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00:00:04:00 आप यह मानते हैं कि शंकराचार्य की फिलोसफी मायावाद है। हां बिल्कुल बिल्कुल तो इसका कारण बताइए। इसमें शास्त्र में लिखा है। कौन से शास्त्र में? पद्म पुराण में मायावाद शास्त्र प्रमते और शास्त्र में भी लिखा है और आप ही के आप ही के जो सन्यासी हुए जैसे कि वाचस्पति मिश्र हुए तो उन्होंने भी ये ऐसा नहीं है कि बस इस वाले बोल रहे हैं या कोई एक एक पर्टिकुलर संप्रदाय बोल रहा है। ठीक है? आप जितने भी संप्रदाय ले लो जितना भी इंफॉर्मेशन अवेलेबल है Google पे हर जगह पे मायावाद केवल और केवल अद्वैतियों को ही कहा गया है। आपकी फिलॉसफी बुद्धिज्म से काफी मिलती जुलती है। तो मेरा क्वेश्चन पहला है क्या शास्त्र में लिखा है शंकराचार्य की फिलॉसफी मायावाद है। आपने बोला दूसरा पॉइंट बहुत से लोग बोलते हैं। बहुत से लोग ऐसा नहीं बोला। ऐसा नहीं बोला। जितने भी संप्रदाय ले लो जितना भी इंफॉर्मेशन अवेलेबल है Google पे हर जगह पे मायावाद केवल और केवल अद्वैतियों को ही कहा गया है और किसी को ऐसा नहीं बोला ऐसा नहीं बोला कि जितने भी संप्रदाय ले लो जितना भी इंफॉर्मेशन अवेलेबल है Google पे हर जगह पे मायावाद केवल और केवल अद्वैतियों को ही कहा गया है और किसी को
00:01:19:25 ऐसा नहीं बोला ऐसा नहीं बोला जितने भी संप्रदाय ले लो जितना भी इंफॉर्मेशन अवेलेबल है Google पे हर जगह पे मायावाद केवल और केवल अद्वैतियों को ही कहा गया और पहली बात आपने कही क्या शास्त्र में लिखा है तो मैंने उस पर मेरा प्रश्न है क्या शास्त्र में लिखा है कि शंकराचार्य का जो अद्वैतवाद है वही मायावाद है। ठीक है? दूसरा पॉइंट यह है कि कई लोगों के बोल देने से वो प्रमाण नहीं बनता है। महाभारत में भीष्म जी ने ये बात कही है युधिष्ठिर जी से कि कई लोगों के कह देने से पूर्व में किसी के कर देने से वह प्रमाण नहीं माना जाता है। शास्त्रों द्वारा उसे स्वीकार किए जाने पर प्रमाण माना जाता है। तर्क भी ले लीजिए। दुनिया में बहुत से लोग हैं जो कहते हैं सनातन धर्म बुरा है। ईसाई है, बाइबल वाले हैं। तो उसके आधार पे हम ये नहीं कह सकते कि नहीं सनातन धर्म बुरा है। तीसरा पॉइंट था आपकी कि बुद्ध से मैच खाती थी। अगर कहीं-कहीं पे हमारा हमारा कोई चीजें मिल रही है तो ऐसे तो मैं आपके अंदर की कई चीजें मिला दिखा दूंगा जो कुत्तों से भी मिलेगी, जानवरों से भी मिलेगी। जैसे कि जो एक स्वान है वह दांतों से चबाकर खाना खाता है। आप भी दांतों से चबाकर खाना खाते हैं। तो इस कारण से क्या आपको स्वान माना जाए?
00:02:35:01 की बात जो है पद्म पुराण में कही गई है प्रचंड बौद्ध। वही है क्योंकि शंकराचार्य को आप शिव का अवतार मानते हैं और शिव जीना के दिया है। बस इस और मुझे आप दिखा दीजिए कौन सा ऐसा शिव शिव का ऐसा कौन सा अवतार है जिसने अवैदिक मायावा दिया है। मुझे प्रमाण दीजिए फिर। भगवान शंकर के लिए कहा गया है एक करोड़ से ज्यादा अवतार हैं उनके। तो अब मैं आपसे अगर यह पूछूं कि आप मुझे वो बाकी के एक करोड़ अवतार है जो उनके प्रमाण दे दीजिए और अगर नहीं है तो मैं अगर नहीं है अगर नहीं है तो मैं ये कह दूं कि वो सब आप ही हो इस में ही है वो सारे एक करोड़ अवतार तो ये क्या ठीक है अगर वहां पर अगर वहां पर मुझे बोलने दीजिए मेरा तर्क ये है मेरा तर्क ये है मेरा तर्क ये है कि अगर वहां पर शंकर के भगवान शंकर के अवतार की बात हो रही है और उनका कोई अन्य प्रमाण नहीं मिल रहा है। इसलिए कि जो उपलब्ध दिखाई दे रहे हैं अवतार उसमें से किसी को एक को पकड़ के वैदिक बना दो। यह कहां का सनातन सिद्धांत है? जो अंतिम रूप से है वो निर्गुण है वो बौद्ध जैसा है। यह कहां लिखा है? वहां पर वेदों के आधार पे बताया गया बौद्ध लिखा है या वेदों के अगेंस्ट है। तो यार सीधी सी बात है। कोई भी व्यक्ति अपने आप को अवैदिक नहीं बोलेगा। जो वेदों का सहारा लेकर जब वो
00:03:50:07 बुद्ध जो बुद्धिज्म के सिमिलर कोई कांसेप्ट दे रहा है वेदों का सहारा लेकर तो फिर वो वो लोग क्यों बोलेंगे कि भाई मैं अवैदिक वाला मायावादी हूं। अरे आपने कहा कोई भी खुद को अवैदिक क्यों कहेगा? तो अगर कोई भी खुद को अवैदिक नहीं कहेगा तो कोई भी खुद को मायावादी क्यों कहेगा। हां मैं आपको बताता हूं। हमारे सन्यासी स्वयं को वैदिक भी तो कहते हैं। वहां पर जो शास्त्र में आप बात कर रहे हैं कि अवैदिक मायावाद तो हमारे सन्यासियों ने स्वयं को अवैदिक मायावादी कहा है क्या? हमारे सन्यासी स्वयं को वैदिक भी तो कहते हैं। वैष्णव भी तो कहते हैं। धार्मिक भी तो कहते हैं। सच्चिदानंद स्वरूप का बोध कराने वाला भी तो कहते हैं। ये बात आपने क्यों नहीं मानी? इसका मतलब यह है कि जब कोई खुद को वैदिक कह रहा है तो उसकी बात पर आपको विश्वास नहीं है। मगर जब कोई खुद को मायावादी कह रहा है तो क्योंकि वहां से आपका मंतव्य सिद्ध हो रहा है। वो पद पुराण से आप उसको जोड़ पा रहे हैं। इसलिए वो बात आपके लिए प्रमाणिक हो जाएगी। हम इसका अर्थ क्या हुआ? जिस जिस व्यक्ति के बोले हुए एक वचन पर हमको भरोसा नहीं है, उसके ही दूसरे वचन पर हमको भरोसा है।
00:05:05:08 अब आगे जो बात आती है वो यह है कि शंकराचार्य को आने की आवश्यकता ही क्या थी? अगर उन्हें एज इट इज बौद्धों का ही वो देना था। तो मैं एक बात आपसे पूछ रहा हूं कि जब बौद्धों का अतिक्रमण हुआ था इस दुनिया में तो आप गुरु शिष्य परंपरा मधवाचार्य की फॉलो करते हैं। वह जो ज्ञान है भगवान कृष्ण से आया है वह ज्ञान उस समय धरती पर था कि नहीं था? बिल्कुल था। तो शंकराचार्य को क्यों आना पड़ रहा है हिंदुओं को बचाने के लिए? अच्छा बुद्धों का खंडन किसने किया था?
00:05:41:18 बुद्धों से बुद्धों से इसलिए लड़े, बुद्धों से इसलिए लड़े क्योंकि उनकी उनकी फिलॉसफी उनको फैलानी थी। बौद्धों का खंडन इसलिए किया। ठीक है? आपने कोई भी सनातन सिद्धांत नहीं दिया कि मायावाद को मायावाद जिस मायावाद की बात पद्म पुराण में की जा रही है वो मायावाद जो है वो वही मायावाद है जो शंकराचार्य जी का मायावाद है। ये देखिए आपके द्वारा आपके अनुसार प्रामाणिक परंपरा हां रामानुजाचार्य परंपरा पहले इन्होंने श्लोक दिखाया वो पद्म पुराण का देख लीजिए श्लोक दिखाया है देख लीजिए हेलो हेलो प्रतिवादी को मानो आक्षेप करने के लिए किसी पुराण का कोई मूल श्लोक मिलता ही नहीं है इसलिए वह प्रक्षिप्त श्लोकों के आधार पर आक्षेप की इमारत खड़ी करता करना चाहता है। अब ये यहां आपको कह रहे हैं फिलहाल सबसे पहला क्वेश्चन कि ये जो आचार्य जिनका बुक इतना मोटा सा बुक आप दिखा रहे हैं। ठीक है? सबसे पहले तो वो कौन से ईयर के थे? क्वेश्चन नंबर वन। ठीक है? और किस आधार पे? दूसरा क्वेश्चन कि उन्होंने किस आधार पे उसको प्रक्षिप्त कहा है? ये आचार 19वीं
00:06:56:24 सदी के ही है। क्या कब के हैं? 19वीं सदी के ही है। अरे तो 19वीं सदी के तो उसको फिर प्रमाण कैसे मान लेंगे हम लोग? मतलब नहीं मानते ना कि ये ये जो है प्रामाणिक आचार्य हैं। इसकी परिभाषा क्या है? प्रामाणिक आचार्य की परिभाषा क्या है? जो ऑथेंटिक प्रॉपर गुरु परंपरा से हो तो ये परंपरा है और यह सिद्ध हो रहा है तो आप ये इसलिए नहीं मानेंगे क्योंकि ये 19वीं सदी के हैं। 19वीं सदी की बात ही नहीं है। अरे तो 19वीं सदी के तो उसको भी प्रमाण कैसे मान लेंगे हम लोग। 19वीं सदी की बात ही नहीं है। अरे तो 19वीं सदी के तो उसको भी प्रमाण कैसे मान लेंगे हम लोग? 19वीं सदी की बात ही नहीं है। अरे तो 19वीं सदी के तो कि उसको भी प्रमाण कैसे मान लेंगे हम लोग यहां पे। मतलब कि अगर कोई आचार्य 19वीं सदी में अगर ऑथेंटिक गुरु परंपरा से होगा तो वो प्रामाणिक नहीं माना जाएगा। प्रामाणिक की परिभाषा ये है। नहीं नहीं नहीं [हंसी] ये बात तो मैंने बोली नहीं है। ये बात मैंने बोली नहीं है। ये आपने एकदम गलत पूरा ऐसा मतलब घुमा दिया यहां पे। ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। मैं ये नहीं कह रहा कि वो आचार्य है। वो प्रमाणिक परंपरा के नहीं है। मैंने ये नहीं कहा। प्रामाणिक आचार्य का अर्थ क्या बताया आपने? देखो सुनो अभी तक मैंने उस चीज को कंप्लीटली रिजेक्ट भी नहीं किया। मैंने अरे तो 19 अधिग्रहों की उसको भी फिर प्रमाण कैसे मान लेंगे
00:08:11:27 हम लोग देखो सुनो अभी तक मैंने उस चीज को कंप्लीटली रिजेक्ट भी नहीं किया मैंने अरे तो 1920 अधिगो की उसको भी फिर प्रमाण कैसे मान लेंगे हम लोग देखो सुनो अभी तक मैंने उस चीज को कंप्लीटली रिजेक्ट भी नहीं किया मैंने अरे तो 1920 अधि अधिकतों की उसको भी प्रमाण कैसे मान लेंगे हम लोग देखो सुनो अभी तक मैंने उस चीज को कंप्लीटली रिजेक्ट भी नहीं किया मैंने पूछा किस आधार पर कहा पे आप इस पे अध्ययन करिएगा कि वो उन्होंने क्या कहा किस आधार पर कहा गलत कहा सही कहा अरे आप दे रहे हो मैं क्यों अध्ययन करूं जा के आप प्रमाण दो ना अरे आप कह रहे हो मैं कंप्लीटली रिजेक्ट नहीं कर रहा हूं तो आप अभी बीच मजधार में हो ना अरे तो इससे तो क्वेश्चन पूछ रहा है आपको कि उसका उत्तर दो मुझको अच्छे से बोला तो पढ़ के बताया आपको पूरा पढ़ के क्या बताया था पढ़ के सुनाना नहीं होता एक्सप्लेनेशन देना होता है उन्होंने अपने गुरु से जिस पद्म पुराण का अध्ययन किया उसमें वो श्लोक नहीं था दूसरी बात उन्होंने इसका आधार ये भी बताया कि भैया ये जो माया है इस माया के बारे में वेदों में भी बात की गई है। तो अगर इस माया वेदों में दी गई माया के आधार पर पद पुराण में दी गई माया के आधार पे अगर कोई आचार्य अपने आप को मायावादी बोलेगा और मायावाद शब्द का खंडन किया जाएगा पद्म पुराण में तो वो गलत है। उन्होंने दोनों चीजें बताई प्रक्षिप्त भी बताया। अच्छा कोई
00:09:27:03 कोई श्लोक प्रक्षिप्त है कि नहीं? इसका निर्णय किस आधार पे होगा? ये बताइए। अरे मैं आपको वही तो पूछो। क्वेश्चन मेरा है आपसे कि किस आधार पे होगा? [हंसी] दिया ना कि हमारे गुरु ने हमको नहीं पढ़ाया और अब वो आ रहा है सामने तो प्रक्षिप्त है। ये कहा आपने यह कहा कि जो जो भी आचार्य जिनका 19 सेंचुरी का आपने रेफरेंस दिया है उन्होंने इस आधार पर उसको प्रक्षिप्त बोला है क्योंकि उन्होंने वो चीज नहीं पढ़ी। बराबर ये इतना ही है बस। उन्होंने उन्होंने जिस पद्म पुराण का अध्ययन किया अपनी गुरु परंपरा से उस पद्म पुराण में वो श्लोक नहीं है। उस पद्म पुराण में नहीं है ना तो हो सकता है कि लास्ट [हंसी] होना है कि उनको जो पद्म पुराण दिया गया था वो अधूरा था पूरा नहीं था। और पूरे के नाम पे उन्हें दे दिया गया। परंपरा से आने वाला ज्ञान भी भंग हुआ। वैष्णवाचार्यों की परंपरा रामानुजाचार्य सिंपल आपके पास आपके पास रामानुजाचार्य का विधान सूत्र भाष्य
00:10:38:19 आपके पास नहीं है लेकिन क्योंकि मेरे पास एक प्रमाण है कि श्रीमद रामानुजाचार्य ने श्री भाष्य में ये कहा है इस चीज को कहा है कि मायावादम अस शास्त्रम प्रचनम बद्धम उच्चते ये उन्होंने उसमें कोट किया रामानुजाचार्य जी ने इस श्लोक को उधत किया है तो हम यह मान जान लेंगे कि यह जो आचार्य हैं जिसके आधार पर हम यह मानते थे कि वैष्णवाचार्य ने उस श्लोक को प्रक्षिप्त माना है। हम इन आचार्य को गुरु विरोधी मानते हुए प्रामाणिक नहीं मानेंगे। अगर हम अपनी तसल्ली कर लेंगे और इस पर हम वीर भी बना देंगे। देखिए प्रक्षम बौद्ध रामानुजाचार्य के श्री भाषा के दूसरे अध्याय के दूसरे पाद के 27 सूत्र में प्रचन्नम बोध बात यहां पर ये आ रही है कि वो श्लोक प्रक्षिप्त है कि नहीं श्लोक प्रक्षिप्त है कि नहीं श्लोक का उपयोग जी ने किया है कि नहीं आचार्य श्री एक बहुत हमारे पूज्य आचार्य हुए पंडित माधवाचार्य शास्त्री जी और उन्होंने बहुत कालजई ग्रंथ लिखे क्यों क्यों और पुराण दर्शन एक समय प्रभाव बहुत ज्यादा हो गया था आर्य समाज
00:11:54:04 जो है पुराणों पर कटाक्ष कर रहा था तो यथोचित उत्तर उन्होंने समग्र रूप से उन्होंने दिया और उसमें उन्होंने एक जो ये मायावादम अच्छ शास्त्रम वाला जो श्लोक है पद्म पुराण का उसका भी खंडन किया उन्होंने उसमें उन्होंने कहा कि शंकराचार्य जी का जो सिद्धांत है वो भी श्रुति सम्मत है और यह जो श्लोक है प्रक्षिप्त है। उन्होंने श्रुति के आधार पर उसको खंडित किया। इन्होंने यह माना शंकराचार्य का मायावाद भी वैदिक है। हम जब इस तथ्य को ये जो संस्था है विकृत रूप से प्रस्तुत कर रही है। परंपराओं के विरुद्ध कार्य कर रही है। हमने हम जब इस तथ्य को रखते हैं तो इनके लोग कहते हैं कि पंडित माधवाचार्य शास्त्री जी प्रामाणिक आचार्य ही नहीं थे रामानुज परंपरा के। कब के हैं? 19वीं सदी के ही है। अरे तो 19वीं सदी के तो उसको फिर प्रमाण कैसे मान लेंगे हम लोग? तो उनकी प्रमाणिकता माधवाचार्य जी रामानुज परंपरा के थे और विद्वान पुरुष थे। शास्त्र निष्ठावान थे और माधवाचार्य जी के विषय में ऐसा कहना कि वो पारंपरिक नहीं थे। यह तो एक उनका अपलाप
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शंकराचार्य को मायावादी कहने वाला #iskcon अर्धपागल निकला @swamiRaghvacharya जी ने दिया उत्तर
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