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00:00:01:03 तो सभी को जय श्री राम। आशा करते हैं आप सभी कुशल पूर्वक होंगे और इस श्रंखला का आनंद ले रहे होंगे। वैसे मेरा व्यक्तिगत मत था कि इस श्रंखला को नाम दिया जाए रामपाल कॉमेडी सीरीज। जिसमें कि रामपाल ने क्या-क्या कॉमेडीज की है तत्वदर्शी होने के नाम पर वह सब आपको पता चलता रहे। खैर तो हमने कल जाना कि 40 10 यजुर्वेद के आधार पर यह धीरा नाम पुरुषों को तत्वदर्शी कहता है जेलधाम निवासी और 40 13 में उन्हीं तत्वदर्शियों का खंडन भी स्वयं करता है। इसके साथ ही साथ कल हमने जाना कि गीता बोलने वाले को यह अच्छा सिद्ध कर रहा है यह कहते हुए कि भगवान श्री कृष्ण ने अगर गीता बोली होती तो जब वह यह श्लोक बोल रहे हैं कि मैं अच्छे कर्म करता रहता हूं। जबकि भगवान श्री कृष्ण के तो बड़े हीन आचरण इसने बताने का सिद्ध करने का प्रयास किया तो वहां पर इसने कंपैरेटिवली
00:01:16:24 ये बताने का प्रयास किया कि भाई अगर श्री कृष्ण यह गीता बोल रहे होते तो या तो वह वैसे कर्म करने वाले ना होते और अगर उन्होंने वैसे कर्म किए हैं तो उनको यह नहीं बोलना चाहिए था कि मनुष्य मुझे अच्छे कर्म मैं अच्छे कर्म इसलिए करता हूं कि मुझे देखकर भी मनुष्य अच्छे कर्म करेंगे। तो वहां पर इसने सिद्ध किया ये कहना चाह रहा है कि गीता बोल इससे सिद्ध होता है क्योंकि भगवान श्री कृष्ण अच्छे कर्म करने वाले नहीं है और इस श्लोक में वो स्वयं को अच्छे कर्म करने वाला ऐसे कर्म करने वाला कह रहा है गीता बोलने वाला जिसको फॉलो किया जाए लोगों के द्वारा तो इससे पता लगता है कि गीता बोलने वाला कोई और है कृष्ण नहीं है जबकि काल अगर रामपाल की व्याख्या के अनुसार देखा जाए तो काल जो है भगवान श्री कृष्ण से भी ज्यादा गलत कर्म करने वाला है। तो अगर रामपाल की थ्योरी को माना जाए कि गीता बोलने वाले ने कहा है कि मैं अच्छे कर्म इसलिए करता हूं क्योंकि मुझे देखकर लोग फॉलो करेंगे। तो इसका मतलब इस बात के आधार पर क्योंकि गीता बोलने वाले ने यह बात कही है। इस बात के आधार पर जिस प्रकार से वह कृष्ण को गीता बोलने वाला नहीं मान रहा है। उसी प्रकार से वो उसको
00:02:31:25 काल को भी गीता बोलने वाला नहीं मानना चाहिए। तो किसको मानना चाहिए? इसने स्वयं इसी अध्याय में प्रजापति का अर्थ पूर्ण परमेश्वर बताया है और शास्त्रों में प्रजापति ब्रह्मा जी को कहा गया है तो ब्रह्मा जी को मान लो भाई पूर्ण ब्रह्म तुम्हारे कबीर नहीं है ठीक है और इसके साथ ही साथ हमने कल ये भी पता किया कि जो गीता बोलने वाला है वो कह रहा है मुझे कुछ भी प्राप्त करना शेष नहीं है हम मुझे ना ही कोई ऐसी वस्तु है जिसको मुझे मुझे प्राप्त करना है ना ही मुझे किसी वस्तु के खो जाने का भय है। मतलब परम मुक्त है। मगर यदि गीता बोलने वाला काल है तो उसको तो हर रोज अपने आहार का इंतजाम करना है भाई। सवा लाख प्राणियों का जिसको वो खाएगा। तो ये सब चीजें हमें कल तक कल जो है हमने जो अध्ययन किया था उसमें पता
00:03:26:01 चली। और हां एक और कॉमेडी वाली बात हमें कल पता चली थी। कि जो तत्वदर्शी के पास पढ़ने जाते हैं, वह कौन होते हैं? अविद्वान अर्थात भोलेभाले अशिक्षित लोग पृष्ठ संख्या 49 पर है। ये हालांकि इसके जो ये बुलेट पॉइंट्स हैं कल के और आज के ये हम अगले वाले जो एपिसोड आएगा इस श्रंखला का अगले सप्ताह उसमें हम बुलेट पॉइंट्स में दोबारा से कवर करेंगे। फिर भी मैंने एक बार रिवाइज करा दिया आप लोगों को कि रामपाल को तत्वदर्शी मानकर उससे उससे उसके अनुसार शास्त्र का अर्थ लेने वाले और उसके अनुसार पूजा भक्ति करने वाले कौन लोग होते हैं? भोलेभाले, अशिक्षित, अनपढ़, गवार। ये मैं नहीं कह रहा हूं। ये इसकी गीता में लिखा हुआ है। ठीक
00:04:21:26 है? हम अब हम लोगों ने कल 27 से 29 तक पढ़ लिया था। हम अब हम तीसरे अध्याय के 30व श्लोक को पढ़ रहे हैं। क्या कह रहा है यह? अर्जुन ज्ञान योग्य द्वारा मेरे पर आश्रित होकर सर्व धार्मिक कम कर्मों को मुझ में त्याग कर नि इच्छा ममता रहित युद्ध में होने वाले संभावित दुख को त्याग कर युद्ध कर।
00:04:59:12 हम अब इसने कई बार कहा है कि धार्मिक यज्ञ में प्रतिष्ठित कौन होता है? पूर्ण परमात्मा। जबकि आगे क्या कह रहा है? गीता अध्याय तीन के श्लोक 31 32 का सार है कि
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00:05:12:02 जो ऊपर लिखे मेरे मत का अनुसरण करते हैं वह बुरे कर्मों से बच जाते हैं। जो ऐसा नहीं
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00:05:19:06 करते वह मूर्ख अज्ञानी हैं। तो सबसे पहली बात यह लोग कहते कहते रहते हैं कि कई जगह काल ने अपना मत दे दिया है। मगर यहां पे रामपाल ने भी काल के मत को मान लिया है। ये प्रश्न संख्या 50 है और इसमें सबसे लास्ट पैराग्राफ पे हूं मैं गीता अध्याय तीन के श्लोक 31 32 का स्टार तो इसमें इसने क्या कहा कि जो मेरे
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00:05:49:01 मत का अनुसरण करते हैं वह बुरे कर्मों से बच जाते हैं। जो ऐसा नहीं करते वह मूर्ख अज्ञानी है। अब देखिए
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00:05:55:13 पहली बात काल का मत क्या है? काल का मत है अपना उल्लू सीधा करना रामपाल के अनुसार काल का मत है। लोगों को बहकाना, बरगलाना, झूठ बोलना। यह सब भी तो काल का मत है। मगर अब काल काल की यहां पर इस बात को ये मान रहा है। रामपाल के काल अपने मत से जो बताता है वो भी मानना है। जबकि काल का मत तो क्या-क्या है? तो क्यों मान लिया इसने? हम मगर ये जो मेरा मत मेरा मत वाली बात जो चिल्लाया करते हैं तो यहां पे इन्होंने मान लिया काल का मत। इसका मतलब काल का मत भी माना जा सकता है।
00:06:38:18 हम अच्छा इसमें गीता अध्याय तीन के श्लोक 30 में यहीं पर विचार करें इसे थोड़ा सा ऊपर वाला जो पैराग्राफ है हम ये वाला जहां अभी कर्सर आया था ना आपका हां ये तो इसमें क्या लिख रहा है कि ज्ञान योग द्वारा मेरे पर आश्रित होकर सर्व धार्मिक कर्मों को मुझ में त्याग कर तो सर्व धार्मिक कर्मों को किस में त्यागने की बात की जा रही है? सर्व धार्मिक कर्मों के द्वारा पूज्य कौन होता है? इसी ने पिछले उसमें कहा है ना कई जगह कि धार्मिक यज्ञों में प्रतिष्ठित कौन है? इसने ये देखिए पृष्ठ संख्या ये दिखाइए। पृष्ठ संख्या 40 धार्मिक यज्ञ में प्रतिष्ठित पूज्य इष्ट देव है और धार्मिक कर्म भी धार्मिक यज्ञ है। है ना? तो धार्मिक यज्ञ में पूज्य कौन है? प्रतिष्ठित कौन है? ईष्ट कौन है? वो है पूर्ण परमेश्वर। हम यह देख लीजिए पष्ठ संख्या 40 पर
00:07:54:12 तीसरे अध्याय का दवा श्लोक का इसने अर्थ कर रखा है कि यह पूर्ण परमात्मा यज्ञ में प्रतिष्ठित ईष्ट ही इच्छित भोग प्रदान करने वाला हो पूर्ण परमात्मा धार्मिक यज्ञ में प्रतिष्ठित है और यहां पर यह क्या मान रहा है यहां पर ये मान रहा है कि धार्मिक कर्म यानी धार्मिक यज्ञ धर्म यज्ञ को मुझ में त्याग कर तो धर्म यज्ञ को किस में त्यागा जा सकता है जो उस धर्म यज्ञ में प्रतिष्ठित हो तो यहां पर प्रतिष्ठित कौन कौन है यज्ञ में गीता बोलने वाला जबकि इसके अनुसार यज्ञ धार्मिक यज्ञ में प्रतिष्ठित कौन
00:08:36:22 है पूर्ण परमेश्वर हम पूर्ण परमात्मा तो अब इससे पूछो कि धार्मिक यज्ञ में जब पूर्ण परमात्मा प्रतिष्ठित है तो तो ये गीता बोलने वाले को कैसे त्याग? गीता बोलने वाले को कैसे मिल जाएगा धार्मिक कर्मों का त्याग? हम यह भी बात ध्यान रखने की है। आगे चलते हैं। पृष्ठ संख्या 51 गीता अध्याय तीन के श्लोक 33 34 में कहा है कि शिक्षित व्यक्ति जो तत्व ज्ञान हीन है वे मूढ़ स्वभाव वश आंखें देख आंखों से देखकर भी सत्य को स्वीकार नहीं करते। तथा उन चातुर व्यक्तियों के अनुयाई भी यहां पर इसने जो एक शब्द आया था ना लोक संग्रह। लोक संग्रह क्या होता है कि जो लोकाचार की जो मर्यादा है वह बनी रहे। इसको लोक संग्रह कहा गया है। तो इसने लोक संग्रह का मतलब यह है कि लोगों का संग्रह अपने अनुयाई बनाओ। ये तो इसकी हिंदी है। ये तो इसका संस्कृत का अर्थ है। लोगों को संग्रह करो। अपने अनुयाय बढ़ाओ। तो लोक संग्रह का अर्थ ये समझता है मूर्ख। तो क्या है? तथा उन चातुर व्यक्तियों के अनुयाई भी अपने
00:09:51:22 स्वभावव सत्य को स्वीकार ना करके उन चालाक गुरुओं के साथ ही चिपके रहते हैं। वह भी मूढ़ है। समझाने से भी नहीं मानते। हट के भी उन्हें समझाना अति कठिन है। कबीर परमेश्वर से तत्व ज्ञान प्राप्त करके संत गरीब दास जी महाराज ने कहा है जो व्यक्ति तत्व ज्ञान को सुनकर सद ग्रंथों में आंखों से देखकर भी अभिमानवश यथार्थ भक्ति मार्ग स्वीकार नहीं करते वह चालाक प्राणी परमात्मा के चोर हैं। जो उनके अनुयाई हैं। वह भी सत्य को आंखों से देखकर भी उन चालाक गुरुओं को नहीं त्यागते। वह मूर्ख हैं। ऐसे व्यक्ति संतों के काम के नहीं है। परमात्मा उनको एक दूसरे से बांधे रखे। अर्थात वह शुभ शुभ कर्महीन है। उनके भाग्य में सत्य साधना नहीं है। तत्वदर्शी संतों को चाहिए कि उनके साथ अधिक ज्ञान चर्चा ना करें।
00:10:49:19 तो अध्याय 30 का हम लोग अपना अर्थ भी पढ़ ले। अध्याय तीन श्लोक 30 क्या कहा है वास्तविकता में क्योंकि ये तो अर्थ का अनर्थ करता है सब जगह मुझ अंतर्यामी परमात्मा में लगे हुए चित्त द्वारा यहां पे इन्होंने मुझ अंतर अंतर्यामी किया है। कहीं-कहीं पर वो अपनी अंतरात्मा में लगे हुए चित्त द्वारा संपूर्ण कर्मों को मई मुझ में अर्पण करके आशा रहित ममता रहित और संताप रहित होकर युद्ध कर और इसने क्या कर दिया इसका कि ज्ञान योग द्वारा मेरे पर आश्रित होकर सर्व धार्मिक कर्मों को मुझ में त्याग कर इच्छा ममता रहित युद्ध में होने वाले संभावित दुख को त्याग कर युद्ध कर ठीक है तो इससे यहां पर देखना होगा कि यह जो इसने अर्थ किया है इसके जो शब्द है वह उसमें है कि नहीं। जैसे
00:12:05:09 कि अ इसने एक जगह कहा है ममता रहित निर्मम। ठीक है विगत जरा संताप रहित ठीक है भूतवा होकर सन्यस अर्पण करके निराश ही आशा रहित ज्ञान योग ज्ञान योग कहां लिखा है जो इसने अर्थ किया ज्ञान योग ज्ञान योग की संस्कृत कहा है कोई पूछो इससे बाबा से लिखा है कहीं ज्ञान ठीक है। आगे चलते हैं। जो कोई मनुष्य दोष दृष्टि से रहित और श्रद्धायुक्त होकर मेरे इस मत का सदा अनुसरण करते हैं, वह भी संपूर्ण कर्मों से छूट जाते हैं। ठीक है? परंतु जो मनुष्य मुझ में दोषारोपण करके करते हुए मेरे इस मत के अनुसार नहीं चलते, उन मूर्खों को तू संपूर्ण ज्ञानों में मोहित और नष्ट हुए ही समझ। आगे 33 में क्या कहा है? सभी प्राणी प्रकृति को प्राप्त होते हैं। अर्थात अपने स्वभाव के परवश हुए कर्म करते हैं। ज्ञानवान भी अपनी प्रकृति के अनुसार चेष्टा
00:13:20:12 करता है। फिर इसमें किसी का हट क्या करेगा? मतलब यहां पर प्रकृति के अधीन बताया जा रहा है कि जो भी प्राणी कर्म करता है वह प्रकृति के अधीन है इसलिए करता है। तो ऐसे में इंद्रिय प्रत्येक इंद्रिय के विषय में राग और द्वेष छुपे हुए स्थित है। मनुष्य को उन दोषों के वश में नहीं होना चाहिए। क्योंकि वह दोनों ही इसके कल्याण मार्ग में विघ्न करने वाले महान शत्रु हैं। तो ऐसे में उसे राग द्वेष में समत्व बुद्धि रखनी चाहिए। और पीछे हम लोग देख आए हैं कि क्या सोचना चाहिए कि मैं नहीं कर रहा हूं। गुण ही गुण में बरत रहे हैं। इस प्रकार की भावना होनी चाहिए। कर्तापन अहंकार यही बंधन का कारण है। तो इसने यहां पे सत्यानाश कर दिया कुल मिलाकर के अर्थ का। अच्छा एक पॉइंट की बात है कि तत्वदर्शी को चाहिए कि उनके साथ अधिक चर्चा ना करें तो यह पता कैसे चलेगा कौन ये तय करने वाला है जो भी व्यक्ति स्वयं को तत्वदर्शी कहेगा वो व्यक्ति किसी भी कोई भी उससे आकर के जो आर्गुममेंट करेगा उसको कह देगा कि भैया ये तो
00:14:35:13 वो वाला है जो ज्ञानी है जो शुभ कर्मों से हीन है इससे मैं चर्चा नहीं करूंगा तो ऐसे से तो काम चलेगा ही नहीं। भाई कोई भी मैं तत्वदर्शी हूं। मुझसे कोई भी ज्ञान चर्चा करने आएगा तो मैं कह दूंगा कबीर ने मना किया है। तत्वदर्शी को इनके साथ ज्यादा चर्चा नहीं करनी चाहिए। तो निर्णय कैसे होगा? कुल मिलाकर के अगर ऐसे व्यक्ति को ना समझाएं तो किसे समझाएं? इसने वहां पे कहा है। देखिए क्या कहा है। कबीर परमेश्वर जी ने कहा है कि मूर्ख को समझाने से अपने तत्व ज्ञान को ना गवाएं। अब कोई भी व्यक्ति जो है मैंने भर भर के बता दिया जिसको तत्व ज्ञान नहीं है वह मूर्ख ही है तो फिर समझाएं किसको अगर मूर्ख को ज्ञान नहीं देना है अज्ञानी को ज्ञान नहीं देना है तो किसको देना है हमारे पास इसका आंसर है अभी हम इनकी टोपी इनहीं के सर पर रख के चल रहे है हमारे पास ये आंसर है ठीक है तो अभी इनहीं की भाषा में इनहीं से बात कर रहे हैं इसलिए बोल रहे हैं कि भाई तुमने हमने कहा कि मूर्खों को मत समझाओ और जो भी व्यक्ति आज रामपाल के अनुसार नहीं चल रहा है वो मूर्ख है तो फिर समझाओगे किसे प्रचार किसको करोगे?
00:15:51:13 फिर आगे चलते हैं। तीन श्लोक 33 34 में यह भी कहा है कि राग द्वेष स्वयं नहीं करना चाहिए। अब देखो यहां पे इसने फिर से वही कर दिया। वही लाभ हानि के बिना युद्ध नहीं हो सकता। यानी लाभ हानि के बिना क्या नहीं हो सकता? कर्म है ना आसक्ति रहित कर्म नहीं हो सकता। लाभ हानि राग द्वेष के बिना कर्म नहीं हो सकता। यहां पे पीछे इसने मना किया। बीच में इसने सपोर्ट किया। यहां पे फिर उस सपोर्ट का खंडन कर रहा है कि लाभ हानि के बिना और एक बात ध्यान रखने की यह भी है कि कुछ श्लोक कैंसिल होते जा रहे हैं। जैसे जब जहां पर उसने यह कह दिया काल ने इसके अनुसार कि मुझे कुछ भी पाना शेष नहीं है। जबकि उसको प्रतिदिन सवा लाख जीवात्माओं को खाना है। जो भी है खाना है उसको चाहिए। तो यानी कि यह श्लोक नहीं माना जाएगा कि गीता वाला गीता बोलने वाले ने यह बात सही कही है और मैं अच्छे कर्म नहीं करूंगा तो फिर दुनिया में जो है अव्यवस्था फैल जाएगी। यह श्लोक भी कैंसिल मानना पड़ेगा। अभी तक बहुत सारे श्लोक ऑलरेडी कैंसिल हो चुके
00:17:06:16 हैं। और अब यह 33 34 वाले श्लोक का भी खंडन कर रहा है। देखिए क्या कह रहा है। क्या कह रहा है कि अध्याय तीन श्लोक 33 34 में यह भी कहा गया है कि राग द्वेष नहीं करना चाहिए। स्वयं भगवान अब आगे कह रहा है स्वयं भगवान कृष्ण जी पांडवों के राग में महाभारत के युद्ध के दौरान अश्वत्थामा के बारे में युधिष्ठिर से भी झूठ बुलवाई मतलब यहां पे बता रहा है ये लोग राग द्वेष को कंट्रोल नहीं कर पाए क्यों भाई व्यक्ति अनासक्त होते हुए युद्ध नीतियां नहीं अपना सकता क्या हम खैर मगर इसने यहां पर राग द्वेष में अंतर ना करने का खंडन किया है मतलब जो समत्व बुद्धि बार-बार बता रहे है ना मरने का भय हो ना जीने की लालसा हो ना लाभ ना हानि राग ना द्वेष है ना इससे अपनी बुद्धि में यह भाव लाने मैं जो भी कर्म कर रहा हूं शास्त्र के कारण कर रहा हूं ईश्वर की वाणी के कारण कर रहा हूं भगवान बार-बार आपको ये सिखा रहे हैं मगर यहां पर जब पिछले इसने भी कई जगह पर माना है कि मनुष्य आसक्ति रहित कर्मों को करेगा यदि तो मुक्त हो जाएगा जैसे इसने जनक वाले माना तीन दिखाइए
00:18:41:10 तीन 10 का क्या था? जनक जी को मुक्ति मिली थी ना ये है 20वां हम ये 20वा हां प्रश्न संख्या 48
00:19:23:19 देखिए इसने कई जगह माना है कि आसक्ति रहित कर्म से मुक्ति हो जाती है। हालांकि जहां पर जनक जी को मुक्ति प्राप्त होने की बात आई इसने वहां पर मुक्ति होने वाली बात को छुपा लिया कि जनक जी को मुक्ति हुई थी। भगवान भगवत गीता में कहा गया है इसलिए तो यह भी श्लोक कैंसिल मानना पड़ेगा जनक जी को मुक्ति हुई क्यों मानना पड़ेगा यह मानना पड़ेगा इसके अनुसार जो कहता है कहीं-क काल ने अपने मन से बोल दिया तो ये श्लोक भी खंडित है क्योंकि यहां स्पष्ट कहा गया कि जनक जी को मुक्ति प्राप्त हुई थी तो अब यहां पे बात आती है कि राजा जनक जी भी यज्ञ आदि करते थे परंतु इच्छा रूपी नहीं मनुष्य का कर्तव्य समझकर ठीक ठीक है? मनुष्य का कर्तव्य समझकर यदि हम कर्म को कर रहे हैं तो हम जो है मुक्ति को प्राप्त होंगे। ये यहां पर इसने माना है कि श्रद्धालु किसी मनोकामना की पूर्ति की इच्छा ना रखकर रखकर अपना धार्मिक कर्तव्य जानकर जब करता है कर्म ऐसा व्यक्ति अमरलोक में चला जाता है। मोक्ष को प्राप्त कर जाता है। ये इसने यहां माना। मगर यहां पे राग द्वेष ना रखने की बुराई कर रहा है। उसमें उदाहरण क्या दे रहा है? भगवान श्री कृष्ण वो राग द्वेष
00:20:38:19 नहीं कर पाए। यहां पर इसने अपमान किया है। विष्णु जी ने शिव जी के राग में पार्वती का रूप बनाया। राग द्वेष में भगवान भी नहीं बचे क्योंकि पांडवों से राग तो कौरवों से द्वेष द्वेष बिना युद्ध नहीं हो युद्ध हो ही नहीं सकता। है ना? इससे सिद्ध है कि गीता जी में अध्यात्म ज्ञान तो काल भगवान ने सही दिया है। परंतु जीव में विकार देखिए कितना गलत है जो गीता बोलने वाला है ना जो कह रहा है मेरा अनुसरण करेंगे तो क्या गीता बोलने वाले का अनुसरण कर सकते हैं क्या देखिए क्या है गीता बोलने बोलने वाले ने क्या-क्या गलत किया है जीव में काम क्रोध मोह लोभ अहंकार राग द्वेष तथा ये सब भर दिए जिनसे परवश होकर भगवान के काल भी काल के भगवान काल के अवतार भी विवश हो गए जिसके कारण काल जाल से निकल नहीं सकते अब अब अब मामला यह आएगा कि भगवान काल के अवतार कौन है? यह कहता है ना काल अलग है और भगवान श्री कृष्ण ब्रह्मा विष्णु महेश भगवती और गणेश अलग-अलग है। ये पेज पृष्ठ संख्या 51 की बात कर रहा हूं मैं। 51 ले आइए। प्रश्न संख्या
00:21:55:07 51 इसमें लास्ट पैराग्राफ देखिए। बहुत अच्छी बात आई है। यहां पर सबसे पहली बात तो यह कह रहा है कि राग द्वेष के बिना युद्ध हो ही नहीं सकता। यानी यहां पर कुल मिलाकर यह कह रहा है कि राग, द्वेष, लाभ हानि के बिना जो है कर्म नहीं हो सकता। तो इसने अपनी बातों का खंडन किया। गीता की बातों का खंडन किया। खैर यहां मुख्य बात क्या है? यहां मुख्य बात है काल यह काल को जो है वो बता रहा है कि काल के अंदर भी राग द्वेष है। और जब काल के अंदर राग द्वेष है तो उसके अवतार कैसे बच जाएंगे? अब काल के अवतार कौन है? यह देखिए आप यह सोचने वाली बात है। काल के अवतार तो इससे सिद्ध है कि गीता जी में अध्यात्म ज्ञान तो काल भगवान ने सही दिया है। परंतु जीभ में विकार, काम, क्रोध, मोह, लोभ, अहंकार यह सब भर दिए। जिनसे परवश होकर भगवान काल के अवतार भी विवश हो गए। जिसके कारण काल जाल से नहीं निकल सकते। अब यहां सवाल उठता है कि काल के अवतार कौन है? जैसे कबीर का अवतार है यह रामपाल तो रामपाल में और
00:23:10:07 कबीर में कोई अंतर तो है नहीं रामपाल के रूप में परमेश्वर ही है अकॉर्डिंग टू रामपाल तो काल के अवतार कौन है और उनके रूप में क्या काल स्वयं नहीं है तो यहां पे वैसे इसने इंगित किया है जो ऊपर बातें चली हैं जिनका उदाहरण लिया है कि शिव जी राग द्वेष से नहीं बच पाए विष्णु जी राग द्वेष से नहीं बच पाए श्री कृष्ण राग द्वेष से नहीं बच पाए और यहां पर इसने काल का अवतार होना मान लिया। इसका अर्थ क्या हुआ कि काल के अवतार भी विवश हो गए। कौन विवश कौन हुए पीछे? शिव जी श्री कृष्ण जी तो यहां इसने मान लिया कि गीता बोलने वाले के जो गीता बोलने वाला है उसी के उसी के अवतार हैं ये सब। तो काल यानी गीता बोलने वाले वेद कहने वाले और ब्रह्मा विष्णु महेश भगवती गणेश में जो अंतर करता है ये पूरी यहां पे इसने अपने कौन से अ के नशे में पवे के नशे में जो है मान लिया उसको खैर आगे चलते
00:24:17:21 हैं दरदर्द है इसकी जो इसने अर्थ किया है हम इसको इसको काल को डर बना रहता है कि कहीं जीव मेरे जाल से
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00:24:41:06 निकल ना जाए। इसलिए तत्व ज्ञान सुनकर पूर्ण संत की शरण में ग्रहण करके पूर्ण परमात्मा की भक्ति करो। काल
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00:24:48:16 को डर बना रहता है कि लोग मेरी शरण से मेरे जाल से निकल ना जाए। ठीक है? तो वह काहे के लिए गीता में अच्छी अच्छी बातें बताएगा। वह क्यों गीता में सही तत्वदर्शी के पास भेजेगा? तो गीता के अनुसार आप तत्वदर्शी के पास नहीं जा सकते अकॉर्डिंग टू रामपाल। क्योंकि काल क्या करता है? काल को डर बना रहता है। कहीं जीव मेरे जाल से निकल ना जाए। तो फिर उसकी कही हुई बातों का आलंबन लेकर के हम तत्वदर्शी के पास क्यों जाए? हम ठीक है। और जब हम तत्वदर्शी की शरण ग्रहण करके पूर्ण परमात्मा की भक्ति करेंगे तब राग द्वेष समाप्त होंगे। हम अब देखिए पीछे कह रहा है राग द्वेष के बिना बात नहीं बन सकती। कर्म नहीं हो सकता। अब यहां फिर कह रहा है कि राग द्वेष जो है समाप्त हो सकते हैं। ये खुद ही अपनी उसमें ही कैसेट में फंस गया है। पहले ऑडियो टेप आते थे ना इसमें कहीं-क वो फंस जाती ये अजीब सी आवाज आने लगती थी। वही ऐसे ऐसे करके आवाज आने लगती थी। वैसे ही इसकी गीता का अर्थ भी है। चलिए आगे चलते हैं। तो गीता अध्याय तीन श्लोक 35 में इसने क्या कहा है? पहले
00:26:03:22 अपना पढ़ लेते हैं। हमारी गीता का अर्थ है तीन 35 में अच्छी प्रकार से आचरण में लाए हुए दूसरे के धर्म से गुण रहित भी अपना धर्म ही अति उत्तम है। अपने धर्म में तो मरना भी पर मरना भी कल्याण कारक है और दूसरे का धर्म भय को देने वाला है। यहां एक तरीके से स्वधर्म की बात हो रही है। जैसे स्वधर्म क्या है कि मेरा धर्म है अगर ब्राह्मण कुल में जन्म हुआ है तो मेरा कर्तव्य है धर्म है कि मैं जो है जो सनातन ज्ञान विज्ञान है उसका प्रचार प्रसार करूं लोगों तक पहुंचाऊं क्षत्रिय का धर्म है कि वो रक्षा करे वैश्य का धर्म है कि वो जो क्या कहते हैं आपूर्ति है समाज की वो पूरी करे और शूद्र का धर्म है कि वो सेवा के प्रकल्प ों द्वारा कहीं पर भी अव्यवस्था ना फैलने देती। तो यह सारी चीजें धर्म है। अब
00:27:18:26 किसी को लग रहा है भाई वो जो है गुणवान धर्म है उसका। जैसे मुझे लालच आ गया कि देखो वो जो वैश्य है वो ज्यादा अच्छी कमाई कर ले रहा है। उसको धन ज्यादा मिल रहा है। गुण दिखने लगे मुझे। यहां बताया जा रहा है कि भले ही तुमको अपना जो धर्म है वह गुण रहित भी दिखे फिर भी जो दूसरे वाले का जो दूसरे का जो गुणवान धर्म है वह भी तुम्हारे गुण रहित धर्म से धर्म के कंपैरिजन में व्यर्थ है। तो अब जो वर्ण व्यवस्था को कर्म से मानते हैं यहां पर उनके लिए एक सवाल आता है कि यदि दूसरे के धर्म का पालन कर लेना कर लेना भी यानी अपना जो कर्म है आज मेरी ड्यूटी है मान लो आज कर्म के अनुसार मैं बना पुलिस वाला मेरी ड्यूटी आज से हो गई रक्षा करने की व्यवस्था बनाने की उसके बाद कल को मैं अपनी ड्यूटी छोड़ छोड़ के अभी मैंने कर्म से ही माना है। जन्म से नहीं माना है। मगर कर्म से भी मानेंगे तो आज आज से मेरा धर्म क्या हो गया? रक्षा करना पुलिस वाले की तरह। मगर मुझे कल को लालच आया कि मैं मैं जो है जनरल स्टोर खोल लूं या कपड़े का शोरूम खोल लूं। तो
00:28:35:03 यहां मना किया जा रहा है कि तुम दूसरे के गुणवान धर्म को देख के अपने गुण रहित धर्म को मत छोड़ो। यहां उसी का निषेध किया जा रहा है। इसका अर्थ है कि जो आप हो वही रहो। दूसरे का धर्म मत अपनाओ। जो दायित्व आपको मिला है उसी दायित्व को आगे कंटिन्यू करो। और इसमें फिर और भी चीजें आ जाती हैं। जैसे मेरा धर्म है कि मैं एक भाई होते हुए इसकी सेवा करूं या ऐसा करूं या वैसा करूं अपने माता ये सब स्वधर्म में आते हैं। तो स्वधर्म जो है वह हमको लग रहा है कि उसके जो दूसरे का जो स्वधर्म है तमस्ती वाला नहीं दूसरे का जो स्वधर्म है उसमें मुझे लालच दिख रहा है कि उसके स्वधर्म जैसे वो अपने माता-पिता की सेवा कर रहा है तो उसको एसी का कमरा मिल रहा है और मैं अपने माता-पिता की सेवा कर रहा हूं तो मुझे जो है एसी का कमरा नहीं मिल रहा है। एयर कंडीशन कमरा नहीं मिल रहा है। तो मैं सोच रहा हूं कि मैं एक काम करता हूं। मैं भी उसके माता-पिता की सेवा कर लेता हूं। मैं भाई किसी ना किसी की सेवा करनी तो सेवा तो मैं वहां भी कर लूंगा। परंतु क्या है कि वहां पर मुझे वो मिल जाएगा। एयर कंडीशन माहौल मिल जाएगा। तो ये क्या हुआ? मैंने दूसरे के गुणवान धर्म के लालच में अपने गुण रहित धर्म का त्याग किया। तो क्या है? दूसरे के धर्म से गुण रहित भी अपना धर्म अति
00:29:50:04 उत्तम है। ये बात यहां पर कही गई। तो वर्ण व्यवस्था यहां पर ना बदलने की बात की जा रही है। क्या भले ही आपको दूसरे के धर्म में अच्छा लग रहा हो। जैसे कई कहते हैं ना अरे उसका भी मन होता है। उसको भी ऐसा मन होता है। अरे ब्राह्मण ब्राह्मण का भी मन होता है कि उसके बच्चे कारों में चले। ऐसे एक बार एक ब्राह्मण मिले थे जो जब फेरे हो रहे होते हैं तो उस समय उन्होंने कुछ ऐसा कहा था अपनी दक्षिणा को मांगने के लिए फिक्स करने के लिए तो मैंने उनको कहा कि ब्राह्मण को जो दान स्वरूप जो मिल जाए दक्षिणा स्वरूप जो मिल जाए वही उसको लेना जो है धर्म है और वहां पर वो बाध्य करे नहीं नहीं इतना ही दो तो वो फिर ब्राह्मण को शोभा नहीं देता है ब्राह्मण के लिए उचित नहीं है तो वहां ये डायलॉग मारा मारा जा सकता है। कई बार जो नहीं इतना ज्यादा धर्म और अधर्म में ध्यान रख पाते हैं। तो यह डायलॉग मार देते हैं कि भाई क्यों हमारे बच्चे अच्छे कपड़े नहीं पहने। तो क्या हुआ कि अच्छे कपड़े पहनाने के लिए यानी सामने वाले का गुण देख के और वह गुण हमारे पास नहीं है। हमारे धर्म में उसकी कमी है कि धन कम आ रहा है। तो हमारा हमारा जो धर्म है ब्राह्मण का ब्राह्मण के अनुसार वो वो धर्म है वो गुण रहित सिद्ध हो रहा है। हमारी नजरों में हमारे पर्सपेक्टिव में फिर भी
00:31:05:06 उसी धर्म का आलंबन लिए रहो। उसको छोड़ना नहीं है। यानी यहां पर कर्म कर्म कर्मणा वर्ण व्यवस्था की धज्जियां उड़ाई गई है। ठीक है? यह सार्वभौम सिद्धांत आपको प्राप्त हुआ। इसने क्या अनर्थ किया है? गीता अध्याय तीन के श्लोक 35 में कि
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00:31:24:02 दूसरों की गलत साधना से जो शास्त्र अनुकूल नहीं है। चाहे वे कितनी अच्छी नजर आए या वे अज्ञानी चाहे आपको कितना ही डराए उनकी साधना भयवश होकर स्वीकार नहीं करनी चाहिए। अब
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00:31:40:16 लोग साधना कहां से आ गई भाई? संस्कृत कहां है? साधना की साधना की। संस्कृत कहां है? अब इसने एक कहानी आगे सुनाई है ऐसी साधना के लिए कि अपनी साधना मत छोड़ना। चाहे जितना लालच हो, चाहे जितना वो हो। खुद लालच दे दे के ला रहा है। खुद लालच दे दे के मैं पहले ऐसा था, फिर ऐसा हो गया। मैं भय दे के ला रहा है। कि अगर तुम ये करोगे तो तुमको काल खाएगा। मगर तुम ये ये करोगे तो काल नहीं खाएगा। खुद लालच भय दिखाकर लोगों को कन्वर्ट कर रहा है। मगर फिर अपने लोगों को यह कह रहा है कि तुम लालच के कारण कहीं और मत चले जाना। हां तो आगे इसने कपोल कल्पित कथाएं सुनाई है। रमेश जैन पुत्र श्री ओम प्रकाश जैन ये शांति नगर ये सब कहानियां सुना दी। उसका दमा नहीं रहा। लड़की को दौरे ये सब बंद हो गए। और अंत तक आते आते प्रश्न संख्या 53 पर देखिए लालच रामपाल के द्वारा किस तरह से धर्मांतरण कराया जा रहा है। मतांतरण कराया जा रहा है। देखिए पुराना मकान बेचकर नई कोठी बना ली है। कर्ज मुक्त हो गया है। जो कह रहा है ना जो लोग कहते हैं कि नहीं शरीर शरीर को पोषित करना
00:32:55:25 एक व्यक्ति आया था कि भाई तुम अपना कैंसर का है। मैंने उससे पूछा कि तुम अपना कैंसर के इलाज के लिए रामपाल की शरण में गए हो तो इसके लिए तो रामपाल ने मना किया सांसारिक सुख के लिए तो व्यक्ति कहने लगा नहीं शरीर का इलाज और सांसारिक सुख अलग-अलग है। अब यहां पे भाई तू अब ये धन के लालच में कोठी के लालच में जा रहा है कि नहीं व्यक्ति उपासना में लालच दिया जा रहा है ना पुराना मकान बेचकर नई कोठी बना ली है। कर्ज मुक्त भी हो गया है। तीसरा पैराग्राफ 53 नंबर पेज तो यहां पर धन के लिए भक्ति बताई गई। ये देख लीजिए तीसरा पैराग्राफ पृष्ठ संख्या 53 पुराना मकान बेचकर नई कोठी बना ली है। स्वस्थ तो हुआ ही हुआ। बाकी धन का लालच भी यहां दिया जा रहा है। ऐसे होता है मतांतरण। ऐसे होता है धर्मांतरण।
00:33:55:22 आगे चलते हैं। अब आगे मान बढ़ाई जान की दुश्मन अज्ञानी अपनी गलत पूजा को नहीं त्यागते। चाहे कितना आग्रह करें चाहे सद ग्रंथों के प्रमाण दिखा दें। दिखा दिए जाए वे नहीं मानते। इसी
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00:34:12:24 प्रकार ज्ञानी विद्वान पुरुष मानव वस पैसा प्राप्ति व अधिक शिष्य बनाने की इच्छा के कारण गलत त्याग कर सच्चाई का अनुसरण नहीं करते। दोनों ज्ञानी व अज्ञानी स्वभाव वश चल रहे हैं। इसलिए भक्ति मार्ग गलत दिशा
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00:34:29:20 में दिशा पकड़ चुका है। इन दोनों को समझाना ये लोक संग्रह को यहां पर फिर उन्होंने बताया है। अच्छा एक बात है कबीर ने गीता पर भाष्य किया क्या? या कबीर ने वेदों का भाष्य किया क्या? क्यों नहीं किया भाई? कबीर ज्ञानी नहीं थे क्या? क्यों नहीं ज्ञान भाष्य किया? और जब तुम्हारे गुरु ने नहीं किया, किसी भी धार्मिक ग्रंथ का भाष्य किया ही नहीं है तो तुम कहां से कर रहे हो? हम तुम कैसे कर रहे हो? कभी वेद भाष्य किया ही नहीं है। अब यहां पर लिख रहा है विवेचन मेरे ज्ञानी
00:35:21:15 मेरे यानी रामपाल दास के अतिरिक्त अन्य सब अनुवादकों ने गीता अध्याय तीन श्लोक 35 का अर्थ गलत किया है जो इस प्रकार है। अच्छी प्रकार से लाए हुए दूसरे के धर्म से गुण रहित भी अपना धर्म अति उत्तम है। अपने धर्म में मरना भी कल्याण का कारक है। दूसरे का धर्म भय देने वाला है। अब ये कह रहा है इस बात का खंडन कर रहा है। विचार करें यदि यह अनुवाद सही है तो गीता के 18 अध्यायों के ज्ञान की क्या आवश्यकता थी? फिर तो जैसे साधना कर रहा था करता रहे। यह साधना कहां से आ गई भाई? स्वधर्म की बात की जा रही है। बेवकूफ मूर्ख व्यक्ति
00:36:06:20 स्वधर्म जो सबसे पहले मनुष्य होते हुए फिर मनुष्य में सनातनी होते हुए फिर सनातन में ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शद्र इत्यादि होते हुए फिर उसमें किसी का पिता पुत्र भाई इत्यादि होते हुए जो तुम्हें धर्म प्राप्त होता है उसको स्वधर्म कहते हैं। जैसे मनुष्य होते हुए क्या कि तुम्हें दिख रहा है कि भाई फलाने पशु का जो जीवन है बड़ा सरल है। मेरा जीवन कठिन है तो क्यों ना मैं उसी की तरह आचरण करने लगूं। मनुष्य के पर्सेक्टिव से। तो मनुष्य होते हुए उसका स्वधर्म क्या है? उसको उसी का आलंबन लेना चाहिए। अगर उसे लग रहा है कि नहीं पशुओं को यह आसान जीवन है। मैं केवल एग्जांपल के लिए बोल रहा हूं तो उसे वो नहीं अपनाना चाहिए। उसके बाद सनातनी होते हुए उसका स्वधर्म क्या है? जो भी है। परंतु यदि उसको दिख रहा है कि नहीं मुसलमान मुस्लिमों में ये अच्छी चीज है या फलाने में ये अच्छी चीज है या उसको ये अच्छा दिखाया है या देवताओं का धर्म ऐसा बताया है, वानरों का धर्म ऐसा बताया है तो उसको वहां पर उसको अपनाना नहीं चाहिए। ठीक है? और
00:37:22:07 इसके बाद फिर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र होते हुए मैंने बता ही दिया कि ब्राह्मण होते हुए आपको जो धर्म प्राप्त है ब्राह्मण की सीमा में तो क्षत्रिय का धर्म देखकर या वैश्य का या शूद्र का स्वधर्म देखकर आजकल हो क्या रहा है? कि ब्राह्मण जो शूद्रों के जीवन में जो सरलता है उसके कारण अपने ब्राह्मण ब्राह्मणोचित जो आचरण है उसको छोड़कर जो शूद्रों का कार्य है वो अपना रहे हैं और शूद्रों को भड़का रहे हैं कि तुम ब्राह्मण बनो जाके कठिन जीवन जीने के लिए शूद्रों को प्रेरित करते हैं आजकल के जो ये वाले ब्राह्मण ब्राह्मण कुल में जन्म लेने वाले आर्य समाधि टाइप के जो बन जाते हैं तो वो क्या कर रहे हैं खुद तो शूद्र वाले सारे कार्य करेंगे उनकी जो सरल जीवन यापन है शूद्र का उसको अपनाएंगे और शूद्र को प्रेरित करेंगे। तुम जाओ दिन भर में अनाज अन्न खाने के बाद 16 कुल दातून के बाद 12 कुल इत्यादि इत्यादि ये वाला सारा जीवन आचरण करो। ब्राह्मण बन जाओ। तुम ब्राह्मण दीक्षा ले लो और खुद बैठेंगे। आराम ढूंढेंगे। ऐसे भी ब्राह्मण है जिनमें से एक जो उदाहरण है आर्य समाज में ऐसा थोड़ी है ना ब्राह्मण कुल में जन्म लेने वाले बहुत से आर्य समाजी
00:38:37:15 होंगे ना तो ये सब क्या कर रहे हैं खुद ब्राह्मण धर्म जो अपन जो ब्राह्मण धर्म पर जो चलना है उसको छोड़कर खुद तो क्षत्रिय का धर्म वैश्य का धर्म अपना रहे हैं क्योंकि वहां उनको अनु वो अनुकूलता दिख रही है और उन लोगों को प्रेरित करेंगे जाओ ब्राह्मण दीक्षा ले लो ब्राह्मण दीक्षा ले लो राशन राशन की दुकान पर बटती है ब्राह्मण दीक्षा और राशन की दुकान पर और कुछ राशन नहीं मिलता है केवल ब्राह्मण दीक्षा मिलती है खैर तो अब यहां पे साधना की बात ले आया भाई धर्म की बात हो रही है आचरण की बात हो रही है भक्ति की बात नहीं हो रही है हम तो इसने उसको अलग ही एक वो दे दिया अन्य किसी की बात नहीं सुनते हुए राक्षस स्वभाव के धारण किए हुए मनुष्यों में नीच दूषित कर्म करने वाले मूर्ख मेरी भक्ति भी नहीं करते। मेरी भक्ति भी नहीं करते। मेरी भक्ति नहीं करते को कर दिया। मेरी भक्ति भी नहीं करते। खैर आगे चलते हैं। अब कुछ अगले कुछ प्रश्नों में कुछ जरूरी वैसे श्लोकों की बात इसने नहीं की है। और अगले कुछ प्रश्नों में इसने क्या किया है? तो कुछ जरूरी चीजें जो हमारे नजर में पड़ गई।
00:39:54:12 उसको हमने आपके सामने रखा है। तो 55 नंबर पृष्ठ पर देखिए तीसरे पैराग्राफ में चारों वेदों 18 पुराणों गीता जी व छह शास्त्रों में केवल ब्रह्म की उपासना की जानकारी है। सत्पुरुष की उपासना का ज्ञान नहीं है। ठीक है? इसके बाद अगला प्रश्न सीधे आ जाइए 59 पर। यह इन प्रश्नों में क्या चल रहा है कि अपनी बात को पुष्ट करने के लिए इसने कबीर वाणी नानक साहब की वाणी वो पता नहीं मिलावट के साथ दी है कि कैसे दी है पर यहां वाणी दे दे के अपनी बात को पुष्ट कर रहा है तो उस वो पुष्ट करते समय इससे इसके झोल ढोल में जो पोल है वो हमने कहीं-कहीं पर पकड़ी है उसको हम आपको दिखा रहे है अब देखिए यहां बहुत बड़ा खुलासा होने वाला 59 नंबर
00:41:03:02 पर बहुत बड़ा खुलासा गरिमा गीता की पृष्ठ संख्या 59 पैराग्राफ वन भावार्थ में रामपाल दास क्या लिख रहा है? सर्व प्राणी भगवान की साधना करते हैं। परंतु काल प्रभु यानी ज्योति निरंजन किसी को भी पूर्ण परमात्मा के भेद नहीं देता। पूर्ण परमात्मा के भेद नहीं देता। ठीक है? पहली बात। तो यानी कि वह झूठा है, द्वेषी है, षड्यंत्रकारी है। तो उसकी किसी भी बात पर भरोसा क्यों किया जाए भाई? संसार के नर नारी। अब यहां बहुत जरूरी बात है। ये बहुत जरूरी। संसार
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00:41:47:10 के नर नारी सनक सनंदन सना सनातन तथा संत कुमार तथा नारद जी व्यास जी उनके पिता ऋषि पहराचार्य जी प्रह्लाद तथा मुनिंद्र ऋषि जो स्वयं परमात्मा कबीर जी ही थे।
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00:42:05:10 लो भाई प्रहलाद जी कौन थे? स्वयं परमात्मा कबीर ठीक है। तो यहां क्या हो गया? यदि प्रह्लाद जी कबीर थे तो कबीर ने किसकी पूजा की? प्रह्लाद के रूप में। और जो प्रह्लाद का अवतार बताया गया भविष्य पुराण में कबीर को वो बात भी यहां से सिद्ध हो गई। इसकी बात से सिद्ध हो गई। और क्यों कहीं पर कबीर वाणी में इनके नाम आ गए होंगे। पष्ठ संख्या 58 पर दिखाइए जरा। कबीर वाणी दी गई है। सबसे नीचे हां यह घर होए पुरुष की सेवा पुरुष निरंजन कहे ना भवा ताकी भक्ति करे संसारा नर नारी मिल करें पुकारा सनकादिक नारद मुख गावे ब्रह्मा विष्णु महेश्वर ध्यावे मुनि व्यास पारासर ज्ञानी प्रहलाद और विभीषण धानी द्वादश भगत भगती सोराचे ते ते तारी नर नारी नाचे जुग जुग भगत भए बहु तेरे
00:43:20:16 सब पर सब परे काल के घेरे काहु भगत ना राम ही पाया भक्ति करत सर्व जन्म गवाया तो इसी के अर्थ में मूर्ख खुद ही लिख रहा है अगले पृष्ठ पर 59 में कि संसार के नर नारी सनक सनंदन नर नारी भी सनक सनंदन यहां अद्वैत मत की स्थापना हो रही है। सनातन तथा संत कुमार तथा नारद जी व्यास जी उनके पिता ऋषि पाराशर जी अगर अद्वैत ना भी माने तो कम से कम प्रह्लाद मुनि ऋषि जो स्वयं परमात्मा कबीर जी ही थे। हो गया। आगे देखते हैं। प्रश्न संख्या
00:44:10:22 निकालिए। 63 63 अब यहां पर देखिए जो यह लोग कहते हैं ना कि अगर वह स्वयं कबीर हैं तो वह यू क्यों कहेंगे कि वो परमात्मा उस परमात्मा उसकी शरण में जा वो तुझे मिलेगा यह होगा वो होगा वो अपने से भिन्न किसी और की बात क्यों कर रहे हैं मगर यहां पे कबीर भी बात कर रहे हैं क्या कह रहे हैं पष्ठ संख्या 63 में पृष्ठ संख्या 63 में कबीर साहब साहब ने बताया है कि वह परमात्मा जिसका काल ना हो यानी
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00:44:49:04 अविनाशी सत्पुरुष वह सच्चा परमात्मा जिसका नाश हो नाश हो ना हो यानी अविनाशी शब्द स्वरूपी राम वह परमात्मा जिसका वास्तविक स्वरूप शब्द है वास्तविक स्वरूप शब्द है और शब्द खंड नहीं होता वह नाश में नहीं आता यानी अविनाशी उस परमात्मा को जो अविनाशी है जिसको शब्द स्वरूपी राम अकाल मूरत व सत्पुरुष आदि नामों से जाना जाता है।
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00:45:20:12 को पाना है। किसको पाना है? उस परमात्मा को। तो यहां हो गया 63 नंबर पृष्ठ पर हो गया ना? किसको पाना है? उस परमात्मा को। वह जिसका मुझे नहीं पाना है। कबीर ने यह नहीं कहा कि मुझे पाना है। उस परमात्मा को पाना है। यानी कबीर से भी अलग कोई परमात्मा है। अकॉर्डिंग टू रामपाल थ्योरी। अकॉर्डिंग टू रामपाल कॉमेडी। इसके बाद जो मुख्य बात है वो है हां। 69 नंबर पेज निकालिए। बहुत बढ़िया बढ़िया तथ्य मिले हैं। कुछ सरसरी निगाहों से देखा है। सरसरी एक दृष्टि मारी बस और उसी में जो चीजें पकड़ में आ गई वही हम आपको प्रस्तुत कर रहे हैं। तो 69 नंबर पेज पर क्या हुआ है? काल जब दोबारा सृष्टि रचेगा तो फिर 84 लाख योनियों में कर्म कष्ट भोगने के लिए दोबारा चले जाएंगे। कौन चले जाएंगे?
00:46:30:24 जो काल की भक्ति करते हैं, ठीक है? वो काल के लोक में जाकर निश्चिंत रहते हैं। पहली बात तो निश्चिंत कैसे रह रहे हैं? काल तो उनको खाता है। ये कंट्राडिक्शन। दूसरी बात क्या है कि उनको महाप्रलय तक मृत्यु की चिंता नहीं है। ठीक है? परंतु महाप्रलय में फिर समाप्त हो जाएंगे और काल जब दोबारा सृष्टि रचेगा तो फिर 84 लाख योनियों में कर्म कष्ट भोगने के लिए चले जाएंगे। तो काल दोबारा सृष्टि कब रचेगा? जब काल मरने के बाद दोबारा जन्म लेगा। जब काल मर गया तो किसके जाल में फंसा रहा व्यक्ति वो जीव? पहली बात। दूसरी बात क्या काल जब दोबारा जन्म लेगा और दोबारा वही सब चीजेंगी तो वो लोग जिनको यह मालूम पड़ चुका है जैसा कि यह कहते हैं कि अब थोड़ी ना आएंगे हम लोग वहां से तो ये कह रहे हैं कि काल जब दोबारा सृष्टि रचेगा तो दोबारा आएंगे यानी ये लोग उस समय मुक्त हो गए होते हैं जब काल मर जाता है दोबारा सृष्टि रचने के लिए जब वो जन्म लेता है तो ये जो लोग हैं ये दोबारा काल को देख के हाथ खड़ा करते हैं मुझे फिर जाना है मुझे फिर जाना है काल के साथ पहली बात
00:47:46:09 और या फिर यह माना जा सकता है कि जो आत्माएं मुक्त होती जाती है वह भर दी गई वापस और नई नई आत्माओं को बनाया जाता है। फैक्ट्री है ना वहां पर आत्मा बनाने की आत्मा नित्य नहीं है ना इसलिए खैर आगे चलते हैं। पृष्ठ संख्या 72 उस भगवान पूर्ण ब्रह्म को पाने का मंत्र ये कौन कह रहा है? कबीर जी दे रहे हैं उस भगवान को पाने का मंत्र तो अपने से भिन्न भगवान की व्याख्या 72 पद तीसरा पैराग्राफ
00:48:34:10 है हां अब यह बहुत बढ़िया चीज आ गई 75 नंबर का प्रश्न है और 75 नंबर के पृष्ठ पर क्या लिखा है नीचे नाम देने का अधिकारी वही है जिसको गुरु जी ने आदेश दे रखा है तथा सत्यनाम व सारनाम साधना बताता है। अब पॉइंट यहां पर ये है कि रामपाल का गुरु था कौन? क्या वो तत्वदर्शी था? क्या उसको तत्व का ज्ञान था? कि नहीं था और अगर वह तत्वदर्शी नहीं था तो रामपाल को यह नाम देने का अधिकार मिला कहां से चलो कबीर को मान लिया थोड़ी देर के लिए पूर्ण परमात्मा रामपाल को कहां से मिला क्योंकि रामपाल का गुरु तो तत्वदर्शी नहीं था क्या था तो बताओ परंपरा उसको उसको कहां से मिला हम यहां पे यहां पे इन्होंने परंपरा का समर्थन किया है। परंतु परंपरा का खंडन ये स्वयं करते हैं। क्योंकि कबीर जी के स्वयं के गुरु थे रामानंदाचार्य।
00:49:49:27 मगर ये कबीर को रामानंदाचार्य के विरोध में खड़ा करते हैं। ठीक है ना? आगे देखिए 76 नंबर पृष्ठ पर अध्याय श्लोक अध्याय सात श्लोक 12 से 15 12 से 15 20 से 23 में स्पष्ट किया है कि तीनों गुणों रजगुण ब्रह्मा सद्गुण विष्णु तमगुण शिव की उपासना करने वाले मूर्ख हैं। वह राक्षस स्वभाव को धारण किए गए। यह वह आक्षेप है जो आप नोट कर सकते हैं। राक्षस स्वभाव को धारण किए हुए मनुष्यों में नीच दुष्कर्म करने वाले हैं। वह मेरी ज्ञान दात गीता ज्ञान दाता ब्रह्म की पूजा भी नहीं करते। ऐसा कुछ नहीं लिखा है यहां पर। आगे के प्रश्नों में हम लोग देखेंगे। आगे चलते हैं।
00:50:38:19 यहां ये बीच में श्लोक 35 वहां से छोड़ा हुआ है। कहीं पर भी इसने श्लोक की बात नहीं की है। अगर की हो तो भाई मुझे बताना क्योंकि मैंने काफी देख लिया। इसमें बीच में 35 के बाद 36 वे श्लोक की बात ही नहीं हुई है कहीं भी। तीसरे अध्याय तीन श्लोक 35 के बाद इसने अभी तक कोई बात नहीं की है। और इसके करते करते करते इसने ये जो है यहां आ गया। फिर वही 89 नंबर प्रश्न पर अपमान किया है जो सीता माता का। आप लोग देख सकते हैं। उमा ने ऊपरले मन से कहा कि अच्छा परीक्षा नहीं लूंगी। परंतु शिव के दूर जाते ही शिवकर सीता जी का रूप रूप बनाकर यह सोचकर कि मुझे सीता जानकर प्यार व संतोष करेगा। प्यार किसको करेगा? तो प्यार व संतोष ये समझ में आ रहा है। रामचंद्र जी के सामने गई।
00:51:41:02 हम बात इसके विपरीत हुई। रामचंद्र जी बोले हे दक्षत्री फिर यह सब है। हां देखिए उधर से काल मन ने शिव जी को उकसाया तथा पूछ बैठा ले आई परीक्षा देखिए काल उकसाता है कोई भी दुनिया में कोई भी गलत कार्य कर रहा है तो काल उकसा रहा है उसको क्योंकि काल मन भी है तो ये श्री कृष्ण भगवान को काल की अपेक्षा कर बुरा क्यों सिद्ध कर रहा है भाई तेरा काल ही बुरा है फिर तू गीता बोलने वाला काल को कैसे सिद्ध कर रहा है जब गीता बोलने वाला ये कह रहा है कि मैं अगर अच्छे कर्म ना करूं तो दुनिया दुनिया में संसार में अवस्था फैल जाए और देखिए आगे पृष्ठ संख्या 91
00:52:25:22 यहां क्या किया है इसने? यहां इसने क्या किया है? यह विचार कर भगवान विष्णु अंतर्ध्य हो गए। कुछ दूरी पर यह सेकंड पैराग्राफ है जो बड़ा सा उसमें नीचे से अगर गिने तो एक दो तीन चार पांच छ सात आठ आठवीं लाइन है नीचे से सेकंड पैराग्राफ में नीचे से आठवीं लाइन क्या लिखा है यह विचार कर भगवान विष्णु अंतर्ध्यान हो गए कुछ दूरी पर एक सुंदर युवा मतलब भगवान शंकर भगवान विष्णु से कह रहे हैं कि आपने अमुक अमुक अवसर पर जो रूप बनाया था वो रूप मुझे दोबारा दिखाओ तो पहले मना कर रहे हैं। फिर उन्होंने दिखाया। हां। तो इसमें देखिए इसने मिलावट क्या की है। यह विचार कर विष्णु अंतर्ध्य हो गए। कुछ दूरी पर एक सुंदर युवा स्त्री के रूप में अर्ध नग्न शरीर युक्त पोशाक पहने हुए
00:53:40:24 दिखाई दिए। अब कोई है माई का लाल जो लाकर दिखाए कि अर्ध नग्न शरीर युक्त पोशाक पहने हुए दिखाई दिए थे। भगवान विष्णु स्त्री के रूप में भगवान शिव को। यह है इसकी नीचता जो इसने मिलाई है। ठीक है? और आगे चलते हैं। मन स्वयं काल है। आगे के पन्नों में भी यही सब है। और इस प्रकार से इसने तीसरा अध्याय पूरा कर दिया। इसने 35वें के बाद चर्चा ही नहीं की है। अपनी क्या है? कचरा है, क्या है? 35व श्लोक के बाद इसने बात ही नहीं की कि अध्याय तीन में 36 वे श्लोक में क्या है? 37 श्लोक में क्या है? तो अब क्या होगा कि एक तरीके से यह खंडित खंडन हो गया इनका जब 36 37 38 39 40 और 41 है ना शायद संभवत 45 श्लोक है 43 है 45 43 तो 43 36 से लेकर 43 यानी यहां सीधेसीधे इसने एक तरीके से बिना कुछ कहे कितने श्लोकों का खंडन कर दिया? पांच और तीन आठ।
00:54:56:00 ठीक है? मगर हम अपने श्लोकों की व्याख्या और फिर हम आप तब तक वो स्ट्रीम का वो दे दीजिए लिंक हम अपना अर्थ पढ़ लेते हैं। तो 36व में भगवान श्री कृष्ण कह रहे हैं अर्जुन से अर्जुन बोले भगवान श्री कृष्ण से 36व में हे कृष्ण तो फिर यह मनुष्य स्वयं ना चाहता हुआ भी बलात लगाए हुए की भांति किससे प्रेरित होकर पाप आचरण करता है? भगवान बोले रजोगुण से उत्पन्न हुआ यह काम ही क्रोध है। यह बहुत खाने वाला अर्थात भोगों से भी कभी ना गाने वाला और बड़ा पापी है। इसको ही तू इस विषय में बैरी
00:55:36:06 जान। है ना? यह देख लेना भाई। मुझे मैंने कोशिश की है कि मुझे मिल जाए। मगर मुझे दिखा नहीं कि 35 नंबर के बाद से श्लोकों का कहीं पर अर्थ किया हो। इस व्यक्ति ने तो आप लोग देखना किया है कि नहीं किया है और बताना तो इन्होंने काम को अ व्यक्ति के पसने का कारण बताया है काम ही क्रोध है रजोगुण से उत्पन्न जिस प्रकार धुएं से अग्नि ये हम लोग पढ़ रहे हैं 38वा जिस प्रकार धुएं से अग्नि और मैल से दर्पण ढका जाता है तथा जिस प्रकार जेर से गर्भ ढका रहता है वैसे ही काम के द्वारा यह ज्ञान ढका रहता है। 39वा हे अर्जुन इस अग्नि के समान कभी ना पूर्ण होने वाले काम रूप ज्ञानियों के नित्य वैरी के द्वारा मनुष्य का ज्ञान ढका हुआ है। इंद्रियां, मन और बुद्धि ये हम 40वा पढ़ रहे हैं। यह सब इसके वास स्थान कहे जाते हैं। यह काम इन मन, बुद्धि और इंद्रियों
00:56:51:06 के द्वारा ही ज्ञान को आच्छादित करके जीवात्मा को मोहित करता है। इसलिए हे अर्जुन तू पहले इंद्रियों को वश में करके इस ज्ञान का और विज्ञान का नाश करने वाले महान पापी काम को अवश्य ही बल पूर्वक मार डाल। काम को वश में करने की बात की जा रही है। इंद्रियों को स्थूल शरीर से पर यानी श्रेष्ठ बलवान और सूक्ष्म कहते हैं। इन इंद्रियों से पर मन है। मन से भी पर बुद्धि है और बुद्धि से भी अत्यंत पर वह आत्मा है।
00:57:37:03 ठीक है? यहां पे इन्होंने पर का अर्थ क्यों लिया है? क्योंकि परे परे परे परह परतः यह कई बार आ रहा है और यहां पर दिखाई दे रहा है कि एक क्रम बताया जा रहा है कि इंद्रियों से परे मन है। मन से परे बुद्धि है। बुद्धि से परे जो बुद्धि से भी अत्यंत परे है वह आत्मा है। तो यहां यही बताया गया कठोपनिषद अह में भी यही बात बताई गई है। और 43वें में कहा गया है इस प्रकार बुद्धि से परे अर्थात सूक्ष्म बलवान और अत्यंत श्रेष्ठ आत्मा को जानकर और बुद्धि के द्वारा मन को वश में करके हे महाबाहु तू निष्काम रूप दुर्जन शत्रु को मार डाल। तो यह जो है भगवत गीता का तीसरा अध्याय समाप्त हुआ। अब हम लोग बात कर सकते हैं। किसी ने अगर ज्वाइन किया हो तो आज आपको कॉमेडी अच्छी लगी हो संभवतः रामपाल की और दे दीजिए भाई एक बार लिंक कोई अगर आना चाहे किसी वैचारिक मतभेद के निमित्त
00:58:52:04 चर्चा करना चाहे तो छोटी-मोटी तो कर सकता है किसी प्रकार का कोई विचार प्रकट करना चाहे तो आ सकता है और यदि एक कोई बड़ा टॉपिक है तो उसके लिए वह हमसे हमारे दिए गए नंबर पर संपर्क कर सकता है नंबर नंबर दिखा दीजिए और हमें आर्थिक बल प्रदान करने के लिए अभी भी आप यहां पर आपको जानकारी मिल जाएगी। अभियान को आर्थिक बल जो प्रदान करना चाहते हैं वो अवश्य
00:59:36:10 करें। तो हमने काफी सारी कॉमेडी इस ग्रंथ इसमें पढ़ी और सबसे बड़ी एक चीज है कि व्यक्ति इतना उसमें अपने नशे में हो गया कि श्लोक 35 के बाद उसने 36 से ले और 43 तक उसने कुछ अर्थ ही नहीं बताया। ना भावार्थ ना अनुवाद ना कुछ। यह यहां पर हमारे संस्था का डिटेल आ रही है। आप इसमें हमें आर्थिक बल इसके द्वारा उपलब्ध करा सकते
01:00:14:18 हैं। अगले सप्ताह चौथा अध्याय शुरू होगा और धीरे-धीरे रोचकता बढ़ती जाएगी। बुलेट पॉइंट्स आपको मिलते रहेंगे। बुलेट पॉइंट्स का एक व्याख्या देखने के लिए आप को इन वीडियोस पर आना पड़ेगा। मेरे ख्याल से कोई है नहीं अभी आने का इच्छुक। तो हम लोग अब इस चर्चा को विराम देते हैं। अगले सप्ताह मिलेंगे बुधवार को सायल 78 या 9:00 बजे। तब तक के लिए जय श्री राम।
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गीता के नाम पर रामपाल के बोलबचन अध्याय 3 Ep- 5(b) #satlokashram
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