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00:00:06:14 तो सभी को जय श्री राम। अरुण पांडे नामक एक व्यक्ति ने एक बहुत मूर्खता पूर्ण प्रलाप किया है इस विषय में कि भागवतानंद से जो मेरी चर्चा हुई थी उसके स्थल पर जाकर के उसमें मैं किस-किस प्रकार से गलत था और उसने लगभग दो घंटे का वीडियो बनाया है तो उसका वीडियो सुन सुन करके उसका जो पक्ष है वो आपको प्रस्तुत करके मैं यहां पर उत्तर दूंगा आपको इसमें वह पार्ट जिसमें मैं उसका वीडियो सुनूंगा वह काट देंगे क्योंकि कि उसने खुद ही प्रलाप करते हुए दो घंटे तक खींचा है वीडियो को तो हम उतना नहीं खींचेंगे। इसलिए वो हिस्सा कट कर दिया जाएगा। जिस हिस्से में मैं वीडियो को सुनूंगा। तो सबसे पहले हम उसका पहला भाग सुन लेते हैं। तो इसने सबसे पहले कुछ दो-तीन बातें कही है जो अपने आप में ही उलझी हुई है कि भागवतानंद ने इसको अधिकार दिया बोलने के लिए। मैं इसको बोलने नहीं दे रहा था। यह ऐसा नहीं है बोलना नहीं चाह रहा था। परंतु दो लोगों के बीच में बोलना उचित नहीं है। फिर भी इसने बोला, अरे भाई, पहले तू तय तो कर ले कहना क्या चाहता है। सीधी सी बात है दो लोगों के बीच में तीसरा तब बोलता है जब जो पहला वाला है उसके पक्ष का व्यक्ति वो असामर्थ्यवान

00:01:22:04 है। और दिख रहा है ना वहां बृजेश पांडे को यह जाहिलियत इत्यादि शब्दों का उपयोग करना और तुम्हें वहां बैठकर के खुजली होना कि कुछ असंतुष्टि रह गई है। अभी भागवतानंद जी ने वो बात नहीं बोली है जो बोलनी चाहिए जिससे निरुत्तर हो के जाए। तभी तो तुम्हारे मन में चुल उठी बोलने की। अब इसका कहना है कि भागवतानंद ने क्या कहते हैं? यह प्रश्न उठाया कि भाई तुमने शक्ति संगम तंत्र के आधार पर उसको पाखंड घोषित किया है। ठीक है? इसका कहना है कि भाई जब तुम पहले उसको पाखंड कह चुके हो। भागवतानंद जब जो है ये कह रहा है तो तुम उस विषय से भागे क्यों? जो तुम्हारे द्वारा उठाया गया विषय है। पहले वाला। सबसे पहली बात है कि जिज्ञासा करने कौन गया है? तो मैं गया हूं जिज्ञासा करने तो वहां पर प्रश्न कौन पूछेगा कि किस विषय में प्रकाश डालना है? मुझे पूछना है। जिज्ञासा मेरी है। भागवतानंद ने कोई सॉफ्ट कॉर्नर जिसका उत्तर आसानी से दिया जा सकता है वो ढूंढते हुए उसको आधार बना करके अपना वर्चस्व पहले ही स्थापित करने का प्रयास अगर किया। तो हालांकि उसमें भी मेरे पास उत्तर है पर मैं उन हल्के विषयों पर अपना समय क्यों व्यर्थ करूं जिन हल्के विषयों से एक निष्कर्ष प्राप्त होने में बहुत समय लगे। इसलिए मेरा मंतव्य था कि

00:02:37:08 भैया मैं तो वो मूल जगह चोट करूंगा। मूल जगह और अगर बात रही कि मैंने पहले कौन सा विषय उठाया है तो इसका मतलब कि तुम अर्ध ज्ञानी भयंकर वाली स्थिति से गुजर रहे हो। सबसे पहले हमने निग्रह निकासिका नामक एक पुस्तक भी लिखी है और निग्रह निकासिका नामक एक सीरीज बनाई है। उस पूरी छह एपिसोड की सीरीज में उस पूरी 60 से 70 या जो भी जितने भी प्रश्न में वो लिखा हुआ है। उस पूरे सीरीज में कहीं पर भी हमने शक्ति संगम तंत्र के आधार पर पाखंड तंत्र घोषित नहीं किया। निग्रह संप्रदाय को कहीं भी। बाद में जब हमने वो सीरीज जो लिपिबद्ध करके हमने उसका लेख भी डाला। बाद में किसी चर्चा के समय हमें वह चीज दिखाई दी जब हम किसी से बात कर रहे थे तब हमने यह प्रश्न किया था कि भाई यहां से आगे पाखंड तंत्रों की यदि बात की जा रही है तो इसके आगे आने वाले जो तंत्रों के नाम है आगमों के नाम है उसको पाखंड क्यों ना माना जाए इस संबंध में यदि कोई पक्ष हो तो प्रस्तुत कर ये भी कहा था वहां पर हमने अपनी निग्रह निकासी का सीरीज में यह नहीं कहा कि नहीं नहीं इसमें जो कोई उत्तर हो सकता है क्योंकि उसमें जितने भी पूर्वाग्रह थे पूर्व पक्ष थे उन सबको लेकर के हमने उसका खंडन किया था तो सबसे पहली बात तो यह है कि पहला सबसे पहले मैंने कौन से प्रश्न पूछे?

00:03:52:12 अगर पहले पर जाओगे तो निग्रह निकासिका में पूछे हैं। तो वहां से क्यों नहीं प्रश्न लिया गया? दूसरी बात यह है कि जिज्ञासु यदि मैं हूं तो मैं वहां पर गया हूं तो मेरा प्रश्न वहां पर होगा ना कि कौन सा प्रश्न होना चाहिए। अब विषय विषय से भागना तो तब कहते हैं ना जब मुझसे पूछा ही नहीं गया। मुझे किस संबंध में आंसर चाहिए। अपने आप मेरा कोई एक वक्तव्य लेकर के जिसके बारे में मैं कह भी चुका हूं कि भाई वो एक मैंने प्रश्न मात्र पूछा है और जिसमें कि मैंने यह भी संभावना व्यक्त की थी कि इसमें हो सकता है भाई कि तुम्हारा कोई पक्ष निकल आए। हालांकि उसमें भी हम रगड़ सकते हैं पर देर लगेगी। हम देर वाले कार्य क्यों करें? विलंब वाले कार्य क्यों करें? तुम्हारा तो आदमी तैनात है ना गालीबाजी करने के लिए। अगर हम ज्यादा व्यर्थ के विषयों में समय अपना खर्च करेंगे तो वो व्यक्ति आधे से एक घंटे में जो पर बौखला गया था कि भैया मेरे बाबा जी तो निरुत्तर हो रहे हैं तो गालीबाजी शुरू करनी है जाहिलियत मूर्खता इत्यादि शुरू करनी है हम तो बौखला करके वो जब ये करने लगा तो हम अपना समय व्यर्थ क्यों गवाए जब हमारे पास हथौड़े वाले प्रश्न है अकाट्य प्रश्न है हमारे पास है ना तो इसलिए पहली बात मैं जिज्ञासु था प्रश्न प्रश्न मुझे करना था। वो क्यों चुन रहा है कि मेरे बहुत सारे प्रश्नों में से कौन सा प्रश्न लिया जाए। पहली बात। दूसरी

00:05:07:22 बात यह है कि अगर उसको कुछ कहना था तो जब हमने कहा था कि कुछ चर्चा आपको करनी है तो उसने अरुचि दिखाई थी तो फिर वो जो मुझे मैंने जो विषय चुना है मुझे उस पर प्रश्न करना है। तो वो कौन होता है मेरे प्रश्न को चयन करने वाला? और यदि पहले और बाद वाली चीजें भी देखनी है तो पहले प्रश्न मैंने निग्रह निकासि में उठा चुका हूं। बाद में मैंने वो प्रश्न उठाया है पाखंड तंत्र वाला तब भी तुम तब भी उस अर्थ से भी पहले वाली कि पहले क्या उठाया गया उस अर्थ से भी ये पाखंड तंत्र वाला प्रश्न उचित सिद्ध नहीं होता और तुम लगे अपनी मूर्खता करने चलो पहली बात यह है कि संप्रदाय का निग्रह नहीं है अगर इस पर हम अगर बात करें तो किस संप्रदाय में क्या मान्यता है उसका निर्णायक कौन होगा हम जो उस संप्रदाय की प्रामाणिक गुरु गद्दी होगी, सर्वोच्च गुरु गद्दी होगी, वह बताएगा कि इस संप्रदाय की यह मान्यता है। प्रामाणिक रूप से तो वही बताएगा। बाकी कोई कुछ भी कहता रहे। ठीक है? अब यदि तुम उस प्रामाणिक गुरु गद्दी के वचनों को ध्वस्त कर रहे हो। या उस प्रामाणिक गुरु गद्दी के वचनों का तुम विरोध कर रहे हो। तो तुम उस संप्रदाय का ही विरोध कर रहे हो। यदि शंकराचार्य के पद पर बैठने वाला व्यक्ति

00:06:23:20 तुम कह रहे हो कि वह झूठ बोल रहा है। वह अज्ञानी है। तो यानी कि जो भगवत पाद आदि शंकराचार्य जी ने घोषणा की है कि मेरी इस गुरु इस मेरे द्वारा स्थापित पीठ पर बैठने वाला जो व्यक्ति है वो मुझ शिव का स्वरूप ही मान्य होगा। तो यदि उस उस उनकी इस घोषणा के अनुसार जो उनकी गद्दी पर बैठने वाले व्यक्ति हो व्यक्ति है उस पर यदि तुम उंगली उठा रहे हो तो इसका मतलब है तुम उसके रूप में भगवत पाद आदि शंकराचार्य जी पर ही उंगली उठा रहे हो। क्योंकि वही उस उन उनके संप्रदाय का निर्वाहक है। तुमने किसी केवल एक शिष्य मात्र पर उंगली नहीं उठाई है उस संप्रदाय के। शंकराचार्य पद पर बैठे हुए व्यक्ति के सिद्धांतों को या शास्त्रीय अर्थ को तुमने चुनौती दी है। तो उस हिसाब से तुमने संप्रदाय का विरोध किया है क्योंकि उनके रूप में भगवत पाद आदि शंकराचार्य का तुमने विरोध किया है। दूसरी बात अगर तुम ये कहो नहीं भगवत पाद को तो हम मानते हैं तो भगवत पाद ने क्या कहा है और क्या नहीं कहा है इस संबंध में शंकराचार्य निर्णायक हैं। तुम कौन होते हो निर्णायक वाले? निर्णायक होने वाले। अभी मैं अगर रामानुज संप्रदाय पर ये अपना मत थोपने लगूं कि नहीं नहीं रामानुज रामानुज रामानुजाचार्य जी ने तो पांचों पंच देवोपासना मानी है तो तुम मानोगे उस बात को

00:07:38:26 तब तो राघवाचार्य जी और ये जो विद्या भास्कर जी महाराज हैं सभी रामानुजाचार्य जो जितने भी वैष्णवाचार्य हैं वो सब इस बात का खंडन करते हैं कि नहीं नहीं शिवजी का रूप जो है भगवान नहीं है तो मैं अगर थोप दूं नहीं रामानुजाचार्य जी ने तो माना है वो तो शंकर संप्रदाय को ही माना वो तो अद्वैतवादी थे तो मान लोगे कैसे मानोगे तुम किताबें लाओगे मैं कहूंगा किताबें तो तुमने अपने मन से छपवा रखी है। फिर क्या करोगे? फिर क्या करोगे? एक गवाह नहीं मिलेगा फिर भी मैं कहूंगा नहीं यही बात है। तो तुम अगर यह बात कहोगे कि शंकराचार्य शंकर संप्रदाय में यह माना गया ये मैं बताऊंगा। शंकराचार्य नहीं बताएगा। तो उस हिसाब से तुम्हारी प्रमाणिकता सिद्ध नहीं होगी। शंकराचार्य को जानने के विषय में और अगर तुम उनके अगर शंकराचार्य को जानने के विषय में वर्तमान शंकराचार्य को प्रमाणिक मानते हो तो वर्तमान शंकराचार्य का अगर तुम विरोध कर रहे हो शास्त्रीय विषयों में तो उनके रूप में तुम आदि शंकराचार्य जी का ही विरोध कर रहे हो। पहली बात। दूसरी बात मैंने ये मान लिया। मैंने ये बात मान ली कि संप्रदाय का विरोध नहीं है। दुर्जन तोष न्याय से जिससे कि बात जो है ना मूल विषय से भटके ना। इसमें ये वाली बात आएगी कि मैंने मूल विषय को बचाने के लिए कितने सारे वहां पर त्याग किए हैं। उस पर भी अभी बात करेंगे। तो मैंने तुरंत उस बात को मानता चला गया जिस जो

00:08:54:02 बात जो है मूल विषय से भटका सकती है। ऐसी एक बात थी भागवतानंद के द्वारा उठाई गई कि पाखंड तंत्र तुमने कहा है तो मूल विषय मेरा वहां था। परंपरा शास्त्र कैसे प्राप्त हुए। तो इसलिए मैंने तुरंत उस बात को छोड़ा। भाई तुम क्यों चयन कर रहे हो प्रश्न का? मैं करने आया हूं ना प्रश्न। तुमने मुझसे कहा है पूछो। तो मैं पूछ रहा हूं। इसने इस व्यक्ति ने दूसरी बार हमको भ्रांति मूलक प्रश्न करने वाला होने के संबंध में एक हमारी जो हमसे जो वाकलन हुआ है उसके कारण जो है हमको जो है ये सिद्ध करना चाहता है। भ्रांति मूलक प्रश्न के रूप में हमको वहां पर उपस्थित कर रहा है। भाग भगवती का वरदान भागवतानंद को प्राप्त है। फिर भी वो ये बोल देता है कि भैया देखो एक जो है अमुक अमुक तरह की जो लड़की है वो मंच पर मंच साझा कर रही है। पूरी के शंकराचार्य जी के साथ और एक बार नहीं कम से कम पांच से छह बार अपने एक ही वीडियो में वो इस बात को दोहराता है तो भगवती का वरदान प्राप्त होने के बाद भी उससे तो वाकलन हो सकता है मगर शिवश नारायण द्विवेदी से वाकलन नहीं हो सकता है। फिर भी बुद्ध के विषय की बात आ जाने पर हमने उसका त्याग इसीलिए किया क्योंकि हमको विषय को बचाना था। विषय यह नहीं था कि बुद्ध के विषय में पूरी के शंकराचार्य जी सही है या फिर

00:10:09:06 भागवतानंद सही है। कर्पात्री जी सही है या फिर भागवतानंद जी सही है? हम पूछ रहे हैं यदि तुम सबका निग्रह कर रहे हो। सबका निग्रह मतलब सभी आचार्यों में दोष दृष्टि रख रहे हो तो फिर तुम्हारा शब्द प्रमाण कौन है? जिसके आधार पर तुमने वेद नामक ग्रंथ को वेद माना है। ठीक है? विषय ये था। तो जितनी बार जैसे ही कोई भी हल्की बात आएगी जिससे कि विषय से दूर जा रहे हैं तो उतनी बार मैं कहूंगा कि भाई विषय पर वापस आओ। अगर बुद्ध की बात मेरे मुख से निकल गई है तो उसको छोड़ो। मूल प्रश्न यह है तुम्हारे पास शास्त्र कैसे आए? अब यहां पर इसने एक बात और कही है कि व्यक्ति के बारे में जब तुम्हें पता ही नहीं है तो तुम वहां पर तुम्हारा वहां पर उस पर वक्तव्य निर्गत करना मूर्खता ही है ना? तो यही बात तो मैं भी तुमसे कह रहा हूं। जब तुमने मेरा निग्रह निकासिका वाली सीरीज देखी नहीं है तो मेरे ऊपर वक्तव्य वक्तव्य देना तुम्हारी मूर्खता नहीं है क्या? भाई देखो अगर रामानुजाचार्य परंपरा से ये माना जा रहा है कि दो प्रकार के बुद्ध हैं तो आप खूब मानो। आप जो है भगवान श्री राम को ही चार शादियां करने वाला मान लो। आप भगवान के अवतार को जो है मूर्ख स्वरूप मान लो। हमें उस पर कोई आपत्ति नहीं है। पर यदि भागवतानंद यह बात बोल रहा है कि दो बुद्ध हैं और दोनों बुद्ध जो है भगवान का ही स्वरूप

00:11:24:09 है तो वहां पर हम प्रश्न पुट अप कर सकते हैं कि जो शुद्धोधन पुत्र है उसको माया मोह स्वरूप कहा गया है। तो आपने इस बात ये माया मोह स्वरूप होने वाली बात मैंने अपने वीडियो में बाद में कही भी है। मैंने वहां मौके पे इसीलिए नहीं कही। क्योंकि फिर माया मोह स्वरूप के कारण वहां पर फिर दूसरी जगह बात चली जाएगी और जो मूल विषय है एक निश्चित समय सीमा के अंदर कट्टर विरोधी के प्रांगण के अंदर बैठे हुए मूल विषय पर उसको निरुत्तर करना जो मूल विषय था वो था भागवतानंद की परंपरा विषय से कौन भागा विषय से कौन भागा सबसे पहले तो उसने ही विषय खोद दिया कि तुमने हमारे को पाखंड कहा है मैंने वहां पर कहा था क्या पाखंड मैंने तो बहुत कुछ कहा है उसने सब कुछ क्यों नहीं खोदा वही क्यों खोदा क्योंकि उसको वहां पर लग रहा है कि उसकी वहां पर जीत हो सकती है इसलिए वह खोदा दूसरी बातें क्यों नहीं खोद दी उसने बहुत सारी बातें थी अगर पहले और बाद की वजह से खोद रहा है तो पहले तो मैंने कुछ और कहा है सबसे क्रम से चलो फिर क्रम से चलना है तो तो विषय कौन कर रहा है ध्यान दो और रही बात बुद्ध की तो बुद्ध के विषय में कहा गया है जो शुद्धोधन पुत्र बुद्ध है वो माया मोह स्वरूप है तो रामानुज संप्रदाय घोषित करे कि भगवान के अवतार

00:12:39:10 सच्चिदानंद स्वरूप नहीं माया मोह स्वरूप होते हैं। हमें उस पर कोई आपत्ति नहीं है। उस पर तो तुमने बात बोली ही नहीं। क्यों नहीं बोली भाई? अग्नि पुराण में जहां पे शुद्धोधन पुत्र दिया हुआ है वहीं पे माया मोह स्वरूप लिखा हुआ है। और इस बुद्ध पे शबरी पे एक विस्तृत वीडियो अलग चलाएंगे। वरना यह वीडियो लंबा हो जाएगा। फिलहाल बात ये है इस बात को ध्यान में रखो। अरुण पांडे कि यह जो चर्चा हो रही है भागवतानंद की प्रामाणिकता के विषय में हो रही है। ये चर्चा इस विषय में नहीं हो रही है। कि भागवतानंद ने गुरु विरोध क्यों किया या फिर भागवतानंद और कर्पात्री जी के बीच में कौन सही है कौन गलत है शंकराचार्य और भागवतानंद के बीच में कौन सही है कौन गलत है और जो तुम एक बात कह रहे हो ना कि यदि जो आचार्य गण है वो अपने अपने मंच से बैठकर के अगर कुछ बोल देंगे उनसे करोड़ों लोग प्रभावित होते हैं तो प्रश्न वहां भी पूछ लिया जाएगा कि राघवाचार्य जी महाराज विद्या भास्कर जी महाराज क्यों हरिहर में भेद करते हैं क्यों बोलते हैं और ये वहां निग्रह क्यों नहीं करेगा उससे तो पूरा समाज प्रभावित ित हो रहा है। फूट डल रही है। इस वालों को आधार मिलता है।

00:13:44:14 जब हरिहर में भेद नहीं है। भागवतानंद सही है तो क्यों बोलते हैं स्टेज से? और भागवत उनका निग्रह क्यों नहीं करता है? ठीक है? तो यह सवाल भी आएगा कि भैया वो क्यों कह रहे हैं मंच से? अब इस मूर्ख ने यहां पर तीन चार प्रलाप एक साथ किए हैं कि भैया इसने प्रश्न किया है। मैंने प्रश्न किया कि भाई जिस संप्रदाय में आप अपनी जिससे आप अपना सिद्धांत लेंगे जिस परंपरा को मानेंगे उसका आप खंडन नहीं कर सकते। ठीक है? एक तो इसने यह कहा। फिर इसके बाद कहा कि भाई शबरी के विषय में जो है अगर पूरी शंकराचार्य जी बोल रहे हैं तो किस शास्त्र के आधार पर बोल रहे हैं और काक भुसुंडी को रामायण को अगर क्या कहते हैं करपात्री जी ने प्रामाणिक माना है तो फिर वो उसी का खंडन कैसे कर रहे हैं ठीक है पहले तो ये जो करपात्री जी वाली बात है इस बात का मैंने वहीं पर जवाब दिया था हालांकि मेरा जो फोकस है वो इस बात पे है कि बार-बार जो विषय बदला जा रहा है वो वो ना बदले। जितनी बार इधर-उधर जाएं तो कम से कम चीजें करते हुए वापस उसको विषय पर लाएं। फोकस मेरा इस बात पे है। और इसके लिए मैं आपको दो बड़ी चीजें बताऊंगा जिसमें वहां पर मैंने त्याग कहा त्याग किया और मौन रहा। जैसे कि चर्चा के बीच में जब कोई उसने बोला कि

00:14:59:18 ये आपके ही गुरु भाई हैं और ये भी परिकरों के उससे त्रस्त है। व्यवहार से त्रस्त है। मैंने वहां पर उसका खंडन क्यों नहीं किया? उसका भी खंडन करता। फिर उसने एक जगह कहा कि तुम सब पर सब पर आरोप लगाते रहो पर अपने मठ में होने वाले व्यभचार पर बात मत करो। मैंने उसका खंडन नहीं किया। फिर इसने हेमंत पालीवाल जोधपुर वाली बात जो जिसका विषय से कोई मतलब नहीं है कि तुमने मेरे मेरे ऊपर आरोप लगाया है यौन उसका हम मैंने उसका भी कोई जवाब नहीं दिया। फिर इसने ब्रह्मदंड इत्यादि बहुत सी चीजें करनी चाही जिनका विषय से कोई मतलब नहीं था। मगर मैंने वहां पर या तो मौन रहा या फिर संक्षिप्त से संक्षिप्त बात करते हुए मैं जल्दी से वापस इसको बैक टू द पॉइंट लाया क्योंकि इसका काम ही यही है। इसके पास सवालों का जवाब नहीं है। अब ये व्यक्ति जो यहां पर इसकी मीमांसा कर रहा है। ये शबरी वाला प्रकरण आया कैसे? इससे ये पूछो ना। अरे मूर्ख जब मैं उससे ये पूछ रहा हूं कि तुम्हे तुमने शास्त्र कहां से प्राप्त किए हैं? तो इससे इस बात का क्या संबंध है कि तुम्हारे गुरु ने शबरी का शबरी को ब्राह्मणी कैसे कहा है? इस बात का क्या संबंध है? शबरी को ब्राहणी जो पूरी के शंकराचार्य जी है उन्होंने शबरी को ब्राहणी कहने के लिए अपने ग्रंथ में पर्याप्त विवेचना दी है। उस पर मैं वीडियो भी बनाऊंगा। अभी मोटे रूप में बता दे रहा हूं। शबरी

00:16:14:26 को कृष्ण मृग चर्म धारणी बताया गया है। जो ब्राह्मणों के लिए होता है। शबरी को तपस्वनी बताया गया है। तपस्या करने पर समुख का वध हुआ था शूद्र का। तो यह कैसी तपस्वी है जो शूद्र होते हुए जिसको दोष नहीं लग रहा है तपस्या करने पर। इसके अलावा शबरी कहीं से भी बहिष्कृत नहीं थी। तो गुरुदेव ने पर्याप्त चीजें दी हैं। आनंद रामायण का भी वहां पर उन्होंने कोट किया है अपने ग्रंथ में कि किस प्रकार से आनंद रामायण के अनुसार भी जो शबरी हैं वो क्या कहते हैं? ब्राह्मण सिद्ध होती हैं। और एक मीमांसा दर्शन के भाषिकार हुए हैं। शबराचार्य उनका नाम था। उनके ही सदस्य उनके नाम में वो शब्द आ रहा है शबरी परंतु वो शबरी केवल शीर्षक है उनका ना कि वो शबरी जाति की ही मानी गई है अब बात आती है काग भुसंडी रामायण को प्रमाण माना जाता है करपात्री जी के द्वारा लिखा दिखा भाई तू यही तो है मूर्खों की फौज तुम्हें पता ही नहीं है करपात्री जी ने क्या कहा लगे मेंढकों की तरह उछलने करपात्री जी ने कहीं पर भी यह नहीं कहा है कि वो प्रमाण है, आर्ष ग्रंथ है। लोकाचार की दृष्टि से उसकी भी चीजों को स्वीकार किया है। किस सीमा

00:17:29:27 में? वाल्मीकि रामायण की सीमा में। क्यों? क्योंकि वाल्मीकि रामायण अपने शुरुआत होते ही यह घोषणा करती है कि वो वेदों का अवतार है। अपौषय वेद हैं। उनका अवतार है। ये घोषणा करती है वाल्मीकि रामायण। तो जितने भी भ्रम फैलाए जाएंगे या फिर जितनी भी ऐसी बातें होंगी जो क्या कहते हैं? वाल्मीकि रामायण के इत जा रही होंगी। उनको उन्होंने नहीं माना है। तो पहली बात तो तुम्हारी यही चीज गलत हो गई कि भाई करपात्री जी ने उन्हें प्रमाण माना है। दिखा कहां पर प्रमाण माना है। और दूसरी बात यह है कि करपात्र तुम यही बता दो कि भुसुंडी रामायण को लिखने वाले कौन है? बता दो। आज तक कोई नहीं बता पाया है। कौन है रचयिता भुसुंडी रामायण के? मगर लोकाचार में वो सनातनियों के द्वारा ग्रहण की जाती है। तो ग्रहण की गई है। कृपात्री जी के द्वारा परंतु वाल्मीकि रामायण के आलोक में जहां इत जाएगी तो वहां उसे अमान्य मानना पड़ेगा और हम अमान्य मानने को भी नहीं कह रहे। हम तो यह कहेंगे कि भैया अगर उसका सम्मान आपको रखना है उसके वचनों का तो वहां पर रामो विग्रहवान धर्म का सम्मान रखते हुए उसका सम्मान रखिए। उसको दिव्य दृष्टि मान लीजिए। दिव्य दृष्टि से घटित होने वाली घटना। जो रामानंद संप्रदाय है उसमें

00:18:45:03 श्री राम जी के द्वारा रास लीला होना भी स्वीकार किया जाता है। मगर दिव्य दृष्टि से व्यवहारिक रूप से नहीं कि श्री राम जी ने भी रास लीला रचाई हो वहां पर भी रस है। परंतु दिव्य दृष्टि से व्यावहारिक रूप से वह मर्यादा पुरुषोत्तम राम है। तो अगर किसी भी वाल्मीकि रामायण से इतर जाते हुए किसी भी स्मृति के द्वारा उनकी मर्यादा पुरुषोत्तम होने पर प्रश्न चिन्ह उठेगा। तो वहां पर उसको नहीं माना जाएगा। ये कर्पात्री जी ने घोषणा की है। तो तुम करपात्री जी के पक्ष से तो कम से कम ये नहीं कह सकते हो ना कि भैया वो क्यों नहीं मानेंगे उसको? कहां प्रमाण उन्होंने माना उनको? यह व्यक्ति अभी थोड़ी देर पहले कह रहा था ना कि जो है पहले उसके बारे में बोलने से पहले जान तो लो उसका पक्ष क्या है तो भाई तू करपात्री जी को पढ़ा तूने कि बस अपने बुग्गू बाबा के वो सपने में आने वाली परी जिसको वो भगवती मान बैठा है उसके द्वारा ही मान लिया तो मूर्ख कौन सिद्ध हुआ यहां पर अब ये व्यक्ति आरोप लगा रहा है कि जब शबरी का विषय ही चल रहा है उसी में भागवतानंद बात कर रहा है शबरी के विषय में तो फिर मैंने क्यों कहा कि भैया विषयंतर हो रहा है तो देखिए कैसे साक्षात तरीके से विषयंतर की बात कहकर जो है बचने का प्रयास कर रहा है। भाई विषय क्या है? विषय है कि तुम्हारे को शास्त्र

00:20:00:07 कैसे प्राप्त हुए? कौन सी परंपरा से प्राप्त हुए? विषय यह है। तो यदि विषय घूम करके इधर जा रहा है कि शबरी के विषय में शंकराचार्य जी सही है, करपात्री जी सही है या फिर भागवतानंद सही है। तो जैसे ही मुझे इस बात को बार-बार याद आएगा तो मैं बोलूंगा ना भैया यहां पर क्यों आ गए हो तुम? मुख्य विषय है तुम्हारे पास शास्त्र कैसे आए? शास्त्रों के लिए तुम किस पर निर्भर हो? कौन है तुम्हारा शब्द प्रमाण? मैंने वहां छाती ठोक के बोला ना मेरे शब्द प्रमाण शंकराचार्य हैं। शास्त्रों के विषय में कौन सा शास्त्र शास्त्र है? कौन सा शास्त्र शास्त्र नहीं है? इस विषय में परंपरा प्राप्त आचार्य हमारे प्रमाण हैं। अगर हम स्वतंत्र रूप से शास्त्रों को ग्रहण करेंगे तो वो जो पब्लिकेशन है, वो जो इंटरनेट का पोर्टल है या फिर वो गीता, प्रेस, चौखंबा इत्यादि ये सब हमारे शब्द प्रमाण हो जाएंगे। हम नहीं कह सकते कि ये झूठ बोल सकते हैं, झूठ बोल सकते हैं तो फिर वो हमें को शास्त्र भी झूठे दे सकते हैं। इतनी सी बात भेजे में घुस नहीं रही है। भाई विषयंतर जो मैं कह रहा हूं वो इसलिए कह रहा हूं कि मूल विषय था निग्रह संप्रदाय पर प्रकाश डालना। अब उसने पूछा कि किन विषयों में मैंने जो है परंपरा प्राप्त आचार्यों का खंडन किया। यद्यपि ये सवाल भी अपने आप में गलत ही था। जब वो एक अपनी दोष दृष्टि वो बता रहा है कि मैं किसी पर विश्वास नहीं करता पूर्णतया मेरा शब्द प्रमाण कोई नहीं

00:21:15:08 है क्योंकि वो कह रहा है कि मैं सबका निग्रह करूंगा और वो ये भी नहीं बता रहा है व्यवहारिक रूप से ये मेरा गुरु है जिसका मैं निग्रह नहीं करूंगा जिसका मैं खंडन नहीं करूंगा यानी कि उसका शब्द प्रमाण कोई नहीं है यानी कि उसकी दोष दृष्टि सब में है। जब वो स्वतंत्र रूप से ये कह ही रहा है तो उसमें ये पूछने की आवश्यकता क्या है कि मैंने किसका शास्त्रीय या सैद्धांतिक विरोध किया है। फिर भी उसने पूछा और हमने दो जगह बता दिया कि भैया यहां यहां पे तुमने किया है। तो यहां पर ये कहने लगा वहां मापे तुम्हारे आचार्य गलत है इसलिए किया है। प्रश्न ये नहीं है कि कौन गलत है कौन सही है प्रश्न ये था कि तुमने विरोध किया है कि नहीं किया है? पहली बात तो विरोध करना तुमने खुद स्वीकार कर रखा है। फिर भी तुम्हारे पूछने पर व्यर्थ का प्रश्न था। फिर भी तुम्हारे पूछने पर जब तुमको बता दिया गया तो तुमने अगला प्रश्न खोदा कि उसमें तो मैं सही हूं। अरे भैया प्रश्न ये है ही नहीं कि शबरी के मामले में कौन सही है कौन गलत प्रश्न ये था कि तुमने विरोध किया कि नहीं किया परंपरा प्राप्त आचार्य का तो मैंने बताया तुमने किया अब तुम अपने वापस विषय पर आना चाहिए था विषय क्या था कि तुम शास्त्रों के लिए किस पर निर्भर करते हो क्या तुम्हारा शब्द प्रमाण है तो जब ये एक्सप्लोर करने के चक्कर में कि कौन सही है कौन गलत एक्सप्लोर करने के चक्कर में वो मूल विषय खो रहा था तो मैंने वहां पर ध्यान दिलाया कि विषयांतर हो रहा है तो यह मूर्ख व्यक्ति क्या

00:22:30:09 प्रलाप कर रहा है कि देखो देखो वो सबरी वाले विषय पे ही है तब भी जो है विषयंतर कह रहा है और मूर्ख यह भूल गया कि मुख्य विषय था कि भागवतानंद का जो भागवतानंद का जो तथाकथित निग्रह संप्रदाय है उसकी प्रमाणिकता राम जी के विषय में हमें कोई दिक्कत नहीं है रामानुज संप्रदाय के अंतर्गत आप खूब मानो की वो मर्यादा पुरुषोत्तम नहीं है वो खूब मानो आप लोग कि जो है राम राम जी जो है मर्यादा का अमुक अमुक जगह पर ब्रह्म भाव से उल्लंघन करने लगे। आप खूब मानो रामानुज संप्रदाय से हमें कोई आपत्ति नहीं होगी। परंतु जब कोई परंपरा विहीन व्यक्ति ऐसी बात बोलेगा तो हम उसको काउंटर कर रहे हैं। आप खूब उनको मानो कि वो भी नाचते थे। वो भी रास रचाते थे। वो हमारे आदर्श नहीं है। वो अनुकरणीय नहीं है। भले ही स्कंद पुराण में रामायण महात्म में उनका जो चरित्र है वो अनुकरणीय बताया गया हो। कितनी बार पूरी के शंकराचार्य जी और अन्य वैष्णवाचार्य भी यह बात स्वीकार कर चुके हैं कि जो भगवान श्री कृष्ण है वो अनुसरणीय हैं पूजनीय हैं प्राप्तव्य हैं मगर अनुकरणीय नहीं है और श्री राम अनुसरणीय और अनुकरणीय दोनों हैं। तो अनुकरणीय वो जैसा जैसा कर रहे हैं वैसा वैसा हम कर सकते

00:23:45:10 हैं। पुल बनाना, मरे हुए को जिंदा कर देना। यह सब सामर्थ्य का क्या कहते हैं? सामर्थ्य के आधार पर है। यदि हमारे पास सामर्थ्य है किसी को जिंदा करने की कर सकते हैं। रोक नहीं है। किसी भी शास्त्रीय मर्यादा का उल्लंघन करना स्वीकार नहीं किया जा सकता। प्रभु श्री राम के द्वारा व्यवहारिक स्वरूप से। आप आदि दैविक जगत में खूब मानो कि राम जी ऐसे कर रहे हैं। रामानंद संप्रदाय का मैंने उदाहरण दिया। हां। भागवत पुराण में जो स्त्रियां वहां रास में गई थी वह सब अपने अपने घर पर सो रही थी। व्यवहारिक घटना नहीं थी। वो आदिविक घटना थी। और यदि ब्रह्म भाव से भगवान श्री राम जो है मर्यादा का उल्लंघन कर सकते हैं तो क्यों 16,000 स्त्रियों को उन्होंने अगले जन्म के लिए छोड़ दिया? क्यों सुपनखा का जो प्रस्ताव था वो ठुकरा दिया? क्यों वैष्णो देवी का प्रस्ताव था वो ठुकरा दिया? इसका जवाब कब दोगे? और जवाब देना तब देना। सबसे पहले तो ये घोषित कर दो रामानुज संप्रदाय के अनुसार जो है मर्यादा पुरुषोत्तम नहीं है वो हमारे आदर्श नहीं है सैकड़ों वर्षों से सदियों से पूरा जमाना इसी बात पर तुला हुआ है कि इनसे इनका आदर्श छीन लो और आज स्वयं प्रामाणिक संप्रदाय के लोग एक तुच्छ से मंतव्य की पुष्टि करने के लिए

00:25:00:21 हमसे हमारा आदर्श छीनने की बात कर रहे हैं। छीन लो आदर्श। दुनिया की किसी विचारधारा में प्रभु श्री राम के जैसा कोई उनकी विचारधारा का पालन करने वाला कोई आदर्श नहीं है। ना मोहम्मद ना जीसस कोई नहीं है। केवल हमारे पास एक आदर्श है राम। उसको भी इस तुच्छ मानसिकता वाले व्यक्ति की धारणा को पोषित करने के लिए छीन लो। हमारे आदर्श को। पर हम ऐसा नहीं होने देंगे। ठीक है? मत मानो तुम आदर्श रामो विग्रह वान धर्मा को काट के रख दो तुम मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम को काट के रख दो तुम उनको लीला पुरुषोत्तम बना दो अलौकिक घटनाएं हैं मगर वहां पर उन्होंने साध्य कोटि के धर्म का उल्लंघन नहीं कर दिया पुल बना के कि धर्म ने बताया हो कि भैया पुल नहीं बना सकते उन्होंने पुल बना दिया उन्होंने अपनी सामर्थ्य से बनाया उन्होंने अहिल्या को जो है श्राप मुक्त किया अपनी सामर्थ्य से किया व्यवहारिक दृष्टि से तो उन्होंने एक शिला को छुआ अपने पैर से और रही बात क्या कहते हैं ब्राह्मण ब्राह्मण के द्वारा जो है सत्कार करने की पैर धुलाने की तो विश्वामित्र जी के

00:26:15:22 पैर नहीं धुलाए थे वशिष्ठ जी ने ये आतित्य सत्कार होता है विश्वामित्र जी क्षत्रिय थे वशिष्ठ जी जो है ब्राह्मण थे तो वहां पर पैर नहीं धुलाए गए यदि हमारे यहां पर कोई द्विज आएगा तो हम हम भी उसके पैर धुलाएंगे। भले ही हम ब्राह्मण है और वो क्षत्रिय वैश्य है। और यदि कोई शूद्र भी आएगा आतित आतिथ्य की सीमा में आएगा यदि वो तो वहां पर अपने आगे शूद्र से हम उसके उसका सत्कार करवाएंगे। यदि वहां पर स्पष्टता इत्यादि की मर्यादा होगी तो। इतनी सी बात नहीं समझ में आ रही है। लगे अपने ही आदर्श को चुनौती देने। कैसे लोग हो तुम लोग? तरस आता है। [हंसी] जिस डाल पर बैठे हो उसी को काट रहे हो। रामायण में मानसा और जो शास्त्रार्थ महारथी माधवाचार्य शास्त्री जी लड़ लड़ के मर गए कि हमारे राम ने कोई गलती नहीं की। हमारे राम ने कोई गलती नहीं की। वो बुलके ने किताब लिख दी। जैनियों ने किताबें लिख दी। बौद्धों ने किताबें लिख दी। कि नहीं राम ने भी बाली को छुप के मारा। सबका जवाब दे दे के वो मरे जा रहे हैं और यहां ये खुद ही उनको मर्यादा का उल्लंघन करने वाला सिद्ध करने पर तुले हुए हैं ब्रह्म भाव से। अरे ब्रह्म भाव से

00:27:30:24 अगर वो दूसरी चीजें कर सकते हैं तो एक से ज्यादा स्त्रियों को ग्रहण क्यों नहीं कर सकते हैं? अपने वचन से मुकर क्यों नहीं सकते हैं? क्यों सत्य प्रतिज्ञ होना ना? मुकर जाए अपने वचन से ब्रह्म भाव से। क्यों? श्री राम के आदर्श को छीनोगे तुम। इस भागवत आनंद के चक्कर में शबरी के विषय में सहमत हो गया। किस रूप से सहमत हुआ भाई? आदि दैविक दैवीय घटना के रूप में यदि आप उसको मान रहे हैं कि प्रभु श्री राम ने झूठे बैर खाए शबरी के तो मान लो कोई दिक्कत नहीं है। खूब मानो। कुछ भी मान लो आदि दैविक स्वरूप से। व्यवहारिक रूप से वो मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम है। कहीं नहीं माना मैंने कि व्यवहारिक रूप से उन्होंने बेर खाए थे। फिर से देख लेना उसको घुमा करके और ज्यादा उस बात को खींचा इसलिए नहीं कि मूल विषय मेरा है निग्रह परंपरा की प्रामाणिकता यह व्यक्ति भी वो चीजें काट काट के दिखा रहा है जहां उसका मुंह इतना सा हुआ है उसकी बातें दिखा ही नहीं रहा है कि वो स्वा अध्ययन से मिला बोल रहा है शास्त्र कहां से मिले स्वा अध्ययन से किसका अध्ययन किया भाई शास्त्र यदि स्वा अध्ययन से मिले हैं किसका अध्ययन किया था तुमने

00:28:45:20 जो शास्त्र मिल गए तुमको को टपक पड़े तुम्हारे पास स्वास ध्यान से शास्त्र में ले वाह अच्छा अब ये कह रहा है हंसते हुए कि देखो देखो अब ये प्रश्न करेगा कि भैया वो भुसिंडी रामायण कहां से प्राप्त हुई क्यों ये प्रश्न कहां से गलत है कौन से शास्त्रीय आधार से प्रश्न गलत है यहां पे तुम्हारी खिल्ली है ना वही तुम्हारी कमजोरी प्रस्तुत कर रही है वसुंडी रामायण कहां से प्राप्त हुई देखो क्या प्रश्न करेगा क्यों प्रश्न नहीं कर सकते क्या प्रामाणिकता है पुसुंडी रामायण की बोलो ना बिना परम परंपरा के कैसे तुमने मान लिया कि भसुंडी रामायण एक शास्त्र है। किससे माना? प्रश्न तो यह है ही नहीं कि तुम किसी का विरोध कर रहे हो या नहीं। प्रश्न तो यह है ही नहीं कि किस विषय में तुम शास्त्रीय पक्ष तुम्हारा सही है या दूसरे का सही है। प्रश्न तो यह है कि तुम्हें शास्त्र, सिद्धांत और मंत्र यह कहां से प्राप्त हुआ है? उस विषय में तुम्हारा प्रमाण कौन है? यह व्यक्ति कह रहा है यह जो सवाल है यह गलत है। और फिर आगे क्या कह रहा है? मूर्खता की पराकाष्ठा आप देखिए। मैं अगर वहां पर एक उदाहरणार्थ बोल रहा हूं तो फिर गीता प्रेस आपका शब्द प्रमाण हो जाएगा। तो ये व्यक्ति उस शब्द को पकड़ रहा है। जो मैं सैद्धांतिक प्रश्न कर रहा हूं वो नहीं पकड़ रहा है। सिद्धांतिक

00:30:01:06 प्रश्न क्या है? कि यदि भुसुंडी रामायण तुम्हें किसी आचार्य से प्राप्त नहीं हुई है। तुम स्वतंत्र रूप से मोबाइल इत्यादि से प्राप्त कर रहे हो तो वह उपलब्ध कराने वाली जो इंटरनेट का जो पोर्टल है, वेबसाइट है, पीडीएफ है, वो तुम तक पहुंचाने वाला तुम्हारा शब्द प्रमाण हो जाएगा ना। तुम्हें क्या पता काग भुसुंडी रामायण में क्या लिखा था, क्या नहीं लिखा था उसको पढ़ने से पहले? यदि तुम मान रहे हो कि प्रमाण है तुमने किसी से उसको सत्यापित नहीं कराया है तो का बुसनी रामायण में भेजने वाले ने दो श्लोक बढ़ा दिए हो घटा दिए हो तुमको कैसे पता भाई मैं तो ये पूछ रहा हूं ना कि बुसुंडी रामायण तुम्हें प्राप्त कहां से हुई तो हंस रहा है फिर कह रहा है कि गीता प्रेस से अरे गीता प्रेस से हुई हो गीता प्रेस का कोई छपा हुआ ग्रंथ हो या चौकंबा का हो या फिर स्वतंत्र रूप से किसी ने और ने कहीं किसी और पब्लिकेशन से के नाम से वहां डाला हो इंटरनेट पे तुमको तुमको मिल रहा है जिससे भी वो तुम्हारा प्रमाण सिद्ध हो रहा है ना तो ये व्यक्ति कह रहा है देखो देखो इसको यही नहीं पता है कि वो गीता प्रेस नहीं छापता है अरे बेवकूफ व्यक्ति मैं वहां पर प्रश्न ये कर रहा हूं कि वो जिसने भी छापा है जिसने भी उपलब्ध कराया है वो आपका शब्द प्रमाण हो जाएगा वो चाहेगा तो भुसुंड रामायण के नाम पे आपको रावण को भी वो चरित्रवान बना देगा तब क्या करोगे क्यों रावण को चरित्रवान नहीं मानोगे

00:31:16:16 क्योंकि और किसी ने नहीं माना अच्छा वो जो ग्रंथ है उसमें भी पब्लिकेशंस पर निर्भर हो जाओगे तो वो जो चाहेंगे पब्लिकेशन वाले वो लिखेंगे। अच्छा दो में से एक को क्यों किस आधार पर मान लोगे? सीधी सी बात है पूर्वाचार्यों का समर्थन जिसको प्राप्त होगा वो तुम्हारे लिए प्रमाणिक शास्त्र होगा। यह बात तो करनी ही नहीं है। जहां-जहां वो अटक रहे हैं। चार बार में चार उत्तर दे रहे हैं वहां पे बात करनी नहीं। उसको कट करना है। यहां लिख रहा है। यहां भागवतानंद ने कहा था कि स्वाधन से शास्त्र प्राप्त हुए हैं। यहां भगवतानंद ने कहा था आचार परंपरा से हुए तो आचार्य परंपरा पूछी तो चुप हो गए थे। पांच 10 सेकंड का मौन हो गया था पूरे वातावरण में। धागा लपेटते हुए मुंह इतना सा बना के बातों का जवाब दे रहे थे। पता चल रहा था कि उत्तर नहीं है इनके पास। घबराए हुए हैं। विषयंतर करने के अलावा उस चर्चा में भागवतानंद के पास कुछ नहीं था। कि अगर मैं गलत हूं तो तुम भी तो गलत हो। तो कहां गया तुम्हारा मतानुज्ञा निग्रह स्थान अगर दुर्जन तोष न्याय से मान भी लिया जाए शबरी के विषय में बुद्ध के विषय में सब में मैं गलत हूं तो तुम्हारी प्रमाणिकता सिद्ध हो गई मैंने ये बात बोली भी है इस व्यक्ति ने यहां पर एक बात और कही है क्या तुम्हारे आचार्यों के हाथ में देवता वो दे जाते हैं नहीं दे जाते हमारे आचार्य भी पब्लिकेशंस पर या छपे हुए ग्रंथों

00:32:31:18 पर निर्भर होते हैं। परंतु उन्होंने उनकी प्रामाणिकता को सत्यापित कराया होता है। अपने पूर्वाचार्यों से अपने पूर्वाचार्यों से उस ग्रंथ को पढ़ा होता है। तो अगर वो स्वतंत्र रूप से किसी का आह प्रेस से छपा हुआ ग्रंथ लाएंगे और उनके पूर्वाचार्यों ने मना किया होगा कि भैया ये सिद्धांत जो है इसके आलोक में तुम कोई भी ग्रंथ पढ़ना तो हम आराम से वहां देख सकते हैं कि ये विपरीत जा रहा है भाई ये तो पूर्वाचार्य ने मना किया था ये सिद्धांत है नहीं तो या तो उसका अपने समर्थन में अर्थ निकालेंगे और या फिर उसको प्रक्षिप्त घोषित करना पड़ेगा कोई भी छाप सकता है ग्रंथ रामपाल छाप रहा है ग्रंथ वो भी ग्रंथ छाप रहा है जो अभी जिसको जिसकी किताब का विमोचन जो है प्रधानमंत्री ने किया है। वह भी ग्रंथ छाप रहा है। उसको भी मान लो तुम छपा हुआ है बस। अभी वह उसके यहां गए थे। क्या कहते हैं? सत्यम योगी के यहां वो भी दिखा रहा था। मेरा ग्रंथ मान लो। बुद्ध के विषय में जो इसमें लिखा है वो सत्य है। तो कोई भी अगर कुछ लिख देगा तो उसको मान ले बिना आचार्यों के द्वारा सत्यापित किए हुए। और तुम खुद ही कह रहे हो कि हमारी गीता प्रेस में दोष दृष्टि है। इसका मतलब गीता प्रेस झूठ लिख सकती है। तो जब तक आप उसके ग्रंथ को सत्यापित नहीं कराओगे स्वतंत्र रूप से अगर ग्रंथ लोगे तो उसकी प्रमाणिकता पर सवाल बना रहेगा। तो सवाल यह था कि अगर तुमने ग्रंथ प्राप्त अगर तुम ग्रंथ

00:33:46:19 को प्रमाणिक मान रहे हो तो किस आधार पर मान रहे हो? अगर तुम्हारा कोई आधार है तो तुम उसका निग्रह नहीं कर पाओगे क्योंकि जो एक जगह झूठ बोल सकता है वो गलत ग्रंथ को सत्यापित भी कर सकता है और अगर कोई आधार नहीं है तो फिर प्रामाणिकता बताओ इसकी सीधी सी बात निग्रह संप्रदाय खत्म सीधी सी बात थी चर्चा में ही खत्म हो गया और यह व्यक्ति क्या कर रहा है उसके अंशों को काट रहा है जहां उसकी फालतू की जहां वो निरुत्तर हुआ है ना बिल्ली जैसा उसका मुंह बना है जहांजहां पर उतने हिस्सों को काट रहा है अब इसने कहा कि मेरे मन की बात मेरे मुख पर आ ही गई कि भैया जो है तुम अगर खंडन करोगे तो जो है जो आचार्य गण है उनके प्रति जो है आस्था कम हो जाएगी यह हो जाएगा वो हो जाएगा ठीक है अब इसमें क्या कह रहा है मेरे मन की बात है तो क्यों ना हो भाई जब हम किसी विधर्मी से सामना करते हैं ना आर्य समाजियों से सामना करते हैं ना तब गुरुओं के प्रति प्रमाण बुद्धि रखना ही वहां पर काम आता है और देख लो तुमने जो वीडियो बनाया है तुरंत उसको समर्थन करने लगे आज आर्य समाज वाले क्यों करने लगे क्योंकि उनका रास्ते का कांटा रामानुज संप्रदाय नहीं है। उनका रास्ते का कांटा शिवा नारायण द्विवेदी है। जो पूछ रहा है कि वेद मंत्र कहां से मिले? जिनके मंत्रों पर विश्वास है उनके अर्थ पर विश्वास क्यों नहीं है? जिनके अर्थ पर विश्वास नहीं है उनके मंत्र

00:35:01:25 पर विश्वास। क्यों? क्यों? क्यों? शिवश नारायण द्विवेदी खाल उदेड़ रहा है ना इनकी। इसलिए वो तुम्हारा समर्थन करने चले आए। बहुत बढ़िया वीडियो बनाया भैया। बहुत बढ़िया। स्वतंत्र रूप से व्याख्या कर सकते हैं हम लोग। शास्त्र कहीं से भी उठाएं उसको शास्त्र का ठप्पा लगा दे और स्वतंत्र रूप से हम लोग उसकी व्याख्या करेंगे। कह देंगे वैदिक है। ऐसे थोड़ी ना होगा। आएंगे मैं चला जाऊंगा दूसरा कोई आएगा। पूछेंगे शास्त्रों की प्रमाणिकता क्या है? मैंने कभी अपने वक्तव्यों में ये नहीं कहा केवल गुरु केवल गुरु गुरु गोविंद और ग्रंथ। मेरे हर वीडियो के एंड में एक चित्रपट आता है जिसमें कि मिशन गुरु गोविंद ग्रंथ लिखा रहता है। उसमें कभी नहीं लिखा कि मिशन गुरु मिशन गोविंद गुरु गोविंद और ग्रंथ इन तीनों के सामंजस्य से जो प्राप्त होगा वो धर्म है। अगर सामंजस्यता नहीं है गुरु शास्त्र के विरुद्ध जा रहा है तो गुरु को भी हटाया हटाना पड़ेगा। शास्त्र यदि गुरु के विरुद्ध जा रहा है तब भी हटाना पड़ेगा। मगर ये सब तुम्हारे भेजे में तब उतरेगा जब सामने आमने सामने से बात होगी ना जब आमने सामने से जब बात होगी तब तुम्हारी जो ये जो तुच्छ बुद्धि है ना उसका प्रमाण लोगों को दिखाई देगा हम होने वाली है ना वेट कर रहा हूं मैं है कि यदि हम सभी आचार्यों में दोष दृष्टि रखेंगे

00:36:17:20 तो फिर हम किस ये कैसे कह पाएंगे किसी से कि जाकिर नायक तुम हमारे शास्त्रों का अर्थ नहीं कर सकते हो जब हम वहां पर यह कहेंगे कि भैया तुम श्वेता शत्रुपनिषद का अर्थ नहीं बताओगे। तुम नातस प्रतिमा अस्ति का अर्थ नहीं बताओगे बल्कि हमारे परंपरा प्राप्त आचार्य बताएंगे उसका अर्थ तो वो ये कहेगा कि भैया परंपरा प्राप्त आचार्य तो शबरी के विषय में अभी झूठ बोल रहे हैं या उनका तो निग्रह कर रहा है ना निग्रह संप्रदाय वाला यानी कि वो सबके प्रति उनमें कोई ऐसा नहीं है जिसके प्रति प्रमाण बुद्धि हो तुम्हारी तो मुझसे क्यों कह रहे हो कि मैं नहीं कर सकता मैं भी करूंगा तो वहां पर अकाट रूप से हम जाकिर नायक जैसों को उत्तर दे पाएंगे क्या तुम जैसे लोगों की बातें मान लेंगे तो मैं दूंगा उत्तर वहां कि जो जिनके हम शास्त्र प्राप्त हुए उन्हीं का अर्थ भी मान्य होगा। जिनके द्वारा शास्त्र प्राप्त हुए हैं उनका ही अर्थ भी मान्य होगा शास्त्र का। ठीक है? तो शास्त्रों की अवेलना की बात तो मैंने की ही नहीं कहीं पे। मैं तो यहां पर यह सवाल उठा रहा हूं कि भैया जब वो बात को जबकि विषय वो चल ही नहीं रहा है। कि तुमने किसी का विरोध किया कि नहीं किया जो मैंने पहले क्लियर कर दिया। मगर यदि वहां पर बात आ भी गई है तो वहां मैं क्लियर कर रहा हूं की इससे दिक्कत क्या होती है जब यह सवाल आ रहा है तुम भागवतानंद का विरोध क्यों कर रहे हो तो

00:37:32:21 क्योंकि भागवतानंद स्वयं किसी प्रामाणिक संप्रदाय से नहीं है। ऐसे में वो जब प्रामाणिक आचार्यों के विरुद्ध बोलेगा तो वहां पर ये दिक्कत आएगी कि भैया वो तो सभी प्रामाणिक संप्रदायों के आचार्यों में से किसी के प्रति भी प्रमाण बुद्धि नहीं रख रहा है और उसके इस निग्रह को स्वीकार किया जा रहा है प्रामाणिक आचार्यों के द्वारा प्रमाणिक लोगों के द्वारा तो फिर मुझसे क्यों कह रहे हो कि मैं भी उनकी सीमा में रहकर के अर्थ करूं नातस प्रतिमा का या श्वेता शत्रुपनिषद का या मनु स्मृति का क्यों करूं भाई बिना परंपरा के करूंगा मैं क्यों करूं मैं उनकी सीमा में रह के अर्थ तब तुम्हारी बत्ती सी खुल जाएगी तब याद आएगी शिवश भैया बचा लो आ के

00:38:14:04 कभी भिड़े नहीं हो ना दूसरों से कभी युद्ध में तो निकले नहीं हो इसलिए ये सब है कोई बात नहीं जो सीख नहीं पाए मैं सिखा दूंगा तो यहां पर निष्कर्ष क्या निकला अगर संप्रदाय वाला कोई हमारे आचार्य की कही हुई किसी बात पहली बात तो संप्रदाय वाले जब खंडन करते हैं तो सैद्धांतिक खंडन करते हैं व्यक्ति व्यक्तिनिष्ठ को केंद्रित करते व्यक्तिनिष्ठता को केंद्रित करके खंडन नहीं करते वो कहते हैं भाई मान लो कुछ लोग जो है शबरी को जो है ब्राहणी कह रहे हैं मगर ब्राह्मणी नहीं वो भीलनी थी का भुसुंडी रामायण के आधार पे इस तरह से करते नाम लेके तो करते ही नहीं है ये होती है एक मर्यादा फिर भी अगर कर भी देते हैं तो भाई हम ये मान लेते की भाई वो स्वमत की पुष्टि कर रहे है ठीक है अपने संप्रदाय को मान रहे है ऐसा वो मान रहे है भैया राम राम जी का जो अवतार था वो लीला पुरुषोत्तम था मर्यादा पुरुषोत्तम नहीं था हमारे यहां तो राम जी को मर्यादा पुरुषोत्तम माना जाता है और यदि यदि वो सामना करेंगे तो वहां पर प्रतिकार कर देंगे हम रखेंगे भगवान राम के चरित्र के लिए लड़ेंगे भगवान राम ने कभी मर्यादा का उल्लंघन नहीं किया व्यवहारिक रूप से ब्रह्म भाव से वही कृष्ण के रूप में सब कुछ कर रहे हैं ये है धर्म ठीक है तो अगर संप्रदाय विहीन व्यक्ति ये करेगा तो उससे

00:39:29:10 दिक्कत ये आएगी कि हम ये नहीं कह पाएंगे भैया वो स्वमत की पुष्टि के लिए ऐसा कर रहा है उसका सहारा लेकर हर समाजी आएंगे कहेंगे वो भी तो निग्रह कर रहा है उसका तुमने कैसे स्वीकार कर लिया ठीक है जाकिर नायक भी आएगा ये मेरी बात थी कि अगर वो ऐसा कर रहा है परंपरा प्राप्त प्रमाणिक आचार्यों के विषय में अनास्थावान बना रहा है हम अगर वो कह रहा है कि शंकराचार्य जी झूठ बोलते हैं मोह में आसक्त हो गए हैं तो उनका सन्यासत्व सिद्ध होता है क्या सन्यासी सिद्ध होते हैं क्या वो और उसने साचारों पीठों के लिए कुछ ना कुछ बोला अन्गल तो कोई भी शंकराचार्य वर्तमान में है ही नहीं सन्यासी है ही नहीं क्योंकि ये सब बातें तुम जैसे तुच्छ दिमाग वालों को कहां समझ में आएंगी अगर तुम किसी पर मोह में आसक्ति का बोध लगा रहे हो आरोप कि वो आसक्त है अपने परिकरों के प्रेम में या फिर वो कुंठा में है ज्योतिष पीठ वाले या शंगेरी वाले अमुक्त कारण से है तो क्या वो सन्यासी सिद्ध हो रहे हैं तो लक्षण संप सन्यासी सिद्ध नहीं होंगे तो चारों पीठे खा लिए खत्म हो गया आदि शंकराचार्य का संप्रदाय उनके विषय में कौन प्रमाणिक है क्या बात प्रमाणिक है क्या

00:40:44:12 नहीं है कौन बताएगा किस पे क्या भरोसा करें सब अपनी मन मर्जी चलाएंगे नहीं नहीं आदि शंकराचार्य जी ने ये कहा था मेरी मान लो आदि शंकराचार्य जी ने वो कहा था वो मान लो फिर तो उसको ही मान लेना सत्यम योग को जो कह रहा है कि विशिष्टा द्वैत बकवास है उसको ही मान लेना चलो अब बात आती कि इसने कहा कि थोड़ा आत्मनिरीक्षण करो बालक। ठीक है? वो बालक कौन है और व्ययस्क कौन है? ये सब तो जब सामना आमनासामना होगा तो पता चलेगा ही। मैं इस तरीके से निर्णायक नहीं बनता हूं। पर इसने एक बात कही कि भाई तुम्हारी अपनी व्यक्तिगत श्रद्धा के कारण क्या जो है पूर्वाचार्यों ने व्यास इत्यादि सरीखे जो आचार्यों ने लिख लिखा है उसमें श्रद्धा बंद कर दें। मैंने वहां कहा है कि उसमें सिद्धा मत रखो। मैं प्रश्न यह कह रहा हूं कि यदि तुम काउंटर कर रहे हो तो तुम्हारे पास काउंटर करने का जो आधार है तुम शास्त्र जिसको बता रहे हो उस शास्त्र के लिए तुम किस पर निर्भर करते हो? क्योंकि मैं तुम्हें वहां लाना चाह रहा हूं जहां पर तुम्हारा निग्रह समाप्त होगा और जहां पर तुम्हारे निग्रह संप्रदाय की प्रमाणिकता खत्म होगी। जब तुम निग्रह नहीं कर सकते किसी भी एक आचार्य का यदि तुम निग्रह नहीं करोगे तो निग्रह संप्रदाय समाप्त हो जाएगा। कैसे करोगे?

00:41:59:15 तुमने खुद ही भूक के रखा है ना तो यह व्यक्ति कह रहा है तुम्हारी अपनी मैंने कब कहा भाई शास्त्रों में ना रखो भाई मैं शास्त्रों का तुम्हें उदाहरण दूंगा शास्त्रों के तुम्हें प्रमाण दूंगा मगर अभी विषय चल रहा है निग्रह संप्रदाय की प्रामाणिकता इसलिए मैं उन विषयों को छेड़ नहीं रहा हूं और भी मैंने बहुत से विषयों को नहीं छेड़ा उसने खूब कोशिश की उसने भी आरोप लगाया कि तुमने मेरे ऊपर ये जोधपुर गए वो कहे मैंने इन सब बातों में क्यों नहीं छुआ इन सब बातों को फिर और भटकता मामला तो इसलिए मैं बार-बार मूल प्रश्न पर आ रहा हूं और यह व्यक्ति उसके उन दृश्यों को काट दे रहा है जब मैं मूल प्रश्न पे आ रहा हूं। शास्त्र मिले कहां से आपको? अब इसने एक बात और कही है कि श्रद्धाहीन जो होता है उसको जो है प्रश्न नहीं प्रश्न का जवाब नहीं दिया जाता है। तो क्या मेरे वहां आने से पहले भागवतानंद को नहीं मालूम था कि मैं निग्रह संप्रदाय में श्रद्धा नहीं रखता हूं। कैसी मूर्खों वाली बातें कर रहा है भाई। और फिर मुझे बालक कह रहा है। अच्छा दूसरी बात यह है कि भगवत गीता में भी कहा गया है कि भगवत गीता श्रद्धा श्रद्धावान को ही सुनाएं। श्रद्धावान का मतलब क्या होता है? एक बच्चा जो जन्म लिया है क्या वो श्रद्धावान होता है? तो उसको क्यों सुनाते हैं हम भगवान के दृश्य क्यों बताते हैं? भगवत वचन क्यों बताते हैं? भगवान की लीलाएं क्यों बताते

00:43:14:21 हैं उसको? श्रद्धाहीन और श्रद्धावान होने के विषय में केवल इतना अर्थ ग्रहण किया जा सकता है कि जो व्यक्ति अपनी आत्मा के अंदर से उठने वाले सवाल है असतो मा सद्गमया तस ज्योतिर्गमया जो व्यक्ति इन सवालों को सुन रहा है अपनी आत्मा की आवाज को सुन रहा है उसको शास्त्रीय विषय या उसको जो है आध्यात्मिक विषय बताने चाहिए और जो व्यक्ति अपनी आत्मा की आवाज को ही नजरअंदाज कर रहा है मुझे तो एसी लाना है टीवी लाना है फ्रिज लाना है मुझे मत बता भाई तू असुतोमा सद में वो व्यक्ति श्रद्धावान है क्योंकि वो अपनी आत्मा की आवाज को ठुकरा रहा है। क्योंकि हर व्यक्ति भगवान के विषय में जानने से पहले भगवान के प्रति अश्रद्धावान होता है। फिर किसको पढ़ाओगे गीता? किसको पढ़ाओगे गीता बताओ? हर व्यक्ति भगवान को जानने से पहले तक भगवान के प्रति अश्रद्धावान ही होता है। कोई प्रारब्ध के कारण कोई दिव्यता के कारण कोई अगर जन्म ले लिया तो बात अलग है। मगर जिसके अगर वो जन्म लिया है तो वो जो दिव्यता उससे जुड़ी हुई है उससे पूर्व तक वो भी उस हिस्से में भी वो अश्रद्धावान ही सिद्ध होगा। जब तक उसे भगवत चर्चा नहीं करोगे तो ये वाला कुतर्क है। सबसे पहली बात तो कि श्रद्धावान को ही बताया जाए। दूसरी बात श्रद्धावान मैं पहले से ही नहीं था। जब चर्चा में तुम प्रश्नों

00:44:29:27 में अटक रहे हो तब जो है कह रहे हो कि तुम श्रद्धावान नहीं हो। क्यों? जब मैंने शुरुआत में कहा था कि भैया जिज्ञासा शांत करो। जिज्ञासा बोला था ना कि उसमें प्रकाश डालो। जिज्ञासाएं दूसरी है। जिज्ञासा मैं नहीं दूंगा जवाब। तुम श्रद्धावान नहीं हो। और दूसरी बात भागवतानंद ने कहा है अपने वीडियो में कि मैं तो पूरी शंकराचार्य जी के संबंध में जो है अपना शिष्य होने का कर्तव्य निभा रहा हूं। क्या कर्तव्य निभाया भाई तूने? तू गया उनके पास श्रद्धावान एक शिष्य की तरीके से ह तुझे मिलने नहीं दिया गया तो तू बागी हो गया। करत करत अभ्यास जड़मति हो सुजान रस आवत जात ते सिल परान श्रद्धावान शिष्य बन के दिखाता वहां क्यों नहीं बनाता फिर तू क्यों चाहता है कि तेरे विषयों का जो पूरी के शंकराचार्य जी खंडन करें जिससे तेरा और चमक जाए वो तेरा जो तथाकथित कपोल कल्पित संप्रदाय है हं वो अपने स्तर से उतर आए नीचे तेरे जैसों को मुंह लगाएं अच्छा अब इसने कहा कि जो मजाक उड़ाने के लिए आया है, जो विरोध करने के लिए आया है या जो श्रद्धावान नहीं है, उसको क्यों दिया जाए? उपदेश क्यों किया जाए? तो भाई शुरू के उपदेश क्यों किए

00:45:45:03 गए? जो शुरुआत में उपदेश दिए गए मैंने पहले भी बताया कि उपदेश क्यों किए गए? अब इसमें एक बात इसने और कही है कि उनको याद है शास्त्र पर तुम्हारे कहने पर वो क्यों सुनाएं। पहली बात तो उसका याद होना सिद्ध नहीं होता क्योंकि वो मोबाइल में देख- देख के उसके बहुत सारे वीडियोस है। मोबाइल में देख- देख के वो शादी कर रहा था। अपनी फेरे ले रहा था। उसको तो याद थे शास्त्र। क्यों मोबाइल में देखदेख के फेरे लिए भैया उसने? अच्छा दूसरी बात तो ये ये अपने आप में एक हंसी की बात है। यहां पर ये जो है इस बात का पोषण कर रहा है कि उसको सारे शास्त्र याद है। वाह भाई वाह। उसको महाभारत ये छह छह खंडों में जो रखी हुई है। ये सब श्लोक क्रमांक सहित उसको याद है। बहुत बढ़िया। बहुत बढ़िया। अच्छा जा रहे हो। ये अच्छा तुमने किया। यहां पर अपनी मूर्खता को यहां प्रदर्शित कर दिया। भागवतानंद को अपने तमाम जितना भी वैदिक वांगम में है सब रटा डाला है भगवती की कृपा से हां बहुत बढ़िया अच्छी बात है तभी वो मोबाइल में देख देख कर जो है वीडियो बनाता है अच्छा दूसरी बात क्या कह रहा है कि श्रद्धावान जो नहीं है उसको क्यों सुना दें तो भाई वहां पर ये नहीं कहा गया कि शास्त्र मत सुनाना उसके कहने पर वहां तो यह कहा जा रहा है उपदेश ही मत करना तो क्यों कर रहे हो उपदेश बात सीधी सी यह है कि जब तक तुम्हारे अंदर भूता रहा तथा तब

00:47:00:07 तक तुम भूकते रहे और उसके बाद जहां तुम देखा हमारा मामला तो फेल हो रहा है तो भैया जो है यहां क्या करते हैं ना कुरियात सस भाषणम जो है हम जो है जो श्रद्धावान नहीं है उसको जो है वो बताने के लिए मना किया गया है ठीक है अच्छा जो श्रद्धावान नहीं है उससे शास्त्रार्थ क्यों किया जाए शास्त्रार्थ तो होता ही उससे है जो आपके मत में श्रद्धा नहीं रखता है तो शास्त्रार्थ होगा ही नहीं कभी फिर तुम शास्त्रार्थ की बात क्यों कह रहे हो कि हम शास्त्रार्थ करेंगे जाकर के निग्रह करेंगे चर्चा क्यों करोगे तुम किसी से पक्ष विपक्ष की बात क्यों करोगे

00:47:41:01 यह सब बातें नहीं करनी है अब यह व्यक्ति कह रहा है कि वो जो भी बोल रहे हैं शास्त्र का संदर्भ देते हुए ही तो बोल रहे हैं तो शास्त्र को क्यों सुना है बात ये नहीं है कि वो शास्त्रों से बोल रहे हैं कि नहीं बोल रहे हैं बात ये है कि उसको शास्त्र क्या भगवती की कृपा से सारे शास्त्र उसको या अतीत जन्मांतर से सारे शास्त्र उसको रटे हुए हैं कि नहीं रटे हुए हैं क्योंकि वो कह रहा है कि मैं शास्त्रों के विषय में जो है अतीत जन्मांतर पर निर्भर हूं। शास्त्रों के विषय में भगवती पर निर्भर हूं। तो उसके पास पहले से वो शास्त्र है। तो फिर वो मोबाइल क्यों देख रहा है? इसलिए कहा जा रहा है कि शास्त्र तुम सुना दो अगर तुमको मालूम है तो है ना? तो वहां पर बात को कहां ले जा रहा है कि जो वो बोल रहे हैं वो जो है शास्त्रों में है नहीं क्या? विषय यह नहीं है कि वो शास्त्रों में है कि नहीं। विषय यह है कि शास्त्रों के लिए तुमने बताया है कि मैं अपने अतीत जन्मांतर से मेरे को प्राप्त है शास्त्र मैं कहीं नहीं लेने गया। तुम्हारी इस बात को काउंटर करने के लिए वहां पूछा जा रहा है और ये लगे वहां पर जो फिल्मी दुनिया के साइड हीरो आते थे ना वो आए अपना साइड रोल निभाने के लिए। चलिए अब इसने फिर मेरे उस शब्द को पकड़ा कि तुम परंपरा का विरोध कर रहे हो। अरे भैया वहां पर मेरा कहने का तात्पर्य यही है कि परंपरा का विरोध कर रहे हो। परंपरा प्राप्त आचार्यों का विरोध कर रहे हो। विषय वो है ही नहीं। विषय तो यह है

00:48:56:02 कि तुम शास्त्र के लिए किस पर निर्भर करते हो। मैं यहां भी वही बात बार-बार बोल रहा हूं। ठीक है? फिर ये कह रहा है कि भैया इसको जब पूर्व में बता दिया गया है कि परंपरा का विरोध नहीं। परंपरा से जुड़े हुए लोगों का विरोध हो रहा है। तो मैंने समझा दिया है कि शंकराचार्य का रामानुजाचार्य की गद्दी पर बैठने वाला मधवाचार्य की गद्दी पर बैठने वाले का अगर तुम विरोध कर रहे हो तो परंपरा का विरोधी माना जाएगा। तुम उसके किसी अनुयाई का विरोध नहीं कर रहे हो। उसके निर्णायक का विरोध कर रहे हो। जो उसका ब्रेन है उसका विरोध कर रहे हो। जो उसका सीपीयू है उसका विरोध कर रहे हो। उसके रूप में तुम भगवत आदि शंकराचार्य का विरोध कर रहे हो। तो या तो तुम यह कह रहे हो कि इस समय जो संप्रदाय है वो खत्म हो चुका है। अगर वो सन्यासी ही नहीं है और यदि वो सन्यासी हैं। ये तुम मान रहे हो कि वो सन्यासी हैं तो फिर तुम्हें मानना पड़ेगा कि उनके रूप में भगवत पाद आदि शंकराचार्य जी ही हैं। तो तुम जो विरोध कर रहे हो वो उनका विरोध कर रहे हो। उनकी परंपरा का विरोध सिद्ध हो जाता है। फिर भी मैंने वहां पर जो परंपरा शब्द का विरोध का उपयोग किया था वह इस रूप में किया था कि तुम परंपरा प्राप्त आचार्यों का विरोध कर रहे हो। मगर वहां पे इस पर ध्यान ना देते हुए देखो देखो इसको समझा दिया गया फिर से वही बात बोल रहा है। अरे भैया विरोध कर रहे हो ना परंपरा प्राप्त आचार्य का शास्त्र के आधार पे वो शास्त्र शास्त्र है। तुमने कैसे तय किया? प्रश्न

00:50:11:06 यह है क्योंकि जब तुम जैसे ही बोलोगे ऐसे तय किया वो ऐसे के चक्कर में तुम्हारा निग्रह हो जाएगा। खत्म। और निग्रह खत्म निग्रह संप्रदाय खत्म। यह बात मैंने भी वीडियो में वहां पर कही कि भाई तुम उसका विरोध मैंने जब परंपरा का विरोध पूछा गया तो मैंने वहां समझाया कि तुम उसका विरोध कर रहे हो जो परम जो शंकराचार्य की गद्दी पर बैठने वाला जिसका समर्थन कर रहे हैं। तो तुम उसका विरोध कर रहे हो तो तुम शंकराचार्य का विरोध कर रहे हो। शंकराचार्य का विरोध कर रहे हो। शंकराचार्य परंपरा का विरोध कर रहे हो। अब ये व्यक्ति यहां पर हमें यह भी बताएगा आकर के कि भैया तुम्हारे वो आपस में वो चीजें मान्य है कि नहीं। तो इस हिसाब से रामानुज में रामानुज रामानुजाचार्यों में रामानुज संप्रदाय के जितने भी प्रमाणिक आचार्यों में जरा जरा सा भी भेद हो तो किसी भी बात को वहां की को प्रामाणिक मानेंगे ही नहीं। चाहे भले ही वो रामानुजाचार्य कह रहे हो यानी कि चाहे भले ही वो विद्या भास्कर जी कह रहे हो राघवाचार्य जी कह रहे हो मानेंगे ही नहीं। क्योंकि भेद है ना उसमें तो अरे भैया वस्तुनिष्ठ चीजों में वर्तमान की जानकारियों को लेकर के भेद है। सिद्धांतिक भेद नहीं है। शास्त्रीय अर्थ के रूप में भेद नहीं है। और यदि भेद होगा भी तो उसमें वहां माना जाएगा कि एक ही तत्व ने अपना ही खंडन किया है। शंकराचार्य ने खंडन किया है तो वहां स्वीकार कर लिया जाएगा कि भैया जो जिसका गुरु जो जिसका शिष्य है वो अपने क्या कहते हैं

00:51:27:08 उसमें श्रद्धा रखे। जैसे कि भागवतानंद ने कहा मधवाचार्य मधवाचार्य जी ने इनका खंडन किया। उनका खंडन किया तो भागवतानंद ने कहा कि भैया भगवत अवतार आपस में एक ही तत्व दूसरे अपने दूसरे रूप का खंडन कर रहा है। उसमें हम कैसे बोले? अब इस व्यक्ति ने कहा है कि भाई अपया दीक्षित जी ने भी विष्णु धर्मत्तर पुराण के एक श्लोक को कोट किया है और उसको जो है माना है कि वो भीलनी है। तो सबसे पहली बात तो यह आती है कि एक तरफ ये ये खुद कह रहा है कि जो है पूर्वाचार्यों वो आचार्यों से गलती हो सकती है। फिर हमको एक प्रयास कर रहा है। हमको मजबूर कर रहा है कि हम जो है उसके द्वारा जिस रूप में भी हमारे किसी पूर्वाचार्य का कथन है उसी रूप में उसको मान लें क्योंकि वो पूर्वाचार्य का कथन है। जबकि खुद ही आचार्यों में दोष दृष्टि रख रहा है। दूसरी बात ये है कि अपया दीक्षित जी ने क्या कहा है? क्या नहीं कहा है? ये तो हमें कोई उनकी परंपरा से जिन्होंने उनसे प्रामाणिक रूप से गुरुगम्य विद्या के द्वारा अध्ययन किया होगा। वही बताएगा ना। मेरा यही यही प्रश्न था वहां पर। तुमको कैसे पता पाया दीक्षित जी ने क्या कहा है? क्या नहीं कहा है? तीन बेर खाती थी वो तीन बेर खाती है बैरन बास की बांसुरिया गिरजा मुख चूमत बनवारी गिरजा अर्थ गिरजा

00:52:42:09 का अर्थ है उमा गिरजा मुख चूमत बनवारी इसका अर्थ ले लिया जाए कि गिरजा जो है मुमा जो है मनारी का मुख चूम रही है या इसका अर्थ ये लिया जाएगा कि जो बैरन बास की बांसुरिया वो गिरजा इसके लिए हमको अपनी बात को प्रामाणिक दोनों अर्थ निकल रहे हैं मगर प्रामाणिक मानने के लिए किसी परंपरा प्राप्त आचार्य का सहारा लेना पड़ेगा तो उन्होंने पहली बात तो वहां पर उसको भीलनी माना ही नहीं है। और दूसरी बात अगर मैं इस बात के लिए वहां पर लडूंगा तो जो मुख्य विषय है कि तुम शास्त्रों के लिए किस पर निर्भर करते हो वो तो गौण होता चला जा रहा है और यही उसका मंतव्य था और यही ये व्यक्ति यहां कर रहा है। उसके जो दृश्य है विफल होने वाले असफलता वाले उनको काटता चला जा रहा है। और जो विषयांतर कर करके वो जो लाद रहा है विषय से भटकाने के लिए उन पर केवल बात कर रहा है। हां और जो यह इसका कहना है कि अरे भाई अगर वह ब्राह्मण थी भीनी नहीं थी तो उस विषय में शास्त्रीय प्रमाण उपलब्ध क्यों करूं वहां पर वहां तो विषय चल रहा है ना निग्रह संप्रदाय की प्रमाणिकता पांच मिनट की बहस है वो केवल पांच मिनट की और खत्म है उसमें उसका संप्रदाय केवल इधर उधर भटकाव

00:53:57:13 के लिए दूसरी बातें की गई है निग्रह संप्रदाय की प्रामाणिकता के विषय में क्या बात हुई भाई वहां पर तुम अलग से वीडियो बना करके खूब बोल लो प्रामाणिकता के विषय में वहां पर क्या-क्या बातें हुई है और अगर श्रद्धावान के सामने बातें होनी नहीं थी तो फिर क्यों वहां पर शुरू की गई बात व्यक्ति कह रहा है कि स्वतंत्र रूप से जो है ग्रंथ पढ़ के उसका अर्थ समझ में आ सकता है यही तो आर्य समाज जी कहते हैं क्या अंतर है आर्य समाज जी और तुम में क्या फायदा परंपरा का सहारा लेने का जो संप्रदाय विहीन हो गुरु परंपरा विहीन हो उसको त्याग देना चाहिए शंकराचार्य जी ने कहा 13वा अध्याय दूसरा श्लोक अपने भगवत गीता भाष्य में अच्छा तुमने कहा कि मैंने चार अध्याय पढ़े हैं और मैं जो है आगे जो है और पढ़ लेता हूं तो उसमें मेरी चीज को संदिग्ध माना जाएगा क्या? तो मेरे भाई तुम गुरुदेव के द्वारा दिए गए सिद्धांत के अंदर रहकर के खुद पढ़ो बाकी के अध्याय खुद स्वाध्याय करो। मगर गुरुदेव का जब विरोध करोगे कि नहीं गुरुदेव इस जगह पर गलत है। जबकि गुरुदेव कह रहे होंगे नहीं तुम यहां पर गलत अर्थ ले रहे हो। यहां पर बेर का अर्थ जो है तीन बेर है। उन्होंने दोनों बार यह नहीं कहा तीन बर खाती थी वह तीन बर खाती तो उन्होंने दोनों बार नहीं कहा कि तीन बर खाती थी वह तीन बर खाती

00:55:12:19 है। पहले बार जो शब्द आया है तीन बर खाती थी वो उस उसका अर्थ था थ्री टाइम्स इन ए डे। दूसरी बार जो शब्द आया है तीन बर खाती है उसका मतलब है थ्री फ्रूट्स इन ए डे। थ्री टाइम्स इन ए डे। वो दिन भर में तीन बार भोजन करती थी। और अब थ्री फ्रूट्स इन ए डे। अब वो दिन भर में सिर्फ तीन बेर खाती है। बेर नामक फल खाती है। तीन इतनी उसकी दशा खराब हो चुकी है। तो फल का अर्थ यहां पर समझ में आ रहा है कि बेर है। फिर भी अलग-अलग अर्थ हो गया। ठीक है? तो अगर तुम गुरु से स्वतंत्र होकर के पढ़ोगे तो वहां पर तुम निर्णायक रूप से नहीं कह सकते कि नहीं इसका अर्थ यही लेना है। नहीं तो मैंने पूछा है। जनते शूद्रा उसका अर्थ क्या लोगे तुम? स्वतंत्र रूप से अगर पढ़ोगे तो उसका अर्थ लेना पड़ेगा। कि भैया उसका अर्थ तो वही है कि जन्म से सब शूद्र होते हैं। तो फिर काहे के लिए बोलोगे कि शूद्रवत होते हैं। क्योंकि तुमने किसी परंपरा प्राप्त आचार्य से उसको जाना होगा कि भैया क्या है सिद्धांत कि नहीं जन्म से सब जो है शूद्र नहीं वो जन्म से वो जो वर्ण व्यवस्था है वो जन्म से होती है। कर्म से नहीं होती है। तो फिर वहां पर शूद्र क्यों कहा जा रहा है? जन्म से सब शूद्र है। तो वहां पर शूद्रव बोला जा रहा है। शूद्र

00:56:27:20 के जैसे होते हैं। फिर संस्कार से वो जो है द्विज आचरण से भी द्विज हो जाते हैं। ठीक है? तो ये सब बातें वो तब बात आती है ना जब सामने से बात हो। मजा तब आता है। अब ये व्यक्ति मुझसे कह रहा है कि होमवर्क करके आया करो। तो बालक होमवर्क तुम्हारा इनकंप्लीट है। है ना? और तुम हमें कह रहे हो कि जो है होमवर्क करके आया करो। तो होमवर्क क्यों नहीं कंप्लीट है तुम्हारा? वो भी बता देते हैं। भागवतानंद का वीडियो सुनो। और

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00:56:58:28 भगवती ने मुझे यही वरदान दिया। इस बात की भी मैं शपथ कर सकता हूं कि यदि तुम्हारी बुद्धि कभी अधर्म में लग रही होगी तो क्रिया पर तुम्हारा नियंत्रण होगा। बुद्धि खराब होने से तुम्हारा कर्म खराब नहीं होने दूंगी। और यदि कभी तुम क्रिया ही गलत करने जा रहे हो तो बुद्धि भ्रष्ट नहीं होगी। तुम्हारा विवेक तुम्हें रोक लेगा। यदि कभी कलयुग के प्रभाव से बुद्धि गड़बड़ा रही हो तो क्रिया नियंत्रित रह जाएगी। कभी क्रिया ही गड़बड़ होने जा रही हो तो बुद्धि वहां तुम्हें बचा लेगी। बहुत बड़ा एक रक्षा कवच माणसा हमें प्रदान किया है ऋग संप्रदाय के अंतर्गत

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00:57:31:13 इसमें वो कह रहा है कि यदि तुम्हारी बुद्धि कहीं पर बिगड़ रही होगी यदि तुम्हारी बुद्धि कहीं पर बिगड़ रही होगी तो तुम्हारा जो जो क्रिया नहीं बिगड़ेगी यानी कि बुद्धि खराब हो रही है पर कर्मेंद्रियों से गलती नहीं होगी। ये उसने कहा है बिगड़ रही होगी तो क्रिया नहीं बिगड़ेगी और यदि क्रिया बिगड़ रही होगी तो विवेक उसे रोक लेगा। यानी कि गलती होगी ही नहीं। गलती होगी ही नहीं। और यदि होने के बाद शोधन करने की चीज है तो इसमें वरदान का काम क्या है फिर? इसमें वरदान की क्या विशेषता रह गई? फिर तो फिर सब जितने भी लोग हैं शास्त्र सम्मत आचार्यों के पास जो जा रहे हैं वो सब अपनी चीजों का पश्चाताप कर रहे हैं। शोधन कर रहे हैं लोग। और वो तो खुद कह रहा है ना कि न्यूनतम अधर्मी होगी। उसको तो सुन लो। क्रिया गलत नहीं होगी। बहुत न्यूनतम गलत तो होगी। बड़ी गलत नहीं होगी। मतलब कि उसका कहने का अर्थ है वाक स्कलन जैसी इत्यादि जो न्यूनतम गलतियां हैं वह तो हो जाएंगी। उस पर वरदान काम नहीं करेगा। बड़ी गलतियों पर काम करेगा। बड़ी गलतियां होंगी ही नहीं। ये वो कह रहा है। बड़ी क्रिया गलत होगी ही नहीं। अपने बाबा जी को तो सुन ले भाई। और फिर मुझको बालक कह रहा है। क्या चेचिस की

00:58:46:14 तरह जैसे शरीर में हड्डी हड्डी है वैसे दिमाग भी खाली है क्या? बाबा जी स्वयं कह रहे हैं कि बड़ी गलतियां होंगी ही नहीं। तो तुम कैसे कह रहे हो कि नहीं गलतियां हो सकती है बाद में विवेक ठीक कर लेगा और फिर इसमें विशेषता क्या रह गई वरदान की फिर और बाबा जी स्वयं जब कह रहे हैं कि भैया गलतियां छोटी वाली हो जाएंगी बड़ी वाली नहीं होंगी यानी वो कह रहे हैं ना कि क्रिया गलत नहीं होगी खुद कह रहे हैं बाबा फिर भी नहीं दिमाग काम कर रहा है इतना पार्शियल व्यक्ति आश्चर्य हो रहा है ये व्यक्ति ऐसे व्यक्ति पोषित करेंगे हमारे धर्म को पक्षपाती कहीं के फिर वही बात बोल रहा है भट भटकेगा ना जबकि वो कह रहा है भटकेगा ही नहीं। बड़ी गलतियों में दिमाग या बुद्धि एक साथ भटकेगी ही नहीं। क्रिया गलत होगी ही नहीं। बड़े चीजों में वो भी कह रहा है छोटी चीजें होंगी। बड़ी चीजें होंगी ही नहीं। तो तू अपने भागवतानंद को ही तो काट रहा है यहां पर। वो तो कह रहा है ना मुझसे बड़ी गलतियां होंगी ही नहीं। भगवती का वरदान है। यानी कि क्रिया पर नियंत्रण है। होगा ही नहीं। यहीं पर तेरी बात गलत हो गई। अब दूसरी बात वहां पर यह था कि भैया भगवती ने कोई लिस्ट प्रोवाइड कराई है क्या कि यह फलानी फलानी चीजें न्यूनतम में आती है तो यह नहीं होंगी। कोई वरदान ऐसे देता

01:00:01:20 है क्या? क्रिया गलत नहीं होगी तो नहीं होगी। ये वरदान होता है। या तो उन्होंने फर्रा दिया हो तो दिखा दो कौन सा फर्रा है? मैंने पूछा तो उसका पैरामीटर क्या है? न्यूनतम इत्यादि का। उन्होंने वरदान देते समय दिया था क्या? तो हम तुम्हें क्यों बताया? आंसर नहीं है तो कहां से बताओगे? यही कहोगे। जब मैं उसमें चर्चा में कह रहा हूं वाक्य स्कलन होगा ही नहीं। तो ये कह रहा है तुम्हारी मूर्खता है बालक। अरे मूर्ख तो तू है। जब वो कह रहा है कि न्यूनतम गलतियां हो सकती है। बड़ी गलतियां नहीं हो सकती है। तो मुझे कह रहा है कि मूर्ख है। फिर कह रहे हो बालक। वैसे तो इस बात का जवाब मैंने दे दिया है कि शास्त्र कहे कि शुद्धोधन पुत्र जो है क्षत्रिय था और गुरु कहे कि क्या कहते हैं? शास्त्र यदि कहे कि शुद्धोधन पुत्र क्षत्रिय था और गुरु कहे कि नहीं नहीं शुद्धोधन पुत्र जो है क्षत्रिय तो था मगर वो जो है हमारे बुद्ध के अवतार नहीं है। हालांकि वहां पर हमें प्रमाण प्राप्त है पर्याप्त और अलग से वीडियो भी बनेगा। शबरी ब्राहणी के विषय में और झूठे बेर के विषय में और शुद्धोधन पुत्र वाले जो बुद्ध है उसके विषय में वीडियो अलग से बनेगा। पर फिलहाल बात यह है कि यदि ऐसी स्थिति आ भी जाएगी कि शास्त्र में जो लिखा है वो गुरु मना कर रहे हैं। तो वहां पर हमें मानना पड़ेगा। हमें नहीं मालूम क्या शास्त्र है क्या शास्त्र नहीं है। वहां धर्म

01:01:16:26 गलत सिद्ध हो जाएगा। धर्म की असिद्धि हो जाएगी। गुरु गोविंद और ग्रंथ केवल गुरु नहीं केवल गोविंद नहीं केवल ग्रंथ नहीं। अगर गुरु की वाणी शास्त्र से मैच नहीं खा रही है। तो गुरु अगर एक जगह गलत बोल सकते हैं तो दसियों जगह गलत बोल सकते हैं। और दुख न्याय करोगे क्या? गुरु ने हमको कहा कि यह शास्त्र है। अगर हम गुरु पर विश्वास करते हैं तो हमने मान लिया कि शास्त्र है। अब हम ही कह रहे हैं गुरु अमुक अमुक विषय में शास्त्र संबंधी बातों पर झूठ बोल रहे हैं। अच्छा एक बात और है। एक बात और है इसने शुरू में भी कही है वो बात में प्रकाश नहीं डाल पाया कि इसका कहना है कि जो कृत है उन वह भी जो है जो वचन होते है गुरुओं के उनका भी जो है आ जो गुरुदेव का वचन होता है वो भी उनका कृत में ही आता है आचरण में ही आता है। पहली बात जो आचरण संबंधी बात है वो आप भी समझ रहे हो कि आचरण क्या होते हैं जो उसके व्यक्तिगत जीवन में वो आचरणों को पालन कर रहा होता है वो आचरण होते हैं। पर यहां पर अगर पूरी तरीके से यह कर लेंगे कि अगर वचन को भी आचरण मान लेंगे जो गुरु की व्याख्या है उसको आचरण से बाहर नहीं निकालेंगे तो श्वेता शत्रुपनिषद छह 23 का क्या करेंगे कि गुरु और जो

01:02:31:27 है भगवान में अंतर नहीं करना चाहिए वहां क्या करोगे गुरु के उस आचरण का आप विरोध कर सकते हो जिस आचरण को गुरु ने स्वयं गलत माना हो क्योंकि गुरु वही जो अंधकार को दूर करे आपका अंधकार उसी ने दूर किया है यदि वो अपने ही द्वारा बताए गए सिद्धांत के विरुद्ध जा रहा है। वो कह रहा है मेरा यह आचरण गलत है। तब तुम कह सकते हो कि हां भाई तुम गलत हो यहां पर। यदि वो यह कह रहा है कि मेरा आचरण गलत नहीं है। तुम शास्त्र का गलत अर्थ समझ रहे हो। मेरा यह आचरण गलत नहीं है। तुम शास्त्र का गलत अर्थ समझ रहे हो। तो या तो वहां पर यह मानना छोड़ दो कि हम वैदिक धर्म की बात कर रहे हैं। क्योंकि वैदिक धर्म आए तो उन्हीं की मध्यस्थता से है। वो वैदिक धर्म के विषय में हमारा प्रमाण है। गुरु परंपरा प्राप्त आचार्य अगर तुम उन पर अविश्वास रखते हो तो उनसे प्राप्त होने वाले शास्त्रों पर भी अविश्वास रखो। और या फिर जिस विषय में वह स्वीकार करें कि मेरा आचरण गलत है तो उस आचरण को गलत मानो और उसका जो उसको फॉलो मत करो। उनके विरुद्ध जाकर के धर्म और धर्म की व्याख्या नहीं कर सकते आप स्वतंत्र रूप से क्योंकि यदि उनके विरुद्ध जाकर के धर्म और धर्म की व्याख्या करेंगे तो वो आपके प्रमाण सिद्ध नहीं होंगे। शब्द प्रमाण और जब वो आपके शब्द प्रमाण सिद्ध नहीं होंगे तो

01:03:46:28 उनके द्वारा प्राप्त होने वाले वेदादि शास्त्र भी आपके प्रमाण सिद्ध नहीं होंगे। तो यदि ऐसी स्थिति आ जाती है कि गुरु आपके बता देने पर भी या गुरु का वाक्य कुछ और हो रहा है, शास्त्र का वाक्य कुछ और हो रहा है, गुरु में श्रद्धा नहीं हो पा रही है तो वहां पे आपकी वैदिकता नष्ट होगी। आप ये क्लेम नहीं कर सकते मैं वैदिक हूं। आपको भगवती ने सपना दिया। आपका अपने अपने से आप ये कह सकते हो कि ठीक है भाई स्वतंत्र रूप से जो है मैं एक नया धर्म और अधर्म की व्याख्या कराने वाला एक निग्रहक कल्ट बना रहा हूं। निग्रहकल्ट क्यों कहोगे निग्रह तो है ही नहीं किसी का। मैं जो है वो बना रहा हूं। क्या कहते हैं? परी परिधर्म मैं परी धर्म बना रहा हूं नया जैसे इस्लाम आया था बाइबल आया था ऐसे ही आया था जब पुराने या पूवाचार्यों द्वारा दिए जाने वाले शास्त्रों में श्रद्धा नहीं बैठी क्योंकि वो झूठ बोल सकता है तो ये भी झूठ हो सकता है तो जब मैच नहीं हुआ तो भैया नया धर्म नहीं तो अपने हिसाब से वेदों का अर्थ तो कोई भी निकाल सकता है फिर उसमें प्रामाणिकता चाहिए ना कि भैया जो अर्थ मैं ले रहा हूं वो परंपरा से भी है। आचार्य यास्क ने निरुक्त तक में यह सब बातें कही है कि मैं जो अर्थ दे रहा हूं, परंपरा से प्राप्त अर्थ है वो मैं दे रहा हूं। श्रुति का मतलब ही है कि तुमने किसी से सुना यदि वर्तमान में शास्त्र छप रहे हैं तो हम छपे हुए शास्त्रों को किसी से सुनकर प्रमाणिक मानेंगे।

01:05:02:12 तब वो श्रुति शास्त्र कहलाएंगे। प्रामाणिक रूप से। हां। यहां पर अब इसने अंत में एक बात और कही है कि भैया वो अगर मुझे चार चीजें बना बताई हैं तो मैं जो है और उसके बाहर एक्सप्लोर एक्सप्लोर करो। मगर गुरुदेव का विरोध बिना किए हुए खूब एक्सप्लोर करो। अगर विरोध करोगे उनकी किसी कथनी का तो तुम्हारा प्रमाण सिद्ध नहीं होगा वो शास्त्र जिसका तुम भाष्य कर रहे हो। अगर तुमने किया है जैसा कि तुमने बताया कि भाई मैंने अष्टाध्यायी में किया तो अष्टाध्याय में अंतिम प्रमाण तुम्हारा वो नहीं होगा। कोई और होगा। जिसको भी मानोगे अंतिम प्रमाण उसका तुम खंडन नहीं कर पाओगे। अंतिम प्रमाण बताओ जिसको भी करो फिर मैं तुम्हें सिद्ध करूंगा कि वो तुम्हारा प्रमाण या तो अंतिम प्रमाण सिद्ध नहीं होता है या फिर तुम उसका विरोध नहीं कर पाओगे। हां उसके सिद्धांत का खंडन किए बिना खूब उसकी व्याख्या करो। खूब उसको एक्सप्लोर करो। स्वा अध्ययन करो और जो विलुप्त ज्ञान विज्ञान है उसको उद्भाषित करो। मगर विरोध करके नहीं पूर्वाचार्य का प्रामाणिक पूर्वाचार्य का ये भी बात ध्यान रखो। जिस बात को उस समय की गुरु गद्दी ने ग्रहण किया हो उसका विरोध करते हुए वर्तमान की गुरु गद्दी उसका विरोध करते हुए या फिर जिस बात को जो वर्तमान की प्रामाणिक गद्दी है उसने ग्रहण किया हो और उसका विरोध करते हुए तुम अपनी शास्त्र व्याख्या

01:06:17:13 करो। वो नहीं कर सकते। हां उन्होंने कोई वचन कहा है। अहम ब्रह्मास्मि उसके समर्थन में तुमने बहुत सारी व्याख्या कर दी। उन्होंने कोई वचन कहा है विशिष्टाद्वैत वाला वचन कहा हो उसके संबंध में तुमने बहुत सारी व्याख्या कर दी बहुत सारे तर्क ले आए प्रमाण भी ले आए वो सब तुम्हारा स्वीकार रहे जो उसके सीमा के अंदर है मगर वो तुम अगर विशिष्टाद्वैत पर ही सवाल उठाने लगोगे नहीं नहीं रामानुज रामानुजाचार्य जी ने गलत कहा था भैया वेदों का तात्पर्य तो ये आ रहा है हां तो बन जाओ फिर शंकर बन जाओ शंकर संप्रदाय के वेदों का तात्पर्य क्या आ रहा है ये तो तुम भी जानते हो अब ये आखिर में कह रहा इसको कुछ अपशब्द नहीं बोला गया है। इसको यह जो है इसको ऐसा नहीं है कि उत्तर नहीं दिया गया है। इसकी किसी भी बात का जो है और यह उठ के जा रहा है कि ठीक है आप जो है उत्तर नहीं दे रहे तो मैं जा रहा हूं। बेवकूफ हो क्या? वो व्यक्ति बोला है ना तुम्हारे सामने कि मैं तुम्हें क्यों बताऊं? वो किसी व्यक्ति का ये कह देना कि मैं तुम्हें क्यों बताऊं? तुम कहीं के आचार्य हो क्या? तुम अनाधिकारी हो। मैं तुम्हें क्यों बताऊं? ये कहना भी प्रश्न का उत्तर ना देना नहीं है। ये भी प्रश्न का उत्तर देना है। वाह भाई [प्रशंसा] गजब आदमी हूं। वाह मजा आ गया तुम्हारी बात सुनकर के। हां। और रही बात ये के कोई भी

01:07:32:16 अपशब्द नहीं बोला गया तो ये जो पूरा वृतांत तुमने सुना है और इस पूरे वृतांत में तुम्हारे लिए जितने भी मैंने ऐसे शब्दों का उपयोग किया है जो तुम्हें जो है अपने लिए नहीं लगे। अगर लगते हैं तो अच्छी बात है। अगर ग्रहण कर लेते हो। और अगर यदि नहीं लगे तो समझ लेना कि मैंने तुम्हें इस योग्य समझा और मेरे द्वारा तुम्हारे को यह सब अह शब्द बोलना गलत नहीं है क्योंकि मैं ही निर्णायक हूं। तुम्हारे और मेरे विषय में जैसे मेरे और भागवतानंद के विषय में निर्णायक भागवतानंद का पक्ष ही है और उस पक्ष से अगर कोई वो ये धारण करते हुए यह व्यक्ति जाहिलियत मूर्ख इत्यादि शब्दों के योग्य है और बृजेश पांडे ने इतने शब्द तुमने स्वीकार किए। बोला है वो उचित है। उसी तरीके से अब मैं वीडियो बना रहा हूं। मेरी जगह है तो मैं निर्णायक हो गया और उस हिसाब से मैंने देख लिया कि तुम देख लिया कि तुम किन-किन शब्दों के योग्य हो तो तुम सिंगल चेचिस के योग्य हो साइड हीरो के योग्य हो हैं और मूर्ख हो मूर्खता की पराकाष्ठा वाले हो रट्टू तोते हो ये सब चीजें तुम पे लागू होती है उचित है तुम्हारे लिए बिल्कुल उचित है वो तो कटाक्ष है मगर तुम्हारे लिए उचित भी है चले आए मुंह उठा के मत पड़ो चक्कर में भैया बता रहा हूं मत पड़ो चक्कर में कोई है नहीं टक्कर

01:08:47:20 में समझा रहा हूं समझ लो खामखा तुम्हारा जो घरौंदा बसाया हुआ है चिड़िया उड़ती हुई नजर आएंगी ठीक है और फिर आगे जो बात कही है कि वो गाली नहीं दी गई तो इस पर तो तुम्हारे बाबा जी ने कहा है ना वो तो शंकराचार्यों से अपेक्षा रखता है कि उसके कहने पर वो ज्योतिष पीठ वाले उतर जाए गंगा में पूरी पूरी पीठ वाले उतर जाए गंगा में और दोनों हाथ में जनेऊ लेकर के कह दे हं कि कौन शंकराचार्य कौन नहीं है तो तू कब लेगा भैया जनेऊ हाथ में तेरे तो बाबा जी का काम है जनेऊ हाथ में जनेऊ हाथ में हर बात में लेना कब लोगे श्री भाष्य पे हाथ रख कर के बोल गाली नहीं दी गई वहां पर जनेऊ हाथ में लेके बोलो बोल अपने बाबा जी को गाली नहीं दी गई थी वहां पर तुम्हारे द्वारा निर्गत किए गए वीडियो में साफ दिख रहा है कि मैंने वहां पर अपना मेरे को जब यह हो गया कि भैया जब तुम उत्तर देने से मना कर रहे हो मेरा काम हो गया। शुरू क्यों किया था उत्तर देना? जब फंस गए तो उत्तर नहीं देंगे और यहां आकर के तोते की तरह मुंह चला लो। तुम्हारे द्वारा निर्गत किए गए वीडियो में साफ दिख रहा है कि मैंने अपना जो मोबाइल है जिससे मैं रिकॉर्डिंग कर रहा था उसको मैंने

01:10:02:24 ऑफ करके और जो है अपने पास रख लिया। बंद की मैंने अपनी रिकॉर्डिंग। तुम्हारे उसमें वीडियो में साफ दिख रहा है। पता है ना? यानी

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01:10:10:26 यानी कि क्रिया तो होगी मगर बाद में उसका शोधन करेंगे आप। बाद में क्या क्रिया बहुत न्यूनतम गलत

⬜ Not used yet · 01:10:16:00 – 01:16:36:00 (6:20)

01:10:16:00 होगी और कदाचित होगा। वो न्यूनतम का पैरामीटर क्या है? कितनी गलत होगी? इसकी सभा हम आपको क्यों दें? फिर मतलब आप किस आचार्य पीठ पर हैं। ठीक बस यही चीज है कि आपको शास्त्र कहां से मिलेगा? शास्त्र आचार्य परंपरा से मिलेगा। कौन सी? करने के लिए बैठ गए हो। ग्रंथ से पता चलेगा। अगर केवल गुरु के वचन होते तो शास्त्र ठीक है। फैला लेने से मस्तिष्क थोड़ी फैल जाती है। शंकराचार्यलियत वाला प्रश्न कर रहे हो एकदम हमने तो तुम 10 शंकर पीठ बनाओ कहो कि जो आप लोग जो आप लोग व्यवहार कर रहे हो ना वो भी वो भी भगवती देख रही है। ठीक है। तो मेरी वहां पर रिकॉर्डिंग समाप्त हो जाना ये दिखाई दे रहा है। मेरी रिकॉर्डिंग वहां रुक जाना। तुम्हारी रिकॉर्डिंग क्यों रुक रही है? क्यों रुक रही है यहां पर? जब मैंने कहा कि ये तुम्हारा व्यवहार भगवती भी देख रही है। क्यों रुक गई तुम्हारी रिकॉर्डिंग भाई कोई है इस बात का जवाब?

01:11:18:04 झूठे कहीं के तरस आता है, दुख होता है। रामानुजाचार्य परंपरा के जो है शिष्य होते हुए और झूठ बोल रहे हो। आंख में हाथ डाल आंख डाल के। खाओ जनेऊ हाथ में लेकर के। मैं भी देखूं कितने सच्चे हो तुम लोग। श्री भाष्य पर हाथ रख के कसम खाओ। सौगंध खाओ। नीचता की पराकाष्ठा पे जा रहे हैं कि जो है वो गाली नहीं दी गई। मैं तो अपना नेता हो के आया था ना। मैं तो नहीं अपनी सेना दलबल को ले आया था साथ में। तुमने तो वो अवसर दिया ही नहीं था। कि समान रूप से बैठकर के चर्चा हो पाए। दिया था क्या वो अवसर? अरे मैं कह रहा हूं ऊपर नीचे की बात नहीं। कम से कम ऐसा वातावरण तो प्राप्त होता जहां पर मुझे टेंशन ना होती कि रिकॉर्डिंग के बाद बाहर कैसे जाएंगे?

01:12:12:19 बोलने की आवश्यकता क्या थी बृजेश पांडे को बीच में? भागवत आनंद पर्याप्त नहीं है क्या? क्या इस मामले में भी उसकी धातु नष्ट हो चुकी है? तो बृजेश पांडे का बोलना तुम्हारा बीच में उत्सुक होना यह सिद्ध कर रहा है कि वहां तुम संतुष्ट नहीं हो पा रहे थे तुम्हारे बाबा जी के उत्तरों से और तुम लोगों को बाबा जी का जो पक्ष है वो कमजोर होता हुआ दिखाई दिया था इसीलिए फड़फड़ा रहे थे कि हम भी बोले हम भी बोले किसी तरीके से बात को निपटाएं खत्म करें बात को पर हमारे हमें जो करना था वो करके आए झूठे की हद तक चोर के घर तक और तुमसे भी कह रहे हैं खामखा अपने चीजों को दाब पे मत लगाओ वो जो रट्टू तोते वाली चीज से चीजें चल रही है वो कर लो हमसे खामखा बैर मोल मत लो क्योंकि हम जब एक तरफ से या तो चालू करते नहीं है और चालू करते हैं ना तो पाताल तक प्रहार कर जल को तू निकाल दे नृत्य कर बिगुल बजा कर ध्वनि तू ताल दे घायल खड़ा पराक्रमी तू आस चाहिए मुझे तेरा अंतिम वही प्रयास चाहिए अंतिम प्रयास तक जाते हैं फिर भागवतानंद की देख रहे हो ना भाषा शैली सुधर गई ना प्रवचनों में लगा हुआ है वो जो निग्रह करता था ना लतखोर तू तू तड़ाक सब बंद हो गया है। अब बड़ा सहजता से वो कर रहा है। बोलना बंद कर दिया उसने। देख

01:13:27:20 लिया ना इसको कहते हैं निग्रह। और हां तो इसके बाद यह चर्चा जब बंद हो गई है उस पर इसने जो मीमांसा की है, समीक्षा की है, उसका उत्तर मैंने आपको दे दिया है। अब इससे आगे इसने जो भी प्रलाप किया होगा वीडियो बहुत लंबा हो जाएगा। तो मैं उसका उत्तर यहां देना उचित नहीं समझ रहा हूं। इसके साथ जो मेरी आमने-सामने की चर्चा सुनिश्चित हो चुकी है। आज नहीं तो कल या तो संडे को लाइव होगी या फिर यह लखनऊ आएगा तो जो है लखनऊ में इसके साथ वन ऑन वन बात होगी और या फिर कहीं ना कहीं अब हो जाएगी जब इसने डन कर दिया। मैं तो प्रस्ताव दे ही चुका था और रही बात इसने एक अपनी वीडियो में यह भी कहा है कि भाई इसने हमारे चैनल पर आकर के कमेंट किया था तो मैंने इसको कम टू लाइव बोला था और फिर मैंने जो है इसका चैनल डिलीट कर दिया। हमने किसी का हम तब तक उसका डिलीट नहीं करते हैं जब तक वो गाली गलौज ना करे। इवन गाली गलौज पे भी अब तो समय ना होने के कारण उसको डिलीट नहीं कर पाते हैं। मगर हमारा जो सिद्धांत यही है कि कोई गाली गलौज करने लगता है तब उसका डिलीट करते हैं। या फिर उसके साथ चर्चा हो चुकी है। निरुत्तर हो चुका है। उसके बाद आकर के वही जीरो से वो अपने प्रश्न फिर कर रहा है। वहां पर चिल्ला रहा है। विधवा विलाप कर रहा है। तब उसको डिलीट करते हैं। हमें जरूरत नहीं पड़ी है टुच्चों के प्रश्नों को डिलीट करने की। हैं तो

01:14:42:21 डिलीट नहीं किया। हां YouTube में मैंने कई बार देखा है कि कोई कोई कमेंट जो होता है बहुत देर के बाद दिखता है या दिखता ही नहीं है तो उसमें अपने हिसाब से निर्णायक हो करके ये सब निर्णय लेना भी एक बचकानी बुद्धि का ही प्रमाण है कि हमने उसका कमेंट डिलीट किया। दूसरी बात प्रतिक्रिया नहीं दी। ये हो सकता है कि हम तुम्हारी प्रतिक्रिया नहीं दे पाए हो क्योंकि बहुत सारे कमेंट आ रहे होते हैं तो प्रतिक्रिया नहीं दे पाए भाई। हां, हमने हमसे चर्चा करने के लिए ओपन चीजें कह रखी हैं। जिसको भी चर्चा करनी हो, डिस्क्रिप्शन में नंबर है। वीडियो के अंत में नंबर है। वहां WhatsApp करके एक फॉर्म प्राप्त होगा। उस फॉर्म को भर दो। अगर कोई विशेष व्यक्ति है तो उसको फॉर्म भरने की जरूरत भी नहीं है। अगर सामने वाला वो होता है ना वो एक बात है झुंड में वार करने वाला शेर नहीं ठग होता है और दुश्मन अगर कायदे का हो ना तो उसे मारने का मजा ही अलग होता है। तो यदि कोई ठीक-ठाक विरोधी है तो उसको फॉर्म भरने की जरूरत नहीं है। वो अपना फोटो भेज देता है। अपना नाम भेज देता है। अपना पक्ष भेज देता है। उससे भी काम चल जाता है। मगर चर्चा को सुनिश्चित करने के लिए हमने अपना नंबर इत्यादि पर्याप्त इंफॉर्मेशन वहां दे रखी है। तो यदि तुम चर्चा को तैयार थे तो तुम्हें उसको प्रोटोकॉल को फॉलो कर लेना होता जो वहां पर वीडियो में दिया गया है। है ना? और डिलीट इत्यादि हम करते नहीं है। तो ये सारी बातें

01:15:57:22 हैं। अब बाकी का विषय हम नहीं उठाएंगे जो इसने अनर्गल और सारे आगे प्रारलाप किए हैं। जो इसने उस चर्चा को लेकर के समीक्षा की थी उसका जवाब दे दिया है। अब आगे बहुत जल्द आप लोगों को इसकी और मेरी जो आमने-सामने की बातचीत है। यदि संभव हुआ तो अवश्य दिखाई देगी। संभव हुआ इसलिए कहता हूं क्योंकि मैं भविष्यवक्ता नहीं बनता हूं और मैं कभी भी निर्णायक ये नहीं बनता। प्रयास करेंगे अभी भी। ठीक है? वैसे तो जहां तक है होगी ही तो ठीक है। सभी को जय श्री राम। [संगीत]

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A: AHVAAN - Call Of Dharma Video 1:16:37 · 03 Feb 2026

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