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00:00:02:02 मैं स्वयं इस बात को समझता हूं कि मैं खुद अव्वल दर्जे का मूर्ख हूं और मुझे कोई वेद, पुराण, उपनिषद का ज्ञान नहीं है। शास्त्रों में वेदों में भी विरोधाभास है। लेकिन वेदों में कोई विरोधाभास नहीं है। और वो शिक्षा मिलेगी हमको हमारे प्रमाणित ग्रंथों से। उनको जब हम सुनेंगे, समझेंगे तब हम जान पाएंगे। शास्त्र के विभिन्न गहराइयां इनमें जाना हमारा उद्देश्य नहीं है। यानी शिव को आप यह भी नहीं बोल सकते कि पूर्ण भौतिक है या जीवात्मा है और ना उनको ये बोल सकते हैं कि ये पूर्ण ब्रह्म परब्रह्म परमात्मा है। ये कोई अल्लाह अलग नहीं है। कृष्ण अलग नहीं है। गॉड अलग नहीं है। एक ही है। तो गुरु जी बहुत-बहुत धन्यवाद आपका। हमें अपना कीमती समय देने के लिए और हम अपने व्यूअर्स को थोड़ा सा बताना चाहेंगे आपके मुखारविंदु से कि इस
00:00:57:15 इंटरनेशनल सोसाइटी ऑफ कृष्णा कॉन्शसनेस अंतरराष्ट्रीय कृष्ण भावनामृत संघ इस की स्थापना श्रील प्रभुपाद जी ने की और उनका मुख्य उद्देश्य था कि गीता तथा भागवत के प्रमाणिक संदेश को जनजन तक पहुंचाना। अच्छा और गुरु जी थोड़ा सा अपने बारे में भी बताएं हमें अपना व्यक्तिगत परिचय आपका कैसे आप इस भाग भावनात्मक संघ से जुड़े अ मैं मेरा नाम कर्मी नेम लीगल नेम जो है वो अनुराग दीक्षित था और मैं आईसीic बैंक में जॉब करता था लेकिन भगवान की विशेष कृपा हुई और खास करके हनुमान जी का क्योंकि मैं हनुमान जी को बहुत अधिक प्रेम करता था और उनके मंदिर जाता था और उनकी सेवा करता था। तो हनुमान जी की विशेष प्रेरणा से हमारे मन में राम भक्ति कृष्ण भक्ति के प्रति जागरूकता आई। बहुत ही बहुत ही सुंदर परिचय गुरुदेव। बहुत अच्छा लगा आपका सुन के। अच्छा गुरु गुरुदेव ये इसमें जैसे कि हम नाम सुनते हैं कि अंतरराष्ट्रीय कृष्ण भावनात्मक संघ तो हम जानना चाहते हैं कि ये
00:02:12:21 हिंदुत्व में सनातन धर्म में कृष्ण जी का महत्व क्या है? देखिए सनातन धर्म को जानने वाले लोग समझेंगे कि क्या सनातन धर्म है। जब तक हम सनातन धर्म में जन्म लेने से हम सनातन धर्म को नहीं समझ पाएंगे। सनातन धर्म को जानने के लिए हमको ये शिक्षा लेना होगा। यह समझना होगा कि वास्तव में सनातन धर्म है क्या और वह शिक्षा मिलेगी हमको हमारे प्रमाणित ग्रंथों से वेद पुराण उपनिषद उनको जब हम सुनेंगे समझेंगे तब हम जान पाएंगे लेकिन अगर हम उनको पढ़ ही नहीं रहे उनको समझ ही नहीं रहे हैं तो हम कैसे सनातन धर्म को समझ पाएंगे तो श्रीमद् भागवत में श्रीमद् भगवत गीता में अन्य पुराणों में स्पष्ट रूप से वर्णन है कि वास्तविकता में परम ब्रह्म परम भगवान श्री कृष्ण है और सब उनके दास हैं। एक ले ईश्वर कृष्ण और सब वृत्य ईश्वर परम कृष्ण सच्चिदानंद विग्रह अनादि आदि का गोविंद सर्वकारण कारण अच्छा और बहुत अच्छा लगा गुरुदेव ये श्री कृष्ण के बारे में सुनकर के हमें भगवान श्री कृष्ण का मैं भी बहुत भक्त हूं अ एक अगला हमारा ये रहेगा कि जैसे आजकल हम देखते हैं कि धर्म के नाम पर काफी युद्ध हो रहा है दुनिया में
00:03:28:04 पंथ के के नाम पर कई सारे पंथ बन गए हैं। तो इसमें आप किस तरह से देखना चाहेंगे कि जैसे क्रिश्चियनिटी है क्या जैसे हमें कई बार इस से इस की जब हम पढ़ाई करते हैं कुछ स्टडी करते हैं तो कई बार ऐसा आता है कि सारा धर्म एक ही है। कृष्णा और क्राइस्ट में कोई अंतर नहीं है। कृष्णा और मोहम्मद में कोई अंतर नहीं है। जी ऐसा नहीं। कृष्णा और क्राइस्ट में कोई अंतर नहीं है। नहीं बहुत बड़ा अंतर है। जी। कृष्णा मोहम्मद साहब ने कहां मोहम्मद साहब कहां कृष्ण कहां क्राइस्ट कहां वो इसको सीधा समझिए जैसे हमारे संस्थापकाचार्य हैं श्रील प्रभुपाद जी तो हम प्रभुपाद जी को भगवान नहीं बोलते प्रभुपाद जी हमारे गुरु हैं इसी तरह से जो जीसस है वो गुरु हैं वो और वो स्वयं बोलते हैं कि मैं भगवान का पुत्र हूं। जी जी मोहम्मद साहब स्वयं बोलते हैं मैं भगवान का दूत हूं। हां मैसेंजर हूं। मैं दास हूं। उनका पैगंबर हूं। तो उन्होंने कभी नहीं बोला कि वो भगवान है। तो अगर कोई उनको भगवान बोलता है तो ये गलत है। लेकिन भगवान ने स्वयं स्पष्ट बोला कि मैं भगवान हूं। जी श्री कृष्ण भगवत गीता में घोषणा कर रहे हैं कि मैं भगवान हूं। जी तो इसलिए हमको ये समझना चाहिए कि कभी भी हमको भगवान कृष्ण की तुलना मोहम्मद
00:04:43:13 साहब या जीसस से या किसी और संत से नहीं कर सकते। संत और गुरु अलग है और भगवान अलग। भगवान का स्थान कोई नहीं ले सकता और वह भगवान एक हैं। उनका नाम है सनातन धर्म और वास्तविक आध्यात्मिक चेतना के अनुसार कृष्ण उनको अल्लाह भी बोलते हैं। उनको गॉड भी बोलते हैं। उनको जोोबा भी बोलते हैं। उसमें कोई भेद नहीं। कोई अल्लाह अलग नहीं है। कृष्ण अलग नहीं है। गॉड अलग नहीं है। एक ही है। अच्छा। अच्छा। नहीं। जैसे हम कभी-कभी ऑफिशियल वेबसाइट्स के थ्रू पढ़ाई करते हैं जब तो एक शीला प्रभुपाद जी का एक कथन मिलता है कि कृष्ण और क्राइस्ट के नाम में कोई फर्क नहीं है। तो इस पर थोड़ा सा प्रकाश डालेंगे। कृष्ण देखिए क्राइस्ट वो कृष्ण को शाब्दिक उन्होंने समानता बताई है कि कृष्ण कहें या क्राइस्ट कहें लगभग बात एक ही है ऐसे करके। नहीं नहीं नहीं क्र नहीं वो कृष्ण को उन्होंने एक्सप्लेन करने के लिए भले ही उसप में बोला हो लेकिन वास्तविकता में वो जो बोलना चाह रहे हैं वो बता रहे हैं कि कृष्ण ही एकमात्र भगवान का परफेक्ट नाम है क्योंकि अगर आप प्रभुपाद जी की पुस्तक लेंगे आत्म साक्षात्कार का विज्ञान पुस्तक हो तो मैं अभी आपको बोलता हूं
00:06:01:08 हां ने कहा कि हमारे पिता तो यहां ये है ना क्राइस्ट शब्द को इन्होंने अंत में कहा कि क्राइस्ट और कृष्ण कहने का एक और तरीका है मतलब क्राइस्ट शब्द में और कृष्ण में एक्चुअली उनको समझाने के लिए उन्होंने इस चीज को लिया भाषा से उन्होंने जो बोला है ना जैसे ये बोल रहे हैं ना कि ग्रीस यहां पर क्राइस्ट ग्रीक शब्द जी क्रिस्टोन से आया है। जी ठीक है ना जी क्रिस्टोन शब्द कृष्णा का ग्रीक संस्करण है जी जब कोई भारतीय व्यक्ति कृष्ण को पुकारता है जी तो वह अक्सर कृष्ण कहता है जी कृष्ण एक संस्कृत शब्द है जी जिसका अर्थ है सर्वाकर्षण यानी आकर्षण की वस्तु बिल्कुल इसलिए जब भगवान को क्राइस्ट कृष्ण कृष्ण या कृष्ण के रूप में संबोधित करते हैं तो हम भगवान के समान सर्व आकर्षण सर्वोच्च व्यक्ति का संकेत देते हैं। जब यीशु ने कहा कि हमारे पिता हैं एक्चुअली क्राइस्ट जो है ना क्राइस्ट शब्द आया कहां कोई क्राइस्ट बोलता है क्या कृष्ण कृष्ण क्राइस्ट कहां से आया प्रश्न ये क्राइस्ट शब्द
00:07:16:16 जो है इसका प्रयोग कहां से हुआ किसने बोला क्राइस्ट नहीं जैसे इनका नाम है ना जीसस क्राइस्ट तो क्राइस्ट जीसस खुद बोल रहे हैं कि वहां कृष्ण नहीं है आप उसको पढ़ जी जी कृष्ण नहीं है मतलब कहने का मेरा प्रश्न बस ये था कि जैसे यहां क्यों को बोल रहे हैं क्राइस्ट और कृष्ण क्या हम ऐसा मान सकते हैं सभी धर्म एक है नहीं क्राइस्ट इसको हमें समझना यही होगा उन्होंने कहा ना कि ग्रीक भाषा के अनुसार क्राइस्ट शब्द का अर्थ है आकर्षण और कृष्ण का भी अर्थ आकर्षण है संस्कृत के का मतलब भी सर्वकर्षण तो मतलब ये उन्होंने दी लेकिन हम ये कह के कंफ्यूज हो जाएंगे या जनरल पब्लिक को कंफ्यूज कर लेंगे कि क्राइस्ट यानी जीसस क्राइस्ट और कृष्ण एक ही है ये नहीं कह रहे प्रभुपाद जी नहीं अंत में ऐसा ही बोल रहे हैं ना कि क्राइस्ट केवल कृष्ण कहने का एक और तरीका है। हां। लेकिन वो क्या कह रहे हैं? वो शब्द को बोल रहे हैं। जीसस हम उस शब्द को कृष्ण जीसस क्राइस्ट ईसा मसीह को नहीं मान रहे। हम उस शब्द को कृष्ण मान सकते हैं। क्राइस्ट को अलग भाषा में कृष्ण मान सकते हैं। मतलब अच्छा ठीक है। ठीक है ना? ठीक है। क्राइस्ट शब्द जो है उसको कृष्ण मान सकते हैं। जीसस को कृष्ण उनको यीशु मसीह को नहीं। क्राइस्ट नाम कृष्ण का ही एक और
00:08:31:18 नाम है। हां वो एक और नाम है। उसका जो अर्थ है सर्व आकर्षण इसका आकर्षण क्राइस्ट का क्या दिया है उन्होंने? गुरु जी यीशु जैसे ईसा मसीह है जो जीसस क्राइस्ट उनको हम किस रूप में देखें एक अवैदिक व्यक्ति के रूप में जो वेद विरोधी हैं या फिर हम उनको ऐसा माने कि हमारे ही धर्म के एक और वो मैसेंजर हैं दूत हैं क्या किस रूप में निश्चित रूप से वो हमारे ही धर्म के देखिए धर्म एक ही है। पहले तो ये समझना बहुत आवश्यक है धर्म क्या है? जी हिंदू धर्म, मुस्लिम धर्म, सिख धर्म यह धर्म नहीं है। जी धर्म क्या है? जिसको धारण किया जाए। जी। जैसे चीनी का धर्म क्या है? मिठास। चीनी मिठास को जी धारण किया है। अब चीनी से आप मिठास को हटा नहीं सकते। जी। अगर आप चीनी से मिठास को हटा दोगे तो फिर चीनी का अस्तित्व खत्म हो जाएगा। फिर चीनी नाम की कोई चीज नहीं रहेगी। जी। ऐसे ही नमक। नमक से जो नमकीनपन है आप उसको हटा नहीं सकते। अगर नमक से आपने नमकीनपन हटा दिया तो इसका मतलब है फिर नमक नाम की कोई चीज नहीं है। तो धर्म का मतलब जिसको धारण किया जैसे चीनी का धर्म है मिठास उसने मिठास को धारण कर रखा है। अब मिठास हटते ही चीनी नाम का अस्तित्व खत्म हो गया। जी तो इसी प्रकार से हम मनुष्य हैं। हम लोगों का धर्म क्या है? हिंदू धर्म, सिख धर्म,
00:09:46:26 ईसाई धर्म, मुस्लिम धर्म नहीं। अगर यह होता तो पता चलता है एक सनातन धर्मी आने वाले समय में कोई व्यक्ति उसको समझाता है और वो मुस्लिम बन जाता है। फिर उसको कोई दूसरा व्यक्ति समझाता है तो वो अपनी घर वापसी कर लेता है और पुनः सनातन धर्म को स्वीकार कर लेता है। एक व्यक्ति उसको जो आध्यात्मिक ज्ञान नहीं है या वेदों का ज्ञान नहीं है उस व्यक्ति को कोई समझाता बोलता है कि आप क्रिश्चियन बन जाओ तो वो क्रिश्चियन बन जाता है। लेकिन उसके बाद में वो फिर समझ में आता है उसको वो घर वापसी करता है और फिर सनातन धर्म स्वीकार कर लेता है। जी तो यह अगर वह उसको बदल रहा है तो उसका अस्तित्व खत्म हो जाना चाहिए। तो यह धर्म नहीं है। मनुष्य का एकमात्र धर्म है सेवा। सेवा के बिना कोई मनुष्य नहीं रह सकता। चाहे मुस्लिम हो, हिंदू हो, ईसाई हो, सनातन धर्मी कोई भी हो बिना सेवा के नहीं रह सकते। तो सेवा परमो धर्म। सेवा ही वास्तविकता मूल धर्म है। क्या सेवा? किसकी सेवा? वो फिर अपने आप में एक अलग विषय, बड़ा गहरा विषय होगा। लेकिन इतनी बात हमें समझनी चाहिए कि सेवा धर्म है ना कि हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई ये धर्म नहीं है। यह विचारधाराएं हैं। कोई किसी विचारधारा से प्रभावित है। आज वो उस विचारधारा को स्वीकार कर रहा है। कल वो किसी और विचारधारा से प्रभावित हुआ।
00:11:01:27 उसको स्वीकार करने लगा है। लेकिन ये धर्म नहीं है। तो गुरुदेव इसका मतलब हमें ये मानना चाहिए कि सनातन नाम का कोई धर्म नहीं है। नहीं सनातन धर्म है। क्यों धर्म है? इसको भी समझ लीजिए। जी। सनातन का मतलब क्या है? प्राचीन शाश्वत। शाश्वत हमेशा से सनातन शाश्वत जो हमेशा से है और हमेशा रहेगा जी सेवा आपके अंदर हमेशा से है और हमेशा रहेगी आप किसी भी शरीर में रह हमारे शास्त्रों में वर्णन मिलता है कि 84 लाख प्रकार की योनियां हैं लेकिन आप किसी भी योनि में जाओगे आप सेवा को नहीं छोड़ पाओगे पशु हो पक्षी हो कीट हो चिड़िया हो चींटी हो कोई भी आप देखोगे बिना सेवा के नहीं रह सकता जी आप देखते हैं कुछ ना कुछ कोई ना कोई बराबर सेवा कर रहा है एक चींटी अपने बच्चों के लिए भोजन ले जा रही है, वो उठा रही है, दाना उठा रही है। कुछ भी किसी भी आप जीव को देखेंगे बिना सेवा के वो नहीं रह सकता। तो जो सनातन धर्म है, सनातन धर्म का मतलब क्या है? लोग सनातन धर्म ही नहीं समझते। सनातन का मतलब है शाश्वत। और हम कौन हैं? हम अपनी पहचान अपने शरीर, हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, अमेरिकी, चीनी, भारतीय पाकिस्तानी इससे कर रहे हैं। ये हमारी वास्तविक पहचान नहीं है। हम वास्तविकता में शरणनी आत्मा हैं और हम हमेशा से हैं। हमेशा रहेंगे। तो कहा जा सकता है कि सनातन मात्र एक धर्म है दुनिया में। सनातन
00:12:17:15 धर्म है। लेकिन सनातन धर्म को समझने के लिए हम कि सनातन धर्म क्या है? जी तो सेवा सनातन है। जो सेवा करना है हम लोगों का जो मूल तो जो जैसे कोई अगर मुस्लिम फिलॉसफी को फॉलो कर रहा है तो वो भी सनातनी है। बिल्कुल निश्चित रूप से उसको ऐसे भी समझ सकते हैं आप। आप देखिए 1400 साल पहले दुनिया में कोई मुस्लिम था? नहीं। 2000 साल पहले कोई दुनिया में ईसाई था? नहीं। अगर हम और 500 साल पहले कोई दुनिया में सरदार सिख था। जी नहीं बिल्कुल नहीं। तो ये कहां से आए? सनातन से। सनातन। तो पहले क्या था? बहुत अच्छी बात कही गुरु। सनातन यानी जो हमेशा से था। बिल्कुल बिल्कुल। चाहे जैन हो, चाहे बौद्ध हो, चाहे जो भी अपना अपना जब उनके पैगंबर आए, उनके मैसेंजर आए, उनकी विचारधारा आई, उस विचारधारा को जो फॉलो करने वाले लोग हैं ये आए कहां से? जी सनातन से सनातन मगर गुरु जी जैसे आपने अभी एक बात कही कि यह जैसे मोहम्मद हुए या फिर ये जीसस क्राइस्ट हुए यह मैसेंजर थे गॉड के मगर अगर हम इनकी जब बुक्स को पढ़ते हैं तो काफी ऐसी बातें मिलती हैं जो वेदों का बिल्कुल स्पष्ट रूप से विरोध कर रही हैं और हमारे शास्त्रों में कहा गया कि वेद विरोध करने वाला नास्तिक है। तो हम फिर उन्हें कैसे मान लें कि
00:13:32:16 वह धार्मिक व्यक्ति थे। हां देखो समझने वाली बात यह है कई बार अगर हम वेदों वेदों को भी पढ़ते हैं वेदों को भी देखते हैं तो वेदों में वेदों का मतलब क्या है वेद का मतलब है ज्ञान और ज्ञान में सब कुछ आ जाता है जी थर्ड क्लास ज्ञान सेकंड क्लास ज्ञान फर्स्ट क्लास ज्ञान सारा ज्ञान आता है तो वास्तविकता में वेदों में भी अगर कोई देखे तो कहा जाएगा अरे एक जगह ये मना किया जा रहा है शराब और दूसरी जगह लोग शराब का भोग लगा रहे हैं शराब चढ़ा चढ़ा रहे हैं। एक तरफ मना किया जा रहा है कि यह मांस नहीं खाना चाहिए और एक तरफ लोग बड़ी चढ़ा रहे हैं। तो देखा जाए तो शास्त्रों में वेदों में भी विरोधाभास है। तो समझने वाली बात इतनी है जो व्यक्ति जिस लेवल को समझता समझता है उस लेवल की बात की जाती है। उतनी ही बात की जाती है। तो उस समय जिन परिस्थितियों में मोहम्मद साहब थे या जिन परिस्थितियों में आपके जीसस थे उनको वो समझ रहे थे कि जो लोग जितनी बात समझ पाएंगे उनको उतनी बात समझाई कि कम से कम इतना तो मानो लेकिन भगवान को याद करो लेकिन अगर कोई कहता है कि नहीं ईसाई धर्म ही पूर्ण है। इसमें पूरा ज्ञान है या कोई कहता है कि नहीं मुस्लिम धर्म पूर्ण है या कोई बोलता है कि नहीं यह सिख धर्म
00:14:47:22 पूर्ण है या कोई बोलता है कि हम कोई हम हिंदू धर्म में ही कोई व्यक्ति बोलता है कि मैं जो बोल रहा हूं यही पूर्ण है या कोई संत महात्मा ये कहे कि यही पूर्ण है तो वास्तविकता में वहां पर थोड़ा सा समझदारी की जरूरत है पूर्ण एकमात्र भगवान है और उनकी वाणी है और ये जो वाणी है वो आपको वेदों के रूप में प्राप्त है और वेदों में जो ज्ञान दिया गया है वो वो बिल्कुल परफेक्ट है। हां उसको समझने के लिए जो पात्रता चाहिए वो हमारे पास ना होने के कारण कई बार हमें वेदों में भी विरोधाभास दिखता है। लेकिन वेदों में कोई विरोधाभास नहीं वास्तविकता में नहीं है वो दिखता है। जैसे इस पे मैं मैं अभी थोड़ा सा अभी मैं बढ़ाई कर रहा था। एक वैष्णवाचार्य जी थे माधवाचार्य शास्त्री जी रामानुजाचार्य परंपरा से थे। उनकी एक बुक उन्होंने बनाई। क्यों? उसमें उन्होंने बहुत सारे प्रश्नों के जवाब दिए। तो उसमें से एक जवाब उन्होंने दिया था कि ये जो जगह-जगह पे हमें पुराने शास्त्रों में मांस दिखता है। मांस मदिरा उनके उन्होंने वो वाले अर्थ दिए थे जो निरुक्त से निकले हमारे जो पुराना प्राचीन ग्रंथ है जिससे हमने वेदों को कहते हैं कि उसको हम समझ पाए वेदों को निरुक्त की सहायता से। बिल्कुल आपने ये चीज सही कही है। तो फाइनली हम क्या माने कि जीसस क्राइस्ट और मोहम्मद साहब हमारे धर्म के ही भगवान के ही भेजे हुए
00:16:03:03 मैसेंजर थे या फिर कोई ऐसे लोग जो जिन्होंने वेदों का विरोध किया। नहीं नहीं निश्चित रूप से इस तरीके से बोलना उचित नहीं है। चाहे मोहम्मद साहब हो, चाहे जीसस हो, चाहे गुरु नानक देव जी हो, चाहे और अन्य जितने धर्म को स्थापित करने वाले धर्माचार्य हैं या धर्म को फैलाने वाले जो आप देखेंगे जो पैगंबर हैं, पुत्र हैं, मैसेंजर हैं। इनका वास्तविकता में इन्होंने लोगों की योग्यता के आधार पर बात कही। लेकिन सबने एक बात बोली ईश्वर को ध्यान करो। ईश्वर का स्मरण करो। वही सब कुछ है। आप देखेंगे चाहे ईसाई हो वह भी किसको याद करते हैं? गॉड को याद करते हैं। मुस्लिम्स को देखेंगे वो भी भगवान को याद यानी सब कहीं ना कहीं अगर देखा जाए तो ईश्वर से ही जुड़ रहे हैं। ईश्वर से कनेक्टेड होने के कारण समानता है। हां जी। लेकिन भेद कहां है? लोगों की योग्यता के अनुसार। तो इसी तरीके से भगवान के जितने भी ये मैसेंजर आए हैं, चाहे वो मोहम्मद साहब हो, चाहे वो जीसस हो, चाहे वो अन्य सनातन धर्म के लोग उन्होंने लोगों को आकर के उनकी चेतना उनके लेवल वर्तमान परिस्थिति के अनुसार ही बात कही कि इतना इतना समझ जाए लोग तो मतलब हम इन्हें ऐसा ही देखें कि हमारे ही भगवान
00:17:18:07 द्वारा भेजे गए मैसेंजर्स हैं। हमारे भगवान उनके भगवान अलग नहीं है। भगवान भगवान है। श्री कृष्ण भगवान द्वारा ही एक ही परमात्मा द्वारा परमात्मा द्वारा श्री कृष्ण द्वारा ही सबको भेजा जाता है कि आप जाओ और धर्म की स्थापना करो। धर्म को समझो और धर्म की चर्चा करो और व्यक्ति को उसके अनुसार जिस जिस तरह के उसमें सामर्थ हो उसके अनुसार उसके अनुसार वो कार्य करें। जी अच्छा गुरुदेव एक ये पब्लिक में काफी ये बात है चर्चित कि जैसे
00:17:51:06 हमारे श्रील प्रभुपाद जी हैं। इनके बारे में कई कहा जाता है कि शिव को नहीं मानते थे। ऐसा कई बार आता है कि कृष्ण को ही कहते हैं और शिव को नहीं मानते। इन्होंने भागवतम में अपने भाष्य में यह तीसरे शायद स्कंध है और 25वा चैप्टर है। 25वां श्लोक है। उसमें कहा है कि शिव को कृष्ण के तुल्य समझना समझने वाले मूर्ख हैं शिव और दुर्गा को। तो इस तरह की चर्चाएं फैली हुई है। ये बात सही है। कोई भी जब तक समझेगा नहीं सिद्धांतों को तो नहीं समझ पाएगा। मेरा आप सबसे यह प्रश्न है परमात्मा कितने हैं? परमात्मा कितने हैं? परम भगवान जी कितने हैं? आप बताइए कितने परमात्मा है? मेरी जानकारी के अनुसार तो एक ही है। आपकी जानकारी नहीं सबकी जानकारी के अनुसार हिंदू मुस्लिम, सिख, ईसाई किसी से भी पूछो कि भाई परम ब्रह्म परमात्मा, परम भगवान एक शक्ति सब बोले। मतलब मूर्ख से मूर्ख व्यक्ति बोलेगा कोई शक्ति है। एक जो एक शक्ति है जो संसार को चला रही है। जी। तो यानी एक व्यक्ति। वो एक कौन है? जी इसको हमें वेदों से जानना है और वेदों में इसका स्पष्ट निर्देश है। वेदों में बताया गया है कि वास्तविकता में किसकी क्या स्थिति है। चैतन्य चरता में वर्णन आता है एकले ईश्वर कृष्ण और सब भ्रत
00:19:06:12 एकमात्र ईश्वर परमेश्वर कौन है? कृष्ण है और सब क्या है? भ्रत। वृत्त मतलब होता है दास और सब सर्वेंट है। शिव जी भगवान के महान भक्त हैं। और शिव तत्व को समझने के लिए प्रभुपाद जी ने और भी जगह बहुत कुछ बोला है। शिव तत्व जो है वो जीव तत्व से ऊपर है। यानी ब्रह्मा जी के पोस्ट है। ब्रह्मा जी एक पद है। ब्रह्मा जी कोई व्यक्ति नहीं है। लेकिन शिव एक व्यक्तित्व है। और शिव को प्रभुपाद जी ने बताया शास्त्रों के आधार पर कि यह ब्रह्मा जी और कृष्ण के बीच की स्थिति है। अच्छा यानी शिव को आप यह भी नहीं बोल सकते कि ये पूर्ण भौतिक है या जीवात्मा है और ना उनको ये बोल सकते हैं कि ये पूर्ण ब्रह्म परब्रह्म परमात्मा है। तो ऐसा नहीं है कि हम शिव जी को मानते नहीं है। हम शिव जी का सम्मान करते हैं। वो महा भगवान के महान भक्त हैं। हम हनुमान जी का सम्मान करते हैं। वो हनुमान जी के महान भक्त हैं। आप देखेंगे हमारे कई मंदिरों में सीताराम, लक्ष्मण, हनुमान जी के आपको विग्रह मिलेंगे और हनुमान जी और शिव जी रुद्रावतार हैं। जी तो उनमें भेद नहीं है। तो ऐसा नहीं है कि हम उनको नहीं मानते या उनको उनका अपमान करते हैं या उनकी उपेक्षा करने वालों को मूर्ख कह दिया ना तो इससे आपको नहीं लगता कि पाखंडी पाखंडी कहा गया। ये मैं नहीं कह रहा। वेदों में अगर आप पढ़ेंगे, शास्त्रों
00:20:21:15 को पढ़ेंगे तो शास्त्रों में यह बोला गया कि जो व्यक्ति भगवान को भगवान के समान अन्य देवी देवताओं को समझता है वो व्यक्ति पाखंडी है। जो व्यक्ति भगवान के समान समझता है। अच्छा मतलब ये जो शिव और दुर्गा है ये इनको अगर कोई भगवान के समान समझता है। शिव देवी देवता नहीं है। शिव देवी देवता से ऊपर है। देवी देवता अलग हैं। भगवान से श्री कृष्ण भगवान से देखिए बात वही फिर आ जाएगी कि अभी हमारा लेवल नहीं है। चर्चा करने का क्योंकि हम अगर हम जनरल पब्लिक को कुछ बोलेंगे तो वो समझ नहीं पाएगा। तो उसको वो समझने के लिए उस चेतना पे आना समझने में आता है कि परम वैष्णव शिव जी हैं। हां परम वैष्णव है और उनका स्थान अलग है। वो देवी उनको देवी देवता नहीं बोल सकते। देवी देवता तो पद है। जैसे सूर्य चंद्र ये पद है। जैसे मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री ये पद है। जी। इस पद पर आज कोई बैठा है। कल कोई बैठा होगा। तो इसी तरीके से जो सूर्य हैं, चंद्र हैं इन पर आज कोई व्यक्ति बैठा हुआ है। कल कोई बैठेगा। इंद्र पद है। जी। वर्तमान समय में इंद्र कौन है? तो शास्त्रों में ऐसा बताया गया। अगर हम शास्त्रों को पढ़ेंगे, समझेंगे, जानेंगे तो ये सब क्लियर है। ठीक है? तो मतलब ये कह सकते हैं कि शिव जी का और दुर्गा जी का नाम श्री कृष्ण के समान समझना नहीं चाहिए। हां
00:21:36:24 शिव जी के समान उनको नहीं भगवान एक है परमात्मा एक है जी शिव जी को अगर कोई कृष्ण के समान सोचता है कि एक ही बात है भगवान कृष्ण कहो या शिव कहो एक ही बात है तब वो ठीक नहीं अच्छा लेकिन शिव से जो द्रोह करता है शिव जी का जो अपमान करता है शिव जी की जो उपेक्षा करता है उससे भगवान प्रसन्न नहीं होते उसे कभी भगवान की भक्ति नहीं मिलेगी जी अच्छा गुरुदेव एक ये जो शब्द आता है कि परम वैष्णव शिव जी परम वैष्णव है। इसको थोड़ा सा प्रकाश डालिए कि क्या है? देखिए वैष्णव एक होता है वैष्णव। वैष्णव मतलब बोलते हैं जो भगवान का भक्त है। भगवान के आदेशों के अनुसार जीवन जीता है। तो शिव जी को परम बोला जाता। शिव जी का और कोई उद्देश्य नहीं है। शिव जी सर्वश्रेष्ठ भगवान के भक्त हैं। अच्छा। अच्छा। ठीक है ना? अच्छा। परम मतलब बहुत श्रेष्ठ। मतलब उनसे श्रेष्ठ और कोई भक्त नहीं है। नहीं ऐसा नहीं कहेंगे। वो फिर वो एक डी विषय हो [हंसी] जाएगा। लेकिन क्योंकि एक्चुअली भगवत गीता के भाष्य में प्रभुपाद जी लिखते हैं कि शिव से परम और कोई भक्त को वहां मेंशन किया उन्होंने शिव जी से शिव जी से परम कोई हरिदास ठाकुर जी हैं उनको परम भक्त कहा है शिव जी से भी ऊपर हां तो ढेरों और भक्त बहुत भक्त मतलब शिव जी परम वैष्णव नहीं है फिर
00:22:52:07 से परम वैष्णव नहीं शिव जी भगवान के महान भक्त हैं और वो भगवान के बहुत देखिए जैसे इसको ऐसे समझ सकते हैं कि भगवान को प्रेम करना करने वाली अनंत जीवात्माएं हैं। जी और उन अनंत जीवात्माओं में हर व्यक्ति का अपना अपना स्थान है। जी अब उनमें कुछ बहुत ऊपर लेवल पर है। तो जो बहुत ऊपर लेवल पर हैं उनमें भी बहुत वैरायटी है। जी तो इस तरह से हम देखेंगे अगर बहत भाव पढ़ेंगे और ग्रंथ पढ़ेंगे आचार्यों के ट गोस्वामियों के तो वहां आपको पता चलता है कि नहीं इनसे बड़े भक्त ये हैं। इनसे बड़े भक्त ये है उनसे बड़े भक्त ये हैं। और फाइनली पता चलता है कि नहीं सबसे बड़ी भक्त तो राधा रानी है। वह भगवान की महान भक्त हैं। उनसे बड़ा कोई भक्त नहीं है। तो मतलब शिव जी को परम वैष्णव माने या ना माने? नहीं निश्चित रूप से परम वैष्णव है। परम वैष्णव फिर हरिदास जी से तुलनात्मक रूप में उनको ऐसे मतलब क्या उसको समझाने के लिए प्रभुपाद जी ने कोई एक सिद्धांत दिया। उसके आधार पर यह बताया है कि हरिदास जी को बोला कि हरिदास जी इतने समर्पित थे कि उनको एक वैश्या पहुंचती है और वो उनको अप्रोच करती है अपना संग करने के लिए रात्रि के समय में अकेली पहुंचती है लेकिन नानाचार्य हरिदास ठाकुर विचलित नहीं होते अच्छा अच्छा बल्कि वो उसको भक्त बना
00:24:07:13 देते हैं और शिवजी कैसे मतलब तो शिवजी के विषय में शिव जी की स्थिति भी साधारण स्थिति नहीं है। लेकिन अगर शिवजी के विषय में अह शास्त्रों में पढेंगे तो जब मोहिनी अवतार का दर्शन शिवजी बोलते हैं कि भाई आप मुझे अपना मोहिनी अवतार दिखाइए। तो भगवान कहते हैं नहीं तुम मोहिनी अवतार मत दो। तो शिव जी बोलते हैं नहीं मुझे आपका मोहिनी अवतार देखना है। वो बहुत सुंदर है। तो जब भगवान अपना मोहिनी अवतार लेते हैं तो पता चलता है शिवजी विचलित हो जाते हैं और उनके पीछे भागने लगते हैं। अच्छा। तो कहने का तात्पर्य है उस दृष्टांत को दिखाने के लिए प्रभुपाद जी ने एक बात बोली कि जो भगवान शिवजी उसको कंट्रोल नहीं कर पाए। शिव जी वहां कंट्रोल नहीं कर पाए और हरिदास जी ने कंट्रोल कर लिया। तो इस बात को समझाने के लिए ये बात बोली लेकिन शिव जी का स्थान कोई काम स्थान नहीं है। ऐसा सोचना कि नहीं वो हरिदास जी से छोटे हैं या हरिदास जी उनसे बड़े हैं। ये नहीं एक दृष्टांत देने के लिए बताया। वो भागवतम में कहा है ना कि जैसे यहां जो श्रीमद् भागवत में भगवत गीता में कहा प्रभुपाद जी ने कि शिव जी को जब पार्वती माता ने कामदेव ने उनको जब वो किया था तो प्रेरित तो पार्वती माता के समझाने पर वो मान गए थे और हरिदास ठाकुर जी नहीं माने थे ये दृष्टांत दिया था वही तो एक दूसरा दृष्टांत भी मैंने और बताया
00:25:22:21 हां मोहिनी जी वाला मोहिनी वाला उसके अलावा ये भी तो कहने का तात्पर्य केवल इतना सा है कि आचार्य कुछ बोल रहे हैं तो वह कुछ प्रसंग से कुछ समझाने की बात कर रहे हैं। किसी बात को पकड़ कर के खींचना या उसको अलग तरीके जैसे राम जनमानस क्या करता है? वो बात को पकड़ता है। बोले अरे ऐसा कैसे हो गया? हरिदास ठाकुर कौन है? शिवजी से बड़ा कौन भक्त है? चारों तरफ शिव जी के मंदिर हैं। शिव जी की इतनी आराधना है। सनातन धर्म में शिव जी का कितना ऊंचा स्थान है। और आप कह रहे हैं कि हरिदास ठाकुर उनसे बड़े हैं। तो ये आम व्यक्ति नहीं समझ पाता है कि क्या ये क्या बोल दिया? ऐसा थोड़ी होता है। लेकिन हमें समझना होगा कि एक भक्त, एक संत प्रभुपाद जी किस आधार पर क्या बताना चाह रहे हैं। क्या मैसेज देना चाह रहे हैं? क्या समझाना चाह रहे हैं? वो हमें थोड़ा सा समझना होगा। लेकिन ऐसा नहीं है कि शिव जी की स्थिति कोई छोटी स्थिति है या वो छोटी नहीं है पर एक समय पर जाकर के हरिदास से कहीं ना कहीं वो उस परिपेक्ष में जिस घटना को लेकर के वो समझा रहे हैं। हरिदास जी ने कंट्रोल कर लिया इंद्रियों को और शिव जी नहीं कर पाए। उस समय हां ये बात बताने की जी। अच्छा तो आगे चलेंगे एक एक दूध दही वाला उदाहरण बहुत ख्यापित है हमारे शिव जी को जी शिव जी को लेकर के जिस प्रकार कृष्ण जी जिस प्रकार दूध से दही बन जाता है मगर दही से दूध नहीं बनता है उसी प्रकार
00:26:38:04 श्री कृष्ण तो शंकर भगवान बन सकते हैं मगर शंकर जी पुनः श्री कृष्ण नहीं बन सकते बिल्कुल सही बात ये कैसे है और कहां से है ये शास्त्र में चैतन्य महाप्रभु ने इसको समझाने का प्रयास किया कि अचिंत भेदाभव दर्शन दिया अचिंत भदा वेद का मतलब होता है है भी और नहीं भी है। कृष्ण शिव है भी और नहीं भी है। तो लोगों ने पूछा कैसे है? कैसे नहीं है? तो उन्होंने उदाहरण दिया कि दूध से दही बनाया जा सकता है। तो जब दूध से जो दही बना है अगर दही को पूछा जाए कि उसमें क्या कंटेंट है? तो आप क्या कहेंगे? दूध ही तो है। जी केवल दही में और दूध में भेद क्या है? जाम का। बिल्कुल। उसमें जाम पड़ते ही वो दही बन जाता है। लेकिन है तो वो दूध का ही कंटेंट। तो दूध दही को भी दूध बोला जा सकता है। एक तरह से दही दूध है भी और नहीं भी है। जी जी जी तो दूध से दही बन सकता है। लेकिन अगर आप दही से दूध बनाना चाहो नहीं बन सकता तो नहीं बन सकता। इसी बात को समझाने के लिए बोला कि कृष्ण ये चैतन महाप्रभु ने मतलब मुझे लगता था कि ब्रह्म संहिता का श्लोक है ऐसा कुछ दूध दही वाला। नहीं एक्चुअली एक्सप्लेन करने के लिए आचार्यों ने चैतन्य महाप्रभु जी ने भी बोला है। ब्रह्म संहिता से आचार्यों ने कई तरह समझाया। अच्छा मतलब नहीं ये चरितामृत में भी है या फिर ब्रह्म संहिता में है? नहीं ब्रह्म
00:27:53:06 संहिता में है। इसको एक्सप्लेन करने के लिए महाप्रभु ने अन्य आचार्यों ने सब लोगों ने इसको एक्सप्लेन किया। अच्छा अच्छा तो यहां पर एक क्वेश्चन ये बनता है गुरुदेव कि जैसे हमारे ईश्वर के लिए कहा गया पूर्ण ईश्वर ईश्वर अबाध्य है। कुछ भी कर सकता है। तो जब हम उसके सामने लगा देते हैं कि वो यह बन करके ही वापस नहीं बन सकता तो फिर यह अबाध्य हो गया। क्योंकि बृहधारण्य उपनिषद का एक ऐसे नियम है कि ईश्वर वही है जो जिसके सामने कोई लिमिट ना लग पाए। बाध बाधित नहीं हो सकता ईश्वर हमारा पूर्ण ईश्वर श्री कृष्ण भगवान कुछ भी कर सकते हैं। तो यहां पर हम कहीं ना कहीं उन्हें बाधित कर रहे हैं कि जैसे अब दही तो भाई पूर्ण नहीं है। वो तो अपूर्ण है। अब यहां पर श्री कृष्ण को हम बाधित कर रहे हैं कि वो शंकर बनने के बाद पुनः श्री कृष्ण नहीं बन सकते। तो यह एक ऐसा आता रहता है सवाल इस तरह से। एक बार फिर से रिपीट करिए अपना प्रश्न। जैसे हम सनातन धर्म का जो कांसेप्ट है पूर्ण ईश्वर वाला जिसमें जैसे अन्य जो पंथ हैं उसमें ईश्वर अवतार नहीं ले सकता यह नहीं कर सकता वो नहीं मगर हमारा क्या है कि ईश्वर ने कुछ भी कुछ भी का मतलब वो कुछ भी कर सकते हैं सब कुछ कर सकते हैं कहीं पे भी बाधित नहीं होते वो तो यही सर्वोच्च ईश्वर की सबसे बड़ी पहचान है कि वो बाधित नहीं हो सकता लिमिटेड नहीं हो सकता अनलिमिटेड है कुछ भी कुछ भी का मतलब कुछ
00:29:08:12 नहीं अच्छा इस चीज को उपनिषद भी हमारे मानते हैं वेद भी मानते हैं कि वो बाधित नहीं हो सकता सच्चिदानंद स्वरूप परमेश्वर तो यहां पर हम जब दूध दही से उनकी तुलना कर रहे हैं कि जिस प्रकार दूध से दही पुनः वापस दूध नहीं बन सकता उस उसी प्रकार श्री कृष्ण भी शंकर बनने के बाद पुनः कृष्ण नहीं बन सकते। तो यहां ना सकते वाला आ गया ही कांट। [हंसी] और सनातन धर्म के ईश्वर के सामने वही है कि ये नहीं लिखा जा सकता कि ही कांट डू इट। हां। तो देखिए समझने वाली बात यह है जब भी कोई भौतिक उदाहरण दिया जाता है तो वो केवल समझाने देखिए पहले तो यह बात समझना बहुत आवश्यक है। ईश्वरी विषय जो है ना वो अचिंत है। अचिंत का मतलब क्या होता है? विचारणीय नहीं है। हां जो आपकी बुद्धि से, आपकी सोच से, आपकी मन की पहुंच से परे है। हम तो इसको अचिंत बोला जाता है। तो अचिंत विषय को मानसिक चिंतन द्वारा एग्जैक्ट नहीं समझा जा सकता कभी भी। नहीं तो यहां पे ये दूध दही से उनका करें मिलान या ना करें। नहीं वो समझने के लिए जब किसी को कोई बात आपको बतानी है अब जो विषय अचिंत है और लोग चिंतन करना चाहते है लोग तर्क के आधार पर समझना चाहते हैं तब निश्चित रूप से उन्हें एक्सप्लेन करने के लिए भौतिक उदाहरण देके बात समझाई जाती है नहीं तो इसको निराधार माने या क्या माने कि ये ये इसको जैसे आप जैसे कोई
00:30:23:15 हमारे गुरुदेव हम समझा रहे हैं किसी को डिवोटी को तो उसमें ये इसको तर्क को ले एक्सेप्ट करे या ना करें मतलब उसमें फिर बात ये तर्क निश्चित रूप से स्वीकार किया जाए गुरुजनों ने बोला है देखिए पहली चीज तो यह है कि हम लोग आचार्यों को फॉलो करते हैं। ठीक है ना? और हम लोग एक दूसरे को प्रभु संबोधित करते हैं। तो आप प्रभु बोलेंगे तो वो ज्यादा अच्छा होगा। और हमारे गुरु जो है वो परम पूज्य गोपाल कृष्ण गोस्वामी महाराज जी हैं। हमारे आचार्य प्रभुपाद जी हैं। तो गुरु एक बहुत बड़ा व्यापक शब्द है। वो अलग बात है कि गुरुजन बड़ी दयालता करके हम लोगों को कोई जिम्मेदारी देते हैं तो वो और हम उस पर सेवा करते हैं और उस पर कार्य करते हैं। तो ये समझना बहुत आवश्यक है। तो हम लोग एक दूसरे को प्रभु बोलते हैं। हम अपने को गुरु नहीं मानते। हम अपने को भगवान का सेवक और गुरु का दास मानते हैं। अच्छा अच्छा। तो कहने का तात्पर्य है कि जो आपने कहा कि हम दही दूध दही बोले कि ना बोले निश्चित रूप से बोलिए नहीं बोलेंगे तो समझेंगे कैसे लोग लेकिन इसके साथ-साथ ये भी बोलिए कि ये अचिंत विषय है इसको एग्जैक्ट तुलना करने की कोशिश मत करो अच्छा अच्छा मतलब एक कैजुअली इसको मान सकते हैं कि बच्चों को जैसे समझाने के लिए हम कुछ भी उदाहरण दे देते हैं बाकी इसका कोई मीनिंग नहीं है। इसको समझाने
00:31:38:28 के लिए बताया गया कि शिव जी और कृष्ण में और भगवान में क्या भेद है इसको कैसे समझा जाए। हां ठीक है जी जी ठीक है आगे चलते हैं गुरुदेव एक आता है [हंसी] सॉरी प्रभु जी एक ये भी आता है निकल कर के कि जैसे क्या श्रीमद् भागवतम पुराण का कोई विशेष महत्व है 18 महापुराणों में या सभी पुराण बराबर है श्रीमद् भागवत पुराण का विशेष महत्व है और इसे मैं नहीं डिक्लेअ कर रहा हूं इसे स्वयं जिन्होंने ने लिखा है वो डिक्लेअर कर रहे हैं वेदव्यास जी। अच्छा अच्छा क्योंकि वेदव्यास जी ने जब 17 पुराण लिख लिए फिर भी अशांत थे। वेद, पुराण, उपनिषद सब लिख चुके हैं लेकिन फिर भी अशांत है। फिर भी उनको शांति नहीं मिल रही है। तो वो अपने गुरु का ध्यान करते हैं। जी। तो नारद मुनि प्रकट होते हैं और फिर उनको चतुश्लोकी भागवत सुनाते हैं। अच्छा। और फिर वो चतुश्लोकी भागवत को 18,000 श्लोकों में एक्सप्लेन करते हैं। और जब भागवत की रचना करते हैं तब वो पूर्ण रूप से शांत और आनंद का अनुभव करते हैं। अच्छा तो श्रीमद् भागवत वेदव्यास जी ने बड़ी ही परिपक्व अवस्था और अपने
00:32:54:02 गुरु के निर्देशन में उसको एक्सप्लेन किया और उसको बताया। तो भागवत का सभी पुराणों से सभी वेद पुराण उपनिषद उन सब का सार है। भागवत जो है इसीलिए भागवत को सर्वश्रेष्ठ बोला जाता है। वो भी है पुराण लेकिन उसको महापुराण बोलते हैं और उसका बहुत विशेष स्थान है। अच्छा गुरुदेव जैसे प्रभु जी प्रभु जी जैसे हमारे 18 पुराणों की जब हम सूची को चेक करते हैं। जैसे देवी भागवत में आई है वो सूची। नारद पुराण में आई है। भागवत पुराण में भी अंत में तो उसमें सूची में वो अंत में नहीं आता है। वो मध्य में आता है। एक तो यह कंट्राडिक्शन हो गया। सूची में भागवत मध्य में भागवत पुराण मध्य में आता है। एक तो ये शंका संशय का विषय आ गया। दूसरा यह आ गया कि भागवत नाम के दो पुराण हैं। देवी भागवत और श्रीमद् भागवत। यह जो श्री कृष्ण बाला है और 18 महापुराणों में जो नाम मेंशन है वह सिर्फ भागवत मेंशन है। उसमें ना तो देवी भागवत कहा गया है तो ना ही ना ही उसमें श्रीमद् भागवत कहा गया है। तो जैसे वैष्णवाचार्य वैष्णवाचार्य माधवाचार्य शास्त्री जी ये कोट करते हैं कि एक ही पुराण के दो पार्ट हैं। एक देवी भागवत है और एक श्रीमद् भागवत है। अच्छा श्रीमद् जो देवी भागवत है उसमें भी ये चीज है कि उनका
00:34:09:08 असंतुष्टि दिखाई गई है। ये हमारे महर्षि वेदव्यास जी की जो तो ये फिर संशय का विषय आ जाता है और अगर हम इनको दोनों को पुराणों को एक नहीं मानेंगे देवी भागवत को श्रीमद् भागवत को तो हमारे पुराण 18 से हो जाएंगे 19 तो वो हमारी सूची कैंसिल हो जाएगी। उस पे फिर प्रश्न चिन्ह उड़ जाएगा। तो इसको कैसे हम समझे? देखिए मूल बात यह है मैं यह कहना चाहूंगा कि जो जनरल आम व्यक्ति है वो इन सूची में इन नामों में इनमें ना फंस करके वह पहले मूल चेतना में आए क्योंकि हम अगर जनरल व्यक्ति को कुछ चर्चा करेंगे ना और उसका वह स्तर है नहीं वह उसको समझ नहीं सकता तो वो उस व्यक्ति को उसको स्वीकार नहीं कर पाएगा सबसे बेहतर ये है सबसे बेहतर तरीका जो हमारे आचार्यों ने बोला पहले जैसे चैतन्य महाप्रभु जो कि स्वयं भगवान है जी उनके गुरु ने उनसे क्या कहा जी कि तुम मूर्ख हो तुम भगवान का नाम जप करो जी जी ठीक है तो जब स्वयं भगवान भगवान श्री कृष्ण जो कि ज्ञान के स्रोत हैं और वो जब प्रकाश वाराणसी में आते हैं आचार्यों के बीच में जो वेदांती है तो वहां जाकर के जब वो पहुंचते हैं और लोग उनको बोलते हैं कि अरे ये क्या
00:35:24:09 तुम नाचते हो गाते हो रोते हो कीर्तन करते हो ये क्या कुछ वेदांत पे चर्चा करो कुछ वेदों पे चर्चा करो कुछ तर्क वितर्क करो चीजों को आप करो आप तो इतने विद्वान आप कर सकते हो तो वो क्या बोलते हैं मेरे गुरु ने मुझसे बोला है कि तुम मूर्ख हो तुम भगवान के पवित्र नाम का जाप करो। तुम में इतना बुद्धि नहीं है कि तुम इन वेदों को पढ़ सको। इन पर चिंतन कर सको। इन मनन कर सको। इसमें बाल की खाल निकलेगी। तुम्हारे बहुत सारे प्रश्न होंगे और तुम कंफ्यूज होगे और तुम फिर किसी लायक नहीं रहोगे। इसीलिए अगर आप देखोगे चैतन्य महाप्रभु ने केवल हमें आठ श्लोक दिए। अच्छा शिक्षाष्टकम और उन्होंने कोई वेद, पुराण, उपनिषद, बहुत कुछ लिख के कुछ बहुत सारे ग्रंथ नहीं दिए। केवल उन्होंने आठ श्लोक दिए। इन आठ श्लोकों को बस कोई मान ले इन पर चल ले उसको जीवन का लक्ष्य मिल जाएगा। तो मेरा कहना यह है कि हम जनरल पब्लिक में जो भी तर्क वितर्क भागवत पुराण इसमें यह इसको यह वहां यह इन सब में ना पड़ के अगर हम कलयुग के मूल धर्म को समझे और उसको स्वीकार करें तो मनुष्य लक्ष्य जल्दी मिलेगा। मनुष्य जीवन का जो मूल लक्ष्य है वो जल्दी मिलेगा। नहीं वह तो ठीक है गुरु प्रभु जी मगर अभी जैसे आपने एक बात कही कि भागवतम पुराण श्रेष्ठ है तो उसको श्रेष्ठ माने या ना माने अगर माने तो फिर देवी भागवत भी उसी के तुल्य हो गई बराबर आ गई या फिर उसको क्या मतलब 19 पुराण माने
00:36:39:13 18 माने फिर वो एक संशय बना रहेगा फिर संशया आत्मा विनश्यति भगवान श्री कृष्ण ने कहा [हंसी] चार में देखिए ऐसा है ना संशय आत्मा विनश्यति लेकिन आत्मा को ये समझना होगा कहां संशय करना है कहां नहीं करना है और संशय में भी प्रश्न जो हम करते हैं वो अलग-अलग स्तर पर अलग कई बार क्या होता है जब हम प्रश्न करते हैं गुरु से और गुरुजन क्या करते हैं हमें उसका उत्तर नहीं देते तो उसके दो कारण है एक कारण ये है कि वो जानते हैं कि अभी इस प्रश्न को समझने के ये योग्य नहीं है या वो उस विषय पर अभी चर्चा करना उचित नहीं समझते इसलिए मैं आपको सिंपल सी एक बात बोलूंगा कि हम कोई भी विषय को कुछ भी ऐसा नहीं बोलना चाहते जिसको कोई व्यक्ति अलग परिपेक्ष में देखे अच्छा अच्छा जो शास्त्र में बोला गया जो वेदव्यास जी ने कहा जो नारद मुनि ने बोला हम और जो हमारे माधवाचार्य ने कहा जो हमारे प्रमाणित आचार्यों ने बोला उस चीज को हम आपको रिपीट कर रहे हैं और उसी बात को बोल रहे हैं कि हम इतना समझे कि श्रीमद् भागवत पुराण सर्वश्रेष्ठ पुराण है। मतलब ये जो सवाल आएगा अगर पढ़ने पर तो इस पर ध्यान ना दें और अपनी बुद्धि को कृष्णा कॉन्शियसनेस में लगाएं। हां क्योंकि बुद्धि में तो बहुत सारे सवाल
00:37:54:21 आएंगे। अगर हम उन सवालों की खोज में उनकी बाल की खाल में जाएंगे तो निश्चित रूप से जो मूल विषय है वो निकल जाएगा। पहले तो मुझे ये बताओ ये मनुष्य शरीर है कितने दिन के लिए? कितने दिन के लिए मिला है हमको? हम मानते हैं ज्यादा से ज्यादा 100 साल। हम मानते हैं 100 साल। ठीक है? 100 साल तक कोई जिंदा नहीं रह रहा। लेकिन हम मान लेते हैं आप 100 साल रहोगे। तो अभी 100 साल में 50 साल तो सोने में निकल जाते हैं। 50 नहीं 40 साल है ना? जी जी। बचा हुआ कमाने में निकल जाता है। दैनिक दिनचर्या में निकल जाता है। गिना चुना समय है एक जीव के पास कुछ वर्ष जी और उन वर्षों को भी हम व्यर्थ के तर्क कुतर्क बहस और उसमें जबकि हमारी कोई योग्यता नहीं है। हमारे अंदर कोई स्तर नहीं है हमारा। तो अगर हम उन विषय में फसेंगे तो निश्चित रूप से हम अपने मूल लक्ष्य से डायवर्ट हो जाएंगे। इसलिए मेरा निवेदन है आम जन आपके माध्यम से जनरल यूथ को और जनरल लोगों को कृपया व्यर्थ की चीजों में अपने को मत फसाइए वरना आप लक्ष्य से भटक जाएंगे। मूल सिद्धांत को समझिए। अगर आचार्य ने बोला, चैतन्य महाप्रभु ने बोला, माधवाचार्य ने बोला, प्रभुपाद जी ने बोला, छठ गोस्वामियों ने बोला, पूरा संसार आप देख रहे हो। सब जगह आप स्वय विवेक
00:39:09:22 से देखिए। घर जगह-जगह भागवत कथाएं ही क्यों हो रही है? अभी कलयुग का प्रभाव बढ़ रहा है तो नईनई चीजें आ रही हैं। कोई कुछ कर रहा है, कोई कुछ कर रहा है। नए-नए भगवान आ रहे हैं। नईनई खोजे आ रही है। ये सब मूर्खता है। कृपया भगवान भगवान है और भगवान का जो निर्देश है, गुरुजनों का जो निर्देश है, उसको हम स्वीकार करें और इस बात को समझे कि भागवत पुराण सर्वश्रेष्ठ पुराण है। मैं नहीं बोल रहा हूं कि मेरी कोई वैल्यू नहीं है। मेरी कोई वैल्यू नहीं है। लेकिन गुरुजनों का वैल्यू है, चैतन्य महाप्रभु का वैल्यू है। जो स्वयं साक्षात श्री कृष्ण है। वो कुछ कह रहे हैं। वो कुछ हमें बता रहे हैं। तो हम उनकी बात को स्वीकार करें और उस पर अपने जीवन को आगे बढ़ाएं। तो प्रभु जी एक एक चर्चा और है जो मैं देखता हूं कि कई बार इस के विरोध में कई ऐसे वीडियोस वगैरह आते हैं जिसमें कि क्लेम किया जाता है कि जैसे मधवाचार्य जी जो थे उन्होंने भी श्रीमद् भागवत पर भाष्य लिखा था और जो हमारे श्री चैतन्य महाप्रभु जी हैं उन्होंने मधवाचार्य जी के भाष्य को ना मान के उन्होंने श्रीधरी जो टीका है उसको प्रमाणिक माना इसके अलावा एक
00:40:24:24 चीज और है कि जैसे इस की जो परंपरा है गुरु परंपरा वो ब्रह्मा जी से शुरू होते हुए मधवाचार्य जी तक आते हुए और फिर इस तरीके से चैतन महाप्रभु जी से होते हुए और फिर हमारे जो प्रभु जी हैं शीला प्रभुपाद जी उन तक आती है। पर मधवाचार्य के जो स्वयं के अधिकृत मठ हैं वहां पर ये क्लेम मतलब डिनाई किया जाता है और वहां पर क्योंकि श्री चैतन्य महाप्रभु जी ने मधवाचार्य जी के भागवतम भाष्य को नहीं अपनाया और उन्होंने जो तत्कालीन शंकराचार्य थे शायद श्रीधर स्वामी उनके भाष्य को उन्होंने अपनाया। तो इस कारणवश उनको अपनी लाइननेज में नहीं लिया गया है। तो मधवाचार्य जी की अधिकृत परंपरा में उनका नाम नहीं है और इस की जो गुरु परंपरा है उसमें उनका नाम है। मधवाचार्य जी कहते हैं कि जो हमारी गुरु परंपरा है वो हमसे स्वयं से प्रारंभ होती है। मगर इस कहता है कि मधवाचार्य की परंपरा कृष्ण भगवान स्वयं से प्रारंभ होती है। तो यह क्लेम उठाया किया जाता है। जो आप क्लेम बोल रहे हैं इसको मुझे रिटन में दीजिए क्योंकि इस पर मेरा कोई चिंतन मनन और श्रवण नहीं है। तो हम पहले इसको डीपली तर्कों के आधार पर और प्रमाणित तथ्यों के आधार पर समझेंगे तब आपको इसके विषय में बोलेंगे। अच्छा जैसे ये
00:41:40:02 एक मेरे पास एक है जो मैं नोट एक्चुअली नोट करता रहता था। तो यह वाली चीज मुझे खराब लगी थी। किसी ने कही थी तो जैसे चैतन्य चरितामृत हमारी इस की पुस्तक है। इसमें जो हमारे चैतन महाप्रभु हैं, वह कह रहे हैं, "प्रभु हंसी कहे स्वामी ना माने यह जाना, वैश्यार भरे तारे करिए गाना, एता कहीं महाप्रभु मौना धारिला, सुनिया सवारा माने संतोष हैला।" तो इसमें ये आगे कह रहे हैं जो कोई स्वामी श्रीधर स्वामी की अवेलना करता है। तत्कालीन शंकराचार्य की अवहेलना करता है उसे वैश्याओं में गिना जाना चाहिए। ये वल्लभाचार्य जी से टॉक चल रहा है। जो है ना ये शंकराचार्य नहीं होंगे। नहीं नहीं ये उन्हीं के बारे में बात हो रही है। श्रीधरी टीका ये वही है। तत्कालीन शंकराचार्य जी हैं। तो ये उनके बारे में यहां लिखा हुआ है। तो जब मधवाचार्य जी ने खुद भागवतम पर भाष्य लिखा है जो जैसा कि इनकी परंपरा के वो गुरु हैं मधवाचार्य जी तो उनका भाष्य ना मान करके शंकराचार्य जी की परंपरा की शंकराचार्य का भाष्य जो है स्वीकार कर रहे हैं। कह रहे हैं कि अच्छा ये यहां पे ये भी कोट कर रहे हैं कि अगर
00:42:55:06 कोई और लिखने की कोशिश करेगा तो उसे वैश्याओं में गिना जाना चाहिए। इस तरह का कोट किया है। तो अब यहां पे प्रभुपाद जी ने भागवत भाष लिखा है तो वो भी उन पर भी प्रश्न उठ गया। ये इस तरह से देखिए मूल चीज पता है हमें ये समझना चाहिए जी कि मैंने फिर एक बात कही मैं फिर उसी बात को फिर रिपीट करूंगा। देखिए हम लोग इन व्याख्याओं में इन विषयों में जब चैतन्य महाप्रभु जैसे स्वयं भगवान है। वो क्या कह रहे हैं कि मैं मूर्ख हूं। जी जबकि वो सब पर डिस्कशन कर सकते हैं। सब पर चर्चा कर सकते हैं। जी हम लोग वास्तविकता में बड़ी छोटी बुद्धि के साथ आए। ना हम श्रीधर को समझ पा रहे हैं, ना माधवाचार्य को समझ पाएंगे, ना महाप्रभु को समझ पाएंगे, ना कृष्णदास कविराज को समझ पाएंगे कि वो जो बोल रहे हैं। जी जी तो इन लोगों का जो स्तर है ये दिव्य धरातल पर हैं। हम और हम लोग जो है वो संसार की निकृष्ट चेतना वाले लोग हैं। तो हम इन विषयों में ना फंस करके हरे कृष्ण महामंत्र का जप करें और यही हमारा निवेदन सबसे है। और मैं जो महाप्रभु ने बोला वही बात मैं रिपीट करूंगा कि हम मूर्ख हैं। हम इन विषयों में ना पड़कर इससे क्या होगा कि हम केवल जब हम कोई
00:44:10:07 चीज समझते नहीं है और उसको समझने की कोशिश करें तो या तो फिर हम महाप्रभु जैसी चेतना ले आए जी महाप्रभु जितना ज्ञान ले आए कि उन्होंने ऐसा क्यों किया इस इस किस परिपेक्ष में किया इसका कारण क्या था है ना क्योंकि आचार्य गण कुछ भी करते हैं कई बार वो हमें ऐसा लगता है कि अरे ये तो पथ से हटकर भी कुछ कर रहे हैं लेकिन हम उसको समझने के उतने योग्य नहीं होते कि वास्तविकता में यह कार्य किस स्तर पर हो रहा है और क्यों हो रहा है। हम तो मेरा निवेदन केवल इतना सा है कि हम इन सब में नफस करके हम मूल बात को समझे जिसे सब ने कहा है कलयुग केवल नाम आधार है ना इसमें तो कोई संदेह नहीं है किसी को जी अच्छा जितने लोग प्रश्न करने वाले हैं उन लोगों से अगर पूछो कि आप कितने माला जप करते हैं जैसे मेरा आपसे मैं आपसे प्रश्न है आप मुझसे प्रश्न कर रहे हो मेरा आपसे प्रश्न है आप कितनी माला रोज जप करते हो 16 पर डे जी नियम से जी अच्छा तो भगवान की कृपा आपको मिलेगी और आप चीजों को समझ पाओगे। तो देखो आप सबको भी मैं बोलना चाहूंगा कि जैसे प्रभु जी 16 माला जप कर रहे हैं वैसे ही आप भी 16 माला करिए और इन तर्क कुतर्क वितर्क शास्त्र के विभिन्न गहराइयां इनमें जाना हमारा
00:45:25:15 उद्देश्य नहीं है। हम कोई टीका लिखने नहीं आए हैं। हम कोई बहुत ज्ञान देने नहीं आए हैं। मैं स्वयं इस बात को समझता हूं कि मैं खुद अव्वल दर्जे का मूर्ख हूं और मुझे कोई वेद, पुराण, उपनिषद का ज्ञान नहीं है। मैं तो केवल गुरुजनों के मुख से जो श्रवण किया है उस पर पूर्ण श्रद्धा रखते हुए आगे बढ़ रहा हूं और निश्चित रूप से यही प्रत्येक अच्छे शिष्य का लक्षण है और उसे ऐसा ही करना चाहिए। उसे अपनी विवेक को अपनी बुद्धि अपनी भौतिक बुद्धि को तर्क वितर्क कोतर्क में फंसाना नहीं चाहिए। फिर भी अगर कोई प्रश्न किसी को परेशान कर रहा है तो निश्चित रूप से उसका समाधान लेना चाहिए। आपने मुझे बोला है। मैंने आपको यह भी बोला है कि हम इसको हां क्योंकि इसमें एक्चुअली इसलिए यह वाला प्रश्न था क्योंकि एक भक्तों को एक वो हो जाती है निश्चितता कि हम प्रमाणिक ज्ञान ले रहे हैं। तो इसलिए ये परंपरा पे जब प्रश्न उठता है तो प्रमाणिकता पे प्रश्न उठ जाता है। बिल्कुल मैंने आपसे बोला ना कि
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कृष्ण और अल्लाह एक हैं : शिवजी भगवान नहीं हैं Iskcon president lucknow
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