निराकार ईश्वर की तरह है ही नहीं अस्तित्व है ही नहीं जहां भी है वो किन किस आधार पर है कि विधर्म की आलोचना करो विधर्मियों को मलेच्छों पे अच्छी चीज है ठीक है उनकी चीजों उनकी असलियत सामने लाओ मगर आपका अस्तित्व इसी पर है ख्याति कैसे प्राप्त होती कि मलेच्छों की समीक्षा करो बैठकर के उससे हमारा हिंदू खुश हो जाएगा प्रभावित हो जाएगा जुड़ जाएगा

00:53:06:14 उसके बाद मिलीजुली भड़काऊ बातें भी करो इनके प्रति परंपराओं के प्रति क्योंकि जब तक ये हैं तब तक आपका पूर्णत अस्तित्व तो हो नहीं सकता और बीच-बीच में क्रांतिकारी बन जाओ दार्शनिक बातें भगवान की भक्ति की बातें ये सब बातें बहुत न्यून फलाने तंत्र की बुराई भड़काऊ भाषण अपनों के लिए काशी शास्त्रार्थ स्मृति स्थल और अंतत गतवा कुछ हो जाए तो हमने क्रांतिकारी दिए ये तीन खंबे हैं प्रचार के अस्तित्व के इस पर खड़े हैं

00:53:46:17 [गला साफ़ करने की आवाज़] उन्नत उधर आपको दिख रहा है मेरा खैर ये बात अलग है कि अभी समय नहीं मिलता है। व्यायाम नहीं कर पाता हूं। आप जैसे लोगों ने जो खिचड़ी पका रखी है, जो रोक नहीं पा रहे हो कन्वर्शन क्यों नहीं रोक पा रहे हो? क्यों हमारे भाई बहन छीन रहे हैं? क्यों 35 टुकड़े हो रहे हैं बेटियों के? तब छोड़ना पड़ा ना व्यायाम। प्रायोरिटीज बदलनी पड़ी। नहीं। इस शरीर को जो है फिट एंड फाइन रखने से ज्यादा जरूरी है कुछ और। धर्म की रक्षा ज्यादा जरूरी है। छोड़ो नहीं रहेंग। सिक्स पैक एप्स तो कोई बात नहीं।

00:54:28:16 खैर फिर भी आज भी पौरुष इतना है कि ये जो आपको जो उदर दिख रहा है ना बढ़ा हुआ वो जो उदर है आज भी पौरुष इतना है कि भगवान ना करे अगर कभी सामना होता है चर्चा में और जैसे अग्निवत जी का तो हो ही रहा था। हार्ट पर बार-बार हाथ जा ही रहा था। गले पर बार-बार जा ही रहा था। जान सूख ही रही थी। इधर आपकी भी जान सूखने लगे। कुछ हो जाए भगवान ना करे तो आप दोनों को एक कंधे पे एक और एक कंधे पर एक ऐसे दोनों को जाकर के मैं हॉस्पिटल जरूर छोड़ आऊंगा। इतना सामर्थ्य पर्याप्त

00:55:06:21 शारीरिक रूप से इतना मजबूत हूं। आप दोनों कंधे पर डाल के एक साथ अस्पताल छोड़ आऊंगा। और क्या चाहिए? भाई अपनों के काम आ जाऊं। इससे बढ़के और क्या है? भगवान ना करे ऐसा हो कभी ऐसा हो कि मेरे से सामना हो जाए और फिर आपका इस तरह की स्थिति हो जाए पर अगर हो गई तो आपका वहां पर ये भाई बालक जो भी जिस भी दृष्टि से देखते हो वो इतना सामर्थ रखता है इसी उदर के साथ कि आपको कंधे पर डाल के आराम से गोद में उठा के छोड़ आए अस्पताल

00:55:43:22 अच्छा [गला साफ़ करने की आवाज़] आपने कहा कि चर्चा लगी पड़ी हो ये हो रहा हो वो हो रहा हो लगी पड़ी हो वैद से भी शांत ना हो रही हो तो मेरे यहां के जो गुरुकुल के छात्र हैं उनसे कर लो मैं तो करता रहूंगा आज नहीं तो कल मैं आपको विवश करूंगा कि आप चर्चा करिए मुझसे और या तो समाज को कहिए कि ईश्वर अवतार ले सकता है इस मामले में आर्य समाज गलत है इस मामले में दयानंद गलत से कहिए घोषणा करिए मैं करूंगा चर्चा मैं नहीं रुकने वाला आज मैं योग्य नहीं हूं हो सकता है आगे चलकर के आपको योग्यता दिखाई दे जैसे भाई मैंने जब ये सब शुरू किया था तब मैं योग योग्य नहीं दिखा था ना इनको अग्निव्रत जी को आए ना एक दिन फोन आया ना इनका मेरे पास हां भाई चर्चा आपका भी आया था आपने तो कहा ही है अच्छा चर्चा से पलायन देखिए क्या है आप खुद कह रहे हैं मैंने बहुत प्रयास किया प्रयास किया और अब भाग रहे हैं ये ये तो वो वाली बात हो गई जैसे आमतौर पर एक जनरल सिद्धांत है जैसे वो अभी थोड़ी देर पहले मैंने एक जनरल सिद्धांत दिया था कि एक वैश्या क्या करती है कि अपने दोष को छुपाने के लिए अपने आप को एक्स्ट्रा छुपाती

00:56:59:06 है। आपकी बात नहीं कर रहा था फिलहाल और अभी भी नहीं कर रहा हूं। तो जैसे कार जा रही होती है तो कुत्ते जो होते हैं पीछे दौड़ते हैं कार के पीछे। मगर कार को जब रोक देते हैं और खोलते हैं दरवाजा तो भाग जाते हैं। आपकी बात नहीं कर रहा हूं। मगर यह दृश्य अगर आप ऐसा बना रहे हैं तो ऐसा ही दिखेगा वह दृश्य। हम तो अंतत गत्वा बात यही है कि विषयंतर ना करें। अवतारवाद की बात हो रही थी और अवतारवाद पर भी विरोध आपकी तरफ से प्रारंभ हुआ है। आपकी ओर से भड़काऊ भाषण आते हैं। आप उनको उनका नियंत्रण करें। उनको समझाइए जाकर के। आपने बोला ना म्लेच्छ देख रहे हैं खुश हो रहे हैं भाई समझाओ उनको सच्चिदानंद स्वामी को वैश्यावन ये सब करते रहते हो उसको सिखाया किसने है दयानंद जी ने उनको सिखाया किसने दयानंद जी ने तो आपको ये सब देखना पड़ेगा ना और फिर भी ये सब जो जो आस्था वाली बात है ये तो उतने समय की बात है जब मैं उसमें इन्वॉल्व हूं डायरेक्ट बात मुख्य ये है कि हम सनातनी बट रहे हैं इन कारणों से और इसका फायदा जो दूसरा है वह उठाता है हम बट रहे हैं आर्य समाजी

00:58:14:21 अनास्थावान है मूर्ति के प्रति भगवान के सगुण साकार स्वरूप के प्रति रामचरितमानस के प्रति और यही वो घटक है जिनके जिनके आसपास हमारी लड़ाईयां होती है हमारे युद्ध होते हैं तो वहां पर आर्य समाज निष्ठा के साथ उपलब्ध नहीं है ना एक आध बार कहीं आपने अपने आर्य समाज के ही सिद्धांतों के विरुद्ध जाकर के कुछ कर दिया उसका ढिंढोरा कब तक पीटोगे सच्चाई तो ये है ना कि आपके अनुसार भी वो अधर्म है जब तक वहां पर मूल में आप परिवर्तन नहीं करोगे उससे कुछ नहीं होना जाना दिखावा करने से तो इन सब बातों का ध्यान रखें और जो मां के दूध की बात कही थी वो आपके लिए नहीं कही थी आप अपने लिए मत समझो वो एक जनरल बात कही थी किसी मां ने तो आर्य समाज में किसी मातृशक्ति ने कोई तो मां की कोख ऐसी जन्मी होगी जो आकर के बिना किसी पूर्वाग्रह के सच्चाई तक पहुंचने का प्रयास करेगी। एक चर्चा ऐसी हो कि भाई ईश्वर अवतार क्यों नहीं ले सकता है? तीन चीजें हैं। सर्वशक्तिमान ईश्वर परम स्वतंत्र मोक्ष शाश्वत धर्म बस मुझे दे दो। मैं चलता हूं तुम्हारे साथ बना लो आर समाजी मुझे क्योंकि जीव की चाह का वास्तविक विषय तो सच्चिदानंद

00:59:30:04 स्वरूप परमेश्वर है ना। सर्वशक्तिमान ईश्वर परम स्वतंत्र मोक्ष और इन दोनों चीजों को प्राप्त साधने के लिए प्राप्त कराने के लिए शाश्वत धर्म मनमुखी धर्म नहीं परंपरा प्राप्त धर्म मिलावट वाला धर्म नहीं ये सब चीजें दे दो मुझे ले चलो अपने साथ तो ये सब चीजें ध्यान रखें और स्नेह आपसे मेरा बना रहेगा आपको मैं अपने एक बड़े के रूप में देखता आया हूं आगे भी देखूंगा और आज आप तैयार नहीं है कोई बात नहीं मैं समझ सकता हूं आपके हृदय में किस प्रकार का भय होगा, पीड़ा होगी, बचने के रास्ते ढूंढ रहे होंगे। मैं भगवान से प्रार्थना करता हूं कि आगे वो आपको इस प्रकार के कुछ बल प्रदान करें कि आप जो है इस पूरी के शंकराचार्य जी के अल्पज्ञ शिष्य का सामना करने का सामर्थ्य जुटा पाए। ठीक है? इसी के साथ मैं आपसे आपके साथ जो वार्ता चल रही है उसको यहां विराम देता हूं। एक बात और आपने मोहित गड का नाम लिया है अपनी दोनों ही चर्चाओं में। मोहित गड की स्थिति आपको ज्ञात है। ना जाने कितने स्टेटमेंट्स में मोहित गड स्वयं को बोल बोल चुके हैं कि वो जो है आर्य समाजी नहीं है। अभी सूचना प्राप्त हो रही है कि वो जो है अवतार को लेकर के कोई विरोधी नहीं है।

01:00:48:16 किस किस किस चीज के बारे में बात करूं? और आपको ज्ञात नहीं है किन कारणों से उससे उनके साथ चर्चा नहीं हो पाई थी। तो पहले एक बार फोन मिला लो मोहित गड को और पता कर लो कि तुम आर समाजी हो कि नहीं तुम अवतार का विरोध करते हो कि नहीं हमारी तरह कट्टर विरोधी हो कि नहीं मूर्ति पूजा के मूर्ति पूजा को अधर्म मानते हो कि नहीं अगर मोहित गड ये सब है पहली बात तो चर्चा हो गई होना सुनिश्चित हो गया है मोहित गड से बातचीत हुई है परंतु उन्होंने यही कहा मुझे कि भाई मेरा ऐसा कोई मैंने आज तक कभी विरोध नहीं किया उनकी अपनी मान्यता कुछ भी हो मगर उन्होंने विरोध नहीं किया ऐसा उनका कहना है मेरी मेरी जानकारी में किया भी नहीं। एक जगह पर सर्वशक्तिमान का तर्क मुझे जरूर सुनाई दिया था कि सर यदि ईश्वर सर्वशक्तिमान है तो क्या वास्तविकता में अपने आप को खत्म कर सकता है? हालांकि इसमें भी मुझे ये नहीं सुनाई दिया कि वो जो है अवतार नहीं ले सकता। तो अगर अवतार ना ले सकना से दूर होकर के कोई ये बातें कर रहा है। मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। कोई दिक्कत नहीं। तो पहले आप उससे उनसे पूछिए फोन लगाकर। आपकी तो बनती है ना अच्छी। आपके तो वही है ढाल। आपका सम्मान बचाने के लिए इस समय एक ही नाम मिला है आपको मोहित गड तो भैया फोन लगा के पूछ लो उससे भाई तू क्या कर रहा है पूछ

01:02:03:25 तो लो उनसे कि उनकी मान्यता क्या है आप उनका नाम बार-बार ले रहे हो वो अलग परेशान हो रहे होंगे भाई ये मेरा नाम मेरे नाम पर क्यों मेरे कंधे पर रख के बंदूक क्यों चला रहे हो है ना अच्छा अब यहां पर एक घंटा हुआ आपको जवाब दिए हैं मैंने और इसमें कोई एडिटिंग वगैरह नहीं की है। यहां तक आपका समाप्त हो रहा है। अब मैं आता हूं अग्निव्रत जी पर। [खांसने की आवाज़] [गला साफ़ करने की आवाज़] उन्होंने पहले कुछ आक्षेप लगाए हैं। शर्तें तोड़ी मैंने अपना वीडियो बनाया जो परंपरा वाला तो उसमें कह रहे कि शर्तें तोड़ी।

01:02:50:19 तो शर्तें किसकी ओर से टूट रही है वो तो देख ही रहे हैं दर्शक इसमें मैं कुछ नहीं कहना चाहूंगा उनको शायद पता नहीं वो भी कुछ चापलूसों से घेरे रहते हैं शर्तें अग्निवत जी सर्वप्रथम आपने तोड़ी है जब आप तर्क से प्रमाण पर गए हैं तो आपने घोषणा नहीं की कि मेरे पास तर्क नहीं है आप विषयंतर कर रहे हैं बात हो रही है कि निराकार ईश्वर पर पाप लगेगा नहीं लगेगा तो अवतार पर पाप कैसे लगेगा आप कह रहे कि नहीं नहीं अब से मोहिनी पर आ जाओ। नहीं नहीं अब श भाष्य पर आ जाओ। नहीं नहीं यह कर लो। इसको विषयंतर कहते हैं। शर्तें आप तोड़ रहे हैं। जब तय हुआ है कि किसी के आराध्य के प्रति अपमानजनक बातें नहीं बोलींगी तो आप कह रहे हो आपकी परंपरा में जो पाप लिखा हुआ है। आपने पाप लिखा है। तो भाई शुरू में ही कहते तो चर्चा करता ही नहीं मैं। फस रहे हो तब क्यों कह रहे हो? फस रहे हो। जब आप पर आंसर नहीं आ रहा है तब आप क्यों कह रहे हो?

01:03:48:24 एक कमेंट में जब मुगल मंदिर तोड़ रहे थे तब दयानंद जी ने निराकार की उपासना पर जोर दिया और साकार पूजा का खंडन किया ताकि मुस्लिम ज्यादा विरोध ना करें लेकिन आज दयानंद की नीति की जरूरत नहीं है। तो मैंने कहा ना शाश्वत धर्म शाश्वत हमें हमारा धर्म क्या है? सनातन किसी भी देश काल परिस्थिति में जो ना बदले उसका नाम सनातन। आपने किसी परिस्थिति वश अगर कुछ नियम कायदे कानून बना दिए तो उनको आप थोपो मत समाज पर वास्तविक धर्म बताते रहो।

01:04:21:27 [गला साफ़ करने की आवाज़] खैर अच्छा फिर आगे वो बोल रहे हैं कि हमने पहले ही कहा था वेद प्रमाण होंगे। फिर उसके बाद मनुस्मृति इत्यादि परतः प्रमाण होंगे। तो भाई वेद आपके लिए स्वत प्रमाण नहीं है ना वेद भी परता प्रमाण है उनका उनका प्रमाण तब तक मान्य है आपके लिए जब तक वो आपकी वाणी से आपके पहले से जो आपने सिस्टम बना रखा है उससे जब मैच खाएगा तब वेद प्रमाण है आपके लिए तो ये आप भूल कर रहे हैं स्वतः प्रमाण नहीं है आपके लिए और जब आप ऐसा करते हैं कि नहीं हमारी वाणी से वेद मैच करने वाला अर्थ होगा वेद का मान्य तब हम आपसे आपकी परंपरा पूछते हैं कि वेद कहां से आए सिंपल अच्छा इन्होंने ने एक घंटे का वीडियो बना दिया पर उसमें यह नहीं बता पाए कि क्या कहते हैं ये इनकी परंपरा क्या है चैन क्या है पीछे की कुछ चार पांच पीढ़ी तक नहीं बताई और एक घंटे विधवा विलाप जैसा लगता रहा और रोते रहे कि मेरी परंपरा मेरी परंपरा आर परंपरा बड़ा हास्यास्पद था वो

01:05:30:00 आगे कहते हैं कि ढेला नहीं चलाया वो धक्के वाली बात है ना कि जड़ पदार्थों को ईश्वर की इच्छा किस रूप में प्राप्त हुई मूव कैसे किया ये सब तो वो कह रहे ढेला नहीं चलाया मेरे सामने नहीं तो मैं बताता अरे भाई तुम इतने निचले स्तर के तर्क दे रहे थे वहां पर आप तो आप तो उस स्तर पर जा ही नहीं रहे ना वो बहुत आगे का प्रश्न है जब आप यहां पर अटकेंगे कि जो सब जगह है वो एक जगह कैसे हो सकता है वो अपने स्वरूप के विरुद्ध कार्य कैसे कर सकता है तब ये चीज आएगी ना आप अटकिए तो आप तो यहीं पर ढेर हुए जा रहे हैं कि वो जो है पाप पाप नहीं कर सकता निराकार उसको पाप लगेगा नहीं फिर भाग गए आप जो प्रमाण पर भाग गए फिर प्रमाण से परंपरा पे आपने कहा कि मैं क्यों बताऊं और फिर जो है आप ये व्यक्तिगत कटाक्ष करने लगे शिव मोहिनी पे आ गए फटाफट फटाफट जल्दी जहां पर गिरने लगे वहां से अच्छा इन्होंने देखिए इन्होंने एक बात कही सुखदेव जी को लेकर के कि सुखदेव जी और ग पादाचार्य जी के बीच में गैप है तो इसको मैं कई बार बता चुका हूं एक बार और बता देता हूं कि अगर वैष्णव परंपराओं के अनुसार जो हमारा सामप्य सारूप्य सालोक्य और सायुज्य मोक्ष है अगर उसके अनुसार मोक्ष मानेंगे तो यह इस प्रकार के जो मोक्ष होते हैं श्रोता शत्रुपनिषद इत्यादि में प्रमाण है

01:06:45:13 कि जो योगी योगी हो जाते हैं ऐसी सिद्धियां प्राप्त होती है। परमहंस बन जाते हैं। ऐसी सिद्धि प्राप्त होती है। लोक में ट्रेवल कर सकते हैं। यानी कि भगवान के लोक में जाने के बाद भी आवागमन कर सकते हैं। ऐसा मोक्ष भी होता है। तो अगर यह वाली मोक्ष इस मोक्ष को मानेंगे कि उनका ऐसा मोक्ष हुआ था तो वहां से सुखदेव जी ने आकर के उपदेश दे दिया ग पादाचार्य जी को। ठीक? दूसरा अगर आर्य समाज का मोक्ष भी मान ले तो उसमें यह माना जाता है कि जो जीव मुक्त हो गया वो एक इतने परांत काल के बाद वापस आएगा। ठीक है? तो उस हिसाब से भी वापस आने वाले हो गए। और अगर कैवल्य के हिसाब से वहां देखें कि उनको कैवल्य वाला मोक्ष प्राप्त हुआ था तो पहले भी ब्रह्म ही सुखदेव के रूप में प्रकट हुए थे जिनको हमने सुखदेव माना था। तो अब दोबारा जब वो सुखदेव के रूप में प्रकट होंगे और शब्द प्रमाण कहेंगे कि सुखदेव है तो हम उन्हें सुखदेव ही मानेंगे। है ना? इसमें शब्द प्रमाण हो गया। क्योंकि एक ही ब्रह्म ही तो सबके रूप में प्रकट हो रहे हैं। एक ही परम तत्व तो प्रकट हो रहे हैं। तो क्यों मान रहे हैं हम किसी को अलग-अलग? क्यों मान रहे हैं ईश्वर? क्योंकि शब्द प्रमाण कह रहे हैं कि यह ईश्वर है। यह अवतार है। ठीक है? तो वहां पर जो है शब्द प्रमाण आ गया।

01:08:01:22 योगेश योगेश भारद्वाज जी ने भृगु से भार्गव की सिद्धि करने में व्याकरण की कितनी गलतियां की है? सूत्र की संख्या तक गलत बताइए। अच्छा हां हुई है। हुई होंगी चीजें। जिस चीज में गति नहीं है उस चीज में ज्यादा हम नहीं बोलते। ठीक है भाई उनका क्राइटेरिया है। हां मगर इतनी बात है कि यह सब बातें जो मैं बोलता हूं जैसे उन्होंने एक बात कही कि आपको यह व्याकरण समझ में नहीं आई होगी तो मुझे लगता है कि आपको जो मेरे प्रश्न है वो अभी तक समझ में नहीं आए। भारद्वाज जी इसीलिए आप बगले झांक रहे हैं या फिर बहाने ढूंढ रहे हैं चर्चा से दूर दूर रहने के या फिर मोहित गौर के कंधे पर रख के बंदूक चलाने का प्रयास कर रहे हैं क्योंकि जो व्यक्ति पहले ये कह रहा है कि भाई हमने बहुत प्रयास किया इनसे इनके साथ आमने सामने की चर्चा करने का वो व्यक्ति आज ये कह रहा है कि भैया ये बहाने हैं मेरे पास इसलिए मैं नहीं आ सकता तो इसका अर्थ क्या है कि आप मेरे प्रश्नों को समझ नहीं पा रहे हैं और आप आपके ऊपर की चीज है मुझे मालूम है आपको ये सब चीजें समझ समझ में नहीं आई जो अवतार के पक्ष में मैंने बोली कई बार सुनिएगा उनको तो आपको समझ में ठीक है वापस आते हैं कंप्यूटर पॉइंट ऑपरेटर जी ये हटा दीजिए कमेंट पढ़ लिया मैंने

01:09:17:01 हम तो ढेला इसलिए नहीं चलाया अग्निवत जी क्योंकि आप उस स्तर तक पहुंचे ही नहीं चर्चा को लेकर के भाई मैं आपसे पूछ रहा हूं अवतार क्यों नहीं ले सकता तो आप कहो कि वो उसका स्वरूप ऐसा है वो तो सर्वव्यापक है वो एक जगह आ नहीं सकता तब हम आपको बताएंगे क्या कैसे आएगा एक जगह तो आपने उस चीज पर अटके ही नहीं तो हम क्यों लाए उस चीज को अगर ले आते अगर ले आते आप ही ले आते वैदिक रश्म थ्योरी इत्यादि आप एक व्यक्तिगत कटाक्ष पहना जाते तो आपको और आनंद देते आपको बिल्कुल आनंद दे देते बिल्कुल असली वाला जो आपने कभी भी दूध इत्यादि पिया होगा असली वाला वो सब याद स्मरण में आ जाता पर बस आपने बहुत पहले ही हथियार डाल दिए। आपने बहुत पहले ही अपना जो तप्त का इक्का है ना विषयंतर और व्यक्तिगत कटाक्ष वाला शर्तों का उल्लंघन वाला वो पहले ही आपने निकाल दिया। हमें मालूम था इस चर्चा का जो एंड है वो ऐसे ही होगा क्योंकि निर्णायक कोई वहां है नहीं जो ये बोलेगा हां अब अमुक जीतते हैं या अमुक की बात सिद्ध हो जाती है। अमुक का पक्ष सिद्ध हो जाता है। निर्णायक तो वहां कोई है नहीं। आप यह कहने नहीं वाले कि नहीं भैया मैं मानता

01:10:32:02 हूं अवतार होता है और मैं भी नहीं कहने वाला तो तो कैसे खत्म होगी वो चर्चा ऐसी इसी प्रकार से खत्म होगी वो चर्चा कि कोई ना कोई गरमा गर्मी होगी जिसमें कि क्योंकि मैं आपके दरवाजे पर आया हूं तो मैं अपना भैया चला आऊंगा वहां से ऐसे ही होनी थी चाहे जिस तरह से भी कर लेते एक घंटे और चलती तब भी एक हालांकि आपने वहां पर हथियार जल्दी डाल दिए फिर आपका कहना है कि भाई गवारों के स्तर के तर्क हैं और जो है नंगी स्त्रियों को देखना। हालांकि यह नंगी शब्द बोलने मुझे असहजता हो रही है। आपको नहीं हो रही है। मैंने वहां पर स्त्रियों को नहाते हुए देखने की बात की थी। मेरे मुख से नंगी शब्द नहीं निकल रहा था। आपने बोला तो गवार कौन है वो आप देखो। फड़ता किसके शब्दों में है वो आप देखो। मैंने कहा था स्त्रियों को नहाते हुए देख। आप इन नंगी स्त्रियों को देख रहा है तो आपको नंगी नंगी ज्यादा दिखाई देती है इसलिए शायद आप नंगी शब्द पर ज्यादा जल्दी से पहुंच गए मैंने नंगी शब्द का उपयोग नहीं किया तो फवरता आप अपनी चेक करिए और [गला साफ़ करने की आवाज़] और फता देखनी है तो आप सत्यार्थ प्रकाश पढ़ लीजिए देखिए कभी भी इस सब चीजों पर आएंगे ना कटाक्ष किया ये किया उसमें शुरुआत आप ही की ओर से मिलेगी क्योंकि हम आपके पूर्वज हैं आपके

01:11:47:18 मूल में बैठे हैं ना आपसे पहले हमारा अस्तित्व है तो कभी भी यह सब चीजें शुरू करेंगे आप कटाक्ष किया यह किया यह गलत कहा उसमें पहले आपकी ओर से प्राथमिकता से शुरुआत की गई होगी क्योंकि हम जब थे तब तो आप थे ही नहीं हम तब से हैं जब आप थे भी नहीं तो जो भी शुरुआत होगी जब आप है ही नहीं तो हमारी ओर से आपके लिए कटाक्ष होना सिद्ध ही नहीं होगा हमारी ओर से उसका प्रारंभ सिद्ध नहीं होगा तो वो तार्किकता से यही है कि आप ही की ओर से पहला बार हुआ। ठीक है? इस पर ध्यान दें। अच्छा आगे चलते हैं। एक भी प्रमाण नहीं ऐसा नहीं है। ऐसा नहीं है। प्रमाण मैंने दिया है यहां वहां नैन चिनती शस्त्राण नैन धति पावका चैन क्ल मारता। ये क्या प्रमाण नहीं है क्या? प्रमाण है। एक भी प्रमाण नहीं कैसे कह दिया? यह आपकी बालक बुद्धि है। 60 बरस में व्यक्ति सिया जाता है। कुछ ऐसा प्रतीत हो रहा है। है ना? अगर आप ऐसा करेंगे तो ऐसा प्रतीत बिल्कुल लोगों को ऐसा समझ मतलब लोग ऐसा समझ लेंगे तो इसलिए ऐसा ना करें। अच्छा आगे शय भस भाष्य जो है ना मंत्र पढ़ा ना

01:13:02:21 भाष्य पढ़ा। हां मैं जितनी देर आसन पर बैठता हूं उतनी देर ही मंत्र पढ़ता हूं। आसन पर नहीं होता तो मुझे लगता है कि बहुत सारी अशुद्धियां होती है, पवित्रताएं होती हैं। तो मैं मंत्र इत्यादि को पढ़ने से दूर रहता हूं। मैं उनकी जो शक्ति है उस पर बिलीव करता हूं कि मंत्र में होती शक्ति और हम सदैव उस शक्ति को धारण करने के लिए तैयार नहीं रहते हैं। मेरे जैसा सामान और निकृष्ट व्यक्ति तो नहीं रहता है। आप बहुत महान है चलते फिरते जो है आप तो टेप रिकॉर्डर में आप जैसे लोगों की कृपा है जो आज जो है डोर बेल में गायत्री मंत्र लगा हुआ है। कचरे वाला आ रहा है। गाड़ी वाला आया घर से कचरा निकाल बेल बजा रहा है तो उसमें जो है भू भव स्वाहा तत्स वितुरण्यम यह आप लोगों की कृपा है। गायत्री माता जाकर के बुला रही कचरे वाला आया कचरा दे दो भाई यह आप लोगों की कृपा है ना हम ऐसे नहीं है ना हमारी उनमें आस्था है हम ढिंढोरा नहीं पीटते हैं केवल हम वैदिक है हम वैदिक है हम वैदिक है हम ढिंढोरा नहीं पीटते केवल वो क्या उसको क्या कहते हैं फोकस बाजी नहीं करते हमारी उसमें आस्था है निष्ठा है उसमें सम्मान है उन चीजों का वो हमारे लिए बहुमूल्य चीजें

01:14:18:12 डर लगता है। प्रणव का उच्चारण करने में डर लगता है। नहीं करेंगे। जब जिस समय नहा के निकलेंगे स्नान ध्यान स्नान ध्यान के लिए पहुंच स्नान करके जब ध्यान करने बैठेंगे भगवान का उस समय जब आसन पर तमाम सारे मंत्र इत्यादि के द्वारा स्वयं को शुद्ध कर चुके होंगे संध्या वंदन में तब जाकर के हमारे मुख से गायत्री मंत्र निकलेगा। वेद मंत्र नहीं पढ़ सकते। अच्छा [गला साफ़ करने की आवाज़] हमारे आचार्यों को भी देख लीजिए। आप लोग जब भी किसी मंत्र की बात करेंगे अपने ग्रंथों में पूरा पूरा मंत्र लिखते हैं। हमारे आचार्य गण भी इतना ध्यान रखते हैं। अगर कोई शास्त्र की कोई बात भी बता रहे होंगे तो उनके शास्त्र उनके भाष्य को इत्यादि को आप खोल के देखिएगा। जैसे वेदार्थ पारजात है इत्यादि भक्ति सुधा है कहीं तो शास्त्र के जो मंत्र इत्यादि तो पूरे पूरे कभी नहीं लिखते।

01:15:14:02 बहुत उनका भी प्रयास यही होता है कि मंत्र पूरे ना लिखे। यदि व्यक्ति कोई शास्त्र का कोई मर्म समझने के लिए ग्रंथ पढ़ रहा हो तो ऐसा ना हो कि वो जो है उसे मंत्र वो मंत्र उच्चारित कर दे। इस बात का वो ध्यान रखते हैं। ठीक है? वैल्यूएबल चीजें हैं। आपने इनको बना दिया खेल पर बिकने वाला। तभी रामपाल जैसे लोग खड़े होते हैं ना। अपनी सबसे प्रिशियस चीजों को, बहुमूल्य चीजों को, कीमती चीजों को आपने गलीगली नुक्कड़ पर सब्जी तरकारी की दुकान की तरीके से उसकी दुकानें लगवा दी। उसी का तो नतीजा है। आज बर्बाद गुलिस्ता करने को सिर्फ एक ही उल्लू काफी है। यहां हर डाल पे उल्लू बैठा है। हर साग पे उल्लू बैठा है। अंजाम में गुलिस्ता क्या होगा? हर कोई व्यक्ति वेद का भाष्य कर रहा है। आप आप तो चलिए आप तो जनक हैं इन लोगों के। ब्रह्मा कुमारी लोग इस लोग ये निरंकारी लोग रामपाली लोग अरे हर कदम पर बैठे हैं लोग भाई और जितने सब तंत्र है उन्हीं से और तंत्र निकलते जा रहे हैं इस से निकलता है हरे कृष्णा मूवमेंट ऋत्विक ब्रह्मा कुमारी से निकलता है ईश्वरीय विश्वविद्यालय फलानी मंडली शंकर मंडली

01:16:30:21 आपकी देन है ये सब करो परंपरा की परंपरा प्राप्त आचार्यों का विरोध ठीक है साय ने भाष्य नहीं किया तो वो वाक स्कलन वाली बात है शुक्ल यजुर्वेद की माध्यानी शाखा पर उनका भाष्य नहीं है पर जो भाष्य मैंने आपको बताया वो हमारी जो परंपरा है उसमें स्वीकार्य है प्रामाणिक आचार्य के द्वारा स्वीकार्य बस इतना पर्याप्त है मैच कर रहा परंपरा से विरोध नहीं है। अच्छा और क्या है? पढ़ना भी नहीं आता। तो इसका तो उत्तर मैंने दे ही दिया। बड़ी

01:17:15:27 हां अच्छा हां एक बात और है। संभवत शायण ने भाष्य नहीं किया है। यह बात आपने कही। जबकि जो भारद्वाज जी हैं भारद्वाज जी वो भगु ऋषि के वंशज हालांकि उनकी चीजों में काफी सारी मैंने प्रश्न किए हैं तो भारद्वाज जी जो हैं उन्होंने शायद ये स्वीकार किया है कि सायण ने यह भाष्य किया है अपने वीडियो में पहले जो वीडियो बनाया था तो ये गलती उनसे भी हो गई [गला साफ़ करने की आवाज़] खैर आगे चलते हैं कोई इतनी इंपॉर्टेंट बात नहीं वो आगे है योगेश जी ने बहुत अच्छी वीडियो बनाई थी हां बहुत अच्छी वीडियो बनाई थी बड़े ही कटाक्ष पूर्ण तरीके से बातें की थी घुमा घुमा करके परंपरा अब आप यहां पर आते हैं अपनी परंपरा बताते हैं परंपरा आपकी क्या है परंपरा है ब्रह्मा से जैमिनी पर्यंत हम अच्छा ब्रह्मा से जैमिनी पर्यंत आपकी परंपरा है ब्रह्मा से जैमिनी जैमिनी से दयानंद जी तक ये आपने बोला आप खुद कह रहे हैं कि एक समय था आपने अपनी वीडियो में बोला जब आप यह बता रहे हैं कि क्रांतिकारी इतने दिए आर्य समाज ने तो आपने वहां पर पूर्व पक्ष रखा कि अगर कोई यह कहे कि भैया उस समय कहां थे जब यह हो रहा था हरिहर मुक्का के समय पर कहां थे तो आपने

01:18:31:08 कहा कि भाई उस समय आर्य समाज था ही नहीं तो ये प्रश्न क्यों कर रहे हो तो वो तो एक अलग विषय हो जाएगा कि अगर आर्य समाज है नहीं तो कोई अपनी उपलब्धियों के बारे में ना बताएं क्योंकि आप तो बता रहे हो अपनी उपलब्धियों के बारे में। दूसरी बात यह तो एक बात अलग हो गई। मगर आप खुद कह रहे हो कि एक समय पर आपकी परंपरा नहीं थी। बिंगो क्या कर रहे हो आप? आप कह रहे हो कि जैमनी से लेकर आप तक परंपरा है। फिर कह रहे हो कि हम वहां पर हैं नहीं। हमारा अस्तित्व ही नहीं है वहां पर। तो कहां गए थे उस समय? कौन था उसका धारक? आर्य समाज के सिद्धांतों का धारक कौन था? उस समय जब आप यह कह रहे हो कि आर्य समाज नहीं था। और यदि कोई धारक था ही नहीं तो परंपरा कहां से जुड़ गई दयानंद जी से? या तो यह कहो कि था आर्य समाज। था तो बहुत सारे क्वेश्चन उठ जाएंगे। दयानंद जी को यह क्यों लिखना पड़ा कि बौद्धों का खंडन करके अच्छा किया शंकराचार्य जी ने

01:19:29:20 बहुत सारे प्रश्न उठ जाएंगे आपकी तो परंपरा अब रूप से चली आ रही है तो आप बताइए कि आर्य समाज के सिद्धांतों को धारक किए हुए कौन था धारण किसने कर रखा था उस समय आर्य समाज के निराकार ईश्वर को ये सब बहुत बातें बिल्कुल तर्क के साथ है और बहुत जेन्युइन क्वेश्चंस है जिनको आपको तर्क कह के भाग जाते हैं। अरे भाई मुझे मत दो। कम से कम अपने लोगों को तो दे दो। और जो लोग यहां पर कमेंट करेंगे अभी भी कर रहे हैं। भाई तुम अपमान कर लो मेरा। बहुत अपमान अच्छे से कर लो। पर इन क्वेश्चंस का जवाब तो मांगो जाकर के अपने आकाओं से।

01:20:10:26 जिसके वेद मंत्र पर विश्वास है उसके अर्थ पर विश्वास के लिए मना कैसे कर सकते हैं? और यदि विश्वास नहीं है तो उसके वेद मंत्र पर विश्वास मत करो। वेद के लिए स्वतंत्र कोई स्त्रोत निकालो ढूंढ के हमें यहां से मिला। जैसे जो व्यक्ति तुम्हारे यहां के प्रबुद्ध है जितने भी जो मेरे से जिनका संघर्ष चला है युवा है ऋषिवाच का और निर्भय आर्य का तो वो जब इस चीज पर एक एक पीक टाइम आता है अंत में व्यक्ति को कहना पड़ता है मुझे डायरेक्ट भगवान ने दिए तो ऋषिवाच ने भी यह कहा डायरेक्ट भगवान ने दिए घोषित करो

01:20:46:12 डायरेक्ट ये निर्भय ने भी कह दिया एक जगह डायरेक्ट डायरेक्ट भगवान ने दिए बात खत्म ये घोषित करो फिर उसके आगे बात होगी। फिर उस पर आगे के प्रश्न होंगे। समझ रहे हो? हम पर डिपेंड हो के अपने आप को वैदिक मत कहो। क्योंकि हम आपके लिए अप्रामाणिक हैं अर्थ में। और यदि आप ये पूछोगे कि भैया तुम्हारी भी तो परंपरा नहीं है। तो भाई हम कब कह रहे हैं कि हमें तुम प्रमाणिक मान लो। तुम तो पहले ही हमें अप्रामाणिक कह रहे हो ना। हमें अप्रामाणिक घोषित करके तुम स्वयं को अवैदिक सिद्ध कर रहे हो। हमें अप्रामाणिक कहने के लिए तुम्हें अगर स्वयं को वैदिक कहते हुए अप्रामाणिक कहना है उसके लिए पहले स्वतंत्र स्त्रोत को स्थापित करो ऐसे आए वेद फिर उस पर बातें होंगी आगे कैसे आए कैसे नहीं आए फिर मैं पूछूंगा भागवतानंद की तरह चलो शास्त्र सुनाओ कान में दिया माथा में दिया [हंसी]

01:21:41:18 ठीक है अच्छा हम [खांसने की आवाज़][गला साफ़ करने की आवाज़] ठीक है। अब आगे इन्होंने कहा अग्निव्रत जी ने कि सबने अपशय माना है। सायण अर्थ परंपरा वेद में संपूर्ण ज्ञान विज्ञान है। वेद अपशय है ये सब। और फिर इन्होंने एक बात कही कि इन्होंने कहा कि भाई आप ऐसा भाष्य दिखा दो। इन्होंने एक आरोप लगाया कि भैया इन्होंने जो शायण ने जो भाष्य किया है इनकी यहां से जो बातें शुरू हो रही है ये है अगर संक्षिप्त में कहें कि शय ने जो भाष्य किया है कहीं भी विज्ञान इत्यादि नहीं है उपयोगी चीजें नहीं है केवल कर्मकांड है और फिर ये कटाक्ष भी किया कि कर्मकांड होते रहे हैं फिर भी देश लुटता रहा बर्बाद होता रहा और [गला साफ़ करने की आवाज़] ये इनका कहना है तो इस इस बात को लेकर के मैं बाद में आऊंगा क्योंकि आगे इससे जुड़ी हुई एक और चीज है। आगे और चलते हैं। फिर यह कह रहे कर्मकांड होते रहे फिर भी मंदिर टूटते रहे। तो भाई अभी मेरे ख्याल से 150 साल से तो आप भी आ चुके हो। शासन तंत्र आपके अनुसार है। वैश्य कर्मणा है।

01:22:56:28 है ना? जो जो कर रहा है वो वही है। तो जो वर्ण व्यवस्था वो आपकी लागू है। आप क्या कर रहे हैं? 150 वर्ष में क्या परिवर्तन ले आए? मुझे तो यह दिख रहा है कि और गर्त में जा रहा है राष्ट्र हमारा। 150 वर्ष से आपकी व्यवस्था लागू हो चुकी है। क्योंकि अंग्रेजों के शासनकाल में आपका आप प्रादुर्भाव हुआ है आर्य समाज का और उसके बाद से लेकर अभी तक कर्मणा ही हैं। कोई राजतंत्र तो आ नहीं गया है। मनुवाद तो स्थापित हो नहीं गया। आप जिस तरीके से चल रहे हैं लेकर के और जिस तरीके से आप जो है स्थापित करते हैं व्यवस्था का सामाजिक ढांचा उसी के अनुसार तो देश आज चल रहा है जो आप चाहते हैं जिस प्रकार की व्यवस्था वही व्यवस्था लागू है इस समय देश में तो 150 साल में क्या परिवर्तन ले आए आप तो और गिराते जा रहे हैं गिर रहा है पतन हो रहा है व्यक्ति का तो सवाल तो आपसे होना चाहिए कि आप क्या कर रहे हैं आपके ऊपर से आपके अनुसार व्यवस्था होने के बावजूद आपके यहां पर जो है यह सब हो रहा है। हिंदू बहन बेटियों का विवाह करा रहे हो आप। बहुत हालत खराब है। आपकी अपनी व्यवस्था की। चरमराई हुई है आपकी अपनी व्यवस्था। जरा झांक के देखिए आप अपने अंदर। खैर आगे चलते हैं। अवतार

01:24:13:03 इन्होंने कहा कि गुरुदेव ने जो है अवतार माना। कब माना? तो अभी एक वीडियो देख के आ रहा हूं। जब गौ रक्षा आंदोलन हुआ था तो आर्य समाजी भी साथ में खड़े हुए थे और उसकी बहुत प्रशंसा करते हैं गुरुदेव और तब वहां जब सब जेल में थे जी वहां पर सबसे वरिष्ठ थे तो वहां जब जेल में थे वहां आर्य समाजी भी थे तो एक दिन वहीं पर दयानंद जी का जो जन्म दिवस था वो पड़ा तो उसमें जो है उनको प्रमुख वक्ता के रूप में उन्होंने कहा डेली वहां प्रवचन करते थे भाई सब आध्यात्म से जुड़े हुए लोग थे तो डेली वहां प्रवचन करते थे सब सुनते थे करपात्री जी को तो करपात्री जी को यह निवेदन किया गया कि भाई आप ही आज बोले आज उनका जन्म दिवस तो करपात्री जी ने जितने अंशों में वो जितने अंश उनके उपयोगी हैं उतने अंशों में उनका सम्मान भी किया उनके लिए जो है जो भाव थे अपने साधुवाद वाले वो प्रकट किए ये गुरुदेव बताते हैं अपने वीडियो में तो वो भगवान का अवतार स्वीकार नहीं किया है। अवतार से उनका तात्पर्य है कि प्रकट होना वहां पर। यहां पर भी

01:25:28:04 आप मिलावट कर रहे हो। ईश्वर के अवतार के रूप में दयानंद जी को नहीं स्वीकार किया है। जो आप यहां कह रहे हो दयानंद क्या दयानंद जी को अवतार माना है। ईश्वर के अवतार के रूप में स्वीकार स्वीकार नहीं किया है। प्रकट होने की बात हो रही है। तो प्रकट होने पर वो उन्होंने अवतार बोल दिया उन्हें। वो उन्हें ईश्वर का अवतार नहीं कह रहे हैं वहां पर। ठीक है? और वहां उन्होंने माना कि मूर्ति पूजा का अतिरेक हो रहा था। मूर्ति पूजा के नाम पर जो है धन उगाई हो रही थी। भ्रष्ट हो रहे थे चीजें तो ठीक है। बिल्कुल ठीक है। इसी परिस्थिति के कारण परिस्थिति जन्य किसी व्यक्ति के सिद्धांत उद्भाषित हो जाए अच्छी बात है। उसने उन्होंने जो है उस समय जो है समाज सुधार की भूमिका निभाई। पर उसको ही सनातन सिद्धांत के रूप में स्थापित कर देना। पीछे पड़ जाना यही सनातन है। यह गलत है। बरसात से बचने के लिए आपने कहीं किसी टीन शेड का सहारा ले लिया तो उसको घर नहीं बना लेते। ठीक है। अच्छा

01:26:30:19 फिर आगे आप आ गए। हां। इसके बाद यह और कहते हैं कि भैया [गला साफ़ करने की आवाज़] आपके गुरुदेव ऐसे कह रहे हैं फिर आप जो है गालियां देते हैं। मैंने कब गालियां दी? अग्निव्रत जी मैंने कब गालियां दे दी? आपके लोग गालियां देते फिरते हैं। मैंने गाली नहीं दी है। कोई भी व्यक्ति हमारी ओर का जो प्रामाणिक रूप से प्रस्तुत होगा कभी गाली इत्यादि नहीं देगा। वो ऐसे ही आपको अपनी चीजों से छका लेगा सिद्धांतों से। हमारे सिद्धांत इतने मजबूत है गुरु गोविंद और ग्रंथ सर्वशक्तिमान ईश्वर परम स्वतंत्र मोक्ष शाश्वत धर्म परंपरा हमारे पास सिद्धांत इतने मजबूत है हमें गालियों गालियों की आवश्यकता उसको है जिसके सिद्धांत कमजोर होते हैं व्यक्तिगत कटाक्ष पर जाने की आवश्यकता उसको है जिसके सिद्धांत कमजोर होते हैं मैं तो ऐसे ही छका लूंगा ना आपको छकाया तो फिर भागे आप विषय पर करना पड़ा आपको व्यक्तिगत कटाक्ष शर्तों का उल्लंघन

01:27:25:09 [गला साफ़ करने की आवाज़] और दूसरी बात अगर अवतार मान भी लिया जाए दुर्जन तोष ने माना नहीं है तो हमारे यहां बुद्ध को भी अवतार माना गया है भगवान विष्णु इसका मतलब यह नहीं कि उनके सिद्धांत स्वीकार कर ले यज्ञों की रक्षा करने के लिए उन्होंने जो वैदिक वाक्यों का विरोध किया तो हम उतने अंशों में उनको उनका अनुकरण नहीं करते ठीक है भगवान के रूप में स्वीकार है [गला साफ़ करने की आवाज़] और एक आपकी यहीं पे वो वाली बात भी कर देता हूं। कृष्ण जो है ऐसा कार्य करते हैं। तो भगवान कृष्ण ने स्वयं भगवत गीता में कहा है कि जो लोग मनुष्य दृष्टि का चश्मा लगा के मुझे देखते हैं और मुझे मानव समझ लेते हैं मेरे ब्रह्म भाव को नहीं ध्यान रखते। आपके द्वारा स्वीकार गीता में नहीं हमारी गीता जो गीता के 700 श्लोक हमारे स्वीकार जो

01:28:26:02 मेरे ब्रह्म भाव को भूल जाते हैं मूर्ख होते हैं तो मनुष्य दृष्टि का चश्मा लगाकर उनको देखने के लिए कृष्ण भगवान को स्वयं वो मना कर रहे हैं तो वो कह ही नहीं रहे कि मुझे मनुष्य के हिसाब से देखो वो बता रहे हैं कि मैं परम स्वतंत्र जो ईश्वर परम स्वतंत्र सत्ता है वो हूं और मैं आया हूं तुम्हें यह बताने के परम स्वतंत्र सत्ता किस तरह से कार्य करती है जिससे कि उसको जान करके उसमें तुम्हारी निष्ठा आ सके और जिस कारण से उसका चिंतन करके तुम मुक्त हो सकते। अब इसमें योगेश भारद्वाज जी ने एक बात कही थी वो याद आ गई मुझे यहां पर जिसका उत्तर मैंने नहीं दिया। वो रह गया। उन्होंने कहा कि भाई क्या ईश्वर बिना

01:29:10:00 अवतार धारण किए क्या लोगों को आकर्षित नहीं कर सकता? कर सकता है? बिल्कुल कर सकता है। तो यही तो बात है। इसी को तो आप सोच नहीं रहे हो। मैं कह रहा हूं बिना वेद मंत्रों के वह ज्ञान नहीं दे सकता क्या? दे सकता है। मगर उसने वेद मंत्र के रूप में दिया। बात बस इतनी है। बाउंड नहीं है वो। आप बाउंड कर रहे हो। ये अवतार ले ही नहीं सकता। मैं ये नहीं कह रहा हूं कि नहीं अवतार लेके ही आकर्षित करेगा। क्यों? आपको आकर्षित किया तो है निराकार रूप से। हम कहां मना कर रहे हैं? गीता में उन्होंने यह कहा कठिन होता है। अव्यक्त की पूजा करना कठिन होता है। पर यह तो नहीं कहा कि असंभव होता है। है ना? आप बाउंड कर रहे हो। नहीं नहीं अवतार ले नहीं सकता। हम बाउंड नहीं कर रहे। अवतार ले ही आकर्षित करेगा। नहीं निराकार ईश्वर भी आकर्षित कर रहा है। कर करता है। हो रहे हैं लोग आकर्षित। जिनकी चेतना का स्तर और बहुत आगे है वो आकर्षित हो जाते हैं सीधे। मगर जो व्यक्ति सामान्य रूप से जन्म लेता है भैया उसके लिए तो सगुण साकारी पहला रास्ता है। आगे बढ़ने का तो आप उसको बाधा लगा रहे हैं ना कि अवतार नहीं लेगा। हम तो तीनों रूपों में स्वीकार कर रहे हैं। निर्गुण निराकार, सगुण निराकार और सगुण साकार। ठीक है? [गला साफ़ करने की आवाज़] अच्छा अब आगे चलते

01:30:25:01 हैं। युधिष्ठिर मीमांसक जी से शास्त्रार्थ हुआ था इस बात पे कि विज्ञान है कि नहीं? तो भाई आप अगर अपना मनमुखी कुछ भी अगर डाल दोगे कुछ भी चीजें जोड़ दोगे जिससे कि उपास के पात्र बन जाएंगे लोग। हां तो वहां पर तो कोई व्यक्ति अगर उसको मालूम होगा कि यहां पर आप गलत जोड़ रहे हो आगे चलकर के हमें जो है पास का पात्र बनना पड़ेगा तो वो ऑब्जेक्शन करेंगे ना आपकी वैदिक रस्म रश्मि थ्योरी का ऑब्जेक्शन कर तो रहे हैं आपके यहां के सन्यासी गण है जो आर्य समाज के ही सन्यासी आपका विरोध कर रहे हैं कि नहीं कर रहे हैं शास्त्रार्थ तक के लिए ललकार चुके आप बहाने बाजी कर रहे हो कौन है वो कोई है मुनि करके हैं उन्होंने शास्त्रार्थ के लिए ललकारा भाग रहे हो वहां से वैदिक रश्मि थ्योरी को नहीं मान वो तो जबरदस्ती जहां पर जो चीज नहीं है जहां झूठ का सहारा लिया जाएगा हमें अपने वा सच्चे सिद्धांतों को स्थापित करने के लिए झूठ की आवश्यकता है क्या कि जबरदस्ती जहां जहां पर जो चीज नहीं है वहां भी जोड़ दो ऐसे ही दयानंद जी ने एक तोप जोड़ दी। किसी ने कहा वेदों में तोप का फार्मूला है तो उन्होंने तोप जोड़ दी कहीं पर

01:31:31:03 ये तरीका है काम करने का। धर्म की रक्षा ऐसे होगी जो चीज आवश्यकता दिखाई दे रही है उसको जबरदस्ती जोड़ते जाओ जबरदस्ती जोड़ते जाओ वही वाली बात नेता जी नेता जी से पूछा गया बाढ़ का पानी जो है खतरे के निशान तक आ गया है क्या करें बाढ़ से कैसे बचे तो नेताजी ने कहा खतरे का निशान दो इंच और ऊपर बढ़ा दो लो हो गया समाधान धर्म [गला साफ़ करने की आवाज़] को बचाने के लिए धर्म को बदलते जाओ ये शाश्वत धर्म नहीं है सनातन धर्म नहीं है यह परिवर्तित धर्म और यह शैली इस्लाम की है, बाइबल की है। हमारी नहीं है। जो किसी भी देश काल परिस्थिति में ना बदले उसका नाम ईश्वर।

01:32:17:13 ब्रह्मवरत पुराण यहां से इनका वो चालू हो गया। गाय को अग्न्या कहा गया है। पांच मकार काट छाट। [गला साफ़ करने की आवाज़] इन्होंने कहा कि भैया हमने तो जो है धर्म को बचाया है। आपकी वह जो मनुस्मृति आपने उसमें ये सब डाल दिया है। पांच मकार इत्यादि और उसको हमने विशुद्ध बनाया। हमने धर्म को बचाया। आपने कैसे बचाया वो मैं अभी बताता हूं थोड़ी देर। अच्छा इंद्र भी खाते हैं मास इंद्र भी खाते हैं। इंद्र भी मनुष्य हैं। मैथुन सृष्टि इंद्र की भी है ना तभी कह रहे हो कि भैया वो इंद्र भी खाते हैं। उनके उनकी भी वैसा ही पाचन तंत्र होगा। प्रोटीन कार्ब और फैट जाता होगा। न्यूट्रिशंस जो होते होंगे न्यूट्रिएंट्स जो होते होंगे डिवाइड होते होंगे। फिर उनके मसल्स गेन होते होंगे। माइटोकांड्रिया में जाके सब जलती होगी। एनर्जी प्रोवाइड होती होगी। ऐसे ही तो है अंदर इत्यादि। तो इसलिए उनकी गतिविधियों को हमारे मनुष्यों की तरह सामान्य गतिविधियों से आप जोड़ करके देखें।

01:33:35:11 [गला साफ़ करने की आवाज़] कृष्ण पाप करते हैं। जवाब दे चुका। शिवश केवल कुतर्क कर पाएगा। इसका आंसर दे ही दिया। कुतर्क कौन कर रहा है? सबसे बड़ा तर्क क्या है इस समय अगर जो भी आर्य अगर आर्य समाज इस समय इनके पक्ष में खड़ा हुआ है अग्निवत जी के पक्ष में खड़ा हुआ है तो इसका अर्थ है कि आर्य समाज के पास जो सबसे बड़ा लॉजिक है सबसे बड़ा जो तर्क है वो यह है कि तुम कुतर्क कर रहे हो यह सार है उसका तुम कुतर्क कर रहे हो यह लॉजिक है सबसे बड़ा आर्य समाज का बाकी जो 17 18 सिद्धांत जो मैंने गिना ही दिए हैं अच्छा अब बात आती है कि इन्हों इनका दावा है इन्होंने बार-बार एक चैलेंज किया है कि आप जो है उसकी वैज्ञानिकता सिद्ध कर दो सायण भाष्य की वैज्ञानिकता सिद्ध कर दो सायण भाष्य की इन्होंने दावा किया हालांकि इनकी वैज्ञानिकता कितनी है वह तो तब पता चले जब सामने आए और इन्होंने यह भी कहा है कि मैंने जो भाष्य किया उसका मैं चैलेंज करता हूं। मैं चैलेंज कर रहा हूं शंकर परंपरा के सिद्धांतों को माने बिना नास्तिकता का खंडन कर दो। ईश्वर के बारे में जो अपनी अवधारणा है। बौद्धों से जब शास्त्रार्थ होगा, बौद्धों से

01:34:50:14 जब टकराव होगा वैचारिक तो वहां उनसे ये कहोगे ना वेद से प्रमाण दिखाओ। वेद से प्रमाण दिखाओ। यही कहोगे ना तब वहां शंकर के सिद्धांत काम आएंगे। यह ध्यान रखना धर्म का जो प्राथमिक उद्देश्य है ना उसका परवसान मोक्ष में है। मोक्ष सच्चिदानंद स्वरूप मोक्ष में है। सबसे पहला कार्य है उसका मोक्ष। और अगर मोक्ष नहीं है मोक्ष पे आप मोक्ष को आप गण करेंगे। धर्म का अस्तित्व मिटा देंगे। तो मैं चैलेंज कर रहा हूं। आप शंकर का विरोध करते हुए स्थापित कर दीजिए ईश्वर के अस्तित्व को उपास के रूप में प्राप्तव्य के रूप में मनुष्य के एकमात्र प्राप्तव्य के रूप में स्थापित कर सकते हैं। नहीं अरे ईश्वर तो ईश्वर दूर की बात है। वो तो बाधित है ही है। आपका तो मोक्ष तक परम स्वतंत्र नहीं है। कहां से स्थापित करेंगे? सच्चिदानंद है ही नहीं। मोक्ष वापस आता है व्यक्ति परांत काल के बाद।

01:35:59:08 बिना शंकर के सिद्धांत को स्वीकार किए स्थापित कर दोगे ईश्वर की सत्ता कार्य है तो कारण होगा हां ठीक है तो क्या करे उसका व्यक्ति जब तक उसको जीव के एकमात्र जीव की चाह का वास्तविक विषय नहीं बनाओगे तब तक क्या करें कार्य का कारण है ठीक है दुनिया में एलन मस्क है ठीक है हमें क्या मतलब भाई जब तक उनके बीच में संबंध स्थापित नहीं करोगे तार्किकता के साथ तब तक क्या उपयोगिता है उस ईश्वर की

01:36:34:19 उसको प्राप्तव्य के रूप में स्थापित करने की बारी जब आएगी तब आपको शंकर की जरूरत पड़ेगी ध्यान रखना इसीलिए बार-बार कहता हूं शंकराचार्य ने जो सिद्धांत का सुरक्षात्मक घेरा बनाया हुआ है ना आस्तिकों के लिए उसके अंदर बैठ के अपने ही सुरक्षा के घेरे को घाव मारते जाओ पंजों से जिस दिन बाहरी आक्रमण होगा आस्तिकता के बाहर से उस दिन आखिरी चुनौती उसको शंकराचार्य से मिलेगी और वह उसका अंत होगा। कोई नहीं चुप करा सकता नास्तिकता को। ध्यान रखो कोई है ही नहीं। एकमात्र शंकर का सिद्धांत चुप कराएगा वहां पर जाकर। तो इसलिए सब चैलेंज वेंज देना बंद करो। बचपना किया करते हो। चैलेंज दे रहा हूं। चैलेंज दे रहा हूं।

01:37:23:27 विवादित वातावरण खुद बनाएंगे अर्थ। अब यह क्या कह रहे हैं? आप देखिए मेरे अर्थ कितने सुंदर है। इन्होंने पूरी 50 मिनट की वीडियो मेरी परंपरा मेरी परंपरा मान लो। मेरी परंपरा मान लो प्लीज। मैं बहुत सिंपैथी चाहता हूं आप लोगों की। मेरी परंपरा आर्ट्स परंपरा मान लो। प्लीज पूरी 50 मिनट की वीडियो में उन्होंने यही विलाप किया है। परंपरा बताऊंगा नहीं पर मान लो। हवा में मान लो। खुद कह रहा हूं कि एक समय बीच में है जहां आर्य समाज है ही नहीं। म मेरी परंपरा मान लो।

01:38:04:21 के तुम्हारी भी तो नहीं है तो हमसे वेद क्यों ले रहे हो? बोलो ना किसी और से लिए। बताओ किससे लिए? हम का कह रहे हैं हमसे वेद लो। हमारे वेदों को मानो। हम तो नहीं कह रहे। आप खुद कह रहे हो हमसे वेद लिए तब हम पूछ रहे हैं। आप मत कहो ना कि हमसे वेद लिए। आप बताओ कहां से लिए दूसरे से? किसी और का इतिहास अस्तित्व है ही नहीं। जिस डाल पर बैठे हो उसी को काट रहे हो। जो तुम्हारा शब्द प्रमाण है शंकर परंपरा उसको काटते हो तुम लोग। जो तुम्हें जीत दिलाएगा ना आखिरी उसको काटते हो तुम लोग। सनातन की सबसे बड़ी शक्ति है शंकराचार्य परंपरा उसको काटते हो तुम लोग दूर की दृष्टि नहीं देख पाते कि जब बाहरी आक्रमण होगा तब कैसे लड़ेंगे जाकिर नायक भी अर्थ करेगा वेदों का अपने अनुसार नहीं चुप करा पाओगे उसे हम कराएंगे चुप तब काम आएगी परंपरा कुछ सोचना है नहीं कुछ चिंतन है नहीं ना कोई तर्क है ना प्रमाण है बस सिंपैथी गेम खेलो, इमोशनल कार्ड खेलो और क्रिएट कर दो एक वातावरण।

01:39:20:04 अब इनका तर्क क्या है कि भाई हमने बहुत अच्छा अर्थ किया है इसलिए मेरा अर्थ प्रामाणिक है। मैंने बहुत अच्छा अर्थ किया है। इसलिए मेरा अर्थ प्रामाणिक है। यानी अर्थ से यह चेक होगा कि वह प्रामाणिक है कि नहीं। प्रामाणिकता से अर्थ की प्रामाणिकता सिद्ध नहीं होगी। अर्थ से अर्थ की सुंदरता से यह सिद्ध होगा कि वह प्रामाणिक है कि नहीं। अगर कल को कोई आपसे और अच्छी उन्नत टेक्नोलॉजी को वेद मंत्रों से जोड़ देगा तो आप अप्रामाणिक हो जाओगे और वो प्रामाणिक हो जाएगा। फिलहाल के लिए अगर मान लिया जाए कि आपने बहुत ही उन्नत टेक्नोलॉजी को वेदों से जोड़ दिया। यह आपकी तार्किकता है। अच्छा अर्थ प्रमाणिक है कि नहीं? इसके लिए मुझे जानना पड़ेगा कि ये अर्थ जो है सुंदर है कि नहीं, उपयोगी है कि नहीं? इसका अर्थ क्या हुआ? इसका अर्थ है कि मुझे क्या सही है, क्या गलत है? वो उस वेद मंत्र को जानने से पहले तय कर लेना होगा। कहां से करूंगा? अपने आप या इस्लाम से सीख के आऊंगा। क्या सही है, क्या गलत? वही वाली बात स्कूल की प्रामाणिकता कैसे चेक होगी कि स्कूल पढ़ा क्या रहा है उससे चेक होगी? अरे भैया पढ़ाने से अगर चेक करनी है तो इसका मतलब मुझे मालूम होना चाहिए ना कि

01:40:35:08 क्या है पढ़ाई बेसलेस बात है। अर्थ से प्रामाणिकता सिद्ध नहीं होती है। प्रामाणिकता से अर्थ सिद्ध होता है। आज के समय में गो का मतलब जाना लिखा हुआ है। जाओ और कल को जो है आना अच्छा हो जाए स्थिति के कारण। ये गो का मतलब है छोड़ो आना भी छोड़ दो। गो का मतलब है भाई आप पानी ले जाओ। तो जब हम कल के आने वाले समय में अगर यह पानी ले जाने की डिमांड जो है बढ़ गई तो हम कहेंगे कि गो का मतलब जाना नहीं है। क्योंकि गो क्योंकि पानी की आवश्यकता है तो पानी ले जाना जो है गो का मतलब यह प्रमाणिक अर्थ है। वाह चाहे जो जोड़ दो वही प्रामाणिक है जो सुंदर होगा। और सुंदर क्या है क्या नहीं है यह हम खुद तय करेंगे। वेदों के विधा तय करेंगे। यह तरीका है प्रामाणिकता जांचने का। मैं कह रहा हूं यह जो है अग्निव्रत जी अभी कुछ दिनों के लिए दो चार दिन के लिए गायब हो जाए। मैं कह रहा हूं मैं जो बातें बता रहा हूं अग्निव्रत जी की बातें हैं। और मैं हर चीज को जोड़ दूंगा आपकी चीजों से आपकी किताबों से मूर्ति पूजा को जोड़ दूंगा। शिव जी शिव मोहिनी के जो जो

01:41:50:16 आप मना कर रहे हैं सब जोड़ दूंगा। फिर कैसे कहोगे कि ये अप्रामाणिक है। कहोगे ना कि ये भैया उनसे पढ़ा नहीं लिखा नहीं। उनसे कोई कनेक्शन नहीं। यही होती है परंपरा और जो आपके लोग होंगे उनकी बात वहां पर प्रामाणिक माननी पड़ेगी क्योंकि वो डायरेक्ट आपसे जुड़े हुए थे कि अग्निव्रत जी ने क्या कहा यह कौन बताएगा? शिवांश नहीं बताएगा। यह बताएगा अग्निव्रत जी के जो सीधे-सीधे शिष्य हैं वो बताएंगे। फिर उनके शिष्य बताएंगे उनके ना होने की स्थिति में। और अगर ऐसे ही क्लेम करना है तो मैं भी कह रहा हूं। मूर्ति पूजा कही है दयानंद जी ने। लो और जब किसी भी चीज का कुछ भी अर्थ जोड़ा जा सकता है तो मैं आपकी चीजों में जोड़ दूंगा ले आओ सत्यार्थ प्रकाश निकाल दूंगा मूर्ति पूजा ईश्वर शक्ति रूपी हाथ से सृष्टि बनाता है कार्य करता है लो शक्ति रूपी हाथ ईश्वर के हाथ आ गए शक्ति के रूप में लो हो गई मूर्ति पूजा चालू हाथों की ठीक है ऐसे ही जोड़ दूंगा फिर आप मुझे कैसे क्लेम करेंगे कि मैं जो है दयानंद जी का सही अर्थ नहीं बता रहा हूं। कैसे क्लेम करेंगे? इस बात से क्लेम करेंगे कि इसका अर्थ श्रेष्ठ नहीं है, सुंदर नहीं है। तो यह सुंदरता

01:43:05:20 चेक कौन करेगा? जहां आप खड़े हो वहां मैं खड़ा हूं। वहां देखना होगा कि क्या मैं उनसे प्रामाणिक रूप से जुड़ा हुआ था कि नहीं जुड़ा हुआ था। जो जुड़ा हुआ होगा उनसे। हालांकि उन्होंने तो परंपरा को कैंसिल कर रखा है। तो वहां पर तो यह हो ही नहीं सकता। कोई भी उठ के कह सकता है कि मैं दयानंद जी की ओर से खड़ा हूं। कोई भी और जिस दिन ऐसा हुआ उस दिन आपको पता चलेगा परंपरा कहते किसे। कोई नहीं करेगा तो एक ना एक दिन मैं जरूर करने वाला हूं। तब आप लोगों के होश ठिकाने आएंगे। दयानंद जी के नाम से ही मैं कहूंगा कि मूर्ति पूजा आप सिद्ध नहीं कर पाओगे बिना परंपरा को माने। वहां आपको कहीं ना कहीं लाना पड़ेगा कि भैया यह व्यक्ति हमसे जुड़ा हुआ नहीं है। यही तो मैं कह रहा हूं कि आप डायरेक्ट उन लोगों से जुड़े हुए नहीं है जहां से वेद आ रहे हैं। बीच में हम है। हमको झुठला करके आप उनका क्लेम नहीं कर सकते।

01:43:56:07 कुछ लोग हैं कहते हैं मैं आर्य समाज से नहीं जुड़ा। मैं तो दयानंद जी को मानता हूं। दयानंद जी की किताबें कहां से आई? आर्य समाज से आई। आर्य समाज को बिना माने कोई दयानंद जी तक कैसे पहुंच रहा है? इतनी बुद्धि उनमें नहीं है। ठीक है। [गला साफ़ करने की आवाज़][खांसने की आवाज़] फिर इन्होंने फिर बुराइयां चालू की है। यजुर्वेद में 231 19 में जो घोड़े के द्वारा महिला को गर्भवती इत्यादि अश्लील नंगा नाच ऐत ब्राह्मण में ये बिन ब्याही और ये वो गाय काटना ये वो ये सब बता रहे हैं। तो [गला साफ़ करने की आवाज़] अच्छा फिर इन्होंने वह शूद्र वाला मामला भी कर लूं। इन्होंने एक बात कही है कि ब्राह्मण को दंड कम देते थे और शूद्र को ज्यादा देते थे। यह आपकी गलतफहमी है। जिस श्लोक के आधार पर आपने अपना महिमागान किया उस श्लोक को हमने नकारा नहीं है। जो अपराध करने पर शूद्र को कम दंडे हैं, कम दंड है, वही अपराध करने पर ब्राह्मण को ज्यादा दंड है। मदिरापान करने पर शूद्र को दंड नहीं है। मदिरापान करने पर ब्राह्मण को दंड है कि वह जो है जलती हुई सलाख का आलिंगन कर ले। कब तक? जब तक मर ना जाए। यह है प्रायश्चित।

01:45:09:25 शूद्र के लिए नहीं कहा गया है। कि उसको जो है धन केवल इतना अर्जित करना है कि अपना रोटी कपड़ा और मकान चल सके। प्राण रक्षा के निमित्त केवल धनार्जन करना है। प्राण रक्षा धन जोड़ना नहीं है क्योंकि जोड़ेंगे तो तामस प्रवृत्ति आएगी और उसको जो है जो जो सात्विक ज्ञान है उसको धारण करना है। तो इसलिए आवश्यकता से अधिक धन का संग्रह नहीं कर सकता। यह शूद्र के लिए नहीं कहा है। कोई व्यक्ति उसका पालन ना करे वो बात अलग है। मगर हमने सिद्धांत कौन से स्वीकार कर रखे हैं वो सुन लो। आपके यहां भी ये नहीं स्वीकार रहे होंगे ये वाले सिद्धांत।

01:45:50:12 और सुनो ब्राह्मण को सदैव अपमान का भूखा होना चाहिए। अपमान जो है उसके लिए अमृत के समान है। सम्मान उसके लिए विष के समान है। क्यों? क्योंकि भिक्षा पर उसको जीवित रहना है। भिक्षा पर वेतन नहीं ले सकता। व्यापार नहीं कर सकता। पतित हो जाएगा। धारण नहीं कर पाएगा ज्ञान। इसलिए जो भिक्षा में मिला है उस पर जीवित रहना है। और योगेश भारद्वाज जी कह रहे हैं कि मैं मजाक उड़ा रहा हूं। यह मजाक उड़ा रहा हूं मैं। मुझे गर्व है इस बात पर। यह मजाक नहीं है ब्राह्मणों का।

01:46:36:00 यह सब सिद्धांत हमने स्वीकार किए हुए हैं। शूद्र क्या वो लिख रखा है उन्होंने वो नारी नरक का द्वार है। अरे क्या छोटे बच्चे हो गए हो क्या? नई बातें कर रहे हो। अवतारवाद से बचने के लिए कहां-कहां तक भागोगे? अवतार ईश्वर के अवतार से इतना भय है। नारी नरक का द्वार ले आए। अब और कुछ मिला नहीं तुम्हें। आप नैष्ठिक है, ब्रह्मचारी मुझे नहीं पता। एक सन्यासी के लिए नारी को भोग की दृष्टि से देखना क्या है? वो बात वो वहां कह रहे हैं।

01:47:16:24 यही तो करना था। बात यही है। कभी भी निष्कर्ष निकालना ही नहीं है। ऐसे करके चर्चा को ऐसा मटियामेट कर दो कि निष्कर्ष निकले ही नहीं। वाह वाह वाह वाह करते रहो। यही तो होना था। अभी और होगा। अभी मैं लाया हूं आपके लिए सामग्री बढ़िया वाली। तो अच्छा स्त्री जो है वो स्त्रियों को गायत्री मंत्र नहीं पढ़ने देते। आप बड़ा पूछते हो कि आवश्यकता क्या है? आवश्यकता क्या है? अब मैं पूछ रहा हूं आवश्यकता क्या है? भाई स्त्रियों जो गायत्री मंत्र पढ़ने का परवसान है वो मोक्ष में है ना। तो जब मोक्ष उनको राम राम से मिल रहा है तो गायत्री मंत्र ही आवश्यक क्यों है? क्योंकि इसके आधार पर आप कन्वर्ट करोगे उन्हें।

01:48:02:26 अच्छा स्त्री स्त्री मांग भरती है पुरुष पुरुष क्यों नहीं भरता है भाई? आप भरते हो मांग। आप भी मांग भरवाते हो अपने। आपके यहां जो विवाहित पुरुष होंगे वो मांग भरते हैं। इक्वल कर दो सबको। मोक्ष प्राप्त करने के मार्ग अलग हैं। उनकी दहिक संरचना के अकॉर्डिंगली मोक्ष से वंचित कोई नहीं है। ना ब्राह्मण ना वैश्य ना शूद्र ना क्षत्रिय ना स्त्री सबके लिए मोक्ष अवेलेबल है। बस उनकी दह जो उनको जन्म मिला है उस उस के अनुसार जन्म के अनुसार जो उनका अधिकार है उनकी सीमा में उनको विधि प्राप्त है। उसका आलंबन लीजिए।

01:48:47:18 एक पतित ब्राह्मण से [गला साफ़ करने की आवाज़] कहीं उच्चतम गति प्राप्त करेगा स्वधर्म निष्ठ शूद्र ये कहा गया है आपको तो शूद्र के अस्तित्व से नफरत है क्या बात करते हो आपके यहां पर कितने शूद्र बनाए आपने जो जाता है समाज में वो ब्राह्मण हो जाता है ना क्षत्रिय ना वैश्य सब आचार्य बने डोल रहे हैं सब आचार्य बने डोल रहे हैं कोई कोई है ही नहीं ना शूद्र ना क्षत्रिय ना वैश्य शद्र से नफरत है आपको। आप कह शद मूर्ख होता है, अनार्य होता है। आर्य समाज में जगह ही नहीं शूद्र के लिए। आप कहते हो कि हम लोग उनके साथ भेदभाव कर रहे हैं।

01:49:30:07 स्त्रियां इतनी हुई है। भैया कबूतर भी उसमें वेद मंत्र का दृष्टा बना है। तो कबूतरों का भी जनेऊ करवा दो। वो शर्मा नाम की एक शर्मा सूक्त है उसमें वो स्वान है मादा स्न वो भी मंत्र की दृष्टा है उसको भी जनेऊ कराने लगो सांड को भी ब्रह्मचारी ब्रह्मचारी कहा गया है उसमें बैल को ब्रह्मचारी कहा गया है उसमें वेदों में उनका भी जनेऊ कराने लगो ब्रह्मचारी शब्द आ गया भाई इसीलिए कहते हैं ना कि परंपरा प्राप्त आप भी कई जगह जाकर के जहां पर साफ साफ कुछ और दिखाई दे रहा होता है वहां अपना भाव लगाते हो ना तो भाव जब लग ही रहा है तो किसका भाव लगेगा जब स्पष्ट दिखाई दे रहा है उससे भिन्न कुछ अर्थ लेना है तो जरा सोच के देखिए कि भाव अगर लगाना है उसमें तो किसका भाव प्रामाणिक माना जाएगा भाई जिसने वो चीजें आपको दी है उसका ना कम से कम उसका नकार के तो अपना नहीं लगा पाओगे ना तीन बेर खाती थी वह तीन बेर खाती है बेर शब्द दो बार आ गया। अब इसमें से जिस व्यक्ति ने यह लिखा है वह बताएगा ना भैया कि मैंने बेर शब्द का मतलब क्या

01:50:45:10 कहा है? आप अपने मन से कर लोगे। एक बार कहा है थ्री टाइम्स इन ए डे वो खाना खाती थी। दूसरी दूसरी बार कहा है कि दिन भर में वो मात्र तीन बेर खाती है। फल छोटे-छोटे बेर एक रानी की दुर्दशा बताई जा रही है। पहले वो ऐसे रहती थी। दिन में तीन बार भोजन करती थी और आज उसको दिन भर में सिर्फ तीन बेर प्राप्त होते हैं। तो जब इस प्रकार से हमें अर्थ निकालना पड़ेगा तो हमें प्रामाणिक रीति से उसको जानने वाला बनना पड़ेगा। यह नहीं कि उस समय की उपयोगिता हमने देखी जो अर्थ अच्छा लग रहा है वही इसका अर्थ है। ऐसे नहीं हो सकता ना कि जो आपको अच्छा लग रहा है वही इसका अर्थ है। इसका मतलब कि आपका अच्छे और बुरे का चुनाव पहले है। उसके बाद धर्म है। धर्म से पहले ही आपको धर्म का बोध है। कुछ समझ में आ रहा है जो कह रहा हूं। अच्छा फिर आगे कुरान बाइबल से मिलान कर दिया। गायत्री मंत्र का अधिकार नहीं है। अश्वमेध यज्ञ। अच्छा हां एक बात और कही है वो अश्वमेद यज्ञ के लिए जो है वहां पर जो है वैश्याओं का वर्णन आया रामायण तो क्या नास्तिक नहीं होते थे? जब राम जी को लेने जाते हैं

01:52:00:12 तो भरत जी होते हैं। वशिष्ठ जी होते हैं। साथ में एक और थे राज परिवार से। वो नास्तिक थे। वहां पर श्री रामचंद्र जी उनका खंडन करते हैं। किसी घटना का घटित होना प्रमाण नहीं होता है। घटना को धर्म के रूप में स्वीकार किया जाना प्रमाण होता है। महाभारत में लिखा है घटनाएं तो है ही है। भरी पड़ी है घटनाएं। शास्त्रों में तो सभी घटनाएं वो अनुकरणीय हो गई। क्या रावण ने सीता का हरण किया। हमारे शास्त्र में ये घटना है तो हम उसका अनुकरण करने लगे। नहीं रावण का अनुकरण करने योग्य नहीं कहा गया तो जितना जो अनुकरण योग्य घटनाएं कही जाएंगी उनका अनुकरण किया जाएगा। इसीलिए रामो विग्रह धर्म

01:52:50:12 इतने तह तक कभी सोचा ही नहीं तो क्या करें? सत ही स्तर पर घूमते रहे। कह रहे हैं स्त्री का वक्ष स्थल देखना पाप नहीं था। किसने कहा पाप नहीं था? बोला तो है उन्होंने। पाप था। इन्होंने एक प्रश्न उठाया अपनी वीडियो में कि मैंने जब गुरुदेव से शंकराचार्य जी से एक मैंने प्रश्न किया था वह वीडियो डला हुआ है चैनल पर तो उसमें मैंने पूछा था कि भाई जब रावण आता है उनको सीता मैया को हरण करने के लिए तो वहां पर वो जो है स्पष्ट रूप से जो है व ऐसे शब्द उन अंगों के बारे में भी स्पष्ट रूप से बात करता है जो हमारे लिए आपत्तिजनक है सुनने

01:53:38:00 तो वहां मैंने प्रश्न किया कि उन्होंने ऑब्जेक्शन क्यों नहीं किया सीता मैया? तो सीता मैया के मन में तो बहुत सारे विचार उस समय चल रहे हैं। रावण आया हुआ है। साधु के बेस में है। जब तक वो कोई निर्णय ले पाए ऐसी स्थिति है। कोई पुरुष नहीं है घर का। वो किस तरह से रिएक्ट करें, कोई श्राप ना दे दे, कोई यह ना कर दे। बहुत सारी चीजें हैं। और वहां पर गुरुदेव ने एक बहुत सुंदर उत्तर प्रस्तुत किया था। मैंने प्रश्न किया था कि श्री रामचंद्र जी ने जब वह अपनी व्यथा सुना रहे हैं तो व्यथा सुनाते सुनाते जो लक्ष्मण जी हैं उनको भी वो उन अंगों का नाम ले देते हैं। उनसे वार्ता करते समय लक्ष्मण जी से वार्ता करते समय उन अंगों का नाम ले लेते जो हमारे लिए आपत्तिजनक होता है। परंतु उनकी उस समय स्थिति क्या थी और लक्ष्मण जी कौन थे? जो सदैव अपनी भाभी मां के चरण देखते थे। आपकी तरह थोड़ी ना जहां नियो करा दिया जाता है। देवर के साथ हमारे यहां तो पाप माना गया है नियोग कराना देवर के साथ अपराधी कहा गया है

01:54:45:08 तो आपके यहां तो आपत्तिजनक है ही नहीं हमारे यहां आपत्तिजनक है तो तो किसको उन्होंने ये बातें कही थी एक एक चिकित्सक को यदि हम वहां पर अपने रोग के निवारण के लिए अगर कोई बात कर रहे होते हो तो वहां पर क्या उसको पाप में गिना जाएगा शारीरिक संरचना के बारे में बात हो रही होगी जब उसको पाप में गिना जाएगा तो देखना पड़ता है कि मंतव्य क्या है सामने वाले का तो यदि लक्ष्मण जी उनमें अपनी मां देखते हैं तो उनसे आपत्ति नहीं है बात करने में उस विषय में जब सीता माता का हरण हो गया उनका अपहरण हो गया है वो गायब हो गई है ऐसी स्थिति में आपातकालीन स्थिति में उस समय जब लक्ष्मण जी उनको अपनी मां के रूप में देखते हैं तब वहां पर कैसी आपत्ति और आप आपने अपना अलग ही अर्थ निकाल लिया। आपने वहां लगा लिया कि भैया वह जो है कहते हैं कि आपने क्या कहा कि वक्त स्थल देखना पाप नहीं है। किसने कहा आपसे? मतलब जो अभी बैठे हुए हैं। चलो ऋषियों को छोड़ दो। वो सामने उपस्थित नहीं है। मैं बैठा हुआ हूं सामने। गुरुदेव इस समय विराजमान है। हमारी बातों का भी मतलब अपने अनुसार निकाल करके फिर उसका खंडन करोगे। इसको पता नहीं कौन सी कहते हैं।

01:56:00:21 फैलेसी कहते हैं। स्ट्रांग मैन आर्गुममेंट आर्गुममेंट पता नहीं क्या कहते हैं। ऐसे करके कुछ है कि सामने वाले जो सोच रहा है जो कह रहा है उसको एज इट इज ना लेना उसको अपने हिसाब से मैनपुलेटिव तरीके से ले लेना। फिर इस बदले हुई चीज का खंडन करना। वो आप कर रहे हो। ठीक है। अच्छा अब जो है इन्होंने एक बात कही कि आप भी खाते होंगे पीते होंगे। ये झूठी परंपरा है काटने खाने वाली है। चिकन मटन आप देवताओं को खिलाते हो। आप फिर अब बाद में कह रहे हैं आप नहीं खाते होंगे। पहले कह रहे हैं आप भी खाते होंगे। 26 टुकड़े करता है। यह करता है वो करता है। फिर बाद में कह रहे नहीं भी खाते होंगे। फिर पापों का भंडार तब भी और इतना सब बता दिया। फिर भी बहस करते हैं। मेरे भाष पढ़ लेना, माता बच्ची सब बहुत सारी कुल मिलाकर के प्रामाणिकता के विषय में कुछ नहीं है। इनकी जो सिंपैथी गेम है वही मैंने बताया सिंपैथी गेम है। अरे वो तुमको मंत्र नहीं पढ़ने देते। इमोशनल कार्ड भड़काऊ भाषण और फिर ज्यादा दिक्कत हो जाएगी तो क्रांति की बातें और ज्यादा दिक्कत हो जाएगी तो मिलों की बुराइयां। इस पर अस्तित्व खड़ा हुआ है। क्योंकि अपना ईश्वर तो ऐसा है कि उसकी कितनी महिमा गान कर लो। उससे उसके प्रति व्यक्ति आपके

01:57:15:27 पास तो आने ही नहीं वाला जुड़ने के लिए। फिर आखिर में इन्होंने जो है एक बात कही कि हिंदू समाज दलित को स्त्री को दबाते रहे। वो सब ये सब इन्होंने कहा। अच्छा दलित को दबाते रहे। तो अभी मैंने वो बता ही दिया। शूद्र के लिए आपके क्या विचार है? किस तरह से आप शूद्र को जोड़ रहे हो। अब कुल मिलाकर के अब बात आ जाती है [गला साफ़ करने की आवाज़] तीन जवाब पहला जवाब है गाय के विषय में तो गाय के विषय में वेदार्थ पारिजात में करपात्री जी ने क्या लिखा है वह आप सब लोगों के लिए श्रवण करने योग्य है। मैं पढ़ के सुना देता हूं।

01:57:59:29 [गला साफ़ करने की आवाज़] गोमेद वाला ही मामला है ना? एक जी

01:58:45:25 थोड़ा सा अंश मैं आपको सुना देता हूं [गला साफ़ करने की आवाज़] कि शंकर परंपरा का गोमेद यज्ञ नाम से जो बात प्रचलित हो रही है उसमें क्या निर्णय है? कुछ लोग यह जिज्ञासा करते हैं वेदार्थ पारिजात से पढ़ रहा हूं कि यद्यपि कुछ श्रुतियों के अनुसार सभी प्राणी अवध्य बताए गए हैं। तथापि यज्ञ में विधित पशुओं का तो वध किया ही जाता है। उसी तरह गोमेध यज्ञ में गोव गो वध को भी मान लेना चाहिए। किंतु उक्त जिज्ञासा का समाधान यह है कि अन्य प्राणियों की अपेक्षा गौ की यह विशेषता है कि उसे अग्न कहा गया कहा गया है। अन्य पशुओं से यह जो शब्द है अन्य पशुओं को इस शब्द से संबोधित नहीं किया गया। यदि यह कहा जाए कि अश्वमेध के सहचर्य से अश्व के समान गो का भी गोमेद में वध क्यों ना हो किंतु ऐसा नहीं कह सकते क्योंकि वैसा कहने पर सर्वमेद यज्ञ में सभी को वध समझना होगा। सर्वमेद यज्ञ भी होता है। तो उसमें सबका वध मान लिया जाए क्या? यहां खंडन कर रहे हैं। करपात्री जी महाराज गौ बलि का खंडन कर रहे हैं। जो आप लोग दुष्प्रचार करते हो। इसीलिए मैंने उस दिन चर्चा के समय पर कहा था ना कि जो आप आक्षेप लगा रहे

02:00:00:28 हो आप प्रामाणिक रीति से जान तो लो कि उनका अर्थ क्या है? तब आप आक्षेप लगाया करो। यहां तो मेरे सामने मैं मैं खड़ा हूं। मेरे सामने ही मेरी बातों को बदल करके आप जो है आक्षेप लगा रहे हो। तो हमारे यहां पर कहीं पर भी गाय को बलि के रूप में यज्ञ में पशु के रूप में उपयोग करने के लिए कहीं भी स्वीकार नहीं किया गया है। गौवंश के लिए कहीं पर भी स्वीकार नहीं है। निषेध है पूर्णतया। और इसमें आगे उन्होंने बहुत सी और भी व्याख्या दी है। इस बारे में आपको पढ़ना चाहिए। ये वेदार्थ पारिजात में। अब ये तो रही ये बात गौ के विषय में। ये बात क्लियर हो गई। शंकर परंपरा का क्या मानना है? वेदार्थ पारिजात में करपाती जी ने निर्णय दिया हुआ है और इसी प्रकार से उसमें अलंकार जो उसमें उन्होंने बताया है किस प्रकार से जो मन से मानसिक रूप से वो जो निवेदित किया जाता है जो वहां गौमेध शब्द आया है उसको किस तरह से निवेदित किया जाना है वो आगे पूरी व्याख्या उन्होंने दी हुई है और प्रमाण भी दिए वहां पर जैसे आप बता रहे हो निरुक्त का प्रमाण है इसका प्रमाण है उसका ऐसे ही वहां पर प्रमाण केवल क्लेम कर देना कि मैं जो है उनकी परंपरा से उससे सिद्ध नहीं होता है कि मैं उनहीं की परंपरा से हूं। ब्रह्मा कुमारी वाले भी कहते हैं कि हम भी है भाई सनातनी

02:01:16:19 जबकि वेदों का विरोध कर रहे हैं। रामपाल भी कहता है कि मैं भी हूं सनातनी जबकि वो वेदों का विरोध कर रहा है। तो क्लेम कर देने मात्र से तय होगा क्या? आपके पूर्वाचार्य ने आपको घोषित किया होना चाहिए कि भैया यह मेरे बाद अब यह बताएगा शास्त्रकार। यह होती है गुरु शिष्य परंपरा। प्रामाणिक रीति से आप जुड़े होने चाहिए उस पठन पाठन से। अच्छा [गला साफ़ करने की आवाज़] यह हो गई गोमेदी यज्ञ के बारे में बात। इसके बाद आगे की बात क्या है कि जो अन्य पशुओं की बात है तो उसका परवसान मांसाहार की मांसाहार के प्रोत्साहन में नहीं है। उसका परवसान न्यूनता में है। प्रवृत्ति से निवृत्ति और निवृत्ति से निवत्ति ये जो आपने मनुष्मति का श्लोक लिया है ना कि कोई दोष नहीं है। मांस, मध्य और मैथुन। तो इसमें भाव यह है कहने का कि जो मन जो जीव जो जन्म लेता है वह इन तीन चीजों के साथ लेता है। उसकी प्रवृत्ति प्रवृत्ति है उसकी। तो इस धर्म का आलंबन लेकर अपनी इन प्रवृत्तियों से मुक्त हो जाना ही मोक्ष की ओर अग्रसर होना है। धर्म के द्वारा बताए गए नियमों का आलंबन लेकर इन प्रवृत्तियों से मुक्त होना आपका लक्ष्य है। वहां यह बताया जा रहा है। यह आपकी ये आपके स्वभाव में इनबिल्ट

02:02:32:02 है। यह चीजें मास मदद और मैथुन। और सुनिए अब यह जो इनबिल्ट वाली बात है यह तो आपने भी स्वीकार किया है। कहां स्वीकार किया है? जब आप नियोग का समर्थन कर रहे हैं तो वहां पर यह पूछा जा रहा है नियोग की आवश्यकता क्या है? ठीक है? नियोग कहां पर है भाई? ये रहा शान हम

02:03:21:18 इसमें देखिए इसमें उन्होंने यही कहा है लाइन एक्सजेक्टली ढूंढनी पड़ेगी। उन्होंने कहा है कि भाई आप जो स्वाभाविक जो प्रवृत्ति है ना वो रहेगी ही। हालांकि हम उस पर देखिए वह वहां पर मांसाहार में तो उसकी छूट नहीं दे रहे हैं। जबकि एक तरफ मांसाहार और एक तरफ शारीरिक संबंध बनाना। एक पति मर गया उसके बाद दूसरा पति फिर तीसरा पति फिर चौथा पति ये आएंगे हम इस पर। यहां पर वो छूट दे रहे हैं प्रवृत्ति से निवृत्ति की। पर किसी के अंदर जो मांसाहार की प्रवृत्ति है उससे निवृत्ति प्राप्त करने के लिए वहां पर विधि नहीं उपलब्ध करा रहे। समझ रहे हैं? प्रवृत्ति से निवृत्ति की विधि यहां पर यह शारीरिक संबंध में बनाने में तो दे रहे हैं। आर्य समाज वाले शारीरिक संबंध बनाने इसलिए नियोग करते जाओ। एक के बाद दूसरा दूसरा मर जाए तो तीसरा तीसरा छोड़ो तो चौथा चौथा के बाद पांचवा और बीच में अगर पहले वाला पति वापस लौट आए विदेश से देखिए एक जगह लिखा हुआ है

02:04:26:24 यदि वह इतने दिनों के बाद वापस आ जाए हां देखिए क्या लिखा है नियोग के लिए क्या लिखा है इन्होंने दयानंद जी ने विवाहित स्त्री जो विवाहित पति धर्म के अर्थ परदेश गया हो तो आठ वर्ष विद्या और कीर्ति के लिए गया हो तो छह और धनाद कामना के लिए गया हो तो तीन वर्ष तक बाट देख के मतलब उसकी प्रतीक्षा करे अपने पति की स्त्री अपने पति की इतने दिनों तक प्रतीक्षा करे इन इन कारणों से गया हो उसके पश्चात नियोग करके संतान उत्पत्ति कर ले जब विवाहित पति आवे तब नियुक्त पति छूट जावे। यानी जिससे संतान जब जो नियुक्त पति हो गया अब वह जब अगर वापस आ गया वो जो परदेश गया हुआ है तो जब वो वापस आएगा ये वाला पति छूट जाएगा। कितना सरल है ना शारीरिक संबंध बनाना चालू कर दे और फिर पुराना वाला वो आ गया पति तो अब तुम खत्म। अब आज से आपका जो हमारा जो रिश्ता है वो संबंध खत्म कितना सरल है। है ना? तो आपने भी यहां पर इस चीज को माना है कि नियोग की आवश्यकता क्यों है? क्योंकि अगर नियोग की व्यवस्था नहीं दी जाएगी तो यह लोग फिर गलत तरीके से चोरी छुपे वह कार्य तो करेंगे ही क्योंकि उनके अंदर प्रवृत्ति है। तो जो

02:05:41:27 यहां पर जो ये मांसाहार परख वाक्य हैं शास्त्र वचन है उनका पर्यावसान भी प्रवृत्ति से निवृत्ति में है। उसके प्रोत्साहन में नहीं है कि व्यक्ति उसमें इस तरीके से उसका आलंबन ले। अगर वो मांसाहार की उसकी प्रवृत्ति है तो वो इस तरीके से उसमें गमन करे कि धीरे-धीरे उसके प्रति अनासक्त हो जाए। इसलिए वहां पर विधि दी गई जैसे किसी अस्पताल के बाहर यह नहीं लिख सकते यहां पर किसी रोगी का आना मना है। उसी प्रकार से अगर इस प्रकार की एक कुछ प्रवृत्तियां है जिनसे उसको छुड़ाया जा सकता है धर्म के आलंबन के द्वारा तो उस छुड़ाने की विधि के लिए शास्त्र के ऐसे वचन है जिस प्रकार के वचन आप अपने नियोग को जो है प्रामाणिक सिद्ध करने के लिए जिस प्रकार से आप ले रहे हो स्वयं ठीक है तो यह वाली बात भी हो गई अब जो है आपने एक प्रश्न उठाया है वो गड़ा नाम वाला जो महेंद्र जी का भाष्य तो उसमें आपने प्रश्न उठाया कि वहां पर जो है स्त्री जो है संतान प्राप्त गर्भधारण कर रही है अश्व के द्वारा। तो यहां पर फिर वही धूर्तता है। फिर से वही धूर्तता है। क्या धूर्तता है कि वहां पर कहीं भी अश्व के पहली बात तो वो जो अश्व है जिसके पास एक रात ठहरने वाली बात है।

02:06:57:13 वो अश्व मरा हुआ है। फिर उससे गर्भ धारण करने वाली बात कहां से आ गई? उसमें सीधेसीधे गणपति जी का आहान किया जा रहा है। गणपति जी की स्तुति की जा रही है और गणपति जी के दिव्य तेज को ग्रहण करने की बात हो रही है। और क्या कहते हैं जो माधवाचार्य शास्त्री जी उन्होंने अपने ग्रंथ में लिखा है कि कई जो दवाई कंपनियां हैं जो आज दवाई बना रही हैं नपुंसकता की या फिर संतान प्राप्ति करने के लिए जो कुछ तत्व कार्य में आते हैं वो घोड़े से भी वह तत्व प्राप्त होते हैं। तो वह जो औषधि के रूप में या फिर वह एक दिव्य तेज के रूप में जो प्राप्त करने वाली बात वहां पर उन्होंने स्वीकार की है महध जी ने उसको बड़े ही इत्मीनान से अपने मन से महदर जी के भाष्य का हिंदी में अर्थ करके और जो है प्रचारित कर दिया कि ये तो जो है घोड़े से संतान प्राप्ति की बात कर रहे हैं।

02:07:50:28 खैर आज आपको बहुत आनंद आने वाला है। मैं आपको कुछ चीजें और भी सुनाने वाला हूं। तो ये गणा नाम वाला भी हो गया और हम्म [गला साफ़ करने की आवाज़] ठीक है। तो अब बात आती है कि इन्होंने जैसे हमारे शायण भाष्य की चीजों पर प्रश्न उठाए गौ जो गौ का उपयोग करना यज्ञ में उसका मैंने उत्तर दे दिया। फिर जो है मांसाहार परक वचन का जो पर्यावसान है वह किस में है वह भी उत्तर मैंने दे दिया और तर्क से भी दे दिया। इसके बाद जो आता है ये जो इन्होंने एक अश्वमेद यज्ञ वाली बात बताई तो उसका भी मैंने समाधान उपलब्ध करा दिया। अब

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02:08:49:27 जो है मैं थोड़ा सा इनके भाष्य पर बात करने वाला हूं। तो अब आप सीट की पेटियां बांध लें थोड़ा सा। बहुत रोचक चीजें आपके सामने आने वाली हैं। मैं बस दो चार उदाहरण दूंगा। बहुत ज्यादा मैं उसमें नहीं जाना चाहता हूं और मुझे थोड़ा सा पढ़ने में असहज भी है कहीं-कहीं पर पर क्षमा करिए भाई वो उदारता जो आपके अस्तित्व और आदर्श को नष्ट करने के लिए बाध्य करे वो उदारता उदारता नहीं कायरता कहलाती है। इसलिए मैं पहले से ही क्षमा प्रार्थी हूं। पर अब मुझे पढ़ना पड़ रहा है। जिस तरीके से इन्होंने पढ़ के वो एक नफरत का गेम खेला कि अवतार इसलिए नहीं हो सकता कि देखिए इन्होंने कितना गंदा गंदा लिखा है। तो अब मैं थोड़ा सा इनकी ओर आपका ध्यान आकर्षित करना चाह रहा हूं। ठीक है? तो [खांसने की आवाज़][गला साफ़ करने की आवाज़] दयानंद जी अपने यजुर्वेद के भाष्य में लिखते हैं अध्याय 25 मंत्र सात। उसमें लिखते हैं हे मनुष्यों तुम मांगने से पुष्टि करने वालों को स्थूल गुद्द्रियों के साथ वर्तमान अंधे सर्पों को गुद्दियों के साथ वर्तमान विशेष कुटिल सर्पों को आंतों से जलों को नाभि से नीचे के भाग से जलों को नाभि के नीचे के

02:10:05:06 भाग से अंडकोष को आंडों से ठीक है मैं नहीं पढ़ रहा घोड़े के गुप्तांग की बात भी हो रही है वीर से संतान को ये सब बात हो रही है ठीक है थोड़ा पढ़ने में असहजता आप लोग स्वयं पढ़ें। दयानंद जी के द्वारा जो भाष्य किया गया है यजुर्वेद अध्याय 25 मंत्र सात। अच्छा इसमें कई बातें की गई हैं। एक मैं प्रश्न बता देता हूं। समीक्षा कर रहा है जो उन्होंने समीक्षा में एक प्रश्न उठाया है कि अब दयानंदी हमें बताएं कि अंधे सर्पों को अंधे सर्पों को गुदा द्वार में घुसाने और कुटिल सर्पों को आंतों से लेने की आज्ञा क्या ईश्वर देता है? इसमें एक प्रश्न और उठाया गया है। थोड़ा पढ़ने में असहजता है और आगे भी जो आने वाले हैं उनको भी पढ़ने में असहता है। फिर भी मैं प्रयास करूंगा आपको बताने का। अच्छा अब दयानंद कृत जो यजुर्वेद भाष्य है अध्याय 25 और मंत्र एक उसमें क्या लिखा है? हे अच्छे ज्ञान की चाहना करते हुए ज्ञानी जन

02:11:12:09 वीर्य को अच्छे प्रकार धारण करने हारे बोलना मुश्किल है थोड़ा पता नहीं दयानंद जी ने कैसे लिख दिया वीर बरसाने वाली अंग वीर बरसाने वाला जो अंग है अब समझ लीजिए गुप्तांग की बात हो रही है उसके मुख से चारों ओर जो केश है मुख के चारों ओर जो केश है वीर बरसाने वाला जो अंग है गुप्तांग उसको मुख के चारों ओर जो केश है अर्थात दाढ़ी उससे वह पदार्थ अच्छे प्रकार से ग्रहण करने चाहिए। अब ये यहां क्या कहने चाह रहे हैं? दाढ़ी के आसपास जो है जो केश है और वीर से आने वाला जो वीर वाला जो पदार्थ है

02:11:55:18 दयानंदी बताएं कि दयानंद अपने दयानंद जी अपने भाष्य के द्वारा वीर्य वर्षाने वाला जो अंग है गुप्तांग है और दाढ़ी से ऐसा कौन सा ईश्वरीय ज्ञान बांट रहे हैं? ठीक है? यह प्रश्न उठता है। यह मैं पीडीएफ डाल दूंगा जो लिखी हुई है।

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02:12:15:03 इसमें संकलन है। यह यह आज की चीजें नहीं है। यह सब जो यह अग्निव्रत जी ने मुद्दा उठाया है। यह बहुत पहले की चीजें हैं। इधर आर्य समाजियों ने उनका भाष मुताबिक निकाला और ये सब आक्षेप लगा दिए। फिर जो हमारी तरफ के जो परंपरा प्राप्त आचार्य थे उन्होंने भी बताया भाई तुमने भी तो ये कर रखा है और कई जगह तो ऐसी है जहां भावार्थ भी बदल नहीं रहा है कई जगह भावार्थ बदलता है कई जगह भावार्थ भी नहीं बदलता है और तो और हम यह कह सकते हैं कि हम परंपरा वाले हैं इसलिए आप हमारा जो अर्थ है वो हमारी प्रामाणिकता प्रामाणिक रीति से आप लीजिए आप तो यह भी नहीं कह सकते आपने जो लिखा है उसका जो अर्थ हम निकालना चाहे वो निकाल सकते हैं एज इट इज पढ़ेंगे तो एज इट इज ही पढ़ेंगे भाई दयानंद जी यही कहना चाहते थे आपकी बात क्यों मान परंपरा को तो माना नहीं जाता है। तो कैसे पता करें दयानंद जी यह नहीं कहना चाहते जो लिखा है। आगे चलते

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02:13:05:22 हैं और क्या लिखा है? [गला साफ़ करने की आवाज़] जैसे पुरुष का गुप्तांग मैं यहां पर दूसरे शब्दों का उपयोग कर रहा हूं क्योंकि मुझे पढ़ने में असहजता हो रही है। जैसे पुरुष का गुप्तांग स्त्री के गुप्तांग में प्रवेश करता हुआ वीर्य को छोड़ता है। यह है यजुर्वेद 19 76 यजुर्वेद 1976 जैसे पुरुष का गुप्तांग स्त्री के गुप्तांग में प्रवेश करता हुआ वीर्य को छोड़ता है और इससे अलग मूत्र को छोड़ता है। इससे जाना जाता है कि शरीर में मूत्र के स्थान से पृथक स्थान में वीर्य रहता है। यह वैज्ञानिक भाष्य है दयानंद जी का। तालियां बजाइए।

02:13:51:18 ये वैज्ञानिक भाष्य है ना? ये कह रहे हैं ना वैज्ञानिक भाष्य हमारे पढ़िए प्रामाणिकता दयानंद जी की यजुर्वेद 1988 क्या लिखा है? इसमें ये कर रहे हैं हे मनुष्यों जैसे जिससे रस ग्रहण किया जाता है वह वाणी के समान स्त्री इस पति के सुंदर अवयवों से विभक्त सिर के साथ सिर करें तथा मुख के समीप पवित्र मुख करें। इसी प्रकार गृह आश्रम में के व्यवहार में व्याप्त स्त्री पुरुष दोनों ही वर्त तथा जो इस रोग से रक्षक वैद्य और बालक के समान वास करने का हेतु पुरुष उपस्थेंद्रिय यहां पर गुप्तांग को बल से करने हारा होता है। वह शांति करने के समान वर्तमान में संतान उतत्पत्ति का हेतु होवे। यहां मतलब बता रहे हैं कि किस प्रकार से पति को पत्नी के साथ रमण करना है। वैज्ञानिकीकरण भाष्य दयानंद जी बता रहे हैं वेदों में। ठीक है? अच्छा आगे चलते हैं। इसमें बहुत अच्छी समीक्षा भी दी है। तो जिसके पास समय हो वही समीक्षा भी पढ़ सकता है। [गला साफ़ करने की आवाज़] आगे है यजुर्वेद 28 32

02:15:07:03 इसमें क्या लिखा हुआ है? दयानंद जी के भाष्य में हे मनुष्यों जैसे बैल गायों को गाभिन करके पशुओं को बढ़ता बढ़ाता है वैसे गृहस्थ लोग स्त्रियों को गर्भवती कर प्रजा बढ़ावे आगे लिखा है यजुर्वेद 2160 इसमें लिखा है हे मनुष्यों प्राण और अपान के लिए दुख विनाश करने वाले छेरी आदि पशु से वाणी के लिए मेढ़ा से और परम ऐश्वर्य के लिए बैल से भोग करें। वाणी के लिए मेंढक से भोग करिए। परम ऐश्वर्य के लिए बैल से भोग करिए। और दुख का विनाश करने के लिए छेरी आदि पशु से भोग करिए। यह लिखा है दयानंद जी के भाष्य में। है ना? भोग करिए। भोग बैल के साथ भोग करिए। आर्य समाजियों के यहां पर यह चीजें लागू होती है। मैं पूछना चाह रहा हूं। आगे चलते हैं। यजुर्वेद 148 स्वामी जी लिखते हैं स्त्री पति से और पति अपनी स्त्री से कहे कि हे स्त्री

02:16:22:24 तू मेरे नाभि के नीचे भवेंद्रिय मार्ग से निकलने वाली अपान वायु की रक्षा कर। अपान वायु समझते हैं फार्ट कहते हैं ना इंग्लिश में और हिंदी में क्या कहते हैं आप लोग समझ रहे होंगे अपान वायु जो वायु निकलती है निचले द्वार से उसकी रक्षा करेगी कौन पत्नी ये कहा जा रहा है हे स्त्री तू मेरे गुेंद्रिय से निकलने वाली अपान वायु की रक्षा कर आगे चलते हैं

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02:16:56:16 योगेश भारद्वाज जी यही पर है अगर यहीं पर हैं तो आपने तो कहा था यह मेरी अंतिम बात है। अंतिम बात है। तो आपको चर्चा करने में कैसी आपत्ति है या कोई नकली आईडी से है यहां पर। खैर [गला साफ़ करने की आवाज़] ऑपरेटर से मैं कहूंगा कि आप थोड़ा सा पता लगा के बताएं। ओरिजिनल आईडी से है तो इनको चर्चा करनी है तो चर्चा का समय सुनिश्चित करें और साथ चर्चा करें। ठीक है? आगे

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02:17:25:20 चलते हैं। यजुर्वेद छ 14 क्या लिखते हैं स्वामी जी हे शिष्य मैं तेरी वाणी नेत्र नाभि जिसे मूत्रोत्सर्ग आदि किए जाते हैं उस गुप्तांग यहां पर दूसरा शब्द लिखा हुआ है मैं बचा के चल रहा हूं थोड़ा सा को तेरे गुद्दिय के लिए शुद्ध करता हूं यहां पर गुरु जो है शुद्ध कर रहे हैं गुेंद्रदिय को गुप्तांग को यह हो क्या रहा है और वहां भाष्य में दयानंद जी यह भी लिख रहे हैं गुरु और गुरु पत्नी दोनों कर रहे हैं। शिष्य की गुप्तांग को गु्दियों को शुद्ध कर रहे हैं। सफाई कर रहे हैं वहां की। यह सब शुद्ध करता हूं। ठीक है? चलिए आगे चलते हैं। [नाक से की जाने वाली आवाज़] यजुर्वेद 3021 इसमें लिखा हुआ है बंदर किसी छोटी आंखों वाले शीत प्राय देसी मनुष्यों को पीली आंखों वालों को उत्पन्न कीजिए। को गंजे को काले रंग वाले पीले नेत्रों से युक्त पुरुष को दूर कीजिए। ठीक है? यहां क्या हो रहा है? को दूर करो।

02:18:39:27 और आप एक और कहते हैं कि हमने अत्याचार किया है। उनको तो कुछ नीच कुल की की गंध इत्यादि ये सब कहा है उन्होंने कि की गंध आती है उसको दूर रखो मुझसे। यह सब स्वीकार किया है। और स्त्री पुरुष में भेद क्या दयानंद जी ने नहीं किया। वो कह रहे हैं कि जब अगर न्यूक की बात करूं तो न्यू के बारे में आपको कुछ बढ़िया चीजें आपको बता दूं।

02:19:26:19 सबसे पहली बात है कि नियोग का आदेश कहां पर भी दिया जा रहा है? हे विध्व नारी तू इस मरे हुए पति जो है मरा हुआ पड़ा है सामने वह विलाप कर रही है वहां की बात है इस मरे हुए पति की आशा छोड़ दे छोड़ के बाकी पुरुषों में से जीते हुए दूसरे पति को प्राप्त हो इस बात का विचार कर और निश्चय रख कि जो तुम विधवा के पुनः मतलब पति वहां सामने लेटा हुआ है मृत्यु शैया पर उसको छोड़ और आसपास जो जीवित लोग हैं उनमें से किसी को पति बना मतलब नियुक्त कर नियोक्त के पति तो ना बना और फिर जो है उसके साथ अपना वो जो आगे की प्रक्रिया है उसमें आप लिप्त हो जाइए। यह इनका कहना है। देवर उसको कहते हैं जो विधवा का दूसरा पति होता है। इन सब चीजों का खंडन करते हैं हम और यह कह रहे हैं कि आपके यहां पाप लिखा है। देवर उसको कहते हैं जो विधवा का दूसरा पति होता है। चाहे वह छोटा भाई हो या बड़ा भाई हो अथवा अपने वर्ण का वह अपने से उत्तम वर्ण वाला हो। जिससे नियो करे उसी का नाम देवर। लो ये है देवर। और यह लोग क्या कहते हैं

02:20:33:15 कि हमने जो सम्मान दिया है वो जो रानी थी लक्ष्मीबाई पद्मावती इन सब का नाम लेते हैं। इनमें से कितनी कितनों का आप आप जो है नियोग स्वीकार करते हैं जितनों का आपने अपनी वीडियो में नाम लिया है। अरे अच्छा हुआ आपकी विचारधारा उस समय नहीं थी। नहीं रानी लक्ष्मीबाई और पद्मावती का आप नियोग करवा देते वहां पर। उन्होंने तो जहर कर लिया था। आप कहते जोहर मत करो संतान प्राप्ति करो नियोग करके। ये जो अलाउद्दीन खिलजी आ रहा संतान प्राप्त करो भाई आप तो यह करते वहां पर नियोग करवाते आप वहां पर झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का नियोग करवाते आप यही है ना आपके यहां पर स्त्रियों का अधिकार नियोग करवाना उनका बात करते हैं कितनी ज्यादा लालसा है नियोग करवाने की देखिए आप और क्या है इसमें 11 पतियों तक बताया कि उसका क्या नाम होगा कहां से कहां तक सत्यार्थ प्रकाश पढ़ रहा हूं और देखिए

02:21:42:14 संतान उत्पत्ति में असमर्थ होवे अच्छा एक चीज और है कि अग्निव्रत जी नियोग को आपत धर्म मानते हैं जबकि वहां पर जो दयानंद जी वह तर्क दे रहे हैं कि प्रवृत्ति होती है। प्रवृत्ति होती है व्यक्ति की जो उसके अंदर स्वाभाविक दिए हैं मैथुन के प्रति आकर्षण उसकी बात की है दयानंद जी ने तो जब उन्होंने यह बात की प्रवृत्ति होती तो यहां पर आपत धर्म तो खत्म हो गया तो प्रवृत्ति से निवृत्ति का मामला आ गया दूसरी बात यह है कि क्या केवल संतान प्राप्ति के लिए जो एक बार रमण होगा उससे काम चल जाएगा प्रवृत्ति में का उससे काम हो जाएगा प्रवृत्ति से निवृत्ति के लिए आप जो जो है नियोग करवाते जा रहे हो। एक छूटा दूसरा गया, दूसरा गया, तीसरा आया, तीसरा गया, चौथा आया, चौथा गया, पांचवा आया, पांचवा गया, छठवा आया, छठवा गया,

⬜ Not used yet · 02:22:32:14 – 02:23:33:13 (1:01)

02:22:32:14 सातवां आया, सातवां गया, आठवां आया। ये धर्म लिखा हुआ है और कितने आप लोग नियोग करवा रहे हो अपने यहां? ये बता दो। आउटपुट कभी समझा है? आपने आरोप लगा दिए। गौ गौ का वो मानते हो, यह मानते हो। आउटपुट पर भी तो ध्यान दो भाई। गौ रक्षा के लिए लड़ रहे हैं कि नहीं लड़ रहे हैं? कितने कितने हमारे मठ मंदिर है जहां पर जो गाय की बलि हो रही है। अरे गाय की बलि छो बड़ी बलि हो रही है। कौन से चार शंकराचार्य के चारों मठ में से कहां पर बलि चढ़ रही है बताइए? अगर मांसाहार को प्रोत्साहित करने वाला ही अर्थ हम स्वीकार कर रहे हैं तो बलि होती ना हमारे यहां मठों में कहां हो रही है? क्योंकि उसका परवसान जो मांसाहार परक शास्त्र के वाक्य है उनका परवसान भी मांसाहार के प्रोत्साहन में नहीं है। जैसे आपके अनुसार ये जो नियोग वाले वाक्य नियोग के प्रोत्साहन में नहीं है। वो बात और है कि आप जो है नियोग से नियोग के द्वारा प्रवृत्ति से निवृत्ति करा रहे हो।

02:23:33:06 एक

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→ Used in: A · Video वेदों पर दयानंद भाष्य में वैज्यानिकता या अश्लीलता? at 11:40 ↗

02:23:33:13 तरफ मांसाहार मांसाहार में आपको दिखाई नहीं दे रहा कि प्रवृत्ति से निवृत्ति के लिए हो सकता है। मगर यहां आप जो है एक से एक के बाद दूसरा दूसरे के बाद तीसरा तीसरे बाद चौथा व्यक्ति के साथ शारीरिक संबंध बनवा बनवाते जा रहे हो और फिर बात कर रहे हो कि भैया जो है इतना ऐसा कैसे हो सकता है? कोई मांस खाने की आज्ञा कैसे दे सकता है? यहां अनेक स्त्री पुरुषों का आप संबंध बनवाने की आज्ञा दे दे रहे हो। अरे भाई जो सुनने में अच्छा ना लगे क्यों जोड़ रहे हो शास्त्र से? क्योंकि हमें तो पहले से ही पता है ना धर्म क्या है? फिर क्यों जोड़ रहे हो? फिर यहां पर आप बाउंड हो जा रहे हो कि नहीं नहीं जो शास्त्र शास्त्र से धर्म पता चलेगा। एक जगह कह रहे हो कि मुझे धर्म पता है। मैं जो अच्छी चीज बताऊंगा वो धर्म शास्त्र का अर्थ होगा। और दूसरी जगह कह रहे हो कि नहीं नहीं हमें धर्म पता नहीं है। शास्त्र से धर्म पता होगा। ये क्या है? इसे कहते हैं दोगलाप।

02:24:27:25 तो भर भर के इनके प्रमाण है मैं और दे देता हूं दयानंद जी के जो बहुत बढ़िया बढ़िया सुंदर वो हैं और ऐसी भी जीवनी में कई चीजें हैं। मुर्दे को निकाला मुर्दे को जांच के लिए निकाला ये किया वो सब किसी और भाग में अगर आवश्यकता पड़ी तो आपके समक्ष प्रस्तुत करूंगा। ऐसा भी आया है कि वह कोई कुछ व्यसन था उनको जिसका सेवन करते तो यह सब चीजें भी अभी अगर आवश्यकता पड़ी तो अगले भाग में लाऊंगा। आज केवल इनके भाष्य पर ही बात होगी। वो आप देखते जाइए।

02:25:12:07 ऋग्वेद हे स्त्री ऋग्वेद मंडल 10 सूक्त 85 और मंत्र 40 इसमें वह लिखते हैं हे स्त्री जो तेरा प्रथम पहला विवाहित पति तुझको प्राप्त होता है उसका नाम सुकुमार सुकुमारता आदि है। गुण युक्त होने से सोम जो दूसरा नियोग होने से प्राप्त होता है वह गंधर्व एक स्त्री से संभोग करने से गंधर्व जो तृतीय दो के पश्चात तीसरा पति हो होता है वह अग्नि और इसी तरीके से आगे इनके नाम बताए गए हैं 11वीं 10 तक पति हैं वैसे ही पुरुष भी 11वीं स्त्री तक नियोग कर सकता है 11 11 पुरुषों तक नियोग कर सकते हैं और अगर बाहर जाने की वजह से नियोग कर रहे हैं ना कि वह चला गया कहीं तो उसमें सिस्टम यह है कि अगर आपने किसी को नियुक्त कर लिया और अगर वह जो बाहर गया वापस आ जाएगा तो जिसके जिसको आपने नियुक्त किया है उसको आप तब छोड़ दो वो वो हटा दिया जाएगा नियुक्ति से वापस पुराने वाले पति के साथ पुराने वाला पुराना व्यवहार शुरू हो जाएगा क्या बात है मांसाहार को लेकर के आप लांछन लगाते हो जो पहली

02:26:27:13 सत्यार्थ प्रकाश छपी थी अभी प्रमाणिकता परंपरा तो है नहीं आपके यहां कौन प्रमाणिक है कौन नहीं तो पहली सत्यार्थ प्रकाश में मांसाहार भरभर किताब वो किसी दिन अगले भाग में हम लोग मैं आपके समक्ष प्रस्तुत करूंगा यदि आवश्यकता पड़ी तो अभी केवल थोड़ा सा ट्रेलर दे देते हैं। है ना ऋग्वेद मंडल 10 सूक्त 85 मंत्र 45 इसमें क्या है? वीर सेचन में समर्थ ऐश्वर्य युक्त पुरुष तू इस विवाहित स्त्री व विधवा स्त्रियों को श्रेष्ठ श्रेष्ठ पुत्र और सौभाग्य युक्त कर इस विवाहित स्त्री में 10 पुत्र उत्पन्न कर और 11वीं स्त्री को मान हे स्त्री तू भी विवाहित पुरुष व नियुक्त पुरुषों से 10 संतान उत्पन्न कर और 11 पति को समझ बार-बार 10 11 10 11 10 11 के बिना तो काम ही नहीं चलेगा ना

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02:27:29:25 यह तो मैंने पढ़ ही दिया एनारी विध्व बताइए

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02:27:36:19 पत्नी को पति कह रहा है गुदा द्वार से जो अपान वायु निकलती है उसकी रक्षा कर यह भाष्य इनके वैज्ञानिक भाष्य प्रामाणिक भाष्य है ना भूदा द्वार से निकले निकलने वाली अपान वायु फिर आगे इसी तरीके से और भी भाष्य मनुस्मृति इत्यादि की भी वो लिया है तो मैं इतना पर्याप्त समझता हूं और काफी चीजें बातें बता दी है और इसके अलावा कहीं पर लिख रहे हैं शूद्र को वेद पढ़ाने चाहिए कहीं पर लिख रहे हैं नहीं पढ़ाने चाहिए यजुर्वेद 26 दो शूद्र को अनार्य लिख रहे हैं आर्य है ही नहीं शूद्र के लिए कोई जगह नहीं है आर्य समाज तो शूद्र का तो अस्तित्व ही मिटा देना चाहता है जो आर्य समाज वास्तविकता में देखा जाए तो क्योंकि उसके अनुसार जो भी है जाएगा आर्य समाज में गायत्री मंत्र पड़ेगा जो गायत्री मंत्र पड़ेगा जनेऊ धारण करे जने धारण करेगा शुद्र ही नहीं और 26 दो के अनुसार भगवान कह रहे हैं ईश्वर कह रहे हैं 26 दो के अनुसार यजुर्वेद 26 दो का जो भाष्य वो किया है कि ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शद्र सबके लिए वेद जो वेद है वेद का उपदेश है और सब पढ़ सकते हैं तो सब पढ़ सकते हैं तो शद्र भी पढ़ सकता है शद्र वो है जिसका जन्म नहीं होता शद्र वो है या तो ये मान लो कि जन्मना वर्ण

02:28:51:22 व्यवस्था है। तब तो माना जाएगा कि हां भाई आप जन्म से मानते हैं ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र और तब आप कह रहे हैं कि हां ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र सभी के लिए वो है और अगर कर्मणा मानते हैं तो कर्मणा तो फिर शद्र शूद्र जो है उसकी गति हो ही नहीं सकती वो तो जैसे ही उसको अधिकार प्राप्त होगा वेद पढ़ने का वैसे ही वो द्विज हो जाएगा। ठीक है?

⬜ Not used yet · 02:29:12:28 – 02:30:32:12 (1:19)

02:29:12:28 तो ये इनकी बातें हैं दोहरी। तो बहुत सारी चीजों का जवाब दे दिया है और मुझे लगता है पर्याप्त चीजें मैंने बता दी हैं। इन्होंने शिव मोहिनी प्रकरण पर जो प्रश्न उठाया था उसका उत्तर मैंने तभी दे दिया था। शिव मोहिनी प्रकरण जब वो उस दिन जब चर्चा समाप्त हुई थी उसके बाद मैंने शिव मोहिनी प्रकरण का उत्तर दे दिया था और पुराणों से जुड़ी हुई बहुत सी कथाएं हैं जिस तरीके से यह भावार्थ निकाल के वेदों में आने वाली बात का पहली बात तो गलत अर्थ करते फिर अपनी बातों का कहीं अलंकार इत्यादि करके फिट करके अपना भावार्थ लगा देते हैं। वेदों जो पुराणों में दी गई कथाएं हैं उनका संदर्भ वेदों में भी मिलता है। शब्दांतर से शब्दांतर से वह वर्णन मिलता है वेदों में। और यह सारी बातें इस ग्रंथ में बताई गई हैं। कई प्रमुख जो घटनाएं हैं पुराणों की जिस पर आक्षेप लगाए जाते हैं विरोधियों के द्वारा। याद से नहीं हो रहा है। काफी समय से हो रहा है। तो जो उनका वास्तविक अर्थ है जैसे यह बता रहे थे ना आदि दैविक आध्यात्मिक आदि भौतिक अर्थ ऐसे ही वो तीन प्रकार के अर्थ इसमें बताए गए हैं। प्रत्येक घटना के कि वो घटना क्या प्रस्तुत करना चाहती है और यह स्वयं को इतना ज्ञानी समझते हैं। इतना एक्सपीरियंस वाले समझते हैं। मगर आज तक इन्होंने जानने की कोशिश नहीं की और अपने भाष्य को कह रहे हैं कि हमारे बहुत हमारे

02:30:28:07 अच्छे भाष्य सुंदर भाष्य वैज्ञानिक भाष्य इसलिए उसको स्वीकार करना चाहिए। ये है

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02:30:32:12 इनके वैज्ञानिक भाष्य। पति अपनी पत्नी से कह रहा है कि गुदा द्वार से निकलने वाली जो अपान वायु है उसकी रक्षा कर और वह अंधा सांप पता नहीं क्या है बैल से भोग अब ये सब चीजें हैं जो मेरा कभी भी मंतव्य नहीं रहा है क्योंकि अगर इस तरह से हम लोग चर्चा करेंगे इन चीजों पर अंतहीन चर्चाएं चलती रहेंग बात अलग है हमारा ही पक्ष मजबूत है उसमें भी मगर बहुत लॉन्ग प्रोसेस है इसलिए मैंने कहा था तीन चीजों पर बात कर सर्वशक्तिमान ईश्वर परम स्वतंत्र शाश्वत धर्म जिसके पास है उसकी बात सारी मान ली जाएगी हिंदू शब्द भी मान लिया जाएगा हिंदू शब्द गलत है मान लेंगे भाई तुम्हारा भेदभाव सही है मान लेंगे भाई चीजें सिद्ध तो करो अपनी

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02:31:17:10 अभी वो जो बकरी बकरे का दूध और इनके यहां तो वो पतंजलि वाले कह रहे गधी का गधी का दूध भी पी लो तो उसको भी स्वीकार कर लेंगे हमारे यहां पर जो है जो दिखाई देने वाले गुण है उसके आधार पर स्वीकार नहीं की जाती चीजें हमारे यहां पर शास्त्रों के द्वारा बताया जाने वाले जो गुण है उसके आधार पर स्वीकार की जाती। यही तो अंतर है। यह जो इंद्रियों से प्राप्त होने वाली सूचना है उसके आधार पर अपने धर्म अधर्म का निर्णय कर लेते हैं। और जहां पर इनको समझ में नहीं आ रहा होता इंद्रियों से वहां कहते यह कैसे हो गया? आप मंत्र पढ़ने से मना कैसे कर देते हो? खुद ही कहते हैं कि भैया रश्मि विज्ञान है। वेद मंत्रों में भी वाइबेशंस हैं। उससे सृष्टि उत्पन्न होती है। जब वो वाइबेशंस है तो यह भी तो आवश्यक होगा कि वो वाइबेशंस धारण कौन करेगा? किसके कंठ से उच्चारित होने पर वाइबेशंस उचित होंगे। किसके कंठ से उच्चारित होने पर वाइब्रेशन बदल सकते हैं। यह सब बातें नहीं सोची।

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02:32:06:28 खैर मुझे लगता है मैंने पर्याप्त चीजें दे दी हैं और यह सारी चीजें इनके यहां भरी पड़ी है और यह कहते हैं हमारा प्रामाणिक है। सुंदरता वैज्ञानिक है। और इसलिए आप हमारे को मान लो। जबकि अर्थ से प्रामाणिकता सिद्ध नहीं होती है। प्रामाणिकता से अर्थ प्रामाणिक सिद्ध होता है। ठीक है? अर्थ सुंदर होने से अर्थ की प्रामाणिकता सिद्ध नहीं होती है। प्रामाणिक जब उसकी प्रामाणिकता सिद्ध होती है तब वह अर्थ मान्य होता है। ठीक है ना? चलिए और

02:32:41:25 समय देने के लिए सभी को आभार और किसी को भी अगर वैचारिक मतभेद के निमित्त चर्चा करनी हो तो वह संपर्क कर सकता है

⬜ Not used yet · 02:32:50:24 – 02:33:28:00 (0:37)

02:32:50:24 और मोहित गड जी से बात हो चुकी है। जल्दी उनके साथ हमारी चर्चा होने वाली है। जय श्री राम सभी को। [संगीत]

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A: AHVAAN - Call Of Dharma Live 2:33:30 · 29 Jun 2026

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