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00:00:01:28 [घंटी की आवाज़] [संगीत]

00:00:12:09 इस विषय में तुम्हारा क्या पक्ष है कि ये जो है ईश्वर सृष्टि बनाता कैसे है? जो

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00:00:18:12 पहाड़ उठाने में जो शक्ति लग रही है माटी का ढेला उठाने में तो दो पावर वाली लगेगी और अगर नहीं लगेगी तो वो अपनी निश्चित दूरी से ज्यादा आगे जाएगी। फिर अगर पहाड़ वाली ताकत उसमें लग जाएगी तो तो भेद तो लाना ही पड़ेगा तभी तो सृष्टि रचना हो पाएगी। मानते हैं उसमें कहते हैं कि बिल्कुल जैसे जो जीव है वो वो अपनी इच्छा से चाहे हाथ उठाए चाहे हाथ की उंगली उठाए है ना कंट्रोलोल्ड उसकी शक्ति है। उसी प्रकार से ईश्वर भी कंट्रोल है क्योंकि वो बुद्धिमान है। वो इस प्रकार की कि जो उंगली उठा सकता है। ठीक है? जी तो वो इसलिए उठा सकता है क्योंकि उसके पास भेद है। बल है बल है। हां बल भी है और भेद भी है। मतलब रेगुलेट मतलब उसको कंट्रोल है। उसको अपने बल के ऊपर कंट्रोल है। कंट्रोल है। चलो ठीक है। कंट्रोल है। मगर जो जो कंट्रोल करके वो जो

00:01:02:16 जो बल लगा जी जी जी 10 नंबर और दो नंबर ये दोनों अलग-अलग बल है क्वांटिटी में।

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00:01:09:06 ठीक है। अब ये जो बल है ये उससे अलग नहीं है। ईश्वर से है ना? तो ये बल के रूप में ईश्वर में भेद है। यह कम बल है या ज्यादा भेद है। इसको मानते नहीं है अभी हम लोग। [संगीत] कि जैसे मैंने ये कहा कि ईश्वर स्वरूप से निर्बाद है। है ना? तो निर्बाद होना भी उसका स्वरूप है। और अगर आप इस उसके ईश्वर के एक गुण से जो उसका निर्द वाला पॉइंट है उससे उसके स्वरूप का खंडन कर देंगे तो ये चीज ठीक नहीं बैठेगी। अब परंतु यदि सृष्टि निर्माण करने करना पड़ेगा तो उनको कम ज्यादा होना पड़ेगा। वो मैंने फोर्स की बात बताई है ना कहीं पे ज्यादा हो रही शक्ति कहीं पे कम हो रही है। ये सगुण है। उसमें उसमें मैंने थोड़ा सा विचार किया तो मुझे क्या समझ में आया कि जैसे जो हम ईश्वर का जो बल है ठीक है? वास्तव में उसकी इच्छा ही है और उसका बल से हम अर्थ फोर्स नहीं ले सकते हैं। फॉर इसलिए नहीं कोइंसिडेंटली मैं एक बच्चे को पढ़ाता हूं चार से पांच मैं उसको ट्यूशन पढ़ाता हूं तो उसका वो उसमें चैप्टर था फोर्स वर्क एनर्जी वाला वो कल ही मैंने पढ़ाया उसको उसमें जब मैंने फोर्स देखा तो फोर्स की डेफिनेशन लिखी थी पुल या पुश

00:02:24:14 है ना तो मेरे दिमाग में क्लिक किया कि यार पुश और पुल तो एक देसी चीज ही कर सकती है या एक ही साइड से पुश जो सर्व्यापक है उसके पुल पुश और पुल सिद्ध नहीं होता इसीलिए तो सगुण का तभी होगा जब वो अवतार लेंगे वही तो मैं कह रहा हूं नहीं नहीं उसमें पॉइंट ये आ जाए कि पॉइंट ये है कि जैसे ईश्वर तो बिना अवतार लिए ही सृष्टि निर्माण कर रहा है। तो यहां पे या तो यह करना पड़ेगा मैं बताऊं या तो यह मानना पड़ेगा कि फिर वही आप कह दो अचिंत। अब जैसे यहां पे अगर हम यह नहीं मानेंगे कि सगुण हुए भगवान है ना तो हमें यही यहीं पे अचिंत कह देना पड़ेगा कि भैया यहां अचिंत शक्ति से करते हैं। उसमें बात आएगी। उसमें बात आएगी कि जैसे जैसे इच्छा मात्र की बात आ गई ना? हां हां। तो अचिंत शक्ति हो गई। फिर वो वो कैसे हो रहा है। हम उसको डिफाइन नहीं कर सकते। मतलब जो प्रैक्टिकली हम डिफाइन कर रहे हैं चीजों को कि भाई वो कैसे हुआ वो डिफाइन नहीं अचिंत शक्ति से ही कर दिया उन्होंने लेकिन ये है कि फिर भी उस अचिंत शक्ति को

00:03:17:01 अब उसकी व्याख्या उसमें हमें थोड़ी और गहराई से मुझे शास्त्रों में थोड़ी और गहराई में पढ़नी पड़ेगी कि

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00:03:21:27 ईश्वर का बल और मनुष्य के बल मतलब किस प्रकार से उन्होंने व्याख्या की है। बाकी ब्रह्म ने तो इच्छा मात्र की है। इधर से देख तो कहीं सूर्य कहीं पृथ्वी बन रही है तो हम हमारी दृष्टि से कहीं फोर्स का कम ज्यादा मानना पड़ेगा। हमारी ओर से तो यही हो रहा है कि भैया जो निर्गुण भगवान है सर्व जो ये क्या कहते हैं सर्वव्यापक जो व्यवहार में ना आ सकने वाला है वो फिर वो रहते हुए भी स्वरूप के विरुद्ध दूसरा अवतार लेते हैं। या तो मान ही रहे हैं कि वही एक ही ईश्वर है। वही व्यवहार में आता ही आता है। ऐसा अब उसमें बात ये थी कि अब जैसे तो फिर वो परिवर्तनशील हो गया।

00:04:01:01 [संगीत] तो वो जो इफेक्ट है गति करने वाला या रुकने वाला सेफ चेंज उस इफेक्ट के कारण उन्होंने बोला कि यहां पे बल है रियल में बल जैसा कुछ नहीं होता बल एक फिनोमना मात्र है यानी एक रास्ता है चलो ठीक है ठीक है ईश्वर इसका मतलब तुम्हारा क्रियावान भी नहीं है इच्छा कर रहा है तो क्रियावान है ना वो इच्छा कर रहा हो या कुछ भी कर रहा हो पृथ्वी को घूमने के लिए धक्का मिलता है जिस कारण से वह घूम रही जिस कारण

00:04:32:28 तो वही तो मैं कह रहा हूं कि एक देसी होके काम करता है वो सगुण तभी तो हो रहा है तुम कह रहे हो तुम सगुण की व्याख्या दे नहीं रहे हो तुम अपने ग्रंथ का प्रमाण दे नहीं रहे हो कि ईश्वर केवल इच्छा करता है बल नहीं है बल नहीं लगाता वो बल्कि मैं बताऊं हो क्या रहा है कि उसकी जो इच्छा है वो जो भौतिक पदार्थ है उनपे बल का काम कर रही है यही तो होगा बल का मानना पड़ेगा बल का काम नहीं कर रही है वो जब वो इच्छा करता है और फलाना फलाना एक्टिविटी होती है तो उस पर्टिकुलर चीज को उस फिनोमिना को हम लोग वो बोल देते हैं। बल बोल देते हैं। मतलब की मतलब कि क्या कहते हैं ईश्वर जो है वो बिना किसी चेतन वस्तु के वहां पर उसको घुमाने लगता है। कैसा बिना किसी चेतन वस्तु के मतलब? जैसे

00:05:14:14 उसके अंदर चेतन तो है नहीं मटेरियल में। हां। मटेरियल थोड़ी चेतन है। हां। है ना। अब उसने केवल इच्छा की और वो घूमने लगा। उसकी क्या सूचना गई, क्या नहीं गई इसके इसको थोड़ा सा डिफाइन करोगे कैसे? वह

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00:05:25:25 घूमी कैसे क्या सूचना गई मतलब? इच्छा से कैसे घूम गई पृथ्वी यानी कि कार्य करने वाली जो फोर्स है उसके रूप में उसने अपनी इच्छा अनुसार कहीं पर कम फाॅर्स और कहीं पर ज्यादा फाॅर्स दी पंच भौतिक पदार्थों को ठीक है मतलब उसने जैसी इच्छा की वैसा काम हुआ सिंपल नहीं तुम यहां पे मिस कर रहे हो तुम यहां पे ये मिस कर रहे हो तुम शक्ति को मिस कर रहे हो ना पृथ्वी को प्राप्त हो रही है फाॅर्स अब वो ईश्वर ने उसकी इच्छा की है मगर पृथ्वी को फोर्स प्राप्त हो रही है अब ये फोर्स आई कहां से इसको हमने लौकिक भाषा में हमने इसको ऐसे बोल दिया कि इसको यहां पे फोर्स लगा तब ये वाल मूव करी कैसे परिणाम देख के अब इसमें अब इसमें अब इसमें आगे क्या आ रहा है कि अलौकिक भाषा से हम उसको फ़ देता हूं अब इसमें ये आया अब ये जो ये जो मूव हुआ ये क्या था क्या ऐसा हो गया कौन सा तीर लग गया इसमें कि मूव हो गया तो पॉइंट यहां आया की ये इच्छा से ही मूव हुआ पृथ्वी घूमी तो उसके कोई ब्रेन है जिसमें उसको पता लगा कि ईश्वर की इच्छा ये है तो ये करना है उसको क्या प्राप्त हुआ उसको क्या प्राप्त भाई भाई तो इसका मतलब इच्छा प्राप्त हुई यानी कि मतलब तुम ये मान समझ सकते हैं ना इसका मतलब एक मिनट एक मिनट एक मिनट एक मिनट यानी कि तुम ये मान रहे हो वहां पे कोई बल नहीं लगा बस वो घूम गई कुल मिला

00:06:40:26 के कहना ये जब वो घूमी तो उसी घूमने वाले जिस इच्छा को यानी जब ईश्वर ने इच्छा की नहीं कि तू घूम ठीक है यानी कि वो जो इच्छा है उसी इच्छा को हमने बल बोला अरे तो फिर बल लगा बल मिला ना ऐसे बोलो ना कि बल मिला उसको नहीं बल मिलना अलग बात हो हो गई [संगीत] वही थोड़ा सिद्धांत वगैरह सोच रहा था चर्चा करूं अगर आपके पास समय हो तो अरे हो तो गई अपने बीच में चर्चा वही पॉइंट अटक जाता है सगुण निराकार में तुम इच्छा कर देते हो सगुण निराकार में इच्छा हां तो वो तो सही पॉइंट है ना उसमें क्या उसके पास आर्गुमेंट क्या है आपके पास मतलब सही वहां पे वो संतुष्टिजनक नहीं ना तुम्हारा यह कहना बल नहीं है वो इच्छा है हम तो उसमें तो सही पॉइंट है उसमें आपके पास क्या फिर सर फिर उसको शक्तिमान क्यों कह रहे हो इच्छा कहो शक्ति का मतलब क्या होता है शक्ति का मतलब होता है सामर्थ्य हां और सामर्थ्य कैसे होता है सामर्थ्य ऐसे होता है इच्छा के रूप में धक्का है ही नहीं ईश्वर का इसमें इसमें ये होता है कि जैसे मान लीजिए मेरी इच्छा हुई तर्क की संगत नहीं लगी ना ये बात मैं इसका एक्सप्लेनेशन देता हूं ना मैं आपको एक्सप्लेनेशन देता हूं अरे वो लंबा हो चुका है काफी अपना उसको को

00:07:56:02 कहो तो रिकॉर्डिंग पड़ी होगी मैं भेज देता हूं सुनो और ये मतलब लूप लूप टाइप से हुआ है उसमें कुछ बार-बार नहीं मेरी मेरी जानकारी में तो अभी देखिए मेरी जानकारी में तो जैसे तुम कह रहे हो ना कि स्वरूप से वो वो है क्या कहते हैं निराकार या स्वरूप से वो नित्य शाश्वत है। तो स्वरूप से वो निर्गुण भी है। एक रस भी है। उसका कार्य करने वाला होने के रूप में उसका सगुण होना ही आवश्यक है। तो वहीं से या तो यह मान लो अगर तुम अपने स्तर से अवतार का खंडन करोगे तो तुम्हें यह भी मानना पड़ेगा कि ईश्वर की सृष्टि की रचना ईश्वर ने नहीं की फिर क्योंकि ईश्वर तो एक रस है और वो कम ज्यादा हो रहा है यहां सगुण रूप में क्योंकि क्रियाशील है ना ईश्वर जब ईश्वर दोनों के अंदर है और वो हिलना चाहता है हिलने के रूप में अपनी शक्ति लगा रहा है तो वो अंदर भी हिलेगा बाहर भी हिलेगा नहीं हिलने से नहीं महाराज ये बताइए शरीर के अंदर जीव है तो क्या ही जीव हिल हिल के हाथों को उठाता है क्या तो आप वहां पे बताओ वह बल है कि क्या है वो जैसे जैसे जैसे मेरे शरीर में जीव है। ठीक है। मैंने चाहा तुम वहां से बताओ कि वो जो पृथ्वी का गोला है उसमें धक्का कैसे लगा? उसमें धक्का कहां धक्का लगने के लिए एक देसी चाहिए? तो क्या हुआ? तो क्या हुआ? मतलब वहां

00:09:11:13 कुल मिला के वहां कुछ तो कुछ समझाने वाली बात नहीं। बस मान लो कि हुआ। यही तो है। ऐसा नहीं है ना। तो भगवान ने धक्का लगाया कि नहीं? और भगवान ये ये सब जो बातें लिखी हुई है तुम्हारे उसमें कि बिन उसके वो सब सुनता है बिन वो सब उसमें ये करता है वो करता है करने वाली कई बातें लिखी हुई है तो करने वाली जैसे ही क्रिया आएगी तो वहां पर वो फोर्स का ट्रांसफर ट्रांसफरिंग फोर्स तो दिखाई देगा ना उसी को तो सामर्थ्य बोलते हैं ना जैसे आंख आंख है तो कोई जैसे सामर्थ्य को ही तो मैं बल बोल रहा हूं बल ना बोले उसे तो बल उसमें देखिए मैं समझाता हूं जैसे एक तो जैसे हम उसे बोल रहे हैं कि सर्वशक्तिमान ठीक है? शक्ति का अर्थ तो सामर्थ बताया हुआ है शास्त्रों में। तो सामर्थ्य का एक्सजीक्यूशन तो बल के रूप में होगा ना। पत्ता हिलाना है। पत्ता हिलाना है तो इतना मात्र नहीं होता ना। अगर अगर नहीं है तो फिर वो जिस रूप में फिर वो बताओ। हां तो मैं वो रूप बताते नहीं वो इच्छा कह देते हो तुम बस। बताता रहूं। मैं बताता रहूं। हां। और खैर बताने से पहले जो मैं थोड़ा सा इसमें और ओवरव्यू इसमें उधर बात करना चाहता था। यह तो बिना अल्टीमेटम के आप विषय में घुस गए। तो इसमें

00:10:20:21 जो टॉपिक रह रहे हैं हमारे सिद्धांतिक चर्चा के एक तो हम उस पे चर्चा कर रहे थे परंपरा पे

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00:10:32:02 [संगीत] से तुम कह रहे हो इच्छावान है बस फिर शक्तिमान भी मान रहे हो शक्ति का पूछ रहा हूं तो वो बस सामर्थ है उसके आगे आप पूछो मत आपने कहा उसके आगे पूछो मत सामर्थ्य के आगे वो क्या है पृथ्वी को धक्का लग रहा है कि नहीं लग रहा है वो क्या है साकार एक देसी वस्तु होनी चाहिए साकार एक बताओ ना पृथ्वी पृथ्वी सरकी कैसे मुझे बताओ थोड़ा प्रैक्टिकली नहीं आप मुझे आप मुझे बताइए आप सगुण ईश्वर को साकार एक देसी मानते हैं ऐसा लेकिन सर्वव्यापक होते हुए भी एक देसी है ऐसे है वो जैसे सगुण उदार सगुण है। मैं पूछ रहा हूं साकार एक देसी है कि नहीं है? क्योंकि धक्का लगा अगर कोई वस्तु किसी दूसरे वस्तु को धक्का दे रही है तो उसके लिए उसका साकार हो क्योंकि लक्षण में तो हमें ही दिख रहे हैं भाई जो भी हम देखते हैं कि या तो धक्का लगाने के लिए उसका साकार होना है और दूसरा उसके कांटेक्ट में साकार हो एक देश है तभी उसका धक्का लगा पाएगा। हम मानो बिल्कुल बिल्कुल बिल्कुल अपने को रेगुलेट करता है। ठीक है। ठीक है। आप इसी पे रुकिए इसी पे रुकिए। यानी आपने माना कि जो आपका ईश्वर है वो साकार एक देश है। व्यवहार वाला है ना? सर्व्यापक होते हुए भी व्यापक है अगर वही पॉइंट है ना यही बात है ना तुम ऐसे कह रहे हो देखो मैं बताऊं तुम क्या कह रहे हो जैसे मैंने कोई बुक उठाई तो तुम कह रहे हो कि आपने नहीं उठाई आपके हाथ ने उठाई तो मैं कह रहा हूं मैं होते हुए भी मेरे हाथ से बुक उठा रहा हूं उसी पे ही मैंने आपको धक्के वाले पे

00:11:47:06 ही प्रश्न किया ना कि धक्का लगाने के लिए उसका सगुण एक साकार एक देसी होना जरूरी है तो क्या आप ईश्वर को तो क्या आप ईश्वर को साकार एकदेशी मानते हो अपना धक्का नहीं मानते ध्यान से सुनिए सर्वव्यापक होते हुए भी साकार एक देश पॉइंट सुनिए जो ईश्वर सृष्टि बना रहा है धक्का लगा के बना रहा है। है ना आपके मंतव्य में हां यानी जिस ईश्वर ने और धक्का लगाने के लिए उसका साकार एक देश होना जरूरी है। यानी आपके यानी आपके हिसाब से जिस ईश्वर ने सृष्टि की रचना की है वो साकार एक देश है। है ना? सर्वव्यापक होते हुए भी यही तो पॉइंट हो तो रहा है। हो तो रहा है। तभी तो तभी तो आपको वहां पे अवतार मानना पड़ेगा। वरना पृथ्वी पे धक्का सिद्ध कर दो आप। वहां पे आप सिद्ध नहीं कर रहे वहां आप इच्छा इच्छा बोल के हट जाते हो इच्छा है वहां बल नहीं अवतार मानना पड़ेगा नहीं मानना पड़ेगा बाद की बात है पहले मैं आपसे पूछ रहा हूं यही तो बात है वहां तुम वहां वाले मामले में तुम कमजोर हो वहां वो तुम खुल के बात नहीं मैं कमजोर नहीं हूं अभी उस पे बात ही नहीं हो रही है ये क्यों नहीं उसी पे तो बात हो रही है निर्गुण अभी तुम रिकॉर्डिंग सुन लो मैंने निर्गुण सगुण का मैं ये कह रहा हूं कि जितनी बार निर्गुण सगुण की बात अभी तक हमारे बीच में आई है तुमने वहां से मतलब वहां पे क्लियर कट जो निर्भय आर्य है जो निर्भय आर्य है जिस तरह से बात करने वाला निर्भय आर्य ने अपने स्वाभाविक लक्षण

00:13:02:09 के अनुसार वहां पर प्रस्तुतीकरण नहीं दिया है। निर्गुण और सगुण वाले विषय में वहां वो बचता है। सबसे उसको खोलना चाहा था तो तुमने उसको बात को खत्म कर दिया था। मतलब उसमें बहुत ज्यादा क्लेरिटी नहीं थी। ठीक है। मैं ये पहली बार की बात है। फिर दोबारा हुआ तो तुमने कहा वो बल नहीं है। वो इच्छा है। अब रुकिए इच्छा जो है पृथ्वी को प्राप्त के रूप में हो रही है। दिखा देता हूं। आगे बढ़िएगा बाद में। पहले मैं सगुण निर्गुण वाला बोल देता हूं। हां खुला होगा तो तुम अभी फ्रेश व्याख्या दे दो निर्गुण सगुण की क्या है मैंने आपसे पहले ही बोला था कि जो विशिष्टा इसमें इसमें माना जाता है ना सगुण निर्गुण ठीक है कि उस उस दृष्टिकोण से मैंने कहा था कि अभी भी अभी भी तुम कुछ मत करो तुम अपनी फ्रेश व्याख्या दो वो छोड़ दो विशिष्टा सब कुछ को अपनी निर्गुण सगुण की व्याख्या दो अब उसमें देखिए मैंने तो आपको पहले बताया था कि निर्गुण सगुण हर वस्तु जो होती है निर्गुण सगुण होती है ठीक है तो अब इसमें जैसे यह पॉइंट है कि जैसे कोई भी जैसे अग्नि है ठीक है वो गर्म है लेकिन ठंडी नहीं है यानी उसमें गर्मी है लेकिन ठंडी नहीं तो ये वाला हां हट गया पेन पेन [नाक से की जाने वाली आवाज़] तो एक सेकंड तो अब जैसे अग्नि है वो गर्म है वो ठंडी नहीं है ठीक है इस वाले केस में क्या हो रहा है कि उसमें अग्नि

00:14:17:13 उनमें गर्मी के गुण है लेकिन कुछ गुण नहीं भी है तो उसी प्रकार से दुनिया की हर वस्तु में जैसे ईश्वर सच्चिदानंद ंद है ठीक है लेकिन दुख ही नहीं है तो सच्चिदानंद का जो है उसके अंदर तो इस दृष्टिकोण से सगुण है और जो दुख राग आदि ये सब नहीं है तो इस दृष्टिकोण से निर्गुण अब वो एक रास्ता वाला पॉइंट ये आता है कि ईश्वर सर्व्यापक है और कहीं ऐसा तो नहीं कि लंदन वाला ईश्वर सच्चिदानंद है और भारत वाले ईश्वर सच्चिदानंद नहीं है तब उसकी एक रचता भंग होती है ऐसे भंग नहीं हो जाती कहते कोई गुण है कोई गुण नहीं है तो भंग हो गई ये कौन सी बात कौन से गुण है उसमें कौन से नहीं है हां तो वो तो आर्य समाज का जो दूसरा समुलास है उसमें मुख्य मुख्य मुख्य मेजर मेजर गुणों का अधिक दिया है। सर्वशक्तिमान सर्वमी अजर नित्य पवित्र सृष्टि करता आदि आदि जो है वो मेजर मेजर उसके गुण है। सर्वशक्तिमान से वो एक रस है ना। हां ठीक है। यानी कि फोर्स की दृष्टि से वो एक रस वाला है। फोर्स की दृष्टि से एक रस वो तो इच्छा हो गया ना। फोर्स क्या होता है? तो फिर शक्तिमान क्यों लिख रहे हो? इच्छा मान लिखो। अच्छा सर्वशक्तिमान का इच्छा अर्थ क्या होता है? सर्वशक्तिमान सब कुछ कर सकने वाला जो सब कुछ कर सकने का सामर्थ रखे जिसमें सब कुछ कर सकने की वो हो बल हो क्या ठीक है अब अब आपने बोला कि सर्वशक्तिमान का अर्थ होता है सब कुछ कर सकता है

00:15:32:21 ठीक है अब मुझे ये बताइए कि आपको कैसे पता चला कि सर्वशक्तिमान अरे तुम देखो फिर टॉपिक चेंज कर रहे हो अब टॉपिक नहीं तुम अपनी व्याख्या क्यों नहीं दे रहे हो सर्वशक्तिमान पे लाइन मैंने क्या पूछा है मैंने पूछा क्या था तुमसे मैंने पूछा क्या था तुमसे अभी मैंने पूछा था क्या वो शक्ति के गुण से बिल्कुल एक रस है सभी जगह कि नहीं तुमने उसका जवाब आप बल शक्ति का मतलब क्या समझते ना जब वो बल मैंने आपको पहले तो मतलब कुल मिला के मुझे तुम्हें दिखा दो हां हां बोलो बोलो अब बात ये है कि जब मैंने आपको पहले ही बता दिया कि जो बल वाला जो विषय है वो तो इच्छा से संबंधित है अब आप उसे अब उसे सर्वशक्तिमान से जब अगर अगर मेरे भाई वो इच्छा से देखो दूसरी जगह चली जाएगी बात बात वही बात है अगर इच्छा से संबंधित भी है मैं कह रहा हूं क्या पृथ्वी के कण को कुछ प्राप्त हुआ या नहीं नहीं हुआ। बस ये बताओ कोई क्या प्राप्त हुआ उसे? एक सेकंड रुकिए।

00:16:27:10 हां। हेलो हम हां तो अब बात ये आ जाती है कि जब मैं कह रहा हूं कि आपने बल वाला विषय छेड़ा। अब मेरे को जब मेरी जब मेरे अकॉर्डिंग वो बल से संबंधित उस टाइप से है नहीं क्योंकि सर्वशक्तिमान में बहुत सारी चीजें आ जाती है। इसीलिए तो मैं कह रहा हूं ना निर्भय शक्तिमान में देखना तो बल मानेंगे। मैं समझ गया। मैं यह कह रहा हूं

00:16:46:12 कि तुम मुझे बस इतना बताओ अभी कि पृथ्वी को प्राप्त क्या हो रहा है? कुछ फोर्स सोर्स प्राप्त हो रही है उसे कि नहीं हो रही है? बस वह एक उसके अंदर कोई ऐसा भैया ये सारा विषय मैंने आपको पिछली बार भी इच्छा वाला पूरा कांसेप्ट अच्छे से बताया था। नहीं नहीं बताया था अच्छे से। तुम उसमें खिचड़ी पका रहे हो। सगुण निर्गुण में तुम्हारी खिचड़ी पक रही है। के दृष्टिकोण से पक रही है। लेकिन चलिए कोई बात नहीं। मैं उसमें ले लेता हूं। उसमें अपना भी मैं इशू ले लेता हूं। तो उसमें हम सॉल्यूशन की ओर बढ़ते हैं। इसमें वो क्लियर नहीं है सगुण निर्गुण और वहीं पे अवतार की सिद्धि होती है। क्योंकि अगर वह शक्ति शक्ति के उससे सर्व वो है सर्वव्यापक एक रस है तो जब वो पृथ्वी इत्यादि के लिए व्यवहारिक होगा तो वहां पर वो कहीं पे कम कहीं पे ज्यादा होगा। सिंपल तो ऐसी स्थिति में या तो यह मानना पड़ेगा कि निर्गुण ने अपने स्वरूप को बदला जो कि वो बदल नहीं सकता। बदला तो उसकी शाश्वतता भंग हो जाएगी। तो यहीं पर अवतार मानना पड़ेगा कि वो एक और अवतार लेता है। अपने उस रूप को सुरक्षित रखते हुए, नित्यता को सुरक्षित रखते हुए सगुण अवतार लेता है और अब वो जो है क्रियाशील होता है। क्रिया

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00:17:50:07 करने के लिए ही उसे कहीं कम कहीं ज्यादा होना पड़ेगा मेरे भाई। क्रिया हो ही नहीं सकती जब वो सही सब जगह है। हां उस दृष्टि से तत्व की दृष्टि से वो केवल इच्छा मात्र कर रहा है। मगर हमारी ओर से तो हमें कुछ ना कुछ उसका बल प्राप्त हुआ ना कि हम किसके। नहीं तो हमें मानना पड़ेगा केवल वो सोचता है उसके पास ना बल है ना कुछ है ना फोर्स है कुछ केवल सोचता है वो बस और वहां सोचने पर भी जब अगर आर्य समाज के अनुसार चलो एक बार वो अद्वैत के अनुसार तो केवल सोचता है चल भी जाएगा आर्य समाज के अनुसार तो वो चलेगा ही नहीं आपको क्या कहते हैं व्यवहारिक तौर पर उसकी वो सिद्धि करनी पड़ेगी कि वो बल लगा कि नहीं लगा ये इस तरह की बातें तो अद्वैत में है कि उसने केवल सोचा और हो गया क्योंकि माया है यह वाली बात है हम ठीक है। अब देखिए अब तो चलिए आपने अपनी व्याख्या कर दी ना। अब तो अब तुम इस पर और करो। इस पर और अध्ययन करो। मुझे जो मेरा पूरा हो चुका है। मेरे हिसाब से मैं

00:18:44:26 एक बड़े भाई होने के नाते तुम्हें कह रहा हूं। तुम सगुण निर्गुण पे और वो करो क्योंकि यहां पे तुम जो है क्लियर नहीं हो। सगुण मेरा क्लियर है। वह इच्छा वाला पॉइंट खंडन करिए ना। कर तो दिया खंडन कि भैया यहां पर हमें प्राप्त क्या हो रहा है? जैसे हमें व्यवहार में क्या प्राप्त हो रहे हैं? इच्छा इच्छा मतलब इच्छा मतलब एक मानसिक सूचना।

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00:19:07:20 अब जैसे मैं उदाहरण देता हूं। मैंने इच्छा मतलब मानसिक समझिए समझिए। जैसे पॉइंट क्या है कि जैसे आप आप समझने के लिए मुझसे पूछ रहे ना समझने कांसेप्ट समझने के लिए कि मानसिक मानसिक तरंग है क्या? आपने समझने के लिए बोला। तो समझने के लिए ही मैं दृष्टांत दे रहा हूं अपनी तरफ से। दृष्टांत ये दे रहा हूं कि

00:19:25:03 जैसे चेतन जीव है। ठीक है? तो जीव इच्छा करता है और मन में विचार आता है। इच्छा करता है और हाथ उठता है। है ना? तो चाहने मात्र से ऐसा तो नहीं कि जीव अलग से हाथ के नीचे आकर के धक्का मार रहा है। ये तो हो नहीं रहा।

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00:19:38:28 चाहने मात्र से क्या हुआ? जैसे जीव इच्छा कर रहा है। मैं इच्छा कर रहा हूं तो मेरे इच्छा करने से मेरे शब्द मन में हो रहे हैं। मुंह से निकल रहे हैं। हाथ पैर हिल रहे हैं इत्यादि। है ना? हम हम यह इच्छा मात्र से ही तो हो रहा है। मैं कोई जैसे मैंने हाथ उठाया मैंने हाथ तो क्या मैं हाथों तो मेरा जो जीव है शरीर के बाहर आकर के हाथों के नीचे से ऊपर कोई धक्का थोड़ी लगा। नहीं नहीं अब मैं बताता हूं

00:19:59:27 हमारी जो वो होती है माइटोकांड्रिया जहां से एनर्जी प्रोड्यूस होती है हां हमारे चाहने मात्र से वो एनर्जी काम करती है

⬜ Not used yet · 00:20:07:25 – 00:20:43:18 (0:36)

00:20:07:25 हम और वो एनर्जी देती है कि हाथ वो जो हमारी जो हड्डियों पे चिपकी हुई वो है नर्व वो सूचना के द्वारा उस मसल को ये सूचना पहुंचाती है उस मसल को कि तुमको जो एनर्जी कहां से आ रही है माइट्रोकांड्रिया से है ना ठीक है अब तुम्हें जो है वो क्या कहते हैं अगर फैला हुआ है इलास्टिसिटी है तो अब तुम्हें है तो [गला साफ़ करने की आवाज़] मेरा जीव जो है वो उसकी सूचना जाती है मन को मस्तिष्क को मान लो मस्तिष्क के द्वारा नर्वस के द्वारा उस चिपाक को जो हड्डियों से चिपकी हुई है ठीक है और वो जब सिकुड़ती है तो हाथ मेरा मुड़ने लगता है और वो जब फैलती है तो हाथ मेरा सीधा होने लगता

00:20:43:18 है लेकिन चाहने मात्र से हुआ ना ये चाहने मात्र से एनर्जी का यूज किया तुम ये बताओ एनर्जी का अस्तित्व तो मान रहे हो कि नहीं मान रहे हो मैं उस तरीके से नहीं समझ पा रहा ना भैया इसीलिए तो मैं ऐसे बोल रहा

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00:20:53:20 हूं तो इस मैं इसीलिए तुम्हें समझाने के लिए बोल रहा हूं एनर्जी का अस्तित्व मान रहे हो कि नहीं? मैं नहीं वह एनर्जी किस चीज की क्या एनर्जी वह मेरे को समझना तो पड़ेगा ना पहले कुछ हां ना बोलने के लिए बिना समझे मैं कैसे बोल दूं आप बताइए कैसे तो मैंने मैंने बताया था कि भैया मैं जो खाता पीता हूं वो जो कार्ब कार्ब इंटेक करता हूं आप एटीपी की बात कर रहे हैं चलो एटीपी मान लो चलो ठीक है एटीपी हां एटीपी तो स्थूल शरीर में आ गया ना जीव जो क्रिया करता है वह तो सूक्ष्म शरीर में क्रिया करता है अरे तो मेरे चिपाक को तो एटीपी मिली ना वो तो सूक्ष्म शरीर में आ गया ना तो एटीपी मिली स्थूल शरीर में आ गया ना वह भाई एटीपी का अस्तित्व है कि नहीं? मैंने कहा मना किया अस्तित्व है कि नहीं? एटीपी अलग-अलग है। आ गया। ठीक है? तो मैं और एटीपी तो अलग-अलग होता है वो तो सूक्ष्म शरीर पे होता है। तो यानी कि यानी कि सूक्ष्म शरीर पर नियंत्रण के कारण सूक्ष्म शरीर ने एटीपी को यूज किया। ये माने सूक्ष्म शरीर क्या करता है? जैसे जीव का नियंत्रण सूक्ष्म शरीर पे है। उसने उसने सूक्ष्म शरीर को आर्डर दिया और सूक्ष्म शरीर ने एटीपी को यूज़ कर अरे केवल सोचा उसने बस केवल इच्छा की इच्छा उसने इच्छा की हां उसने इच्छा की उस इच्छा के कारण जो मेरा सूक्ष्म शरीर है उसने एटीपी को यूज़ किया और

00:22:08:24 मेरे स्थूल शरीर पे उसका जो है रिफ्लेक्शन दिखाई एटीपी एटीपी भी जो हो गया वो आपका इसी में स्थूल में ही आ गया। यह होता है। मैं इसको पूरा बोल देता हूं कि जैसे जीव ने चाहा और जीव का जीव के चाहने से जो है यह वो सूक्ष्म शरीर है। ठीक है? जिसमें मन, बुद्धि, चित अहंकार आ जाता है। इसमें प्रतिक्रिया होती है। जब इसमें प्रतिक्रिया होती है तो इसके प्रतिक्रिया के अनुकूल शरीर में क्रिया होती है। अरे मेरे भाई फिर भी एक एनर्जी का तत्व लिया ना क्रिया कराने के लिए तो वो जो वो जो सारा कुछ एनर्जी का बता रहे हो ये पूरे शरीर के वो स्थूल शरीर [संगीत] में होगा ना। तो प्रसिद्ध स्थूल नहीं है। नहीं है। उससे जीव का लेना देना नहीं होता। जो जीव का लेना देना नहीं होता। बिल्कुल सही कह रहे हो। बिल्कुल सही कह रहे हो। अब मुझे ये

00:22:47:06 बता दो कि मेरी मसल्स चिपाक को सिकुड़ने अथवा इलास्टिसिटी होने के लिए एक तुमने एटीपी नामक वो मानी शक्ति वो ऑर्डर्स कहीं से भी आए हो मगर उस शक्ति का उपयोग [संगीत] हुआ। हां। ठीक। हां। तो जो शक्ति का उपयोग हो रहा है पृथ्वी को [संगीत] खिसकाने इत्यादि में वो और ईश्वर अलग-अलग है क्या? [संगीत] जिस शक्ति का प्रयोग हो रहा है नहीं वो इच्छा तो उसका गुण है ना देखा बस [नाक से की जाने वाली आवाज़] क्या अब तुम अब बस अभी अब फिर बात करेंगे हां क्यों क्या हुआ अब फिर बात करेंगे मुझे निकलना भी है और यहां पे तुम थोड़ा वैसा दे रहे हो धुंधला आंसर क्लियर नहीं कर रहे हो नहीं धुंधला मतलब कैसे मैं समझ अब यहां तुम इच्छा पे क्यों ले आए तुमने माना ना मेरी मसल्स को हिलाने के लिए एक एनर्जी [संगीत] नामक तत्व है जिसको तुमने एटीपी नाम दिया अब अब जैसे मैंने मैंने जो उदाहरण दिया था मैंने वो क्या दिया था मैंने उदाहरण ये दिया था कि जिस प्रकार इसीलिए मैंने उसमें दो तीन पॉइंट इसलिए रखे हुए थे। अब इसमें मैंने उसमें बोला था विचार का भी बोला था। है ना विचार। अब इसमें यह होता है कि जैसे हाथ हिलाने पर तो जीव का डायरेक्ट कंट्रोल नहीं होता है। वो जैसा चाहता है उसके अकॉर्डिंग वो ईश्वर ही उसमें सहायक होता है हाथ हिलाने में। ठीक है? खैर वो मैंने मोटे मोटे भाषा में बोला था। लेकिन मैंने इसीलिए मैंने जानबूझ के उसके साथ में ये शब्द भी बोला था कि इच्छा [संगीत] मतलब चाहता है विचार करता है। तो जीव के चाहने मात्र से मन में मतलब वो जो विचार होते

00:24:02:09 हैं। [संगीत] ठीक है? और वो उसके खुद के सामर्थ्य से होते हैं। उसमें कोई ऐसा आप ये नहीं दिखा सकते कि अलग से कोई एनर्जी कुछ ऐसा हो ये गलत बात है फिर। फिर तो खाना खाने की जरूरत ही नहीं है। चाहने मात्र से हो जाना चाहिए।

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00:24:11:27 एनर्जी तत्व को विषय हो गया ना। तो भाई स्थूल पृथ्वी स्थूल है ना उसको एनर्जी चाहिए ना फिर हिलने के लिए। पूरी बात तो सुनिए। पूरी बात [संगीत] जब तुम जीव के चाहने मात्र से स्थूल शरीर के ऊपर एक एनर्जी का स्थूल नहीं कह रहा। सूक्ष्म कह रहा हूं। इसीलिए तो

00:24:29:13 कह रहा हूं सुनते ही नहीं हो आप मेरी बात। तुम कितना भी घुमा हो उसमें अंत में आएगा कि एक तत्व मानना पड़ेगा एनर्जी के रूप में जो कि एक देसी हो रहा है। मान लीजिए कभी कि सिद्ध नहीं कर पाएंगे। इतना भी जेली भी बना लिया सिद्ध नहीं पाए। अच्छा ठीक है। ठीक है। तुम गुस्सा मत हो। गुस्सा मत दो। चलो चलो आगे बढ़ो। बताओ। मैं ये शब्द मैं भी बोल दूंगा। क्या होता है? बताओ बताओ। चलो बताओ। है ना? ऐसे नहीं बोलना चाहिए। खैर बताओ बताओ। क्या है? सुन तो लिया एक बार में। निर्मल मुझे थोड़ा पंप मारने दो। फिर बात करेंगे। हां। चलिए ठीक है [संगीत] भैया। फिर बात करते हैं। जय श्री राम। सुन लो। घर वालों की भी सुन लो। दिन भर इसी में ना रहो। हां। चलो ठीक ठीक ठीक

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00:25:07:27 नमस्ते [संगीत]

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B: SARVASHAKTIMAAN DHARMA Video 25:32 · 05 Apr 2026

जड़ पदार्थों को ईश्वर की इच्छा किस रूप में प्राप्त हुई? अवतारवाद को निर्भय कर देने वाली

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