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00:00:00:26 जिन लोगों को नहीं पता एक सीरीज है पूरी रामपाल के पाखंडी गीता ज्ञान पर पाखंडी का गीता ज्ञान नाम से तो वो सीरीज में ये नाइंथ एपिसोड है तो आप लोग पीछे से सर्च कर सकते हैं जो दूसरे चैप्टर से एक्चुअली हमने चालू किया था क्योंकि पहले चैप्टर में तो केवल ऐतिहासिक तथ्य देखते हुए रामपाल ने उसको छुआ भी नहीं उसने ज्ञान देना चालू किया है दूसरे से तो दूसरे दूसरे चैप्टर से अभी तक ये होते इसके नाइन आठ एपिसोड हो चुके हैं और इस श्रंखला का जो ये मेन वीडियो होता है जो यहां मेन चैनल पर चलता है इसके कुछ बुलेट पॉइंट्स होते हैं। तो वो बुलेट पॉइंट्स आपको संक्षिप्त रूप में इस वीडियो के बुलेट पॉइंट्स आपको वहां पर भी मिलते हैं। सर्वशक्तिमान पर बुलेट पॉइंट्स की एक सीरीज है वहां पर इसी पाखंडी के गीता ज्ञान की

00:00:58:02 और एक अनाउंसमेंट और कर दूं मैं आपको बहुत जल्द देखिए बहुत सारे तरीके अपनाए जा रहे हैं रामपाल का जो उसे रोकने के लिए रामपाल की चीजों का प्रतिकार कर रहे हैं लोग अपने अपने हिसाब से और आधिकारिक रूप से ऑफिशियली हमने भी कर रखा है हाई कोर्ट में केस अभी चल ही रहा है एफआईआर दर्ज है वो सब तो है पर अभी एक बहुत बड़ा धमाका हम लोग करने जा रहे हैं। है ना? आपको बहुत जल्द कुछ ही दिनों में एक बहुत सारी ऐसी चीजें मिलने वाली है कि आपको भी आनंद आ जाएगा रामपाल के उसमें कि हां अब कुछ हुआ है। जैसे हम जब करते हैं तो बिल्कुल 100 सुनार की एक लोहार की वाला काम करते हैं। कुछ वैसा ही है। अभी डिस्क्लोज नहीं कर रहे हैं। चालू कर देंगे तब आपको आनंदमई चीजें देंगे। और कहते हैं ना वो झूठे की हद तक और चोर के घर तक तो कुछ ऐसा ही है। इस बार जो भी होगा आपको बहुत आनंद आएगा। बढ़ चढ़ के आप उसमें पार्टिसिपेट कर सकते हैं।

00:02:06:07 इसके साथ ही साथ ये जो वीडियोस होते हैं रामपाल से संबंधित अथवा हमारे चैनल पर जितने भी पड़े उसका आप जो बिना उसमें मतलब मिलावट के जैसे हमारे शब्दों को हमारे भाव को बदले बिना जहां भी आप यूज़ करना चाहते हैं कर सकते हैं। बस ऐसा ना हो कि मैंने बोला यस मैंने बोला यहां से मत जाना। तो आपने उसका मत काट दिया। यहां से जाना ऐसा नहीं करना। ठीक है? आप अपने अनुसार उनका उपयोग कर सकते हैं। और इसमें यह जो सीरीज है इसमें कभी-कभी बहुत जरूरी मैं ऐसी चीजें बताऊंगा उसको कह सकते हैं की पॉइंट्स रामपाल के विषय में। तो वो की पॉइंट्स भी आप अगर एकत्रित करते रहेंगे ना तो वही पर्याप्त होगा रामपाल का मुंह धुआं कर देना। मुंह सूख जाए रामपाल। जैसे आज का मैं आपको की पॉइंट एक बताने वाला हूं।

00:03:01:20 आप चाहे तो यहां से इसको कट करके और रील के रूप में अपने Instagram वगैरह जो भी आपका सोशल मीडिया हैंडल हो उस पर आप डाल सकते हैं। और मुझे कुछ ऑडियो रिकॉर्डिंग मिली है जिसमें ये लोग यही सब बातें कर रहे हैं कि आप इतने वीडियोस बनाइए। आप आप भगत जी आप इतना बनाइए। एक भगत जी को 10 वीडियोस बनाने हैं। इस तरह की रिकॉर्डिंग्स मेरे पास आई है। इनकी लीक हुई है रिकॉर्डिंग्स। तो यह इस तरह से काम करते हैं। एक-एक व्यक्ति को प्रेशराइज करते हैं अपने भगत को कि वीडियो बना वीडियो बना। क्योंकि यह जो भी कुछ कर सकते हैं सोशल मीडिया पे ही कर सकते हैं। धरातल पर ये आपको अपने उस रूप में नहीं मिलेंगे कभी भी जिस रूप पर सोशल मीडिया पर धरातल पर ये आपको बकरी बकरी बन के मिलेंगे। और सोशल मीडिया पर आपको ये शेर बन के मिलेंगे। ठीक है? तो ये प्रेशराइज करते हैं कि भाई वीडियो बनाओ वीडियो बनाओ। तो आप लोग भी वीडियो बनाइए। आप स्वयं नहीं बना सकते तो हम लोग हम लोगों के वीडियोस की कटिंग कर करके एक एक दोद मिनट के जो भी आपको पार्ट अच्छा लगता है वो करिए और अभी जो मैं बोलने जा रहा हूं उसको जरूर कट कर लीजिएगा ठीक है तो रामपाल के अनुसार रामपाल वेद गीता जो शास्त्र है शास्त्र सम्मत चीजें बताता है ज्ञान देता है

00:04:17:06 और रामपाल ने ही बताया है कि हमारे शास्त्रों में शिव शिव दुर्गा काली की पूजा को निषेध किया गया है। व्रत करने को निषेध किया गया है। या इस तरह के श्राद्ध इत्यादि कर्म है जो उनको निषेध किया गया है। है ना? या फिर और ऐसी जो भक्ति भक्ति विधि विषयक बातें हैं उसमें मना की गई। गीता का आधार लेकर के या जो भी आधार लेकर के वो बताता है। एक निचोड़ वाली बात आपको बता रहा हूं। बहुत पॉइंट की बात है। तो हमारे शास्त्रों ने जो जो चीजें हम कर रहे हैं उनको निषेध किया है। अगर हम ब्रह्मा विष्णु महेश की पूजा कर रहे हैं भगवान को उनको परमेश्वर के रूप में स्वीकार करके तो वो उसका निषेध करते हैं हमारे शास्त्र। तो हमारे शास्त्रों का निचोड़ है कि हम जो जो काम परंपरागत रूप से करते चले आ रहे हैं वह हमें नहीं करना। ठीक है? अब बात यह आती है कि यदि हमारे शास्त्र ही ऐसा कह रहे हैं यदि हमारे शास्त्र ही ऐसा कह रहे हैं तो फिर यह चीजें हमारे पास आई कहां से? हमने ब्रह्मा विष्णु महेश की पूजा करना चालू कहां से किया? कभी ये सोचा? जब गीता ही मना कर रही है कि कृष्ण जी भगवान नहीं है। जब गीता जी ही मना कर रही हैं कि वो इसका

00:05:32:12 रामपाल के अनुसार हमारे शास्त्रों में ज्यादातर इस बारे में बात की गई कि क्या-क्या नहीं करना है। समझ रहे हैं कि आपको ब्रह्मा विष्णु महेश की भक्ति नहीं करनी है। आपको ये ये नहीं करना है। नहीं करना बात तब होती है जब कोई कर रहा है। तो क्यों कर रहे हैं? अब अगर आप यह कहेंगे कि आपने इनहीं शास्त्रों का गलत मतलब निकाल लिया था। इनहीं शास्त्रों का आपने गलत मतलब निकाल लिया था। यह शास्त्र तो मना कर रहे थे। गीता तो मना कर रही है। पुराण तो मना कर रहे हैं। वेद तो मना कर रहे हैं। तो अगर हमने गलत मतलब निकाल भी लिया और यह शास्त्र वो है जो मना कर रहे हैं। तो इससे पहले वो कौन से शास्त्र थे जिसमें इनकी पूजा बताई गई है? उसका प्रमाण क्या है? तुम्हारे हिसाब से इसमें इनकी पूजा नहीं बताई गई है। इसमें और भी चीजें हैं जो मना की गई है। यह सारे शास्त्र इसी से ओतप्रोत है। ब्रह्मा विष्णु महेश भक्ति नहीं करनी है या कृष्ण जी को परमेश्वर नहीं मानना है जो भी है निषेध किया है जो हमारे अकॉर्डिंगली वेद गीता पुराण इत्यादि जो धर्म शास्त्र है उनके अनुसार ये जो चीजें हैं जो हम कर रहे हैं वो बताई गई है। तुम्हारे अनुसार इनका नाम लेकर के मना किया गया है। ये ये नहीं

00:06:47:13 करना है नाम लेकर के। तो इन शास्त्रों का जो अस्तित्व है वह इस बात में है कि हमको यह यह नहीं करना है। तो यह सब चीजें हमारे पास आई कहां से? इसका प्रमाण क्या है? हमारे पास तो यह सब चीजें हैं। हमारे अनुसार तो इनहीं शास्त्रों से आई है। मगर इन शास्त्रों का सही अर्थ है कि यह शास्त्र इन शास्त्रों का आविर्भाव ही इसलिए हुआ है कि आपको यह बता सके कि कृष्ण की भक्ति नहीं करनी। ब्रह्मा विष्णु महेश की भक्ति नहीं करनी है। इसका मतलब है कि हम पहले से इन शास्त्रों के बाहर से हम लोग ब्रह्मा विष्णु महेश की भक्ति कर रहे हैं। क्यों कर रहे थे? धर्म ही ना पशु भी समाना हमको ये ज्ञान मिला कहां से? उस बात का प्रमाण कहां है? अगर इन शास्त्रों ने इनकी पूजा निषेध की है तो इनकी पूजा का बताने वाला विधान वाला शास्त्र कहां है? यहीं पर टफिस हो जाएगी। पूरी

00:07:45:06 पूरा इनका जो स्ट्रक्चर है सब तबाह हो जाएगा। केवल इसी बात से यह दिखाए अगर तुमने ये घोषित कर दिया कि जो हमारे सनातन शास्त्र हैं उनमें ये ये चीजें नाम लेके मना की गई है और इसी रूप में इनका अस्तित्व है मना करने के रूप में। इसका मतलब वो चीजें पहले से एक्सिस्ट करती हैं। जिसको हम जिसको हम फॉलो करते हैं। तो जय श्री राम। वो यहां पर पावर कट हो गया था। लाइव चल रहा है। मैं दिख रहा हूं ना सबको पावर कट हो गया था। इन्वर्टर की एक जरूरत है। अगर कोई व्यवस्था कर सकता है इन्वर्टर की तो देखें। अच्छा तो मैं बात कर रहा था कि

00:08:30:04 सीधी बात यह है कि हमारे जो शास्त्र हैं जिनके आधार पर हम ब्रह्मा विष्णु महेश की भक्ति करते हैं वो बहुत सी चीजें जो रामपाल मना करता है कि आपके शास्त्रों में इन चीजों को मना किया गया है। ठीक है? मना किया गया। इन शास्त्रों का स्वरूप ही है कि यह चीज मना कर रहे हैं। तो फिर वो कौन से शास्त्र थे जिनके कारण हमने इन चीज को अपनाया क्योंकि धर्मे हीना पशु भी समाना मनुष्य अपने आप धर्म नहीं सीखता है। यानी क्या करना है? क्या डज एंड डोंट्स उसके उसके पास अपने आप नहीं आते हैं। तो यह कहां से आए उसके पास? उसका प्रमाण क्या है? तो इस बारे में इनके मुंह पे लग जाएगा ताला। उसका कोई प्रमाण नहीं है। वेद शास्त्र इत्यादि से हटकर कौन से शास्त्र से जिनके कारण हम लोगों ने ब्रह्मा विष्णु महेश की पूजा करना शुरू किया। जबकि वेद इत्यादि तो वो मना कर रहे हैं। तो ये एक की पॉइंट है जो आप लोग नोट करिएगा और इस पर आप बहुत लंबी-लंबी बात कर सकते हैं। ठीक है? और भी है की पॉइंट तो अलग-अलग एपिसोड्स में मैं आपको बताता चलूंगा। जैसे पिछले वाले में तत्व ज्ञानी के बारे में बताया था। अच्छा कुछ लोग हैं जो यह कहते रहते हैं समाज सेवा के बहाने धर्मांतरण का आधार हां यह तो ठीक है। कुछ लोग यह कहते हैं कि

00:09:42:14 कुछ लोग यह कहते हैं कि रामपाल जो है वो धरातल पर मदद कर रहा है। लोगों की सेवा कर रहा है। इसलिए रामपाल अच्छा है। तो रामपाल लोगों को धरातल पे पाइप बना पाइप बांट रहा है। अनाकोंडा के बराबर लंबे-लंबे पाइप यदि वह बांट रहा है तो आप सब लोग अपने घर की मातृ शक्तियों को उसके पास भेज देंगे किसी भी तरह से उपयोग में लेने के लिए है ना यही है ना क्योंकि वो पाइप बांट रहा है इसलिए भेज दो अपने घर की मातृशक्तियों को तुम भेज सकते हो ये नपुंसकता आप लोग दिखा सकते हैं कट्टर मनुवादी कट्टर सनातनी नहीं चलिए अब हम लोग शुरू करते हैं जो पिछला वाला एपिसोड था उसका उसके बुलेट पॉइंट्स देख लेते फटाफट क्या थे

00:10:29:20 बुलेट पॉइंट्स सबसे पहली बात है हमने रामपाल की जो गरिमा गीता की पुस्तक है उसका 102 नंबर का पृष्ठ है उसमें हमने बुलेट पॉइंट्स जो हम बता रहे हैं जिस पर पिछली लाइव में विस्तृत चर्चा हुई थी तो उसमें बुलेट पॉइंट क्या-क्या निकले थे? सबसे पहला बुलेट पॉइंट निकला था कि 5 14 के अर्थ में रामपाल यह कहता है कि परमात्मा किसी के शुभ कर्मों का फल नहीं देता। और थोड़ी देर बाद उसी पैराग्राफ में यह भी कह देता है कि परमात्मा उसकी भक्ति। भक्ति यानी कि क्या है? शुभ कर्म। तो भक्ति करने को भक्ति करने पर जो रामपाल का ईश्वर है वह क्षमा कर देता है। तो इधर कह रहा है फल नहीं देता। इधर कह रहा है क्षमा कर देता है। यह दोहरी बातें दोगली बातें मूर्खता पूर्ण बातें हैं। दोगली क्या दोगलेपन के लिए दोगलापन करने के लिए भी अकल चाहिए होती है। मगर यहां तो फड़ता है। ठस बुद्धि है तो वहां अकल की भी जरूरत नहीं है। तो ये दोगली बातें हैं। वैसे भी रामपाल खुद ही दावा करता है। मैं जो है फलाने को करंट से बता बचा के आया। यह आया वो बात और है कि खुद ही जमानत के लिए रोता रहता हो। अपनी

00:11:45:10 ढलती हुई उम्र का वास्ता देकर के बाहर आता हो। लिखित में देता हो वह बात और है मगर वह दावे तो करता है ना कि मेरी भक्ति करने से यह हो जाएगा वह हो जाएगा मगर यहां पर वह खुद कह रहा है 5 14 में पृष्ठ क्रमांक 102 नंबर पृष्ठ पर कि परमात्मा किसी के शुभ कर्म का फल नहीं देता लो भाई इनका तत्व ज्ञान नहीं है इनका ज्ञान इनका ज्ञान है पंचर ज्ञान क्या ज्ञान है पंचर ज्ञान पांच 16 का अर्थ करते हुए आत्मज्ञान और परमात्म ज्ञान को तत्व ज्ञान कह रहा है अच्छी बात आत्मज्ञान, परमात्म ज्ञान, तत्वज्ञान है। अच्छी बात है। मगर उस उसके बाद थोड़ी देर बाद ही उसी पैराग्राफ में कह रहा है कि उसका महिमा और नाम दीक्षा इत्यादि। उसकी महिमा गाना कि उसने यह किया है। उसने वहां फलाने गांव में यह हो गया था वो किया। वहां डेरा डाल दिया। वहां डेरे में भविता कांड हो गया। वहां पर यह निकला। इतने सारे वो निकले। सामग्रियां काम वासना को तृप्त करने में। संतान उत्पत्ति को रोकने के लिए जो सामग्री होती है ना आजकल जो वैज्ञानिकों द्वारा बनाई गई वो सब सामग्रियां एक किलो निकली ये निकली तो यह जो इसके ईश्वर की जो इनके ईश्वर की रामपालियों का ईश्वर रामपाल तो यह जो इसकी महिमा है तो इस महिमा का बखान करना ही तत्वज्ञान

00:13:00:24 है तो पहले कह रहा है आत्मज्ञान और परमात्म ज्ञान तत्व ज्ञान है फिर जो इस तरह की चीजें हैं उसकी महिमा बखान करना जेल कैसे गया जेल में क्या-क्या हुआ उसके साथ उसने सफाई की शौचालय की या क्या किया बगीचा बगीचा संभाला या भंडारी बना वहां का। तो यह सब महिमा गान इसका जो है वो उसका तत्व ज्ञान है। तो अब एक ही पैराग्राफ में दो तरह की बातें फिर 57 में कह रहा है तत्व ज्ञान यानी नाम दीक्षा। मैंने पिछली लाइव में भी चैलेंज किया था। मैं इस लाइव में भी चैलेंज कर रहा हूं। जिसने भी अपनी मां का निष्ठा पूर्वक दूध पिया हो। जिसने भी अपनी मां का दूध पिया हो या जिसकी मां ने उसको निष्ठा पूर्वक दूध पिलाया हो। वह पूरे सनातन शास्त्र वांगमय में वैदिक वांगमय से दिखा दे कि तत्व का अर्थ होता है नाम दीक्षा। दिखा ऐसी चीज बोलते हैं ना कि अकाट्य चीजों पर बात करते हैं। फालतू की बातें नहीं करते हैं। अकाट्य चीज व्यर्थ की बातें नहीं करते हम कि अरे तुम्हारा फोटो बिगाड़ दिया। कुत्ते जैसा मुंह बना दिया। उसकी आवश्यकता ही नहीं है। उसकी आवश्यकता है क्या? आप ही लोग बताओ। रामपाल का फोटो बिगाड़ करके उसको कुत्ते जैसा दिखा करके या और कोई प्राणी के रूप में दिखा दिखाने की आवश्यकता है।

00:14:16:00 आज मैंने एक वीडियो देखा था सुबह-सुबह उसका चेहरा देख लो तो वैसे ही दिन खराब हो जाता है। तो इस सब की हमें आवश्यकता नहीं है। कट अकाट्य बातें बोलते बिल्कुल अकाट उसमें जब बात आ जाएगी तो खत्म टू स्टॉप द ट्रेन पुल द चिन। ठीक है? तो क्या है कि जिसने जिसकी भी मां ने उसको निष्ठा पूर्वक दूध पिलाया हो वह यह बता दे मुझे सिद्ध कर दे शास्त्रों से सनातन शास्त्रों से कि तत्व का अर्थ होता है तुम्हारे वो जेल कट्टू रामपाल के द्वारा दी जाने वाली नाम दीक्षा। ठीक है। आगे चलते हैं। अच्छा अब जो है यह कहता है 51 18 में तत्वज्ञानी कि तत्वज्ञानी जो होता है वह समदर्शी होता है। यही तत्वज्ञानी कहता है कि ब्रह्मा विष्णु महेश की पूजा करने वाले नीच होते हैं। ये कैसा समदर्शी? समदर्शी मतलब सबको एक समान देखने वाला। मगर यह तो ऊंचानीचा कर रहा है। अगर हमारा सिद्धांत है तो उसमें व्यवहार और परमार्थ के भेद से परमार्थ की दृष्टि से देखें तो सब तत्व की दृष्टि से देखें तो सब उसमें समदर्शिता आ जाती है। और व्यवहार के जिसके साथ जो जैसा

00:15:31:06 व्यवहार कर रहा है उसके अनुसार व्यवहार हो जाता है। मगर तुम्हारे यहां तो एक ही एस्पेक्ट है। एक ही डायमेंशन है। पर व्यवहार परमार्थ का कोई भेद नहीं है। ये सब गढ़ विषय है। तुम्हारे बल्ले नहीं पड़गी। रामपालियों सीधी बात है कि तत्वज्ञानी वो होता है जो 5 18 के अर्थ में ले तत्वज्ञानी जो होता है वो सब में एकता देख एक समान देखता है नहीं देखता भाई तू बबिता को अलग देखता है और तेरी बेटी जो आकर के तेरे पैरवैर छूती है उसको तू अलग देखता है अभी कुछ दिन पहले हुआ था कि सौम्य सौम्या माथुर ने क्या किया था कि वो समझ नहीं पाई थी कि वो इसकी बेटी क्योंकि इसके पास आकर के महिलाएं ऐसी चीजें करती हैं और इसका नाम ऐसा उड़ा हुआ है अखबारों के जरिए से बबीता इत्यादि के साथ तो वो इसकी जब स्वयं की सगी पुत्री ऐसा कर रही थी तो सौम्या माथुर को गलती हो गई। उसने कहा देखो देखो कि जो बूढ़ी है अधेड़ उम्र की औरत औरतें हैं उन पर महिलाएं हैं उन पर ये ध्यान नहीं दे रहा है। मगर जो बिल्कुल थोड़ा क्या कहते हैं युवावस्था में ज्यादा कम आयु वाली आई हैं तो उन पर ध्यान दे रहा है। इस तरह का कटाक्ष कर दिया था। बाद में सौम्या माथुर ने उसके लिए क्षमा भी मांगी थी उन्होंने कि मेरे से गलती हो गई। मैं जानती नहीं थी पुत्री हैं। तो बबिता में और अपनी पुत्री में अंतर करता है। फिर ये

00:16:46:09 बता कहां से किया तूने अंतर? इन सवालों का जवाब सिद्धांतवादी आचार्यों के पास होता है। है ना? तुम्हारे जैसे मूर्ख जेल कट्टू और खीर पिवैया खीर पिलाने वालों के पास नहीं होता है। जो अपनी खीर पिलाते हैं। वह खीर कहां-कहां से होकर के आती है? अखबारों के अनुसार अखबारों की बात यदि सत्य है तो रामपाल के नहाए हुए की खीर पीते हैं लोग और वो खीर कहां-कहां से होते हो के आती है जो अगर नहा रहा है कोई व्यक्ति तो आप सोच के देखिए शरीर के प्रत्येक अंग से वह जो दूध है वह बह करके आता है। अब प्रत्येक अंग में आंख, नाक, कान, गला उधर फिर गुदा द्वार सब आता है। मल त्याग का जो गुदा द्वार होता है वो भी आता है और वहां से आने वाला जो दूध है वो निकल के आता है और फिर जो है उसको भक्तगण ग्रहण करते हैं। जो अपने आप को भगत कहते हैं वो ग्रहण करते हैं। ऐसा अखबारों के अनुसार बताया गया है। अब बाकी उसमें कितनी सच्चाई है बाद की बात है। तो तो समदर्शी की बात हो गई। जिसका मन जो तत्वज्ञानी होता है वह

00:17:54:07 समदर्शी होता है। मगर यहां तो ये ऊंचनीच देख रहा है। भविता में अपनी पुत्री में अंतर कर रहा है। अच्छा और आगे चलते हैं। तो जिसका मन समदर्शी है वह पूर्ण ब्रह्म में स्थित है। अब ये पूर्ण ब्रह्म में स्थित होने वाली बात बता दे भाई। पूर्ण ब्रह्म में स्थित होने वाली बात तू बता पाएगा कभी? नहीं बता पाएगा। इसकी विवेचना ही नहीं कर पाएगा। पूर्ण ब्रह्म में स्थित होने की बात है कि जिसका मन रमा हुआ हो भगवान की भक्ति में जो अपने विचारों से अपनी आत्मा से भगवान में संलग्न हो भले ही उस शारीरिक रूप से वो इधर-उधर जाता हुआ दिखाई दे रहा हो पर मन से सदैव वो भगवान के साथ अटैच्ड हो। यह तो यह रही बात। मगर तुम जैसे मूर्ख तो यह कहते हो ना कि भगवान ने भगवान तो अर्जुन के पास ही खड़े थे। 1866 तुम तो वह मूर्ख हो ना जो कहते भगवान तो उसके पास ही खड़े थे। फिर वो कहां जाने को कह रहे हैं भगवान अर्जुन से? कहां जाने को कह रहे जब वो उसके पास में है स्वयं तो यानी कि तुम्हारे लिए क्रिया एक ही होती है। गत्यार्थक भौतिक रूप से ही तुम्हारे क्रिया होती है। मनन चिंतन वाली क्रिया नहीं होती है। ज्ञानार्थक होती नहीं है। क्योंकि

00:19:09:13 ये यहां पर ये ज्ञानार्थक क्रिया में लेंगे स्थित होना तो तो चल जाएगा। वरना कैसे स्थित हो रहा है? घुस रहा है क्या तुम्हारे परमेश्वर के कबीर के अंदर? तुम्हारे यहां तो अद्वैत भी नहीं है जो घुसने वाली बात हो। कबीर के अंदर घुस रहा है क्या? कि वही उसी वो जो खीर जहां से होकर आती है उसमें घुस रहा है। कहां घुस रहा है? यह सोचने वाली बात है। यह स्थित होने का अर्थ कर पाएंगे तुम्हारे बुऊ। इसी में फंस जाएंगे। दो-तीन जन्म लग जाएंगे। इसी में इसी में पकड़ लूंगा तो जीभ बिल्कुल सूख जाएगी। इसलिए अपनी खैर चाहते हो तो कभी भूल करके शिवश नारायण द्विवेदी के सामने आने की हिम्मत मत करना। यह रामपाल के लिए उसकी गैंग की तो बाद दूर है ना मत पड़ो चक्कर में कोई है नहीं टक्कर में बस अपना वो कपड़े की दुकान जो चलाते हो ना काउंटर लगा के कपड़े की दुकान चलाते हो खड़े हो के जैसे आदमी नहीं यहां कौन सी दिखाऊं सिल्क दिखाऊं बनारसी दिखाऊं काजीवरम दिखाऊं इस तरह से खड़ा हो खड़ा हो जाता है काउंटर के बगल में वो इसका वो है प्रवचन पॉइंट वहां प्रवचन देता है तो जिसका मन समदती समदर्शी है वह ब्रह्म में स्थित यहां पर ब्रह्म का अर्थ इसने सच्चिदानंद स्वरूप लिया। जबकि यह ब्रह्म कहते हैं काल को। 520 में जो

00:20:24:14 सुखदख को परमात्मा की रजा समझता है। 520 में इसने मान लिया है कि तत्वज्ञानी को भी दुख होता है। जबकि यह दावा करते हैं अपने लोगों को बहकाने के लिए, अपनी खीर पिलाने के लिए अ कि जो उसकी शरण में आ जाएगा रामपाल की शरण में उसको दुख नहीं होगा। जबकि यहां पर क्या है? दुख तो होगा मगर वो यह समझेगा कि यह तो सब भगवान की मर्जी है। है ना? तो प्रत्येक आस्तिक यही समझता है। जो भी आस्तिक है वही समझता है कि भगवान की मर्जी से ही हुआ जो हुआ है। और उसमें मेरे अपने कर्म है। तो दुख तो होगा। यह बात मान ली रामपाल ने। नोट कर लेना। ऊपर मान लिया कि परमात्मा किसी शुभ कर्म का फल नहीं देता। नीचे मान लिया 5:20 में कि सुखदख होता है रामपालियों को भी होता तो है वह मान रहा है यहां पर लिखित रूप से वो तो होता ही है सुबह संडास जाता ही होगा रामपाल गैस बनती ही है उसके दिख रहा है उसकी शक्ल से है ना पेट में दर्द ऐंठन इत्यादि होती होगी रोते-रोते आंखों की बीमारी के लिए तमाम बुढ़ापा दिखाते हुए भीख मांग करके बाहर आया है तो दुख तो होता है अच्छा 5 24

00:21:39:06 ब्रह्म का अर्थ इसने फिर से 52 24 में मान लिया पूर्ण परमात्मा जबकि यह लोग कहते हैं ब्रह्म अलग है और सच्चिदानंद जो परमेश्वर है सच्चिदानंद स्वरूप सच्चिदानंद घन ब्रह्म वो अलग है। परम ब्रह्म अलग है। तो यहां ब्रह्म का अर्थ फिर मान लिया पूर्ण परमात्मा। अच्छा नाम दीक्षा से संशय कट जाते हैं। नाम दीक्षा मिलने से संशय कट जाते हैं। और इसी 5:25 में इसने कहा है नाम दीक्षा जिसको मिल जाती है उसके संशय कट जाते हैं। अब जरा सोच के देखो इनके जो सूखे हुए छुआारे जैसे चेहरे वाले लोग आते हैं चर्चा करने उनके संशय कट चुके हैं क्या? जो डडियल युवराज सिंह है और जो सचिन वगैरह हैं गंजा इन लोगों के संशय कट चुके हैं। क्यों नहीं आते पता है मेरे सामने? इनको मालूम है यह ऐसी ज्ञानार्थक कुटाई करेगा ना वह सब कोई काम नहीं आएगा पीछे गन मैन खड़े खड़े करना बिल्कुल ऐसी ज्ञानार्थक कुटाई कि रात में सोते समय भी मेरे सपने आएंगे कि वो कौन सा समय था बुरा जो मैंने ये सोच लिया कि मैं शिवाश नारायण द्विवेदी के सामने चला जाऊं वास्तविक सनातनी के सामने चला जाऊं इसलिए नहीं आते तो इनका संशय कट चुका है तो पवन दास से बात हुई थी बत्ती ही बाहर

00:22:54:07 आ गई थी। संशय संशयात्मक प्रश्न है ना कि कबीर जब सृष्टि बना रहा है तो कहां खड़ा है? वो सृष्टि किसने बनाई तो फेल हो गए। फिर तो इस पर कहने लगे भैया ऐसा है आग लगा दूंगा उसमें देख लेंगे। जिसका परमेश्वर सत्य होगा वो यानी कि संशय नहीं कटे हैं। अब तो सीधे आस्था की बात है। संशय नहीं कटे तुम्हारे। ठीक है? तो तत्व ज्ञान की बात मत करो। तुम पंचल जोड़ो। पंच ज्ञान लोगों को दो अपना। तो यहां पर 5:25 में इसने कहा नाम दीक्षा से संशय कट जाते हैं। अच्छा इसी में इसने ये कहा है कि जो काल ब्रह्म है वो उग्र है। काल ब्रह्म तो उग्र उग्र है। उग्र। अच्छा ये उग्रता एक्सिस्ट कहां करती थी? काल ब्रह्म तो था नहीं इस दुनिया में। तो उग्रता भी नहीं थी। तो काल ब्रह्म निकल के कहां से आया है? किसने बनाया? काल ब्रह्म को। काल ब्रह्म को किसने बनाया? कबीर ने। तो कबीर के पास काल ब्रह्म नहीं था। यानी कि काल ब्रह्म जो जो चीजें कर रहा है वह कबीर के पास नहीं थी। अच्छा वो छोड़ो। काल ब्रह्म को जो शक्ति दी है उग्रता वाली यह कहां था? यह कहां था? किसने बनाया? काल ब्रह्म के पास अपने आप कुछ आ गया। यानी काल ब्रह्म अपने आप स्वयंभू

00:24:09:20 है क्या? और उत्पत्ति, स्थिति और लय लय करने में उग्रता नहीं चाहिए। लय कैसे करोगे? प्रलय कैसे आएगी? सृष्टि समाप्त कैसे होगी? तुम्हारे यहां तो एक ही बार होती है। वह बात अलग है। काल ब्रह्म बार-बार बार-बार जन्म भी लेता रहता है। अरे भाई एक बार काल ब्रह्म ने जब गलती कर दी तो फिर क्यों बना रहे हो काल ब्रह्म को? कि 70 बार जब शिव जी शिव जी के प्राण छूट जाते हैं उसके बाद एक बार काल ब्रह्म का अंत होता है। तो फिर क्यों बनाता है कबीर? काल ब्रह्म और उसके मरने के बाद कहां ये लोग कहां जाते हैं? जो फंसे हुए हैं। उस बीच काल ब्रह्म के मरने से लेकर काल ब्रह्म के दोबारा जन्म होने के बीच में ये लोग कहां जाते हैं जो काल ब्रह्म ने फंसा रखे हैं। हम मुंह सूख जाएगा मुंह पांच 26 के अर्थ में इसने कहा है कि परमात्मा इसने मान लिया परमात्मा पहले मान लिया सर्वव्यापक है। उसके बाद कहता है यानी उसकी सत्ता सब जगह है। अब यहां पर वही वाला प्रश्न फस जाएगा वह अब्रामिक आईडियोलॉजी वाला कि सत्ता और उसमें अगर अंतर होगा तो एक रस नहीं कहलाएगा विकार वाला हो जाएगा

00:25:21:13 और उसकी यहां पे इसने चतुर ये तो एक अलग विषय मगर सत्ता जब मान ली तो उसने काल पर भी अपनी सत्ता मान ली 5 26 में काल पर कबीर की सत्ता यानी काल जो भी कर रहा है जो भी सोच रहा है कुछ भी हो रहा है उस पर सत्ता है उसकी यानी उसकी अनुमति के सीमा के अंदर है काल ब्रह्म का कुछ भी। ठीक है? और वहीं पे काल को जो है मन कहा गया है। और यह कहा गया कि काल जो मन को जो जीत लेता है वह पार लग जाता है। तो काल को जीतना है क्या? क्योंकि मन तो काल है। काल से जीतेंगे कैसे? काल का तो वैसा घटिया स्वरूप है।

00:26:08:21 फड़ पंचर ज्ञान पंचर करने वालों सीट की पेटी और कमर की बेल्ट बांध एक नंबर का फड़ ज्ञान है इस ज्ञान को सुनने समझने के लिए भी गुर्दा चाहिए गुर्दा अच्छा तो ये हो गई अभी तक अपनी मर्जी आगे चलते हैं अब जो है मेन कोर्स पे आ जाते हैं तो इसकी गरिमा गीता का पृष्ठ ये अभी तक बुलेट पॉइंट्स हो गए। ठीक है? बुलेट पॉइंट्स आप लोग कट कर करके डाला करिए।

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00:26:39:27 तो बुलेट पॉइंट्स हो गए अभी तक के। अब आ जाइए पष्ठ क्रमांक 102 पर। हां, 102 में चालू हो रहा है यह। अध्याय पांच के श्लोक एक में अर्जुन ने प्रश्न किया कि कर्म सन्यास और कर्म योग में कौन सा श्रेष्ठ है? ठीक है? हम लोग अपना भी पढ़ते जाएंगे। भगवत गीता जय दयाल गोविंद का जी की पढ़ रहा हूं मैं भगवत गीता गीता प्रेस की।

00:27:23:27 अर्जुन बोले हे कृष्ण आप कर्मों के सन्यास की और फिर कर्म योग की प्रशंसा करते हैं। यह बात इसने पचा ली क्योंकि इसको अपने अनुसार चीजें फिट करनी है इसलिए ये चीजें काट दी इसने। क्यों नहीं बताता भाई? आप कर्मों की कर्मों के सन्यास की और फिर कर्म योग की प्रशंसा करते। कर्मों का सन्यास क्या कि कर्मों के प्रति मतलब कर्म से सन्यास लेना कर्म से निवृत्त हो जाना और फिर कर्म योग एक तो कर्मों से दूर रह के मुक्ति के पथ पर चलना और एक कर्म यानी ये समझ लीजिए गृहस्थ मान लीजिए इसको एक गृहस्थ संसार से दूर रह के मुक्ति के पथ पर चलना और एक गृहस्थ संसार में रह के मुक्ति के पथ पर चलना। ठीक है? जैसे सुखदेव जी को मान लीजिए सन्यास वाला मामला और जनक जी को मान लीजिए गृहस्थ वाला मामला। तो यहां पर कह रहे हैं अर्जुन जी कि आप कर्मों के सन्यास की और फिर कर्म योग की प्रशंसा करते हैं। इसलिए इन दोनों में से जो मेरे लिए श्रेष्ठ श्रेष्ठ है तो वो आप मुझे बताइए। मैं पहले अभी अपना वाला जो है पूरा बता दे रहा हूं आपको। गीता क्या कह रही है? वास्तविक रूप में गीता क्या कह रही है? तो फिर भगवान कह रहे हैं कि कर्म सन्यास

00:28:39:08 और कर्म योग यह दोनों ही परम कल्याण के करने वाले हैं। परंतु उन दोनों में से भी कर्म सन्यास से कर्म योग साधन में सुगम होने से श्रेष्ठ है। मतलब पहली बात तो यह है कि इस कर्म सन्यास क्या है? कि गुण ही गुण में बरत रहे हैं। इस प्रकार से कर्म होते हुए उनको साक्षी भाव से देखना और उसमें कर्तापन ना रखना। यानी कि अद्वैत सिद्धांत को धारण करते हुए जब व्यक्ति कर्म

00:29:12:24 व्यवहार करता है तो वह हो गया कर्म सन्यास। ठीक है? और एक होता है द्वैत भाव को रखते हुए जिसमें जिसमें वो यह सोचता है कि मैं कर्म तो मैं ही कर रहा हूं। कर्तापन अपने को मानता है। परंतु वह यह सोच करके करता है कर्म कि मैं यह कर्म भगवान के लिए कर रहा हूं। अनासक्त होकर के कर्म करता है कि मुझे उनका फल नहीं चाहिए। तो फल ना चाहने के रूप में भगवान को अर्पित करते हुए कर्म करने के रूप में वो हो गया कर्म योगी और यह सोचते हुए कि गुण ही गुण में बरत रहे हैं। साक्षी भाव से अपने कर्मों को देखना यह हो गया कर्म सन्यासी। द्वैत भाव वाला कर्म योगी और अद्वैत भाव वाला कर्म सन्यासी। तो इसमें आगे

00:29:58:09 आगे चल रहा है कि साधन में सुगम। अब क्या है यह वाली बात कि ऐसा सोच पाना कठिन होता है कि मैं नहीं कर रहा हूं। तो यह वाली बात कठिन होती है। सन्यासत्व आ जाए। है ना? विरक्तता तो मुझे भूख लग रही है या बहुत सारी इंद्र इंद्रिय विषय हैं। उन सबका पर्यावसान आप भगवान के चरणों को बना दो। तो ये हो गया द्वैत कि मेरा जो भी कर्म है भगवान के लिए है। ठीक है? और एक केवल साक्षी भाव से देखना देख पाना उसको और ज्यादातर कर्मों से निवृत्त हो जाना यह हो गया द्वैत भाव। तो यह थोड़ा कठिन होता है। इसलिए साधन में सुगम होने के कारण यह जो है गृहस्थ संसार से होते हुए निकलना मुक्ति के पथ पर चलना उसके आगे की स्टेज में वह आना ही है सन्यास वो भी बात है। तो डायरेक्ट सन्यास की ओर जाना वह कठिन है। ठीक है? तो यहां पर यह कहा जा रहा है। इसके बाद चार में कह रही है गीता कि उपयुक्त सन्यास और कर्म योग को मूर्ख लोग पथक पथक फल देने वाला कहते हैं ना कि पंडित जन। तो मूर्ख होते हैं जो अलग-अलग फल देने वाला कहते हैं। कठिन है जो वाला सन्यास है कर्म सन्यास वह कठिन जरूर है मगर अलग-अलग फल देने वाला है।

00:31:13:15 यह ऐसा सोचना गलत है क्योंकि दोनों में से एक में भी सम्यक प्रकार से स्थित पुरुष दोनों के फल स्वरूप परमात्मा को ही प्राप्त होता है। सन्यास का मार्ग भी वास्तविकता में तत्व बोध ज्ञान प्राप्ति है और इसमें भी आगे जाकर के ज्ञान प्राप्ति है। इसमें भी आगे जाकर के विरक्तता आएगी ही दोनों में। यह हमारी गीता कह रही है। अच्छा अब यह क्या कह रहा है? अब देखो इसका कचरा इसका कचरा अब चालू होगा। यह क्या कह रहा है? अब पहले इसने कर्म सन्यास का विवरण दिया है। कर्म सन्यास क्या है? कर्म सन्यास दो प्रकार का होता है।

00:31:47:10 एक तो सन्यास वह होता है जिसमें साधक परमात्मा की प्राप्ति के लिए प्रेरित होकर घर त्याग कर हटके जंगल में बैठ जाता है। विरक्तता तथा शास्त्र विधि रहित साधना करता है। दूसरा घर पर रहते हुए भी हठ योग करके घंटों एक स्थान पर बैठकर शास्त्र विधि त्याग कर साधना करता है। यह दोनों ही कर्म सन्यासी

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00:32:09:01 कर्म सन्यासी हैं। मतलब अब इसने क्या किया कि घर पर रहते हुए वाले को अगर वह हठ योग कर रहा है तो हठ पहली बात तो यह है कि प्रयास पूर्वक अपनी इंद्रियों को कंट्रोल करने का प्रयास नहीं किया करना चाहिए। इसके हिसाब से तो इस मैंने इस ये वाला जो एपिसोड है इसका नाम क्यों रखा है कि रामपाल का ग्रस्त संसार तो रामपाल का जो कहना है कि हठ पूर्वक अपनी इंद्रियों पर कंट्रोल नहीं करना चाहिए इसकी निंदा कर रहा है कुल मिलाकर के इसने कई जगह की है छठवें अध्याय में भी की है तो इसका मतलब यह है कि अगर यह किसी स्त्री के प्रति आसक्त होता है रामपाल तो यह अपने आप को जबरदस्ती नहीं रोकता ठीक है और इनके जितने लोग हैं चुवा भगत वो सब अगर किसी स्त्री के प्रति या मदिरापान के प्रति या किसी भी दुर्वसन के प्रति आसक्त होते हैं तो वो अपने ऊपर कंट्रोल नहीं करते नहीं कंट्रोल करो वो प्रयास पूर्वक अपने आप को नहीं रोकते हो गए आसक्त तो हो गए लट्टू बबिता पे बबिता पे लट्टू हो गए तो हो गए अगर अखबार में छपी खबर के अनुसार गुदा द्वार से बहकर आने वाले दूध की खीर खाने के लिए आसक्त हो गए तो हो गए अब रोकेंगे नहीं नहीं नहीं खीर नहीं खानी है भाई यह कैसे मल मल

00:33:24:02 त्याग का जो द्वार वहां से बह के दूध आ रहा है। उसकी खीर बन रही है। तो नहीं नहीं आसक्त हो गए तो हो गए। तो यह लोग रोकेंगे नहीं क्योंकि हठ योग इनके यहां पर निषेध है। ठीक है? तो पहली बात तो यह हो गई। फिर आगे यह कह रहा है कर्म योग का विवरण क्या है?

00:33:39:15 यह भी दो प्रकार का होता है। एक तो बाल बच्चों सहित सांसारिक कार्य करता हुआ शास्त्र विधि अनुसार भक्ति साधना करता है या शादी ना करवा करवा शादी ना करवा करके घर पर या किसी आश्रम में रहता हुआ सांसारिक कर्म अथवा अर्थात सेवा करता हुआ शास्त्र विधि अनुसार साधना करता है। तो

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00:33:58:19 इसने क्या किया? कर्म सन्यास को शास्त्र विरुद्ध बता दिया। ठीक है? कर्म सन्यास को शास्त्र विरुद्ध बता दिया कि जो शास्त्र विरुद्ध तरीके से करता है वह कर्म सन्यास है और जो शास्त्र सम्मत तरीके से करता है वो कर्म योग है। ठीक है? समझ रहे हैं ना? उसमें कर्म सन्यास में गृहस्थ भी है और विरक्त भी है। और इधर कर्म योग में गृहस्थ भी है और विरक्त भी। जबकि गृहस्थ क्या है? कर्म योग और विरक्त क्या है? कर्म सन्यास। दूसरी प्रकार अच्छा एक कर्म योगी इसने यह भी माने जो बाल बच्चों में रहते

00:34:36:00 हैं तथा शास्त्र तथा साधना शास्त्र विधि विरुद्ध करते हैं या शादी ना करवाकर किसी अब

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00:34:43:13 यह देखो पंचर करने वाली बातें क्या है इसने कर्म सन्यास में शास्त्र विरुद्ध चीजों को ले लिया कि वो जंगल में जाकर रहेंगे घर त्याग कर रहेंगे शास्त्र विधि के विरुद्ध करेंगे वो कर्म सन्यास है ठीक है इसने यह मान लिया इसके बाद इसने यह भी कह दिया के घर में रह के हठ पूर्वक अपनी इंद्रियों को कंट्रोल करेंगे। वह भी संयमित रह के जीवन जिएंगे। शास्त्र विधि के विरुद्ध वो भी कर्म सन्यास है। यानी कि यह जो शास्त्र विधि के विरुद्ध इसने यह कह दिया कि इसको कहते हैं कर्म सन्यास। भले ही वो विरक्त होकर के रहे या फिर गृहस्थ होकर के। उसके बाद कर्म योगी की व्याख्या बता दी कि जो शास्त्र विधि के अनुसार चाहे विरक्त हो करके रहे चाहे गृहस्थ होकर के रहे वह कर्म योगी है। मगर फिर कर्म योगी को भी यह बता रहा है कि यदि यदि कोई व्यक्ति गृहस्थ होकर के या गृहस्थ होकर के या विरक्त हो के शास्त्र विधि के विरुद्ध अगर करेगा वो भी कर्म योगी कहलाता है। अरे दिमाग पंचर वाले फिर तूने कर्म सन्यास को क्या कहा है? फिर फिर कर्म सन्यास में कर्म योगी में अंतर क्या रह गया पंचर दिमाग वाले इसलिए कहता हूं आप लोगों से कि यह सीरीज जिसको भी सुननी समझनी है वो अपने

00:35:58:16 झंडू बाम इत्यादि लेकर के बैठे इसी से ले आओ कोई सर दर्द का कोई बाम इत्यादि इसने बनाया हो अपने यहां वो बढ़िया बनाया होगा इसने झंडू तो है ही है तो बाम बनाने में क्या दिक्कत है तो झंडू बाम लेके बैठा करो इसने शास्त्र विधि के विरुद्ध चीजें करना गस्त और विरक्त दोनों को कर्म सन्यास का नाम दे दिया और शास्त्र विधि के अनुसार गृहस्थ या विरक्त दोनों को कर्म योगी नाम दे दिया। फिर कर्म योगी में भी लिख दिया कि वो वो भी कर्म योगी कहलाता है जो शास्त्र विधि के विरुद्ध जाकर के यह दोनों चीजें करता है। गस्त हो या विरक्त पागल है पागल और इसके द्वारा वो तत्व ज्ञान प्राप्त करने वाले सूखे मुके छुआारे वो भी पागल है। आगे चलते हैं। अब ये कह रहा है कि कर्म सन्यासी से कर्म योगी उत्तम है। वहां वह कह रहे हैं कि साधन में सुगम होने के कारण श्रेष्ठ है क्योंकि इसमें जाना सरल है। गृहस्थ होते हुए पार करना नदी को क्योंकि हमारी इंद्रियां हमें खींचती है ना तो गृहस्थ आश्रम से होते हुए जाना उनको धर्म के द्वारा संयमित रहते हुए निकलना वहां से वह ज्यादा सुगम होता है। तो वो इसलिए सुगमता के कारण एक नंबर ज्यादा है। फल दोनों का सेम है। यदि किसी के जीवन में स्वतः

00:37:13:25 विरक्तता आ रही है तो वो उसका मोस्ट वेलकम है। अगर हठ पूर्वक विरक्तता लेकर के वो छोड़ गई मुझे अब मैं मुझे संसार से कोई लाभ नहीं मैं जा रहा हूं तो अगर ऐसी चीजों के लिए कर रहा है तो यह जो है वो विरक्तता नहीं है जो उसके स्वभाव से उत्पन्न हो गई खैर तो अब ये पांच एक का अब ये जो है

00:37:46:12 पांच एक का इसने अनुवाद कर दिया और केवल हिंदी में लिखा है कि एक ओर तो कर्मों के सन्यास के महिमा मंडन कर रहे हैं। दूसरी ओर कर्म के योग यानी कर्म के कर्मों के संयोग की अर्थात कर्म करने की प्रशंसा कर रहे हैं। इन दोनों में से जो एक मेरे लिए कल्याणकारक हो वह सुनिश्चित करिए। अब पांच दो पे आते हैं। पांच दो पे अब ये क्या कह रहा है? पांच एक का उसने सही कर दिया। हम लोग ये जो पहले देख रहे थे ना कि भाई इसने बात नहीं की है सन्यास से सन्यास की प्रशंसा और फिर कर्म योग की प्रशंसा कर्म सन्यास की प्रशंसा फिर कर्म योग की प्रशंसा दोनों यानी एक तरीके से गृहस्थ और विरक्त दोनों की प्रशंसा तो वो इसने बाद में अनुवाद किया है। ठीक है? फिर अब ये पांच दो के अर्थ में क्या कह रहा है? गीता अध्याय पांच श्लोक दो का भावार्थ है कि तत्वदर्शी संत के अभाव में जो शास्त्र अब ये यहां पर अनुवाद तो किया ही नहीं है इसने पांच दो का सीधे अनुवाद तथा भावार्थ मिक्स कर दिया क्योंकि यहां पर अनुवाद में क्या करेगा शब्दार्थ तो कर नहीं पाएगा वो तो इसके बिल्कुल उलट है तो फिर इसने क्या कर दिया कि

00:39:02:02 तत्वदशी तत्वदर्शी संत के अभाव से जो शास्त्र विरुद्ध साधक है वह दो प्रकार के हैं एक तो कर्म ब्रह्म सन्यासी और दूसरे कर्म योगी दोनों की साधना अमंगलकारी है। ना करने वाली अर्थात व्यर्थ है। क्योंकि गीता अध्याय 16 23 अरे भाई तू यहां पर पहले पांच दो का हिंदी अनुवाद तो कर। इसमें ये सब बातें तो आए ना करने योग्य है। यह है फलाना ढिमका है। या तो ये कह दे ये श्लोक प्रक्षिप्त है। या तो ये कह दे काल ने अपने मन से बोला। मगर कितने श्लोकों को कहेगा? इसलिए हर जगह दूसरी चीजें लाने ला के और जो यहां की चीज है उसको मिटाने की कोशिश करता है कि कितने श्लोकों को मैं डिनाई करूंगा। यहां पर ऐसी कोई त्यागने की बात हो ही नहीं रही है। पांच दो में पांच दो में भगवान तो यह कह रहे हैं कि कर्म सन्यास और कर्म योग दोनों ही परम कल्याण को परम कल्याण के करने वाले हैं। परंतु उन दोनों में से भी कर्म सन्यास सन्यास श्रेष्ठ है। साधन में सुगम होने की वजह से। इसमें कहां आ गया कि इनको नहीं करना इनको नहीं करना है। अगर 16 23 के आधार पर काटना है तो तू यह कहना है श्लोक गलत है। मगर दिमाग को पंचर करने वाला ज्ञान फड़ ज्ञान फड़ ज्ञानी जेल कट्टू वो ऐसा क्यों करेंगे?

00:40:17:08 है ना? तो क्या कह रहा है कि क्योंकि गीता अध्याय 16 23 में कहा है कि शास्त्र विधि को त्याग कर जो मनमाना आचरण अर्थात पूजा करते हैं उनको लाभ नहीं होगा। 24 में कहा है कि पूर्ण मोक्ष के लिए जो साधना त्यागने की

00:40:30:04 है अर्थात ना करने वाली है तथा जो करने वाली है उनके लिए शास्त्रों को ही प्रमाण मानना चाहिए। तो

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00:40:39:03 यह यह जो बताया जा रहा है कर्म सन्यास और कर्म योगी यह कट कहां से गया जो इसको प्रमाण ना माने कहां से कट गया वो कटने की बात इसने नहीं कही है कि क्यों कट गया और यहां पर वो वाला प्रश्न आता है कि जब गीता इन साधनाओं को काटने की बात कर रही है ब्रह्मा विष्णु महेश के निषेध कर रही है गीता पुराण भी निषेध कर रहे हैं वेद भी निषेध कर रहे हैं तो ब्रह्मा विष्णु महेश की पूजा आई कहां से एकिस्ट में कहां किसने किस कारण पर चालू किया करना ये भी सोचने वाली बात है

00:41:19:27 ठीक है आगे चलते हैं क्योंकि इसने बार-बार हमारे शास्त्रों में यही बताया है ये नहीं करना ये नहीं करना है वो नहीं करना है इसका मतलब ये शास्त्र इस रूप में लिखे गए हैं कि ये ये नहीं करना है तो इन जिन चीजों को ना करने की बात शास्त्र कर रहे हैं वो चीजें एकिस्टेंस इसमें आई कहां से? अस्तित्व में कैसे आई है पूजा? और उसका प्रमाण क्या है? तो तुम करोगे ठेंगा। तुम्हारे पास है ठेंगा। अब इसने आगे उदाहरण दिए हैं कुछ तो मैं एक आध उदाहरण लूंगा और फिर सीधे इसकी जो इसने मक्कारी की है गीता का अर्थ करने में उस मक्कारी पे आ जाऊंगा। पृष्ठ संख्या 108 निकालिए आप। अब इसने बार-बार यही बताया कि जो सन्यास है वो बेकार है। व्यर्थ की चीज है। यानी सन्यास नहीं होना चाहिए। जबकि गीता में भरभर के सन्यासी है मगर सन्यास नहीं होना चाहिए और फिर कहीं-कहीं पर मान मिलेगा सन्यास होना चाहिए। जैसे कर्म योगी की व्याख्या करते हुए मान लिया कि शास्त्र विधि के अनुसार यदि सन्यास है तो वो ठीक है। फिर कर्म योगी की व्याख्या करते हुए मान लिया कि यदि आप शास्त्र विधि के विरुद्ध जाकर के भी सन्यासी हो रहे हो तो भी आप कर्म योगी कहलाओगे। पागल व्यक्ति है। पागल हां अब इसने

00:42:36:16 पांच अध्याय के पांच श्लोक तीन के शास्त्र में ये कह रहा है हिंदी कर रहा है नीचे है भावार्थ हां इस

00:42:47:10 अध्याय पांच श्लोक तीन में शास्त्र विधि अनुसार साधना करने वाले कर्म योगी का विवरण है जो श्रद्धालु भक्त चाहे बाल बच्चों सहित है या बाल बच्चों सह रहित है या किसी आश्रम में रहकर सतगुरु व संगत की सेवा में रत

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00:43:01:27 है वह सर्वथा राग राग द्वेष रहित होता है। वो बात और है कि इनके यहां जो है फिर डंडे चलते हैं। फिर गन मैन लेकर खड़े होते हैं। राग द्वेष रहित होते हैं। ये क्योंकि वह सेवा कर रहे हैं वहां पर गन मैन के साथ। अच्छा किसी आश्रम में सद्गुरु

00:43:19:03 व संगत की सेवा में रत है। वह सर्वथा राग द्वेष रहित होता है। वास्तव में वही सन्यासी है।

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00:43:24:00 वो सन्यासी हो गया। ठीक है भाई हो गया। वही फिर अन्य शास्त्र साधकों को पूर्ण निश्चय के साथ सत्य साधना ज्ञान बताता है। जबकि हमारी जो वास्तविक अर्थ है वह क्या बता रहा है कि जो पुरुष ना किसी से द्वेष करता है ना किसी की आकांक्षा करता है वह कर्म योगी सदा सन्यासी ही समझने योग्य है। अब यहां पे यह जो सन्यासी है यह किस प्रकार का सन्यासी है? जो द्वैत भाव में रहते हुए भी जो कर्म कर रहा है और उसमें अपने आप को कर्ता मान रहा है उससे मिलने वाले फल के प्रति अनासक्त है इसलिए वह सन्यासी सन्यासी ही मानने योग्य तो यहां उस रूप में सन्यासी कहा गया क्योंकि राग द्वेष आदि द्वंदों से रहित पुरुष सुख पूर्वक संसार बंधन से मुक्त हो जाता है। ठीक है?

00:44:12:16 तो यहां पर इसने कर दिया कि या तो वह सहित रहे या रहित रहे, ग्रस्त रहे या विरक्त रहे। जंगल वाला तो बिल्कुल काट दिया इसने। जंगल वाला नहीं या तो अपना नौकरी करके कमा के मुझे लाके देते रहो और या फिर मेरे आश्रम में सेवा करो। ये दो चीजें कर सकते हैं। रामपाल के भगत जंगल में जाके वो नहीं करना है। तप वो मत करना। ठीक है? और प्रसन्न इनका भगवान उसी पे होता है जो सब कुछ छोड़ के तप करता है। जैसे उसने किया था इनके काल ने। उसने तप किया तो उसको दे दिए फलाने ब्रह्मांड फलाने ब्रह्मांड यह दे दिया उसके बाद इन रामपालियों का कोई ऐसा बाप नहीं है जो किसी भक्त को ऐसी चीज दे पाया हो जो उसको मिली थी काल को तप करने पर सब कुछ छोड़ के तप करने पर है ना इन्हीं के अनुसार ठोको ताली खैर अब अध्याय पांच के श्लोक चार में ज्ञान योगी व गृहस्ती दोनों की एक ही उपलब्धि बताई है यदि

00:45:11:22 कोई कहता है कि ज्ञान योगी श्रेष्ठ या गृहस्ती श्रेष्ठ है। वह पंडित नहीं है। यदि दोनों की भक्ति शास्त्र अनुकूल है तथा गुरु मर्यादा में रहते हैं तो दोनों ही सफल है। यदि भक्ति शास्त्र विधि अनुसार नहीं है तो वह चाहे गस्ती है या ज्ञान योगी है दोनों ही असफल है। स्वयं भगवान कह रहे हैं। वैसे यह खुद कह रहा है। तो रामपाल की गीता में प्रमाण है भगवान श्री कृष्ण भगवान है। ठीक है? स्वयं भगवान कह रहे हैं कि शास्त्र विधि रहित साधक कर्म सन्यासियों से कर्म योगी

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00:45:46:26 गस्ती उत्तम है। अब यहां पर इसने क्या माना है? देखो इसका पंचर कर देने वाला ज्ञान नोट करना। अध्याय पांच के श्लोक चार में इसने ठीक ठीक अनुवाद कर लिया है। थोड़ा सा मिक्स किया है कि चाहे वह गृहस्थ हो या विरक्त हो। ठीक है? ज्ञान योगी हो या कर्म योगी हो। दोनों की भक्ति शास्त्रानुकूल है। हालांकि यह चीज नहीं यह शास्त्रानुकूल शास्त्रानुकूल इसलिए कहता है कि वह मेरी वाली चीज अपाइड हो जाए। मगर चलो ले लेते शास्त्रानुकूल तथा गुरु गुरु मर्यादा में रहते हुए दोनों ही सफल है। यह तो हम भी मानते हैं भाई कि जो परंपरा प्राप्त आचार्यों द्वारा बताई गई चीजें हैं उनके उनके साथ में जब आप गृहस्थ या विरक्त हैं तब जो है आप आपके लिए फलदाई है। मगर इसने क्या किया यहां पर लगभग लगभग अनुवाद वैसा ही माना जो अनुवाद उसका होना चाहिए।

00:46:43:18 फिर जो है मगर आगे इसने क्या किया है? पांच चार का ही अनुवाद करते हुए बताया है कि नहीं इसमें इसने मान लिया अनुवाद करते समय कि जो क्या कहते हैं ये जो कर्म सन्यास है कर्म सन्यास से कर्म योग उत्तम है क्योंकि वो सरल है यहां पे इसने मान लिया मगर आगे चलकर के ये कहने वाला रामपाल यह कह रहा है पांच चार के ही अर्थ में कि नहीं नहीं यहां पे तो भगवान ने कहा है कि कर्म सन्यास जो है नहीं करना दुखदाई है वो उसका निषेध किया गया है। यहां पर श्रेष्ठ बताया गया कि साधन में सुगम है। मगर वहां पे इसने मान लिया कि नहीं नहीं उसका निषेध किया इन्होंने। देखिए बताता हूं।

00:47:32:16 तो कर्म सन्यास में।कि कर्म सन्यास में त्याग का अभिमान होना स्वाभाविक है। अब ये इसने अपने मन से घुसेड़ दिया। घुसेड़ दिया ठोक दिया। त्याग का अभिमान होना स्वाभाविक है। तो इसका मतलब इसने जो बबिता का त्याग किया होगा रामपाल ने उसका अभिमान है इसको रामपाल को पूछना भाई रिपोर्टर्स जो पत्रकारता करते हैं इससे पूछना बबीता को त्यागने का अभिमान है कि नहीं क्योंकि तुमने बबीता को त्यागा है ना और जिन जिन लोगों ने अपने घर को त्याग करके जो इसकी खीर खाई है अखबारों के अनुसार तो उनसे भी पूछ लेना तुमको अभिमान है कि नहीं घर को त्यागने का क्योंकि भाई त्यागने का अभिमान होता है यदि आप कोई चीज त्यागोगे तो अभिमान होगा तो ये जो भी चीजें मना कर रहा है उसका अभिमान होगा

00:48:28:00 तो अभिमान होना परमात्मा प्राप्ति में पूर्ण रूप से बाधक है। अध्याय

00:48:32:28 पांच के श्लोक पांच में कहा है कि ज्ञान योगी तथा कर्म योगी एक ही स्थान

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00:48:36:28 प्राप्त करते जिनकी साधना यदि शास्त्रानुकूल है और जो कोई ऐसा जानता है उसे सही ज्ञान है। यह इसने अपने हिसाब से पंचर करने वाली चीजें बता दी। अब क्या है? अब विशेष रूप से बता रहा है। उपरोक्त अध्याय पांच श्लोक चार से पांच का भावार्थ है कि भावार्थ है कि कोई तो कहता है जिसको ज्ञान हो गया वह शादी नहीं करवाता तथा आजीवन ब्रह्मचारी रहता है। वही पार हो सकता है। इसने मतलब सन्यास की बातों को मना किया है। इसमें आगे कह रहा है कि यह पष्ठ क्रमांक वो है। हां ठीक है खुला हुआ है। तो फिर आगे कह रहा है कि जिसको वह चाहे घर रहे चाहे किसी आश्रम में रहे। कारण व्यक्ति कुछ ज्ञान प्राप्त करके अन्य जिज्ञासुओं को अच्छी प्रकार उदाहरण देकर समझाने लग जाता है। तो भोलीभाली आत्माएं समझती हैं कि यह तो बहुत बड़ा ज्ञानी हो गया। यह तो पार है। हमारा गस्थियों का नंबर कहां है? कुछ एक कहते हैं कुछ एक कहते हैं कि बाल बच्चों में रहता हुआ ही कल्याण को प्राप्त होता है। कारण गृहस्थ व्यक्ति दान धर्म करता है इसलिए श्रेष्ठ है। इसलिए कहा कि वह तो दोनों पार प्रकार के विचार व्यक्त कर करने वाले बच्चे हैं। उन्हें विद्वान ना समझो। अब खुद कह रहा है। इसलिए कहा है कि वह तो दोनों प्रकार के विचार व्यक्त करने वाले बच्चे

00:49:52:04 हैं। उन्हें विद्वान ना समझो। वास्तविक ज्ञान तो पूर्ण संत जो तत्वदर्शी है वही बताता है। यह सब कहां लिखा है इसमें? पांच चारों पांच चार से पांच में कहां लिखा है अपने मन से तो भाई यह अपना मनगढ़ंत यहां पर बताता जा रहा है कुल मिलाकर के यह पहले क्या करता है कि शास्त्र जिस चीज को कह रहे हैं उस चीज को पहले डिनाय करता है मना करता है कि चाहे विरक्त हो विरक्त इसके लिए वो है जो आश्रम में रहे अगर जंगल में रहने वाला विरक्त है तो इसके काम का नहीं है इसलिए वह तो पूर्णता निषेध है मगर आश्रम में रह के इसके हाथ पांव दबाने वाला या इसके लिए भविता जैसी व्यवस्थाएं करने वाला यदि है तो वो विरक्त ठीक है तो वो शास्त्र सम्मत है तो पहले क्या करता है कि यह कहता है कि शास्त्रों जो पहले जो विरक्त है और ग्रस्त दोनों दोनों गलत विरक्त हो चाहे ग्रस्त फिर उसके बाद कहता है कि यदि वह शास्त्रानुकूल भक्ति करते हुए कह रहा है तो विरक्त ग्रस्त दोनों स्वीकार रहे हैं। अरे भाई तो तूने जब उनको कैंसिल किया था गस्थ और विरक्त को तो तब किसने कहा था कि वो शास्त्रों के अनुसार नहीं चल रहा है या शास्त्रों के अनुसार वाला विरक्त है वो जब तू मना कर रहा है ये एक तरीके से ब्रेन वाशिंग का तरीका कि बार-बार बार-बार बार-बार अपनी वो चीज रटाते

00:51:07:10 रहो हर जगह एक ही एजेंडा वो बोलते रहो शास्त्रानुकूल शास्त्रानुकूल शास्त्रानुकूल तत्वदर्शी तत्वदर्शी तत्वदर्शी तत्वदर्शी तत्वदर्शी हम बाद में पता चले पंचरदर्शी पंचरदर्शी खैर तो फिर यह बताते हुए इसमें आता है कि भैया ज्ञान तो वही मिलेगा परंतु तत्व ज्ञान से परिचित गृहस्ती ब्रह्मचारी अच्छा इसने एक बात और है इसने यहां पर यह मान लिया है कि ब्रह्मचारी का अर्थ है शादी ना करवाने वाले रूप शादी ना करने वाले के रूप में वह ब्रह्मचारी इसने मान लिया ठीक है अब बात यहां पर यह आती है कि वेद जो है कभी भी परम ब्रह्मचारी की बात नहीं कर रहे हैं। ब्रह्मचारी ही आचार्य बनता है। 11 5 16 ब्रह्मचारी उसमें ब्रह्मचारी का ही पूरा सूक्त है। ठीक है? उसमें आचार्य किसी को नहीं कहा गया हो कि इनके कबीर कबीर कबीर चारी या रामपाल चारी ब्रह्मचारी ही आचार्य बनता है तो इसका कोई तोड़ नहीं है तो इसने माना है ना इसका वीडियो आजकल आया है इसने गीता में भी लिखा है कि वेद के सीमा में जितना ज्ञान है गीता का उतना स्वीकार है और जितना उसके बाहर है स्वीकार्य नहीं है

00:52:22:21 तो भाई वेद तो यह कह रहा है कि ब्रह्म की ओर जाओ ब्रह्मचारी बनो ब्रह्मचारी ही आचार्य बनेगा। तो फिर तू गीता के आधार पर क्यों कैंसिल कर रहा है कि नहीं नहीं ब्रह्म की ओर मत जाओ। कबीर की तरफ जाओ। तो खैर अब क्या है कि इसने शादी ना करने वाले को आजीवन ब्रह्मचारी वगैरह के रूप में यहां बता दिया। फिर आगे बोल रहा है इसी पैराग्राफ में कि वास्तविक ज्ञान तो पूर्ण संत जो तत्वदर्शी है। तत्वदर्शी का मतलब वही इसकी नाम दीक्षा और परंतु तत्व ज्ञान से परिचित गृहस्ती व ब्रह्मचारी जानता है कि ज्ञान तो सद्गुरु का बताया हुआ है। ज्ञान से नहीं नाम जप गुरु मर्यादा में से रहने से मुक्ति होगी। अब देखो क्या बोल रहा है। यह मूर्ख लुच्चा क्या बोल रहा है। ज्ञान से नहीं ज्ञान से नहीं। नाम जप व गुरु मर्यादा में रहने से मुक्ति होगी। यह क्या है? यह ज्ञान नहीं है। क्या है बे यह? पागल कहीं के कभी-कभी इतनी गुस्सा आ जाती है ना कहीं मिल जाए तो बाल सर से ऐसे ही नोच लूं अगर मिल जाए तो। क्या लिखता है? भांग का नशा किया था। क्या ये लिखते समय? इसमें अनुवादक का नाम तेरा ही लिखा हुआ है। यह अनुवादक रामपाल

00:53:42:02 इसीलिए कहता हूं झंडू बाम लेकर के बैठा करो इसकी बातें सुनने के लिए तो ज्ञान से मुक्ति नहीं है नाम जब गुरु मर्यादा में रहने से मुक्ति है यह भी तो ज्ञान है बे मूर्ख कहीं का गुरु से नाम मिलेगा नाम का ज्ञान हुआ कि नहीं हुआ मूर्ख और यह जो तू बता रहा है कि ऐसे मुक्ति होगी यह भी तो ज्ञान है अच्छा नहीं तो दोनों ही पाप के भागी भक्ति हो जाएंगे। ठीक है। वह चाहे ब्रह्मचारी या गृहस्ती है दोनों ही वास्तविकता को जानते हैं। तो तत्वज्ञानी हो गए। यानी कि 15 करोड़ तत्वज्ञानी है इस दुनिया में। क्योंकि जो जो नाम दीक्षा लिए हुए वो वो तत्वज्ञानी हो गया। नाम तत्वज्ञान क्या है? नाम दीक्षा जितनों को तूने बांट दी तेरे अनुसार 15 करोड़ को बांटी है। हालांकि मुझे लगता है कि मुश्किल से 10 20 लाख भी निकला है। बहुत बड़ी बात है। तो तूने बांटी है 15 करोड़ को। तो 15 करोड़ तत्वदर्शी हैं रामपाल के अनुसार इस दुनिया में। ठीक है?

00:54:51:13 और अब इसी प्रश्न पर इसी पृष्ठ पर अब इसने विशेष रूप से लिखा है गीता जी के अन्य अनुवादकर्ताओं ने जो अनुवाद गीता पांच श्लोक चार का किया है उसमें सन्यास और कर्म योग दोनों द्वारा एक ही फल मिलता है। यह ऐसा लिखा है। ठीक है? विशेष में बात कर रहा है। तो

00:55:36:04 देखिए यह खुद ही अपने आप को ही कह रहा है कि यह मूर्ख है। रामपाल यहां पर अपने आप को ही कह रहा है कि मैं मूर्ख हूं। क्यों? क्योंकि पांच चार का अर्थ इसने भी किया है। थोड़ी देर पहले मैंने आपको बताया था। पृष्ठ संख्या 108 दिखाइए जरा। देखो पंचर करने वाला ज्ञान देखिए आप रामपाल का। पंचर ज्ञान यह सबसे लास्ट पैराग्राफ। अध्याय पांच के श्लोक चार में ज्ञान योगी व गृहस्ती दोनों की एक ही उपलब्धि बताई गई है। किसने लिखा? रामपाल ने। उसके बाद प्रश्न संख्या 109 दिखाओ। विशेष वाला।

00:56:17:22 भांग खाकर के लिखी गई है क्या? देखो क्या लिख रहा है। गीता जी के अन्य अनुवाद्ताओं ने अनुवाद क्या किया है इसके अनुसार कि सन्यास और कर्म योग दोनों के द्वारा एक ही फल मिलता है। लो जी खुद ही कह के आ रहा है कि इन दोनों के द्वारा एक ही उपलब्धि बताई गई है। फिर खुद ही कह रहा है कि यह जो अन्य अनुवादकर्ताओं ने जो अर्थ किया है कि एक ही उपलब्धि बताई गई है। एक ही फल है दोनों का वो ठीक नहीं है। और यह जो चीज है यह अब इसमें आगे यह कहता है अपनी बात को पुष्ट करने के लिए अध्याय पांच के श्लोक छ से यह बात कट जाती है। क्यों? कट जाती है। क्योंकि अध्याय छह के श्लोक अध्याय पांच के श्लोक छह में क्या कहा गया है? वास्तविकता में क्या कहा गया है? कर्म योग के बिना सन्यास अर्थात मन, इंद्रिय और शरीर द्वारा होने वाले संपूर्ण कर्मों में कर्तापन का त्याग प्राप्त हो पाना कठिन है। अब यह जो कठिनाई है ना जो पहले भी बताई जा चुकी है कि कर्म योग सरल होता है। गृहस्थ होकर के पार करना भवसागर को सरल होता है। कर्म योग से होते हुए विरक्तता को प्राप्त करना सरल है। मगर कर्म योग से बिल्कुल अलग हटकर के सीधे विरक्त हो जाना कठिन है। यह शुरू में भी बताई गई है और यहां पर भी बताई

00:57:32:24 गई है। वहां पर कर्म योग को सरल बता करके यह बात कह दी गई और यहां पर सन्यास को कर्म सन्यास को कठिन बता के ये बात कह दी गई। मगर यहां से क्या कह रहा है कि कर्म सन्यास तो निषेध किया है। यह कह रहा है। क्या कह रहा है ये? इसका अर्थ सुनो कि यह गीता अध्याय पांच श्लोक छह के आधार से गलत सिद्ध होता है। जिसमें लिखा है फला फला फला कि सन्यास मार्ग तो शास्त्र विरुद्ध साधना होने से दुख का हेतु है। लो दुख का हेतु नहीं है। सन्यास मार्ग कठिन है। वहां पर दुख का अर्थ कठिनाई से है। ठीक है? क्योंकि सीधे किसी चीज से हो के उनकी वास्तविकता देख के और तब जाना वो सरल होता है और उनसे फेस ऑफ आमनासामना हुआ ही नहीं और सीधे पहुंचना कठिन होता है तब तक वो जैसे वो एक कहावत है साधु शादी का लड्डू जो खाए वो पचता है जो ना खाए वह भी पचता है खाने वाला उसका साक्षी हो जाता है कि भैया इसमें यह दिक्कतें आती है अंतत गतवा जो है यहां परम सुख नहीं है वह फिर आगे बढ़ता है। मगर जिसने खाया ही नहीं है तो वह यह सोचता है कि भैया

00:58:47:25 उसमें सुख है। उसके सुख के लालच होने की संभावना बढ़ जाती है। तो जिसके जीवन में सीधे सन्यास आता है वो अपना प्रारब्ध लेकर के आता है पूर्व जन्म का। यानी उसने पूर्व जन्म में वो जो यात्रा है वो पार कर रखी है। उसके जीवन में सीधे सन्यास आ गए। ऐसा नहीं है कि सीधे सन्यास आने वाले गलत है। वह अपना प्रारब्ध लेकर के आए हैं उनके जीवन में। सीधे सन्यास इसलिए आ गए और या फिर इस जन्म में कर्म गृहस्थ मार्ग से होते हुए सन्यास आएगा उनके जीवन में। ठीक है? तो यह तो हमारी गीता कह रही है। यह कह रहा है कि यह जो अध्याय पांच का श्लोक छ है इसके कारण पांच चार की यह बात कट जाती है अनुवादों की। जबकि खुद ही वही अनुवाद कर रहा है। खुद भी वही अनुवाद कर रहा है। तो तू अनुवादों को गलत कहने की बजाय यह कहना कि गीता का ये श्लोक गलत है। अध्याय पांच के श्लोक छह के कारण अध्याय पांच का श्लोक चार गलत है। तू ये कह यह मत कह के कि अनुवाद गलत है क्योंकि तूने भी वही अनुवाद किया है। मूर्ख ठीक। दूसरी बात ये है कि पांच छ के कारण पांच चार को गलत क्यों माना जाए? पांच चार के कारण पांच छ को गलत क्यों ना माना जाए यह भी सोचा करिए इतनी बारीकी से सोचना शुरू करिए पांच छ के कारण यह कह रहा है पांच चार को मत मानो

01:00:03:13 अनुवाद गलत हो या श्लोक गलत हो जो भी हो मत मानो मगर पांच चार के कारण पांच छ को मत मानना क्योंकि वहां तेरी दाल नहीं गल रही यह है पंचर कर देने वाला ज्ञान तो खुद ही कह रहा है पष्ठ संख्या 108 पर कि ज्ञान योगी जिसे सन्यास कहा गया है कर्म सन्यास कि ज्ञान योगी व गृहस्ती पांच चार के अर्थ में कह रहा है कि ज्ञान योगी अर्थात कर्म सन्यास वाले और गृहस्ती अर्थात कर्म योग वाले दोनों की ही एक ही उपलब्धि है और फिर पष्ठ संख्या 109 पे खुद ही कह रहा है कि ये अनुवाद गलत किया है। गीता का अनुवाद 109 में 109 पृष्ठ संख्या पे कह रहा है कि पांचवे अध्याय के चार चौथे श्लोक में गलत किया है। यह कहकर कि सन्यास और कर्म योग का एक ही फल है। कैसा घन चक्कर है रे तू? हैं तो आज के लिए इतना ही पर्याप्त है। कई बार विद्युत का विच्छेद भी हुआ जिसके कारण बाधा आई। क्षमा प्रार्थी है उसके लिए और यदि कोई सहायता करने के उद्देश्य से व्यवस्था कर सकता है कि हमारी यह बाधा ना हुआ करे तो संपर्क कर सकता है। वीडियो में वीडियो के अंत में दिए गए नंबर पर।

01:01:19:22 ठीक है। लिंक दे दिया गया है। यदि किसी माई के लाल को उसकी माता ने निष्ठा पूर्वक दूध पिलाया हो वो यहां आ सकता है। हम लोग सामंजस्य पूर्ण ढंग से बात करेंगे। ठीक है? और शास्त्रवाद जी या टीआर पहाड़ी जी अगर देख रहे हैं तो वो भी आ सकते हैं।

01:01:57:25 केवल कॉमेडी और सर दर्द दोनों एक साथ जब लेने हो, बहुत ज्यादा कंफ्यूजन और बहुत ज्यादा हास्यास्पद चीजें दोनों एक साथ जब लेनी हो तो इस सीरीज को आप देखा करें। ठीक है ना? कहां बुलाया है माननीय? रामपाल का नंबर दीजिए। क्या नंबर है रामपाल का? मैं बात करता हूं। देखूं आपने बुलाया। कहां बुलाया भाई? और मैंने भी तो बुलाया बहुत दिनों से। आप ही आ जाइए।

01:02:30:02 मैंने भी बहुत दिनों से बुलाया हुआ है। वो नहीं वो आएगा तब आएगा। आप आ जाइए। तो जिसने भी जिसने भी जो भी अपने आप को रामपाल का भगत मानता है रामपाल की कोई भी ऐसी बात सिद्ध कर सकता है जो हमारे द्वारा मानी जाने वाली बातों के विरुद्ध है और उसको उसकी माता जी ने निष्ठा पूर्वक दूध पिलाया है। वह कुपोषित नहीं है। वह आ सकता है और यहां बैठकर के मेरे साथ चर्चा कर सकता है। कहां है भाई रामपाली? कोई नहीं आना चाहता। इसीलिए मैं कहता हूं मत पड़ो चक्कर में कोई नहीं है टक्कर में पहाड़ी जी जुड़े हैं

01:03:17:18 जी पहाड़ी जी जय श्री राम जय शिवश भाई जय श्री राम जय श्री राम जय श्री राम जी कैसे हो बस कृपा है राम की आप बताइए सीरीज कैसी लग रही है दोबारा से चालू हुई है जो बहुत बढ़िया लग रही है लोगों को ये रामपाल के से लोग नहीं ये हमारे सनातनी भाई है उनके लिए ज्यादा है क्योंकि वो लोग देखिए किताबों से जब भी कहीं देखे हो वो लोग सवाल पूछे इसलिए है और सवाल पूछ भी रहे हैं लोग और किताबें हैं ये तो राम है जी

01:04:06:09 रामपाल की आत्मा है और आत्मा का ज्ञान ऐसा है। अच्छा आप बिना हसे कैसे पढ़ लेते हो ये मतलब ये किताबें आप अरे मेरे सर में दर्द होता है भाई मैं जब ये चालू होने वाला था लाइव स्ट्रीम तो उससे पहले मैं थोड़ा मतलब अपने सर को ठीक कर रहा था। बहुत ज्यादा पंचर ज्ञान है। क्या बताऊं मैं? मैं तो 5 से 10 मिनट से ज्यादा की किताबों को देख तक नहीं सकता। हंसी आ जाती है मेरे को हंसी छूट गई उनको ये किताबें देख के जैसे जो ये मनोरंजन वाली कहानियां नहीं होती है जो ठीक उसी प्रकार की इसी में घपोड़ भर रखी है और ये बोलते हैं कि इसमें ज्ञान भर रखा है कोई मेरे को एक पॉइंट में गलत सिद्ध कर दो हर पेज पर गलत भर रखा है हमने इसको हर पेज पर हर श्लोक में हर श्लोक में हर बात में मुश्किल से कोई एक आध लाइन ऐसी होती है जिसको काउंटर करने का मन नहीं करता। हालांकि मूर्खता तो उसमें भी दिखती है।

01:05:11:13 थोड़ा सा आपकी आवाज है ना वो ब्रेक हो के आ रही है। पता नहीं क्या आप हेडफोन लगाए? हां हल्का वो कट कट नहीं हेडफोन तो नहीं लगा। नेटवर्क इशू हो सकता है शायद। तो मगर यह मतलब जो जनता है जो देख रही है उसके लिए बड़ी उपयोगी है ये कि वो राम हमें कुछ कहने की जरूरत नहीं रामपाल की किताबें ही पर्याप्त है उसके लिए और देखिए कितना अच्छा ये एक सूत्र निकला है कि हमारे सारे शास्त्रों का ज्ञान रामपाल दे रहा है और रामपाल ये बता रहा है कि हमें व्रत नहीं रखना है तो व्रत आया कहां से हमारे पास हमें ब्रह्मा विष्णु महेश की भक्ति नहीं करनी नहीं तो वो आई कहां से हमारे पास? उसके लिए भी तो वो शास्त्र दिखा जहां से वो आई हमारे पास उसका सबूत है ही नहीं कोई। हां। भाई ये शास्त्र तो इसी लिखे ही इस रूप में गए हैं कि नहीं करना है। तो यानी कि जब ये लिखे गए तो इस कारण से लिखे गए कि हम ये कर रहे थे। है कि नहीं? ये शास्त्र जो लिखे गए वो इसलिए लिखे गए कि हम ये कर रहे थे। हमें कब रोका जाएगा? गलत करने से। जब हम गलत कर रहे होंगे तभी तो रोका जाता है। बिल्कुल बिल्कुल

01:06:26:28 तो हम कहां से किस आधार पे कर रहे थे वो तो आधार बता। वो कभी नहीं बता पाएगा। इतने इतने डीप कहां जा रही है? इतना डीप तो है नहीं। अभी एक आप जब जैसे इंटरव्यू सुन रहे थे रामपाल का देखो खड़ेखड़े कैसा मूर्ख बना गया उन दोनों को। वो एक बार पहले बोला कि आवाज कट रही है आवाज बहुत ज्यादा। वह मूर्ख है नहीं मतलब मूर्ख बनाया नहीं गया है उनको मूर्ख जन्मजात मूर्ख है जो उसकी यह बातें सुन लेते हैं संदीप जी आप अपना चेहरा दिखाएं

01:07:06:12 और आर्य आपने लिख रखा है अपने नाम के आगे अगर रामपाल से संबंधित बात है तो आप आए उसका पक्ष लेना है तो और यदि आर्य समाज से संबंधित कोई समस्या है तो WhatsApp नंबर दिया गया है। वहां सूचित करें और एक विशेष समय लेकर के आपके साथ बैठेंगे। वैसे भी सर में दर्द हो रहा है। रामपाल का ज्ञान पड़ा है। फड़ ज्ञान एक बार उसने कहा जब पूछा ये सवाल कि आपके ऊपर आरोप लगता है। रामपाल से पूछा आपकी आवाज कट रही है। आप एक बार ना जाके जाके वापस आ जाइए आप एक बार।

01:07:51:18 ठीक ये क्या कह रहे हैं भाई साहब ये रामपाल वाले सारे गधे हैं। सही कह रही हैं आप गीतांजलि जी। कोई नहीं है भाई। यह सब बस सांप और बिच्छू शेरों से टकराया नहीं करते। शेरों को काटा नहीं करते। दूर ही दूर से रैंक कर निकल जाते हैं। इनका वो वाला हाल है।

01:08:28:00 जी पहाड़ी जी मेरी आवाज सही आ रही है? हां बोलिए बोलिए। नहीं भी आ रही होगी तो अब काम चला लेंगे क्योंकि ये समझ में आ जाएगा। डिस्कनेक्ट करके कोई फायदा नहीं है। बताइए थोड़ा सा नेटवर्क इशू है। मैं ये कह रहा था कि खाने को कैसे मूर्ख बनाया उसने? हां। जब आप वेदों को नहीं मानते। नहीं नहीं बहुत बहुत डिस्टर्बिंग आ रही है पहाड़ी जी। पहाड़ी जी बहुत डिस्टर्ब आ रही है आवाज।

01:09:06:21 तो रहने दीजिए फिर भी। जी जी जी कोई तो ले लीजिए। खीर खाने गए हैं। चलिए ठीक है। फिर आज की लाइव यही पूरी करते हैं। जितने भी गुरु रामपाल जी के भक्त हैं वह अपना समय यहां खराब ना करें। भक्ति करें इनसे दूर रह। हां वहां खराब करो जहां पर ये सब बातें हो रही होती है ना। महिलाओं के अंतरंग वस्त्रों की बातें जहां हो रही होती है। गंजा बैठकर के मातृशक्तियों के अंतरंग वस्त्रों का नाम लेता है। उनके अंतरंग जो अंग है उनका नाम लेता है। वहां जाकर समय खराब करो। यहां क्या मिलेगा तुम्हें? यह सब तुम्हारे काम की चीजें थोड़ी ना है कि आत्मज्ञान, परमात्म ज्ञान, तत्व बोध, नित्य, स्थाई, सनातन, शाश्वत

01:10:04:07 सच्चिदानंद घन ब्रह्म। यही अर्थ पूछ लूंगा ना। सच्चिदानंद घन ब्रह्म। इसका अर्थ क्या है? इसी में तुम्हारे रामपाल दोबारा कहेंगे मैं जा रहा हूं जेल काटने दोबारा और मुझे अबकी बार लेके मत आना। जब तक शिवा नारायण द्विवेदी इस पृथ्वी पर जीवित है या कोई भी एक शंकर का सैनिक जीवित है मनुवादी जीवित जीवित है मुझे बाहर मत निकालना दोबारा और तड़पेंगे बाहर सब लोग हाय हमारी खीर हाय हमारी खीर अब खीर कैसे आएगी फिर जेलर से कह के व्यवस्था की जाएगी

01:10:38:19 इतना तो कर ही देता होगा प्रशासन कि खीर की व्यवस्था हो जाए ठीक है भाई। तो इसके साथ ही अब आज की यह चर्चा समाप्त करते हैं। हां कल कल या परसों रामपाली एक है जो आने वाले हैं उनके साथ होगी चर्चा। तो इसीलिए चर्चा अभी की समाप्त कर रहे हैं। बने रहिए सीरीज के साथ रामपाल की यदि पोल देखनी है तो और संभवत पूरी चांस है कि जो सर्वशक्तिमान धर्म पर वहां पर कल वो सीरीज हम स्टार्ट करने वाले हैं। नीलिमा जी के साथ जो

01:11:25:15 उनका ब्रह्मा कुमारियों का जो सेवन डेज कोर्स है ना वह कल चालू हो जाएगा शाम से तो जो भी ब्रह्मा कुमारियों से त्रस्त हैं वो उससे जरूर जुने जय श्री राम सभी को आ

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A: AHVAAN - Call Of Dharma Live 1:12:07 · 02 Sep 2026

रामपाल का ग्रहस्त जीवन कभी हां कभी ना पाखंडी का गीता ज्ञान भाग 9 अध्याय 5

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